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LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 5 Notes

 

LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 5 Notes:- Jurisprudence and Legal Theory Important Boos of LLB Law 1st Year / 1st Semester for Lawyer, Bachelor of Laws Notes Study Material in PDF Link in Website Available, LLB Previous Year Sample Model Test Question With Answer Paper in Hindi English Available.

 

 

अध्याय 5 विश्लेषणात्मक विचारधारा

(Analytical School)

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में अध्यात्मवाद के स्थान पर प्रयोगात्मक प्रवृत्ति प्रबल हो जाने के कारण विधि-दर्शन (legal philosophy) में परिकल्पना (speculation) की बजाय घटनाओं के सूक्ष्म अवलोकन पर आधारित निष्कर्षों को अधिक महत्व दिया जाने लगा तथा प्राकृतिक जगत पर इनकी प्रक्रिया के आधार पर परिणामों तक पहुँचने की पद्धति अपनाई गई। यहीं से विश्लेषणात्मक विचारधारा का शुभारम्भ हुआ जिसके परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के स्थान पर वर्तमान राष्ट्रवादी राज्यों की स्थापना होने लगी। इन राष्ट्रों की विशेषता यह थी कि राजनीतिक तथा वैधानिक सत्ता राज्य में ही केन्द्रित रखी गई। फलत: विधिव्यवस्था को अधिक सुव्यवस्थित बनाने तथा विधि-सामग्री को क्रमबद्ध रूप में संकलित करने की आवश्यकता बढ़ने लगी और प्रमाणवादी विधिशास्त्रियों का ध्यान प्रचलित वास्तविक विधि के सिद्धान्तों के विश्लेषण की ओर आकृष्ट हुआ।’ विधि’ या ‘कानून’ को राज्य के समादेश मानते हुए उन्होंने इन कानूनों के प्रति निश्चयात्मक तथा तात्विक दृष्टिकोण अपनाया। विश्लेषणात्मक विचारधारा के प्रवर्तका में जर्मी बेन्थम, ऑस्टिन, सामंड, हालैंड और केल्सन आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में प्राकृतिक विधि के सिद्धान्तों (Natural Law Theories) के विरुद्ध जोरदार अभियान शुरू हो गया था। इस आन्दोलन के प्रवर्तक प्रमाणवादी विधिवेत्ता (Positivist Jurist) ही थे जिन्होंने विधि-सम्बन्धी आध्यात्मिक या पारलौकिक विचारधारा का खण्डन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि विधिशास्त्र का मुख्य उद्देश्य वास्तविक विधि (अर्थात् ऐसी विधि जो किसी काल-विशेष में प्रचलित हो) के मूलभूत सिद्धान्तों का विश्लेषण करना है। अब तक विधिक दार्शनिकों ने कानून के अन्तिम उद्देश्य पर ही अधिक महत्व दिया था तथा उनके अनुसार विधि में ऐसे आदर्शों का समावेश आवश्यक था जिन्हें समाज उचित समझता था। परन्तु विधिशास्त्र की विश्लेषणात्मक विचारधारा (Analytical School) के समर्थकों ने वास्तविक प्रचलित विधि के विश्लेषणात्मक अध्ययन को ही महत्व दिया तथा वे निराधार परिकल्पनाओं (speculations) तथा आदर्शों (ideals) पर आधारित भूतकालीन विधि के अध्ययन को निरर्थक समझने लगे। विधि के प्रति विश्लेषणात्मक प्रमाणवादी दृष्टिकोण (Analytical Positivism) अपनाने वाले विधिशास्त्रियों के अनुसार विधि (कानून) के निम्नलिखित पाँच प्रमुख लक्षण हैं :

1. विधि मानव द्वारा निर्मित आदेश है।

2. विधि और नैतिकता एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न हैं। इसका आशय यह है कि विधि, ‘जैसी कि

वह है’ तथा ‘ जैसी कि वह होनी चाहिए’ में अन्तर है। प्रमाण-वादियों ने जैसी कि वह है’

(अर्थात् वास्तविक विधि को) ही अपने अध्ययन का केन्द्र बिन्दु बनाया।

3. उन्होंने विधिक सिद्धान्तों का परीक्षण तथा अर्थान्वयन किया जाना आवश्यक समझा। परन्तु उनका विचार था कि ऐसा करते समय इन सिद्धान्तों के ऐतिहासिक उद्गम तथा विकास, नैतिक या सामाजिक ध्येय तथा सामाजिक प्रभाव पर विचार करना आवश्यक नहीं है, अर्थात् विधि की भूतकालीन स्थिति पर विचार करना प्रमाणवादियों (Positivists) का कार्यक्षेत्र नहीं है।

4. उनका मानना था कि किसी देश की विधि-व्यवस्था स्वयं में परिपूर्ण होती है तथा तर्क के आधार पर उस विधि के निश्चित अर्थान्वयन तथा निर्णयों तक पहुँचा जा सकता है।

विधि का आदेशात्मक सिद्धान्त (Imperative Theory of Law) ।

जॉन ऑस्टिन ने विधि सम्बन्धी जो सिद्धान्त प्रतिपादित किया है उसे विधि का आदेशात्मक सिद्धान्त कहा जाता है। इस सिद्धान्त के मुख्य तत्व इस प्रकार हैं

1. संप्रभ शक्ति (Sovereign Power)—ऑस्टिन ने विधि को संप्रभुताधारी का आदेश कहा है। उन्होंने

भता शक्ति के दो लक्षण बताये हैं। प्रथम यह कि वह सर्वोच्च शक्ति होनी चाहिए जिस पर किसी अन्य सादा शक्ति का प्रभुत्व न हो तथा दूसरे यह कि सम्प्रभु-शक्ति ऐसी होनी चाहिए जिसके आदेशों का प्रजा स्वेच्छा से अनुपालन करने की इच्छुक हो।

2. समादेश (Command)-ऑस्टिन ने विधि को संप्रभुताधारी का ‘समादेश’ माना है। उनके मतानुसार समादेश राज्य की उस इच्छा की अभिव्यक्ति है जो प्रजा से किसी कार्य को करने’ या न करने की आकांक्षा करे। इस इच्छा की अभिव्यक्ति प्रार्थना के रूप में नहीं होती । संप्रभुताधारी का समादेश (command) दो प्रकार का हो सकता है-(1) सामान्य समादेश और (2) विशिष्ट समादेश।

सामान्य समादेश वह है जो सभी व्यक्तियों के प्रति सभी समय समान रूप से जारी किया जाता है तथा यह तब तक प्रभावशील रहता है जब तक कि उसका निरसन न किया जाये या उसे समाप्त न किया जाए। विशिष्ट समादेश कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के प्रति सभी समय के लिए या सभी व्यक्तियों के प्रति कुछ समय के लिए जारी किया जाता है। ऑस्टिन ने सामान्य समादेश (general command) को ही निश्चयात्मक विधि (Positive Law) माना है।  

ऑस्टिन ने ‘समादेश’ (command) तथा कर्तव्य’ को परस्पर-सम्बन्धित और अविभाज्य निरूपित किया है। उनके अनुसार संप्रभुताधारी की इच्छा की अभिव्यक्ति का नाम समादेश है। समादेश की अवहेलना को ही ‘कर्तव्य-भंग’ कहते हैं तथा इन दोनों के परिणामस्वरूप जो हानि उत्पन्न होगी, उसे ऑस्टिन ने ‘शास्ति’ (Sanction) कहा है। उल्लेखनीय है कि ‘आदेश’ का तत्व विधि को नैतिक नियमों से अलग रखता है। क्योंकि नैतिक नियमों का पालन न किया जाने पर शास्ति का भय नहीं होता है। ऑस्टिन के अनुसार निश्चयात्मक विधि (Positive Law) की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं

  • प्रत्येक कानून एक प्रकार का समादेश होता है,
  •  निश्चयात्मक कानून संप्रभुताधारी के प्रत्यक्ष या परोक्ष आदेश होते हैं,
  •  प्रत्येक विधि आचरण-सम्बन्धी क्रम प्रस्तुत करती है,
  •  सम्प्रभु द्वारा प्रवर्तित विधि की पृष्ठभूमि में राज्य की भौतिक शक्ति (Physical force of the State) निहित होती है जिसके अनुसार समादेश को न मानने वाले व्यक्ति को दण्डित किया  जाता है।  

3. शास्ति (Sanction)-ऑस्टिन ने अपने आदेशात्मक विधि सिद्धान्त में यह स्पष्ट किया कि संप्रभुताधारी के आदेश मात्र ही कानून का रूप धारण नहीं कर लेते जब तक कि उनके पीछे कोई शास्ति (Sanction) न हो। ऐसे आदेश को जिसका अनुपालन न किये जाने पर या जिनका उल्लंघन होने पर दोषी व्यक्ति को दण्ड देने की व्यवस्था न हो, सही अर्थ में ‘कानून’ नहीं कहा जा सकता है। ऑस्टिन के अनुसार आदेश के साथ शास्ति जुड़ी रहने पर ही उसे ‘निश्चयात्मक विधि’ (Positive Law) कहा जा सकेगा।

ऑस्टिन के अनुसार संप्रभुता की तीन विशेषतायें हैं-– अविभाज्यता (indivisibility), असीमितता

htability) तथा अपरिहार्यता (essentiality) । ऑस्टिन सम्प्रभुता में किसी प्रकार के सीमा-बन्धन को स्वीकार नहीं करते तथा उनके मतानुसार प्रत्येक राज्य के लिए सम्प्रभुता अनिवार्य है।

आस्टिन के अनुसार निश्चयात्मक विधि में सम्प्रभुता, आदेश, कर्तव्य तथा शास्ति’ ये चार तत्व होना आवश्यक है। उन्होंने विधि के औचित्य या अनौचित्य को कोई महत्व नहीं दिया है। उनके विधि-सम्बन्धी सिद्धान्त में दो बातों पर विशेष बल दिया गया है–(1) विधि की सामान्यता (generality of law); तथा

घि का प्रवर्तनीयता (enforce ability of law) । विधि राजनीतिक प्राधिकारी द्वारा प्रवर्तित की जाती है तथा इसे सभी व्यक्तियों के प्रति समान रूप से बिना किसी भेदभाव के लागू किया जाता है। विधि – पति करने वाली संप्रभ शक्ति में लोगों से अपने आदेशों का अनिवार्य रूप से पालन करा सकने की क्षमता होती है।

ऑस्टिन के अनुसार विधियों के प्रकार

जॉन ऑस्टिन ने विधियों के दो प्रकार बताये हैं-(1) दैवी विधियाँ (Devine law), (2) मानव विधियाँ (Human Laws) । मानवीय-विधियाँ दो प्रकार की हो सकती हैं। प्रथम, निश्चयात्मक विधि (Positive Law) जिसे राज्य के सम्प्रभु द्वारा अपने अधीनस्थ व्यक्तियों के अनुपालन हेतु आदेश के रूप में निर्मित किया गया हो। द्वितीय ऐसी विधि जो वस्तुतः विधि नहीं है क्योंकि उसका मूल आधार सम्प्रभुताधारी का आदेश न होकर असंख्य व्यक्तियों की राय या भावनाओं की अभिव्यक्ति मात्र है। ऑस्टिन इस प्रकार की विधि को लाक्षणिक विधि (Metaphorically Laws) कहना अधिक उपयुक्त समझते हैं। उनका स्पष्ट मत है। कि इस विधि को विधि कहा जाना अनुचित है। उनके अनुसार फैशन सम्बन्धी विधियाँ या गुरुत्वाकर्षण सम्बन्धी विधियाँ इसी कोटि में आती हैं।

जॉन ऑस्टिन को विश्लेषणवादी शाखा (Analytical School) का प्रवर्तक माना गया है। वे चार वर्ष तक लन्दन विश्वविद्यालय में विधिशास्त्र के अध्यापक रहे। उनकी सुप्रसिद्ध कृति ‘दि प्राविन्स ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स डिटरमिन्ड’ सन् 1832 में प्रकाशित हुई। इस कृति से यह स्पष्ट होता है कि ऑस्टिन की विचारधारा हॉब्स; ब्लैकस्टोन तथा बेन्थम आदि पूर्ववर्ती विधिशास्त्रियों के विचारों से प्रभावित हुए बिना न रह सकी। ऑस्टिन ने कुछ समय जर्मनी में रहकर रोमन विधि के अध्ययन में बिताया। रोमन विधि के सुव्यवस्थित वैज्ञानिक निरूपण (scientific treatment) से वे इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने जर्मनी से वापस लौटने पर इंग्लैण्ड की आंग्ल-विधि के प्रति विश्लेषणात्मक पद्धति अपनाई जाने पर बल दिया। ‘ऑस्टिन’ की अन्य कृतियों में ‘ए प्ली फॉर कान्स्टीट्यूशन’ (A Plea for Constitution) भी एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

उल्लेखनीय है कि ऑस्टिन के विश्लेषणात्मक प्रमाणवाद (analytical positivism) की अनेक विधिवेत्ताओं ने आलोचना की है। प्रो० एलेन ने इसे आध्यात्मिक रीति मात्र निरूपित किया है।

यद्यपि हॉब्स (Hobbes) ने भी सम्प्रभु-शक्ति को ही विधि का स्रोत माना है तथा उनके विचार में विधि। सम्प्रभताधारी का समादेश है, परन्तु ऑस्टिन ने हॉब्स के सामाजिक संविदा के सिद्धान्त को निराधार माना। तथापि हॉब्स की सम्प्रभु-शक्ति की अविभाज्यता तथा अपरिमितता को स्वीकार करते हुए उन्होंने व्यक्त किया। कि विधि ऐसी ही सम्प्रभु-शक्ति का समादेश है।

ब्लैकस्टोन (Blackstone)

ब्लैकस्टोन की महान् कृति ‘कमेंट्रीज ऑन दि लाज ऑफ इंग्लैण्ड’ से ऑस्टिन काफी प्रभावित हुए। यह ग्रन्थ सन् 1769 में प्रकाशित हुआ था। ब्लैकस्टोन ने इस ग्रन्थ में ‘विधि’ को परिभाषित करते हुए कहा कि ‘विधि नागरिक आचरणों के ऐसे नियम हैं जिन्हें किसी राज्य की सर्वोच्च शक्ति द्वारा उचित का समावेश और अनुचित का प्रतिषेध करने के लिए निदेशित किया गया है।”3 उनका मत था कि न्यायाधीशों का कार्य विधि का अन्वेषण मात्र करना है, न कि विधि का निर्माण करना। यद्यपि ऑस्टिन ने ब्लैकस्टोन का यह तर्क स्वीकार नहीं किया फिर भी उन्होंने विधि की प्रकृति के विषय में ब्लैकस्टोन के विचारों को स्वीकार किया। संक्षेप में। यह कहना अनुचित न होगा कि यदि ऑस्टिन ने सम्प्रभुता के सिद्धान्त को हॉब्स से ग्रहण किया है, तो विधि के सिद्धान्त को ब्लैकस्टोन के विचारों पर आधारित किया।

2. ऑस्टिन : लेक्चर्स ऑन ज्यूरिसपूडेंस (चतुर्थ संस्करण), पृ० 86.

3. Blackstone defined law as a rule of civil conducts prescribed by the supreme power in a State

commanding what is right and prohibiting what is wrong.

ऑस्टिन के पश्चात्वर्ती प्रमाणवादी विधिवेत्ता

ऑस्टिन के विधिक सिद्धान्त ने वर्तमान युग की विधि-सम्बन्धी विचारधारा को काफी प्रभावित किया।

ऑस्टिन के विधिक सिद्धान्त की महत्ता इसी बात से प्रकट होती है कि कटु आलोचना होने पर भी इसका प्रदत्व बना रहा। ऑस्टिन का विधिक सिद्धान्त राज्य की सम्प्रभु-शक्ति के आदेश पर आधारित है। उनकी विश्लेषणात्मक पद्धति को उन्नीसवीं शताब्दी में इहरिंग (Ihering), जेलीनिक (Jellinek) आदि विधिशास्त्रियों ने विकसित किया। रोग्वीन (Roguin) , सेलिलिस (Saleiles) तथा रिपर्ट (Ripert) भी ऑस्टिन के विचारों से प्रभावित हुए बिना न रह सके।

जर्मी बेन्थम (Jeremy Bentham : 1748-1832)

ऑस्टिन की भाँति बेन्थम भी प्राकृतिक विधि के सिद्धान्त के आलोचक थे। उन्होंने तात्विक तथा ऐतिहासिक विधिशास्त्र की आलोचना करते हुए अपने विधि-सम्बन्धी विचारों को उपयोगितावाद पर आधारित किया। यद्यपि बेन्थम ने ऑस्टिन के इस विचार से सहमति व्यक्त की कि विधि’ राज्य की देन है, परन्तु विधि की वैधता के विषय में उनकी धारणा ऑस्टिन से पूर्णतः भिन्न थी। बेन्थम के विचार से विधि की जाँच एक उच्चतर सिद्धान्त” के आधार पर की जानी चाहिए। यह उच्चतर सिद्धान्त है विधि की उपयोगिता। अत: बेन्थम की उपयोगितावादी (Utilitarian) विचारधारा उन्हें ऑस्टिन से पृथक् कर देती है। ।

जर्मी बेंथम का जन्म 15 फरवरी, 1748 को रेड लाइन स्ट्रीट , हाउन्ड्सडिच, लन्दन में हुआ था। इंग्लैण्ड के विधायन के इतिहास में बेंथम का इतना महत्वपूर्ण अविस्मरणीय योगदान है कि उनके समय को बेथम-युग (Benthamite Age) कहा जाता है। वे इंग्लैण्ड के गरीबों, श्रमिकों तथा शोषितों की दशा सुधारने हेतु सदैव प्रयासरत रहे तथा चौरासी वर्ष तक पूर्णत: सुखी एवं सक्रिय जीवन बिताने के पश्चात् 6 जून, 1832 को इस महान युग-प्रवर्तक का वेस्ट-मिन्सटर में निधन हो गया। उल्लेखनीय है कि बेंथम के पिता एवं पितामह, दोनों ही व्यवसाय से वकील थे, अत: बेंथम को भी विधि तथा विधायन में रुचि होना स्वाभाविक ही था। वे एक अत्यंत प्रतिभावान छात्र रहे तथा केवल पन्द्रह वर्ष की आयु में ही उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त कर ली। तत्पश्चात् उन्होंने ‘लिंकन्स इन’ में कानून का अध्ययन किया तथा सन् 1772 से वकालत करना प्रारम्भ कर दिया। परन्तु शीघ्र ही उन्होंने इस व्यवसाय को छोड़ दिया। तथा अपना ध्यान विधायन की ओर केन्द्रित किया और आगे चलकर स्वयं को एक कुशल राजनीतिक विचारक, विधि एवं समाज सुधारक के रूप में सुस्थापित किया। यद्यपि बेंथम को एक कुशल राजनीतिज्ञ माना। जाता है लेकिन वस्तुत: वे मूल रूप से एक समाज-सुधारक एवं आंग्ल विधायन के प्रणेता के रूप में ही अधिक लोकप्रिय हुए।

बेन्थम का उपयोगितावादी सिद्धान्त

उपयोगितावाद आचार शास्त्र का एक सिद्धान्त या नीति है जिसमें यह बताया गया है कि जो कुछ। उपयोगी है वही श्रेष्ठ है। अत: सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक सिद्धान्तों तथा नीतियों को उपयोगितावाद के सिद्धान्त के आधार पर ही निर्धारित किया जाना चाहिए।  

उपयोगितावाद मानव जाति के कल्याण का प्रतिनिधित्व करता है जो युक्तिसंगत तर्कों के आधार पर मानव जीवन की दशा को सुधारने तथा प्रभावशाली राज्य विधायन के द्वारा जनता के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए वास्तविक प्रयासों को सर्वाधिक महत्व देता है। इसका मूल उद्देश्य लोक कल्याण को प्रमुखता देना है। बेन्थम तथा उनके अनुयायी जेम्स मिल तथा जॉन स्टुअर्ट मिल (पिता-पुत्र) ने उपयोगितावादी सिद्धान्त को राजनीतिक क्षेत्र में लागू करने का कार्य किया। अतः यह सिद्धान्त नैतिक एवं राजनीतिक, दोनों क्षेत्रों में लागू होता है। नैतिक सिद्धान्त के रूप में इसे ‘‘सार्वलौकिक सुखवाद” (universal happiness) कहा जा सकता है। और इस रूप में यह सिद्धान्त एपीक्यूरस के दर्शन से मेल खाता है। परन्तु आधुनिक सुखवाद इससे भिन्न है। क सुखवाद परोपकारी है जबकि वर्तमान सुखवाद अहंवादी है। यह सिद्धान्त इस धारणा पर आधारित है। मनुष्य मूल रूप से एक इन्द्रिय-प्रधान प्राणी है जो सदैव सुख की कामना रखता है तथा दु:ख से बचना प्रत्यक वह कार्य जो दु:ख की बजाय सुख की अधिक उत्पत्ति करता है और प्रत्येक वह कार्य

जिसका परिणाम दु:ख की बजाय अधिक सुख है, अच्छा या सही है। इस प्रकार सुख समस्त मानव प्रयत्नों का सर्वोच्च लक्ष्य है। अत: उपयोगितावाद का प्रथम तथा अंतिम उद्देश्य मानव जीवन, मानव-कर्म तथा मानव कल्याण द्वारा सुख की समृद्धि करना है तथा राजनीतिक दृष्टि से इसे अन्याय एवं अत्याचार विरोधी कहा जा सकता है। यह स्वाभाविकतः ही मानव की वैयक्तिक स्वतंत्रता को सर्वाधिक महत्व देता है जो राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप द्वारा ही संभव है। उपयोगितावाद का ध्येय केवल ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ तक ही सीमित न । होकर इसके द्वारा मानव के बौद्धिक, शैक्षणिक, राजनीतिक, नैतिक एवं सामाजिक विचारों को परिष्कृत करने का प्रयास भी किया जाता है।

बेथम तथा उनके पश्चात्वर्ती उपयोगितावादी दार्शनिकों ने उपयोगितावाद को ‘सुख’ (Happiness) का पर्यायवाची मानते हुए इसे ‘अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख’ (Greatest happiness of the greatest number) के सिद्धान्त पर आधारित किया है। इस दृष्टि से सुख या उपयोगिता का अर्थ ‘कल्याण’ से लगाया जा सकता है। कल्याण-भाव के अंतर्गत वे समस्त तत्व समाविष्ट हैं जो मानव सुख में संवृद्धि करते हैं। अत: स्पष्ट है कि उपयोगितावाद एक प्रायोगिक एवं व्यावहारिक सिद्धान्त है जिसका मानव जीवन में महत्व है। उपयोगितावादी नीति आवश्यक रूप से विश्लेषणात्मक, वर्णनात्मक तथा निरीक्षणात्मक होती है, जो जीवन के वास्तविक तथ्यों पर आधारित है। इसका उद्देश्य तथ्यों का उसी ढंग से प्रयोग करना है जिससे सामाजिक उन्नति तथा जीवन की वर्तमान दशाओं में सुधार हो सके। अत: निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि उपयोगितावाद मानव जीवन के सजीव आंदोलन (Living Movements) से जुड़ा हुआ है जो प्रगतिशील समाज का अभिन्न अंग माना जाता है। यह सिद्धान्त सामाजिक कल्याण को व्यक्तियों के वैयक्तिक सुख का संग्रह मात्र मानता है जो इस धारणा पर आधारित है कि जो कुछ भी व्यक्ति के लिए ठीक है, वह संपूर्ण समाज के लिए भी ठीक होगा क्योंकि व्यक्ति समाज की ही एक इकाई है। 

जर्मी बेंथम को उन्नीसवीं शताब्दी के उपयोगितावाद का प्रणेता माना गया है। वे आंग्ल-उपयोगितावाद के मुख्य प्रवर्तक थे जिनके अनुयायियों में जेम्स मिल, जॉन स्टुअर्ट मिल, जार्ज ग्रेटे तथा एलेक्जेन्डर वेन आदि प्रमुख थे।

बेथम की प्रथम पुस्तक ‘फ्रेगमेण्ट्स ऑन गवर्नमेंट’ सन् 1776 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में इंग्लैण्ड के सुप्रसिद्ध विधिवेत्ता ब्लेकस्टोन के विचारों की आलोचना की गई थी जिसने आंग्ल विधि-क्षेत्र में उथल-पुथल मचा दी। बाद में बेंथम की ‘नैतिक और विधायन के सिद्धान्त का परिचय (Introduction to the Principles of Morals and Legislation) नामक पुस्तक का प्रकाशन भी हुआ # अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बेंथम ने संविधान संहिता (Constitutional Code) लिखी जिसका कुछ अंश सन् 1830 में उनकी मृत्यु के पूर्व प्रकाशित हो चुका था। उन्होंने 76 वर्ष की आयु में वेस्ट मिन्स्टर रिव्यू’ नामक पत्रिका निकाली तथा 79 वर्ष की आयु में लन्दन विश्वविद्यालय में यूनिवर्सिटी कॉलेज’ की स्थापना की ताकि वह तात्कालिक आक्सफोर्ड एवं केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के दूषित वातावरण से बचा रहे।

बेंथम न केवल उच्च कोटि के सुधारक के रूप में प्रतिष्ठित हुए बल्कि वे अपनी सहदयता, भाव-प्रधानता तथा उदारवादी दृष्टिकोण के लिए भी विख्यात थे। यही कारण था कि उनके विचारों तथा सुझावों का सदैव सम्मान हुआ। इंग्लैण्ड के विधि-क्षेत्र में वे अपने समय के युग-प्रवर्तक माने गये हैं।

बेंथम के जीवन का प्रमुख लक्ष्य तात्कालिक भेदभावपूर्ण विधि-द्धति में सुधार लाना तथा उसे अधिकाधिक समाजोपयोगी बनाना था। उन्होंने उपयोगितावादी सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए तत्कालीन आंग्ल विधि की रूढ़िगत अंधविश्वास पर आधारित विसंगतियों को दूर करने का भरसक प्रयत्न किया।

बेंथम की धारणा थी कि सामाजिक व्यवस्था में सुख (Happiness) की प्रकल्पना को वस्तुनिष्ठ अर्थ (objective sense) में लिया जाना चाहिये जिसमें सामान्यत: भोजन, कपड़े और मकान आदि की उपलब्धता

4. बेथम की अन्य कृतियाँ हैं-A Defence of Usuary Discourse on Ci: 1 & Penal Legislation (1802);

heory of Punishments & Rewards (1811); A Treatise on Judicial Evidence (1813): The Book of Fallacies (1824); Papers on Codification & Public Instruction (1817 etc.

से व्यक्ति को पास होने वाले संतोष का समावेश रहता है। उनके विचार से मानव के सुख और संतप्ति की। संकल्पनायें चिरस्थायी नहीं होतीं, अपितु वे समय और समाज के परिवर्तन के साथ परिवर्तित होती

* जत बिजली और रसोई गैस जैसी आधुनिक सुविधायें उपलब्ध नहीं थी, तो लोग लालटेन के प्रकाश या लकडी, कोयले के ईंधन से ही संतुष्ट थे, लेकिन वर्तमान में यदि थोड़े समय के लिये ही बिजली गुल हो जाये या रसोई गैस खत्म हो जाये, तो लोग हाय तौबा मचाने लगते हैं।

विधिक क्षेत्र में बेंथम के योगदान की समीक्षा की दृष्टि से उसके व्यक्तित्व के तीन पहलुओं पर विचार करना समीचीन होगा–.

1. बेंथम नैतिक–दार्शनिक के रूप में,

2. बेन्थम सामाजिक विचारक के रूप में,

3. बेन्थम विधिशास्त्री के रूप में।

1. नैतिक दार्शनिक के रूप में-बेंथम ने मानव प्रकृति को सुख-दु:ख नामक दो तत्वों के अधीन मानते हुए कहा है कि हमें क्या करना चाहिए या हम क्या करेंगे, यह हम केवल सुख-दु:ख के आधार पर ही निश्चित करते हैं। इस प्रकार, मानवीय आचरण पूर्णत: सुख-दु:ख की अनुभूतियों पर आधारित रहता है। बेंथम उपयोगिता’ को ही नैतिक तथा मानवीय जीवन का आधार मानते हैं। बेंथम के पूर्ववर्ती काल में प्राकृतिक विधि के अन्तर्गत ईश्वरेच्छा को ही नैतिकता का आधार माना जाता रहा तथा यह धारणा थी कि जो कुछ इसके विपरीत है वह अनैतिक एवं पापमूलक है। इस धारणा को धर्मशास्त्रियों का प्रबल समर्थन प्राप्त था। लेकिन बेंथम ने ईश्वरेच्छा, प्राकृतिक विधि तथा अन्त:करण आदि को आत्मगत (Subjective) कल्पनाएँ मात्र मानते हुए कहा कि मानव को जो कुछ अच्छा (सुखमय) लगता है, वही करता है अतः ये सभी धारणाएँ निरर्थक हैं।

बेन्थम के विचार से कार्यों के उद्देश्य के बजाय उनके परिणाम को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। अतः जो वस्तु हमें सुख देती है, वह ठीक और उपयोगी है तथा जिस वस्तु से हमें सुख कम और दु:ख अधिक होने की संभावना हो, वह व्यर्थ, अहितकर और गलत समझी जानी चाहिए।

2. बेंथम सामाजिक विचारक के रूप में-बेंथम ने अनुभव किया कि उनके समय में मानव के प्राकृतिक अधिकारों को सर्वाधिक महत्व दिया जा रहा था। अतः उन्होंने इसका घोर विरोध करते हुए कहा कि जो अधिकार मनुष्य को प्राप्त हैं वे वस्तुत: प्राकृतिक नहीं हैं अपितु वे विधि द्वारा प्रदान किये गये अधिकार हैं क्योंकि विधि की महत्ता और अच्छाई उसकी उपयोगिता पर निर्भर करती है।

बेंथम ने राज्य की उत्पत्ति संबंधी संविदात्मक अवधारणा का खंडन किया तथा सामाजिक समझौते के सिद्धान्त को एक कोरी कल्पना मात्र निरूपित किया। उनका तर्क था कि लोग राज्य के कानों और आटे को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करते क्योंकि वे किसी पूर्ववर्ती समझौते पर आधारित होते हैं वरन इसलिए मानते हैं क्योंकि वे उनके लिए लाभकारी एवं सुखवर्धक होते हैं। उन्हीं के शब्दों में, लोग राज्य की आज्ञा (आदेश) का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि ऐसा करना उनके लिए लाभदायक और उपयोगी है तथा आज्ञा पालन से संभावित हानि अवज्ञा के संभाव्य दु:ख की अपेक्षा कम होती है।”

3. बेंथम विधिशास्त्री के रूप में-एक प्रगतिवादी विधि सुधारक के रूप में बेंथम ने तत्कालीन विधि के क्षेत्र में प्रचलित पुरातन धारणाओं तथा अन्ध-विश्वासों को दूर करते हुए विधियों को वैज्ञानिक पद्धति प्रदान की जो मूलत: उपयोगितावाद पर आधारित थी। उन्होंने विधियों के संहिताकरण की आवश्यकता प्रतिपादित। करते हुए इस बात पर जोर दिया कि विधि को सरल एवं सुबोध भाषा में अभिव्यक्त किया जाए। विधि के संहिताकरण से उसकी अस्पष्टता, अनिश्चितता, जटिलता, रूढ़िवादिता, दर्बोधता आदि के सभी दोष समाप्त हो जाएग और उसका परिपालन सुगम हो जायेगा। उन्होंने विधिशास्त्र को राजनीति से अलग रखे जाने पर बल दिया तथा इस कार्य को आगे चलकर उनके शिष्य जॉन ऑस्टिन ने पूर्ण किया।  बेथम ने विधायन तथा न्याय क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सधार किये। न्यायाधीशों की निरंकुशता पर रोक लगाने की दृष्टि से बेंथम ने जूरी पद्धति का समर्थन किया। ऐसा प्रतीत होता है कि बेथम ब्रिटेन की तत्कालीन न्यायालयीन कार्य-पद्धति के प्रति क्षुब्ध थे इसीलिए उनमें न्यायाधीशों के प्रति आदर भाव की कमी थी और वे न्यायाधीशों को ‘जज एण्ड कम्पनी’ के नाम से व्यंग्यात्मक रूप से संबोधित करते थे।

बेंथम ने दण्ड पद्धति तथा कारागार व्यवस्था में सुधार संबंधी उल्लेखनीय कार्य किये। उनके अनुसार दण्ड का प्रमुख लक्ष्य लोक कल्याण की भावना होनी चाहिए तथा दंड प्रभावकारी होने के लिए यह आवश्यक है कि उससे उत्पन्न होने वाला दु:ख अपराध कृत्य से उत्पन्न होने वाले सुख से अधिक हो। । बेंथम के समय में दंड व्यवस्था अत्यंत कठोर एवं अमानुषिक थी। छोटे-मोटे अपराधों के लिए भी वीभत्स एवं कठोर दंड के प्रावधान थे। इस अमानवीय एवं बेतुकी दंड व्यवस्था का विरोध करते हुए बेंथम ने यह विचार व्यक्त किया कि दंड का उद्देश्य अपराधों को रोकना है, अतः दंड की प्रकृति एवं मात्रा, अपराध की गंभीरता के अनुरूप होनी चाहिए। दंड निर्धारण में निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

1. अपराध का स्वरूप या उसकी प्रकृति (साधारण या गंभीर)

2. अपराध कारित होने की परिस्थितियाँ, अर्थात् वे परिस्थितियाँ जिनके कारण अपराधी अपराध

करने के लिए प्रेरित हुआ है।

3. अपराध कारित करने का अपराधी का उद्देश्य । ।

4. अपराध से व्यथित व्यक्ति को हुई हानि या क्षति ।  

दण्ड के प्रति सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए बेंथम ने कहा कि दंड में कठोरता की बजाय निश्चितता होनी चाहिए ताकि वह लोगों के लिए चेतावनी का कार्य कर सके। इसी प्रकार उन्होंने कारागारों को ‘यातनागृह’ बनाये रखने के बजाय ‘सुधार गृहों में परिवर्तित किये जाने पर बल दिया। जेलों के अन्दर ऐसा वातावरण हो ताकि कैदी स्वयं में सुधार कर सके और कारावास समाप्ति के पश्चात् स्वयं को समाज में सरलता से पुनस्र्थापित कर सके। इस दृष्टि से उन्होंने जेलों में धार्मिक प्रवचन तथा शिक्षा को अधिक महत्व दिया जाने की अनुशंसा की।  

बेंथम के पश्चात् उनके अनुयायी जेम्स मिल ने उपयोगितावाद के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया तथा उसे यथासंभव परिष्कृत एवं परिमार्जित रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

जेम्स मिल के पुत्र जॉन स्टुअर्ट मिल ने भी उपयोगितावादी विचारधारा का समर्थन किया। इस संबंध में डनिंग (Dunning) ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कथन किया है कि जेम्स मिल का जन्म 1773 में हुआ था तथा उनके पुत्र जॉन स्टुअर्ट मिल का देहावसान सन् 1876 में हुआ। अत: यह एक शताब्दी की अवधि उपयोगितावाद के प्रादुर्भाव, विकास तथा ह्रास की शती है।” जॉन स्टुअर्ट मिल उपयोगितावाद के अंतिम समर्थक थे।

अनेक विद्वानों ने बेंथम के उपयोगितावाद की आलोचना इस आधार पर की है कि इसमें भौतिकवाद तथा सुखवादी दृष्टिकोण को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया गया है। दूसरे शब्दों में, इस विचारधारा के अन्तर्गत व्यक्ति को अत्यधिक महत्व देते हुए सामाजिक दृष्टिकोण की शोचनीय उपेक्षा की गयी है जो सर्वथा अनुचित है। तथापि इसमें संदेह नहीं कि बेंथम की विचारधारा ने तत्कालीन ब्रिटिश विधायन-क्षेत्र को एक नई दिशा प्रदान की, जो व्यावहारिक तथा तार्किक चिंतन पर आधारित थी।

बेंथम के उपयोगितावादी सिद्धान्त पर टिप्पणी करते हुए फ्रीडमैन ने लिखा है कि उपयोगितावादी सिद्धांत अठारहवीं सदी के राजनीतिक एवं विधिक चिंतन के पदार्थवादी (materialistic) विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है। विधि के संबंध में समयानुकूल व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए यह सिद्धान्त अमूर्त से निश्चित स्वरूप की ओर, आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर तथा निगम्य (a priori) से अनुभविक (empirical) की ओर अधिक ध्यान देता है। दूसरे शब्दों में, उपयोगितावाद अमूर्त प्रस्थापनाओं (abstract propositions) की बजाय विधि के क्रियात्मक तथा व्यावहारिक पहलू को अधिक महत्व देत. है|

सैबाइन (Sabine) ने बेंथम के सुख-दु:ख के सिद्धान्त को तत्कालीन परिस्थितियों में अत्यन्त व्यावहारिक एवं उपयोगी मानते हुए इसे विधि को एक सार्वभौमिक स्वरूप दिलाने वाला अस्त्र निरूपित किया

विधि की उपादेयता के संदर्भ में बेंथम के सुख-दुखों का वर्गीकरण चार प्रमुख वर्गों में किया जाता है-(1) भौतिक, (2) नैतिक, (3) राजनीतिक तथा (4) धार्मिक। बेंथम के विधि सम्बन्धी विचार (Bentham’s views about law)

विधि को सम्प्रभु द्वारा प्रचारित नियमों का समूह मानते हुये बेन्थम ने इन्हें प्रजा पर बन्धनकारी माना। उनके अनुसार किसी भी विधि में निम्नांकित आठ तत्वों का होना आवश्यक है5

(1) विधि का स्रोत (Source)–बेन्थम के अनुसार सम्प्रभु की इच्छाशक्ति ही विधि का वास्तविक स्रोत

होना है। सम्प्रभु यदि चाहे, तो उसके पूर्ववर्ती शासक द्वारा लागू की गयी विधि को यथावत् जारी रख सकता है या उनमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर सकता है या स्वयं नये कानून लागू कर सकता है।  2. विधि के पालनकर्ता-विधि के पालनकर्ता, अर्थात् जिनके लिये विधि बनायी गयी है वे या तो व्यक्ति हो सकते या कोई संस्था या निर्जीव इकाई भी हो सकती है, जैसे कम्पनी, स्कूल, कार्पोरेशन आदि।

3. उद्देश्य-विधि मानव आचरण को नियन्त्रित रखने का साधन मात्र होने के कारण यह सकारात्मक

अथवा नकारात्मक या निरोधात्मक हो सकती है।

(4) परिधि या क्षेत्राधिकार-सम्प्रभु के अधीन सम्पूर्ण भू-क्षेत्राधिकार पर विधि लागू होती है, जिसमें कोई कृत्य या अकृत कारित हो।

(5) आज्ञात्मकता–विधि की आज्ञात्मकता ही उसका सर्वश्रेष्ठ लक्षण है, जिसका उल्लंघन किये जाने

पर सम्प्रभु द्वारा शास्ति का प्रयोग किया जाता है।

(6) सम्प्रभु द्वारा शास्ति ही विधि को बल प्रदान करती है। दूसरे शब्दों में, शास्ति (sanction) के अभाव में विधि पूर्णतः निष्प्रभावी हो जाती है।

(7) समाज से दुष्कर्मों या अवांछित कार्यों के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति को होने वाली हानि या क्षोभ

की स्थिति में उसे विधि के अन्तर्गत उपचार उपलब्ध होता है जो प्रायः न्यायालय द्वारा पीड़ित

पक्षकार को दिलाया जाता है।

(8) जहां कोई विधि पूर्ण, सुस्पष्ट एवं सुनिश्चित हो, तो न्यायालयों को तद्नुसार उनका यथावत् पालन करना अनिवार्य होता है और वे उसमें कोई फेरबदल नहीं कर सकते और न उनका उल्लंघन ही कर सकते हैं।

न्याय के सम्बन्ध में बेंथम के विचार (Bentham’s Views on Justice) 

बेन्थम ने केल्सन की इस धारणा का समर्थन किया था कि शुद्ध-न्याय की परिकल्पना करना अव्यावहारिक होगा क्योंकि वह आवश्यक रूप से सामाजिक व्यवस्था पर आधारित है जो कि समाज के लोगों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में सहायक होती है। बेन्थम ने ‘न्याय’ को ‘सामाजिक सुख’ का ही एक रूप बताते हुये कहा है कि न्याय का प्रमुख लक्ष्य समाज द्वारा मान्य विभिन्न हितों एवं मूल्यों का संरक्षण करना है। ताकि लोग सुख-शांति से रह सकें। अतः स्पष्ट है कि बेथम की न्याय संबंधी परिकल्पना सामाजिक-मूल्यों पर आधारित थी तथा विभिन्न समाजों की मान्यताओं एवं मूल्यों में समानता न होने के कारण ‘न्याय’ के प्रति भी मतभिन्नता होना स्वाभाविक ही है। यदि सामाजिक मूल्यों तथा मान्यताओं में टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो, तो ‘न्याय’ की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। सारांश यह कि बेंथम के अनुसार न्याय एक व्यापक (Subjective) धारणा है जो विभिन्न सामाजिक संरचनाओं पर आधारित होती है।

5. आर० एम० डब्ल्यू० डायस : ज्यूरिसपूडेन्स (5वां संस्करण, 1994) पृ० 340.

रूडोल्फ इहरिंग (Rudolf Von Ihring : 1818-1892)

रूडोल्फ वोन इहरिंग समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र के समर्थक होते हुए भी विधि के आदेशात्मक सिद्धान्त के पोषक थे। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ “Zweckim Rechi” में यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि किसी। देश की विधि उसकी सम्प्रभु-शक्ति पर निर्भर रहती है तथा प्रत्येक राज्य को यह एकाधिकार प्राप्त है कि वह विधि को प्रवर्तित करने के लिए बल का प्रयोग करे।

जेलीनिक (Jellinek)

इहरिंग के विधिक विचारों से प्रभावित होकर प्रसिद्ध जर्मन विधिशास्त्री जेलीनिक ने भी विधि सम्बन्धी नियमों की व्याख्या की। जेलीनिक के अनुसार विधि के नियमों में निम्नलिखित बातें आवश्यक होती हैं

  • ये नियम मानव के परस्पर बाह्य आचरणों के प्रति नैतिक आदेश (norms) होते हैं।
  • ये ऐसे नैतिक आदेश हैं जिनका उद्भव किसी ज्ञात बाह्य शक्ति से होता है।
  • ये ऐसे नैतिक आदेश (norms) हैं जिनका बन्धनकारी प्रभाव किसी बाह्य शक्ति द्वारा प्रतिरक्षित होता है।

यद्यपि जेलीनिक राज्य की सम्प्रभु-शक्ति को विधि का आधार मानते हैं परन्तु उन्होंने अपनी विचारधारा को मनोवैज्ञानिक मोड़ देते हुए व्यक्त किया कि विधि को प्रवर्तित कराने के लिए, राज्य की शक्ति तो आवश्यक है ही परन्तु साथ ही इन कानूनों को समाज का समर्थन भी प्राप्त होना चाहिए।

सेलिलिस तथा रिपर्ट (Saleilles & Ripert)

उन्नीसवीं शताब्दी की फ्रान्स की विधिक विचारधारा में भी प्रमाणवादी प्रवृत्ति की झलक दिखलाई पड़ती है। सेलिलिस ने निश्चयात्मक विधि की निश्चितता तथा वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से प्रभावित होकर फ्रान्स के सिविल कोड के प्रति विश्लेषणात्मक पद्धति अपनायी। इसी आधार पर रिपर्ट ने विधिक आदेशों को नैतिक नियमों से पृथक् रखे जाने पर बल दिया। उनका मत था कि नैतिक नियमों की परिशुद्धता कानूनों द्वारा ही संभव है।

ऑस्टिन का आदेशात्मक सिद्धान्त (Austin’s Theory of Imperative)

आस्टिन ने विधि को परिभाषित करते हुये कहा है कि ये ऐसे नियम हैं जो एक सत्ताधारी प्रज्ञावान व्यक्ति द्वारा अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों के मार्गदर्शन के लिये निर्मित किये गये हैं। ऑस्टिन के अनुसार विधि के दो प्रकार हैं-(1) ईश्वर द्वारा व्यक्तियों के लिये बनाई गई विधि, तथा (2) मानव निर्मित विधि। ऑस्टिन यथार्थमुलक नैतिकता (Positive morality) को विधि मानने से इन्कार करते हुये कहते हैं कि यह एक प्राकल्पनिक सादृश्य विधि (Law by analogy) मात्र है। उनके मतानुसार केवल यथार्थमूलक विधि। (Positive law) ही विधिशास्त्र के अध्ययन की विषय-वस्तु है, जो राजनीतिक सत्ताधारी द्वारा अपने अधीनस्थों द्वारा अनुपालन किये जाने हेतु निर्मित होती है। अतः ऑस्टिन ने समादेश (Command), कर्तव्य (Duty) तथा शास्ति (Sanction) को ही विधि के आवश्यक तत्व माना है।6 तथापि वे स्वीकार करते हैं कि विधि के ऐसे तीन अन्य प्रकार भी हैं जिनमें समादेश (Command) का तत्व विद्यमान न होते हुये इन्हें विधि के रूप में मान्यता प्राप्त है –

(1) घोषणात्मक या व्याख्यात्मक विधि (Declaratory or Explanatorv Laws)-ये समादेश न

होते हुये भी पूर्वकाल से ही प्रचलित होने के कारण इन्हें विधि के समान मान्यता प्राप्त है क्योंकि वे।

विधि के अस्तित्व को बल प्रदान करते हैं।

(2) निरसन संबंधी विधियाँ (Law of Repeal)-क्योंकि ये समादेश न होते हुये भी समादेश का

संप्रतिग्रहण (revocation of Command) करते हैं।

6. ऑस्टिन : दि प्रॉविन्स ऑफ ज्यूरिस्पूडेंस डिटरमिन्ड पृ० 9.

(3) अपूर्ण बाध्यताओं की विधि (Law of Imperfect Obligations)—इन्हें समादेश इसलिये नहीं। । माना जाता क्योंकि इनके साथ कोई शास्ति जुड़ी नहीं रहती है।

ऑस्टिन के विधि संबंधी उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि उन्होंने प्रथा तथा विधि के अनुज्ञात्मक स्वरूप की पूर्ण अनदेखी की। इसी प्रकार उन्होंने न्यायाधीशों द्वारा निर्मित विधि को भी विधि के रूप में स्वीकार नहीं क्रिया तथा समादेश (Command), कर्तव्य एवं शास्ति को ही विधि के आवश्यक तत्वों के रूप में स्वीकार किया।

ऑस्टिन के आदेशात्मक सिद्धान्त का प्रभाव

ऑस्टिन के पश्चात्वर्ती विधिशास्त्रियों ने सिद्धान्त रूप में ऑस्टिन के विचारों को स्वीकार किया परन्तु साथ ही उन्होंने यह अनुभव किया कि ऑस्टिन ने विधि के सामाजिक तथा नैतिक आधार की पूर्ण अवहेलना की थी। ऑस्टिन के विधि-सम्बन्धी सिद्धान्त की सबसे बड़ी कमी यह थी कि उन्होंने विधि की दण्डात्मक शक्ति तथा राज्य सम्प्रभुता पर ही ध्यान केन्द्रित किया तथा सामाजिक रीति-रिवाज, अन्तर्राष्ट्रीय विधि आदि को निश्चयात्मक विधि के रूप में स्वीकार न करते हुए केवल सकारात्मक नैतिकता (positive morality) मात्र माना। ऑस्टिन के सिद्धान्त को परिमार्जित रूप में स्वीकार करने वाले विधिवेत्ताओं में ग्रे (Gray), सामण्ड (Salmond), हालैण्ड (Holland) आदि प्रमुख हैं, जिन्होंने विधिशास्त्र की निओ-ऑस्टीनियन शाखा (Neo-Austinian School) को जन्म दिया।

विधिशास्त्र की निओ-ऑस्टीनियन शाखा (Neo-Austinian School of Jurisprudence)

प्रोफेसर ग्रे ने ऑस्टिन के आदेशात्मक सिद्धान्त के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि इसमें संदेह नहीं कि विधि का निर्माण राज्य द्वारा ही किया जाता है तथा इसमें धर्म, प्रकृति या नैतिकता को । स्थान नहीं है, परन्तु फिर भी विधि को राज्य के आदेश मात्र’ मानना उचित नहीं है। ग्रे के विचार में विधि का वास्तविक उद्गम-स्रोत राज्य की संप्रभु-शक्ति न होकर वहाँ प्रचलित रीति-रिवाज, सामयिक आचार तथा पूर्वोक्तियाँ होती हैं। उनका मत था कि कानून उन नियमों का संग्रह है जो न्यायालय द्वारा आचरण के नियमों के रूप में लागू किये जाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रो० ग्रे के अनुसार न्यायाधीश केवल लिपिबद्ध विधि का निर्वचन ही नहीं करते अपितु अपने निर्णयों द्वारा ‘नवीन विधि’ का निर्माण भी करते हैं। उनके विचार से न्यायाधीशों के वैयक्तिक स्वविवेक का विधि पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सर जॉन सामंड (Sir John Salmand : 1862-1924)

सामण्ड7 ने ऑस्टिन के विधि-सम्बन्धी विश्लेषण के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत किया कि कानून राज्य द्वारा मान्यताप्राप्त तथा लागू किये जाने वाले सिद्धान्तों का ऐसा संकलन है जिसका प्रयोग न्याय-प्रशासन के लिए किया जाता है। इसका आशय यह है कि कानून में वे सभी नियम समाविष्ट हैं जिनको न्यायालयीन निर्णयों द्वारा मान्यता प्राप्त होती है तथा जिनके अनुसार न्यायालय न्याय-प्रशासन का कार्य करते हैं। सामण्ड के अनसार विधि का उद्देश्य न्याय की रक्षा करना है और केवल इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु न्यायालयों की स्थापना की गयी है। सामण्ड के मतानुसार ऑस्टिन के ‘आज्ञात्मक सिद्धान्त’ के अन्तर्गत विधि का वास्तविक उद्देश्य ही समाप्तप्राय हो जाता है। इसीलिए उनका कहना है कि “विधि न तो केवल अधिकार है और न केवल शक्ति ही है, बल्कि इन दोनों का उचित समन्वय है; वह राज्य की आवाज में मनुष्य द्वारा की गयी न्याय की पुकार है।”8 सामण्ड ने ऑस्टिन के इस कथन को स्वीकार किया है कि कानून और राज्य में घनिष्ठ सम्बन्ध है परन्तु वे ऑस्टिन के इस तर्क को स्वीकार नहीं करते कि कानून में नैतिकता को कोई स्थान नहीं है। उनके अनुसार ऑस्टिन ने विधि के आदेशात्मक सिद्धान्त में ‘शक्ति’ के अतिरिक्त सभी तत्वों को विधि से अलग कर दिया है जो सर्वथा अनुचित है।

7. सर जॉन सामंड न्यूजीलैण्ड के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश थे तथा उनकी ‘ज्यूरिसपूडेंस’ नामक कृति सन् 1902 में

प्रकाशित हुई.

8. Law is not right alone or might alone, but the perfect union of the two. It is justice speaking to men

by the voice of the State.-Salmond.

सर थॉमस इर्सकाइन हालैण्ड (Sir Thomas Erskine Holland : 1835-1926)

सर थॉमस हालैण्ड ने ऑस्टिन के विश्लेषणात्मक विधि के विश्लेषण से सहमति व्यक्त करते हुए कहा है कि निश्चयात्मक विधि मनुष्य के उन विभिन्न सम्बन्धों’ का प्रतीक है जो वैधानिक नियमों द्वारा नियमबद्ध किये जाते हैं। अतः विधिशास्त्र का सम्बन्ध वैधानिक नियमों से नहीं है, बल्कि उनके द्वारा नियंत्रित किये। जाने वाले ‘सम्बन्धों’ से है। केल्सन का शुद्ध विधि-सिद्धान्त (Pure Theory of Law) भी विधि के इसी पहलू पर जोर देता है।

ऑस्टिन के विधि-सिद्धान्त की आलोचना

ऑस्टिन के निश्चयात्मक विधि (Positive law) के सिद्धान्त की ऐतिहासिक विचारधारा के समर्थकों ने कटु आलोचना की है जिनमें सर हेनरी मेन तथा सैविनी (Savigny) प्रमुख हैं। हेनरी मेन का कथन है। कि–आदेशात्मक विधि का सिद्धान्त आदिम समुदायों के प्रति लागू नहीं होता है क्योंकि विधि प्रत्येक समय से संप्रभु से सम्बद्ध नहीं रही है। विधि का अस्तित्व राजनीतिक प्राधिकारी के अस्तित्व से पहले का है तथा वह स्वयं में स्वतंत्र है। इसके दृष्टान्त रूप में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए हेनरी मेन कहते हैं कि इस शासक ने अपनी प्रजा को इतना अधिक वशीभूत कर लिया था कि जो कुछ वे कहते थे वही उनका समादेश माना जाता था। इतना होने पर भी रणजीतसिंह ने कानूनों का निर्माण आवश्यक नहीं समझा तथा उनके राज्य में प्रजा का दैनिक जीवन अतीत काल से चली आ रही प्रथाओं तथा परम्पराओं द्वारा ही नियंत्रित होता था न कि शासन की आज्ञा द्वारा। ये प्रथायें या रीति-रिवाज शासक द्वारा कार्यान्वित नहीं करायी जाती थीं, परन्तु इन्हें कार्यान्वित कराने का कार्य स्थानीय पंचायतों, परिवारों तथा ग्रामीण जातियों को सौंपा गया था। सर हेनरी मेन का मत है कि इस स्थिति में यह कहना कि विधि संप्रभु-शक्ति की आज्ञा है, सही नहीं है। उन्होंने ऑस्टिन के विधि-सिद्धान्तों को एक ऐसी कपोल-कल्पना मात्र माना जिसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।

सैविनी ने भी ऑस्टिन के संप्रभु-शक्ति के सिद्धान्त को निराधार बताया है। उनके अनुसार विधि मानव के कार्यों तथा व्यवहारों का नियम है जिन्हें राष्ट्रीय प्रथाओं द्वारा मान्यता प्राप्त होती है। उनका कथन था कि परंपराएं विधि का ऐसा मापदण्ड हैं जिससे उचित-अनुचित का आभास होता है अतः विधि की प्रकृति को ऐतिहासिक तथा सामाजिक व्यवहारों में ही खोजा जा सकता है।

सर हेनरी मेन की उपर्युक्त आलोचना पर टिप्पणी करते हुए सामण्ड ने कहा कि ऑस्टिन का आदेशात्मक विधि-सिद्धान्त ऐसे कानून के प्रति लागू होता है, जो किसी परिपक्व राज्य में विद्यमान है। ऑस्टिन ने आदिम समाज और उसमें प्रचलित कानूनों को वास्तविक कानून नहीं माना है। उनके अनुसार रीति-रिवाजों तथा उधाओं पर आधारित प्राचीन नियम वस्तुत: वर्तमान कानून के पूर्ववर्ती रूप हैं जो कि कानून के स्रोत कहे जाते हैं. परन्तु वे स्वयं कानून नहीं हैं। सामण्ड के मतानुसार ऑस्टिन के विधि-सिद्धान्त की आलोचना करते समय नीमेन ने भलवश ‘कानून के स्रोत’ को ही ‘कानून’ समझ लिया। अपने विचारों को स्पष्ट करते हुए सामण्ड हा कि आदिम समाज में रीति-रिवाज तथा प्रथायें ‘कानून’ थे, लेकिन विकसित राज्यों में वे कानून के स्रोत-मात्र बनकर रह गये।।

पैटन (Paton)  ने ऑस्टिन के आदेशात्मक विधि-सिद्धान्त पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि ऑस्टिन नधि का राज्य से सम्बद्ध किया जाना अनेक दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हुआ है। इस सिद्धान्त ने ‘राज्य – ‘चर्च’ के बीच सत्ता के लिए संघर्ष की स्थिति को समाप्त कर दिया। आदेशात्मक विधि सिद्धान्त के अनसार विधि का निर्माण करने का अधिकार केवल राज्य (State) को ही प्राप्त है; अत: चर्च को केवल वे अधिकार ही होंगे जो राज्य द्वारा उसे प्रदत्त किये गये हों। पैटन के अनसार राज्य वैधता का आधार है।10

9. हेनरी मेन : अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंस्टिट्यूशन्स पृ० 382

10 जी० डब्ल्यू० पैटन : ऐ टेक्स्ट बुक ऑफ ज्यूरिसपूडेंस (द्वितीय संस्करण), पृ० 57.

सकता है क्योंकि यह सार्वभौम एवं अकाट्य होता है, परन्तु जेथ्रो ब्राउन (Jethro Brown) ने

ऑस्टिन के इस विचार का खण्डन करते हुये अभिकथन किया कि सम्प्रभु अपने प्रजाजनों के प्रति कर्तव्यबद्ध होता है। बेन्थम ने भी जेथ्रो ब्राउन के इस विचार से सहमति दर्शाते हुये कहा कि ब्रिटिश सम्राट द्वारा अपने अधीनस्थ उपनिवेशों (British Colonies) को विधियों का निर्माण करने की शक्ति प्रदान किया जाना, यह दर्शाता है कि सम्प्रभु द्वारा अपनी सम्प्रभु शक्ति का विभाजन किया जा सकता है।

(7) विधि के अनुपालन के लिये ‘शास्ति’ एकमात्र साधन नहीं है, इसमें लोकमत को भी समुचित स्थान दिया जाना चाहिए।

(8) ऑस्टिन ने अपने विधि-सिद्धान्त में विधि और नैतिकता के परस्पर संबंधों की पूर्ण उपेक्षा की

है। उनके विचार से विधि का नैतिकता से कोई संबंध नहीं है। डॉ० जेथ्रो ब्राउन ने ऑस्टिन के इस विचार का खण्डन करते हुए कहा है कि अत्यधिक निरंकुश विधान मण्डल भी जनसमुदाय की आकांक्षाओं की अनदेखी नहीं कर सकता है। दूसरे, यह मानना गलत है कि विधि-पूर्णतः बल या शास्ति पर आधारित है। अधिकार, अपकार, कर्तव्य, दायित्व आदि जैसी विधिक संकल्पनायें नीति और नैतिकता पर ही आधारित हैं।

(9) अनेक विधिवेत्ताओं ने ऑस्टिन के आदेशात्मक विधि-सिद्धान्त को कृत्रिम निरूपित किया है। क्योंकि इस सिद्धान्त से यह आभास मिलता है कि मानों संप्रभु (शासक) प्रशासित समुदाय से पृथक् हो, जब कि वास्तव में ऐसा नहीं है।

विश्लेषणात्मक विचारधारा में एच० एल० ए० हार्ट का योगदान-विधिशास्त्र की विश्लेषणात्मक विचारधारा के आलोचकों में एच० एल० ए० हार्ट का नाम भी अग्रगण्य है। उन्होंने चान्सरी न्यायालय में वकालत की तथा सन् 1952 से 1965 की अवधि में आक्सफोर्ड में विधि के प्रोफेसर भी रहे थे। उन्होंने आस्टिन की विश्लेषणात्मक विचारधारा का खण्डन करते हुये समाज और विधि के परस्पर सम्बन्धों विषयक अपने स्वयं के सिद्धान्त प्रतिपादित किये। उन्होंने ऑस्टिन के आदेशात्मक विधि सिद्धान्त की अपनी कृति ‘कन्सेप्ट ऑफ लॉ’ में कटु आलोचना की।12 हाटे ने अपने प्रमाणवादी सिद्धान्त (Positivist Theory) को निम्नलिखित बातों पर केन्द्रित किया

(1) इन्होंने यह स्वीकार किया कि विधि सम्प्रभु का आदेश होती है;

(2) वे इस बात से सहमत थे कि विधि का विश्लेषणात्मक किया जाना आवश्यक होता है;

(3) न्यायाधीशों के निर्णय केवल सुस्थापित विधि पर ही आधारित होने चाहिये न कि किसी नीति विशेष या नैतिकता पर;

(4) नैतिक निर्णयों की पुष्टि सबूत या साक्ष्य के आधार पर नहीं की जा सकती है, तथा

(5) विधि जैसी कि वह वास्तव में है’ को ‘विधि जैसी कि वह होनी चाहिये, से पृथक रखा जाना चाहिये।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ऑस्टिन के विधि-सम्बन्धी प्रमाणवादी विचारों (Positivist views) ने विधि-क्षेत्र में खलबली मचा दी। अनेक विधिशस्त्रियों ने ऑस्टिन के विधि-सिद्धान्त की आलोचना इस आधार पर की कि उन्होंने विधि’ और ‘न्याय’ को एक दूसरे से पृथक रखकर महान भूल की। परन्तु । उल्लेखनीय है कि ऑस्टिन द्वारा विधि और न्याय के बीच जो अन्तर स्थापित किया गया वह प्राकृतिक विधि (Natural Law) के विरुद्ध चुनौती थी, जिसे भावी विधिशास्त्रियों ने अपनी विचारधारा में पर्याप्त स्थान दिया। तथापि प्रमाणवादी विधिशास्त्री के रूप में ऑस्टिन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि वे ऐसे प्रथम

12. एच० एल० ए० हार्ट की प्रमुख कृतियों में कनसेप्ट ऑफ (1961); मॉरेलिटी ऑफ दि क्रिमिनल लॉ (1965) तथा पनिशमेण्ट एण्ड रिस्पॉन्सिबिलटी (1967) प्रमुख हैं.

व्यक्ति थे जिन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विधि की उत्पत्ति राज्य से हुई है। उनके द्वारा प्रतिपादित आदेशात्मक विधि-सिद्धान्त से पश्चात्वर्ती विधिशास्त्रियों को पर्याप्त प्रेरणा मिली। आगे चलकर इसी सिद्धान्त के परिणामस्वरूप विधिशास्त्र में वियना-स्कूल का सूत्रपात हुआ जिसके मुख्य प्रवर्तक केल्सन थे। विधिशास्त्र की प्रमाणवादी विचारधारा (Positive School) के समर्थकों में जान ऑस्टिन का नाम सदैव अविस्मरणीय रहेगा। नि:संदेह ही उनकी विधिसम्बन्धी विश्लेषणात्मक विचारधारा से विधिशास्त्र में नये अध्याय का शुभारम्भ हुआ।

विश्लेषणात्मक प्रमाणवाद (Analytical Positivism)- भारतीय परिप्रेक्ष्य : ब्रिटेन की विधि व्यवस्था में ऑस्टिन द्वारा समर्थित विश्लेषणात्मक प्रमाणवादी सिद्धान्त का वर्चस्व एक शताब्दी से अधिक समय तक बना रहा। यह सिद्धान्त मूलतः तीन प्रकल्पनाओं पर आधारित था—(1) विधि राज्य के संप्रभुताधारी की देन है, (2) इसमें नैतिकता समाविष्ट नहीं है, तथा (3) विधि की अवज्ञा के पीछे शास्ति का भय उसकी बाध्यता सुनिश्चित करता है।

यदि ऑस्टिन के उपरोक्त विधि सिद्धान्त का भारतीय विधि के परिप्रेक्ष्य में परीक्षण किया जाए तो दोनों में विलक्षण भिन्नता दिखलाई देगी। ऑस्टिन ने राज्य के संप्रभुताधारी को विधि से श्रेष्ठतम माना क्योंकि संप्रभुताधारी ही विधि का निर्माण करता है जबकि भारतीय विधि-व्यवस्था में विधि का स्थान शासक से ऊँचा है क्योंकि विधि शासक पर भी उतनी ही बंधनकारी है जितनी कि प्रजाजनों पर। शासक को विधि, अर्थात् * धर्म के अनुसार शासन करना होता है। प्राचीन हिन्दू विधि व्यवस्था में विधि को ‘धर्म’ की संज्ञा दी गई थी। जिसमें सत्य, अहिंसा और औचित्य को सर्वाधिक महत्व दिया गया था। अतः स्पष्ट है कि भारतीय विधि व्यवस्था में धर्म तथा नैतिकता, दोनों सहवर्ती अवधारणाएँ थीं जबकि ऑस्टिन ने इन्हें एक-दूसरे से पूर्णतः पृथक माना।

 यह सत्य है कि भारत में ब्रिटिश राज्य स्थापित होने के पश्चात् भारतीय विधि भी अंग्रेजी विधि-प्रणाली के प्रभाव से मुक्त न रह सकी। परिणामस्वरूप ऑस्टिन के आदेशात्मक विधि सिद्धान्त को ब्रिटिश शासित भारतीय विधि में भी समाविष्ट किया गया। परन्तु भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात् संविधान निर्माताओं ने प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली लागू की जिसमें जन-कल्याण को सर्वोपरि माना गया। अतः शासक की निरंकुश विधि-निर्माण की शक्ति को नकारते हुए उससे अपेक्षा की गई कि विधि निर्माण करते समय संसद सामाजिक न्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ऐसे कानून बनाये जो संविधान की द्देशिका, नागरिकों के मूल अधिकार एवं भाग IV में वर्णित नीति निदेशक सिद्धान्त के लक्ष्य को संवर्धित करें।

तात्पर्य यह है कि भारत में संविधान लागू होते ही यह देश एक प्रजातांत्रिक गणराज्य में परिणित हो गया जिसके अन्तर्गत अपनाई गई विधि-व्यवस्था में स्वाधीनता, समानता तथा सम-न्याय के सिद्धांतों को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। इस कथन की पुष्टि में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत मेनका गाँधी बनाम। भारत संघ13 के वाद का उल्लेख किया जाना उचित होगा जिसमें न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि विधि द्वारा विहित प्रक्रिया (Procedure prescribed by law) न्यायपूर्ण, उचित एवं तर्कसंगत होनी चाहिये न कि दमनात्मक या स्वच्छंद। उच्चतम न्यायालय ने उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य14 तथा उपभोक्ता शिक्षा एवं शोध केन्द्र बनाम भारत संघ15 के प्रकरणों में दिये गये अपने पश्चातवर्ती निर्णयों में। इसी अभिमत को पुन: दोहराते हुए अभिकथन किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित जीवन और स्वाधीनता के अधिकार के संदर्भ में सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सामाजिक न्याय के लक्ष्य की अनदेखी न की जाए। अत: संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि वर्तमान भारत में ब्रिटिश कालीन आज्ञात्मक विधि को कोई स्थान नहीं है, क्योंकि कल्याणकारी राज्य में विधि सर्वोपरि न होकर सामाजिक न्याय सुनिश्चित कराने का एक साधन मात्र है जिसका प्रयोग शासन द्वारा लोकहित के संवर्धन के लिए किया जाना अपेक्षित है।

13. ए० आई० आर० 1978 सु० को० 597.

14. ए० आई० आर० 1993 सु० को० 2178.

15. ए० आई० आर० 1995 सु० को० 922.

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