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LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 2 Notes

 

LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 2 Notes:- Admissions Jurisprudence and Legal Theory LLB 1st Semester / 1st Year Important Study Material Notes in PDF Download Online File In this new post you welcome all the candidates again in this post you will find Jurisprudence & Legal Theory Chapter 2 Origin and Are going to read about Development of Jurisprudence. LLB Study Material Notes With Question Answer in Hindi Please comment to read in English.

 

अध्याय 2 (Chapter 2)

विधिशास्त्र की उत्पत्ति और विकास

(Origin & Development of Jurisprudence)

LLB Notes Study Material

प्राय: सभी विधिवेत्ता इस बात से सहमत हैं कि विधिशास्त्र की उत्पत्ति किसी युग-विशेष में या व्यक्ति विशेष से नहीं हुई है बल्कि यह शास्त्र क्रमिक गति से विकसित हुआ है। इसके विकास में असंख्य विधिशास्त्रियों का सक्रिय योगदान रहा है। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से विधिशास्त्र के विकास-क्रम को तीन प्रमुख काल-खण्डों में विभाजित किया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं

(1) पूर्व रोमन काल (Pre-Roman period);

(2) रोमन काल (Roman period);

(3) उत्तर–रोमन काल (Post-Roman period)

1. पूर्व रोमन काल

प्राचीन काल में मानव की बौद्धिक क्षमता से उत्पन्न सामाजिक विज्ञान के अस्तित्व को पृथक् रूप से मान्यता प्राप्त नहीं थी। मानव ज्ञान की प्रारम्भिक अवस्था में एक ही व्यक्ति एक ही समय विभिन्न विज्ञानों का अध्ययन किया करता था। उदाहरणार्थ, अरस्तू (Aristotle) ने तत्व-मीमांसा, भौतिकी, नीतिशास्त्र आदि का अध्ययन ‘सार्वभौमिक दर्शन-विज्ञान’ नामक एक ही विषय के रूप में किया था। विविध विज्ञानों का स्पष्ट विभाजन न होने के कारण उन सभी के अध्ययन को दर्शनशास्त्र में समाविष्ट किया गया था। अन्य विज्ञानों की भाँति विधिशास्त्र को भी पृथक् स्वतंत्र अस्तित्व प्राप्त नहीं था। . यूनानी तर्कशास्त्री (Greek Philosophers) विभिन्न विज्ञानों में से विधि सम्बन्धी तात्विक विज्ञान विकसित करने में असफल रहे । यद्यपि यूनानियों ने प्राकृतिक विधान’ (Jus natural) शन्द का प्रतिपादन किया किन्तु इसके अन्तर्गत धर्म, नीति तथा विधायन में कोई अन्तर नहीं था; अत: उनके प्राकृतिक विधान (Jus natural) को वर्तमान विधिशास्त्र का प्रणेता नहीं माना जा सकता है। वस्तुत: यूनानियों की प्राकृतिक विधान की कल्पना से साम्या (Equity) विधि की उत्पत्ति हुई है।

2. रोमन काल

कानून के ज्ञान के अर्थ में ‘ज्यूरिसपुडेंशिया’ (jurisprudentia) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग करने का श्रेय रोमवासियों को है, जिन्होंने विधिशास्त्र को एक विशिष्ट स्थान दिलाया। रोम में प्रचलित लैटिन भाषा में ‘ज्यूरिस’ (Juris) शब्द का अर्थ ‘विधि’ तथा ‘पूडेंशिया’ (prudentia) शब्द का अर्थ ‘ज्ञान’ से है। इसीलिये विधिशास्त्र को ज्यूरिसप्रूडेंशिया, अर्थात् विधि का ज्ञान’ कहा जाने लगा। रोम के शासक जस्टीनियन (Justinian) ने अपने शासन काल में विभिन्न विधियों को एकत्रित करके नागरिक विधि कोष (Cropus ituris civilis) नामक संहिता तैयार कराई जिसमें विभिन्न विधियों के सिद्धान्तों को संकलित किया गया था। जस्टीनियन द्वारा निर्मित पश्चात्वर्ती संविधियों (statutes) को कालक्रमानुसार संकलित किया गया जिन्हें ‘नोवेले कान्स्टीट्यूशनिस’ (novellae constitutiones) कहा गया जो कॉरपस ज्यूरिस के अंतिम घटक के रूप में ग्रीक भाषा में लिपिबद्ध है। इसका प्रभाव अनेक सदियों तक इटली के अनेक भागों में बना रहा। रोमन विधि को एकत्रित करके उसका पुनर्लेखन कर उसे व्यवस्थित विधिशास्त्र के रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय सम्राट जस्टीनियन को ही है।

1. हेनरी मेन : ऐशियन्ट लॉ, पृ० 75.

2. ज’टीनियन का प्रासन-काल 527 से 565 ई० तक रहा.

सिसरो ने रोम में प्रचलित ज्यूरिसपूडेंशिया’ (विधिशास्त्र) शब्द के आशय को स्पष्ट करते हुये लिखा है। कि न्यायशास्त्रियों के लिये कानूनी व्यवस्थाओं तथा नागरिकों में प्रचलित प्रथाओं के सम्बन्ध में समुचित ज्ञान गवना आवश्यक होता है तथा उनमें अपनी राय को कार्यरूप में परिणित करने की क्षमता होनी चाहिये। सिसरो का मत था कि व्यावहारिक दृष्टि से यह आवश्यक है कि कानून के अध्ययन को दर्शनशास्त्र से पथक रखा जाए। प्रो० हालैण्ड के मतानुसार विधिशास्त्र को पृथक् अस्तित्व दिलाने का श्रेय रोमवासियों को ही है। जिसके लिये विश्व उनका सदैव ऋणी रहेगा।

विख्यात रोमन विधिशास्त्री अल्पियन (UIpian) ने विधिशास्त्र की परिभाषा देते हुए कहा है। कि-‘यह मानवीय एवं दैविक वस्तुओं का ज्ञान तथा न्यायपूर्ण तथा अन्यायपूर्ण तथ्यों का विज्ञान है।” इसी प्रकार सिसरो (Cicero) ने विधिशास्त्र को विधि के ज्ञान का दार्शनिक पहलू निरूपित किया है; परन्तु फ्रीडमैन के मतानुसार विधिशास्त्र के विकास में रोमवासियों के बजाय यूनानियों का योगदान ही अधिक महत्वपूर्ण है। उनके विचार से रोम के विधिशास्त्रियों ने आधुनिक विश्लेषणात्मक विधिशास्त्र की आधारशिला अवश्य रखी। परन्तु विधि के दर्शन (Philosophy of Law) में उनका योगदान नगण्यप्राय रहा है। वर्तमान विधिशास्त्र की। संविदा, अपकृत्य अथवा सम्पत्ति सम्बन्धी धारणाओं का मूल आधार प्राचीन यूनानी विधि व्यवस्था में ही दिखलायी पड़ता है।

3. उत्तर रोमन काल

मध्ययुग में इस काल के महान विचारक सेन्ट थॉमस एक्वीनास (Saint Thomas Aquinas) ने विधिशास्त्र को धर्म-दर्शन की एक शाखा के रूप में पुनः स्थापित किया। उनके विचार से विधिशास्त्र में ऐसे कानून समाविष्ट थे जो प्राकृतिक एवं दैविक तर्क के अनुकूल थे। इस प्रकार थॉमस एक्वीनास के प्रभाव के कारण विधि-विज्ञान को धर्म-दर्शन का ही अंग समझा जाने लगा। परन्तु धार्मिक क्षेत्र में कानून के इस अनावश्यक हस्तक्षेप के विरुद्ध मार्टिन लूथर (Martin Luther) ने आवाज उठाई।

सोलहवीं शताब्दी में धार्मिक रूढ़िवादिता के विरुद्ध आन्दोलन शुरू हुआ। विधिशास्त्र को धर्म दर्शन से अलग रखे जाने की प्रक्रिया यहीं से प्रारम्भ हुई। धार्मिक आडम्बरों के कारण धर्म-सुधारकों ने पोप के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया तथा चर्च की प्रधानता समाप्त कर दी गई। परिणामस्वरूप शासक को विधि सम्बन्धी अधिकार प्राप्त हुए। इस प्रकार राजनीतिक अधिकारियों के लिए यह आवश्यक हो गया कि वे केवल धर्म निरपेक्ष विधियों का ही निर्माण करें। विधिशास्त्र के विकास में यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था इसलिये इस युग को विधि का ‘सुधार-काल’ भी कहा गया है। |

सत्रहवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध डच न्यायशास्त्री ह्यगो ग्रोशियस (Hugo Grotius) ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि संसार के विभिन्न देश अपने पारस्परिक संव्यवहारों में अन्तर्राष्ट्रीय विधि या प्राकृतिक विधि का पालन करने के लिये बाध्य हैं, परन्तु उन्हें आन्तरिक मामलों के लिये आवश्यकतानुसार राष्ट्रीय विधि (Municipal Law) बनाने का पूर्ण अधिकार है। इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध दार्शनिक थॉमस हॉब्स (Hobbes) ने राज्य के आदेशों को ही विधि मानते हुए यह विचार व्यक्त किया कि राज्य के नागरिकों को इन विधियों का अनुपालन करना चाहिये क्योंकि ये कानून राज्य के शक्ति-सम्पन्न नियम होते हैं।

विधि-क्षेत्र में प्राकृतिक विधि-सिद्धान्त (Natural Law Theory) का प्रभुत्व अठारहवीं शताब्दी तक बना रहा। लन्दन विश्वविद्यालय के कानून के प्रोफेसर ब्लैकस्टोन (Blackstone) (1723-80) ने प्राकृतिक विधि के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह विधि दैवी आदेश के समतुल्य होने के कारण अन्य सभी कानूनों से श्रेष्ठतम है। प्राकृतिक विधि विश्व के समस्त देशों में समान रूप से लागू होती है तथा कोई भी ऐसा कानून जो प्राकृतिक विधि के सिद्धान्तों के विपरीत हो, वैध नहीं हो सकता। ब्लैकस्टोन का मत था कि सभी वेध कानून अपनी अधिकार-शक्ति प्राकृतिक विधि से ही प्राप्त करते हैं। परन्तु जर्मी बेन्थम (1748-1832) ने ब्लैकस्टोन के इन विचारों का खण्डन करते हुए कहा कि किसी कानून को राज्य का अनुमोदन प्राप्त हो जाने पर राज्य के नागरिक उसका पालन करने के लिये बाध्य होंगे फिर चाहे वह कानुन प्राकृतिक नियमों के विपरीत नहा। बेन्थम की इस विचारधारा के परिणामस्वरूप विधि विज्ञान (juridical science) धर्म-दर्शन के

बन्धनों से मुक्त हो गया। बेन्थम ने विधि-निर्माण (विधायन) को महत्वपूर्ण मानते हुये उसे विधिशास्त्र का ही एक अंग माना तथापि राजनीतिशास्त्र का प्रभाव विधिशास्त्र पर अभी भी बना रहा।

विधिशास्त्र को मानवीय ज्ञान की एक स्वतन्त्र शाखा के रूप में विकसित करने का श्रेय जॉन ऑस्टिन (1790-1859) को दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार विधिक विज्ञान को केवल संप्रभु या राज्य की सर्वोच्च विधायनी शक्ति के प्राधिकार की आवश्यकता होती है तथा यह आवश्यक नहीं कि वह विधि प्राकृतिक नियमों के अनुकूल ही हो। उनके विचार से विधिशास्त्र का सम्बन्ध केवल काल-विशेष में प्रचलित विधि से ही है तथा विधि कैसी होनी चाहिए (Law as it ought to be) यह विधान-शास्त्रियों का विषय है। उसका स्पष्ट मत था कि किसी भी राज्य की निश्चयात्मक विधि वहाँ की सर्वोच्च विधायिनी शक्ति या राज्य की कृति । होती है। ।

वर्तमान रूप में विधिशास्त्र को ऐतिहासिक शाखा (historical school) का प्रबल समर्थन प्राप्त हुआ है। इस शाखा के मूल प्रवर्तक सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine) ने इस बात पर जोर दिया कि विधिशास्त्र से सम्बन्धित समस्याओं को भली-भाँति समझने के लिये उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि पर विचार करना आवश्यक होता है जिनमें से उनका विकास हुआ है।

विधिशास्त्र के विकास में सुविख्यात विधिशास्त्री केल्सन (Kelson) का योगदान भी उल्लेखनीय है। जिन्होंने विधि को प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र से केवल पृथक् ही नहीं किया अपितु उसे एक विशुद्ध ज्ञान के रूप में मान्यता दिलाई 14 विधिशास्त्र के प्रति वस्तुनिष्ठ (objective) दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने इसे राजनीतिशास्त्र, नीतिशास्त्र या समाजशास्त्र से पूर्णत: स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में प्रतिस्थापित किया। ऑस्टिन द्वारा प्रतिपादित विधि के आदेशात्मक सिद्धान्त (Command Theory of Law) को अस्वीकार करते हुए। केल्सन ने कहा कि यह तर्क उचित नहीं है कि कानून राज्य द्वारा जारी किये गये आदेश होने के कारण। नागरिकों के प्रति बन्धनकारी होते हैं। उनका कहना है कि ऑस्टिन के विधि-सम्बन्धी सिद्धान्त का मूल आधार राज्य की शास्ति (Sanction) है जो स्वयं मनोवैज्ञानिक तत्व है और किसी भी मनोवैज्ञानिक तत्व का शुद्ध सिद्धान्त के रूप में समावेश उचित नहीं है। ।

विधिशास्त्र के विकास का इतिहास विधि की आधुनिकतम क्रियात्मक शाखा (FEnctiona! School) के विचारकों का उल्लेख किये बिना अधूरा रह जायेगा। इस विचारधारा के मुख्य प्रवर्तक अमेरिका के डीन रास्को पाउण्ड (Roscoe Pound) हैं जिन्होंने विधिशास्त्र को सामाजिक यांत्रिकी (Social Engineering) निरूपित किया है। पाउंड ने विधि को एक सामाजिक संस्था निरूपित करते हुए इसे मानव के परस्पर संव्यवहारों को नियंत्रित रखने वाला साधन माना है। । वर्तमान समय में विधिशास्त्र के अन्तर्गत तुलनात्मक पद्धति पर विशेष बल दिया जा रहा है जिससे विधि का सर्वांगीण विकास सम्भव हो सके। इसके अन्तर्गत किसी भी विधि प्रणाली का मूल्यांकन अन्य विधिप्रणालियों से उसकी तुलना के आधार पर किया जाता है ताकि उसे अधिक व्यावहारिक तथा सुदृढ बनाया जा सके।

प्राय: सभी विधिशास्त्री इस बात से सहमत हैं कि विधिशास्त्र का विकास क्रमशः परिस्थिति के अनसार हुआ है। विधिशास्त्र सम्बन्धी धारणाओं में समयानुसार परिवर्तन होते रहे हैं क्योंकि इस शास्त्र का मानवप्रवृत्तियों से सीधा सम्बन्ध है। विधिशास्त्र के विकास के प्रत्येक चरण में विचारकों का प्रयास यही रहा है कि इस शास्त्र को अधिकाधिक व्यावहारिक तथा ग्राह्य बनाया जा सके। यही कारण है कि हालैण्ड ने विधिशास्त्र को निश्चयात्मक विधि का प्रारूपिक विज्ञान (formal science of positive law) माना है, तो सामण्ड ने इसे नागरिक विधि का विज्ञान (science of civillaw) कहा है। परन्तु वर्तमान में विधिशास्त्र के समाजशास्त्रीय

3. जी० डब्ल्यू पैटन : ए टेक्स्ट बुक ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स (चतुर्थ संस्करण), पृ० 15.

4. केल्सन : लॉ-ए सेन्चुरी ऑफ प्रोग्रेस, पृ० 231.

5. पाउण्ड रास्को : इन्टरप्रिटेशन्स ऑफ लीगल हिस्ट्री, पृ० 156.

दृष्टिकोण को अधिक महत्व दिया जा रहा है क्योंकि विधि का कार्य मनुष्य के सामाजिक जीवन को निर्देशित करना है। यही कारण है कि इसे ‘हितों का विधिशास्त्र’ (Jurisprudence of Interests) कहा गया है। इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक फिलिप हैक (Phillip Hack) ने कहा है कि विधिशास्त्र का मुख्य कार्य मानव-हितों के आपसी टकरावों को समाप्त करना है; अर्थात् विधि का मुख्य प्रयोजन मानव हितों का संरक्षण करना है। परन्तु उल्लेखनीय है कि प्रमुख विधिशास्त्रियों का समर्थन प्राप्त होते हुए भी इस विचारधारा को अभी न्यायिक मान्यता प्राप्त नहीं हुई है। तथापि इसमें संदेह नहीं कि मानव के सर्वोन्मुखी विकास के साथसाथ न्यायिक समस्याओं के समाधान हेतु समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण अपनाये जाने को निरंतर गति प्राप्त हो रही है। ।

वर्तमान में विधिशास्त्र के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण (Pragmatic approach) अपनाते हुए अमेरिकी विधिशास्त्रियों ने यथार्थवादी आन्दोलन (Realist Movement) प्रारंभ किया। लिवेलैन (Llewellyn) के अनुसार यह विधिशास्त्र की कोई नवीन शाखा नहीं थी। इस नये आन्दोलन के प्रणेता यूजेन इहरलिक (Eugen Ehrlich) का मत है विधि के विकास का स्रोत न तो राज्य के विधायन में है और न ही विधि के विज्ञान में । या न्यायिक विनिश्चयों में, अपितु वह समाज में सन्निहित है। बाद में इस शास्त्र को अमेरिका में जॉन चेपमैन ग्रे (John Chapman Gray) तथा ओलीवर वेन्डल होम्स (Oliver Wendell Holmes) ने पूर्ण रूप से स्थापित किया।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि विधिशास्त्र की उत्पत्ति और विकास के विषय में विधिवेत्ताओं की विचारधारायें भिन्न हैं। इन विचारधाराओं में कहीं-कहीं अतिव्याप्ति (overlapping) भी दिखलाई देती है। परंतु इसमें संदेह नहीं कि इनसे विधि सम्बन्धी चिंतन को आगे बढ़ाने में पर्याप्त सहायता मिली है।

उल्लेखनीय है कि वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विधिशास्त्र के प्रति विधिवेत्ताओं का दृष्टिकोण निरन्तर बदलता जा रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इसकी विषयवस्तु “कानून” होने के कारण वह समय तथा स्थान के अनुसार परिवर्तनशील है। मानव समाज युगों से परिस्थिति के अनुसार बदलता चला आ रहा है। इसके साथ ही कानून में भी समयोजित परिवर्तन होते चले आ रहे हैं। आज की जटिलताओं के युग में विधिशास्त्र को एकाकी विषय बनाये रखना अनुचित होगा। अतः इसे अधिक विकासशील एवं अन्तर-अनुशासनिक (inter-disciplinary) बनाना होगा ताकि वह वर्तमान मानवीय समस्याओं का समाधानपूर्वक हल कर सके। यही कारण है कि वर्तमान में विधिशास्त्र के प्रति तुलनात्मक विश्लेषण पद्धति अपनाई जाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सारांश यह है कि वर्तमान परिवेश में विधिशास्त्र के प्रति परम्परागत रूढ़िवादी दृष्टिकोण को त्याग कर अधिक व्यापक नीति अपनाना उचित होगा ताकि इसके निर्दिष्ट लक्ष्य को साध्य किया जा सके। मानव के सर्वांगीण विकास के लिये विधि को अधिक व्यापक तथा क्रियात्मक बनाना परम आवश्यक है जिससे इसका उपयोग मानवीय हितों की रक्षा के उपयुक्त साधन के रूप में किया जाना संभव हो सके।

अन्त में यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि यद्यपि पाश्चात्य विधि प्रणाली और अध्ययन का स्रोत रोमन विधि है तथापि भारतीय विधि चिंतन का मूल आधार स्मृतिकारों और टीकाकारों की वे कृतियाँ हैं। जिनमें धर्म और नैतिक उपदेशों के अतिरिक्त विधि के नियमों का उल्लेख तथा निर्वचन किया गया है। यह बात अलग है कि इन रचनाकारों ने विधि, धर्म और नैतिकता में विशेष अन्तर नहीं माना है। ये कतियाँ प्राचीन हिन्दू विधिशास्त्र की आधारशिला मानी जाती हैं। इनमें कर्तव्य को ही विधियों का प्रमुख स्रोत माना गया है तथा सदाचार को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। परन्तु कालान्तर में मुगल शासन तथा अंग्रेजी शासन

6. Ehrlich (1862-1927) was Austrian jurist.

7. मनु ने श्रुति, स्मृति तथा चिर-प्रथाओं को प्राचीन हिन्दू विधि का प्रमुख स्रोत माना है। श्रुति में कानून संबंधी बातें विशेष नहीं हैं तथा इसमें धार्मिक विधानों के ज्ञान तथा मंत्रों का ही समावेश अधिक है। स्मृति में अधिकांश विधि संबंधी प्रावधान हैं जिनमें मनु-संहिता, याज्ञवल्क्य संहिता तथा नारद संहिता का विशेष महत्व है। स्मृति के प्रथम 368 श्लोक मानव आचार से तथा 307 श्लोक मानव व्यवहार और 334 श्लोक प्रायश्चित से संबंधित हैं.

के कारण भारतीय विधि चिंतन का रूप पूर्णत: बदल गया और वह पाश्चात्य विधि प्रणाली के प्रभाव से न बच सका।

विधिशास्त्र के विकास में लोकहित वाद8 का समावेश बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की उल्लेखनीय उपलब्धि है। इस नवीनतम पद्धति द्वारा जनसाधारण को सुलभता से न्याय प्राप्त करने के अवसर प्रदान हुए हैं। तथा व्यक्ति के मूल अधिकारों को समुचित संरक्षण प्राप्त हुआ है। न्यायालयों की न्यायिक सक्रियता के फलस्वरूप आज गरीब से गरीब व्यक्ति को भी सरलता से न्याय प्राप्त करना संभव हो सका है जिससे सामाजिक न्याय की कल्पना यथार्थ में साकार हो सकी है। भारत में लोकहित के मुकदमों के विकास में माननीय न्यायमूर्ति पी० एन० भगवती (उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधिपति) तथा न्यामूर्ति वी० आर० कृष्णा अइयर का विशेष योगदान रहा है जिन्होंने सामाजिक न्याय प्रस्थापित करने के उद्देश्य से श्रमिकों, कारावासियों, अपचारियों, निर्धन एवं साधनहीन गरीबों, बंधुआ मजदूरों, शोषित महिलाओं, बालकों आदि को समुचित न्यायिक तथा सामाजिक संरक्षण दिये जाने हेतु आवश्यक निर्देशं तथा मार्गदर्शिकायें निर्धारित करके न्यायिक क्षेत्र में अत्यन्त सराहनीय कार्य किया है। लोकहित वादों के माध्यम से शासन तन्त्र की उपेक्षापूर्ण तथा मनमानी कार्यवाहियों को भी अंकुशित किया जाना संभव हुआ है।

भारतीय न्याय-व्यवस्था में लोकहित वाद के पदार्पण से भारतीय सांविधानिक विधिशास्त्र को एक नई दिशा मिली है तथा नवीनतम इपिस्टोलरी अधिकारिता (epistolary jurisdiction) का प्रयोग करते हुए। उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय समाज के उपेक्षित वर्गों को समुचित न्याय दिलाने की ओर सक्रियता से कार्य कर रहे हैं। इस नवीनतम लोकहितवाद की तकनीक के अन्तर्गत जनसेवी नागरिक या समाजसेवी संस्थाएँ न्यायालय को पत्र लिखकर समाज के आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से उपेक्षित वर्ग के लोगों को न्याय तथा विधिक उपचार दिलाने का प्रयास करते हैं और यदि न्यायालय इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि वास्तव में कार्यपालिक प्राधिकारियों की मनमानी, ज्यादती या उपेक्षा के कारण समाज के दीन-हीन लोगों के प्रति घोर अन्याय हो रहा है, तो वह उक्त पत्र को रिट-याचिका मानकर उस पर आवश्यक कार्यवाही कर सकता है। इस प्रकार लोकहित वाद के अन्तर्गत परम्परागत सुनवाई के अधिकार (locus standi) संबंधी रूढ़िगत नियम को शिथिल करते हुए जनसाधारण को शीघ्र एवं सुलभ न्याय दिलाया जाता है। इस प्रकार न्यायिक क्रियाशीलता के परिणामस्वरूप संमाज के दलित, शोषित, उपेक्षित और साधनहीन लोगों को उचित न्यास प्राप्त होना संभव हुआ है।10 आज यह पद्धति भारत में पूर्णत: स्थापित हो चुकी है।11

सारांश में यह कहना पर्याप्त होगा कि लोकहित प्रकरणों के माध्यम से देश के उच्चतर न्यायालयों ने वितरणात्मक न्याय (distributive justice) की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। उन्होंने लोकहित से। संबंधित निर्णयों द्वारा अनेक नये उपचारों का सृजन किया है, जो उनकी न्यायिक सक्रियता का परिचायक है। बंधुआ मजदूरी12 से मुक्त हुए श्रमिकों का पुनस्र्थापन, 13 श्रमिक विधियों का अनिवार्य रूप से अनुपालन, 14 अवैध निरोध के लिये प्रतिकर,15 विचाराधीन कैदियों के मामलों में अत्यधिक विलंब, 16 महिलाओं तथा

8. इसे ‘Public Interest Litigation’ (PIL) कहा जाता है।

9. लोकहित के वादों के विषय में विस्तृत विवेचन इस पुस्तक के अंतिम अध्याय में दिया गया है।

10. डॉ० उपेन्द्र बख्शी : दि क्राइसिस ऑफ इंडियन लीगल सिस्टम (1982) पृ० 7.

11. डॉ० एन० वी० परांजपे : लोकहित वाद, विधिक सहायता एवं सेवायें, लोक अदालतें तथा पैरा-लीगल सेवायें, (प्रथम संस्क० 2005 पेज 57)

12. बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1984 सु० को० 802.

13. नीरजा चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1984 सु० को० 1099.

14. पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1982 सु० को० 1483.

15. भीम सिंह बनाम जम्मू एवं कश्मीर राज्य, ए० आई० आर० 1986 सु० को० 494; रुदुल शाह बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1983 सु० को० 1986; तथा सेबेस्टियान होंगरी बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1984 सु० को० 1026 आदि.

16. हुसैन आरा खातून बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1979 सु० को० 1360 तथा कद्रफडिया बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1980 सु० को० 939 आदि.

बालकों के लिये संप्रेषण गृहों की व्यवस्था, 17 पर्यावरण, 18 प्रदूषण19 आदि संबंधी कुछ ऐसे विशिष्ट उपचार आज उपलब्ध हैं जो न्यायिक क्षेत्र में अपेक्षाकृत नवीन हैं तथा इनसे जनसाधारण को पर्याप्त राहत मिली है।

भारतीय विधिशास्त्र के विकास की दिशा में गरीबों तथा साधनहीनों को नि:शुल्क विधिक सहायता तथा लोक अदालतों के गठन द्वारा त्वरित न्याय उपलब्ध कराने की नवीनतम पद्धति एक उल्लेखनीय प्रगति मानी गई है। लोक अदालतों का मुख्य उद्देश्य आपसी सुलह-समझौते द्वारा जन-साधारण के विवाद शीघ्रता से निपटाकर उन्हें सस्ता और सुलभ न्याय उपलब्ध कराना है। इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के पूर्व-मुख्य न्यायाधीश पी० एन० भगवती ने कहा है कि-”जहाँ अब तक पक्षकारों को न्यायालय के दरवाजे खटखटाने पड़ते थे, अब लोक अदालतों की व्यवस्था से न्याय स्वयं पक्षकारों के दरवाजे पर जाकर उन्हें न्याय दिलाता है।” वर्तमान में भारत के अनेक राज्यों ने लोक अदालत पद्धति को अपनाकर असंख्य लोगों को त्वरित न्याय उपलब्ध कराया है। |

इसी प्रकार निर्धनों को नि:शुल्क कानूनी सहायता दिलाने में भी न्यायालयों की भूमिका सराहनीय रही है। इस संबंध में संविधान के राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों के अध्याय 4 में एक नया अनुच्छेद 39-क20 जोड़ा गया है जिसके द्वारा राज्यों से अपेक्षा की गई है कि वे साधनहीनों को नि:शुल्क विधिक सहायता दिये जाने हेतु आवश्यक कदम उठायें। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने विधिक शोध कार्य केन्द्र बनाम केरल राज्य21 के निर्णय में अभिनिर्धारित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 39-क के प्रावधानों का प्रमुख उद्देश्य नि:शुल्क विधिक सहायता द्वारा सामाजिक न्याय स्थापित करना है ताकि समाज के धनहीन, गरीब एवं उपेक्षित वर्ग धन के अभाव में न्याय-प्राप्ति के अधिकार से वंचित न रह जायें 22

17. शीला बारसे बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए० आई० आर० 1983 सु० को० 398; आगरा महिला संरक्षण का मामला [ उपेन्द्र बख्शी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, एस० सी० जे० (1986) 291].

18. रूरल लिटिगेशन एण्ड इंटाइटिलमेंट केन्द्र देहरादून बनाम उ० प्र० राज्य, ए० आई० आर० 1985 सु० को० 6S2.

19. एस० सी० मेहता बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1987 सु० को० 695.

20. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया.

21. ए० आई० आर० 1986 सु० को० 1322.

22. समाज के कमजोर वर्ग के लोगों को नि:शुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराने हेतु केन्द्र सरकार ने लीगल सर्विसेस अथारिटीज ऐक्ट, 1987 पारित किया है.

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