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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 29 Notes

 

LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 29 Notes:- Bachelor of Law LLB 1st Semester / Year Jurisprudence & Legal Theory Section 4 Chapter 29 Liability Welcome all of you candidates in this post, in today’s post you are going to learn LLB Chapter 29 Notes Study Material in Hindi English language which we have online Is prepared for Free Study Material for LLB.

 

अध्याय 29 (Chapter 29

दायित्व (Liability)

LLB Notes Study Material

 

विधिशास्त्र के अन्तर्गत दायित्व एक ऐसी संकल्पना (concept)1 है जिसके विषय में विधिवेत्ताओं के विचार भिन्न-भिन्न रहे हैं। व्यापक अर्थ में दायित्व से आशय ‘न्यायिक बंधन’ से है। मनुष्य का दायित्व उस समय उत्पन्न होता है जब वह किसी व्यक्ति के प्रति अपने विधिक कर्त्तव्य का उल्लंघन करता है। यह सर्वविदित है कि अपकार-कर्त्ता (wrongdoer) अपने अपकृत्य (wrong) के लिए दायी होता है। इसीलिए सामण्ड ने कहा है कि “दायित्व आवश्यकता का ऐसा बन्धन है, जो अपकारकर्ता और उसके द्वारा किये गये अपकार के उपचार के बीच विद्यमान है।”2 दायित्व का उद्भव राज्य की प्रभुता-शक्ति से होता है। उल्लेखनीय है कि दायित्व की संकल्पना बाध्यता (obligation) से भिन्न है। बाध्यता का सम्बन्ध उन कर्त्तव्यों से है, जो वैयक्तिक अधिकार के अनुरूप होते हैं जबकि दायित्व के अन्तर्गत कोई व्यक्ति अपने किसी अपकृत्य के परिणाम का भुगतान अथवा उसके लिए हानिपूर्ति करने के लिए दायित्वाधीन रहता सम्बन्ध उन कलेखनीय है कि चार के बीच विद्यमापकता का ऐसा बन्ध है।

जब व्यक्ति कोई ऐसा कार्य नहीं करता है जो उसे करना चाहिये था, तो इसके लिये उसे जो कुछ करना पड़ता है या भुगतना पड़ता है, उसी को ‘दायित्व’ कहा जाता है।

दायित्व के प्रकार

सामण्ड ने दायित्व के निम्नलिखित प्रकार बताये हैं

(1) सिविल दायित्व तथा आपराधिक दायित्व (Civil and Criminal Liability);

(2) उपचारात्मक दायित्व तथा शास्तिक दायित्व (Remedial and Penal Liability)

सिविल दायित्व (civil liability) में प्रतिवादी के विरुद्ध दीवानी कार्यवाही द्वारा वादी के अधिकार का प्रवर्तन कराया जाता है जबकि आपराधिक दायित्व (criminal liability) का सम्बन्ध अपराधी को अपराध कृत्य के लिए दण्डित करने की कार्यवाही से है।

उपचारात्मक दायित्व (remedial liability) के अन्तर्गत वादी के अधिकार का विनिर्दिष्ट अनुपालन (specific enforcement) कराया जाता है तथा इसका मूल उद्देश्य अपकारी को दण्डित कराना न होकर वादी के अधिकारों की रक्षा करना है। शास्तिक दायित्व (penal liability) में अपराधकर्ता को दण्डित करने की भावना प्रमुख रूप से विद्यमान रहती है। उदाहरणार्थ, किसी ऋणी व्यक्ति का ऋण चुकाने का दायित्व उपचारात्मक दायित्व होता है, परन्तु किसी अपमान-लेख के प्रकाशित करने वाले व्यक्ति को कारावासित किये जाने का अथवा क्षतिपूर्ति करने का दायित्व शास्तिक दायित्व (penal liability) कहा जायेगा।। उल्लेखनीय है कि आपराधिक दायित्व (criminal liability) प्रत्येक दशा में शास्तिक (penal) होता है। जबकि सिविल दायित्व अधिकांशत: उपचारात्मक (remedial) स्वरूप का होता है, तथापि वह शास्तिक भा हो सकता है।

1. इसे vinculum juris कहा गया है.

2. “Liability is the bond of necessity that exists between the wrongdoer and the wrong.”- almond : Jurisprudence (12th ed.), p. 349.

उपचारात्मक दायित्व का सिद्धान्त (The Theory of Remedial Liability)

जैसा कि कथन किया जा चुका है कि उपचारात्मक दायित्व का एकमात्र उद्देश्य वादी के अधिकारों का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन कराना है। जब कभी कानून किसी कर्त्तव्य का सृजन करता है, तो वह उस कर्त्तव्य के विनिर्दिष्ट पूर्ति का प्रवर्तन कराता है। जो व्यक्ति इस कर्त्तव्य का पालन नहीं करते उन पर विधि के अन्तर्गत उपचारात्मक दायित्व (remedial liability) अधिरोपित किया जाता है, अर्थात् कानून अपकारी को कर्त्तव्य की पूर्ति करने के लिए बाध्य करता है। दूसरे शब्दों में, यदि किसी व्यक्ति ने किसी विधि के नियम का पालन उस प्रकार नहीं किया है जैसा कि उसे करना चाहिए, तो राज्य अपनी भौतिक शक्ति के बल पर कानून का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन करा सकेगा। उपचारात्मक दायित्व सम्बन्धी इस सामान्य सिद्धान्त के कुछ अपवाद हैं। जिनका उल्लेख किया जाना आवश्यक है। निम्नलिखित दशाओं में विधि द्वारा कर्तव्यों का विनिर्दिष्ट अनुपालन नहीं कराया जाता है

1. अपूर्ण बाध्यता के कर्त्तव्य (Duties of imperfect obligations)

किसी अपूर्ण कर्त्तव्य का अनुपालन न किये जाने पर विधि के अन्तर्गत दायित्व उत्पन्न नहीं होता है। उदाहरणार्थ, अवधि सीमा अधिनियम द्वारा बाधित ऋण की अदायगी के लिये ऋणी व्यक्ति के विरुद्ध कोई विधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती, भले ही वह ऋण कितना ही वैध क्यों न हो।।

उल्लेखनीय है कि यद्यपि अवधि बाधित ऋण (Time barred debt) न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (enforceable) नहीं होता है, परन्तु इसका आशय यह कदापि नहीं है कि न्यायालय इस बात को स्वीकार करने से इन्कार करता है कि ऋणी व्यक्ति ऋणदाता का कर्जदार है। दूसरे शब्दों में, यदि अवधि सीमा से बाधित हो जाने के पश्चात् ऋणी व्यक्ति ऋणदाता को ऋणराशि का संदाय (भुगतान) कर देता है, तो यह पूर्णत: विधिमान्य होगा। आशय यह है कि अवधि बाधित ऋण का विधि या न्यायालय द्वारा प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता लेकिन इससे ऋणी व्यक्ति का ऋण राशि को वापस पाने का अधिकार (Right) समाप्त नहीं हो जाता है, और यदि ऋणी व्यक्ति उसकी ऋणराशि का भुगतान करता है, तो यह संव्यवहार पूर्णतः वैध एवं विधिमान्य होगा।

2. ऐसे कर्त्तव्य जिनका विनिर्दिष्ट प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता कोतवारी (Duties which cannot be specifically enforced after a breach has taken place)

कुछ परिस्थितियों में कृत्य के स्वरूप को देखते हुए उसका उल्लंघन होने पर उसका विनिर्दिष्ट अनुपालन कराना संभव नहीं होता है।

यदि किसी व्यक्ति द्वारा अपमान-लेख (libel) प्रकाशित किया जा चुका है या हमला किया जा चुका है, तो उस दशा में अपकार-कर्ता को घटित कार्य से विरत रहने के लिए विवश करना व्यर्थ होगा क्योंकि अपकार घटित हो जाने पर अपकारी के विरुद्ध अपमान-लेख प्रकाशित न करने या हमला न करने के कर्त्तव्य का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन कोई अर्थ नहीं रखता है।

3. ऐसे कर्त्तव्य जिनका विनिर्दिष्ट प्रवर्तन अनुपयुक्त या अयुक्तियुक्त हो (Where the specific enforcement of the duty is inadvisable or inexpedient)

अनेक कर्त्तव्य ऐसे होते हैं जिनका विनिर्दिष्ट प्रवर्तन कराना संभव होते हुए भी वह समयोचित (expedient) नहीं होता। उदाहरणार्थ, कानून के अन्तर्गत विवाह-सम्बन्धी वचनबद्धता का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन कराने के बजाय क्षतिपर्ति दिलाना ही उचित माना जाता है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति द्वारा वैयक्तिक सेवा का करार को भंग किया जाने पर उसके विनिर्दिष्ट अनुपालन के बजाय क्षतिपूर्ति दिलायी जाना ही अधिक उपर एवं कालोचित होगा।

3. विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14.

शास्तिक दायित्व का सिद्धान्त (Theory of Penal LIability)

विधि के अन्तर्गत शास्तिक दायित्व के लिए दो शर्ते आवश्यक हैं। प्रथम, किसी भौतिक कृत्य का होना तथा द्वितीय, उस कृत्य को करने का दुराशय (mens rea) होना। शास्तिक दायित्व (penal liability) के लिए आवश्यक इन तत्वों को प्रसिद्ध लैटिन सूत्र (actus non facit reum nisi mens sit rea) द्वारा अभिव्यक्त किया गया है जिसका अर्थ है, “केवल कृत्य मात्र किसी को अपराधी नहीं बनाता जब तक कि उसका मन भी अपराधी न हो।’4

किसी व्यक्ति पर शास्तिक दायित्व तभी होता है जब वह विधि द्वारा वर्जित कोई कृत्य करता है तथा उस कृत्य को करने में उसकी आपराधिक मन:स्थिति (mens rea) रही हो। इसका अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति का आशय चाहे जितना भी दोषपूर्ण क्यों न हो, उसे तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि उसका आशय किसी ऐसे कृत्य का रूप धारण नहीं कर लेता जो विधि द्वारा निषिद्ध है। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति किसी के मकान में आग लगा देने का आशय रखता है किन्तु वह इस विचार मात्र के अलावा और कुछ नहीं करता, तो उसे इसके लिए दण्डित नहीं किया जा सकता है। यही नहीं, यदि वह आग लगाने के इरादे से माचिस तथा पेट्रोल जैसी वस्तुएँ खरीद कर उस दिशा में कुछ और तैयारी भी कर लेता है, तो भी उसे दण्डित नहीं किया जा सकता है। परन्तु यदि वह आग लगाने का प्रयत्न करता है, तो वह कृत्य स्वयं ही एक दंडनीय कृत्य होने के कारण उस व्यक्ति पर शास्तिक दायित्व आरोपित कर देगा। तात्पर्य यह है कि शास्तिक दायित्व के लिए प्रथम आवश्यक तत्व यह है कि व्यक्ति द्वारा कोई ऐसा बाह्य कृत्य किया गया हो, जो विधि द्वारा वर्जित हो। कृत्य (Act)

‘कृत्य’ शब्द का प्रयोग सन्दर्भानुसार भिन्न-भिन्न अर्थों में किया जाता है। दायित्व के मर्मभूत तत्व के रूप में कृत्य से आशय किसी ऐसी घटना से है जो मानवीय इच्छा के नियंत्रण के अधीन हो। विधिक दृष्टि से कृत्य का अर्थ किसी व्यक्ति की केवल शारीरिक क्रिया से नहीं है बल्कि उसमें वे परिणाम भी सम्मिलित हैं, जो प्रारम्भिक क्रिया को पूर्ण करते हैं। परन्तु जो घटनायें मनुष्य की सामर्थ्य के परे हैं, उनके लिए उस पर दायित्व नहीं होता। उदाहरणार्थ, भयंकर वर्षा या तूफान अथवा वज्रपात के लिए किसी व्यक्ति को दायी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि ये ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ हैं जो मनुष्य की शक्ति के परे हैं। इसी प्रकार किसी व्यक्ति को केवल आपराधिक मन:स्थिति होने मात्र के कारण दण्डित नहीं किया जा सकता जब तक कि वह उन विचारों को कार्यान्वित करने का प्रयास न करे या उसे मूर्त रूप न दे दे।

सामंड ने ‘कृत्य’ को व्यापक अर्थ में परिभाषित किया है जिसमें ऐसी घटनाएँ भी सम्मिलित हैं, जो मानव इच्छा शक्ति के अधीन घटित होती हैं। वास्तव में देखा जाए तो सही अर्थ में घटना (event) कृत्य नहीं होती और न वह कोई शारीरिक क्रिया ही है। परन्तु सामंड ने ऐसी सभी घटनाओं को ‘कृत्य’ निरूपित किया है, जो मानव इच्छा शक्ति के द्वारा नियंत्रित होती हैं। सामंड के अनुसार कृत्य के तीन चरण (stages) होते

(1) किसी शारीरिक या मानसिक क्रिया द्वारा उसका उद्भव या करने वाले की निष्क्रियता;

(2) उस कृत्य की परिस्थितियाँ; तथा

(3) उसके परिणाम।

सामंड द्वारा बताये गये कृत्य के उपर्युक्त तत्वों को एक उदाहरण द्वारा अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति कुल्हाड़ी मारकर किसी व्यक्ति की हत्या कर देता है, तो इस कृत्य में कार्य के उपर्युक्त तीनों तत्व विद्यमान हैं। हत्या करने का निश्चय तथा कुल्हाड़ी से प्रहार करना हत्या के कृत्य का उद्गम होगा।

4. The basic principal of criminal liability is embodied in the maxim actus non facit reum nisi mens sit rea.

5. इसे ‘Act of God’ या ‘vis major’ कहा जाता है.

कुल्हाड़ी में धार होना तथा उसके प्रहार से मृत व्यक्ति को गंभीर उपहति होना उक्त कृत्य की परिस्थितियाँ हैं। तथा मृतक की मृत्यु उस कृत्य का परिणाम होगा। किसी व्यक्ति के कृत्य के लिए उस पर शास्तिक दायित्व का निर्धारण करते समय न्यायालय द्वारा इन सभी बातों पर विचार किया जाना आवश्यक होता है।

सामंड ने उपर्युक्त परिभाषा को उचित निरूपित करते हुए कहा है कि शास्तिक दायित्व की आवश्यक शर्त के रूप में ‘कृत्य’ का व्यापक अर्थ ही स्वीकारना होगा। दंड विधि में व्यक्ति केवल स्वयं के ‘कृत्य’ या ‘घटना’ के लिए दायित्वाधीन होता है न कि किसी अन्य द्वारा कारित आपराधिक कृत्य या घटना के लिए।

उल्लेखनीय है कि दायित्व के आवश्यक तत्व के रूप में ‘कृत्य’ या ‘कार्य’ के अन्तर्गत लोप (omission) का भी समावेश है; अर्थात् कार्य-लोप के लिए भी व्यक्ति का दायित्व ठीक उसी प्रकार होता है, जिस प्रकार कि कार्य को करने के लिए।

कृत्य के विविध प्रकार (Kinds of acts)

1. स्वैच्छिक तथा अस्वैच्छिक कृत्य (Voluntary and Involuntary acts)

विधि के प्रयोजनों के लिए कृत्यों को स्वैच्छिक (voluntary) तथा अस्वैच्छिक (involuntary) कृत्यों के रूप में विभाजित किया जा सकता है। मनुष्य के हृदय का स्पन्दन (beating of heart), छींक आना, नींद में चलना आदि ऐसी घटनाएँ हैं, जो उसकी इच्छा या अनिच्छा के परे हैं, अतः ये उसके अस्वैच्छिक कृत्य कहलाते हैं। इसके विपरीत मनुष्य के वे कृत्य जो इसकी सहेतुक शारीरिक गतिशीलता के परिणामस्वरूप घटित होते हैं, उसके स्वैच्छिक कृत्य (voluntary act) कहलाते हैं जैसे-चलना, फिरना, दौड़ना, उठना, बैठना आदि।

2. आन्तरिक तथा बाह्य कृत्य (Internal and External acts)

आन्तरिक कार्य के अन्तर्गत मस्तिष्क की क्रिया समाविष्ट है, जबकि शारीरिक इन्द्रियों द्वारा किये गये बाह्य कृत्य (external acts) कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, किसी काम को करने के लिए उसके विषय में सोचना आन्तरिक कृत्य (internal acts) है जबकि मुँह से बोलना या हाथ से कोई कार्य करना बाह्य कृत्य (external acts) होता है। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक बाह्य कृत्य में आन्तरिक कृत्य निहित रहता है किन्तु यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक आन्तरिक कृत्य में कोई बाह्य कार्य सम्मिलित हो। शास्तिक दायित्व केवल बाह्य कार्य (external acts) के लिए ही उत्पन्न होता है।

3. आशय-युक्त तथा आशयरहित कृत्य (Intentional and Unintentional acts)

यदि कोई कृत्य किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया जाता है, तो उसे आशययुक्त कृत्य (intentional acts) कहते हैं। आशय-युक्त कृत्य में कर्ता को उसके परिणामों का पूर्वानुमान होता है तथा वह इन परिणामों की इच्छा से उस कृत्य को करता है। परन्तु यदि कोई कृत्य अकस्मात् या बिना इच्छा के घटित हो जाता है, तो उसे आशय-रहित (unintentional act) कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि ‘क’ द्वारा ‘ख’ पर इस इरादे से गोली चलाई जाती है कि ‘ख’ की मृत्यु हो जाये, तो ‘क’ का यह कृत्य ‘आशययुक्त कृत्य’ (intentional act) होगा तथा इसके लिए उसे दण्डित किया जायेगा। परन्तु यदि ‘क’ पेड़ पर बैठे किसी पक्षी को मारने के उद्देश्य से गोली चलाता है किन्तु वह गोली उस पेड़ पर छिपे बैठे हुए व्यक्ति को लगती है जिससे उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उस दशा में ‘क’ का कृत्य आशय-रहित माना जायेगा तथा उसे इस कृत्य के लिए शास्तिक दायित्व से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।

अपकारपूर्ण कृत्य (Wrongful acts)

अपकार (wrong) एक ऐसा कृत्य होता है जो विधि की दृष्टि से रिष्टिकर (mischievous) होता है। विधि के अन्तर्गत अपकार के दो प्रकार हैं

6. लोप से आशय ऐसे कृत्य के न किये जाने से है, जो उन परिस्थितियों में सामान्य व्यक्ति करेगा.

7. ऐसे अपकार जिनमें हानि साबित करना आवश्यक नहीं होता, स्वयं अनुयोज्य (actionable pt अतिचार (trespass), अपलेख (libel) आदि इसके उदाहरण हैं.

(1) ऐसे अपकार जिनमें कोई हानि हुई हो, जैसे अतिचार (Trespass), अपलेख (Libel) जो स्वयं वाद योग्य (actionable per se) होते हैं।

(2) ऐसे अपकार जो रिष्टिकर प्रवृत्तियों के कारण अपकार कहलाते हैं। प्रथम प्रकार के अपकारों के लिए वास्तविक हानि (damages) सिद्ध करना आवश्यक है, परन्तु दूसरे प्रकार के अपकारों में केवल रिष्टिकर कृत्य (mischievous act) घटित होना ही साबित करना पर्याप्त होता है तथा हानि सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती है।

सामान्यतः आपराधिक दायित्व उस स्थिति में उत्पन्न होता है, यदि यह साबित कर दिया जाये कि कृत्य खतरनाक या रिष्टिकारक (dangerous or mischievous) स्वरूप का था, भले ही इससे किसी को कोई नुकसान न हुआ हो। यही कारण है कि किसी अपराध को कारित करने के प्रयास में विफलता (Unsuccessful attempt to commit an offence) के लिये भी वैसा ही दायित्व अधिरोपित होता है मानो कि अपराध पूर्णतः घटित हुआ है। उदाहरणार्थ, लापरवाही से कार चलाना आपराधिक दायित्व उत्पन्न करता है भले ही इससे किसी को क्षति न हुई हो।

परन्तु अपकृत्य से उत्पन्न होने वाले दायित्व की स्थिति इससे भिन्न है। सिविल दायित्व उत्पन्न करने वाले कुछ मामले ऐसे होते हैं जिनमें वादी को वास्तविक हानि या नुकसानी साबित करना आवश्यक होता है जबकि कुछ मामलों में हानि या नुकसानी साबित किये बिना ही प्रतिवादी को दायित्वाधीन माना जाता है। इसे दो प्रमुख लैटिन सूत्रों द्वारा अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। ये सूत्र (Maxims) निम्नानुसार हैं-

क्षति बिना हानि (Domnum since injuria)

विधि की उपधारणा यह है कि समस्त अपकार (wrongs) रिष्टिकर कृत्य (mischievous act) होते हैं किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि सभी रिष्टिकर कृत्य अपकार हों। इसी प्रकार अपकारों के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वे हानिकर हों। अनेक मामलों में किसी व्यक्ति द्वारा दूसरों को जानबूझकर नुकसान पहुँचाये जाने पर भी विधि उस पर दायित्व आरोपित नहीं करती। ऐसे कृत्य जो हानिप्रद होते हए भी विधि में दायित्व उत्पन्न नहीं करते ‘क्षति के बिना हानि”(dammum sine injuria) के अन्तर्गत आते है |

क्षति बिना हानि के अन्तर्गत दो प्रकार के कृत्यों का समावेश है। प्रथमतः ऐसे कृत्य जिनसे किसी व्यक्ति विशेष को हानि होती है किन्तु सम्पूर्ण समाज लाभान्वित होता है, जैसे व्यापारिक प्रतिस्पर्धा। द्वितीयतः ऐसे कृत्य जो दूसरों के लिए हानिकारक हैं किन्तु उनकी तुच्छता (trivialty) या सबूत की कठिनाई के कारण विधि के अन्तर्गत उन्हें अनुयोज्य (actionable) नहीं माना जाता है। उदाहरण के लिए, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 95 में यह स्पष्टतः उपबन्धित है कि कोई बात यदि वह इतनी तुच्छ है कि सामान्य व्यक्ति उसके विषय में शिकायत करना उचित नहीं समझेगा, अपराध नहीं मानी जायेगी।10 |

इस सन्दर्भ में ऐतिहासिक इंगलिश निर्णीत-वाद मोगल स्टीमशिप कं० बनाम मेक्ग्रेजर एण्ड गो कं०11 (Mogul Steamship Co. V. Mc Gregor Gow & Co.) उल्लेखनीय है। इस वाद में समुद्री मार्ग से चाय के व्यापार में रत कुछ स्टीमशिप कम्पनियों ने बढ़ती हुयी व्यापारिक स्पर्धा के निवारण हेत एक संघ (Association) बनाया ताकि उन सभी के भाड़े एक समान हों। वादी कम्पनी इस संघ में शामिल नहीं हुयी परिणामतः उसका व्यापार ठप्प पड़ गया और उसे गम्भीर हानि हुयी। अत: वादी कम्पनी ने प्रतिवादी संघ (Association) के विरुद्ध नुकसानी (Damages) के लिये वाद प्रस्तुत किया। वाद को खारिज करते हये हाउस ऑफ लाईस ने विनिश्चित किया कि प्रतिवादियों का कृत्य (संघ बनाने का) एक-सा भाड़ा तय करने

8. धारा 279, भारतीय दंड संहिता.

9. धारा 279, भारतीय दण्ड संहिता। –

10. de minimis non curat lex (विधि तुच्छ बातों पर ध्यान नहीं देती).

11. (1889) 23 QBD 612 (HL); Allen v. Flood (1898) AC 1.

के उद्देश्य से होने के कारण व्यापार में एकरूपता तथा अनुचित स्पर्धा को रोकना था, इसलिये यह पूर्णत: वैध एवं उचित था, अत: इसे वादी के अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है, भले ही वादी को इसके कारण नुकसानी हुयी हो।

हानि बिना क्षति (Injuria sine damno)

अनेक कृत्य ऐसे होते हैं जो किसी प्रकार की हानि हुए बिना भी अनुयोज्य (actionable) होते हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के वैध अधिकार में बाधा पहँचाता है, तो अपकारित व्यक्ति अपकारी के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का वाद लाकर उससे क्षति प्राप्त कर सकता है, भले ही उसे कोई वास्तविक हानि न हुई हो।12 उदाहरणार्थ, किसी अन्य व्यक्ति की भूमि में उसकी अनुमति के बिना अनधिकृत प्रवेश ‘अतिचार’ कहलाता है। जो स्वयं अनुयोज्य है, अर्थात्, भूमि धारक को यह साबित नहीं करना पड़ता कि अतिचारी के अतिक्रमण के कारण उसे कोई वास्तविक हानि हुई है।

आपराधिक दायित्व और सिविल दायित्व में भेद को स्पष्ट करते हुये सामण्ड ने अभिकथन किया कि आपराधिक विधि यह कहती है कि “आपको यह (कृत्य) नहीं करना चाहिये, और यदि आप यह करोगे, तो आपको दण्डित नहीं किया जायेगा,” जबकि सिविल विधि कहती है कि आप यह (कृत्य) कर सकते हो, लेकिन यदि इससे कोई बुरा परिणाम (हानि) निकलता है, तो इसके लिये आप दायित्वाधीन होंगे।13।

आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea)

केवल विधि द्वारा वर्जित बाह्य कृत्य (external act) को करने में ही किसी व्यक्ति पर शास्तिक दायित्व आरोपित नहीं किया जा सकता है जब तक कि उसमें उस कृत्य को करने की आपराधिक मनः स्थिति (mens rea) विद्यमान न हो। आपराधिक मन:स्थिति (mens rea) शास्तिक दायित्व का मानसिक तत्व है। यदि कोई कृत्य आशय सहित (intentionally) या लापरवाही (negligently) से किया गया है, तो यह माना जायेगा कि उस कृत्य में आपराधिक मन:स्थिति का तत्व विद्यमान है। तात्पर्य यह है कि बिना आपराधिक मन:स्थिति (mens rea) के किसी व्यक्ति को उसके बाह्य कृत्य के लिए दण्डित नहीं किया जा सकता है।

कोई कृत्य आशय सहित किया गया तब माना जायेगा यदि उस कार्य को करने वाले व्यक्ति ने कृत्य के परिणामों के विषय में सोच-विचार कर लिया हो तथा उन परिणामों की इच्छा से ही उसने वह कृत्य किया हो। अत: यदि कोई व्यक्ति विधि द्वारा निषिद्ध किसी कृत्य के परिणामों की इच्छा रखते हुए उस कृत्य को करता है, तो उस व्यक्ति का वह कृत्य आशय सहित किया गया माना जायेगा तथा उस कृत्य के लिए उस व्यक्ति का शास्तिक दायित्व (penal liability) होगा।

इसी प्रकार अपने कृत्यों के परिणामों के प्रति अवांछित उदासीनता भी व्यक्ति की आपराधिक मन:स्थिति सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। इसे विधि में अनवधान उपेक्षा (inadvertent negligence) कहा गया है।

इंग्लिश विधि तथा भारतीय दण्ड विधि का मूलभूत सिद्धान्त है कि किसी कृत्य के लिए व्यक्ति को दण्डित करने के लिए उस कृत्य को करने की उसकी आपराधिक मनःस्थिति (mens rea) को साबित करना आवश्यक होता है। अतः किसी व्यक्ति पर शास्तिक दायित्व (penal liability) तब तक अधिरोपित नहीं किया जा सकता है जब तक कि उसके द्वारा किया गया कृत्य और उस कृत्य को करने की आपराधिक मन:स्थिति (mens rea) सिद्ध न हो जाए। इस सिद्धान्त को प्रसिद्ध इंग्लिश वाद आर० बनाम टालसन14 के मुकदमे में सविस्तार समझाया गया है। उक्त वाद में एक महिला ने, जिसके पति ने उसे त्याग दिया था, सात वर्ष की अवधि पूर्ण होने के पूर्व पुनर्विवाह किया था, जो कि बहुविवाह-सम्बन्धी कानून के विरुद्ध था। तथापि जूरियों ने उस महिला को निर्दोष घोषित किया क्योंकि उनके विचार से पुनर्विवाह के समय उस

12. ऐशबी बनाम ह्वाइट, (1703) 1ER 417.

13. सामण्ड : ज्यूरिसप्रूडेन्स (12वां संस्करण) पृ० 357.

14. R. V. Tolson, (1889) 15 Cox 629.

महिला की यह युक्तियुक्त धारणा थी कि उसके प्रथम पति की मृत्यु हो चुकी है। अत: पुनर्विवाह के कृत्य में आपराधिक मन:स्थिति (mens rea) के साबित न हो सकने के कारण उस महिला को दण्डित नहीं किया जा सका।

जैसा कि कथन किया जा चुका है, अपराध का सृजन केवल कृत्य से नहीं अपितु उसके साथ आपराधिक मन:स्थिति से होता है; अर्थात् आपराधिक मन:स्थिति (mens rea) अपराध का एक अनिवार्य तत्व है। परन्तु सर जे० स्टीफेन्स ने इस विचार की आलोचना करते हुए कहा है कि अपराध सम्बन्धी यह धारणा अनावश्यक तथा भ्रांति उत्पन्न करने वाली है। उनका विचार है कि वर्तमान में सभी अपराध भली-भाँति परिभाषित होने के कारण अपराधी के मन की विशिष्ट स्थिति या आपराधिक मन:स्थिति क्या थी, इस पर विचार किया जाना व्यर्थ होगा।

उल्लेखनीय है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 14 में मानसिक दशा के कतिपय ऐसे तत्वों का उल्लेख है जो किसी मनोदशा या शारीरिक भावना की विद्यमानता साबित करने के लिए सुसंगत माने गये हैं। इस धारा के अनुसार ऐसे तथ्य जो किसी व्यक्ति विशेष के प्रति किसी आशय, जानकारी, दुर्भावना, सद्भावना, या किसी शारीरिक भावना प्रदर्शित करने के द्योतक हैं, सुसंगत होंगे जब इनमें से कोई विवाद्यक तथ्य मामले में अन्तग्रस्त हों।

किसी अपराध के लिये व्यक्ति का दाण्डिक दायित्व (Penal liability) उसके (1) कृत्य या अकृत्य (act or omission) के स्वरूप, तथा (2) आपराधिक मन:स्थिति (mens rea) पर निर्भर करता है। सरसरी तौर पर यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक कृत्य (act) में तीन बातें होती हैं-

(1) उसका उद्भव (origin), जो मानसिक या शारीरिक गतिविधि द्वारा अभिव्यक्त होता है,

(2) वे परिस्थितियां जिनमें वह कृत्य कारित हुआ है, तथा

(3) उस कृत्य के परिणाम।

अत: किसी व्यक्ति को गोली मारकर उसकी मृत्यु कारित कर देने के कृत्य में, गोली चलाना इस कृत्य का मानसिक और शारीरिक तत्व (गतिविधि) है, तथा बन्दूक भरी हुयी होना और मृतक का उसकी फायरिंग रेंज में होना इस कृत्य की परिस्थितियां हैं, और मृत्यु उसका परिणाम है।

कुछ दशाओं में एक ही कृत्य को जब विभिन्न परिस्थितियों में कारित किया जाता है, तो वह गम्भीरतम रूप धारण कर लेता है। उदाहरणार्थ, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 456 में गृहभेदन (House-breaking) यदि रात्रि के समय कारित हो, तो वह गंभीर रूप का अपराध होगा जिसके लिए दिन के समय कारित गृहभेदन की तुलना में अधिक दण्ड दिये जाने का प्रावधान है।

दाण्डिक दायित्व उत्पन्न करने वाला कृत्य

(1) सकारात्मक हो सकता है या नकारात्मक। यदि व्यक्ति कोई ऐसा कृत्य करता है जो उसे नहीं करना चाहिये, तो वह सकारात्मक कहलायेगा परन्तु यदि कोई व्यक्ति ऐसा काम करने में लोप (ommission) करता है जो उसे करना चाहिये, तो इसे नकारात्मक कृत्य या लोप (omission) कहा जायेगा।

(3) कृत्य बाहय हो सकता है या आंतरिक (external or internal) । बाह्य कृत्य शारीरिक गतिविधि से उत्पन्न होता है जबकि आन्तरिक कृत्य मस्तिष्क (mind) से उद्भूत होता है।

(4) कत्य साशय (Intentinal) हो सकता है या बिना आशय के (unintentional) । आशय सहित किये गये कृत्य के परिणामों का अंदाजा (अनुमान) कृत्य करने वाले को पूर्व कल्पित रहता है जबकि आशय रहित कृत्य के परिणामों की पूर्व कल्पना उसे नहीं रहती है।

उच्चतम न्यायालय ने गुजरात राज्य बनाम आचार्य देवेन्द्र प्रसाद जी पाण्डे15 के वाद में दुराशय को परिभाषित करते हुए अभिनिर्धारित किया कि कोई भी दोषी मनोदशा (blamworthy mental condition),

15. ए० आई० आर० 1969 सु० को० 373.

चाहे वह सज्ञान हो या साशय या अन्यथा हो, दूषित मन:स्थिति (mens rea) कहलाती है। उदाहरणार्थ, भारतीय दंड संहिता की धारा 304-क के अधीन उतावलेपन (restrend) या उपेक्षापूर्ण कार्य से किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करना दण्डनीय अपराध है चाहे भले ही वह कृत्य साशय या जानबूझकर न किया गया हो।

आपराधिक मनःस्थिति के सिद्धान्त के अपवाद (Exceptions to the Doctrine of mens rea)

आधुनिक आपराधिक न्याय-प्रशासन में कुछ दशाओं में आपराधिक मन:स्थिति को अपराध का आवश्यक तत्व नहीं माना गया है। अत: इन परिस्थितियों में वास्तविक दुराशय या दूषित-मन न होने पर भी विधि के अन्तर्गत अपवाद स्वरूप गर्भित रूप से अपराधी का प्रलक्षित-दुराशय (Constructive mens rea) मानते हुए उसे दायी ठहराया जाता है। ये परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं

(1) ऐसे मामले जिनमें संविधि द्वारा कठोर दायित्व अधिरोपित होता है। उदाहरणार्थ-जन सुरक्षा तथा जन-स्वास्थ्य से सम्बन्धित प्रकरणों में कठोर दायित्व का सिद्धान्त अधिरोपित होता है। अत: औषधि विक्रेता, खाद्य तथा पेय पदार्थों के विक्रेता16, आयुध अधिनियम17 के अन्तर्गत कार्य करने वाले प्रतिष्ठान आदि पर इस प्रकार का कठोर दायित्व होता है तथा उनकी लापरवाही के परिणामस्वरूप होने वाले परिणामों के लिए वे दायी होंगे, भले ही उनकी आपराधिक मन:स्थिति न रही हो। मादक-द्रव्य एवं मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1988; अस्पृश्यता निवारण अधिनियम, 1955; अनुसूचित जाति एवं जनजाति (उत्पीड़न निवारण) अधिनियम, 1989; महिलाओं का अश्लील प्रदर्शन (निवारण) अधिनियम, 1986 आदि के अन्तर्गत कारित अपराधों के प्रति भी कठोर दायित्व का सिद्धांत लागू होता है तथा इनके परिणामों के लिए व्यक्ति को दंडित किया जाता है भले ही उस कृत्य को करने में उनका दुराशय न रहा हो।

(2) ऐसी परिस्थिति में जब आपराधिक मन:स्थिति सिद्ध करना कठिन हो तथा दण्ड मामूली जुर्माने के रूप में हो।

(3) लोक-अपदूषण के मामलों में आपराधिक मनःस्थिति पर विचार करना आवश्यक नहीं होता है और अपकारी पर दायित्व अधिरोपित कर दिया जाता है।

(4) ऐसे मामले जो दिखने में आपराधिक स्वरूप के होते हैं लेकिन वास्तव में सिविल अधिकार का उल्लंघन मात्र है। उदाहरणार्थ, निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का वैधानिक रूप से प्रयोग किया जाना अपराध नहीं माना जाता है18 भले ही वह साशय कारित हो। इसी प्रकार किसी मरीज का ऑपरेशन करना उसके जीवन को बचाने का एकमात्र उपचार होने की दशा में शल्य-चिकित्सक द्वारा किया गया ऑपरेशन अपराध नहीं माना जायेगा भले ही उस चिकित्सक को यह सम्भावना दिखलायी देती हो कि आपरेशन मरीज के लिये घातक सिद्ध हो सकता है।

(5) ऐसे प्रकरण जिनमें अपराधी द्वारा विधि की अनभिज्ञता का तर्क प्रस्तुत किया जाता है। यह अपवाद इस सूत्र पर आधारित है कि विधि का अज्ञान अपराध-मार्जन नहीं करता।19

सामाजिक-आर्थिक अपराधों में आपराधिक मनःस्थिति (mens-rea in Socio-Economic offences)

यह सर्वविदित है कि सामाजिक-आर्थिक अपराध परम्परागत अपराधों की तुलना में अधिक गम्भीर होते हैं क्योंकि इनसे जनसाधारण का स्वास्थ्य, तथा खुशहाली के साथ-साथ परे समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता।

16. खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 की धारा 19.

17. आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 35.

18. देवनारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1973 स० को० 473, साहेब सिह बनाम (1986) क्रि० लॉ ज० 12853; योगेन्द्र मुरारजी बनाम गजरात राज्य, ए० आई० आर० 1980 F०

19. Ignorance of Law is no excuse.

है तथा राष्ट्र की आर्थिक स्थिति बिगड़ती है। अतः इन अपराधों के लिये कठोर दण्ड दिये जाने की दण्डनीति अपनायी गयी है तथा इसमें अपराधी की आपराधिक मन:स्थिति या दुराशय को विशेष महत्व नहीं दिया जाता है। इन अपराधों के लिये दुराशय को इसलिये अपवर्जित (exclude) किया गया है क्योंकि ये अपराध कठोर दायित्व (Strict liability) के सिद्धान्त द्वारा प्रशासित होते हैं और इनके सम्बन्ध में उपधारणा (Presumption) यह रहती है कि अपराध कृत्य में अपराधी का दुराशय अवश्य ही रहा होगा।20

आशयतथा हेतुमें भेद (Distinction between Intention and Motive)

‘आशय’ (intention) का अर्थ है किसी कृत्य के सम्भावित परिणामों को जानते हुए उन परिणामों की कामना से उस कृत्य को करना। अत: स्पष्ट है कि आशय का सम्बन्ध कार्य के निकटतम प्रयोजन से है। परन्तु उस कृत्य को करने के अन्तिम उद्देश्य को हेतु (motive) कहा जाता है। आशय और हेतु के अन्तर को एक दृष्टान्त द्वारा अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। बेरोजगारी (unemployment) की चपेट में आये हुए किसी व्यक्ति के बच्चे यदि भूख से तड़प रहे हों तथा वह व्यक्ति विवश होकर अपने बच्चों की जीवन-रक्षा के उद्देश्य से किसी व्यक्ति के किचन में घुसकर कुछ रोटियाँ चुराकर ले आता है, तो ऐसी दशा में उस व्यक्ति का आशय चोरी करने का था, किन्तु उसका उद्देश्य बच्चों को भूखों मरने से बचाना था। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति किसी कन्जूस धनाढ्य व्यक्ति के घर में घुसकर उसका धन इस प्रयोजन से लूट लाता है कि उस धन को गरीबों में बाँटकर उनका दारिद्र्य दूर किया जा सके, तो ऐसी दशा में उस व्यक्ति का उद्देश्य अच्छा होते हुए भी उसका आशय (intention) चोरी करने का था। अत: उसे चोरी के लिए दण्डित किया जायेगा।

आर० बनाम शार्प21 के इंग्लिश वाद में अभियुक्त ने अपनी मृत माता के दफनाये हुए शव को कब्र से खोदकर इस उद्देश्य से निकाला कि उसे कुछ दूर स्थित अपने मृत पिता की कब्र के पास दफना देगा। यद्यपि इस कृत्य में अभियुक्त का हेतु पवित्र था परन्तु फिर भी उसे गड़ा हुआ मुर्दा उखाड़ने के अपराध के लिए दण्डित किया गया।

उल्लेखनीय है कि दायित्व का निर्धारण करते समय न्यायालय द्वारा कर्ता के आशय (intention) पर ही विचार किया जाता है तथा कार्य करने का हेतु (motive) असंगत (irrelevant) होता है। तथापि हेतु के आधार पर विचाराधीन कृत्य के परिणाम के विषय में अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है। गां उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि विधि की दृष्टि में मनुष्य के कृत्य का ‘हेतु’ या ‘उद्देश्य’ विशेष महत्व नहीं रखता है। सामान्यत: कोई भी कृत्य जो अन्यथा वैध है, इस कारण विधि-विरुद्ध नहीं होगा कि वह बुरे हेतु से किया गया है। इसके विपरीत, कोई भी कृत्य जो अन्यथा अवैध है, न्याय-संगत नहीं माना जा सकेगा भले ही वह कितने ही अच्छे उद्देश्य से क्यों न किया गया हो। व्यक्ति के किसी अपकार या अपराध के विषय में निर्णय देते समय न्यायालय इस बात पर विचार करेगा कि उसने कौन-सा कृत्य किया है, न कि इस ओर कि उसने वह कृत्य किस उद्देश्य या हेतु से किया है। तात्पर्य यह है कि बुरा हेतु (bad motive) किसी प्रथम दृष्ट्या वैध कृत्य को अवैध कृत्य में परिणित नहीं कर सकता और न अच्छा हेतु (good motive) अवैध कृत्य को विधिमान्य ही बना सकता है तथापि कुछ अन्य दशाओं में ‘हेतु’ कृत्य की वैधता के निर्धारण में सुसंगत होता है। ये दशाएँ हेतु-विषयक उपर्युक्त सामान्य नियम के अपवाद रूप में नीचे दी गई

(i) आपराधिक प्रयत्न (Criminal Attempt)

आपराधिक प्रयत्न के कृत्य पर विचार करते समय न्यायालय उस कृत्य के पीछे अपराधी के वास्तविक देत (motive) पर विचार अवश्य करेगा। ऐसे मामलों में यद्यपि कृत्य स्वयं अपकारपूर्ण नहीं होता है परन्तु उसके पीछे छिपे हुए वास्तविक हेतु के कारण वह आपराधिक प्रयत्न के रूप में दण्डनीय बन जाता है।

20 महाराष्ट्र राज्य बनाम एम० एच० जाज, ए० आई० आर० 1965 सु० को०722; मंगलदास बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए० Se आई० आर० 1966 सु० को० 128 आदि.

21. (1881) 7 Cox. 214.

उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति किसी तालाब में कूद पड़ता है, तो उसका निकटस्थ प्रयोजन (immediatel nnse) पानी में गिर पड़ने का है जो किसी प्रकार से अवैध नहीं है किन्तु यदि तालाब के कूदने में उसका अन्तिम हेतु (motive) आत्महत्या करने का है, तो वह कार्य आत्महत्या करने के आपराधिक प्रयत्न22 के रूप। में दण्डनीय होगा।

(ii) जहाँ हेतु स्वयं ही किसी अपराध का आवश्यक तत्व हो (Where motive itself is an ingredient of the offence)

कुछ अपराध ऐसे हैं जिनमें हेतु आवश्यक तत्व के रूप में विद्यमान रहता है, अर्थात् ‘हेतु’ के बिना वे अपराध घटित नहीं हो सकते। इस प्रकार के अपराधों या अपकृत्य में हेतु सुसंगत (relevant) होता है। जैसे, कटरचना (forgery) के अपराध में मिथ्या दस्तावेज कपट करने के इरादे से ही बनाये जाते हैं। अत: कपट करने का इरादा ही ‘हेतु’ है जो कूटरचना (forgery) के अपराध के लिये सुसंगत है। इसी प्रकार आपराधिक अतिचार (criminal trespass) के मामले में अतिचारी किसी व्यक्ति की सम्पत्ति में इस विनिर्दिष्ट प्रयोजन से हस्तक्षेप या प्रवेश करता है कि वह व्यक्ति अभित्रस्त हो जाए। यदि यह हेतु सिद्ध नहीं किया जाता, तो इसके अभाव में यह कृत्य केवल सिविल अतिचार मात्र होगा जिसके लिए वादी क्षतिपूर्ति की माँग कर सकता

(ii) प्रतिवाद के रूप में हेतुकी सुसंगति (Relevance of motive as a factor in defence)

दाण्डिक या अपकार-सम्बन्धी दायित्व के निर्धारण के समय प्रतिरक्षा कार्यवाही में ‘हेत’ या उद्देश्य को सुसंगत माना गया है। अत: यदि मानहानि के वाद में प्रतिवादी द्वारा अपनी प्रतिरक्षा में ‘उचित समालोचना’ (fair comment) का तर्क प्रस्तुत किया जाता है, तो यह प्रश्न सुसंगत होगा कि क्या वह समालोचना किसी अनुचित हेतु के कारण की गई थी? विद्वेषपूर्ण अभियोजन (malicious prosecution) के वाद में भी इस बात की जाँच करना आवश्यक होता है कि क्या अभियोजन अनुचित उद्देश्य या प्रयोजन से चलाया गया था?

(iv) दायित्व के निर्धारण में हेतुएक आवश्यक तत्व होता है। (Motive as a factor in fixing the measure of liability)

किसी अपराधी या अपकारी की दोषसिद्धि हो जाने के पश्चात् उसे दण्ड का निर्धारण करते समय न्यायालय अन्य बातों के साथ अपराधी या अपकारी द्वारा उस अपराध या अपकार को किये जाने के उद्देश्य से या हेतु’ पर विचार करता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति अपने बच्चों को भूख के कारण मरने से बचाने के लिए कुछ रोटियाँ चुरा लाता है, तो वह चोरी के अपराध के लिये दण्डित तो किया जायेगा किन्तु उसका दण्ड उस अपराधी से भिन्न होगा जिसने किसी बच्चे के शरीर से कोई आभूषण चुराया है। अत: अपराध की गम्भीरता तथा उसके लिए दण्ड की मात्रा का निर्धारण करते समय न्यायालय उस कृत्य के पीछे अन्तर्निहित वास्तविक उद्देश्य या हेतु पर विचार अवश्य करेगा क्योंकि दण्ड-निर्धारण के लिए यह एक सुसंगत तत्व है।

आवश्यकता से प्रेरित होकर किया गया अपराध या अपकृत्य (jus necessitatis)

कभी-कभी मनुष्य आवश्यकता के अधीन अपराध या अपकृत्य करने के लिए बाध्य हो जाता है। इस प्रकार के मामलों में हेतु के औचित्य के आधार पर अपकारी को अपने आपराधिक कृत्य से दोष-मुक्ति मिल सकती है। विधि के अन्तर्गत यह उपधारणा है कि यदि कार्य आवश्यकता से प्रेरित होकर किया गया है, तो उसे सदोष नहीं माना जाता, भले ही वह जानबूझकर क्यों न किया गया हो। विधि की यह उपधारणा इस

22. धारा 309, भारतीय दण्ड संहिता। रथीनम नागभूषण पटनायक, ए० आई० आर० 1994 सू० को० 844 के निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के आधार पर असंवैधानिक घोषित किया था लेकिन ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1996 स० को 946 के निर्णय ने उक्त निर्णय को पलट दिया है और अब यह धारा वैध है.

सिद्धान्त पर आधारित है कि “आवश्यकता किसी नियम को नहीं मानती”,23 अर्थात् आवश्यकता की दशा में सामान्य नियमों को नजरंदाज किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी मकान में भयंकर आग गई है तथा उसकी ऊपरी मंजिल पर किसी बालक के चीखने की आवाज आ रही है और कोई व्यक्ति उस बच्चे को आग से बचाने के प्रयत्न में उसे ऊपरी मंजिल से आस-पास खड़ी भीड में इस पर्व सचना के साथ फेंक देता है कि लोग उस बालक को झेल लें। परन्तु यदि दुर्भाग्यवश इस कृत्य के परिणामस्वरूप बालक जमीन पर नीचे आ गिरता है और बुरी तरह आहत हो जाता है, तो ऐसी दशा में उस व्यक्ति द्वारा किया गया कृत्य आवश्यकता के वशीभूत होकर किया कृत्य माना जायेगा और उसे दण्डित नहीं किया जायेगा।

आवश्यकता से प्रेरित कृत्य को दण्डनीय नहीं माना जाता है। किन्तु यह नियम हत्या जैसे गम्भीर अपराधों के प्रति लागू नहीं होगा। डडले बनाम स्टीफेन्स24 के वाद में न्यायालय ने निर्णय दिया कि उस व्यक्ति को, जो भूख से मरने की स्थिति में किसी दूसरे व्यक्ति का मांस खाकर अपनी प्राण-रक्षा के उद्देश्य से किसी व्यक्ति की हत्या करता है, आवश्यकता के आधार पर हत्या के अपराध से दोष-मुक्त नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दों में, हत्या का अपराध किसी भी दशा में क्षम्य नहीं होगा, भले ही वह कितनी ही आवश्यकता से प्रेरित क्यों न किया गया हो।

निर्दोषिता की उपधारणा (Presumption of Innocence)

दण्ड विधि का यह सुस्थापित सिद्धान्त है कि प्रत्येक व्यक्ति को निर्दोष माना जायेगा जब तक कि वह दोषसिद्ध नहीं हो जाता है। इसीलिये किसी अपराध के आरोपी को इस बात के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता है कि वह अपना अपराध स्वीकार करे। न्यायालय के समक्ष विचारण के लिये प्रस्तुत आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाएगा जब तक कि अभियोजन पक्ष द्वारा साक्ष्य के आधार पर उसका अपराध साबित नहीं कर दिया जाता परन्तु इस सिद्धान्त के कतिपय अपवाद हैं जो निम्नानुसार हैं

(1) न्यायालय यह उपधारित (Presume) कर सकेगा कि व्यक्ति जिसके कब्जे में चोरी की सम्पत्ति पायी जाती है, स्वयं चोर है या चोरी की सम्पत्ति रखने का दोषी है, जब तक कि वह व्यक्ति उस सम्पत्ति को अपने कब्जे में रखने का कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे देता 25

(2) जहां अभियुक्त अपने अपराध के बचाव में कोई तर्क प्रस्तुत करता है, तो न्यायालय को उसे निर्दोष नहीं मानना चाहिये तथा उस अभियुक्त का बचाव विफल होने की दशा में उसे दण्डादिष्ट करना चाहिये।

(3) भारतीय दण्ड विधि में ट्रेडमार्क26, सम्पत्ति मार्क27, करेन्सी नोट्स28 आदि जैसे कुछ अपराध हैं, जहां निर्दोषिता की सिद्धि का भार (burden of proof) अभियोजन पक्ष के बजाय अभियुक्त को अन्तरित हो जाता है। उदाहरणार्थ, रेल में कोई यात्री बिना टिकट यात्रा करता हुआ पकड़ा जाने पर यह सिद्ध करने का भार उसी पर होगा कि उसके पास टिकट था और वह बिना टिकट यात्रा नहीं कर रहा था।

दुर्भाव या विद्वेष (Malice)

सामान्यतः दुर्भाव से आशय है दुराशय (ill-will)। लेकिन विधिक दृष्टि से इसे ऐसा गलत कृत्य कहा जा सकता है जो किसी व्यक्ति के विरुद्ध जानबूझकर या बिना किसी औचित्य के किया गया हो। यदि

23. (necessitatis non habet legum).

24. ((1884) 14 QBD 273.

25. साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 का दृष्टान्त (क)..

26. धारा 486, भारतीय दण्ड संहिता.

27. धारा 487, भारतीय दण्ड संहिता.

28. धारा 489-ई, भारतीय दण्ड संहिता.

किसी व्यक्ति को कोई कार्य करने का वैधानिक अधिकार हो तो ऐसे कृत्य के लिये उस व्यक्ति के विरुद्ध वाद दायर नहीं किया जा सकेगा, भले ही उससे किसी अन्य व्यक्ति को हानि क्यों न हुयी हो। उदाहरणार्थ, मेयर ऑफ ब्रेडफोर्ड बनाम पिकल्स29 वाद में वादी ने अपनी भूमि में एक कुआं खोदा जिसके कारण प्रतिवादी की भूमि की ओर बहाव वाला भूमिगत जल प्रभाव रुक गया और उसका कुआं सूख गया। वादी द्वारा प्रतिवादी के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का वाद संस्थित किया जाने पर न्यायालय ने विनिश्चित किया कि प्रतिवादी क्षतिपूर्ति के लिये दायित्वाधीन नहीं था भले ही वादी ने कुआं खोदने का कार्य जानबूझकर प्रतिवादी के प्रति दुराशय से ही क्यों न किया हो, क्योंकि वादी को अपनी भूमि पर कुआं बनाने का अधिकार प्राप्त था।30

उपेक्षा या असावधानी (Negligence)

अपकार से सम्बन्धित आशय (intention) पर विचार कर लेने के पश्चात् उपेक्षा या असावधानी की व्याख्या करना युक्तियुक्त होगा।

उपेक्षा का अर्थ (Meaning of Negligence)

विधिक दृष्टि से आपराधिक असावधानी (culpable carelessness) या ‘गफलत’ को ‘उपेक्षा’ (Negligence) कहते हैं। न्यायाधीश विलीस के शब्दों में-“उपेक्षा ऐसी सावधानी का अभाव है जो प्रतिवादी का कर्तव्य था कि उसका पालन करता।”31

सामण्ड के अनुसार “उपेक्षा प्रधानतः किसी व्यक्ति के आचरण तथा उसके परिणामों के सम्बन्ध में अवांछित उदासीनता की मानसिक प्रवृत्ति है।”32 यदि कोई व्यक्ति अपने कृत्य के परिणाम के सम्बन्ध में पूर्णतया उदासीन या लापरवाह रहता है, तो उसका यह कृत्य उपेक्षापूर्ण कार्य कहलायेगा।

ऑस्टिन ने उपेक्षा को परिभाषित करते हुए लिखा है कि किसी निश्चित कर्त्तव्य के लोप (omission of a positive duty) को ‘उपेक्षा’ कहते हैं; अर्थात् उपेक्षा के लिये दोषी व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करने की परवाह नहीं करता जिसे करने के लिये वह आबद्ध है और इस प्रकार वह निश्चयात्मक कर्त्तव्य का भंग करता है।

हालैण्ड के अनुसार ‘उपेक्षा’ ऐसी असावधानी है जो एक ओर तो दूसरों की उपहति (dolus) तथा दूसरी ओर परिणामों को सोचने का पूर्ण अभाव है। उनका कहना है कि किसी वैध कर्त्तव्य को न करना या उसे लापरवाही से करना ‘उपेक्षा’ कहलाता है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि वैध कर्त्तव्य को करने में लोप (omission) को उपेक्षा कहते हैं, अर्थात् यदि वैध कर्त्तव्य की ओर ध्यान दिया जाता, तो जो क्षति हुई है वह न होती। इससे यह स्पष्ट है कि उपेक्षा में आशय का होना आवश्यक नहीं है। दूसरे शब्दों में, यह आवश्यक नहीं है कि उपेक्षा या असावधानी जानबझकर की गई हो। विधिक दृष्टि से किसी भी वैध कर्त्तव्य को न करना उपेक्षा का अपकार कहलाता है। वस्तुस्थिति यह है कि उपेक्षा (असावधानी) और आशय दोनों परस्पर-विरोधी शब्द हैं क्योंकि असावधानी से किये गये कार्य का परिणाम आशयित नहीं होता है। इसके विपरीत जो कार्य किसी निश्चित आशय से किया गया हो, उसे असावधानी से किया गया नहीं कहा जा सकता है।

प्रत्येक व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपना कृत्य सावधानीपूर्वक करे ऐसा न करना उपेक्षा (negligence) का अपकार होगा। यदि किसी व्यक्ति द्वारा असावधानी से कार्य किये जाने के परिणामस्वरूप किसी अन्य को क्षति होती है, तो अपकारित व्यक्ति प्रतिवादी के विरुद्ध ‘उपेक्षा’ के लिए वाद ला सकता

29. (1895) ए० सी० 582.

30. cd, Moghul Stamship Co. v. Mc. Gregor & Gow Co, (1892) AC 25 (HL).

31. Willis J. in Grill v. General , Iron Screw Colliery Co., (1866) LR 1 CP 612 observed that, “negligence is the absence of such care as it was the duty of the defendant to use…”

32. Negligence is the mental attitude of undue indifference with respect to one’s conduct and its consequences.’-Salmond : Jurisprudence (12th ed.) p. 390.

है।33 उपेक्षा (Negligence) के वाद में वादी को प्रतिवादी के विरुद्ध निम्नलिखित बातें साबित आवश्यक है, इन्हें उपेक्षा के आवश्यक तत्व कहा जाता है

(1) प्रतिवादी का वादी के प्रति सावधानी बरतने का विधिक कर्त्तव्य होना:

(2) प्रतिवादी द्वारा उस कर्त्तव्य का भंग किया जाना; तथा

(3) परिणामतः वादी को हानि होना।

उपेक्षा के प्रकार (Kinds of Negligence)

विधि के अन्तर्गत उपेक्षा के दो प्रकार हैं जिन्हें क्रमशः (1) अवधानिक उपेक्षा (Advertent Negligence) तथा (2) अनवधानिक उपेक्षा (Inadvertent Negligence) कहा गया है। – अवधानिक उपेक्षा में किसी व्यक्ति को हानि कारित होने की सम्भावना का पूर्वानुमान तो रहता है लेकिन हानि पहुँचाने की इच्छा विद्यमान नहीं रहती है। उदाहरण के लिए, किसी रोगी का इलाज करने में यदि चिकित्सक ऑपरेशन के सम्भावित खतरों को जानते हुए भी उस रोगी की शल्यचिकित्सा (surgical operation) करता है तथा इससे मरीज की हालत और बिगड़ जाती है, तो उस दशा में चिकित्सक का कृत्य अवधानिक उपेक्षा (Advertent Negligence) कहा जायेगा, परन्तु यदि वह चिकित्सक अज्ञानतावश अथवा भूल के कारण उस मरीज का ऑपरेशन गलत ढंग से करता है, तो वह अनवधानिक उपेक्षा (inadvertent Negligence) के लिये दोषी होगा।

अवधानिक उपेक्षा और अनवधानिक उपेक्षा के विभेद को एक अन्य उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। अवधानिक उपेक्षा को दुःसाहस (recklessness) भी कहा जाता है। जहां कोई व्यक्ति अपनी कार भीड़ भरे बाजार में यह जानते हुये भी कि इससे किसी भी व्यक्ति से टक्कर हो सकती है और उसे क्षति कारित होने का खतरा है, अन्धाधुन्ध गति से चलाता है, तो वह अवधानिक उपेक्षा का दोषी होगा क्योंकि उसे दुर्घटना होने की सम्भावना का ज्ञान था लेकिन उसका दुर्घटना कारित करने का आशय नहीं है। परन्तु यदि वह दुर्घटना के बारे में बिना सोचे-समझे तेज गति से बीच बाजार में अपनी कार चलाता है, जो इसे उसकी अनवधानिक उपेक्षा (inadvertant negligence) माना जायेगा।

उपेक्षा की कम-अधिक मात्रा (Degrees of Negligence)

रोमन विधि के अन्तर्गत उपेक्षा की कम-अधिक मात्रा (degree of negligence) को स्वीकार किया गया है। इस विधि के अनुसार उपेक्षा (negligence) गम्भीर स्वरूप की हो सकती है तथा नगण्य स्वरूप की भी। गम्भीर उपेक्षा को रोमन में घोर उपेक्षा (gross negligence) या सदोष प्रमाद (culpa lata) कहा गया है जबकि नगण्य उपेक्षा को अल्प उपेक्षा (slight negligence) की संज्ञा दी गई है। परन्तु इंग्लिश विधि के अन्तर्गत उपेक्षा के गम्भीर तथा अल्प स्वरूप के भेद को स्वीकार नहीं किया गया है। यही कारण है कि सामण्ड ने उपेक्षा की कम-अधिक मात्रा को अस्वीकार करते हुए कहा है कि उपेक्षा की मात्रा सदैव एक-सी रहती है।34 अत: उपेक्षा के मामलों में सदैव एक ही मापदण्ड अपनाया जाना चाहिए तथा दण्ड के निर्धारण में गम्भीर तथा नगण्य उपेक्षा में विभेद नहीं किया जाना चाहिए।

उपेक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त (Theories of Negligence)

उपेक्षा का व्यक्तिनिष्ठ सिद्धान्त (Subjective Theory of Negligence)-उपेक्षा के निश्चित अर्थ के सम्बन्ध में दो परस्पर-विरोधी धारणाएँ हैं जो उपेक्षा के सिद्धान्त के रूप में प्रचलित हैं। प्रथम धारणा यह है कि उपेक्षा मानसिक स्थिति है।35 इस सिद्धान्त के मुख्य समर्थक सामण्ड हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी

33. डोनोघ बनाम स्टीवेन्सन, (1932) AC 526; ग्रांट बनाम आस्ट्रेलियन नीटिंग मिल्स लि०, (19362 ए० सी० 85 आदि के वाद.

34. There are no degrees of negligence-Salmond.

35. Negligence is a state of mind.

व्यक्ति के आचरण (conduct) और उसके परिणामों (consequences) के सम्बन्ध में अवांछनीय उदासीनता की मानसिक प्रवृत्ति ‘उपेक्षा’ कहलाती है। इसे उपेक्षा का व्यक्तिनिष्ठ सिद्धान्त कहा गया है।

उपेक्षा का वस्तुनिष्ठ सिद्धान्त (Objective Theory of Negligence)-उपेक्षा के द्वितीय सिद्धान्त के अनुसार उपेक्षा मानसिक स्थिति नहीं है बल्कि आचरण का स्तर है। इस विचारधारा के मुख्य प्रवर्तक सर फ्रेड्रिक पोलक हैं जिन्होंने यह विचार व्यक्त किया है कि उपेक्षा व्यक्तिनिष्ठ न होकर वस्तुनिष्ठ है। उनके अनुसार सावधानी बरतने के कर्त्तव्य का भंग ‘उपेक्षा’ माना जायेगा। उदाहरण के लिए, रात के समय बिना हेड-लाइट के कार चलाना उपेक्षा है क्योंकि अपघात बचाने के लिए हेड-लाइट जलाकर गाड़ी चलाने की सावधानी प्रायः सभी सामान्य चालक बरतते हैं। सावधानी बरतना (to take care) मानसिक स्थिति मात्र नहीं। होती है। इसे उपेक्षा का वस्तुनिष्ठ सिद्धान्त कहा गया है। इस सिद्धान्त के अन्तर्गत उपेक्षापूर्ण कार्य के लिए। व्यक्ति की उपेक्षा का निर्धारण इस आधार पर किया जाता है कि उस परिस्थिति में एक सामान्य व्यक्ति का आचरण क्या होता और वह कितनी सावधानी बरतता।

उपर्युक्त सिद्धान्तों में से उपेक्षा-सम्बन्धी व्यक्तिनिष्ठ सिद्धान्त (Subjective Theory of Negligence) अधिक व्यावहारिक प्रतीत होता है। इस कथन की यथार्थता इस बात से प्रकट होती है कि अनेक मामलों में यह निष्कर्ष निकालना कि मनुष्य ने असावधानी बरती अथवा नहीं. उसकी मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। इसी प्रकार इस सिद्धान्त की एक अन्य उपादेयता यह है कि इससे आशय (intention) तथा उपेक्षा में अन्तर स्पष्ट हो जाता है। जानबूझकर अपकृत्य करने वाला व्यक्ति हानिकारक परिणामों की अपेक्षा करता है तथा इस आशय से कार्य करता है कि वांछित हानि हो जाये। परन्तु उपेक्षा में ऐसे हानिकर परिणामों की इच्छा नहीं होती तथापि अधिकतर वादों में अपकारी व्यक्ति असावधान रहता है तथा परिणामों की ओर ध्यान नहीं देता है।

विधि में उपेक्षा के व्यक्तिनिष्ठ सिद्धान्त का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि अनेक मामलों में यह निष्कर्ष निकालने के लिए कि दोषी व्यक्ति ने असावधानी बरती है अथवा नहीं, उसकी मानसिक स्थिति पर विचार करना आवश्यक होता है। विशेषतः आपराधिक विधि में यह जानने के लिए कि अपराधी द्वारा किया गया अपराध जान-बूझकर (साशय) किया गया है या उपेक्षा (negligence) से, उसके आशय तथा उद्देश्य आदि पर विचार करना आवश्यक होता है। यह उपेक्षा के व्यक्तिनिष्ठ सिद्धान्त द्वारा ही सम्भव है।

उल्लेखनीय है कि ग्लेनवाइल विलियम्स (Glanville Williams) ने उपेक्षा से सम्बन्धित उपर्युक्त दोनों सिद्धान्तों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास करते हुए कहा है कि ये सिद्धान्त एक दूसरे के विरोधी न होकर एक ही समस्या के दो पहलू मात्र हैं। उपेक्षा के मामले में यह विनिश्चित करने के लिए कि अपकारकर्ता किसी अमुक परिणाम का आशय रखता था या वह परिणाम के प्रति उदासीन था, व्यक्तिनिष्ठ सिद्धान्त सहायक होगा जबकि यह सुनिश्चित करने के लिए कि अपकारकर्ता द्वारा किया गया कृत्य ‘उपेक्षा’ माना जाए अथवा नहीं, वस्तुनिष्ठ सिद्धान्त का सहारा लेना होगा। इसके अन्तर्गत विचारणीय प्रश्न यह होता है कि उस परिस्थिति में एक सामान्य व्यक्ति का क्या आचरण होता है। यदि अपकारकर्ता का व्यवहार सामान्य व्यक्ति जैसा रहा है, तो उसे उपेक्षापूर्ण कार्य नहीं कहा जायेगा अन्यथा वह उपेक्षा के लिए दायी होगा।

उपेक्षा सम्बन्धी ऑस्टिन के विचार

जॉन ऑस्टिन (Austin) के अनुसार उपेक्षा (Negligence) आवश्यक रूप से असावधानी में निहित है। उनके विचार से सावधानी की कमी जो कि व्यक्ति को कर्त्तव्य के रूप में बरतनी चाहिये, उपेक्षा की मल भावना है।36 आशय यह है कि किसी कृत्य को करते समय उसकी वास्तविक प्रकृति, परिस्थिति तथा परिणाम के बारे में विचार न करना तथा उसे सावधानी से न करना ‘उपेक्षा’ (Negligence) कहलायेगा। उपेक्षा का दोषी व्यक्ति वह है जो यह नहीं जानता कि उसका कृत्य अपकार है, किन्तु यदि वह इस सम्बन्ध में अवांछित उदासीनता न रखता, तो वह जान सका होता कि उसके कार्य के परिणाम अपरिपूर्ण हो सकते हैं।

36. Want of advertence which one’s duty would naturally suggest is the fundamental or radical idea in the conception of negligence.–Austin.

ऑस्टिन के उपेक्षा सम्बन्धी उपर्युक्त विचारों से सामण्ड सहमत नहीं हैं। सामण्ड का कथन है कि सभी प्रकार की अनवधानता (inadvertence) को उपेक्षा कहना भूल है। उपेक्षा अवधानता (advertence) से अथवा हानिकारक परिणामों की सम्भावना की जानकारी सहित भी हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति किसी कृत्य के परिणामों का पूर्वानुमान रहते हुए भी उस कृत्य को करने का दुस्साहस करता है, तो उसकी इच्छा हानि पहुँचाने की न होने पर भी उसे उपेक्षा (Negligence) के लिए दोषी माना जायेगा। परन्तु सामण्ड की यह आलोचना उचित प्रतीत नहीं होती है क्योंकि ऑस्टिन ने उपेक्षा के संदर्भ में अनवधानता (inadvertence), अविचारिता (heedlessness) तथा दुस्साहस (recklessness) में भेद स्पष्ट करते हुए इनकी पृथक्-पृथक् व्याख्या की है।

ऑस्टिन के अनुसार अनवधानता (inadvertence) मनुष्य की वह मानसिक स्थिति है जब वह परिणामों को जाने बिना या उनकी इच्छा या चिन्ता किये बिना कोई कृत्य करता है।

अविचारिता (heedlessness) में मनुष्य को किसी कृत्य के सम्भावित परिणामों का पूर्वाभास तो रहता है किन्तु वह यह इच्छा नहीं रखता कि वे परिणाम घटित हों। इसे अवधानिक उपेक्षा (advertent negligence) कहते हैं।

दुस्साहस (recklessness) के अन्तर्गत व्यक्ति को अपने कत्य के परिणामों की सम्भावना तो रहती है किन्तु वह उनसे बचना चाहता है तथा इन परिणामों से बचने के युक्तियुक्त कारणों के बिना वह कृत्य कर डालता है। दूसरे शब्दों में, मूर्खतापूर्ण साहस को दुस्साहस कहते हैं। दुस्साहस प्रायः अविचारिता (recklessness) का समानार्थी शब्द है।

कठोर दायित्व का नियम (Rule of Strict Liability)

सामान्यतः विधि के अन्तर्गत व्यक्ति का दायित्व उसकी उपेक्षा या असावधानी के लिए होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी कृत्य को करने में असावधानी बरतता है और इससे दूसरों को क्षति होती है, तो उस व्यक्ति पर क्षतिपूर्ति का दायित्व रहता है। परन्तु दायित्व सम्बन्धी इस सामान्य नियम के कुछ अपवाद हैं। अनेक कृत्य ऐसे होते हैं जिनके लिए व्यक्ति ‘अनिवार्यतः’ दायी रहता है, चाहे उसने वह कार्य जान-बूझकर किया हो या लापरवाही से अथवा बिना किसी आशय के। ऐसे मामले कठोर दायित्व (Strict Liability) के अन्तर्गत आते हैं। कुछ विधिशास्त्रियों ने ‘कठोर दायित्व’ को ‘आत्यन्तिक दायित्व’ (Absolute Liability) भी कहा है।

किसी आत्यन्तिक कर्त्तव्य का भंग किये जाने के परिणामस्वरूप कठोर दायित्व उत्पन्न होता है। उदाहरणार्थ, जो व्यक्ति अपने प्रयोजन के लिए अपनी भूमि पर कोई ऐसी खतरनाक वस्तु लाता है, रखता है या रखी रहने देता है, जिससे किसी को हानि या रिष्टि होने की संभावना है, तो वह उसे अपनी जोखिम पर रखेगा तथा उससे उत्पन्न होने वाले समस्त परिणामों के लिए दायी होगा; उसका यह तर्क व्यर्थ होगा कि उसने उस वस्तु को सम्भालने में पूर्ण सावधानी या सतर्कता बरती थी।37 इसी प्रकार जंगली पशओं, विस्फोटक पदार्थों, खतरनाक द्रव या गैस के रिसन38 तथा बिजली, पानी आदि जैसी पलायनशील वस्तुओं को रखने वाले व्यक्ति का इनसे उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों के लिए कठोर दायित्व (strict liability) होता है। कठोर दायित्व के सिद्धान्त का प्रयोजन यह है कि कानून किसी व्यक्ति को साहसपूर्ण कार्य करने से नहीं रोकना चाहता। विधि केवल यह अपेक्षा करती है कि यदि किसी व्यक्ति के साहसपूर्ण कार्य के परिणामस्वरूप किसी को क्षति होती है, तो वह व्यक्ति अपकारित व्यक्ति की क्षतिपूर्ति कर दे। सारांश यह है कि ऐसे मामले जिनमें आशय या असावधानी के बिना भी व्यक्ति को दायी ठहराया जाता है, कठोर दायित्व (Strict Liability) के अन्तर्गत आता है।

सामण्ड ने कठोर दायित्व से सम्बन्धित प्रकरणों को निम्नलिखित तीन शीर्षकों के अन्तर्गत रखा है-

37. राइलैण्ड बनाम फ्लेचर, (1968) LR 3 HL 330.

38. एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1987 सु० को० 965.

(1) विधि-सम्बन्धी भूल (Mistake of Law);गिEिET

(2) तथ्य सम्बन्धी भूल (Mistake of Fact); तथा

(3) अवश्यम्भावी दुर्घटना (Inevitable Accident)

1. विधि-सम्बन्धी भूल (Mistake of Law)

विधि की भूल के परिणामस्वरूप कारित कृत्य आशययुक्त (intentional) कृत्य नहीं होता क्योंकि कर्त्ता नहीं जानता कि उसका कृत्य विधि द्वारा निषिद्ध है। यदि विधि के सम्बन्ध में उसकी अनभिज्ञता उसकी लापरवाही के कारण न हुई हो, तो ऐसे कृत्य को दुराशय से किया गया कार्य नहीं कहा जा सकेगा। फिर भी, विधि-सम्बन्धी अनभिज्ञता से किये गये कृत्य के लिये व्यक्ति दायित्वाधीन होता है तथा बचाव में उसका यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि उसे अपने कृत्य से सम्बन्धित विधि के विषय में जानकारी नहीं मिली थी। इस सिद्धान्त की अभिव्यक्ति इस लैटिन सूत्र में मिलती है कि “विधि की अनभिज्ञता दोषमार्जन का आधार नहीं हो सकती” (ignoranita juris non excusat) । अत: यह स्पष्ट है कि ऐसे मामलों में कठोर दायित्व का सिद्धान्त लागू होता है क्योंकि विधि की उपधारणा यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कार्य से सम्बन्धित विधि की जानकारी रखनी चाहिये।

2. तथ्य सम्बन्धी भूल (Mistake of Fact)

इंग्लिश तथा भारतीय आपराधिक विधि के अन्तर्गत ‘तथ्य की भूल’ एक अच्छा बचाव (defence) है39 लेकिन अपकृत्य विधि में तथ्य की भूल के आधार पर दायित्व से उन्मुक्ति नहीं मिल सकती है। सिविल दायित्व सम्बन्धी सामान्य सिद्धान्त यह है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी अन्य की सम्पत्ति, प्रतिष्ठा अथवा वैध हितों में हस्तक्षेप करता है, तो वह अपनी जोखिम पर ऐसा करता है और उसका यह तर्क कि उसने यह कार्य सद्भावनापूर्वक तथा युक्तियुक्त आधारों पर विश्वास करते हुए किया था, मान्य नहीं होगा। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य की भूमि पर यह विश्वास करते हुए प्रवेश करता है कि वह भूमि उसकी स्वयं की है, तो वह व्यक्ति अतिचार के लिए दायी होगा और बचाव रूप में उसका यह तर्क कि उसने भूल से यह समझा कि वह भूमि उसकी स्वयं की थी, मान्य नहीं होगा।40

3. अवश्यम्भावी दुर्घटना (Inevitable Accident)

इंग्लिश विधि के अनुसार अवश्यम्भावी दुर्घटना सिविल तथा दाण्डिक, दोनों ही विधियों के अन्तर्गत दायित्व से छूट का अच्छा आधार मानी गयी है। अवश्यंभावी दुर्घटना से आशय किसी ऐसी घटना से है जिसका परिहार किसी ऐसी सावधानी से नहीं किया जा सकता है, जो उस परिस्थिति में बरतने की आशा एक विवेकयुक्त व्यक्ति से की जा सकती है। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति पेड़ पर बैठे किसी पक्षी को मारने के लिए बन्दूक चलाता है और दुर्घटनावश उसकी गोली उस पेड़ पर छिपे बैठे किसी व्यक्ति को लग जाती है, तो बन्दूक चलाने वाले व्यक्ति का कार्य अवश्यम्भावी दुर्घटना (inevitable accident) के कारण क्षम्य होगा 41 क्योंकि कोई भी सामान्य व्यक्ति यह अपेक्षा नहीं करता कि कोई व्यक्ति पेड़ पर छिपा बैठा होगा।

यद्यपि सिविल तथा दाण्डिक विधियों में अवश्यंभावी दुर्घटना को प्रतिवाद के रूप में अच्छा बचाव माना गया है परन्त सिविल विधि में इसके कतिपय अपवाद हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने प्रयोजनों के लिए कोई भी ऐसी वस्तु, अपनी भूमि में लाता है या संग्रह करता है, जिसके निकल भागने में रिष्टि (mischief) की

39. इसके कुछ अपवाद अवश्य हैं, जैसे आर० बनाम प्रिंस, (1875) RC2 CC 154 के वाद में अभियुक्त ने किसी अवयस्क बालिका का उसकी सहमति से अपहरण किया तथा अपने बचाव में यह तर्क प्रस्तुत किया कि बालिका की वास्तविक आयु के बारे में उससे भूल हुई है। न्यायालय ने उसके इस बचाव को अस्वीकार करते हुए उसे दण्डित किया क्योंकि बालिका का अपहरण करना स्वयं एक अपराध कृत्य था.

40. बेसली बनाम क्लार्कसन, (1682) 2 Liv 37; तथा कंसोलिडेटेड कम्पनी बनाम कर्टिस, (1892) 1 QB 495 का वाद.

41. Stanly v. Powell, (1891) 1QB 86.

सम्भावना हो; तो वह व्यक्ति ऐसी वस्तु अपने ही जोखिम पर रख सकता है और उस वस्तु के निकल भागने के परिणामस्वरूप होने वाले समस्त नुकसान के लिए वह प्रथम-दृष्ट्या दायी होगा 42 इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति जंगली पशु43, पानी, कचरा, दुर्गन्धयुक्त वस्तु, बिजली, जहरीली गैस,44 स्फोटक पदार्थ आदि रखता है और यदि उनके रिसाव या निकल भागने से पड़ोसी को नुकसान होता है, तो इसके लिए व्यक्ति पूर्णत: दायी होगा।

प्रतिनिहित दायित्व (Vicarious Liability)

विधि का सामान्य नियम यह है कि अपकारपूर्ण कृत्य (wrongful act) के लिए साधारणत: दायित्व उसी व्यक्ति पर होता है जिसने वह अपकृत्य किया हो। किन्तु इस नियम के अपवाद स्वरूप प्रतिनिहित दायित्व का सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है। यदि किसी व्यक्ति के अपकृत्य का दायित्व किसी अन्य व्यक्ति पर होता है, तो ऐसे दायित्व को प्रतिनिहित दायित्व (vicarious liability) कहते हैं। उदाहरणार्थ, नियोजन काल में नौकर द्वारा किये गये अपकृत्य के लिये स्वामी का दायित्व प्रतिनिहित दायित्व का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसी प्रकार मृत व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधि मृतक द्वारा किये गये कृत्यों के लिए दायी होते हैं, क्योंकि वे उसके हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। विधि में प्रतिनिहित दायित्व को सिद्धान्त रूप में मान्य किये जाने का कारण यह है कि इस सिद्धान्त के अभाव में अनेक दशाओं में अपकारित व्यक्ति के हितों को उचित संरक्षण नहीं मिल पाता।

दण्ड विधि के अन्तर्गत प्रतिनिहित दायित्व (vicarious liability) के सिद्धान्त को मान्य नहीं किया गया है क्योंकि किसी व्यक्ति को अन्य के अपराधों के लिए दण्डित करना लोकनीति के विरुद्ध होगा। तथापि इस सामान्य नियम के तीन अपवाद हैं जो इस प्रकार हैं

(1) ऐसे मामले जिनमें संपत्ति के स्वामी पर यह विधिक दायित्व हो कि वह अपनी सम्पत्ति का इस प्रकार उपयोग करे जिससे दूसरों को क्षति न पहुँचे। उदाहरणार्थ, मानहानि के मामले में समाचार-पत्र के संपादक या प्रबन्धक द्वारा प्रकाशित लेख के लिए मालिक पर आपराधिक दायित्व होगा तथा वह इस आधार पर अपने दायित्व से नहीं बच सकता कि उक्त प्रकाशन उसके कर्मचारियों ने उसकी बिना जानकारी के किया था।

(2) लोक-अपदूषण या कर्त्तव्य-भंग के मामलों में भी स्वामी पर प्रतिनिहित दायित्व अधिरोपित किया जा सकता है।

(3) लाइसेन्स अधिनियमों के अन्तर्गत लाइसेन्स प्राप्त व्यवसायी पर उसके नौकरों या प्रबन्धकों द्वारा किये गये कृत्य के लिए आपराधिक दायित्व होगा। अत: लाइसेन्स प्राप्त व्यवसायी अपना दायित्व सेवकों पर सौंपकर आपराधिक दायित्व से नहीं बच सकता है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय दण्ड विधि में कुछ मामलों में प्रतिनिहित दायित्व अधिरोपित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, दण्ड संहिता की धारा 155 में यह उपबंधित है कि यदि किसी व्यक्ति की भूमि में बलवा (riot) होता है जो उसके हित के लिए किया गया था और उस व्यक्ति का अभिकर्ता या प्रबंधक यह जानते हए भी कि बलवा होने की संभावना है, उसके निवारण या रोकने का कोई प्रयत्न नहीं करता, तो उस दशा में उस भूमि के धारक पर प्रतिनिहित दायित्व अधिरोपित किया जा सकेगा।

आपराधिक दायित्व का परिमाण (The Measure of Criminal Liability)

आपराधिक न्याय के अन्तर्गत अपराधियों को दण्डित किये जाने का मुख्य उद्देश्य जन साधारण को दण्ड भय दिखाकर अपराध करने से विरत रखना है। प्राचीन विधि-व्यवस्थाओं में सामान्य प्रवृत्ति यह थी कि

42. Ryland v. Fletcher, (1868) LR 3 HL 330.

43. Filburn v. Aquarium Co., (1890) 25 QBD 354.

44. भोपाल गैस त्रासदी प्रकरण (दिसंबर 1984) देखें, ए० आई० आर० 1990 सु० को 1480.

अपराधी को कठोरतम दण्ड देकर अन्य व्यक्तियों को वैसा अपराध करने से परावृत्त रखा जाता था। यहाँ तक कि यूनानी विधायक ड्रेको ने तो प्रत्येक अपराध के लिये मृत्यु-दण्ड के एकल दण्ड की ही अनुशंसा की थी। परन्तु विख्यात दण्डशास्त्री बकारिया (Baccaria) ने भयावह दण्ड के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए कथन किया है कि एक विशिष्ट सीमा के बाद कठोरतम दण्ड का आतंक समाप्त हो जाता है। इस तर्क की पुष्टि इस बात से हो जाती है कि अठारहवीं सदी में इंग्लैण्ड में जेबकतरों को सार्वजनिक स्थल में फाँसी देने की सजा दी जाती थी ताकि अन्य व्यक्ति इस दण्ड की भयंकरता को देखते हुए वैसा अपराध करने की हिम्मत न करें। परन्तु यह देखा गया कि कभी-कभी फांसी दिये जाने के समय एकत्रित दर्शकों में ही जेब-कटी की वारदातें हो जाया करती थीं। सम्भवत: इसी कारण जर्मी बेंथम (Jeremy Bentham) ने अपराधों में नैतिकता के अनुपात के आधार पर दण्ड को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किये जाने पर बल दिया। उनके अनुसार दण्ड की उचित मात्रा का निर्धारण वैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर किया जाना चाहिए। विधिशास्त्रियों ने प्रत्येक अपराध के लिए दण्ड की मात्रा निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित बातों पर विचार किया जाना आवश्यक माना है

(i) अपराध का हेतु (Motive for the offence)

किसी अपराध के लिए दण्ड की मात्रा निर्धारित करते समय उसके ‘हेतु’ या प्रयोजन पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। अन्य बातों के समान होते हुए जानबूझकर किये गये अपराध की दशा में कठोरतम दंड दिया जाना चाहिये। इसका आशय यह है कि दण्ड की कठोरता अपराध की गम्भीरता के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिये। परन्तु कुछ मामलों में इस नियम का कठोरता से पालन करना अनुचित होगा। उदाहरण के लिए यदि कोई सामान्य व्यक्ति भूख से मरते हुए बच्चों को बचाने के प्रयोजन से किसी खाद्य-पदार्थ की चोरी करता है, तो दंडित करते समय उसके साथ उदारता बरती जा सकती है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति परिस्थितिवश या क्षणिक आवेश में कोई अपराध कर बैठता है, तो उसके दण्ड की मात्रा ऐसे अपराधी की तुलना से कम होनी चाहिये जिसने जानबूझ कर वह अपराध किया हो।

अरविन्द मोहन सिन्हा बनाम अमूल्य कुमार बिस्वास45 के वाद में अभियुक्त-द्वय लगभग बीस वर्षीय युवक थे जो कृषि कार्य द्वारा जीवन-निर्वाह करते थे। उन्होंने अपनी बहिन के विवाह हेत तस्करी द्वारा स्वर्ण (gold) प्राप्त किया जो सीमा-शुल्क अधिनियम तथा भारतीय सुरक्षा नियम, 1962 के अधीन अपराध कृत्य था। अत: उन्हें विचारण न्यायालय द्वारा कारावास के दण्ड से दंडित किया गया जिसे अपील में उच्च न्यायालय ने बहाल रखा। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्तों के चरित्र तथा अपराध की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 4(1) के अधीन परिवीक्षा

का लाभ देकर छोड़ा जाना न्यायोचित माना क्योंकि अपनी बहिन के विवाह हेतु सोना जुटाने के सद्कार्य के लिए ही अभियुक्तों को उक्त अपराध करने के लिए बाध्य होना पड़ा था।

परन्तु ईशरदास बनाम पंजाब राज्य46 के वाद में अभियुक्त युवा तथा नव-अपराधी होने पर भी उच्चतम न्यायालय ने उसे परिवीक्षा पर छोड़े जाने से इन्कार किया क्योंकि उसे खाद्य अपमिश्रण जैसा जघन्य अपराध के लिए दोषी पाया गया था। न्यायालय के अनुसार खाद्य अपमिश्रण जन-स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक होने के कारण इसके लिये दोषी अपराधी के साथ उदारता बरतते हुये उसे परिवीक्षा पर छोडे जाने का लाभ देना उचित नहीं था।

(ii) अपराध का परिणाम (Magnitude of the Offence)

किसी अपराध के लिए दण्ड की मात्रा निर्धारित करते समय उसके परिणामों पर विचार किया जाना भी आवश्यक होता है। अन्य बातों के समान होते हुए अपराध का परिणाम जितना गम्भीर हो, दण्ड उतना ही

45. ए० आई० आर० 1974 सु० को० 1818.

46. ए० आई० आर० 1972 सु० को० 1295.

कठोर होना चाहिए। सामंड ने इस सिद्धान्त का समर्थन करते हुए कथन किया है कि अपराधी द्वारा कारित रिष्टि (mischief) जितनी अधिक गंभीर प्रकृति की होगी, दंड की मात्रा उतनी ही अधिक होनी चाहिए ताकि उस अपराध की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।47 इसके अतिरिक्त यदि दण्ड की मात्रा अपराध की गम्भीरता के अनुसार कम अधिक नहीं होती, तो उन मामलों में जहाँ कि अपराधी के समक्ष दो समान दण्ड वाले अपराधों का विकल्प है, वह उस अपराध को करने की ओर प्रवृत्त होगा जो अधिक गम्भीर स्वरूप का होगा। उदाहरणार्थ, यदि हत्या-सहित चोरी और हत्या-रहित चोरी, दोनों के लिए समान दण्ड की व्यवस्था हो, तो. अपराधी हत्या सहित चोरी करने से नहीं हिचकिचाएगा।

(iii) अपराधी का चरित्र (Character of the offender)

सामान्यत: मानव की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि वह विधि के उल्लंघन से विमुख रहना चाहता है। मानव की इस प्रवृत्ति के अनेक कारण हो सकते हैं जिनमें धार्मिक बन्धन, दूसरों के प्रति दया और प्रेम तथा स्वाभिमान आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। व्यक्ति में इन बातों के प्रति जितनी अधिक रुचि होगी वह उतना ही अधिक सदाचारी होगा। परन्तु इन बातों में आस्था न होना उसे विधि-उल्लंघनकारी कृत्यों की ओर आकृष्ट करेगा। दूसरे शब्दों में, ईर्ष्या, क्रोध, निर्दयता तथा क्रूरता मनुष्य की आपराधिक प्रवृत्ति के लिए कारणीभूत होते हैं 48

यही कारण है कि अपराधी के आपराधिक दायित्व का निर्धारण करते समय उसके शील या चरित्र पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है।49

इसी प्रकार आदतन अपराधी (habitual offenders) को नव-अपराधी (first offender) की तुलना में अधिक कठोर दण्ड दिया जाना उचित है। इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत निम्नलिखित वादों का उल्लेख किया जाना उचित होगा। ___ उल्लेखनीय है कि भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 75 में न्यायालय द्वारा पूर्व में दण्डित किये जा चुके अपराधी को पुनः अपराध के लिये दोषी पाया जाने पर वर्द्धित दण्ड (enhanced punishment) दिये जाने का प्रावधान है।

अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 4 एवं 6 में भी यह उपबन्धित है कि सिद्धदोष अपराधी को परिवीक्षा का लाभ देकर छोड़े जाने के पूर्व उसकी आयु, चरित्र, पूर्व वृत्तान्त, मानसिक एवं शारीरिक स्थिति आदि पर विचार किया जाना चाहिये।

उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा राज्य बनाम प्रेमचंद50 के वाद में बलात्कार के प्रयास के दोषी सोलह वर्षीय युवा अभियुक्त को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 360 या परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 4 के अधीन परिवीक्षा पर छोड़े जाने के विचारण न्यायालय के निर्णय को उचित ठहराते हुए अभिनिर्धारित किया कि चूँकि अभियुक्त भा० द० सं० की धारा 367/511 के अधीन बलात्कार के प्रयास के लिए दोषी पाया गया था इसलिए उसे केवल दस वर्ष तक के कारावास से दंडित किया जा सकता था न कि आजन्म कारावास से। अत: उसे परिवीक्षा का लाभ देकर उन्मोचित किया जाना न्यायोचित था, विशेषकर तब जबकि उसका पूर्वाचरण अच्छा था और उसके विरुद्ध पूर्व में कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं था।

भारतीय दण्ड संहिता में अपराधों के लिए अधिकतम सीमा निर्धारित करके यह न्यायाधीश के विवेक पर छोड़ दिया गया है कि वह अपराधी के शील व अपराध की गम्भीरता के अनुसार उसके दण्ड का निर्धारण करें।

47. सामण्ड : ज्यूरिसप्रूडेंस (12वाँ संस्करण), पृ० 405.

48. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 तथा 304 (क) में हत्या के लिए भिन्न-भिन्न दण्ड की मात्रा इसी नियम पर आधारित है.

49. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 53-54.

50. (1997)7 सु० को० केसेज,

निवेदित है कि यद्यपि क्षतिपूर्ति का उपचार अपकृत्य विधि में ही उपलब्ध है परन्तु भारतीय दण्ड संहिता में कतिपय ऐसे प्रावधान हैं जो सिद्धदोष अपराधी से व्यथित व्यक्ति को हर्जाना या क्षतिपूर्ति दिलाना अधिकृत करते हैं। इसी प्रकार कारावास का दण्ड आपराधिक दण्ड व्यवस्था का भाग होते हुये भी कुछ सिविल वादों में न्यायालय अपने विवेक का प्रयोग करते हुए अपकारी को सिविल जेल भेज सकते हैं। इसी प्रकार सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 57 के अन्तर्गत ऋणी व्यक्ति द्वारा ऋण न चुकाया जाने पर न्यायालय उसकी गिरफ्तारी का आदेश दे सकता है और धारा 58 में वर्णित अवधि तक निरोध में रखे जाना आदेशित कर सकता है। यदि ऐसा व्यक्ति डिक्री अनुपालन कर देता है, तो उसे तत्काल रिहा कर दिया जायेगा।

सिविल दायित्व की मात्रा का निर्धारण

सिविल दायित्व का मुख्य उद्देश्य यह है कि अपकारी (wrongdoer) द्वारा अपकारित व्यक्ति की क्षतिपूर्ति की जाये। अत: सिविल वादों में प्रतिवादी के दायित्व का निर्धारण करते समय अपकार करने में उसके उद्देश्य या हेतु की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। दूसरे शब्दों में, साधारणतः सिविल विधि में न्यायालय इस ओर ध्यान नहीं देता कि प्रतिवादी ने अपकृत्य आशय सहित (intentionally) किया है या उससे वह अपकृत्य अनजाने में (innocently) हो गया या वह उसकी असावधानी (negligence) के कारण हुआ है। सिविल विधि का उद्देश्य तो केवल यह है कि यदि प्रतिवादी के अपकृत्य के कारण वादी को क्षति हई है, तो प्रतिवादी वादी की क्षतिपूर्ति कर दे। तात्पर्य यह है कि सिविल-दायित्व के निर्धारण में अपकृत्य की गम्भीरता या प्रतिवादी के आचरण आदि जैसे तत्वों पर विचार करना अनावश्यक होता है। सिविल दायित्व में प्रतिवादी द्वारा वादी को हानिपूर्ति (compensation) के रूप में दी जाने वाली राशि का निर्धारण उसके द्वारा किये गये अपकृत्य के परिणामों के आधार पर किया जाता है। दीवानी वादों में अपकारी (wrongdoer) द्वारा अपकारित व्यक्ति को नुकसानी के रूप में एक निश्चित धनराशि दी जाती है जिसका निर्धारण न्यायालय करता है। अत: सिविल वादों में दायित्व का निर्धारण दण्ड रूप में नहीं होता, अपित क्षतिपूर्ति के रूप में किया जाता है।

उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि किसी व्यक्ति द्वारा अपना विधिक कर्त्तव्य न किये जाने के परिणामस्वरूप उसे जो प्रताड़ना मिलती है, उसे विधिशास्त्र में ‘शास्ति’ (sanction) कहते हैं। विधिक शास्ति के कारण ही व्यक्ति का दायित्व उत्पन्न होता है। विधिशास्त्र में शास्ति का महत्व इसलिए है क्योंकि इसके माध्यम से विधि व्यक्तियों के उन हितों का संरक्षण करती है जिन्हें उसने मान्यता प्रदान की है। व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का अनुपालन करने के लिए बाध्य करने हेतु शास्ति एक प्रभावी उपाय है। जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है, शास्ति तथा इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले दायित्व दो प्रकार के होते हैं-(1) सिविल तथा (2) आपराधिक।

52. ‘हेतु’ या ‘उद्देश्य केवल निम्नलिखित अपकृत्यों में सुसंगत होता है-मानहानि, षड्यन्त्र, विद्वेषपूर्ण अभियोजन, न्यसेंस कपट आदि।

सिविल दायित्व के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति का उपचार उपलब्ध है जबकि आपराधिक दायित्व के लिए अपराधी को दण्डित किया जाता है। सिविल दायित्व में वादी को हुई वैयक्तिक क्षति के लिए हानिपूर्ति दिलाई जाती है जबकि आपराधिक दायित्व का स्वरूप सार्वजनिक होने के कारण अपराधी को दण्डित किया जाना ही उचित माना जाता है। परन्तु यह ध्यान देने योग्य है कि सभी आपराधिक दायित्व शास्तिक स्वरूप के नहीं होते और न सिविल दायित्व सदैव उपचारात्मक स्वरूप के होते हैं। यही कारण है कि वर्तमान विकसित विधि-प्रणालियों में दायित्व के वर्गीकरण का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है।

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