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LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 8 Notes

 

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अध्याय 8 (Chapter 8)

समाजशास्त्रीय विचारधार (Sociological School)

LLB Notes Study Material

 समाजशास्त्रीय विचारधारा का प्रादुर्भाव विधि के क्षेत्र में वर्तमान युग की सबसे बड़ी उपलब्धि है। विधि की समाजशास्त्रीय पद्धति के विषय में विधिशास्त्रियों के विचार भिन्न-भिन्न होते हुए भी प्राय: सभी ने यह स्वीकार किया है कि इस पद्धति में सामाजिक पहलू पर सबसे अधिक महत्व दिया गया है तथा विधि के अमूर्त सिद्धान्तों की ओर बिल्कुल ही ध्यान नहीं दिया गया है

विधिशास्त्र की समाजशास्त्रीय विचारधारा के आधारभूत सिद्धान्तों की विवेचना करने के पहले इस पद्धति के विकास के कारणों का उल्लेख कर देना उचित होगा। उन्नीसवीं शती के अन्तिम तथा बीसवीं शती के प्रारम्भिक वर्षों में हुए सामाजिक परिवर्तनों ने विधिशास्त्रियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया कि विधि के प्रति अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिये। उन्होंने यह अनुभव किया कि विधि को सामाजिक आवश्यकताओं से अलग नहीं रखा जा सकता है। विधि के प्रति विधिशास्त्रियों के विचारों में इस परिवर्तन के अनेक कारण थे जिनमें जनसंख्या में वृद्धि, औद्योगीकरण तथा समाज की प्रगति आदि प्रमुख थे। इसके अतिरिक्त विधिशास्त्र की ऐतिहासिक पद्धति द्वारा इस बात पर अधिक जोर दिया गया कि विधि का उन सामाजिक परिस्थितियों से गहरा सम्बन्ध है जिनमें वह विकसित हुई है। उन्नीसवीं सदी के अन्तिम चरण में राज्य द्वारा स्वास्थ्य, जन-कल्याण, शिक्षा, अर्थ-व्यवस्था आदि जैसे वैयक्तिक क्रिया-कलापों में रुचि दर्शायी जाने के फलस्वरूप इन कार्यों को विधि द्वारा नियंत्रित किये जाने की आवश्यकता अनुभव की गई। परिणामतः विधि को सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना आवश्यक हुआ। इसी अवधि में विधिशास्त्रियों का ध्यान तत्कालीन विश्लेषणात्मक पद्धति (Analytical School) की कमियों की ओर आकृष्ट हुआ जो तत्कालीन नई समस्याओं को हल करने में विफल रही थीं। अतः विधि के प्रति अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया गया जिसके परिणामस्वरूप समाजशास्त्रीय विचारधारा का सूत्रपात हुआ।

समाजशास्त्रीय विचारधारा

विधि के प्रति समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण अपनाने वाले विधिशास्त्री विधि के उद्देश्य तथा नैतिक पहलू पर अधिक ध्यान नहीं देते हैं। उनके अनुसार विधिशास्त्र का अध्ययन ऐसी पद्धति से किया जाना चाहिए जिससे ‘सामुदायिक जीवन’ के अन्तर्गत सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों और संव्यवहारों को विनियमित किया जा सके। दूसरे शब्दों में, इस पद्धति के अन्तर्गत विधि के क्रियात्मक (functional) स्वरूप की विवेचना की जाती है, अर्थात् विधि के विभिन्न सिद्धान्तों के वास्तविक कार्यों का क्रमिक एवं व्यावहारिक रीति से अध्ययन किया जाता है। यही कारण है कि इस पद्धति को ‘क्रियाशील विधि’ (law in motion) माना गया है। जुलियस स्टोन ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘दि प्रॉविन्स एण्ड फंक्शन ऑफ लॉ’ में लिखा है कि समाजशास्त्र इस ओर विशेष ध्यान देता है कि विधि का मनुष्यों पर क्या प्रभाव पड़ता है और मनष्यों का विधि पर क्या प्रभाव पड़ता है। यह पद्धति ‘विधि’ को सामाजिक प्रगति का साधन मानती है इसलिए अमेरिकन विधिशास्त्री डीन रास्को पाउण्ड (Dean Roscoe Pound) ने इसे ”सामाजिक यांत्रिकी” (Social Engineering) की संज्ञा दी है।  

विधिशास्त्र की समाजशास्त्रीय पद्धति के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए सर जॉन सॉमण्ड (Salmond) कहते हैं कि यद्यपि विधिशास्त्र और समाजशास्त्र में काफी भिन्नता है फिर भी दोनों में अनेक

1.  रास्को पाउण्ड : दि स्कोप एण्ड परपज ऑफ सोशिओलॉजिकल ज्यूरिसपूडेंस, 25 हॉर्वर्ड लॉ रिव्यू, 489 (1911).

बातों में समानता भी है। उनके अनुसार समाजशास्त्र के अन्तर्गत यह अध्ययन किया जाता है कि अमुक विधि का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है? समाजशास्त्री यह भी अध्ययन करते हैं कि अमुक विधि समाज में किस सीमा तक ग्राह्य है और वह अपने उद्देश्यों में कहाँ तक सफल हुई है। समाजशास्त्री इस ओर भी ध्यान देते हैं। कि विधि कैसी होनी चाहिए क्योंकि वे आशा करते हैं कि विधि के माध्यम से समाज में आवश्यक सुधार किये जाएँ। इसके विपरीत विश्लेषणात्मक विधिशास्त्री अपना अध्ययन विधि के वास्तविक रूप पर ही केन्द्रित करते हैं। उन्होंने इस ओर ध्यान देना आवश्यक नहीं समझा कि विधि का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति किन परिस्थितियों में पड़कर विधि के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य हुआ है। वे तो केवल विधि के यथार्थ स्वरूप को ही स्वीकार करते हैं और तदनुसार विधि का अध्ययन करते हैं। इस प्रकार समाजशास्त्री और विश्लेषणात्मक विधिशास्त्री की विधि-सम्बन्धी धारणाओं में भिन्नता होते हुए भी दोनों ही इस उद्देश्य को लेकर चलते हैं कि विधि को समाज के अनुकूल बनाते हुए उसमें सुधार किये जाएँ। दोनों ही ‘मानव’ को अपने अध्ययन का आधार मानते हैं। दोनों में अन्तर केवल यह है कि समाजशास्त्री अपना ध्यान इस ओर केद्रत करता है कि विधि का मानव तथा मानव का विधि पर क्या प्रभाव पड़ता है जबकि विश्लेषणात्मक विधिशास्त्री मानव-समाज में लागू होने वाली विधि के उस पहलू का अध्ययन करता है जो समाज में लोगों के पारस्परिक संव्यवहारों को नियोजित करने का कार्य करता है।

समाजशास्त्रीय विचारधारा के प्रमुख समर्थक  

विधि की समाजशास्त्रीय शाखा के विकास में अनेक विधिशास्त्रियों का योगदान रहा है जिनमें बेन्थम, कॉम्टे, इहरिंग, वेबर, ड्यूगिट, इहलिंच, मान्टेस्क्यू, जर्मी, रास्को पाउण्ड आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। समाजशस्त्रीय विधिवेत्ताओं का मूल योगदान यह रहा है कि उन्होंने सामाजिक परिस्थितियों का विश्लेषण करके विधि-प्रशासन को उनके अनुकूल बनाए जाने पर बल दिया क्योंकि उनकी निश्चित धारणा है कि विधि सामाजिक परिवर्तनों का एक सशक्त साधन है।

मान्टेस्क्यू (1689-1755 )

विधिशास्त्र की समाजशास्त्रीय विचारधारा का सूत्रपात करने का वास्तविक श्रेय फ्रांसीसी विचारक मान्टेस्क्यू (Montesquieu) को दिया जाना चाहिये। उन्होंने विधि को प्रभावित करने वाली विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन करने के पश्चात् यह तर्क प्रस्तुत किया कि किसी भी देश की राष्ट्रीय विधि उस देश की सामाजिक परिस्थितियों, मूल्यों एवं मान्यताओं पर आधारित होनी चाहिये। उनका मानना था कि विभिन्न देशों की सामाजिक, भौगोलिक एवं भौतिक परिस्थितियाँ भिन्न-भिन्न होने के कारण सभी जगह एक समान विधि लागू नहीं की जा सकती है। अतः विधियों के निर्माण में देश-विदेश की सामाजिक परिस्थितियों पर विचार किया जाना आवश्यक है।

मान्टेस्क्यू के उपर्युक्त विचारों मात्र के आधार पर उन्हें विधिशास्त्र की समाजशास्त्रीय शाखा का जनक कहना तो उचित नहीं होगा लेकिन इस शाखा के सूत्रपात का पूर्वगामी (fore-runner of sociological jurisprudence) अवश्य माना जा सकता है। उन्होंने किसी देश की सामाजिक संरचना जानने के लिये उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन किये जाने की आवश्यकता जताई तथा उस पर आर्थिक कारकों के प्रभाव पर विचार करने के पश्चात् ही विधि निर्मित किये जाने पर बल दिया है।3

जर्मी बेन्थम (Jeremy Bentham : 1748-1832)

वस्तुत: बेन्थम की गणना विधि की विश्लेषणात्मक शाखा के प्रवर्तकों में की जाती है फिर भी विधि की समाजशास्त्रीय पद्धति का बीजारोपण इनकी विचार-शैली से ही प्रारम्भ होता है। बेन्थम मूलत: व्यक्तिवादी विचारधारा के समर्थक थे तथा उनके विधिक विचार उपयोगितावाद पर आधारित थे। उनके उपयोगितावाद

2. डायस एण्ड ह्यज : ज्यूरिसपूडेन्स (तृतीय संस्करण), पृ० 409.

3. मान्टेस्क्यू द्वारा लिखित दि स्प्रिट ऑफ लॉ (L’Esprit des lois).

का मूल आधार यह था कि मनुष्य के आचरणों को दु:ख तथा सुख (Pain and Pleasure) की अनुभूति के आधार पर आँका जाना चाहिए; अर्थात् यह देखना चाहिए कि मनुष्य के अमुक आचरण से सुख में वृद्धि हुई । या दुख में; अतः बेन्थम ने इस बात पर जोर दिया कि विधायन (Legislation) का प्रमुख उद्देश्य यह होना चाहिए कि विधि द्वारा मानव सुख में वृद्धि हो। इसी दृष्टिकोण से बेन्थम को अपने समय का एक महान् विधि सधारक (Law Reformer) माना गया है। उन्होंने व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक कल्याण में जो संतुलन कायम रखा उससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने सामाजिक हितों के संवर्धन को ही विधि का मुख्य उद्देश्य माना था।

बेन्थम ने ‘अधिकाधिक लोगों के अधिकाधिक सुख’4 को ही विधायन का अंतिम लक्ष्य माना। उन्होंने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ ‘थियोरी ऑफ लेजिस्लेशन’ में लिखा है कि विधि का कार्य है कि वह लोगों के अधिकाधिक सुख के लिए निम्नलिखित की समुचित व्यवस्था करे

(1) आजीविका के निर्वाह (Subsistance),

(2) प्रचुरता (abundance),

(3) समता को प्रोत्साहन (encourage equality), तथा

(4) सुरक्षा का रखरखाव (Maintenance of security)

इन चारों में बेन्थम ने सुरक्षा को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना तथा राज्य से यह अपेक्षा की कि कानूनों द्वारा वह प्रजा की सुरक्षा सुनिश्चित करे ताकि उनके सुख में संवर्धन हो सके। बेन्थम के अनुसार यदि सुरक्षा व समता में द्वंद्व (टकराव) की स्थिति उत्पन्न हो जाए, तो सुरक्षा को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि निर्वाह, प्रचुरता (बहुलता) तथा सुख आदि सभी सुरक्षा पर निर्भर करते हैं। उनका मानना था कि समाज में पूर्ण समता स्थापित करना लगभग असंभव है तथा विधायन केवल असमानता को कम करने में सहायक हो सकता है, लेकिन उसे पूर्णत: समाप्त नहीं कर सकता।

सम्भवतः बेन्थम के उपयोगितावाद के सिद्धान्त का सबसे गंभीर दोष यह था कि उन्होंने विधायकों की विधि-निर्माण शक्ति पर आवश्यकता से अधिक विश्वास रखा तथा विधि में वैयक्तिक स्वविवेक (discretion) तथा नमनशीलता (flexibility) की अनदेखी की। बेन्थम ने वैयक्तिक हितों तथा सामुदायिक हितों में संतुलन बनाये रखे जाने पर भी विशेष ध्यान दिया क्योंकि वे आर्थिक क्षेत्र में अहस्तक्षेप (Laissez Faire) के सिद्धान्त के पोषक थे। परन्तु निवेदित है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस नीति का कोई महत्व नहीं रह गया है क्योंकि आज विश्व समाजवादी संरचना की ओर अग्रसर है।

ऑगस्ट कोम्टे (August Compte : 1786-1857)  

विधिशास्त्र की समाजशास्त्रीय विचारधारा के विकास में ऑगस्ट कोम्टे की भूमिका विशेष उल्लेखनीय रही है। वे ऐसे प्रथम विधि-विचारक थे जिन्होंने ‘समाजशास्त्र’ (Sociology) को एक स्वतन्त्र निकाय के रूप में स्थापित किया।

कोम्टे समाजशास्त्रीय अध्ययन को ‘विज्ञान’ के रूप में परिभाषित करने वाले प्रथम व्यक्ति थे। उन्नीसवीं शताब्दी में हुई वैज्ञानिक प्रगति के कारण लोगों में यह धारणा बन गयी थी कि मानवीय आचरण का निर्धारण भी वैज्ञानिक माध्यम से ही किया जाना चाहिये। इस धारणा से प्रभावित होकर ऑगस्ट कोम्टे ने एक नई विचारधारा को जन्म दिया जिसे उन्होंने वैज्ञानिक प्रमाणवाद’ (Scientific Positivism) कहा है।

कोम्टे का वैज्ञानिक प्रमाणवाद अनुभववादी (empirical) पद्धति पर आधारित है न कि अनुभूतिवादी (metaphysical) पद्धति पर। उनके मतानुसार ज्ञान का प्रत्येक बिम्ब पूर्व कल्पित विचारों पर आधारित न

4. Greatest happiness of the greatest number is the ultimate end of legislation.—Bentham.

5. बार्स : एन इन्ट्रोडक्शन टु दि हिस्ट्री ऑफ सोशियोलॉजी, पृ० 3.

होकर अनभव और निरीक्षण पर आधारित होना चाहिये। सामाजिक विकास के प्रति इस सिद्धान्त को ला करते हुए कोम्टे ने समस्त मानव-इतिहास को तीन चरणों में विभाजित किया। उनके अनुसार प्रथम चरण मानवीय मस्तिष्क ने प्राकृतिक नियमों की व्याख्या दैवी शक्ति के रूप में की। द्वितीय चरण में दैवी शक्ति का मानवीकरण हुआ जो कार्य-कारण के सम्बन्धों के रूप में व्यक्त किया गया। मानवीय इतिहास के तृतीय चरण में प्राकृतिक शक्तियों की व्याख्या तथ्यगत अनुभव और परीक्षण के आधार पर की जाने लगी। कोम्टे का निश्चित मत था कि सही वैज्ञानिक सिद्धान्तों के मार्गदर्शन से ही मानव समाज का सुधार और विकास सुचारु रूप से हो सकता है ।6

हर्बर्ट स्पेन्सर (Herbert Spencer : 1820-1903)

ब्रिटिश समाजशास्त्री हर्बर्ट स्पेन्सर ने उद्भव के सिद्धान्त (Theory of Evolution) के आधार पर यह साबित करने का प्रयास किया कि समाज का उद्भव अति साधारण स्थिति से प्रारम्भ होकर जटिलता की ओर अग्रसर हुआ है। उन्होंने इस आधार पर विधि के चार स्रोत निरूपित किये|

  • दैवीय विधि (Divine Law) जिसे धर्म का समर्थन प्राप्त था;  
  • भूतकालीन राजनेताओं के व्यादेश (Injunction of Past leaders);
  • शासक की इच्छा शक्ति (Will of the rulers) तथा |
  • समाज का सामूहिक मत (Collective opinion of the society)।।

उन्होंने दैवी विधि को मानव निर्मित विधि से पृथक् बताते हुये अभिकथन किया कि मानव द्वारा निर्मित विधि प्राय: अर्वाचीन काल से सुस्थापित रूढ़ियों पर आधारित होती है। विधि का मुख्य उद्देश्य समाज में मानवीय टकरावों को समाप्त करना है ताकि सामाजिक प्रगति हो सके। सी० के० ऐलन के अनुसार स्पेन्सर ने अपने जैविक सिद्धान्त के आधार पर सतत यह साबित करने का प्रयास किया कि मानव के अस्तित्व तथा सामाजिक विकास में घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके फलस्वरूप कालान्तर में सामाजिक विधिक शोध (Sociological research) को एक नई दिशा प्राप्त हुयी। रूडोल्फ वान इहरिंग (Rudolf Von Ihering : 1818-1892) ।

रूडोल्फ वॉन इहरिंग को वर्तमान समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र का जनक माना गया है। उनके अनुसार विधि का उद्देश्य व्यक्तिगत हितों को एकरूपता देते हुए ‘सामाजिक हितों को सुरक्षा प्रदान करना और उन्हें आगे बढ़ाना है। उनका तर्क है कि समाज में व्यक्तिगत और सामाजिक हितों के बीच परस्पर द्वन्द्व की स्थिति प्राय: उत्पन्न होती रहती है। अत: विधि का मुख्य कार्य है इन दोनों प्रकार के हितों में समन्वय बनाए रखते हुए टकराव की स्थिति को टालना। इहरिंग के अनुसार यह समन्वय पारितोषिक (reward) और प्रपीड़न (coercion) के सिद्धान्तों द्वारा स्थापित किया जा सकता है। विधि को परिभाषित करते हुए इहरिंग कहते हैं। कि ‘‘विधि सामाजिक दशाओं का यौगिक स्वरूप है जिसे बाह्य विवशता के माध्यम से राज्य की शक्ति द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।”8

इहरिंग का ‘सामाजिक हित’ (Social interest) उन्हें उपयोगितावाद के प्रणेता बेन्थम से सम्बद्ध करता है जबकि उनका ‘राज्य की शक्ति का सिद्धान्त’ उन्हें ऑस्टिन के निकट लाता है। उनके विधिक विचारों से यह स्पष्ट है कि वे विश्लेषणात्मक विधियों की प्रभावोत्पादकता को अस्वीकार नहीं करते बल्कि उनकी कमियों की ओर ध्यान आकर्षित कराना चाहते हैं। निवेदित है कि अपने सामाजिक उपयोगितावाद (Social

6. फ्रीडमैन एल० एम० : लीगल थ्योरी (5वाँ संस्करण) पृ० 244.

7. सी० के० ऐलन (Allen) : लॉ इन दिन मेकिंग (7वां संस्करण, 1964 पृ० 85).

8. I. Husik: Law as a means to an End. p. 380. This is an English translation of Ihering’s Der Zweck in Reclit.

Utilitarianism) के माध्यम से इहरिंग ने  विधिवेत्ताओं का ध्यान समाज और विधि के बीच समन्वय स्थापित  किये जाने की आवश्यकता की ओर आकृष्ट किया।

इहरिंग ने विधि को सामाजिक हितों को साध्य करने का साधन माना है। इस प्रकार वे विधि को एक साधन मात्र निरूपित करते हैं जिसका प्रयोग राज्य द्वारा लोगों के हितों के टकराव के निवारण हेतु किया जाता है। इस प्रकार विधि में राज्य की सुनियोजित प्रपीड़न शक्ति परोक्षत: अन्तर्विष्ट रहती है । तथापि विधि का निर्माण  पतिशोध के उद्देश्य से नहीं किया जाना चाहिए। इहरिंग ने सामाजिक लक्ष्य की प्राप्ति हेतु आवश्यक माना है परंतु वह प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त पर आधारित नहीं होना चाहिए। विधि का मुख्य उद्देश्य मानव केवैयक्तिक हित तथा सामाजिक हित में सामंजस्य स्थापित करना है।

तथा इहरिंग का स्पष्ट मत था कि सामाजिक नियन्त्रण के लिये विधि एकमात्र साधन न होकर जलवाय, भागोलिक स्थिति, व्यक्ति की मनोदशा आदि जैसे अनेक अन्य कारक भी सामाजिक नियन्त्रण को। उभावित करते हैं। मानव के सामाजिक जीवन के केवल कुछ ही पहलू जैसे कराधान (taxation) राजस्व evenue) है जिन्हें केवल कानून या विधि द्वारा ही नियन्त्रित रखा जा सकता है। बेन्थम की भांति इहरिंग ने भी हितों (Interests) को सुख और दु:ख के आधार पर परिभाषित किया है। इहरिंग ने दण्ड को सामाजिक हित की सं क्षा के लिये आवश्यक साधन के रूप में स्वीकार किया है। उनके विचार से विधि सामाजिक हितों के संरक्षण का एक साधन मात्र है।9

विधिशास्त्र में इहरिंग के योगदान को स्वीकारते हुये फ्रीडमेन ने उन्हें आधुनिक सामाजिक विधिशास्त्र का जनक माना है जिससे प्रेरणा लेते हुये विभिन्न देशों ने तुलनात्मक पद्धति अपनाते हुये अपनी देशीय विधियों का स्थानीय सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार विकास किया। इहरिंग का मानना था कि विधि व्यक्तियों के लिए निर्मित न होकर समग्र समाज के लिये निर्मित की जाती है।

विधिशास्त्रियों ने इहरिंग की विधि सम्बन्धी विचारधारा का दो मुख्य आधारों पर खंडन किया है। प्रथम उनका यह कथन कि विधि का कार्य समाज के व्यक्तियों के विभिन्न हितों में टकराव का निवारण करना है, समस्या की ओर इंगित करना है न कि इसके समाधान की ओर। दूसरा यह कि इहरिंग का ‘सामाजिक हित (theory of social purpose) का सिद्धान्त वस्तुत: मानव इच्छाओं को संरक्षित करता है न कि उनके हितों को। परन्तु इस आलोचना से अनेक विधिज्ञों ने असहमति दर्शाते हुये अभिकथन किया है इनसे विधि-क्षेत्र में इहरिंग के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता है।

लिओन ड्यूगिट (Leon Duguit : 1859-1928)

फ्रांस के विख्यात विधिशास्त्री लिओन ड्यूगिट बोर्डियक्स विश्वविद्यालय में संवैधानिक विधि के प्राध्यापक थे। उन्होंने विश्लेषणात्मक विधिशास्त्र की संप्रभुता सम्बन्धी धारणा तथा विधि के आदेशात्मक स्वरूप का खण्डन किया। अपनी लॉ इन दि माडर्न स्टेट (Law in the Modern State) नामक कृति में उन्होंने लिखा है कि संप्रभुता की धारणा के स्थान पर जन-सेवा (Public Service) के विचार को महत्व दिया जाना चाहिये। वर्तमान राज्य के सिद्धान्त का मूल आधार ‘जन सेवा’ है।

ड्यूगिट का सामाजिक समेकताका सिद्धान्त (Duguit’s Principle of Social Solidarity)

ड्यूगिट के अनुसार समाज का सर्वोच्च लक्ष्य यह है कि मनुष्य एक दूसरे के सहयोग से सुखमय जीवन की ओर अग्रसर हो। उनका विचार है कि वर्तमान समय में मनुष्य के एकल जीवन (isolated life) की परिकल्पना करना व्यर्थ है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनुष्य को अन्य व्यक्तियों के सहयोग की आवश्यकता होती है। अत: समाज के सदस्य के रूप में मानव की सामाजिक परस्पर निर्भरता (social interdependence) कोरी कल्पना मात्र न होकर एक वास्तविकता है। मनुष्य के सभी क्रिया-कलाप परस्पर सहयोग की ओर

9. Ihring considered law as a means to an end, the end being protection of social interest.

लक्षित होने चाहिए। समाज में मनुष्य की परस्पर निर्भरता को ड्यूगिट ने ‘सामाजिक समेकता’ (social solidarity) कहा है।

उल्लेखनीय है कि ड्यूगिट की ‘‘सामाजिक समेकता” की कल्पना कोम्टे तथा दुर्चीम (Durkheim) के विधि दर्शन पर आधारित थी। उन्होंने यह प्रयास किया कि सामाजिक एकता” को एक निर्विवाद तथ्य के रूप में मान्यता देने का कार्य वैज्ञानिक रीति से किया जाए और इसकी पुष्टि में प्रस्तुत किये गये सभी विचार विवाद रहित हों, आदर्शवादिता से परे हों तथा धार्मिक या अनुभूतिपरक (metaphysical) प्रभावों से मुक्त हों।

ड्यूगिट के सामाजिक समेकता’ के सिद्धान्त के अनुसार राज्य को मानव संगठन का एक प्रकार मात्र माना गया है। राज्य का अस्तित्व तभी तक उचित है जब तक कि वह ‘सामाजिक समेकता’ को बढ़ाता है। अतः यदि राज्य की गतिविधियाँ ‘सामाजिक समेकता के प्रतिकूल हैं, तो प्रजा का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह ऐसे राज्य के विरुद्ध विद्रोह करे। इस प्रकार ड्यूगिट न तो राज्य के व्यक्तित्व (personality) में विश्वास करते हैं और न उसकी शक्ति के केन्द्रीकरण में। अपने सिद्धान्त को तथ्य-अनुभव (empricism) पर आधारित करते हुए ड्यूगिट मानव के वैयक्तिक अधिकारों को अस्वीकार करते हैं। उनके अनुसार मनुष्य केवल एक ही अधिकार धारण करता है, वह अधिकार है अपने कर्तव्य का निरन्तर पालन करने का अधिकार।”

ड्यूगिट के मतानुसार विधि को अधिकारों का समूह नहीं माना जाना चाहिए। यदि समाज के व्यक्ति का कोई अधिकार है तो केवल यह है कि वह अपने कर्तव्यों का पालन करे। विधि आवश्यक रूप से एक ऐसी सामाजिक वास्तविकता है जिसका संबंध व्यक्तियों के बीच संबंधों को नियंत्रित रखना है।

ड्यूगिट के विधिक दर्शन (Legal philosophy) को उसके द्वारा प्रतिपादित सामाजिक समेकता’ के सिद्धान्त के आधार पर सार-संक्षेप में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है

(1) उन्होंने राज्य की सम्प्रभुता को नकारते हुये यह स्पष्ट किया कि राज्य शासन कर्ता या शासन करने वाले व्यक्तियों की इच्छा का प्रतीक मात्र है।

(2) राज्य की एकता (Unity of State) सामूहिक संघवाद के समनुरूप नहीं है, अर्थात्, ये दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं।

(3) विधि केवल उन कर्तव्यों का द्योतक है जिनका अनुपालन किया जाना राज्य के व्यक्तियों से अपेक्षित है। उदाहरणार्थ, जातिवाद को प्रतिबन्धित करने वाले विधि द्वारा सामाजिक समेकता का संवर्द्धन होता है।

(4) समाज की इकाई होने के नाते व्यक्ति एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं, अर्थात् समाज से अलग-थलग हो जाने की दशा में उसका व्यक्तित्व ही समाप्तप्राय हो जायेगा।

(5) उन्होंने तीन प्रकार की निर्माणकारी विधियों (formative laws) को अधिमान्यता दी है, सम्पत्ति विधि, स्वतन्त्र संविदा विधि तथा दोषपूर्ण कृत्यों के लिये दायित्व सम्बन्धी विधि।

(6) सामाजिक समेकता लोकमत (Public opinion) द्वारा अभिव्यक्त होती है।

(7) पब्लिक और प्राइवेट विधि के विभेद को अस्वीकार करते हुये ड्यूगिट कहते हैं कि इन सभी विधियों का एकमात्र उद्देश्य सामाजिक समेकता को सुनिश्चित करना है। विधि में अधिकारों के अस्तित्व का कोई महत्व न होकर केवल कर्तव्य बोध ही लोकहित का संवर्धन कर सकता है।

(8) उनके विचार से शनैः शनै: राज्य का विघटन होना निश्चित है जिनके स्थान पर सामूहिक संगठन (Collective associations) सामाजिक हित के लिये कार्य करेंगे।

ड्यूगिट के सिद्धान्त की समीक्षा

ड्यूगिट के विधिक सिद्धान्त की समीक्षा निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर करना उचित होगा

(1) डयुगिट ने अपने सामाजिक समेकता के सिद्धान्त में राज्य को अपरिहार्य (indispensable) मानव संगठन के रूप में स्वीकार नहीं किया। उनका मानना है कि जीवन की जटिलताओं के साथ मानव समाज

विकेन्द्रीकरण की ओर अग्रसर होता है और राज्य के अस्तित्व की आवश्यकता कम होती जाती है। इस प्रकार वास्तविकतावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए ड्यूगिट ने विश्लेषणात्मक प्रमाणवादियों की राज्य की संप्रभुता-शक्ति सम्बन्धी धारणा को खण्डन किया।

(2) ड्यूगिट का यह विचार कि ‘राज्य’ और ‘विधि’ का उद्देश्य सामाजिक समेकता को बढ़ावा देना है, उचित होते हुए भी व्यावहारिक दृष्टि से प्रभावोत्पादक प्रतीत नहीं होता है। इसका कारण यह है कि राज्य या मनुष्य का अमुक कार्य ”सामाजिक समेकता” को बढ़ावा देगा या उसमें बाधा पहुँचायेगा, यह व्यक्ति विशेष के वैयक्तिक विचारों पर निर्भर करेगा तथा इस विषय में व्यक्तियों के विचार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। उदाहरण के लिये, ऐसा कानून जो न्यूनतम वेतन निर्धारित करता है या श्रमिकों के काम के घण्टों की अधिकतम सीमा निर्धारित करता है, वर्तमान युग में नि:संदेह ही सामाजिक समेकता के अनुकूल माना जायेगा। परन्तु यही प्रश्न यदि आज से कुछ वर्षों पूर्व पूँजीवादी युग में उठाया जाता, तो संभवत: इसका उत्तर भिन्न होता। इसी प्रकार ऐसा कानून जो विभिन्न प्रयोजनों के लिए वैयक्तिक सम्पत्ति के अधिग्रहण को वैधता देता है, सामाजिक समेकता को बढ़ावा देने वाला होगा या नहीं, यह विवादास्पद प्रश्न है। इस विषय में व्यक्तियों के विचार उनकी भावनाओं और राजनीतिक या सामाजिक मूल्यों के अनुसार भिन्न-भिन्न होना स्वाभाविक है। अत: इस दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि ड्यूगिट का सामाजिक समेकता का सिद्धान्त आदर्शात्मक होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

(3) ड्यूगिट के अनुसार किसी भी कानून को विधिक मान्यता तभी प्राप्त होती है जब वह सामाजिक समेकता की ओर लक्षित हो। उनका यह निश्चित मत था कि ऐसे सभी कानून, जिनका सामाजिक समेकता में कोई योगदान नहीं है, ‘विधि’ की श्रेणी में नहीं रखे जा सकते हैं।

(4) ड्यूगिट के ‘राज्य’ तथा ‘प्रशासनिक कार्यो’ सम्बन्धी धारणाओं ने उन्हें लोक-विधि (Public Law) और प्राइवेट विधि के अन्तर को अस्वीकार करने के लिए बाध्य किया। उनके विचार से इन दोनों विधियों का लक्ष्य एक ही है-“सामाजिक समेकता” स्थापित करना। अतः विधि का पब्लिक और प्राइवेट विधि के रूप में भेद अनावश्यक है। विधि को पब्लिक और प्राइवेट विधि के रूप में विभाजित करने का अर्थ राज्य को अनावश्यक बढ़ावा देकर समाज से श्रेष्ठ मानना है, जो कदापि उचित नहीं है।

(5) ड्यूगिट ने मानव के वैयक्तिक अधिकारों के अस्तित्व को भी अस्वीकार किया। उनके विचार से व्यक्ति को केवल एक अधिकार प्राप्त है कि वह सदैव अपने कर्तव्यों का पालन करता रहे।”

(6) ड्यूगिट की विधिक विचारधारा ने रूसी विधिशास्त्रियों को अत्यधिक प्रभावित किया। उनके विचारों की झलक रूस की विधि-व्यवस्था में दिखलाई पड़ती है। ड्यूगिट की समाज-सम्बन्धी धारणा तथा विकेन्द्रीकरण द्वारा राज्य के अस्तित्व की समाप्ति के विचार को रूसी विधिशास्त्रियों ने अपने विधि-दर्शन में स्थान दिया है।10।

डयुगिट के सामाजिक समेकता (Social Solidarity) के सिद्धान्त की अनेक आलोचकों ने इस आधार पर आलोचना की है कि यह व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता है क्योंकि इसमें विधि के नैसर्गिक लक्षणों की पूर्ण अवहेलना की गई है जबकि वस्तुस्थिति यह है कि विधि स्वयं ही प्राकृतिक विधि के सिद्धान्तों पर आधारित है। आलोचकों का मानना है कि ड्यूगिट ने अपने विधि सम्बन्धी सिद्धान्त में ‘‘प्राकृतिक विधि को दरवाजे से निकाल बाहर किया और खिड़की से उसे पुन: प्रवेश करने दिया।”

संभवत: डयगिट के विधिक दर्शन का सबसे गंभीर दोष था कि उन्होंने राज्य द्वारा निर्मित विधि के महत्व की पूर्ण अनदेखी की। वे विधि के निर्माण में राज्य की न्यूनतम भूमिका के पक्षधर थे जबकि वर्तमान

10. Russian Jurist Stuchka regards law as a system of rules for social relationship. Another Russian Jurist Pashukanis in his work ‘General Theory of Law and Marxim’ denounced the need for law and state.

11. uguit, “pushed natural law out through the door and let it come in by window.”

जन-कल्याणकारी राज्य व्यवस्था तथा मानव जीवन की जटिलताओं में विधि के माध्यम से राज्य का अधिकाधिक हस्तक्षेप अत्यावश्यक हो गया है।

ड्यूगिट के सामाजिक समेकता के सिद्धान्त के बारे में अनेक विद्वानों का यह मानना भी था कि यह सिद्धान्त अस्पष्ट है। यह विनिश्चित करना कठिन है कि अमुक विधि या नियम सामाजिक समेकता में वृद्धि करता है अथवा नहीं। यदि यह निर्णीत करने का कार्य न्यायाधीशों पर सौंपा जाये तो यह उनकी वैयक्तिक मान्यताओं पर निर्भर करेगा और विभिन्न न्यायाधीशों में मतभिन्नता होगी, जो विधिक दृष्टि से उचित नहीं है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न विचारधाराओं के समर्थक ड्यूगिट के इस विधि सिद्धान्त का अपने-अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिये उपयोग करेंगे। उदाहरणार्थ, माक्र्सवादी इसका प्रयोग मानव के अधिकारों को नकारने के लिये कर सकते हैं जबकि फासिस्टों (Fascists) द्वारा इस सिद्धान्त का उपयोग व्यापार संघ आन्दोलन (Trade Union Movment) को दबाने के लिये किया जा सकता है।

मैक्स वेबर (Max Weber)

विधिशास्त्र की समाजशास्त्रीय विचारधारा के विकास में मैक्स वेबर का योगदान भी उल्लेखनीय है। उन्होंने सामाजिक घटनाओं और विधिक विकास के परस्पर सम्बन्धों के विषय में महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले। विधि के प्रति समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने उसे अधिक तर्कसंगत बनाने का प्रयास किया।12 मैक्स वेबर के अनुसार विधिक विकास पर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों का गहरा प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिये, आर्थिक विनिमय में मुद्रा के बढ़ते हुए उपयोग के साथ वर्तमान संविदा-विधि का विकास हुआ जिसमें समनुदेशन (assignability) की पूरी छूट रहती है।13 वेबर ने अपने सैद्धान्तिक निष्कर्ष विधि के विकास के तुलनात्मक अध्ययन तथा निजी अनुभवों पर आधारित किये। उनके अनुसार समाज-विशेष की राजनीतिक स्थिति, सभ्यता, आचार-विचार तथा धार्मिक सहिष्णुता का वहाँ की विधि के विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वेबर का यह निष्कर्ष इस्लामी, चीनी, बौद्ध तथा यहूदी विधि-प्रणालियों । के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित था। इसी कारण उन्होंने अनुभवी व्यवसायियों तथा विधिवेत्ताओं द्वारा निर्मित तथा बुद्धिजीवी विधिवेत्ताओं द्वारा निर्मित विधि में अन्तर बताया। उनके अनुसार एंग्लो-सैक्सन (Anglo-Saxon) विधि स्पष्टत: अनुभवी विधि-व्यवसायियों द्वारा निर्मित विधि का उत्कृष्ट उदाहरण है। जबकि रोमन विधि पर आधारित विधियाँ बुद्धिजीवी विधिवेत्ताओं द्वारा निर्मित विधि का उदाहरण हैं। सारांश यह है कि मैक्स वेबर ने विधि को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों पर आश्रित मानते हुए उसके सापेक्ष स्वरूप (relative character) को स्वीकार किया। दुर्भाग्यवश सन् 1920 ई० में उनका अकस्मात् देहावसान हो गया अन्यथा सम्भवत: वे अपने विधिक सिद्धान्तों को और अधिक विकसित करते।

इयूगेन इहलिंच (Eugen Ehrlich : 1862-1922) 

विधि के प्रति समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण अपनाने वाले विधिवेत्ताओं पर आस्ट्रिया के विधिशास्त्री इयूगेन इहलिंच (Eugen Ehrlich) के विचारों का प्रभाव पड़ा। इहलिच के अनुसार किसी समाज विशेष की वास्तविक विधि वस्तुतः वहाँ के पारस्परिक विधि-स्रोतों, संविधियों और निर्णीत वादों में सन्निहित होती है। तथा समाज की मान्यताएँ भी अन्तत: विधि में प्रतिबिम्बित होती हैं। इस तर्क की पुष्टि इहलिंच इंग्लैण्ड की वाणिज्यिक विधि (Commercial law) के विकास का उदाहरण देकर करते हैं। अनेक रूढिजन्य व्यापारिक परम्पराओं को स्थायित्व प्राप्त हो जाने के कारण कालान्तर में न्यायालयों ने इन्हें अपने निर्णयों द्वारा मान्यता प्रदान कर दी। इंग्लैण्ड की विधि में इन प्रथागत परम्पराओं को माल-विक्रय अधिनियम, 1893 के रूप में समाविष्ट कर लिया गया। परन्तु व्यापारिक प्रगति के परिणामस्वरूप नई व्यापारिक परम्पराएँ अस्तित्व में आई जिनकी ओर न्यायालयों और विधायकों का ध्यान आकृष्ट हुआ और इस प्रकार विधि के नवीनीकरण का आवश्यकता हुई। तात्पर्य यह कि विधि सामाजिक रीतियों (social practice) का अनुसरण करती है। परन्तु

12. फ्रीडमैन : लीगल थ्योरी (पाँचवां संस्करण), पृ० 245.

13. Weber Max: Sociology of Law p. 13.

 इहलिच कहते हैं कि यह भी देखा गया है कि अनेक मामलों में कानून जो कुछ कहता है, समाज की परम्परा वैसा न करते हुए कुछ और ही करती है। उदाहरण के लिए इंग्लैण्ड के साहूकारी अधिनियम (Money Inders Act) में यह प्रावधान था कि यदि साहूकार 48 प्रतिशत से अधिक वार्षिक ब्याज पर ऋण देता है। तो यह माना जायेगा कि ऐसे लेन-देन ऋण लेने वाले के प्रति कठोर तथा लोकनीति के विरुद्ध हैं। परन्तु इसके बावजूद प्रत्यक्ष में साहूकार 80 प्रतिशत तक ब्याज वसूलते देखे गये और अनेक व्यक्ति स्वेच्छा से इस ऊंची राशि पर ऋण लेते थे, यद्यपि ऐसा करना विधि के विरुद्ध था। वस्तुत: न्यायालय के सामने ऐसे मामले पहुँचने ही नहीं पाते थे निवेदित है कि भारत में दहेज प्रथा या बाल विवाह समाप्ति संबंधी कानूनों की भी यही स्थिति है जिनवे अनुसार दहेज दिये जाने या लिये जाने या बाल विवाह पर पूर्ण रोक लगाई गई, परन्तु प्रत्यक्षतः व्यवहार में लोग स्वेच्छा से दहेज देते-लेते हैं तथा बाल विवाह करते हैं और इन कानूनों का उन पर कोई प्रभाव नहीं है। सारांश यह है कि अनेक अवसरों पर लिपिबद्ध विधि और समाज में प्रचलित परम्परा में बहुत अंतर होता है। यहाँ तक कि कभी-कभी समाज की परम्परा विधि के ठीक विपरीत होते हुए भी कायम रहती है। इसका आशय यह कदापि नहीं है कि न्यायालय या विधान-मण्डल इसके प्रति अनभिज्ञ या उदासीन रहते हैं। इहलिंच का कहना केवल यह है कि ‘‘विधि के विकास का केन्द्रबिन्दु विधायन या न्यायालयीन निर्णय न होकर समाज स्वयं है।” इस प्रकार यह स्पष्ट है कि इहलिंच ने अपने गुरु इहरिंग की ‘जीती-जागती विधि” (living law) को अपनी विचारधारा का केन्द्रबिन्दु बनाया तथा विधि और सामाजिक विषयों के अन्तर को यथासम्भव कम किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

इहर्लिच की विधि-सम्बन्धी धारणा ने उन्हें ड्यूगिट की भाँति राज्य की महत्ता का विरोधी बना दिया। उनके मतानुसार राज्य द्वारा निर्मित औपचारिक विधि सामाजिक नियंत्रण का एक साधन मात्र है जो प्रचलित रूढ़ि, नैतिकता, परम्परा आदि अन्य साधनों से मिलकर कानून का जीता-जागता रूप ग्रहण कर लेती है। इहलिंच राज्य की शास्ति को भी अस्वीकार करते हैं। उनके अनुसार सामाजिक दबाव (social pressure) ही मनुष्य को विधि द्वारा निर्धारित आचरण करने के लिए बाध्य करता है। उनका कहना है कि मनुष्य का अस्तित्व समाज से पृथक् नहीं होता तथा वह समाज से पृथकू नहीं रह सकता है। अतः वे राज्य की बजाय समाज को अधिक महत्व देते हैं। अपने तर्क की पुष्टि में आस्ट्रिया के तत्कालीन सिविल कोड का उदाहरण देते हुए इहलिच कहते हैं कि इस संहिता के लगभग एक-तिहाई कानून ऐसे हैं जिनका व्यावहारिक जीवन में कभी प्रयोग नहीं होता, अत: राज्य द्वारा निर्मित कानून को स्वयं में पूर्ण नहीं माना जा सकता है।

इहलिच की विधि विचारों की समीक्षा  

इहर्लिच के विधिक विचारों से पश्चात्वर्ती विधिशास्त्रियों को यह प्रेरणा मिली कि विधि का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से इस प्रकार किया जाना चाहिये ताकि विधि और सामाजिक बन्धन में अन्तर यथासंभव कम हो जाय। इहलिंच के विचार सैविनी से बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं क्योंकि दोनों ने विधि को व्यावहारिक स्वरूप देने की आवश्यकता पर जोर दिया। दोनों में अन्तर केवल इतना है कि सेविनी ने भूतकाल पर अधिक जोर दिया जबकि इहलिंच ने वर्तमान वास्तविक विधि को अधिक महत्वपूर्ण माना। | इहर्लिच के आलोचकों ने उनके विचारों की भर्त्सना करते हुए उनमें तीन कमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया|

(1) इहलिच की विचार-पद्धति का प्रथम दोष यह है कि उन्होंने राज्य को गौण स्थान दिया जब कि आधुनिक समाज में राज्य का महत्व दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। राज्य की विधिक शक्ति की अवहेलना करना उचित नहीं माना जा सकता। राज्य द्वारा निर्मित विधि में केवल तत्कालीन व्यावहारिक नियम ही प्रतिबिम्बित नहीं होते बल्कि उसमें सामाजिक आदर्शों और मूल्यों को मान्यता दिलाने की शक्ति भी होती है।14

(2) इहर्लिच के विधि-दर्शन की दूसरी कमी यह है कि उन्होंने रूढ़ि (custom) को विधि का स्रोत न मान कर उसे विधि का एक प्रकार मात्र माना है। यह ठीक है कि प्राचीन समाज तथा अन्तर्राष्ट्रीय विधि के

14. डायस एण्ड ह्यज : ज्यूरिसपूडेन्स तृतीय संस्करण (1970) पृ० 427.

सन्दर्भ में ‘रूढ़ि’ को विधि के स्रोत की बजाय विधि का एक प्रकार ही मानना उचित होगा। परन्तु वर्तमान विधि-व्यवस्थाओं में रूढ़ि’ को विधि के स्रोत के रूप में स्वीकार करना होगा क्योंकि वर्तमान मान्यता के अनुसार केवल सुनिश्चित विधि-निर्माता द्वारा प्रदत्त कानूनों को ही ‘विधि’ के रूप में स्वीकार किया जाता है।

(3) इहलिच की विचार-पद्धति का तीसरा दोष यह है कि उन्होंने ऐसा कोई मापदण्ड निर्दिष्ट नहीं किया जिससे सामाजिक आदेशों और विधिक मानकों के बीच अन्तर स्पष्ट किया जा सके। यद्यपि दोनों की अन्योन्याश्रितता (Interchangeability) एक ऐतिहासिक तथा सामाजिक वास्तविकता है फिर भी इससे इन। दोनों प्रकार के मानकों में विभेद की आवश्यकता कम नहीं हो जाती। परिणामतः इहलिंच द्वारा प्रतिपादित विधि का सिद्धान्त एक सामान्य समाजशास्त्रीय धारणा मात्र बन कर रह जाता है।

(4) फ्रीडमैन (Friedmann) ने हइर्लिच के विधि सम्बन्धी सिद्धान्त की आलोचना इस आधार पर की है। कि इहर्लिच ने विधि की सामाजिकी (Sociology of law) को अनावश्यक महत्व दिया है, यहां तक कि इससे विधिक मान्यताओं और सामाजिक मान्यताओं का अन्तर ही समाप्त हो गया है जबकि दोनों का एक दूसरे से पृथक् अस्तित्व है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राज्य द्वारा निर्मित विधि के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। क्योंकि मानव संव्यवहारों को विनियमित करने में विधायन (Legislation) की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वस्तुस्थिति तो यह है कि आधुनिक कल्याणकारी राज्यों में विधि के माध्यम से राज्य का हस्तक्षेप अत्यावश्यक हो गया है और इसके साथ ही प्रथाओं का महत्व दिनोंदिन क्षीण होता जा रहा है।

फ्रीडमैन का मानना है कि विधि के अधिक प्रभावोत्पादक होने के लिये यह नितांत आवश्यक है कि औचित्यपूर्ण तथा समाज द्वारा स्वीकार्य (Reasonable and acceptable) हो तथा विधि में प्रचलित संस्कृति, आदर्शो, मूल्यों तथा मान्यताओं की झलक स्पष्टतः प्रतिबिंबित हो। अतः किसी विधि की वैधता सामाजिक परम्पराओं पर निर्भर करती है न कि केवल नैतिकता पर।15

फ्रेंकोइस गिने (Francois Geny : 1861-1944) 

फ्रेंकोइस गिने फ्रांस के नेन्सी विश्वविद्यालय में विधि के प्रोफेसर थे। वे यूरोपीय महाद्वीप के प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने विधि-व्यवस्था में न्यायिक निर्णयों तथा न्यायिक प्रक्रिया के महत्व पर बल दिया। उन्होंने अपनी कृतियों16 द्वारा फ्रांस की विधि की निर्वचन पद्धति में आमूल परिवर्तन किये जाने की आवश्यकता प्रतिपादित की। उन्होंने विधि के अध्ययन में मुक्त वैज्ञानिक शोध पद्धति अपनायी जाने की अनुशंसा की। डीन रास्को पाउंड ने गिने को विधि के सामाजिक-दर्शन का प्रबल समर्थक माना है। गिने ने विधि को सामाजिक विज्ञान की एक शाखा निरूपित करते हुए उसे अनावश्यक औपचारिकता से दूर रखे जाने पर बल दिया। उनके अनुसार न्यायाधीशों का यह परम कर्तव्य है कि वे विधि-संहिता के उपबंधों की तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए व्याख्या करें ताकि न्याय समाजोपयोगी हो और उसमें लोगों की आस्था बनी रहे।

फ्रेंकोइस गिने के अनुसार प्रत्येक राज्य द्वारा निर्मित विधि के निर्माण में निम्नलिखित बातों पर ध्यान अवश्य दिया जाना चाहिए

(1) उस स्थान विशेष की भौतिक वास्तविकताएं, जैसे-जलवायु, धर्म, आचार, आदतें आदि। |

(2) उस स्थान या देश-विशेष का साधारण वातावरण तथा परिस्थितियाँ।

(3) प्राकृतिक विधि के समता, वैयक्तिक स्वतंत्रता आदि संबंधी सिद्धान्त तथा

(4) उस समाज-विशेष की नैतिक धारणाएँ तथा सामाजिक मान्यताएँ आदि।

15. Friedmann L.M. : Dilemmas of Law in the Welfare State (1986) p. 26.

16. Shoosh TOT ‘Methode’d interpretation et sources en droit prive positif 1469914 la 412

में प्रकाशित हुई तथा Science et Technique en droit prive positif” नामक द्वितीय कृति चार खण्ड *”। 1914-1924 में प्रकाशित हुई.

 डीन रास्को पाउन्ड (Dean Roscoe Pound : 1870-1964)

अमरीकी विधिशास्त्री डीन रास्को पाउंड का जन्म सन् 1870 में नेब्रास्का (Nebraska) स्थित लिंकन coln) में हुआ था। अपनी युवावस्था में वे वनस्पतिशास्त्र की ओर आकर्षित थे। सन् 1901 में वे सुप्रीम कोर्ट के सहायी न्यायाधीश (Auxiliary Judge) नियुक्त किये गये तथा सन् 1903 में उन्हें नेब्रास्का विद्यालय के लॉ स्कूल का संकायाध्यक्ष बनाया गया। तत्पश्चात् सन् 1916 से लेकर 1936 तक पाउड वर्ड विद्यालय में विधिशास्त्र के प्रोफेसर रहे। इस अवधि में उन्होंने समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र पर अनेक शोधपत्र लिखे जो हारवर्ड लॉ रिव्यू में नियमित रूप से छपते रहे।

रास्को पाउन्ड ने इहरिंग के विचारों के आधार पर समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र के कार्यक्रम को क्रियात्मक Anctional) स्वरूप दिया। इस कार्यक्रम को पाउण्ड ने ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की संज्ञा दी। एलेन ने पाउन्ड के विधि-दर्शन को एक ‘व्यावहारिक समन्वय पद्धति’ निरूपित किया। पाउन्ड ने अपने विधि-दर्शन को ‘हितों’ (interests) पर आधारित करते हुए कथन किया कि ‘हित’ (interest) को विधि की प्रमुख विषयवस्त मानना उचित होगा। उन्होंने विधि द्वारा संरक्षित विभिन्न हितों को तीन श्रेणियों में विभाजित करते हुए कहा कि विधि का कार्य केवल यह है कि वह मनुष्यों के हितों की रक्षा करे, अर्थात् उनकी इच्छाओं, । आवश्यकताओं और माँगों की पूर्ति करे। उनके अनुसार विधि एक ऐसा ज्ञान और अनुभव है जिसके माध्यम से सामाजिक नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।  

रास्को पाउण्ड का सामाजिक यांत्रिकी‘ (Social Engineering) का सिद्धान्त

डीन रास्को पाउन्ड के विचार से विधि का प्रधान कार्य सभ्यता को आगे विकसित करना है। ‘सभ्यता’ से उनका तात्पर्य यह था कि सृष्टि से निरन्तर संघर्ष करते हुए मानव अपनी शक्तियों का उत्तरोत्तर विकास करता रहे। इस प्रकार पाउण्ड विधि को एक साधन मात्र मानते थे। उनके मतानुसार विधि का प्रथम कार्य यह है कि वह समाज के उन तत्वों की खोज करे जो सभ्यता को विकसित करते हैं। इन तत्वों को खोजने के बाद विधि का दूसरा कार्य यह है कि इन तत्वों के निरीक्षण और परीक्षण द्वारा मानवीय संव्यवहारों के उन सिद्धान्तों की खोज करे जो सभ्यता को बनाये रखने में सहायक हो सकते हैं। इन सिद्धान्तों को पाउण्ड ने न्यायिक आधारतत्व” (jural postulates) के नाम से सम्बोधित किया। उन्होंने मनुष्यों की इच्छाओं, आशाओं तथा माँगों को ऐसे तत्व माना जो सभ्यता को विकसित करते हैं।17 जैसा कि कथन किया जा चुका है, पाउण्ड ने समस्त मानव हितों को तीन श्रेणियों में विभक्त करते हुए उन्हें विधि द्वारा संरक्षण दिये जाने की आवश्यकता प्रतिपादित की है। ये हित निम्नलिखित हैं

(i) व्यक्तिगत हित (Private interest)- इनमें व्यक्ति सम्बन्धी हित, घरेलू मामलों सम्बन्धी हित, सम्मान एवं प्रतिष्ठा, एकान्तता, इच्छा की स्वतंत्रता आदि शामिल हैं।

(ii) लोक हित (Public interest)–इनमें राज्यों से परिरक्षण के हित तथा सामाजिक हितों के संरक्षण के रूप में राज्य के हित का समावेश है।

  • सामाजिक हित (Social interest)—इसमें शान्ति-व्यवस्था तथा सामान्य सुरक्षा बनाये रखने के हित, विवाह जैसी संस्था का अस्तित्व बनाये रखने के हित, सामान्य आचरणों को बनाये रखने के हित, सामाजिक साधनों की रक्षा करने वाले हित, सामान्य प्रगति से सम्बन्धित तथा मानवीय व्यक्तित्व के विकास से सम्बन्धित हितों का समावेश है।  

हितों के सिद्धान्त को आगे विकसित करते हुए रास्को पाउण्ड कहते हैं कि कभी-कभी इन विभिन्न हितों में परस्पर टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अत: विधि के माध्यम से परस्पर-विरोधी हितों में समन्वय स्थापित किया जाना चाहिये। रास्को पाउन्ड के अनुसार हितों के परस्पर टकराव को कम करने के लिये विवादों के हल का ऐसा मार्ग ढूंढा जाना चाहिए ताकि उसमें सन्निहित विभिन्न हितों को कम से कम हानि

17. रॉस्को पाउंड : इन्टरप्रिटेशन्स ऑफ लीगल हिस्ट्री, पृ० 156.

पहुँचे। यही कारण है कि रास्को पाउण्ड ने विधिशास्त्र को सामाजिक विज्ञान कहने की बजाय सामाजिक तकनीक कहना ही अधिक उचित समझा। विधि को ‘सामाजिक यांत्रिकी’ (Social Engineering) निरूपित। करते हुए उन्होंने राज्य की संप्रभुता, अधिकार, कर्तव्य, व्यक्तित्व आदि सैद्धान्तिक ‘परिकल्पनाओं’ पर विचार । करना आवश्यक समझा तथा सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप नई विधिक तकनीक (new leg।। technique) के विकास की ओर ध्यान केन्द्रित किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

न्यायिक आधार तत्वों के बारे में पाउण्ड के विचार (Pound’s views on Jural Postulates)

जैसा कि कथन किया जा चुका है, पाउण्ड के अनुसार न्यायिक आधारतत्व (Jural Postulates) मानव की इच्छाओं, आशाओं तथा माँगों आदि पर आधारित रहते हैं। इनमें यह उल्लेख नहीं रहता कि विधि क्या है। बल्कि यह उल्लेख रहता है कि मनुष्य विधि से क्या आकांक्षा रखता है। दूसरे शब्दों में, ये आधार तत्व उन इच्छाओं या माँगों से नहीं निकलते जिनका कानून द्वारा समर्थन किये जाने की मनुष्य कामना करता है। तत्कालीन अमरीकी समाज की इच्छाओं, आवश्यकताओं और माँगों को ध्यान में रखते हुए सन् 1919 में रास्को पाउण्ड ने जिन न्यायिक आधारतत्वों को प्रस्तुत किया उनका विवरण निम्नानुसार है।

(1) प्रत्येक सभ्य समाज में मनुष्य यह आकांक्षा करता है कि दूसरे लोग उस पर जानबूझ कर आक्रमण न करें।

(2) उन्नत सभ्य समाज में मनुष्य यह प्रत्याशा कर सकता है कि तत्कालीन सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था में उसने जो कुछ पाया या स्वयं के परिश्रम से अर्जित किया है, उसे अपने लाभ के लिये स्वयं के नियंत्रण में रख सके। |

(3) प्रत्येक सुसभ्य समाज में मनुष्य यह प्रत्याशा कर सकता है कि वह समाज के जिन विभिन्न व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है, वे उसके प्रति सद्भावपूर्ण व्यवहार करें।

(4) विकसित समाज में मनुष्य यह आशा करता है कि जो व्यक्ति किसी कार्य को सम्पादित करने में लगा है, वह अपने कार्यों को इतनी सावधानीपूर्वक करे जिससे दूसरों को किसी प्रकार की हानि न पहुँचे। | (5) प्रत्येक सभ्य समाज में मनुष्य यह आकांक्षा रख सकता है कि वे व्यक्ति जो ऐसी वस्तु रखे हुए हैं। जिनमें निकल भागने की या पलायन करने की क्षमता है तथा जिनके निकल भागने पर अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को हानि होने की संभावना है, तो ऐसे व्यक्ति उन वस्तुओं को पूर्णत: नियंत्रण में रखेंगे ताकि वे अन्य व्यक्तियों को हानि न पहुँचा सकें।18

डीन रास्को पाउण्ड के उपर्युक्त न्यायिक आधारतत्वों (jural postulates) से स्पष्ट होता है कि एक उदार पूँजीवादी समाज में वे किन मूल्यों (मान्यताओं) की अपेक्षा करते थे। परन्तु उन्होंने स्वयं यह अनुभव किया कि सामाजिक प्रगति के साथ नई न्यायिक मान्यताओं का प्रादुर्भाव हो रहा है। उदाहरण के लिये, सामाजिक बीमा19 की अवधारणा जो आज सभी समाजवादी राष्ट्रों में प्रतिस्थापित हो चुकी है, सन् 1919 में जब पाउण्ड न्यायिक अवधारणाओं के विषय में लिख रहे थे, उदीयमान अवस्था में थी। फिर भी यह सत्य है कि ऐसी अनेक न्यायिक मान्यताएँ (jural postulates) अस्तित्व में आयी हैं जो पाउण्ड द्वारा कथित आधारतत्वों से मेल नहीं रखती थीं। तात्पर्य यह है कि सामाजिक परिवर्तनों के साथ न्यायिक धारणाएँ भी निरन्तर बदलती रहती हैं तथा इनका स्वरूप स्थायी नहीं होता है। बदले हुए सामाजिक परिवेश को ध्यान में रखते हुए रास्को पाउंड ने सन् 1942 में न्यायिक आधारतत्वों संबंधी अपनी पूर्व सूची में तीन आधार-तत्व और जोड़ दिये जो निम्नलिखित थे :- ।

(6) उन्नत समाज का प्रत्येक व्यक्ति यह प्रत्याशा कर सकता है कि उसे अपने काम (नौकरी) की सुरक्षा मिलेगी,

18. रास्को पाउण्ड : इन्ट्रोडक्शन टु अमेरिकन लॉ (1919); राइलैंड बनाम फ्लेचर, (1863) एल० आर० 3 एच० एल० 330 का वाद.

19. सामाजिक बीमा से आशय यह है कि अनपेक्षित दुर्भाग्य की स्थिति में व्यक्ति की हानि का बोझ समाज स्वयं वहन करे.

(7) उसकी वृद्धायु में समाज उसका आर्थिक भार वहन करेगा, |

(8) अनपेक्षित दुर्घटना या विपत्ति की स्थिति में उसे हुई हानि का भार सामाजिक बीमा (Social insurance) के माध्यम से समाज स्वयं वहन करेगा।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र के अन्तर्गत विधि और सामाजिक घटनाओं के परस्पर प्रभाव का जो अन्वेषण और परीक्षण किया गया है, वह सराहनीय है। इस पद्धति का विकास अमेरिका में रास्को पाउण्ड द्वारा किया गया। इंग्लैण्ड में इस विचार-पद्धति को अपनाने की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया, तथापि डायसी (Dicey) ने इसे अपनी प्रसिद्ध कृति, ”लॉ एण्ड पब्लिक ओपीनियन इन इंग्लैण्ड” में कुछ सीमा तक अपनाने का प्रयास अवश्य किया। डॉ० विलियम्स के मतानुसार उस समय विधि के समाजीकरण को लेखबद्ध करने का समय नहीं आया था।20 पाउण्ड ने विधि के समाजशास्त्रीय अन्वेषण को तीन चरणों में पूरा किये जाने का उल्लेख किया है ।21 प्रथम चरण में लेखबद्ध विधि की बजाय उस विधि का अध्ययन करना आवश्यक है जिसका क्रियान्वयन हो रहा (law in action) है। दूसरे चरण में सामाजिक अनुसंधान (social research) को महत्व दिया जाना चाहिये जो उत्कृष्ट विधि-निर्माण के लिये परम आवश्यक है। तीसरे चरण में पाउण्ड ने न्यायिक कार्यों के पुनरुद्धार (re-statement) की आवश्यकता प्रतिपादित की ताकि विधि को बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जा सके। विधिशास्त्र की विभिन्न विचार-पद्धतियों में वर्तमान विधिशास्त्रियों द्वारा समाजशास्त्रीय पद्धति को ही सबसे अधिक तर्कसंगत और व्यावहारिक माना गया है।

विधि के प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण अपनाने वाले विधिशास्त्रियों को न्याय-क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह रहा है कि उन्होंने विधि के अध्ययन तथा विकास को नई दिशा दी है। इस विचारधारा के फलस्वरूप विधि के प्रति यह भ्रान्ति कि वह क्लिष्ट तथा जटिल नियमों का संकलन मात्र है, दूर हो चुकी है। तथा अब विधि का अध्ययन समाज के एक आवश्यक शस्त्र के रूप में किया जाने लगा है। ऐसी अनेक विधियाँ जो वर्तमान में निरर्थक तथा अनुपयुक्त हैं, निरस्त कर दी गयी हैं, 22 तथा इनके स्थान पर सामाजिक विधायन को महत्व दिया गया है।23 इसीलिए पेटन (Paton) ने समाजशास्त्रीय विचारधारा को क्रियात्मक शाखा (Functional School) कहा है।

 

पाउंड के सामाजिक-यांत्रिकी सिद्धान्त की आलोचना 

जहाँ एक ओर रास्को पाउंड ने विधिशास्त्र सम्बन्धी अपने सामाजिक-यांत्रिकी सिद्धान्त द्वारा विधिक क्षेत्र में खलबली मचा दी, दूसरी ओर कुछ लोगों ने इसकी आलोचना भी की। इन आलोचकों का तर्क था कि पाउंड ने अपने न्यायिक आधारतत्वों (Jural Postulates) में घर्षण (friction), अवशिष्ट (waste) तथा सामाजिक यांत्रिकी जैसे-तकनीकी शब्दों का प्रयोग करके समाज को एक कारखाने के समान माना, जो उचित नहीं है। समाज को किसी कारखाने या पुल के समतुल्य मानना उचित नहीं है, क्योंकि ये स्थिर स्वरूप के होते हैं। जबकि समाज सदैव परिवर्तनशील होता है तथा उसमें प्रवर्तनशील विधि भी सामाजिक परिवर्तनों के साथ बदलती रहती है। अत: समाज को यंत्रवत मानना सरासर भूल है।

पाउंड के सिद्धान्त की आलोचना इस आधार पर भी की गई है कि इसके अन्तर्गत विधि को प्रयोगात्मक स्वरूप का माना गया है जिससे यह आभास मिलता है कि मानो समाज एक नट और बोल्ट युक्त मशीन हो।। अत: सामयिक यांत्रिकी का सिद्धान्त पूर्णत: कल्पनाओं पर आधारित है न कि वास्तविक सत्यता पर। इसके अतिरिक्त पाउंड का हितों का सिद्धान्त (Theory of Interest) ऐसे बहुविध समाजों के लिए विशेष महत्व

20. विलिएम्स जी० एल० : सामंड्स ज्यूरिसपूडेंस, पृ० 81.

21. रास्को पाउण्ड : दि स्कोप एण्ड परपज ऑफ सोशियालॉजीकल ज्यूरिसपूडेंस, 24 हारवर्ड लॉ रिव्यू 59 (1911).

22. रेडक्लाइफ बनाम रेडक्लाइफ, (1939) AC 15. ।

23. आज ‘‘एक ही नियोजन” (common employment) तथा अंशदायी प्रमाद (contributory negligence) के सिद्धान्तों की समाप्ति हो चुकी है। वर्तमान में प्रशासी विधि के अन्तर्गत नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्त के बढ़ते हुए महत्व को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि विधि सामाजिक आवश्यकताओं के प्रति सजग है.

नहीं रखता जिनमें जातीय, धार्मिक, भाषा या वंश आदि पर आधारित अल्पसंख्यकों का बाहुल्य है, जैसा कि अमेरिका, भारत, इंग्लैण्ड आदि देशों में है।

अन्य अमरीकी समाजशास्त्री विधिज्ञ (Other American Sociological Jurists)

न्यायमूर्ति ओलीवर विन्डेल होम्स (Justice Oliver Windell Holmes) तथा न्यायमूर्ति कार्बोझो (Justice Cardozo) को समाजशास्त्री विधिक विचारधारा का पूर्वगामी (fore runner) माना जाता है जिनके विचारों से आगे चलकर रास्को पाउण्ड ने सामाजिक विधिशास्त्र का सूत्रपात किया।

न्यायमूर्ति होम्स (Justice Holmes : 1841-1935)

होम्स के अनुसार समाज में विधि की क्रियात्मक भूमिका (Functional role) रहती है जिसका उपयोग समाज के सामूहिक हित के संरक्षणार्थ किया जाता है न कि व्यक्तियों के निजी हित के लिये। उनके अनुसार विधि एक तार्किक संकल्पना मात्र न होकर, वास्तविक अनुभव पर आधारित है। इसका आशय यह है कि न्यायाधीशों द्वारा विधि या विधि के नियमों का निर्वचन करते समय, सामाजिक आवश्यकताओं, प्रचलित नैतिक नियमों, राजनीतिक एवं लोक जातियों तथा जनमत को ध्यान में रखना चाहिये तथा तदनुसार निर्णय देना चाहिये। लगभग तीस वर्षों से अधिक समय तक अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के पद पर कार्यरत रहने के फलस्वरूप न्यायमूर्ति होम्स इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मानव के जीवन को सुव्यवस्थित रूप में ढालने में विधि की भूमिका अहम होती है। उन्होंने अपनी कृति ‘कॉमन लॉ’ के माध्यम से सामाजिक विधिशास्त्र को अटलाण्टिक महासमुद्र से बाहर अन्य यूरोपीय देशों में उल्लेखनीय योगदान किया है।24

बेन्जामिन कार्डोजो (Benjamin Cardoz0 : 1870-1938)

न्यायमूर्ति कार्डोजो अमरीकी सुप्रीम कोर्ट में एसोसिएटेड जज के रूप में लगभग छ: वर्षों तक (19321938) कार्यरत थे। उन्होंने आस्टिन द्वारा प्रतिपादित विश्लेषणात्मक विधिक सिद्धान्त को पूर्णत: अस्वीकार करते हुये अभिकथन किया कि विधि का निर्वचन सामाजिक आवश्यकताओं तथा मानव जीवन की वास्तविकताओं के आधार पर किया जाना चाहिये। उन्होंने न्यायाधीशों का आह्वान किया कि वे अपने आत्मनिष्ठ परक (subjective) उपागम को त्यागकर विधि के प्रति वस्तुनिष्ठ उपागम (Objective approach) अपनायें ताकि किसी प्रकरण में निर्णय देते समय तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों, नैतिक मूल्यों तथा आवश्यकताओं की अनदेखी न हो सके। उन्होंने विधि सम्बन्धी अपना अध्ययन दो बिन्दुओं पर केन्द्रित किया(1) न्याय-निर्णय करते समय न्यायाधीश विधि को किस प्रकार लागू करें तथा (2) विधि समाज में किस प्रकार विकसित होती है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य (Indian Perspective)

भारत में विधि के प्रति समाजशास्त्रीय एवं क्रियात्मक दृष्टिकोण अपनाए जाने के प्रमाण अनेक विधियों में स्पष्टतः दिखलाई देते हैं। भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात् भारत की विधि-व्यवस्था को सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के लिये निरन्तर प्रयास किये गये तथा आज भी किये जा रहे हैं। भारत के संविधान में गत 60 वर्षों में हुए संशोधनों से इस कथन की पुष्टि हो जाती है। भारतीय संविधान में उल्लिखित कल्याणकारी राज्य की कल्पना को साकार रूप देने के प्रयत्नस्वरूप अनेक सामाजिक, आर्थिक तथा मानवीय विधान लाग किये गये जो गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा या भेदभाव, छूआछूत आदि को समाप्त कर समाजवाद को स्थापित कर सके। संविधान के भाग IV में दिये गये नीति-निदेशक सिद्धान्त इस दिशा में मार्गदर्शक सिद्ध हरा हैं 25 बैंक राष्ट्रीयकरण, 26 प्रिवीपर्स की समाप्ति27 शहरी सम्पत्ति की परिसीमा पर निर्बध आदि आर्थिक

24. एस० एन० ध्यानी : फण्डामेण्टल्स ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स : दि इण्डियन प्रोच, (1997) पृ० 219,

25. मिनर्वा मिल्स लि० बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1980 सु० को० 1739.

26. आर० सी० कूपर बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1970 सु० को० 564.

27. प्रीवी पर्स का वाद, ए० आई० आर० 1971 सु० को० 100.

 

समानता की ओर इंगित करते हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता28, प्रजातन्त्र के रक्षण में विशेष सहायक सिद्ध हुई है। वर्तमान में गरीबों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता29 तथा बँधुआ मजदरी को समाप्त30 करने सम्बन्धी नन भी इस बात के परिचायक हैं कि भारतीय विधि के अन्तर्गत सामाजिक आवश्यकता को सर्वाधिक त्व दिया जा रहा है ताकि उसकी उपादेयता बढ़ सके। लोकहित सम्बन्धी वाद (Public Interest cation) इस दिशा में एक सराहनीय कदम है जिसके अंतर्गत ‘सुने जाने के अधिकार’ (locts standi) को अधिक व्यापक रूप31 दिया गया है। उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993 पारित हो जाने के फलस्वरूप उपभोक्ता को घटिया-सेवा, मिलावट, धोखाधड़ी, मुनाफाखोरी, आदि से राहत दिलाने का प्रयास किया गया है। महिलाओं के सामाजिक स्तर को सुधारने तथा पुरुष वर्ग के शोषण से बचाने के लिए आपराधिक दण्ड विधि में संशोधित किये गये तथा सन् 1990 में एक राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन भी। किया गया है। ग्राम पंचायत अधिनियम, 1993 में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित हैं। पिछड़े वर्ग, आदिम जन-जाति आदि के लोगों को समुचित अवसर उपलब्ध कराने के बारे में अनेक कानून बनाये गये हैं। भारत के पिछड़े वर्ग तथा अनुसूचित जाति तथा जनजाति को शोषण, उत्पीड़न तथा अपमान से बचाने के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण), अधिनियम, 1989 पारित किया है जिसके अन्तर्गत कठोर दंड के प्रावधान हैं। वर्तमान कम्प्यूटर युग में तकनीकी प्रौद्योगिकी के विकास के फलस्वरूप नये प्रकार के साइबर अपराध बढ़ रहे हैं जिन्हें रोकने हेतु सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 निश्चित ही एक प्रगतिवादी कदम है। अनुभव के आधार पर इस अधिनियम की कमियों को दूर करने के लिये इसे 2008 के संशोधन द्वारा अधिक प्रभावी बनाया गया है। इन सभी परिवर्तनों से समाज में विधि की क्रियात्मक भूमिका का स्पष्ट आभास मिलता है।

भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात्वर्ती दशकों में भारतीय समाज में अनेक आमूल परिवर्तन हुये हैं ताकि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भारत विकासोन्मुख हो सके। इन दशकों में सामाजिक-आर्थिक प्रगति हेतु जो विभिन्न कानून या विधियां पारित की गयी हैं, इनमें प्रमुख निम्नलिखित विशेष उल्लेखनीय हैं :

1. सिविल अधिकार अधिनियम32, 1955

2. अनैतिक व्यापार (निरोधक) अधिनियम, 1956

3. अपराधियों की परिवीक्षा अधिनियम, 1958

4. गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971

5. समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976

6. परिवार न्यायालय अधिनियम, 1984

7. बाल श्रम (निरोधक तथा विनियमन) अधिनियम, 1986

8. विधिक सेवा प्राधिकारी अधिनियम, 1987

9. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986

10. बाल न्याय (बालकों की देखरेख तथा संरक्षण) अधिनियम, 2000

11. अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989

12. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988

28: इन्दिरा नेहरू गाँधी बनाम राजनारायण, ए० आई० आर० 1975 सु० को० 2299.

29. अनुच्छेद 39-क, संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम 1976 द्वारा अंत:स्थापित.

30. (1991) 4 एस० सी० सी० 177.

31. एस० पी० गुप्ता बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1982 एस० सी० 149.

32. यह पूर्ववर्ती छुआछूत निवारण अधिनियम, 1955 का परिष्कृत रूप है.

13. बाल विवाह प्रतिषेध (संशोधन्) अधिनियम, 1978

14. महिला राष्ट्रीय आयोग अधिनियम, 1990

15. लोक दायित्व बीमा अधिकार अधिनियम, 1991

16. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993

17. जन्म-पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994

18. पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996

19. प्रतिस्पर्धा अधिनियम23, 2002

20. घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005

21. माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक कल्याण अधिनियम, 2007

22. सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008

उपरोक्त के अलावा अनेक अन्य लोकोपयोगी कानून भी विगत दशकों में पारित हुये हैं जिन पर सभी का उल्लेख किया जाना सम्भव नहीं है।

भारतीय विधि में उपर्युक्त परिवर्तन स्पष्टतः दर्शाते हैं कि स्वतंत्रता के पश्चात् भारत की विधि-प्रणाली में सामाजिक न्याय को सर्वोपरि माना गया है। उच्चतम न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में इस बात को दोहराया है कि सामाजिक परिवर्तनों के साथ-साथ विधि के कार्य क्षेत्र में भी बदलाव लाया जाना समयोचित होगा ताकि वह सामाजिक-न्याय को सुनिश्चित कर सके। इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ34 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संविधान जो कि एक राजनीतिक दस्तावेज है, इसका निर्वचन इस प्रकार किया जाना चाहिए ताकि वह स्वयं को सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप ढाल सके। 

उपभोक्ता शिक्षा एवं अनुसंधान केन्द्र बनाम भारत संघ35 के बाद में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति के० रामास्वामी ने अभिनिर्धारित किया कि संविधान की उद्देशिका (Preamble) तथा अनु० 38 सर्वोच्च विधि है जिसमें यह उल्लेख है कि विधि द्वारा सामाजिक परिवर्तन का उद्देश्य यह है कि प्रत्येक नागरिक गरिमामय जीवन व्यतीत कर सके तथा उसे अपना जीवन संवारने का यथोचित अवसर मिल सके। सामाजिक न्याय एक ऐसा माध्यम है जो निर्धनों, गरीबों, दलितों या साधनहीनों के कष्टों का निवारण करने में सहायक हो सकता है।

विधि द्वारा सामाजिक न्याय दिलाने की पहल करते हुए उच्चतम न्यायालय ने नूर सबा खातून बनाम मोहम्मद कासिम36 के बाद में विनिश्चित किया कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 अथवा मुस्लिम वैयक्तिक विधि के अधीन अपने बच्चों के लिए पति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है, यदि बच्चे उस महिला के साथ रह रहे हैं। यहाँ तक कि अब विवाह संबंध स्थापित किये बगैर साथ-साथ रह रहे स्त्री-पुरुषों तथा उनसे उत्पन्न होने वाली संतानों के अधिकारों को भी विधिक मान्यता दी जाने हेतु प्रयास किये जा रहे हैं जिन्हें कुछ वर्षों पूर्व तक अनैतिक तथा पूर्णत: अवैध माना जाता था। उल्लेखनीय है कि ऐसी संतानें नाजायज होते हुये भी विधि द्वारा उन्हें संपत्ति के अधिकार प्रदत्त किये गये हैं।

33. यह पूर्ववर्ती एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार अधिनियम, 1969 (M.R.T.P.) को परिवर्तित रूप है.

34. ए० आई० आर० 1993 सु० को० 447.

35. ए० आई० आर० 1995 सु० को० 922. 36. ए० आई० आर० 1997 सु० को 3280.

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