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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 9 Notes

 

LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 9 Notes:- All the candidates are again welcome in another new post of LLB 1st Year / 1st Semester. Today you are studying in Jurisprudence and Legal Theory Chapter 9 Philosophical School of Jurisprudence Notes Study Material in Hindi English, Bengali. We have already shared LLB Law Papers With Answer Paper.

 

अध्याय 9 (Chapter 9)

विधिशास्त्र की दार्शनिक विचारधारा (Philosophical School of Jurisprudence)

LLB Notes Study Material

ऑस्टिन के विधिक प्रमाणवाद (Legal Positivism) विचारधारा के परिणामस्वरूप लोगों में यह धारणा बन गई कि राज्य की अवपीड़क शक्ति (coercive power) ही विधि का एकमात्र आधार है। इसी प्रकार सेविनी द्वारा समाज में प्रचलित पुरातन रीतिरिवाजों, प्रथाओं तथा नैतिक मूल्यों को ही विधि का प्रमुख स्रोत दर्शाया जाने के कारण विधि का विकास लगभग थम-सा गया था। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप जर्मनी और फ्रांस के कतिपय विधिज्ञों ने विधि को एक नई विचारधारा का सूत्रपात किये जाने की आवश्यकता अनुभव की ताकि विधि के विकास के लिये उचित वातावरण तैयार हो सके। उन्होंने यह अनुभव किया कि विधि को समाज में सम्माननीय स्थान दिलाने के लिये उसमें नीतिशास्त्र के तत्वों का समावेश, अत्यावश्यक है क्योंकि सामाजिक संव्यवहारों में आदर्शों तथा नीतिमूलक नियमों का गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप सोलहवीं शती के अंतिम वर्षों में विधि सम्बन्धी एक नई विचारधारा का सूत्रपात हुआ जिसे विधि की दार्शनिक शाखा कहा जाता है। ह्यगो ग्रोशियस, कान्ट, हीगेल तथा सेबेलिंग (Hugo Grotius, Kant, Hegal and Sebelling) विधिशास्त्र की दार्शनिक विचारधारा के प्रमुख प्रवर्तक माने जाते हैं। विख्यात दार्शनिक सिसरो (Cicero) ने विधिशास्त्र को ज्ञान का दार्शनिक पक्ष’ निरूपित किया है। दार्शनिक विचारधारा

विधिशास्त्र की दार्शनिक विचारधारा अधिकतर नीतिशास्त्र के सिद्धान्तों पर आधारित होने के कारण इसे नीतिशास्त्रीय शाखा (Ethical School) भी कहा जाता है। इस विचारधारा के समर्थकों का मानना था कि विधि-दर्शन को नैतिक मूल्यों पर आधारित किया जाना चाहिये ताकि लोगों को सदाचारी जीवन जीने की प्रेरणा मिल सके और वे अपने संव्यवहारों में नीतिमूलक आदर्शों को प्रधानता दें।

नीतिशास्त्र मूलत: नैतिक मूल्यों पर आधारित होने के कारण, इससे लोगों को सही और गलत (Right and wrong) में विभेद करने की क्षमता बढ़ती है तथा वे सामाजिक समरूपता (harmony) बनाये रखने के लिये दूसरों के अधिकारों का आदर करने की ओर प्रवृत्त होते हैं। दार्शनिक शाखा के विचारकों के अनुसार विधि का प्रमुख कार्य समाज में शांति व्यवस्था बनाये रखना है और विधि द्वारा मानव आचरण पर प्रतिबंध उसी दशा में लगाये जाने चाहिये यदि वे समाज में व्यक्ति की स्वतंत्रता में संवृद्धि करते हों। यही कारण है कि इस विचारधारा के अध्ययन की मुख्य विषयवस्तु है ”विधि जैसी कि वह होनी चाहिये न कि वर्तमान विधि जैसी कि वह है या भूतकालीन विधि, जैसी कि वह पूर्व में थी।”

विधिशास्त्र की दार्शनिक शाखा के प्रमुख लक्षण निम्नानुसार हैं-

(1) न्याय की अवधारणा में नैतिकता का तत्व विद्यमान है तथा विधि और न्याय एक दूसरे से जुड़ी हुई संकल्पनायें हैं। विधि न्यायप्राप्ति का एक साधन है। अत: यह न्याय के उद्देश्य की पूर्ति हेतु अपनाया गया एक माध्यम मात्र है और चूँकि न्याय नीतिशास्त्रीय नियमों पर आधारित होता है इसलिये विधि से नैतिकता को पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता, जैसा कि आस्टिन ने अपने आदेशात्मक सिद्धान्त (Imperative Theory) में दर्शाया है।

(2) विधिशास्त्र की दार्शनिक शाखा के अध्ययन की मुख्य विषय-वस्तु यह है कि न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य की पूर्ति में विधि किस प्रकार से सक्रिय भूमिका निभाती है।।

(3) यह शाखा विधि और न्याय में विभेद स्पष्ट करते हुये इस बात पर जोर देती है कि विधि न्यायप्राप्ति का एक साधन मात्र है न कि स्वयं उद्देश्य ।।

(4) इस विचारधारा का प्रयोजन विधिक संकल्पनाओं (Legal concepts) में नैतिकता को उचित स्थान दिलाना है।

ह्यगो ग्रोशियस (Hugo Grotius)

ह्यूगो ग्रोशियस एक डच (Dutch) विधिवेत्ता तथा दार्शनिक थे। इन्हें दार्शनिक विधिशास्त्र का प्रणेता माना जाता है। अपने अप्रतिम ग्रंथ ‘‘दि लॉ ऑफ वार एण्ड पीस’ (The Law of War and Peace) में उन्होंने अभिकथन किया कि विधि की उत्पत्ति मानव के समाज-प्रेमी स्वभाव के परिणामस्वरूप हुई है तथा प्राकृतिक विधि एवं सकारात्मक नैतिकता (Positive Morality) ये दोनों ही नीतिपरायणता (rightousness) पर। आधारित हैं। मानव आचरण के नियमों का वास्तविक स्रोत मानव की नीतिमूलक चिंतन शक्ति होने के कारण। ही नीति प्रधान विधि को समाज का समर्थन एवं अनुमोदन प्राप्त होता है और इसीलिये लोग विधि का अनुपालन करना अपना कर्तव्य समझते हैं। अत: ह्यगो ग्रोशियस का स्पष्ट मत था कि समाज के व्यक्ति विधि का अनुपालन इसलिये नहीं करते क्योंकि उन्हें राज्य द्वारा प्रताडित किये जाने का भय रहता है, अपितु इसलिये करते हैं, क्योंकि ऐसा न करने पर उन्हें सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ेगा, जो उनके लिये अवांछनीय होगा। ग्रोशियस ने अपने विचारों में प्राकृतिक विधि के नियमों को यथास्थान देते हुये दार्शनिक विचारधारा को नीतिशास्त्र का ही एक दूसरा रूप निरूपित किया।

इमैन्युअल कान्ट (Immanual Kant : 1724-1804) ।

कान्ट ने तिधिशास्त्र की दार्शनिक विचारधारा का समर्थन करते हुये यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि नीतिशास्त्र और विधि एक ही न होकर इनका क्षेत्र अलग-अलग है। नीतिशास्त्र मानव को किसी कार्य या कृत्य को करने के लिये आन्तरिक प्रेरणा देता है जबकि विधि ऐसे कृत्यों से सम्बन्धित है जो व्यक्ति बाह्य तौर पर भौतिक रूप से करता है। आशय यह है कि नीति व्यक्ति के आन्तरिक जीवन को नियंत्रित करती है जबकि विधि का सम्बन्ध व्यक्ति के बाह्य (भौतिक) जीवन से होता है। विधि अपनी बाह्य शक्ति द्वारा मानव को सद्गुणी (Virtuous) नहीं बना सकती है अतः विधि का नियंत्रणकारी प्रभाव केवल व्यक्ति के बाह्य कृत्यों या कार्यों तक ही सीमित रहता है परन्तु नीति या नैतिकता व्यक्ति को आन्तरिक प्रेरणा देते हुये अच्छे-बुरे । में विभेद करने की क्षमता प्रदान करती है, अत: इस अर्थ में विधि की तुलना में नैतिकता का महत्व अधिक है।

कान्ट ने अपनी ऐतिहासिक कृति ‘‘क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन” (Critique of Pure Reason) में उल्लेख किया है, कि जीवन के अनुभवों की अनुभूतियाँ मानव मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ जाती हैं जिनके आधार पर वह विभिन्न परिस्थितियों में औचित्य या अनौचित्य के अनुसार अपने आचरण को विनियमित करता है। कालांतर में व्यक्ति की भावनायें उसकी धारणाओं (Perceptions) में परिणत हो जाती हैं, जो अन्ततोगत्वा उसके अनुभवों के साथ उसके आचरण को नियंत्रित रखने में सहायक होती हैं। कान्ट के अनुसार व्यक्ति सदैव ही अपनी आवश्यकताओं से पराभूत होकर कार्य नहीं करता है, बल्कि उसकी आंतरिक सोच जो नीति मलक होती है, उसे किसी कृत्य को करने या न करने के लिये प्रवृत्त करती है। इसे कान्ट ने निरपेक्ष आदेशक (ceoorical Imperative) सिद्धान्त निरूपित किया है जो नैतिक और विधिक सिद्धान्तों का मूल आधार है।

अपने निरपेक्ष आदेशक सिद्धान्त की व्याख्या करते हुये कान्ट ने अभिकथन किया कि व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने कार्यों को इस प्रकार कार्यान्वित करे ताकि उससे अधिकतम सर्वमान्य आदर्शों की पूर्ति हो सके। उनके अनुसार नैतिकता व्यक्ति की आन्तरिक प्रवृत्तियों की द्योतक है जबकि वैधानिकता विधि द्वारा निर्धारित किये गये बाह्य आचरण के अनुसार कार्य करने में निहित होती है। अतः कॉन्ट ‘बाध्यता’ (Compulsion) को विधि का एक अनिवार्य तत्व नहीं मानते हैं और उनके मतानुसार अधिकार व्यक्ति को कोई कार्य करने या करने से रोकने के लिये प्रयुक्त होने वाली शक्तिमात्र है। इस समता के अधिकार को व्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिये एक आवश्यक शर्त मानते हैं तथा संपत्ति के अधिकार को मानव के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं।

कान्ट ने इस बात पर जोर दिया कि लोगों में स्वीकार्य होने के लिये विधि में न्याय का तत्व होना वश्यक है। अतः लोगों की इच्छाओं तथा भावनाओं के विरुद्ध थोपी गई विधि अधिक प्रभावी नहीं हो ती है। कोई भी विधान तभी सफल हो सकेगा जब वह जन भावनाओं के अनुरूप हो। इस दृष्टि से किसी। शासन को सुशासन कहलाने के लिये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आवश्यक तत्व माना गया है।

कान्ट के अनुसार ‘न्याय’ (Justice) की संकल्पना सापेक्ष (Relative) स्वरूप की है जो स्थान विशेष की माजिक, आर्थिक, नैतिक, राजनैतिक आदि परिस्थितियों तथा समाज के मूल्यों पर निर्भर करती है। अतः। विधि को न्याय के अनुरूप होने के लिये उसका ‘औचित्य’ पर आधारित होना आवश्यक होता है ताकि यह उक्ति साकार हो सके कि जो भी विधिपूर्ण है वह न्यायपूर्ण भी है।”

राज्य के कार्यों के विषय में कान्ट ने अभिमत प्रकट किया कि उसे स्वयं को केवल दो प्रमुख कार्यों तक ही सीमित रखना चाहिये-राज्य में शांति-व्यवस्था बनाये रखना तथा न्याय प्रशासन सुनिश्चित करना। जनता को राज्य तथा राज्य सरकार की युक्तियुक्त आलोचना करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिये परन्तु उसका प्रतिरोध (Resist) करने की छूट नहीं दी जानी चाहिये। काण्ट वैश्विक शांति-व्यवस्था के पक्षधर थे तथा वे राज्यों की समानता एवं स्वतंत्रता में विश्वास करते थे। अन्तर्राष्ट्रीय विधि को अधिक प्रभावी बनाने के लिये उसे सदस्य देशों से श्रेष्ठता प्रदान की जानी आवश्यक है।2

फिच्टे (Fichte) 

फिच्टे ने सामान्य व्यक्ति की स्वचेतना (Self-consciousness) को अपने विधिक सिद्धान्त का आधार | मानते हुये मानव की स्वतन्त्रता को आवश्यक निरूपित किया और कहा कि स्वतन्त्रता एक निरपेक्ष संकल्पना है जो व्यक्तियों के आपसी संबंधों पर निर्भर करती है। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक कर्तव्य है कि वह अन्यों की स्वतन्त्रता का सम्मान करे। अत: राज्य को केवल उन्हीं मानवीय अधिकारों का संरक्षण करना चाहिये जो व्यक्ति के अस्तित्व के लिये अत्यावश्यक हैं तथा राज्य की विधि का लक्ष्य लोगों को न्याय दिलाना। होना चाहिये।  

राज्य द्वारा विधि का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को दंडित किये जाने को उचित ठहराते हुये फिच्टे ने अभिकथन किया कि सामाजिक शांति एवं सुरक्षा के लिये यह परम आवश्यक है। यह इसलिये भी आवश्यक है कि राज्य प्रत्येक नागरिक से अपने नागरिक कर्तव्यों के अनुपालन की अपेक्षा करता है जिनका अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिये राज्य को विधि के माध्यम से बल प्रयोग करना आवश्यक होता है। लेकिन नागरिकों के निजी जीवन में राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिये क्योंकि नैतिकता उन्हें स्वयं को अनुशासित रहने का बोध कराती रहती है जो उनकी स्व-चेतना से उत्पन्न होती है।

हीगेल (Hegel : 1770-1831) 

विख्यात विधि-दार्शनिक हीगेल ने कान्ट के मानव इच्छा की स्वतन्त्रता संबंधी सिद्धान्त को आगे बढ़ाते हुय अभिकथन किया कि राज्य द्वारा विधि का निर्माण किये जाने का उद्देश्य समाज में व्याप्त मानवीय दंभ (eg0) के कारण उदभुत होने वाले टकराव का निवारण करना है। व्यक्ति अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर दसरों के हता पर कुठाराघात न करे इसलिये विधि द्वारा उन पर नियंत्रण रखा जाना आवश्यक होता है। अतः विधि का मुख्य भूमिका यह होनी चाहिये कि व्यक्ति के स्वार्थ और परहित में उचित सामंजस्य बना रहे। हीगेल के अनुसार जीवन के संघर्ष में व्यक्ति अपनी स्वच्छंदता और स्वतन्त्रता के प्रति सदैव जाग्रत रहता है और इसमें हस्तक्षेप होने की दशा में अपने हितों के रक्षणार्थ विधि की सहायता लेता है। सामाजिक परिवर्तनों के साथ व्यक्ति की आवश्यकताओं तथा हितों सम्बन्धी धारणाओं में भी बदलाव होता रहता है, इसलिये राज्य की “धि इन्हें संतुलित बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भमिका निभाती है।

• कान्ट इमेन्युअल : फिलासफी ऑफ लॉ (हेस्टिक Hastic द्वारा अनूदित) पृ० 46.

2. जैसा कि वर्तमान राष्ट्र संघ की प्रास्थिति है.

 हीगेल के विचार से राज्य का अस्तित्व विभिन्न समुदायों तथा परिवारों के एकीकरण का परिणाम है। वे राज्य के तीन कार्यों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हैं-(1) सार्वभौमिक कार्य, (2) राज्य के वैयक्तिक कार्य तथा (3) नागरिकों से सम्बन्धित कार्य। सार्वभौमिक कार्यों में विधि का निर्माण तथा उसका प्रवर्तन समाविष्ट है जबकि वैयक्तिक कार्य राजतंत्र व्यवस्था में शासक में निहित रहते हैं। हीगेल प्रजातांत्रिक व्यवस्था तथा सार्वजनिक मताधिकार (Universal franchise) के विरोधी थे। उन्होंने वंशानुगत राजतंत्र को उचित ठहराते हुये अभिकथन किया कि शासक में राज्य के वैयक्तिक कार्य निहित होने के कारण वह प्रजा को नियंत्रण में रखने तथा राज्य की शांति-व्यवस्था बनाये रखने में सक्षम होता है तथा इसमें शास्तियों के हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है।

विधि दर्शन में होगेल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह रहा है कि उन्होंने विधि को एक उविकासी प्रक्रिया (evolutionary process) का परिणाम माना है। मानव अपनी परिकल्पना और सूझबूझ से एक निश्चित विचारधारा को जन्म देता है जिसके स्थापित हो जाने के पश्चात् समय परिवर्तन के साथ उसकी

आलोचना होने लगती है जो उसके उलट विचार-धारा को जन्म देती है और यह प्रक्रिया निरंतर चलनी रहती है। विधि इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप उद्भूत नियमावली है।

उल्लेखनीय है कि हीगेल द्वारा प्रचारित विधि के दार्शनिक सिद्धान्त को भारतीय विधि के विकास के परिप्रेक्ष्य में भलीभाँति समझा जा सकता है। स्वतन्त्रता के पूर्व भारत में इंग्लिश विधि सुस्थापित थी, जो मूलतः इंग्लैण्ड के कॉमन लॉ पर आधारित थी। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन होने के कारण तत्कालीन भारतीय परिस्थितियाँ वर्तमान परिस्थितियों से पूर्णतः भिन्न थीं। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत की राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों में आमूल परिवर्तन हुये जिसके फलस्वरूप ब्रिटिश कालीन विधि को विकासशील भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढालना आवश्यक हो गया। विशेषतः समाजवादी अर्थव्यवस्था कायम करने के लिये जमींदारी उन्मूलन कानून, परिसीमन संबंधी कानून (Ceiling law) आदि पारित किया जाना आवश्यक हो गया। परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया इन कानूनों को संशोधनों द्वारा परिवर्तित करना आवश्यक हो गया। संविधान के भाग 4 में उपबंधित नीति निदेशक सिद्धान्तों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिये अनेक नये कानून पारित किये गये तथा इन निदेशक सिद्धान्तों को परिवर्धित करना आवश्यक हो गया।6 वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में विधि का कार्य यह सुनिश्चित करना है कि नागरिकों को समान सामाजिक एवं आर्थिक न्याय तथा व्यक्ति स्वातंत्र्य प्राप्त हो ताकि कल्याणकारी राज्य की संकल्पना साकार हो। सके तथा देश में धर्मनिरपेक्ष प्रजातान्त्रिक व्यवस्था कायम हो सके।

स्केब्लिंग (Scbelling : 1775-1854)  

स्केब्लिंग के अनुसार विधि एक ऐसा माध्यम है जो वैयक्तिक इच्छाओं तथा समाज की सामान्य इच्छा में संतलन बनाये रखने की भूमिका निभाता है। इसके लिये कभी-कभी यह आवश्यक हो जाता है कि विधि द्वारा व्यक्तियों की स्वतंत्रता पर आवश्यक निर्बध लगाये जायें।।

स्केब्लिंग ने विधिशास्त्र को मानव की पूर्णता के लिये एक सशक्त माध्यम निरूपित किया है। कान्ट तथा हीगेल की विधि सम्बन्धी दार्शनिक विचारधारा का समर्थन करते हुये वे स्वीकार करते हैं कि राज्य में । नागरिकों की स्वतन्त्रता एवं स्वायत्तता को सुनिश्चित करने के लिये विधियों का होना आवश्यक है, क्योंकि मानव विकास के लिये व्यक्ति स्वातंत्र्य प्रथम आवश्यकता मानी जाती है।

3. Law is a process of thesis, anti-thesis and syntnesis—Hegel.

4 यहाँ तक कि सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार की श्रेणी से हटाकर अनु० 300-क के अन्तर्गत एक

5. सामान्य विधिक अधिकार में परिवर्तित कर दिया गया है। 5. समान वेतन अधिनियम, बोनस अधिनियम, बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम,

विधिक सेवा अधिनियम आदि.

6. अनुच्छेद 43क तथा 48क नये जोड़े गये हैं।

सेविनी तथा विधिशास्त्र की ऐतिहासिक विचारधारा के अन्य समर्थकों ने विधि सम्बन्धी दार्शनिक विचारों का इस आधार पर खंडन किया कि विधि मानव की स्वचेतना से उद्भूत होती है जो प्राय: औचित्य पर आधारित रहती है। सेविनी का मत था कि विधि का उद्भव जनचेतना (Volkgeist) से होता है न कि वैयक्तिक स्वचेतना से। दार्शनिकों का स्पष्ट अभिमत था कि विधि सामाजिक आदर्शों तथा तर्कों पर आधारित होती तथा उसमें पूर्व प्रचलित प्रथाओं आदि की कोई भूमिका नहीं रहती है। परन्तु निवेदित है कि वर्तमान विधि के परिप्रेक्ष्य में दार्शनिक विचारधारा का केवल बौद्धिक महत्व रह गया है क्योंकि यथार्थ में विधि का उद्भव नैतिकता या आदर्शों पर निर्भर न होकर विद्यमान वास्तविक परिस्थितियों तथा सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप होता है। इसी प्रकार, यदि कोई विधि वांछित परिणामों के विपरीत प्रतीत होती है। तो उसे संशोधित करके समाजोपयोगी बनाये जाने का प्रयास किया जाता है तथा यदि वह पूर्णत: विफल या प्रभावहीन हो, तो उसका निरसन कर दिया जाता है।

कोहलर (Kohler : 1849-1919)

विधि की दार्शनिक शाखा को एक नई दिशा प्रदान करने में कोहलर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वे हीगेल के विधि दर्शन से अत्यधिक प्रभावित थे, परन्तु हीगेल की इस धारणा से सहमत नहीं थे कि कोई ऐसी शाश्वत विधि (eternal law) हो सकती है, जो सभी समाजों के प्रति एक समान लागू की जा सके। कोहलर का विचार था कि यह संभव है कि एक स्थान विशेष पर लागू विधि दूसरे स्थान के लिये पूर्णत: अनावश्यक सिद्ध हो या निष्प्रभावी हो। कोहलर का मानना था कि मानव समाज सदैव परिवर्तनशील और प्रगतिवादी होने के कारण विधि को भी परिस्थितियों के अनुसार ढालने की आवश्यकता होती है क्योंकि समय के साथ सामाजिक मूल्यों तथा नैतिक मान्यताओं में भी आमूल परिवर्तन होता रहता है। भारत में अस्पृश्यता निवारण अधिनियम, 1955, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा (प्रतिषेध) अधिनियम, 2005, सती प्रथा प्रतिषेध अधिनियम, दहेज निषेध अधिनियम आदि इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। वर्तमान में बिना विवाह किये साथसाथ रह रहे स्त्री-पुरुषों से उत्पन्न बच्चों के विधिक अधिकारों के बारे में कानून बनाया जाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।  

विधि को परिभाषित करते हुये कोहलर ने कहा है कि विधि मानव आचरण के ऐसे मानक स्थापित करती है जो व्यक्ति की आन्तरिक चेतना से उत्पन्न होते हैं तथा एक सुव्यवस्थित जीवन की ओर लक्षित होते हैं। और जिनका अनुपालन करना लोगों के लिये आवश्यक होता है। | डीन रास्को पाउंड (Dean Roscoe Pound) ने कोहलर के विधि तथा विधिक दर्शन सम्बन्धी विचारों के बारे में अभिकथन किया कि समयानुसार विधिक आधारतत्वों (Legal postulates) को खोजकर विधि का निर्माण करना वर्तमान विधिक ज्ञान की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।8 नि:सन्देह ही इसे विधिशास्त्र में कोहलर का। महत्वपूर्ण योगदान कहा जायेगा।

स्टेमलर (Stammler : 1856-1938)

स्टेमलर ने काण्ट की दार्शनिक विचारधारा से असहमति व्यक्त करते हुये अभिकथन किया कि धिशास्त्र की ऐतिहासिक शाखा तथा दार्शनिक शाखा के सिद्धान्तों एवं नियमों में भिन्नता होते हुये भी, ये दोनों ही एक दूसरे के पूरक बनकर सामाजिक आदर्शों की पूर्ति करने में सहायक हो सकते हैं। उन्होंने विधि के एक वैकल्पिक सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुये यह अभिमत प्रकट किया कि विश्लेषणात्मक विधि। (Positive law) जो स्वभावतः अन्वेषणात्मक है, के बावजूद समाज को एक न्यायोचित विधि की आवश्यकता होती है और विधि न्यायोचित तभी होती है जब वह सामाजिक मूल्यों तथा आदर्शों में परिवर्धन करती है, अर्थात लोगों के वैयक्तिक हितों और सामाजिक हित में संतुलन स्थापित करती है। सामाजिक

7. Kohler : Philosophy of Law p. 37.

8. Roscoe Pound : Interpretation of Legal Theory p.150.

9. स्टेमलर : दि थ्योरी ऑफ जस्टिस, 

 

आदर्शों की पूर्ति हेतु स्टेमलर ने दो तत्वों को आवश्यक बताया है। प्रथम यह कि प्रत्येक व्यक्ति के वैयक्तिक हितों को संरक्षण प्राप्त हो तथा दूसरा यह कि सभी व्यक्तियों से सामाजिक सहकार्य की अपेक्षा की जाती है।

अपनी महत्वपूर्ण कृति “दि थ्योरी ऑफ लॉ” में स्टेमलर ने उल्लेख किया है कि ऐसा कोई भी विधि का नियम नहीं है जिसे एकमात्र प्रधानता प्राप्त हो। उनके अनुसार न्यायोचित विधि (Just law) और विश्लेषणात्मक विधि (positive law) का साथ-साथ सहअस्तित्व संभव है क्योंकि विश्लेषणात्मक विधि का स्वरूप अन्वेषण प्रधान होने के कारण वह औचित्य के आधार पर विधि का मूल्यांकन करती है, जो विधि की समाज में उपयोगिता पर विचार करने का एक सकारात्मक तरीका है। स्टेमलर के अनुसार सामाजिक आदर्श वैयक्तिक हितों की एकता का प्रतिनिधित्व करते हैं।

विधि एक ऐसा संकल्प (volition) है जो उन व्यक्तियों की इच्छाओं को अभिव्यक्त करता है जिनके प्रति यह लागू की जाती है। विधि द्वारा मानवीय आचरणों को उनके लक्ष्य तथा साधनों के अनुसार अनुशासित किया जाता है। न्यायोचित विधि मानव के सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

विधि-क्षेत्र में स्टेमलर के योगदान की समीक्षा करते हुये फ्रीडमैन (Friedmann) ने अभिकथन किया है। कि एक ओर अपने दार्शनिक विचारों के कारण स्टेमलर विधि को सार्वभौमिक स्थान दिलाने में प्रयत्नशील थे, तो दूसरी ओर एक सिविल विधि के प्राध्यापक होने के नाते वे विधि के माध्यम से लोगों के वास्तविक विवादों को निपटाने की दिशा में सक्रिय थे। इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी न्याय विषयक धारणा एक अमूर्त इच्छा मात्र बनकर रह गई। उनकी धारणा थी कि लोगों के हितों में टकराव के कारण उत्पन्न होने वाले विवादों को हल करने के लिये विधि एक उपयुक्त साधन थी, लेकिन विभिन्न समाजों में विसंगतियों के कारण उसे सार्वभौमिक स्थान दिलाने में व्यावहारिक कठिनाइयाँ थीं। इसीलिये स्टेमलर की सार्वभौमिक विधि (universal law) की आदर्शात्मक संकल्पना यथार्थ से परे होने के कारण अव्यावहारिक थीं।10

डेल वेहियो (Del Vecchio)

विख्यात इटेलियन विधिशास्त्री डेल वेहियो ने स्टेमलर के विधिक विचारों का समर्थन करते हुये अभिकथन किया कि विश्लेषणात्मक विधि (Positive Law) विधिक सुधारों में सदैव बाधक रही है। उन्होंने स्टेमलर की भाँति विधि के प्रति दार्शनिक दृष्टिकोण अपनाया परन्तु उनका विधि दर्शन स्वतंत्र चिंतन पर आधारित था। डेल वेक्हियो को दर्शनशास्त्र, विधि एवं इतिहास का अच्छा ज्ञान होने के कारण उनका मानना था. मानव मस्तिष्क स्वयं ही मानव नियमों को बनाने में समर्थ है, इसलिये राज्य द्वारा विधि निर्माण की आवश्यकता नहीं है। मानवीय विधि प्राकृतिक विधि के नियमों पर आधारित होने के कारण यह स्वयं ही न्यायोचित स्वरूप की होती है, जबकि राज्य द्वारा निर्मित विश्लेषणात्मक विधि कृत्रिम, कल्पित तथा परिस्थितियों पर आधारित होने के कारण आवश्यक नहीं कि वह सदैव ही न्यायोचित हो। वस्तुत: डेल वेहियो के मतानुसार विश्लेषणात्मक विचारधारा विधि के सुधार की गति को अवरोधित करने का कार्य करती है, इसलिए उसे अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिये। उनका विचार था कि विधि में एक प्रकार की तटस्थता (neutrality) निहित रहती है इसलिये अच्छी तथा बुरी विधि या न्यायिक तथा अन्यायिक विधि का विभेद अनुचित एवं व्यर्थ है।

डेल वेक्हियो ने विधि को प्राकृतिक नियमों का ही एक रूप माना तथा उनके अनुसार समाज की

खुशहाली के लिये यह मानव स्वच्छता की एक अभिव्यक्ति मात्र है। उनके अनुसार विधि का मूल उद्देश्य  मानव को स्वतन्त्रता तथा समानता के अवसर उपलब्ध कराना है। डेल वेक्हियो के व्यक्ति और राज्य के परस्पर सम्बन्धों विषयक विचार हीगेल के विचारों से मिलते-जुलते हैं।

10. फ्रीडमैन : लीगल थ्योरी (छठाँ संस्क०) पृ० 137.

11. Del Vecchio : Formal Bases of Law, p. 254.

उल्लेखनीय है कि डेल वेक्हियो के विधि सम्बन्धी दार्शनिक विचार उनके समकालीन विधि विचारकों को भले ही स्वीकार्य न हों, लेकिन वर्तमान समय के वैश्विक युग में सार्वभौमिक विधियों के बढ़ते हुये महत्व को दृष्टि में रखते हुये इसे कोरी काल्पनिक आदर्शवादिता कहना अन्यायपूर्ण होगा।

ग्यूइस्ट (Gueist : 1816-1895)

यद्यपि ग्यूइस्ट ने सेविनी द्वारा प्रतिपादित विधि सम्बन्धी अन्तर्चेतना के सिद्धान्त (theory of Volkgeist) का समर्थन किया, परन्तु उनके अनुसार तत्कालीन परिवर्तित सामाजिक परिस्थितियों में प्राकृतिक विधि के पुनर्लेखन द्वारा विधि को विकसित किया जाना अधिक श्रेयस्कर सिद्ध होता है। किसी भी विधि के औचित्य का मूल्यांकन करते समय उसके नैतिक और आदर्शात्मक पहलुओं पर विचार किया जाना। चाहिये, जिसका अधिकांश प्राकृतिक विधि के समर्थकों ने अनुमोदन किया था। विधि का वास्तविक स्रोत मानव का अन्तर्मन है न कि कोई बाह्य शक्ति। राज्य को भी विधि के निर्माण में लोकमत पर विचार करना। आवश्यक होता है क्योंकि विधि को समाज से अलग नहीं रखा जा सकता है।

विधि की दार्शनिक विचारधारा तथा ऐतिहासिक विचारधारा में समन्वय स्थापित करते हुये प्रो० न्डचाइल्ड12 (Prof. Windchild) ने अभिकथन किया कि दोनों ने ही इस बात को स्वीकार किया है कि  विधि की वास्तविक उत्पत्ति मानवीय मूल्यों तथा आदर्शों से होने के कारण इसमें राज्य की भूमिका गौण होती है। यदि राज्य कोई ऐसी विधि का निर्माण करता भी है जो लोक हित का संवर्धन नहीं करती है तो ऐसी विधि एक औपचारिकता मात्र बन कर रह जायेगी।

विधि की दार्शनिक विचारधारा का प्रभाव  

विधि की दार्शनिक शाखा तथा इसकी पूर्ववर्ती ऐतिहासिक शाखा तथा विश्लेषणात्मक शाखाओं का संयुक्त प्रभाव यह हुआ कि विधिशास्त्रियों ने अपना ध्यान इस ओर केन्द्रित किया कि विधि की प्रकृति, उसकी विषय-वस्तु एवं उद्देश्य तथा राज्यों के साथ विधि के सम्बन्धों के बारे में नये सिरे से पुनः विचार किया जाना चाहिये इनमें एक विचारधारा का अंध समर्थन किया जाना उचित नहीं है। विश्लेषणात्मक शाखा ने विधि के सामाजिक पहलू की पूर्ण अनदेखी की तथा विधि के दार्शनिक दृष्टिकोण को कपोल कल्पित निरूपित किया और केवल राज्य के बल तथा संप्रभु की सर्वसत्ता को ही विधि का आधारबिन्दु माना। रॉबसन (Robson) ने विश्लेषणात्मक शाखा के इस अनम्य तथा संकरे दृष्टिकोण की भर्त्सना करते हुये अभिकथन किया कि बेंथम के समय से ही इंग्लिश विधि की अनम्यता बढ़ती गई और वह केवल राज्य की आदेशात्मक शक्ति के रूप में ही विकसित होती रही तथा इसमें दार्शनिक तत्वों, आदर्शों तथा सामाजिक भावनाओं को कोई स्थान नहीं दिया गया।।3 ।।

डॉ० जेथ्रो ब्राउन ने ऑस्टिन के विधि सम्बन्धी आदेशात्मक सिद्धान्त (Imperative theory of law) को अव्यावहारिक मानते हुये कहा कि इससे राजतंत्र को अनावश्यक बल प्राप्त हुआ तथा शासक की संप्रभुता ही विधि का एकमात्र स्रोत बनकर रह गई जिसमें जन साधारण की इच्छाओं तथा आकांक्षाओं को कोई स्थान प्राप्त नहीं था। अतः जेथ्रो ब्राउन ने नैतिक मूल्यों तथा आदर्शों को विधि का अत्यावश्यक तत्व निरूपित करते हुये कहा कि विधि को केवल राज्य का आदेश मानना अनुचित है क्योंकि इसके प्रभावी रूप से प्रवर्तन के लिये जन इच्छा आवश्यक होती है, अतः विधि में सामाजिक एवं नैतिक तत्वों का समावेश आवश्यक है।14।।

सामण्ड ने भी इस विचार से सहमति जताई कि विधि को राज्य का समादेश मात्र निरूपित करना उचित नहीं है क्योंकि समाज में प्रचलित रीतिरिवाज, परंपरायें तथा प्रथायें भी विधि के भौतिक स्रोत के रूप में मान्य की गई हैं। इसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय विधि को केवल सकारात्मक नैतिकता (positive morality) मात्र कहना

12. प्रो० विन्डचाइल्ड (1817-1892) ने विधिशास्त्र की ऐतिहासिक विचारधारा तथा दार्शनिक विचारधारा में समन्वय स्थापित करते हुये विधि के विकास का मार्ग प्रशस्त करने में सराहनीय योगदान किया।

13. Robson : Civilization and the Growth of Law p. 254.

14. Jethro Brown : Austinian Theory of Law : Excursions, p. 537.

न्यायोचित नहीं है क्योंकि इसमें राज्य की स्वेच्छा तथा परंपरागत विधि का समावेश है। अत: विधि के निर्माण में उसके ऐतिहासिक तथा दार्शनिक पहलू की अवहेलना नहीं की जा सकती। विधि और न्याय के परस्पर संबंधों की व्याख्या करने हेतु दार्शनिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिये ताकि विधि के उद्देश्यों तथा लक्ष्य को भलीभाँति समझा जा सके।

न्याय सम्बन्धी सिद्धान्त (Theories of Justice)

हेन्स केल्सन (Hans Kelson) ने यह निरूपित किया कि न्याय की संकल्पना एक सामाजिक-नैतिक (Socio-ethical) अवधारणा है, अतः पूर्ण न्याय की अपेक्षा करना मानव के लिये के शाश्वत भ्रम (Eternal elusion) मात्र है। केल्सन के अनुसार न्याय मानव के आपसी सम्बन्धों को नियन्त्रित रखने का ऐसा माध्यम है जिसके फलस्वरूप सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है। समाज की आदर्शमूलक मान्यतायें ही न्याय का संवर्द्धन करती हैं ताकि मानव अपने संव्यवहारों में उनका अनुसरण करे । उनका मत था कि न्याय की अपेक्षा रखना सुखी जीवन की अपेक्षा करना है और यह सुख समाज में ही प्राप्त हो सकता है, अत: न्याय भी सामाजिक सदाचरण से ही प्राप्त होना सम्भव है।

केल्सन द्वारा प्रतिपादित न्याय सम्बन्धी इस विचारधारा को आगे बढ़ाते हुये जर्मी बेंथम ने इसे अपने उपयोगितावाद के सिद्धान्त से सम्बद्ध किया, जिसे उन्होंने सामूहिक सुख (Collective happiness) की संज्ञा दी, अर्थात्, अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख ही वास्तविक न्याय है। बेन्थम ने अपनी उपयोगितावादी विचारधारा में न्याय की संकल्पना की व्याख्या करते हुये कहा कि बहुजनों के सामाजिक हितों को मान्यता देते हुये उन्हें संरक्षित करना ही वास्तविक न्याय है।

सुविख्यात यूनानी दार्शनिक अरस्तू Aristotle) ने भी न्याय को एक ऐसा सद्गुण (virtue) माना जो व्यक्तियों को राज्य के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। न्याय और अन्याय में विभेद करते हुये उन्होंने कहा कि व्यक्ति के उचित एवं विधिपूर्ण आचरण में ही न्याय का वास रहता है। विधियों का निर्माण ही इसलिये किया जाना आवश्यक होता है ताकि जो कुछ न्यायपूर्ण है, उसका संरक्षण किया जा सके तथा व्यक्तियों के अन्यायपूर्ण अनुचित आचरण पर पाबन्दी लगायी जा सके।

अरस्तू के इसी विचार का समर्थन करते हुये मध्ययुगीय पाश्चात्य दार्शनिक थामस एक्वीनास (Thomas Acquinas) ने अभिकथन किया कि न्याय एक आदत के समान है जो मानव आचरण एवं अनुभव से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने वितरणात्मक न्याय (Distributive justice) पर जोर देते हुये कहा कि न्याय का मूल उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान करते हुये अन्यों के अधिकारों में व्यवधान पहुंचाने से उपरत (desist) रहना है। |

इमैन्यूअल कॉण्ट (Immanuel Kant) के अनुसार न्याय सुनिश्चित करने के लिये विधियों का ‘औचित्य’ (reason) पर आधारित होना परम आवश्यक है। मानव कार्यों को उचित-अनुचित के आधार पर परखते हुये अनुचित कृत्यों का वर्जन ही न्याय का मूल सिद्धान्त है।

जॉन रॉल्स का संस्थागत न्याय का सिद्धान्त (John Rawls Institutional Theory of Justice) 

जॉन रॉल्स ने न्याय की संकल्पना को एक सामाजिक संस्था (Social Institution) के रूप में विकसित करते हुये कथन किया कि संस्थाओं के प्रति लागू होने वाले न्याय के सिद्धान्त व्यक्ति के प्रति होने वाले न्यायिक सिद्धान्तों से भिन्न होते हैं, इसलिये दोनों को एक समान आंका जाना भ्रमपूर्ण होगा। उनके अनुसार न्याय की प्रारम्भिक विषयवस्तु समाज के मूल ढांचे में निहित होती है। कोई संस्था मूल ढांचे पर आधारित है। अथवा नहीं यह विभिन्न कारकों (Factors) पर निर्भर करता है। प्रथम यह, कि क्या मूलभूत अधिकारों या कर्तव्यों के वितरण में उसकी कोई भूमिका है ताकि लोगों की जीवन की प्रत्याशा को संवद्भित किया जा सके. तथा दसरा यह कि क्या लोगों को समान अवसर दिलाने में सक्रिय रूप से कार्यरत है? यदि ये दोनों बातें किसी संस्था में विद्यमान हों तो उसे एक न्याय सुनिश्चित कराने वाली संस्था कहा जा सकता है। इस प्रकार जॉन रॉल्स (John Rawls) ने राजनीतिक उदारवाद को ही न्याय का स्रोत माना जो काण्ट के वितरणात्मक न्याय के सिद्धान्त तथा बेन्थम के उपयोगितावादी सिद्धान्त के समरूप है।

न्यायोचित नहीं है क्योंकि इसमें राज्य की स्वेच्छा तथा परंपरागत विधि का समावेश है। अत: विधि के निर्माण में उसके ऐतिहासिक तथा दार्शनिक पहलू की अवहेलना नहीं की जा सकती। विधि और न्याय के परस्पर संबंधों की व्याख्या करने हेतु दार्शनिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिये ताकि विधि के उद्देश्यों तथा लक्ष्य को भलीभाँति समझा जा सके। न्याय सम्बन्धी सिद्धान्त (Theories of Justice)

हेन्स केल्सन (Hans Kelson) ने यह निरूपित किया कि न्याय की संकल्पना एक सामाजिक-नैतिक (Socio-ethical) अवधारणा है, अतः पूर्ण न्याय की अपेक्षा करना मानव के लिये के शाश्वत भ्रम (Eternal elusion) मात्र है। केल्सन के अनुसार न्याय मानव के आपसी सम्बन्धों को नियन्त्रित रखने का ऐसा माध्यम है जिसके फलस्वरूप सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है। समाज की आदर्शमूलक मान्यतायें ही न्याय का संवर्द्धन करती हैं ताकि मानव अपने संव्यवहारों में उनका अनुसरण करे । उनका मत था कि न्याय की अपेक्षा रखना सुखी जीवन की अपेक्षा करना है और यह सुख समाज में ही प्राप्त हो सकता है, अत: न्याय भी सामाजिक सदाचरण से ही प्राप्त होना सम्भव है।

केल्सन द्वारा प्रतिपादित न्याय सम्बन्धी इस विचारधारा को आगे बढ़ाते हुये जर्मी बेंथम ने इसे अपने उपयोगितावाद के सिद्धान्त से सम्बद्ध किया, जिसे उन्होंने सामूहिक सुख (Collective happiness) की संज्ञा दी, अर्थात्, अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख ही वास्तविक न्याय है। बेन्थम ने अपनी उपयोगितावादी विचारधारा में न्याय की संकल्पना की व्याख्या करते हुये कहा कि बहुजनों के सामाजिक हितों को मान्यता देते हुये उन्हें संरक्षित करना ही वास्तविक न्याय है।। | सुविख्यात यूनानी दार्शनिक अरस्तू Aristotle) ने भी न्याय को एक ऐसा सद्गुण (virtue) माना जो व्यक्तियों को राज्य के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। न्याय और अन्याय में विभेद करते हुये उन्होंने कहा कि व्यक्ति के उचित एवं विधिपूर्ण आचरण में ही न्याय का वास रहता है। विधियों का निर्माण ही इसलिये किया जाना आवश्यक होता है ताकि जो कुछ न्यायपूर्ण है, उसका संरक्षण किया जा सके तथा व्यक्तियों के अन्यायपूर्ण अनुचित आचरण पर पाबन्दी लगायी जा सके।

अरस्तू के इसी विचार का समर्थन करते हुये मध्ययुगीय पाश्चात्य दार्शनिक थामस एक्वीनास (Thomas Acquinas) ने अभिकथन किया कि न्याय एक आदत के समान है जो मानव आचरण एवं अनुभव से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने वितरणात्मक न्याय (Distributive justice) पर जोर देते हुये कहा कि न्याय का मूल उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान करते हुये अन्यों के अधिकारों में व्यवधान पहुंचाने से उपरत (desist) रहना है। | इमैन्यूअल कॉण्ट (Immanuel Kant) के अनुसार न्याय सुनिश्चित करने के लिये विधियों का * औचित्य’ (reason) पर आधारित होना परम आवश्यक है। मानव कार्यों को उचित-अनुचित के आधार पर परखते हुये अनुचित कृत्यों का वर्जन ही न्याय का मूल सिद्धान्त है। जॉन रॉल्स का संस्थागत न्याय का सिद्धान्त (John Rawls Institutional Theory of Justice) | जॉन रॉल्स ने न्याय की संकल्पना को एक सामाजिक संस्था (Social Institution) के रूप में विकसित करते हुये कथन किया कि संस्थाओं के प्रति लागू होने वाले न्याय के सिद्धान्त व्यक्ति के प्रति होने वाले न्यायिक सिद्धान्तों से भिन्न होते हैं, इसलिये दोनों को एक समान आंका जाना भ्रमपूर्ण होगा। उनके अनुसार न्याय की प्रारम्भिक विषयवस्तु समाज के मूल ढांचे में निहित होती है। कोई संस्था मूल ढांचे पर आधारित है। अथवा नहीं यह विभिन्न कारकों (Factors) पर निर्भर करता है। प्रथम यह, कि क्या मूलभूत अधिकारों या कर्तव्यों के वितरण में उसकी कोई भूमिका है ताकि लोगों की जीवन की प्रत्याशा को संवद्भित किया जा सके. तथा दसरा यह कि क्या लोगों को समान अवसर दिलाने में सक्रिय रूप से कार्यरत है? यदि ये दोनों बातें किसी संस्था में विद्यमान हों तो उसे एक न्याय सुनिश्चित कराने वाली संस्था कहा जा सकता है। इस प्रकार जॉन रॉल्स (John Rawls) ने राजनीतिक उदारवाद को ही न्याय का स्रोत माना जो काण्ट के वितरणात्मक न्याय के सिद्धान्त तथा बेन्थम के उपयोगितावादी सिद्धान्त के समरूप है।

इस बात के प्रमाण में कि संस्थागत न्याय वैयक्तिक न्याय से भिन्न है, रॉल ने एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुये कहा है कि अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिये आरक्षण की नीति इस वर्ग के लिये निश्चित रूप से न्यायपूर्ण है परन्तु अन्य वर्गों के व्यक्ति यह अनुभव कर सकते हैं कि नीति उनके प्रति भेदभावपूर्ण एवं अन्याय का प्रतीक है। तथापि रॉल्स ने इसे उचित निरूपित करते हुये कहा है कि यदि किसी नीति से संस्थागत न्याय में संवर्द्धन होता है, तो वहां व्यक्तिगत न्याय को वरीयता नहीं दी जा सकती। रॉल्स के इस संस्थागत न्याय के सिद्धान्त का औचित्य भारत में दलितों, अनुसूचित एवं जनजातियों तथा पिछले वर्ग के लिये लागू आरक्षण की नीति सुस्पष्टतः साबित हो जाती है जो इन वर्गों के लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने की दृष्टि से सफल रही। है। साररूप में यह कहा जा सकता है कि रॉल्स ने सामाजिक न्याय तथा वैयक्तिक न्याय में विभेद करते हुये यह अभिमत प्रकट किया है कि वैयक्तिक न्याय की तुलना में सामाजिक या संस्थागत न्याय को प्राथमिकता दी जानी चाहिये ताकि समग्र समाज का कल्याण हो सके।  निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि विधिशास्त्र की दार्शनिक विचारधारा का मूल लक्ष्य न्यायिक आदर्शों को विकसित करना था ताकि विधि लोक हित का सशक्त साधन बन सके क्योंकि न्यायालयों द्वारा दिये जाने वाले निर्णय इन्हीं आदर्शात्मक सिद्धान्तों पर आधारित होते हैं। उल्लेखनीय है कि कान्ट, फिटे और हीगेल की विधि सम्बन्धी दार्शनिक विचारधारा ने यूरोपीय विधि दर्शन को पर्याप्त रूप से प्रभावित किया लेकिन वे इसे विधिशास्त्र की एक स्वतंत्र शाखा के रूप में विकसित करने में विफल रहे क्योंकि पश्चात्वर्ती विधि दर्शन अंशत: प्राकृतिक विधि-सिद्धान्त तथा अंशतः विश्लेषणात्मक प्रमादवाद से विकसित हुआ। कालांतर में विधिशास्त्र की ऐतिहासिक तथा सामाजिक विचारधारा के बढ़ते प्रभाव के कारण विधि की दार्शनिक विचारधारा विलुप्त होती गई।

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