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अध्याय 25 (Chapter 25)

स्वामित्व (Ownership)

LLB Study Material Notes

कब्जे की भाँति स्वामित्व भी एक जटिल न्यायिक संकल्पना है। यह एक सांपत्तिक अधिकार है। विभिन्न विधिक अधिकारों में स्वामित्व’ (ownership) का अधिकार विशेष महत्व रखता है। प्राचीन विधिव्यवस्थाओं में स्वामित्व और कब्जे का अर्थ तथा इनमें भेद के विषय में विधिवेत्ताओं के विचार स्पष्ट नहीं थे, फिर भी रोमन विधि के अन्तर्गत इन दोनों को एक-दूसरे से भिन्न माना गया था। रोमन-विधि में स्वामित्व के लिए ‘डोमिनियम’ (dominiunt) तथा कब्जे के लिए पजेशियो’ (possessio) शब्दों का प्रयोग किया गया था। रोमन विधि के अन्तर्गत स्वामित्व (dontinium) किसी वस्तु पर पूर्ण अधिकार (absolute rights) का द्योतक है, जबकि कब्जा (possessio) उस वस्तु पर केवल भौतिक नियंत्रण को ही प्रदर्शित करता है। रोमवासियों ने कब्जे की तुलना में स्वामित्व’ को अधिक महत्व दिया क्योंकि उनके विचार से किसी वस्तु पर भौतिक नियंत्रण होना विधिक दृष्टि से उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि उस पर पूर्ण अधिकार होना ।

प्राचीन तथा मध्यकालीन इंग्लिश विधि में भूमि तथा चल सम्पत्ति (land and chattels) के कब्जे को ही महत्व दिया गया था। तत्कालीन विधि में स्वामित्व की धारणा कब्जे में ही सन्निहित होने के कारण भूमि में दखल और बेदखली (occupation and ejectment) के तत्व को प्रधानता दी गयी थी। कालान्तर में स्वामित्व के अन्तर्गत पूर्ण अधिकार की धारणा भूमि से सम्बन्धित दखल और बेदखली की संकल्पनाओं से ही विकसित हुई। तात्पर्य यह है कि इंग्लिश विधि के अन्तर्गत किसी वस्तु पर उसी व्यक्ति का स्वामित्व’ माना जाता था, जो उस वस्तु पर अपना कब्जा अन्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक सुदृढ़ सिद्ध कर सकता था। मेटलैण्ड के मतानुसार इंग्लिश विधि में ‘स्वामित्व’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम सम्भवतः सन् 1583 ई० में किया। गया था।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि रोमन विधि स्वामित्व के पूर्ण अधिकार को कब्जे पर आधारित नहीं मानती, जबकि इंग्लिश विधि में कब्जे को ही स्वामित्व का ठोस एवं प्रबल प्रमाण माना गया है। अतः जब तक कोई व्यक्ति किसी वस्तु पर कब्जाधारी (possessor) के स्वामित्व की तुलना में अधिक सुदृढ अधिकार सिद्ध नहीं कर देता, तब तक उस वस्तु पर कब्जाधारी का ही स्वामित्व माना जायेगा।

स्वामित्व का अधिकार तथा अधिकार का स्वामित्व में विभेद (Distinction between right of ownership and ownership of a right)

स्वामित्व के अधिकार से आशय किसी भौतिक वस्तु के अनन्यतः उपयोग के अधिकार से है जिसमें स्वायत्तता (liberties), शक्तियों (powers) तथा उन्मुक्तियों (immunities) आदि अनेक अधिकार-समहों का समावेश है। पोलक (Pollock) के अनुसार किसी भौतिक वस्तु पर स्वामित्व से आशय है व्यक्ति को उस वस्तु के उपयोग, उपभोग तथा व्ययन (disposal) की अनन्य शक्ति प्राप्त है। इसके ठीक विपरीत किसी अधिकार पर व्यक्ति का स्वामित्व होना यह दर्शाता है कि वह उस अधिकार का न तो केवल धारणकर्ता है। और न अभिभारधारी (encumbrancer) अपितु उस अधिकार का पूर्ण स्वामी है। किसी अधिकार के स्वामित्व को अमूर्त स्वामित्व (incorporeal ownership) भी कहा जाता है जबकि स्वामित्व के अधिकार मूत स्वामित्व (corporeal ownership) कहा जाता है। इंगलिश विधि के अन्तर्गत स्वामित्व के अधिकार

1. डायस एण्ड ह्यज : ज्यूरिसपूडेन्स (1957 संस्करण), पृ० 336.

को ‘फी सिम्पल’ (Fee simple) कहा जाता है जिसमें स्वामित्व का उत्तराधिकारियों को अन्तरण न्यागत रूप (devolution) से होता है परन्तु यह शाश्वत (perpetual) नहीं किया जा सकेगा।

स्वामित्व के विधिक तत्व

स्वामित्व में किसी वस्तु के प्रति उन्मुक्ति, शक्ति, उपयोग या व्ययन की स्वतन्त्रता आदि जैसे अनेक दावों (claims) का समावेश रहता है। अतः यदि यह कहा जाये कि स्वामित्व में स्वामित्वाधीन वस्तु के उपयोग, व्ययन तथा नष्टीकरण का अधिकार निहित होता है और स्वामी इनको विधिपूर्ण ढंग से चाहे जैसा प्रयोग कर सकता है। परन्तु उसके द्वारा किया जाने वाला उपयोग, व्ययन या विनष्टीकरण देश की विधि के अनुसरण में होना चाहिये न कि विधि-विरुद्ध । स्वामित्व की परिभाषा | ब्लेक के विधि-शब्दकोष (6ठा संस्करण) के अनुसार स्वामित्व (Ownership) की परिभाषा इस प्रकार की गई है-सम्पत्ति के उपयोग और उपभोग के लिए अधिकारों के संग्रह को ‘स्वामित्व’ कहते हैं जिसमें सम्पत्ति का अन्तरण किसी अन्य को करने का अधिकार भी सम्मिलित है। अत: किसी सम्पत्ति के प्रति स्वत्व (claim) को विधित: मान्यता देना स्वामित्व कहलाता है।

विधिशास्त्रियों ने स्वामित्व’ की परिभाषा भिन्न-भिन्न प्रकार से की है। तथापि प्रायः सभी विधिवेत्ता यह स्वीकार करते हैं कि समस्त विधिक अधिकारों में स्वामित्व का अधिकार सर्वाधिक पूर्णतम तथा प्रबल अधिकार होता है। हिबर्ट (Hibbert) के अनुसार स्वामित्व के अन्तर्गत चार प्रकार के अधिकार सन्निहित हैं। ये अधिकार हैं

(1) किसी वस्तु के प्रयोग का अधिकार;

(2) दूसरों को उस वस्तु से अपवर्जित करने का अधिकार;

(3) उस वस्तु के व्ययन (disposal) का अधिकार; और

(4) उस वस्तु को नष्ट करने (destruction) का अधिकार है

मार्कबी (Markby) के अनुसार किसी वस्तु पर स्वामित्व होना यह दर्शाता है कि उस वस्तु से सम्बन्धित समस्त अधिकार उस व्यक्ति में निहित हैं। अत: स्पष्ट है कि स्वामित्व किसी व्यक्ति और किसी वस्तु के बीच ऐसे सम्बन्धों का प्रतीक है जो उस वस्तु से सम्बन्धित समस्त अधिकार उस व्यक्ति में निहित करता है। परन्तु मार्कबी स्वामित्व को अधिकारों का संकलित योग मात्र न मानते हुए स्वतन्त्र व्यापक अधिकार के रूप में मान्य करते हैं ।

स्वामित्व किसी मूर्त या भौतिक वस्तु पर हो सकता है तथा साख (goodwill) पेटेण्ट या कॉपीराइट जैसे अमूर्त अधिकार पर भी हो सकता है। अमूर्त वस्तुओं में सभी प्रकार के हक या दावों (claims) का समावेश

स्वामित्व सम्बन्धी ऑस्टिन के विचार

ऑस्टिन ने ‘स्वामित्व’ की व्याख्या करते हुए लिखा है कि स्वामित्व’ किसी निश्चित वस्तु पर ऐसा  अधिकार है जो उपयोग की दृष्टि से अनिश्चित, व्ययन की दृष्टि से अनिर्बन्धित तथा अवधि की दृष्टि से

2. In Black’s Law Dictionary (6th ed.) ownership has been defined as “collection of rights to use and enjoy property including right to transait it to others.” Thus ownership is de jure recognition of claim to certain property.

3. हिबर्ट : ज्यूरिसपूडेन्स, पृ० 210.

4. मार्कबी : ज्यूरिसपूडेन्स, पृ० 157.

5. डायस आर० एम० डब्ल्यू० : ज्यूरिसपूडेन्स (5वां संस्करण) पृ० 196.

असीमित है। इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि स्वामित्व किसी वतु और व्यक्ति के बीच परस्पर सम्बन्ध को दर्शाता है। ऑस्टिन के अनुसार स्वामित्व में निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है

(1) उपयोग की दृष्टि से अनिश्चितता (indefinite in point of user)

इसका आशय यह है कि किसी वस्तु के स्वामी को यह स्वतन्त्रता रहती है कि वह उसका उपयोग चाहे जिस प्रकार करे। परन्तु निवेदित है कि ऑस्टिन के इस तर्क को पूर्णतः स्वीकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि वर्तमान में उपयोग की स्वतन्त्रता पर अनेक वैधानिक बन्धन लगाये गये हैं। उदाहरणार्थ, प्रत्येक स्वामी से यह अपेक्षित है कि वह अपनी वस्तु या भूमि का उपयोग इस प्रकार न करे कि जिससे किसी दूसरे को क्षति पहुँचे या वह उसके लिए न्यूसेन्स (nuisance) का कारण बने।

(2) व्ययन की दृष्टि से अनिर्बन्धितता (unrestricted in point of disposition)

ऑस्टिन के विचार से स्वामित्व व्ययन की दृष्टि से अनिर्बन्धित इस कारण होता है क्योंकि स्वामी अपनी वस्तु को इच्छानुसार बेच सकता है, या दान कर सकता है अथवा विधि द्वारा मान्य किसी अन्य रीति से अन्तरित कर सकता है। परन्तु ऑस्टिन का यह तर्क भी पूर्णत: सही नहीं है क्योंकि स्वामी का सम्पत्ति-व्ययन सम्बन्धी अधिकार सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम अथवा किसी अन्य भार (charge) के अस्तित्व के कारण निर्बन्धित (restrict) हो सकता है।

(3) अवधि की दृष्टि से असीमितता (unlimited in point of duration)

ऑस्टिन ने स्वामित्व को अवधि की दृष्टि से असीमित माना है क्योंकि उनके अनुसार स्वामित्व शाश्वत (perpetual) होता है, अर्थात् स्वामी की मृत्यु के पश्चात् वस्तु का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता अपितु उसे मृतक के वारिसों अथवा विधि द्वारा निर्धारित व्यक्ति या व्यक्तियों को अन्तरित कर दिया जाता है।

ऑस्टिन द्वारा दी गई ‘स्वामित्व’ की परिभाषा वास्तविकता के निकट होते हुए भी अपूर्ण प्रतीत होती है, क्योंकि वर्तमान समाज में स्वामित्व सम्बन्धी ऐसी अनेक जटिलताएं हैं जिनका समाधान ऑस्टिन की परिभाषा में नहीं मिलता है। ऐसी अनेक वस्तुएँ हैं जिन पर राज्य के अलावा अन्य किसी व्यक्ति का स्वामित्व हो ही नहीं सकता। उदाहरणार्थ, भारतीय विधि के अनुसार जनहित की दृष्टि से कोई भी व्यक्ति गांजे के वृक्ष पर स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकता, अर्थात् यदि किसी व्यक्ति की भूमि में गांजे का वृक्ष उगता है तो राज्य उस व्यक्ति के वृक्ष सम्बन्धी स्वामित्व के अधिकार में हस्तक्षेप कर सकता है तथा उस वृक्ष को वहाँ से हटाकर स्वयं की अभिरक्षा में ले सकता है। संवैधानिक विधि के अन्तर्गत राज्य द्वारा निजी सम्पत्ति अभिग्रहीत की जाना8 इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि स्वामित्व सदैव ही उपयोग की दृष्टि से अनिश्चित तथा व्ययन की दृष्टि से अनिर्बन्धित नहीं होता। यही कारण है कि सामण्ड ने आस्टिन के स्वामित्व सम्बन्धी विचारों की आलोचना करते हुए कथन किया है कि यथार्थ में उनकी परिभाषा केवल विल्लंगम-रहित स्वामित्व (unencumbered ownership) के प्रति लागू होती है। यदि स्वामित्व विल्लंगमग्रस्त (encumbered) हो, तो उस स्थिति में उसके स्वामी को उस सम्पत्ति के व्ययन (disposition) या अन्तरण का असीमित अधिकार नहीं होगा।

स्वामित्व के विषय में सामण्ड के विचार

ऑस्टिन द्वारा प्रस्तुत स्वामित्व की परिभाषा को परिमार्जित करते हुए सामण्ड ने कथन किया है कि किसी वस्तु का स्वामित्व व्यक्ति और उस वस्तु के परस्पर सम्बन्ध का प्रतीक है। इस परिभाषा को अधिक

6. Ownership is a right over a determinate thing, indefinite in point of user, unrestricted in point of disposition and unlimited in point of duration.–Austin.

7. के० कृष्ण मेनन : आउटलाइन ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स (तृतीय संस्करण) पृ० 124 .

8. इसे ‘सर्वोपरि आधिपत्य का सिद्धान्त’ (Doctrine of eminent domain) कहते हैं.

9. Ownership denotes the relation between a person and an object forming the subject matter of his ownership. Salmond : Jurisprudence (12th Ed.) p. 246.

विस्तृत करते हुए उन्होंने लिखा है कि किसी भौतिक वस्तु (material object) का स्वामित्व ऐसे अवशिष्ट उपयोग (residuary uses) का अधिकार है जिसमें से अन्य व्यक्तियों में विल्लंगम के रूप में निहित उपयोग के समस्त विशेष और सीमित अधिकारों को निकाल दिया गया हो। दूसरे शब्दों में, किसी विल्लंगमग्रस्त (encumbered) सम्पत्ति के संदर्भ में स्वामित्व एक ऐसा अधिकार है, जो उस सम्पत्ति पर होने वाले समस्त विल्लंगमों को निकाल देने के पश्चात् स्वामी के पास शेष बचता है। किसी व्यक्ति के दूसरों की सम्पत्ति के प्रति अधिकार को ‘विल्लंगम’ (encumbrance) कहते हैं जबकि व्यक्ति को स्वयं की सम्पत्ति पर प्राप्त अधिकार को ‘स्वामित्व’ कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति ने अपनी कोई सम्पत्ति बन्धक रखी है, तो बन्धकदार (mortgagee) का सम्पत्ति पर बन्धक-अधिकार उस सम्पत्ति पर ‘विल्लंगम’ कहलायेगा। अतः बन्धककर्ता (mortgagor) द्वारा बन्धकदार (mortgagee) को प्रदत्त इस बन्धक-अधिकार को छोड़कर शेष अधिकार बन्धककर्ता का स्वामित्व’ का अधिकार कहा जायेगा। सामण्ड ने स्वामित्व की संकल्पना को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि जब विल्लंगम के कारण उत्पन्न हुए अन्य व्यक्ति के अधिकार समाप्त हो जायेंगे, तो अवशिष्ट (residuary) अधिकार को स्वामित्व’ कहा जा सकेगा तथा उसमें वे सभी लक्षण विद्यमान होंगे जिनका उल्लेख ऑस्टिन ने ‘स्वामित्व’ की परिभाषा में किया है। तात्पर्य यह है कि सामण्ड ने स्वामित्व की संकल्पना को केवल विल्लंगम रहित वस्तुओं तक ही सीमित नहीं रखा है बल्कि वह विल्लंगमग्रस्त वस्तुओं के प्रति भी लागू होती है।

‘स्वामित्व’ की व्याख्या करते हुए सामण्ड ने अभिकथन किया है कि स्वामित्व एक ऐसी । संकल्पना (concept) है, जो व्यक्ति और अधिकार के बीच निम्नलिखित दो सम्भावित सम्बन्धों के प्रतिकूल

(1) ‘स्वामित्व’ कब्जे (possession) के प्रतिकूल है। स्वामित्व विधित: (de jure) होता है, जबकि कब्जा वास्तविक (de facto) होता है। व्यक्ति किसी वस्तु का स्वामी न होते हुए भी उस पर कब्जा रख सकता है, या कब्जा रखे बिना उसका स्वामी हो सकता है, अथवा उस वस्तु पर स्वामित्व और कब्जा, दोनों ही एक साथ रख सकता है।

(2) स्वामित्व विल्लंगम या ‘भार’ के प्रतिकूल है। किसी अधिकार का स्वामी वह व्यक्ति होता है। जिसमें वह अधिकार निहित हो, जबकि उस अधिकार का विल्लंगमधारी (encumbrancer) वह व्यक्ति होता है जिसमें स्वयं अधिकार निहित नहीं होता, बल्कि उसके सम्बन्ध में कुछ प्रतिकूल, अधीनस्थ या सीमित करने वाले अधिकार निहित होते हैं। उदाहरण के लिए, भूमि का बन्धकदार (mortgagee) बन्धक का स्वामी होता है। बन्धक (mortgage), सुखाधिकार (easement), पट्टा (lease), सुविधाभार (servitude), प्रतिभूति (security), आदि विल्लंगम के कुछ प्रकार हैं।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सामण्ड ने ‘स्वामित्व’ शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया है। उनके अनुसार व्यापक अर्थ में स्वामित्व व्यक्ति तथा उसमें निहित किसी अधिकार के सम्बन्ध को अभिव्यक्त करता है-ये अधिकार चाहे सांपत्तिक हों, अथवा वैयक्तिक, लोकलक्षी हों अथवा व्यक्तिलक्षी, भौतिक हों अथवा अभौतिक। संकीर्ण अर्थ में स्वामित्व से तात्पर्य किसी व्यक्ति और किसी वस्तु के बीच परस्पर सम्बन्ध से है। इस दृष्टि से स्वामित्व केवल भौतिक स्वरूप का ही हो सकता है।

सामंड द्वारा दी गई स्वामित्व की परिभाषा स्वामित्व के निम्नलिखित लक्षणों को रेखांकित करती है

1. जिस व्यक्ति का किसी वस्तु पर स्वामित्व है उसे उस वस्तु पर कब्जा धारण करने का अधिकार भी होगा। यह बात अलग है कि वह वास्तविक रूप में ऐसा कब्जा धारण न किये हो;

2. उसे सामान्यत: स्वामित्वाधीन वस्तु का उपयोग और उपभोग करने का अधिकार होगा;

3. स्वामी को उस वस्तु का उपभोग करने, अन्तरण करने या नष्ट करने का अधिकार होगा;

4. स्वामित्व में कालावधि की दृष्टि से अनियत (indeterminate in duration) होने का लक्षण विद्यमान रहता है; तथा ।

5. स्वामित्व अवशिष्ट स्वरूप (residuary character) का होना है। उदाहरणार्थ, यदि कोई भू स्वामी अपनी भूमि ‘क’ को पट्टे पर देता है, ‘ख’ को सुखाधिकार हेतु तथा ‘ग’ को परस्व लाभ के लिए, तो उसे उस भूमि से संबंधित शेष बचे अधिकारों पर स्वामित्व प्राप्त होगा।

आलोचना

सामण्ड द्वारा दी गयी स्वामित्व की परिभाषा अधिक व्यापक होते हुए भी अनेक विधिवेत्ताओं ने इसकी कड़ी आलोचना की है। ड्यूगिट (Duguit) ने सामण्ड के विचारों का खंडन करते हुए कथन किया है कि वस्तुत: स्वामी का सम्बन्ध वस्तु से होता है न कि किसी कल्पित अधिकार से। विधिवेत्ता कुक (Cook) ने सामण्ड के स्वामित्व सम्बन्धी विचारों को एक अनावश्यक भ्रांति (unnecessary confusion) मात्र निरूपित किया है। डॉ० ग्लेनविल विलियम्स का विचार है कि सामण्ड की स्वामित्व की परिभाषा से ऐसा आभास मिलता है कि कालावधि की दृष्टि से अधिकारों पर स्वामित्व की कल्पना भौतिक वस्तुओं पर स्वामित्व से पूर्ववर्ती होगी, जबकि ऐतिहासिक आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि वस्तुस्थिति इससे ठीक विपरीत रही। होगी।10

हॉलैण्ड के स्वामित्व सम्बन्धी विचार

हॉलैण्ड के अनुसार किसी वस्तु पर पूर्ण नियन्त्रण को स्वामित्व’ कहते हैं।11 उनके अनुसार स्वामित्व शब्द का प्रयोग तीन भिन्न-भिन्न अर्थों में किया जा सकता है। प्राथमिक और पूर्ण अर्थ में स्वामित्व का अर्थ भौतिक वस्तुओं पर नियन्त्रण से है जैसे, किसी व्यक्ति का उसकी भूमि या अन्य किसी वस्तु पर अधिकार होना। |

गौण और परम्परागत अर्थ में कुछ संकलित अधिकारों के नियन्त्रण को स्वामित्व कहा जा सकता है, जैसे किसी अन्वेषण के लिए अन्वेषक को पेटेन्ट (patent) के अधिकार पर स्वामित्व प्राप्त हो सकता है।

तृतीय एवं अधिक विस्तृत अर्थ में स्वामित्व का अर्थ किसी व्यक्ति में निहित उन समस्त अधिकारों के संकलित योग से है जिनका वह व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों के विरुद्ध प्रयोग कर सकता है।

परन्तु हॉलैण्ड का विचार है कि वस्तुतः स्वामित्व को प्राथमिक तथा पूर्ण अर्थ में ही स्वीकार किया। जाना उचित होगा। वे कहते हैं इस दृष्टि से उनके और ऑस्टिन के विचारों में निकट साम्य है।

हॉलैण्ड के अनुसार स्वामित्व में किसी वस्तु से सम्बन्धित सभी प्रलाभ (benefits) तथा जिम्मेदारियों (burden) का समावेश रहता है। प्रलाभ में उस वस्तु के उपयोग, उपभोग या व्ययन की अनन्य शक्ति, अन्यों के हस्तक्षेप से उन्मुक्ति तथा विधिपूर्ण तरीके से उपयोग की स्वतन्त्रता आदि शामिल हैं जबकि उस वस्तु से प्राप्त होने वाले फायदे या हक (claims) स्वामी के उस वस्तु के प्रति कर्तव्यों, दायित्वों आदि से परिसीमित हो जाते हैं। स्वामी द्वारा स्वामित्वाधीन वस्तु का उपयोग, व्ययन आदि देश की विधि के उल्लंघन में नहीं किया जा सकेगा।

स्वामित्व के विषय में पैटन के विचार

स्वामित्व की संकल्पना के विषय में अपने विचार प्रकट करते हुए पैटन (Paton) ने लिखा है कि व्यक्ति का किसी वस्तु पर स्वामित्व होना यह प्रदर्शित करता है कि उस व्यक्ति को उस वस्तु के सम्बन्ध में निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं

(1) उपयोग करने का अधिकार,

10. डायस एण्ड ह्यज ज्यूरिसपूडेन्स (1957 संस्करण), पृ० 340 से उद्धृत.

11. Ownership is a plenary control over an object.-Holland : The Elements of Jurispru The Elements of Jurisprudence, p. 221.

(2) कब्जा, जिसमें अन्य को उस वस्तु से अपवर्जित करने का अधिकार भी सम्मिलित है,

(3) अन्तरण करने का अधिकार, तथा

(4) इच्छानुसार उस वस्तु को त्याग देने या नष्ट करने का अधिकार।

पैटन के मतानुसार स्वामित्वधारी के उपर्युक्त पूर्ण अधिकारों को विधि द्वारा सीमित या आपसी समझौते द्वारा प्रतिबन्धित किया जा सकता है।12

बकलैंड (Buckland) के अनुसार स्वामित्व किसी वस्तु के प्रति ऐसा अधिकार है जो उस वस्तु के प्रति निहित विभिन्न लोगों के अन्य सभी अधिकारों को निकाल देने के बाद शेष बचता है।

होहफेल्ड (Hohfeld) ने स्वामित्व को अधिकारों, विशेषाधिकारों तथा शक्तियों का ऐसा संकलन निरूपित किया है जो स्वामी के अलावा अन्य व्यक्तियों में शाश्वत या सीमित समय के लिए निहित रहता है। उनके अनुसार जिस प्रकार बाल्टी में भरे पानी को पृथक्-पृथक् बूंदों का संकलन नहीं माना जा सकता ठीक उसी प्रकार स्वामित्व को सुभिन्न अधिकारों का योग नहीं माना जाना चाहिए। जिस प्रकार बाल्टी में से पानी की एक बूंद या अनेक बूंदें ली जा सकती हैं, उसी प्रकार स्वामित्व में से एक या अनेक अधिकार अलग किये जा सकते हैं।

नोएस (Noyes) के अनुसार स्वामित्व एक ऐसी चुंबकीय शक्ति है, जो उसमें से सभी उपभोग के अधिकारों को निकाल देने के बाद शेष बचती है और जो लुप्त होने वाले अधिकारों द्वारा अस्थायी रूप से धारित विभिन्न तत्वों को स्वयं की ओर आकर्षित करती है।

फेड्रिक पोलक (Fedrick Pollock) के अनुसार किसी वस्तु के प्रति विधि द्वारा अनुदत्त उपयोग तथा व्ययन शक्ति की सम्पूर्णता को स्वामित्व कहा जाता है। अत: वस्तु का व्ययन करने की शक्ति स्वामित्व का एक महत्वपूर्ण तत्व है। तथापि यह शक्ति सीमित भी हो सकती है तथा स्वामी अपनी व्ययन-शक्ति (Power of disposal) को स्वयं निलम्बित रख सकता है या उसे अपने उत्तराधिकारियों के लिए सुरक्षित रख सकता है।

सारांश में यह कहा जा सकता है कि स्वामित्व स्वयं में एक अधिकार (right) है जो अन्य विधिक संकल्पनाओं से भिन्न है, तथा यह स्वामी और अन्य लोगों के मध्य सम्बन्ध स्थापित करता है। यह किसी वस्तु के प्रति ऐसा हक है जो अन्यों को उस वस्तु के उपयोग या उपयोग में अनुचित हस्तक्षेप से परावृत्त रखता है। साथ ही यह स्वामी को वस्तु के उपयोग, व्ययन या नष्टीकरण का अधिकार भी दिलाता है।

स्वामित्व के विषय में गांधीवादी विचारधारा (Gandhian Concept of Ownership)

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वामित्व के अधिकार को न्यासधारिता (trusteeship) की संकल्पना से जोड़ते हुये यह अभिमत व्यक्त किया कि स्वामित्व स्वामित्वधारी के वैयक्तिक फायदे या प्रलाभ के लिए नहीं होता, अपितु वह समाज के हितार्थ उस वस्तु को न्यासधारी के रूप में धारण करता है। अत: स्वामी किसी भौतिक वस्तु, भूमि या सम्पत्ति को स्वयं के हित के लिये धारण नहीं करता बल्कि वह उसका सामाजिक हित में न्यासवत उपयोग, उपभोग या व्ययन करता है। स्वामी द्वारा स्वामित्वाधीन वस्तु का प्रयोग लोकहित में ही किया जाना चाहिये न कि स्वलाभ या स्वार्थ के लिये। इस दृष्टि से यह स्पष्ट है कि स्वामित्व के अधिकार के प्रति लागू की गयी गांधीजी की न्यासधारिता की संकल्पना (concept of trusteeship as applied to ownership) वैदिक कालीन स्वामित्व की संकल्पना से मिलती-जुलती है, जो ‘सर्वजन हिताय’ के मूल सिद्धान्त पर आधारित थी।

स्वामित्व के लक्षण (Characteristics of Ownership)

स्वामित्व सम्बन्धी उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि स्वामित्व में निम्नलिखित लक्षणों का होना आवश्यक है

12. पैटन जी० डब्ल्यू० : ए टेक्स्ट बुक ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स, पृ० 420.

(1) स्वामित्व पूर्ण (absolute) अथवा निर्बन्धित (restricted) हो सकता है, अर्थात् वह या तो अनन्य होता है या सीमित। स्वामित्व स्वेच्छा से अथवा विधि द्वारा सीमित हो सकता है। जब एक ही वस्तु या सम्पत्ति के अनेक सह-स्वामी (co-owners) होते हैं, तो प्रत्येक स्वामी का अधिकार दूसरे सह-स्वामी के अधिकार द्वारा सीमित हो जाता है।13। |

(2) किसी देश की आपात्कालीन स्थिति में स्वामित्व के अधिकारों को निर्बन्धित (restrict) रखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, युद्ध-काल में भवनों को सेवा के उपयोग या अन्य किसी कार्य के लिए अर्जित किया जा सकता है। वर्तमान में भाड़ा नियंत्रण अधिकारियों द्वारा किरायेदारों को मकान आवंटित किया जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि स्वामित्व को निर्बन्धित किया जा सकता है क्योंकि ऐसे मकानों के स्वामियों। को रेन्ट कन्ट्रोल अधिकारी के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है।

(3) सम्पत्ति के स्वामी को अपना स्वामित्व सम्बन्धी अधिकार बनाये रखने के लिए राज्य को कर (tax) देना पड़ता है अतः उसका स्वामित्व इस शर्त पर निर्बन्धित होता है कि वह अपनी सम्पत्ति के उपयोग के बदले राज्य को वांछित कर का भुगतान करता रहे।

(4) कोई भी स्वामी अपने स्वामित्व के अधिकार का प्रयोग इस प्रकार नहीं कर सकता कि जिससे दूसरों के अधिकारों का अतिलंघन हो। उसे अपने अधिकार का उपयोग इस प्रकार करना चाहिये कि जिससे अन्यों को क्षति न पहुँचे।14 |

(5) कोई स्वामी अपनी सम्पत्ति का मनमाने ढंग से व्ययन (disposition) नहीं कर सकता है। अतः कोई व्यक्ति अपने लेनदारों (creditors) को ऋण की राशि से वंचित करने के कपटपूर्ण उद्देश्य से अपनी सम्पत्ति का अन्तरण नहीं कर सकता है। अनेक देशों में स्वामियों को अपनी सम्पत्ति विदेशियों को अन्तरित करने की छूट नहीं रहती है।

(6) विधि के अन्तर्गत अवयस्क (नाबालिग) अथवा पागल व्यक्ति अचल सम्पत्ति (immovable property) पर स्वामित्व के अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते क्योंकि विधिक धारणा यह है कि ऐसे व्यक्ति अपने कार्यों की वास्तविक प्रकृति तथा उसके परिणामों को ठीक तरह से समझने की क्षमता नहीं रखते हैं।

(7) स्वामी की मृत्यु से सम्पत्ति का स्वामित्व समाप्त नहीं हो जाता, अपितु वह स्वामी के दायादों (heirs) में अन्तरित हो जाता है।

स्वामित्व की विषय-वस्तु (Subject-matter of ownership)

साधारणत: स्वामित्व की विषय-वस्तु केवल भूमि, मकान, टेबल, घड़ी आदि जैसी भौतिक वस्तुएँ ही होती हैं। परन्तु कभी-कभी भूमि या वस्तुओं के अतिरिक्त व्यक्ति के स्वामित्व में अन्य हितों का समावेश भी हो सकता है, जैसे ऋणी से ऋण की राशि प्राप्त करने का अधिकार, पेटेन्ट या कॉपीराइट का अधिकार या किसी अन्य की भूमि में आने-जाने का अधिकार इत्यादि। अतः भौतिक वस्तुओं (material objects) के अलावा अभौतिक अधिकार भी स्वामित्व की विषय-वस्तु हो सकते हैं। । सामंड के अनुसार किसी वस्तु पर स्वामित्व का अधिकार स्थायी, असीमित एवं दायार्ह (permanent, unlimited and inheritable) स्वरूप का होता है। यदि किसी व्यक्ति को किसी भूमि या वस्तु का उपयोग करने का सीमित अधिकार प्राप्त है, तो वह उसका स्वामी न होकर केवल विल्लंगमधारी (encumbrancer) मात्र होगा। स्वामित्व एक पूर्ण एवं आत्यंतिक अधिकार है।

सामण्ड ने ‘अधिकार’ को स्वामित्व की विषय-वस्तु के रूप में स्वीकार तो किया है किन्तु उनके अनुसार उपर्युक्त अधिकारों में से केवल कुछ अधिकार ही स्वामित्व की विषय-वस्तु हो सकते हैं तथा आम ।

13. गंगानाथ झा: हिंदू लॉ एण्ड इट्स सोर्सेस (ग्रंथ 2) पृ० 122.

14. राइलैण्ड बनाम फ्लेचर (1868) L.R. 3 HL 330.

धारणा प्राय: यह है कि मनुष्य अधिकार को धारण करता है, न कि उस अधिकार के स्वामित्व को 15 इस दृष्टि से अनेक अधिकार स्वामित्व की विषय-वस्तु नहीं माने जा सकते। उदाहरण के लिए, प्रत्येक व्यक्ति को वाक-स्वातन्त्र्य का अधिकार (right of speech) या प्रतिष्ठा सम्बन्धी अधिकार (right of reputation) होता है, किन्तु ऐसा नहीं कहा जाता कि उनका उन अधिकारों का स्वामित्व है। इसी प्रकार कोई इन। अधिकारों को अन्तरित नहीं कर सकता है।

इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि यद्यपि भौतिक वस्तु स्वामित्व की विषय-वस्तु होती है परन्तु इसके कुछ अपवाद हैं। किसी राज्य के क्षेत्राधिकार के बाहरी भू-प्रदेश पर राज्य का स्वामित्व नहीं हो सकता। इसी प्रकार स्वच्छन्दता से विचरने वाले जंगली जानवर, जीवित व्यक्ति16, वायु, चन्द्रमा, सूर्य आदि पर स्वामित्व नहीं हो सकता है।

स्वामित्व का अर्जन (Acquisition of Ownership)

स्वामित्व के सन्दर्भ में वस्तुएँ दो प्रकार की हो सकती हैं। ऐसी वस्तुएँ जिनका स्वामित्व किसी व्यक्ति में न हो। ऐसी वस्तुएँ स्वामीहीन सम्पत्ति (res nullius) कहलाती हैं तथा इन्हें कब्जे में लेकर इन पर स्वामित्व अर्जित किया जा सकता है। परन्तु ऐसी वस्तुओं पर, जो पहले से किसी व्यक्ति के स्वामित्व में हैं, व्युत्पन्न रीति (derivative method) से स्वामित्व प्राप्त किया जा सकता है।

सामण्ड ने स्वामित्व अर्जित करने के दो तरीके बताये हैं

(1) विधि के प्रवर्तन द्वारा (by operation of law) अर्जन; इसे मूल अर्जन (original acquisition) भी कहते हैं; उदाहरणार्थ, किसी स्वामित्व-विहीन वस्तु को प्राप्त करने वाले व्यक्ति का उस वस्तु पर स्वामित्व मूल अर्जन द्वारा हासिल किया जाता है।

(2) किसी कृत्य या घटना के फलस्वरूप स्वामित्व का अर्जन; इसे व्युत्पन्न अर्जन (या derivative acquisition भी) कहते हैं।

यदि कोई व्यक्ति निर्वसीयतता (intestacy) सम्बन्धी विधि के प्रवर्तन से अथवा दीवाला सम्बन्धी कानून (Law of Bankruptcy) के प्रवर्तन के कारण किसी अन्य की सम्पत्ति पर स्वामित्व प्राप्त करता है, तो ऐसा स्वामित्व विधि की क्रिया द्वारा अर्जित कहा जायेगा। परन्तु यदि कोई व्यक्ति किसी वस्तु का निर्माण करता है। या उसे किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त करना है, तो ऐसा स्वामित्व उस व्यक्ति के कृत्य द्वारा अर्जित कहलायेगा। इसी प्रकार वसीयत, दान या क्रय द्वारा प्राप्त की गई संपत्ति या वस्तु पर स्वामित्व व्युत्पन्न अर्जन (derivative acquisition) द्वारा हासिल किया गया माना जाता है। |

‘सामण्ड’ के विचार से ‘स्वामित्व’ सम्बन्धी धारणा सामाजिक परिवर्तनों के साथ समयानुसार बदलती रहती है।17 उनके अनुसार प्राचीन युग में स्वामित्व के अधिकार को अनन्य तथा पूर्ण (absolute) माना गया था जबकि वर्तमान समय में स्वामित्व के अधिकार को अधिकाधिक सीमित करने की प्रवृत्ति दिनों दिन बढ़ती जा रही है। आधुनिक भूमि सम्बन्धी कानूनों में भूमि-स्वामियों के अधिकारों पर लगाये गये निर्बन्धन (restrictions) इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। यही नहीं, वर्तमान में निजी स्वामित्व (private ownership) के स्थान पर लोक-स्वामित्व (public ownership) को महत्व दिया जा रहा है ताकि निजी व्यक्ति अपनी स्वामित्व शक्ति के बल पर जन-साधारण का शोषण न करने पायें। भारत में प्रमुख उद्योगों, रेलों, बैंकों तथा अन्य महत्वपूर्ण निकायों के राष्ट्रीयकरण की नीति इसी उद्देश्य से अपनाई गई थी। कम्पनी विधि के अन्तर्गत लिमिटेड कम्पनियों को प्रोत्साहन भी इसी प्रयोजन से दिया गया है।

15. Usually a man is said not to own, but to have a right’.-Salmond.

16 जिस समय दास-प्रथा (slavery) प्रवर्तित थी उस समय जीवित व्यक्ति स्वामित्व की विषय-वस्तु होते थे, परन्तु वर्तमान में जीवित व्यक्तियों पर स्वामित्व नहीं हो सकता.

17. सामण्ड : ज्यूरिसपूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 253.

स्वामित्व के विभिन्न प्रकार (Different Kinds of Ownership)

स्वामित्व का सामान्य गुण यह है कि यह अनन्य (exclusive), अव्यवहित (immediate), अशते । (unconditional) तथा लाभप्रद (beneficial) होता है। परन्तु यह आवश्यक नहीं कि स्वामित्व में उपर्युक्त सभी तत्व एक साथ विद्यमान हों। अत: उपर्युक्त गुणों के अस्तित्व या अनस्तित्व के अनुसार स्वामित्व के अनेक प्रकार हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, यदि किसी व्यक्ति को किसी वस्तु पर अनन्य (exclusive) स्वामित्व प्राप्त नहीं है क्योंकि उस वस्तु के दो या अधिक स्वामी हैं; तो उस दशा में उस वस्तु पर प्रत्येक स्वामी का। सह-स्वामित्व (co-ownership) होगा। इसी प्रकार यदि स्वामित्व किसी शर्त को पूरा किये जाने या न किये। जाने पर निर्भर है, तो ऐसा स्वामित्व सशर्त स्वामित्व (conditional ownership) कहलायेगा।

स्वामित्व के विभिन्न प्रकारों का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

मूर्त तथा अमूर्त स्वामित्व (Corporeal and Incorporeal Ownership)

जैसा कि पूर्व में कथन किया जा चुका है, सामण्ड ने ‘स्वामित्व’ शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया है, सीमित अर्थ में तथा व्यापक अर्थ में। सीमित अर्थ में स्वामित्व भौतिक वस्तुओं पर होता है। अत: किसी। व्यक्ति को भौतिक वस्तुओं पर प्राप्त स्वामित्व को मूर्त स्वामित्व (corporeal ownership) कहते हैं। पार्थिव या मूर्त वस्तु से आशय उन वस्तुओं से है जिन्हें ज्ञानेन्द्रियों द्वारा देखा, परखा या स्पर्श किया जा सकता है, जैसे भूमि, मकान, सिक्के आदि। फेड्रिक पोलक (Federick Pollock) के अनुसार मूर्त स्वामित्व’ से आशय पार्थिव वस्तु के वैध प्रयोग के पूर्ण अधिकार से है। |

व्यापक अर्थ में स्वामित्व किसी व्यक्ति और उसमें निहित अधिकार का द्योतक है। यह अधिकार वैयक्तिक (personal), साम्पत्तिक (proprietary), लोक-लक्षी (in rem) अथवा व्यक्ति-लक्षी (in personam) इनमें से किसी भी स्वरूप का हो सकता है। अधिकार एक ऐसी अमूर्त संकल्पना है जिसकी अनुभूति ज्ञानेन्द्रियों द्वारा नहीं की जा सकती, जैसे पेटेन्ट, कॉपीराइट, मार्गाधिकार, दिये गये ऋण की राशि प्राप्त करने का अधिकार, आदि। अमूर्त स्वामित्व की विषय-वस्तु कोई मूर्त वस्तु न होकर अधिकार जैसी अमूर्त धारणा होती है। सारांश यह कि भौतिक वस्तु के स्वामित्व को मूर्त स्वामित्व कहते हैं, जबकि किसी अधिकार के स्वामित्व को अमूर्त स्वामित्व कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की जेब में दस रुपये हैं, तो उन रुपयों पर उसका ‘मूर्त स्वामित्व’ होगा क्योंकि ये रुपये मूर्त वस्तु हैं जिसकी अनुभूति ज्ञानेन्द्रियों द्वारा की जा सकती है, परन्तु यदि उस व्यक्ति को अपने ऋणी से दस रुपये लेने हैं, तो उस ऋणराशि को प्राप्त करने के उसके अधिकार को अमूर्त स्वामित्व कहा जायेगा क्योंकि इस अधिकार को ज्ञानेन्द्रियों से अनुभव नहीं किया जा सकता है।

सामण्ड स्वामित्व सम्बन्धी इस भेद को व्यर्थ मानते हैं क्योंकि उनके अनुसार प्रत्येक स्थिति में स्वामित्व की वास्तविक विषय-वस्तु अधिकार ही होती है न कि भौतिक पदार्थ । किसी भौतिक वस्तु के स्वामित्व का वास्तविक आधार उस वस्तु पर प्राप्त अधिकार ही होता है। अतः स्वामित्व की वास्तविक विषय-वस्तु ‘अधिकार’ है, न कि ‘भौतिक वस्तु’।।

(2) एकल स्वामित्व तथा सह-स्वामित्व (Sole Ownership and Co-ownership)

यदि स्वामित्व का अधिकार एक ही व्यक्ति में निहित होता है, तो ऐसा स्वामित्व ‘एकल स्वामित्व’ (sole ownership) कहलाता है; परन्तु यदि स्वामित्व का अधिकार दो या अधिक व्यक्तियों में संयुक्त रूप से निहित हो, तो उस दशा में प्रत्येक का स्वामित्व ‘सह-स्वामित्व’ (co-ownership) कहा जायेगा। इसका आशय यह कदापि नहीं कि सभी व्यक्ति उस सम्पत्ति के किसी हिस्से के पृथक-पृथक् स्वामी हैं। स्वामित्व का अधिकार एक अविभाज्य अधिकार है जो एक साथ अनेक व्यक्तियों में संयुक्त रूप से निहित हो सकता है। परन्तु बँटवारे द्वारा स्वामित्व के अधिकार को पृथक्-पृथक् हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है।

सह-स्वामित्व (co-ownership) के दो प्रमुख भेद हैं, जिन्हें (1) सामान्य या एक ही स्वामित्व (ownership in common) तथा (2) संयुक्त स्वामित्व (joint ownership) कहा जाता है।

सामान्य या एक ही स्वामित्व (ownership in common) में दो या अधिक व्यक्ति एक साथ किसी भूमि या वस्तु पर स्वामित्व रखते हैं। उनका कब्जा अविभाजित रहता है और उनमें से प्रत्येक व्यक्ति अन्य सह-स्वामियों के साथ उस भूमि या वस्तु का स्वामी होता है। सामान्य स्वामित्व में किसी एक सह-स्वामी की मृत्यु के पश्चात् उसका अधिकार उसके उत्तराधिकारी को प्राप्त हो जाता है। सामान्य स्वामित्व को सह| आभोग (tenancy in common) भी कहते हैं। । संयुक्त स्वामित्व में किसी सह-स्वामी की मृत्यु हो जाने पर उसका स्वामित्व भी समाप्त हो जाता है18 | तथा शेष जीवित सह-स्वामी उत्तरजीविता के अधिकार (right of survivorship) के आधार पर उस सम्पत्ति के पूर्ण स्वामी हो जाते हैं। इसमें मृत सह-स्वामी के उत्तराधिकारी को स्वामित्व प्राप्त नहीं होता, अपितु वह शेष जीवित सह-स्वामियों में अन्तरित हो जाता है।

संयुक्त स्वामित्व को संयुक्त आभोग (Joint tenancy) भी कहा जाता है। किसी भागीदारी फर्म में भागीदारों (Partners) का स्वामित्व संयुक्त स्वामित्व होता है। सामान्य या एक ही स्वामित्व तथा संयुक्त स्वामित्व (Ownership in Common and Joint ownership) के विभेद को एक अन्य दृष्टान्त द्वारा सरलता से समझा जा सकता है। जहाँ किसी सम्पत्ति पर | ‘अ’ और ‘ब’ दोनों का बराबरी का हिस्सा हो, तो सामान्य स्वामित्व (Ownership in Common) की दशा में, ‘अ’ की मृत्यु के पश्चात् उसके हिस्से की, अर्थात् आधी सम्पत्ति, उसके उत्तराधिकारियों को अन्तरित हो जायेगी और शेष आधी सम्पत्ति पर ‘ब’ का अधिकार यथावत् बना रहेगा। परन्तु यदि ‘अ’ और ‘ब’ उस सम्पत्ति के संयुक्त स्वामी (Joint owner) हों, तो उस दशा में ‘अ’ की मृत्यु के पश्चात् उसके स्वामित्व वाली आधी सम्पत्ति प्राप्त करने का हक ‘ब’ को ही होगा न कि मृतक ‘अ’ के उत्तराधिकारियों को। अर्थात्, संयुक्त स्वामित्व की दशा में ‘अ’ की मृत्यु के पश्चात् उसके उत्तराधिकारियों को सम्पत्ति का कोई भी हिस्सा नहीं मिलेगा और ‘ब’ पूरी सम्पत्ति का स्वामी हो जायेगा।।

भारतीय विधि के अनुसार एक सहस्वामी को आवश्यक रूप से तीन अधिकार प्राप्त होते हैं-(1) कब्जे का अधिकार, (2) सम्पत्ति के उपभोग का अधिकार, तथा (3) व्ययन का अधिकार (Right to dispose of)। अत: यदि किसी सहस्वामी को उसकी सम्पत्ति से वंचित किया जाता है, तो उसे उस सम्पत्ति पर पुनः कब्जा वापस प्राप्त करने का अधिकार होगा।

यदि किसी विलेख में यह स्पष्ट उल्लेख न हो कि व्यक्ति को किस प्रकार का सहस्वामित्व प्राप्त है, तो यह धारित किया जायेगा कि वह उस सम्पत्ति पर सहअधिभोगी का स्वामित्व (Tenancy-in-common) रखता है और प्रत्येक सहअधिभोगी स्वामी सम्पत्ति में अपने हिस्से पर पृथक् अधिकार रखता है।

संयुक्त-स्वामित्व में चार प्रकार की एकतायें (unities) विद्यमान होती हैं—(1) समय की एकता, (2) कब्जे की एकता, (3) हक या स्वत्व की एकता तथा, (4) उपयोग या उपभोग के हित की एकता (Unity of interest in use of enjoyment of property)

(3) न्यास-स्वामित्व तथा हितप्रद स्वामित्व (Trust Ownership and Beneficial Ownership)

सम्पत्ति का न्यास दोहरे स्वामित्व (duplicate ownership) का एक अद्भुत उदाहरण है। न्यास सम्पत्ति पर एक ही समय दो व्यक्तियों का स्वामित्व होता है। एक ओर तो न्यासी (trustee) उस सम्पत्ति पर स्वामित्व रखता है, जबकि दूसरी ओर हिताधिकारी को भी उस सम्पत्ति पर स्वामित्व प्राप्त होता है। न्याससम्पत्ति न्यासी के स्वामित्व को ‘न्यास-स्वामित्व’ (trust ownership) कहते हैं तथा उस सम्पत्ति पर हितग्राही के स्वामित्व को हितप्रद स्वामित्व (beneficial ownership) कहा जाता है। वस्तुत: न्यासी का स्वामित्व हितग्राही के कल्याण के लिए ही होता है, अत: वह नाममात्र का स्वामी होता है तथा न्यास सम्पत्ति का उपयोग स्वयं के लाभ के लिए नहीं कर सकता है। न्यास सम्पत्ति का वास्तविक स्वामित्व हितग्राहियों में निहित होता है, अर्थात् वस्तुत: सम्पत्ति हितग्राही की होती है, न कि न्यासी की। न्यासी तो न्यास सम्पत्ति से सम्बन्धित हितग्राही के अधिकारों का केवल प्रतिनिधित्व-मात्र करता है, तथापि हितग्राही ।

18. Kendall v. Hamilton (1971) 4 AC 504.

(beneficiary) को छोड़कर किसी तीसरे व्यक्ति के बजाय न्यास के स्वामित्व को विधिक प्राथमिकता प्राप्त

न्यास की आवश्यकता के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए सामण्ड ने कहा है कि इसका मुख्य उद्देश्य उन व्यक्तियों के अधिकारों और हितों को संरक्षण देना है, जो किसी कारणवश स्वयं प्रभावी रूप से अपने हितों का संरक्षण करने में असमर्थ हैं। जिन व्यक्तियों को न्यास द्वारा संरक्षण दिया जा सकता है, उन्हें चार वर्गों19 में रखा जा सकता है

(1) अजन्मे व्यक्ति (unborn persons) अर्थात् ऐसे व्यक्ति जिनका अभी जन्म न हुआ हो-ऐसे व्यक्तियों के स्वामित्व के उचित प्रबन्ध तथा संरक्षण के लिए उन न्यासियों में निहित कर दिया जाता है जो उसकी उचित देखभाल करते हैं।

(2) शिशु, पागल अथवा अन्य अक्षम व्यक्ति-ऐसे व्यक्तियों की सम्पत्ति के संरक्षण के लिए भी न्यास का निर्माण हो सकता है क्योंकि ये व्यक्ति स्वयं उसका प्रबन्ध करने में असमर्थ होते हैं।

(3) किसी सम्पत्ति में समान हित (common interest) रखने वाले अनेक व्यक्ति-यदि किसी सम्पत्ति में समान हित रखने वाले व्यक्तियों की संख्या बहुत अधिक है, तो असंख्य सह-स्वामियों के कारण सम्पत्ति के प्रबन्धन में अनेक व्यावहारिक कठिनाइयाँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है। अत: ऐसी सम्पत्ति को प्रायः किसी न्यासी या न्यासियों में निहित कर दिया जाता है जो उसका प्रबन्ध इन असंख्य व्यक्तियों के हित में करते हैं। | (4) किसी सम्पत्ति में परस्पर विरोधी हित रखने वाले व्यक्ति-यदि किसी सम्पत्ति में व्यक्तियों के परस्पर विरोधी हित निहित हों, तो ऐसी सम्पत्ति को विनाश से बचाने की दृष्टि से उसे न्यासियों में निहित करना उचित होता है, जो उस सम्पत्ति की देखभाल परस्पर विरोधी हित रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लाभ के लिए करते हैं।

न्यास-स्वामित्व की उत्पत्ति साम्या विधि से हुई है। इंग्लैण्ड में कॉमन लॉ के अन्तर्गत हितग्राही (cestui que trust) के हितों को विधिक मान्यता प्राप्त नहीं थी। अत: चांसरी न्यायालयों ने साम्या के आधार पर न्यास (trust) को मान्यता प्रदान करते हुए हितग्राही के हितों को संरक्षण दिया। न्यास-सम्पत्ति में न्यासी के स्वामित्व को स्वीकार करते हुए उसे हितग्राही के हितप्रद स्वामित्व से अलग रखा गया, अर्थात् न्यासी न्यास सम्पत्ति का उपयोग केवल हितग्राही के लाभ के लिए ही कर सकता है, न कि स्वयं के लाभ के लिए।

न्यासी तथा हितग्राही के स्वामित्व, दोनों का ही अन्तरण हो सकता है। न्यासी हितग्राही की सहमति के बिना न्यास सम्पत्ति का अन्तरण कर सकता है, किन्तु यह आवश्यक है कि ऐसा अन्तरण हितग्राही के हित के लिए ही किया गया हो।

अनेक न्यासों में हितग्राही का स्वामित्व (beneficial ownership) विल्लंगम-ग्रस्त हो जाता है। ऐसी दशा में न्यासी उस सम्पत्ति को हितग्राही (beneficiary) तथा विल्लंगम-धारी (encumbrancer) दोनों की ही ओर से धारित करता है तथा उसे दोनों के ही हितों का समान रूप से ध्यान रखना आवश्यक होता है।

न्यास तथा संविदात्मक सम्बन्ध में विभेद । (Distinction between trust and contractual relations)

न्यास और संविदात्मक संबंध में विभेद स्पष्ट करते हुये सामण्ड ने कहा है कि यद्यपि ऊपरी तौर पर दोनों एक जैसे ही प्रतीत होते हैं लेकिन ये एक-दूसरे से भिन्न हैं। न्यास में कोई दूसरा व्यक्ति (जिसे न्यासधारी कहते हैं) न्यासकर्ता की ओर से किसी तीसरे व्यक्ति (जिसे हितग्राही कहते हैं) के हित या फायदे के लिये न्यस्त सम्पत्ति की देखरेख करता है जबकि संविदात्मक संबंध में केवल संविदा के पक्षकार ही एक-दूसरे के प्रति दायित्व और कर्तव्य निभाते हैं। इन दोनों में निम्नलिखित अन्तर है

19. सामण्ड : ज्यूरिसपूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 257.

(1) ऐतिहासिक दृष्टि से संविदाओं का अस्तित्व न्यास की तुलना में बहुत पूर्ववर्ती है। संविदा इंगलिश कॉमन विधि का एक महत्वपूर्ण अंश था जबकि न्यास का प्रारम्भ साम्या विधि के आगमन से हुआ। न्यास सम्बन्धी संविदात्मक संबंधों के विवादों पर कॉमन लॉ न्यायालयों को अधिकारिता प्राप्त थी।

(2) यद्यपि संविदा की भाँति न्यास की निर्मिति भी दो व्यक्तियों के बीच करार से ही होती है परन्तु न्यास केवल न्यासकर्ता की एकल घोषणा (unilateral declaration) द्वारा भी निर्मित हो सकता है। | जिसका कि हितग्राही (Beneficiary) को भी पता न हो।

(3) न्यास में एक पक्ष द्वारा प्रस्ताव (offer) तथा दूसरे पक्ष द्वारा उसका प्रतिग्रहण (acceptance) आवश्यक नहीं होता जो कि संविदात्मक संविदा के अनिवार्य तत्व हैं। न्यासकर्ता द्वारा न्यास की निर्मिति घोषित कर दी जाने पर न्यासी द्वारा उसका प्रतिग्रहण गर्भित रूप से (implied) मान लिया जाता है जब तक कि वह अभिव्यक्ति द्वारा इसकी अस्वीकृति नहीं करता है।

(4) संविदात्मक संबंधों का यह सामान्य नियम कि किसी बाहरी व्यक्ति (stranger) को जो संविदा का पक्षकार न हो, संविदा से उत्पन्न कोई अधिकार प्राप्त नहीं होगा, न्यास के प्रति लागू नहीं होता है। अतः हितग्राही, न्यासकर्ता और न्यासी के मध्य संविदा का पक्षकार न होते हुये भी अपने अधिकार हेतु वाद दायर कर सकता है। संविदात्मक संबंध व्यक्तिबन्धी अधिकार (Right in personalm) का सृजन करते हैं जबकि न्यास की निर्मिति सर्वबन्धी अधिकार (Right in rem) का सृजन करती है जिसका कोई भी प्रवर्तन करा सकता है, सिवाय उस व्यक्ति को छोड़कर जिसने न्यस्त सम्पत्ति उचित मूल्य पर इस ज्ञान या जानकारी के बिना खरीदी है कि वह एक न्यस्त सम्पत्ति है। ज्ञातव्य है कि न्यास तथा एजेन्सी में भी विभेद है। एजेन्सी का स्वामी एजेन्सी का प्रधान (Principal) ही होता है न कि अभिकर्ता (Agent) परन्तु न्यास में दोहरा स्वामित्व रहता है, अर्थात् न्यासकर्ता तथा न्यासी, दोनों का ही न्यास सम्पत्ति पर स्वामित्व रहता है।

(4) विधिक स्वामित्व तथा साम्यिक स्वामित्व (Legal and Equitable Ownership)

विधिक स्वामित्व तथा साम्यिक स्वामित्व का भेद मूलत: इंग्लैण्ड के कॉमन लॉ तथा साम्या विधि पर आधारित है। कभी-कभी किसी एक ही वस्तु पर एक व्यक्ति का स्वामित्व होता है और दूसरे का उस पर सायिक स्वामित्व हो सकता है। उदाहरण के लिए, किसी न्यासी का स्वामित्व विधिक स्वामित्व होगा, जबकि हितग्राही का स्वामित्व साम्या द्वारा मान्य होने के कारण साम्यिक-स्वामित्व कहा जायेगा। तात्पर्य यह है कि जिस स्वामित्व का उद्भव कॉमन लॉ के नियमों से हुआ है उसे ‘विधिक स्वामित्व’ कहते हैं। और जिस स्वामित्व की उत्पत्ति साम्या के नियमों से हुई है, उसे ‘साम्यिक स्वामित्व’ कहा जाता है। कॉमन लॉ ने साम्यिक स्वामित्व को मान्य नहीं किया था तथा इसे केवल चांसरी न्यायालय ने मान्यता प्रदान की है।

विधिक तथा साम्यिक स्वामित्व के भेद को एक अन्य उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति अपना ऋण किसी अन्य व्यक्ति को मौखिक रूप से समनुदेशित (assigns orally) करता है, तो वह व्यक्ति अभी भी उस ऋण का विधिक-स्वामी होगा क्योंकि उसने ऋण को लिखित समनुदेशन द्वारा अन्तरित नहीं किया है तथा दूसरा व्यक्ति उस ऋण का साम्यिक स्वामी माना जायेगा। अत: यहाँ ऋण एक ही है किन्त उसके स्वामी दो हैं। इस दृष्टांत से यह स्पष्ट होता है कि विधिक और साम्यिक स्वामित्व का भेद विधिक और साम्यिक अधिकार के भेद से पूर्णत: भिन्न है। इस दृष्टांत में दोनों के ही अधिकार ‘विधिकअधिकार’ हैं किन्तु समनुदेशिती का स्वामित्व साम्यिक है। संक्षेप में यह कहना पर्याप्त होगा कि किसी वैध अधिकार का सायिक स्वामित्व साम्यिक अधिकार के स्वामित्व से भिन्न होता है। इसी प्रकार किसी साम्यिक। बन्धक (equitable mortgage) का स्वामित्व किसी वैध बन्धक के साम्यिक स्वामित्व से भिन्न है।20

20. The equitable owner ownership of an equitable brebence (12th ed.), P. 260. wnership of a legal right is a different thing from the ownership of an equitable die right. Similarly the ownership of an equitable right is egal mortgagee.’–Salmond : Jurisprudence (12th ed.), P. 260.

(5 ) निहित स्वामित्व तथा समाश्रित स्वामित्व (Vested and Contingent Ownership)

स्वामित्व या तो निहित होता है या समाश्रित। यदि स्वामित्व प्राप्त करने सम्बन्धी सभी बातें पूर्ण हो जाती हैं तथा स्वामी का हक पहले से ही पूर्ण रहता है, तो वह स्वामित्व निहित स्वामित्व (vested ownership) कहलाता है, जैसे यदि कोई व्यक्ति अपनी सम्पत्ति किसी दूसरे व्यक्ति को अन्तरित कर देता है, तो उस दूसरे व्यक्ति को उस सम्पत्ति पर निहित स्वामित्व प्राप्त होगा। परन्तु यदि स्वामित्व प्राप्त करने। सम्बन्धी कुछ बातें घटित हो जाती हैं लेकिन कुछ का घटित होना या न होना शेष रह जाता है, तो ऐसा स्वामित्व समाश्रित स्वामित्व (Contingent Ownership) होता है। निहित स्वामित्व में स्वामी को पूर्ण अधिकार (absolute right) प्राप्त होता है, किन्तु समाश्रित स्वामित्व में वह केवल सशर्त स्वामी होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अपनी वसीयत में यह उल्लेख करता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसकी जायदाद उसकी पत्नी को (पत्नी के जीवन-पर्यन्त) सौंपी जाये तथा पत्नी की मृत्यु के पश्चात् वह जायदाद ‘क’ को सौंपी जाये और यदि ‘क’ उस समय तक मृत हो, तो उसे ‘ख’ को सौंपा जाये, तो उस दशा में ‘क’ और ‘ख’ दोनों ही उस सम्पत्ति के समाश्रित स्वामी होंगे क्योंकि ‘क’ को सम्पत्ति तभी मिलेगी जब वसीयतकर्ता की पत्नी की मृत्यु हो जाये और ‘क’ उस समय जीवित हो। इसी प्रकार ‘ख’ को सम्पत्ति तभी मिलेगी जब वसीयतकर्ता की पत्नी और ‘क’ दोनों ही की मृत्यु हो जाये और ‘ख’ जीवित रहे। तात्पर्य यह है कि समाश्रित स्वामित्व में सम्पत्ति का स्वामित्व किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित होने या न होने पर ही स्वामी में निहित होता है। स्वामी का समाश्रित स्वामित्व विनिर्दिष्ट घटना के घटित होने या न होने पर निहित स्वामित्व में परिवर्तित हो जाता है ।21

समाश्रित स्वामित्व निम्नलिखित दो शर्तों पर निर्भर करता है

(1) पुरोभाव्य शर्त (Condition Precedent),

(2) उत्तरभाव्य शर्त (Condition Subsequent)

पुरोभाव्य शर्त ऐसी शर्त होती है जिसकी पूर्ति होने पर अधूरा हक पूरा हो जाता है। पुरोभाव्य शर्त की दशा में जो अधिकार पहले ही सशर्त अर्जित किया गया होता है, वही पूर्ण रूप से अर्जित हो जाता है।22 इसके विपरीत, उत्तरभाव्य शर्त ऐसी शर्त होती है जिसकी पूर्ति होने पर हक का लोप हो जाता है, अर्थात् वह नष्ट हो जाता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई वसीयतकर्ता अपनी सम्पत्ति पत्नी के लिए इस शर्त के साथ छोड़ जाता है कि यदि वह पुनर्विवाह करती है, तो उस सम्पत्ति से वंचित हो जायेगी तथा वह सम्पत्ति वसीयतकर्ता के पुत्रों को चली जायेगी, तो इस दशा में पत्नी को उस सम्पत्ति पर निहित स्वामित्व प्राप्त होगा तथा वसीयतकर्ता के पुत्र उस सम्पत्ति पर समाश्रित स्वामित्व रखेंगे। यहाँ पत्नी के पुनर्विवाह की शर्त उसके स्वयं के निहित स्वामित्व (vested ownership) के सम्बन्ध में उत्तरभाव्य शर्त (condition subsequent) है, जब कि वसीयतकर्ता के पुत्रों के समाश्रित स्वामित्व के सम्बन्ध में वह पुरोभाव्य शर्त (condition precedent) है। पत्नी पुनर्विवाह करती है, तो उसके निहित स्वामित्व का लोप हो जायेगा तथा पुत्रों का समाश्रित स्वामित्व निहित स्वामित्व में परिवर्तित हो जायेगा तथा वे उस सम्पत्ति पर पूर्ण अधिकार (absolute right) प्राप्त कर लेंगे।

पुरोभाव्य शर्त तथा उत्तरभाव्य शर्त में भेद (Distinction between Condition Precedent and Condition Subsequent)

पुरोभाव्य शर्त तथा उत्तरभाव्य शर्त में निम्नलिखित अन्तर है

(1) पुरोभाव्य शर्त हित निर्मित होने की पूर्ववर्ती होती है, जबकि उत्तरभाव्य शर्त की दशा में पहले हित का सृजन होता है तथा शर्त का प्रभाव उत्तरवर्ती होता है।

21. शशीकान्त बनाम प्रमोद चन्द्र, ए० आई० आर० 1933 कलकत्ता 609.

22. एलोकसी बनाम दपनारायण, 5 कलकत्ता 59.

(2) पुरोभाव्य शर्त में शर्त का अनुपालन होने तक संपदा निहित होना निलम्बित रहता है परन्तु उत्तरभावी शर्त में निलम्बन नहीं होता है।

(3) पुरोभाव्य शर्त में एक बार हित निहित किया जाने पर शर्त की अपूर्ति के कारण उसे छीना नहीं जा सकता, परन्तु उत्तरभाव्य शर्त में हित निहित होने पर भी शर्त पूरी न होने की दशा में हित छिन जाएगा।

(4) यदि पुरोभाव्य शर्त का पालन असंभव हो या वह अनैतिक या लोकनीति के विरुद्ध हो, तो ऐसी दशा में अन्तरण शून्य तथा निष्प्रभावी होगा, परन्तु उत्तरभाव्य शर्त असंभव, अनैतिक या लोकनीति के विरुद्ध होने पर भी अन्तरण प्रभावी होगा और ऐसी शर्त की अनदेखी कर दी जाएगी। आशय यह है कि पुरोभाव्य शर्त विधिमान्य होना आवश्यक है, जबकि उत्तरभाव्य शर्त विधिमान्य न होने पर भी उसकी अविधिमान्यता की उपेक्षा करके उसे प्रवर्तित किया जाएगा।

(5) पुरोभाव्य शर्त के प्रति तत्सदृश्य का सिद्धान्त (Doctrine of cypres) लागू होता है, जबकि उत्तरभावी शर्त की दशा में यह सिद्धान्त लागू नहीं होता है। सशर्त परिसीमन (Conditional Limitation)

जहां पुरोभाव्य शर्त तथा उत्तर भाव्य शर्त दोनों संयुक्त रूप से विद्यमान हों, तो इसे सशर्त परिसीमन कहा जाता है। जहां एक शर्त ऐसी हो, जो व्यक्ति को निहित हित से वंचित (Divest) करती हो तथा उस हित को किसी अन्य व्यक्ति में निहित (Vest) करती हो, तो इसे सशर्त परिसीमन कहा जायेगा क्योंकि पूर्ववर्ती हित के सन्दर्भ में यह उत्तरवर्ती शर्त होगी जबकि परतर हित (ulterior interest) के सन्दर्भ में यह पुरोभाव्य शर्त होगी। उदाहरणार्थ, यदि ‘अ’ को एक मकान का दान इस शर्त के साथ किया जाता है कि यदि वह अपनी पत्नी को तलाक दे देता है, तो वह मकान ‘ब’ का हो जायेगा। यहां जहां तक ‘अ’ का सम्बन्ध है। यह एक उत्तरभाव्य शर्त (condition subsequent) है क्योंकि उसे मकान का स्वामित्व (दान रूप में) तत्काल मिलता है परन्तु इस शर्त के साथ कि यदि उसने अपनी पत्नी को तलाक दिया, तो वह मकान ‘ब’ का हो जायेगा। परन्तु ‘ब’ के सन्दर्भ में यह एक पुरोभाव्य शर्त (condition precedent) है क्योंकि जब तक ‘अ’ अपनी पत्नी को तलाक नहीं देता वह मकान ‘ब’ को नहीं मिल सकेगा।

निहित स्वामित्व तथा समाश्रित स्वामित्व में भेद (Vested Ownership and Contingent Ownership Distinguished)

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि निहित स्वामित्व और समाश्रित स्वामित्व एक दूसरे से भिन्न हैं। इन दोनों में निम्नलिखित अन्तर है

(1) निहित स्वामित्व किसी शर्त की पूर्ति पर निर्भर नहीं होता है तथा इससे अधिकार का तत्काल सृजन हो जाता है। परन्तु समाश्रित स्वामित्व किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना घटित होने या न होने की शर्त पर आधारित रहता है।

(2) अन्तरण द्वारा अन्तरित किये गये निहित स्वामित्व की दशा में यदि अन्तरिती (transferee) की कब्जा लेने के पूर्व ही मृत्यु हो जाती है तब भी उसका स्वामित्व निरस्त नहीं होगा, परन्तु समाश्रित स्वामित्व अन्तरिती की मृत्यु हो जाने की दशा में शर्त पूरी होने के पहले कार्यान्वित नहीं हो सकेगा।

(3) यदि निहित स्वामित्व के अन्तरिती के वास्तविक उपभोग के पूर्व मृत्यु हो जाती है, तो निहित हित उसके उत्तराधिकारियों को अन्तरित हो जाएगा, परन्तु समाश्रित स्वामित्व की दशा में हित मृतक के वारिसों को अन्तरित नहीं होगा क्योंकि ऐसा स्वामित्व असंक्राम्य (inalienable) होता है, जो वंश के आधार पर उत्तराधिकारियों को प्राप्त नहीं हो सकता है।

(4) निहित स्वामित्व अन्तरणीय (transferable) तथा उत्तराधिकार में प्राप्य (heritable) होता है जब कि समाश्रित स्वामित्व ऐसा नहीं होता।

(5) निहित स्वामित्व में अधिकार तत्काल ही प्राप्त हो जाता है, भले ही उसका उपयोग भविष्य के लिए टल गया हो, किन्तु समाश्रित स्वामित्व में ऐसा अधिकार तुरन्त प्राप्त नहीं होता है वरन् वह किसी शर्त । के घटित होने या न होने पर निर्भर रहता है।

सामाजिक शक्ति के स्रोत के रूप में स्वामित्व का महत्व

फ्रीडमैन (W. Friedmann) ने स्वामित्व के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा है कि सामाजिक शक्ति के स्रोत रूप में स्वामित्व की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण रही है। रेनर (Renner) ने स्वामित्व को प्रबल सामाजिक शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए उसके क्रमिक विकास का वर्णन किया है।23 उनके अनुसार प्रारम्भिक काल में उद्योग (industry) के लिए उत्पादक को औजार, आवश्यक कच्चा माल तथा श्रम-साधन स्वयं जुटाने पड़ते थे। इनसे वह वस्तुओं का उत्पादन करता था तथा इन्हें बेचकर पर्याप्त लाभ कमाता था। जब उसके पास पर्याप्त धन संचित हो गया, तो वह औजार और कच्चा माल जुटाकर अन्य व्यक्तियों से श्रमिक के। रूप में काम लेने लगा। परन्तु उत्पादित वस्तुओं का स्वामी अभी भी उत्पादक ही होता था, न कि श्रमिक। इस उत्पादन से अर्जित लाभ पर उत्पादनकर्ता का स्वामित्व होता था। इस प्रकार उत्पादन के साधनों का स्वामित्व (ownership of means of production) मनुष्य की सामाजिक प्रतिष्ठा तथा शक्ति का स्रोत बन गया जिसके बल पर वह निजी लाभ अर्जित करते हुए अन्य व्यक्तियों ( श्रमिक वर्ग) को अपने अधीन रखने में सफल हुआ। औद्योगिक क्षेत्र में मालिक और मजदूर के सम्बन्धों का विकास इसी प्रकार हुआ है। मालिक की श्रमिकों को सेवामुक्त करने तथा उनकी सेवा-शर्तों में परिवर्तन करने की अधिकार-शक्ति उनके प्रभावशाली होने की द्योतक है। परन्तु रेनर के अनुसार निजी लाभ के बल पर पूंजीपतियों, मालिकों तथा नियोजकों की श्रेष्ठता आधुनिक समाजवादी युग के लिए असहनीय हो उठी। अत: वर्तमान में निजी स्वामित्व के स्थान पर लोक स्वामित्व (public ownership) को महत्व दिया जा रहा है। अनेक देशों द्वारा राष्ट्रीयकरण की नीति इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर अपनाई गई है।

फ्रीडमैन के अनुसार वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में निजी स्वामित्व के अनावश्यक महत्व को समाप्त करने के लिए तीन प्रमुख साधन अपनाये गये हैं |

प्रथम यह कि ट्रेड यूनियन तथा राष्ट्रीय बीमा योजनाओं के माध्यम से उत्पादक वर्ग तथा श्रमिक वर्ग के बीच का अन्तर समाप्त कर दिया गया है तथा अब उत्पादक वर्ग अपनी शक्ति या प्रभाव के आधार पर श्रमिकों का शोषण नहीं कर सकते हैं। परिणामस्वरूप वर्तमान में इन दोनों ही वर्गों की सौदा-क्षमता (bargaining capacity) समान है।

द्वितीय, कानूनी नियन्त्रणों द्वारा उद्योगपतियों के निजी-लाभ को सीमित कर दिया गया है। आयकर (income tax) या लाभों पर कर (Profits tax) आदि द्वारा निजी उत्पादकों को अपने लाभ की समुचित राशि लोकहित के लिए राज्यों को देनी पड़ती है। इससे धन के वितरण की असमानता बहुत-कुछ कम हो सकेगी।

तृतीय, वर्तमान में निकायों (Corporations) को प्रोत्साहन दिये जाने के कारण शक्ति के तत्व’ (power element) को ‘स्वामित्व’ से पृथक् रखने की प्रवृत्ति दिनोंदिन बढ़ रही है। पूंजीवादी व्यवस्था में ‘स्वामित्व’

और ‘शक्ति’, दोनों ही उत्पादकों में केन्द्रित होने के कारण श्रमिक वर्ग के लिए हानिकारक थी। परन्त वर्तमान औद्योगिक व्यवस्था में शक्ति (power) प्रबन्धकों तथा विशेषज्ञों में निहित है न कि उद्योग के स्वामी में। इस प्रकार ‘शक्ति’ को स्वामित्व’ से पृथक् कर दिया गया है। प्रबन्धक वर्ग शक्ति का दुरुपयोग न कर सकें। इस दृष्टि से वर्तमान कम्पनी-विधि में समुचित व्यवस्था की गई है 24 श्रमिकों के प्रतिनिधियों को औद्योगिक प्रबन्धन में भागीदारी दी जाना भी इस दिशा में एक प्रगतिवादी कदम है।।

23. रेनर : इन्स्टीट्यूशन्स ऑफ प्राइवेट लॉ एण्ड देयर फंक्शन्स (1949), काहन-फ्रियून्ड (Kahn-Freund) द्वारा। सम्पादित.

24. नेशनल टेक्सटाइल्स वर्कर्स बनाम पी० आर० रामकृष्णन्] ए० आई० आर० 1983 सु० को 75; कामगार, रोहतास इंडस्ट्रीज बनाम रोहतास इंडस्ट्रीज (1987) 62 कम्पनी केसेज 872.

उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि वर्तमान समाज में स्वामित्व की भूमिका को समझने के लिए उसका औपचारिक विश्लेषण मात्र पर्याप्त नहीं है बल्कि उसका क्रियात्मक विश्लेषण (functional analysis) किया जाना भी आवश्यक है।25

भारतीय विधि के अन्तर्गत स्वामित्व की स्थिति।

अन्य देशों की भाँति भारतीय विधि-व्यवस्था में भी सम्पत्ति पर स्वामित्व के अधिकार को मान्यता दी गई है। परन्तु भारत में कोई भी व्यक्ति किसी वस्तु पर अनन्य स्वामित्व (absolute ownership) नहीं रख सकता है क्योंकि इस देश में स्वामित्व का अधिकार संविधियों तथा विनियमों द्वारा निर्बन्धित रखा गया है। भूमि के परिसीमन सम्बन्धी कानून (Land Ceiling Laws), भाडा नियन्त्रण अधिनियम, बैंक-राष्ट्रीयकरण तथा कम्पनी-विधान आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ।

प्राचीन भारतीय विधि में मनु, याज्ञवल्क्य, व्यास तथा नारद आदि विधि-मर्मज्ञों की कृतियों में स्वामित्व की संकल्पना का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। चिरभोगाधिकार, उपनिधान तथा विक्रय आदि सम्बन्धी पुरातत्व विधियाँ स्वामित्व व कब्जे के भेद पर ही आधारित थीं 26 कब्जे को स्वामित्व का प्रमाण माना जाता था और इस प्रकार दोनों में घनिष्ट सम्बन्ध था। कात्यायन ने ‘स्वामित्व विहीन विक्रय’ (sale without ownership) के संबंध में लिखा है, ”नाष्टिकेस्तु प्रकुर्वीत तद्वनन्नातुभि स्वकम्’, अर्थात्, यदि किसी व्यक्ति की कोई वस्तु गुम हो जाती है और वह उसे किसी अन्य व्यक्ति के कब्जे में पाता है, तो उस वस्तु को प्राप्त करने के लिए उसे साक्षियों तथा अन्य सबूतों के आधार पर यह सिद्ध करना होगा कि उस वस्तु पर उसका स्वामित्व था।

उल्लेखनीय है कि प्राचीन हिन्दू विधि में भी व्ययन के अप्रतिबंधित अधिकार (unrestricted right of disposition) को स्वामित्व का महत्वपूर्ण घटक माना गया था। कात्यायन के अनुसार स्वामी की व्ययन संबंधी शक्ति असीमित थी तथा उस पर कोई निर्बधन नहीं लगाया जा सकता था। |

नारद ने संपत्ति के स्वामित्व को अर्जित करने के बारह तरीकों (modes) का वर्णन किया है, लेकिन मनुस्मृति में केवल सात तरीकों का वर्णन है, जो (1) वसीयत (inheritance), (2) लाभ (gain), 3) क्रय (purchase), (4) विजय (conquest), (5) सम्पत्ति का उपयोजन (application of wealth), (6) नियोजन (employment) तथा (7) दान का प्रतिग्रहण (acceptance of gift) है 27 ।

भारत में प्राचीनकाल में स्वामित्व का अर्जन बहुधा उत्तराधिकार, दान तथा विक्रय द्वारा होता था। दान और विक्रय के लिए निर्धारित औपचारिक कर्मकाण्ड की पूर्ति की जाना आवश्यक होता था। रोमन विधि के अन्तर्गत स्वामित्व का अन्तरण ‘तुला’ (Balance) तथा ताम्रमुद्राओं के साथ लिवरोमेन’ के समक्ष साक्षियों की उपस्थिति में होता था। वर्तमान भारत में स्वामित्व के अन्तरण सम्बन्धी औपचारिकताएँ विभिन्न विधियों28 में सन्निहित हैं जिनका अनुपालन किया जाना अनिवार्य है।

स्वामित्व और कब्जे में भेद

सम्पत्ति पर प्रभुत्व के अधिकार को स्वामित्व (ownership) कहते हैं। स्वामित्व के अधिकार में सम्पत्ति का स्वामी होने का अधिकार, सम्पत्ति के उपयोग, अन्तरण तथा उसे नष्ट करने का अधिकार समाविष्ट है। परन्तु हो सकता है कि ये सब अधिकार एक ही समय विद्यमान न हों। कब्जे के अधिकार द्वारा स्वामित्व का अधिकार प्राप्त किया जाना सम्भव है। ।

स्वामित्व में स्वामी और सम्पत्ति का सम्बन्ध विधितः (de jure) होता है जब कि कब्जे में कब्जाधारी। और सम्पत्ति का सम्बन्ध वस्तुतः (de facto) होता है, अर्थात् कब्जा वास्तविक होता है। उदाहरण के लिए

25. डायस एण्ड ह्यज : ज्यूरिसपूडेंस, पृ० 346.

26. गंगानाथ झा : हिन्दू लॉ एण्ड इट्स सोर्सेस (ग्रन्थ I), पृ० 122.

27. सप्त बिलांगमा धर्मा दायोलाभ: क्रयोजयः। प्रयोग: कर्मयोगश्च या प्रतिग्रह एव च ॥ मनुस्मृति X-315

28. उदाहरणार्थ, सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882; माल-विक्रय अधिनियम, 1930; भागीदारी अधिनियम, 1932:। कम्पनी अधिनियम, 1956; रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1908 आदि. ।

किराये पर दिये गये मकान पर उसके मालिक का स्वामित्व विधितः होता है, लेकिन किरायेदार का कब्जा वस्तुत: (वास्तविक) होता है। ।

स्वामित्व और कब्जे के विभेद को स्पष्ट करते हुए सामण्ड कहते हैं कि कोई व्यक्ति किसी वस्तु का स्वामी तभी होता है जब उस वस्तु पर उसका दावा राज्य की इच्छा द्वारा विधि के माध्यम से होता है; परन्तु उस वस्तु पर कब्जा उस व्यक्ति की स्वाग्रही इच्छा से कायम रहता है। इस प्रकार स्वामित्व विधि का प्रत्याभूति (गारन्टी) है, जब कि कब्जा तथ्यों की प्रत्याभूति है।

कब्जा, स्वामित्व का बाह्य साक्ष्य (external evidence) होता है। किसी वस्तु के कब्जाधारी को उस वस्तु का स्वामी उपधारित (presume) किया जाता है और यदि कोई अन्य व्यक्ति उस वस्तु पर स्वत्व (Title) होने का दावा करता है, तो उसे अपने स्वत्व को प्रमाणित करना होगा। दीर्घकाल तक कब्जा धारण किये रहने को स्वामित्व का स्रोत (Source of ownership) माना जाता है।

जब वास्तविक स्वामी के प्रतिकूल कोई व्यक्ति विहित अवधि तक (सामान्यत: 12 वर्ष) कब्जा धारित किये रहता है, तो स्वामी का स्वामित्व सम्बन्धी अधिकार निर्वापित (extinguish) हुआ माना जायेगा और प्रतिकूल कब्जाधारी को स्वत्व प्राप्त हो जायेगा।

डॉ० सेठना के अनुसार स्वामित्व और कब्जे में वही सम्बन्ध है, जो आत्मा और शरीर में है। जिस प्रकार आत्मा की अनुभूति के लिए शरीर आवश्यक है, उसी प्रकार स्वामित्व की अभिव्यक्ति के लिए कब्जा आवश्यक तथा उपयोगी होता है क्योंकि वह बाह्य और औपचारिक स्वरूप का होता है। ।

उल्लेखनीय है कि कब्जे के बिना भी स्वामित्व सम्भव है जैसा कि ऋण (debt) को स्वामित्व धारण योग्य होता है लेकिन उस पर कब्जा नहीं रहता है। इसके विपरीत, कब्जा भी बिना स्वामित्व के हो सकता है। जैसा कि किरायेदार द्वारा किराये पर लिये गये मकान का कब्जा । सामान्यत: लोकलक्षी अधिकार (Right in rem) पर कब्जा और स्वामित्व दोनों होते हैं जबकि व्यक्तिलक्षी अधिकार (Right in personant) पर स्वामित्व होता है लेकिन कब्जा नहीं होता।

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