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Offences Affecting Public Health Safety Convenience Decency Morals LLB Notes

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अध्याय 14

लोक स्वास्थ्य, क्षेम, सुविधा, शिष्टता और सदाचार पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषय में

(OF OFFENCES AFFECTING THE PUBLIC HEALTH, SAFETY, CONVENIENCE, DECENCY AND MORALS)

  1. लोक न्यूसेंस- वह व्यक्ति लोक न्यूसेंस का दोषी है, जो कोई ऐसा कार्य करता है, या किसी ऐसे अवैध लोप का दोषी है, जिससे लोक को या जनसाधारण को जो आसपास में रहते हों या आसपास की सम्पत्ति पर अधिभोग रखते हों, कोई सामान्य क्षति, संकट या क्षोभ कारित हो या जिससे उन व्यक्तियों का, जिन्हें किसी लोक अधिकार को उपयोग में लाने का मौका पड़े, क्षति, बाधा, संकट या क्षोभ कारित होना अवश्यम्भावी हो।।
कोई सामान्य न्यूसेंस इस आधार पर माफी योग्य नहीं है कि उससे कुछ सुविधा या भलाई कारित होती है। टिप्पणी न्यूसेंस का अर्थ है ऐसा कोई कार्य जो असुविधा, क्षोभ या क्षति कारित करता है। न्यूसेंस दो प्रकार का होता है-(1) लोक न्यूसेंस या सामान्य न्यूसेंस तथा (2) वैयक्तिक न्युसेंस।। । लोक न्यूसेंस एक सामान्य क्षोभ है जो जन सामान्य को प्रभावित करता है तथा सभी प्रजाजन को सारवान् । क्षोभ कारित करता है। वैयक्तिक न्यूसेन्स एक ऐसा कार्य है जो किसी व्यक्ति को सामान्य प्रयोजनों हेतु उसके मकान या सम्पत्ति के उपयोग में सारवान् असुविधा या क्षोभ कारित करता है। यह एक ऐसा कृत्य है जो किसी विशिष्ट व्यक्ति या व्यक्तियों को प्रभावित करता है। कोई लोक न्यूसेन्स गठित करने के लिये कोई कार्य या अवैध लोप होना चाहिये। कार्य का अवैध होना आवश्यक नहीं है। किन्तु जैसे ही कोई कार्य न्यूसेन्स बनता है, वह अवैध बन जाता है, इसलिये नहीं कि न्यूसेन्स स्वयं अवैध है, अपितु इसलिये कि यह जनता पर एक हानिकारक प्रभाव छोड़ता है और असहनीय है। लोक न्यूसेन्स के सिलसिले में लगाये गये किसी आरोप के विषय में यह बचाव नहीं प्रस्तुत किया जा सकता है कि अमुक कार्य अपने सम्पत्ति में अपने अधिकार को प्रभावशाली बनाने के लिये किया गया था या यह कार्य अपनी सम्पत्ति पर किया गया था या वह कार्य अति प्राचीन काल से होता चला आया था। लोक न्यूसेन्स के प्रकरणों में शिकायत वस्तुत: कारित असुविधाओं में निहित होती है न कि उस व्यक्ति के, साशय या ज्ञान में, जो उस परिसर का अधिभोगी है जिस पर न्यूसेन्स का सृजन हुआ, अथवा उस परिसर का स्वामी है यदि वह किसी के कब्जे में नहीं है। यदि किसी स्वामी या नियोजक के विरुद्ध न्यूसेन्स का आरोप लगाया गया है तो उसे यह कहने का अधिकार नहीं होगा कि न्यूसेन्स उसके नौकर द्वारा किये गये किसी कार्य के कारण उत्पन्न हुआ यदि वह कार्य नौकर के नियोजन के दौरान किया गया था। किसी कार्य या कार्य के अवैध लोप के कारण कोई चोट कारित हो सकती है किन्तु इस तरह कारित चोट तब तक लोक न्यूसेन्स नहीं होती जब तक कि वह जन सामान्य को प्रभावित नहीं करती। लोक न्यूसेन्स का यह आवश्यक तत्व नहीं है कि इसके द्वारा समाज का प्रत्येक नागरिक घातक रूप से प्रभावित हो। इतना ही।
  1. अटार्नी जनरल बनाम टाड हीटले, (1897) 1 चान्सरी 560. |
  2. आर० बनाम स्टीफेन्स, (1866) एल० आर० 1 क्यू० बी० 702.
पर्याप्त है यदि न्यसेन्स के आस-पास रहने वाले लोक सामान्यतया उससे प्रभावित होते हैं 3 – विषयक प्रश्न है कि क्या न्यूसेन्स से प्रभावित व्यक्तियों की संख्या इतनी है कि उन्हें जनसामान्य बोधित किया जा सके। इस तथ्य का निर्धारण न्यायालय न्यूसेन्स की प्रकृति, लोक पर इसके प्रभाव न न्यसेन्स के विषय में शिकायत करने वाले व्यक्तियों की संख्या के आधार पर करता है। अवयव-इस अपराध के निम्नलिखित प्रमुख अवयव हैं (1) किसी कार्य को करना या करने में अवैध लोप करना। (2) ऐसा कार्य या लोप (i) कोई सामान्य क्षति, संकट या क्षोभ (क) पब्लिक को, या (ख) न्यूसेन्स के पड़ोस में रहने वाले या सम्पत्ति धारण करने वाले जन सामान्य को कारित करे, या (ii) किसी सार्वजनिक अधिकार का उपयोग करने वाले व्यक्तियों को क्षति, बाधा, संकट या क्षोभ कारित करे। लोक-इस धारा में प्रस्तुत लोक” (Public) शब्द का तात्पर्य जन सामान्य से है न कि किसी विशिष्ट रूप से परिष्कृत संवेदनशील व्यक्ति से। एक प्रकरण में 55 वर्षीय एक नागरिक ने किसी गाँव में एक चारागाह में विद्यमान इमली के पेड़ के नीचे पेशाब किया। यह अभिनिर्णीत हुआ कि यह सम्भव है कि इस तरह खुले में पेशाब करना लोक स्वास्थ्य, शालीनता तथा नैतिकता के विरुद्ध हो किन्तु यह अपने आप लोक न्यूसेन्स का अपराध गठित नहीं करता। अधिकतर गाँवों में लोक शौचालय या पेशाब घर नहीं हैं और बिना किसी अश्लील प्रदर्शन के लोक स्थानों में पेशाब करना लोगों में आम बात है। इस तरह पेशाब का किया जाना सामान्यतया गाँव वालों में किसी तरह का क्षोभ नहीं कारित करता है। वेश्यावृत्ति-लोक न्यूसेन्स कारित करने के लिये सामान्य क्षति जन-साधारण का होनी चाहिये न कि किसी विशिष्ट व्यक्ति को यदि वेश्यावृत्ति गुप्त में की जा रही है तो ऐसी वेश्यावृत्ति लोक न्यूसेन्स गठित नहीं करती, यद्यपि जिन लोगों को इस तथ्य का पता लग जाता है वे ऐसा महसूस कर सकते हैं कि नैतिकता पर अतिक्रमण किया गया है। एक प्रकरण में एक यात्री किसी डाक बंगले में ठहरा हुआ था और एक वेश्या उसके निमन्त्रण पर डाक बंगले में आयी। उस वेश्या को उस स्थान पर पुनः न आने की चेतावनी दी गई। इस प्रकरण में सामान्य क्षति तथा जनसाधारण को क्षति दोनों ही तत्व विद्यमान नहीं हैं, अत: उसे लोक न्यूसेन्स के लिये दण्डित नहीं किया जा सका। इसी प्रकार सतीत्व की याचना, किसी लोक स्थान में जो, लोक न्यूसेन्स नहीं है क्योंकि इसमें कोई सामान्य क्षति या क्षोभ सिद्ध नहीं होता। माँस या मछली का विक्रय-किसी आम सड़क पर या उसके नजदीक माँस या मछली का केवल विक्रय लोक न्यूसेन्स नहीं कहा जा सकता8 भले ही ऐसा प्रदर्शन लोगों की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाता हो। यह केवल एक कार्यपालिकीय कार्यवाही का आधार हो सकता है। इस धारा के अन्तर्गत अपेक्षित क्षोभ उस क्षोभ से भिन्न है जो लोक या जनसाधारण के एक वर्ग के किसी अन्यथा निर्दोष कृत्य के कारण दूसरे वर्ग की धार्मिक भावना को कारित होता है।
  1. फिरायामल बनाम इम्परर, (1904) पी० आर० नं० 9 सन् 1904.
  2. इन रि वेदगिरी पेरूमल नायडू, ए० आई० आर० 1937 मद्रास 130.
  3. जतीन्द्र नाथ बनाम मनीन्द्र नाथ, ए० आई० आर० 1950 कल० 331.
  4. मुसम्मात बेगम, एन० डब्ल्यू० पी० एच० सी० आर० 349.
  5. राजी (1895) अनरिपोर्टेड क्रिमिनल केसेज 765.
  6. पांग थी री (1880) पी० एल० जे० 94.
  7. जानकी प्रसाद बनाम करामत हुसैन, ए० आई० आर० 1931 इला० 674.
जुआघर- जुआ, लाटरी या शर्त लगाने के प्रयोजनों से किसी घर का निर्माण करना या उसकी देखभाल करना लोक न्यूसेन्स है क्योंकि ऐसे घर अवांछित तत्वों को आकर्षित करते हैं जिससे समीपवर्ती लोगों को क्षोभ होता है। इंग्लैण्ड में एक सामान्य जुआघर लोक न्युसेन्स10 माना जाता है किन्तु भारत में स्थिति इससे भिन्न है। हन नागजी11 के वाद में यह अभिनित किया गया कि किसी सांविधिक उपबन्ध की अनुपस्थिति में केवल एक जुआघर का रखना दण्डनीय नहीं है। यह तभी दण्डनीय होगा जब इसके द्वारा जन साधारण को कोई वास्तविक क्षोभ कारित हो। मद्रास उच्च न्यायालय ने भी इस विचार को अपनी स्वीकृति दिया है।12 । ताजिया स्थापित करना-मुटूमीरा13 के वाद में कुछ मुसलमानों ने मिलकर मुहर्रम त्यौहार के दौरान परती जमीन के एक टुकड़े पर एक प्रतिमा स्थापित किया। यह जमीन गाँव की आबादी का एक अंश थी तथा एक हिन्दू मन्दिर के नजदीक थी। प्रतिमा स्थापित किया जाना हिन्दुओं को क्षति कारित करने की सम्भावना से युक्त था। इस धारा के अन्तर्गत मुसलमानों को दण्डनीय नहीं पाया गया, क्योंकि यह धारा उन कार्यों या लोपों को दण्डित करने के लिये आशयित नहीं है जो जनसाधारण के एक वर्ग की भावनाओं का तिरस्कार करते हैं। एक विशिष्ट जगह पर किसी पूजास्थल का निर्माण, पड़ोस में रहने वाले दूसरे धर्मावलम्बियों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है परन्तु भारतीय दण्ड संहिता ऐसे किसी कार्य को लोक न्यूसेन्स नहीं मानती है। इसी तरह का विचार एक दूसरे वाद में भी व्यक्त किया गया। इस वाद में कुछ जैन धर्मावलम्बियों ने अभियुक्त के विरुद्ध एक शिकायत दर्जा कराया था। उनका विचार था कि अभियुक्त ने अपने मकान के बरामदे में माँस काटा था जो भोजन के लिये पकाया गया था। माँस ताजा था इसलिये उसमें से किसी प्रकार की दुर्गन्ध नहीं आ रही थी। किन्तु माँस का प्रदर्शन पड़ोस में निवास कर रहे जैनियों की भावनाओं के विरुद्ध था। इस कार्य को भी लोक न्यूसेन्स नहीं माना गया।14 यदि उस स्थान में जानवरों का वध किया जाता है, और लोग उन जानवरों की कराह को सुनते हैं तथा उनके खून को देखते हैं तो ऐसा कार्य लोक न्यूसेन्स माना जायेगा।15 विधि द्वारा प्राधिकृत न्यूसेंस-न्यूसेन्स का एक वर्ग ऐसा भी है जिसे विधि द्वारा प्राधिकृत न्यूसेंस के रूप में जाना जाता है, जैसे मृतक को जलाना16, अनुज्ञप्तियुक्त व्यापार17 इत्यादि। किसी लोक न्यूसेंस को उपभोग की अवधि के आधार पर वैध घोषित नहीं किया जा सकता है चाहे उपभोग की अवधि कितनी ही लम्बी क्यों न हो।18 अन्य उदाहरण- बोलने वाली तुरही द्वारा अत्यधिक शोर मचाकर रात्रि के नीरव को नष्ट करना न्यूसेन्स होगा।19 पब्लिक में अपने शरीर का नंगा प्रदर्शन, चाहे वह अपनी बाल्कनी20 से हो या किसी लोक स्थान जैसे मूत्रालय21 से, मोटरगाड़ी से22, या स्नानगृह जिससे महिलायें गुजरती हैं23 न्यूसेंस है। कांटों से ढंकी एक नंगी आकृति का विज्ञापन की तरह प्रदर्शन न्यूसेंस है।24 इसी प्रकार मेले या बाजार में भिक्षुओं द्वारा
  1. रोजियर, 1 बी० एण्ड सी० 272. |
11, 7 बी० एच० सी० आर० 74. ।
  1. थन्ड्० बनाम अरायुडू, आई० एल० आर० 14 मद्रास 364. |
  2. आई० एल० आर० 7 मद्रास 590.
  3. बैरम जी, ईदल जी, आई० एल० आर० 12 बाम्बे 437.
  4. जकीउद्दीन, आई० एल० आर० 10 इला० 44.
  5. स्वामीनाथन पिल्लई, आई० एल० आर० 19 मद्रास 464.
  6. मोहम्मद अली, 16 डब्ल्यू० आर० 6.
  7. पूर्वोक्त सन्दर्भ.
  8. स्मिथ, 2 स्टैन 704.
  9. थालसन, 9 काक्स 388.
  10. हैरिस 40 एल० जे० (एम० सी०) 61.
  11. होम्स 22 एल० जे० (एम० सी० 122.
  12. ग्रे, 4 एफ० एण्ड एफ० 73; रीड 12 काक्स 1.
  13. साउन्डर्स, 1 क्यू० बी० डी० 15.
अपनी घृणित बीमारियों का प्रदर्शन लोगों की दया का पात्र बनने के लिये भी न्यूसेंस है यद्यपि उदासीन  इसको सामान्यतया सहन कर लेती है। ऐसा कोई भी कार्य चाहे वह किसी लोक स्थान में या वैयक्तिक में जनसाधारण के समक्ष किया गया हो, जो किसी व्यक्ति को क्षोभ कारित करता है, न्यूसेंस है। यदि किसी लोक मार्ग के एक अंश का अतिक्रमण कितना ही तुच्छ क्यों न हो, किया जाता है, तो ऐसा अतिक्रमण उन लोगों को बाधा उपस्थित करेगा जिन्हें उसे उपयोग में लाने का अवसर प्राप्त है क्योंकि पब्लिक को समर्पित मार्ग के प्रत्येक इंच को उपयोग में लाने का अधिकार प्राप्त है, इसलिये ऐसे मार्ग पर किया गया अतिक्रमण लोक न्यूसेंस होगा 25 इसी प्रकार यदि पब्लिक मार्ग पर नागफनी के कांटे को फैलने दिया जाता है। तो यह लोक न्यूसेंस के सदृश होगा 26 यदि कोई व्यक्ति किसी गली के एक अंश को मकान बनाकर अपने कब्जे में ले लेता है।27 या अपने घर के समक्ष एक मंच इस प्रकार बनाता है कि उसका विस्तार गली के लिये छोड़ी गयी भूमि में रहता है।28 या कोई व्यक्ति यदि खाँई या नाली के एक अंश को पाट कर अपने कब्जे में लेता है जबकि इस प्रकार पाटा गया अंश पब्लिक प्रयोजन के लिये समर्पित29 था तो वह व्यक्ति लोक न्यूसेंस का दोषी होगा। एक प्रकरण में कुछ व्यक्तियों ने मिलकर मछली पकड़ने के उद्देश्य से एक नदी के आर-पार बाँस का बना हुआ कटघरा खड़ा कर दिया। इस कटघरे में नाव आने-जाने के लिये एक छोटा द्वार बना दिया गया था। इस द्वार को अक्सर बन्द रखा जाता था और जब नावों को ले जाना होता था तभी खोला जाता था। कठघरा लगाने वाले व्यक्तियों को इस धारा के अन्तर्गत दोषी ठहराया गया।30 एस० वेंकटरमैया बनाम राज्य31 के मामले में पेटीसनर ने भूमि न्यायाधिकरण (Land Tribunal) के समक्ष प्रतिपरीक्षण के दौरान अपने भाई को कतिपय शब्द कह दिये। उनमें कोई झगड़ा नहीं था परन्तु प्रतिपरीक्षण के दौरान पूछे गये कतिपय प्रश्नों से चिड़चिड़ा कर एवं घबराकर वह उन अवांछित शब्दों को बोल गया और इस प्रकार दुर्व्यवहार किया। यह अभिनिर्णय दिया गया कि इस प्रकार का कथन यदि सत्य हो तो भी धारा 268 के अन्तर्गत लोक न्यूसेंस नहीं कहा जायेगा क्योंकि दोनों भाइयों के बीच कोई झगड़ा (quarrel) नहीं हुआ। लोक न्यूसेंस के अस्तित्व की घोषणा करने के लिये तथा लोक न्यूसेंस को हटाने हेतु व्यादेश जारी करने के लिये कोई वाद तब तक दायर नहीं किया जा सकता जब तक विशिष्ट क्षति न सिद्ध कर दी जाय।32
  1. उपेक्षापूर्ण कार्य जिससे जीवन के लिए संकटपूर्ण रोग का संक्रम फैलना सम्भाव्य हो-जो कोई विधिविरुद्ध रूप से या उपेक्षा से ऐसा कार्य करेगा, जिससे कि और जिससे वह जानता या विश्वास करने का कारण रखता हो कि, जीवन के लिए संकटपूर्ण किसी रोग का संक्रम फैलना सम्भाव्य है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
टिप्पणी यह धारा ऐसे किसी व्यक्ति को दण्डित करती है जो कोई ऐसा कार्य करता है जिससे समाज में संक्रामक रोगों का फैलना सम्भाव्य है। हैजा, प्लेग तथा शीतला संक्रामक रोग हैं। इस धारा के प्रवर्तन के लिये यह आवश्यक है कि अभियुक्त को यह ज्ञात हो कि उसके कार्य से संक्रामक रोग का फैलना सम्भाव्य था। यदि कोई व्यक्ति जो हैजा से पीड़ित था तथा हैजा की संक्रामक प्रकृति से भी भिज्ञ था, रेलवे अधिकारियों को अपनी दशा के विषय में बताये बिना रेल यात्रा किया तो वह हैजा फैलाने के अपराध के लिये उत्तरदायी होगा।33
  1. निसार मुहम्मद खान, (1925) 6 लाहौर 203.
  2. मोलेप्पा गोल्डन, (1928) 52 मद्रास 79.
  3. वीरप्पा शेट्टी, (1996) 20 मद्रास 433.
  4. । पुरन माशी, (1935) 58 इला० 694.
  5. रूप नारायण दत्त, (1872) 18 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 38.
  6. उमेश चन्द्र कर, (1887) 14 कल० 656.
  7. 1989 क्रि० लॉ ज० 789 (कर्नाटक).
  8. बरादी प्रसाद 12 सब, डब्ल्यू ० आर० 160.
  9. कृष्णाप्पा, (1883) 7 मद्रास 276.
एक वेश्या ‘अ’ ने एक पुरुष को जिसने उसके इस व्यपदेशन पर विश्वास करते हुये कि वह किसी रोग से पीड़ित नहीं है उसके साथ सम्भोग किया, योनि रोग संचारित किया। इस मामले में अ नामक वेश्या भारतीय दण्ड संहिता की धारा 269 के अधीन रोग का संक्रमण (infection) फैलाने के लिये दायित्वाधीन होगी, क्योंकि वह जानती थी कि वह संक्रमणीय योनि रोग से ग्रसित है जिसकी छूत से दूसरे लोग भी पीड़ित हो सकते हैं और इस तथ्य को जानते हुये उसने उस पुरुष से यह मिथ्या व्यपदेशन किया कि वह ऐसे किसी। रोग से मुक्त है और इस प्रकार के व्यपदेशन (representation) के आधार पर उस पुरुष के साथ लैंगिक सम्भोग किया।
  1. परिद्वेषपूर्ण कार्य जिससे जीवन के लिए संकटपूर्ण रोग का संक्रम फैलना सम्भाव्य हो-जो कोई परिद्वेष से ऐसा कोई कार्य करेगा जिससे कि, और जिससे वह जानता या विश्वास करने का कारण रखता हो कि, जीवन के लिए संकटपूर्ण किसी रोग का संक्रम फैलना सम्भाव्य है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
271, करन्तीन के नियम की अवज्ञा- जो कोई किसी जलयान को करन्तीन की स्थिति में रखे जाने के, या करन्तीन की स्थिति वाले जलयानों को किनारे से या अन्य जलयानों से समागम विनियमित करने के, या ऐसे स्थानों के, जहाँ कोई संक्रामक रोग फैल रहा हो और अन्य स्थानों के बीच समागम विनियमित करने के लिए सरकार द्वारा बनाए गए और प्रख्यापित किसी नियम को जानते हुए अवज्ञा करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।
  1. विक्रय के लिए आशयित खाद्य या पेय का अपमिश्रण- जो कोई किसी खाने या पीने की वस्तु को इस आशय से कि वह ऐसी वस्तु को खाद्य या पेय के रूप में बेचे या यह सम्भाव्य जानते हुए कि वह खाद्य या पेय के रूप में बेची जाएगी, ऐसे अपमिश्रित करेगा कि ऐसी वस्तु खाद्य या पेय के रूप में अपायकर बन जाए, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
टिप्पणी जो कोई किस खाद्य या पेय पदार्थ में किसी हानिकारक वस्तु का सम्मिश्रण करता है इस धारा के अन्तर्गत दण्डित किया जायेगा। अधिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से अहानिकारक वस्तु का सम्मिश्रण जैसे दूध में पानी मिलाना या घी में वनस्पति तेल मिलाना इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय नहीं बनाया गया है। इस धारा में प्रयुक्त “अपमिश्रण” (Adulteration) शब्द का अर्थ है, एक वस्तु को दूसरी वस्तु, चाहे पूर्णतः भिन्न, या उसी प्रकृति की किन्तु उससे निम्न स्तर की, में मिलाना। इस धारा के प्रवर्तन हेतु यह प्रतिस्थापित करना आवश्यक है कि कोई खाद्य या पेय पदार्थ अपमिश्रित किया गया है और अपमिश्रण का बेचा जाना आशयित है।
  1. अपायकर खाद्य या पेय का विक्रय-जो कोई किसी ऐसी वस्तु को, जो अपायकर कर दी गई हो, या हो गई हो, या खाने पीने के लिए अनुपयुक्त दशा में हो, यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि वह खाद्य या पेय के रूप में अपायकर है, खाद्य या पेय के रूप में बेचेगा, या बेचने की प्रस्थापना करेगा या बेचने के लिए अभिदर्शित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
टिप्पणी यह धारा अपायकर खाद्य या पेय के विक्रय को दण्डित करती है। इस धारा के निम्नलिखित अवयव हैं। (1) किसी पदार्थ को भोज्य अथवा पेय के रूप में बेंचना या बेंचने के लिये प्रस्तावित करना; (2) ऐसा पदार्थ अपायकर हो गया हो या ऐसी स्थिति में आ गया हो कि भोज्य अथवा पेय के लिये उपयुक्त न रह गया हो, (3) विक्रय या अनावरण (exposure) इस ज्ञान या विश्वास से किया गया हो कि पदार्थ भोजन अथवा पेय के रूप में अपायकर है। इस धारा के अन्तर्गत अपायकर पदार्थों का भोजन अथवा पेय के रूप में विक्रय दण्डनीय बनाया गया है न कि अपायकर पदार्थ का केवल विक्रय।
  1. औषधियों का अपमिश्रण- जो कोई किसी औषधि या भेषजीय निर्मिति में अपमिश्रण इस आशय से या यह सम्भाव्य जानते हुए कि वह किसी औषधीय प्रयोजन के लिए ऐसे बेची जाएगी या उपयोग की जाएगी, मानो उसमें ऐसा अपमिश्रण न हुआ हो, ऐसे प्रकार से करेगा कि उस औषधि या भेषजीय निर्मिति की प्रभावकारिता कम हो जाए, क्रिया बदल जाए या वह अपायकर हो जाए, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  2. अपमिश्रित औषधियों का विक्रय- जो कोई यह जानते हुए कि किसी औषधि या भेषजीय निर्मिति में इस प्रकार से अपमिश्रण किया गया है कि उसकी प्रभावकारिता कम हो गई या उसकी क्रिया बदल गई है, या वह अपायकर बन गई है, उसे बेचेगा या बेचने की प्रस्थापना करेगा य बेचने के लिए अभिदर्शित करेगा या किसी औषधालय से औषधीय प्रयोजनों के लिए उसे अनपमिश्रित के तौर पर देगा या उसका अपमिश्रित होना न जानने वाले व्यक्ति द्वारा औषधीय प्रयोजनों के लिए उसका उपयोग कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  3. औषधि का भिन्न औषधि या निर्मिति के तौर पर विक्रय--जो कोई किसी औषधि या भेषजीय निर्मिति को, भिन्न औषधि या भेषजीय निर्मिति के तौर पर जानते हुए बेचेगा या बेचने की प्रस्थापना करेगा या बेचने के लिए अभिदर्शित करेगा या औषधीय प्रयोजनों के लिए औषधालय को देगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छ: मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
  4. लोक जल-स्रोत या जलाशय का जल कलुषित करना-जो कोई किसी लोकजलस्रोत या जलाशय के जल को स्वेच्छया इस प्रकार भ्रष्ट या कलुषित करेगा क वह उस प्रयोजन के लिए, जिसके लिए वह मामूली तौर पर उपयोग में आता हो, कम उपयोगी हो जाये, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पाँच सौ रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।
  5. वायुमण्डल को स्वास्थ्य के लिए अपायकर बनाना- जो कोई किसी स्थान के वायुमण्डल को स्वेच्छया इस प्रकार दूषित करेगा कि वह जन साधारण के स्वास्थ्य के लिए, जो पड़ोस में निवास या कारबार करते हों, या लोक मार्ग से आते जाते हों, अपायकर बन जाए, वह जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा।
  6. लोक मार्ग पर उतावलेपन से वाहन चलाना या हांकना- जो कोई किसी लोक मार्ग पर ऐसे उतावलेपन या उपेक्षा से कोई वाहन चलाएगा या सवार होकर हांकेगा जिससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए या किसी अन्य व्यक्ति को उपहति या क्षति कारित होना सम्भाव्य हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  7. जलयान का उतावलेपन से चलाना- जो कोई किसी जलयान को ऐसे उतावलेपन या उपेक्षा से चलाएगा, जिससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए या किसी अन्य व्यक्ति को उपहति या क्षति कारित करना सम्भाव्य हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।
  8. भ्रामक प्रकाश, चिन्ह या बोये का प्रदर्शन-जो कोई किसी भ्रामक प्रकाश, चिन्ह या बोये । का प्रदर्शन इस आशय से या यह सम्भाव्य जानते हुए करेगा, कि ऐसा प्रदर्शन किसी नौपरिवाहक को मार्ग भ्रष्ट कर देगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने । से या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  9. अक्षेमकर या अति लदे हुए जलयान में भाड़े के लिए जलमार्ग से किसी व्यक्ति का प्रवहण-जो कोई किसी व्यक्ति को किसी जलयान में जलमार्ग से, जानते हुए या उपेक्षापूर्वक भाड़े पर तब प्रवहण करेगा, या कराएगा जब वह जलयान ऐसी दशा में हो या इतना लदा हुआ हो जिससे उस व्यक्ति का जीवन संकटापन्न हो सकता हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।
टिप्पणी यदि कोई व्यक्ति उपेक्षापूर्वक या जानते हुये किसी दूसरे व्यक्ति को जलयान में प्रविष्ट करा कर उसके जीवन के लिये संकट उत्पन्न करता है तो वह इस धारा के अन्तर्गत दण्डित किया जायेगा। कुछ व्यक्ति जिन्हें अभियुक्त नाव में बैठाकर नदी के दूसरे किनारे पर ले जा रहा था, नाव के डूबने से नदी में डूब गये। नाव पुरानी थी और उसकी सतह में कई सुराख हो गये थे जिन्हें पटरों से ढक दिया गया था। यह अभिनिर्णीत हुआ कि अभियुक्त इस धारा के अन्तर्गत दोषी है।34 ।
  1. लोक मार्ग या नौपरिवहन पथ में संकट या बाधाजो कोई किसी कार्य को करके या अपने कब्जे में की, या अपने भार–साधन के अधीन किसी सम्पत्ति की व्यवस्था करने का लोप करने द्वारा, किसी लोक मार्ग या नौपरिवहन के लोक पथ में किसी व्यक्ति को संकट, बाधा या क्षति कारित करेगा वह जुर्माने से, जो दो सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा। ।
  2. विषैले पदार्थ के सम्बन्ध में उपेक्षापूर्ण आचरण- जो कोई किसी विषैले पदार्थ से कोई कार्य ऐसे उतावलेपन या उपेक्षा से करेगा, जिससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए, या जिससे किसी व्यक्ति को उपहति या क्षति कारित होना सम्भाव्य हो, या अपने कब्जे में के किसी विषैले पदार्थ की ऐसी व्यवस्था करने का, जो ऐसे विषैले पदार्थ से मानव जीवन को किसी अधिसम्भाव्य संकट से बचाने के लिए पर्याप्त हो, जानते हुए या उपेक्षापूर्वक लोप करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। |
  3. अग्नि या ज्वलनशील पदार्थ के सम्बन्ध में उपेक्षापूर्ण आचरण– जो कोई अग्नि या किसी ज्वलनशील पदार्थ से, कोई कार्य ऐसे उतावलेपन या उपेक्षा से करेगा, जिससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए या जिससे किसी अन्य व्यक्ति को उपहति या क्षति कारित होना सम्भाव्य हो,
अथवा अपने कब्जे में की अग्नि या किसी ज्वलनशील पदार्थ की ऐसी व्यवस्था करने का, जो ऐसी अग्नि या ज्वलनशील पदार्थ से, मानव जीवन को किसी अधिसम्भाव्य संकट से बचाने के लिए पर्याप्त हो, जानते हुए या उपेक्षापूर्वक लोप करेगा, | वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दंडित किया जाएगा।
  1. मगनी बेहरा, (1869) 11 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 3.
  2. विस्फोटक पदार्थ के बारे में उपेक्षापूर्ण आचरण– जो कोई किसी विस्फोटक पदार्थ से कोई कार्य ऐसे उतावलेपन या उपेक्षा से करेगा, जिससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए या जिससे किसी अन्य व्यक्ति को उपहति या क्षति कारित होना सम्भाव्य हो,
अथवा अपने कब्जे में के किसी विस्फोटक पदार्थ की ऐसे व्यवस्था करने का जैसी ऐसे पदार्थ से मानव जीवन को अधिसम्भाव्य संकट से बचाने के लिए पर्याप्त हो, जानते हुए या उपेक्षापूर्वक लोप करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। । 287, मशीनरी के सम्बन्ध में उपेक्षापूर्ण आचरण- जो कोई किसी मशीनरी से कोई कार्य ऐसे उतावलेपन या उपेक्षा से करेगा, जिससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए या जिससे किसी अन्य व्यक्ति को उपहति या क्षति कारित होना सम्भाव्य हो, अथवा अपने कब्जे में की या अपनी देखरेख के अधीन की किसी मशीनरी की ऐसी व्यवस्था करने का, जो ऐसी मशीनरी से मानव जीवन को किसी अधिसम्भाव्य संकट से बचाने के लिए पर्याप्त हो, जानते हुए या उपेक्षापूर्वक लोप करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  1. किसी निर्माण को गिराने या उसकी मरम्मत करने के सम्बन्ध में उपेक्षापूर्ण आचरण- जो कोई किसी निर्माण को गिराने या उसकी मरम्मत करने में उस निर्माण की ऐसी व्यवस्था करने का, जो उस निर्माण के या उसके किसी भाग के गिरने से मानव जीवन को किसी अधिसम्भाव्य संकट से बचाने के लिए पर्याप्त हो, जानते हुए या उपेक्षापूर्वक लोप करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के काराबास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। ।
  2. जीवजन्तु के सम्बन्ध में उपेक्षापूर्ण आचरण- जो कोई अपने कब्जे में के किसी जीवजन्तु के सम्बन्ध में ऐसी व्यवस्था करने का, जो ऐसे जीवजन्तु से मानव जीवन को किसी अधिसम्भाव्य संकट या घोर उपहति के किसी अभिसम्भाव्य संकट से बचाने के लिए पर्याप्त हो, जानते हुए या उपेक्षापूर्वक लोप करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।
  3. अन्यथा अनुपबन्धित मामलों में लोक न्यूसेंस के लिए दण्ड- जो कोई किसी ऐसे मामले में लोक न्यूसेंस करेगा जो इस संहिता द्वारा अन्यथा दण्डनीय नहीं है, वह जुर्माने से, जो दो सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा।
  4. न्यसेंस बन्द करने के व्यादेश के पश्चात् उसका चालु रखना- जो कोई किसी लोक सेवक द्वारा, जिसको किसी न्यूसेंस की पुनरावृत्ति न करने या उसे चालू न रखने के लिए व्यादेश प्रचालित करने का प्राधिकार हो, ऐसे व्यादिष्ट किए जाने पर, किसी लोक न्यूसेंस की पुनरावृत्ति करेगा, या उसे चालू रखेगा, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  5. अश्लील पुस्तकों आदि का विक्रय आदि- (1) उपधारा (2) के प्रयोजनार्थ किसी पुस्तक, पुस्तिका, कागज, लेख, रेखाचित्र, रंगचित्र, रूपण, आकृति या अन्य वस्तु को अश्लील समझा जाएगा
यदि वह कामोद्दीपक है; या कामुक व्यक्तियों के लिए रुचिकर है या उसका या (जहाँ उसमें दो या अधिक सुभिन्न मदें समाविष्ट हैं वहां) उसकी किसी मद का प्रभाव, समग्ररूप से विचार करने पर, ऐसा है जो उन व्यक्तियों को दुराचारी तथा भ्रष्ट बनाए जिसके द्वारा उसमें अन्तर्विष्ट या सन्निविष्ट विषय का पढ़ा जाना, देखा जाना या सुना जाना सभी सुसंगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सम्भाव्य है। (2) जो कोई (क) किसी अश्लील पुस्तक, पुस्तिका, कागज, रेखाचित्र, रंगचित्र, रूपण या आकृति या किसी भी अन्य अश्लील वस्तु को चाहे वह कुछ भी हो, बेचेगा, भाड़े पर देगा, वितरित करेगा, लोक प्रदर्शित करेगा, या उसको किसी भी प्रकार परिचालित करेगा, या उसे विक्रय, भाड़े, वितरण, लोक प्रदर्शन या परिचालन के प्रयोजनों के लिए रचेगा, उत्पादित करेगा, या अपने कब्जे में रखेगा, अथवा । (ख) किसी अश्लील वस्तु का आयात या निर्यात या प्रवहण पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी प्रयोजन के | लिए करेगा या यह जानते हुए, या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए करेगा कि ऐसी वस्तु बेची, भाड़े पर दी, वितरित या लोक प्रदर्शित या किसी प्रकार से परिचालित की जाएगी, अथवा (ग) किसी ऐसे कारबार में भाग लेगा या उससे लाभ प्राप्त करेगा, जिस कारबार में वह यह जानता है या यह विश्वास करने का कारण रखता है कि कोई ऐसी अश्लील वस्तुएं पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी | प्रयोजन के लिए रची जातीं, उत्पादित की जातीं, क्रय की जातीं, रखी जातीं, आयात की जातीं, निर्यात की जातीं, प्रवहण की जातीं, लोक प्रदर्शित की जातीं या किसी भी प्रकार से परिचालित की जाती हैं, अथवा (घ) यह विज्ञापित करेगा या किन्हीं साधनों द्वारा चाहे वे कुछ भी हों यह ज्ञात कराएगा कि कोई व्यक्ति  किसी ऐसे कार्य में, जो इस धारा के अधीन अपराध है, लगा हुआ है, या लगने के लिए तैयार है, या यह कि कोई ऐसी अश्लील वस्तु किसी व्यक्ति से या किसी व्यक्ति के द्वारा प्राप्त की जा सकती है, अथवा (ङ) किसी ऐसे कार्य को जो इस धारा के अधीन अपराध है, करने की प्रस्थापना करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, प्रथम दोषसिद्धि पर दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, तथा द्वितीय या पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि की दशा में दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा। अपवाद-इस धारा का विस्तार निम्नलिखित पर न होगा: (क) कोई ऐसी पुस्तक, पुस्तिका, कागज, लेख, रेखाचित्र, रंगचित्र, रूपण या आकृति (i) जिसका प्रकाशन लोकहित होने के कारण इस आधार पर न्यायोचित साबित हो गया है कि ऐसी पुस्तक, पुस्तिका, कागज, लेख, रेखाचित्र, रंगचित्र, रूपण या आकृति विज्ञान, साहित्य, कला या विद्या या सर्वजन सम्बन्धी अन्य उद्देश्यों के हित में है, अथवा (ii) जो सद्भावपूर्वक धार्मिक प्रयोजनों के लिए रखी या उपयोग में लाई जाती है, (ख) कोई ऐसा रूपण जो (i) प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 (1958 का 24) के अर्थ में प्राचीन संस्मारक पर या उसमें, अथवा (ii) किसी मंदिर पर या उसमें या मूर्तियों के प्रवहण के उपयोग में लाए जाने वाले या किसी धार्मिक प्रयोजन के लिए रखे या उपयोग में लाए जाने वाले किसी रथ पर, तक्षित, उत्कीर्ण, रंगचित्रित या अन्यथा रूपित हों। टिप्पणी धारा 292 तथा 293 में सन् 1969 के ऐक्ट XXXV द्वारा संशोधन किया गया है। इस धारा का (1) अश्लीलता शब्द को परिभाषित करता है। खण्ड (2) ऐसे किसी व्यक्ति को दण्डित करता है जो अश्लील पुस्तकों या इस प्रभाव से युक्त अन्य वस्तुओं को बेचता है या उनका वितरण करता है। यह धारा किसी प्रदर्शन या प्राचीन संस्मारक पर खुदी, या रंगी मूर्तियों के सम्बन्ध में अपवाद प्रस्तुत करती है। उस मामले में जहाँ क एक फोटोग्राफी का कलाकार अपने स्टूडियो में अल्पवय फिल्म तारिकाओं का नग्न चित्र प्रदर्शित करता है, वह धारा 292 की उपधारा (2) के अन्तर्गत चित्र को लोक प्रदर्शित करने के अपराध का दोषी होगा। वह अपने बचाव में यह कह सकता है कि उसने इस प्रकार का प्रदर्शन कला के हित | में किया है। यह बचाव उपधारा (2) के अपवाद (क) (i) में उपलब्ध हैं। परन्तु मेरे विचार से न्यायालय द्वारा यह बचाव मान्य नहीं होना चाहिये क्योंकि ऐसा प्रदर्शन अश्लील प्रभाव से युक्त है। अश्लील-अश्लीलता का मुख्य परीक्षण यह है कि क्या वह वस्तु जिसके अश्लील होने का आरोप | लगाया गया है ऐसी प्रकृति की है कि उन व्यक्तियों के मन में अनैतिक व भ्रष्ट विचारों को उत्पन्न करती है। जिनके हाथों में वह पड़ जाती है 35 इस सम्बन्ध में हमारे समसामयिक समाज के हित और विशेषकर पुस्तक का उस पर पड़ने वाले प्रभाव | की अनदेखी नहीं करनी चाहिये 36 किसी प्रकाशन की अश्लीलता के प्रश्न पर विचार करते समय न्यायालय को यह ध्यान में रखना चाहिये कि क्या कोई वर्ग, न कि व्यक्ति विशेष जिसके हाथ में पुस्तक, लेख अथवा कहानी पड़ेगी, उनका नैतिक दृष्टिकोण प्रभावित होगा अथवा इसके पढ़ने से उनमें चरित्रहीनता आयेगी अथवा उनके मस्तिष्क में अशुद्ध और कामुक भाव जागृत होंगे या नहीं 37 समरेश बोस तथा अन्य बनाम अमल मित्र तथा अन्य,38 के वाद में यह मत व्यक्त किया गया कि यह आवश्यक नहीं है कि एक अशिष्ट या कामोद्दीपक लेख अश्लील हो। कामोद्दीपक लेख निराशा, विचारों में हिंसक परिवर्तन एवं उदासी उत्पन्न करता है, इसके विपरीत अश्लीलता, उन व्यक्तियों को, जो ऐसे अनैतिक प्रभावों के सम्पर्क में आते हैं, अध:पतन की ओर ले जाने वाली प्रवृत्ति से युक्त है। अत: यदि कोई उपन्यास समाज में व्याप्त बुराइयों का पर्दाफास करने के उद्देश्य से लिखा गया है और इसके लिए कामुकता (Sex) पर बल दिया गया हो तथा गाली-गलौज की भाषा का प्रयोग किया गया हो तो मात्र इस आधार पर उपन्यास को अश्लील नहीं कहा जायेगा। एस० खुशबू बनाम कन्नी अम्मल और अन्य39 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्त अपीलांट ने मात्र विवाह के पहले यौन सम्बन्ध की बढ़ती हुई घटनाओं का सन्दर्भ मात्र | दिया था और इसके समाज द्वारा स्वीकृति के लिये कहा था। किसी भी समय अपीलांट ने मैथूनिक कार्यों (sexual act) का ऐसा वर्णन नहीं किया अथवा ऐसा कुछ भी नहीं कहा जो कि किसी युक्तियुक्त और बुद्धिमान पाठक के मस्तिष्क में मैथुनिक इच्छा उत्पन्न करे। साथ ही बयान एक सर्वे के सन्दर्भ में दिया गया था जो बड़े शहरों के लोगों में मैथुनिक आदतों के विभिन्न पहलुओं को स्पर्श करता है। यद्यपि कि यह सर्वे भले ही किसी साहित्यिक अथवा कलात्मक कृति का अंग नहीं रहा हो यह एक समाचार पत्रिका में प्रकाशित किया गया था जिसके द्वारा ऊपर वर्णित विषय में कुछ निश्चित विचार और राय के संचारित किये जाने का उद्देश्य पूरा होता है। अन्ततोगत्वा ऐसा संचारण से समाज के अन्दर एक संवाद को प्रेरणा मिलती है जिससे कि लोग यह निर्णय ले सकते हैं कि वर्तमान सामाजिक बन्धनों का समर्थन करने अथवा उस पर प्रश्न चिन्ह लगाने का चुनाव कर सकते हैं। कोई बयान जो एक सर्वे के अंश के रूप में प्रकाशित किया जाता है उसे अश्लील प्रकृति का संचारण (communication) नहीं कहा जा सकता है। अतएव कार्यवाही को निरस्त किये। जाने योग्य अभिनिर्धारित किया गया।
  1. हिकलिन का मामला, 1868 एल० आर० 3 क्यू० बी० 360; रनजीत डी० उदेशी (1962) 64 बाम्बे एल० आर० 356 भी देखें।
  2. रनजीत डी० उदेशी, (1965) 1 एस० सी० आर० 65.
  3. चन्द्रकान्त कल्याणदास, ए० आई० आर० 1970 एस० सी० 1390. |
  4. समरेश बोस बनाम अन्य बनाम अमल मित्र तथा अन्य, 1986 क्रि० लॉ ज० 24 सु० को०.
  5. (2010) 3 क्रि० ला ज० 2228 (एस० सी०).
आगे यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि यह नहीं कहा जा सकता है कि अपीलांट की टिप्पणियाँ नवयुवकों को विवाह पूर्व यौन सम्बन्ध में आसक्ति को प्रोत्साहित करने में गलत रास्ता दिखायेंगी। अपीलांट की अपनी टिप्पणियाँ किसी व्यक्ति अथवा ग्रुप विशेष की ओर इशारा नहीं करती हैं। जो कुछ भी अपीलांट ने किया वह मात्र विवाह पूर्व यौन सम्बन्ध तब जब कि दोनों ही पक्षकार एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध (committed) हों, की सामाजिक स्वीकृति का अनुरोध मात्र था। इसका अर्थ हर प्रकार की यौनिक क्रियाओं का खुला समर्थन से नहीं लगाया जा सकता है। बी रोसाइया बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, 40 के मामले में अभियुक्त एक अश्लील फिल्म का दर्शक मात्र था। उसके विरुद्ध यह आरोप नहीं लगाया गया था कि उसने अश्लील फिल्म का साशय प्रदर्शन किया अथवा ऐसे प्रदर्शन का आयोजन किया जिससे उस फिल्म के प्रदर्शन में उसकी सहअपराधिता दर्शित होती हो। यह निर्णय दिया गया कि किसी अश्लील फिल्म में मात्र दर्शक के रूप में भागीदारी धारा 292 के अन्तर्गत कारित – होने वाले मूल अपराध का दुष्प्रेरण तब तक नहीं कहा जा सकता है जब तक कि अभियुक्त की मात्र दर्शक से। अधिक की सह-अपराधिता सिद्ध नहीं हो जाती है। अवीक सरकार और अन्य बनाम पश्चिमी बंगाल राज्य41 के वाद में एक लेख एक विश्व प्रख्यात मशहूर टेनिस खिलाड़ी की फोटो के साथ छपा था। इस फोटो में वह खिलाड़ी एक काली फिल्म अभिनेत्री जो उसकी वागदत्ता थी, के साथ वस्त्रहीन था। इस चित्र को अभिनेत्री के पिता ने खींचा था। विचारणीय प्रश्न यह था कि क्या यह फोटो महिला के साथ अभद्र प्रदर्शन अधिनियम के अधीन आभद्र चित्रण या प्रदर्शन की कोटि (category indecent) में आयेगा। यह अधिनिर्णीत किया गया कि अश्लीलता का विनिश्चय करने हेतु लागू किया जाने वाला परीक्षण हिकलिन परीक्षण नहीं है वरन् सम्प्रदाय की सहनशक्ति क्या है वह है और उक्त फोटो में कोई ऐसी बात नहीं है जिसमें याचिका पढ़ने वाले लोगों के मस्तिष्क को दूषित/विकृत करने की प्रवृत्ति (Tendency) हो। इसके अलावा यह लेख जो संदेश (message) देता है वह समाज में नस्लवाद/जातिवाद को समाप्त करने का तथा प्रेमभाव और सफेद चमड़ी वाले और काले लोगों के मध्य प्रेम भावना और शादी विवाह बढ़ाने का है। यह अधिनिर्णीत किया गया कि उक्त चित्र या लेख ऐसा आपत्तिजनक नहीं कहा जा सकता है जिससे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 292 अथवा अभद्र प्रदर्शन अधिनियम, 1986 की धारा 4 के अन्तर्गत कार्यवाही प्रारम्भ की जा सके।
  1. तरुण व्यक्ति को अश्लील वस्तुओं का विक्रय आदि-जो कोई बीस वर्ष से कम आयु के किसी व्यक्ति को कोई ऐसी अश्लील वस्तु, जो अन्तिम पूर्वगामी धारा में निर्दिष्ट है, बेचेगा, भाड़े पर देगा, वितरण करेगा, प्रदर्शित करेगा या परिचालित करेगा या ऐसा करने की प्रस्थापना या प्रयत्न करेगा। प्रथम दोषसिद्धि पर दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, तथा द्वितीय या पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि की दशा में दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डित किया जायेगा।
  2. अश्लील कार्य और गाने-जो कोई
(क) किसी लोक स्थान में कोई अश्लील कार्य करेगा, अथवा (ख) किसी लोक स्थान में या उसके समीप कोई अश्लील गाने, पवांडे या शब्द गाएगा, सुनाएगा या उच्चारित करेगा जिससे दूसरों को क्षोभ होता हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। टिप्पणी क्षोभ (Annoyance)—इस धारा के अन्तर्गत किसी कार्य को दण्डनीय होने के लिये यह आवश्यक है। कि उस कार्य से किसी व्यक्ति विशेष को या जनसामान्य को क्षोभ हो। ‘‘दूसरों को क्षोभ होता हो” शब्दों के 40. 1991 क्रि० ला० ज० 189 (आन्ध्र प्रदेश).
  1. (2014) II क्रि० लॉ ज० 1560 (एस० सी०).
प्रयोग से यह अभिप्रेत है कि ‘अश्लील कार्य” से क्षोभ केवल आशयित व्यक्ति को हो 42 जहाँ कोई किसी चिकित्सीय प्रैक्टिशनर के विरुद्ध किसी सार्वजनिक स्थान में गाली तथा अश्लील शब्दों का प्रयोग कर है उसे इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान की जायेगी क्योंकि यह तथ्य कि डाक्टर तथा पब्लिक के कर अन्य सदस्य अभियुक्त द्वारा बोले गये गाली तथा अश्लील शब्दों के विरुद्ध शिकायत करने के लिये बाध्य हो गये थे, इस बात का पर्याप्त सूचक है कि वे सभी लोक स्थान में कहे गये ऐसे शब्दों से क्षुब्ध थे 43 किन्तु यति गाली का प्रयोग लोक स्थान में नहीं किया गया था, तो इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि नहीं प्रदान की जायेगी। अश्लील कार्य-किसी लोक-स्थान में अपने शरीर का अभद्र प्रदर्शन या संभोग इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय है। जहाँ कि अभियुक्त जो कि एक रिक्शा चालक था, अपना रिक्शा दो युवा लड़कियों के समीप खड़ा करता है जिन्हें वह पहले से नहीं जानता था, तथा लड़कियों को सम्बोधित करते हुये एवं अन्य लोगों को सुनाते हुये, निम्नलिखित शब्दों का उच्चारण करता है-“आओ मेरी जान मेरे रिक्शे पर बैठ जाओ, मैं तुमको पहुँचा दूंगा, मैं तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूँ।” ये शब्द स्पष्टत: लड़कियों के सतीत्व एवं शालीनता के लिये अपमानजनक हैं तथा लड़कियों के साथ-साथ अन्य श्रोताओं के मस्तिष्क को भी प्रतिरूपित कर सकते लोक स्थान- अश्लील कार्य किसी लोक स्थान में किया जाना चाहिये। खण्ड (ख) में उल्लिखित कार्य किसी लोक स्थान में या उसके समीप किया जाना चाहिये। अपने शरीर का अभद्र प्रदर्शन किसी बस में45 किसी लोक मूत्रालय में46 या किसी ऐसी जगह में जहाँ पब्लिक जाती है+7 इस धारा के अन्तर्गत आता के० पी० मोहम्मद बनाम केरल राज्य18 के वाद में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया गया था। प्रश्न था कि क्या कैबरे नृत्य अश्लील कार्य के अन्तर्गत आयेगा? और यदि अश्लील कार्य के अन्तर्गत आता है तो होटलों तथा जलपान गृहों में इसके प्रदर्शन पर क्या रोक लगाई जा सकती है? केरल उच्च न्यायालय ने कैबरे नृत्य के इतिहास पर प्रकाश डालते हुये कहा कि लोक स्थानों या सार्वजनिक स्थानों जैसे होटल तथा जलपान गृह में कैबरे नृत्य का प्रदर्शन यदि हमारे देश के मापदण्ड के अनुसार है तो उसे स्वीकृति प्रदान की जा सकती है तथा किसी भी प्रकार उस पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि होटल तथा जलपान गृह अपने ग्राहकों का मनोरंजन संगीत तथा नृत्य से कर सकते हैं और तब तक कोई गम्भीर आपत्ति नहीं उठायी जा सकती है जब तक कि प्रदर्शन अश्लील या नंगेपन में परिवर्तित नहीं हो जाता है। वस्तुत: शालीनता तथा नैतिकता अपने आप में व्यापक तथा परिवर्तनशील अवयवों से युक्त शब्द हैं। इस प्रकार के संवेदनशील विषयों पर न्यायालय कोई कट्टर विचार नहीं व्यक्त कर सकता क्योंकि शालीनता, नैतिकता की अवधारणा स्थिर नहीं है। यह स्थान से स्थान को, व्यक्ति से व्यक्ति को, समय से समय को तथा काल से काल को परिवर्तित होने को बाध्य है। ऐसे विषयों पर न्यायालय का विचार एवं उत्सुकता केवल यह होनी चाहिये कि लोक स्थानों पर ऐसी चीजों का प्रदर्शन बन्द हो जो अपने समय तथा अपने देश के मापदण्डों के आधार पर अभद्र एवं अश्लील है। दीपा बनाम एस० आई० पुलिस19 के वाद में एक होटल में कैबरे नृत्य के विज्ञापन के फलस्वरूप कछ लोगों ने काफी महंगे टिकट खरीदे और नृत्य देखने के बाद संहिता की धारा 294 के अधीन यह शिकायत किया कि नृत्य इतना अश्लील था कि उससे उन्हें अत्यन्त क्षोभ हुआ। यह निर्णय दिया गया कि दर्शक यह शिकायत कर सकते हैं कि प्रदर्शन की अश्लीलता से उन्हें क्षोभ हुआ। यह भी निर्णीत किया गया। कि होटल का ऐसा घेरा हुआ स्थान जहाँ टिकट के आधार पर प्रवेश दिया जाता है लोक स्थान है (यदि ऐसा नहीं मानेंगे तो किसी भी सार्वजनिक स्थान को घेरकर और उसमें प्रवेश महंगे टिकटों के द्वारा सीमित प्राइवेट धान में परिवर्तित कर दिया जायेगा) इसी प्रकार इस बात की पूर्व घोषणा कि ऐसे घिरे स्थान में क्या प्रदर्शित किया जायेगा. भी उस स्थान को सार्वजनिक में प्राइवेट में और अश्लीलता को किसी ऐसे प्रदर्शन में जिस
  1. जफर अहमद खान बनाम राज्य, ए० आई० आर० 1963 इला० 105,
  2. पटेल एच० एम० मल्ल गाड़ बनाम मैसूर राज्य, 1973 मद्रास लॉ ० ( क्रि०) 11S.
  3. जफर अहमद खान बनाम राज्य, ए० आई० आर० 1963 इला० 105.
  4. होल्म्स केस, (1853) डियर्स क्रि० के० 207,
  5. हैरिस 1871, एल० आर० 1 सी० सी० आर० 282.
  6. वेलार्ड (1884) 14 क्यू० बी० डी० 63.
  7. 1984 क्रि० लॉ ज० 745 (केरल).
  8. 1986 क्रि० लॉ ज० 1120 (केरल).
अश्लील नहीं कहा जायेगा, परिवर्तित नहीं कर सकता है। न्यायालय ने यह तर्क कि ‘दर्शकों ने अपनी सम्मति से प्रदर्शन को पूर्ण ज्ञान के साथ देखा’ को भी अमान्य करते हुये धारा 87 एवं 88 के अन्तर्गत बचाव को स्वीकार नहीं किया। यदि इस प्रकार के तर्क को स्वीकार कर लिया जाय तो किसी भी सार्वजनिक स्थान पर ऐसे लोगों को जो उसे देखने को सहमत होंगे कोई भी अश्लील प्रदर्शन उन्मुक्त रूप से प्रदर्शित किया जा सकेगा। जहाँ समाज का हित आवेष्टित होगा वहाँ इस प्रकार का धारा 87 एवं 88 के अन्तर्गत बचाव मान्य नहीं हो सकता है। सम्मति से किसी अपराध का निराकरण नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार उन लोगों का हित जो लाभ अथवा अपनी जीविका के लिये ऐसा प्रदर्शन आयोजित करते हैं और जो स्वेच्छा से ऐसे प्रदर्शनों को देख कर आनन्द का अनुभव करते हैं, समाज के हित, जो सर्वाधिक विचारणीय होना चाहिये, के ऊपर नहीं हो सकता है। केरल उच्च न्यायालय ने दीपा बनाम एस० आई० पलिस50 के मामले में के० पी० मोहम्मद बनाम केरल राज्य में दिये गये अपने पूर्व निर्णय में अन्तर को स्पष्ट करते हुये कहा कि के० पी० मोहम्मद के मामले में यह मत व्यक्त किया गया था कि कैबरे नृत्य, यदि इसे सही अर्थों में समझा जाय, तो अपने आप में आपत्तिजनक नहीं है। वह रिट पेटीशन कैबरे नृत्य के प्रदर्शन के अधिकार के सम्बन्ध में था और उसमें यह निर्णय दिया गया था कि ऐसे नृत्य के प्रदर्शन पर तब तक कोई आपत्ति नहीं उठायी जा सकती है जब तक कि प्रदर्शन अश्लील अथवा नग्न नहीं होता है। दीपा के मामले में नृत्य प्रदर्शन इतना अश्लील था कि कतिपय दर्शकों को उससे क्षोभ हुआ, अतएव धारा 294 के अन्तर्गत अपराध कारित हुआ माना गया। । पी० कुलैया स्वामी बनाम उप-निरीक्षक पुलिस जौनमालामाडुगू52 वाले मामले में याची का थियेटर जो मैसर्स साईराम पिक्चर पैलेस के नाम और अभिनाम से ज्ञात था, अश्लील फिल्म दर्शित करने के कारण जब्त कर सील कर दिया गया था, यद्यपि उनके पास थिएटर चलाने की अनुज्ञप्ति थी। थियेटर के मालिक और कुछ अन्य को गिरफ्तार कर लिया गया। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 294 के अधीन अपराध के लिये विचारण किया गया। उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि जहाँ तक उन व्यक्तियों का प्रश्न है जिन्होंने अभिकथित रूप से भारतीय दण्ड संहिता की धारा 294 के अधीन अपराध कारित किया है जो संज्ञेय अपराध है और जहाँ तक आपत्तिजनक फिल्म की पाँच रीलें जब्त किये जाने का प्रश्न है, कोई भी आपत्ति नहीं की जा सकती, क्योंकि उनका संबंध अपराध कारित किये जाने से है। तथापि थियेटर को इस अभिकथन पर जब्त और सील किया जाना विधिक रूप से प्राधिकृत नहीं है, क्योंकि अश्लील और आपत्तिजनक फिल्म दिखाये जाने पर अनुज्ञप्ति रद्द की जा सकती है या निलंबित की जा सकती है और थिएटर का उपयोग किसी भी फिल्म को प्रदर्शित करने के लिये नहीं किया जा सकता है। तथापि अन्वेषण के प्रक्रम पर पुलिस को सिनेमा थिएटर या प्रोजेक्टर जब्त करने का अधिकार नहीं था। इसलिये, पुलिस की कार्रवाई अधिकारिता रहित थी और विधि द्वारा प्राधिकृत नहीं थी। यह स्मरण रखना चाहिये, लोकहित और लोक कल्याण को वैसा नहीं समझा जाता जैसा विधि का प्रवर्तन करने वाले प्राधिकारियों द्वारा उसे समझा जाता है। यदि विधि किसी कार्रवाई की अनुमति देती है तो प्राधिकारी चाहे उनकी शक्तियाँ कितनी ही व्यापक क्यों न हों, यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि अन्यथा करने से लोक हित पूर्ण होगा। । 294-क. लाटरी कार्यालय रखना- जो कोई ऐसी कोई लाटरी, जो न तो राज्य लाटरी हो और न तत्सम्बन्धित राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत लाटरी हो, निकालने के प्रयोजन के लिए कोई कार्यालय या स्थान रखेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा, तथा जो कोई ऐसी लाटरी में किसी टिकट, लाट, संख्यांक या आकृति को निकालने से सम्बन्धित या लागू होने वाली किसी घटना या परिस्थिति पर किसी व्यक्ति के फायदे के लिए किसी राशि को देने की, या किसी माल के परिदान की, या किसी बात को करने की, या किसी बात से प्रविरत रहने की कोई प्रस्थापना प्रकाशित करेगा, वह जुर्मान से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा।
  1. 1986 क्रि० लाँ ज० 1120 (केरल).
  2. 1984 क्रि० लॉ ज० 745 (केरल).
  3. 2003 क्रि० लॉ ज० 2488 सु० को०.

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