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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Notes

 

LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Notes:- This post is very important for LLB Study Material in Hindi for LLB Students. In this post of LLB 1st Year / 1st Semester Laws Notes, today you are going to read Jurisprudence & Legal Theory Section 5 Chapter 32 Study Material which is considered very important in Laws.

 

अध्याय 32 (Chapter 32)

भारतीय विधिशास्त्र के नये आयाम (New Trends in Indian Jurisprudence)

LLB Notes Study Material

मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ व्यक्ति के कार्य-कलापों में भी उल्लेखनीय अभिवृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक जटिलताओं का प्रादुर्भाव हुआ। उन समस्याओं को सुलझाने हेतु राज्य द्वारा विधि का प्रयोग किया जाने लगा। इसीलिए सामण्ड ने विधि को मानव आचरण को नियंत्रित करने वाला साधन निरूपित किया है। मानव को अपने संव्यवहारों के औचित्य या अनौचित्य का निर्धारण करने के लिए विधि की जानकारी होना आवश्यक है। यही कारण है कि वर्तमान जीवन की सामाजिक जटिलताओं से जूझने के लिए जनसाधारण को विभिन्न कानूनों की जानकारी कराना राज्य का परम कर्त्तव्य है। भारत में कानून (विधि) की स्थिति

वर्तमान समय में विधि को सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है। यह कार्य मुख्यतः विधायन द्वारा नियोजित होता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह सर्वविदित है कि धनी और धनहीनों के बीच की खाई अभी भी बढ़ती जा रही है यद्यपि इसे विभिन्न कानूनों द्वारा पाटने के भरसक प्रयास किये जा रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 39 (ख) के नीति-निर्देशक तत्व द्वारा राज्य से यह अपेक्षित है कि वह गरीबों तथा साधनहीनों के शोषण तथा दमन के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करे तथा भौतिक साधनों का साम्यिक वितरण सुनिश्चित करें ताकि जनसाधारण के हितों में संवर्धन हो सके। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु राज्य द्वारा अनेक सामाजिक एवं आर्थिक कानून पारित किये गए जो देश की बदलती हुई सामाजिक परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए राष्ट्रीय विकास की ओर लक्षित हैं।

ज्ञातव्य है कि उपर्युक्त प्रयासों के बावजूद भारतीय समाज आज भी अनेक गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है जिनमें गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ापन, साम्प्रदायिकता, राजनीतिक दुराचरण, आतंकवाद आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। निरन्तर बढ़ती हुई भौतिकवादी प्रवृत्ति, शिक्षा के बाजारीकरण तथा राष्ट्रीय चरित्र के हास के कारण प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थ एवं धन-लोलुपता में लिप्त है। अत: ऐसी परिस्थिति में विधि और विधायन का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि केवल इनके माध्यम से ही समाज के विभिन्न घटकों के हितों में टकराव की स्थिति का निवारण करते हुए इनमें सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। यहाँ यह उल्लेख कर देना भी आवश्यक है कि केवल कानून पारित कर देने मात्र से ही इन समस्याओं का निदान संभव नहीं है जब तक कि उन्हें प्रभावी ढंग से लागू किये जाने हेतु सार्थक प्रयास नहीं किये जाते। वर्तमान में भ्रष्टाचार निवारण, अस्पृश्यता निवारण, दहेज निषेध, बाल विवाह निषेध, बँधुआ मजदूरी उन्मूलन, मद्य निषेध आदि ऐसे अनेक कानून वर्षों से प्रचलित हैं लेकिन समाज में इनका उल्लंघन सरेआम हो रहा है जिसके कारण ये कानून केवल एक औपचारिकता मात्र बनकर रह गए हैं। संभवत: राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी इन कानूनों के प्रभावी ढंग से प्रवर्तन में मुख्य रुकावट है।

इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कृष्णा अय्यर ने अभिमत प्रकट किया है कि कानून तथा प्रणाली में आदर्शवादिता के बजाय नैतिकता को प्रथम स्थान दिया जाना चाहिए। नैतिकता व्यक्ति के सदाचार की ओर प्रेरित करती है जिससे उसे समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध होता है।

  1. उदाहरणार्थ, दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम 1986, दण्ड विधि (संशोधन) अधिनियम, 1983, मादक द्रव्य एवं मनः प्रभावी पदार्थ (संशोधन) अधिनियम, 1989, कम्पनी (संशोधन) अधिनियम, 2002, पंचायती राज्य अधिनियम, 1993, उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993. माध्यस्थम अधिनियम, 1996, किशोर न्याय (बालका संरक्षण और देखरेख) अधिनियम, 2000, महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम 2005, मातावरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 आदि.

भारत में न्यायपालिका की सर्वोच्चता (Supremacy of Judiciary in India)

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को भारतीय संविधान का एक मूल आधार (basic structure) माना गया है। संविधान के मूल ढांचे के आधार स्तम्भ अपरिवर्त्य (immutable) होने के कारण उनका निबंधन संविधानिक अधिदेशों (mandates) के अनुरूप किया जाना आवश्यक होता है। अत: न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि न्यायाधीश संविधान की नीतियों से हटकर विधि की व्याख्या करने के लिये स्वतन्त्र है। प्रत्येक स्थिति में संविधानिक नीतियों के अनुरूप निर्णय देना उनका परम कर्तव्य है। चूंकि न्यायाधीशों की सत्यनिष्ठा, ईमानदारी और सद्चरित्रता ही न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का आधार-स्तम्भ है, इसलिये न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है कि वे न्याय-निर्णय में निष्पक्षता, निर्भीकता तथा पारदर्शिता बरतें और किसी प्रकार के राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक प्रलोभन से मुक्त रहें। उन्हें अपने निर्णयों के परिणामों को ध्यान में रखते हुये न्याय-दान करना चाहिये ताकि किसी के प्रति भी वह अन्यायपूर्ण न हो लोकनीति के अनुकूल हों। विशेषतः न्यायाधीशों को स्वतः की सस्ती लोकप्रियता तथा अनावश्यक साहसिकता (Undue adventurism) से बचना चाहिये ताकि समाज में उनकी प्रतिष्ठा बनी रहे। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सबसे अहम बात यह है कि न्यायपालिका के सदस्यों को भ्रष्टाचार रूपी दानव (monster of corruption) से स्वयं को दूर रखना नितान्त आवश्यक है जिसने भारतीय लोकतन्त्र को खोखला करके विश्व में लज्जा-पात्र बना दिया है। 

न्यायपालिका के लिये यह परम आवश्यक है कि वह अपनी गरिमा और स्वतन्त्रता सतत् बनाये रखे ताकि लोगों का न्यायालयों के प्रति विश्वास बना रहे और यह तभी सम्भव है जब न्यायाधीशगण स्वयं को सभी प्रलोभनों से पूर्णतः मुक्त रखें।

भारत का संविधान-एक सामाजिक दस्तावेज (Constitution of India–A Social Document)

जन सामान्य की आकांक्षाओं के कार्य रूप में परिणित करने की दृष्टि विधि को एक सशक्त माध्यम या साधन माना जाता है। अतः उसकी पवित्रता और महत्व को बनाये रखने के लिये सभी भारतीयों को दढसंकल्पित रहना चाहिये। संविधान को सामाजिक दस्तावेज इसलिये कहा गया है क्योंकि इसमें उन सभी बातों का समावेश है जो एक स्वस्थ एवं विकासशील समाज के लिये आवश्यक होती हैं जैसे विधि की सर्वोपरिता (Supremacy of Law), सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, प्रजातान्त्रिक व्यवस्था आदि। संविधान के भाग-III में नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकार स्वतन्त्र एवं प्रजातान्त्रिक समाज को सुनिश्चित करते हैं। इन अधिकारों को मौलिक इसलिये कहा गया है क्योंकि राज्य के तीनों अंगों, अर्थात, कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका द्वारा इनका उल्लंघन किये जाने पर नागरिकों को इनके विरुद्ध सांविधानिक संरक्षण प्राप्त हैं। अपने अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों द्वारा उच्चतम न्यायालय ने मौलिक अधिकारों की सर्वोपरिता को मान्यता प्रदान की है।

संविधान के भाग-IV में वर्णित नीति निदेशक सिद्धान्त राज्य को निर्देशित करते हैं कि वह राज्य उपाय करे जिससे लोक कल्याण सुनिश्चित हो। संविधान में विधिसम्मत शासन (Rule of law) को विशेष महत्व दिया गया है तथा लोगों के वैयक्तिक अधिकारों तथा विधिक उत्तरदायित्व में समचित सन्तलन बना रहे।

संविधानिक विधि के सन्दर्भ में यह उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि भारत जैसे विशाल देश में केवल अधिनियमों तथा संविधियों को पारित किए जाने मात्र से सामाजिक सुधारों की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा जब तक कि इन विधियों के पारित किये जाने के पूर्व आवश्यक जनमा संग्रहीत नहीं कर लिया जाता। विधि निर्माण की प्रक्रिया के साथ-साथ विधि के क्रियात्मक पहलू पर भी उचित ध्यान दिया जाना

  • केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य, ए० आई० आर० 1973 सु० को० 1461; मेनका गांधी बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1978 सु० को० 759; उन्नीकृष्णन बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1993 सु० को० 2178 आदि.

आवश्यक होता है क्योंकि किसी भी विधि की सफलता उसे प्राप्त जनाधार पर निर्भर करती है। सामान्यतः । देखा गया है कि विधि निर्माता, अर्थात् संसद या विधान मण्डल कोई विधि पारित करते समय जनता से उसके समर्थन और अनुपालन की जो अपेक्षा करते हैं, वास्तव में वैसा होता नहीं है क्योंकि समाज से उसे अपेक्षित । प्रत्युत्तर (Response) नहीं मिलता है जिसके फलस्वरूप उस कानून को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाती है। राजनीतिक दलों के सदस्यों सम्बन्धी दल-बदल कानून, दहेज प्रतिषेध कानून, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण कानून, आरक्षण सम्बन्धी कानून आदि इसके उदाहरण हैं। इन कानूनों के वर्षों से प्रचलित होने के बावजूद ये अपराध प्रायः घटित होते रहते हैं क्योंकि जनता को इनके प्रति विशेष आस्था नहीं है। अत: यह परम आवश्यक है कि किसी भी विधान या विधि के पारित करने के पूर्व विधायिका को समाज की वास्तविकताओं तथा जनता की सम्भावित प्रतिक्रिया की और अवश्य ध्यान देना चाहिये।

इस सन्दर्भ में न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने कहा है कि “हम अपनी पुरानी विधायनी गरिमा को तब तक पुनः प्राप्त नहीं कर सकते जब तक कि हमारी वर्तमान प्रणाली में नैतिकता को महत्व नहीं जाता है।” किसी भी विधि में नैतिकता का तत्व उस विधि को बल प्रदान करता है। यदि हम कर अपवंचको का कालाधन उजागर करने पर छुट देते रहेंगे तो इससे ईमानदार करदाता पर अवांछित भार पड़ेगा तथा उसे हताशा हागा, जो विधिक दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है। ए० आर० अन्तले बनाम भारत संघ के प्रकरण में भी अपीलों, प्रति अपीलों, याचिकाओं तथा पुनर्विलोकन पिटीशनों के कारण भ्रष्टाचार का अपराध दबा दिया गया जो उचित नहा कहा जा सकता है।

तथापि भारत की वर्तमान सामयिक परिस्थितियों तथा सामाजिक परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए भारतीय विधि-क्षेत्र में भी अनेक जनकल्याणकारी प्रगतिशील कदम उठाये गये हैं जिनमें (1) विधिक साक्षरता; (2) निर्धनों को निःशुल्क विधिक सहायता; (3) लोक अदालतें; तथा (4) लोकहित-वादों की पद्धति विशेष उल्लेखनीय हैं। इनके द्वारा जनसाधारण को सामाजिक न्याय दिलाने में सुविधा हुई है तथा वितरणात्मक न्याय (distributive justice) की कल्पना का क्रियान्वयन संभव हो सका है।

विधिक साक्षरता (Legal Literacy)

वर्तमान समय में प्रायः सभी विकसित देशों ने विधिक साक्षरता द्वारा कानूनी शिक्षा को जन-साधारण तक पहुँचाने में पर्याप्त सफलता प्राप्त कर ली है। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। उचित कानूनी जानकारी के अभाव में अशिक्षित वर्ग, विशेषतः ग्रामीण अंचलों के निवासी अपनी छोटी-मोटी समस्याओं के लिये वकीलों के चंगुल में फँस जाते हैं। भारत जैसे गरीब देश में न्यायिक प्रक्रिया महँगी और दीर्घकालीन होने के कारण सामान्य व्यक्ति को न्याय प्राप्त करना दुर्लभ होता है। विशेषत: ग्रामीण क्षेत्रों में कानूनी-परामर्श उपलब्ध होना कठिन होता है। अत: आज इस बात की आवश्यकता है कि कानूनी शिक्षा के प्रचार और प्रसार के द्वारा विधिक साक्षरता (Legal literacy) के अभियान को सार्थक बनाया जाये।

( जन-साधारण तथा ग्रामीण क्षेत्रों के निवासियों को उनके सामान्य हितों के बारे में जानकारी दिलाने तथा तत्सम्बन्धी कानून का ज्ञान कराने के लिए वर्तमान में विधिक साक्षरता को विशेष महत्व दिया जा रहा है। इस अभियान में अधिवक्ताओं, विधि के प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं की मिली-जुली “कानूनी-ज्ञान प्रसारण समितियाँ” गठित की जानी चाहिये जो सुदूरवर्ती ग्रामीण अंचलों में जाकर वहाँ के निवासियों को उनके दैनिक संव्यवहारों से सम्बन्धित मूलभूत कानूनों के विषय में जानकारी उपलब्ध कराये तथा उनके मामलों तथा समस्याओं को आपसी बातचीत द्वारा निपटाने का प्रयत्न करें। विधिक साक्षरता का

3. देखें, आर० के० गर्ग बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1981 सु० को० 2138; इसे बियरर बाण्ड केस भी कहा गया है.

4. (1988) 2 एस० सी० सी० 602.

कार्यक्रम ठीक उसी प्रकार चलाया जाना चाहिये जिस प्रकार प्रौढ़-शिक्षा (Adult Education) का कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस योजना से कानून के विद्यार्थियों को विधि का व्यावहारिक प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा, जो वकालत के व्यवसाय में उनके लिए लाभकारी सिद्ध होगा।

उल्लेखनीय है कि भारतीय विधि तथा विधि-शिक्षा मूलतः इंग्लिश-विधि पर आधारित है। यह रूढ़िवादी पद्धति बदलती हुई परिस्थितियों में अपना महत्व खो चुकी है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि विधि-पाठ्यक्रमों में आवश्यक संशोधन किये जायें ताकि वे अधिक उपयोगी और प्रभावी बन सकें। उदाहरणार्थ, अनेक विश्वविद्यालयों ने अपने विधि-पाठ्यक्रमों में जनसंख्या नियंत्रण, पर्यावरण विधि, विधिक-सहायता, पैरा-लीगल सेवाएं, उपभोक्ता विधि, मानवाधिकार, सहकारिता आदि सम्बन्धी कानूनों को समाविष्ट किया है। वर्तमान में विधि के समाजीकरण पर विशेष बल दिया जाना चाहिये ताकि कानूनी शिक्षा अधिक उपयुक्त एवं व्यावहारिक हो सके।

विधिक-साक्षरता के प्रसार एवं प्रचार के लिए तत्सम्बन्धी आवश्यक साहित्य उपलब्ध होना नितांत आवश्यक है। कुछ विश्वविद्यालयों द्वारा कानूनी साक्षरता विषयक अनेक पुस्तिकायें तथा पत्रिकायें प्रकाशित की जा रही हैं, जिन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में वितरित करके जनता में कानूनों के प्रति जागरूकता तथा रुचि उत्पन्न की जा रही है।

निःशुल्क कानूनी सहायता

सभी को न्याय का समान अवसर उपलब्ध कराना न्यायिक प्रशासन का मूलभूत सिद्धान्त है। प्रत्येक कल्याणकारी राज्य का यह परम कर्त्तव्य है कि वह जाति-पाँति तथा धार्मिक, सामाजिक या आर्थिक भेदभाव के बिना सभी नागरिकों को समुचित न्याय उपलब्ध कराये। भारत-जैसे विकासशील देश में जहाँ अधिकांश जनता निर्धन, साधनहीन और गरीब है, सभी को समान न्याय दिलाना तभी सम्भव है जब आपराधिक एवं सिविल मामलों में विवादियों को समुचित कानूनी सहायता उपलब्ध हो। यदि व्यक्ति को अपने अधिकारों को प्रवर्तित कराने या समुचित प्रतिरक्षा का पर्याप्त अवसर उपलब्ध न हो, तो ऐसी न्याय-व्यवस्था भेदभावपूर्ण होगी जो सम-न्याय के सिद्धान्त के प्रतिकूल है।

कानूनी सहायता का अर्थ

कानूनी सहायता का अर्थ यह है कि सीमित साधन वाले व्यक्तियों को नि:शुल्क अथवा नाममात्र की फीस पर विधिक सलाह या विधिक सहायता उपलब्ध कराई जाये। यद्यपि कानूनी सलाह और कानूनी सहायता एक दूसरे के पूरक हैं, परन्तु दोनों एक-दूसरे से पूर्णत: भिन्न हैं। विधिक सहायता से आशय किसी न्यायालय या अधिकरण की कार्यवाही में पक्षकार की नि:शुल्क या नाममात्र की फीस लेकर सहायता करना है जबकि विधिक-सलाह में उपचारात्मक तथा निवारणात्मक, दोनों उपायों का समावेश है।

कानूनी सहायता की संकल्पना का उद्भव

अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर कानूनी सहायता का उदय विख्यात ऐतिहासिक प्रलेख मेग्नाकार्टा (Magnacarta) से माना जाता है। तथापि पश्चात्वर्ती सामाजिक प्रगति तथा आर्थिक विकास के साथ-साथ अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं का प्रादुर्भाव हुआ। समाज के कमजोर वर्गों के लिए अनेक लाभकारी योजनायें राज्य द्वारा चलाई गईं। न्यायिक क्षेत्र में विधिक-सलाह तथा विधिक सहायता की योजना भी गरीबों तथा कमजोर वर्गों के लोगों को सुलभ न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लागू की गई हैं।

निर्धनों को उचित विधिक सहायता दिये जाने के सम्बन्ध में प्रस्ताव सर्वप्रथम संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में तेहरान में सन् 1968 के आयोजित मानव अधिकार सम्मेलन (Human Rights Conference) में पारित हुआ। इस प्रस्ताव में यह स्वीकार किया गया कि समाज के निर्धन तथा गरीब वर्गों के लोगों के मानव

5. Article 40 Magna Carta (1215).

अधिकारों तथा मूलभूत स्वतंत्रताओं की संरक्षा के लिए विधिक सलाह तथा विधिक सहायता उपलब्ध कराना राज्य का दायित्व है और इस हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा राज्यों को आवश्यक आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए।

मानव के सिविल तथा राजनीतिक अधिकारों सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा (International Covenant on Civil & Political Rights) के अनुच्छेद 14 (3) में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसन्द की विधिक सहायता द्वारा स्वयं की प्रतिरक्षा का अधिकार दिया गया है।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी सहायता

का राष्ट्रसंघ के उपर्युक्त प्रयासों से प्रेरित होकर अनेक विकसित पाश्चात्य देशों ने ऐसे अभियुक्तों को, जो अपनी दरिद्रता तथा आर्थिक कठिनाइयों के कारण स्वयं का प्रतिवाद करने में असमर्थ थे, राज्य के खर्चे पर कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की योजना क्रियान्वित की। इस हेतु एक अन्तर्राष्ट्रीय कानूनी सहायता परिषद् (The International Legal Aid Association) का गठन किया गया, जो इस दिशा में सराहनीय कार्य कर रही है।

अन्तर्राष्ट्रीय कानूनी सहायता की योजना से प्रेरित होकर अनेक यूरोपीय देशों ने स्थानीय वकीलों, समाजसेवकों तथा प्राधिकारियों के सहयोग से मोबाइल लीगल एण्ड क्लीनिक्स (Mobile Legal Aid Clinics) स्थापित किये। क्लीनिकों के सदस्य गरजमन्द पक्षकारों से सम्पर्क साधकर उनके आपसी विवादों को सद्भाव और समझौते द्वारा निपटाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार समस्या का समाधान मानवीय आधार पर किया जाता है। इन क्लीनिकों द्वारा बन्दीगृहों, बोटलों तथा सुधारगृहों आदि में जाकर गरीब, निर्धन एवं साधनहीन व्यक्तियों का पता लगाकर उन्हें उनके अधिकारों एवं सम्भावित उपचारों से अवगत कराया जाता है। इटली, स्वीडन, ब्राजील, अर्जेन्टाइना आदि जैसे अनेक उन्नत राष्ट्रों में कानूनी सलाह एवं सहायता योजना के अन्तर्गत मुकदमेबाजी के बजाय पारस्परिक समझौते एवं सुलह द्वारा मामलों को निपटाने पर बल दिया जाता है। इस हेतु इन देशों में समझौता-न्यायालय बोर्ड (Conciliation Courts) भी स्थापित किये गये हैं।

ब्रिटेन में निःशुल्क कानूनी सहायता

ब्रिटेन में निर्धनों को मुफ्त कानूनी सलाह एवं सहायता योजना सन् 1959 से प्रभावशील है। इस योजना के अन्तर्गत निर्धन पक्षकारों को वैधानिक रूप से गठित समितियों अथवा ब्यूरो द्वारा नि:शुल्क विधिक सहायता प्रदान की जाती है। इस दिशा में सन् 1944 की रशक्लिफ समिति (Rushcliffe Committee) ने सराहनीय कार्य किया है। निर्धनों के लिए विधिक सहायता का व्यय राज्य द्वारा वहन किया जाता है तथा इस योजना को विधि-व्यवसायियों के माध्यम से लागू किया जाता है।9

राज्य-स्तर पर काननी सलाह तथा सहायता के अतिरिक्त ब्रिटेन में अनेक विधि परिषदें (Law Societies) स्वैच्छिक रूप से गरीबों को कानूनी सहायता उपलब्ध करा रही हैं तथा यथासंभव न्यायालय के बाहर विवादों को पारस्परिक समझौते द्वारा निपटाने में मदद कर रही हैं।

अमेरिका में निःशुल्क कानूनी सहायता 

संयक्त राष्ट अमेरिका में अनेक समितियों द्वारा निर्धनों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध करायी जाने की व्यवस्था है। अमेरिका-जैसे विकसित एवं उन्नत राष्ट्र ने बहुत पहले से ही यह अनुभव किया था कि

6. Art. (8) of the Universal Declaration of Human Rights.

7. See also Articles 9, 10, 11 and 15 of the International Covenant of United Nations.

8. ब्रिटेन में निर्धनों के मुफ्त कानूनी सलाह एवं सहायता हेतु लीगल एड एण्ड एडवाइस एक्ट, 1948 तथा 1960 में पारित किये गये थे.

9. समिति ने अपनी रिपोर्ट 1954 में प्रस्तुत की.

किसी भी व्यक्ति को समान-न्याय से केवल इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता है कि वह आर्थिक अभाव एवं निर्धनता के कारण स्वयं का अधिकार प्रवर्तित कराने या प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है। अमेरिकन सुप्रीम कोर्ट ने पावेल बनाम अलबामा10 के वाद में अभिनिर्धारित किया कि मृत्युदण्ड से दण्डनीय प्रत्येक प्रकरण में अप्रतिवादित (undefended) अभियुक्त को राज्य के व्यय पर अधिवक्ता उपलब्ध कराया जाये ताकि उसे अपनी प्रतिरक्षा का उचित अवसर मिल सके। तत्पश्चात् निर्धनों की विधिक सहायता हेतु निम्नलिखित प्रकार के विधिक सलाहकार उपलब्ध कराने की योजना लागू की गई-

(1) मुफ्त कानूनी सहायता हेतु राज्य द्वारा उचित मानदेय पर नियुक्त वकील।  

(2) सरकारी अथवा सार्वजनिक अधिवक्ता, जो स्वैच्छिक वेतन के आधार पर नियुक्त किये जाते काम

(3) निजी अथवा प्राइवेट वकील, जो स्वैच्छिक कानूनी संगठनों द्वारा निर्धनों की सहायता हेतु नियुक्त किये जाते हैं।

(4) मिश्रित व्यवस्था, अर्थात् सार्वजनिक एवं निजी रूप से नियुक्त वकील, जिनके वेतन या पारिश्रमिक का भुगतान राज्य द्वारा किया जाता है।

सन् 1945 के लगभग अमेरिका में ‘नेशनल लीगल एड एण्ड डिफेन्डर एसोसिएशन’ द्वारा निर्धनों को दीवानी तथा आपराधिक प्रकरणों में कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की विस्तृत योजना बनाई गई। बाद में विधिक सहायता एजेन्सियों ने इस कार्यक्रम को विश्वविद्यालय के विधि-छात्रों एवं प्राध्यापकों के सहयोग से आगे बढ़ाया तथा आज पूरे देश में यह पद्धति पूर्णत: स्थापित हो चुकी है।

अन्य देशों में विधिक सहायता

वर्तमान में मुफ्त कानूनी सहायता अन्य देशों में भी लोकप्रिय हुई है। आस्ट्रेलिया में यह योजना सुनियोजित ढंग से लागू है।

जापान में भी आर्थिक दृष्टि से कमजोर तथा निर्धन अभियुक्तों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध करायी जाती है11 ताकि वे अपनी प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित न रह जायें।

निर्धनों एवं गरीबों के लिए नि:शुल्क कानूनी सलाह तथा सहायता की योजना श्रीलंका, चीन, मलेशिया आदि एशियायी देशों में भी लागू है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य यह है कि निर्धनों को उनके विधिक अधिकारों से वंचित न रखा जाये।

भारत में निःशुल्क कानूनी सलाह व सहायता

ब्रिटिश भारत में निर्धनों एवं गरीबों के लिए नि:शुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। यद्यपि कलकत्ता और बम्बई की कुछ निजी संस्थायें स्वैच्छिक रूप से गरीबों को निःशल्क कानूनी सहायता प्रदान करती थीं। सन् 1949 में बम्बई सरकार ने न्यायमूर्ति भगवती समिति की नियुक्ति की जिसे गरीबों तथा विकलांगों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता की योजना बनाने का कार्य सौंपा गया। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में निर्धनों तथा पिछड़े वर्गों के व्यक्तियों के लिए सिविल एवं आपराधिक प्रकरणों में नि:शल्क सहायता उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिये। समिति ने  सरकार का ध्यान इस ओर दिलाया कि इस सम्बन्ध में सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 33, नियम 1 के अकिंचन-वाद (Pauper suit) के प्रावधान अपर्याप्त हैं क्योंकि इसके अन्तर्गत निर्धन व्यक्ति को केवल कोर्ट-फीस देने से छूट मिलती है तथा मुकदमे में होने वाले व्ययों को उसे ही वहन करना पड़ता है जो उनकी सामर्थ्य के बाहर होता है। इसके अलावा

10. (1932) 287 US 45.

11. जापान का संविधान, अनु० 36.

अकिंचन (pauper) शब्द की परिभाषा इतनी संकुचित है कि इसका लाभ केवल कुछ सीमित व्यक्तियों को ही मिल पाता है।

बंगाल समिति

बंगाल में भी विधिक सहायता की योजना पर सुझाव देने हेतु 1949 में एक समिति नियुक्त की गयी। कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ऑर्थर हैरिज को इस समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। समिति ने अपनी रिपोर्ट सन् 1950 में प्रस्तुत की जिसके सारभत सझाव लगभग वही थे जो बम्बई-सामात न अपनी रिपोर्ट में दिये थे।

भारत सरकार ने सन् 1952 में राज्य सरकारों से पुनः अनुरोध किया कि वे ऐसे अभियुक्तों को, जिनके विरुद्ध पाँच वर्ष से अधिक अवधि से दण्डनीय अपराधों का अभियोग हो, विधिक सहायता उपलब्ध कराने हेत कानुन बनाएँ। इस सम्बन्ध में राज्य सरकारों की अरुचि को देखते हए केन्द्रीय सरकार ने सन् 1958 में इस हेतु पुनः निर्देश जारी किये।

विधिक सहायता सम्बन्धी विधि-आयोग की रिपोर्ट

भारत के विधि-आयोग ने सन् 1958 में प्रकाशित अपनी न्यायिक शासन में सुधार सम्बन्धी रिपोर्ट12 में कानूनी सहायता पर एक पृथक अध्याय रखा। इस रिपोर्ट में भारत के विभिन्न राज्यों में लागू की गई विधिक सहायता योजनाओं की समीक्षा करते हए इस योजना के विस्तार पर बल दिया गया तथा विधि-व्यवसायियों से इस दिशा में वास्तविक रुचि लेने की अपील की गई।

सन् 1959 में दिल्ली में आयोजित विधिशास्त्रियों के अन्तर्राष्ट्रीय आयोग (International Commission of Jurists) के सम्मेलन में न्यायिक तथा विधिक व्यवसायियों की समिति ने यह विचार व्यक्त किया कि विधिसम्मत शासन (Rule of Law) को यथार्थ रूप देने के लिए यह परम आवश्यक है कि राज्य द्वारा निर्धन एवं असहाय वर्ग के लोगों को उचित विधिक सहायता उपलब्ध करायी जाये।

सन् 1960 में केन्द्रीय सरकार ने विधिक सहायता की योजना की एक विस्तृत रूपरेखा तैयार की तथा उसे राज्यों को विचारार्थ भेजा। परन्तु सन् 1962 में राज्यों के विधि-मन्त्रियों के सम्मेलन में इस योजना में होने वाले आर्थिक व्यय का वहन करने में राज्यों ने अपनी असमर्थता व्यक्त की। तथापि केन्द्रीय सरकार ने स्वयं इस योजना को लागू करने का निर्णय लिया परन्तु दुर्भाग्यवश सन् 1962 में चीनी-आक्रमण के कारण इस योजना को लागू नहीं किया जा सका।

सन् 1962 के तृतीय अखिल भारतीय विधि सम्मेलन (Third All India Law Conference) में यह निर्णय दोहराया गया कि गरीबों को विधिक सहायता उपलब्ध कराना केन्द्र तथा राज्य सरकारों का नैतिक दायित्व है और इसके लिए उन्हें वित्तीय व्यवस्था करनी होगी। परन्तु आगामी सात-आठ वर्षों तक इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।

देश में द्रुतगति से हो रही सामाजिक, आर्थिक एवं औद्योगिक प्रगति के कारण मुकदमेबाजी में वृद्धि होना स्वाभाविक था, जिसके कारण निर्धनों को उचित विधिक सहायता के अभाव में न्याय प्राप्त करना कठिन होता जा रहा था। अतः इस समस्या के समाधान हेतु सन् 1970 में विधिक सहायता पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन (National Conference on Legal Aid) आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में विधिक सहायता से सम्बन्धित विभिन्न योजनाओं पर विचार किया गया।

तदुपरान्त, तत्कालीन संसद सदस्य श्री मधु लिमये द्वारा 13 मार्च, सन् 1970 को लोक सभा के पटल पर विधिक सहायता सम्बन्धी विधेयक रखा गया, परन्तु सरकार के समर्थन के अभाव में विधेयक नाम गया।

12. भारत के विधि-आयोग की चौदहवीं रिपोर्ट (ग्रन्थ 1, पृ० 587).

सन् 1971 में गुजरात राज्य द्वारा गुजरात उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश माननीय पी० एन० भगवती की अध्यक्षता में विधिक सहायता पर एक समिति गठित की गई, जिसे निर्धनों तथा साधनहीन व्यक्तियों को दाण्डिक, सिविल, राजस्व, श्रम तथा अन्य कार्यवाहियों में विधिक सहायता अनुदत्त कराने हेतु योजना बनाने का दायित्व सौंपा गया।13 समिति ने इस विषय पर एक विस्तृत योजना तैयार की तथा यह विचार व्यक्त किया कि निर्धन तथा अकिंचनों को विधिक सहायता प्रदान करना राज्यों का केवल सामाजिक दायित्व ही नहीं है अपितु संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 22 (1) के अन्तर्गत यह उनका संवैधानिक कर्त्तव्य भी है।

इस समिति ने अपनी सिफारिश में यह स्पष्ट किया कि निःशुल्क विधिक सहायता प्राप्त करने हेतु किन व्यक्तियों को पात्रता होनी चाहिये। समिति का स्पष्ट मत था कि इसके लिए वर्ग या हैसियत का मापदण्ड न अपनाया जाकर ‘आर्थिक साधन की कसौटी’ को आधार माना जाना चाहिये, अर्थात् गरीबों और पिछड़े वर्ग के लोगों को नि:शुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध करायी जानी चाहिये। इस हेतु तहसील और जिला-स्तर पर विधिक सहायता समितियों का गठन किये जाने की अनुशंसा भी समिति ने अपने रिपोर्ट में की। समिति के विचार में विधिक सहायता के अन्तर्गत तीन मदों, अर्थात् विधिक सहायता, विधिक सलाह तथा उपचारात्मक सेवा का समावेश किया जाना चाहिये। इस योजना के क्रियान्वयन हेतु आवश्यक निधि (funds) की व्यवस्था राज्य तथा स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किया जाना प्रस्तावित था। परन्तु इतना सब कुछ किये जाने पर भी गुजरात राज्य में इस दिशा में विशेष प्रगति नहीं हुई है।

केन्द्रीय सरकार समिति, 1972

जन-साधारण में विधिक सलाह तथा सहायता के कार्यक्रम के प्रति रुचि एवं जागरूकता उत्पन्न करने की दिशा में केन्द्रीय सरकार द्वारा सन् 1972 में एक बार पुनः प्रयास किया गया। भारत सरकार ने 27 अक्टूबर, 1972 को न्यायमूर्ति वी० आर० कृष्णा अय्यर की अध्यक्षता में विधिक सहायता पर विचार करने हेतु एक विशेषज्ञ समिति (Expert Committee on Legal Aid) नियुक्त की। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट मई, 1973 में प्रेषित की जिसे ‘प्रोसेसुएल जस्टिस टू दी पीपुल’ शीर्षक दिया गया। विधिक-सहायता के क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है जिसमें इस बात पर बल दिया गया कि न्याय-दान के साधन के रूप में विधिक सहायता को एक सामाजिक आवश्यकता मानते हुए स्वीकार किया जाना चाहिये। निर्धनों और आवश्यकताग्रस्त लोगों को विधिक सहायता द्वारा न्याय सुलभ कराना राज्य का सामाजिक एवं वैधानिक दायित्व है जिससे समता तथा सामाजिक न्याय के सिद्धान्त को यथार्थ रूप में व्यावहारिक रूप दिया जा सके। समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि विधिक सहायता को विधि-प्रणाली का एक अभिन्न अंग माना जाना चाहिये। समिति ने इस ओर भी संकेत किया कि विधिक सहायता से सम्बन्धित अनेक प्रविष्टियाँ14 संविधान की संघ-सूची, राज्य सूची में समवर्ती सूची में समाविष्ट हैं।

समिति ने सुझाव दिया कि जिन व्यक्तियों को विधिक सहायता का लाभ मिलना चाहिये उनमें ग्रामीण, कृषक, मजदूर, औद्योगिक श्रमिक एवं कर्मकार, बच्चे तथा महिलायें, हरिजन, अवयस्क बन्दी तथा भौगोलिक दृष्टि से वंचित पिछड़े वर्ग के लोगों का समावेश किया जाना चाहिए। समिति ने सैनिक न्यायालयों तथा अधिकरणों में चल रही कार्यवाहियों के लिए भी आरोपित व्यक्ति को विधिक सहायता उपलब्ध कराने की अनुशंसा की। इस संबंध में एक व्यापक कानून पारित किये जाने की आवश्यकता भी समिति ने प्रतिपादित की।

तत्पश्चात सन 1975 में राज्यों के विधि-मंत्रियों के सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि प्रत्येक राज्य गरीबों को मुफ्त कानूनी सलाह एवं सहायता दिये जाने के विषय में अपनी योजना तैयार करके विधि मंत्रालय

13. The Report of the Legal Aid Committee, Gujarat, 1971, p. (iii), para 3.

14. संघ सूची की प्रविष्टियाँ 77 व 78; समवर्ती सूची की प्रविष्टियाँ, 2, 13, 20, 23, 24 तथा 26 तथा राज्य-सूची की

प्रविष्टि 3.

को भेजे।परन्तु राज्यों ने इसमें विशेष रुचि नहीं दर्शाई तथा केवल कुछ ही राज्यों ने इस सम्बन्ध में राज्य-स्तर पर कानून पारित किये।

भारत के संविधान में विधिक सहायता सम्बन्धी उपबन्ध

भारत के संविधान के आमुख (Preamble) में सम-न्याय सम्बन्धी उपबन्ध हैं तथा अनुच्छेद 14 में वा के अधिकार का प्रावधान यह दर्शाता है कि संविधान इस बात को सुनिश्चित करता है कि विधि के समभ सभी समान हैं तथा विधि के अन्तर्गत सभी को समान संरक्षण प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 22 (1) में

पबन्धित है कि बन्दी बनाये गये व्यक्ति को उसकी इच्छानुसार विधि-व्यवसायी से परामर्श तथा पहायता लेने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकेगा।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 38 में यह उल्लेख है कि लोक कल्याण हेतु राज्य ऐसी व्यवस्था जायेगा जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्रमाणित कर सके।

संविधान प्रभावशील होने के पश्चात् यह अनुभव किया गया कि अनुच्छेद 38 में निहित निर्देश तथा अनच्छेद 14 एवं 22 (1) में समता और प्रतिरक्षा के अधिकार को वास्तविक अर्थों में प्रभावी बनाने के लिए समाज के धनी एवं गरीब, सभी वर्गों को वाद लाने या अपनी प्रतिरक्षा करने के अधिकार का यथेष्ट अवसर मिलना चाहिये। अतः इस लक्ष्य को प्राप्त करने के उद्देश्य से सन् 1976 में संविधान में बयालीसवें संशोधन द्वारा गरीबों को नि:शुल्क कानूनी सहायता विषयक एक नया उपबन्ध अनुच्छेद 39-क के रूप में जोड़ा गया, जिसमें यह निर्देश है कि-

“अनुच्छेद 39-क-राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि कानूनी व्यवस्था इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो, और विशिष्टतया यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी विषमता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित रह जाये, उपर्युक्त विधान या योजना द्वारा या अन्य प्रकार से नि:शुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था करेगा।”

 

इस प्रकार उपर्युक्त उपबंध आर्थिक रूप से पिछड़े हुये वर्ग को निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करने की व्यवस्था करता है।

उल्लेखनीय है कि विगत तीन दशकों में साधनहीनों के लिए नि:शुल्क कानूनी सहायता प्रदान करने की अनेक योजनाएँ बनाई गईं। निर्धन, विकलांग एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए नि:शुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए बार-एसोसिएशन, न्यायालय तथा विधान मण्डल और विभिन्न विश्वविद्यालयों के विधि-संकाय सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। साधनहीनों को मुफ्त कानूनी सहायता देने के लिए लीगल एड क्लीनिक्स आज प्रायः सभी छोटे-बड़े शहरों, नगरों तथा उपनगरों में स्थापित हो चुके

निःशुल्क कानूनी सहायता में उच्चतम न्यायालय की भूमिका

निधनों एवं साधनहीनों को नि:शुल्क कानूनी सहायता दिलाने में उच्चतम न्यायालय का योगदान नाय रहा है। उच्चतम न्यायालय के नियमों के अनुसार मृत्युदण्ड से दण्डनीय सभी प्रकरणों में राक्षत (undefended) अभियक्त के लिए विधिक सहायता के रूप में अधिवक्ता की सेवाएँ अनिवार्य रूप उपलब्ध कराई जाती हैं। इसके अतिरिक्त, उच्चतम न्यायालय के बार के सदस्य भी निर्धन एवं साधनहीन या को उनके अधिकार दिलाने या बचाव करने हेतु कानूनी सहायता देते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने अपने विभिन्न विनिश्चयों में भी संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (जी), 21 तथा नवचन इस प्रकार किया है कि जिससे विधिक सलाह और सहायता के प्रति लोगों में चेतना उत्पन्न वहस्काट बनाम महाराष्ट्र राज्य15 में उच्चतम न्यायालय ने बन्दियों को विधिक सहायता दिये हो। माधव हस्काट बनाम

15. ए० आई० आर० 1978 सु० को 1548.

जाने हेतु निम्नलिखित कल्याणकारी निर्देश दिये हैं जिन्हें ऐसे नागरिकों के प्रति लागू किया जाना अपेक्षित है जिनके जीवन या वैयक्तिक स्वाधीनता को गम्भीर खतरा उत्पन्न हुआ हो

(1) कारावास की सजा से दण्डित व्यक्ति को दण्डादेश देते समय न्यायालय के निर्णय की प्रति मुफ्त दी जानी चाहिए।

(2) बन्दी द्वारा अपील या पुनरीक्षण दायर की जाने की स्थिति में जेल प्रशासन द्वारा उसे आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करायी जानी चाहिये।

(3) यदि अभियुक्त साधनहीन या अकिंचन है, तो न्यायालय उसे प्रतिरक्षा हेतु वकील की सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध करायेगा।  

(4) राज्य द्वारा साधनहीन अभियुक्त के लिए नियुक्त वकील को उचित फीस दी जानी चाहिये।

हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य16 तथा कद्र फाडिया बनाम बिहार राज्य17 के प्रकरणों में भी उच्चतम न्यायालय ने यह अभिमत व्यक्त किया कि आपराधिक मामलों में नि:शुल्क विधिक सहायता संविधान के अनुच्छेद 21 में विवक्षित एक मूलभूत अधिकार है। भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 110 के अन्तर्गत भी मजिस्ट्रेट का यह दायित्व है कि बन्दी को प्रतिरक्षा की सुविधा उपलब्ध करना संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुपालन में होगा।18

खत्री बनाम बिहार राज्य19 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अभियुक्त को विधिक सहायता उसी समय से उपलब्ध करायी जानी चाहिये जब वह प्रथम बार मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाता है। अभियुक्त के प्रकरण में विचारण कर रहे मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायाधीश का यह दायित्व है कि वह अभियुक्त को इस बात से सूचित करे कि यदि वह साधनहीनता या अकिंचनता के कारण अपने बचाव के लिए किसी अधिवक्ता की सेवाएँ प्राप्त करने में असमर्थ है, तो वह राज्य से निःशुल्क विधिक सहायता प्राप्त कर सकता है।

सेन्टर ऑफ लीगल रिसर्च बनाम केरल राज्य20 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 39-क का उद्देश्य साध्य करने के लिए राज्यों को चाहिये कि वे निजी स्वयंसेवी संस्थाओं को प्रोत्साहन दें क्योंकि विधिक सहायता के कार्यक्रम का अन्तिम लक्ष्य सामाजिक न्याय स्थापित करना है तथा इसमें जनता का सक्रिय योगदान आवश्यक है।

डी० के० त्रिवेदी बनाम भारत संघ21 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने निःशुल्क विधिक सहायता के संबंध में महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए अभिकथन किया कि इस योजना को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित करने के लिए राज्य द्वारा स्वैच्छिक संगठनों को आगे आने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिए तथा उन्हें आवश्यक वित्तीय सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। इन स्वैच्छिक जन-सेवी संस्थाओं को राज्य के नियंत्रण से पूर्णत: मुक्त रखा जाना चाहिए।

भारत के अन्य राज्यों में निःशुल्क कानूनी सहायता

अब तक भारत के विभिन्न राज्यों ने साधनहीन तथा निर्धन व्यक्तियों के लिए निःशुल्क विधिक सहायता की योजना लाग की है। मध्य प्रदेश में इस योजना को सन् 1976 में कानूनी प्रारूप दिया गया। इस राज्य ने “मध्य प्रदेश समाज के कमजोर वर्गों के लिए विधिक सहायता तथा विधिक सलाह अधिनियम, 1976”

16. ए० आई० आर० 1979 सु० को० 1360.

17. ए० आई० आर० 1981 सु० को० 939.

18.गोपालाचारी बनाम केरल राज्य, ए० आई० आर० 1981 स० को0 678.

19. ए० आई० आर० 1981 सु० को० 928.

20. ए० आई० आर० 1986 सु० को० 1322.

21. ए० आई० आर० 1987 सु० को० 1323.

पारित करके उसे प्रथम चरण में पन्द्रह जिलों में 6 मई, 1976 से लागू किया जिनमें जनजाति के सदस्यों की अधिकता से थी। बाद में इसे 15 अगस्त, 1976 से मध्य प्रदेश के शेष सभी जिलों में लागू किया गया। पर्यत अधिनियम में मध्य प्रदेश के लिए कानूनी सहायता तथा सलाहकार-बोर्ड की स्थापना करने का भान है, जिसका मुख्यालय भोपाल में स्थित है। इसमें कानूनी सहायता तथा कानूनी सलाह समितियाँ जिला एवं तहसील स्तर पर स्थापित किये जाने का प्रावधान है।

मध्य प्रदेश विधिक सहायता एवं विधिक सलाह अधिनियम, 1976 की धारा 33 के अनुसार निम्नलिखित व्यक्ति कानूनी सहायता प्राप्त करने की पात्रता रखते हैं(

(1) 200 रुपये मासिक आय से कम वाले परिवार के सदस्य,

(2) भूमिहीन कृषक मजदूर,

(3) ग्रामीण शिल्पी जैसे-लुहार, बढ़ई, कुम्हार,

(4) जिस परिवार में एक हेक्टेयर सिंचित भूमि या दो हेक्टेयर असिंचित भूमि से अधिक भूमि न हो और खेती के सिवाय अन्य साधन न हों।

इस अधिनियम की धारा 37 के अनुसार निःशुल्क कानूनी सहायता मानहानि, विद्वेषपूर्ण अभियोजन चुनाव याचिकाओं तथा संविदा भंग के मामले में उपलब्ध नहीं होगी।

की अधिनियम की धारा 36 के अनुसार नि:शुल्क कानूनी सहायता की पात्रता रखने वाले व्यक्ति को निम्नलिखित रूप में कानूनी सहायता प्राप्त हो सकती है

(1) कोर्ट फीस का भुगतान,

 (2) साक्षियों का व्यय, तलवाना तथा न्यायालय में हुए खर्चे का भुगतान,

(3) अधिवक्ता की फीस,

(4) निर्णयों या आदेशों की प्रतिलिपियाँ प्राप्त करने का व्यय, तथा

(5) अपील दायर करने का खर्च।

मध्य प्रदेश में उपर्युक्त अधिनियम के अन्तर्गत निःशुल्क कानूनी सहायता एवं सलाह योजना के क्रियान्वयन के लिए कानूनी सलाह समिति अधिवक्ताओं की एक सूची तैयार करेगी और उसे अनुमोदन हेत कानूनी सहायता बोर्ड के पास भेजेगी। इस प्रकार अधिवक्ताओं की एक सूची तैयार की जायेगी तथा अधिनियम के अनुसार पारिश्रमिक के आधार पर उन्हें कानूनी सहायता का कार्य सौंपा जा सकेगा।

मध्य प्रदेश विधिक सहायता तथा सलाह अधिनियम, 1976 में यह भी उपबन्धित है कि यदि सहायता प्राप्त व्यक्ति के पक्ष में न्यायालय डिक्री या आदेश पारित करता है या उसे क्षतिपर्ति दिलाता है तो सहायता के रूप में प्राप्त धन-राशि को जिला कानूनी सहायता तथा सलाह समिति को वापस करने के लिए बाध्य होगा। यदि वह इस धनराशि को वापस नहीं करता, तो उससे यह राशि भूमि लगान बकाया राशि की तरह वसल की जा सकेगी। इस प्रावधान से यह स्पष्ट है कि कानूनी सहायता की योजना दान रूप में न होकर समान-न्याय के अधिकार का एक रूप मात्र है। यह सहायता सिविल, आपराधिक तथा राजस्व सम्बन्धी मामलों में निचली अदालत से उच्च न्यायालय, राजस्व मडल (Revenue Board) या उच्चतम न्यायालय तक सपा की जा सकती है। इसके अलावा इस अधिनियम में जमानती प्रकरणों में जमानत कराने के लिए भी नि:शुल्क अधिवक्ता की नियुक्ति का प्रावधान है।

सारांश में यह कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश विधिक सहायता एवं विधिक सलाह अधिनियम, 1976 एक व्यापक कानून है जो निर्धनों, साधनहीन कृषकों, विकलांगों तथा पिछड़ी जनजाति के लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में एक सराहनीय कदम है। यह कानून राष्ट्रीय नीति के अनुकूल है। अनेक राज्यों ने इससे प्रेरणा लेते हुए अपने क्षेत्र के लिए निःशुल्क विधिक सहायता एवं सलाह अधिनियम पारित किये हैं। इसमें संदेह नहीं कि इस कानून के पारित होने के बाद मुकदमेबाजी में अपेक्षाकृत कमी हई है और अनेक मामले न्यायालय के बाहर आपसी समझौते से सुलझाने में विधिक सहायता समितियों को पर्याप्त

सफलता मिली है। फिर भी प्रायः यह देखा गया है कि निर्धन और साधनहीन व्यक्ति कानूनी सहायता या सलाह प्राप्त करने के लिए कानूनी सहायता समिति के पास जाने में कतराते हैं। सम्भवतः वे यह समझते हैं कि राज्य द्वारा नियुक्त अधिवक्ता उनके मामले में उतनी रुचि नहीं लेगा जितना कि निजी तौर पर तय किया गया वकील। इस संदर्भ में एक अन्य उल्लेखनीय बात यह है कि पिछड़े वर्ग के साधनहीन निर्धन व्यक्ति साधारणतः अनपढ़ तथा सीधे-सादे होने के कारण मुकदमेबाजी के दौरान दलालों एवं ठगों के चंगुल में फँसकर शोषण के शिकार हो सकते हैं। अतः विधिक सहायता समितियों को इन भोले-भाले व्यक्तियों के हितों की रक्षा के लिए समुचित व्यवस्था करनी चाहिये।

महाराष्ट्र राज्य ने सन् 1955 में सिविल एवं आपराधिक प्रकरणों में कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की योजना लागू की थी। बिहार में यह कार्यक्रम 1959 में अपनाया गया था जिसके अन्तर्गत जन-कल्याण विभाग द्वारा अनुसूचित जाति के व्यक्तियों को नि:शुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध करायी जाती है।

आन्ध्र प्रदेश राज्य में नि:शुल्क कानूनी सहायता योजना सन् 1964 से लागू की गई। इसी प्रकार की योजनाएँ तमिलनाडु, हरियाणा, दिल्ली, गोवा तथा उत्तर प्रदेश में भी लागू की गई हैं। संघ-राज्य क्षेत्रों (Union Territories) के अन्तर्गत दादरा, नगर हवेली, पांडिचेरी, दमन-ड्यू में भी नि:शुल्क कानूनी सलाह एवं सहायता योजना कार्यान्वित की गयी है। भारत के अन्य राज्यों ने भी इस योजना को अपनाया है लेकिन इस सम्बन्ध में पृथक् कानून नहीं बनाया है। 

वर्तमान समाज में अनेक प्रकार की नई-नई समस्याएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं जिनका सामाजिक संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। परिणामस्वरूप, पारिवारिक एवं सामाजिक विघटन की प्रक्रिया की गति तीव्र होती जा रही है। इस स्थिति पर नियंत्रण पाने हेतु यह परम आवश्यक है कि समाज के उपेक्षित एवं दलित या शोषित वर्ग के लोगों को उनके विधिक, न्यायिक तथा सामाजिक अधिकारों से अवगत कराया जाये तथा संविधान के निर्दिष्ट कर्त्तव्यों22 के प्रति उन्हें जाग्रत किया जाये। यह कार्य विधिक सलाह तथा सहायतासमितियों द्वारा अधिक कुशलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।

विधिक सहायता तथा सलाह-योजना का मुख्य उद्देश्य यह होना चाहिये कि विवादियों को मुकदमेबाजी से यथासम्भव विमुख रखा जाये तथा उन्हें आपसी विवाद परस्पर बातचीत और समझौते के आधार पर तय करने हेतु प्रोत्साहित किया जाए। इससे न्यायालयों के कार्य का बोझ तो हल्का होगा ही साथ ही जनता का बहुमूल्य धन तथा समय व्यर्थ की बरबादी से बच सकेगा। वर्तमान में लोक अदालतों की स्थापना से इस समस्या का बहुत कुछ निदान संभव हुआ है। समाज के विघटनकारी तत्वों को नियंत्रण में रखने के लिए यह परम आवश्यक है कि विधिक सहायता समितियाँ जन-मानस में राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण के प्रति रुचि उत्पन्न करने का प्रयास करें। इसमें संदेह नहीं कि सामाजिक संरचना की सुदृढ़ता के लिए जन-चेतना ही एकमात्र प्रभावी उपाय है जो विधिक सहायता एवं सलाह जैसी योजनाओं के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। लोगों में न्याय प्रशासन के प्रति विश्वास जगाने में विधिक सहायता तथा सलाह की योजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

निष्कर्ष रूप में यह कह देना पर्याप्त होगा कि सामान्य नागरिकों की विधिक समस्याओं का निवारण ही विधि की प्रक्रिया की सफलता का मापदण्ड है। न्याय का लक्ष्य पक्षकारों को उस कीमत पर न्याय उपलब्ध कराना है, जिसे वे सहन तथा वहन कर सकें। यही विधिक सलाह तथा सहायता का भी मुख्य उद्देश्य है।

 

लोक अदालतें (Lok Adalats)

यह सच है कि नि:शुल्क कानूनी सहायता और सलाह समितियाँ गरीबों तथा पिछड़े वर्ग के लोगों को समान न्याय दिलाने का भरसक प्रयत्न कर रही हैं फिर भी विधि की प्रक्रियात्मक जटिलताओं के कारण मुकदमे शीघ्रता से नहीं निपट पाते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि अच्छे अधिवक्ता विधिक-सहायता

22. अनुच्छेद 51-क.

योजना के अन्तर्गत कार्य करने में विशेष रुचि नहीं रखते हैं क्योंकि इस कार्य में मिलने वाली फीस अपेक्षाकृत कम होती है। विधिक सहायता की औपचारिकताओं के कारण न्यायालयों को भी मामलों को शीघ्रता से निपटाने में अनेक अड़चनें आती हैं। इस समस्या के समाधान हेतु अनेक राज्यों ने लोक अदालतों का गठन किया है ।23

उल्लेखनीय है लोक अदालतों का मुख्य उद्देश्य आपसी सुलह द्वारा जन-सामान्य को सस्ता और शीघ्र न्याय दिलाना है ताकि न्याय सभी के लिए सुलभ तथा सरलता से उपलब्ध हो। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी० एन० भगवती के शब्दों में, “जहाँ अब तक पक्षकारों को न्यायालय के दरवाजे खटखटाने पड़ते थे, अब लोक-अदालत की व्यवस्था के अन्तर्गत न्याय स्वयं पक्षकारों के दरवाजे पर जाकर उन्हें राहत दिलाएगा।”

वर्तमान न्याय-दान में लोक अदालतें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। लोक अदालतों के माध्यम से कानूनी जटिलताओं, औपचारिकताओं तथा उलझनों को दूर करके परस्पर विश्वास और समझौते से विवाद निपटाने की व्यवस्था पर्याप्त रूप से सफल हुई है। देश के विभिन्न राज्यों ने लोक अदालतें स्थापित कर न्यायालयों के कार्य-भार को हल्का करने में सफलता प्राप्त की है।

वर्तमान में महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ हरियाणा दिल्ली आदि में लोक अदालतें उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। इन अदालतों में आपराधिक तथा दीवानी प्रकरण, वैवाहिक झगड़े, भरण-पोषण, राजस्व सम्बन्धी मामले तथा मोटर अपघात के प्रकरण आदि विशेष रूप से निपटाये जाते हैं। इन अदालतों में न तो विवादियों को कोर्ट-फीस देनी पड़ती है और न वकीलों की सहायता की आवश्यकता होती है। पक्षकार आमने-सामने आकर आपसी रजामन्दी से लोक-अदालत के माध्यम से अपना विवाद तय कर लेते हैं। फलतः उन्हें न्याय अपेक्षाकृत सस्ता और शीघ्रता से प्राप्त होता है।

गत दशक में लोक अदालतों की लोकप्रियता को देखते हुए इन्हें और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं जो निम्नानुसार है-

(1) स्थायी लोक अदालतों की स्थापना24 की गयी है जिन्हें दस लाख रुपये तक के दीवानी वाद पटाने की अधिकारिता प्राप्त है।

(2) सार्वजनिक लोकोपयोगी प्रतिष्ठानों (Public Utility Services) के लिये पृथक् स्थायी लोक

अदालतें गठित की जाने की व्यवस्था है। ये प्रतिष्ठान (विद्युत मण्डल, दूरभाष सेवायें, जल आपूर्ति विभाग, यातायात विभाग आदि) अधिकतर शासकीय या अर्धशासकीय होने के कारण इन्हें लोक अदालत के पंचाट का निर्णय बाध्यकर होता है और इसके विरुद्ध अपील नहीं हो सकेगी।

(3) लोक अदालतों की कार्यवाहियों के वकीलों, अधिवक्ताओं तथा विधि-व्यवसायियों को बाहर

रखा जाना यह दर्शाता है कि सरकार विधिक सिद्धान्तों (Legal principles) के बजाय न्यायिक सिद्धान्तों (Principles of justice) को अधिमान्यता देती है। तथापि इसकी विधि क्षेत्र में कटु आलोचना हुयी है।  

(4) सन् 2002 के विधिक सेवा प्राधिकरण संशोधन अधिनियम में पक्षकारों की सुविधा हेतु यह प्रावधान रखा गया है कि यदि वे चाहें तो अपना प्रकरण न्यायालय में ले जाने के पूर्व स्थायी लोक अदालत द्वारा निपटाये जाने हेतु आवेदन कर सकेंगे।

इसमें सन्देह नहीं कि लोक अदालतें भारतीय न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान कर रही हैं तथा इनसे दीवानी न्यायालयों में मकदमों की संख्या नियन्त्रित रखने में पर्याप्त मदद मिली है लेकिन अनेक विधिज्ञों ने इस नवोदित प्रणाली की आलोचना इस आधार पर की है कि लोक अदालों के स्थायीकरण के परिणामस्वरूप सामान्य न्यायालयों के प्रति लोगों की आस्था कम होगी और न्यायालयों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इन आलोचकों का मानना है कि लोक अदालतों को अनावश्यक बढ़ावा देना सरकार की निराशावादी प्रवृत्ति का

23. ग्रामीण अंचलों में पंचायत स्तर पर न्याय पंचायतों की पुनर्स्थापना भी इसी दिशा में एक प्रगतिवादी कदम है.

24. विधिक सेवा प्राधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2002 की धारा 22-ख (1).

घोतक है क्योंकि सरकार के विचार से न्यायालयीन सुधार जो कि न्याय को सामान्य लोगों तक पहंचा सकते हैं, एक दुर्गम एवं कठिन कार्य हे। लोक अदालतों के पंचाट-निर्णय के विरुद्ध अपील का कोई प्रावधान न होना भी लोक अदालत व्यवस्था का एक गम्भीर दोष है क्योंकि इससे इन अदालतों के सदस्यों एवं अध्यक्षों को असीमित विवेकाधिकार शक्ति (Unlimited discretionary power) प्राप्त है, जो न्यायिक दृष्टि से उचित नहीं है।

निवेदित है कि उपर्युक्त कुछ दोषों के होते हुये भी कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारत के वर्तमान परिवेश में लोक अदालतों के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि न्याय को जनसामान्य तक पहुंचाने में यही एकमात्र सुगम, सुलभ, सशक्त एवं उपयोगी साधन है।25  

वैकल्पिक विवाद निपटान (Alternative Dispute Resolution; ADR)

न्यायालयों में लम्बित सिविल वादों की बड़ी संख्या के कारण न्याय में अत्यधिक विलम्ब की समस्या उत्पन्न हो गयी है जिसके निवारण हेतु वर्तमान समय में वैकल्पिक विवाद निपटान (ADR) व्यवस्था को अधिमान्यता दी जा रही है। इस हेतु सिविल प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2002 द्वारा-आदेश x CPC में तीन नये नियम 1-क, 1-ख एवं 1-ग जोड़े गये हैं जिनसे सिविल वादों को मध्यस्थता, आपसी वार्तालाप या समझौते से हल किये जाने को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। केवल इन वैकल्पिक तरीकों के विफल हो जाने की दशा में ही सिविल न्यायालय द्वारा सिविल वाद विचारार्थ ग्रहण किया जायेगा। विगत वर्षों में वैकल्पिक विवाद निपटान (ADRs) को भारत में आशातीत सफलता मिली है। अभिवाक् की सौदेबाजी (Plea Bargaining)

अभिवाक् के सौदे की पद्धति का शुभारम्भ अमेरिका की दाण्डिक न्याय व्यवस्था से हुआ है। भारत में दण्ड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2005 द्वारा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में एक नया अध्याय 21क जोड़कर प्ली बारगेनिंग व्यवस्था को अपनाया गया है। इसके अन्तर्गत अभियुक्त को उसके विरुद्ध आरोपों से अवगत करा देने के पश्चात् उसे उसके संविधानिक अधिकारों तथा बचाव सम्बन्धी अधिकारों की पूरी जानकारी दी जाती है और यदि वह आरोपित अपराध की कोटि में आने वाला कोई कम गम्भीर अपराध किया जाना स्वीकार कर लेता है, तो अभियोजन की अनुमति से इस हेतु मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकेगा। उदाहरणार्थ, उद्दापन (Extortion) के आरोप के विरुद्ध चोरी (Theft) का अपराध स्वीकार करने पर उसे अभिवाक् के सौदे का अवसर प्राप्त हो सकता है परन्तु ऐसा अभिवाक् स्वेच्छया होना चाहिये। परन्तु ऐसे अपराध जो सात वर्ष या इससे अधिक कारावधि से दण्डनीय हैं, इनके लिये अभिवाक् के सौदेबाजी सम्भव नहीं होगी।

फास्ट-ट्रैक न्यायालय (Fast Track Courts)

न्यायालय में लम्बित प्रकरणों के शीघ्र निपटान के लिये एक अन्य व्यवस्था फास्ट ट्रैक कोर्टस (द्रुतगति न्यायालय) की स्थापना द्वारा अपनायी गयी है। प्रारम्भ में अप्रैल, 2001 में लगभग 450 तगामी न्यायालयों की स्थापना की गयी थी जो सन् 2005 में बढ़कर 1600 के लगभग पहुंच चुकी थी। वर्तमान समय में लगभग तीन हजार द्रुतगामी न्यायालय भारत में कार्यरत हैं। प्रारम्भ में इनकी अवधि मार्च 31, 2010 तक ही सीमित थी, जिसमें अब वृद्धि कर दी गयी है। साधारणतः प्रत्येक जिले में औसतन पांच द्रुतगामी न्यायालय कार्यरत रखने की योजना अपनायी गयी है। इन्हें सेशन न्यायालय की अधिकारिता प्राप्त है। इन न्यायालयों के लिये न्यायाधीशों की नियुक्ति सम्बन्धित उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है।

लोकहित के मुकदमे (Public Interest Litigation)

भारत के गरीब और निर्धन लोगों को सामाजिक तथा आर्थिक न्याय दिलाने के लिए नि:शुल्क कानूनी सहायता, लोक अदालतों आदि जैसी जन-कल्याणकारी योजनाएं लागू की जाने के बावजूद लोक सेवकों में

25. डॉ० एन० वी० परांजपे : लोकहित वाद, विधिक सहायता एवं सेवाएँ तथा लोक अदालतें और पैरा लीगल सेवायें (2005) पृ० 220-21.

जन-कल्याण के प्रति आस्था की कमी है जिसके कारण इनका क्रियान्वयन उचित ढंग से नहीं हो पा रहा है। इसके लिए कोई निरंतर बढ़ती हुई आबादी को दोषी ठहराता है, तो कोई इसे सार्वजनिक क्षेत्र में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार का कारण मानता है। जनता के प्रति शासन तंत्र की मनमानी तथा लापरवाही पर उचित अंकुश लगाने के उद्देश्य से उच्चतम न्यायालय के कुछ सक्रिय तथा क्रियाशील न्यायालयों ने परंपरागत सुनवाई के अधिकार (Locus standi) के रूढिगत नियम को उदार बनाते हए जन-साधारण को लोकहित के मामलों द्वारा न्याय सुलभ कराना प्रारंभ कर दिया। भारतीय न्यायपालिका के इस प्रयास से प्रोत्साहित होकर कतिपय जनसेवी सस्थाआ तथा व्यक्तियों ने भी प्रशासकीय अधिकारियों द्वारा कर्त्तव्य अपालन या उसके पालन में उपेक्षा बरती जाने के मामलों में जनहित की याचिका (Public Interest writ) दायर करके जन साधारण को न्याय दिलाने का सिलसिला प्रारंभ किया। इस प्रकार न्यायिक क्रियाशीलता (judicial activism) के परिणामस्वरूप लाकाहत क मुकदमे का प्रादुर्भाव हआ जिनसे समाज के दलित. उपेक्षित और साधनहीन लोगों को उचित न्याय मिलना संभव हुआ।26 भारत में इस नवीनतम न्यायिक तकनीक का प्रारंभ सन् 1976 में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत मुंबई कामगार सभा बनाम अब्दल भाई27 के निर्णय से हुआ। भारत के संविधान के आमुख (Preamble) से प्रेरणा लेते हुए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश वी० आर० कृष्णा अय्यर ने सर्वप्रथम इस वाद में कामगारों की ओर से प्रतिनिधिक याचिका को स्वीकार करते हुए सुनवाई के अधिकार (locus standi) के नियम को शिथिल करते हुए न्यायाधीशों की सृजनात्मक भूमिका को अधिक महत्व दिया।

भारत में लोकहित के वादों के विकास में न्यायाधीशों के स्थानांतरण28 का मामला एक प्रमुख आधार-स्तंभ माना जाता है जिसके परिणामस्वरूप अब कोई भी जनसेवी व्यक्ति लोकहित में याचिका दायर करके या न्यायालय को साधारण पत्र लिख कर सार्वजनिक हित से संबंधित किसी मामले में न्याय प्राप्ति की याचना कर सकता है। इस वाद में यह विनिश्चत किया गया कि लोकहित से संबंधित मामले में कोई भी अभ्यावेदक व्यथित व्यक्ति की ओर से न्यायालय में याचिका दायर करके न्याय की याचना कर सकता है, भले ही उस मामले से उसका प्रत्यक्ष सबंध न हो। उच्चतम न्यायालय ने यह भी अभिनिर्धारित किया कि यदि न्यायालय प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए अधिक छानबीन करना आवश्यक समझता है, तो तथ्यों की वास्तविकता का पता लगाने हेतु वह किसी आयोग या समिति की नियुक्ति29 कर सकता है या इस संबंध में आवश्यक निर्देश दे सकता है।

लोक हित के वादों के संदर्भ में यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि इसे अधिक लोकप्रिय बनाने में • पत्रकारों, समाजसेवी संस्थाओं, निजी संगठनों तथा जनसेवकों की विशेष भूमिका रही है30 क्योंकि इसके द्वारा समय-समय पर शासनतन्त्र की मनमानी, लापरवाही, अराजकता तथा शोषणकारी नीतियों के विरुद्ध लोकहित की याचिका के माध्यम से न्यायालय में आवाज उठाकर जन-साधारण की समस्याओं को निपटाने का प्रयास किया जाता है। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर उच्चतम न्यायालय में लोकहित के वादों की याचिकाओं की संवीक्षा (scrutiny) के लिए एक पृथक प्रकोष्ठ की स्थापना की गई है, जो भारत में लोकहित के वादों के स्थायीकरण की दिशा में एक सराहनीय कदम है।

लोकहित के वादों का औचित्य

लोकहित वादों का औचित्य स्थापित करते हुए प्रोफेसर एच० आर० डब्ल्यू वेड31 ने लिखा है कि यदि अभ्यावेदक के पास मुकदमे का उचित कारण है, तो केवल इस आधार पर कि वह प्रकरण से वैयक्तिक रूप से प्रभावित नहीं हआ है, उसे न्यायालय के द्वार से नहीं लौटा दिया जाना चाहिए क्योंकि इसके परिणामस्वरूप

26. डा० उपन्द बख्शा : द क्राइसिस आफ झण्डयन लागलासस्टम (1982), पृ० 1.

27. ए० आई० आर० 1976 सु० को० 1465.

28. एस० पी० गुप्ता बनाम भारत के राष्ट्रपति तथा अन्य, ए० आई० आर० 1982 सु० को० 149 कामात 29. देहरादून घाटी का मामला ए० आई० आर० 1985 सु० को० 652.

30. हसैन आरा खातून बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1979 सु० को० 360; ओल्गा टेलिस बनाम बम्बई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन, ए० आई० आर० 1986 सु० को० 180; पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ (एशियाड का वाद), ए० आई० आर० 1982 सु० को० 149; बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ, (1984) 3 एस० सी० सी० 161; रूरल लिटीगेशन एण्ड इन्टाइटिलमेंट केन्द्र, देहरादून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (दून घाटी का वाद), ए० आई० आर० 1985 सु० को 652 आदि.

31. Swartz & Wade : Legal Control of Government (1972), p. 291.

शासन-तंत्र को विधि का उल्लंघन करते हुए मनमानी करने की छूट मिल जाएगी, जो सामाजिक हित की दष्टि से उचित नहीं होगा। वस्तुतः लोकहित में वाद लाना भागिता-न्याय (Participatory Justice) का ही एक रूप है जो दीवानी मामलों में न्याय के अधिकाधिक अवसर प्रदान करता है।

उल्लेखनीय है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण32 के वाद में दिये गये विनिश्चय के पश्चात यह कहा जा सकता है कि भारत के उच्चतम न्यायालय ने वाद में अभ्यावेदक के हित संबंधी ‘लोकस स्टेंडी’ के नियम को शिथिल करते हुए न्याय दान के मार्ग में आने वाले सभी अवरोधों को दूर कर दिया है जिसके परिणामस्वरूप अब कमजोर, गरीब एवं साधनहीन लोगों को न्याय प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

लोकहित वाद में लोकस-स्टेंडी के नियम को शिथिल किये जाने का औचित्य बताते हुए न्यायमूर्ति पी० एन० भगवती ने पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ33 के वाद में अभिनिर्धारित किया कि यदि जनता का एकमात्र सदस्य भी साधारण पत्र द्वारा न्यायालय का ध्यान जनता की किसी गंभीर विधिक समस्या या क्षति की ओर आकृष्ट करता है, तो न्यायालय को चाहिए कि सभी तकनीकी प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं को एक तरफ रखते हुए उस पत्र को याचिका के रूप में स्वीकार करके उस पर न्यायिक कार्यवाही करे।

भारत में लोकहित के वादों के संबंध में निम्नलिखित बातें विशेष उल्लेखनीय हैं

(1) लोकहित की याचिकाओं का प्रयोग केवल मूलभूत अधिकारों के उल्लंघन तक ही सीमित नहीं है अपितु इनका प्रयोग ऐसे मामलों की ओर न्यायालय का ध्यान आकर्षित करने के लिए भी किया जा सकता है जिनके कारण किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को कोई विधिक क्षति, हानि या अपकृति हुई या होने की संभावना है।

(2) लोकहित के मामले में अभ्यावेदक कोई भी व्यक्ति या व्यक्तियों का निश्चित समूह हो सकता है जो सामाजिक या आर्थिक दृष्टि से कमजोर या असहाय होने के कारण स्वयं न्यायालय तक पहुँचने में समर्थ है।

(3) ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों की ओर से जनता का कोई भी जनसेवी सदस्य या संगठन न्यायालय से उचित आदेश, निर्देश या अनुतोष (relief) के लिए अभ्यावेदन कर सकता है।

(4) यदि प्रकरण किसी मूलभूत अधिकार के उल्लंघन से संबंधित हो, तो याचिका अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकेगी, परंतु किसी सामान्य अधिकार के उल्लंघन की दिशा में याचिका संबंधित राज्य के उच्च-न्यायालय में भी दायर की जा सकती है।

(5) याचिका पर सुनवाई करने के पश्चात् शिकायत को दूर करने हेतु न्यायालय उचित निर्देश, आदेश या रिट जारी कर सकेगा जिसमें कोई निश्चित कार्य किये जाने का निर्देश भी हो सकता है तथा उस पर निरंतर देखरेख रखने हेतु आदेश भी दिया जा सकता है।34

(6) लोकहित वाद की इस अपेक्षाकृत नवीन तकनीक के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति जनहित में न्यायालय के नाम पर एक साधारण पत्र लिखकर भी जनता की किसी समस्या की ओर न्यायालय का ध्यान आकर्षित कर सकता है और यदि न्यायालय उचित समझता है, तो ऐसे पत्र को याचिका मानकर उस पर न्यायिक कार्यवाही प्रारंभ कर सकता है। इस प्रकार की कार्यवाही को न्यायालय की ‘इपिस्टोलरी अधिकारिता’ (Epistolary Jurisdiction) कहते हैं।

लोकहित वादों द्वारा न्यायिक उपचारों का प्रजातंत्रीकरण (Democratisation of Judicial Remedies through PIL)

लोक हित के वादों की न्यायिक कार्यवाही को यदि न्यायिक उपचारों का प्रजातंत्रीकरण कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।35 निस्संदेह ही मानव अधिकार संबंधो विधिशास्त्र में यह एक अनमोल उपलब्धि

32. एस० पी० गुप्ता बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1982 सु० को० 49.

33. ए० आई० आर० 1983 सु० को० 473.

34. विशाखा बनाम राजस्थान राज्य, ए० आई० आर० 1987 सु० को० 1909 (Infra).

35. Madhav Menan N. R. : The Dawn of Human Rights Jurisprudence, p. 17.

उपेक्षितों तथा साधनहीनों के संदर्भ में मूलभूत अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए नवीन उपचारों की आवश्यकता अनुभव को गई। इसी बात को ध्यान में रखते हए उच्चतम न्यायालय ने लोकहित के ये गये निर्णयों के माध्यम से समय-समय पर ऐसे निर्देश या आदेश पारित किये जिनसे जन साधारण सामाजिक न्याय-सुलभ हो सके। इनमें कारावासियों के प्रति न्याय,36 बाल अपराधियों की सुरक्षा37, 38 बंधआ मजदूरी का उन्मूलन39, तथा इन मजदूरों का पुनर्वास40. उपभोक्ता संरक्षण.41 स्वास्थ्य परमधी खतरों से जनता की सुरक्षा,42 वैयक्तिक स्वाधीनता,43 शीघ्र परीक्षण,44 श्रमिकों के अधिकारों45 आदि के मामले विशेष उल्लेखनीय हैं जिनके माध्यम से वितरणात्मक न्याय (distributive justice) का कियान्वयन संभव हुआ है। यद्यपि लोकहित वादों की पद्धति भारत में अपेक्षाकत नई है, फिर भी इससे जन साधारण को पर्याप्त राहत मिली है। निस्संदेह ही यह इस बात का द्योतक है कि न्यायाधीशगण भी अपनी न्यायिक सक्रियता द्वारा भारत में कल्याणकारी राज्य की संकल्पना को साकार रूप देने की दिशा में प्रयत्नशील हैं। तथापि यह अनुभव किया गया है कि न्यायालय द्वारा दिये गये निर्देशों तथा आदेशों के अनुपालन को कार्यपालिका के प्राधिकारी गम्भीरता से नहीं लेते हैं और कभी-कभी तो इनकी अनदेखी करने में भी नहीं हिचकिचाते हैं। अत: यह आवश्यक है कि अपने निर्देशों, आदेशों तथा उपचारों का अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए उच्चतम न्यायालय के अधीन एक विशेष प्रकोष्ठ (Special Cell) की स्थापना की जाए ताकि शासन तंत्र नागरिकों के अधिकारों की उपेक्षा न कर सके और उसे अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने के लिए बाध्य किया जा सके। सारांश में यह कहना पर्याप्त होगा कि न्याय को जन-साधारण तक पहुँचाने में लोकहित वादों की भूमिका सराहनीय रही है। फिर भी इसमें जनता तथा न्यायाधीशों की और अधिक सक्रिय भागीदारी अपेक्षित है।

अनेक विद्वानों ने लोकहित वाद की न्यायिक तकनीक की इस आधार पर आलोचना की है कि इसके परिणामस्वरूप न्यायालयों की शक्तियाँ असीमित होती जा रही हैं तथा इससे संविधान के अनुच्छेद 32 एवं 226 में उपबंधित रिट-उपचार का दुरुपयोग की सम्भावना को टाला नहीं जा सकता।46 परन्तु उच्चतम न्यायालय के पूर्व-मुख्य न्यायाधीश एम० एन० वेंकटचलैया ने ‘इन्डो अमेरिकन लीगल फोरम’ के उद्घाटन भाषण47 में अभिकथन किया कि लोकहित प्रकरणों में न्यायालयों की बढ़ती हुई भूमिका के प्रति चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि प्रत्येक सांविधानिक न्याय निर्णय (Constitutional adjudication) में थोड़ा-बहुत विधायन का अंश तो रहता ही है।

उल्लेखनीय है कि लोक हित मामलों में दिये गये कुछ निर्णयों के औचित्य के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनमें सुस्पष्टतः कमी दिखलाई देती है। उदाहरणार्थ, मिथिलेश कुमार सिन्हा बनाम मतदान

36. हुसैन आरा खातून बनाम राज्य, ए० आई० आर० 1979 सु० को० 1360; रूदल शाह बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1983 सु० को० 1086; सेबेस्टीन होंगरी का वाद 1984 सु० को० 1026.

37. शीला वारसे बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए० आई० आर० 1989 सु० को० 378.

38. देहरादून घाटी का मामला, ए० आई० आर० 1985 सु० को० 652.

39. बंधुआ मुक्तिमोर्चा बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1984 सु० को० 804.

40. नीरजा चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1984 सु० को० 1099.

41 डॉ० शिवराज शांताराम बागले बनाम भारत संघ, (1988) 19 एस० सी० आर० 559 तथा विन्सेन्टपाणीकुरलंगराबनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1987 सु० को० 990.

42. डॉ० एस० जी० काबरा बनाम राजस्थान राज्य, राज० लॉ रिपोर्ट 1989 (1)695

43. मेनका गाँधी बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1978 सु० को० 597 तथा हिमाचल प्रदेश बनाम उमेदराम, (1986) 2 एस० सी० सी० 68 आदि.

44. सूर्य नारायण सिंह बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1987 पटना 219; तथा हुसैन आरा का वाद. 45. फर्टीलाइजर कारपोरेशन कामगार यूनियन बनाम संघ, ए० आई० आर० 1981 सु० को० 388.

46. GO H AT Ef Public Interest Litigation in Quest of Justice, (1993 ed) P. 103.

47. दिसम्बर 30, जनवरी, 1994.

अधिकारी48 में यह निर्णीत किया गया कि राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के चुनाव के विरुद्ध किसी ऐसे व्यक्ति को चुनाव याचिका दायर करने का श्रवणाधिकार (locus standi) नहीं है जो इनके चुनाव में मतदान का अधिकार न रखता हो। इसी प्रकार सिमरनजीत सिंह मान बनाम भारत संघ49 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि ऐसा कोई पक्षकार जो अभियोजन कार्यवाही के लिए पूर्णतः अजनबी (stranger) हैं, दोषसिद्धि तथा दंडादेश को अनुच्छेद 32 के अधीन चुनौती देने का अधिकार नहीं रखता है।

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