Select Page

How to download LLB 2nd Semester Law Chapter 1 Notes

 

How to download LLB 2nd Semester Law Chapter 1 Notes:- LLB 2nd Semester Family Law – 1 (Modern Hindi Law) Most Important Notes in PDF (Download) Online Free Website LLB Notes and Study Material in Hindi English for all Indian University PDF Download.

 

अध्याय 1 (Chapter 1 LLB Notes)

हिन्दू कौन है? (Who is Hindu)

आज भारत वैयक्तिक (Personal) विधि की विविधता का देश है। हर धार्मिक सम्प्रदाय अपनी पृथक वैयक्तिक विधि द्वारा शासित होता है। हिन्दुओं पर हिन्दू विधि, मुसलमानों पर मुसलमान विधि, ईसाइयों पर ईसाई विधि और पारसियों पर पारसी विधि, यहूदियों पर यहदी विधि लागू होती है। लगभग प्रत्येक सम्प्रदाय को वैयक्तिक विधि में कुछ-न-कुछ धार्मिक अंश विद्यमान हैं। हिन्दू और मसलमान अपनी विधियों को दैवी (Divine) मानते हैं । सम्भवत: यही भारतीयों की वैयक्तिक विधि के एकीकरण में प्रमुख बाधा है।

एक युग था, मुसलमानों के आगमन से पूर्व, जब ‘हिन्दू’ शब्द का प्रयोग एकमत के अनुयायियों के लिये नहीं होता था, अपितु ‘हिन्दू’ शब्द का प्रयोग प्रादेशिकता (Territorial) के रूप में होता था। भारत के रहने वाले सब व्यक्ति ‘हिन्दू’ कहलाते थे। उस समय ‘हिन्दू’ शब्द राष्ट्रीयता का भी द्योतक था। ऐसा प्रतीत होता है कि ‘हिन्दू’ शब्द का प्रचलन ग्रीकों के आगमन के साथ हुआ। ग्रीक लोग सिन्ध (इण्टम) नदी की घाटी में रहने वाले व्यक्तियों को ‘इन्डोई’ कहते थे। धीरे-धीरे इस शब्द का प्रयोग सिन्ध नदी की घाटी परे रहने वाले व्यक्तियों के लिये भी होने लगा। सिन्ध नदी की वादी में रहने वाले व्यक्तियों को मुसलमान ने भी हिन्दू का नाम दिया। मुसलमान राज्य स्थापित होते-होते हिन्दू शब्द न ही राष्ट्रीयता का द्योतक रहा और न ही प्रादेशिकता का। उसका प्रयोग एकमत के अनुयायियों के लिये होने लगा। वे सब जो हिन्दू धर्म को मानते हैं हिन्दू कहलाने लगे। अंग्रेजी राज्य के स्थापित होने पर भी ‘हिन्दू’ शब्द का प्रयोग इसी रूप में होता रहा।

परन्तु हिन्दू शब्द की व्याख्या के विकास में एक विचित्र बात यह हुयी कि यद्यपि हिन्दू शब्द का प्रयोग हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिये होता रहा, परन्तु यह आवश्यक नहीं रहा कि हिन्द वही कहलायेगा जो हिन्दू धर्म का पालन करता है। अत: सन् 1955 में, हिन्दू विधि के कुछ अंशों के संहिताबद्ध (Codification) होने के पूर्व, स्थिति ने यह मोड़ लिया कि हिन्दू धर्म का पालन करने वाला हिन्दू कहलाता रहा, परन्तु यह आवश्यक नहीं रहा कि जो व्यक्ति हिन्दू धर्म का पालन नहीं करता है, वह हिन्दु न हो। कुछ व्यक्ति ऐसे रहे हैं जो हिन्दू धर्म की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं, परन्तु फिर भी हिन्दू विधि उन पर लागू होती थी और इसलिये वे हिन्दू कहलाते थे। सन् 1955 के पूर्व हम उस अवस्था पर पहुंच गये हैं जहां सकारात्मक रूप से हिन्द शब्द की परिभाषा देना कठिन था। नकारात्मक रूप से हम कह सकते थे कि वे व्यक्ति जो मसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं, हिन्दू हैं। धार्मिक मापदण्ड के अनुसार हिन्दू की परिभाषा हिन्दू धार्मिक और पूर्त (पुण्यार्थ) न्यासों के सम्बन्ध में ही महत्वपूर्ण रह गयी है।

आज स्थिति यह है कि ‘हिन्दू’ की परिभाषा देना कठिन है। सत्य तो यह है कि न कोई इसकी सुतथ्य परिभाषा है और न ही देना सम्भव है। संहिताबद्ध हिन्दू विधि के किसी भी विधेयक में ‘हिन्दू’ शब्द की परिभाषा देने का प्रयत्न नहीं किया गया है। परन्तु विधि व्यवहारिक विषय है, अत: परिभाषा की कुछ भी कठिनाई क्यों न हो, यह जानना आवश्यक है कि हिन्दू विधि किन व्यक्तियों पर लागू होती है। यह कहना सहज है कि हिन्दू विधि सभी हिन्दुओं पर लागू होती है, लेकिन प्रश्न फिर भी यही रहता है कि हिन्दू किसे कहते हैं। इसका उत्तर हम (हिन्दू) की परिभाषा द्वारा नहीं बल्कि जिन व्यक्तियों पर हिन्दू विधि लागू होती।

1. देखें, राधाकृष्णन-हिन्दु व्यू ऑफ लाइफ, गजेन्द्रगडकर न्यायाधीश, शास्त्री यज्ञपुष्प दासजी बनाम मूलदास, 1966 सु० को० 1119.

है उनक प्रवीकरण द्वारा जान सकते हैं। यह कार्य सम्भवतः इतना कठिन नहीं है। लगभग यही संहिताबद्ध हिन्दू विधि के विधेयकों में अपनायी गयी है।

हिन्दू विधि जिन व्यक्तियों पर लागू होती है, उन्हें हम तीन मुख्य प्रवर्गों में बांट सकते हैं

(1) वे व्यक्ति जो धर्मतः हिन्दू, जैन, बौद्ध या सिक्ख हैं;

(2) वे व्यक्ति जो हिन्दू, जैन, बौद्ध या सिक्ख माता-पिता (या दोनों में से एक) की सन्तान हैं; और।

(3) वे व्यक्ति जो मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं।

धर्मतः हिन्दू

प्रथम प्रवर्ग में आने वाले हिन्दुओं को हम निम्न दो उप-प्रवर्गों में बांट सकते हैं

(अ) जो जन्म से, धर्म द्वारा हिन्दू, जैन, बुद्ध या सिक्ख हैं; और

(ब) जो सिक्ख, बुद्ध या जैन संपरिवर्तन (Conversion) या प्रतिसंपरिवर्तन (Reconversion) द्वारा हैं।।

हिन्दू धर्म प्रव्यंजना (Profession) या आचरण द्वारा हिन्दू धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति धर्म से हिन्दू है।

 

हिन्दू धर्म (LLB Study Material in Hindi)

इतनी विविधता से पूर्ण है कि यथावत् रूप से उसकी व्याख्या करना या उसकी परिभाषा देना बहुत कठिन है। कुछ समय पूर्व उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश श्री गजेन्द्रगडकर ने हिन्दू धर्म की परिभाषा देने का साहसिक प्रयत्न किया था,2 यद्यपि यह प्रयत्न पूर्णतया धार्मिक पृष्ठभूमि में किया गया था। न्यायालय के समक्ष प्रश्न था कि क्या बम्बई हिन्दू मन्दिर प्रवेश विधेयक के अन्तर्गत सत्संगियों के मन्दिर में हरिजन (शूद्र) प्रवेश कर सकते हैं? महागुजरात दलित संघ के सभापति श्री मूलदास ने स्वामी नारायण मत के प्रवर्तकों, जिन्हें सत्संगी के नाम से पुकारा जाता है, के अहमदाबाद स्थित मन्दिर में प्रवेश करने की नोटिस मन्दिर के प्रबन्धकों को दिया। इस पर स्वामीनारायण मत के अनुयायियों ने महागुजरात दलित सभा के विरुद्ध व्यादेश का वाद प्रेषित किया। इस मुकदमें की रोचक बात यह है कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रवर्तकों ने अपने वाद में कहा कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय एक अहिन्दू सम्प्रदाय होने के नाते हिन्दू-मन्दिर प्रवेश अधिनियम उन पर लागू नहीं होता है। उच्च न्यायालय में अपील होने पर न्यायाधीश, गजेन्द्रगडकर ने हिन्दू धर्म और दर्शन के पंडितों (जैसे कि राधाकृष्णन, तिलक, मोनी विलियम और मैक्समूलर) द्वारा लिखित ग्रन्थों में से मुक्त उद्धरण लिये। उन्होंने तिलक के ‘गीता रहस्य’ में से निम्न उद्धरण लिया-

हिन्दू धर्म के उल्लेखनीय लक्षण हैं, वेदों को आदर के साथ ग्रहण करना, यह मानना कि मुक्ति के पथ अनेक और विधिक हैं, और यह समझना कि पूज्यनीय देवी-देवता अनेक हैं।

हिन्दू धर्म और दर्शन के मुख्य ग्रन्थों को हवाला देते हुये माननीय न्यायाधीश ने अपना विचार इस प्रकार व्यक्त किया-

‘हिन्दू धर्म-प्रवर्तकों और दार्शनिकों द्वारा व्यक्त किये गये विचारों, सिद्धान्तों मान्यताओं की विभिन्नता के परे कुछ विचार, सिद्धान्त और मान्यतायें ऐसी भी हैं जिन्हें सब हिन्दू स्वीकार करते हैं। इन सिद्धान्तों में सर्वप्रथम है, यह स्वीकार करना कि धार्मिक और दार्शनिक मामलों में वेद सर्वोपरि हैं, इस सिद्धान्त की स्वीकृति का अर्थ है यह मानना कि हिन्दू धर्म की सभी व्यवस्थायें और पद्धतियां और मूल सिद्धान्त विचार और ज्ञान के भंडार वेदों से ही लेती हैं। …..दूसरा मूल सिद्धान्त, जो हिन्दू दर्शन की छहों पद्धतियों में से एक

1. देखें, हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 और हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 2 और हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 3.

2. शास्त्री यज्ञपुरुष दासजी बनाम मूलदास, 1966 सु० को० 1119; और देखें; अशीम बनाम नरेन्द्र, (1978) 76 के० वी० नो० 1116.

है, यह कि ब्रह्माण्ड के महान चक्र में उत्पत्ति, पालन और विघटन के वृहत् काल पुनर्जन्म और पूर्वजन्म में। विश्वास करती है।’ माननीय न्यायाधीश ने यह जानने के लिये कि स्वामी नारायण मत हिन्दू-धर्मावलम्बियों की शाखा है या नहीं, स्वामीनारायण मत के मूल सिद्धान्तों का पर्यवेक्षण किया। उन्होंने कहा कि हिन्दु धर्म और दर्शन की उत्पत्ति और विकास के इतिहास पर दृष्टि डालने पर भी यह विदित होता है कि समय-समय पर जब भी किसी महात्मा या सुधारक ने हिन्दू धर्म में सुधार लाने या हिन्दू धर्म को युक्तिहीन, भ्रष्ट या दूषित आचरणों से मुक्त करने का प्रयास किया है, एक नये मत का जन्म हुआ है जिसने अपने पृथक् सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं, परन्तु ऐसा करने के लिये उन्होंने हिन्दू धर्म और दर्शन के मूल सिद्धान्तों का ही सहारा लिया है। यह कभी नहीं कहा गया कि उस मत के प्रवर्तक और अनुयायी हिन्दू नहीं हैं जो मन्दिर उन्होंने स्थापित किये हैं वे हिन्दू मन्दिर नहीं हैं। इस लेखक की राय में हिन्दू की व्याख्या करने का यह सराहनीय प्रयास है, सम्भवतः धार्मिक दृष्टिकोण से हिन्दू शब्द की इससे अच्छी परिभाषा नहीं की जा सकती है। उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या स्वामीनारायण मत के अनुयायी हिन्दू हैं। अत: उसका कार्य अपेक्षाकृत सरल था। यदि तर्क यह दिया गया होता कि हरिजन (जिसमें चमार, भंगी और अन्य सब शूद्र आते हैं) हिन्दू नहीं हैं तो उच्चतम न्यायालय का कार्यभार इतना आसान नहीं होता। किसी धार्मिक पंथ या सम्प्रदाय के बारे में यह कहना कठिन नहीं है कि वह हिन्दू पंथ या सम्प्रदाय है या नहीं। परन्तु यह कह पाना इतना आसान नहीं है कि चमार (या हरिजन) हिन्दू हैं, क्योंकि वे न ही हिन्दू धर्म के ज्ञाता हैं और न ही हिन्दू दर्शन में पारंगत हैं (उस भांति जिस भांति के माननीय न्यायाधीश हैं) उसके बारे में यह ही कह सकते हैं कि शूद्र इसलिये हिन्दू हैं क्योंकि हिन्दुओं के चार वर्गों में से वे एक हैं। अत: इस लेखक की राय में धर्म के आधार पर हिन्दू शब्द की कोई भी परिभाषा अपूर्ण ही रहेगी यह ठीक है कि जो भी व्यक्ति हिन्दुत्व की कसौटी पर खरा उतरता है, वह हिन्दू है, परन्तु हम यह नहीं कह सकते हैं कि जो व्यक्ति हिन्दुत्व की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है, वह हिन्दू नहीं है। यही समस्या की कठोर कड़ी है। हम कह सकते हैं कि कोई व्यक्ति जो हिन्दू धर्म का पालन करता है, प्रव्यंजना करता है या हिन्दू धर्म पर आचरण करता है, हिन्दू धर्म में आस्था रखता है, हिन्दू है। परन्तु केवल इस कारण से हम किसी व्यक्ति को हिन्दू कहने से इन्कार नहीं कर सकते हैं कि वह न हिन्दू धर्म का पालन करता है, न उसकी प्रव्यंजना करता है, न ही उसका आचरण करता है और न ही उसमें आस्था रखता है। तथ्य की बात तो यह है कि जब तक वह व्यक्ति किसी अन्य धर्म का अनुयायी नहीं है या हो जाता है (धर्म-परिवर्तन द्वारा) वह हिन्दू ही है और रहेगा। उदाहरण के लिये, मान लीजिये कि कोई किसी अन्य धर्म (जो हिन्दू धर्म की शाखा, पंथ या सम्प्रदाय नहीं है, जैसे ईसाई मत) का पालन करने लगता है, उसकी प्रव्यंजना करने लगता है या उस पर आस्था रखने लगता है, तो वह हिन्दू, हिन्दू ही रहेगा जब तक कि वह धर्म परिवर्तन न कर ले। इसी भाँति यदि कोई हिन्दू नास्तिक हो जाये तो भी वह हिन्दू ही रहेगा। यही बात प्रीवी कौन्सिल ने 1909 में रानी भगवान कौर बनाम जे० सी० बोस2 में कही थी। उसने कहा था कि हिन्दू धर्म के मूल सिद्धान्तों से विमुख होने या विसम्मत होने या कट्टर हिन्दू धर्म के आचरण को छोड़ देने से, जैसे कि पश्चिमी ढंग से रहने में, या हिन्दू धर्म की निन्दा करने, या गाय का मांस खाने मात्र से कोई व्यक्ति अहिन्दू नहीं हो जाता है। संक्षेप में जब तक हिन्दुत्व का अंकुर उसमें रहेगा, वह हिन्दू ही रहेगा। यह अंकुर उसके द्वारा दूसरा धर्म स्वीकार करने पर ही समाप्त होगा।

हिन्दू धर्म के सम्प्रदाय (LLB 2nd Semester Hindu Law PDF Download)

पिछले 5,000 वर्षों से अपने इतिहास में हिन्दू धर्म कई रास्तों और मोड़ों से निकलता हुआ अग्रसर हुआ है। कई बार मतभेद हुये हैं, वैमत्य हुआ है, एक दूसरे के विपरीत विचारों, धारणाओं और आचरणों का प्रादुर्भाव हुआ है। परन्तु हिन्दू धर्म की यह विलक्षणता रही है कि सब मतभेद, वैमत्य और विरोधी धारणाओं और मतों के होते हुये भी उसने अपने मूलभूत सिद्धान्तों की ऐक्यता को बनाये रखा है। हिन्दू के समक्ष मूल

1. तत्रैव.

2. (1903) 30 इण्डियन अपीलल्स 249, और देखें, चन्द्रशेखर बनाम कुलन्दबेल, 1963 सु० को० 185.

3. तत्रैव.

ध्येय और परम आदर्श रहा है, परब्रह्म की प्राप्ति (मोक्ष-प्राप्ति र आत्मा की मुक्ति) परब्रह्म की प्राप्ति के अनेक मार्ग हैं। परब्रह्म प्राप्ति हो सकती है इस विश्वास द्वारा कि ईश्वर एक है और इस विश्वास द्वारा भी कि ईश्वर अनेक हैं। यह एक ईश्वर की या अनेक ईश्वरों की उपासना द्वारा प्राप्त हो सकता है। यह भक्ति-मार्ग, कर्ममार्ग या ज्ञान-मार्ग द्वारा भी प्राप्त हो सकता है। इसकी प्राप्ति सगुण उपासना द्वारा भी हो सकती है और निर्गुण उपासना द्वारा भी। यह गीता के उपदेश पर चलने पर भी प्राप्त हो सकती है और यह उपनिषदों के दर्शन द्वारा भी। यह तपस्या द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है, और ब्रह्मचर्य द्वारा भी। सद्-गृहस्थी का जीवन व्यतीत करके भी इसे प्राप्त किया जा सकता है। किसी भी मार्ग का अनुसरण करने वाला, किसी भी पंथ या सम्प्रदाय का अनुयायी हिन्दू हैं।

हिन्दू धर्म के अनेकानेक रूप हैं, हिन्दू धर्म के इतने पंथ, उपपंथ, सम्प्रदाय, उप-सम्प्रदाय हैं, हिन्दू धर्म में इतनी विभिन्नता है, परब्रह्म की प्राप्ति के इतने अधिक मार्ग हैं कि हिन्दू धर्म के अनुयायियों का वर्गीकरण एक असम्भव प्रयास होगा। कुछ जाने-माने पंथ और सम्प्रदायों को दृष्टान्तरूप में ले सकते हैं। वीरशैव और लिंगायता दोनों ही शिव के उपासक हैं, दोनों वर्ण-भेद के विरोधी हैं और दोनों हो ब्राह्मण को उच्च मानने से इन्कार करते हैं। दोनों में अन्तर यह है कि लिंगायतों का विष्णु-विरोधी इतना तीव्र नहीं है जितना कि वीरशैवों का। इनके अतिरिक्त भी अनेक पंथ और सम्प्रदाय हैं, जैसे नम्बूदरी, तान्त्रिक, शक्ति के उपासक, वैरागी, सखी-सम्प्रदाय, इत्यादि। संक्षेप में हम यही कह सकते हैं कि यदि कोई व्यक्ति हिन्दू धर्म के किसी भी पंथ, सम्प्रदाय या हिन्दू धर्म की किसी शाखा का अनुयायी या अनुगामी है, तो हम उसे धर्मतः हिन्दू मानेंगे।

हिन्दू धर्म के आन्दोलन (LLB 2nd Semester Hindu Law)

हिन्दू धर्म की विलक्षणता यह है कि इसने सदैव धार्मिक स्वतन्त्रता की अगुवानी की है। इसके अनुयायी और अनुगामियों को यह छूट रही है कि वे नये-नये प्रयोग करें और नये सिद्धान्त, नई मान्यताओं पर पद्धतियों को विकसित करें। एक आन्दोलन के पश्चात् दूसरे आन्दोलन का जन्म हुआ है। नये-नये विचार, सिद्धान्त, मान्यतायें और पद्धतियां प्रतिपादित हुयी हैं, कभी कुछ पुराने आवरणों, मान्यताओं और पद्धतियों को छोड़ दिया गया है, कभी पुराने आचरणों, मान्यताओं और पद्धतियों को पुर्नजीवित किया गया है। कुछ आन्दोलनों के प्रवर्तकों ने हिन्दू-धर्म के पवित्रीकरण का दावा किया है, कुछ ने उसके शोधन का और कुछ ने इसे अधिक बहुमुखी बनाने का। इन आन्दोलनों में प्रमुख हैं, ब्रह्मसभाजी, आर्यसमाजी, सत्संगी, राधास्वामी। आर्यसमाज के अनुयायी ईश्वर की एकता में और वेदों में विश्वास करते हैं। वे मूर्तिपूजा के विरोधी हैं और वर्ण-भेदों को भी नहीं मानते हैं। सत्संगी मत के प्रवर्तकों का कहना है कि व्यक्ति को वेदों में वर्णित, पवित्र और धर्मनिष्ठ जीवन व्यतीत करना चाहिये, मुक्ति का मार्ग है, कृ ग-भक्ति दार्शनिक रूप से इसके संस्थापक स्वामीनारायण रामानुज के शिष्य थे। ब्रह्मसमाजी हिन्दू धर्म के सुधारक हैं जो हिन्दू धर्म को उसकी मौलिक निर्मलता प्रदान करने का दावा करते हैं।

अधिकांश रूप में ये आन्दोलन कट्टरपंथीपन और रूढ़िवादिता के विरुद्ध विद्रोह है। इन सभी आन्दोलनों के प्रवर्तक हिन्दू धर्म को तथाकथित या यथार्थतः पतन से उबारने का या हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान (Revival) का दावा करते हैं और यही कारण है कि इन आन्दोलनों के प्रवर्तक हिन्दू के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहला सकते हैं।

1. उदाहरणार्थ देखें, धारा 2 (1) (क) हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955; और देखें, गुरम्मा बनाम मलप्पा, 1964 सुप्रीम कोर्ट 510.

2. देखें, श्याम सुन्दर बनाम शंकर, 1960 मैसूर 27.

3. ब्रह्मसमाजियों की दो शाखायें हैं-अननुष्ठानवादी, जो ब्रह्मसमाज के सिद्धान्तों को कट्टरता से पालते हैं और जो मर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते हैं और न ही, जन्म,मरण, विवाह आदि के अवसरों पर सम्पन्न किये जाने वाले अनुष्ठानों में विश्वास नहीं रखते हैं। अनुष्ठानवादी प्राचीन हिन्दू अनुष्ठानों में आस्था रखते हैं। देखें, रानी भगवान कौर बनाम बोस, (1903) 31 कल० 11.

 

जैन धर्म, बौद्ध धर्म, और सिक्ख धर्म के अनुयायी (LLB Hindu Law PDF

हिन्दू विधि के संहिताबद्ध होने के पूर्व भी यही नियम था कि जैन धर्मा बौद्ध धर्म2, और सिक्ख धर्म के अनुयायियों पर रूढ़ि द्वारा उपान्तरित (Modified) हिन्दू विधि ही लागू होती थी। आधुनिक हिन्दू विधि में भी यही स्थिति है।

किसी समय यह मत व्यक्त किया गया था कि जैन हिन्दू धर्म से विमत होने वाले लोग हैं। परन्तु अब यह पूर्णतया स्थापित है कि जैन धर्म का इतिहास स्मृतियों से भी पूर्व का इतिहास है। जैन धर्म के अनुयायी वेदों में आस्था नहीं रखते हैं और हिन्दुओं के अनुष्ठान और रीति-रिवाजों को भी नहीं मानते हैं। उनके अनुसार तपस्या द्वारा संसार और सांसारिक जीवन के त्याग द्वारा आत्मा-परमात्मा हो सकती है और यही मोक्ष की प्राप्ति है।

सिक्ख धर्म के अनुयायी हिन्दू धर्म में विमत (Dissenter) होने वाला पंथ है। सिक्खों के प्रथम गुरू श्री नानक देव के कथनानुसार ईश्वर एक है। सिक्ख धर्म के सिद्धान्त ईश्वरवादी हैं। हिन्दू विधि के संहिताबद्ध होने के पूर्व सिक्ख अपनी रूढ़ियों द्वारा शासित होते थे। रूढ़ियों के अभाव में उन पर हिन्दू विधि लागू होती थी। अब सिक्ख संहिताबद्ध विधि से शासित होते हैं। कुछ ही विषय ऐसे रह गये हैं, जिन पर रूढ़ियां अब भी लागू होती हैं। वर्तमान हिन्दू विधि में वे हिन्दू द्वारा ही शासित होते हैं। 1

जैन धर्म की भांति ही बौद्ध धर्म एक पराकाष्ठावादी (Extreme) धर्म है, जो जीवन के नकारात्मक पहलू को अधिक महत्व देता है। सन् 1955 के पूर्व यह मान्य नियम था कि बौद्ध धर्म के अनुयायी भी हिन्दू विधि से शासित हैं यद्यपि उनके द्वारा यह सिद्ध करने पर कि हिन्दू विधि के विपरीत कोई रूढ़ि उनके यहां प्रचलित है तो वे उस रूढ़ि द्वारा शासित होते थे। अब संहिताबद्ध विधि उन पर लागू होती है।

वर्तमान हिन्दू विधि में स्थिति यह है कि संहिताबद्ध हिन्दू विधि, जैन, सिक्ख, और बौद्ध धर्मों के अनुयायियों पर समान रूप से लागू होती है। असंहिताबद्ध हिन्दू विधि उन पर उनके यहाँ प्रचलित रूढ़ि द्वारा उपान्तरित रूप में ही लागू होती है।

संपरिवर्तित और प्रतिसंपरिवर्तित हिन्दू (Hindu Law PDF)

संपरिवर्तित व्यक्ति वह है जो अपना धर्म त्याग कर दूसरा धर्म स्वीकार कर लेता है। हिन्दू धर्म के त्यागने मात्र से कोई व्यक्ति अन्य धर्मावलम्बी नहीं बन जायेगा; ऐसा व्यक्ति नास्तिक हो सकता है, परन्तु अहिन्दू नहीं। इस भांति किसी अन्य धर्म की प्रव्यंजना करने मात्र से या अन्य धर्म में आस्था रखने मात्र से कोई हिन्दू नहीं हो जाता है। एक विपरीत स्थिति का उदाहरण लें, एक ईसाई हिन्दू धर्म और दर्शन का इतना प्रशंसक हो जाता है कि वह हिन्दू धर्म को मानने लगता है, प्रव्यंजना करने लगता है और हिन्दू मन्दिरों में जाकर पूजापाठ करने लगता है, तो भी वह हिन्दू नहीं बन जायेगा। वह हिन्दू तब ही होगा जबकि धर्म संपरिवर्तन द्वारा वह हिन्दू हो जाये।

धर्म परिवर्तन द्वारा हिन्दू बनने का एक मार्ग है, धर्म परिवर्तन के अनुष्ठान (Ceremony) द्वारा हिन्दू धर्म ग्रहण करना। यह अनुष्ठान उस जाति, मत, सम्प्रदाय या पंथ का होगा जिसमें धर्म परिवर्तन करने वाला वह

1. छोटेलाल बनाम चुन्नीलाल (1879) 1 कलकत्ता 744; शकूरबाई बनाम श्योराज, (1920) 25 सी० डब्ल्यू० एन० 227; श्योसिंह बनाम दारवो, (1878) 1 इलाहाबाद 688; कमिश्नर ऑफ वैल्थ टैक्स बनाम चम्पा, (1972) 2 सु० को० जर्नल 186.

2. रानी भगवान कौर बनाम बोस, (1903) 31 कल० 11; रायबहादुर बनाम बिशन डे, (1882) 4 कलकत्ता 343.

3. बोबलादी बनाम बोबलादी, (1927) 50 मद्रास 228; देखें, न्यायाधीश कुमारस्वामी शास्त्री का निर्णय।

4. भगवान कौर बनाम बोस, (1903) 31 कल० 11; महन्त बसन्त दास बनाम हेम सिंह, (1926) 7 लाहार 275; (उदासी मतावलम्बी) शुगन चन्द बनाम प्रकाशचन्द, 1967 सुप्रीम कोर्ट 506.

5. राम प्रकाश बनाम दाहन, (1924) 3 पटना 142; बन्नी बनाम बन्नीची, (1928) 51 मद्रास 1 (पूर्णपीठ).

6. कुसुल बनाम सत्या, (1930) 30 कलकत्ता 996.

व्यक्ति सम्मिलित होना चाहता है। उदाहरण के लिये, कोई व्यक्ति यदि आर्य समाजी हिन्दू होना चाहता है तो उसे शुद्धि का अनुष्ठान करना होगा। संपरिवर्तन या प्रतिसंपरिवर्तन द्वारा हिन्दू बनने का एक और भी मार्ग है। कोई भी व्यक्ति हिन्दू बनने की अपनी इच्छा व्यक्त करके हिन्द की तरह जीवन व्यतीत करता है और जिस जाति, मत, सम्प्रदाय या पंथ में वह सम्मिलित हुआ है,उसने उसे अपना सदस्य मान लिया है तो वह हिन्दू बन जाता है। ऐसी स्थिति में धर्म परिवर्तन के किसी भी अनुष्ठान को पूरा करना या कोई शुद्धिकरण करना आवश्यक नहीं है।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में हिन्दू धर्म में संपरिवर्तित या प्रतिसंपरिवर्तित होने के लिये किसी भी अनुष्ठान का उपबन्ध नहीं है। अत: पेरूमल बनाम पुन्नूस्वामी3 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यदि यह सिद्ध हो जाये कि किसी व्यक्ति ने हिन्दू धर्म स्वेच्छा से अंगीकार कर लिया है और हिन्दुओं ने उसे अपना सदस्य स्वीकार कर लिया है तो वह हिन्दू कहलायेगा, चाहे उसने धर्म परिवर्तन का कोई भी अनुष्ठान सम्पन्न न किया हो। यह तथ्यहीन बात है कि धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति किस वर्ण का सदस्य है। यह भी अनावश्यक है कि वह कट्टरता से हिन्दू धर्म का पालन करता है या नहीं। सत्य तो यह है कि यह भी सिद्ध करना आवश्यक नहीं है कि वह हिन्दू धर्म का पालन करता। इसी भांति कोई संपरिवर्तन द्वारा अहिन्दू हो जाये तो प्रतिसंपरिवर्तन द्वारा वह फिर हिन्दू हो सकता है। प्रतिसंपरिवर्तन हिन्दू धर्म में संपरिवर्तित होने अनुष्ठान द्वारा हो सकता है या उस व्यक्ति की हिन्दू होने की इच्छा व्यक्त करने के पश्चात् हिन्दू जीवन व्यतीत करके उससे संप्रदाय, पंथ, वर्ण या जाति द्वारा स्वीकार करने पर जिसमें वह सम्मिलित हुआ है, जो सकता है। 5 प्रतिसंपरिवर्तन के लिये किसी भी अनुष्ठान का सम्पन करना आवश्यक नहीं है। किसी अन्य धार्मिक अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है, जब तक कि प्रतिसंपरिवर्तित जाति वैसे अनुष्ठानों को आवश्यक न माने । ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रतिसंपरिवर्तन के लिये यह आवश्यक नहीं है कि वह व्यक्ति पुनः उसी जाति, संप्रदाय पंथ या वर्ण में सम्मिलित हो जिसे छोड़कर उसने अहिन्दू धर्म स्वीकार किया था। उदाहरण के लिये, एक जैन जो संपरिवर्तन द्वारा ईसाई हो जाता है, प्रतिसंपरिवर्तन द्वारा सिक्ख धर्म स्वीकार करता है, ऐसा व्यक्ति हिन्दू ही कहलायेगा। गुंटूर मेडिकल कॉलेज बनाम मोहन राव में एक हरिजन जो ईसाई हो गया था, पुनः हिन्दू हो गया। उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या वह और उसकी संतान पुन: उसी हरिजन जाति के सदस्य हो गये जिसके ईसाई होने के पूर्व थे? न्यायालय ने कहा कि वह उसी जाति का हरिजन तब हो सकता है जबकि वह जाति उसे और उसकी संतान को अपना सदस्य स्वीकार कर ले।

घोषणा द्वारा हिन्दू-केरल उच्च न्यायालय ने संपरिवर्तन द्वारा हिन्दू बनने की विधि को और एक पग आगे बढ़ाया है। मोहनदास बनाम देवासन बोर्ड में न्यायालय ने कहा कि यदि कोई हिन्दू व्यक्ति यह घोषणा करता है कि वह हिन्दू हो गया है और बतौर वह हिन्दू के रहता है, तो इसका तात्पर्य यह होगा कि उसने हिन्दू धर्म अंगीकार कर लिया है और वह हिन्दू हो गया है। इस मुकदमे में जेसूदास नामक एक कैथोलिक ईसाई कई वर्षों से एक हिन्दू मन्दिर में भक्ति संगीत देता था। कुछ समय उपरान्त कुछ हिन्दुओं ने उन्हें मन्दिर में आने से यह कहकर रोका कि वह हिन्दू नहीं है, अत: वेदी के पास जाकर नहीं गा सकता है।

1. तत्रैव.

2. देखें, दुर्गाप्रसाद बनाम सुदर्शन स्वामी, 1940 मद्रास 513; पेरुमल बनाम पोन्नू स्वामी, 1971 सुप्रीम कोर्ट 2352.

3. 1971 सुप्रीम कोर्ट 2352.

4. बरमानी बनाम वरमानी, 1943 लाहौर 51.

5. दुर्गाप्रसाद बनाम सुदर्शन स्वामी, 1940 मद्रास 513; और भी देखें, वी० वी० गिरि बनाम डी० एस० दोरा, 1959 सुप्रीम कोर्ट 1318. किसी जनजाति या वर्ग का बनने के लिये यह आवश्यक है कि जनजाति या वर्ग उस व्यक्ति को स्वीकार कर लें.

6. जनवालागन बनाम देवराजन, 1948 सु० को० 411.

7. तत्रैव

8. 1976 सुप्रीम कोर्ट 1904.

9. 1975 के० एल०टी० 55.

जेसुदास ने यह घोषणापत्र न्यायालय में दाखिल किया, “मैं घोषणा करता हूं कि मैं हिन्दू हैं।” इस तथ्य के आधार पर न्यायालय ने निर्णय दिया कि जेसूदास हिन्द है।

अतः निर्णयों के आधार पर हम कह सकते हैं कि निम्न स्थितियों में कोई भी अहिन्दू संपरिवर्तन द्वारा हिन्दू हो जाता है

(क) यदि वह संपरिवर्तन के अनुष्ठान द्वारा हिन्दू धर्म अंगीकार करता है।

(ख) यदि वह ईमानदारी से यह इच्छा व्यक्त करता है कि वह हिन्दू हो गया है और वह बतौर हिन्दू के

रहता है तथा जिस वर्ग, जाति या सम्प्रदाय में वह सम्मिलित हुआ है वह उसे अपना सदस्य स्वीकार करता है।

(ग) यदि वह घोषणा करता है कि वह हिन्दू है और वह बतौर हिन्दू रह रहा है।

अन्तर्जातीय विवाह की सन्तान (LLB PDF Download)

अन्तर्जातीय विवाह की सन्तान को पारम्परिक हिन्दू विधि में वर्ण शंकर कहते हैं और वह शूद्रों की श्रेणी में आती है। क्या आधुनिक विधि में हम उन्हें शूद्र कहकर अनुसूचित जाति का लाभ दे सकते हैं। यह प्रश्न उठा सपना बनाम केरल राज्य में । अन्तर्जातीय विवाहों को बढ़ावा देने के लिये केरल सरकार ने एक अधिनियम पारित किया जिसके अन्तर्गत यह उपबन्ध बनाया गया है कि अन्तर्जातीय विवाहों की संतान को अनुसूचित जातियों के समस्त लाभ प्राप्त होंगे यदि माता या पिता में एक अनुसूचित जाति का सदस्य है। केरल उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि ऐसे विवाह की सन्तानें अनुसूचित जाति की सदस्य नहीं हो सकती हैं। इस लेखक का यह निवेदन है कि वर्ण शंकर यदि उच्च जाति के सदस्य नहीं हो सकते हैं तो उन्हें शूद्र क्यों नहीं माना जाना चाहिये। देवदासियां,2 निःसन्देह ही देवदासियां हिन्दू हैं।

जन्मतः हिन्दू (LLB Study Material in PDF)

जिस व्यक्ति के माता-पिता दोनों ही हिन्दू हैं, वह सामान्यतः हिन्दू ही कहलायेगा। इसी भांति वह व्यक्ति भी हिन्दू है जिसकी माता या पिता हिन्दू हैं, जिसका लालन-पालन हिन्दू की भांति हुआ है।

जब माता-पिता दोनों हिन्दू हों-धर्मतः हिन्दू माता-पिता की संतान हिन्दू ही होती है। इस कोटि में जन्मजात हिन्दू होने के लिये यह आवश्यक है कि माता-पिता दोनों ही धर्मतः हिन्दू, जैन, बौद्ध या सिक्ख हों। यदि उनमें से एक हिन्दू, जैन, बौद्ध या सिक्ख है और दूसरा सिक्ख, बौद्ध, जैन या हिन्दू है,तो भी उसकी सन्तान हिन्दू ही होगी। आवश्यक यह है कि उसके माता-पिता दोनों ही किसी-न-किसी हिन्दू धर्म (अर्थात् : हिन्दू, जैन, बौद्ध या सिक्ख धर्म) के अनुयायी होने चाहिये। यह आवश्यक नहीं है कि ऐसे मातापिता की संतान हिन्दू धर्म का पालन करती हो। संतान नास्तिक होने पर, पूर्णतया अधर्मी होने पर या धर्म विरोधी होने पर भी, हिन्दू रहेगी। यहां भूल बात जन्मजात हिन्दू होने की है, इसके बारे में यह प्रश्न कि वह धर्मतः हिन्दू है या नहीं, गौण है। अनिवार्य यह है कि जन्म के समय उसके माता-पिता दोनों हिन्दू होने चाहिये। यदि उसके जन्म के पश्चात् माता-पिता दोनों ही या दोनों में से एक अहिन्दू हो जायें, तब भी वह संतान हिन्दू रहेगी, जब तक कि पैतृक अधिकार के अन्तर्गत पिता (या माता) ने उसका धर्म परिवर्तन न कर दिया हो। इस पैतृक अधिकार का प्रयोग धर्मज (Legitimate) संतान पर पिता कर सकता है, पिता की मृत्यु के पश्चात् माता । अधर्मज (Illegitimate) संतान के प्रति इस अधिकार का प्रयोग माता ही कर सकती है।

संहिताबद्ध हिन्दू विधि में भी यही उपबन्ध (Provision) है। हिन्द विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2 (1) के स्पष्टीकरण (क) के अन्तर्गत कहा गया है कि कोई भी अपत्य (बालक), धर्म या अधर्मज जिसके माता-पिता दोनों ही धर्मतः हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख हैं, हिन्दू हैं।

जब माता या पिता हिन्द हों-इस सम्बन्ध में संहिताबद्ध हिन्दू विधि के पूर्वस्थिति इतनी स्पष्ट ही

हताबद्ध हिन्दू विधि में कहा गया है कि कोई अपत्य (बालक) धर्मज या अधर्मज, जिसके माता-पिता

1. 1993 केरल 75.

2. भाग्यवती बनाम लक्ष्मी, 1993 मद्रास 346.

में कोई एक धर्मतः हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख हो और जो उस जनजाति, समुदाय, समूह या कुटुम्ब के सदस्य के रूप में पला हो जिसका वह माता या पिता सदस्य है या था, हिन्दू होगा। इस भांति निम्न दो शर्तों का पूर्ण होना आवश्यक है

(1) बालक या बालिका के जन्म के समय माता-पिता में से एक हिन्दू है, और

(2) बालक या बालिका उस जन-जाति, समुदाय, समूह या कुटुम्ब के सदस्य के रूप में पला हो जिसका हिन्दू माता (या पिता) सदस्य है या था। ट्रावनकोर की नाडर जाति में कोई भी पुरुष अहिन्द स्त्री से विवाह कर सकता है। विवाह के उपरान्त उस स्त्री से उत्पन्न सन्तान और वह स्त्री हिन्दू मानी जाती है।

माया बाई बनाम उत्तराम2 में एक यूरोपीय ईसाई की दो हिन्दू रखैलों के अधर्मज पुत्रों का लालनपालन हिन्दू की भांति हुआ था। न्यायालय ने कहा कि दोनों पुत्र हिन्दू हैं। इसी भांति राम परगास सिंह बनाम धानव में भी न्यायालय ने कहा कि धर्म परिवर्तन द्वारा मुसलमान हो जाने वाली हिन्दू नर्तकियों की सन्तानें जिनका लालन-पालन उनके नाना-नानी ने हिन्दू की भांति किया है, हिन्दू हैं। परन्तु यदि बालक का लालन-पालन हिन्दू की भांति नहीं हुआ है तो वह हिन्दू नहीं होगा हिन्दू पिता और ईसाई माता की सन्तान हिन्दू ही होगी, विशेषकर जबकि उसकी माता या अन्य किसी ने भी उसके ईसाई होने का दावा नहीं किया

असंहिताबद्ध (Uncodified) और संहिताबद्ध (Codified) विधियों के अन्तर्गत मुख्य अन्तर यह है कि सामान्यतया पिता (या पिता) अपना धर्म परिवर्तन करते समय बालक का भी धर्म परिवर्तन कर सकने की शक्ति रखते हैं, परन्तु संहिताबद्ध हिन्दू विधि के अन्तर्गत यदि बालक का लालन-पालन हिन्दू की भांति हुआ है तो उसके पिता के धर्म परिवर्तन के पश्चात् भी बालक हिन्दू ही रहेगा। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 2 (1) के स्पष्टीकरण (ख) के शब्द ‘सदस्य’ था से यही तात्पर्य निकलता है। मान लीजिये, हिन्दू माता और ईसाई पिता की संतान का लालन-पालन हिन्दू की भांति होता है, तत्पश्चात् माता भी ईसाई हो जाती है। प्रश्न यह उठता है कि क्या इस समय बालक हिन्दू है? माता-पिता के अहिन्दू होने पर भी बालक हिन्दू है। परन्तु बालक के माता-पिता दोनों अहिन्दू हैं, तो फिर भी बालक हिन्दू नहीं होगा, चाहे उसका लालन-पालन हिन्दू की भांति हुआ हो।

 

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2 (1) के स्पष्टीकरण (ख) में यह उपबन्ध है कि अपत्य उस जनजाति, समुदाय, समूह या कुटुम्ब के सदस्य के रूप में पला हो जिसका सदस्य उसका माता या पिता है। मान लीजिये, ब्राह्मण पिता के पुत्र का लालन-पालन क्षत्रीय की भांति हुआ है, या जैन पिता के पुत्र का लालन-पालन सिक्ख की भांति हुआ है, या जाट माता के पुत्र का जैन पुजारी की भांति लालन-पालन हुआ है, तो क्या बालक हिन्दू नहीं होगा? इस लेखक की राय में बालक हिन्दू ही होगा, क्योंकि यदि बालक का लालन-पालन हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन या उनके किसी संघ, सम्प्रदाय, जाति-उपजाति के बतौर हो तो वह हिन्दू ही होगा, उसका पिता (या माता) चाहे हिन्दुओं के किसी भी धर्म का पालन करने वाले हों।

 

वे व्यक्ति जो न मुसलमान हैं, न ईसाई, न यहूदी, न पारसी (LLB Study Material in Hindi)

संहिताबद्ध हिन्दू विधि के पूर्व हिन्दू विधि का यह मान्य नियम था कि प्रत्येक हिन्दू, हिन्दू विधि से शासित होता था, चाहे वह आर्य हिन्दू है, चाहे वह अनार्य हिन्दू है। अनार्य हिन्दू के लिये यह स्थापित

1. देवाबासम बनाम जयाकुमारी, 1991 के० 175.

2. (1861) 8 मूर्स इण्डियन अपील्स 406, और भी देखें, निकोलस बनाम कमिश्नर ऑफ वैल्थ टैक्स,1970 मंद्रास 249.

3. (1942) 3 पटना 142; और देखें, सपना बनाम स्टेट, 1993 केरल 75.

4.. अब्राहम बनाम अब्राहम, 9 एम० आई० 199; ए० वन्नामुडाला बनाम चेकाती, 1953 मद्रास 571.

5. राजकुमार गुप्ता बनाम बारवांरा, 1989 कल० 165.

करना आवश्यक नहीं था कि उसने श्रुति-स्मृति को स्वीकार किया है। यदि वह हिन्दू है-कैसा भी हिन्द । क्यों न हो-उस पर हिन्दू विधि लागू होगी, इसलिये मूल द्रविड़, चमार और अनेक आदिवासी जातियों के सदस्यों पर हिन्दू विधि लागू होती थी। यह माना गया था कि वे हिन्दू हैं या हो गये हैं, तब पूर्णतया हिन्द होना आवश्यक नहीं था, आंशिक रूप में हिन्दू होना पर्याप्त था।

संहिताबद्ध हिन्दू विधि ने इस नियम को कुछ अधिक विस्तृत कर दिया है। जब तक कोई भी अन्य व्यक्ति जो धर्मतः मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है हिन्दू होगा, जब तक यह सिद्ध न हो जाये कि संहिताबद्ध विधि के पारित होने से पूर्व वह हिन्दू से शासित नहीं होता था।

इस प्रवर्ग के अन्तर्गत वे सब लोग आयेंगे जो किसी भी धर्म के मानने वाले नहीं हैं। कोई भी व्यक्ति जो नास्तिक हैं, या जो सब धर्मों में विश्वास रखता है या जो मिले-जुले धर्म में विश्वास करता है, हिन्दू कहलायेगा। आवश्यक केवल यह है कि वह मुसलमान, ईसाई, पारसी और यहूदी नहीं है, और यदि वह मुसलमान, ईसाई, पारसी यहूदी नहीं तो वह हिन्दू है उसके बारे में सकारात्मक ढंग से यह सिद्ध करना अनिवार्य नहीं है कि वह हिन्दू है। उदाहरण के लिये, कोई शिशु किसी व्यक्ति को सड़क पर पड़ा मिलता है, यह ज्ञात नहीं है कि शिशु के माता-पिता कौन हैं, तो शिशु हिन्दू होगा। यही बात उन शरणार्थियों के बारे में है, जिनके माता-पिता का पता नहीं है।

जन-जातियां (LLB Study Material)

संहिताबद्ध हिन्दू विधि के विधेयकों के अन्तर्गत संहिताबद्ध हिन्दू विधि किसी ऐसे जनजाति के सदस्यों पर, जो संविधान के अनुच्छेद 366 के खण्ड (25) के अन्तर्गत अनुसूचित जनजाति हो, लागू नहीं होगी जब तक कि केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र (Gazette) में अधिसूचना द्वारा अन्यथा निर्दिष्ट न करे। इसका तात्पर्य यह है कि वे अनुसूचित जनजातियां जो हिन्दू विधि के संहिताबद्ध होने के पूर्व, हिन्दू विधि से शासित होती थीं, अब हिन्दू विधि द्वारा शासित नहीं होंगी? इस लेखक की राय में केन्द्रीय सरकार की अधिसूचना के अभाव में वे संहिताबद्ध हिन्दू विधि से शासित नहीं होगी; परन्तु संहिताबद्ध हिन्दू विधि उन पर पहले की ही भांति लागू होती रहेगी। परन्तु यदि उस जाति का हिन्दूकरण नहीं हुआ है तो वह हिन्दू विधि द्वारा शासित नहीं होगी।

संहिताबद्ध हिन्दू विधि का शासन-क्षेत्र (LLB Notes in PDF Download)

वृहत् रूप से हम यह कह सकते हैं कि संहिताबद्ध हिन्दू विधि का शासन-क्षेत्र जहां तक व्यक्तियों का प्रश्न है, निम्न है

(क) वे जो धर्मतः या जन्मतः हिन्दू, जैन, बौद्ध या सिक्ख हैं, और

(ख) वे जो मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं।

यह ध्यान देने की बात है कि यद्यपि जैन, बौद्ध और सिक्ख हिन्दू हैं परन्तु वे धर्म से हिन्दू नहीं हैं। इसी भांति हिन्दू विधि से शासित होने वाले वे व्यक्ति जो न मुसलमान हैं, न यहूदी, न ईसाई, न पारसी धर्म से हिन्दू नहीं हैं, बल्कि वे हिन्दू इसलिये कहलाते हैं कि हिन्दू विधि उन पर लागू होती है। हिन्दू संहिताबद्ध विधि ने पहले उन व्यक्तियों का प्रवर्गीकरण (Categorization) किया है, जिन पर हिन्दू विधि लागू होती

1. रेफैल बनाम वईदा, 1957 पटना 71; बुद्ध बनाम दुखन, 1956 पटना 123.

2. राजकुमार गुप्ता बनाम वारवारा, 1989 कल० 165.

3. देखें, धारा 2 (2) हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955; दशरथ बनाम गुरु, 1972 उड़ीसा 78; कदम बनाम जीतन, 1973 पटना 205.

4. सतीश बनाम बलराम, 1973 गौहाटी 76%; अबुत्ताल बनाम ताल्लुका लैंड बोर्ड, 1977 के० एल० टी० 333; कुन्दन बनाम जीतन, 1988 पटना 206 (जनजाति रिवाज के अन्तर्गत) घर जमाई की प्रास्थिति पत्र जैसी होने पर वह पुत्र की तरह उत्तराधिकार प्राप्त करेगा.

5. गोपाल बनाम गिरिबाला, 1991 पटना 138.

है उन्हें हिन्दू की संज्ञा दी है। धारा 2 (3) के अन्तर्गत2 इस अधिनियम के किसी भी प्रभाग में आये हुये ‘हिन्दू’ पद का अर्थ लगाया जायेगा कि मानो उसके अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति आता है जो यद्यपि धर्मतः हिन्दू नहीं है तथापि ऐसा व्यक्ति है जिस पर यह अधिनियम इस धारा के अन्तर्विष्ट उपबन्धों (By virtue of the provisions) के आधार पर लागू होता है।

उपर्युक्त उपबन्धों का तात्पर्य यह होता है कि उन सब व्यक्तियों पर जो मुसलमान, ईसाई, पारसी और यहूदी नहीं हैं एक रूपात्मक विधि लागू होती है, और उन सब व्यक्तियों को एक नाम दिया गया है-वे सब हिन्दू हैं। संहिताबद्ध हिन्दू विधि वैयक्तिक विधि की वह शाखा है जो धर्मतः और जन्मतः सिक्ख, जैन, बौद्ध धर्मावलम्बियों एवं उन पर जो किसी अन्य धर्म (जैसे मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी) के अनुयायी नहीं हैं, लागू होती है, जिस पर भी वह लागू होती है, वे हिन्दू कहलाते हैं।

जहां तक संहिताबद्ध हिन्दू विधि के क्षेत्रीय विस्तार का प्रश्न है यह विधि जम्मू और काश्मीर राज्य को छोड़कर समस्त भारतवर्ष में लागू होती है।

असंहिताबद्ध हिन्दू विधि का शासन-क्षेत्र (LLB Notes in PDF)

हम ऊपर देख चुके हैं कि 1955 से पूर्व भी ‘हिन्दू’ पद का विस्तृत अर्थ लिया गया था जिसके अन्तर्गत न केवल धर्मतः और जन्मतः हिन्द, जैन, बौद्ध और सिक्ख आते थे बल्कि अन्य कई जातियां और जनजातियां भी आती थीं जो धर्मतः हिन्दू नहीं थीं। वे सब व्यक्ति जहां तक असंहिताबद्ध हिन्दू विधि का प्रश्न है अब भी असंहिताबद्ध हिन्दू विधि से ही शासित होते रहेंगे, चाहे वे संहिताबद्ध हिन्दू विधि के प्रवर्गीकरण की कोटियों में आयें या न आयें। केरल के तमिल बनिया और ईसाई उत्तराधिकार और विभाजन के मामलों में अब भी हिन्दू विधि द्वारा शासित होते हैं । यह बात जालन्धर जिले के राम कबीर मतावलम्बियों पर लागू होती है।

1. देखें; हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2 (1).

2. देखें; हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2 (3).

3. देखें, गोंगी रेड्डी बनाम गोंगी रेड्डी, 1972 आन्ध्र प्रदेश 156. |

4. चिन्नास्वामी बनाम एंथोनी स्वामी, 1961 केरल 161; केलूकुट्टी बनाम मामेड, 1972 सुप्रीम कोर्ट 2403.

5. शीतलदास बनाम सन्त राम, 1964 सुप्रीम कोर्ट 606; देखें कन्नामुडल्ला बनाम चीकाती, 1953 मद्रास 571 (नर्तकियां).

Follow me at social plate Form