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LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Third Part Notes

 

LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Third Part Notes:- LLB (Bachelor of Law) 2nd Semester Year Wise Hindu Law Books Chapter 6 Third Part Notes and Online Study Material All LLB University for Students, LLB Question Paper With Sample Model Paper in PDF Download available on this Post in Hindi English Language.

छिपा कर करा लिया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि वह क्रूरता है। इसी भाँति सत्या बनाम श्रीराम में पत्नी ने अकारण ही दो बार बिना पति को बताये गर्भपात करा लिया जबकि पति और उसका परिवार सन्तान के बहत इच्छुक थे। न्यायालय ने कहा कि यह क्रूरता है। परन्तु यदि स्वास्थ्य के कारण गर्भपात कराया जाता है या उन कारणों से गर्भपात कराया जाता है, जो गर्भपात अधिनियम, 1957 के अन्तर्गत मान्य है तो फिर यह क्रूरता नहीं होगी।

पारिवारिक जीवन की उपेक्षायदि पत्नी पारिवारिक जीवन की उपेक्षा करती है, समय पर खाना बनाकर नहीं देती है, बिना पति की अनुमति के बहुधा अपने पिता के घर चली जाती है तो यह क्रूरता की संज्ञा में आयेगा

काम विकृति-काम विकति करता है। पत्नी और अन्य महिला के बीच समलिंग संभोग काम विकृति है और क्रूरता की संज्ञा में आती है। पत्नी या पति का समलिंगामी होना क्रूरता है। इस भाँति अत्यधिक संभोग की माँग विकृति रूप से संभोग की माँग करता है। पत्नी के साथ पति द्वारा गुदा मैथुन करना या उसकी मांग करना भी करता है। पत्नी द्वारा ढीले पड़े हुये पति के लिंग को खींचना भी क्रूरता है। इस तरह पति द्वारा कोई बात न मानने पर अपने अपत्य द्वारा पति की अंड ग्रन्थियों को खिंचवाना क्रूरता भी है और विकृतता

पत्नी को वेश्यावृत्ति के लिये बाध्य करना-पत्नी को वेश्यावृत्ति के लिये बाध्य करना क्रूरता है और पतितता भी। पति पत्नी को वेश्यावृत्ति के लिये बाध्य करता है, या उसे अन्य व्यक्तियों से मैथुन करने के लिये फुसलाता है या कायल करता है तो यह क्रूरता है।

गाली-गलौच करना, अभद्र भाषा का प्रयोग करना, लड़ना-झगड़ना-गाली-गलौच करना लड़ना-झगड़ना, अभद्र भाषा का प्रयोग करना भी क्रूरता है ऐसे अभद्र व्यवहार और आचरण से भयानक मानसिक व्यथा पहुँचती है। परन्तु सास-ससुर व अन्य रिश्तेदारों के साथ बुरा बर्ताव क्रूरता नहीं कहलायेगी।10

राजन बसन्त बनाम शोभा1 पत्नी द्वारा पति से अभद्र व्यवहार करने का अच्छा दृष्टान्त है। विवाह की पहली रात्रि को ही पत्नी ने पति से कहा कि उसका चेहरा बहुत ही बदसूरत है और बदसूरत चेहरे वाले व्यक्तियों का दिमाग वैसा ही होता है। इसी भाँति वह पति की माता उसकी दो विवाहित बहिनों से अभद्र व्यवहार करती रही। झूठे-मूठे लांछन वह लगाती थी और ये लांछन उसने पत्रों द्वारा भी लगाये। यह भी कहा कि उसका पति उसे दहेज की मांग करता है। पत्नी के माता-पिता द्वारा पति को पीटने की भी कोशिश की गई। याचिका प्रेषित होने के पश्चात् भी पत्नी झूठे लांछन लगाती रही, गाली-गलौच करती रही। यह सब करता ही है। न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार के व्यवहार द्वारा विवाह पूर्णतया टूट चुका है, अत: विवाहविच्छेद की डिक्री पारित करना ही उचित है। (इस निर्णय में न्यायाधीश अरविन्द सामन्त ने पूर्व निर्णयों की समीक्षा की है। इस निर्णय को पढ़ना चाहिये)।

त्यागपत्र की मांग-पति द्वारा पत्नी से अपनी नौकरी के त्यागपत्र देने के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करना, क्रूरता नहीं है।12

1. 1983 पंजाब और हरियाणा 252.

2. कटारी बनाम कटारी, 1994 आन्ध्र 364.

3. काफर बनाम काफर, (1964) सो० ज० 465.

4. कसुमलता बनाम कामता, 1965 इलाहाबाद 280.

5. सावित्री बनाम मूलचन्द, 1987 दिल्ली 52; विनीत जोगलेकर बनाम वैशाली जोगलेकर, 1998 बम्बई

6. अशोक बनाम सन्तोष, 1987 दिल्ली 63.

7. डान बनाम हेन्डरसन, 1979 मद्रास 104.

8. ‘ओनील बनाम ओनील, (1975) बी० लॉ रि० 1118.

9. गंगाधरण बनाम थंकम, 1988 केरल 224.

10. रेणु बनाम संजय सिंह, 2000 इलाहाबाद 201.

11. 1995 बम्बई 246.

12. विमला बनाम दिनेश, 1991 म०प्र०346; अल्का बनाम भास्कर 1968 बाम्बे, 164.

दहेज मांगना-आज दहेज माँगना दाण्डिक विधि के अन्तर्गत भी अपराध है और वैवाहिक विधि के अन्तर्गत यह क्रूरता है। आदर्श बनाम सरिता पति को दहेज पाने की आकांक्षा द्रौपदी के चीर जैसी थी। वे लगातार दहेज मांगते रहे, विवाह के दो वर्ष पश्चात भी। पत्नी के माता-पिता की सामर्थ्य के बाहर होने के कारण वे दहेज की मांग पूरी नहीं कर सके तो पति और उसके माता-पिता ने उसे सताना आरम्भ कर दिया। न्यायालय ने कहा कि पति का यह आचरण क्रूरता है। यही बात शोभारानी वि० मधुकर2 में थी। न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह करता है। न्यायालय ने कहा कि क्रूरता के दाण्डिक अपराध से भिन्न यह वैवाहिक अपराध है जिसके आधार पर पत्नी विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकती है।

पति के परिवार के सदस्यों का पत्नी से अभद्र व्यवहार करना और पति द्वारा पत्नी की रक्षा न करना–हिन्दू संयुक्त परिवार में यह होता है कि किसी भी कारण से या अकारण ही परिवार के सदस्य पत्नी को तिरस्कृत करते हैं, क्रूरता का व्यवहार करते है, लांछन लगाते हैं और पति उसे सुरक्षा प्रदान नहीं करता है या असमर्थ होता है। कई बार स्थिति यह हो जाती है कि पत्नी आत्महत्या पर उतारू हो जाती है। पति का यह आचरण क्रूरता की संज्ञा में आता है। इसके विपरीत भी स्थिति हो सकती है जब पत्नी के आचरण के कारण पति आत्महत्या का प्रयास करता है। यह भी क्रूरता होगी।

एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्ष की पूर्ण अवहेलना-रमेश चन्द्र बनाम सावित्री में पति ने विवाह के 25 वर्ष के दौरान पत्नी की उपेक्षा की, अवहेलना की। पति ने पत्नी के प्रति अपने दायित्व को कभी नहीं निबाहा। ऐसे विवाह को जीवन रखना क्रूरता होगी और उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसे विवाह को जीवित नहीं रखा जा सकता है और जो विवाह पूर्णतया टूट चुका है उसे जीवित रखने का प्रयत्न करना क्रूरता होगी। यही मत उच्चतम न्यायालय ने चन्द्रकला बनाम त्रिवेदी में व्यक्त किया है।

वैवाहिक जीवन की कठिनाईयां-वैवाहिक जीवन की हर समस्या, हर कठिनाई और हर-बाधा को या पति-पत्नी के घर अनुचित आचरण, व्यवहार या स्वाभाव को हम क्रूरता की परिधि में नहीं ला सकते हैं। अपने स्वाभाविक रूप में हर विवाह की कुछ-न-कुछ कठिनाईयां और कारण (टूट-फूट) होते हैं, पति या पत्नी में कुछ न कुछ कमी होती ही है, कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है, कोई भी विवाह आदर्श नहीं है। हो सकता है कि पति या पत्नी का कोई आचरण दूसरे को ठेस पहुँचाता है, दुःख पहुंचाता है, विपन्न बनाता है या उसके सुखी जीवन में बाधक है तो इसे क्रूरता नहीं कह सकते हैं। इसलिये रोजमर्रा की वैवाहिक कठिनाइयों को क्ररता की परिभाषा नहीं दी जा सकती। अंग्रेजी न्यायाधीश, लार्ड डेनिंग ने ठीक ही कहा है कि करता की परिधिहीन व्याख्या करने के प्रलोभन से हमें बचना चाहिये, अन्यथा उस स्थिति में पहुंच जायेंगे जहाँ विवाह की संस्था ही संकट में पड़ जायेगी। अत: पति या पत्नी का सनकी या झक्की होना, कमीना या नीच व्यवहार करना, स्वार्थी, उजड्ड, कंजूस, चिड़चिड़ा या जंगली स्वभाव का होना, स्वयं में केन्द्रित होना, दूसरे के सुख-सुविधा का ध्यान न रखने वाला होना, लापरवाह होना, दूसरे की भावना को ठेस पहुंचाने वाला होना, शिष्टाचार से अनभिज्ञ होना, अशिष्ट और अश्लील भाषा का प्रयोग करने वाला होना, या दूसरे के प्रति घृणा और वितृष्णा प्रदर्शित करने वाला होना। ये तथ्य स्वयं में क्रूरता गठित नहीं करते हैं। परन्तु उनमें कुछ तथ्यों का एक साथ होना या उनका कुछ अन्य तथ्यों के साथ होना क्रूरता को गठित कर सकता है। राजकमार सारामपकाश में पति द्वारा अपने माता-पिता को रुपया भेजने के प्रतिवाद में पत्नी ने दो या तीन बार पति के लिये खाना बनाने से इन्कार कर दिया और पति के मन में उसके माता-पिता के प्रति घृणा जगाने के

1. 1987 दिल्ली 203; और देखें; मन्यम बनाम मन्यम 1990 केरल 1.

2. 1988 सु० को 124.

3. देव कुमार बनाम थिलागवती, 1995 मद्रास 116.

4. सुशीला बनाम ओमप्रकाश, (1993) 1 डी० एम० सी० 358.

5.1995 सु० को० 890.

6. (1993) 4 एस० सी० सी० 232; और देखें, भगत बनाम भगत, (1994) 1 एस० सी०सी०137

7. सावित्री पांडे बनाम प्रेमचन्द्र पांडे, 2002 सु० को0591.

8. (1968) 70 पंजाब लॉ रिपोर्ट्स 879.

लिये वह किसी फकीर से ताबीज भी लाई। नारायण बनाम प्रभा में पत्नी हमेशा ही अपनी सास की अवहेलना करती थी जबकि सास चाहती थी कि वह उसकी हर आज्ञा का पालन करे, उसके इशारों पर चले। परन्त पत्नी सदैव ही उलटा आचरण करती थी। राजस्वला होने पर सास बहू से किसी भी वस्तु को छने से मना करती तो वह हर वस्तु को छू लेती, सास नहीं चाहती थी कि वह ठंडे पानी से स्नान करे, परन्तु वह हमेशा ही ठन्डे पानी से ही स्नान करती थी। सास चाहती थी कि वह पास-पड़ोस में न जाये, सिनेमा न देखे, परन्तु वह पास-पड़ोस में भी जाती और सिनेमा भी देखती। वह सास की खाने की तम्बाकू की डिबिया भी छिपा देती। अन्ना बनाम ताराबाई में पत्नी को शिकायत यह थी कि पति चाहता था कि कुछ अवसरों पर पत्नी उसके साथ-साथ जाये, परन्तु पत्नी यह नहीं चाहती थी। एक-दो बार पति ने उसे साथ चलने के लिये बाध्य किया इसके फलस्वरूप पति-पत्नी में मनमुटाव हो गया। न्यायालय ने तीनों ही वादों में याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि उपरोक्त कोई भी आचरण क्रूरता की संज्ञा में नहीं आता है। यही बात नीलम बनाम विनोद’ में थी। न्यायमूर्ति सोधी ने कहा कि विवाह एक अत्यन्त सामीप्य सम्बन्ध है जब वर-वधू साथ-साथ रहना आरम्भ करते हैं तो प्रारम्भ में समायोजना की कठिनाई होती है। इस समय थोड़ा बहुत मनमुटाव होना, क्रूरता नहीं है। केवल चार-पांच दिन ही पति के पास रह कर यदि पत्नी, क्रूरता की शिकायत करती है तो यह बात समायोजना की कमी है, क्रूरता नहीं है। गृहस्थ जीवन में मनमुटाव साधारण लड़ाई-झगड़े आपसी कहना-सुनना, क्ररता की परिधि में नहीं आते हैं। न ही गलतफहमियां क्रूरता की सत्ता में आयेगी।

कृत्य और आचरण-कौन से कृत्य या आचरण क्रूरता गठित करते हैं यह कहना कठिन है। प्रत्येक मामले में पृथक-पृथक कृत्य और आचरण क्रूरता गठित करते हैं। किसी मामले के आचरण या कृत्य क्रूरता की परिधि में आते हैं या नहीं इसके लिये न्यायालय पक्षकारों की सामाजिक प्रास्थिति, परिवार और समाज का वातावरण जिसमें वे रहते हैं उनकी शिक्षा, मानसिक और मौलिक संवेदनायें और दया, इत्यादि पर ध्यान देगा। संक्षेप में उन समस्त आचरणों और कृत्यों को जिनके आधार पर याचिका प्रस्तुत की गई है, पूरे वैवाहिक जीवन और संबन्धों की पृष्ठभूमि के आधार पर आंकना होगा। सम्भवतः पृथक-पृथक रूप से उनमें से कोई भी आचरण या कृत्य क्रूरता की संज्ञा में न आये, परन्तु उन्हें एक श्रृंखला में देखने पर वे क्रूरता गठित कर सकते हैं। सामान्यतया क्रूरता एक संचयी (Cumulative) अपराध है। अनेक आचरण और कृत्य क्रूरता की संज्ञा में नहीं आते हैं। परन्तु यह भी हो सकता है कि कोई एक ही आचरण या एक ही कृत्य ऐसा हो जो एकाकी रूप से ही क्रूरता की संज्ञा में आ जाये । सत्य नारायण बनाम ममता में पति को शुरू से पत्नी पसन्द न थी तथा वह जारता का जीवन व्यतीत कर रहा था। उसका पुनर्विवाह क्रूरता मानी गयी।

सामान्य नियम यह है कि न्यायालय समस्त वैवाहिक सम्बन्धों पर विहंगम दृष्टि डालता है, और यह नियम उस समय अधिक महत्वपूर्ण है जब क्रूरता का गठन हिंसा के कृत्यों के द्वारा नहीं होता है बल्कि छोटी-छोटी बातों के संकलन द्वारा होता है, जैसे तानाकशी, गाली-गलौज, झूठे आरोप, तिरस्कार, अपमान आदि के वैवाहिक जीवन में फैले हुये दृष्टान्तों द्वारा। अत: एक पक्षकार का आचरण जिसके द्वारा दूसरे पक्षकार पर कलंक लगता है या अपमान होता है या दूसरा पक्षकार तिरस्कृत जीवन व्यतीत करने को बाध्य होता है, क्रूरता कहलाता है। संकट की आशंका मानसिक वेदना पहुंचाती है, जो शारीरिक कष्ट से भी अधिक दुःख

1. 1964 मध्य प्रदेश 28.

2. 1970 मध्य प्रदेश 36.

3. 1986 पंजाब और हरियाणा 253..

4. सन्तोष कुमारी बनाम परवीन, 1987 पंजाब और हरियाणा 33; नन्दा बनाम बीना, 1988 सु० को० 407. |

5. तपन बनाम अंजली, 1993 कल० 10.

6. इन्दिरा बनाम शैलेन्द्र 1993 मध्य प्रदेश 59; तपन बनाम अंजली, 1993 कल० 10.

7. देखें; रूप लाल बनाम करतारी, 1970 जम्मू और काश्मीर 158.

8. सप्तमी बनाम जगदीश, 73 कलकत्ता वीकली नोटस 502; कुसुम बनाम कामता, 1965 इलाहाबाद

9. 1997 राज० 118.

दायी होती है। संभोग से इन्कार करना मात्र करता का आचरण नहीं है, परन्तु यदि वह इन्कार स्थाई हो जाये तो यह क्रूरता का आचरण होगा, क्योंकि स्वाभाविक वासना भी अतृप्त स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालती है। हिन्दुओं में पुत्र आत्मा की मुक्ति के लिये आवश्यक है कि और यदि एक पक्ष स्थाई रूप से सम्भोग करने से इन्कार कर दे या स्थाई रूप से गर्भ-निरोधकों के साथ ही सम्भोग करे तो यह क्रूरता होगी।

क्रूरता के कृत्य याचिका दायर करने के पूर्व के होने चाहिये।

हमारे उच्च न्यायालयों में एक नई विचारधारा (trend) चली है। जो याचिकायें क्रूरता के आधार पर डाली जाती हैं तथा तथ्य यह बताते हैं कि विवाह पूरी तरह से टूट चुका है वहां वे याचिका मंजूर (allow) कर लेते हैं।

क्रूरताएवंक्रूर व्यवहार“-यह काफी सीमा तक तथ्य का प्रश्न अथवा विधि और तथ्य का मिश्रित प्रश्न है। इसका निष्कर्ष तथ्यों एवं पक्षकारों के दाम्पत्य सम्बन्धों से निकाला जाना चाहिये। जहाँ किसी एक के पक्ष से दूसरे पति या पत्नी को चोट पहुँचाने एवं अपमानित करने हेतु आशयित आचरण से साशय अनुक्रम का सबूत विद्यमान हो और ऐसा आचरण बार-बार किया जाता हो, तो क्रूरता को सरलता से अनुमानित किया जा सकता है। दूसरे पति या पत्नी को चोट पहुँचाने का न तो वास्तविक न ही आधारित आशय क्रूरता में आवश्यक तत्व है।

क्रूरता की प्रतिरक्षा-विकृतचित्त होना एक समय अंग्रेजी विधि में क्रूरता की अच्छी प्रतिरक्षा थी, परन्तु अब नहीं है। यही स्थिति भारतीय विधि में भी है। प्रकोपन और आत्मरक्षा क्रूरता की अच्छी प्रतिरक्षा है। प्रतिरक्षा के सम्बन्ध में अभी तक कोई भारतीय निर्णय उपलब्ध नहीं है।

विवाह-विच्छेद की डिक्री-यदि पति एवं पत्नी कई वर्षों तक एक दूसरे से अलग रह रहे हों और पति द्वारा अत्यधिक प्रयास के बावजूद पत्नी अपने पति के घर वैवाहिक जीवन व्यतीत करने नहीं आती है तो पति हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 10 के अधीन विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है।

मिथ्या आरोप द्वारा विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त नहीं की जा सकती-जहां किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी के विरुद्ध लगाये गये आरोप मिथ्या हैं एवं यह पाया गया कि व्यक्ति किसी अन्य महिला की ओर आकर्षित है तथा उसने अपनी पत्नी का अधित्यजन कर दिया है तो न्यायालय व्यक्ति द्वारा दायर विवाहविच्छेद की डिक्री के लिये याचिका को निरस्त कर सकता है।

मानसिक करता-जहां पत्नी अपने वैवाहिक घर को छोड़कर अपने मायके चली जाती है और काफी प्रयत्न के बावजूद भी वापस नहीं आती है तथा पत्नी और उसके पिता द्वारा दहेज की मांग एवं अन्य महिला से स्थापित सम्बन्ध का आरोप लगाया जाता है और न्यायालय पाता है कि आरोप गलत एवं मिथ्या आधार पर है, वहां पति द्वारा विवाह-विच्छेद हेतु प्रार्थना-पत्र पर डिक्री प्रदान की जा सकेगी।10

1. साह बनाम पायली, 1959 केरल 75; राजेन्द्र बनाम अनिता, 1993 दिल्ली 135.

2. ज्योतिष चन्द्र बनाम मीरा, 1970 कलकत्ता 266.

3. ए० बनाम बी०, 1993 बम्बई 70.

4. पवन कुमार बनाम चंचल कुमारी, 1999 पंजाब और हरियाणा 108; नरेश पुरोहित बनाम पी० के० शोभना, 1999 म०प्र० 108.

5. सजाता उदय पाटिल बनाम उदय मधुकर पाटिल, 2007 वी० एन० एस० 325 (एस० सी०); और भी देखें: माया देवी बनाम जगदीश प्रसाद, ए० आई० आर० 2007 एस० सी० 1426 : 2007 वी० एन० एस० 438 (एस० सी०).

6. भगवत बनाम भगवत, 1967 बम्बई 80.

7. मैचर बनाम मैचूर, (1946) 2 आल इंग्लैंड रिपोर्टस 307; दास्ताने बनाम दास्ताने, 1975 सु० का0 1534.

8. आध्यात्म भट्टार अलवर बनाम श्रीदेवी, ए० आई० आर० 2002 एस० सी० 89.

9. चेतन दास बनाम कमला देवी, ए० आई० आर० 2001 एस० सी० 1709.

10. राकेश शर्मा बनाम सुरभि शर्मा, ए० आई० आर० 2002 एस० सी० 138.

पत्नी (या पति) है। यदि प्रतिपक्षी के साथ यह जानते हुये मैथुन किया है कि यह उसकी पत्नी (या पति) नहीं है तो जारकर्म के वैवाहिक अपराध के गठन के लिये यह पर्याप्त है। वैवाहिक न्यायालय के समक्ष उपप्रतिपक्षी के इस ज्ञान या अज्ञान का कोई महत्व नहीं है कि यह मैथुन के समय यह जानता था कि प्रतिपक्षी किसी अन्य की पत्नी (या पति) है। एक उदाहरण लें, उप-प्रतिपक्षी ने प्रतिपक्षी को मैथुन के लिये यह कह कर राजी कर लिया कि वह उसका पति है और इसी विश्वास में प्रतिपक्षी ने उप-प्रतिपक्षी के साथ मैथुन किया। इस स्थिति में प्रतिपक्षी जारकर्म के वैवाहिक अपराध की दोषी नहीं है, यद्यपि उप-प्रतिपक्षी जारकर्म के दाण्डिक अपराध का अपराधी है।

क्या विवाह-वाह्य मैथुन पूर्ण मैथुन होना चाहिये, या अपूर्ण मैथुन ही पर्याप्त है? यह स्पष्ट है कि मैथुन का प्रयत्न मात्र मैथुन की संज्ञा में नहीं आता है। अंग्रेजी विधि में यह मान्य है कि अपूर्ण मैथुन ही पर्याप्त है।। सम्भवतः यही बात भारतीय विधि के अन्तर्गत भी है। इस आधार पर याचिका के सफल होने के लिये क्या मैथुन के कृत्य का साक्ष्य आवश्यक है या परिस्थितियों का साक्ष्य पर्याप्त होगा, मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि इस देश के नैतिक स्तर और सामाजिक मानदण्ड के अनुसार यदि कोई अपरिचित किसी विवाहिता स्त्री के साथ अर्द्धरात्रि में उसके शयनकक्ष में उसके अंक में पाया जाये तो उससे यही निष्कर्ष निकलेगा कि वे मैथुन में रत थे, जब तक कि उनके निर्दोष होने का स्पष्टीकरण न हो। लेखक इस मत से सहमत है। दास बनाम दास में पति ने पत्नी के जारकर्म में रहने के आधार पर विवाह-विच्छेद याचिका प्रेषित की, परन्तु यह केवल यह सिद्ध कर सका कि पत्नी ने जारकर्म किया है। जब उसकी अपील लम्बित थी हिन्दू विवाह अधिनियम में ‘जारकर्म’ को विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित करने का अधिकार है।

चिरुधा बनाम सुब्रमन्यम में पति ने तीन सन्तान होने के पश्चात् अपनी नसबन्दी करायी। परन्तु कुछ समय पश्चात् उसके चौथी सन्तान हो गयी। पति ने पत्नी की जारता के आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका दायर की। पति ने अपने वीर्य की जांच नहीं करायी थी। अत: न्यायालय ने यह सिद्ध नहीं माना कि पत्नी ने जारता की है। विवाह-विच्छेद के लिये जारकर्म का एक कृत्य ही पर्याप्त है।

जारकर्म का सबूत-जारकर्म के सिद्ध करने के सबूत का भार याचिकाकार पर है । जारकर्म के सबूत पर अनेक निर्णय हैं। समस्त अंग्रेजी और भारतीय निर्णयों की बहुत अच्छी समीक्षा न्यायाधीश श्री मुकर्जी ने की है। इस विषय पर उच्चतम न्यायालय के भी चार निर्णय हैं। इन निर्णयों के अनुसार सबूत का भार याचिकाकार पर है और उसे यह बात कि प्रत्यर्थी ने जारकर्म किया है या प्रत्यर्थी जारकर्म में रह रहा है किसी भी संशय के परे सिद्ध करनी चाहिये। किसी भी ‘संशय के परे’ शब्दों का अर्थ है कि न्यायालय के समक्ष आयी साक्ष्य से एक ही ओर केवल एक ही, निष्कर्ष निकाला जा सकता है, वह यह कि प्रतिपक्षी ने जारकर्म किया है। पूर्ण निश्चितता आवश्यक नहीं है, परन्तु यह आवश्यक है कि उन तथ्यों से यही निष्कर्ष निकलता है कि प्रतिपक्षी ने जारकर्म किया है। केवल अवसर का साक्ष्य पर्याप्त नहीं है। साथ ही यह भी स्थापित मत है कि जारकर्म को सिद्ध करने के लिये सीधा सबूत आवश्यक नहीं है। जारकर्म परिस्थितियों के साक्ष्य के द्वारा भी सिद्ध किया जा सकता है। सत्य तो यह है कि जब भी सीधा साक्ष्य प्रेषित किया जाता है, न्यायालय उसे संशय की दृष्टि से देखते हैं क्योंकि जारकर्म का सीधा साक्ष्य मिलना लगभग असम्भव है,

1. रेडन ऑन डाइवोर्स (दसवां संस्करण, पृष्ठ 172).

2. सुब्रमा बनाम सरस्वती, (1966) 2 मद्रास लॉ जर्नल 263.

3. 1982 म०प्र० 120.

4. 1987 केरल 5.

5. राजेन्द्र बनाम शारदा, 1993 मध्य प्रदेश 142.

6 अरुण बनाम अनिला, 1993 पंजाब और हरियाणा 33.

7. शचीन्द्रनाथ बनाम नीलिमा, 1978 कलकत्ता 38.

8. विपिन चन्द्र बनाम प्रभा, 1957 सुप्रीम कोर्ट 176; ह्वाईट बनाम ह्वाईट, 1958 सुप्रीम कोर्ट 441; लक्ष्मण बनाम माना, 1964 सुप्रीम कोर्ट 40; महेन्द्र बनाम सुशीला, 1965 सप्रीम कोर्ट 365

9. पुष्पा बनाम राधेश्याम, 1972 राजस्थान 260; चन्द्रमती बनाम पझेती, 1982 केरल 68.

जारकर्म सदैव ही छिपकर किया जाता है। त्रिपट बनाम विमला में निम्न तथ्य न्यायालय के समक्ष में आये-प्रतिपक्षी घर से निरन्तर चार-छ: दिन गायब रहती है और उसे कई बार एकान्त में नितान्त अपरिचितों के साथ देखा गया, जिसका कोई भी स्पष्टीकरण नहीं था। न्यायालय ने कहा इन तथ्यों से प्रतिपक्षी की जारता में रहना सिद्ध हो जाता है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि परिस्थितियां ऐसी होनी चाहिये जिनके द्वारा यह अबाध्य निष्कर्ष निकलता हो कि प्रतिपक्षी जारता में रह रहा है। यदि पत्नी के जार के साथ अर्द्धनग्न अवस्था में किसी होटल में देखा गया हो तो यह जारकर्म का साक्ष्य नहीं हो सकता है जब तक कि उन कृत्यों द्वारा सहवास की अकाट्य धारणा न बनती हो पति का कुख्यात व्यक्तियों के बीच रहना या वेश्याओं का उससे परिचत होना या कुख्याति वाली स्त्रियों के साथ उसे देखा जाना इन तथ्यों से यह अबाध्य निष्कर्ष नहीं निकलता है कि उसने जारकर्म किया। पत्नी द्वारा पति को पत्र लिखकर जारकर्म की स्वीकृति जारकर्म का पर्याप्त परिणाम है। इस भांति प्रतिपरीक्षा (जिरह) में पत्नी द्वारा जारकर्म की स्वीकृति से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि उसने जारकर्म किया है। सरोज बनाम कल्याणकान्त ; वीन बनाम नरेन्द्र और स्वयं प्रभा बनाम चन्द्रशेखर10 में न्यायालयों ने मत व्यक्त किया है कि तथ्यों द्वारा औचित्यपूर्ण सम्भावना होती है कि प्रतिपक्षी ने ही जारकर्म किया है, तो जारकर्म सिद्ध करने के लिये यह पर्याप्त है। आज के दिन यह नियम अकाट्य नहीं है कि जारकर्म संशय के परे सिद्ध किया जाये। आज जारकर्म औचित्यपूर्ण सम्भावना के आधार पर भी सिद्ध किया जा सकता है।।1

जारकर्म एवं अधित्यजन-किसी विश्वासोत्पादक और अकाट्य साक्ष्य के बिना पति या पत्नी के विरुद्ध जारकर्म का एकमात्र अभिकथन एवं जारकर्मी को पक्षकर न बनाना क्रूरता के समान है और यह उचित रूप से विवाह-विच्छेद का आधार हो सकता है। उक्त आचरण वैवाहिक विधि में क्रूरता की कोटि में आता है। धारा 13 (1) (i-ख) प्रावधान करती है कि यदि पत्नी ने पति को याचिका को पेश करने से तत्काल दो वर्ष से अन्यून निरन्तर अवधि तक अधित्यजित किया है, तो यह विवाह-विच्छेद के लिये आधार होगा।12

उन्मत्तता

उन्मत्तता या विकृतचित्त होना न्यायिक पृथक्करण एवं विवाह-विच्छेद दोनों का ही आधार है।

उन्मत्तता का अर्थ-मस्तिष्क की दुर्बलता या बुद्धि की कमी उन्मत्तता की परिधि में नहीं आती है।13 वह व्यक्ति जो अपने कारोबार, कार्य-व्यापार को समझने और चलाने में असमर्थ होता है या जो सामान्य आचरण करने में असमर्थ है, विकृतचित्त कहलाता है। उन्मत्तता में जड़ता और पागलपन भी आता है।

न्यायिक पृथक्करण या विवाह-विच्छेद के लिये यह आवश्यक नहीं है कि प्रतिपक्षी किसी न्यायालय द्वारा उन्मत्तचित्त घोषित किया गया है। यदि न्यायालय ने ऐसी घोषणा की है तो भी वैवाहिक न्यायालय उसे

1. पतयाई बनाम मणयामी, 1967 मद्रास 254; रवीन्द्र बनाम सीता, 1986 पटना 128; विरुपक्षी बनाम सरोजिनी, 1991 कर्नाटक 128.

2. 1956 जम्मू और कश्मीर 72.

3. सुब्रमा बनाम सरस्वती, (1966)2 मद्रास लॉ जर्नल 263; ह्वाईट बनाम ह्वाईट, 1958 सुप्रीम कोर्ट 441; वीरा रेडी बनाम किस्तम्मा, 1959 मद्रास 236%; सुब्रमा बनाम सरस्वती, (1966) 2 मद्रास लॉ जर्नल 263.

4. पी० बनाम पी०, 1982 बम्बई 498.

5. हेन्डरसन बनाम हेन्डरसन, 1970 मद्रास 104.

6. दास बनाम दास, 1982 म०प्र० 20.

7. अनन्दी बनाम राजा, 1973 राजस्थान 94.

8. (1982) 85 कल० वी० नो073.

9. 1984 पंजाब और हरियाणा 99.

10. 1982 कर्ना० 295.

11. हरगोविन्द बनाम रामदुलारी, 1986 म०प्र० 57; संयुक्ता बनाम लक्ष्मी नारायण, 1991 उड़ासा 39.

12. श्रीमती प्रमोद बिजलवान बनाम सतेन्द्र दत्त, 2008 विधि निर्णय एवं सामयिकी 142 (उत्तराखण्डा :एण आई० आर० 2008 (उत्तराखण्ड) 508 (एन० ओ० सी०).

13. अजीनराज बनाम वासुमणि, 1969 गुजरात 48.

मानने के लिये बाध्य नहीं है और वे स्वतन्त्र साक्ष्य मांग सकते हैं। ऐसी घोषणा एक महत्वपूर्ण तथ्य है, इससे अधिक कुछ नहीं। प्रतिपक्षी विकृतचित्त है, इसके सबूत का भार याचिकाकार पर है।।

सन् 1976 के संशोधन द्वारा उन्मत्तता सम्बन्धी उपबन्ध 13 (1) (iii) का पूर्व गठन किया गया है। अब इस आधार पर विवाह-विच्छेद या न्यायिक पृथक्करण के लिये यह सिद्ध करना होगा कि दूसरा पक्षकार असाध्य रूप से विकृतचित्त रहा है, या लगातार या आंतरिक रूप से इस किस्म से और इस हद तक मानसिक विकार से पीड़ित रहा है कि अर्जीदार से युक्तियुक्त रूप से आशा नहीं की जा सकती है कि वह प्रत्यर्थी के साथ रहे। मानसिक विकार की परिभाषायें दी गयी हैं-मानसिक विकार से तात्पर्य है, मानसिक बीमारी, मस्तिष्क या संरोध या अपूर्ण विकास मनोविक्षेप विषयक विकार या मस्तिष्क का कोई अन्य विकार या अशक्तता, और इसके अन्तर्गत विखण्डित मनस्कता भी आती है। मनोविक्षेप विषयक विकार’ से तात्पर्य है अभिव्यक्ति से मस्तिष्क का दीर्घ स्थायी विकार या अशक्यता (चाहे इनमें बुद्धि की असामान्यता हो या न हो) अभिप्रेत है जिसके परिणामस्वरूप अन्य पक्षकार का आचरण अमान्य रूप से आक्रामक या गम्भीररूप से अनुत्तरदायी हो जाता है चाहे उसके लिये चिकित्सा-उपचार अपेक्षित हो या न हो, या किया जा सकता हो या न किया जा सकता हो। ‘विखण्डित मनस्कता’ मानसिक विकार की परिभाषा में आता है परन्तु इस आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका तभी सफल हो सकती है जबकि यह सिद्ध हो जाये कि विखण्डित मनस्कता’ ऐसी है जिसके कारण युक्तियुक्त रूप से यह आशा नहीं की जा सकती है कि याचिकाकार प्रत्यर्थी के साथ रह सकेगा। दोनों ही शर्तों का पूर्ण होना आवश्यक है। दोनों शर्तों के पूर्ण होने पर विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित की जा सकती है। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि यह स्थिति विवाह के समय या उसके पूर्व उपस्थित थी।

इस उपबन्ध को अंग्रेजी अधिनियम मेट्रिमोनियल कॉजेज ऐक्ट से लिया गया है। समझ में नहीं आता है कि इस परिवर्तन द्वारा हम क्या नई बात कहना चाहते हैं। यह उपबन्ध उलझनें और कठिनाइयां ही उत्पन्न करेगा।

विखण्डित मनस्कता (सीजोफ्रेनिया)-पत्नी मस्तिक के असंतुलन के कारण उक्त बीमारी से ग्रस्त थी। उसके उपचार की कम सम्भावनायें हैं, चिकित्सक ने भी अभिकथन किया था कि विखण्डित भनस्कता मानसिक विकार से भिन्न है। साक्ष्य से स्थापित कि स्त्री को विखण्डित मनस्कता (सीजोफ्रेनिया) नामक बीमारी के कारण तलाक दिया जा सकता है लेकिन निर्वाह व्यय प्रदान किया गया।

विखण्डित मनस्कता मानसिक विकार है जिसके आधार पर विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित की जा सकती है, परन्तु याचिकाकार को यह स्थापित करना होगा कि विखण्डित मनस्कता ऐसी है जिसके कारण वह दूसरे के साथ युक्तियुक्त रूप से रहने में असमर्थ है।।

ऐसा प्रतीत होता है कि उन्मत्तता के आधार पर याचिका प्रेषित होने पर न्यायालय का यह कर्तव्य होगा कि वह सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 32 और नियम 3 और 15 के अन्तर्गत उन्मत्तता की प्राथमिक जांच करें जहां पत्नी ने काबिल डाक्टरों की समिति के समक्ष सहयोग देने से इन्कार कर दिया, उसकी हस्तलेखा की कई मानसिक विकृति की दवाइयों की पर्चियां पायीं गयीं, इनसे उसकी उन्मत्तता का अंदाज लगाया जा सकता है।

1. कादम्बिनी बनाम रेशमलाल, 1990 मध्य प्रदेश 150.

2. रीता बनाम सितेश, 1982 कल0 138.

3. किरण बनाम भेरी प्रसाद, 1982 इला० 242; रीता बनाम सितेश, 1982 कल० 138.

4. किरण बनाम भैरो प्रसाद, 1982 इला० 242.

5. हदय नारायण राय एवं अन्य बनाम रतजय प्रधान, 2008 विधि निर्णय एवं सामयिकी 503 (इला०) : ए० आई० आर० 2008 इला० 2375 (एन० ओ० सी०).

6. त्रिलोचन बनाम जीत, 1986 पंजाब और हरियाणा 379; रामनारायण बनाम रामेश्वरी. स०को 2260; प्रेमाथा बनाम आशिक, 1991 कल० 123.

7. आशा बनाम अमृत, 1977 पंजाब और हरियाणा 28.

8. टी० हरिकुमार नायडू बनाम प्रमिला, 2001 आन्ध्र प्र० 46.

इस धारा में मानसिक उन्मत्तता आयेगी। केवल मानसिक उदासी (depression) इस धारा का आधार नहीं है।

कुष्ठ रोग

धारा 13 (1)(iv), हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत कुष्ठ रोग न्यायिक पृथक्करण और विवाहविच्छेद का आधार है। न्यायिक पृथक्करण या विवाह-विच्छेद की डिक्री के लिये कोढ़ का उग्र और असाध्य होना अनिवार्य है। विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 ने इस आधार को संशोधित करके यह रूप दिया है। अब कुष्ठ की कोई भी कालावधि निर्धारित नहीं की गई है।

कुष्ठ रोग के आधार पर न्यायिक पृथक्करण या विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त करने के लिये निम्न शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है

(क) कुष्ठ रोग असाध्य हो, और

(ख) कुष्ठ रोग उग्र रूप में हो।

चिकित्सा विज्ञान के विकास के कारण अब अनेक प्रकार के कुष्ठ रोग असाध्य नहीं रहे हैं। अतः प्रतीत यह होता है कि कुछ समय व्यतीत होने पर ही कुष्ठ रोग उग्र हो सकता है। घातक या विषैला कुष्ठ उग्र कुष्ट की परिभाषा में आता है। लिप्रोमेट्स कुष्ठ रोग, घातक और लगने वाला, भी उग्र कुष्ठ की परिभाषा में आता है। कभी-कभी लिप्रोमेट्स कुष्ठ रोग को इलाज द्वारा रोका जा सकता है, परन्तु फिर भी यह कुछ समय उपरान्त उभर आता है। कुष्ठ रोग तब भी उग्र माना जाता है जब छाले उभर आयें, अंग गलने लगे और सामाजिक सहवास लगभग असम्भव हो जाये।

रतिज रोग (Veneral Diseases)

रतिज रोग विवाह-विच्छेद और न्यायिक पृथक्करण का आधार है। यह आवश्यक है कि रोग संचारी हो। विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 ने इस आधार को संशोधित किया है। 1955 के अधिनियम के अन्तर्गत रतिज रोग तीन वर्ष पुराना हो तभी वैवाहिक अनुतोष का आधार बनता था। अब कोई भी कालावधि आवश्यक नहीं है। जन्मत: गर्मी का रोग रतिज रोग की परिभाषा में नहीं आता है यह बात कोई महत्व नहीं रखती है कि रोग असाध्य नहीं है, या रोग अकारण ही लग गया है, या प्रत्यी उसका दोषी नहीं है |

1955 के अधिनियम के अन्तर्गत न्यायिक पृथक्करण के लिये यह अनिवार्य था कि अर्जीदार यह सिद्ध करे कि प्रत्यर्थी को रोग उससे नहीं लगा है, परन्तु विवाह-विच्छेद के लिये यह शर्त नहीं दी गई थी। इस ग्रन्थ के प्रथम संस्करण में इस लेखक ने निवेदन किया था कि यह केवल शाब्दिक अन्तर है, मूल रूप से दोनो आधारों में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि धारा 23 (1) (क) के अन्तर्गत प्रत्येक याचिकाकार के लिये यह सिद्ध करना आवश्यक है कि अनुतोष प्राप्त करने के लिये वह अपने किसी दोष का लाभ नहीं उठा रहा है। यदि प्रत्यर्थी के रोग अर्जीदार से लगा है तो उसे न विवाह-विच्छेद और न ही न्यायिक पृथक्करण की डिक्री मिल सकती है। सन् 1976 के अधिनियम द्वारा अब इन शब्दों को कि प्रत्यर्थी का रोग अर्जीदार से नहीं लगा है’ हटा दिया गया है।

मि० एक्स बनाम हॉस्पिटल वाई (Mr. Xv. Hospital Y)4 में उच्चतम न्यायालय ने एच० आई० वी० (HIV) पोजिटिव (Positive) को रतिज रोग माना तथा कहा कि यदि कोई व्यक्ति एच० आइ०१० पोजिटिव हो तो उसे विवाह करने से रोका जा सकता है क्योंकि किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति का रागा करने का अधिकार नहीं है।

1. मा रेड्डी बनाम राकेश रेड्डी , 2002 आंध्र प्र० 228.

2, अन्नपूर्णा बनाम नवलकिशोर, 1965 उड़ीसा 72.

3. शिवय्या बनाम पदमराव, (1974) सुप्रीम कोर्ट जर्नल 79.

4.1999 सु० को० 495.

संपरिवर्तन (Conversion)

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 (1) (ii) के अन्तर्गत संपरिवर्तन न्यायिक पृथक्करण और विवाह-विच्छेद का आधार है। इस खण्ड के अन्तर्गत यदि संपरिवर्तन द्वारा प्रतिपक्षी हिन्दू नहीं रहा है तो याचिकाकार न्यायिक पृथक्करण या विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकता है। इस आधार की निम्न शर्ते है-

(1) प्रतिपक्षी हिन्दू नहीं रहा है, और

(2) प्रतिपक्षी अन्य धर्म में संपरिवर्तित हो गया है।

हिन्दू नहीं रहा है-इस पुस्तक के अध्याय 1 में हम देख चुके हैं कि यदि कोई हिन्दू यह घोषणा करे कि वह हिन्दू नहीं रहा है या हिन्दू धर्म का पालन करना छोड दे, हिन्दू धर्म की निन्दा करने लगे या नास्तिक हो जाये या पश्चिमी ढंग से रहने लगे, गाय का मांस खाने लगे, देवी-देवताओं की निन्दा करने लगे, तो भी वह व्यक्ति हिन्दू ही रहेगा। उसके द्वारा दूसरे धर्म में आस्था रखने की घोषणा या अन्य धर्म का पालन करना भी उसे हिन्दू से अहिन्दू बनाने के लिये पर्याप्त नहीं है। अत: हिन्द्र नहीं रहने के संपरिवर्तन के अतिरिक्त और कोई सार्थकता नहीं है। हम यह भी देख चुके हैं कि बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिक्ख धर्म या हिन्दू धर्म के अनुयायियों का एक दूसरे के धर्म में संपरिवर्तित होना कोई महत्व नहीं रखता है, क्योंकि वह फिर भी हिन्दू ही रहेंगे। अत: इन शब्दों हिन्दू नहीं रहा है कि सार्थकता इस संदर्भ में है।।

अन्य धर्म में संपरिवर्तन-यह आवश्यकता है कि प्रतिपक्षी हिन्दू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिक्ख धर्म को छोड़कर अन्य किसी धर्म में संपरिवर्तित हो जाये। उदाहरणार्थ : यदि वह ईसाई, मुसलमान, यहूदी या पारसी हो जाये तो यह संपरिवर्तन द्वारा हिन्दू नहीं रहेगा। संपरिवर्तन के लिये धर्म द्वारा निर्धारित अनुष्ठान का सम्पन्न करना आवश्यक है। नये धर्म में प्रतिपक्षी की कितनी आस्था है, कितनी गहराई है यह निरर्थक बात है। संपरिवर्तित व्यक्ति नये धर्म का चाहे बिन्कुल ही पालन न करे, यदि वह संपरिवर्तन द्वारा हिन्दू नहीं रहा है, तो याचिकाकार विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा ही समाप्त हो सकता है।

प्रवज्या ग्रहण करना (Renunciation of World)

संसार त्यजन या सन्यासी होना पूर्णतया हिन्दू आधार है। धारा 13 (1)(vi) के अन्तर्गत यदि प्रत्यर्थी ने किसी धार्मिक पंथ के अनुसार प्रवज्या ग्रहण कर लिया है तो याचिकाकार विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकता है।

हिन्दुओं में सन्यास आश्रम चार आश्रमों में से अन्तिम आश्रम है। हिन्दू धर्म के अनुसार प्रत्येक हिन्दू के लिये अपनी वद्धावस्था में सन्यास आश्रम में प्रविष्ट होना अनिवार्य है। सन्यास आश्रम में प्रविष्ट होने का तात्पर्य यह होता है कि सांसारिक रूप से मृत्यु, यही कारण है कि सन्यासी होने के अनुष्ठानों में क्रिया-कर्म । का भी अनुष्ठान होता है। सन्यासी अपना सांसारिक नाम भी पीछे छोड़ देता है और नया धारण करता है। दूसरे शब्दों में, सन्यासी होने से तात्पर्य है संसार और सांसारिकता का पूर्ण त्याग, अपने सांसारिक जीवन का अन्त उस जीवन का जो उसने गृहस्थ जीवन में व्यतीत किया है और उस जीवन का जो उसने वानप्रस्थआश्रम में व्यतीत किया है। स्पष्ट ही है कि सन्यास आश्रम में प्रविष्ट होना हिन्दू धर्म का ही अनुसरण करना है। यह पूर्णतया धार्मिक कृत्य है। हिन्दू चाहे तो वृद्धावस्था के पूर्व, युवाकाल में भी सन्यास आश्रम में प्रविष्ट कर सकता है। सन्यास आश्रम में प्रविष्ट करने को ही प्रवज्या ग्रहण करना कहते हैं।

दसरे दृष्टिकोण से देखने पर दूसरे पक्षकार और वैवाहिक जीवन के दृष्टिकोण से देखने पर प्रवज्या ग्रहण करना अभित्यजन का अति रूप है। यह ठीक है कि हर व्यक्ति का अपना धर्म पालन और धार्मिक आस्थाओं की स्वतन्त्रता है, परन्तु क्या अपने धर्म पालन या अपनी आस्थाओं के निर्वहन द्वारा उसे अपनी पत्नी (या पति) को कष्ट देने का भी अधिकारी है? एक पक्षकार द्वारा दूसरे को छोड़ना असीम कष्ट की स्थिति है. सत्य

1. चन्द्र शेखर बनाम कुलन्द देवलू, 1963 सुप्रीम कोर्ट 185.

2. देखें, इस ग्रन्थ का अध्याय 1.

तो यह है कि सन्यासी-आश्रम में प्रविष्ट करने का अर्थ है वैवाहिक जीवन का त्याग, अत: दूसरे पक्षकार के दृष्टिकोण से वह अभित्यजन का अति रूप है, अभित्यजन करने वाले पक्षकार के तो वापस आने की आशा हो सकती है परन्तु सन्यासी की नहीं। हिन्दू विवाह अधिनियम के नये और पुराने में सामंजस्य स्थापित करने के लिये यह उपबन्ध बनाया है कि यदि एक पक्षकार सन्यासी हो जाये तो दूसरा उस आधारा पर विवाहविच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकता है। अधिनियम सन्यासी होने की अभित्यजन को संज्ञा नहीं देता है।

हो सकता है कि कोई व्यक्ति संसार त्याग दे, अर्थात् सांसारिक जीवन से विरक्त होकर एकांकी जीवन व्यतीत करने लगे और दाम्पत्य जीवन को भी समाप्त कर दे। संक्षेप में वह पूर्णतया सामाजिक समागम को त्याग दे, परन्तु आश्रम में प्रविष्ट न हो, तो वह अभित्यजन या क्रूरता का दोषी भले ही हो, प्रवज्या ग्रहण करने का दोषी नहीं है। इस खण्ड के अन्तर्गत उसका किसी धार्मिक पंथ के अनुसार प्रवज्या ग्रहण करना अनिवार्य है। चेला होना ‘मात्र सन्यासी होना नहीं है।

सन्यास-आश्रम में कोई भी व्यक्ति तब ही प्रविष्ट हो सकता है जबकि वह सकल अनुष्ठानों को सम्पन्न कर ले। अनुष्ठानों के सम्पन्न न करने पर वह सन्यासी नहीं हो सकता है। यद्यपि उस स्थिति का सोच पाना कठिन है कि कोई व्यक्ति सन्यासी होने पर भी संसार न त्यागे, परन्तु यदि ऐसा है तो फिर इस आधार की एक शर्त होने के कारण, विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित नहीं हो सकती है। कुछ धार्मिक आश्रम ऐसे भी हैं जहां संसार त्यागना आवश्यक नहीं है। उदाहरण लें; कुछ महन्त (महन्त होना धार्मिक आश्रम में प्रविष्ट करना है) ऐसे भी हैं जो विवाहित जीवन व्यतीत कर सकते हैं। सिक्ख के ग्रन्थी होने पर, हिन्दू या जैन के पुजारी होने पर वह धार्मिक पद तो ग्रहण करता है, परन्तु संसार को नहीं त्यागता है।

मृत्यु की उपधारणा (Presumption of death)

साक्ष्य अधिनियम की धारा 108 के अन्तर्गत यह उपबन्ध है कि यदि किसी व्यक्ति के विषय में सात वर्ष से उन लोगों ने, जिनको सामान्यत: उसके जीवित होने के बारे में सुनना चाहिये था, उसके जीवित होने के बारे में कुछ भी सुना है तो व्यक्ति मृत माना जायेगा। जो भी व्यक्ति यह कहता है कि वह व्यक्ति जीवित है, सबूत का भार उस पर है। वैवाहिक विधि में इस उपधारणा का क्या महत्व है? क्या इस उपधारा के आधार पर कोई पत्नी या पति यह मानकर चल सकते हैं कि वह विधवा (या विधुर) हो गया है, और क्या यह मानकर वह दूसरा विवाह कर सकती है? यदि हाँ, तो मान लीजिये दूसरे विवाह के दो दिन पश्चात् उसका पति (या पत्नी) घर वापस आ जाता, तो क्या विवाह समाप्त माना जायेगा? क्या दूसरा विवाह वैध होगा? दोनों पश्नों का उत्तर नकारात्मक है, अत: मृत्यु की अवधारणा (Presumption) के आधार पर पति या पत्नी यह मानकर नहीं चल सकते हैं कि उनका विवाह समाप्त हो गया है। यदि इस उपधारणा के आधार पर दूसरा विवाह किया जाता है तो वह शून्य होगा और पति या पत्नी के वापस आने पर द्विविवाह के अभियोग में अभियोजन भी हो सकता है। विश्व की अनेक वैवाहिक विधियाँ मृत्यु की उपधारणा को विवाह-विच्छेद का आधार बनाती हैं। यही हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 (1) (vii) करती है। एक बार विवाहविच्छेद होने पर दूसरा पक्षकार स्वतन्त्र हो जाता है। वह दूसरा विवाह कर सकता है, फिर चाहे डिक्री पास होने के दूसरे ही दिन लापता पक्षकार वापिस आ जाये, वह कुछ नहीं कर सकता है। विवाह विघटित हो चुका है।

अंग्रेजी विधि में भी यह विवाह-विच्छेद का आधार रहा है और मैट्रिमोनियल ऐक्ट, 1973 में भी इसे मान्यता दी गई है।

पत्नी द्वारा विवाह-विच्छेद के विशेष आधार

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 (2) के अन्तर्गत हिन्द पत्नी को विवाह-विच्छेद के दो। विशेष आधार उपलब्ध थे। 1976 के संशोधन द्वारा दो अन्य आधार निर्धारित किये गये हैं। अब पत्नी का चार। विशेष आधार उपलब्ध हैं। ये चार आधार हैं.—

1. गोविन्द बनाम कुलदीप, 1971 दिल्ली 151.

2. सातलदास बनाम सन्तराम, 1954 सुप्रीम कोर्ट 606: सत्यनारायण बनाम हिन्दू रिलीजियस एण्डाउमण्ट बोर्ड मद्रास, 1957 आन्ध्र प्रदेश 824.

(क) हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व अनुष्ठापित विवाह की दशा में पति ने ऐसे प्रारम्भ पूर्व फिर विवाह कर लिया था या याचिकाकार के विवाह के अनुष्ठापन के समय पति की कोई ऐसी दसरी पत्नी जीवित थी जिसके साथ उसका विवाह ऐसे प्रारम्भ के पूर्व हुआ था परन्तु यह तब जब कि दोनों दशाओं में दूसरी पत्नी याचिका की उपस्थापना के समय जीवित हो।

(ख) विवाह सम्पन्न होने के पश्चात् उसका बलात्कार, गुदामैथुन या पशुगमन का दोषी है।

(ग) हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के अधीन वाद में या दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 के अधीन (या पुरानी दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की अस्थायी धारा 488 के अधीन) कार्यवाही में, यथास्थिति; डिक्री या आदेश, पति के विरुद्ध पत्नी को भरण-पोषण देने के लिये इस बात के होते हुये भी पारित किया गया है कि वह अलग रहती थी और ऐसी डिक्री या आदेश के पारित किये जाने के समय के पक्षकारों में एक वर्ष या उसके अधिक के समय तक सहवास पुनरारम्भ नहीं हुआ है।

(घ) पत्नी का विवाह उस समय हुआ जब उसकी आयु 15 वर्ष से कम थी और उसने 15 वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् और 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व विवाह का निराकरण कर दिया है। यह बात कि विवाहोत्तर संभोग हुआ था या नहीं कोई महत्व नहीं रखता है।

अधिनियम के पूर्व का बहुपत्नी विवाह (LLB Notes PDF)

पत्नी के विवाह-विच्छेद का प्रथम विशेष आधार द्विविवाह समाप्त करने का युक्तियुक्त परिणाम है। धारा 13 (2) (i) हिन्दू विवाह अधिनियम की नीति को कार्य रूप देने का प्रयास होने के कारण पति पत्नी की कोई अयोग्यता या आचरण की याचिका के विरुद्ध अपनी प्रतिरक्षा में नहीं दे सकता है।

हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रतिपादित होने के पूर्व सम्पन्न बहपत्नीत्व विवाह अब भी पूर्णतया विधिमान्य है। परन्तु धारा 13 (2) (i) के अन्तर्गत हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रतिपादन के पश्चात् और याचिका प्रेषित करते समय यदि किसी हिन्दू की एक से अधिक पत्नी जीवित है तो उनमें से कोई भी पत्नी विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित कर सकती है। यह आधार तब ही उपलब्ध होगा जबकि दोनों विवाह अधिमान्य हैं । इस भाँति इस आधार के अन्तर्गत

(क) हिन्दू विवाह अधिनियम के पूर्व सम्पन्न बहुपत्नीत्व विवाह की कोई भी पत्नी विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकती है,

(ख) परन्तु यह आवश्यक है कि याचिका प्रेषित करते समय एक अन्य पत्नी जीवित हो।

इस आधार के अन्तर्गत यह भी हो सकता है कि दोनों ही पत्नियां विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित कर दें और विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर लें, इस उपधारा के अन्तर्गत शर्त यही है कि याचिका प्रेषित। करते समय दूसरी पत्नी जीवित हो। अत: दोनों पत्नियाँ एक साथ या कुछ अन्तराल से याचिका प्रेषित कर सकती हैं, आवश्यक केवल यह है कि दोनों याचिकायें विवाह-विच्छेद की कार्यवाही में डिक्री मिलने के पूर्व याचिका प्रेषित की गई हों। इसका अर्थ यह हो सकता है कि दोनों पत्नियाँ विवाह-विच्छेद ले लें, और पति पत्नी विहीन हो जाये। यह भी हो सकता है कि एक पत्नी द्वारा याचिका प्रेषित करने के पश्चात् दूसरी पत्नी की मृत्यु हो जाये या पति उससे विवाह-विच्छेद कर ले, परन्तु पत्नी की विवाह-विच्छेद की याचिका पर उसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। पत्नी की याचिका इस कारण खारिज नहीं की जा सकती है कि दूसरे विवाह के समय प्रथम पत्नी ने यह करार किया था कि वह पति के साथ ही रहती रहेगी, न ही पति उसके किसी आचरण या अयोग्यता का सहारा अपनी प्रतिरक्षा में ले सकती है न ही धारा 23 का कोई उपबन्ध उसकी किसी याचिका के विरुद्ध अभिवचन में लिया जा सकता है।

1. निम्मो बनाम निक्काराम, 1968 दिल्ली 260.

2वेंकटम्मा बनाम वेन्कटास्वामी, 1963 मैसूर 118; लीला बनाम अमरनाथ सिंह 1968 राजस्थान 178.

3. मंडल बनाम लक्ष्मी, 1963 आन्ध्र प्रदेश 83.

4. ललिथम्मा बनाम कारन, 1966 मैसूर 178; निम्मो बनाम निक्का, 1968 दिल्ली 260; जसवन्त बनाम लाल सिंह 1969 पी० एल० आर० 840.

5. निम्मो बनाम निक्का, 1968 दिल्ली 260.

बलात्कार एवं अप्राकृतिक अपराध

बलात्कार भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अन्तर्गत और पशु-मैथुन और गुदा मैथुन धाप 377 के अन्तर्गत दाण्डिक अपराध है। अन्तिम दो अप्राकृतिक अपराध कहलाते हैं। इन तीनों में से किसी एक का भी यदि पति दोषी है तो पत्नी विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित कर सकती है। परन्तु इन्हीं अपराधों में पत्नी के दोषी होने पर पति विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित नहीं कर सकता है। यह समझ पान कठिन है कि पति-पत्नी के बीच यह प्रभेद क्यों किया गया। बलात्कार, गदा-मैथुन और पशु-मैथुन क्रूरता की संज्ञा में आते कोई व्यक्ति बलात्कार का दोषी है यदि वह अन्य स्त्री के साथ उसकी सम्मति के बिना मैथुन करता है। यदि सम्मति बल या कपट से ली गई हो तो बलात्कार का अपराध बनता है। स्त्री यदि किसी भूल के कारण (जैसे दूसरे व्यक्ति को अपना पति समझकर) सम्मति देती है तो भी बलात्कार का अपराध गठित हो सकता है। परन्तु कोई भी व्यक्ति अपनी वयस्क पत्नी के बलात्कार का अपराधी नहीं हो सकता है। इस आधार पर पति का, अपनी पत्नी को छोड़कर, अन्य स्त्री के बलात्कार का दोषी होना चाहिये।

गुदा-मैथुन और पशुगमन का अपराध तब गठित होता है जब कि कोई व्यक्ति किसी पुरुष, स्त्री या पशु से अप्राकृतिक ढंग से इन्द्रिय भोग करता है। पत्नी के साथ गुदा-मैथुन करना भी इसके अन्तर्गत आता है। यह आवश्यक नहीं है कि पति अपराध (बलात्कार, गुदा-मैथन या पश मैथन, जो भी आधार हो) के लिये दण्डित किया गया हो। यदि दाण्डिक न्यायालय द्वारा पति को दण्ड भी मिला है; तो भी वैवाहिक कार्यवाही में पत्नी को स्वतन्त्र साक्ष्य द्वारा पति का अपराध सिद्ध करना होगा। वह पति के दाण्डिक न्यायालय द्वारा दण्डित होने के आधार पर ही विवाह-विच्छेद नहीं प्राप्त कर सकती है।

भरण-पोषण की डिक्री या आदेश के पश्चात् सहवास का पुनःस्थापन न होना

पत्नी के लिये विवाह-विच्छेद या न्यायिक पृथक्करण का यह नया आधार है। पत्नी ने यदि दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 18 (2) के अन्तर्गत भरण-पोषण की डिक्री प्राप्त कर ली है.या दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के अन्तर्गत भरण-पोषण की आज्ञा प्राप्त कर ली है और एक वर्ष या उससे अधिक की अवधि तक सहवास का पुनराम्भ नहीं हुआ है, तो पत्नी विवाह-विच्छेद या न्यायिक पृथक्करण की माँग कर सकती है। इस उपबन्ध के अन्तर्गत केवल पत्नी को विवाह-विच्छेद का अधिकार है, पति को नहीं। प्रतीत यह होता है कि संसद् ने इसे दोषित सिद्धान्त पर आधारित किया है। जब हमने विवाहभंग सिद्धान्त को मान्यता दी है, तो उचित यह होता कि इस आधार को भी विवाह-भंग सिद्धान्त पर आधारित करते और पति-पत्नी दोनों को ही विवाह-विच्छेद का अधिकार दिया होता। एक वर्ष या उससे अधिक की अवधि तक साहचर्य का पुनराम्भ होना यही इंगित करता है कि विवाह टूट चुका है, भंग हो गया है. अत: उसे विघटित करना ही पति-पत्नी के हित में होगा, अत: दोनों में से किसी को भी विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित करने का अधिकार है। परन्तु संसद् ने यह अधिकार पत्नी को ही दिया है।।

विवाह का निराकरण (Repudiation of marriage) (Law Notes)

धारा 13 (2)(ii) के उपबन्ध के अनुसार पत्नी को विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित करने का अधिकार है यदि उसका विवाह 15 वर्ष से कम आयु में कर दिया गया था और उसने 15 वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् परन्तु 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने से पूर्व विवाह का निराकरण कर दिया है-यह बात कोई महत्व नहीं रखती है कि विवाहोत्तर संभोग हुआ है या नहीं। यह उपबन्ध मसलमान विवाह-विच्छेद। अधिनियम, 1939 की धारा 2 (vii) मिलता-जुलता है, अन्तर केवल यह है कि मुसलमान विधि के अन्तर्गत विवाहात्तर संभोग का न होना अनिवार्य है और यदि विवाहोत्तर संभोग हुआ तो फिर पत्नी विवाह-विच्छ का मांग नहीं कर सकती है। मुसलमान विधि में विवाहोत्तर संभोग का विशेष महत्व सदैव सहा

1. सी० बनाम सी०22 टाइम्स लॉ रिपोर्ट 26; बेम्बटन बनाम बेम्बटनः (1059) 2 आल इंग्लैंड ला रिपाट्स

अत: 1939 के अधिनियम में भी उसे स्थान दिया गया। विवाह-विच्छेद का यह आधार भारतीय समाज की एक कुरीति का परोक्ष निवारण है। भारतीय समाज में बाल-विवाह इतना घर कर गया है कि उसे तुरन्त समाप्त करना असम्भव है। बहधा ऐसा होता है कि 11-13 वर्ष (कभी उससे भी कम) की आयु की कन्याओं का विवाह माता-पिता कर देते हैं और 12-15 की आयु के बीच में अधिकतर विवाहोत्तर संभोग भी हो जाता है। संभोग का होना न होना उस बालिका पर निर्भर नहीं है। हो सकता है कि 18 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वह इस विवाह-बन्धन में बंधी नहीं रहना चाहती है, तो यह धारा अधिकार देती है कि वह विवाह का निराकरण कर दे। इस उपबन्ध का यही औचित्य है।

इस धारा के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद के लिये निम्न दो शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है-

(क) पत्नी का विवाह 15 वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व हुआ था, और

(ख) 15 वर्ष की आय प्राप्त करने के पश्चात और 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व उसने विवाह का निराकरण कर दिया है। इस आधार पर याचिका 18 वर्ष होने के पश्चात् भी प्रेषित की जा सकती है।

असमाधेय विवाह-भंग का आधार (Breakdown Grounds) (LLB Sample Papers)

प्रारम्भ में हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद दोषित सिद्धान्त पर आधारित था। सन् 1964 के हिन्दू विवाह (संशोधन) अधिनियम द्वारा असमाधेय-भंग विवाह सिद्धान्त को मान्यता दी गई। यह किया गया धारा 13 (1) के अन्तर्गत दिये गये अन्तिम दो आधारों पर संरचित करके, उनके स्थान पर उपधारा (1) (i-क) गठित की गई, और विवाह-भंग सिद्धान्त पर आधारित विवाह-विच्छेद के दो आधार बनाये गये। एक वर्ष की अवधि डिक्री की तारीख से आरम्भ होती है। इस उपबन्ध के अन्तर्गत पति या पत्नी (कोई भी), विवाह चाहे हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रतिपादन के पूर्व हुआ हो या बाद में, निम्न किसी भी आधार पर न्यायालय की डिक्री द्वारा विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित कर सकता है-

(क) यह कि पक्षकारों के बीच हुई कार्यवाही में न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित होने के पश्चात् एक वर्ष या उसे अधिक की कालावधि पूर्ण होने पर भी दाम्पत्य जीवन का पुनः प्रारम्भ नहीं हुआ

(ख) यह कि पक्षकारों के बीच हुई कार्यवाही में दाम्पत्य जीवन के प्रत्यास्थापन की डिक्री पारित होने के पश्चात् एक वर्ष या उससे अधिक की कालावधि पूर्ण होने पर भी दाम्पत्य जीवन की प्रत्यास्थापना नहीं हुई है-

असाध्य विवाह भंग के यही दो आधार हैं। चूँकि पति ने दूसरा विवाह संपन्न कर लिया है यह असाध्य विवाह भंग का कोई आधार नहीं है।

सन् 1964 के विधेयक में कालावधि दो वर्ष थी। सन् 1976 विधेयक द्वारा घटाकर एक वर्ष कर दी गई है। एक वर्ष की कालावधि विचारण न्यायालय द्वारा पारित की गई डिक्री की तारीख में आरम्भ होती है, चाहे उस डिक्री की अपील कभी भी खारिज हो। विवाह-विच्छेद का अधिकार दोनों पक्षकारों को है। असमाधेय भंग विवाह सिद्धान्त के अन्तर्गत दोषी या निर्दाष पक्षकार जैसे कोई आग्रह नहीं है। दोष किसी का भी हो, या किसी का भी न हो, यदि विवाह असमाधेय रूप से भंग हो गया है, टूट गया है, तो उसका विघटन व्यक्ति और समाज के हित में है। परन्तु धारा 13 (1) (i-क) की संरचना करते समय, ऐसा प्रतीत होता है कि संसद की धारा 13 (1) (क) की ओर ध्यान नहीं गया जिसके अन्तर्गत यह उपबन्ध है कि यदि याचिकाकार का

1. बथूला बनाम बथूला, 1981 आन्ध्र प्रदेश 74; 1977 सु० को० 228; जीवीबेन बनाम दहियालाल, 1984 गुजरात 63.

2. लीलावती बनाम रामसेवक, 1979 इलाहाबाद 285; सावित्री बनाम सीताराम, 1986 मध्य प्रदेश 218.

3. बुट्टी बनाम गुलाब चन्द, 2002 म० प्र० 123.

4. मोती लाल बनाम पदमा, 1982 गुज० 254; स्मृति बनाम तपन, 1968 कल 284.

कोई ऐसा दोष है जिसके कारण प्रत्यर्थी ने वैवाहिक अपराध किया है फिर प्रत्यर्थी के अपराध के सिद्ध होने के बावजद विवाह-विच्छेद या अन्य किसी अनुतोष की डिक्री पारित नहीं की जायेगी, और वह उपबन्ध धारा 13(1)(क) पर लागू होता है। कुछ न्यायालयों ने यह मत व्यक्त किया है कि यदि याचिकाकार किसी तरह से दोषी है तो असमाधेय भंग विवाह के आधार के सिद्ध होने पर भी विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित नहीं की जायेगी। इस सम्बन्ध में 1977 में धर्मेन्द्र बनाम ऊषा में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि यदि याचिकाकार ने दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री को लागू करने में कोई अड़चन नहीं डाली है तो उसके पक्ष में डिक्री पारित कर देनी चाहिये आशा यह थी कि इस निर्णय के पश्चात् हमारे उच्च न्यायालय दोषिता सिद्धान्त के इस उपबन्ध को असमाधेय भंग विवाह पर लागू नहीं करेंगे, परन्तु अब भी हमारे कुछ उच्च न्यायालय यह मानते हैं कि धारा 23 (1) (क) का नियम असमाधेय भंग विवाह के सिद्धान्त पर भी लागू होगा। हम इन निर्णयों की समीक्षा करेंगे।

न्यायालयों के समक्ष कुछ वादों के तथ्य इस भाँति थे-पत्नी ने दाम्पत्य अधिकारों की अवहेलना की, या पति ने दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री प्राप्त कर ली परन्तु पत्नी को घर आने नहीं दिया, और इस स्थिति में दो वर्ष व्यतीत हो गये और पति ने विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित कर दी। न्यायालय ने धारा 23 (1) (क) का हवाला देते हये कहा कि यदि अर्जीदार ने दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री की अवहेलना की है तो उसे अपने ही दोष का लाभ नहीं उठाने दिया जायेगा। लेखक का निवेदन है कि इस व्याख्या के अन्तर्गत दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री का प्रत्यर्थी कभी भी विवाहविच्छेद की याचिका प्रेषित नहीं कर सकेगा। यह निर्दोष तभी कहलायेगा जब वह डिक्री का पालन करें, परन्तु यदि वह डिक्री का पालन कर लेता है तो विवाह-विच्छेद आधार ही समाप्त हो जाता है। यदि वह डिक्री का पालन नहीं करता है तो वह दोषी कहलायेगा। इस भाँति न्यायालयों द्वारा धारा 13 (1) (i-क) के उपबन्ध की दी गई व्याख्या संसद की इच्छा को विफल कर देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायालयों ने भी संसद की इच्छा को समझने का प्रयास किये बिना ही धारा 13 (1) (i-क) के यंत्रवत लागू किया। लॉ कमीशन ने और संसद ने भी सन् 1976 के संशोधनों को पास करते समय इस ओर ध्यान नहीं दिया है।

यह हर्ष का विषय है कि कुछ निर्णयों में न्यायालयों ने धारा 13 (1) (i-क) के उपबन्ध को कार्यान्वित करने का सफल प्रयत्न किया। मधुकर बनाम सरला2 में बम्बई उच्च न्यायालय ने कहा कि अर्जीदार को धारा 13 (1) (i-क) के उपबन्ध के अन्तर्गत डिक्री देने से तभी इन्कार किया जा सकता है कि जबकि वह न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित होने के उपरान्त किसी दोष का दोषी हो। न्यायिक पथक्करण की डिक्री के दोनों पक्षकारों में किसी के लिये यह आवश्यक नहीं है कि वह दाम्पत्य जीवन के पनः प्रारम्भ के लिये प्रयत्न करें। पति के पक्ष में विवाह-विच्छेद की डिक्री पास करने से न्यायालय इस आधार पर इन्कार नहीं करता है कि पति ने पत्नी के दाम्पत्य जीवन के पुनस्र्थापन के हर प्रयल को असफल बना दिया। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की एक पूर्णपीठ ने पंजाब के पूर्व-निर्णयों को अब निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि दाम्पत्य जीवन की प्रत्यास्थापन की डिक्री की अवहेलना मात्र या दाम्पत्य जीवन के प्रत्यास्थापन के प्रस्ताव की अवहेलना मात्र से धारा 23 (1) (क) के अन्तर्गत दोष नहीं बनता है। धर्मेन्द्र बनाम ऊषा में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि यदि अर्जीदार ने प्रतिपक्षी

1. चमन लाल बनाम मोहिन्दर देवी, 1968 पंजाब 287; रघुवीर बनाम सत्यपाल, 75 पंजाब लॉ रिपोर्ट्स 70; सियाल बनाम सियाल, 1968 पंजाब 489; शकुन्तला बनाम सरदारी, 1972 पंजाब एवं हरियाणा 20 ठाबाई लक्ष्मीबाई बनाम लक्ष्मी चन्द्र, 1968 बम्बई 332; सोमेश्वर बनाम लीलावती, 1968 मैसूर 2745 बनाम मनबाई, 1975 बम्बई 881.

2. 1973 बम्बई 55.

3. जेठाभाई बनाम मनबाई, 1975 बम्बई 881; रामेश्वरी बनाम कपाशंकर, 1975 राज० 20 सुधा नैना; 1978 गुज० 74.

4. वरलक्ष्मी बनाम हनुमन्थ, 1978 आन्ध्र प्रदेश, 6: गजना देवनी बनाम पुरुषोत्तम, 19

5. विमला बनाम भक्तेश्वर, 1977 पंजाब हरियाणा 167 (पूर्णपीठ); जस 1980 पंजाब और हरियाणा 220.

6. 1977 सुप्रीम कोर्ट 228.

के रास्ते में डिक्री पालन करने में कोई बाधा नहीं पहुंचाई है, तो फिर वह धारा 13 (1) (i-क) के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद की डिक्री पाने का अधिकारी है। न्यायिक पृथक्करण को डिक्री प्राप्त करने के पश्चात यह किसी भी पक्षकार के लिये आवश्यक नहीं है कि वह दाम्पत्य अधिकारों को पुनः स्थापित करने का प्रयत्न करें। एक वर्ष की अवधि समाप्त होने पर कोई भी पक्ष विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित कर सकता है।

रामकली बनाम रामगोपाल में दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय सामाजिक दृष्टि से एक अच्छा निर्णय है। न्यायालय के अनुसार धारा 13 (1) (-क) पर धारा 23 (1) (क) के उपबन्ध को लगाने का अर्थ होगा असमाधेय भंग विवाह के आधार को ही नकार देना। अत: दोनों उपबन्धों की व्याख्या ऐसी करनी होगी कि दोनों में तालमेल स्थापित हो जाये हाल में ऐसा ही मत कर्नाटक उच्च न्यायालय ने व्यक्त किया

परन्तु हाल में कुछ उच्च न्यायालयों ने धारा 23 (1) (क) के दोषिता उपबन्धों को लागू किया है। ओ० पी० मेहरा बनाम सरोज में पति ने पत्नी के विरुद्ध दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री मई 30, 1975 को प्राप्त की। उसके चार माह पश्चात् उसने पत्नी की जारता के आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित की। वह खारिज हो गई। जुलाई 26,1976 को उसने धारा 13 (1) (i-क) के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित की, क्योंकि अब दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री को एक वर्ष हो गया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि पति द्वारा पत्नी के विरुद्ध जारता के आधार पर विवाहविच्छेद की याचिका प्रेषित करने के पश्चात् पत्नी से यह अपेक्षा करना कि दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्रो के पालन हेतु वह पति के पास जाकर रह सकती है। हास्यास्पद ही नहीं बल्कि असंगत बात है। न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुये कहा कि यह ऐसा मामला है जिसमें पति के पक्ष में डिक्री पारित करने का अर्थ होगा कि पति को अपने ही दोष का लाभ पहुँचाना। इसी भाँति गीता लक्ष्मी बनाम सरलेश्वर में आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया है। पत्नी ने पति के विरुद्ध दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री प्राप्त की। उसके पश्चात् नाते-रिश्तेदारों की मध्यस्थता के कारण पत्नी पति के घर चली गयी। परन्तु पति ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया उसे और उसके अपत्यों को पृथक कमरे में रखा और खाने के लिये उसे चावल मात्र दिये और 15 दिन के भीतर ही उसे घर से बाहर निकाल दिया गया। एक वर्ष पश्चात् पति ने धारा 13 (1) (i-क) के अन्तर्ग विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित कर दी। न्यायालय ने कहा कि पति के पक्ष में विवाह विच्छेद की डिक्री देने का तात्पर्य होगा कि वह अपने कुकृत्य और कुआचरण का लाभ उठा गया।

इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती है कि इन वादों में पति का आचरण लांछनमय था। किन्तु यह भी स्पष्ट है कि उनका विवाह असमाधेय रूप से भंग हो गया था और उस भंग विवाह से निकलने का रास्ता पति ढूंढ रहा था। हमारी विधि में क्योंकि सीधा रास्ता उपलब्ध नहीं है अत: वह व्यूह को भेदने का प्रयत्न अपने दराचरण द्वारा कर रहा था। उसका समर्थन तो नहीं किया जा सकता है। परन्तु विधि की अपर्याप्तता। स्पष्ट है।

असमाधेय भंग विवाह के सीधे आधार को मान लेने का यही औचित्य है। यदि कोई भी पक्ष न्यायालय में सिद्ध कर दे कि उसका विवाह असमाधेय रूप से टूट चुका है तो उस विवाह को भंग कर देना ही श्रेयस्कर होगा। विवाह-विच्छेद का यह आधार भी हो सकता है कि पति-पत्नी द्वारा दो वर्ष (या तीन वर्ष, जो भी

1 वरलक्ष्मी बनाम हनुमन्थ, 1978 आन्ध्र प्रदेश

2. 1971 दिल्ली 6.

3. गजनादेवी बनाम पुरुषोत्तम, 1977 दिल्ली 1791

4 ललिथम्मा बनाम हारयाणा, 1983 कना० 63.

5.2054 दिल्ली 159.

6.1983 आन्ध्र प्र० 111.

7. मुर्रा हरी बनाम मनोहर,1984 आन्ध्र प्रदश 54 मभा यही मत व्यक्त किया गया।

अवधि संसद ठीक समझे) से पृथक रहने का तात्पर्य है कि उनका विवाह असमाधेय रूप से हट चुका है और किसी भी पक्ष की याचिका पर उसका विघटन किया जा सकता है।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया है कि दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की सहमति द्वारा प्राप्त डिक्री भी धारा 13 (1) (i-क) के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद का आधार हो सकती है।।

मेहता बनाम मेहता में पति ने दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री प्राप्त की। उसके पश्चात् उसने पत्नी की जारता के आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित कर दी। इस याचिका के एक वर्ष से अधिक विचाराधीन होने के कारण उसने विवाह-विच्छेद की दूसरी याचिका इस आधार पर दे दी कि दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री के पश्चात् भी पक्षकार अलग-अलग ही रह रहे हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पति की याचिका यह कह कर रद्द कर दी कि उसके द्वारा जारता के आधार पर विवाहविच्छेद की याचिका प्रेषित करने के पश्चात् पत्नी का उसके साथ जाकर रहने का प्रश्न ही नहीं उठता है। सच तो यह है कि याचिका द्वारा पति ने पत्नी को अपने साथ रहने से रोका है। दूसरी ओर सुनीता बनाम चन्दर में पत्नी ने न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्राप्त की और उसके पश्चात् भी पक्षकार एक वर्ष से भी अधिक की अवधि तक वे अलग-अलग रहते रहे। तत्पश्चात् पति ने इस आधार पर कि न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित होने के एक वर्ष से अधिक की अवधि तक वे पृथक-पृथक रहे हैं, विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित की जाये। पत्नी ने यह कहा कि पति ने साथ-साथ रहने का काई प्रयत्न नहीं किया है और न ही उसने भरण-पोषण की रकम चुकाई है, अत: उसके पक्ष में डिक्री पारित करने का अर्थ होगा कि वह अपने दोष का लाभ उठायेगा। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि दोनों बातें ऐसी नहीं हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि पति अपने दोष का लाभ उठा रहा है। पति के पक्ष में डिक्री पारित कर दी गई है।

परन्तु उच्चतम न्यायालय ने टी० श्रीनिवास बनाम टी० वीरालक्ष्मी में फिर यह कह दिया कि असमाधेय विवाह भंग पर धारा 23 (1) लागू होगी। उच्चतम न्यायालय बार-बार यही मत प्रकट कर रहा है कि धारा 23 (1) इस धारा पर लागू होगी।

श्रीदेवी बनाम ब० वरधाराजन में न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के एक वर्ष पश्चात् पति ने विवाहविच्छेद की याचिका डाली। पत्नी के अनुसार दाम्पत्य जीवन इसलिये नहीं पुनः प्रारम्भ हो सका क्योंकि पति किसी अन्य स्त्री के साथ रह रहा था। यह तथ्य इसलिये नहीं माना गया क्योंकि इस तथ्य का विवाद्यक (issue) ही नहीं बनाया गया था। पति को धारा 13 (1) (i-क) के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद की डिक्री मिल गई।

एक वर्ष की अवधि-एक वर्ष की अवधि प्रथम न्यायालय द्वारा डिक्री पारित होने की तिथि से मानी जायेगी। अपील के न्यायालय की डिक्री की तिथि से नहीं। असमाधेय विवाह-भंग मात्र विच्छेद का आधार नहीं है।

स्नेह प्रभा बनाम रवीन्द्र उच्चतम न्यायालय ने मत व्यक्त किया है कि यदि विवाह पूर्णतया टूट गया है तो विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित करना न्यायसंगत होगा। इस वाद में दाम्पत्य अधिकारों की

1. जोगिन्द्र बनाम पुष्पा, 1969 पं० और ह० 397 (पूर्णपीठ); सुदर्शन बनाम सरोज, 1983 पं० और ह० 59.

2. 1986 दिल्ली 327.

3. 1988 कल० 192.

4. 1999 सु० को० 536.

5. हीराचन्द श्रीनिवास मना गोऊन्कर बनाम सुनन्दा, 2001 सु० को० 1285; चेतनदास बनाम कमला 2001 सु० को0 1709.

6. 2001 मद्रास 1.

7. बलभद्र बनाम सुन्दरमणी, 1995 उड़ीसा 180.

8. राजेन्द्र बनाम अनिल, 1993 दिल्ली 135.

9. 1995 सु० को 2170.

डिक्री के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की गई थी। उच्चतम न्यायालय ने पक्षकारों के बीच समझौता करने का प्रयास किया पर सफलता नहीं मिली। न्यायालय ने निर्णय दिया कि जब विवाह पूर्णतया टूट ही गया है तो उसे जीवित रखे रहने का कोई औचित्य नहीं है उसका विच्छेद कर देना ही न्यायसंगत होगा।

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 में विवाह-विच्छेद के लिये अनेक आधार दिये गये हैं, उदाहरण के लिये क्रूरता, व्यभिचार, सम्परित्याग आदि, लेकिन विवाह के अप्रतिष्ठाप्य रूप से भंग का ऐसा कोई आधार विवाह-विच्छेद प्रदान करने के लिये उल्लिखित नहीं है। धारा 13 के वाचन मात्र से, यह बिल्कुल ही स्पष्ट हो जाता है कि विवाह के अप्रतिष्ठाप्य भंग का ऐसा कोई भी आधार विधान मण्डल द्वारा विवाह-विच्छेद की डिक्री के प्रदान किये जाने हेतु उपबन्धित नहीं है। न्यायालय अधिनियम की धारा 13 में ऐसे किसी आधार को नहीं जोड़ सकता है जो कि अधिनियम को संशोधित करेगा, जो कि विधान मण्डल का कार्य है। पति द्वारा लिया गया एकमात्र आधार व्यभिचार है, जिसे सिद्ध नहीं किया गया है और व्यभिचार के विवाद्यक को पति के विरुद्ध सिद्ध किया गया है। पति द्वारा ऐसे किसी भी अन्य आधार को नहीं लिया गया है जो धारा 13 के अधीन उसे उपलब्ध है। इस प्रकार विवाह के अप्रतिष्ठाप्य रूप से भंग के आरोप के आधार पर विवाहविच्छेद की डिक्री प्रदान नहीं की जा सकती।

पारस्परिक सम्मति द्वारा विवाह-विच्छेद (LLB Notes in English)

विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 ने पारस्परिक सम्मति द्वारा विवाह-विच्छेद का उपबन्ध एक नई धारा 13-ख जोड़कर बनाया है। इस धारा के अन्तर्गत पारस्परिक सम्मति द्वारा विवाह-विच्छेद की याचिका निम्न आधारों पर दोनों पक्षकारों द्वारा सम्मिलित रूप से प्रेषित की जा सकती है

(क) पति पत्नी एक वर्ष या उससे अधिक की अवधि से अलग-अलग रह रहे हैं,

(ख) वे साथ-साथ रहने में असमर्थ रहे हैं, और

(ग) उन्होंने पारस्परिक सम्मति द्वारा विवाह-विच्छेद कराना स्वीकार किया है। इन आधारों के सिद्ध होने पर न्यायालय का यह कर्तव्य है कि विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित कर दे।३

पृथक-पृथक रह रहे हैं-पृथक-पृथक रहने से तात्पर्य है कि पक्षकार पति-पत्नी की तरह नहीं रह रहे हैं। इसका सम्बन्ध रहने के स्थान से नहीं है। वे चाहे अलग स्थानों पर रह रहे हों या एक ही स्थान पर। परन्तु यदि वे पति-पत्नी की तरह नहीं रह रहे हैं तो वे पृथक-पृथक रह रहे माने जायेंगे।

साथ-साथ रहने में असमर्थता-समिष्ठा बनाम ओमप्रकाश में उच्चतम न्यायालय ने मत व्यक्त किया है कि साथ साथ रहने में असमर्थता से तात्पर्य है कि विवाह पूर्ण रूप से टूट चुका है, उसके जुड़ने की कोई सम्भावना नहीं है।

धारा 13-ख (2) के अन्तर्गत यह उपबन्ध है कि याचिका प्रेषित करने के पश्चात् याचिकाकारों को कम-से-कम छ: माह की प्रतीक्षा करनी होगी। तत्पश्चात् वे यह प्रस्ताव न्यायालय के समक्ष पेश करेंगे कि उनके विवाह के विघटन की डिक्री पारित कर दी जाये। परन्तु ऐसे प्रस्ताव को 18 महीने के पश्चात् प्रेषित नहीं किया जा सकता है। अठारह माह निकल जाने पर उन्हें फिर दूसरी याचिका प्रेषित करनी होगी।

विवाह-विच्छेद का प्रस्ताव-पक्षकारों द्वारा प्रस्ताव प्रेषित करने पर, न्यायालय पक्षकारों को सुनकर और आवश्यक जाँच करके (यह न्यायालय के विवेक पर है), यह समाधान होने पर कि पक्षकारों के बीच

1.श्रीमती. अलका बनाम राजन्द्र कुमार एवं एक अन्य, 2012 (2) ए० डब्ल्यू० सी० 1540 (इला०).

2. जयश्री बनाम रमेश, 1984 बम्बई 302,

3. कृष्णमूर्ति बनाम आभालक्ष्मी, 1983 कर्नाटक 235; जयश्री बनाम रमेश, 284 बम्बई 302; नछत्तर सिंह बनाम हरचरण, 1986 ५० और ह० 201; ओमप्रकाश बनाम नीलमनी, 1986 आन्ध्र प्रदेश 163; लीला बनाम महादेव, 1991 बम्बई 105.

4. सोमेज बनाम ओमप्रकाश, 1992 सु० को० 1904; कीर्तीभाई बनाम प्रफुल्ल बेन, 1993 गुज० 111.

5.1992 स० को० 1904; इन रि के० एस० सुब्रामनियम एवं अन्य, 2002 मद्रास 228

विवाह हुआ है और याचिका में दिये गये प्राक्कथन सही हैं, विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित कर देगा। दोनों पक्ष द्वारा संयुक्त प्रस्ताव देना अनिवार्य है।।

पारस्परिक सम्मति द्वारा विवाह-विच्छेद की याचिका में अन्य किसी आधार का देना आवश्यक नहीं है और न ही देना चाहिये।

पारस्परिक सम्मति द्वारा विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करने के पूर्व न्यायालय का यह समाधान होना भी आवश्यक है कि दोनों में से किसी भी पक्षकार की सम्मति कपट, छल या असम्यक असर (undue influence) द्वारा नहीं ली गई है।

धारा 23 की अन्य उपधारायें भी यथायोग्य लागू होंगी। इस अनुबन्ध के अन्तर्गत कुछ प्रश्न न्यायालयों के समक्ष उठे हैं, जिनका समाधान न्यायालयों ने किया है |

क्या सम्मति देने के पश्चात् वापिस की जा सकती है? (LLB Notes in Hindi)

इस प्रश्न के उत्तर में न्यायालयों के बीच मतभेद है। जयश्री बनाम रमेश में पति ने अपनी सम्मति वापिस लेते हुये कि वह दुर्बल मस्तिष्क का व्यक्ति है, और याचिका प्रेषित करते समय वह समझ नहीं पाया कि वह क्या कह रहा था। उसने यह तर्क पेश किया कि वह विवाह-विच्छेद नहीं चाहता है। न्यायमूर्ति गाडगिल ने कहा कि यदि एक बार सम्मति देने के पश्चात उसे वापिस लेने दिया जायेगा तो फिर पारस्परिक सम्मति द्वारा विवाह-विच्छेद के उपबन्ध की सार्थकता ही नहीं रहेगी। अगर सम्मति स्वेच्छा से दी गई है तो वह वापिस नहीं ली जा सकती है। यही मत पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने व्यक्त किया है। परन्तु सन्तोष बनाम वीरेन्द्र राजस्थान उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि दोनों पक्ष या उसमें से एक अठारह महीने पूर्ण होने से पहले अपनी सम्मति वापिस ले सकता है। यह भी कहा कि दोनों पक्षों में से कोई भी दूसरे की अनुमति के बिना भी अपनी सम्मति वापिस ले सकता है। यही मत केरल और कर्नाटक उच्च न्यायालय ने व्यक्त किया है और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपना मत बदल दिया है इन न्यायालयों का मत है कि सम्मति देने वाला उसे वापिस ले सकता है। सुरेष्ठा बनाम ओम प्रकाश10 में उच्चतम न्यायालय ने इस मत की पुष्टि कर दी है। लेखक की राय में हमारे समाज की परिस्थितियों में यह मत उचित नहीं है। हमारे यहाँ पारिवारिक और व्यक्तिगत दबाव का बड़ा प्रचलन है। यह होना सम्भव है कि एक पक्ष द्वारा स्वीकृति देने के पश्चात् उस पर दबाव डाल कर सम्मति को वापिस लेने के लिये बाध्य किया जाये। हाँ यदि दोनों पक्ष सम्मति वापिस लेना चाहें तो वे वैसा कर सकते हैं। अशोक हरी बनाम रूपा!1 में पत्नी ने सम्मति 18 महीने के पश्चात् वापिस ले ली। इस केस से विवाह विच्छेद की डिक्री देते हुये सुप्रीम कोर्ट ने सुरेष्ठा देवी पर पुनः विचार करने को कहा।

क्या विवाह-विच्छेद की डिक्री छः माह पूर्व या 18 माह के पश्चात् भी पास की जा सकती है? (LLB Notes)

हमारे न्यायालयों ने न ही कम से कम छ: माह की अवधि और न ही 18 माह की अधिकतम अवधि को अनिवार्य उपबन्ध माना है। सन्तोष बनाम वीरेन्द्र12 में पति ने पत्नी की क्रूरता और अभित्यजन के आधार

1. गिरिजा बनाम विजय नन्दन, 1995 केरल 159.

2. रवि बनाम शारदा, 1978 मध्य प्रदेश 44.

3. धारा 23 (1) (ख-ख); देखें; कृष्णामूर्ति बनाम आभा, 1983 कर्नाटक 235.

4. 1984 मुम्बई 30.

5. नछत्तर सिंह बनाम हरचरण कौर, 1986 पं० और ह० 201.

6. 1986 राजस्थान 62.

7. मोहमन बनाम जीजा, 1988 केरल 28.

8. रामप्रसाद बनाम वनमाला, 1988 कर्नाटक 162.

9. हरचरण बनाम नछत्तर, 1988 पं० और ह. 27: प्रकाश कौर बनाम विक्रमजीत सिंह, 1989 प० आर 46 बम्बई उच्च न्यायालय ने भी अपना मत बदल दिया है।

10. 1992 सु० को० 1904.

11. जे० टी० 1997 (3) सु० को० 483.

12. 1986 राजस्थान 128.

पर विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित की। पत्नी भी विवाह-विच्छेद चाहती थी। न्यायालय ने पति की याचिका को पारस्परिक पेश करने की औपचारिकता को अनावश्यक मान कर यह कहा कि छ; या अठारह मास की अवधि उस समय से मान ली जाये जब से पति ने याचिका पेश की थी। न्यायालय ने यह भी कहा कि यद्यपि 18 महीने की अवधि अधिकतम अवधि है, न्यायालय चाहे तो उस समय के व्यतीत होने के उपरान्त भी विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकता है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने भी यही मत व्यक्त किया है। परन्तु भगवान बनाम अनीता और कंचन बनाम कुलमन में कहा है कि औपचारिकताओं का पूर्ण होना आवश्यक है। परन्तु रितुशोषा बनाम धर्मपाल में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपने पूर्व मत को दोहराया और कहा कि पक्षकार काफी लम्बे समय से मुकदमेबाजी में लगे हैं अब उन्हें छ: महीने की और यातना भोगने देना औचित्यपूर्ण नहीं है। ये अच्छे निर्णय हैं।

पंछी न्यायाधीश ने कहा कि दुस्संधि और सम्मति में पृथ्वी आकाश का अन्तर है। सम्मति दो व्यक्ति के बीच एक ही बात में सहमत होना है, जब कि दुस्संधि दो व्यक्तियों के बीच धोखा देने की गुप्त कुसन्धि है। इस लेखक के मत में पारस्परिक सम्मति द्वारा विवाह-विच्छेद में दुःसन्धि का कोई स्थान नहीं है, जब तक कि हम यह न मानकर चलें कि विवाह-विच्छेद पाप है या अपराध है।

श्रीराम बनाम मनसू में गुजरात उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया कि धारा 13-ख (2) का उपबन्ध अनिवार्य (Mandatory) उपबन्ध नहीं है न्यायालय को यह विवेक है कि वह चाहे तो छ: महीने पूर्व या अठारह माह पश्चात् भी डिक्री पारित कर दे। जबकि पक्षकारों के बीच विवाह-विच्छेद का मुकदमा कई वर्षों से चल रहा है और उनके बीच मेल-मिलाप की कोई आशा नहीं बची है, विवाह पूर्णरूप से टूट चुका है तो फिर उस विवाह को शीघ्रता से समाप्त कर देना ही औचित्यपूर्ण और न्यायसंगत है। परन्तु यह न्यायालय के विवेक का प्रश्न है। प्रत्येक वाद के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुरूप ही न्यायालय निर्णय देगा जब पति-पत्नी के बीच एक लम्बा चला आ रहा मुकदमा था तथा उन्हें समझ आ गया था कि उनके बीच में स्वाभाव का बेमेल (incompatability of temperament) है तथा वह सम्मति से विवाह-विच्छेद के इच्छुक है यह इन्तजार के समय का उपबन्ध छोड़ा जा सकता है। याचिका दायर होते ही विवाह-विच्छेद नहीं किया जा सकता। अधिनियम में दी गई प्रक्रिया (Procedure) का पालन करना अनिवार्य है।8 याचिका दायर करने का मंच या न्यायाधीश सही होना आवश्यक है। यह मूल अधिकारिता वाले न्यायालय में ही प्रस्तुत की जा सकती है। उच्च न्यायालय उसे पुनरीक्षण न्यायालय की क्षमता में नहीं सुन सकता। याचिका मूल अधिकारिता (original jurisdiction) वाले न्यायालय में ही डलेगी। केवल रजामन्दी या सम्मति ही विवाह विच्छेद का आधार नहीं है जब तक कि कानून द्वारा विनिर्दिष्ट रूप में मान्यता प्राप्त न हो।10

पारस्परिक सहमति द्वारा विवाह का विघटन-हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13-ख में ऐसा प्रावधान है जिसके अधीन विवाहित दम्पत्ति पारस्परिक सहमति पर विवाह-विच्छेद की डिक्री की मांग कर

1. जगमोहन बनाम सुरेश, 1979 हिन्दू लॉ रि० 303; सुरेन्द्र बनाम मोहिन्द्र, 1982 मै० लॉ रि० 187; रूपा बनाम प्रभाकर, 1994 मध्य प्रदेश 208.

2. 1984 मैरिज लॉ रि० 1.

3. 1992 उड़ीसा 165.

4. रिपोर्ट नहीं हुआ, देखें कृष्ण बनाम सतीशलाल, 1987 पं० और ह0 194; और भी देखें; रनबीर सिंह बनाम नरगिस, 1982 मै लॉ रि० 605; कृष्ण बनाम सतीश, 1987 पं० और ह० 191; इन्द्र बनाम राधे, 1981 इला० 151,

5. 1988 गूज 159.

6. और देखें, धारीपति बनाम बीना, 1990 दिल्ली 146.

7. डॉ० सभराजयोती दास बनाम उत्तमा दास, 2002 गौहाटी 117.

8. सत्यभामा बनाम नरेन्द्र, 1997 उड़ीसा 47.

9. एन० विजया राघवन बनाम के० शारदा, 2001 कर्नाटक 300.

10. यमनजी जाधव बनाम निर्मला, 2002 सु० को० 971.

 

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