Select Page

LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 3 Notes

 

Chapter 3 Legal Theory of Jurisprudence and Legal Theory Online Boos LLB 1st Semester / 1st Year Notes Study Material PDF for Student, LLB Law 1st Year Important Notes All Subjects and All Semester 1st, 2nd, 3rd, 3rd, 3rd and 6th Semester PDF File in Download All the candidates update our website to get the BA on LLB 1st Semester Notes PDF. From our website, you get BA LLB 1st Semester / 1st Year English Hindi Notes in PDF Free.

 

अध्याय 3 (Chapter 3)

विधिक सिद्धान्त

(Legal Theory)

 विधिशास्त्र की विषय-वस्तु एक ही होने पर भी विधिशास्त्रियों ने इसके सिद्धान्तों, कार्यों तथा उद्देश्यों आदि की विवेचना अपनी धारणाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार से की है। यह स्वाभाविक ही है क्योंकि सभी के विचार एक समान नहीं होते । राष्ट्रों की नीति के बारे में भी यही बात लागू होती है। यदि कोई राष्ट्र अपनी नीति तथा विचारों में नैतिकता को अधिक महत्व देता है; तो दूसरा धर्म या राजनीति को प्रधान मानता है। उदाहरण के लिये भारतीय चिंतन आध्यात्मिकता पर आधारित होने के कारण भारत के विधिक विचारों (legal thoughts) में नैतिकता की प्रचुरता है परन्तु इंग्लैण्ड में राजनीति को प्रधानता दी जाने के कारण वहाँ की विधि-प्रणाली राजनीतिक विचारों पर आधारित है। इसी प्रकार जर्मनी में ऐतिहासिक दृष्टिकोण को प्रधानता दी जाने के कारण वहाँ विधि को इतिहास के आधार पर विकसित करने का प्रयास किया गया है। इसी प्रकार अमेरिका में विधि का विकास समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों के आधार पर हुआ है जबकि रूस की विधि-व्यवस्था का मूल आधार आर्थिक पृष्ठभूमि में है। राष्ट्रों की वैचारिक विशिष्टता का प्रभाव वहाँ के विधिवेत्ताओं के वैयक्तिक विचारों पर भी पड़ता है और वे विधिक सिद्धान्त (Legal Theory) के प्रति अपने राष्ट्र के अनुकूल दृष्टिकोण अपनाते हैं। विधिक सिद्धान्त से तात्पर्य विधि के स्वरूप के निर्धारण से है; अर्थात् विधिवेत्ताओं की धारणायें भिन्न होने के कारण विधिशास्त्र की विभिन्न विचारधाराओं का प्रादुर्भाव हुआ। विधि सम्बन्धी विभिन्न विचारधाराओं का उल्लेख करने के पूर्व विधि-दर्शन सम्बन्धी कुछ सामान्य बातों की विवेचना करना आवश्यक है जो विधिक सिद्धान्त के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

विधिशास्त्र में विधिक सिद्धान्त का स्थान तथा भूमिका

(The place and function of Legal Theory in Jurisprudence)

विधिक सिद्धान्त (legal theory) सम्बन्धी विचार एक ओर तो तर्कशास्त्र से तथा दूसरी ओर राजनीतिक सिद्धान्तों से जुड़े हुए हैं। कभी-कभी विधिक सिद्धान्त का उद्भव तर्कशास्त्र से होता है तथा राजनीतिक विचारधाराएँ दोयम भूमिका (secondary role) निभाती हैं जैसा कि जर्मन क्लासिकल तत्वज्ञों के विधिक विचारों में दृष्टिगोचर होता है। इसके ठीक विपरीत, कभी-कभी विधिक सिद्धान्त का उद्भव राजनीतिक विचारधारा से होता है तथा दार्शनिक तत्व उनमें द्वितीयक भूमिका निभाते हैं जैसा कि समाजवादी या हक्मशाही (Fascist) देशों की विधि-पद्धतियों में प्रायः देखा जाता है। विधिक सिद्धान्त (legal theory) का उदगम स्रोत कुछ भी क्यों न हो परन्तु यह निर्विवाद है कि इसमें दार्शनिक तत्वों का समावेश अवश्य रहता है। जो संसार में मानव के अनुभवों को प्रतिबिम्बित करते हैं तथा जिन्हें राजनीतिक विचारों से निश्चित रूप पास होता है। विधि के अन्तिम लक्ष्य के विषय में सभी विचारधाराओं का दृष्टिकोण यह है कि मनष्य स्वभावत. विचारशील तथा सामूहिक जीवन व्यतीत करने वाला प्राणी है, अत: वह ऐसी विधियों को स्वीकारना चाहता है, जो समाज में उसके विकास का मार्ग प्रशस्त करती हों। ।

विधिक सिद्धान्त (legal theory) में दार्शनिक तथा राजनीतिक विचारों के सम्मिश्रण को एक आवश्यक परिणाम यह है कि कुछ विधि विचारक प्रथमत: दार्शनिक (philosopher) होते हैं परन्तु दर्शन सम्बन्धी ज्ञान की पर्णता के लिये उन्हें विधिवेत्ता (Jurist) की भूमिका निभानी पड़ती है; जबकि कुछ विधिवेत्ता स्वभावत: गजनीतिन होते हैं परन्तु अपने राजनीतिक विचारों को वैधानिक रूप में प्रकट करने के लिये उन्हें विधिक दृष्टिकोण अपनाना पड़ता है। विधिवेत्ताओं की इन दो शाखाओं के अतिरिक्त वर्तमान में एक तीसरी शाखा का उदय भी हुआ है जो विधि के व्यावसायिक अध्ययन (professional studies) तथा प्रयोग के द्वारा उसके

अन्तिम उद्देश्यों को खोज निकालने में कार्यरत हैं। परन्तु इस कोटि के विधिवेत्ताओं के लिये भी दर्शन अथवा राजनीति में से किसी एक क्षेत्र को अपनाना नितांत आवश्यक होता है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि ‘विधिक सिद्धान्त’ का निर्माण बहुत कुछ दार्शनिक तथा राजनीतिक मान्यताओं पर आधारित है। इसके अतिरिक्त नैतिक, धार्मिक तथा अर्थशास्त्रीय विचारधाराओं का भी विधिक सिद्धान्तों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह सर्वविदित है कि उन्नीसवीं सदी की विधिक विचारधारा पर उस समय के दार्शनिक, धार्मिक, नैतिक तथा राजनीतिक विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा है। इस कथन की पुष्टि इस बात से हो जाती है कि उस समय के प्रमुख विधिवेत्ता विशेषत: दार्शनिक, धर्मशास्त्री अथवा राजनीतिज्ञ रहे। हैं। दार्शनिकों द्वारा राजनीतिज्ञों के विधिक सिद्धान्त के स्थान पर व्यावसायिक कानूनविदों द्वारा निर्मित विधिक सिद्धान्तों को अधिमान्यता दिये जाने का प्रादुर्भाव आधुनिक युग में विधिक शोधकार्य के प्रति लगाव तथा विधि के व्यावसायिक प्रशिक्षण की प्रगति के परिणामस्वरूप हुआ है। वर्तमान समय में विधि-व्यवसायियों को अपने व्यावसायिक कार्यों में विधिक एवं सामाजिक समस्याओं से जूझना पड़ता है। विधि तथा सामाजिक समस्याओं में समन्वय स्थापित करने के उपक्रम में जिस विधिक विचारधारा का उद्भव हुआ है उसे फ्रीडमैन ने ‘‘वर्तमान युग का विधिक दर्शन” (Legal Philosophy of the new era) कहा है। वर्तमान लोकहित वाद का बढ़ता हुआ महत्व इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

सारांश यह है कि भूतकालीन विधिक सिद्धांत (Legal Theory) के विश्लेषण के लिये तत्कालीन दर्शनशास्त्र एवं राजनीतिक विचारों के अध्ययन पर अधिक बल देना आवश्यक होगा जबकि वर्तमान विधिक सिद्धान्तों को आधुनिक विधि-व्यवसायियों के दृष्टिकोण के आधार पर समझना होगा। अत: दोनों में अन्तर केवल चिंतन-पद्धति तथा विधिक सिद्धान्त के प्रति दृष्टिकोण का है।

विधिक सिद्धान्त (Legal Theory) सम्बन्धी यूनानी विचारधारा

यूनान के विधि-दर्शन में होमर (Homer) से लेकर स्टोइक्स (Stoics) के समय तक विधिक सिद्धान्त का पर्याप्त विकास हो चुका था। प्राचीन यूनान में व्याप्त सामाजिक अशान्ति, आन्तरिक कलह, बार-बार सत्ता में परिवर्तन तथा वर्षों की अराजकता के कारण वहाँ के विचारों में यह भावना जागृत हुई कि वे सुव्यवस्थित कानून एवं राज्य-व्यवस्था लाने के लिए न्याय तथा सुस्पष्ट विधि के परस्पर सम्बन्धों के विषय में गम्भीरता से विचार करें।

होमर के विधिक विचार

यूनान के विधि-दर्शन (Greek philosophy) में होमर के विधिक विचारों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। दैवी-शक्ति को विधान का स्रोत मानते हुए उन्होंने व्यक्त किया कि भौतिक जगत् की समस्त न्याय व्यवस्थाएँ। प्रथाओं तथा रूढ़ियों पर आधारित हैं तथा इसका मूल उद्गम थेमिस्टिम (Themistes) में है जो शासक को दैवी शक्ति के रूप में जियस (Zeus) से प्राप्त होती है। इस प्रकार उन्होंने शासक की शक्ति तथा उसके प्राधिकार को ही ‘न्याय’ माना है।

विधि के प्रति प्लेटो के विचार

यह सर्वविदित है कि पेलोपोनेशियन युद्ध (Peloponnesian War) के परिणामस्वरूप एथेन्स में लोकतन्त्र का पतन हुआ तथा शासन और समाज की अवनति के लक्षण स्पष्टत: दृष्टिगोचर होने लगे। एथेनियन समाज (Athenian Society) का विघटन तथा वहाँ की सभ्यता का ह्रास प्लेटो और अरस्तू (Aristotle) की विचारधाराओं को प्रभावित किये बिना नहीं रह सके। इन समस्याओं के कारण दोनों ने ही अपना ध्यान ‘न्याय’ की व्याख्या तथा न्याय और प्रचलित विधि के परस्पर सम्बन्धों के विश्लेषण की ओर केन्द्रित किया। परन्तु

1. फ्रीडमैन (Friedmann) : लीगल थ्यौरी (पाँचवाँ संस्करण), पृ० 3.

2. यूनानी विधि-दर्शन में ‘थिमिस्टिस’ को न्याय की देवी माना गया है।

केल्सन के विचार में प्लेटो और अरस्तू ने इस समस्या के प्रति भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण अपनाये। समाज में विधि की आवश्यकता पर जोर देते हुए प्लेटो ने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ (Republic) में लिखा है कि न्याय के प्रवर्तक का कार्य पूर्णत: शासक को सौंपा जाना चाहिए जिसकी उच्चतर शिक्षा और प्रखर बुद्धि स्वयं ही उचित शासन की गारंटी है। शासक का कार्य यह देखना है कि नागरिक अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार कार्य कर रहे हैं या नहीं। परन्तु उल्लेखनीय है कि रिपब्लिक’ में प्लेटो ने एक आदर्श राज्य की कल्पना प्रस्तुत की थी जिसमें शासक द्वारा लागू की जाने वाली आदर्श विधि का ही वर्णन प्रचुरता से मिलता है। तथापि अपने अन्तिम वर्षों में प्लेटो ने विधि के सम्बन्ध में अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए ‘दि लॉज’ (The Laws) में तत्कालीन एथेन्स, स्पार्टा तथा कीट के राज्यों में प्रचलित विधियों का तुलनात्मक विवेचन किया है। यहाँ तक कि उसने बाजार-सम्बन्धी विनियमों (market regulations) तथा कृषि-कार्य सम्बन्धी नियमों जैसे सामान्य विषयों की विधिक विवेचना करना भी आवश्यक समझा। प्लेटो का मत था कि विधि का कार्य मानव के आपसी सम्बन्धों को नियंत्रित करना तथा शिशुओं के संरक्षण, विवाह, तलाक यहाँ तक कि अन्तिम संस्कार और विधिक व्यवसायों से होने वाली आय आदि के सम्बन्ध में उचित व्यवस्था रखना है। प्लेटो ने दीवानी और आपराधिक शास्ति का विस्तृत विवेचन देकर विधि की इन दोनों शाखाओं को सक्षम बनाया। न्याय का पालन उचित तरीके से हो रहा है या नहीं, यह देखने के लिये पर्यवेक्षकों (supervisors) की व्यवस्था की गई जो लिपिबद्ध विधि से मार्गदर्शन प्राप्त करते थे। केयर्स (Cairans) के अनुसार प्लेटो की विधिक विचारधारा आधुनिक साम्यवादी विचारधारा से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। क्योंकि दोनों ही मनुष्य को राज्य के प्रशासनिक और विधिक नियंत्रण में रखने के पक्ष में हैं।

विधि दर्शन में अरस्तू का योगदान

अरस्तू (Aristotle) का विधि-दर्शन प्लेटो की विधि सम्बन्धी विचारधाराओं से कहीं अधिक यथार्थवादी तथा निश्चित था क्योंकि यह तत्कालीन प्रचलित कानूनों और संवैधानिक व्यवस्थाओं पर आधारित था। अरस्तू के विचार में विधि के संदर्भ में मानव जीवन के दो पहलू हैं-एक प्राकृतिक जो उसे अच्छे और बुरे में भेद का बोध कराता है तथा जिसके आधार पर कालान्तर में प्राकृतिक विधि-सिद्धान्त का प्रादुर्भाव हुआ। अरस्तू का मानना था कि मानव दो अर्थों में प्रकृति का ही एक अंग है, प्रथम यह कि उसे ईश्वर ने निर्मित किया है तथा दूसरे, उसे ईश्वर ने तर्क-बुद्धि प्रदान की है जिसके आधार पर वह अपनी इच्छाओं को अभिव्यक्त कर सकता है। इस प्रकार मानव की तर्क-बुद्धि प्रकृति की ही देन होने के कारण वह प्राकृतिक न्याय के समरूप है। प्राकृतिक न्याय को परिभाषित करते हुए अरस्तू ने कहा है कि उसका प्रभाव सभी जगह एक समान होता है तथा वह लोगों की विचारधाराओं के साथ परिवर्तनशील नहीं होती है। इस विचार का समर्थन कान्ट, हीगल, जॉन स्टुअर्ट मिल, हरबर्ट स्पेन्सर तथा कोहलर जैसे विख्यात विधिशास्त्रियों ने भी। किया है। अरस्तु के अनुसार मानव जीवन का दूसरा पहलू ऐसे न्याय से सम्बद्ध है, जो विधि-प्रशासन के तकनीकी सिद्धान्तों पर आधारित है। इसका उद्देश्य यह है कि विधि का मुख्य कार्य अपकृत्यों या अपराधों के परिणामों के प्रति उचित उपचार दिलाना है, अर्थात् दण्ड द्वारा अपराध का दमन किया जाना चाहिये तथा अपकार civil wrong) के लिये क्षतिपूर्ति की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए।अरस्तू ने सभी व्यक्तियों के प्रति समान न्याय का समर्थन किया। |

विधि क्षेत्र में अरस्तु का मुख्य योगदान यह है कि उसने प्राकृतिक विधि और न्याय में विभेद स्पष्ट किया है। प्राकृतिक विधि (natural law) और वास्तविक विधि (Positive law) में विभेद करते हुए अरस्तू ने कहा है कि प्रथम विधि मानव-प्रकृति से शक्ति प्राप्त करती है जब कि दूसरी स्थान-विशेष में प्रचलित लिपिबद्ध नियमों से, जो उचित भी हो सकते हैं अथवा अनुचित भी।

अरस्तू ने दुर्बोध (abstract) न्याय तथा साम्यिक न्याय में अन्तर स्पष्ट करते हुए कहा है कि दुर्बोध वाघ की प्रकृति ऐसी है जो बहुधा सामान्य मामलों में ही लागू होती है; अत: उनके विशिष्ट मामलों में उसे

3. केल्सन : ‘‘दि मेटामॉरफोसिस ऑफ दि आइडिया ऑफ जस्टिस” शीर्षक से इन्टरप्रिटेशन ऑफ माडर्न लीगल फिलॉसफीज में प्रकाशित लेख (1947 संस्करण), पृष्ठ 390.

लागू करना कठिन होता है। इस समस्या के निवारण के लिये ऐसे मामलों में साम्यिक विधि के सिद्धान्तों को लागू किया जा सकता है। विधि की परिभाषा देते हुए अरस्तू ने कहा है कि ”विधि नियमों का ऐसा संकलन है, जो दण्डाधिकारियों तथा जन-साधारण के प्रति समान रूप से बन्धनकारी होता है।” इसी प्रकार अरस्तू ने राज्य की भी वृहद् व्याख्या की है। उसके विचार में शासन-प्रणालियों (Governments) के मुख्य प्रकार होते हैं-(1) राजतन्त्र (Monarchy); (2) कुलीनतन्त्र (Aristocracy); तथा (3) लोकतन्त्र (Democracy) इनमें से प्रत्येक के विकृत स्वरूप को अरस्तू ने क्रमशः तानाशाही (Tyranny), अल्पतन्त्र (Oligarchy) तथा भीड़तन्त्र (Mobocracy) कहा है जिसमें शासक सामान्य जनहित के बजाय अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की ओर । अधिक ध्यान देता है।

अरस्तू (Aristotle) का विश्वास था कि अनेक कारणों से शासन-प्रणालियों में परिवर्तन होते रहते हैं। और इन परिवर्तनों का एक चक्र-सा चलता रहता है। इस चक्र में राजतन्त्र (monarchy) को अरस्तू सर्वप्रथम स्थान देता है जिसके विकृत हो जाने पर यह तानाशाही (tyranny) का रूप धारण कर लेता है। इस स्थिति से ऊबकर लोग विद्रोह कर देते हैं और कुलीनतन्त्र (aristocracy) कायम हो जाता है। यह शासन-व्यवस्था भी समय पाकर अल्प-शासन (oligarchy) में परिवर्तित हो जाती है जिसे पलट कर लोग लोकतंत्र (Democracy or Polity) स्थापित कर देते हैं। जब लोकतन्त्र में कुव्यवस्था और स्वार्थपरायणता फैल जाती है तो वह विकृत रूप ग्रहण कर लेता है और भीड़तन्त्र में परिवर्तित हो जाता है जिसे अरस्तू ने भीड़तन्त्र (Mobocracy) कहा है। अन्त में इस प्रकार के विकृत शासन से तंग आकर जनता पुन: किसी योग्य व्यक्ति को शासक या राजा के रूप में स्वीकार लेती है और इस प्रकार यह शासन-चक्र चलता रहता है।

अरस्तू ने ‘रिटोरिक’ (Rhetoric) नामक अपने ग्रन्थ में मुकदमेबाजी के विषय में विस्तृत वर्णन किया है। वस्तुत: इसे मुकदमेबाजी सम्बन्धी नियमावली (manual) ही कहा जा सकता है। अरस्तू का मत था कि यदि पक्षकार प्रचलित विधि से संतुष्ट न हों तो उन्हें सार्वभौमिक या प्राकृतिक विधि के अनुसार न्याय प्राप्त करने के लिये अपील करने का अधिकार होना चाहिये।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि अरस्तू ने विधि सम्बन्धी उन सभी पहलुओं पर विचार किया था। जो वर्तमान पाश्चात्य विधिक विचारधारा के लिये प्रश्नचिन्ह बने हुये थे। विधि के क्षेत्र में ‘आदर्श’ और ‘यथार्थ’ के द्वन्द्व को अरस्तू ने समन्यायिक सिद्धान्तों (equity) के माध्यम से समाप्त करने का प्रयास किया जो । उसकी दार्शनिक दूरदर्शिता का उत्कृष्ट प्रमाण है।

सामाजिक परिवर्तनों का विधिक सिद्धान्त पर प्रभाव

(Impact of Social Changes on Legal Theory)

कानून या विधि पर सामाजिक क्रान्ति का गहरा प्रभाव पड़ता है। किसी समाज विशेष की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा नैतिक गतिविधियाँ वहाँ प्रचलित कानून द्वारा विनियोजित रहती हैं। अतः विधि एक ऐसा माध्यम है जो समाज को नियंत्रित रखने का कार्य करती है। सामाजिक नियंत्रण के माध्यम के रूप में विधि से सम्बन्धित तीन प्रमुख बातों पर विचार करना उचित होगा जो सिद्धान्तत: ठीक होते हुए भी क्रान्ति के समय सामाजिक वास्तविकता (social reality) और प्रचलित कानूनों में अलगाव स्थापित कर देती है। ये तीन बातें हैं-(1) विधि का स्थायित्व (stability), (2) उसकी औपचारिकता (formalism), तथा (3) कुव्यवस्था से संरक्षण की इच्छा (Desire for security against disorder) | विधि का प्रमुख उद्देश्य यह है कि वह सामाजिक परिस्थितियों में स्थायित्व (stability) स्थापित करे। परन्तु इस प्रयास में विधिमर्मज्ञ सामाजिक परिवर्तनों की ओर अनदेखी कर जाते हैं। परिणामस्वरूप कानून एक औपचारिकता मात्र बन कर रह जाता है तथा सामाजिक क्रान्ति के कारण उसकी उपेक्षा होने लगती है। इसी

4. पॉलिटिक्स ऑफ एरिस्टाटिल, अर्नेस्ट बार्कर द्वारा अंग्रेजी में अनुवादित एवं संपादित (1946), भाग 3, अध्याय 6-7.

5. Friedmann calls these three characteristic features as stability, formalism and desire for security from disorder–(Friedmann: Legal Theory, 5th ed. p. 5).

प्रकार विधि में औपचारिकता (formalism) को पर्याप्त महत्व दिये जाने के कारण विधिवेत्ताओं को विधि और सामाजिक परिस्थितियों में ताल-मेल बैठाना कठिन हो जाता है जबकि कुव्यवस्था से समाज का संरक्षण करना ही विधि का प्रमुख कार्य है। यही कारण है कि गत दो शताब्दियों से राज्य की बढ़ती हुई शक्ति का प्रयोग सामाजिक तथा राजनीतिक संघर्ष को यथासम्भव कम करते हुए समाज को इनसे संरक्षण दिलाने के लिये किया जा रहा है। राज्य द्वारा यह कार्य विधि के माध्यम से किया जाता है।

वर्तमान में जबकि समाज अधिकाधिक सुख तथा आत्म स्वावलम्बन के लिये संघर्षरत है, राजनैतिक द्वेष, सामाजिक संघर्ष तथा युद्ध आदि विधि पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकते । वर्तमान विधिवेत्ता राजनैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक वास्तविकताओं की अनदेखी नहीं कर सकते। यही कारण है कि इस परिवर्तनशील युग में कानूनों में बारम्बार परिवर्तन या संशोधन करना आवश्यक हो जाता है जो विधि के स्थायित्व के विपरीत होते हुए भी अपरिहार्य है। उदाहरण के लिये, वर्तमान में भारत में किये जा रहे भूमि, सम्पत्ति, कराधान, प्रदूषण, उपभोक्ता संरक्षण, जीवन बीमा तथा औद्योगिक और श्रमिक तथा कम्पनी आदि सम्बन्धी विधानों में परिवर्तनों के कारण सम्पत्ति, संविदा तथा अपकार आदि विधियों की आधारभूत धारणायें ही बदल गयी हैं। सारांश यह है कि सामाजिक, राजनैतिक तथा आर्थिक विकास के साथ विधिक दृष्टिकोण में परिवर्तन होना अवश्यम्भावी है।

द्रुतगति से बदलती हुई राष्ट्र की परिस्थितियों ने अन्तर्राष्ट्रीय विधि को भी प्रभावित किया है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में विधायिनी शक्ति का अभाव होने के कारण इस क्षेत्र के न्यायविदों को अपनी विधियाँ अन्तर्राष्ट्रीय समाज के अनुरूप बनाना आवश्यक होता है। यही कारण है कि विश्व के राष्ट्रों की बदलती हुई सामाजिक परिस्थितियों का प्रतिबिम्ब अन्तर्राष्ट्रीय विधि में निरन्तर होने वाले परिवर्तनों में स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ता है।

विधिक सिद्धान्त से सम्बन्धित एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि समाज के विकास में विधि का क्या योगदान है? सदियों का अनुभव यह दर्शाता है कि विधिशास्त्रियों तथा विधि दार्शनिकों (legal philosophers) ने सामाजिक परिवर्तनों के प्रति या तो बहुत अधिक रुचि दिखाई है या वे उसके प्रति पूर्णतया उदासीन रहे हैं। जैसा कि सर्वविदित है, हीगल (Hegal) ने सभी सामाजिक समस्याओं को विधि के माध्यम से हल करने का प्रयत्न किया जब कि उन्नीसवीं शताब्दी में वास्तविक विधि (positive law) के समर्थकों ने तथा साम्यवादी विधि-विचारकों ने विधि को सामाजिक समस्याओं से पूर्णत: पृथक रखे जाने का समर्थन किया। हीगल के विचार से विधि का कार्य एक आज्ञाकारी सेवक की भाँति होना चाहिये, अर्थात् परिणामों की चिन्ता किए बिना प्रचलित विधि को ज्यों-का-त्यों लागू किया जाना चाहिये।

फ्रीडमैन के अनुसार सामाजिक परिवर्तनों के संदर्भ में विधि-दर्शन (legal philosophy) के तीन प्रकार हो सकते हैं-प्रथम, ऐसा विधि दर्शन जिसमें उन सभी विधिक सिद्धान्तों को समाविष्ट किया गया है, जो विधिक आदर्शों को एक निश्चित पद्धति का रूप देते हैं। द्वितीय, विश्लेषणात्मक विधि-दर्शन जो आवश्यक रूप से विधिक तकनीक (legal technique) से सम्बन्धित है। तृतीय प्रकार के विधि-दर्शन में उन समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों का परीक्षण किया जाता है जो विधिक कल्पनाओं तथा समाज में उनके क्रियान्वयन से प्बन्ध रखते हैं 6 उल्लेखनीय है कि विधि दर्शन के इन तीन प्रकारों में एकरूपता का अभाव है परंतु विधि को समाज में उचित स्थान दिलाने की दृष्टि से ये सभी एक दूसरे के पूरक हैं।

यह सर्वविदित है कि विधि राजनीतिक क्षेत्र को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती; उदाहरणार्थ, पाश्चात्य विचारधारा का मूल आधार प्राकृतिक विधि की कल्पना में ही दिखाई पड़ता है। ईश्वर, प्रकति तथा मनुष्य में आपसी सम्बन्ध शासन-प्रणालियों सम्बन्धी परस्पर विरोधी धारणाएँ तथा राष्ट्रों के सम्बन्धों को निर्धारित करने वाले विभिन्न मापदण्ड आदि प्राकृतिक विधि पर ही आधारित हैं। हॉब्स (Hobbes), कॉन्ट (Kant), फिच्टे (Fichte) तथा हीगल (Hegal) आदि विचारकों ने राज्य सम्बन्धी अपने राजनीतिक सिद्धान्तों

6. फ्रीडमैन : लीगल थ्योरी (5वाँ संस्करण), पृ० 72.

को विधि दर्शन के रूप में ही विकसित किया है। इसी प्रकार सेविनी (Savigny) की वॉल्कजिस्ट (Volkegeisr) की धारणा, गिर्क का अवयवी सिद्धान्त (Gierk’s Organic Theory), इहरिंग (Ihring) का यह सिद्धान्त कि विधि का आधार राज्य की दमनकारी शक्ति (coercive power) में निहित है, ड्युगिट (Duguit) का सामाजिक समेकता (social solidarity) का सिद्धान्त आदि सभी यह दर्शाते हैं कि विधिशास्त्रियों के विधि-सम्बन्धी विचार राजनैतिक वास्तविकताओं पर ही आधारित होते हैं।

उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि विधिक विचारों को सामाजिक वास्तविकताओं की पृष्ठभूमि में समझना आवश्यक है क्योंकि विधि और समाज एक दूसरे से अलग नहीं रखे जा सकते । अमेरिकन यथार्थवादी शाखा (American Realist School) भी सामाजिक वास्तविकताओं के विश्लेषण पर ही आधारित है। विधि-व्यवसायियों को यह भली-भाँति समझ लेना चाहिये कि विधिक सिद्धान्त (Legal theory) समाज-विशेष की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिस्थितियों को प्रतिबिम्बित करता है। इस संदर्भ में फ्रीडमैन (Friedman) ने निम्नलिखित निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं

(1) विधि को मानव-जीवन की वास्तविकताओं से अलग नहीं रखा जा सकता है। अत: यह धारणा कि विधि स्वयं में पूर्ण है, निराधार तथा भ्रामक है; |

(2) विधि प्रणाली सदैव सा पाजिक परिवर्तन के अधीन रही है।

(3) विधि का अध्ययन तथा प्रवर्तन सामाजिक समस्याओं को समझने का अच्छा अवसर प्रदान करता है; तथा

(4) समाज के विकास में विधायिनी तथा अधिवक्ताओं का योगदान दो प्रमुख बातों पर निर्भर करता है। प्रथम यह कि उस समाज का राजनैतिक स्वरूप किस प्रकार का है तथा दूसरे; उसकी विधायिनी संस्था सामाजिक परिवर्तनों से उत्पन्न होने वाली आवश्यकताओं की पूर्ति करने में कहाँ तक सक्षम है?

अत: किसी देश के विकास में विधि के योगदान का मूल्यांकन उस देश में होने वाले परिवर्तनों को राजनैतिक, सामाजिक तथा वैधानिक परिस्थितियों के परिवेश में निरन्तर परीक्षण की प्रक्रिया द्वारा करना उचित होगा। कोई भी विधिवेत्ता या विधि-व्यवसायी स्वयं को सामाजिक प्रक्रिया से पृथकू नहीं रख सकता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में भारत के संविधान में विगत 58 वर्षों में किये गये 94 संविधान संशोधन इस बात के स्पष्ट प्रमाण कि देश के विधि-निर्माता भारतीय विधि को समय-समय पर होने वाले सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक परिवर्तनों के अनुरूप बनाने के प्रति सदैव सजग रहे हैं। यही कारण है कि वर्तमान में भारत की वाणिज्यिक विधि, सम्पत्ति-विधि, औद्योगिक विधि तथा अन्य विधियों को समयानुकूल बनाने की दष्टि से उन्हें संशोधित किया जाता रहा है तथा उपभोक्ता अधिनियम, पर्यावरण प्रदूषण निवारण अधिनियम, पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, दहेज निरोधक कानून, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, घरेलु हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005, वद्धावस्था पेंशन अधिनियम, 2007 आदि जैसे नवीनतम कानून पारित किये गये हैं ताकि सामाजिक परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याओं का उचित निदान हो सके। लोकहित सम्बन्धी वाद को भारतीय विधि-व्यवस्था में पर्याप्त महत्व दिया जाना इसी प्रवृत्ति का द्योतक है।

 

विधिक सिद्धान्तों सम्बन्धी प्रमुख विसंगतियाँ

(Principal Antinomies in Legal Theory)

जैसा कि कथन किया जा चुका है विधि दर्शन का स्थान एक ओर तर्कशास्त्र तथा दूसरी ओर राजनीतिक सिद्धान्त के बीच का है, अर्थात् यदि विधिक विचार तर्कशास्त्र से बौद्धिक सामग्री (intellectual material) ग्रहण करते हैं तो राजनीतिक सिद्धान्त से उन्हें न्याय-सम्बन्धी मान्यताओं की अनुभूति मिलती है। विधिदर्शन का स्वयं का योगदान यह है कि वह राजनैतिक विचारों को विधिक सिद्धान्तवाद के रूप में परिवर्तित करने में सहायता करता है। तथापि विधि-दर्शन, तर्कशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, नीतिशास्त्र अथवा धर्मशास्त्र इन सभी का अन्तिम लक्ष्य यही है कि इस प्रश्न का समाधानकारक उत्तर खोजें कि मानव जीवन का उद्देश्य क्या

होना चाहिए। ये विभिन्न शास्त्र अपनी-अपनी मान्यताओं या धारणाओं के आधार पर मानव जीवन के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाते हैं; अत: इनके विचारों में विरोधाभास होना स्वाभाविक है। विधि-दर्शन की विषय-वस्तु तर्कशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र पर आधारित होने के कारण विधिक विचारों में इन उभय शास्त्रों में उत्पन्न होने वाली विसंगतियाँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है। विधिक सिद्धान्त को प्रभावित करने वाली संभाव्य विसंगतियाँ (antinomies) निम्नलिखित हैं

(1) विधिक सिद्धान्त के संदर्भ में सभी विधिशास्त्री इस बात से सहमत नहीं हैं कि विधि में व्यक्ति को प्रधानता दी जाये या प्रकृति (nature) को। यूनानी विधिक विचारधारा में व्यक्ति की बजाय प्रकृति (अर्थात् प्राकृतिक नियमों) को अधिक महत्वपूर्ण माना गया था। अरस्तू के विचार में मनुष्य प्रकृति का एक अंग मात्र है। प्रकृति की तुलना में व्यक्ति को श्रेष्ठ मानने वाले प्रथम विधि-मर्मज्ञ डेस्कार्टेस (Descartes) थे। आगे चलकर इसी सिद्धान्त को कान्ट (Kant) ने विकसित किया। फिच्टे (Fichte) ने तो मनुष्य को ही प्रकृति का निर्माता माना है।

(2) विधिक सिद्धान्त (Legal theory) सम्बन्धी दूसरी विसंगति इस बात से उत्पन्न होती है कि विधि पर मनुष्य की ‘इच्छा’ (will) का अधिक प्रभाव पड़ता है या उसके ‘ज्ञान’ (knowledge) का। दूसरे शब्दों में, ‘इच्छा’ से ज्ञान-पिपासा जागृत होती है अथवा ‘ज्ञान’ से इच्छा। प्रसिद्ध दार्शनिक सेन्ट थॉमस एक्विनॉस ने ‘ज्ञान’ (knowledge) को अधिक महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है कि ‘ज्ञान’ से ही इच्छा उत्पन्न होती है। केल्सन के विचार से प्रत्येक विधिशास्त्री की विधि-सम्बन्धी विचारधारा उसकी व्यक्तिगत इच्छा की अभिव्यक्ति मात्र है। कान्ट ने भी नैतिक तथा विधिक आदर्शों को ‘इच्छा’ की उत्पत्ति ही माना है। हीगल (Hegal) ने ‘ज्ञान’ अथवा ‘इच्छा’ की श्रेष्ठता सम्बन्धी विवाद को समाप्त करने का प्रयत्न करते हुए कहा है कि वस्तुत: राज्य की इच्छा ही सर्वोपरि है।

(3) विधिक सिद्धान्त (legal theory) सम्बन्धी एक अन्य विसंगति यह है कि विधि का आधार मनुष्य की बुद्धि (intellect) है अथवा उसकी अंत:प्रज्ञा (intuition) । आदिकाल से लेकर वर्तमान समय तक विधिक विचारधाराओं के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि विधि के अन्तर्गत कभी बुद्धि (मनुष्य की विचारशक्ति) को प्रधानता दी गयी तो कभी उसकी अंत: प्रज्ञा को। प्लेटो तथा अरस्तू ने शासक की अंत: प्रज्ञा को ही उसके न्यायिक विवेक का स्रोत माना है। उन्नीसवीं शताब्दी की विधि-विषयक निश्चयात्मक विचारधारा (Positivism) में मनुष्य की अंत: प्रज्ञा की बजाय उसकी बुद्धि या विवेक शक्ति को ही अधिक महत्व दिया। गया है जिससे प्रभावकारी विधि का निर्माण हो सके। गेनी (Geny) ने ‘बुद्धि’ तथा ‘ज्ञान’ में समन्वय स्थापित करते हुए कथन किया कि विधि सम्बन्धी तथ्य मनुष्य के विवेक या बुद्धि पर आधारित होते हैं जबकि उसकी अंतः प्रज्ञा उसे इन तथ्यों को जीवन की आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने की प्रेरणा देती है।

(4) विधि के स्थायित्व (stability) तथा उसकी परिवर्तनशीलता के कारण भी विधिशास्त्रियों के विचारों में विसंगति उत्पन्न हुई है। समाज में व्यवस्था और स्थिरता बनाये रखने की दृष्टि से विधि में निश्चितता होना आवश्यक है। प्राकृतिक विधि-सिद्धान्त (Natural Law Theory) के अन्तर्गत विधि को। दैवी व्यवस्था निरूपित करते हुए उसके स्थायित्व पर बल दिया गया है। विधि की ऐतिहासिक शाखा के प्रवर्तक सैविनी (Savigny) ने भी विधिक प्रथाओं तथा परम्पराओं को विधि का स्रोत मानते हुए विधि के स्थायित्व पर जोर दिया। उनके विचार में विधि का कार्य स्थायित्व स्थापित करना है। इसी प्रकार विधि की विश्लेषणात्मक शाखा के समर्थकों ने विधि के स्थायित्व तथा उसकी निश्चितता को अधिक महत्वपूर्ण माना है। परन्तु इसके ठीक विपरीत उपयोगितावादी (utilitarian) तथा समाजशास्त्रीय (sociological) विचारधाराओं ने विधि की परिवर्तनशीलता पर अधिक बल देते हुए कहा है कि सामाजिक परिवर्तनों के अनसार विधि में संशोधन किया जाना अनिवार्य है। इहरिंग ने विधि के स्थायित्व का विरोध करते हुए उसे परिवर्तनशील बनाये रखने पर जोर दिया है। उसके विचार में सभी राष्ट्रों के प्रति सदैव के लिये एक समान

7. (Law As a Means To An End) (1913) पृ० 328.

विधि को लागू करना ठीक उसी प्रकार अनुचित होगा जिस प्रकार सभी रोगियों को एक ही औषधि दी जाना। ड्यूगिट (Duguit) के सामाजिक समेकता (Social solidarity) के सिद्धान्त में भी विधि को परिस्थिति के अनुसार संशोधित किये जाने पर बल दिया गया है। ऐसे सभी विधिक सिद्धान्त जिनका आधार यह है कि विधि का कार्य परस्पर-विरोधी हितों में संतुलन बनाये रखना है, विधि को परिवर्तनशील रखे जाने की आवश्यकता अनुभव करते हैं क्योंकि उनके अनुसार हित (interests) स्वयं ही परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। डीन रास्को पाउन्ड के सामाजिक यांत्रिकी (social engineering) के सिद्धान्त में विधि के परिवर्तनशील स्वरूप का अच्छा दिग्दर्शन मिलता है।

(5) विधिक-सिद्धान्त सम्बन्धी एक अन्य विसंगति इस कारण भी उत्पन्न हुई है कि विधि के प्रति आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाया जाय अथवा भौतिकवादी दृष्टिकोण। आदर्शवाद पर आधारित विधिक विचारधारा की मान्यता यह है कि विधि का अस्तित्व मानव के नैतिक स्वरूप तथा विवेक पर आधारित है। परन्तु निश्चयात्मक विधिक विचारधारा (Positivism) के समर्थकों की धारणा है कि विधि का मूल्यांकन वास्तविकता के आधार पर ही किया जाना चाहिये। इस प्रकार विधि के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने विधि का विश्लेषण वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार किये जाने पर बल दिया है। परन्तु फ्रीडमैन के अनुसार विधि के प्रति कभी आदर्शवादी तथा कभी यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाये जाने का क्रम निरन्तर चला आ रहा है। आदर्शात्मक विधि की असफलता के कारण विधिवेत्ता वास्तविकता की ओर आकृष्ट होते हैं परन्तु जब वे भौतिकता (materialism) से ऊब जाते हैं तो पुन: आदर्शवादी सिद्धान्त का अपनाने का प्रयास करते हैं।

(6) विधि सम्बन्धी धारणाओं पर राजनीतिक विचारधारा का प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है, अतः राजनीतिक विचारधाराओं की विसंगतियों का परिणाम विधि को प्रभावित किये बना नहीं रहता है। राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त व्यक्ति’ बनाम ‘समुदाय’ या राज्य (Man versus Community) सम्बन्धी बहुचर्चित विसंगति ने विधिक विचारधारा को बहुत प्रभावित किया है तथा यह विसंगति विधि-क्षेत्र में भी व्याप्त है। प्लेटो जैसे महान् दर्शनिक ने भी ‘मनुष्य’ तथा ‘समाज’ के परस्पर विरोधी हितों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया था परन्तु वे इसमें सफल नहीं हो सके। विभिन्न विचारधाराओं में इस विसंगति के विषय में अलग-अलग प्रवृत्तियाँ दिखाई पड़ती हैं।

प्लेटो ने अपनी ‘Republic’ नामक कृति में व्यक्ति की तुलना में समाज (community) को अधिक महत्व देते हुए व्यक्ति को समाज के अधीनस्थ माना है। उनके विचार से मनुष्य के व्यक्तिगत अधिकार’ (private right) को कोई स्वतन्त्र मान्यता नहीं दी जानी चाहिये । आधुनिक असीमित राजतन्त्र (totalitarian) भी व्यक्ति के बजाय समाज को ही सर्वाधिक महत्व देते हैं। राज्य को समाज के समतुल्य मानने वाली इस विचारधारा के समर्थकों का कहना है कि व्यक्ति के निजी अधिकारों को पूर्णतः समाप्त करके राज्य (समाज) को ही सर्वशक्तिमान बनाया जाना चाहिये। इसके लिये वे न्यायिक पार्थक्य के सिद्धान्त की। समाप्ति तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता के अन्त पर जोर देते हैं। ड्यूगिट (Duguit) के सामाजिक समेकता (social solidarity) के सिद्धान्त में भी व्यक्ति को समाज (राज्य) के अधीन रखा गया। उनके विचार से प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह समाज के आदेशों का पालन करे तथा एकनिष्ठा से राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों तथा दायित्वों का निर्वहन करे।।

दूसरी ओर हॉब्स तथा लॉक (Hobbes and Locke) आदि विद्वानों ने ‘व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ माना है। काण्ट (Kant) भी इसी विचारधारा के समर्थक हैं। बेन्थम का उपयोगितावाद (utilitarianism) तथा स्पेन्सर का राज्य के विकास का सिद्धान्त (Theory of Evolution) भी व्यक्तिवाद पर आधारित है। फ्रीडमैन के अनुसार व्यक्तिवादी विचारधारा का सर्वोत्तम प्रमाण अमेरिका के संविधान में दिखाई देता है। | परन्तु कुछ विधि-विचारकों ने व्यक्ति’ या ‘समाज’ के भेद को समाप्त करने की दृष्टि से दोनों में समन्वय स्थापित किये जाने पर बल दिया है। इनमें हीगल (Hegal) का योगदान सबसे अधिक महत्वपूर्ण रहा है।

8. फ्रीडमैन : लीगल थ्योरी (पाँचवाँ संस्करण), पृ० 88.

फिचे (Fichte) तथा राडब्रुच (Radbruch) जैसे आधुनिक विधिशास्त्रियों ने भी इसी विचारधारा का समर्थन किया है।

(7) विधिक विचारधाराओं में राष्ट्रीयता अथवा अन्तर्राष्ट्रीयता (nationalism or internationalism) पर महत्व दिये जाने के सम्बन्ध में भी मतभेद है। व्यक्तिवादी विधिक विचारधारा मनुष्य की समानता। (equality of man) पर अधिक जोर देती है, अतः वह अन्तर्राष्ट्रीयता के अधिक निकट प्रतीत होता है जबकि राज्य को श्रेष्ठतम मानने वाली समूहवादी (collectivist) विचारधारा के समर्थक हीगल, फिच्टे तथा ब्राइन्डर (Brinder) आदि विद्वानों ने राष्ट्र को ही सर्वोच्च स्थान देना उचित समझा।

अन्त में यह कह देना पर्याप्त होगा कि विधिक सिद्धान्त (legal theory) का मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि विधि क्या है? विधि की निश्चित परिभाषा के बिना अधिकार, आधिपत्य, स्वामित्व, व्यक्तित्व आदि जैसी संकल्पनाओं (concepts) को सही अर्थ में समझना सम्भव नहीं है। विधि के मुख्य तत्वों या लक्षणों के विषय में प्राय: तीन विचारधारायें प्रचलित हैं जिनमें से एक विधि को उचित का आधार मानती है, दूसरी इसे संप्रभु का आदेश मानती है तथा तीसरी विधिक यथार्थवाद (legal realism) पर आधारित है। इन सभी विचारधाराओं का अन्तिम उद्देश्य विधि को मानवीय व्यवहारों के नियंत्रक के रूप में मान्यता देते हुए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रगति की ओर विकासोन्मुख करते रहना है। वस्तुत: यही विधि का व्यावहारिक पहलू है जो समाज में इसकी महत्ता प्रतिपादित करता है। वर्तमान में अधिकांश प्रगतिशील विधि-प्रणालियों में विधि के क्रियात्मक पहलू पर विशेष बल दिया जा रहा है ताकि सामाजिक लक्ष्य को प्राप्त करने में विधि एक प्रभावी साधन की भूमिका निभा सके।

भारतीय विधिक सिद्धान्त

इस संदर्भ में प्राचीन भारतीय विधि दर्शन की मूलभूत धारणाओं का उल्लेख कर देना भी समीचीन होगा। भारत की प्राचीन विधि मूलतः धर्म पर आधारित थी। धर्म की व्याख्या वर्तमान संकीर्ण अर्थ में न की जाकर व्यापक अर्थ में की गयी थी जिसमें धार्मिक मान्यताओं के अलावा नैतिक, सामाजिक एवं विधिक कर्तव्यों का समावेश भी था। मानव-सदाचरण को ही सर्वोपरि धर्म माना गया था। इसी प्रकार सत्य एवं अहिंसा भी धर्म के ही स्वरूप माने गये थे।11 यह मान्यता थी कि धर्म और न्याय मानव आचरण के दो पहलू मात्र हैं जिन पर सृष्टि आधारित है। धर्म के अन्तर्गत उत्कृष्ट आचरण का अनुपालन तथा दूषित विचारों के तिरस्कार पर बल दिया गया था ताकि व्यक्ति स्वयं के एवं समस्त समुदाय के प्रति न्याय की भावना रख सके। सदाचार आज भी वर्तमान भारतीय विधि का प्रमुख आधार है।

भारत के धर्मशास्त्रों में प्राचीन भारतीय विधिदर्शन का सविस्तार वर्णन है जिसमें धर्म, नैतिकता और विधि का अभूतपूर्व मिश्रण मिलता है। उस समय केवल विधिक दायित्वों की तुलना में धार्मिक एवं नैतिक दायित्वों को अधिक महत्व दिया जाता था। कालांतर में स्मृतिकारों ने विधि तथा अन्य नियमों में भेद करते हए इन्हें तीन अलग-अलग भागों में रखा है जिन्हें (1) आचार, (2) व्यवहार, तथा (३) प्रायश्चित कहा गया।’ आचार’ के अन्तर्गत मनुष्य के सामान्य कर्तव्यों तथा धार्मिक नियमों का समावेश था जबकि ‘व्यवहार अर्थात् व्यावहारिक विधि में जीवन और संपत्ति की संरक्षा संबंधी नियम समाविष्ट थे। ‘प्रायश्चित’ में मनुष्य द्वारा किये जाने वाले विभिन्न दुराचारों तथा पाप कर्मों के लिये दंड की व्यवस्था थी।

याज्ञवल्क्य स्मृति में भारत में सुस्थापित विधि-सम्मत शासन के अनुरूप विधिव्यवस्था अस्तित्व में होने के प्रमाण मिलते हैं। यह विधिदर्शन सत्य, शुचिता एवं अहिंसा के सर्वव्यापी सिद्धान्तों पर आधारित होने के कारण मानव के लिए कल्याणकारी होने के साथ-साथ सर्वमान्य भी थी। तत्कालीन विधि का आधार समादेश या शासक द्वारा प्रजा पर थोपे गये आदेश न होकर लोगों द्वारा स्वेच्छया स्वीकार किये आचरण के नियम थे

9. A. K. Sarkar : Summary of Salmond’s Jurisprudence, (3rd ed.) p. 7.

10. आचारः परमो धर्मः.

11. अहिंसा परमो धर्मः .

जिनका अनुपालन करना वे अपना परम कर्तव्य और धर्म समझते थे। मेधातिथि तथा विज्ञानेश्वर आदि टीकाकारों ने भी वैदिक कालीन विधि को लोकप्रियता पर आधारित प्रजाजनों द्वारा अनुपालन हेतु स्वेच्छया स्वीकार किये गये विनिमय निरूपित किया है जिसमें ‘आदेश’ या ‘शास्ति’ को कोई स्थान नहीं था। सारांश यह है कि पुरातन भारतीय विधिदर्शन में विधि को एक ऐसा सूत्र माना गया है जो समाज के विभिन्न व्यक्तियों को एक साथ रहने तथा अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करने का बोध कराता था।12 इसका मूल उद्देश्य एक ऐसी विधि व्यवस्था स्थापित करना था, जो एक समाज में व्यक्तियों के परस्पर टकराव को दूर करे तथा विपन्नता (miseries), शोषण तथा अन्याय से उनका संरक्षण करे।। ।

कालांतर में हिन्दू शासन काल में भी विधि को शासक तथा राज्य से श्रेष्ठतर माना गया है। सम्राट अशोक, हर्षवर्धन, चंद्रगुप्त आदि ने स्वयं को जनता का न्यासी मानते हुए सदैव प्रजा के हितों को सर्वोपरि माना। जनक्रान्ति या विरोध का भय शासक को कुशासन या दमनात्मक नीति अपनाने से परावृत्त रखता था। धर्मशास्त्रों तथा कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में शासक के धर्म की व्याख्या ‘राजधर्म’ के रूप में की गयी है जिसके अधीन प्रजा की संरक्षा तथा समाज में सुव्यवस्था बनाये रखना शासक का सर्वोपरि कर्त्तव्य था। महाभारत के ‘राज्यानुशासनधर्म पर्व’ में शासक के कर्तव्यों का विस्तृत विवेचन मिलता है। याज्ञवल्क्य, नारद, कौटिल्य आदि ने शासक को सदैव विधि के अधीन माना तथा उनके अनुसार शासक मनमाने कानून बनाने के लिये स्वतन्त्र नहीं था क्योंकि वह अन्य लोगों की भाँति स्वयं भी विधि द्वारा आबद्ध था।

12. धारणात् धर्ममित्याहु: धर्मोधारयति प्रजा:.

Follow me at social plate Form