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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Notes

 

LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Notes:- In the latest post of LLB 1st Semester / 1st Year Study Material in Hindi English PDF Download, today you are going to read the complete section of Jurisprudence & Legal Theory Section 5 Chapter 32 which we have divided into two parts. Before this post you must have read the first part of LLB Laws Jurisprudence and Legal Theory Chapter 32 which we shared yesterday. Join our website to read LLB Study Material and LLB Notes.

Chapter 32 Part 2

लोकहित वादों के लिये उच्चतर न्यायालयों की इपिस्टोलरी अधिकारिता (Epistolary jurisdiction of the higher courts in PIL cases)

उच्चतर न्यायालयों, अर्थात् उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को लोकहित वादों में प्राप्त इपिस्टोलरी अधिकारिता (epistolary jurisdiction) के फलस्वरूप भारत में लोकहित वादों को नई दिशा प्राप्त हुई है। इपिस्टोलरी अधिकारिता (Epistolary jurisdiction) के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय उसे सम्बोधित किये गये किसी शिकायती पत्र को जनहित याचिका के समान मानकर उस पर न्यायिक कार्यवाही कर सकेगा। न्यायालय को सम्बोधित पत्र को या समाचार-पत्र में किसी समाचार News item) को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किये जाने हेतु उसमें निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक है-

(1) ऐसा पत्र किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा लोकहित में लिखा गया हो जिसमें ऐसे व्यक्तियों के लिये न्याय की मांग की गयी हो, जो अलाभकारी स्थिति में होने के कारण व्यथित होने पर भी स्वयं न्यायालय तक पहुंचने में असमर्थ हो।

(2) उपर्युक्त पीड़ित व्यथित व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का किसी वैधानिक या विधिक हित का उल्लंघन या हनन हुआ हो, तो पत्र द्वारा इसकी शिकायत उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय में की जाने पर न्यायालय इसे PIL रिट मानकर उस पर कार्यवाही करेगी।

(3) ऐसी स्थिति में न्यायालय नियमित रिट याचिका दायर की जाना आवश्यक नहीं समझेगा और उस पत्र को ही रिट याचिका मानकर उस पर कार्यवाही करेगा।

(4) व्यक्ति,जो न्यायालय को इस प्रकार का शिकायती-पत्र लिखता है, उसका यह कार्य सद्भावनापूर्ण होना चाहिये और इसमें उसका कोई निजी हित, लाभ या निहित स्वार्थ नहीं होना चाहिये और न यह सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने की नीयत से लिखा गया हो।

सत्तर और अस्सी के दशक में जब भारत में लोकहित वाद का प्रारम्भ हुआ तो ऐसे पत्र न्यायालय को सम्बोधित किये जाने के बजाय प्रायः न्यायमूर्ति पी० एन० भगवती या जस्टिस कृष्णा अय्यर के नाम से सम्बोधित किये जाने थे क्योंकि देश में इनकी ख्याति सक्रिय न्यायाधीशों के रूप में थी। इसी प्रकार राजस्थान न्यायालय के न्यायाधीश गुमानमल लोढ़ा का नाम भी जनहित मामलों के समर्थकों में अग्रणी माना जाता था। परन्तु लोगों की इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के उद्देश्य से इन न्यायालयों में विशिष्ट लोकहित याचिका प्रकोष्ठ (PIL Cell) का गठन किया ताकि सभी जनहित याचिकायें न्यायालय को ही सम्बोधित हों न कि किसी न्यायाधीश विशेष के नाम।

स्वप्रेरणा अधिकारिता के अन्तर्गत माननीय न्यायाधीश भगवती को लोकहित में सम्बोधित किये गये पत्रों में बंधआ मजदरी की मुक्ति और पुनर्वास की समस्या,50 पर्यावरण असन्तुलन से सम्बन्धित मसरी हिल का प्रकरण,51 सम्प्रेक्षण गृह में रह रही बालिकाओं की दुर्दशा,52 जीवन के अधिकार में पहंच मार्ग का

48. ए० आई० आर० 1993 सु० को० 20 (35).

49. ए० आई० आर० 1993 सु० को० 280.

50. नीरजा चौधरी बनाम म० प्र० राज्य, ए० आई० आर० 1984 सु० को० 1099.

51. रूरल लिटीगेशन एण्ड इण्टाइटिलमेण्ट केन्द्र देहरादून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1985 सु० को० 360.

52. डॉ० उपेन्द्र बक्सी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, क्रि० लॉ ज० (1986) सु० को० 484.

अधिकार,53 म्युनिसिपल द्वारा साफ-सफाई में अव्यवस्था,54 खतरनाक औद्योगिक संयन्त्रों से जहरीली गैस के रिसाव की समस्या5 आदि के प्रकरण विशेष उल्लेखनीय हैं।

प्रवासी श्रमिकों (Migrants Labour) की समस्या से सम्बन्धित सलाल हाइड्रो प्रोजेक्ट56 का जनहित प्रकरण पत्र द्वारा उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश डी० ए० देसाई को सम्बोधित किया गया। राज्य के विरुद्ध लोकहित को संरक्षण

भारत के संविधान के निर्माताओं द्वारा संविधान में मूलभूत अधिकारों का प्रावधान रखे जाने का मुख्य उद्देश्य यह था कि नागरिकों को राज्य की ज्यादतियों के विरुद्ध उचित संरक्षण दिलाया जा सके। इन प्रावधानों को इस प्रकार रखा गया है कि कोई भी दमनकारी सरकार उनमें अनुचित हस्तक्षेप या फेरबदल न कर सके और नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करने से विरत रहे। मौलिक अधिकारों द्वारा राज्य की मनमानी शक्ति पर उचित अंकुश लगाने का प्रयास किया गया है। अतः इन अधिकारों की संवैधानिक गारंटी द्वारा केन्द्र, राज्य या स्थानीय सरकारों के कार्यों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाये गये हैं और उनकी सीमायें निर्धारित की गयी हैं।57 नागरिकों के मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिये राज्य पर अनेक कर्त्तव्य और दायित्व अधिरोपित किये गये हैं। तथापि भारत में लोकहित कार्यवाही की प्रतिस्थापना के पूर्व समाज के गरीब, असहाय और कमजोर वर्ग के लोगों के लिए यह अधिकार केवल कागजी महत्व रखते थे क्योंकि सामाजिक और आर्थिक असमर्थता के कारण इन अधिकारों के प्रवर्तन के लिये उनका न्यायालय तक पहुँच पाना असम्भव था। अतः विवश होकर वे प्रबल सरकारी शक्ति के हाथों शोषण और पीड़न के शिकार बने रहते थे। परिणामतः भारतीय संविधान में प्रावधानित कल्याणकारी राज्य के लक्ष्य के बावजूद सामाजिक न्याय की कल्पना समाज के एक बड़े भाग के लिये निरर्थक थी और इसका लाभ केवल समृद्ध और सम्पन्न लोगों तक ही सीमित था। परन्तु भारत की न्याय प्रणाली में लोकहित कार्यवाही के पदार्पण से अब दलित और शोषित लोगों के लिये मौलिक अधिकार कपोल-कल्पना मात्र न रहकर वास्तविकता में परिवर्तित हो गये हैं। इसीलिये बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ8 के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि सामाजिक और आर्थिक न्याय को सार्थक रूप देकर समाज के उपेक्षित वर्ग के लोगों को मूलभूत मानवीय अधिकार दिलाना तथा सभी को न्याय के समान अवसर उपलब्ध कराना ही संविधान का मुख्य लक्ष्य है। अत: राज्य द्वारा किया गया ऐसा कोई भी कार्य जो इन निर्बन्धनों का उल्लंघन करता हो, शून्य प्रभावी होगा।

पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ59 के लोकहित मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अस्पृश्यता निवारण,60 बेगार निषेध61 बच्चों से कठिन श्रम कार्य लिये जाने पर प्रतिबंध आदि ऐसे मौलिक अधिकार हैं जो राज्य पर यह दायित्व अधिरोपित करते हैं कि वह इन अधिकारों का प्रवर्तन करे और निजी व्यक्तियों से भी इनका अनुपालन कराएं। न्यायालय ने इन अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिये लोकहित कार्यवाही को एक सशक्त माध्यम माना है। मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेत उच्चतम न्यायालय62 अथवा उच्च न्यायालय63 में याचिका प्रस्तुत की जा सकती है।

अनुच्छेद 32 (2)

53. हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम उमेदराम शर्मा, ए० आई० आर० 1986 सु० को० 342.

54. रतलाम म्युनिसिपल काउन्सिल बनाम वर्धीचन्द्र, (1880) 4 एस० सी० सी० 162.

55. एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ, (1871) 1 एस० सी० सी० 398.

56. श्रमिक सलाल हाइड्रो प्रोजेक्ट बनाम जम्मू एवं कश्मीर राज्य, ए० आई० आर० 1984 एस० सी० 177 57. एम० पी० जैन : भारतीय संवैधानिक विधि, (1987) पृ० 702.

58. ए० पी० आर० 1984 सु० को० 811…

59. ए० आई० आर० 1982 सु० को० 1473.

60. संविधान का अनुच्छेद 17.

61. अनुच्छेद 23 व 24.

62. अनुच्छेद 32.

63. अनुच्छेद 226 (1).

के अधीन इस संबंध में उच्चतम न्यायालय को विस्तृत अधिकार शक्ति प्राप्त है। लोकहित की याचिका के लिये भी इन्हीं उपबंधों का प्रयोग किया जाता है। उच्चतम न्यायालय की सदैव यह धारणा रही है कि याचिका से सम्बंधित अधिकारिता (Writ Jurisdiction) का प्रयोग करते समय उपबंधों में वर्णित औपचारिकताओं के अर्थान्वयन पर विशेष ध्यान न दिया जाये बल्कि इन प्रावधानों के उद्देश्यों की ओर अधिक ध्यान दिया जाये तथा संविधान के तीन प्रमुख भागों, उद्देशिका (Preamble), मौलिक अधिकारों तथा नीति निर्देशक सिद्धान्तों से मार्गदर्शन लेते हुये इन्हें वास्तविक रूप से प्रवर्तित कराने की दिशा में प्रयास किया जाये।

उच्चतम न्यायालय के समक्ष लोकहित में लायी गयी विभिन्न रिट याचिकाओं में राज्य को नागरिकों के निम्नलिखित अधिकारों को सुरक्षित कराने के लिए कर्त्तव्याधीन माना गया है-

1. राज्य का यह परम दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि किसी भी नागरिक, विशेषकर दलित, उपेक्षित और शोषित वर्ग के लोगों के, जो कानूनी लड़ाई की क्षमता नहीं रखते, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न होने दे। इस हेतु केन्द्र और राज्य सरकार को विभिन्न सामाजिक कल्याण और श्रमिकों के हितों से संबंधित कानूनों का यथोचित अनुपालन करना चाहिये ताकि कामगारों को जीवन की न्यूनतम सुविधायें उपलब्ध करायी जा सकें और वे मानवीय गरिमा के अनुकूल जीवन यापन कर सकें 64

2. विधिसम्मत शासन (Rule of Law) की स्थापना करना राज्य का परम दायित्व है और लोकहित वाद का आंदोलन राज्य को इस कर्त्तव्य के प्रति सतर्क करते हुये इसे इस संवैधानिक उत्तरदायित्व को निभाने के लिये बाध्य करता है। उल्लेखनीय है कि निःशुल्क विधिक सहायता इसी दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। इसके अतिरिक्त अनेक वादों में ‘सुने जाने के अधिकार’ (Locus Standi) को शिथिल बनाते हुए उसके प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया जाना भी विधिसम्मत शासन को सार्थक बनाने की दिशा में एक प्रयत्न है जिससे ऐसे लोगों को विधिक उपचार सुलभ हो सके, जो धनाभाव के कारण अब तक न्याय प्राप्त करने के अधिकार से वंचित रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि राज्य के कार्यपालक प्राधिकारियों की अनुत्तरदायी प्रवृत्ति और मनमाने ढंग से कार्य करने की पद्धति के कारण प्रायः सभी जगह शासकीय अराजकता व्याप्त है। शासन तंत्र की इन मनमानी को रोकने के लिये परम्परागत न्यायिक उपचार अपर्याप्त प्रतीत हुये क्योंकि गरीब, शोषित और साधनहीन लोग अशक्त सरकारी तंत्र की ज्यादतियों, भ्रष्टाचार, अनाचार और दुर्व्यवहार के विरुद्ध लड़ने में असमर्थ थे। आज भी प्राधिकारियों द्वारा किसानों, गरीबों और ग्रामीणों के प्रति अत्याचार किए जाने की शिकायतें दिनों दिन बढ़ रही हैं। शासन अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मनमाने ढंग से अध्यादेश जारी करा लेता है जो संविधान के प्रति एक धोखा हो सकता है। लाइसेंस वितरण में गड़बड़ी, बच्चों तथा बालिकाओं का शारीरिक शोषण, सामूहिक बलात्कार, कारागार में कैदियों के साथ दुर्व्यवहार, श्रमिकों का शोषण, बेगार आदि ऐसे अनेक कृत्य हैं जो संविधान द्वारा निषिद्ध होने पर भी शासन तंत्र चलाने वाले अपनी अधिकार शक्ति का दुरुपयोग करते हुए उन्हें धड़ल्ले से कह रहे हैं। खत्री बनाम बिहार राज्य65 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि पुलिस कर्मी जिन्हें जनता का रक्षक माना जाता है यदि स्वयं ही कानून की अवज्ञा कर भक्षक बन जायें, तो विधिसम्मत शासन का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा 66

3. शासकीय अराजकता या मनमानी रोकने के लिये लोकहित मामलों द्वारा कारागार संबंधी नवीन नियमों का सूत्रपात किया गया है जिनके द्वारा पीडित व्यक्ति को नये अधिकार और नये उपचार प्राप्त हुए हैं। हुसैन आरा खातून67, सेबेस्टियन68, रूदुल शाह69 तथा भीम सिंह70 के लोकहित प्रकरणों के पश्चात्

64. एशियाड का प्रकरण तथा बंधुआ मुक्ति मोर्चे का मामला आदि…

65. ए० आई० आर० 1981 सु० को० 928 (इसे बिहार ब्लाइंडिंग केस भी कहा गया है).

66. निरंजन सिंह बनाम प्रभाकर राजाराम, ए० आई० आर० 1980 सु० को० 7853; देखें, दिलीप के० बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य ए० आई० आर०1997 स० को० 3017.

67. ए० आई० आर० 1979 सू० को० 1360.

68. ए० आई० आर० 1984 सु० का० 571,

69. ए० आई० आर० 1983 सु० को० 1083.

70. भीम सिंह बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य, ए० आई० आर० 1986 सु० को० 494.

अब सरकार द्वारा अवैध रूप से बंदी रखे गये विचारणाधीन कैदियों को तुरंत मुक्त कर देने मात्र से काम नहीं चलेगा बल्कि सरकार को ऐसे बंदियों को क्षतिपूर्ति के रूप में समुचित हर्जाना भी देना होगा। रूदुल शाह के प्रकरण में अवैध निरोध के लिए सरकार को हर्जाने के रूप में अभ्यर्थी को पैंतीस हजार रुपये देने पड़े जबकि पुलिस की मनमानी और ज्यादती के शिकार हुये भीमसिंह को उच्चतम न्यायालय ने सरकार से पचास हजार रुपये की राशि अवैध निरोध के लिये क्षतिपूर्ति के रूप में दिलायी।

  • लोकहित से संबंधित मामले में राज्य केवल तकनीकी आपत्ति के आधार पर जन-साधारण के प्रति अपने कर्त्तव्य से नहीं बच सकेगा। उदाहरणार्थ, राज्य का यह तर्क व्यर्थ होगा कि विवादित याचिका में आवेदक के स्वयं का कोई मौलिक या विधिक अधिकार का उल्लंघन नहीं किया गया है। यदि याचिका की सुनवाई के दौरान यह पाया जाता है कि व्यक्ति के विधिक या संवैधानिक अधिकार का हनन हुआ है, तो राज्य इसके लिये उत्तरदायी होगा। अखिल भारतीय शोषित कर्मचारी संघ (रेलवे) बनाम भारत संघ/1 के लोकहित मामले में सरकार ने प्रति शपथ-पत्र पर यह तकनीकी आपत्ति उठायी थी कि अर्जीदार एक अपजीकृत संघ होने के कारण उसके द्वारा दी गयी याचिका विचारण योग्य नहीं थी। परन्तु न्यायालय ने इस प्रक्रियात्मक औपचारिकता संबंधी आपत्ति को अमान्य करते हुये मामले की सुनवाई जारी रखी।

लोक सेवकों द्वारा किये गये अपकृत्यों के लिये उदाहरणात्मक क्षतिपूर्ति (Exemplary damages for misfeasance by public servant)

विगत दशकों में न्यायपालिका का यह रुझान (trend) देखने में आया है कि लोक सेवकों द्वारा कारित अपकृत्यों (misfeasance) के लिये न्यायालय व्यथित पक्षकार को राज्य से उदाहरणात्मक क्षतिपूर्ति (exemplary damages) दिलाती है ताकि लोक सेवक ऐसे अपकृत्य पुनः करने का दुःसाहस न करें।

उच्चतम न्यायालय ने लोक सेवकों द्वारा मनमाने ढंग से अपनी अधिकार शक्ति का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने की दृष्टि से उच्चतम न्यायालय ने कॉमन-काज-ए रजिस्टर्ड सोसाइटी बनाम भारत संघ72 के लोकहित वाद में तत्कालीन पेट्रोलियम राज्य मन्त्री कैप्टन सतीश शर्मा द्वारा अपने सगे- सम्बन्धियों तथा कपापात्रों एवं मन्त्रियों के बेटों को मनमाने ढंग से पेट्रोल पम्पों तथा गैस-एजेन्सियों का आवण्टन किया जाने के प्रति गहरा रोष व्यक्त करते हुये अभिकथन किया कि जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि द्वारा इस प्रकार अपने पद का दुरुपयोग तथा जन सम्पत्ति का पक्षपातपूर्ण आवण्टन निन्दनीय एवं संविधान के अनुच्छेद 14 के समता के अधिकार का घोर उल्लंघन था, अत: इसके लिये दोषी मन्त्री को वैयक्तिक रूप से उत्तरदायी ठहराया जाना उचित था। परिणामस्वरूप न्यायालय ने मन्त्री द्वारा आवण्टित सभी आवण्टन रद्द करते हये कैप्टन शर्मा को 50,000 रुपये जुर्माने से दण्डित किया। यह बात अलग है कि इस निर्णय के विरुद्ध दायर पनरीक्षण याचिका में दिये गये दिनांक 3 अगस्त, 1999 के फैसले में उच्चतम न्यायालय ने पेट्रोलियम मंत्री कैप्टन सतीश शर्मा पर अधिरोपित पचास हजार रुपये का जुर्माना रद्द कर दिया और उनके विरुद्ध चल रही सी० बी० आई० जांच के आदेश को भी वापस ले लिया।

होलीकाउ पिक्चर्स बनाम प्रेमचन्द्र मिश्रा73 के वाद में सरकार ने राजनीतिक कारणों से प्रेरित होकर सरकारी भूमि औने-पौने दामों में आवण्टित कर दी जिसे उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया। परन्त न्यायालय ने आवण्टन से जुड़े कतिपय विशेष मुद्दों पर दोषी व्यक्तियों से कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा। जिससे यह सिद्ध हो सके कि आवण्टन में भ्रष्टाचार हुआ था या यह राजनीति से प्रेरित था। अपील में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि इस प्रकरण में उन मुद्दों की अनदेखी हुई है जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि उक्त भमि के आवण्टन में कोई अनियमितता हुयी थी या आवंण्टन भ्रष्टाचारयुक्त होने के कारण अवैध था। अत: उच्चतम न्यायालय ने प्रकरण को पुनः विचारार्थ उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया।

71. ए० आई० आर० 1981 सु० को० 317.

72. ए० आई० आर० 1996 सु० को० 3538; इसी प्रकार उच्चतम न्यायालय ने अपने दिनांक 8 नवम्बर, 1996 के फैसले में तत्कालीन केन्द्रीय शहरी मन्त्री श्रीमती शीला कौल द्वारा मनमाने ढंग से प्लाटों का आवण्टन किये जाने के कारण उन्हें पचहत्तर हजार रुपये जुर्माने से दण्डित किया था. 

73. ए० आई० आर० 2008 सु० को० 913.

राज्य की व्यापक परिभाषा

लोकहित की याचिका को अधिक लोकोपयोगी बनाने तथा आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से साधनहीन एवं असमर्थ लोगों को उनके विधिक अधिकार दिलाने के लिये उच्चतम न्यायालय ने राज्य को नये सिरे से पुनः परिभाषित करना आवश्यक समझा ताकि बदले हुये परिवेश में संवैधानिक उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके। ओलियम गैस रिसन74 के मामले में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न यह उद्भूत हुआ कि श्रीराम फर्टीलाइजर कार्पोरेशन जैसे प्रायवेट औद्योगिक प्रतिष्ठान को संविधान के अनुच्छेद 12 के अधीन ‘राज्य’ की परिधि के अन्तर्गत माना जाये अथवा नहीं। उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 12 के अधीन अपने सभी संदर्भित पूर्ववर्ती निर्णयों का पुनरावलोकन करने के पश्चात् यह अभिनिर्धारित किया कि मौलिक अधिकारों के अनुरक्षण हेतु प्रायवेट निकायों को भी “राज्य” की परिधि में माना जाये ताकि मानव-अधिकारों को अधिकाधिक संरक्षित किया जा सके। इस प्रकरण में न्यायालय ने विनिश्चित किया कि उक्त प्रतिष्ठान सरकार के नियंत्रण और विनियमों के अधीन उत्पादन कार्य कर रहा था जो वस्तुतः सरकार को ही करना चाहिये था और सभी पर्यावरण संरक्षण संबंधी कानून इस प्रतिष्ठान के प्रति भी लागू थे। इस प्रतिष्ठान के कार्य से बड़ी संख्या में लोगों के जीवन संबंधी अधिकार प्रभावित होने की संभावना थी। अत: उच्चतम न्यायालय का निश्चित मत था कि इस प्रतिष्ठान को अनुच्छेद 12 के संदर्भ में ‘राज्य’ की परिधि के अन्तर्गत माना जाये क्योंकि गैस रिसन होने की दशा में आसपास के लोगों के जन-स्वास्थ्य पर प्रतिकूल परिणाम होने की संभावना थी। अनुच्छेद 12 का क्षेत्र अधिक व्यापक बनाये जाने का औचित्य प्रतिपादित करते हुए उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि इससे निगम-क्षेत्र में मानव अधिकारों के प्रति आस्था बढ़ेगी और उनमें सामाजिक जागरूकता की भावना उत्पन्न होगी। न्यायालय ने कहा कि यदि न्यायिक दृष्टि में “लोकहित” सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, तो इस बात से कोई अन्तर नहीं पड़ना चाहिये कि उल्लंघनकारी प्रायवेट संस्थान है या राज्य।

शासन से अनुदान या सहायता प्राप्त संस्था को भी अनुच्छेद 12 के प्रयोजनों के लिये ‘राज्य’ माना गया है। शीला बारसे बनाम सेक्रेटरी चिल्ड्रिन्स एड सोसायटी75 के लोकहित मामले में सोसायटी द्वारा स्थापित नये संप्रेक्षण गृह के बारे में अनेक अनियमितताओं के विरुद्ध बंबई उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की गयी थी। याचिकादाता द्वारा उच्च न्यायालय के निर्देशों के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की गयी। प्रत्यर्थी सोसायटी ने अपने प्रत्युत्तर में यह तर्क प्रस्तुत किया कि एक प्रायवेट संस्था होने के नाते वह संविधान के अनुच्छेद 12 के अधीन ‘राज्य’ की परिधि के अन्तर्गत नहीं आती थी। परन्तु उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी० एन० भगवती तथा न्यायमूर्ति आर० एस० पाठक ने निर्णय दिया कि राज्य का ही एक अभिकरण होने के कारण उक्त सोसायटी अनुच्छेद 12 तथा 21 के प्रयोजन के लिये ‘राज्य’ के समान ही दायित्वाधीन थी। नि:सन्देह ही उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय न्यायिक सक्रियता का उत्कृष्ट उदाहरण

स्थानीय प्राधिकारियों तथा सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के संवैधानिक दायित्व

सार्वजनिक हित की दृष्टि से म्युनिसिपाल्टियों तथा नगर निगमों के कार्यों को तीन प्रमुख वर्गों में रखा जा सकता है जिन्हें प्राथमिक, द्वितीयक तथा विशेष कार्य कहना उचित होगा।

नगर निगमों तथा लोक संस्थाओं के प्राथमिक कार्यों में लोक-स्वास्थ्य, सफाई, जल-प्रदाय, गंदे पानी की निकासी, सड़कों का रख रखाव आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। म्युनिसिपल बोर्ड वित्तीय अभाव76 या कर्मचारियों की कमी का कारण देकर इस दायित्व से नहीं बच सकता है। ये प्राथमिक कार्य अनिवार्य और बंधनकारी होने के कारण इनसे बचने का कोई भी बहाना न्यायालय को स्वीकार्य नहीं होगा।77 इसी प्रकार रेलवे स्टेशन जैसे लोक-स्थलों पर बने शौचालय तथा पेशाब घर को तोड़कर यात्रियों को इस आवश्यक सुविधा

74. एस० सी० मेहता बनाम भारत संघ, (1987) 1 एस० सी० सी० 395.

75. (1987) 3 एस० सी० सी० 50.

76. रतलाम म्युनिसिपल काउंसिल बनाम वर्धीचन्द, ए० आई० आर० 1980 सु० को० 1624. 77. एल० के० कूलवाल बनाम राजस्थान राज्य, ए० आई० आर० 1988 राज० 2.

से वंचित रखने के लिये रेल विभाग को दोषी ठहराया गया तथा न्यायालय ने लोकहित में ये सुविधायें यात्रियों को तत्काल उपलब्ध कराने हेतु रेल विभाग को निर्देश दिये।78

लोक संस्थाओं तथा नगर निगम के द्वितीयक कार्यों में जन्म-मृत्यु तथा विवाहों का पंजीकरण, उद्यान, खेल मैदान, बाजार तथा मेले स्थलों का रखरखाव, मृत पशुओं का निवर्तन, वैश्यालयों तथा अनाचार गृहों पर उचित नियंत्रण आदि का समावेश है।

म्युनिसिपल संस्थाओं के विशेष कार्यों में शहरों का सौन्दर्यकरण, दूध तथा खाद्य सामग्री का वितरण, मानवीय आवास के लिये गृह निर्माण-शालाओं, पुस्तकालयों तथा चिकित्सालयों की प्रबंध व्यवस्था और कांजी हाउस या चारागाह आदि का रखरखाव आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।

उपर्युक्त लगभग सभी कार्य लोकहित से संबंधित होने के कारण इनमें व्यतिक्रम या लापरवाही के लिये निगम दायित्वाधीन होगा क्योंकि उसे राज्य का ही एक अविच्छिन्न अंग माना गया है। इस संबंध में जनता के किसी भी सदस्य को लोकहित में रिट याचिका द्वारा न्यायालय से निगम के विरुद्ध अनुतोष की याचना करने का अधिकार प्राप्त है।

राज्य के विरुद्ध लोकहित याचिका पर निर्बन्धन

राज्य की कार्यपालिका का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह नागरिकों के मौलिक तथा अन्य सभी विधिक अधिकारों का संरक्षण करे। यदि कार्यपालिका अपने कर्त्तव्य पालन में व्यतिक्रम (default) करती है, तो उस स्थिति में नागरिक अपने अधिकारों को न्यायालय के माध्यम से प्रवर्तित कराने हेतु याचिका दायर कर सकता है। परन्तु मूलत: यह राज्य का ही कर्त्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन या हनन तो नहीं हो रहा है। तात्पर्य यह है कि न्यायालयों की धारणा यह नहीं होनी चाहिये कि केवल वे ही नागरिकों के अधिकारों के संरक्षक हैं और प्रजातांत्रिक प्रणाली से निर्वाचित सरकार को इसमें कोई रुचि नहीं होगी। दूसरे शब्दों में, कार्यपालिका के बारे में न्यायालय को आरम्भ से ही शंकित भावना नहीं रखनी चाहिये। हाँ, मामले की जाँच-पड़ताल के पश्चात् यदि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि राज्य ने अपने कर्तव्य का समुचित रूप से निर्वहन नहीं किया है, तो वह हस्तक्षेप करके पीड़ित व्यक्ति को उसका अधिकार दिला सकता है।

निवेदित है कि उक्त संवैधानिक और सार्वजनिक मुद्दों के प्रश्न को लेकर कभी-कभी न्यायालय और कार्यपालिका या विधान मंडल के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। लोकहित मामले में एक व्यक्ति का किसी दूसरे व्यक्ति से टकराव नहीं होता बल्कि उसका टकराव सीधे राज्य या उसके किसी अभिकरण से होता है, जिस पर न्यायालय को निर्णय देना होता है। न्यायालय द्वारा नागरिकों के हित में दिया गया निर्णय बहुधा राज्य के प्राधिकारियों के लिए असुविधाजनक होने के कारण वे न्यायालयों की न्यायिक सक्रियता को पसंद नहीं करते हैं। यहां तक कि वे कभी-कभी न्यायालयों की कटु आलोचना करने में भी नहीं चूकते हैं। परन्तु वास्तविक रूप से कार्यपालिका की अप्रसन्नता का कारण उचित प्रतीत नहीं होता है क्योंकि न्यायालय उसके कार्यों में हस्तक्षेप केवल तभी करता है जब कार्यपालिका ने अपने कार्य विधान मंडल या संसद द्वारा निर्धारित इच्छा के अनुसार नहीं किये हैं। यदि कार्यपालिका संसद की इच्छानुसार अपने कर्तव्य निभाती है, तो फिर न्यायालय के हस्तक्षेप का प्रश्न ही नहीं उठेगा।

परन्तु इस संदर्भ में यह उल्लेख कर देना भी आवश्यक होगा कि बोफोर्स के मामले79 में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि तफतीश या दाण्डिक प्रकरण के विरुद्ध केवल अभियुक्त ही कार्यवाही करने में सक्षम है तथा इस संबंध में किसी राजनैतिक दल या सामान्य जन को लोकहित के अन्तर्गत ऐसा कार्यवाही करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। इस प्रकरण के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार थे

78. रामनाथ शेखर बनाम पांडू पाध्ये, ए० आई० आर० 1987 बम्बई 99.

79. जनता दल बनाम हरमिन्दर सिंह चौधरी, (1991) 3 एस० सी० सी० 756.

प्रथम सूचना रिपोर्ट में कुछ नामित तथा कुछ अनामित व्यक्तियों के विरुद्ध यह आरोप था कि उन्होंने आपराधिक षड्यंत्र करके भारत को बोफोर्स बन्दूकों की सप्लाई कराकर एक बड़ी राशि रिश्वत के रूप में प्राप्त की थी। इस पर केन्द्रीय जाँच ब्यूरो ने उन व्यक्तियों के विरुद्ध जाँच शुरू कर दी। केन्द्रीय जाँच ब्यूरो ने इस प्रकरण की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश से निवेदन किया कि इस मामले की तफतीश में सहयोग करने हेतु स्विटजरलैण्ड को पत्र लिखा जाए। इस पर याचिकाकर्ता हरमिन्दर चौधरी जो एक अधिवक्ता था, ने लोकहित के आधार पर आपत्ति उठाई जिसमें कहा गया था कि लोकहित में यह आवश्यक है कि स्विटजरलैण्ड को इस संबंध में कोई पत्र न लिखा जाए। न्यायालय ने अवलोकन किया कि इस प्रकरण को लोकहित का मामला नहीं बनाया जा सकता क्योंकि इसमें केन्द्रीय जाँच ब्यूरो और केन्द्र सरकार को छोड़कर अन्य किसी व्यक्ति को कार्यवाही का अधिकार नहीं है और न इसमें किसी निजी व्यक्ति का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष हित ही प्रभावित होता है।

इस प्रकरण की अपील पर निर्णय देते हुए उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चत किया कि याचिकाकर्ता का प्रस्तुत मामला किसी भी प्रकार से बंधुआ मुक्ति मोर्चे के प्रकरण में लोकहित के बारे में निर्धारित विधि की परिधि में नहीं आता है, इसलिए याचिकाकर्ता को लोकहित की कार्यवाही लाने का न्यायाधिकार नहीं है।

राज्य के विरुद्ध न्यायिक उपचार

राज्य की कार्यपालिका द्वारा कर्तव्य के अपालन या व्यतिक्रम (default) से नागरिकों को जो उपचार प्राप्त हो सकते हैं उनमें अधिकारों का प्रवर्तन, मुकदमेबाजी का व्यय, आर्थिक क्षतिपूर्ति, निषेधादेश आदि प्रमुख हैं। राज्य द्वारा अनुच्छेद 21 में वर्णित किसी नागरिक के जीवन संबंधी अधिकार का उल्लंघन किया जाने पर न्यायालय उसे हानिपूर्ति भी दिला सकता है जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने रूदुल शाह80 तथा भीम सिंह81 आदि के प्रकरण में किया था।

सारांश रूप में यह कहा जा सकता है कि लोकहित प्रकरणों के माध्यम से जनहित से संबंधित अनेक नये उपचारों का सृजन किया गया है जो उनकी न्यायिक सक्रियता का परिचायक है। बंधुआ मजदूरी से मुक्त हुये श्रमिकों का पुनर्स्थापन, श्रमिक विधियों का अनिवार्य रूप से पालन, पेयजल व्यवस्था, पत्थर की खदानों में पत्थर की धूल सोखने वाली मशीन लगाने का निर्देश, कैदियों की वार्षिक जनगणना, महिलाओं और बच्चों के लिए संप्रेषण गृह आदि कुछ ऐसे विशिष्ट उपचार हैं, जो न्यायिक क्षेत्र में अपेक्षाकृत नवीन हैं परन्तु जिनसे जनसाधारण को पर्याप्त राहत मिली है। तथापि वर्तमान में आवश्यकता इस बात की है कि न्यायालय अपने आदेशों, निर्देश और उपचारों को समुचित रूप से कार्यान्वित कराने के लिये उच्चतम न्यायालय के अधीन एक स्वतन्त्र प्रकोष्ठ की स्थापना करे ताकि शासन तंत्र नागरिकों के अधिकारों की उपेक्षा न कर सके और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिये बाध्य किया जा सके। तभी कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य प्राप्त करना संभव हो सकेगा।

अत्यधिक न्यायिक सक्रियता के विरुद्ध चेतावनी

इसमें संदेह नहीं कि विगत तीन दशकों में लोकहित वादों की प्रगति ने भारतीय न्याय-व्यवस्था को एक नई दिशा प्रदान की है जिससे देश में कल्याणकारी राज्य की कल्पना को साकार रूप देने में पर्याप्त सहायता मिली है। परन्तु साथ ही यह कहना अनुचित न होगा कि जनहित याचिकाओं के माध्यम से  अत्यधिक न्यायिक सक्रियता ने न्याय प्रशासन के प्रक्रियात्मक नियमों के महत्व को कम कर दिया है जिसके कारण विधि में अनिश्चितता आ गई है। विगत कुछ वर्षों में न्यायाधीशों में न्यायिक सक्रियता के प्रति जागरूकता की होड सी लग गई थी और स्वयं को जनता का हितैषी साबित करने के प्रयास में न्यायाधीश अपनी छवि

80. ए० आई० आर० 1983 सु० को० 1083.

81. ए० आई० आर० 1986 सु० को० 494.

 सुधारने में लगे हुए थे। इस कथन के प्रमाण में कतिपय निर्णयों में न्यायाधीशों द्वारा की गई टिप्पणियों का उल्लेख करना समीचीन होगा। एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ82 के वाद में न्यायालय ने काकी प्रक्रिया को न्याय की एक कठपुतली मात्र निरूपित किया। इसके विरुद्ध अपनी चिंता व्यक्त करते द्वा न्यायमूर्ति आर० एस० पाठक ने बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ83 के वाद में टिप्पणी की न्यायालय द्वारा बिना उचित प्रारूप एवं सत्यापन के साधारण पत्रों को रिट के रूप में स्वीकार करते हए न्यायिक कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए। परन्तु विद्वान न्यायाधीश की इस चेतावनी की अनदेखी करते हुए एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ84 के मामले में यह कहा गया है कि किसी व्यक्ति या सामाजिक संगठन द्वारा जनहित में लिखे गये केवल पत्र मात्र को भी न्यायालय कार्यवाही हेतु स्वीकार करेगा।

उपर्युक्त कथन से यह आशय कदापि नहीं है कि न्यायिक सक्रियता पूर्णतः अवांछित एवं अनावश्यक है परन्त नि:संदेह ही इसका प्रयोग एक निश्चित सीमा तक ही किया जाना चाहिये क्योंकि न्यायिक सक्रियता की अति (excessive) के अनेक दुष्परिणाम संभावित हैं। प्रथम यह कि ‘सुने जाने’ (लोकस स्टेंडी) के नियम को अत्यधिक उदार एवं लचीला बना दिया जाने के कारण जनहित के बहाने व्यक्ति या समाज संगठन स्वयं ही याचिकाकर्ता एवं न्यायाधीश दोनों की ही भूमिका एक साथ निभाते हैं जो न्यायिक दृष्टि से अनुचित है।85 दूसरे, न्यायिक सक्रियता के परिणामस्वरूप पूर्व-निर्णयों के बंधनकारी प्रभाव के सिद्धान्त को लगभग पूरी तरह त्याग दिया जाने लगा है तथा न्यायालयों ने स्वयं ही नये मानक स्थापित कर लिये हैं । यहाँ तक कि कतिपय मामलों में वे स्वयं ही मामले की जाँच पड़ताल हेतु आयोग या समिति गठित करने का आदेश दे देते हैं, जो कि वास्तव में राज्य का कार्य है। इस सन्दर्भ में सच्चिदानंद पांडे बनाम पश्चिम बंगाल राज्य86 के वाद में न्यायमूर्ति खालिद ने अभिकथन किया कि इसमें संदेह नहीं कि न्यायालयों को सुनवाई करते समय सामाजिक-आर्थिक न्याय के सांविधानिक अधिदेश (mandate) को ध्यान में रखना चाहिए लेकिन विधि उन्हें स्वयं इन सुधारों को लागू करने की अनुज्ञा नहीं देती, वे इस हेतु केवल निर्देश दे सकते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने विशाखा बनाम राजस्थान राज्य87 के वाद में कामकाजी महिलाओं के लैंगिक शोषण के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए इसे रोकने हेतु विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धान्त प्रतिपादित किये और निर्देश दिया कि जब तक इस संबंध में संसद द्वारा अधिनियम तैयार नहीं किया जाता तब तक इन सिद्धान्तों का अनुपालन कानून के रूप में किया जाना चाहिये। इस प्रकार न्यायालय ने विधायिका (Legislature) की भूमिका स्वयं ही निभाई जो विधिक दृष्टि से उचित नहीं है, क्योंकि यह शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त के विपरीत है।

उल्लेखनीय है कि बम्बई के उच्च न्यायालय ने सन् 1998 में शाहनाज रानी के वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा विशाखा के वाद में दिये गये मार्गदर्शक नियमों का अनुसरण करते हुये याचिकादात्री को न्याय दिलाया। इस वाद में याचिकादात्री अरेबियन एयरलाइन्स के बम्बई स्थित कार्यालय में ग्राउण्ड होस्टेस के रूप में कार्यरत थी। उसने अधिकारियों के विरुद्ध लैंगिक शोषण का आरोप लगाते हुये याचिका प्रस्तुत की इसलिये उसे नौकरी से हटा दिया गया। न्यायालय ने उसकी याचिका मंजूर करते हुये उसे प्रतिवादी एयरलाइन्स कम्पनी से तेरह वर्ष का वेतन दिया जाने का आदेश दिया क्योंकि इस अवधि में उसे बिना औचित्य के नौकरी से बाहर कर दिया गया था। यह निर्णय महिलाओं के प्रति मानव-अधिकारों के संरक्षण हेतु न्यायालय की दक्षता का उचित दृष्टान्त है।88

82. ए० आई० आर० 1987 सु० को० 1086 (1090).

83. ए० आई० आर० 1984 सु० को 802.

84. ऐ० आई० आर० 1987 सु० को० 1086.

85. शीला बारसे बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1988 सु० को० 2211.

86. ए० आई० आर० 1987 सु० को० 1909

87. ए० आई० आर० 1997 सु० को० 3011.

88. देखें, मेधा कोतवाल बनाम भारत संघ, (2004)5 स्केल 573.

इसी प्रकार एपरिल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउन्सिल बनाम ए० के० चोपड़ा89 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिकथन किया कि महिलाओं के यौन शोषण के प्रकरणों में न्यायालयों को इनके मानव अधिकारों को संरक्षित करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिये। इस मामले में एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी अधीनस्थ महिलाकर्मी के यौन शोषण का प्रयास किया और उससे शारीरिक सम्पर्क बनाने की धृष्टता की जो न्याय एवं नैतिकता का उल्लंघन था। उक्त अधिकारी ने इस अपराध के लिये उसे नौकरी से निकाल दिये जाने के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की। न्यायालय ने अपीलार्थी की बरखास्तगी को न्यायोचित ठहराते हुये उसकी अपील खारिज कर दी।

भारत में महिलाओं को घरेलू हिंसा के विरुद्ध वैधानिक संरक्षण दिलाने हेतु घरेलू हिंसा से महिलाओं को संरक्षण अधिनियम, 2005 (Protection of Women From Domestic Violence Act, 2005) पास हुआ जो 26 अप्रैल, 2006 से लागू है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 एवं 21 के अन्तर्गत प्राप्त अधिकारों का संरक्षण करना तथा उनके उल्लंघन की स्थिति में त्वरित सिविल उपचार उपलब्ध कराना है। इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं

(1) परिवार के किसी व्यक्ति द्वारा परिवार की महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन, हाथ-पैर आदि को क्षति कारित करना या क्षति कारित करने की धमकी देना ‘घरेलू हिंसा’ माना जायेगा।

(2) घरेलू हिंसा की शिकार हुई महिला संरक्षण अधिकारी, पुलिस अधिकारी, सेवा प्रदायक (Service Provider) या मजिस्ट्रेट, इनमें से किसी के पास अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है।

(3) उसे यह अधिकार प्राप्त है कि संरक्षण अधिकारी उस महिला को उपलब्ध सेवाओं तथा निःशुल्क

विधिक सहायता के बारे में जानकारी दे।

(4) व्यथित महिला के लिये चिकित्सीय सेवायें तथा आश्रय-गृह (Shelter Homes) की सुविधा उपलब्ध करायी जायेगी।

(5) उसे अन्तरिम प्रतिकर (Interim compensation) की राशि भी दिलाई जा सकेगी।

(6) घरेलू हिंसा से सम्बन्धित प्रकरण की कार्यवाही गोपनीय या केमरा-कार्यवाही के रूप में चलायी जायेगी।

(7) व्यथित महिला को अपने ही घर में अलग रहने की सुविधा प्रदान करायी जा सकती है।

(8) घरेलू हिंसा के प्रकरण में मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध तीस दिनों के भीतर अपील “सेशन न्यायालय” को हो सकेगी।

(9) घरेल हिंसा के दोषी व्यक्ति को एक वर्ष तक के कारावास या बीस हजार रुपये अर्थदण्ड या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा।

एक अन्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने सन् 1999 में मणिपुर विधानसभा के अध्यक्ष को न्यायालयीन अवमानना के लिए दोषी मान कर न्यायालय में स्वयं उपस्थित होने के निर्देश दिये। अध्यक्ष ने इस आधार पर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने से इन्कार कर दिया कि उसे विधानसभा अध्यक्ष होने के नाते ऐसी उपस्थिति से संसदीय विशेषाधिकार के अन्तर्गत छूट प्राप्त है। ऐसी दशा में न्यायालय की स्थिति दुविधामय हो गयी। अंततः अध्यक्ष से अनुरोध किया गया कि वे विधायिका और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति को टालने के लिए न्यायालय में आ जाएं तथा उनकी न्यायलयीन कक्ष में उपस्थिति मात्र को क्षमा याचना मान लिया गया यद्यपि उन्होंने एक शब्द का भी उच्चारण नहीं किया था।

सन 1999 के दिल्ली में फैले डेंग ज्वर के प्रकोप के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा स्वप्रेरणा (suo motu) से दिया यह निर्देश कि वकीलों का एक दल अस्पतालों में दौरा कर इस बारे में अपनी रिपोर्ट पेश करे, आलोचना का विषय रहा। इस पर दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने क्षुब्ध होकर आदेश

89. Apparel Export Promotion Council v. A. K. Chopra, AIR 1999 SC 625.

जारी किया कि कोई भी न्यायाधीश उनकी अनुमति के बिना स्वप्रेरणा से कोई मामला सुनवाई हेतु ग्रहण नहीं करेगा।

इसी प्रकार सन 1999 में प्याज की कीमतों में एकाएक भारी बढ़ोत्तरी में इलाहाबाद उच्च न्यायालय न्यायिक हस्तक्षेप न्यायालयीन सक्रियता की अति का ज्वलंत उदाहरण है। इस प्रकरण में खंडपीठ में भिन्न मत होने के कारण मामला तीसरे न्यायाधीश को निर्दिष्ट (refer) किया गया। अंतत. न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहँचा कि केवल आदेश पारित कर देने से न्यायालय प्याज की कीमत बढ़ने से रोक नहीं सकता; अत: इस पर फैसला देना व्यर्थ होगा।

अनेक बार लोकप्रियता की ललक में अनेक व्यक्ति जनहित के नाम पर अपना वैयक्तिक हित साधने की नियत से जनहित याचिका लाते हैं । अतः न्यायालयों को ऐसे बनावटी जनहित वादों पर अंकुश लगाना चाहिए साथ ही स्वयं को भी ऐसे मामलों में सचेत एवं संयमित रहना चाहिए ताकि प्रगतिवादी न्यायिक साधन का दुरुपयोग न हो सके।90

उच्चतम न्यायालय ने कॉमन काज संस्थान द्वारा दायर की गयी जनहित याचिका को खारिज करते हुये विनिश्चित किया कि आजकल जनहित मुकदमे प्रचार हेतु मुकदमों का रूप धारण कर रहे हैं जो न्यायालय के लिये न्यूसेंस (Nuisance) बनते जा रहे हैं क्योंकि इनसे वास्तविक (सच्चे) मुकदमा के निपटारे में विलम्ब हो रहा है। न्यायालय ने अभिकथन किया कि जनहित याचिकाओं का प्रारम्भ ऐसे उपेक्षित और धनहीन व्यक्तियों को न्याय प्रदान करने हेतु किया गया था, जो न्यायालय में अपनी फरियाद लेकर पहुंचने में असमर्थ थे, परन्तु कालान्तर में ये वास्तविक मुकदमों के त्वरित निपटारे में बाधक और न्यूसेंस बनकर रह गये हैं। न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने अभिमत प्रकट किया कि न्यायालय नित्यचर्या (Routine) में इन्हें सुनवाई हेतु ग्रहण कर लेते हैं जिसके परिणामस्वरूप उच्च न्यायालयों में विचाराधीन मुकदमों का ढेर लग रहा है, जो न्याय के विलम्ब का मुख्य कारण है। न्यायाधीश एच० के० सेमा (Justice H.K. Sema) ने पृथक् लेकिन सम्मत निर्णय में स्वीकार किया कि जनहित वादों का अधिकतर व्यक्तिगत प्राइवेट हितों या विवादों का निपटारे हेतु प्रयोग किया जा रहा है।

प्रस्तुत वाद में कॉमन काज ने जनहित याचिका द्वारा उच्चतम न्यायालय से निवेदन किया था कि वह सरकार को सड़क-सुरक्षा उपाय किये जाने हेतु निर्देशित करे ताकि दुर्घटनाओं को रोका जा सके। लेकिन न्यायालय ने इसे जनहित याचिका योग्य प्रकरण नहीं मानते हुये रिट याचिका खारिज कर दी।

इसी प्रकार मेसर्स होलीकाऊ पिक्चर्स (प्रा०) लि० बनाम प्रेमचन्द्र एवं अन्य 2 के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने एक बार पुनः दोहराया कि जनहित याचिका को विचारार्थ ग्रहण करने के पूर्व न्यायालयों को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिये कि इसे दायर करने वाला व्यक्ति या लोक सदस्य ने उक्त याचिका सद्भावनापूर्वक प्रस्तुत की है तथा इसमें उसका किसी प्रकार का निजी हित, स्वार्थ, दुर्भावना या सस्ती लोकप्रियता की ललक छिपी हुई नहीं है। न्यायालय को चाहिए कि वह लोकहित वाद की प्रक्रिया का दुरुपयोग किये जाने से लोगों को रोके क्योंकि कुछ छद्म व्यक्ति समाज-सुधारक की आड़ में जनहित याचिका के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का दुःसाहस करते हैं, जो वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन न्यायालय की सतर्कता इसे रोकने में सक्षम है।

इसी सन्दर्भ में न्यायालय ने यह अभिकथन भी किया कि समाजसेवी व्यक्तियों या संगठनों द्वारा समाचार-पत्रों में छपी खबरों के आधार पर उसकी सत्यता के बारे में पष्टि किये बिना दायर की गयी जनहित याचिकाओं को विचारार्थ स्वीकार नहीं किया जाना चाहिये। इन पर ध्यान तभी दिया जाना चाहिये जब साक्ष्य के आधार पर इनकी पुष्टि कर दी जाती है।

90. दखें, सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1991 स० को 420; जनता दल बनाम एच० एस० पाया, ए० आई० आर० 1993 सु० को० 892 आदि.

91. कॉमन कॉज-ए रजिस्टर्ड सोसाइटी बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 2008 सु० को०.2116.

92. ए० आई० आर० 2008 सु० को० 913.

जनहित याचिका के सम्बन्ध में न्यायालयों द्वारा अपनी अधिकारिता का सीमोलंघन किये जाने के बारे में टिप्पणी करते हुये प्रोफेसर एस० पी० साठे ने यह विचार व्यक्त किया है कि कभी-कभी लोकप्रियता या दुः साहस की प्रवृत्ति (populism or adventurism) से अभिभूत होकर न्यायाधीशगण ऐसे मामलों में भी जनहित याचिका विचारार्थ ग्रहण कर लेते हैं जो उनकी अधिकारिता के परे हैं तथा इस प्रकार संविधान की शक्ति पृथक्करण (separation of powers) के मूल ढांचेगत सिद्धान्त का उल्लंघन करते हैं। ऐसे प्रकरणों में न्यायालय को स्व-अवरोध (Self restraint) बरतना चाहिये। प्रो० साठे के अनुसार न्यायिक सक्रियता विपथगामी नहीं है अपित यह संविधानिक व्यवस्था का एक गतिशील पहल है लेकिन इसका प्रयोग न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में रहते हुये ही किया जाना चाहिये। न्याय-दान की सदिच्छा तथा अन्याय का निवारण का चाह न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से निश्चित ही पूरी हो सकती है बशर्ते कि इस प्रक्रिया का सन्तुलित ढंग से प्रयोग किया जाये।

 

न्यायनिर्णयन में विलम्ब (Delay in Dispensation of Justice)

न्याय में अत्यधिक विलम्ब के कारण नागरिकों के मौलिक अधिकारों के संरक्षण में विलम्ब होना स्वाभाविक है। इसके प्रति चिन्ता व्यक्त करते हुये यह सुझाव दिया गया है कि विवादियों को अपने प्रकरण न्यायालय में दायर करने के बजाय माध्यस्थम, आपसी परामर्श, समझौते आदि द्वारा निपटा लेने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिये। इन्हें वैकल्पिक विवाद विचारण (Alternative Dispute Resolution) तन्त्र कहा गया है। फास्ट कोर्ट न्यायालय का गठन भी इसी दिशा में एक प्रयास है ताकि मामलों का त्वरित निपटान हो सके।

मानव अधिकार : भारतीय परिदृश्य

प्रायः सभी विकसित एवं विकासशील देशों ने यह स्वीकार किया है कि मानव अधिकार केवल एक कागजी घोषणा न होकर मानव के गरिमामय विकास में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। ये केवल सामाजिक व आर्थिक अधिकारों तक सीमित न रहकर इनका क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है तथा इनमें न्यायिक अधिकारों के अलावा नैतिक, सांस्कृतिक एवं भौतिक मूलभूत आवश्यकताओं का भी समावेश है जो मानवीय गरिमा (human dignity) के लिए महत्वपूर्ण है। राबर्टसन ने मानव अधिकार को परिभाषित करते हुए कहा है कि ये ऐसे मूलभूत अधिकार हैं जो संसार में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति पुरुष, स्त्री, तथा बालक को हक के रूप में प्राप्त हैं क्योंकि उसने मानव के रूप में जन्म लिया है।93 ये अधिकार मानव समाज के विकास के लिए न्यूनतम अर्हताएं एवं मापदण्ड सुस्थापित करते हैं । मानव अधिकार मानव जाति के स्वभाव में अन्तर्भूत होने के कारण उनके बिना मानव का जीवित रहना संभव नहीं है।94

मानव अधिकारों को सार्वजनिक रूप से मान्यता सर्वप्रथम संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा सन् 1948 के मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा पत्र द्वारा दी गई थी। ये घोषणा अन्तर्राष्ट्रीय बिल ऑफ राइट्स का प्रथम भाग थी जिसमें सन् 1966 के आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक न्याय से संबंधित अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय (International Covenant on Economic, Cultural & Social Rights) का समावेश था। यह घोषणा सन् 1976 से प्रभावी हुई।

भारत में मानव-अधिकार

उल्लेखनीय है कि भारत के संविधान के आमुख (Preamble) तथा भाग 3 एवं 4 में वर्णित मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक सिद्धान्तों के अन्तर्गत मानव अधिकारों की संकल्पना का पर्याप्त समावेश

*निवेदित है कि 31 दिसम्बर, 2007 को भारत के विभिन्न न्यायालयों में लम्बित प्रकरणों की संख्या इस प्रकार थी

उच्चतम न्यायालय 46926, विभिन्न उच्च न्यायालयों में 3700223 तथा निचली अदालतों में कुल 25,285,982.

93. राबर्टसन ए० एच० : ह्यमन राइट्स इन दि वर्ल्ड (1972) पृ० 175.

94. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मानवाधिकार पर प्रकाशित प्रश्नोत्तरी क्र० 4 (1987).

द्ष्टीगोचर होता है। इसके अलावा वर्तमान में भारत मानव अधिकार से जुड़ी हुई सोलह अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर 541 गर्ता होने के कारण मानव अधिकारों को यथासंभव लागू करने के लिए कृतसंकल्प है। इन संधियों में। सीय सिविल एवं राजनीतिक अधिकारों, जातीय भेदभाव के विरुद्ध अभिसमय तथा महिलाओं एवं से संबंधित अभिसमय (Conventions on Racial Discrimination, Women, Child etc.) आदि का समावेश है। इन्हीं संधियों एवं अभिसमयों के अनुसरण में भारत में मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (The Human Rights Protection Act, 1993) पारित किया गया जिसके अन्तर्गत सन 1993 में एक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission NHRC) की स्थापना की गई। इस अधिनियम के अन्तर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को यह अधिकारिता प्राप्त है कि यह स्वप्रेरणा से (suo motu) अथवा उसके पास शिकायत आने पर मानवाधिकार उल्लंघन के प्रकरणों के विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है। गत 7 वर्ष से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष मानवाधिकार के उल्लंघन की जो शिकायतें आई हैं उनमें अधिकांश जेल या पुलिस अभिरक्षा में मौत, घरेलू महिलाओं के उत्पीड़न एवं लैंगिक शोषण, बाल-मजदूरों आदि से संबंधित परिवाद ही अधिक हैं। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 21 में राज्यों में भी मानवाधिकार आयोग गठित किये जाने का प्रावधान किया गया है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) प्रमुखत: दो प्रकार के कार्य करता है। प्रथम, यह आयोग मानव अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करता है, तथा दूसरे, जन-साधारण में मानवाधिकार के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए प्रयत्नशील है।

 भारत में प्रजातंत्र की स्थापना के परिणामस्वरूप लोक कल्याणकारी राज्य की संकल्पना को अधिमान्यता दी गई है इसीलिए संविधान में मानवाधिकार से जुड़े अनेक प्रावधानों को समाविष्ट किया गया है। उदाहरणार्थ, संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित जीवन एवं स्वाधीनता का अधिकार (Right to life & liberty), गुलामी एवं शोषण से मुक्ति,95 मनमाने ढंग से निरुद्ध किये जाने के विरुद्ध संरक्षण,96 विधि के समक्ष समानता तथा विधि के अन्तर्गत समान संरक्षण आदि ऐसे उपबंध हैं जो इस ओर इंगित करते हैं कि भारत में गणतंत्र की स्थापना के समय से ही मानवाधिकारों को पर्याप्त महत्व दिया गया था। संविधान में भाग 4 के नीति निर्देशक सिद्धान्तों एवं प्रामुख में यह स्पष्ट उल्लेख है कि भारत एक ऐसे समाजवादी समाज की संरचना के लिए दृढ़ संकल्पित है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय7, अभिव्यक्ति एवं वाक्8, तथा धार्मिक स्वतंत्रता, सभी को समान अवसर उपलब्ध कराने की वचनबद्धता दोहराई गई है। इसी प्रकार अस्पृश्यता का उन्मूलन100, व्यवसाय एवं व्यापार की स्वतंत्रता101, सांस्कृतिक अधिकारों की सुनिश्चितता आदि अनेक ऐसे प्रावधान हैं जो मानवाधिकार को संवर्धित करने में सहायक हैं। इन अधिकारों के प्रवर्तन हेतु उच्चतम न्यायालय102 या उच्च न्यायालय103 में रिट याचिका प्रस्तुत की जा सकती है।

गत तीन दशकों में मानव के मूलभूत मौलिक अधिकारों की उदार व्याख्या (liberal interpretation) द्वारा च्चतम न्यायालय ने मानवाधिकार के संरक्षण में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। विशेषतः अनुच्छेद 21 में वर्णित जीवन एवं स्वाधीनता के अधिकार की व्याख्या इतने व्यापक रूप से की गई है कि इसमें

95. अनुच्छेद 23.

96. अनुच्छेद 22, देखें डी० के० बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, ए० आई० आर० 1997 सु० को० 1017. 97. संविधान का आमुख.

98. अनुच्छेद 19 (1) (क). CONTER

99. अनुच्छेद 25.

100. अनुच्छेद 17.

101. अनुच्छेद 19 (1) (f).

102. अनुच्छेद 32.

103. अनुच्छेद 226.

जीविकोपार्जन104 का अधिकार, त्वरित विचारण का अधिकार105 और यहाँ तक कि शिक्षा106 के अधिकार भी समाविष्ट माना गया है। उच्चतम न्यायालय ने अपने अनेक फैसलों में यह कहा है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने के अधिकार तक ही सीमित न रहकर उसमें वे सभी अधिकार सम्मिलित हैं जो मानव को गरिमामय जीवन-यापन करने की सुविधा जुटा सके। अत: इसमें कामगारों के स्वास्थ्य, महिला एवं बच्चों के शोषण के विरुद्ध संरक्षण, तथा इनके विकास हेतु शैक्षणिक सुविधाएँ107 उपलब्ध कराने का अधिकार तथा प्रसूति आदि संबंधी सुविधा का अधिकार का भी समावेश है। 0 उच्चतम न्यायालय के ऐसे अनेक निर्णय हैं जिनमें मानवाधिकार के संवर्धन को विशेष महत्व दिया गया है। जैसा कहा जा चुका है संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त जीवन एवं स्वाधीनता के अधिकार में ऐसे अनेक अधिकारों का समावेश गर्भित रूप से माना गया है जो मानव जीवन को गरिमा प्रदान कर सकें। इसमें स्वस्थ पर्यावरण108, नि:शुल्क कानूनी सहायता109, जानकारी का अधिकार110, प्रतितोष या नुकसानी प्राप्त करने का अधिकार111, बंधुआ मजदूरी से मुक्ति का अधिकार! 12 आदि भी शामिल हैं। नीरजा चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य!13 के वाद में निर्णय देते हुए उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि बंधुआ मजदूरी से मुक्त हुए श्रमिकों को पुनर्वासित किया जाना भी मानवाधिकार में सम्मिलित है अतः राज्य को बंधुआ मजदूरों को पुनर्वासितं करने हेतु आवश्यक कार्यवाही करनी चाहिए। इसी प्रकार उच्च न्यायालय ने राज्य को निर्देश दिये कि जैसलमेर की मरुभूमि के वन्य प्राणियों के संरक्षणार्थ इस क्षेत्र में वन्य पशुओं के शिकार पर पूर्ण रोक लगाना चाहिए ताकि पर्यावरण संरक्षित रखा जा सके तथा वन्य पशु संरक्षण अधिनियम, 1972 का उल्लंघन न हो।

शीला बारसे बनाम भारत संघl114 के वाद में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी० एन० भगवती ने बाल-अधिकारों के संरक्षण की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए अवलोकन किया कि बच्चे राष्ट्र की संपत्ति होते हैं, अतः सरकार द्वारा उनके शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए तथा इस हेतु एक व्यापक बाल-कल्याण योजना तैयार की जानी चाहिए ताकि बालकों का चहुंमुखी विकास सुनिश्चित किया जा सके। मानव अधिकार के दायरे को अनुच्छेद 21 के माध्यम से व्यापक रूप देने में न्यायिक सक्रियता (Judicial activism) की अहम् भूमिका रही है।

उच्चतम न्यायालय ने वर्तमान में बढ़ते हुए लैंगिक अपराधों के प्रति चिन्ता व्यक्त करते हुए पंजाब राज्य बनाम रामदेव सिंह115 के वाद में अभिनिर्धारित किया कि बलात्कार जैसे गम्भीर एवं घृणित अपराधों के अपराधियों को कठोरतम दण्ड दिया जाना चाहिए क्योंकि यह एक मूलभूत मानव-अधिकार का हनन है तथा इससे व्यथित महिला के जीवन और स्वाधीनता के बहुमूल्य मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है।

104. ओल्गा टेलिस बनाम मुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन, ए० आई० आर० 1986 सु० को० 180.

105. हुसैन आरा खातून बनाम बिहार राज्य, (1980) 1 एस० सी० सी० 91.

106. मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य, (1992) 3 एस० सी० सी० 666.

107. गौरव जैन बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1997 सु० को० 3021.

108. एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1987 सु० को० 1086.

109. एम० एच० हसकोट बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1978 सु० को० 155

110. रूदल शाह बनाम बिहार राज्य, (1983) 4 एस० सी० सी० 141.

11 सेबेस्टियन होंगरी बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1984 सु० को० 1026 तथा भीमसिंह बनाम जम्म कश्मीर राज्य ए० आई० आर० 1986 सु० को० 494, नीलावती बेहरा (श्रीमती) बनाम उड़ीसा राज्य, ए० आई० आर० 1993 सु० को० 1960 आदि.

112. बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1984 सु० को० 802.

113. ए० आई० आर० 1984 सु० को० 1099; देखें, बन्धुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ, (1991) 4 एस० सी० सी० 177; बलराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1990 सु० को० 44; मुकेश आडवाणी बनाम मध्य प्रदेश

राज्य, ए० आई० आर० 1985 सु० को० 1363 आदि ।

114. (1986) 3 एस० सी० सी० 423.

115. ए० आई० आर० 2004 सु० को० 1290.

न्यायालय ने कहा कि बलात्कार न केवल व्यथित महिला के शरीर के प्रति अपराध है, अपित परे समाज विरुद्ध अपराध है। अपने बोधिसत्व गौतम बनाम सुब्रा चक्रवती116 के वाद में दिये गए निर्णय को दोहराते हुए नन्यायालय ने विनिश्चित किया कि बलात्कार का अपराध न केवल व्यथित महिला को शारीरिक चोट एवं हानि पहुँचाता है अपितु उसके सम्मान, गरिमा, प्रतिष्ठा एवं शीलाचरण को भी आघात पहुँचाना है।

ऐपल एक्सपोर्ट प्रमोशन कौंसिल बनाम ए० के० चोपड़ा117 के बाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि लैंगिक समानता के अधिकार (right to gender equalty) के उल्लंघन के प्रकरणों में जहाँ जीवन तथा स्वाधीनता के मानव अधिकारों का हनन होता है, न्यायालयों को मानव-अधिकारों से संबंधित अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमयों (International Conventions) के प्रावधानों का अनुपालन करना चाहिए। इस वाद में कम्पनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने अधीनस्थ महिला कर्मचारी के साथ छेडछाड़ करके उसका शीलभंग करने का प्रयास किया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी महिला के साथ छेड़छाड़ या अभद्र व्यवहार स्वयमेव एक अनैतिक एवं घृणित व निन्दनीय कृत्य है, अत: केवल वास्तविक शारीरिक संबंध न होने से इस अपराध की गंभीरता कम नहीं हो जाती। अत: इस अपराध के लिए दोषी अधिकारी को सेवा से बर्खास्त किया जाना पूर्णत: न्यायोचित था और उसकी अपील खारिज किये जाने योग्य थी।

मानव अधिकारों के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय मानवाधिकार का हस्तक्षेप

सन् 1993 में मानवाधिकार आयोग की स्थापना के पश्चात् आयोग ने मानव अधिकारों का संरक्षण दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं

मध्य प्रदेश राज्य ने सन् 1997 में ‘सारिका’ नाम की एक बीस वर्षीय युवती को भारतीय रेलवे की लापरवाही के कारण मृत्यु के प्रकरण में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मृतका के माता-पिता को रेलवे से एक लाख रुपये मुआवजा के रूप में दिलवाया।

इसी प्रकार सन् 1997 में बिहार राज्य पुलिस द्वारा लापरवाही से एक निर्दोष व्यापारी को गोली मारकर मृत्यु कारित करने के लिए मृतक के वारिसों को दस लाख रुपये प्रतितोष के रूप में दिये जाने का आदेश दिया। राज्य सरकार का तर्क था कि दोषी पुलिस अधिकारी को शासन द्वारा दंडित किया जा चुका है, अतः अब राज्य द्वारा प्रतितोष दिये जाने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि यह राज्य के राजस्व पर अनावश्यक अतिरिक्त भार होगा। परन्तु राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य की इस दलील को अस्वीकार करते हुए हर्जाने की राशि का आदेश यथावत् कायम रखा क्योंकि यह मृतक एवं उसके परिवारजनों के मानवाधिकार का उल्लंघन था।

सन् 1995 में मोहम्मद रशीद अली के प्रकरण में भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों को मानवाधिकार के उल्लंघन का दोषी मानते हुए उनकी मनमाने ढंग से की गई कार्यवाही की भर्त्सना की। यह प्रकरण भारत-बांग्लादेश सीमा पर कार्यरत सीमा सुरक्षा बल के जवानों की अनुचित कार्यवाही से संबंधित था जिन्होंने मोहम्मद रशीद अली को नई सायकिल सहित इस आधार पर गिरफ्तार कर परिरुद्ध रखा कि वह उस सायकिल को बांग्लादेश में ले जाकर बेचने का प्रयत्न कर रहा था। अली ने जवानों को बार बार भरोसा दिलाया कि उक्त सायकिल उसने स्वयं खरीदी थी तथा इसके प्रमाण में उसने खरीद की रसीद भी दिखाई और निवेदन किया कि वह उस सायकिल का वास्तविक स्वामी है। फिर भी जवानों ने उसकी सायकिल नहीं लौटाई। इससे क्षुब्ध होकर अली ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में आवेदन किया। आयोग ने इसे सीमा सुरक्षा बल के जवानों द्वारा मानवाधिकार का सरासर उल्लंघन मानते हुए अली को सायकिल सहित उन्मुक्त किये जाने का आदेश दिया तथा जवानों के कृत्य के लिए उनकी भर्त्सना की।118

116. ए० आई० आर० 1996 सु० को० 922.

117. ए० आई० आर० 1999 सु० को० 625.

118. राष्ट्रीय मानवाधिकार न्यूज-लेटर, अगस्त. 1998

मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस गुलाब गुप्ता ने सन् 2000 के एक आदेश में प्रबंधकों द्वारा शालाओं में बच्चों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध न कराये जाने को मानवाधिकार का उल्लंघन मानते हुए उन्हें स्कूलों में सुरक्षित पेयजल व्यवस्था करने हेतु आदेशित किया।

नसरूद्दीन बनाम राज्य119 के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत डी० के बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य120 में दिये गए निर्णय का अनुसरण करने हेतु तिहार जेल में हुई अभियुक्त की मृत्यु के लिए मृतक के पिता को आर्थिक प्रतिकर दिये जाने का आदेश पारित किया क्योंकि अभियुक्त के शरीर पर सोलह घाव पाये गए थे जो उसे जेल अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किये जाने के स्पष्ट प्रमाण थे।

इसी प्रकार भजन कौर बनाम दिल्ली प्रशासन121 के वाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने संविधान के अनु० 21 की व्याख्या करते समय मानव अधिकारों के महत्व को प्रतिपादित करते हुए अभिनिर्धारित किया कि “मानव की स्वाधीनता में अनु० 21 का अत्यधिक महत्व है क्योंकि यह मानव-गरिमा, मानव-विकास तथा मानव की उत्तरजीविता को सुनिश्चित करता है। यह अनुच्छेद केवल एक घिसापिटा प्रावधान मात्र न होकर भारत में मानव जीवन की सुरक्षा, स्वाधीनता एवं महत्ता की ओर इंगित करता है। अतः राज्य द्वारा व्यक्तियों के कार्य एवं आचरणों को अनुच्छेद 21 के उपबन्धों के अधीन नियंत्रित किया जाना चाहिए ताकि इसका उद्देश्य सफल हो सके।”

अरविन्द सिंह बग्गा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य122 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि यदि किसी व्यक्ति को पुलिस द्वारा अवैध रूप से गिरफ्तार करके प्रताड़ित किया जाता है, तो राज्य द्वारा दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन संस्थित किया जाना चाहिए तथा पीड़ित व्यक्ति को प्रतिकर दिलाया जाना चाहिए।

महाराष्ट्र राज्य बनाम रवीकांत पाटील123 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि विचाराधीन कैदी को हथकड़ी पहनाकर घुमाना मानवाधिकार के हनन के साथ-साथ अनुच्छेद 21 का भी घोर उल्लंघन है। अतः ऐसे प्रकरण में राज्य द्वारा, न कि दोषी पुलिस अधिकारियों द्वारा, पीड़ित व्यक्ति को प्रतिकर दिया जाना चाहिए भले ही संविधान में ‘प्रताड़ना’ (Torture) अभिव्यक्त रूप से प्रत्यादिष्ट (countermanded) न किया हो लेकिन अनुच्छेद 21 इसके विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है।

उपयुक्त निर्णयों से यह स्पष्ट होता है कि मानवाधिकार आयोग तथा न्यायपालिका, दोनों मिलकर मानवाधिकार को लागू कराने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। परंतु इसके बावजूद भी मानवाधिकार के उल्लंघन के मामलों में दिनोंदिन वृद्धि हो रही है जो चिंता का विषय है। विशेषतः बिहार, उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड राज्यों तथा नक्सलवादी क्षेत्रों में मानवाधिकार उल्लंघन एक आम बात है। अत: इन क्षेत्रों में मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु प्रभावी कदम उठाया जाना अत्यावश्यक है।

वर्तमान में अणु शस्त्रों के प्रयोग के कारण मानव जीवन के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। अतः मानव अधिकारों में शांतिपूर्ण जीवन यापन करने के अधिकार को भी समाविष्ट किया जाना परमावश्यक है ताकि मानव प्रजाति विनष्ट होने से बची रहे। इसी प्रकार प्रदूषण विहीन पर्यावरण भी मानव जीवन के लिये अनिवार्य है अतः इस पर नियंत्रण रखने हेतु प्रभावी उपाय किये जाने चाहिये। मानवाधिकारों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू किये जाने हेतु कतिपय सुझाव मानवाधिकारों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु सर्वप्रथम आवश्यकता यह है कि इसके बारे में जनमत तैयार किया जाए तथा लोगों में विशेषकर ग्रामीण अंचलों में इसके प्रति जागृति उत्पन्न करने के प्रयास किये जाने चाहिए।

119. आपराधिक रिट संख्या 585/1996 दिनांक 17 दिसंबर, 1997 को निर्णीत.

120. ए० आई० आर० 1997 सु० को० 610. 121. 1996 (38) डी० आर० जे० 203.

122. ए० आई० आर० 1995 सु० को० 117.

123. 1991 (2) एस० सी० सी० 373.

चाहिए। इस कार्य में दर संचार तथा प्रसार माध्यमों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। टेलीविजन, रेडियों, समाचार-पत्र आदि के द्वारा मानवाधिकार से संबंधित विषयों पर समुचित चर्चा की जा सकती है। शालाओं हाविद्यालयों में भी मानवाधिकार को एक स्वतंत्र विषय के रूप में पाठ्यक्रम में समाविष्ट किया जाये। इसी प्रकार पलिस और जेल प्रशिक्षण संस्थानों में मानवाधिकारों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध करायी जानी चाहिए ताकि मानवाधिकार उल्लंघन को नियंत्रित किया जा सके। इस हेतु राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पलिस विभाग के विभिन्न कर्मचारियों एवं अधिकारियों के लिए एक व्यापक त्रिस्तरीय पाठ्यक्रम तैयार किया है तथा इसे पुलिस अकादमियों में लागू किये जाने की अनुशंसा की है।

राजनेताओं और आपराधिक तत्वों में गहरी सांठ-गांठ के कारण मानवाधिकार के उल्लंघन के प्रकरणों में अत्यधिक वृद्धि हुई है। इस हेतु राजनेताओं के लिए एक आदर्श आचरण संहिता लागू की जाना अत्यावश्यक है। इस संदर्भ में यह आवश्यक हो गया है कि आपराधिक पृष्ठभूमि एवं रिकार्ड वाले व्यक्तियों को लोक प्रतिनिधि के रूप में चुनाव लड़ने से पूर्णत: अयोग्य घोषित किया जाए ताकि केवल स्वच्छ छबि वाले व्यक्ति ही राजनीति में प्रवेश पा सकें। यद्यपि भारत के चुनाव आयोग ने इस दिशा में अपनी ओर से सार्थक पहल करने का प्रयास किया है लेकिन राजनीतिक दलों की ओर से इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया के अभाव में स्थिति अभी भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। हाल ही में केन्द्र सरकार में अपराधी पृष्ठभूमि के दागी मंत्रियों को हटाये जाने हेतु विपक्ष द्वारा चलाया जा रहा राष्ट्रीय आंदोलन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है ।।24 

मानवाधिकारों के संरक्षण एवं संवर्धन में अशासकीय संस्थायें (NGO’s) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। सन् 1993 के मानवाधिकार पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने की दिशा में अशासकीय स्वयंसेवी संस्थाओं को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए तथा मानवाधिकार के उल्लंघन के मामलों को मानवाधिकार आयोग के समक्ष प्रस्तुत करने में हिचकिचाहट अनुभव नहीं करना चाहिए।

इस सन्दर्भ में यह उल्लेख करना आवश्यक प्रतीत होता है कि विगत दो वर्षों से आत्मघाती बम विस्फोट तथा आतंकवाद की निरन्तर बढती हुयी घटनाओं125 ने मानवाधिकार संरक्षण के क्षेत्र में जटिल समस्यायें उत्पन्न कर दी हैं। जहाँ एक ओर घोर आतंकवादी अपनी सुनियोजित गतिविधियों से चन्द मिनटों में असंख्य निर्दोष, निरपराध लोगों का नरसंहार कर देते हैं वहीं उन्हें हिरासत में लाने के प्रयास में पुलिस तथा सुरक्षा बलों से यह अपेक्षा की जाती है कि नियन्त्रण अभियान में किसी भी व्यक्ति के मानवाधिकार का उल्लंघन न हो। इससे आतंकवाद को रोकने तथा आतंकवादियों पर काबू पाने में व्यावहारिक कठिनाइयां उपस्थित होती हैं जिसका निवारण देश के समक्ष एक गम्भीर समस्या है।

उपर्युक्त सुझाव मानव अधिकार संबंधी विधिशास्त्र को नई दिशा देने में पर्याप्त रूप से सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

124. इस मुद्दे को लेकर सत्तापक्ष एवं विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाने के कारण सन् 2004 क स 04 के संसद के मानसून सत्र की समयावधि पूरी होने के पूर्व ही समापन कर दिया गया तथा रेल तथा आम बजट, दान दोनों ही बिना चर्चा के पारित करना पड़ा। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है।

125. सन् 2008 में बंगूलूरू, सूरत, अहमदाबाद, दिल्ली तथा मुम्बई में हुये बम विस्फोट सैकड़ों लोगों की जानें गयीं. अहमदाबाद, दिल्ली तथा मुम्बई में हुये बम विस्फोट एवं आतंकवादी हमला जिसमें सैंकड़ों लोगों की जाने गयी.

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