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LLB 1st Year Semester Law of Contract 1 General Principles Notes

 

LLB 1st Year Semester Law of Contract 1 General Principles Notes:- LLB Law of Contract 1 (SECS. 1-75 of The Indian Contract Act, 1872 and The Specific Relief Act, 1963) Most Important LLB Notes for 1st Semester Study Material in Hindi English PDFDownload December 2019 Semester.

 

संविदा विधि (Contract Law)

भाग 1 (Part 1)

सामान्य सिद्धान्त (GENERAL PRINCIPLES)

अध्याय 1 प्रारम्भिक (Chapter 1 Early)

संविदात्मक दायित्वों का इतिहास एवं प्रकृति (History and Nature of Contractual Obligations)

इतिहास-वर्तमान संविदा अधिनियम, 1872 में पारित किया गया था। इसके पूर्व 18वीं शताब्दी में कलकत्ता, मद्रास एवं बम्बई के प्रेसीडेन्सी नगरों में न्याय के न्यायालय स्थापित किये गये जिनमें तत्समय प्रवृत्त अंग्रेजी कॉमन लॉ एवं अधिनियम विधि उक्त न्यायालयों की अधिकारिता में प्रारम्भ किया गया। उक्त अंग्रेजी विधि उस सीमा तक लागू किया गया जहां तक वह भारतीय परिस्थितियों में प्रयोज्य हो। यह विवादास्पद प्रश्न है कि क्या अंग्रेजी विधि 1726 के चार्टर या 1753 या 1774 के चार्टर द्वारा भारत में प्रारम्भ किया गया।

उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता वाले क्षेत्रों में हिन्दुओं एवं मुसलमानों पर अविवेकपूर्ण रूप से लागू करने से बहुत सारी असुविधायें हुयीं। इन असुविधाओं को दूर करने के लिये कलकत्ता के लिये 1781 का अधिनियम तथा मद्रास एवं बम्बई के लिये 1797 का अधिनियम पारित किया गया। इन अधिनियमों द्वारा यह उपबन्ध किया गया कि उक्त नगरों के रहने वाले निवासियों की भूमि में उत्तराधिकार, किराया, माल तथा संविदा के सभी मामले तथा पक्षकार एवं पक्षकार के मध्य में मुसलमानों के मामले में मुसलमानों की विधि एवं चलन तथा हिन्दुओं के मामलों में हिन्दुओं के विधि एवं चलन के आधार पर निर्णीत किये जायें। इसके परिणामस्वरूप हिन्दुओं की संविदाओं के मामले में हिन्दू संविदा विधि तथा मुसलमानों के मामलों में मुस्लिम संविदा विधि लागू किया जाने लगा।

1862 में प्रत्येक प्रेसीडेन्सी नगर में उच्च न्यायालय स्थापित किये गये। यद्यपि वह न्यायालय जिन्हें 1781 तथा 1797 के चार्टर लागू होते थे समाप्त कर दिये गये थे परन्तु उच्च न्यायालय भी व्यक्तिगत मामलों एवं संविदा आदि के मामलों में वही पूर्व विधि लागू करते रहे। यह स्थिति भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के पारित होने तक चलती रही।

यहां पर यह उल्लेखनीय है कि मुफस्सिल न्यायालयों के लिये 1793 के बंगाल विनियमन, (Regulation) III के अनुसार जिला एवं नगर न्यायालयों में जहां कोई विनिर्दिष्ट नियम नहीं था, वादों का निर्णय, न्याय, साम्या एवं शुद्ध अन्त:करण (justice, equity and good conscience) के अनुसार निणीत किये जाने का प्रावधान किया गया। जहां तक बम्बई के मफस्सिल न्यायालयों का सम्बन्ध था, यह उपबन्ध था कि मामलों का निर्णय संसद के अधिनियम तथा सरकार के विनियमन जो मामले में प्रयोज्य होते हों, लागू होंगे तथा जहां यह सब लागू नहीं होते हैं तो प्रतिवादी की विधि लागू होगी। यहां पर यह नोट करना आवश्यक है कि शब्द “न्याय, साम्या एवं शुद्ध अन्त:करण” से तात्पर्य अंग्रेजी विधि से था। 1872 में

भारतीय संविदा अधिनियम के पारित होने के बाद उपर्युक्त सारी अनिश्चिततायें समाप्त हो गयीं।

संविदात्मक दायित्वों की प्रकृति :

संविदा के उल्लंघन का उपचार प्रतिकार के रूप में होता है, वास्तव में संविदा के उल्लंघन के उपचार के रूप में जो नुकसानी दी जाती है वह प्रतिकरात्मक होती है। प्रतिकर दिये जाने का उद्देश्य यह होता है कि प्रभावित पक्षकार को लगभग उसी स्थिति में लाया जाये जिसमें कि वह होता यदि संविदा का पालन किया जाता। संविदा के उल्लंघन के परिणामस्वरूप नुकसानी का परिमाण वह प्रतिकर होता है जो संविदा के भंग का स्वाभाविक परिणाम होता है या जिसकी परिकल्पना की जा सकती है।

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 73 के अनुसार, जब कोई संविदा भंग कर दी गई है तब वह पक्षकार जो कि ऐसी भग्नता से पीड़ित होता है उस पक्षकार से, जिसने संविदा भंग की है, अपने को उस भग्नता से हुई किसी ऐसी हानि या नुकसान के लिये, जो कि ऐसी घटनाओं के प्रायिक अनुक्रम में प्रकृत्या ऐसी भग्नता से उद्भूत हुई अथवा जिसके बारे में पक्षकार उस समय जबकि संविदा की गयी थी, यह जानते थे कि संविदा भंग का सम्भाव्य फल वह हानि का नुकसान होगा, प्रतिकर पाने का हकदार है।

संविदा के उल्लंघन का उपचार प्रतिकरात्मक होता है। यह बात धारा 73 एवं उसमें दिये गये दृष्टान्तों से भी स्पष्ट होती है।

यहां पर यह भी नोट करना आवश्यक है कि धारा 74 का शीर्षक ‘परिनिर्धारित नुकसान अथवा शास्ति’ है तथा संविदा में भग्नता की दशा में शास्ति के रूप में दी जाने वाली रकम के रूप में कोई राशि नामांकित है परन्तु उपचार के रूप में न्यायालय कोई रकम केवल प्रतिकर के रूप में प्रदान करता है। न्यायालय प्रतिकर देते समय केवल यह ध्यान में रखता है कि प्रतिकर के रूप में दी जाने वाली रकम नामांकित राशि से अधिक न हो। उदाहरण के लिये धारा 74 के दृष्टान्त (क) के अनुसार :

” ‘क’, ‘ख’ से संविदा करता है कि यदि वह ‘ख’ को एक निर्दिष्ट दिन 500 रुपये देने में असफल रहता है तो ‘ख’ को 1,000 रुपये देगा। ‘क’ उस दिन ‘ख’ को 500 रुपये देने में असफल रहता है। ‘ख’, ‘क’ से 1,000 रुपये से अनधिक ऐसा प्रतिकर, जैसा कि न्यायालय युक्तियुक्त समझता है, प्रत्युद्धरित करने का हकदार है।”

इस नियम का एक अपवाद है जो धारा 74 में दिया गया है। इसके अनुसार, जबकि कोई व्यक्ति कोई जमानत, बन्धनामा, मुचलका या उसी प्रकार का अन्य लिखत करता है, या किसी विधि के उपबन्धों के अधीन या केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी राज्य सरकार के आदेशों के अधीन कोई बन्धनामा किसी लोक-कर्तव्य या कार्य पालन के लिये, जिसमें कि जनता का हित बद्ध है, देता है तो यह किसी ऐसे लिखत की शर्त के भंग होने पर उसमे वर्णित पूर्ण राशि को चुकाने के लिये दायित्वाधीन होगा।

संविदा की परिभाषा तथा आवश्यक तत्व* – भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 2 (ज) के अनुसार-“विधि द्वारा प्रवर्तनीय करार संविदा है।” शब्द ‘करार’ की परिभाषा धारा 2 (ङ) में दी गई है। इसके अनुसार, “एक-दूसरे के लिए प्रतिफल होने वाली प्रत्येक प्रतिज्ञा और प्रत्येक प्रतिज्ञा-संवर्ग करार है।” धारा 2 (ख) के अनुसार, “जबकि वह व्यक्ति, जिससे प्रस्थापना की जाती है, उसके प्रति अपनी अनुमति संज्ञात करता है, तब कहा जाता है कि प्रस्थापना प्रतिग्रहीत (या स्वीकृत) हुई है। कोई प्रस्थापना, जबकि प्रतिग्रहीत हो गई हो, प्रतिज्ञा कहलाती है।’ इस प्रकार एक स्वीकृत प्रस्थापना एक करार होती है तथा विधि द्वारा प्रवर्तनीय करार को संविदा कहते हैं। अतः प्रत्येक संविदा में एक करार समाविष्ट होता है, परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक करार संविदा हो, क्योंकि विधि द्वारा प्रवर्तनीय करार ही संविदा हो सकता है। कोई भी करार विधि द्वारा तभी प्रवर्तनीय हो सकता है जबकि वह धारा 10 में वर्णित शर्तों को पूरा करे। धारा 10 के अनुसार

आई० ए० एस० (1978) प्रश्न 1 (क); आई० ए० एस० (1976) प्रश्न 1 (क) तथा आई० ए० एस० (1977) प्रश्न 1

(क); पी० सी० एस० (1993) प्रश्न 6(क)।

“सभी करार, यदि वे संविदा करने के लिये सक्षम पक्षकारों की स्वतन्त्र सम्मति से विधिपूर्ण प्रतिफल के लिए और विधिपूर्ण उद्देश्य से किये जाते हैं और एतदद्वारा अभिव्यक्तरूपेण शून्य घोषित नहीं किये गये हैं, संविदा हैं। इनमें अन्तर्विष्ट कोई बात भारत में प्रवत्त और एतदद्वारा अभिव्यक्तरूपेण निरसित न की गयी किसी विधि को, जिसके द्वारा कि कोई संविदा लेखनबद्ध रूप में या साक्षियों की उपस्थिति में किये जाने के लिए अपेक्षित है, या दस्तावेजों के पंजीकरण से सम्बद्ध किसी विधि को प्रभावित नहीं करेगी।”

उपर्युक्त वर्णित धारा 10 के अनुसार-विधि द्वारा प्रवर्तनीय होने के लिए, किसी करार को निम्नलिखित शर्ते पूरी करना आवश्यक है

(1) पक्षकार संविदा करने के लिए सक्षम होने चाहिये,

(2) करार पक्षकारों की स्वतन्त्र सम्मति के द्वारा किया जाना चाहिये,

(3) करार के लिए प्रतिफल का होना आवश्यक है,

(4) प्रतिफल का उद्देश्य विधिपूर्ण होना आवश्यक है,

(5) यह भी आवश्यक है कि अधिनियम के अन्तर्गत इसे स्पष्टतया शून्य घोषित न किया गया हो,

(6) कुछ विशेष मामलों में, जैसा कि विधि द्वारा उपबन्धित हो, करार लिखित होना चाहिये या गवाहों की उपस्थिति में होना चाहिये अथवा इसका पंजीकरण होना चाहिये।

उपर्युक्त छठी शर्त सभी संविदाओं के लिए आवश्यक नहीं है। ‘संविदा’ एक द्विपक्षीय संव्यवहार दो या दो से अधिक पक्षकारों के मध्य होता है। जब तक कि इस सम्बन्ध में प्रावधान न हो संविदा का लिखित होना आवश्यक नहीं है। पक्षकारों के मध्य मौखिक करार भी बाध्यकारी संविदा हो सकता है। यह कहना उचित होगा कि संविदा के 6 आवश्यक तत्व हैं-(1) संविदा करने का आशय, (2) प्रस्ताव तथा स्वीकृति, (3) प्रतिफल, (4) संविदा करने की क्षमता, (5) पक्षकारों की स्वतन्त्र सम्मति तथा (6) करार के उद्देश्य का विधिपूर्ण होना। जबकि कोई करार वैध या शून्य हो सकता है, संविदा सदैव विधि में प्रवर्तनीय होती

संविदा अधिनियम के अन्तर्गत वैध संविदा के लिए प्ररूप (form) निर्धारित नहीं किया गया है। यह आवश्यक नहीं है कि संविदा सदैव लिखित हो। संविदा मौखिक हो सकती है, अथवा कभी-कभी तथ्यों तथा परिस्थितियों से भी इसका निष्कर्ष निकाला जा सकता है। किसी संविदा का निर्वचन करने के लिए न्यायालय इसके प्ररूप को न देखकर इसके सार को देखता है। अपने करार को किसी विशिष्ट प्ररूप में लिखने से संविदा का पक्षकार उसके परिणामों से बच नहीं सकता । यदि किसी करार को एजेन्सी की संविदा के प्ररूप में लिखा जाता है, परन्तु वास्तव में साझेदारी (partnership) है तो कानून में उसे साझेदारी ही माना जायगा। ___

गाजियाबाद विकास प्राधिकरण बनाम भारतीय संघ (Ghaziabad Development Authority v. Union of India) के वाद में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण का भूखण्ड आवंटित करने की योजना में विवरण पत्रिका (Brochure) में एक निबन्धन यह था कि धन वापसी की स्थिति आने पर प्राधिकरण धन पर ब्याज देने का दायी नहीं होगा। उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि यह निबन्धन उन मामलों में लागू नहीं होगा जिनमें धन वापसी का अवसर उत्पन्न होने के लिये दावेदार स्वयं जिम्मेदार नहीं

1. ए० आई० आर० 1998 एस० सी० 1400, 1403, तरसेम सिंह बनाम सुखमिन्दर सिंह।

2. आई० सी० सक्सेना, “कामर्शियल लॉ”, इंडियन लीगल सिस्टम, सम्पादक जोसेफ मिनाथूर (1978), पृ० 484-485.

3. तत्रैव पृ० 484.

4. सी० आई०टी० पंजाब, जे० एण्ड के० एण्ड यनियन टेरीटरी आफ इण्डिया बनाम मेसर्स पानीपत ऊलेन एण्ड जनरल मिल्स कं० लि०, चंडीगढ़, ए० आई० आर० 1976 एस०सी०640, 644; सुन्दरम फाइनन् एस० सा०640, 644; सुन्दरम फाइनेन्स लि. बनाम केरल राज्य, ए. आई० आर० 1966 एस०सी० 1178,1179 को भी देखें।

5. ए० आई० आर० 2000 एस० सी० 2003.

है। प्रस्तुत वाद में न्यायालय ने पाया कि धन वापसी का अवसर प्राधिकरण की चूक के कारण उत्पन्न हुआ था। अत: उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि प्राधिकरण वापसी धन पर ब्याज देने के लिये जिम्मेदार होगा।

यद्यपि भारतीय संविदा अधिनियम वैध तथा बन्धनकारी संविदा के लिए कुछ शर्ते विहित (Prescribe) करता है, यह संविदा के लिये कोई विशिष्ट प्ररूप निर्धारित नहीं करता है। अत: पक्षकार इस बात में स्वतन्त्र हैं कि वे संविदा को किस विशिष्ट प्ररूप में निष्पादित करें। परन्तु जब कोई व्यक्ति केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार से संविदा करता है तो उसे एक विशिष्ट प्ररूप में होना चाहिये तथा उसे निष्पादित किया जाना चाहिये। यह प्रावधान भारतीय संविधान में है। इसी प्रकार का प्रावधान रेलवे अधिनियम में भी है। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि संविधान अथवा रेलवे अधिनियम ने संविदा अधिनियम को अधिष्ठित (Supersede) कर दिया है।

एक पूर्ण संविदा (जिसमें माध्यस्थम करार भी सम्मिलित है) एक निविदा (tender) तथा उसकी स्वीकृति द्वारा हो सकती है यद्यपि औपचारिक दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं हुये हैं।8 एम० एम० ऐण्ड एम० रिफाइनरी, बंगलौर बनाम एम० एस० एस० आई० कार्पोरेशन के वाद में एक निविदा में यह निबन्धन था कि सफल निविदाकर्ता को निविदा के स्वीकार करने से दस दिन के अन्दर करार को निष्पादित करना होगा तथा इसके बिना करार पूर्ण नहीं होगा। मद्रास उच्च न्यायालय ने इसे अस्वीकार करते हुये कहा कि यह निर्वचन का प्रश्न है कि यह निविदा की शर्त है या नहीं। निविदा-प्रस्ताव की स्वीकृति या अस्वीकृति युक्तियुक्त समय के भीतर होनी चाहिये।10

कानूनी संविदा (Statutory Contract)-कोई संविदा केवल इस कारण ‘कानूनी संविदा’ नहीं हो जाती कि वह लोक उपयोगिता के निर्माण के लिये है तथा इसे एक कानूनी निकाय ने की या प्रदान की है। यह निर्णय उच्चतम न्यायालय ने केरल राज्य विद्युत परिषद बनाम कुरियन ई० कलाथिल (Kerala State Electricity Board v. Kurien E. Kalathil)11 के वाद में दिया था। इस वाद में उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि चूँकि संविदा द्वारा अधिरोपित दायित्व संविदा अधिनियम की परिधि के अन्तर्गत आते हैं, अत: संविदा कानूनी संविदा नहीं होगी। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय से इस निष्कर्ष पर पहुँचने में त्रुटि हुई कि विचाराधीन संविदा प्रकृति में कानूनी संविदा थी।

उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि कोई अधिनियम अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से काननी निकाय को अपने कार्य सम्पन्न करने के लिए संविदायें करने की शक्ति प्रदान कर सकता है। ऐसी संविदाओं के निबन्धनों से या अभिकथित उल्लंघनों से उत्पन्न विवाद को संविदा के साधारण सिद्धान्तों से निस्तारित किया जाना है। इस तथ्य से अन्तर नहीं पड़ेगा कि करार का एक पक्षकार कानूनी या लोक निकाय है। किसी संविदा की कोई शर्त या उसकी प्रवर्तनशीलता संविदा के साधारण सिद्धान्तों के अनुसार ही निर्धारित की जाती है। कानूनी निकाय का प्रत्येक कार्य आवश्यक रूप से कानूनी शक्ति का प्रयोग नहीं होता है। प्राइवेट पक्षकारों के समान कानूनी निकायों को सम्पत्ति के बारे में कार्य करने की शक्ति होती है। ऐसे कार्यों में लोक कानून का मसला नहीं उठता है। प्रस्तुत वाद में, यह नहीं दर्शित किया गया है कि संविदा किस प्रकार कानूनी है। पक्षकारों के मध्य संविदा प्राइवेट विधि के क्षेत्र का है। यह काननी संविदा नहीं है। ऐसी संविदा के निबन्धनों एवं शर्तों के निर्वचन को संविधान के अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत चनौती नहीं दी जा सकती है। यह एक सिविल न्यायालय का या संविदा में विहित माध्यस्थम का मामला है।

6. ए० आई० आर० 2000 एस० सी० पृष्ठ 2007.

7. यनियन आफ इण्डिया बनाम द स्टील होल्डर सिंडीकेट, पूना, ए० आई० आर० 1976 एस० सी0 879, 883

8. भारतीय संघ बनाम ए० एल० रालिया राम, ए० आई० आर० 1963 एस० सी० 1685.

9 ए० आई० आर० 1974 मद्रास 39, 42 मेसर्स प्रोगेसिव कान्सट्रक्शन बनाम भारत हाइड्रो पावर कार्पोरेशन लि. ० आई० आर० 1996 दिल्ली 92 को देखें।

10. मेसर्स सेख सारिया एक्सपोर्ट बनाम भारतीय संघ, ए० आई० आर० 2004 बम्बई 35, 37-38.

11. ए० आई० आर० 2000 एस० सी० 2573, 2576.

केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों द्वारा संविदा (Contracts by Central and State Governments)-जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है कि संविदा अधिनियम संविदा के लिये किसी प्ररूप का विहित नहीं करता है। परन्तु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 299 के अनुसार, जब कोई संविदा केन्द्रीय या राज्य सरकार के साथ की जाती है तो कुछ औपचारिकतायें आवश्यक होती हैं। अनुच्छेद 299 के अनुसार निम्नलिखित औपचारिकताएँ आवश्यक हैं

(1) यह अभिव्यक्त होना चाहिये कि संविदा राष्ट्रपति या राज्यपाल की ओर से की गयी है।

(2) इसका निष्पादन होना आवश्यक है।

(3) निष्पादन ऐसे व्यक्ति द्वारा होना चाहिये जिसे राष्ट्रपति या राज्यपाल प्राधिकृत करे तथा इस प्रकार होना चाहिये जैसे राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल निर्देश दें।

यदि सरकार के साथ संविदा में उपर्युक्त औपचारिकताएँ पूरी नहीं की जाती तो ऐसी संविदा शून्य होगी तथा प्रवर्तित नहीं की जा सकती, और ऐसी संविदा के उल्लंघन के लिए सरकार के विरुद्ध वाद नहीं किया जा सकता है। अनुच्छेद 299 में वर्णित प्रावधान आज्ञापक (mandatory) है। भारतीय संघ बनाम चौथमल (Union of India v. Chouthmal)12 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 299 (1) के प्रावधान आज्ञापक हैं तथा इसके उल्लंघन से संविदा शून्य हो जायगी। इसमें विबन्धन (estoppel) अथवा अनुसमर्थन (ratification) का कोई प्रश्न नहीं उठता है। इसका कारण यह है कि यह प्रावधान केवल विशिष्ट प्ररूप के लिए नहीं है वरन् यह सरकार के विरुद्ध अनधिकृत संविदाओं को बचाने के लिए किये गये हैं। यह प्रावधान संविधान में लोकनीति के आधार पर रखे गये हैं। इसमें वर्णित औपचारिकताओं का अभित्याग नहीं किया जा सकता है।13

सरकार की ओर से संविदा उसी व्यक्ति द्वारा की जानी चाहिये जिसे राष्ट्रपति या राज्यपाल ने इस सम्बन्ध में प्राधिकृत किया है। उदाहरण के लिए, भारतीय संघ बनाम एन० के० प्राइवेट लि० (Union of India v. N. K. Pvt. Ltd.)14 में रेलवे बोर्ड के सचिव की ओर से एक कम्पनी की पटरियों के विक्रय का प्रस्ताव स्वीकार किया गया। परन्तु उक्त सचिव भारत के राष्ट्रपति की ओर से संविदा करने के लिए प्राधिकृत नहीं थे। अत: न्यायालय ने निर्णय दिया कि उक्त स्वीकृति से बन्धनकारी संविदा उत्पन्न नहीं हुई क्योंकि संविदा करने के लिए राष्ट्रपति ने रेलवे स्टोर्स के डाइरेक्टर को प्राधिकृत कर रखा था।15

अत: यह स्पष्ट है कि यदि किसी व्यक्ति तथा सरकार के साथ संविदा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 299 (1) के अनुसार नहीं होती है, तो ऐसी संविदा शून्य होगी तथा यह उस व्यक्ति या सरकार द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होगी।16 परन्तु इसके यह अर्थ नहीं हैं कि भारतीय संविधान (या रेलवे अधिनियम जिनमें संविदा के लिए एक विशिष्ट प्ररूप विहित किया गया है) संविदा अधिनियम को प्रतिष्ठित कर दिया है।17

दृष्टान्त-प्रतियोगी परीक्षा के बाद क्ष का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए हुआ तथा भारत सरकार ने उसे अपने व्यय से राष्ट्रीय अकादमी में प्रशिक्षण के लिए भेजा। प्रशिक्षण समाप्ति पर वह सेवा में नहीं आया। भारत संघ ने क्ष के विरुद्ध प्रशिक्षण व्यय की वसूली का दावा किया। दावे का उत्तर यह है कि न तो पक्षकारों के बीच कोई लिखित करार था तथा न भारत सरकार ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 299 (1) का ही पालन किया है।*

12. ए० आई० आर० 1976 एम० पी० 199, 201.

13. देखें: भीखराज जैपुरिया बनाम भारतीय संघ, ए० आई० आर० 1962 एस० सी० 113; मुलाम चन्द बनाम मध्य प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1968 एस० सी० 1218.

14. ए० आई० आर० 1972 एस० सी० 915.

15. देखें नोट 12, पृष्ठ 202.

16. चन्द्र धनसिंह बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1976 पटना 15.

17. भारतीय संघ बनाम द स्टील स्टाक होल्डर्स सिन्डीकेट, पूना, ए० आई० आर० 1976 एस० सी० 879, 883.

* सी० एस० ई० (1988) प्रश्न 2 (स)।

भारत संघ अपने वाद में सफल नहीं होगा क्योंकि अनुच्छेद 299 के अनुसार यह अभिव्यक्त होना चाहिये कि संविदा राष्ट्रपति या राज्यपाल की ओर से की गई है, इतना ही यथेष्ट नहीं है। यह भी आवश्यक है कि संविदा का निष्पादन राष्ट्रपति की ओर से होना चाहिये। प्रस्तुत मामले में कोई अभिव्यक्त संविदा नहीं हुई । अत: संविदा के निष्पादन का प्रश्न ही नहीं उठा। चूँकि अनुच्छेद 299 (1) का पालन नहीं हुआ है अत: यह संविदा सरकार द्वारा प्रवर्त्तनीय नहीं है।

विधि-सम्मत प्रत्याशा का सिद्धान्त (Principle of Legitimate expectation)

यह सच है कि एक कल्याणकारी राज्य में विशेष सेवायें जैसे पट्टे, लाइसेंस तथा संविदायें प्रदान करने आदि के मामले में सरकार को बड़ी विस्तृत शक्तियाँ होती हैं। ऐसे सरकारी कार्यों की परिधि तथा परिमाण बहुत अधिक है। यह प्रत्याशा की जाती है कि सरकार संविदायें या कोटे जारी करते समय एक निजी व्यक्ति की तरह कार्य नहीं करेगी वरन् उसे कुछ स्वस्थ मापकों तथा नियमों के अनुरूप कार्य करना चाहिये। ऐसे कार्य, अयुक्तिसंगत या असंगत नहीं होने चाहिये। संविदा हेतु यदि निविदा में कोई आरक्षित अधिकार हैं तो वह मनमाने नहीं होने चाहिये; वे किसी नीति या वैध सिद्धान्तों, जो स्वयं में युक्तियुक्त तथा भेदभाव करने वाले नहीं हैं, के अनुरूप होने चाहिये। यह विचार उच्चतम न्यायालय ने भारतीय संघ बनाम हिन्दुस्तान डेवलपमेंट कार्पोरेशन (Union of India v. Hindustan Development Corporation)18 के वाद में व्यक्त किये। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि यदि किसी निविदा में सरकार अधिकार आरक्षित रखती है कि वह चाहे तो न्यूनतम प्रस्ताव को स्वीकार करे अथवा नहीं तथा ऐसा नीति के आधार पर किया गया है तो इसके लिये कोई युक्तियुक्त आधार होना चाहिये।19 सरकार का हर कार्यकलाप लोककल्याण हेतु होता है। इसका प्रयोग मनमाने ढंग या बिना सिद्धान्त के नहीं किया जा सकता है। सरकार का हर कार्य लोकहित में होना चाहिये। यदि सरकार मनमाने ढंग या बिना तर्क के कार्य करती है तो इसे अवैध घोषित किया जा सकता है।20

उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि हाल में संविदा के मामलों में विधिसम्मत प्रत्याशा (Legitimate Expectation) के सिद्धान्त को प्रशासनिक विधि के लक्ष्यार्थों का हवाला देते हुए लागू किया गया है। इस सम्बन्ध में न्यायालय ने अनेक अंग्रेजी तथा अन्य वादों के निर्णयों पर विचार करने के पश्चात् कहा कि यह सामान्यतया स्वीकार किया जाता है कि विधिसम्मत प्रत्याशा प्रार्थी को न्यायिक पुनर्विलोकन (judicial review) के लिये सुने जाने का अधिकार (locus standi) प्रदान करता है तथा विधिसम्मत प्रत्याशा का सिद्धान्त अधिकतर ऐसे निर्णय के पूर्व उचित सुनवाई तक सीमित है जिसके परिणामस्वरूप किसी वचन के नकारने या वापस लेने की बात होती है। इस सिद्धान्त से प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष कोई प्रत्यक्ष अधिकार प्राप्त नहीं होता है। ऐसी विधिसम्मत प्रत्याशा के संरक्षण की पर्ति आवश्यक नहीं होती है जहाँ कोई लोकहित की अन्यथा आवश्यकता है। दसरे शब्दों में जहाँ किसी व्यक्ति की विधिसम्मत प्रत्याशा की पूर्ति किसी विशिष्ट निर्णय द्वारा नहीं होती है, निर्णय लेने वाले के लिये ऐसी प्रत्याशा से इन्कार करने के लिए कोई अध्यारोही (over-riding) लोकहित दिखाना आवश्यक है।

यदि कोई व्यक्ति अपना दावा विधिसम्मत प्रत्याशा पर आधारित करता है तो उसे सर्वप्रथम सन्तुष्ट करना चाहिए कि आधार है तथा उसे ऐसा दावा करने के लिये सुने जाने का अधिकार (locus standi) है। पाधिकारी द्वारा लिया गया निर्णय मनमानी, अयुक्तियुक्त तथा बिना लोक हित के होना चाहिये। यदि नीति का प्रश्न है. चाहे पुरानी नीति के परिवर्तन का, तो न्यायालय निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं। किसी

18. ए० आई० आर० 1994 एस० सी० 988, 997.

19 तत्रैव पष्ठ 9983; इरुसियन इक्यूपमेंट एण्ड केमिकल्स लि० बनाम पश्चिमी बंगाल राज्य, ए० आई० आर० 1975 एस० सी०266 भी देखें।

20. तत्रैव प० 999; कस्तूरी लाल लक्ष्मी रेड्डी बनाम जम्मू एवं कश्मीर राज्य, ए० आई० आर० 1980 एस० सी० 1992.

मामले में ऐसे तथ्य या परिस्थितियाँ हैं जिनसे विधिसम्मत प्रत्याशा का उदय होता है, प्राथमिक रूप से तथ्य का प्रश्न है। यदि यह परीक्षण सन्तुष्ट हो जाते हैं तथा न्यायालय इस बात से सन्तुष्ट हो जाता है कि मामला विधिसम्मत प्रत्याशा का है, तो अगला प्रश्न यह होगा कि निर्णय के पूर्व सुनवाई का अवसर न देने के परिणामस्वरूप क्या न्याय विफल हुआ है तथा क्या उस आधार पर निर्णय रद्द किया जायेगा। यदि निर्णय रद्द किया जाता है तो अनुतोष क्या दिया जायेगा, कई तथ्यों पर निर्भर करेगा।

संविदात्मक क्षेत्र तथा अन्य राज्य कार्यवाहियों में राज्य तथा इसके परिकरणों (instrumentalities) को संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप कार्य करना है तथा गैर मनमानी (non-arbitrariness) इसका एक विशेष गुण है। लोक विधि में बिना नियन्त्रणों या बन्धनों के कोई विवेक नहीं होता है। एक लोक अधिकारी को शक्तियों के प्रयोग करने का अधिकार केवल लोक हित के लिये होता है। यह उसमें एक दायित्व अधिरोपित करता है कि वह उचित कार्यवाही करे तथा उचित प्रक्रिया अपनाये। प्रत्येक नागरिक की एक विधिसम्मत प्रत्याशा होती है कि राज्य तथा उसके परिकरणों के साथ व्यवहार में उसके साथ उचित व्यवहार किया जायेगा। अत: सभी राज्य कार्यवाहियों में यह आवश्यक तत्व होना चाहिये तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि मनमानी नहीं की गई है। अतः राज्य कार्यवाही में गैर-मनमानी सिद्ध करने के लिये यह आवश्यक है कि युक्तियुक्त या विधिसम्मत प्रत्याशा का उचित ध्यान रखा जाय। किसी व्यक्ति की प्रत्याशा युक्तियुक्त या विधिसम्मत है या नहीं यह तथ्य का प्रश्न है जिसे दावेदार के प्रत्यक्ष ज्ञान या बोध (perception) के अनुरूप निर्धारित नहीं किया जाना है वरन् इसे विशाल लोक हित के अनुसार किया जाना है। विधिसम्मत प्रत्याशा का यह सिद्धान्त हमारे विधि के नियम में आत्मसात हो गया है तथा हमारी विधि प्रणाली में इसी ढंग तथा इसी सीमा में कार्यान्वित होता है। विधि का यह स्पष्टीकरण उच्चतम न्यायालय ने फूड कारपोरेशन आफ इण्डिया बनाम मेसर्स कामधेनु कैटल फूड इन्डस्ट्रीज (Food Corporation of India v. M/s Kamdhenu Cattle Food Industries)22 के वाद में किया।

संविदा विधि का उद्देश्य-संविदा विधि का उद्देश्य यह है कि मनुष्य अपने द्वारा की गई प्रतिज्ञाओं का पालन करे। ऐन्सन (Anson) के अनुसार-“संविदा विधि विधि की वह शाखा है जो उन परिस्थितियों को अवधारित करती है, जिसमें कोई प्रतिज्ञा उस व्यक्ति पर विधिक रूप से आबद्धकर (binding) होगी जिसने (प्रतिज्ञा) की है।” (“That branch of law which determines the circumstances in which a promise shall be legally binding on the person making it.”)23 बहुत प्राचीन समय से यह प्रयास रहा है कि मनुष्य अपने द्वारा की गयी प्रतिज्ञाओं को पूरा करे तथा वर्तमान समय में भी संविदा विधि का यही उद्देश्य है।

भारत में संविदा विधि के विकास का संक्षिप्त इतिहास-यह कहना अनुचित होगा कि भारत में संविदा विधि अंग्रेजों की देन है। यह भी कहना अनुचित होगा कि भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के पूर्व भारत में संविदा विधि नहीं थी। संविदा विधि के मूल तत्व भारत में प्राचीन समय से ही विद्यमान थे तथा उन्हें हिन्द-विधि द्वारा मान्यता प्राप्त थी। प्राचीन समय में संविदा विधि सत्य के पालन पर आधारित थी तथा यह अन्तिम रूप से समाज की धार्मिक धारणाओं से सम्बन्धित थी। मनु-संहिता में ऋण की वसूली पर अत्यधिक जोर दिया गया है। प्रत्येक व्यक्ति अपना पवित्र कर्त्तव्य समझता था कि वह अपने द्वारा लिये गये ऋण का भुगतान करे। लोगों का यह धार्मिक विश्वास था कि यदि कोई व्यक्ति अपने द्वारा लिए गये ऋण का भुगतान किये बिना मर जाये तो उसे घोर नरक भुगतना पड़ेगा। राजा का यह कर्त्तव्य समझा जाता था कि वह लोगों द्वारा की गई प्रतिज्ञाओं का पालन कराये। किसी करार के लिये प्रस्थापना तथा स्वीकृति होने की आवश्यकता को हिन्दू-विधि द्वारा मान्यता प्रदान की गई थी। यह भी स्वीकार किया जाता था कि विक्रय ऋण को संविदा के लिए प्रतिफल आवश्यक था, जबकि दान (Gift) के लिए प्रतिफल आवश्यक नहीं था। हिन्दू

21. ए० आई० आर० 1994 एस० सी० 1019-1020.

22. ए० आई० आर० 1993 एस० सी० 1601, 1604.

23. ऐन्सन्स लॉ ऑफ कान्ट्रैक्ट, तेईसवाँ संस्करण (1969) पृष्ठ 23.

विधि के अन्तर्गत प्रतिभूति (Suretyship) की धारणा तथा ऋण पर ब्याज आदि की धारणा भी प्रचलित थी। बल द्वारा, नाजायज दबाव द्वारा या लोकनीति के विरुद्ध की गयी संविदा विधि द्वारा प्रवर्तनीय नहीं थी या वाघ द्वारा लागू नहीं की जा सकती थी। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि प्राचीन भारत में संविदा-विधि के मूल तत्व विद्यमान थे।

परन्तु यह स्वीकार करना पड़ेगा कि संविदा विधि के विषय में संगतपूर्ण हिन्दू विधिशास्त्र बहुत कम था तथा न्यायालय के निर्णयों की नियमित रिपोर्टिंग न होने के कारण इसका विधिवत् विकास नहीं हो सका था। न्यायिक प्रशासन के सुधार पर विधि-कमीशन ने अपनी चौदहवीं रिपोर्ट में यह कहा था कि हिन्द्र विधिशास्त्र में विश्वसनीय न्यायिक पूर्वोक्तियों का अभाव था, अत: सुचारु रूप से तथा विधिवत् संविदा विधि का विकास न हो सका। लोग आमतौर से धर्मशास्त्र, मनुसंहिता तथा नारद, वृहस्पति, याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों के ग्रन्थों में वर्णित बातों का पालन किया करते थे। विभिन्न समुदायों द्वारा विभिन्न लेखकों की रचनाओं का पालन किया जाता था तथा इस विषय में कोई एकरूपता नहीं थी।

भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना के पश्चात् संविदा विधि इस्लाम की धारणाओं से अत्यधिक प्रभावित हुई। यह सामान्यतया स्वीकार किया जाता है कि मुसलमानों के शासनकाल में संविदा विधि का अधिक विकास हुआ। संविदा के लिये अरबी शब्द ‘अक्द’ (Aqd) है जिसका अर्थ है ‘बंधन’। मुस्लिम विधिशास्त्र में संविदा के आवश्यक तत्वों, जैसे प्रस्थापना तथा स्वीकृति, मस्तिष्कों का मिलान (Meeting of the minds) आदि को मान्यता प्रदान की गयी थी। परन्तु मुस्लिम विधिशास्त्र में भी नियमित तथा विधिवत रूप से न्यायिक निर्णयों की रिपोर्टिंग का अभाव था। औरंगजेब के शासन-काल में फतवा-ए-आलमगीरी को छोड़कर कोई नियमित न्यायिक निर्णयों की रिपोर्ट करने की प्रणाली नहीं थी।

भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना के पश्चात् अठारहवीं शताब्दी के चार्टरों द्वारा कलकत्ता, मद्रास तथा बम्बई के प्रेसीडेंसी शहरों में ब्रिटिश सामान्य विधि तथा अधिनियम (Statute) विधि को लाग किया गया। यह मतभेद का विषय है कि भारत में अंग्रेजी विधि 1726 के द्वारा अथवा इस चार्टर के सहित 1753 तथा 1774 के चार्टरों द्वारा आया। उपर्युक्त चार्टरों में यह प्रावधान था कि ब्रिटिश सामान्य विधि तथा अधिनियम विधि को तभी लागू किया जाये जब वह भारतीय परिस्थितियों में लागू होने योग्य हो। परन्तु अधिकतर न्यायाधीश ब्रिटिशवासी थे और उन्होंने ब्रिटिश विधि को लागू करते समय स्थानीय भारतीयों की कठिनाइयों तथा असुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया। स्थानीय निवासियों की सहायता के लिये 1781 में एक अधिनियम पारित किया गया जिसके अनुसार संविदा से सम्बन्धित हिन्दुओं के सभी मामले हिन्दू विधि तथा प्रथाओ के अनुसार तथा मुसलमानों के सभी मामले मुस्लिम-विधि तथा प्रथाओं द्वारा निर्णीत किये जाने चाहिये थे। यदि एक पक्षकार हिन्दू तथा दूसरा मुसलमान हो तो प्रतिवादी की विधि लागू की जानी चाहिये। अतःब्राटश शासन-काल म हिन्दुआक मामले हिन्दूवाध तथा प्रथाओद्वारा निणीत किये जाने लगे जबकि मस्लिम शासन-काल में उनके मामले मुस्लिम-विधि तथा प्रथाओं द्वारा निर्णीत होते थे। इस प्रकार ब्रिटिश शासन-काल में हिन्दुओं तथा मुसलमानों पर संविदा विधि के विषय में उनकी अपनी-अपनी विधि तथा प्रथायें लागू की जाने लगीं। यह स्थिति भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के पारित होने के समय तक चली। हिन्दुओं के लिये हिन्दू तथा मुसलमानों के लिए मुस्लिम विधि लागू होने से नई समस्यायें उत्पन्न हुई। यह आवश्यकता महसूस की जाने लगी कि सारे देश के लिए विधि-प्रणाली में एकरूपता होनी चाहिये। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए 1833 के चार्टर द्वारा एक विधि-कमीशन की नियुक्ति की गई जो सम्पूर्ण भारत में लाग की जाने वाली सामान्य विधि के विषय में अपनी रिपोर्ट दे। तीसरे विधि-कमीशन की दूसरी रिपोर्ट संविटा विधि से सम्बन्धित थी। विधि-कमिश्नरों ने 1866 में एक प्ररूप प्रस्तुत किया जिसे कछ संशोधनों के पचात अंतिम रूप से 1872 में विधायिनी ने भारतीय संविदा अधिनियम के रूप में स्वीकार कर लिया। इस प्रकार 1872 में संविदा विधि के विषय में सम्पूर्ण भारत में एक ही विधि लागू हो गयी।

अन्त में यह नोट करना आवश्यक है कि भारतीय संविदा अधिनियम विधि के सभी पहलओं तथा ग्रेगों के विषय में पूर्ण नहीं है। संविदा से सम्बन्धित कुछ और भी अधिनियम हैं जिनमें निम्नलिखित विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं-

(1) भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932);

(2) भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1956 (Indian Companies Act, 1956):

(3) माल-विक्रय अधिनियम, 1930 (The Sale of Goods Act, 1930);

(4) विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (The Specific Relief Act, 1905);

(5) परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (The Negotiable Instruments Act, 1881);

(6) भारतीय बीमा अधिनियम, 1938 (The Indian Insurance Act, 1958),

(7) भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (The Indian Trusts Act, 1882);

उपयुक्त सूची पूर्ण न होकर केवल दृष्टान्त के रूप में है। इसके अतिरिक्त भी संविदा-सम्बन्धी कई अधिनियम हैं।

यहाँ पर यह नोट करना आवश्यक है कि यद्यपि भारतीय संविदा अधिनियम संविदा विधि के सभी पहलुओं एवं क्षेत्रों में पूर्ण नहीं है, परन्तु जिस सीमा तक यह किसी विषय में प्रावधान करता है उस विषय में यह पूर्ण है तथा प्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी विधि या उसके निर्णयों को लागू करने की अनुमति नहीं है। केवल इसके प्रावधानों के निर्वचन हेतु अंग्रेजी विधि की सहायता ली जा सकता है।24

पुस्तक तथा विषय की विवेचना के सम्बन्ध में कुछ शब्द—पुस्तक को दो भागों में विभाजित किया गया है.—(1) सामान्य सिद्धान्त (General Principles), तथा (2) विशिष्ट संविदायें (Specific Contracts) | संविदा के सामान्य सिद्धान्त संविदा अधिनियम की धारा 1 से धारा 75 में वर्णित हैं। जैसा कि पहले स्पष्ट किया गया है कि विधि द्वारा प्रवर्तनीय करार को संविदा कहते हैं। अत: सर्वप्रथम विचारणीय है कि करार का निर्माण कैसे होता है? करार के निर्माण में मख्य दो चरण या कदम (प्रस्ताव तथा स्वीकृति) होते हैं। करार के लिये सामान्यतया दो पक्षकार होते हैं–एक पक्षकार प्रस्ताव करता है तथा दूसरा पक्षकार उसे स्वीकार करता है। दूसरे शब्दों में जब प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो वह करार बन जाता ह। अत: प्रथम अध्याय में संविदा के विषय में कुछ प्रारम्भिक बातों की विवेचना के पश्चात् द्वितीय अध्याय में ‘प्रस्ताव की विस्तारपूर्वक विवेचना की गई है। तीसरे अध्याय में स्वीकृति’ के आवश्यक तत्व तथा अन्य सम्बन्धित सिद्धान्तों की विवेचना की गई है।

प्रस्ताव की स्वीकृति होने पर वह एक करार में परिणत हो जाता है। परन्तु प्रत्येक करार संविदा नहीं होता है. यद्यपि संविदा के लिए करार होना आवश्यक होता है। केवल वही करार संविदा हो सकते हैं जो विधि द्वारा प्रवर्तनीय होते हैं। किसी करार को विधि द्वारा प्रवर्तनीय होने के लिए कुछ आवश्यक तत्वों की आवश्यकता होती है। यह आवश्यक तत्व निम्नलिखित हैं–(1) प्रतिफल, (2) उद्देश्य की वेधता, (3) संविदा करने की क्षमता, (4) स्वतंत्र सम्मति, (5) जो अन्यथा शून्य घोषित नहीं किये गये हैं। चूंकि कोई करार वैध संविदा में तभी परिणत हो सकता है जब कि उसमें उपर्युक्त आवश्यक तत्व हों। अध्याय 4 से अध्याय 8 में इन आवश्यक तत्वों की विस्तारपूर्वक विवेचना की गई है। इसके पश्चात् अध्याय 9 में “समाश्रित संविदाओं’ से सम्बन्धित सिद्धान्तों को संक्षेप में स्पष्ट किया गया है।

वैध संविदा के होने के पश्चात् अगला महत्वपूर्ण प्रश्न उसके उन्मोचन (Discharge) का होता है। संविदाओं के उन्मोचन का सबसे महत्वपूर्ण ढंग उसके पालन द्वारा होता है। अत: अध्याय 10 में संविदाओं के पालन’ से सम्बन्धित प्रावधानों की समीक्षा की गयी है। यदि किन्हीं विशेष कारणों से किसी संविदा का पालन नहीं हो सकता है, या पक्षकार उसका पालन नहीं करते हैं तो संविदा का उन्मोचन अन्य ढंगों से हो सकता है। इन ढंगों की विस्तारपूर्वक विवेचना ‘संविदाओं का उन्मोचन’ नामक अगले अध्याय में की गई है।

कभी-कभी ऐसा होता है कि पक्षकार आपस में औपचारिक रूप से संविदा नहीं करते हैं, परन्तु फिर भी उनमें ऐसे सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं जो ‘संविदा-सदृश’ होते हैं। अत: इन सम्बन्धों तथा उनसे उत्पन्न होने वाले उत्तरदायित्वों की समीक्षा अध्याय 12 में की गयी है।

जब विधि कोई अधिकार प्रदान करती है तो उसके लिए उपचार का भी प्रावधान करती है। बिना उपचार के अधिकार का कोई महत्व नहीं होता। यही बात संविदा-विधि के लिए भी उचित प्रतीत होती है। भारतीय संविदा अधिनियम में वर्णित ‘संविदा के उल्लंघन के लिए उपचार’ से सम्बन्धित प्रावधानों की विस्तारपूर्वक विवेचना अध्याय 14 में की गयी है।

पाठकों की सुविधा के लिए तथा विवेचना को स्पष्ट करने हेतु एक चार्ट प्रस्तुत किया जा रहा है।

24. देखें : पश्चिमी बंगाल राज्य बनाम बी० के० मण्डल (1962)2 एस० सी० आर० 876, 894.

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