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LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 7 Notes

 

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अध्याय 7 (Chapter 7)

एतिहासिक शाखा (Historical School)

LLB Notes Study Material

विधिशास्त्र के अन्तर्गत प्राकृतिक विधि सिद्धान्त के बढ़ते हुए महत्व की प्रतिक्रियास्वरूप | विश्लेषणात्मक प्रमाणवाद के साथ-साथ ऐतिहासिक पद्धति का भी प्रादुर्भाव हुआ। विधिशास्त्र के प्रति | ऐतिहासिक पद्धति अपनाने वाले विधिवेत्ताओं में सैविनी (Savigny) का स्थान अग्रगण्य है। उन्होंने विधि को। | ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित किया। यद्यपि सैविनी के पूर्व एडमण्ड बर्क (Edmund Burke) ने विधि के प्रति ऐतिहासिक दृष्टिकोण अपनाते हुए कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक तथा दार्शनिक सिद्धान्त प्रतिपादित किये थे। उन्होंने फ्रांस की क्रांति (French Revolution) के पश्चात् वहाँ लागू की गई संवैधानिक विधि की तीव्र

आलोचना करते हुए कथन किया था कि किसी विधि को अमूर्त सिद्धान्तों (abstract principles) के आधार  पर निर्मित करने के बजाय उसे क्रमिक और स्वाभाविक रूप से विकसित होने देना हितकारी होता है। ह्यगो (Hugo) ने भी विमर्शपूर्वक निर्मित विधि (deliberately framed laws) के अनौचित्य पर प्रकाश डालते हुए। विधि के स्वाभाविक तथा क्रमिक विकास को ही अधिक उपयुक्त माना था।

ऐतिहासिक विधिशास्त्रियों ने विधिशास्त्र में नैतिकतामूलक सिद्धान्तों तथा न्यायालयों द्वारा सृजित विधि के समावेश को पूर्णत: नकारते हुये प्रतिपादित किया कि विधि में जिन सार्वभौमिक सिद्धान्तों का समावेश होना। चाहिये वे आदर्शमूलक होकर प्रचलित परंपराओं तथा प्रथाओं पर आधारित होनी चाहिये। विशेषतः फेड्रिक पोलक (Federick Pollock) जिन्हें विधिशास्त्र के एक प्रमुख प्रवर्तक के रूप में ख्याति प्राप्त हुई, का कथन था कि नैतिकता न्यायाधीशों एवं विधिज्ञों की परिधि के बाहर की विषयवस्तु होने के कारण इसे विधि में कोई स्थान प्राप्त नहीं है। यह बात अलग है कि स्मरणातीत प्रथा भी नैतिक मूल्य के विरुद्ध नहीं होनी चाहिये क्योंकि समाज नैतिक मूल्यों को अवश्य ही महत्व देता है, भले ही विधि इन्हें स्वीकार करने से इन्कार करे।

ऐतिहासिक विचारधारा की पृष्ठभूमि

यूरोप में रोमन विधि के प्रभाव के कारण विधि की अनेक विचारधाराओं को ठीक तरह से समझने में सुविधा हुई तथा तत्कालीन समस्याओं को हल करना. अपेक्षाकृत सरल हो गया। पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी में जर्मनी में रोमन विधि को सर्वाधिक महत्व प्राप्त हुआ। यहीं से विधियों के ऐतिहासिक विकास की ओर विधिशास्त्रियों का ध्यान आकृष्ट हुआ।

अठारहवीं शताब्दी में तर्कवाद (rationalism) के प्रादुर्भाव के कारण राजनीतिक व्यक्तियों को बढ़ावा मिला। इसी समय अनेक विधि-संहिताओं का निर्माण हुआ जो प्राकृतिक विधि पर आधारित होने के कारण सार्वभौमिक मानी गई। तत्पश्चात् व्यक्तिवाद (individualism) के प्रचार और प्रसार के कारण लोगों में स्वतन्त्रता और राष्ट्रीयता की भावना उभरने लगी। इसके परिणामस्वरूप श्रमिक वर्ग में भी नवचेतना जागृत हुई। इन सब समस्याओं के समाधान हेतु विधिवेत्ताओं ने ऐतिहासिक संकल्पनाओं की सहायता ली। इसी समय आर्थिक क्षेत्र में हुई अपूर्व प्रगति के कारण इसका प्रभाव ज्ञान की अन्य शाखाओं पर पड़े बिना नहीं रह | सका और इसने विधिशास्त्र को भी प्रभावित किया क्योंकि सामाजिक विचारकों ने श्रमिक वर्ग के उद्धार और मुक्ति का प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया था।

1. एडमण्ड बर्क : रिफ्लेक्शन ऑन दि रिवोल्यूशन इन फ्रांस (1970) पृ० 27,

2. फेड्रिक पोलक : एसेज इन जूरिसपूडेन्स एण्ड एथिक्स, (1882) पृ० 25.

ऐतिहासिक विचारधारा को आगे बढ़ाने में फ्रांस के मांटेस्क्यू (Montesquieu) , इंग्लैण्ड के एडमंड बर्क (Burke) तथा जर्मनी के ह्यगो (Hugo) के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता है।

मांटेस्क्यू (Montesquieu : 1689-1755)

सर हेनरो मेन के अनुसार मान्टेस्क्यू ऐसे प्रथम विधिशास्त्री थे जिन्होंने विभिन्न समुदायों की संस्थाओं और विधियों पर शोधकार्य करके यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि विधियों का स्वरूप विभिन्न प्राकृतिक एवं सामाजिक तथ्यों पर निर्भर करता है तथा विधि पर अन्य कारकों (factors) का गहरा प्रभाव पड़ता है। अतः विधि को देश तथा काल-विशेष की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन मानना चाहिए और इसका अध्ययन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। मॉन्टेस्क्यू का विचार था कि विविध तथ्यों में राष्ट्रीय लोक चेतना (esprit de la nation) भी एक ऐसा तथ्य है जिस पर विधि का स्वरूप निर्भर करता है। सभी विधियों का निर्माण कार्य-कारण (cause and effect) के प्रभाव से होता है।

एडमण्ड बर्क (Burke)–एडमण्ड बर्क के विचार से विधि एक क्रमिक और जैविक प्रक्रिया (organic process) की देन है इसलिए इसका अध्ययन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में किया जाना चाहिए।

गुस्टेव ह्यगो (Gustav Hugo) : (1768-1844)–ह्यगो के मतानुसार विधि समुदाय विशेष की भाषा तथा आचार की भाँति अपना रूप स्वयं ग्रहण करती है और स्वयं को परिस्थितियों के अनुकूल बनाकर विकसित होती रहती है। विधि के संदर्भ में विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि वह जनता द्वारा स्वीकृत और विनियमित की जाती है और जनता द्वारा उसका अनुपालन किया जाना आवश्यक है।

सैविनी (Savigny: 1779-1861)

जर्मन विधिशास्त्री फ्रेड्रिच कार्ल वोन सैविनी (Friedrich Karl Von Savigny) का जन्म जर्मनी के फ्रेंकफर्ट (Frankfurt) शहर में सन् 1779 में हुआ था। उनकी शिक्षा मारवर्ग तथा गोटिंगेन विश्वविद्यालयों (University of Marburg and Gottingen) में हुई। तत्पश्चात् वे लैण्डसहट विश्वविद्यालय में सिविल लॉ के प्राध्यापक रहे तथा बाद में उन्होंने सन् 1810 से 1892 तक बर्लिन विश्वविद्यालय में विधि के । प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। सन् 1842 में सेविनी को प्रशिया (Prussia) के विधि मन्त्री के रूप में पदभार सम्भाला जहां से वे सन् 1848 में सेवानिवृत्त हुये।

सेविनी द्वारा लिखित प्रमुख कृतियों में छ: ग्रन्थों में प्रकाशित उनकी History of Roman Law in Middle Ages (1815-1831), सिस्टम ऑफ मॉडर्न रोमन लॉ (1840-1849); लॉ ऑफ पेजेशन (1803) आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।

सेविनी ने बर्क और ह्यूगो के विचारों से प्रेरणा लेते हुए विधि के प्रति ऐतिहासिक दृष्टिकोण अपनाये जाने पर विशेष बल दिया। जर्मनी की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण सैविनी की  विचारधारा को प्रचण्ड समर्थन प्राप्त हुआ। नेपोलियन के युद्ध के पश्चात् जर्मनी में प्रचलित विधियों को संहिताबद्ध करने का प्रश्न उठा। उस समय वहाँ विभिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न विधियाँ प्रचलित थीं फ्रांसीसी सिविल कोड से अत्यधिक प्रभावित होकर हेडेलबर्ग (Heidelburg) के प्रोफेसर थीबॉट (Thibaut) ने जर्मन विधियों के संहिताकरण की आवश्यकता प्रतिपादित की । परन्तु इस कार्य में अनेक बाधाएँ उत्पन्न होने की आशंका थी। इसका मुख्य कारण यह था कि ये विधियाँ स्थानीय जनता के आचार तथा व्यवहार में अतीत काल से बिना किसी बाह्य हस्तक्षेप के प्रचलित चली आ रही थीं, अतः इनके नवीनीकरण के प्रश्न को लेकर संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने की संभावना थी। यह तर्क और परम्परा के बीच संघर्ष था। साथ ही यह इतिहास का राज्य का स्वेच्छा के विरुद्ध तथा मानव द्वारा बनाई गयी विधियों का विधि के स्वाभाविक विकास के प्रति संघर्ष था। सावनी ने परम्परा पर आधारित विधि के ऐतिहासिक विकास का समर्थन करते हुए विधि के सहितकरण का कड़ा विरोध किया। यहीं से विधि की ऐतिहासिक विचारधारा का सूत्रपात हुआ।

सेविनी का लोक चेतना का सिद्धान्त (Savigny’s Theory of Volkg विधि केवल अमर्त दालों और नियों –

SaVigny’s Theory of Volkgeist)—सैविनी के अनुसार संग्रह मात्र नहीं है अपितु वह किसी समुदाय विशेष या देश

विशेष के व्यक्तियों की आन्तरिक आवश्यकताओं और भावनाओं की अभिव्यक्ति है। विधि की उत्पत्ति व्यक्तियों के पारस्परिक सहयोग से हुई है। ऐतिहासिक आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रारम्भिक अवस्था में विधि को मानव स्वभाव और आचरण का एक अविच्छिन्न अंग माना गया था। सैविनी ने यो इस विचार से सहमति व्यक्त की है कि मानव सभ्यता के प्राथमिक चरण में ही विधि ने विभिन्न समदायों की भाषा, रीति-रिवाजों तथा गठन के अनुसार स्वरूप ग्रहण कर लिया था। वस्तुतः किसी समाज-विशेष के गठन तथा उसकी भाषा और रीति-रिवाजों को वहाँ की विधि से पृथक् नहीं रखा जा सकता है, ये सभी एक दूसरे में पूर्णतः घुल-मिल जाते हैं। उनका दृढ़ विश्वास था कि विधि की उत्पत्ति लोक चेतना पर ही आधारित है। और जब तक इसे जन समर्थन प्राप्त रहता है यह प्रगति करती रहती है लेकिन लोक समर्थन समाप्त होते ही विधि का महत्व समाप्त हो जाता है।

किसी राष्ट्र और उसकी विधि में ऐतिहासिक संबंध स्थापित करते हुए सैविनी (Savigny) ने स्पष्ट किया कि किसी राष्ट्र के विकास के साथ-साथ वहाँ की विधि भी विकसित होती रहती है। जब राष्ट्र में चेतना उत्पन्न होती है तो वहाँ की विधि भी प्रभावोत्पादक हो जाती है परन्तु जब राष्ट्र अपनी राष्ट्रीयता खो देता है, तो विधि का विनाश हो जाता है। सैविनी ने ‘राष्ट्र’ शब्द की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि इसका तात्पर्य उस मानव-समुदाय से है जो सामयिक, ऐतिहासिक तथा भौगोलिक श्रृंखलाओं द्वारा एक-दूसरे से सूत्रबद्ध हैं। सारांश यह है कि सैविनी ने विधि को जन जीवन की सामान्य लोक-चेतना’ (Volkgeist) का प्रतीक माना है इसीलिये उनके विचारों को ‘लोक-चेतना का सिद्धान्त’ (Theory of Volkgeist) की संज्ञा दी गयी है। सैविनी का स्पष्ट मत था कि यदि विधि के स्वाभाविक विकास से किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न हो जाती है, तो देश में अराजकता और अशांति फैलना अवश्यंभावी है जो जनता के लिए कष्टदायी होती है। सैविनी तथा उसके समर्थकों की विधि-सम्बन्धी ऐतिहासिक विचारधारा के मूलभूत सिद्धान्त निम्नलिखित थे-

(1) मानव-समुदाय में विधि का अस्तित्व आचारगत नियमों के रूप में विद्यमान रहता है। अतः विधि निर्मित नहीं की जाती अपितु वह जन-समुदाय में विद्यमान रहती है। विधि का विकास शारीरिक विकास की भांति जैविक सिद्धान्त पर आधारित रहता है तथा वह अपने-आप होता रहता है। अतः इस दृष्टिकोण से , विधायन (Legislation) का महत्व रूढ़िगत रीति-रिवाजों की तुलना में निम्न कोटि का है।।

(2) विधि का विकास आदिम समुदायों में प्रचलित कुछ सहज ग्राह्य विधिक सम्बन्धों से प्रारम्भ हुआ जो कालान्तर में सामाजिक प्रगति के कारण वर्तमान विधि की जटिलताओं में परिणित हो गये विधि के सम्बन्ध में जनता की धारणाओं का प्रतिनिधित्व वकील वर्ग द्वारा किया जाता है जो स्वयं भी जनता का ही एक अंश है। अधिवक्ताओं द्वारा व्यक्त की गयी विधिक भावनाओं को विधायन द्वारा मान्यता प्रदान की जाती है। अतः विधि-निर्माण में विधायकों के बजाय अधिवक्ताओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण मानी जानी चाहिए।

(3) विधि का स्वरूप सार्वभौमिक (universal) नहीं होता है और न इसे सभी स्थानों पर समान रूप से लागू ही किया जा सकता है। विधि देश-विशेष के अनुसार वहाँ के लोगों की भावनाओं तथा धारणाओं के अनुकुल बदलती रहती है। सैविनी ने किसी राष्ट्र-विशेष की भाषा तथा वहाँ प्रचलित विधि में समानता स्थापित करते हुए कहा है कि एक देश की भाषा या विधि दूसरे देश के प्रति लागू नहीं की जा सकती है। किसी देश की विधि वहाँ के जन-समुदाय की लोक चेतना (Volkgeist) की प्रतीक होती है।

(4) सैविनी के अनुसार प्राकृतिक विधि के ‘नैतिक आदेश’ को विधि की शास्ति के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। कानून के पीछे वास्तविक शास्ति (sanction) ‘सामाजिक दबाव’ (Social pressure) ही है।

(5) विधि निर्माण के समय उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर विचार किया जाना चाहिए अर्थात् किसी

विषय से सम्बन्धित विधि का निर्माण करते समय इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए कि भूतकाल में उस

3. फ्रीडमैन एल० एम० : लीगल थ्योरी (5वां संस्करण), पृ० 210.

विषय पर किस प्रकार की विधि प्रचलित थी तथा कालान्तर में उसमें परिवर्तन की आवश्यकता किन कारणों से हुई।

(6) सैविनी का निश्चित मत था कि विधि स्थायी स्वरूप की नहीं होती है तथा वह जन-भावना के अनुरूप सदैव परिवर्तनशील रहती है। उनके अनुसार किसी राष्ट्र की विधि उस राष्ट्र के विकास के साथ। विकसित होती रहती है, बढ़ती रहती है तथा उस राष्ट्र के विघटन के साथ समाप्त हो जाती है। इसीलिए सैविनी जर्मन विधि के संहिताकरण के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि इससे विधि के विकास की गति रुक जाने की संभावना ठीक उसी प्रकार थी जिस प्रकार कि किसी अवरुद्ध तालाब का पानी निकासी के अभाव में रुका रह जाता है। उनके द्वारा जर्मन विधि के संहिताकरण का विरोध किये जाने का एक अन्य कारण यह भी था कि उस समय जर्मनी में लोक चेतना (Volkgeist) का पर्याप्त विकास न हुआ होने के कारण संहिताकरण के परिणामस्वरूप विधि का विकास अवरुद्ध हो जाने की संभावना थी।

लोक-चेतना‘ (Volkgeist) के सिद्धान्त की आलोचना

इसमें संदेह नहीं कि सैविनी के विचार तत्कालीन जर्मन समाज की भावनाओं के अनुकूल होते हुए भी उनमें भावुकता और काल्पनिकता का अंश अधिक था। अनेक विधिशास्त्रियों ने सैविनी के ‘लोक चेतना के सिद्धान्त’ की आलोचना की है जिसका निष्कर्ष इस प्रकार है|

(1) सैविनी के इस कथन का खण्डन करते हुए कि विधि किसी समुदाय या समाज-विशेष की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है, डॉ० एलेन कहते हैं कि यदि ऐसा होता, तो रोमन विधि समस्त यूरोप में सफल नहीं हो पाती क्योंकि यह विधि यूरोपीय जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति नहीं थी। एलेन ने सैविनी के इस मत का भी खण्डन किया कि विधि के निर्माण में अधिवक्ता-वर्ग का विशेष योगदान रहता है क्योंकि वे जनता के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। एलेन के अनुसार विधियों तथा पूर्वोक्तियों (Precedents) का निर्माण न्यायाधीशों द्वारा भी किया जाता है।

यह कहना उचित नहीं है कि विधि सदैव ही जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है। कभी-कभी विधि के विकास में व्यक्ति विशेष के योगदान का अत्यधिक महत्व रहता है फिर चाहे वह व्यक्ति विदेशी नागरिक ही क्यों न हो। उदाहरण के लिए न्यायाधीश कोक (Coke) तथा लिटिलटन (Littleton) ने विधि को केवल विकसित ही नहीं किया वरन् उसे एक नई दिशा भी प्रदान की। |

(2) यद्यपि सैविनी द्वारा विधि के प्रति अपनाई गई ऐतिहासिक पद्धति विधि की संकल्पनाओं (concepts) का खण्डन करती है तथा प्राकृतिक विधि के प्रति विरोध प्रकट करती है, परन्तु वास्तव में सैविनी का ‘लोक-चेतना का सिद्धान्त’ जिसे उन्होंने ‘वोल्कजिस्ट’ कहा है, स्वयं ही बाह्य तथ्यों पर आधारित एक आदर्शात्मक कल्पनामात्र है।

(3) अनेक विधियों का निर्माण जन-चेतना की अदृश्य अभिव्यक्ति पर आधारित न होकर मानव समुदाय के परस्पर संघर्षों के कारण आवश्यक हो जाता है, जो सैविनी के सिद्धान्त के अनुकूल नहीं है। उदाहरण के लिये वर्तमान श्रमिक विधियाँ (जैसे फैक्ट्रियों अथवा ट्रेड यूनियन–सम्बन्धी कानूनों की रचना) जन-समुदाय में संघर्ष की स्थिति को टालने के लिये ही की गई है। यद्यपि सेविनी विधिक सुधारों के विरोधी नहीं थे परन्तु विधि के संहिताकरण के प्रति उनका रुख निराशात्मक था-क्योंकि सभी समस्याओं का समाधान संहिताबद्ध विधि द्वारा संभव नहीं है।

(4) अनेक विधियाँ ऐसी हैं जो शासक अपनी सुविधा के लिए बनाता है तथा वे जन-समुदाय की चेतना की अभिव्यक्ति नहीं होती हैं। दासता का कानून इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

(5) सैविनी ने एक ओर तो विधि को जन-समुदाय की लोक-चेतना की अभिव्यक्ति माना है, परन्तु साथ। ही दूसरी ओर अपने देश (जर्मनी) के लिए रोमन विधि का समर्थन किया। उनके इन दो परस्पर विरोधी तक। में कोई ताल-मेल नहीं दिखलायी देता है।

(6) सैविनी के अनुसार लोक-चेतना की अनुभूति प्रचलित प्रथाओं में व्याप्त रहती है। यही कारण है कि उन्होंने प्रथाओं को विधान की अपेक्षा गुरुतर माना है। उनके अनुसार विधान केवल प्रथाओं का संहिताबद्ध रूप है। परन्तु इस मान्यता के कारण विधायन की सृजनात्मक शक्ति की जो उपेक्षा हुई वह उचित नहीं है । इससे विधि के सुधार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(7) डीन रास्को पाउण्ड ने सेविनी के लोक चेतना के सिद्धान्त को विधिक निराशावाद (legal passimism) निरूपित करते हुये इसे विधि की प्रगति में बाधक माना। उनके और कोई भी विधि व्यवस्था दास प्रथा या गुलामी जैसी बुराइयों तथा कुरीतियों को इस आधार पर जारी बनी रहने देने की अनुमति नहीं देगी क्योंकि लोग सदियों से इसके आदी हो गये हैं। प्रोफेसर पोर्कनोवे (Porkunove) ने भी सेविनी द्वारा प्रतिपादित लोक चेतना के सिद्धान्त की इस आधार पर आलोचना की है क्योंकि यह राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध स्पष्ट करने में विफल रही है।।

(8) सेविनी के लोकचेतना के सिद्धान्त का एक दुष्परिणाम यह हुआ कि अनेक राष्ट्रों ने इसे अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के साधन के रूप में प्रयुक्त किया। अत: नाजियों (Nazis) ने इसका उपयोग जातीयतावाद को बढ़ावा देने के लिये किया जबकि मार्क्सवादियों ने इसे अपनी साम्यवादी आर्थिक नीति के पोषण का साधन माना। इटली में इसके कारण फासिस्ट राज्य व्यवस्था कायम हुई।

उपर्युक्त आलोचना के बावजूद इसमें संदेह नहीं कि सैविनी के विचारों से विधिक इतिहास के अध्ययन को पर्याप्त प्रोत्साहन मिला है।

सैविनी (Savigny) की ऐतिहासिक विचारधारा को बाद में विको, हर्डर तथा पुश्ता (Puchta) आदि विधिशास्त्रियों ने विकसित किया। इन विचारकों ने राज्य द्वारा निर्मित विधि का विरोध करते हुए आचार और परम्पराओं पर आधारित विधि को अधिक महत्व दिया।

सैविनी और ऑस्टिन के विधि-संबंधी विचारों का तुलनात्मक अध्ययन

सैविनी और ऑस्टिन, दोनों का ही विधि-क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान रहा है। सैविनी विधिशास्त्र की ऐतिहासिक शाखा के प्रवर्तक थे जब कि ऑस्टिन विश्लेषणात्मक विधिशास्त्र के समर्थक थे। सैविनी ने विधि को लोक-चेतना का परिणाम माना है जबकि ऑस्टिन विधि को संप्रभु का समादेश मानते हैं। | सैविनी और ऑस्टिन के विधि सम्बन्धी विचारों में अन्तर होते हुए भी दोनों प्राकृतिक विधि की श्रेष्ठता के विरोधी थे तथा दोनों ने विधि के प्रति तुलनात्मक पद्धति अपनाते हुए विधि की वास्तविकता को अधिक महत्व दिया, तथापि दोनों में निम्नलिखित असमानताएं थीं

(1) सैविनी ने रोमन तथा जर्मन विधि को अपनी लोक-चेतना का आधार बनाया जबकि ऑस्टिन का आज्ञात्मक सिद्धान्त इंग्लिश विधि पर आधारित है।

(2) सैविनी का सिद्धान्त समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण पर आधारित है जबकि ऑस्टिन ने अपने सिद्धान्त में तर्क (reason) को विशेष महत्व दिया।

(3) ऑस्टिन विधि को राज्य की उपज मानते हैं परन्तु सैविनी विधि को राज्य का पूर्ववर्ती मानते हैं।

(4) ऑस्टिन ने ‘शास्ति’ को विधि का आधार-बिन्दु माना परन्तु सैविनी इसे स्वीकार नहीं करते।।

हीगल (Hegel : 1772-1831)

हीगल ने सैविनी के लोक-चेतना के सिद्धान्त (Volkgeist) को अपने विचारों का केन्द्रबिन्द्र बनाया। हीगल के विचारों में ऐतिहासिक तथा विधि-दर्शन के तुलनात्मक तत्व समाविष्ट हैं। उन्होंने प्राकृतिक विधि तथा निश्चयात्मक विधि में अन्तर स्पष्ट किया। हीगल के अनुसार विधि दर्शन (legal philosophy) और। निश्चयात्मक विधि में भिन्नता है। वस्तुत: विधि-दर्शन निश्चयात्मक विधि की तार्किक मान्यता का निर्धारण है। उन्होंने सम्पत्ति के अधिकार को व्यक्ति की स्वतन्त्रता की प्रथम अभिव्यक्ति माना तथा उनके अनुसार राज्य

का सदस्य होना मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ ध्येय है। हीगल के अनुसार राज्य और विधि दोनों ही मानव के तर्कबुद्धि की उपज हैं।

हीगल जर्मन-दार्शनिक विचारधारा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने कॉण्ट (Kant) के विधि सिद्धान्त को आगे बढ़ाते हुए कथन किया कि मानव में तर्क बुद्धि होने के कारण वह स्वच्छन्द प्राणी है परन्तु फिर भी यह भौतिक नियमों के अधीन होता है। हीगल का निश्चित मत था कि सांसारिक वस्तुयें विकासशील प्रक्रिया से होकर गुजरती हैं। उनके अनुसार मनुष्य की भौतिक इच्छा (ego) तथा चेतना (super-ego) में निरन्तर द्वन्द्व होता रहता है। इन दोनों में समन्वय के आधार पर मनुष्य विकास की ओर अग्रसर होता है। अतः हीगल कहते हैं कि जो भी उचित है वह वास्तविक है और जो वास्तविक है वही उचित है।”

कोहलर (Kohler : 1849-1919)

कोहलर ने अपने विधि-दर्शन द्वारा हीगल तथा हेनरी मेन की विधि-सम्बन्धी धारणाओं को नई दिशा । प्रदान की। कोहलर का मत था कि विधि सदैव सापेक्ष (relative) होती है तथा इस पर उस सभ्यता का गहरा प्रभाव पड़ता है जिसमें कि वह विकसित हुई है। उनके मतानुसार विधि सदैव सामाजिक सभ्यता का अनुसरण करती है जिसका मूल उद्देश्य यह होता है कि समाज की प्रगति हो। कोहलर ने कथन किया कि मानव मस्तिष्क में प्रकृति के भौतिक पदार्थों के प्रति चल रहे अन्तर्द्वन्द्व के कारण ही समाज प्रगति की ओर अग्रसर होता रहता है। समाज के विकास के संदर्भ में विधि का प्रमुख कार्य यह है कि वह प्रचलित मान्यताओं (values) को यथावत् बनाये रखे तथा समयानुसार नई धारणाओं का सृजन करे। विधायकों, विधिवेत्ताओं तथा न्यायाधीशों आदि का यह परम कर्तव्य है कि वे विधि को समयानुकूल बनाये रखें। कोहलर की इस विचारधारा ने आगे चलकर रास्को पाउन्ड (Roscoe Pound) के सामाजिक यान्त्रिकी (Social Engineering) का रूप ग्रहण किया जिसमें सामाजिक हितों (social interests) में संतुलन बनाये रखने पर जोर दिया गया था।

हरबर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer : 1820-1923)

विधि की तुलनात्मक प्रणाली का एक विशिष्ट रूप साम्यानुमानिक (analogical) पद्धति है। इस पद्धति के समर्थकों ने विधि के विकास को जैविक विकासवादी (evolutionary) सिद्धान्त पर आधारित किया। डारविन के सिद्धान्त को मान्य करते हुए इन विचारकों ने यह मत व्यक्त किया कि मनुष्य समयानुसार स्वयं को परिस्थितियों के अनुकूल ढाल लेता है। हरबर्ट स्पेंसर इस पद्धति के प्रमुख प्रवर्तक माने गये हैं। उन्होंने अपने विचारों को मौलिक सिद्धान्तों पर आधारित करते हुए कथन किया कि समाज के तीन मूलभूत नियम है-

  • बल की शाश्वतता (Persistence of force),
  •  पदार्थ की अनश्यता (Indestructibility of matter), तथा

(iii) गति की निरन्तरता (Continuity of motion) ।।

व्यक्तिवादी विचारधारा के समर्थक होने के कारण हरबर्ट स्पेंसर ने व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अधिक जोर दिया तथा व्यक्ति के कार्यों में राज्य के हस्तक्षेप को यथासम्भव सीमित रखे जाने का समर्थन किया। उन्होंने विधायन (legislation) द्वारा विधियों के सुधार का विरोध किया क्योंकि उनके विचार से विधायिनी द्वारा बनाये गये कानून तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक कि उनका स्वाभाविक रूप से विकास न हुआ हो। वर्तमान समय में स्पेन्सर के सिद्धान्त का विशेष महत्व नहीं रहा है। इसका कारण यह है कि राज्य और सावयवी शरीर (organism) में समानता हो सकती है, किन्तु इस रामानता का अर्थ यह कदापि नहीं है कि राज्य की एक वास्तविक शरीर माना जाये। स्पेन्सर के विकासवादी सिद्धान्त का विधिक महत्व इतना ही है। कि इससे यह संकेत मिलता है कि विधि के प्रति ऐतिहासिक दृष्टिकोण की बजाय समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण अपनाये जाने पर अधिक जोर दिया जाना चाहिये।

सर हेनरी मेन (Henry Maine : 1822-1888)

इंग्लिश विधि के ऐतिहासिक विकास में सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine) का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से विधि शिक्षा प्राप्त की तथा बाद में सन् 1847 से 1854 तक उन्होंने इसी विश्वविद्यालय में विधि के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। राष्ट्र के हित में उन्होंने सर्वश्रेष्ठ कार्य यह किया कि ब्रिटेनवासियों को सामन्तवादी निरंकुश शासन-व्यवस्था से मुक्ति दिलाई, इसीलिये उन्हें ‘सामाजिक डार्विन’ (Social Darwinist) के रूप में ख्याति प्राप्त हुई। 

हेनरी मेन ने जर्मन ऐतिहासिक पद्धति के अन्तर्गत प्रकाशित रोमन विधि और उसके विकास का सर्वांगीण अध्ययन किया। वे इंग्लिश, रोमन तथा हिन्दू विधि के अच्छे ज्ञाता थे। इन विधियों के गूढ़ अध्ययन के परिणामस्वरूप उन्होंने विधि के ऐतिहासिक अध्ययन में तुलनात्मक पद्धति अपनाई जाने पर बल दिया। सर । हेनरी मेन (Sir Henry Maine) की विचार-पद्धति का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine) को विधिशास्त्र की ऐतिहासिक शाखा का प्रणेता माना जाता है। इस क्षेत्र में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण था कि उन्हें अपने समय का सामाजिक डार्विन (Social Darwin of his time) माना जाता था जिन्होंने मानव को सामंतवादी श्रृंखलाओं से मुक्त कराकर उसके स्वतंत्र अस्तित्व पर जोर दिया। सर हेनरी मेन की शिक्षा केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हुई जहाँ उन्होंने सन् 1847 से 1854 की कालावधि में सिविल विधि के प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया। वे 1863 से लेकर 1869 तक भारत की केन्द्रीय विधायनी परिषद (Central Legislative Council) के सदस्य भी रहे। उन्होंने भारत में अपने कार्यकाल के दौरान तत्कालीन भारतीय विधि का गहन अध्ययन किया तथा उसकी तुलना आंग्ल विधि से करते हुये दोनों में महत्वपूर्ण सुधारों का सुझाव दिया। हेनरी मेन सन् 1869 से 1877 की कालावधि में आक्सफोर्ड के कार्पस क्रिस्टी कालेज में ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक विधिशास्त्र पीठ (Chair) के विशिष्ट प्राध्यापक के रूप में सुशोभित किया।

सर हेनरी मेन की कृतियों में यह झलक स्पष्टतः दिखलाई देती है कि सामाजिक तथा विधिक कारकों (Social and legal factors) को एक दूसरे से पूर्णतः पृथक् नहीं रखा जा सकता है। किसी भी स्थान विशेष की विधि के अध्ययन के लिये उस स्थान की भौगौलिक, भौतिक, सामाजिक तथा नैतिक भिन्नताओं पर विचार किया जाना आवश्यक होता है। अत: किसी विधि को भलीभाँति समझने के लिये उन परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होगा जिनमें वह विधि निर्मित हुई है और इसमें स्थान विशेष की परम्पराओं, रीतिरिवाजों, प्रथाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।  

सर हेनरी मेन ने विभिन्न देशों की विधि-प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन करके विधि के विकास सम्बन्धी कुछ सामान्य निष्कर्ष निकाले । हिन्दू विधि तथा रोमन लॉ के तुलनात्मक अध्ययन के बाद उन्होंने यह मत व्यक्त किया कि समाज या तो स्थिर (static) होता है अथवा विकासशील (Progressive)  इन दोनों प्रकार के समाजों के विधिक विकास में भिन्नता होती है। तथापि मेन का यह निश्चित मत था कि ये दोनों प्रकार के समाज अपनी प्रारम्भिक अवस्था में निम्नलिखित विधिक चरणों में से गुजरते हैं

(1) प्रथम चरण में विधि का विकास वैयक्तिक आदेश द्वारा प्रारम्भ होता है। इस अवस्था में शासक के वैयक्तिक आदेशों को ईश्वरीय इच्छा का प्रतीक माना जाता है।

(2) द्वितीय चरण में उपर्युक्त आदेश प्रथा का स्वरूप ले लेते हैं।

(3) तृतीय अवस्था में शासक के स्थान पर कुछ सीमित लोगों का आधिपत्य स्थापित हो जाता है, जो स्वयं विधियों को प्रसारित करते हैं।

(4) समाज की चतुर्थ अवस्था में बहुजन समुदाय विधि-निर्माताओं के विरुद्ध विद्रोह करते हैं जिसके परिणामस्वरूप विधि प्रसारित होकर संहिता का रूप धारण कर लेती है।

4. The main works of Sir Henry Maine include Ancient Law (1861): Village Communities (1871);

Early History of Institutions (1975); Dissertation on Early Law & Custom (1883).

उपर्युक्त चार अवस्थाओं तक स्थिर तथा विकासशील, इन दोनों ही प्रकार के समाज में विधियों का विकास एक समान होता है। परन्तु चतुर्थ चरण में पहुँचने के पश्चात् स्थिर समाज (static societies)

आगे विकसित नहीं हो पाता है। अत: उसकी विधियों का विकास भी कुंठित हो जाता है किन्तु । विकासशील समाज (progressive societies) में विधि का विकास (1) वैधानिक परिकल्पनाओं

(legal fictions), (2) साम्या (equity) तथा (3) विधायन (legislation) के माध्यम से निरन्तर जारी | रहता है। 

(1) वैधानिक परिकल्पनाएँ (Legal Fictions)–हेनरी मेन के अनुसार वैधानिक कल्पना एक ऐसा साधन है जो नवीन नियमों को पुरातन परिस्थिति के प्रति लागू करती है। इसके अन्तर्गत विधि के अन्तर्गत कतिपय ऐसी वस्तुओं के अस्तित्व को मान लिया जाता है जिनका वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है। उदाहरणार्थ निगमित निकायों को विधि के अन्तर्गत विधिक व्यक्ति मान लिया गया है जिनके अधिकार और दायित्व ठीक उसी प्रकार होते हैं जैसे कि किसी जीवित व्यक्ति के। इसी प्रकार विधि के अन्तर्गत हिन्दू देवमूर्तियों को विधिक व्यक्ति माना गया है। हिन्दू विधि के अन्तर्गत दत्तक-पुत्र को नैसर्गिक जन्मे पुत्रवत मान्यता प्राप्त है तथा उसे वे सभी अधिकार प्राप्त हैं जो कि सगे पुत्र को। यह विधिक परिकल्पना का उत्कृष्ट उदाहरण है।

(2) साम्या (Equity)-साम्या के अन्तर्गत ऐसे सभी सिद्धान्तों का समावेश है जिन्हें मानव की अन्तरात्मा स्वीकार करती है। वस्तुत: साम्या का प्रयोग इंग्लैंड के ‘कॉमन लॉ’ के दोषों के निवारण हेतु किया। गया। उन्नीसवीं शती के पूर्व इंग्लैंड में प्रचलित कामन लॉ में अनेक दोष विद्यमान थे जिनके कारण लोगों को समुचित न्याय नहीं मिल पाता था और वे न्याय से वंचित रह जाते थे। इन दोषों में तीन दोष प्रमुख थे–(1) अनेक मामलों में उपचार का पूर्ण अभाव (Absence of Remedy), (2) समुचित उपचार उपलब्ध न होना (Inadequacy of Remedy), तथा (3) कॉमन लॉ में औपचारिकताओं को अनावश्यक अधिकार । (Excessive Formalism) । इन दोषों के निवारण हेतु साम्या विधि के सिद्धान्तों को लागू किया गया ताकि इससे कॉमन लॉ की उपर्युक्त कमियों और दोषों को दूर किया जा सके। न्यास (Trust), मुजराई (set-off), कतिपय साक्षियों का कमीशन पर परीक्षण (examination of witnesses on commission) आदि की अवधारणाएँ साम्या विधि के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इंग्लैंड में सन् 1873 में ज्यूडीकेचर एक्ट पारित हो जाने के

फलस्वरूप कामन लॉ न्यायालयों तथा साम्या न्यायालयों को एक-दूसरे में विलय करके एक हाई कोर्ट ऑफ | ज्यूडीकेचर की स्थापना की गई और यह नियम बनाया गया कि कॉमन लॉ और साम्या विधि में विरोधाभास की दशा में साम्या विधि अभिभावी होगी। वर्तमान में कॉमन लॉ और साम्या विधि दोनों को मिलाकर एक एकीकृत विधि प्रणाली इंग्लैंड में प्रभावी है। 

( 3 ) विधायन (Legislation)-वर्तमान समय में विधायन को विधि-निर्माण का सर्वोत्तम तरीका माना गया है। प्रायः सभी देशों में विधिक सुधारों को लागू किये जाने हेतु विधायन सशक्त साधन के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है। इसकी महत्ता को देखते हुए सभ्यता के विकास के साथ-साथ विधि-निर्माण के अन्य स्रोत गौण होते जा रहे हैं।

सर हेनरी मेन ने यह स्वीकार किया है कि सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ विधि भी परिवर्तित होती रहती है। परन्तु वे यह नहीं मानते कि विधि का यह परिवर्तन आवश्यक रूप से बुरे से अच्छे की ओर या अच्छे से अधिक अच्छे की ओर ही होगा।

विकासशील समाज का प्रास्थिति से संविदा की ओर प्रगमन (Movement of Progressive societies from status to contract) हेनरी मेन के अनुसार प्रारम्भिक समाज में, चाहे वह स्थिर समाज हो या विकासशील समाज, लोगों के धक कर्तव्य, अधिकार, विशेषाधिकार आदि विधि के आधार पर निर्धारित किये जाते थे। परन्तु सामाजिक विकास के साथ-साथ ‘प्रास्थिति’ (status) की महत्ता का लोप होने लगा तथा लोगों की वैधानिक स्थिति का।

निर्धारण उसके पारस्परिक समझौते के आधार पर किया जाने लगा। उल्लेखनीय है अब तक । समाज के प्रास्थिति से संविदा की ओर अग्रसर होने के परिणामस्वरूप रोम में दासों (slave) की सधार हुआ। इसी प्रकार इंग्लैण्ड में महिलाओं की दशा में पर्याप्त सुधार हुआ। अन्य स्थानों में बेगार जोर-जबर्दस्ती से मजदूरी करवाने के बजाय मालिक और नौकर के सम्बन्ध आपसी समझौते (contract) के आधार पर निर्धारित किये जाने लगे।

उल्लेखनीय है कि सर हेनरी मेन द्वारा समाज के विकास सम्बन्धी प्रास्थिति से संविदा की ओर प्रगमन  का कथन ‘अब तक’ (hitherto) शब्द से परिसीमित था, अर्थात् उन्होंने यह सम्भावना दर्शायी कि हो सकता

है कि भविष्य में समाज का विकास इस दिशा में होकर विपरीत दिशा में हो, जैसा कि वास्तव में दिखलाई  दिया।6

उल्लेखनीय है कि वर्तमान विधि व्यवस्थाओं को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि सर हेनरी मेन द्वारा कथित ‘प्रास्थिति से संविदा की ओर’ (status to contract) की क्रिया ने अब विपरीत दिशा अपना ली है; अर्थात् आधुनिक समाज ‘प्रास्थिति से संविदा’ की ओर न बढ़कर ‘संविदा से प्रास्थिति’ (contract to status) की ओर बढ़ रहा है। उदाहरण के लिये, वर्तमान युग में लोग औद्योगिक मामलों में अपनी शर्तों के आधार पर समझौता नहीं करते वरन् अब उनकी नियुक्ति, वेतन, कार्य के घण्टे, पेन्शन तथा अन्य भत्ते आदि का निर्धारण ट्रेड यूनियनों द्वारा समझौते के आधार पर किया जाता है। हेनरी मेन के अनुसार प्रास्थिति’ से तात्पर्य पारिवारिक अधीनस्थ द्वारा प्रतिष्ठापित किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति से है। ‘प्रास्थिति के अन्तर्गत परिवार के मुखिया के माध्यम से परिवार के सदस्य, स्त्री-बच्चे तथा नौकर आदि पारिवारिक बन्धन में एक दूसरे से आबद्ध रहते हैं।

सर हेनरी मेन ने समाज तथा विधिक संस्थाओं के उद्भव, विकास तथा स्रोत के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि हिन्दू तथा रोमन समाज पद्धति के पैतृक पद्धति (patriarchal) पर आधारित है। परिवार (family) को समाज का प्राथमिक चरण मानते हुए उन्होंने व्यक्त किया कि अनेक परिवार मिलकर घर बसाते हैं जिन्हें मिलाकर जन-जाति बनती है जिनके सामूहिक रूप को राष्ट्र कहते हैं। सर हेनरी मेन के मतानुसार स्त्रियों का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है तथा वे कुटुम्ब के मुखिया (patriapotestas) के पूर्णत: अधीन हैं। ऐसी व्यवस्था में वैयक्तिक विधि (personal law) प्रास्थिति (status) पर ही आधारित थी, जिसमें पुत्र-पुत्रियों तथा महिलाओं के अधिकारों को कोई स्थान नहीं था और उनसे केवल अपना दायित्व निभाने की अपेक्षा की जाती थी।

वर्तमान में भारत की आर्थिक और औद्योगिक क्रान्ति के साथ-साथ हस्तक्षेप-रहित अर्थव्यवस्था (laissez-faire) और पूँजीवाद का ह्रास हो गया तथा इन क्षेत्रों में राज्य के उचित हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप श्रमिकों, महिलाओं तथा कामगारों को शोषण के विरुद्ध संरक्षण प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप मजदूरों और कामगारों को सामाजिक व आर्थिक न्याय दिलाने के उद्देश्य से व्यापार संघ अधिनियम, 1926; औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947; न्युनतम मजदूरी अधिनियम, 1948; कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948: प्रसूति प्रलाभ अधिनियम, 1961; ग्रेच्युटी अधिनियम, 1972; बोनस अधिनियम, 1975; समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 आदि पारित हुए। इस प्रकार अब संविदात्मक दायित्व प्रास्थिति पर आधारित न होकर औद्योगिक और श्रमिक विधियों द्वारा प्रशासित होता है, जो इस बात का द्योतक है कि आज भारत में भी समाज का विकास संविदा से प्रास्थिति की दिशा में हो रहा है।

5. हेनरी मेन के ही शब्दों में, “The movement of progressive societies has hitherto been a movement from

status to contract.” ।

6. ए० वी० डायसी : लॉ एण्ड पब्लिक ओपीनियन इन इंग्लैण्ड इन 20th सेन्चुरी (गिन्सबर्ग द्वारा सम्पादित) अध्याय-1.

7. Dicey A.V.: Law And Public Opinion in England (2nd Ed 1914).

8. इसे Pater familiae कहा गया है.

प्रथा को विधि के रूप में स्वीकार करते हुए हेनरी मेन कहते हैं कि प्रथागत विधि निश्चित निर्णयों से। उत्पन्न होती है। रोमन ‘ट्वेल्व टेबल्स’ (Twelve Tables) तथा मनु-संहिता की प्रशंसा करते हुए हेनरी मेन कहते हैं कि इनमें हमें नागरिक, धार्मिक तथा नैतिक विधियों का अच्छा दिग्दर्शन मिलता है।

वधिशास्त्र के विकास में सर हेनरी मेन का योगदान

विधिशास्त्र की ऐतिहासिक शाखा को विधि के अध्ययन में प्रतिष्ठापूर्ण स्थान दिलाने के लिये सर हेनरी मेन का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। उन्होंने सैविनी के विधिक सिद्धान्त को विकसित करते हुये मानव समुदाय और विधि के परस्पर संबंधों को मान्यता दिलाते हुये विधि के विकास में विधिक प्रकल्पनाओं, साम्यिक सिद्धान्तों एवं विधायन के महत्व को प्रतिपादित किया।

जहां सैविनी ने अपने विधिक अध्ययन को केवल रोमन विधि और जर्मनी की विधि तक ही सीमित वा हेनरी मेन ने विभिन्न समुदायों में प्रचलित विधियों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर विधि के विकास को रेखांकित किया। इसी को आधार-स्तम्भ बनाते हुये विनोग्रेडॉफ, मेटलैंड, पोलक आदि विधिशास्त्रियों ने तुलनात्मक अध्ययन पद्धति को अपनाते हुये विधि के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जिसका वास्तविक श्रेय हेनरी मेन को ही दिया जाना चाहिये।

सैविनी और हेनरी मेन की विचारधारा में भिन्नता

यद्यपि सैविनी तथा सर हेनरी मेन दोनों ही विधिशास्त्र की ऐतिहासिक पद्धति के प्रमुख प्रवर्तक थे, परन्तु अनेक बातों में उनके विचार एक-दूसरे से भिन्न हैं। जहाँ एक ओर सैविनी ने प्रथाओं को महत्व दिया दूसरी ओर हेनरी मेन ने सभ्यता के विकास के साथ विधायन (legislation) द्वारा निर्मित संहिताबद्ध विधि की आवश्यकता पर बल दिया। अपने तर्क की पुष्टि में हेनरी मेन ने इंग्लैण्ड की तत्कालीन विधि की अस्पष्टता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि इसका मूल कारण यह था कि यह विधि प्रधान रूप से न्यायाधीशों द्वारा निर्मित की गयी थी न कि विधान-मण्डल द्वारा। हेनरी मेन ने सैविनी के लोकचेतना के सिद्धान्त (Volkgeist) को मान्य नहीं किया। उन्होंने विधान-मण्डल की सृजनात्मक शक्ति को स्वीकार किया जिसे विधि निर्माण का एक अनिवार्य साधन माना गया है। उनका ‘‘प्रास्थिति से संविदा की ओर” (status to contract) का सिद्धान्त व्यावहारिक होने के साथ-साथ तत्कालीन पूँजीवादी और औद्योगिक समाज की परिस्थितियों के लिये उसी प्रकार अनुकूल था जिस प्रकार कि सैविनी की लोकचेतना का सिद्धान्त तत्कालीन जर्मन-समाज की आन्तरिक भावनाओं के अनुकूल था। यद्यपि इन दोनों विधिशास्त्रियों के विचारों में भिन्नता है। फिर भी दोनों को उन मानवीय संस्थाओं (human institutions) की मौलिक दृढ़ता के प्रति अटूट विश्वास था जिन पर अधिकांश विधिक इतिहासकार अविश्वास करते हैं।

पुच्टा (Puchta : 1798-1856)

सैविनी के ही देशवासी और अनुयायी पुच्टा विधिशास्त्र की ऐतिहासिक शाखा के एक अन्य प्रबल समर्थक थे। उनके विचार अधिक तार्किक और सुलझे हुए थे। पुच्टा ने मानव जाति का ऐतिहासिक विकास बाइबिल में वर्णित तथ्यों पर आधारित करते हुए विधि की उत्पत्ति की व्याख्या की तथा इस बात पर जोर दिया कि मानव सदैव ही एकांतप्रिय रहा है। पुच्टा के अनुसार मानव केवल भौतिक एकता में ही विश्वास नहीं रखता अपितु उसके जीवन में आध्यात्मिक एवं वैचारिक एकता का भी पर्याप्त महत्व है। मानव समुदाय की वैचारिक एकता उसकी सामान्य इच्छा (General will) में प्रतिबिंबित होती है। मनुष्य के स्वयं के हित के कारण वैयक्तिक-इच्छा और सर्वसाधारण की इच्छा में टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है जिसके निवारण में विधि की अहम भूमिका होती है जिसे राज्य द्वारा प्रवर्तित किया जाता है। राज्य, विधि के माध्यम से व्यक्ति की वैयक्तिक इच्छाओं को अंकुशित करते हुए सामाजिक हितों को संवर्धित करता है। अत: राज्य की उत्पत्ति राज्य की विधि से प्रत्यक्षतः संबंधित है इसलिए इन दोनों के विकास का अध्ययन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में किया जाना चाहिए।

पुच्टा ने अपने गुरु सैविनी के इस विचार से सहमति व्यक्त की है कि लोकचेतना से विधि की उत्पत्ति हुई है लेकिन यह प्रक्रिया दृश्यमान नहीं है, अर्थात् इसे देखा नहीं जा सकता है। पुच्टा के अनुसार लोक चेतना से उत्पन्न विधि जब निर्मित होकर प्रवर्तित हो जाती है, तब उसके परिणामों को अनुभव किया जा सकता है। उनका निश्चित मत था कि इस दृष्टि से प्रथा एवं परंपराओं पर आधारित विधि विधायन द्वारा निर्मित विधि की अपेक्षा श्रेष्ठतम होती है क्योंकि उसे जन-साधारण का विश्वास और समर्थन प्राप्त होता है। पुच्टा का मानना है यदि विधायन की प्रक्रिया द्वारा निर्मित विधि में प्रचलित प्रथाओं एवं रूढ़ियों का समावेश किया जाए तो ऐसी विधि (कानून) अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है।    

गिर्के के विधिक विचार(Gierke’s Legal Philosophy)

ऐतिहासिक विचारधारा के समर्थकों में प्रसिद्ध विधिशास्त्री गिर्के (सन् 1841-1921) का नाम भी उल्लेखनीय है। गिर्क (Gierke) ने मानव-संगठन (Association) को अपनी विचारधारा का केन्द्र-बिन्दु बनाया। उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया कि मनुष्य का व्यक्तित्व राज्य की मान्यता पर निर्भर रहता है। उनके अनुसार वास्तविक सामाजिक नियंत्रण का मूल आधार यह है कि किसी समाज-विशेष में मानव समूहों। (Groups) ने स्वयं को किस प्रकार संगठित किया है। इस प्रकार गिर्के ने समाज की प्रगति तथा विधि के विकास को विधिक इतिहास तथा मानव की संगठन शक्ति के आधार पर निर्धारित करने का प्रयास किया। उन्होंने मानव-संगठनों के अनेक प्रकार बताये। गिर्के व्यक्तिवाद (individualism) के समर्थक नहीं थे बल्कि उनके विचारों में समूहवाद (collectivism) की झलक अधिक स्पष्ट दिखायी देती है। इस दृष्टि से उन्हें समाजशास्त्री की श्रेणी में रखा जा सकता है। यद्यपि गिर्के ने अपनी विचार-शैली में जैविक शब्दों के प्रयोग को टालने का यथासम्भव प्रयत्न किया परन्तु फिर भी उनके और हरबर्ट स्पेन्सर के विचारों में निकट साम्य है। विधिशास्त्र में गिर्के के विचारों का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इनसे विधि की ऐतिहासिक शाखा को समाजशास्त्रीय शाखा के रूप में विकसित होने में पर्याप्त सहायता मिली। यही कारण है कि अनेक विधिशास्त्री गिर्के की गणना ऐतिहासिक विचारकों में करते हैं जबकि कुछ उन्हें विधि की समाजशास्त्रीय शाखा का प्रतिनिधि मानते हैं।

विनोग्रेडॉफ (Vinogradoff) |

विधिशास्त्र की ऐतिहासिक शाखा के समर्थकों में विनोग्रेडाफ का नाम भी उल्लेखनीय है। उन्होंने विधि की उत्पत्ति राज्य की शास्ति मात्र से न मानकर जनमत या नागरिकों की इच्छा को भी महत्व दिये जाने पर बल दिया।

विनोग्रेडॉफ ने यह विचार प्रकट किया कि हेनरी मेन की ‘प्रास्थिति से संविदा’ की अवधारणा वर्तमान समूहवादी युग में लागू नहीं होती। उन्होंने वर्तमान समाजवादी व्यवस्था में कल्याणकारी राज्य की स्थापना को आवश्यक बताते हुए विधि के अध्ययन में तुलनात्मक पद्धति को उचित बताया। सर फ्रेड्रिक पोलक (Sir Fedrick Pollock : 1845-1936)  

सर फ्रेड्रिक पोलक के नाम का उल्लेख किये बिना विधिशास्त्र की ऐतिहासिक शाखा का विवेचन अधूरा रह जायेगा। पोलक ने इंग्लैण्ड में हेनरी द्वितीय तथा तृतीय के समय प्रचलित विधि की समीक्षा करते हुए कहा कि वे अनिश्चित या परिभाषित प्रथाओं तथा रीति-रिवाजों पर आधारित थीं।

पोलक अन्तर्राष्ट्रीय विधि को केवल नैतिकता मात्र न मानते हुए उसे वास्तविक विधि के रूप में स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार यह विधि राष्ट्रों के पारस्परिक विधि संबंधों पर आधारित है।

फ्रेड्रिक पोलक की विधि सम्बन्धी धारणा इस तथ्य पर आधारित थी कि वर्तमान में भूतकालीन संघटनाओं की झलक अवश्य ही प्रतिबिंबित होती है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि विधि के प्रत्येक नियम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाये और यह एव बौ’ ‘क अध्ययन तक  सीमित रहे। वास्तविकता यह है जब भी किसी वर्तमान प्रचलित विधि में कुछ दोष या कमिया दिखा ‘ हैं, उनके निवारण के लिये उस विधि के पूर्वातिहास या ऐतिहासिक दृष्टिपात करना आवश्यक होता है ताकि

उस विधि के अस्तित्व में आने के कारणों को समझा जा सके तथा उस समय की परिस्थिति तथा वर्तमान की परिस्थितियों के अन्तर को समझते हुये विधि को संशोधित या परिवर्धित किया जा सके। विधिशास्त्र की विश्लेषणात्मक विचारधारा तथा ऐतिहासिक विचारधारा में विभेद  विधिशास्त्र की विश्लेषणात्मक शाखा तथा ऐतिहासिक शाखा में वैचारिक भिन्नता को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जाता है :

विधि तथा विधिक सिद्धान्त के उद्भव सम्बन्धी जैविकी विचारधारा (Biological Approach to evolution of law and legal theory)—विधिशास्त्र की ऐतिहासिक विचारधारा के परिणामस्वरूप विधिशास्त्रियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया कि विधि के उद्भव का जैविकीय दृष्टिकोण से भी अध्ययन किया जाना चाहिये। सन् 1859 में प्रकाशित डार्विन की सुप्रसिद्ध कृति “On the Origin of Species) (अर्थात् प्रजीवियों के उद्भव के सम्बन्ध में) ने विधिशास्त्रियों को यह सोचने के लिये विवश कर दिया कि जीव-जन्तुओं की भांति विधि का विकास भी अस्तित्व के लिये संघर्ष (Struggle for existence) की प्रक्रिया के रूप में हुआ है। जिस प्रकार केवल ऐसे जीव जन्तु ही जीवित रहने में सफल होते हैं जो इस संघर्ष में विजयी होते हैं, ठीक उसी प्रकार केवल ऐसी विधियाँ ही अस्तित्व में बनी रह सकती हैं जो समाज के लिये उपयुक्त होती हैं। हरबर्ट स्पेन्सर (1820-1903) ने सामाजिक जैविकता तथा आंगिक जैविकता (social organism and biological organism) में समानता स्थापित करते हुये अभिकथन किया कि व्यक्ति वंशानुगतता के आधार पर स्वयं को सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल ढालने के लिये सतत् प्रयत्नशील रहता है तथा सामाजिक मानकों, मूल्यों, धारणाओं, दायित्वों आदि को अंगीकृत कर लेता है। इस प्रकार विभिन्न समाज अपनी-अपनी संस्कृतियों, रीति-रिवाजों का अनुसरण करते हुये अपनी विधियों को उद्भवित करते हुये उनका विकास करता है।10 तथापि वर्तमान में कल्याणकारी राज्यों की संकल्पना के कारण डारविन के जैविक सिद्धान्त को निरर्थक माना गया है क्योंकि प्रगतिगामी समाज में विधि को सामाजिक

9. Sir William Holdworth: A History of English Law Vol. XIII (1966) p. 126.

10.. आर० एम० डब्ल्यू डायस : ज्यूरिसपूडेन्स (5वां संस्करण, 1994) पृ० 386.

नियन्त्रण का एक सशक्त साधन माना गया है जो स्वयं को सामाजिक परिवर्तनों के अनुकूल ढालने के प्रति सजग रहती है।

जातीयतावादी विधि-सिद्धान्त (The Racial Theory of Law)  

जर्मनी में उग्रवाद को बढ़ावा देने के लिए नाजियों ने ऐतिहासिक विचारधारा का खंडन किया। एडोल्फ हिटलर ने जातीयता के आधार पर जर्मन लोगों की भावनाएँ भड़का कर इस सिद्धान्त का भरपूर उपयोग किया और सत्ता हथिया ली। इसका मानना था कि विधि मानव-रक्त (जाति) से ही उद्भावित होती है और इसका उद्गम भूतकालिक इतिहास से होता है। अत: जातीय कट्टरता सर्वोपरि विधि है।

जातीयतावाद (racialism) पर आधारित विधि-सिद्धान्त का उद्भव राष्ट्रीय समाजवादी जर्मनी (National Socialist Germany) में हिटलर के समय में हुआ। वस्तुतः यह नाजियों (Nazis) द्वारा सत्ता हथियाने के लिए विधि के सिद्धान्तों को तोड़-मरोड़कर भावुकता प्रधान बनाने का एक प्रयत्न मात्र था। प्रथम महायुद्ध (1914-19) के पश्चात् जर्मनी को साम्यवाद के प्रभाव से बचाये रखने के उद्देश्य से नाजी पार्टी ने सत्ता ग्रहण की। नाजियों की विधिक विचारधारा अनेक स्रोतों पर आधारित थी। जीवशास्त्रीय आन्दोलन से उन्हें यह स्फूर्ति मिली कि विधि का सृजन रक्त की वंशानुगतता पर निर्भर रहता है। ऐतिहासिक विचारधारा से उन्हें यह प्रेरणा मिली कि विधि का उद्गम भूतकालीन प्रथाओं तथा नियमों पर आधारित होता है तथापि नाजियों की जातीयतावादी विचारधारा सैविनी की ऐतिहासिक पद्धति से भिन्न थी। सैविनी ने राष्ट्र को एक ऐसा मानव समुदाय माना था जो ऐतिहासिक, भौगोलिक तथा संस्कृति के एक सूत्र में बंधा हुआ हो जबकि जातीयतावादी विधि सिद्धान्त के समर्थक नाजियों ने राष्ट्र के लिए केवल रक्त और भूमि (blood and soil) के बन्धनों को ही स्वीकार किया। परिणामत: रोमन विधि जिसे जर्मनी में सैविनी का समर्थन प्राप्त हुआ था नाजियों द्वारा हटा दी गयी तथा इसके स्थान पर प्रथाओं पर आधारित पुरातन जर्मन विधि पुनस्र्थापित की गयी। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस नवीन विचारधारा के समर्थकों ने ऐतिहासिक विधि की इस धारणा की अवहेलना की कि विधि का विकास क्रमिक एवं स्वाभाविक रूप से होना चाहिए। इन उवादियों ने केवल विज्ञान को ही विधि निर्माण का एक मात्र साधन माना। जातीयतावादी विचारकों ने हीगल और ड्यूगिट के विधि-सम्बन्धी विचारों का सहारा लेते हुए यह मत व्यक्त किया कि मनुष्यों को राज्य में पूर्णत: विलीन माना जाना चाहिए तथा मनुष्य की वैयक्तिक स्वतन्त्रता को पूर्णत: समाप्त किया जाना चाहिए।

जर्मनी की इस राष्ट्रीय समाजवादी विचारधारा के अनुसार विधि को दो प्रमुख सिद्धान्तों पर आधारित किया गया था

(1) नेतृत्व सिद्धान्त (Leadership Principle); तथा

(2) जातीयता का सिद्धान्त (Racial principle)

नेतृत्व के सिद्धान्त के अनुसार राष्ट्रीयतावादी विचारकों की धारणा यह थी कि राज्य एक संगठन है और संगठन की सशक्तता और एकता के लिए कुशल नेतृत्व की आवश्यकता होती है। अत: राज्य के नेता को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक माना जाना चाहिए। चूँकि देश का नेता राष्ट्रीय एकता का प्रतीक होता है; अत: राष्ट्र . के नेता द्वारा जो आदेश दिये जाते हैं, वे ही उस देश के कानून होते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक स्थिति में विधि का अनुपालन किया जाना चाहिये क्योंकि वह राष्ट्र-नेता की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है। विधि का लक्ष्य यह होना चाहिए कि वह राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करे। इस विधिक विचारधारा के परिणामस्वरूप जर्मनी में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पूर्णत: समाप्त कर दी गयी तथा इसे कार्यकारिणी के अधीनस्थ रखा गया। शक्ति विभाजन के सिद्धान्त को भी तिलांजलि दे दी गयी। राज्य में केवल एवः ही राजनीतिक दल (नाजी पार्टी) का अस्तित्व बना रहा तथा किसी अन्य दल का समर्थन करना देशद्रोह के समान माना ग !

नाजियों द्वारा प्रतिपादित जातीयतावादी सिद्धान्त (racial principle) के अनुसार टिधि को रक्त की। वंशानुगतता से सम्बद्ध किया गया था जिसका मुख्य उद्देश्य जाति की शुद्धता (racial purity) बनाये रखना था। इसीलिए नाजियों ने विधि को यहूदियों (Jews) के दमन का अच्छा अस्त्र माना। जर्मनी में यहूदियों को।

समानता के अधिकारों से वंचित रखा गया। नाजियों ने अपनी जातीयतावादी विचारधारा के कारण जर्मनी के सन 1900 के सिविल कोड का घोर विरोध किया क्योंकि यह अधिकांशत: रोमन विधि पर आधारित था जो जर्मन जाति के लिए एक विदेशी विधि थी। उल्लेखनीय है कि जर्मनी की जातीयतावादी विधि-व्यवस्था में केवल रक्त सम्बन्ध को ही प्रधानता दी गयी थी। इस विचारधारा के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय विधि का बन्धनकारी प्रभाव केवल इस कारण था कि वह राष्ट्रों की सहमति’ पर आधारित थी। किसी राष्ट्र द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय विधि के प्रति असहमति व्यक्त किये जाने पर उसका राष्ट्र के प्रति बन्धनकारी प्रभाव समाप्त हो जाना अवश्यम्भावी था। 

जातीयतावादी विधि-व्यवस्था का सबसे गम्भीर दोष केवल यही नहीं था कि वह बेतुके सिद्धान्तों पर आधारित था बल्कि वह आतंकवादी नीति का पोषक भी था।

विधि के अध्ययन में तुलनात्मक पद्धति को प्राथमिकता

विधि की ऐतिहासिक शाखा के समर्थकों ने विधि के अध्ययन में तुलनात्मक पद्धति अपनाई जाने पर सर्वाधिक महत्व दिया ताकि वर्तमान विधि के गुण-दोषों का मूल्यांकन करने के पश्चात् उनके दोषों तथा कमियों को दूर किया जा सके।

इस पद्धति के मुख्य समर्थकों में प्रोफेसर एच० सी० गटरिज (H. C. Gutteridge) का नाम विशेष उल्लेखनीय है जिन्होंने विधि के तुलनात्मक अध्ययन को एक पद्धति मात्र माना है न कि विधि का एक पृथक् विभाग। भारत के विधि आयोग द्वारा प्रेषित 42वां प्रतिवेदन (42 Report of Law Commission of India) इसका सर्वोत्तम उदाहरण है जिसने भारतीय दंड विधि के सुधार एवं संशोधन हेतु अनेक सुझाव दिये थे जो महाद्वीपीय देशों तथा एंग्लो अमेरिकन दंड विधियों के गहन अध्ययन के पश्चात् उन पर आधारित थे। । विधि के तुलनात्मक अध्ययन हेतु उपलब्ध सामग्री अनेक रूपों में हो सकती है, जैसे संहितायें, विधिग्रंथ, रिपोर्ट्स, जर्नल्स, आदि। उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी में विभिन्न देशों की विधि में किये गये सुधार एवं संशोधन विधियों के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से ही क्रियान्वित किये गये हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य (Indian Perspective)

प्राचीन भारतीय हिन्दू विधि के अध्ययन की दृष्टि से विधिशास्त्र की ऐतिहासिक विचारधारा का अत्यधिक महत्व है। उस समय विधि के प्रति लोगों की धारणा पूर्णतः भिन्न थी तथा विधि को धर्म का ही एक अनिवार्य अंग माना गया था। प्राचीन भारतीय समाज में कर्तव्य (Duty) को ही सर्वप्रथम धर्म माना जाता था तथा प्रत्येक व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह सभी के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करे और ऐसा न करने पर वह दण्ड का पात्र था। सामाजिक कर्तव्यों, मानकों, मूल्यों तथा परम्पराओं का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को दण्डित करना शासक का परम धर्म था और ऐसा न करने पर यह माना जाता था कि शासक प्रजा के प्रति अपने कर्तव्य से विमुख हुआ है।

उल्लेखनीय है कि प्राचीन भारत में धर्म के सम्बन्ध में धारणा वर्तमान समय से पूर्णतः भिन्न थी। उस समय धर्म का अर्थ पूजा-पाठ, देव-दर्शन, श्लोक पाठ या कथा-वाचन मात्र तक सीमित न रहकर मानव के सदाचरण तथा सत्कर्म पर आधारित थी। उसे सनातन धर्म’ की संज्ञा दी गयी थी जिसमें ‘कर्म’ तथा आचरण (action and conduct) को मानव का सर्वोपरि कर्तव्य निरूपित किया गया था। मनु-स्मृति के अनुसार धर्म का मूल आधार सदाचरण था।11 धर्म वह है जो मानव करता है न कि वह जो वह कहता है। इस प्रकार तत्समय धर्म, विधि एवं नैतिकता एक-दूसरे में पूर्णत: समाविष्ट थी। किसी भी प्रकार की अनैतिकता को विधिक मान्यता प्राप्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता था।  

प्राचीन हिन्द विधि के ऐतिहासिक अध्ययन के आधार पर यह स्पष्ट है कि तत्कालीन विधि हिन्दू धर्म ग्रन्थी, तथा वेदों12 पर आधारित थी। इन वेदों की दो प्रमुख शाखायें हैं जिनमें प्रथम कर्मकाण्ड तथा दूसरी

11. आचार : परमो धर्म (मनुस्मृति, अध्याय-1 श्लोक VIII.

12. ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद, इन चार वेदों में कुल 22,000 श्लोक हैं.

ज्ञानकाण्ड कहलाती है। मेक्समूलर (Max Muller) ने वेदान्त दर्शन को केवल जीवन को सुखमय बनाने का साधन मात्र न मानते हुये मृत्यु के पश्चात् मोक्ष प्रदाय करने वाला सर्वश्रेष्ठ मार्ग निरूपित किया है। मानव को उसका कर्तव्य बोध कराने की दृष्टि से भगवतगीता एक महत्वपूर्ण धर्मग्रन्थ है।

प्राचीन सनातन विधि में शासन को दैवीशक्ति के रूप में स्वीकार किया गया था तथा दण्ड को विधि का एक अभिन्न अंग माना गया था।

सन् 1192 में पृथ्वीराज चौहान के पतन के पश्चात् भारत में हिन्दू राज्य समाप्त होकर मुगल साम्राज्य स्थापित हुआ जिसमें कुरान की शरीयतों को ही विधि की मान्यता प्राप्त थी।

सन् 1754 में भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना के फलस्वरूप पुरातन हिन्दू विधि तथा मुस्लिम विधि का प्रभाव समाप्तप्राय हो गया यद्यपि वारेन हेस्टिंग्स ने ब्रिटिश न्यायाधीशों की सहायता हेतु हिन्दू पण्डित एवं मुस्लिम व्यक्तियों की नियुक्ति की थी। कालान्तर में अंग्रेजी विधि को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल ढालते हुये ब्रिटिश भारत में लागू किया गया।

सारांश में यह कहा जा सकता है कि प्राचीन धर्मशास्त्रों एवं चाणक्य के अर्थशास्त्र पर आधारित विधियों के स्थान पर ब्रिटिश विधि प्रस्थापित होने के कारण इन विधियों का ऐतिहासिक महत्व मात्र रह गया है। जिनके आधार पर प्राचीन भारत की गौरवशाली संस्कृति, परम्पराओं एवं नैतिक मूल्यों की झलक अवश्य मिलती है।

उपसंहार

विधि के प्रति ऐतिहासिक दृष्टिकोण अपनाने वाले विधिशास्त्रियों ने विधि की उत्पत्ति और विकास का विवेचन ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार विधि में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में किया जाना चाहिए तथा उन परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए। जिनमें विधि-विशेष को निर्मित किया गया था। यही कारण है कि फ्रेडरिक पोलक (Fredrick Pollock) ने कहा है कि वास्तव में ऐतिहासिक पद्धति मानव-समाज़ और उसकी विधिक संस्थाओं के सिद्धान्त के अलावा और कुछ नहीं है।13 इस विचारधारा के प्रवर्तक राज्य के प्रति विधि के सम्बन्ध को महत्व न देकर उन सामाजिक प्रथाओं को महत्व देते हैं जिनमें से विधि का निर्माण हुआ। ऐतिहासिक विधि-शास्त्री के लिए ‘विधि’ एक ऐसा रूढिजन्य नियम है जिसका विकास ऐतिहासिक आवश्यकता तथा लोकप्रिय प्रणाली से हुआ है। इंग्लैण्ड और भारत जैसी रूढ़ि प्रधान विधि व्यवस्थाओं के विकास में ऐतिहासिक विचारधारा का पर्याप्त महत्व रहा है।

विधिशास्त्र की ऐतिहासिक विचारधारा के समर्थकों ने विधि के विकास के लिए उसके ऐतिहासिक क्रमिक विकास के अध्ययन को आवश्यक माना है। विधि की तुलनात्मक अध्ययन पद्धति को विकसित करने का वास्तविक श्रेय ऐतिहासिक विधिशास्त्रियों को ही है जिसके परिणमस्वरूप विधि के चिन्तन को एक नयी दिशा मिली। ऐतिहासिक विचारधारा के समर्थकों का तर्क है कि विधि बनायी जाने के बजाय उसे अतीत से खोजा जाना चाहिए क्योंकि उसका स्वअस्तित्व होता है। वे प्रथा को विधि का औपचारिक स्रोत मानते हुए उसके बन्धनकारी प्रभाव को स्वीकार करते हैं। इन विधिशास्त्रियों के अनुसार विधायन तथा न्यायिक पूर्वोक्तियाँ प्रथाओं को बल नहीं देतीं वरन् उनका अपना स्वयं का मूल्य होता है। विधि का निर्माण इनके आधार पर नहीं किया जाता अपितु वह जैविक प्रक्रिया से स्वयं साकार रूप लेती रहती है। इसी प्रकार विधि सभी देशों में एक-सी नहीं होती क्योंकि विभिन्न देशों के रीति-रिवाजों, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों तथा परिस्थितियों के अनुसार उनमें भिन्नता होना स्वाभाविक है। ऐतिहासिक विचारधारा के समर्थकों ने विधि के निर्माण में अधिवक्ताओं की भूमिका को महत्वपूर्ण माना है क्योंकि अपने विधिक अनुभव के कारण विधायन कार्य में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहता है।

13. “The historical method is nothing else than the doctrine of evolution applied to human societies and institutions.”—Fredrikck Pollock, Oxford Lectures, p. 41.

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