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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 24 Notes

 

Bachelor of Laws LLB 1st Semester / 1st Year Jurisprudence & Legal Theory Section 4 Chapter 24 Possession Study Material Notes in Hindi English PDF File Online Download Free, LLB 1st, 2nd, 3rd, 4th, 5th, and 6th Semester Notes PDF Free for LLB all University.

अध्याय 24 (Chapter 24

कब्जा (Possession)

LLB Study Material

सांपत्तिक अधिकार के रूप में कब्जे की संकल्पना विधिशास्त्र में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। प्राचीन काल में भी विधिशास्त्रियों ने कब्जे को विधिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी। किसी वस्तु पर भौतिक नियंत्रण को कब्जा कहा जाता है। यह सर्वविदित है कि भौतिक वस्तुओं के उपयोग तथा उपभोग (use and consumption of material things) के बिना मानव-जीवन असम्भव है। जीवित रहने के लिए मानव को भोजन, कपड़ा और मकान चाहिये। इसी प्रकार व्यस्त रहने के लिए उसे कुछ काम भी चाहिये। जब तक अन्न, वस्त्र या साधन मनुष्य के आधिपत्य में नहीं हैं, उसे जीवन-यापन करना दूभर हो जायेगा। इसीलिए सामण्ड ने कहा है कि मानव जीवन के लिए भौतिक वस्तुओं पर आधिपत्य (कब्जा) होना परम आवश्यक है। उनके अनुसार कब्जा मनुष्यों और वस्तुओं के आधारभूत सम्बन्धों को व्यक्त करता है।

कब्जे को स्वामित्व के अर्जन हेतु एक महत्वपूर्ण शर्त के रूप में मान्यता प्राप्त है। गिरवी सम्बन्धी विधि (law relating to pledge) के अन्तर्गत गिरवी रखी गयी वस्तु पर कब्जे को ऋणदाता के स्वामित्व की उपधारणा किये बिना एक अच्छी प्रतिभूति माना जाता है। कब्जे की प्रकृति (Nature of Possession) | कब्जे की संकल्पना से विधि के अंतर्गत स्वामित्व (ownership), हक (title) तथा सम्पत्ति (property)

आदि सम्बन्धी अधिकारों को ठीक तरह से समझने में पर्याप्त सहायता मिलती है। विधिशास्त्रियों का मत है। कि कब्जे में स्वामित्व-निर्माण की शक्ति निहित रहती है। किसी स्वामीहीन वस्तु (Res Niullitus) को यदि कोई व्यक्ति अपने कब्जे (possession) में ले लेता है, तो वह उस वस्तु का वास्तविक तथा एकमात्र स्वामी माना जायेगा; केवल इतना ही नहीं, यदि कोई व्यक्ति किसी वस्तु या सम्पत्ति पर अपने स्वामित्व के हक (title) को किसी अन्य आधार पर सिद्ध नहीं कर पाता, तो उस वस्तु पर केवल दीर्घकाल से कब्जा साबित कर दिया जाने पर वह उस वस्तु या सम्पत्ति का स्वामी माना जायेगा। यही कारण है कि बेन्थम ने कब्जे (possession) के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि किसी सम्पत्ति पर कब्जाधारी का वास्तविक कब्जा उसे सम्पत्ति पर हक (title) दिलाता है और जब तक कोई अन्य व्यक्ति इससे बेहतर हके स्थापित नहीं कर देता, कब्जाधारी ही उस सम्पत्ति का स्वामी बना रहेगा। अपनी भूमि पर कब्जा वापस प्राप्त करने के लिये जिस उपचार की माँग की जाती है उसे आधिपत्यात्मक उपचार (possessory remedy) कहते है |

विधि के अन्तर्गत कब्जे को स्वामित्व का प्रथमदृष्ट्या प्रमाण माना गया है। यदि कोई व्यक्ति किसी के कब्जे में दखल देता है, तो उसे उस सम्पत्ति पर अपना बेहतर हक (better title) सिद्ध करना होगा या कब्जाधारी से अधिक प्रबल-अधिकार साबित करना होगा। यदि वह ऐसा सिद्ध नहीं कर पाता, तो उस सम्पत्ति का स्वामित्व कब्जाधारी में ही होगा। यही नहीं, किसी व्यक्ति के कब्जे में दखल देना कानूनी अपकार है तथा अपकारी अपनी प्रतिरक्षा (defence) में यह दलील नहीं दे सकता कि उस सम्पत्ति पर कब्जा रखने वाले के बजाय किसी अन्य तीसरे ही व्यक्ति का हक (title) है। दूसरे शब्दों में, बेदखली के वाद में परव्यक्ति के अधिकार (Jus tertii) का बचाव मान्य नहीं है।

1. Possession of material things is essential to life. It is the most basic relationship between men and things–Salmond : Jurisprudence, (12th Edn.), p. 265.

2. Possession is the prima facie evidence of ownership.

3. जैफरीज बनाम ग्रेट वेस्टर्न रेलवे, 5 ई० एण्ड बी० 802 (805).

सामण्ड ने ‘कब्जे’ के विषय में अभिकथन किया है कि कब्जे को परिभाषित करना उतना ही कठिन है। 375 जितना कि उसका संरक्षण करना। उनके अनुसार कब्जा मनुष्य और वस्तु के बीच मौलिक सम्बन्ध रखता है। किसी भौतिक वस्तु पर कब्जा रखना यह दर्शाता है कि कब्जाधारी को उस वस्तु पर निरन्तर हक जताने तथा उपयोग का अनन्य अधिकार प्राप्त है।

आंग्ल विधिशास्त्री जी० डब्ल्यू० पैटन ने यह विचार व्यक्त किया है कि इंग्लैण्ड के न्यायाधीश कब्जे को परिभाषित करने के सदैव अनिच्छुक रहे हैं ताकि कब्जे सम्बन्धी प्रकरणों को निपटाने में सुविधा रहे और पक्षकारों के प्रति अन्याय न हो।

सर हेनरी मेन के अनुसार कब्जे से आशय किसी वस्तु के साथ ऐसे संपर्क से है जो अन्य व्यक्तियों को उस वस्तु के उपभोग से अपविर्जत करता है। अत: कब्जे में इच्छानुसार भौतिक संपर्क पुनर्ग्रहण का तत्व विद्यमान रहता है।

रोमन विधि के अन्तर्गत कब्जे सम्बन्धी अवधारणा (Possession under the Roman law)

रोमन विधि में कब्जे के विषय में धारणा यह है कि किसी वस्तु पर कब्जा होना उस पर विधिक कब्जा होने से भिन्न है। रोमन विधि के अनुसार किसी वस्तु पर व्यक्ति का नैसर्गिक कब्जा (inaturalis possessio) तब उत्पन्न होता है जब वस्तु उस व्यक्ति के भौतिक नियंत्रण (physical control) में रहती है। इसे वास्तविक कब्जा (corpus possessionis) भी कहा गया है, जो कब्जे का भौतिक तत्व है। यदि व्यक्ति का किसी वस्तु पर अनन्य नियंत्रण (exclusive control) हो और वह इस सम्बन्ध में आश्वस्त हो कि उस व्यक्ति का उस वस्तु पर वास्तविक कब्जा (corpus possessionis) है, तो वह उस वस्तु का विधिक कब्जाधारी माना जायेगा। व्यक्ति को ऐसा कब्जा उस समय प्राप्त होता है जब वह वस्तु को अपने निरोध (detention) में रखे हो या वस्तु उसकी अभिरक्षा (custody) में हो। जब वास्तविक कब्जे (corpus possessionis) के साथ ‘धारणाशय’ (animus) अर्थात् कब्जे को धारण किये रहने की इच्छा का मानसिक तत्व भी विद्यमान हो, तो उसे विधिक कब्जा (Civilis possessio) कहा जाता है।’ धारणाशय’ से तात्पर्य यह है कि अन्य व्यक्तियों को वस्तु के उपयोग से अपवर्जित रखते हुए कब्जाधारक उसे धारित किये रहे। सकारात्मक दृष्टि से धारणाशय (animus) से तात्पर्य वस्तु पर नियंत्रण बनाये रखने की इच्छा से है, जबकि नकारात्मक दृष्टि से इसका अर्थ है, दूसरों को वस्तु के उपभोग से अपवर्जित रखना। जब कब्जे से सम्बन्धित भौतिक (corpus) तथा मानसिक (animus) दोनों तत्व एकत्र मिल जाते हैं, तो कानूनी कब्जा (juristic possession) उत्पन्न हो जाता है।

कब्जेसंबंधी सिद्धान्त (Theories of Possession)

कब्जे की संकल्पना के संबंध में सैविनी, इहरिंग, कॉन्ट तथा हॉलैन्ड के सिद्धान्त महत्वपूर्ण हैं।

1. सैविनी का कब्जासंबंधी सिद्धान्त-सैविनी ने कब्जे संबंधी अपने सिद्धान्त को रोमन विधिशास्त्री पॉल (Paul) के विचारों पर आधारित करते हुए कब्जे के लिए दो तत्वों का होना आवश्यक माना। है, जिन्हें उन्होंने (1) कार्पस (corpus) तथा (2) धारणाशय (animus) कहा है। भौतिक तत्व (corpus) से सैविनी का आशय वस्तु पर भौतिक नियंत्रण से है जबकि धारणाशय (animus) से अभिप्राय वस्तु को धारण किये रहने की मानसिक इच्छा से है। परन्तु अनेक विधिवेत्ताओं ने सैविनी के इस सिद्धान्त की आलोचना इस

आधार पर की है कि इसके अन्तर्गत कब्जे के लिए भौतिक (वास्तविक नियंत्रण) तथा धारण किये रहने की मानसिक इच्छा, दोनों को आवश्यक माना गया है, जबकि अनेक परिस्थितियों में इन दोनों में से किसी या दोनों के लुप्त हो जाने पर भी कब्जा बना रहता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति अपना सामान मकान में बन्द करके कुछ दिनों के लिए बाहर जाता है, तो उस सामान पर उस समय के लिए उसका भौतिक नियंत्रण न रहने पर भी विधि की दृष्टि से वह उसका कब्जाधारी कहलायेगा।

4. हेनरी मेन : एंशियेंट लॉ पृ० 47.

2. इहरिंग का ‘कब्जा’ संबंधी सिद्धान्त-इहरिंग ने कब्जे के प्रति वस्तुनिष्ठ तथा समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा है कि जब भी किसी व्यक्ति के किसी वस्तु के प्रति स्वामी की भाँति संबंध प्रतीत हों, यह माना जाना चाहिये कि उस वस्तु पर उसका कब्जा भी होगा जब तक कि किसी विधि के नियम द्वारा व्यावहारिक सुविधा के आधार पर उसे कब्जे से वंचित न रखा गया हो। इहरिंग ने कब्जे के धारणाशय (unints) के तत्व को कब्जे की प्रज्ञावान चेतना (intellegent consciousness) मात्र निरूपित किया है। अत: वे धारणाशय को कब्जे के आवश्यक तत्व के रूप में अधिक महत्व नहीं देते हैं और इसे वे कब्जे के लिए एक पूरक तत्व मात्र निरूपित करते हैं। इस प्रकार इहरिंग का कब्जा संबंधी सिद्धान्त अधिक व्यावहारिक एवं यथार्थवादी प्रतीत होता है। यह सिद्धान्त सैविनी के सिद्धान्त से बेहतर है क्योंकि इसमें नमनशीलता है। तथापि, सेविनी की भांति इहरिंग भी यह स्पष्ट करने में विफल रहे हैं कि कतिपय दशाओं में कब्जे का काय (corpus) तथा उस पर धारणाशय (animus) विद्यमान न होने पर भी विधि द्वारा ऐसे कब्जे को संरक्षण क्यों दिया जाता है। कब्जे के लिये काय (corpus) और उसे धारण किये रहने की मानसिकता (animus) ये दोनों अत्यावश्यक तत्व माने जाने के प्रति आपत्ति का मूल कारण यह है कि इन दोनों की विषयवस्तु (contents) में समय के साथ अत्यधिक बदलाव आया है और इन्हें किसी एक निश्चित कसौटी (critarian) के आधार पर आंका जाना सम्भव नहीं है। इस सन्दर्भ में मुख्य न्यायाधीश इलें (Erle, C.J.) ने अभिकथन किया कि ‘कब्जा एक अत्यधिक अनिश्चित एवं अस्पष्ट संकल्पना है और इसका अर्थ विषयवस्तु के अनुसार सदैव बदलता रहता है।”5

3. ‘कब्जासम्बन्धी होम्स का सिद्धान्त (Holme’s Theory of Possession)

जस्टिस होम्स के अनुसार कब्जा धारण करने के लिये व्यक्ति का कब्जे की विषयवस्तु से भौतिक सम्बन्ध होना चाहिये तथा उसे धारण किये रहने का उसका आशय भी होना चाहिये। अत: वे काय (corpus) और कब्जा धारण करने के आशय (aninus) दोनों को कब्जे के अत्यावश्यक तत्व मानते हैं। तथापि वे आशय को काय की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं और इस दृष्टि से उनके विचार सेविनी के कब्जे सम्बन्धी विचारों से समानता रखते हैं।

4. सामण्ड का कब्जे सम्बन्धी सिद्धान्त (Salmond’s Theory)

सामण्ड ने ‘तथ्यतः कब्जा’ और ‘विधित: कब्जा’ में विभेद करने से इन्कार करते हुये अभिकथन किया कि ये एक-दूसरे से भिन्न नहीं हैं और वस्तुत: एक ही हैं। उन्होंने भौतिक वस्तुओं पर कब्जे को मूर्त कब्जा (Corporeal possession) निरूपित किया तथा अधिकारों से सम्बन्धित कब्जे को अमूर्त कब्जा (incoporeal possession) कहा जाना उचित समझा। किसी वस्तु पर भौतिक कब्जे से उनका आशय था उस वस्तु के अनन्य उपयोग पर अपना हक निरन्तर बनाये रखना, जिसमें दो तत्वों का होना अनिवार्य है। ये दो तत्व हैं, वस्तु के भौतिक काय (corpus) पर कब्जा तथा उसे धारण किये रहने की इच्छा जिसे सामण्ड ने धारणाशय। (Animus) कहा। धारणाशय से सामण्ड का अभिप्राय अन्य लोगों को उस वस्तु के उपयोग से परावृत्त रखना था।

बृजेश बनाम हॉक्सवर्थ6 के वाद का सन्दर्भ देते हुये सामण्ड ने अभिकथन किया कि उक्त वाद में न्यायालय ने ठीक ही निर्णय दिया था कि उस दुकानदार का उसकी दुकान में पड़े हुये नोटों की गड्डी के कब्जे । से अन्य लोगों को अपवर्जित (exclude) रखने का कोई आशय न होने के कारण (क्योंकि वह स्वयं उन नोटों का वहां पड़े रहने के बारे में नहीं जानता था) उन नोटों के प्रति उसका ‘ धारणाशय’ (animus) नहीं था, और इसलिये दुकानदार की बजाय उन नोटों को पाने वाले (finder) व्यक्ति का कब्जा उचित माना गया।

तथापि सामण्ड के विधिशास्त्र के ग्यारहवें संस्करण के सम्पादक ग्लेनवाइल विलियम्स (Glanvile Williams) ने सामण्ड द्वारा प्रतिपादित कब्जे के सिद्धान्त (Theory of possession) को परिवर्तित करते हुये

5. R. V. Pirdy, (1975) QB 288 (298).

6. (1851) 27 एल० जे० QB 75.

अभिकथन किया कि यद्यपि कब्जा प्राप्त करने के प्रारम्भ में कब्जे का ‘काय’ तथा धारणाशय, दोनों तत्वों का विद्यमान होना आवश्यक है लेकिन कब्जा अर्जित कर लेने के पश्चात् ये दोनों तत्व लुप्त हो जाने पर भी व्यक्ति का उस वस्तु पर कब्जा यथावत् बना रहेगा। ।

5. ‘कब्जासंबंधी कॉन्ट का सिद्धान्त-कॉन्ट (Kant) का कथन है कि सभी व्यक्ति जन्म से स्वतंत्र एवं समान होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में इच्छा की स्वतंत्रता का भाव अनिवार्यतः विद्यमान रहता है और ‘कब्जा’ इस इच्छा की अभिव्यक्ति का साकार रूप है। अतः किसी वस्तु को कब्जे में लेकर व्यक्ति उसे धारण करने । की अपनी इच्छा को कार्यान्वित करता है। इसीलिए हीगल (Hegel) ने कहा है कि कब्जा मानव की स्वतंत्रइच्छा की वस्तुनिष्ठ अनुभूति है।

6. हॉलैन्ड का कब्जा संबंधी सिद्धांत-हॉलैंड की कब्जा संबंधी अवधारणा समाज की शांतिव्यवस्था पर आधारित है। उनके अनुसार विधि द्वारा ‘कब्जे’ को विधिक संरक्षण दिये जाने का मुख्य उद्देश्य समाज में शांति व्यवस्था बनाये रखना है। अत: ‘कब्जा’ किसी वस्तु पर व्यक्ति के वैधानिक अधिकार के प्रति आदर का प्रतीक है। यही कारण है कि अवैध कब्जाधारी की बजाय औचित्यपूर्ण कब्जाधारी को अपना कब्जा बनाये रखना अपेक्षाकृत सरल, सुगम एवं सुविधाजनक होता है।

निरोध तथा अभिरक्षा में विभेद (Detention & Custody Distinguished)

कब्जे के संदर्भ में निरोध (detention) और अभिरक्षा (custody) में भेद कर देना उचित होगा। निरोध (detention) में व्यक्ति का वस्तु पर नियंत्रण सहित कब्जा होता है चाहे उस वस्तु पर उसका स्वामित्व हो या न हो, किन्तु अभिरक्षा में स्वामित्व के बिना कब्जा और नियंत्रण होता है। इंग्लिश विधि के अन्तर्गत निरोध और कब्जे में कोई भेद नहीं माना गया है। | किसी वस्तु पर कब्जा होना कब्जाधारी को उस वस्तु के प्रति कुछ लाभ (advantages) दिलाता है। रोमन विधि के अंतर्गत ये लाभ निम्नलिखित हो सकते हैं

(1) ‘कब्जा’ स्वामित्व का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होता है। अत: किसी वस्तु पर दीर्घकालिक कब्जा होना कब्जाधारी के स्वामित्व के हक का पर्याप्त प्रमाण है। दूसरे शब्दों में, सम्पत्ति पर कब्जा रखने वाला व्यक्ति ही उसका स्वामी माना जाता है जब तक कि अन्य व्यक्ति उससे बेहतर हक साबित न कर दे।

(2) कब्जा कतिपय उपचारों का आधार है। यहाँ तक कि अनधिकृत रूप में कब्जा रखने वाले व्यक्ति का भी कब्जाधीन सम्पत्ति का अधिकार सुरक्षित रहता है तथा सम्पत्ति का वास्तविक स्वामी उसे विधि की प्रक्रिया का अनुपालन किये बिना इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकता है।

(3) स्वामित्व अर्जित करने के विभिन्न तरीकों में ‘कब्जा’ एक महत्वपूर्ण शर्त है।

(4) कब्जाधीन वस्तु गिरवी रखी जाने पर लेनदार के लिए पर्याप्त प्रतिभूति (security) होती है तथा उसे इस बात की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रहती कि उस वस्तु पर वास्तविक स्वामित्व किसका है।

इंग्लिश-विधि के अन्तर्गत कब्जा‘ (Possession under the English Law)

आंग्ल-विधिवेत्ताओं ने कब्जे के उपर्युक्त लाभों को स्वीकार करते हुए कब्जे के कुछ दोषों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उनके अनुसार अनेक दशाओं में कब्जाधारी अन्य व्यक्ति को स्वयं से अधिक अच्छा हक अन्तरित करता है। उदाहरणार्थ, यदि किसी व्यक्ति ने बैंक नोट चुराये हैं तथा उन्हें किसी अन्य व्यक्ति को बिना यह जानकारी दिये कि वे चोरी के हैं, अन्तरित कर दिया है, तो ऐसी दशा में उस व्यक्ति को उन बैंक नोटों पर चोर की तुलना में अधिक अच्छा हक प्राप्त होगा। इसी प्रकार स्वामीहीन वस्तु (res nullitus) पर सर्वप्रथम कब्जा धारण करने वाले व्यक्ति का कब्जा उसके हक का सुदृढ प्रमाण होता है। सामण्ड ने इन लाभों को ‘‘कब्जे से उत्पन्न होने वाले विधिक परिणाम” कहा है।

7. Possession is the objective realisation of free-will of a man-Hegel.

8. देखे, ब्रिजेस बनाम हॉक्सवर्थ (1857) 21 OB 57: एन्कोना बनाम रोजर्स, (1876) 1 Ex.D 285; आर० बनाम शवल, (1885) 16 OBD 190; आर० बनाम मरे (1861) B&C 1: एल्विस बनाम ब्रिग गेस कम्पनी, (1886) 33 Ch.D 562 आदि के वाद.

डायस (Dias) के अनुसार प्रारम्भिक काल में कब्जे से आशय वस्तु पर केवल भौतिक नियंत्रण से था तथा वस्तु के कब्जे के उपर्युक्त लाभ केवल उसी व्यक्ति को मिल सकते थे जिसके कब्जे में वह वस्तु हो। किन्तु विधि के विकास के साथ यह आवश्यक समझा जाने लगा कि अनेक दशाओं में ऐसे व्यक्ति को भी कब्जे का लाभ मिलना चाहिये जिसका वस्तु पर भौतिक नियंत्रण नहीं है। फलतः ‘कब्जे’ की व्याख्या इस प्रकार की जाने लगी कि इसे अभिरक्षा (custody) से भिन्न माना जाने लगा। उल्लेखनीय है कि ‘कब्जे’ को ‘भौतिक नियंत्रण’ से पृथक किये जाने के परिणामस्वरूप इसमें पर्याप्त नम्यता (flexibility) आ गयी है जिसका। विधिशास्त्रियों ने खुलकर प्रयोग किया है । ।

रोमन विधि की भाँति इंग्लिश विधि में भी कब्जे को बहुत महत्व दिया गया है। विधि के अनुसार कब्जे के सर्वोत्तम अधिकार को ही स्वामित्व’ कहते हैं। किसी वस्तु का वैध स्वामी वही व्यक्ति माना जाता है जो अन्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक सुदृढ़ कब्जे का अधिकार साबित करता है। आंग्ल विधि में वस्तुत: कब्जे को ही हक का स्रोत माना गया है। इंग्लैण्ड की सम्पत्ति-विधि का अधिकांश भाग ‘कब्जे से ही सम्बन्धित है।10

इंग्लिश विधि में इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि कब्जे सम्बन्धी तीन धारणाएँ हो सकती हैं

(1) किसी वस्तु पर व्यक्ति का कब्जा और भौतिक नियंत्रण, दोनों ही हो सकते हैं। |

(2) कोई व्यक्ति बिना भौतिक नियंत्रण रखे भी वस्तु पर कब्ज़ा रख सकता है।

(3) इसी प्रकार व्यक्ति बिना कब्जे के भी वस्तु पर भौतिक नियंत्रण रख सकता है। उदाहरणार्थ, जब कोई यात्री अपना सामान रेल में रखने के लिए कुली को सौंपता है, तो उस समय सामान पर वास्तविक भौतिक नियंत्रण कुली का होता है किन्तु विधिक दृष्टि से उस पर यात्री का ही कब्जा माना जाता है। अत: इस उदाहरण में यात्री का उसके सामान पर कब्जा बिना भौतिक नियंत्रण के है, जबकि कुली का उस सामान पर बिना कब्जे के भौतिक नियंत्रण है। यही कारण है कि इंग्लिश विधि के अन्तर्गत भौतिक नियंत्रण को कब्जे का आधार नहीं माना गया है, बल्कि कब्जे का निर्धारण इससे व्युत्पन्न होने वाले लाभप्रद परिणामों के आधार पर ही किया जाता है।

विधि द्वारा कब्जे को संरक्षण दिये जाने का औचित्य

विधिशास्त्रियों के अनुसार कब्जे को विधि द्वारा संरक्षण दिये जाने के अनेक कारण हैं। विधि केवल वैध कब्जे को ही संरक्षण नहीं देती, अपितु ऐसे कब्जे को भी संरक्षण प्रदान करती है जो अवैध या अनधिकृत तरीके से प्राप्त किया गया हो। कैरन्स (Cairns) के अनुसार विधि द्वारा कब्जे को संरक्षण दिये जाने के निम्नलिखित । कारण हैं।1|

(1) कब्जे को संरक्षण दिये जाने से आपराधिक विधि को क्रियान्वित करने में सहायता मिलती है। किसी के कब्जे में अनुचित हस्तक्षेप से हिंसा की प्रवृत्ति को बल मिलता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई वस्तु किसी व्यक्ति के कब्जे में है (भले ही उस वस्तु पर उसका कब्जा अवैध ही क्यों न हो) और दूसरा व्यक्ति (भले ही वह उस वस्तु का वैध स्वामी ही क्यों न हो) उस वस्तु को उस व्यक्ति से छीनने का प्रयत्न करता है, तो इसके परिणामस्वरूप आपसी वैर, वैमनस्य आदि के कारण शान्ति-व्यवस्था में गड़बड़ी उत्पन्न हो । सकती है। अतः समाज में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने की दृष्टि से कानून यह आवश्यक समझता है कि कब्जे को उचित संरक्षण दिया जाये तथा वस्तु के वास्तविक स्वामी को न्यायालय में कब्जाधारी के विरुद्ध वाद लाने की अनुमति दी जाए।2 इस सम्बन्ध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 110 में यह

9. पोलक फेड्रिक : हिस्ट्री ऑफ इंग्लिश लॉ (ग्रन्थ 2), पृ० 46.

10. डायस एण्ड ह्यज : ज्यूरिसपूडेंस (1970 संस्करण), पृ० 310.

11. कैरन्स (Cairns): सोशल साइन्सेज, पृ० 65.

12. भारत की दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 तथा विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 6.

उपबन्धित है कि यह सिद्ध करने का भार कि विवादास्पद सम्पत्ति पर कब्जा रखने वाला व्यक्ति सम्पत्ति का वास्तविक स्वामी नहीं है, उस व्यक्ति पर होता है, जो उस सम्पत्ति पर स्वयं के स्वामित्व के लिये दावा करता है।

(2) कब्जे का संरक्षण अपकृत्य (Tort) विधि के अन्तर्गत अतिचार (trespass) या संपरिवर्तन (conversion) आदि के मामलों को निपटाने में पर्याप्त रूप से सहायक होता है। किसी व्यक्ति की भूमि या सम्पत्ति में अतिचार (trespass) करना उसके कब्जे में दखल देना है। अपकृत्य विधि के अन्तर्गत न्यायालय द्वारा अपकारित व्यक्ति को अतिचारी से क्षति की राशि दिलाई जाती है। अपकारित व्यक्ति की क्षतिपूर्ति हो। सके, इस उद्देश्य से न्यायालय यह मानकर चलते हैं कि भूमि या सम्पत्ति पर अपकारित व्यक्ति का ही कब्जा रहा होगा। इस कथन के स्पष्टीकरण में उपनिधान (bailment) का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। जब व्यक्ति अपनी कोई जंगम वस्तु (chattel) किसी अन्य को प्रतिभूति (security) के रूप में स्वेच्छा से देता है, तो ऐसे अन्तरण को उपनिधान (bailment) कहते हैं। ऐसे अन्तरण में वस्तु देने वाले व्यक्ति को उपनिधाता (bailor) कहते हैं तथा उसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति को उपनिहिती (bailee) कहते हैं। यदि उपनिधाता ने वस्तु का उपनिधान इस शर्त के साथ किया है कि वह अपनी इच्छानुसार किसी भी समय उस उपनिधान को समाप्त कर सकता है, तो ऐसे उपनिधान में वास्तविक कब्जा उपनिहिती का होते हुए भी विधि के अन्तर्गत उपनिधाता (bailor) का ही कब्जा माना जायेगा। अतः यदि कोई तीसरा व्यक्ति उस उपनिहित वस्तु में हस्तक्षेप करता है, तो उपनिधाता अपने कब्जे के अधिकार के आधार पर अतिचारी के विरुद्ध अतिचार का वाद ला सकता है।13।

(3) विधि के अन्तर्गत कब्जे को संरक्षित रखे जाने का एक कारण यह भी है कि सम्पत्ति विधि (Property Law) में कब्जे को स्वामित्व अर्जित करने का एक अच्छा साधन माना गया है। कभी-कभी हक (title) को प्रमाणित करना कठिन हो जाता है तथा सम्पत्ति सम्बन्धी औपचारिक नियम इतने कठिन होते हैं। कि स्वामित्व का निर्धारण केवल कब्जे के आधार पर ही किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, किसी स्वामीविहीन वस्तु को कब्जे में लेकर उस पर स्वामित्व स्थापित किया जा सकता है। इसी प्रकार किसी स्वामी को बेदखल (eject) कर उसकी भूमि का शान्तिपूर्वक खुलेआम तथा स्वामी की अनुमति के बिना दीर्घकाल तक उपयोग किया जाना कब्जाधारी को स्वामित्व दिला देता है। इसे चिरभोग (prescription) द्वारा अर्जित स्वामित्व कहते हैं। विधि की मान्यता यह है कि समय बीतने के साथ-साथ वास्तविक स्वामी के विरुद्ध कब्जा स्वामित्व में बदल जाता है। अतः यदि कोई अतिचारी किसी भूमि पर निर्धारित कालावधि के विरुद्ध कब्जा बनाये रखता है, तो वह उस भूमि पर स्वामित्व प्राप्त कर लेगा।14।

(4) विधि कब्जे को संरक्षण इसलिए भी प्रदान करती है क्योंकि स्वामित्व के अन्तरण के लिए कब्जे का हस्तांतरण एक अच्छा तरीका माना गया है।

कब्जेका अर्थ

विधिशास्त्रियों ने ‘कब्जा’ शब्द की व्याख्या विभिन्न प्रकार से की है। यद्यपि कब्जे को निश्चित रूप से परिभाषित करना कठिन है परन्तु फिर भी विधिवेत्ताओं ने इस शब्द का प्रयोग निम्नलिखित अर्थों में किया है-

फ्रेड्रिक पोलक ने कब्जे’ को भौतिक नियंत्रण के रूप में परिभाषित किया है।15 ।

सामण्ड के अनसार किसी वस्त और व्यक्ति के बीच जो निरन्तर तथा वास्तविक सम्बन्ध रहता है, उसे कब्जा कहते हैं।16 उनके अनुसार किसी भौतिक वस्तु पर कब्जे से आशय यह है कि संसार का कोई भी अन्य

13. United States of America v. Dolfus Mieg et Cie, (1952) 1 All. E.R. 572.

14. भारतवर्ष में यह अवधि निजी व्यक्तियों के विरुद्ध 12 वर्ष तथा सरकार के विरुद्ध 30 वर्ष है.

15. पोलक फेड्रिक : ज्यूरिसपूडेन्स एण्ड लीगल एसेज (गुडहार्ट द्वारा सम्पादित), पृ० 98.

16. Possession is a continuing de facto relation between a person and a thing.–Salmond.

व्यक्ति उस वस्तु पर कब्जाधारी के विरुद्ध अधिकार न रखे। अतः स्पष्ट है कि सामण्ड ने कब्जे को ‘वस्त’ ने सम्बन्धित माना है, न कि अधिकार से।

झकरिया (Zachariae) के अनुसार ‘कब्जा’ किसी वस्तु तथा व्यक्ति के बीच ऐसा सम्बन्ध है जो यह दर्शाता है कि वह व्यक्ति उस वस्तु को धारण किये रहने का आशय रखता है तथा उसके व्ययन (disposal) की क्षमता भी रखता है। ।

सैविनी (Savigny) के अनुसार मूर्त कब्जे का सार-तत्व यह है कि कब्जाधारी अपने भौतिक बल के आधार पर अन्य व्यक्तियों की कब्जाधीन वस्तु के उपयोग या उपभोग से वर्जित रखे।

मार्कबी (Markby) ने कब्जे को परिभाषित करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति द्वारा स्वत: के लिए अपने भौतिक बल के प्रयोग से किसी वस्तु को अपने भौतिक-नियंत्रण में रखने की दृढ़-इच्छा एवं सामर्थ्य को ही ‘कब्जा’ कहा जाता है। तथ्यतः कब्जा (Possession in Fact) ।

किसी व्यक्ति और वस्तु के बीच जो सम्बन्ध होता है उसे ‘तथ्यत:’ कब्जा कहते हैं। सामान्यत: व्यक्ति के पास जो वस्तुएँ होती हैं उन पर उसका कब्जा रहता है। अत: किसी वस्तु पर तथ्यत: कब्जा होना उस पर भौतिक नियंत्रण का प्रतीक है। उदाहरण के लिये, यदि किसी व्यक्ति ने तोते को पिंजरे में रखा है, तो उस तोते पर उस व्यक्ति का कब्जा होगा किन्तु जैसे ही तोता उड़कर भाग जाता है, उस व्यक्ति का तोते पर से कब्जा समाप्त हो जायेगा।

तथ्यत: कब्जे (Possession in fact) के विषय में निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं

(1) ऐसी वस्तुएँ जिन पर मनुष्य का भौतिक नियंत्रण नहीं हो सकता, कब्जे की विषयवस्तु नहीं हो सकती। उदाहरणार्थ, चन्द्रमा, सितारे आदि।

(2) किसी वस्तु पर वास्तविक कब्जा होने के लिए व्यक्ति का उस पर भौतिक नियंत्रण होना आवश्यक है। किन्तु इसका आशय यह कदापि नहीं है कि उस वस्तु को मनुष्य सदैव ही अपने वास्तविक नियंत्रण में रखे रहे। उदाहरण के लिए, मनुष्य का उसके मकान, कपड़ों तथा रुपये-पैसे आदि पर कब्जा तब भी बना रहता है जब वह निद्रित (asleep) अवस्था में होता है। तथ्यतः कब्जे के लिए केवल यह आवश्यक है कि व्यक्ति जब चाहे अपनी कब्जाधीन वस्तुओं पर स्वयं का नियंत्रण पुनर्ग्रहित (resume) कर सके।

(3) तथ्यत: कब्जे के लिए व्यक्ति का वस्तु पर केवल भौतिक नियंत्रण होना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उस व्यक्ति को अन्यों को उस कब्जे से अपवर्जित (exclude) करने की सामर्थ्य भी होनी चाहिये ।।7 परन्तु अनेक विधिशास्त्री इस तत्व को अनावश्यक मानते हैं तथा केवल ‘बाह्य हस्तक्षेप की अनुपस्थिति या । असम्भाव्यता’ को ही कब्जे के लिये पर्याप्त मानते हैं।

(4) कब्जे के अर्जन (acquisition), त्यजन (abandonment) या समाप्ति के निर्धारण के लिए कब्जाधारी की उस वस्तु को धारण किये रहने की इच्छा होना महत्वपूर्ण है। तथापि अपवाद रूप में कुछ दशाओं में बिना ‘इच्छा’ या आशय’ के भी कब्जा रह सकता है। उदाहरणार्थ, प्रत्येक व्यक्ति के हाथ, पैर, आँख, कान, सिर आदि होते हैं और इन पर उसका कब्जा रहता है किन्तु इन पर कब्जा धारण किये रहने सम्बन्धी उसका कोई आशय नहीं रहता।

विधितः कब्जा (Possession in Law)

यह उल्लेख किया जा चुका है कि सामाजिक हित की दृष्टि से विधि द्वारा कब्जे को संरक्षित किया जाना आवश्यक है। कब्जे को विधि द्वारा दो प्रकार से संरक्षित किया जा सकता है

(1) कब्जाधारी को कुछ विधिक अधिकार देकर, तथा

17. सामण्ड : ज्यूरिसपूडेन्स (12वाँ संस्करण) पृ० 272.

(2) कब्जाधारी के कब्जे सम्बन्धी विधिक अधिकार में हस्तक्षेप करने वाले व्यक्तियों को दण्डित कर या उसे क्षतिपूर्ति दिलवाकर।।

जब कभी कोई व्यक्ति अपना कब्जे सम्बन्धी वाद संस्थित करता है, तो न्यायालय सर्वप्रथम यह देखता है। कि वादी का विवादित वस्तु पर वास्तविक कब्जा है या नहीं। यह ठीक है कि अधिकांश मामलों में वास्तविक कब्जा ही विधित: कब्जे का प्रतीक होता है, परन्तु अनेक दशाओं में वास्तविक कब्जे के बिना भी व्यक्ति को विधित: कब्जा प्राप्त हो सकता है। इस तर्क की पुष्टि में कुछ निर्णीत वादों को उद्धृत करना उचित होगा।

(1) मेरी बनाम ग्रीन18 |

इस वाद में किसी बढ़ई ने नीलाम में दराज वाली एक मेज खरीदी। उसे पता चला कि मेज में एक गुप्त दराज था। उसने उस दराज को तोड़कर खोल लिया और उसमें रखा धन ले लिया। यह धन विक्रेता का था जिसने केवल मेज बेची थी। विधि की दृष्टि में गुप्त दराज में रखे धन पर विक्रेता का कब्जा अभी भी बना हुआ था; यद्यपि उस पर उसका वास्तविक कब्जा नहीं था। अतः इंग्लिश विधि के अनुसार क्रेता द्वारा उस धन को । लिया जाना चोरी (larceny) का अपराध माना गया। इस वाद में यह विनिश्चित किया गया कि वह व्यक्तिजो किसी वस्तु को खरीदता है, उसमें रखी मूल्यवान् चीज पर कब्जा रखने का हकदार नहीं है जो उसे उसमें छिपी हुई मिलती है। उसे वह वस्तु विक्रेता को वापस कर देनी चाहिये क्योंकि विधि की दृष्टि में उस पर विक्रेता का ही कब्जा बना रहता है।

(2) एल्विस बनाम ब्रिग गैस कं०19

इस वाद में प्रतिवादी कम्पनी ने गैस का कारखाना लगाने के लिए वादी से कुछ भूमि पट्टे पर ली। जब प्रतिवादी कम्पनी उस भूमि पर खुदाई का काम कर रही थी, उस समय उसे जमीन के नीचे गड़ी हुई एक प्रागैतिहासिक नौका मिली। वादी ने उस नौका पर कब्जा जताते हुए प्रतिवादी के विरुद्ध वाद चलाया। न्यायालय ने विनिश्चित किया कि विधि की दृष्टि में भूमि पर वादी का कब्जा था और भूमि के अन्दर छिपी हुई सभी वस्तुओं पर भी वादी का ही कब्जा माना जायेगा, चाहे वादी को उन वस्तुओं की जानकारी हो या न हो। अत: वादी को नौका पर कब्जे का हक है।

(3) हन्नाह बनाम पील20

इस वाद में एक व्यक्ति ने मकान खरीदा किन्तु उसने उस पर कब्जा नहीं किया। बाद में यह मकान कुछ। सैनिकों के ठहरने के लिए दे दिया गया। एक सैनिक को खिड़की की सफाई करते समय खिड़की के ऊपर एक आभूषण (brooch) प्राप्त हुआ जो धूल में लिपटा हुआ था। उस मकान के स्वामी ने उस आभूषण की प्राप्ति के लिए माँग की और प्राप्ति करने के बाद उसे बेच दिया। इस पर आपत्ति करते हुए उस आभषण को पाने वाले सैनिक ने उस मकान के स्वामी के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का वाद चलाया। न्यायालय ने सैनिक के पक्ष में निर्णय देते। हुए कहा है कि यद्यपि भूमि पर तथा उसमें छिपी हुई वस्तुओं पर कब्जाधारी का अधिकार होता है, किन्त। उस मकान के स्वामी का अपने मकान पर वास्तविक कब्जा कभी भी नहीं रहा था। इसलिए उस आभूषण पर सैनिक का ही कब्जाधिकार था।

(4) एन्कोना बनाम रोजर्स21

इस वाद में एक मकान के मालिक ने किसी महिला को यह अनुमति दी कि वह अपना सामान मकान के कछ कमरों में रखे। उस महिला ने अपना सामान किसी अन्य के मार्फत भिजवाया जिसने उस सामान को मकान मालिक द्वारा बताये गये कमरों में रखा तथा उनमें ताला लगाकर चाभी उस महिला को सौंप दी। उस

18. Merry V. Green, (1847) 7 M & W 623.

19. Ewes v. Brigg Gas Co., (1886) 33 Ch. D. 562. ।

20. Hainali V. Peel, (1945) 1 KB 509.

21. Ancond V. Rogers, (1876) 1 Ex. Ex.D. 285 (292).

सामान के कब्जे सम्बन्धी विवाद को तय करते हुये न्यायालय ने यह विनिश्चित किया कि यद्यपि वह मकान मालिक के वास्तविक कब्जे में था, परन्तु फिर भी उस पर विधितः कब्जा उस महिला का ही था। न्यायालय ने विनिश्चित किया कि महिला के पास उन कमरों की चाभी होना इस बात का पर्याप्त प्रमाण था कि उस पर भौतिक नियंत्रण उस महिला का ही था।

(5) इन रि कोहेन22

कोहेन तथा उसकी पत्नी जिस मकान में रहते थे उस पर पत्नी का स्वामित्व था। पति-पत्नी दोनों की मत्यु के पश्चात् मकान के विभिन्न हिस्सों में छिपाकर रखे गये अत्यधिक धन का पता चला। इस बात का कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं था कि उक्त धन कब, कैसे और किसके द्वारा लाया गया था या किस कारण से छिपाकर रखा गया था। अत: न्यायालय ने निर्णय दिया कि चूँकि उक्त धन पत्नी के स्वामित्व वाले मकान से मिला था, अतः उस पर पत्नी का ही कब्जा माना जायेगा और वह धन पत्नी की सम्पदा का ही एक भाग होगा।

(6) लाकियर बनाम गिब्ब23

इस वाद में मुख्य न्यायाधिपति पार्कर ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को किसी वस्तु के अस्तित्व के बारे में जानकारी नहीं है, तो वह वस्तु उस व्यक्ति के कब्जे में नहीं मानी जायेगी भले ही वह उसके नियंत्रण वाले किसी स्थान, हैंडबेग या कमरे में पड़ी हो। अत: यदि किसी व्यक्ति की टोकरी में कुछ डाल दिया जाता है जिसका उसे तनिक भी ज्ञान नहीं है, तो उस वस्तु पर उस व्यक्ति का कब्जा नहीं माना जायेगा।

उपर्युक्त निर्णय का अनुमोदन करते हुए बार्नर बनाम मेट्रोपोलिटन पुलिस कमिश्नर24 के वाद में हाउस ऑफ लास ने निर्णय दिया कि इंग्लिश औषधि दुरुपयोग निरोधक अधिनियम, 1964 (Drugs Prevention of Misuse Act, 1964) के अनुसार मादक औषधि रखना पूर्णतः निषिद्ध है लेकिन इसके भीतर आरोपित व्यक्ति का कब्जा रखने के लिए आवश्यक मानसिक तत्व भी विद्यमान होना चाहिए। अर्थात् आरोपी के पास से मादक औषधि बरामद होने मात्र से उस पर उसका कब्जा नहीं माना जायेगा जब तक कि इसके साथ-साथ कब्जे का धारणाशय (animus) भी साबित न किया जाए।

(7) हिबर्ट बनाम मेक कियरनन25

इस प्रकरण को ‘गोल्फ बॉल केस’ के नाम से भी जाना जाता है। इस वाद में गोल्फ के मालिकों द्वारा गोल्फ क्लब के मैदान में छोड़ी हुई गेंदें एक ऐसे व्यक्ति को मिलीं जिसने मैदान में अनधिकृत रूप से प्रवेश किया था। उस व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा चलाये जाने पर न्यायालय ने निर्णय दिया कि वह व्यक्ति दोषी है। क्योंकि जिस समय उसे गोल्फ की गेंदे मिलीं उस समय वे गोल्फ क्लब के कब्जे में थीं। यह बात अलग है। कि उस समय किसी को यह पता नहीं था कि गेंदे कहाँ पड़ी हैं या क्लब के मैदान में कुल कितनी गोल्फ की गेंदें पड़ी हुई हैं।

( 8 ) रेग बनाम रिली26

इस वाद में एक व्यक्ति अपनी भेड़े हाक कर ले जा रहा था। उसकी भेड़ों में कुछ ऐसी भेड़ें शामिल हो । गईं, जो उसकी नहीं थीं। परन्तु यह भूल उसे तब मालूम हुई जब उसने उन सभी भेड़ों को बेच दिया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि वह व्यक्ति चोरी का अपराधी था क्योंकि मिली हुई भेड़ों पर उसका कब्जा नहीं था।

22. 1953 Ch. 88.

23. (1967) 2 QB 243.

24. (1969) 2 AC 256.

25. Hibbert V. Mc. Kieran, (1948) 2 KB 142.

26. Rex V. Riley, (1853) Dears CC 149.।

(9) आर० बनाम मूरे-27 के वाद में में अभियुक्त, जो कि एक दुकानदार था, को अपनी दुकान के परिसर में एक बैंक नोट पड़ा हुआ मिला जिसका उसने स्वयं के लिये उपयोग कर लिया। अभियुक्त को चोरी (larceny) के अपराध का दोषी माना गया क्योंकि उस नोट पर उसका तब तक कब्जा नहीं था जब तक कि उसने उसे पड़ा हुआ देखकर उठा नहीं लिया था। |

(10) इसी प्रकार कार्टराइट बनाम ग्रीन28 के वाद में वादी ने अपनी डेस्क बढ़ई को मरम्मत के लिये परिदत्त की। उस डेक्स की गोपनीय (छिपी हुई) ड्रावर में कुछ सिक्के रखे हुये थे जिसका उस बढ़ई ने स्वयं के लिये उपयोग कर लिया। उसे चोरी के अपराध का दोषी माना गया क्योंकि जब तक वे सिक्के उसे नहीं मिले थे, वे उसके कब्जे में नहीं थे, अत: इसके कब्जे में कब्जा धारण किये रहने का मानसिक तत्व (animus) विद्यमान नहीं था।

(11) आर० बनाम हडसन29 के वाद में अभियुक्त हडसन को खाद्य मन्त्रालय द्वारा डाक से भेजा गया। एक लिफाफा जिसमें एक चेक था जो किसी हडसन नाम के व्यक्ति को भेजा गया था जिसने खाद्य विभाग को सुअरों की आपूर्ति की थी। लेकिन डाक विभाग की भूलवश वह अभियुक्त हडसन को परिदत्त किया था। अभियुक्त ने उस नेक को अपने खाते में जमाकर भूना लिया। उसके इस जानबूझकर किये गये कृत्य के लिये उसे चोरी का दोषी ठहराया गया। न्यायालय ने अभिकथन किया कि जिस वस्तु के अस्तित्व के बारे में व्यक्ति को ज्ञान नहीं है उस पर उस व्यक्ति का कब्जा हो ही नहीं सकता। यहां अभियुक्त को ज्ञात था कि चेक उसका नहीं है फिर भी उसने उसे भुना लिया, इसलिये उसे दोषी माना गया। |

( 12 ) ब्वायंटन वुड बनाम टुमेन30 के बाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि किरायेदार द्वारा किराये के मकान की मरम्मत हेतु मकान-मालिक को चाबी दी जाना कब्जे का अभ्यर्पण (surrender of possession) नहीं माना जायेगा। इसी प्रकार किसी मकान के कमरे की चाबी देने मात्र को उस कमरे का अनन्य कब्जा दिया जाना नहीं माना जायेगा 31

(13) टिकनर बनाम हर्न32

इस वाद में एक महिला किरायेदार अपना परिसर छोड़कर अपनी पुत्री से भेंट करने अन्यत्र चली गई। वहाँ उसे कुछ समय मानसिक रुग्णालय में रहना पड़ा। इस अवधि में उसकी पुत्री ने उक्त परिसर पर कब्जा कायम रखा ताकि उसकी माँ लौटने पर उसमें पुनः रह सके। इन परिस्थितियों में न्यायालय ने निर्णय दिया कि उक्त महिला किरायेदार का कब्जा समाप्त नहीं हुआ था और वह विधिक रूप से उस परिसर की कब्जाधारी थी।

(14) त्रिवेणी बाई बनाम सम्राट33

इस प्रकरण में एक महिला ने यह जानते हुए कि दीवार में उसके पति ने बहुमूल्य जेवरातों का एक बक्सा छिपा रखा है, मजदूरों को दीवार तोड़ने के लिए काम पर लगाया। बक्सा प्राप्त होने पर उस पर उक्त स्त्री का कब्जा ही माना गया न कि उन मजदूर श्रमिकों का जिन्होंने बक्से को दीवार से निकाला था।

उपर्युक्त निर्णयों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि विधिक दृष्टि से कब्जे की संकल्पना के बारे में कोई निश्चित मापदण्ड अपनाना कठिन है। अत: वाद-विशेष के तथ्यों तथा परिस्थितियों के संदर्भ में इस पर विचार किया जाना उचित होता है।

27. R. V. Moore, (1861) L&C 1.

28. Cartwright v. Green (Desk Repairing Case), (1808) 7 RR 99.

29. R. V. Hudson, (1943) 1 KB 458.

30. Boynton v. Trueman, (1961) 177 Estates Gazette 191.

31. Michel v. Volpe, (1967) 202 Estates Gazette 213.

32. (1961) 1 AUER 65. 33. ए० आई० आर० 1946 नागपुर 362.

सारांश में यह कहा जा सकता है कि कब्जा तथ्यत: हो सकता है या विधित: या एक साथ दोनों ही। रोमन विधि में तथ्यत: कब्जे को ‘पजेशियो नेच्युरैलिस’ (possessio naturalis) तथा विधित: कब्जे को ‘पजेशियो सिविलिस’ (Possessio civilis) कहा गया है। विधित: कब्जे के लिए यह आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति को वस्तु पर वास्तविक कब्जा प्राप्त हो। वास्तव में विधित: कब्जा एक प्रकार का अधिकार है जिसे विधि द्वारा मान्य तथा संरक्षित किया जाता है।

सामण्ड के अनुसार तथ्यत: तथा विधित: कब्जे के विषय में निम्नलिखित तीन सम्भावनाएँ हो सकती

(1) सामान्यत: कब्जा वास्तविक तथा विधिक, दोनों रूपों में एक साथ विद्यमान रहता है।

(2) कुछ दशाओं में व्यक्ति का वस्तु पर वास्तविक कब्जा रहता है किन्तु विधित: कब्जा नहीं रहता। उदाहरणार्थ, नौकर का अपने मालिक की सम्पत्ति पर वास्तविक कब्जा होते हुए भी वह उसका विधित: कब्जा नहीं रखता। विधि की दृष्टि से कब्जा मालिक का ही होता है। इसी प्रकार उपनिधान (bailment) में। उपनिधाता (bailor) की सम्पत्ति पर वास्तविक कब्जा उपनिहिती (bailee) का होता है किन्तु विधित: उस पर उपनिधाता का कब्जा ही बना रहता है। |

(3) कभी-कभी किसी व्यक्ति का वस्तु पर विधित: कब्जा हो सकता है, किन्तु उस पर वास्तविक कब्जा किसी अन्य व्यक्ति का ही रहता है। इंग्लिश विधि के अनुसार यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति किसी वस्तु या सम्पत्ति पर वास्तविक कब्जा नहीं रखता किन्तु ऐसे कब्जे के लाभ तथा अन्य परिणाम उस पर अधिरोपित होते हैं। इसे आंग्ल विधि में ‘आन्वयिक कब्जा’ (constructive possession) कहते हैं। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति अपने मकान या गोदाम की चाबी किसी दूसरे व्यक्ति को इस आशय से देता है। कि उस मकान की या गोदाम में रखे माल की अभिरक्षा वह दूसरा व्यक्ति करे, तो इस प्रकार प्राप्त किया गया कब्जा ‘आन्वयिक कब्जा’ कहलायेगा। व्यक्ति द्वारा चाबी का परिदान (delivery) किया जाना कब्जे के अन्तरण का सांकेतिक कृत्य है। वस्तुत: यह कब्जे का वास्तविक अन्तरण भी है क्योंकि मकान या गोदाम पर वास्तविक नियंत्रण चाबी धारक का ही रहेगा। प्रायः देखा गया है कि भाड़ा नियंत्रण अधिनियम, (Rent Control Act) के अन्तर्गत निर्णय हेतु आने वाले प्रकरणों में आन्वयिक कब्जे का प्रश्न अधिकतर उद्भूत होता है।

सामण्ड के अनुसार कभी-कभी कब्जे की विषयवस्तु ज्ञात न होने पर भी कब्जा हो सकता है और कभीकभी कब्जे के लिये विषयवस्तु ज्ञात होना आवश्यक होता है। वे इसका काल्पनिक दृष्टान्त (hypothetical illustration) देते हैं। यदि ‘क’ अपनी पर्स कुछ क्षण के लिये ‘ख’ को सौंपता है और ‘ग’ उसे ‘ख’ से चुरा लेता है और वह पर्स ‘घ’ के परिसर में गिर जाता है और ‘च’ उसे उठाकर अपने पास रख लेता है, तो यहाँ प्रश्न यह उद्भवित होता है कि उसे पर्स पर विधिक कब्जा इनमें से किसका माना जाये और कौन उसे कानूनन अपने पास रख सकता है? ।

यहां ‘च’, जिसे कि पर्स ‘घ की भूमि पर पड़ा हुआ मिला था, को अन्यों की तुलना में कब्जे का बेहतर हक प्राप्त होगा क्योंकि वह उसका पाने वाला (finder) है परन्तु इससे भी बेहतर कब्जे का हक ‘ग’ को होगा जिसके कि कब्जे में पर्स था जब तक वह ‘घ’ के परिसर में गिरा नहीं था। पर्स के वास्तविक स्वामी के सिवाय ‘ग’ को अन्यों की अपेक्षा बेहतर कब्जाधिकार प्राप्त होगा और ‘घ’ तथा ‘च’, ग के विरुद्ध पर-व्यक्ति के अधिकार (Gus terti) का तर्क प्रस्तुत नहीं कर सकते हैं। नि:सन्देह ही ‘क’ पर्स का वास्तविक स्वामी होने के। नाते ‘ख’ तथा ‘ग’ उसके अधिकार के विरुद्ध कोई बचाव प्रस्तुत नहीं कर सकते। यहां ‘ख’ पर्स को इस आधार पर प्राप्त कर सकता है क्योंकि चोरी के समय वह पर्स वास्तव में उसके कब्जे में था। ‘क’ भी पसे पर। कब्जे के अधिकार का दावा कर सकता है क्योंकि ‘ख’ उसका केवल क्षणिक कब्जाधारी था। अत: क या ख जो भी ग के विरुद्ध दावा करेगा उस पर्स का वास्तविक अधिकारी होगा।

कब्जे के आवश्यक तत्व (Elements of Possession)

कब्जे की व्याख्या करते हुए हालैंड ने लिखा है कि इसमें दो तत्वों का विद्यमान होना आवश्यक है। प्रथमत: कब्जाधारी का कब्जाधीन वस्तु पर वास्तविक सामर्थ्य होना चाहिए; तथा द्वितीयतः उस सामर्थ्य से लाभ उठाने की इच्छा होनी चाहिये। आंग्ल विधि में इन्हें क्रमशः ‘कार्पस’ तथा ‘एनीमस’ कहा गया है।

सैविनी ने कब्जे संबंधी अपने सिद्धान्त में कब्जे के लिए दो तत्वों का होना आवश्यक माना है, जिन्हें उन्होंने ‘कॉरपस पजेशियॉनिस’ (corpus possessionis) तथा ‘एनिमस डोमिनी’ (animus domini) कहा है।’कॉरपस पजेशियॉनिस’ का अर्थ है प्रभावी नियंत्रण (effective control) तथा बाह्य हस्तक्षेप का बहिष्कृत करने की क्षमता। ‘एनिमस डोमिनी’ से उनका आशय किसी वस्तु को स्वामी के रूप में धारित किये रहने की इच्छा (intention to hold as owner) से है। उनके अनुसार कब्जे के लिये ये दोनों ही तत्व विद्यमान होना। अनिवार्य है तथा इनमें से किसी एक तत्व के न होने पर ‘कब्जा’ समाप्त हो जायेगा 34

सैविनी के उपर्युक्त विचारों का सामण्ड, लाइटवुड35 तथा अन्य विधिवेत्ताओं ने इस आधार पर खण्डन किया है कि कब्जे में बाह्य हस्तक्षेप को बहिष्कृत करने की शक्ति की धारणा अतिशयोक्ति रंजित है। सामण्ड के अनुसार कब्जे के लिए बाह्य हस्तक्षेप की केवल अनुपस्थिति या असंभाव्यता ही पर्याप्त है। अपने कथन की पुष्टि एक दृष्टान्त द्वारा करते हुए सामण्ड कहते हैं कि किसी हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति की तुलना में शिशु में शारीरिक शक्ति नहीं होती फिर भी यदि कोई सिक्का शिशु के पास है, तो उस पर कब्जा उसका ही माना जायेगा। ।

इहरिंग (Ihering) ने भी सैविनी के उक्त विचारों को खण्डन करते हुए कब्जे की व्याख्या समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से की है। उनके अनुसार जब कभी कोई व्यक्ति किसी वस्तु के सम्बन्ध में स्वामी के सदृश व्यवहार करता है, तो उस वस्तु पर उसका कब्जा तब तक बना रहता है जब तक कि व्यावहारिक सुविधा पर आधारित विधि के नियमों द्वारा उसके कब्जे को अमान्य नहीं कर दिया जाता है। तात्पर्य यह कि इडरिंग धारणाशय (animus) को, अर्थात् स्वामी के रूप में वस्तु को धारण किये रहने के आशय को आवश्यक न मानते हुये केवल अनुपूरक मानते हैं।

सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine) के विचार से प्रारम्भ में कब्जे का अर्थ * भौतिक सम्पर्क’ (Physical contact) रहा होगा किन्तु व्यावहारिक रूप में इसका अर्थ केवल भौतिक नियंत्रण मात्र नहीं है। अपित भौतिक नियंत्रण की वस्तु को अपनी निजी वस्तु के रूप में धारित करने के आशय सहित आधिपत्य में रखने से है।

अमेरिका के विख्यात न्यायशास्त्री जस्टिस होम्स (Justice Holmes) ने कब्जे सम्बन्धी विभिन्न सिद्धान्त का विश्लेषण करते हुए कथन किया है कि किसी वस्तु पर कब्जा अर्जित करने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति का उस वस्तु से भौतिक सम्बन्ध हो तथा साथ ही उस वस्तु के प्रति उसका एक निश्चित आशय भी। हो। इस व्याख्या से उनका अभिप्राय यह है कि कब्जे के साथ भौतिक एवं मानसिक, दोनों ही तत्व जुड़े रहते। हैं 26 ।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि मूर्त कब्जे के लिए उसमें दो तत्वों का होना आवश्यक है। पहला भौतिक अथवा वस्तुनिष्ठ (physical or objective) तत्व तथा दूसरा मानसिक या आत्मनिष्ठ (mental or subjective) तत्व।।

भौतिक अथवा वस्तुनिष्ठ तत्व के अन्तर्गत वस्तु पर प्रत्यक्ष नियंत्रण तथा इस नियंत्रण के परिणामस्वरूप दूसरे व्यक्तियों को अपवर्जित रखने का सामर्थ्य अन्तर्निहित है, जबकि मानसिक अथवा आत्मनिष्ठ तत्व में कब्जाधीन वस्तु के सम्बन्ध में कब्जा रखने वाले का आशय निहित होता है।

34. डायस एण्ड ह्यूज की ‘ज्यूरिसपूडेन्स’ नामक पुस्तक के पृष्ठ 395 से उद्धृत.

35. लाइटवुड (Lightwood) : पजेशन ऑफ लैण्ड पृ० 11.

36. होम्स : दि कॉमन लॉ, पृ० 220.

रोमन विधिशास्त्रियों ने कब्जे के भौतिक तत्व को ‘कॉरपस’ (corpus) तथा मानसिक तत्व को ‘एनिमस’ (animus) कहा है। इन दोनों तत्वों को विधिक भाषा में कब्जे का काय (corpus) तथा धारणाशय (animu) कहा जा सकता है।

1. कब्जे का काय (corpus possessionis)

कब्जे के भौतिक तत्व को ‘कॉरपस’ (corpus) या कब्जे का काय कहते हैं। यह तत्व किसी वस्तु पर वास्तविक कब्जे का द्योतक है। ‘कॉरपस’ से आशय वस्तु पर एकल नियंत्रण तथा उस वस्तु के प्रति दूसरों को कब्जे से अपवर्जित रखने की क्षमता से है। व्यक्ति का किसी वस्तु पर कब्जा होना यह दर्शाता है कि उस व्यक्ति द्वारा वस्तु के उपभोग तथा उपयोग में अन्य व्यक्ति बाधा उपस्थित नहीं करेंगे। दूसरे शब्दों में, कब्जाधारी को इस प्रकार की आश्वस्ति या सुरक्षा निम्न प्रकार से प्राप्त हो सकती है

(i) कब्जाधारी की भौतिक शक्ति (Physical power of the possessor)

कब्जाधारी की भौतिक शक्ति उसे कब्जाधीन वस्तु के उपयोग की गारन्टी दिलाती है। इसके बल पर वह अन्यों से अहस्तक्षेप के विषय में आश्वस्त रहता है। मकान के कब्जे के संरक्षण के लिए दीवालें, दरवाजे, आदि ऐसे साधन हैं जो कब्जाधारी द्वारा अन्य व्यक्तियों को कब्जे से अपवर्जित (exclude) रखने के लिए भौतिक शक्ति के रूप में प्रयुक्त किये जाते हैं।

(ii) कब्जाधारी की वैयक्तिक उपस्थिति (Personal presence of the possessor)

अनेक दशाओं में किसी वस्तु पर कब्जा कायम रखने के लिए कब्जाधारी की वैयक्तिक उपस्थिति पर्याप्त होती है, भले ही उसमें अन्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप को रोकने की शारीरिक शक्ति न हो। उदाहरणार्थ, किसी शिशु के हाथ में कोई सिक्का है, तो उस पर उसका कब्जा उसकी वैयक्तिक उपस्थिति के कारण ही है।

(iii) गोपनीयता (Secrecy)

यदि कोई व्यक्ति किसी वस्तु को इस आशय से छिपाकर रखता है कि उस वस्तु पर उसका कब्जा बना रहे तथा उसके उपभोग में बाह्य हस्तक्षेप न होने पाये, तो यह उसके कब्जे की सुरक्षितता का एक अच्छा उपाय होगा।

(iv) अधिकारयुक्त दावों के प्रति आदर (Respect for rightful claims)

वर्तमान सभ्य समाज में अधिकारयुक्त दावेदार के कब्जे में कोई व्यक्ति अनुचित हस्तक्षेप नहीं करता क्योंकि सदोष दावे को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। अतः कब्जा अधिकारयुक्त होने पर अन्य व्यक्ति उसमें हस्तक्षेप करने से बाधित रहते हैं।

(v) कब्जा बनाये रखने के आशय की अभिव्यक्ति (Manifestation or animtus domini)

किसी वस्तु पर कब्जा बनाये रखने के आशय के साथ-साथ उस वस्तु को प्राप्त करना भी आवश्यक है। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति किसी मकान का कब्जा चाहता है, तो उसे कब्जा ररने के आशय के साथ उस मकान में प्रवेश करने तथा उसका उपयोग करने की स्थिति में भी होना चाहिये।

(vi) अन्य वस्तुओं के कब्जे द्वारा प्राप्त संरक्षण (Protection afforded by the possession of other things)

कभी-कभी एक वस्तु पर कब्जा उससे सम्बद्ध अथवा संलग्न अन्य वस्तुओं पर भी कब्जा दिलाता है। उदाहरण के लिए, व्यक्ति का किसी भूमि पर कब्जा उसे उस भूमि पर स्थित अन्य वस्तुओं, पेड़- पौधे आदि पर कब्जा भी दिलाता है। तथापि इस विषय में विधिक स्थिति स्पष्ट नहीं है। यह सिद्धान्त कि भूमि पर की की वजह से व्यक्ति को उससे संलग्न सभी वस्तुओं पर कब्जा प्राप्त होगा, सदैव लागू नहीं होता तथा वादविशेष की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस संदर्भ में साउथ स्टेफोर्डशायर वाटर वर्ल्स कम्पनी बनाम

शर्मन37 का वाद उल्लेखनीय है। इसमें कम्पनी ने प्रतिवादी को कम्पनी की भूमि पर बने जलाशय (Pond) की सफाई के लिए नियोजित किया। सफाई करते समय प्रतिवादी को जलाशय की तह में कुछ सोने की अंगूठियाँ पड़ी मिलीं। कंपनी ने इन अंगूठियों पर अपना कब्जा बताते हुए प्रतिवादी के विरुद्ध वाद संस्थित किया। न्यायालय ने विनिश्चित किया कि कंपनी को ही उन अंगूठियों पर प्रथम कब्जा प्राप्त है न कि प्रतिवादी को।

कब्जे के काय (corpus) सम्बन्धी एक अन्य आवश्यक तत्व यह है कि कब्जाधारी को वस्तु पर कब्जा रखना चाहिये। परन्तु इसका यह आशय नहीं कि उस वस्तु पर कब्जाधारी का पूर्ण नियंत्रण हो। यह नियंत्रण वस्तु के अनुसार न्यूनाधिक भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति मछली पकड़ने के लिए जाल फेंकता है, तो उस व्यक्ति का मछलियों पर कब्जा तब तक नहीं होता जब तक कि वे उसके जाल में नहीं फंसतीं।

यदि किसी व्यक्ति का पालतू कुत्ता घर से बाहर घूमता है, तो यह नहीं माना जाता कि वह व्यक्ति उतने समय के लिए कुत्ते के कब्जे से वंचित हो जाता है क्योंकि उस व्यक्ति का अपने कुत्ते पर भौतिक नियंत्रण रखने की क्षमता तथा इच्छा तब भी विद्यमान रहती हैं। इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति टहलने के लिए घर से बाहर निकलता है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि टहलते समय वह अपने घर की वस्तुओं के कब्जे से वंचित हो जाता है, अर्थात् उन वस्तुओं पर उसका कब्जा तब भी बना रहेगा।

2. धारणाशय या कब्जा धारण किये जाने की मानसिक इच्छा (Animls Possidendi)

कब्जे को धारण किये रहने की मानसिक इच्छा को धारणाशय (aninius) कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है। कि कब्जाधारी की कब्जाधीन वस्तु पर अपना कब्जा बनाये रखने की इच्छा होनी चाहिये। सामण्ड के अनुसार अन्य व्यक्तियों को अपवर्जित (exclude) करने का आशय कब्जे का मानसिक अथवा आत्मनिष्ठ तत्व है। कब्जाधारी की इच्छा स्वयं किसी वस्तु का उपयोग करने की हो या न हो, किन्तु कब्जे के लिए उसकी यह इच्छा होना आवश्यक है कि वह अन्य व्यक्तियों को उस वस्तु में हस्तक्षेप करने से अपवर्जित रखें। कब्जे सम्बन्धी मानसिक इच्छा के विषय में निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं

(i) यह आवश्यक नहीं है कि कब्जा धारण किये रहने का आशय न्यायोचित ही हो, वह सदोष भी हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी वस्तु को चुराकर अपने पास रख लेता है, तो उस वस्तु पर उसका कब्जा वस्तु के वास्तविक मालिक से किसी प्रकार कम नहीं है। ऐसी दशा में उस वस्तु का कब्जाधारी वह व्यक्ति नहीं होता जो उस पर अधिकार रखता है या जो अपना अधिकार होने का विश्वास करता है, बल्कि वह व्यक्ति होता है जो यह दर्शाता है कि मानों उसे ही ऐसा अधिकार प्राप्त है।

इस सन्दर्भ में आर० बनाम हडसन38 के वाद का उल्लेख करना उचित होगा। इस मामले में अभियुक्त को एक लिफाफा प्राप्त हुआ जो उसी नाम के किसी अन्य व्यक्ति को संबोधित था। अभियुक्त ने उस लिफाफे को कुछ दिन अपने पास रखा और उसे खोल लिया। उसे लिफाफे के भीतर एक चैक मिला जिसका उसने विनियोग कर लिया। उसे चोरी के लिए दोषी ठहराया गया। न्यायालय ने इस वाद में विनिश्चित किया कि जब तक लिफाफा खोला नहीं गया था तब तक अभियुक्त का उस पर कब्जा नहीं था क्योंकि उसमें आशय का अभाव था।

(ii) कब्जाधारी का दावा अनन्य (exclusive) होना चाहिये, अर्थात् उसमें अन्य व्यक्तियों को अपवर्जित (exclude) करने का आशय होना चाहिये। परन्तु यह आवश्यक नहीं कि अपवर्जन पूर्णतः। (absolute) हो।

(iii) धारणाशय या कब्जा रखने की मानसिक इच्छा का अर्थ यह नहीं होता है कि कब्जाधारी स्वामी के रूप में वस्तु को प्रयोग करने का आशय रखे। किसी गिरवी रखी वस्तु पर गिरवीदार का कब्जा होता है।

37. South Staffordshire Waterworks Co. v. Sharman, (1896) 2 QB 44.

38. (1943) 1 KB 458.

यद्यपि उसका मानसिक आशय उस वस्तु को ऋण की अदायगी होने तक अभिरक्षा (custody) में रखने का होता है।

(iv) यह आवश्यक नहीं है कि कब्जाधारी की कब्जा धारण किये रहने की इच्छा स्वयं के लिए ही हो, यह किसी अन्य व्यक्ति के लिए भी हो सकती है। उदाहरणार्थ, नौकर अभिवक्ता, न्यासी तथा उपनिहिती आदि वस्तु को स्वयं के लिए धारण नहीं करते, बल्कि अन्य व्यक्ति के लिए करते हैं।

(v) कब्जाधारी का कब्जे सम्बन्धी मानसिक आशय विनिर्दिष्ट (specific) होना आवश्यक नहीं है। वह सामान्य भी हो सकता है। उदाहरणार्थ, यदि किसी व्यक्ति ने जाल में मछलियाँ पकड़ी हों, तो उन सब पर उनका कब्जा होगा, भले ही उसे उन मछलियों की निश्चित संख्या ज्ञात न हो। इसी प्रकार व्यक्ति को अपने पुस्तकालय में री सभी पुस्तकों पर कब्जा प्राप्त होता है, भले ही उसमें से कुछ के अस्तित्व के बारे में उसे जानकारी न हो।

उल्लेखनीय है कि यदि कोई बंद संदूक, पेटिका, लिफाफा आदि किसी व्यक्ति के कब्जे में हो, तो इनके अन्दर रखी हुई वस्तुओं पर भी उसी व्यक्ति का कब्जा माना जाएगा। |

कब्जे के धारणाशय (animus) के सन्दर्भ में कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा विनिश्चित एन० एन० मजूमदार बनाम राज्य39 का वाद उल्लेखनीय है। इस मामले में पुलिस ने अभियुक्त के घर की तलाशी इस उम्मीद से ली कि शायद वहाँ से पिस्तौल बरामद हो जाए परन्तु पिस्तौल नहीं मिली। अभियुक्त ने अपनी पत्नी से कुछ बात की और पत्नी घर से बाहर चली गई। वह तीन-चार मिनट बाद एक पिस्तौल और कुछ कारतूसों के साथ घर वापस लौटी। पुलिस ने दण्ड संहिता की धारा 27 का सहारा लेते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया कि यह उपधारणा की जानी चाहिए कि अभियुक्त के कब्जे में पिस्तौल थी। न्यायालय ने निर्णय दिया कि आयुध अधिनियम, 1959 (Arms Act, 1959) विशिष्ट संविधि होने के कारण ‘कब्जे’ के ‘धारणाशय’ के तथ्य को साबित किया जाना आवश्यक है। धारणाशय के अभाव में केवल कार्य का होना कब्जा साबित करने के लिए अपर्याप्त है।

कब्जे के प्रकार (Kinds of Possession)

कब्जे के अनेक प्रकार हैं। कब्जा मूर्त तथा अमूर्त हो सकता है अथवा तात्कालिक तथा मध्यवर्ती। ।

(1) मूर्त कब्जा तथा अमूर्त कब्जा (Corporeal and Incorporeal Possession)

किसी भौतिक वस्तु के कब्जे को मूर्त कब्जा’ (Corporeal Possession) कहते हैं, जैसे मकान, भूमि, मेज, घड़ी आदि। भौतिक वस्तु पर वास्तविक कब्जे को छोड़कर अन्य प्रकार के कब्जे को ‘अमूर्त कब्जा’ (incorporeal possession) कहते हैं। उदाहरणार्थ, दूसरे व्यक्ति को भूमि से होकर जाने का मार्गाधिकार या प्रतिष्ठा सम्बन्धी अधिकार आदि। रोमन विधि में मूर्त कब्जे को पजेशियो कॉरपोरिस (possessio corpdris) तथा अमूर्त कब्जे को (possessio juris) कहते हैं। कुछ विधिवेत्ताओं का विचार है कि वास्तविक कब्जा सदैव मूर्त होता है तथा अमूर्त कब्जा एक ऐसी संकल्पना है जो वास्तविक कब्जे से कुछ न्यूनता प्रदर्शित करती है। यही कारण है कि अमूर्त कब्जे को रोमन विधि में क्वासी पजेशिर (quasi possessio) के नाम से सम्बोधित किया है। अमूर्त कब्जे के लिए यह आवश्यक है कि उसका निरन्तर उपयोग तथा उपभोग किया जाए। परन्तु सामण्ड ने इस भेद को निरर्थक माना है।

(2) तात्कालिक तथा मध्यवर्ती कब्जा (Immediate and Mediate Possession)

सामण्ड के अनुसार ऐसा कब्जा जो व्यक्ति स्वयं व्यक्तिगत रूप से प्रत्यक्षत: अर्जित करता है तात्कालिक * कब्जा (immediate possession) कहलाता है। परन्तु ऐसा कब्जा जो किसी दूसरे व्यक्ति के माध्यम से प्राप्त होता है, मध्यवर्ती कब्जा’ (mediate possession) कहलाता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति स्वयं

39. ए० आई० आर० 1951 कलकत्ता 140.

पुस्तक खरीद लाता है, तो उस पुस्तक पर उसका तात्कालिक कब्जा होगा, परन्तु यदि वह पुस्तक खरीदने के 389 लिए अपने नौकर को भेजता है, तो वह व्यक्ति उस नौकर के कब्जे के माध्यम से पुस्तक का मध्यवर्ती । कब्जाधारक तब तक बना रहता है जब तक नौकर वह पुस्तक उसके हवाले नहीं कर देता। पुस्तक उसके हाथ में आते ही उस पर उसका तात्कालिक कब्जा हो जाएगा।

सामण्ड ने मध्यवर्ती कब्जे के निम्नलिखित तीन प्रकार बताए हैं ।

(i) ऐसा मध्यवर्ती कब्जा (mediate possession) जिसे कोई व्यक्ति अपने नौकर या अभिकर्ता के माध्यम से अर्जित करता है। इसमें जिस व्यक्ति के माध्यम से कब्जा प्राप्त होता है वह कब्जाधीन वस्तु को दूसरे के लिए धारित करता है तथा उस पर अपने किसी निजी हित का-दावा नहीं करता। इस प्रकार के कब्जे में तात्कालिक कब्जा नौकर या अभिकर्ता में ही निहित होता है किन्तु मध्यवर्ती कब्जा उसके स्वामी में निहित होता है, क्योंकि नौकर या अभिकर्ता उस कब्जे को स्वामी के लिए ही धारण करता है।

(ii) दूसरे प्रकार के मध्यवर्ती कब्जे में कोई व्यक्ति किसी वस्तु पर दूसरे के लिए तथा स्वयं के हित के लिए कब्जा रखता है किन्तु वह उस दूसरे व्यक्ति के स्वामित्व के बेहतर हक (title) को स्वीकार करता है। तथा कब्जाधीन वस्तु मांगी जाने पर उसे लौटाने के लिए किसी भी क्षण तैयार रहता है। उदाहरण के लिए, किराये पर दिये गये अपने मकान पर मकान-मालिक का मध्यवर्ती कब्जा किरायेदार के मार्फत रहता है। इसी प्रकार लेनेदार (creditor) का अपने ऋण पर मध्यवर्ती कब्जा उसके ऋणी के मार्फत रहता है।

(iii) तीसरे प्रकार के मध्यवर्ती कब्जे में व्यक्ति किसी दूसरे की वस्तु पर स्वयं के हित के लिए वास्तविक कब्जा उस समय तक बनाये रखता है जब तक कि कोई विनिर्दिष्ट शर्त पूरी नहीं हो जाती या निर्धारित अवधि पूर्ण नहीं हो जाती । तथापि वह उस दूसरे व्यक्ति के उस वस्तु सम्बन्धी हक को स्वीकार करता है जिसके लिए उसने वह वस्तु धारण की है तथा जिसे वह अस्थायी दावा (claim) समाप्त होते ही उस दूसरे व्यक्तिको लौटाने के लिए तैयार है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति ऋण की अदायगी की प्रतिभूति के रूप में अपने गहने ऋण देने वाले व्यक्ति के पास गिरवी (pledge) रखता है, तो यद्यपि उन गहनों पर वास्तविक कब्जा गिरवीदार (pledgee) का होता है किन्तु गिरवी रखने वाले व्यक्ति का उन पर मध्यवर्ती कब्जा माना जायेगा। इसका कारण यह है कि यद्यपि गहने गिरवीदार के अस्थायी कब्जे में हैं किन्तु गिरवी रखने वाला व्यक्ति उसके अनन्य उपयोग का दावा नहीं छोड़ता है; अत: इसमें कब्जा बनाये रखने का आशय (animuas) विद्यमान है। इसी प्रकार उस व्यक्ति में कब्जे का काय (corpus) भी मौजूद है, क्योंकि गिरवीदार उन गहनों को उस व्यक्ति के लिए सुरक्षित रखता है तथा गिरवीदार के अस्थायी कब्जे के माध्यम से वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों को उन आभूषणों के उपभोग में हस्तक्षेप से बहिष्कृत करता है। अत: गहने गिरवी रखने वाले व्यक्ति में कब्जे का आशय (animus) तथा काय (corps) दोनों ही विद्यमान हैं, यह बात अलग है कि उन गहनों पर उसका कब्जाधिकार गिरवीदार के अस्थायी अधिकार से प्रतिबन्धित है। ।

उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त सभी प्रकार के मध्यवर्ती कब्जे (mediate possession) में एक ही वस्तु पर एक साथ दो व्यक्ति कब्जा रखते हैं। मध्यवर्ती कब्जे के अस्तित्व का प्रयोग किसी तीसरे व्यक्ति के विरुद्ध ही किया जा सकता है न कि तात्कालिक कब्जाधारी के विरुद्ध। अत: मालिक, भू-स्वामी, गिरवीकर्ता आदि को क्रमश: अपने नौकर, अभिधारी (tenant) तथा गिरवीदार के माध्यम से जो मध्यवर्ती कब्जा प्राप्त होता है। उसका प्रयोग वे संसार के अन्य समस्त व्यक्तियों के विरुद्ध कर सकते हैं किन्तु इनके विरुद्ध नहीं, क्योंकि इनके तात्कालिक कब्जे के माध्यम से ही उन्हें मध्यवर्ती कब्जा प्राप्त हुआ है।

समवर्ती कब्जा (Concurrent Possession) सिविल विधि के अन्तर्गत यह धारणा थी कि किसी वस्तु पर एक ही समय दो व्यक्ति हो सकता क्योंकि कब्जे की अनन्यता (exclusiveness) ही उसका वास्तविक मर्म है। इसका एक कारण

40. Exclusiveness is the essence of possession-Salmond.—Jurisprudence

यह है कि दो अनन्य उपयोगों के दो परस्पर दावों का एक साथ निष्पादन नहीं किया जा सकता 41 परन्तु । सामण्ड (Salmond) के अनुसार कुछ मामले ऐसे होते हैं जिनमें दावे पृथक्-पृथक होते हुए भी वे परस्पर विरोधी या खण्डनकारी नहीं होते; अत: उनका एक साथ निष्पादन हो सकता है। इस प्रकार के दोहरे कब्जे की ‘समवती कब्जा’ (concurrent possession) कहते हैं। सामण्ड ने ऐसी दशाओं का वर्णन किया है जिनमें समवर्ती कब्जा विद्यमान रहता है। ये दशायें हैं|

(1) एक ही वस्तु पर तात्कालिक तथा मध्यवर्ती कब्जे का एक साथ होना। उदाहरणार्थ, किसी गिरवी रखी वस्तु पर वास्तविक कब्जा गिरवीदार का होता है लेकिन गिरवी रखने वाले व्यक्ति का उस वस्तु पर गिरवीदार के मार्फत मध्यवर्ती कब्जा बना रहता है। गिरवीदार को वस्तु का तात्कालिक कब्जा ऋण की अदायगी की सुरक्षा के रूप में प्राप्त है। |

(2) सह-स्वामियों का आधिपत्य, अर्थात् दो या अधिक व्यक्तियों का एक ही वस्तु पर समान रूप में कब्जा और हक होना। इसे रोमन विधि में कॉम-पोजिशियो (compossessio) कहा गया है।

(3) एक ही भौतिक पदार्थ के सम्बन्ध में मूर्त तथा अमूर्त कब्जे का साथ-साथ होना । उदाहरणार्थ, यदि एक व्यक्ति भूमि पर मूर्त (corporeal) कब्जा रखता है तथा दूसरे को उस भूमि पर से आने-जाने के मार्ग के अधिकार के रूप में अमूर्त (incorporeal) कब्जा है, तो उस भूमि पर उन दोनों ही व्यक्तियों का समवर्ती’ कब्जा होगा। इसे दोहरा कब्जा भी कहते हैं।

4. आन्वयिक कब्जा (Constructive Possession)

आन्वयिक कब्जे का अर्थ है किसी सम्पत्ति या वस्तु पर बिना वास्तविक उपस्थिति या नियन्त्रण के उसे प्रतिधारित किये रहने या रखे रहने (retain) की शक्ति तथा आशय रखना।

फेड्रिक पोलक (Pollock) के मतानुसार ऐसा कब्जा जो वास्तविक कब्जा नहीं होता लेकिन विधि के प्रयोजनों के लिए उसे कब्जा माना जाता है, ‘आन्वयिक कब्जा’ कहलाता है। वस्तुत: यह कब्जा प्राप्त करने का अधिकार मात्र होता है। उदाहरणार्थ, किसी कमरे को ताला लगाकर उसकी चाबी किसी व्यक्ति को सौंप दी जाने पर उस कमरे के अन्दर रखी हुई सभी वस्तुओं पर चाबीधारी व्यक्ति का आन्वयिक कब्जा होगा। तथापि कीटन (Keeton) ने इस प्रकार के आन्वयिक कब्जे को मान्य नहीं किया है क्योंकि चाबी का परिदान (delivery of key) केवल प्रतीकात्मक कृत्य (symbolic act) न होकर इस बात का द्योतक है कि कब्जे का वास्तविक अन्तरण हुआ है। अत: यह आन्वयिक कब्जा न होकर वास्तविक कब्जा माना जाना चाहिए। क्योंकि चाबी के अन्तरण के साथ ही कमरे में रखी वस्तुओं का वास्तविक कब्जा भी चाबीधारी व्यक्ति को अन्तरित हो जाता है।

5. प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession)

जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की ओर से किसी भूमि पर कब्जा रखता है लेकिन बाद में स्वयं को उस भूमि का वास्तविक स्वामी बताते हुए उस पर अपना हक जताता है, तो इस प्रकार से हथियाए गए कब्जे को प्रतिकूल कब्जा’ कहते हैं। यदि ऐसा प्रतिकूल कब्जा एक विहित अवधि (prescribed period) तक निर्बाध रूप से शांतिपूर्वक जारी रहता है, तो निहित अवधि की समाप्ति पर उस भूमि पर से वास्तविक स्वामी का हक समाप्त हो जाएगा और प्रतिकूल कब्जाधारी को उस भूमि का स्वामित्व प्राप्त हो जाएगा। प्रतिकूल कब्जे का वास्तविक कब्जे में परिवर्तन होने के लिए वह निरंतर एवं निर्वाध रूप से जारी रहा हो। तथा उसका पर्याप्त प्रसारण हुआ हो। इसके अतिरिक्त वह बिना किसी हिंसा के वास्तविक स्वामी की अनुमति के बिना विहित अवधि तक जारी रहा हो।

कब्जे का अर्जन (Acquisition of Possession)

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि कब्जे के अर्जन के लिए ‘काय’ (corpus) और ‘धारणाशय’ (animus), इन दोनों तत्वों का विद्यमान होना आवश्यक है। सामान्यतः कब्जा तीन प्रकार से अर्जित किया जा सकता है

41. सजातीय स्वत्वं प्रति सजातीय स्वत्वं विरोधि.

 (1) ग्रहण द्वारा (By taking);

(2) परिदान द्वारा (By delivery); ।

(3) विधि के प्रवर्तन द्वारा (By operation of law) ।

(1) ग्रहण द्वारा कब्जे का अर्जन (By taking)-जब कोई वस्तु पूर्ववर्ती कब्जाधारी की सहमति के बिना प्राप्त की जाती है, तो उस वस्तु के कब्जे को ‘ग्रहण’ (Taking) द्वारा अर्जित कहा जाता है। यह

आवश्यक नहीं कि जिस वस्तु को ग्रहण किया गया हो वह पहले किसी के कब्जे में रही हो, वस्तु का ग्रहणाधिकार उचित भी हो सकता है या सदोष भी हो सकता है।

(2) परिदान द्वारा कब्जे का अर्जन (By delivery)-यदि कोई व्यक्ति किसी वस्तु के कब्जे का। अर्जन पूर्व-कब्जाधारी की सम्मति तथा सहयोग से करता है, तो उसे परिदान (delivery) द्वारा कब्जे का अजन कहते हैं। परिदान दो प्रकार से हो सकता है

(i) वास्तविक परिदान (actual delivery); तथा

(ii) आन्वयिक परिदान (constructive delivery) ।

(i) वास्तविक परिदान (actual delivery)–वास्तविक परिदान दो प्रकार से किया जा सकता है। जब कोई व्यक्ति अपनी कब्जाधीन वस्तु किसी दूसरे के सुपुर्द कर देता है, तो वह दूसरा व्यक्ति उस वस्तु पर वास्तविक परिदान द्वारा कब्जा अर्जित करेगा। वास्तविक परिदान के दूसरे प्रकार में वस्तु का तात्कालिक कब्जा तो अन्य व्यक्ति में अन्तरित हो जाता है किन्तु उस पर मध्यवर्ती कब्जा पहले व्यक्ति का बना रहता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अपनी पुस्तक कुछ समय के लिए अन्य व्यक्ति को पढ़ने के लिए देता है, तो ऐसा परिदान इस प्रकार के वास्तविक परिदान की कोटि में माना जायेगा।

(ii) आन्वयिक परिदान (constructive delivery)-आन्वयिक परिदान वास्तविक परिदान से भिन्न होता है। आन्वयिक परिदान में केवल मध्यवर्ती कब्जे का अन्तरण होता है, वास्तविक कब्जे का नहीं। सामण्ड के अनुसार आन्वयिक कब्जे के तीन प्रकार हैं।

(क) मध्यवर्ती कब्जे का समर्पण (traditio brevi main) रोमन विधि के अन्तर्गत मध्यवर्ती कब्जे के समर्पण को ‘ट्रेडीशियो ब्रेवी मेनू’ कहा गया है। इसका आशय यह है कि व्यक्ति अपना मध्यवर्ती कब्जा उस व्यक्ति को अन्तरित कर देता है जिसका उस वस्तु पर तात्कालिक कब्जा पहले से ही विद्यमान था 42 उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अपनी घड़ी को दुरुस्ती के लिए घड़ीसाज को देता है और बाद में उसी घडीसाज को वह घड़ी बेच देता है, तो ऐसी दशा में इसे मध्यवर्ती कब्जे के समर्पण द्वारा किया गया आन्वयिक परिदान माना जायेगा क्योंकि घड़ी के स्वामी ने दुरुस्ती के लिए दी गई घड़ी का अपना मध्यवर्ती कब्जा घड़ीसाज को अन्तरित कर दिया है जिसके पास घड़ी का तात्कालिक कब्जा था।

(ख) कान्स्टिट्यूटम पजेसोरियम (constitutum possessorium)—यह ‘ट्रेडीशियो ब्रेवी मेनू’ के ठीक उल्टा है। इसमें मध्यवर्ती कब्जे का अन्तरण होता है जबकि तात्कालिक कब्जा अन्तरक में रहता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति ने गोदाम से कुछ बोरे अनाज खरीदा तथा गोदाम वाले ने वे बोरे उस क्रेता को सपर्द कर दिये तथा वह इस बात पर राजी हो जाता है कि वह उन बोरों को क्रेता की ओर से अपने गोदाम में रखे रहेगा। यहाँ उन बोरों से सम्बन्धित मध्यवर्ती कब्जा तो विक्रय के बाद क्रेता के हाथ में आ गया किन्तु तात्कालिक कब्जा गोदाम वाले के पास ही बना रहा।

(ग) नव-स्वामित्व (attornment)—यह मध्यवर्ती कब्जे का अन्तरण है जबकि तात्कालिक कब्जा किसी तीसरे (अन्तरक और अन्तरिती को छोड़कर किसी अन्य व्यक्ति में बना रहता है। उपर्युक्त उदाहरण में यदि क्रेता गोदाम में रखे हुए अपने बोरे ‘क्ष’ नामक किसी व्यक्ति को बेच देता है, तो जैसे ही गोदाम वाला उन बोरों को पहले क्रेता की बजाय ‘क्ष’ के लिए अपने गोदाम में रखने के लिए सहमत हो जाता है, यह माना जाएगा कि उस पहले क्रेता ने उस माल का आन्वयिक परिदान ‘क्ष’ को प्रभावी रूप से कर दिया है।

42. Cain v. Moon (1896) 2OB 283; Richer vs. Vaver (1874) LR 5 PC 461.

LLB Study Material
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(3) विधि के प्रवर्तन द्वारा कब्जे का अर्जन (By operation of law)—यदि विधि के प्रवर्तन द्वारा। कोई वस्तु या सम्पत्ति एक व्यक्ति के नियन्त्रण से हटकर किसी दूसरे व्यक्ति के हाथों में आ जाती है, तो इसे विधि के प्रवर्तन द्वारा अर्जित कब्जा कहा जाता है। उदाहरणार्थ, किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद जब उसकी सम्पत्ति उसके वारिसों को अन्तरित कर दी जाती है, तो उन वारिसों का उस सम्पत्ति पर कब्जा विधि के प्रवर्तन द्वारा अर्जित माना जायेगा।

उल्लेखनीय है कि भारतीय सुखाधिकार अधिनियम, 1882 (Indian Easements Act, 1882) की धारा 15 के अन्तर्गत जब कोई व्यक्ति जो किसी भूमि पर प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) किये हुए। है, निरंतर बारह वर्षों तक सतत् निर्बाध कब्जा बनाए हुए है, तो विधि के प्रवर्तन द्वारा वह उस भूमि का स्वामित्व अर्जित कर लेगा और उसका प्रतिकूल कब्जा, वास्तविक कब्जे में परिवर्तित हो जाएगा। इसके साथ ही उस भूमि के वास्तविक स्वामी के स्वामित्व का लोप हो जाएगा। इस प्रकार एक विहित अवधि (prescribed period) के बाद प्रतिकूल कब्जाधारी स्वामित्व अर्जित कर लेता है जबकि उस भूमि के वास्तविक स्वामी के स्वामित्व का लोप हो जाता है। कब्जे का सतत चालू रहना (Continuance of Possession)

कब्जे के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए सामण्ड कहते हैं कि जो कब्जा एक बार अर्जित हो जाता है वह काय (corpus) तथा आशय (animus) का लोप हो जाने पर भी समाप्त नहीं होता, अपितु सतत चालू रहता है। इस कथन की पुष्टि में सामण्ड कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। जब कोई व्यक्ति अपने घर से बाहर घूमने जाता है, तो उसके घर में रखे सामान पर उसका विधिक कब्जा बना रहता है यद्यपि उसकी घर से अनुपस्थिति की अवधि में सामान पर उसका वास्तविक नियन्त्रण नहीं रहता है। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति की कीमती अंगूठी रास्ते में कहीं पर गिर जाती है, तो यद्यपि उस अंगूठी पर से उसका नियन्त्रण समाप्त हो चुकता है तथा उसके लिए यह भी सम्भव नहीं रहता कि वह अन्यों को उस अंगुठी में हस्तक्षेप करने से रोक सके: परन्तु फिर भी जब तक वह अंगूठी मिलने की उसकी आशा पूर्णतः समाप्त नहीं हो जाती, तब तक उस अंगूठी पर उस व्यक्ति का विधिक कब्जा बना रहेगा।

इस सन्दर्भ में टिकनर बनाम हर्न43 का वाद उल्लेखनीय है। इसमें भाड़ा नियन्त्रण अधिनियम के अन्तर्गत एक संरक्षित रिहायशी मकान की रहिवासी महिला ने अस्थायी यात्रा हेतु अपना परिसर छोड़ा। उसी।

43. Tickner v. Hearn (1961) 1All ER 65.

बीच वह पागल हो जाने के कारण निरंतर अस्पताल में रही। अपने मकान पर कब्जा सिद्ध करने के लिए उसे न्यायालय के समक्ष यह साबित करना आवश्यक था कि वह उस मकान में वापस लौटने का निश्चित इरादा। रखती थी।

वास्तविक कब्जा और विधिक कब्जा में विभेद (Difference between Possession in Fact and Possession in Law)-किसी वस्तु पर व्यक्ति का वास्तविक कब्जा तब माना जाता है यदि वह उस वस्तु को अपने पास रखने तथा उसका उपयोग करने की क्षमता रखना हो और उस पर निरंतर नियत्रण कायम | रखते हुए अन्यों को उससे अपवजित रखने की शक्ति रखता हो। दूसरे शब्दों में, किसी वस्तु के उपयोग या उपभोग की शक्ति, उस पर निरंतर नियंत्रण तथा अन्यों को इससे अपवर्जित रखने की शक्ति, ये वास्तविक कब्जे के दो प्रमुख तत्व हैं। (To hold, use and exercise continuous control and power of excluding others are the two essential elements of possession in fact) तथापि यदि वस्तु पर। कब्जा रखने को व्यक्ति का आशय (animus) स्पष्टत प्रकट होता हो, तो उस दशा में यह आवश्यक नहीं। होगा कि वह वस्तु उस व्यक्ति के भौतिक नियंत्रण्स में हो।

विधिक कब्जे से आशय है, विधि द्वारा कब्जे को संरक्षित किया जाना (protected by law) । यह दो प्रकार से सुनिश्यित किया जाता है (1) व्यक्तिलक्षी अधिकार को संस्वीकृत करके और (2) इस अधिकार का उल्लंघन किया जाने पर दोषी व्यक्ति को दंडित करके। विधिक कब्जा व्यक्ति का लोकलक्षी अधिकार (right in rent) होने के कारण किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा इसमें अवैध हस्तक्षेप किया जाना वर्ज है और यदि कोई व्यक्ति ऐसा हस्तक्षेप करता है तो विधिक कब्जाधारी को उस व्यक्ति के विरूद्ध सिविल या दांडिक उपचार उपलब्ध होगा। उदाहरणार्थ, यदि कोई उपनिहिती (bailee) उसके पास गिरवी रखी वस्तु का दुर्विनियोग (misappropriation) करता है, तो उसे संविदा अधिनियम के अन्तर्गत चोरी का दोषी माना जाएगा क्योंकि प्रारंभ में (जब वस्तु उसके पास गिरवी रखी गई थी) उस वस्तु पर उसका कब्ज़ा वैध था, परंतु बाद में दुर्विनियोग कके कारण वह अविधिमान्य हो गया। आन्वयिक कब्जा (constructive possession) भी विधिक कब्जे का अच्छा उदाहरण है। यदि ‘क’ द्वारा ‘ख’ की घड़ी का दोषपूर्ण कब्जा लिया जाता है तो विधि के अन्तर्गत ‘ख’ को विधिक अधिकार होगा कि वह क से अपनी घड़ी वापस ले। यहां यद्यपि घड़ी पर वास्तविक कब्जा ‘ख’ का है, लेकिन यह दोषपूर्ण होने के कारण उस घड़ी पर ‘क’ का विधिक कब्जा बना रहेगा।

कब्जा और स्वामित्वमें परस्पर सम्बन्ध (Relation Between Possession and Ownership) “

कब्जे और स्वामित्व में परस्पर सम्बन्ध के विषय में विधिवेत्ताओं ने भिन्न-भिन्न विचार व्यक्त किये हैं। सामण्ड के अनुसार कब्जे और स्वामित्व की विषय-वस्तु प्रायः एक ही है। जिस वस्तु पर स्वामित्व प्राप्त किया जा सकता है, उस पर कब्जा भी रखा जा सकता है। इसी प्रकार जो वस्तु कब्जाधीन की जा सकती है। उस पर स्वामित्व प्राप्त किया जा सकता है तथापि इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं।44

कुछ अधिकार ऐसे होते हैं जिन पर व्यक्ति का कब्जा होता है परन्तु स्वामित्व नहीं होता। उदाहरणार्थ, कॉपीराइट टेडमार्क तथा एकाधिकार आदि ऐसे अधिकार हैं जिन पर व्यक्ति का कब्जा होता है लेकिन स्वामित्व नहीं। इसके ठीक विपरीत कुछ अधिकार ऐसे होते हैं जिन पर व्यक्ति का स्वामित्व हो सकता है। परन्तु वह उन्हें कब्जे में नहीं ले सकता। उदाहरण के लिए, लेनदार के ऋण-सम्बन्धी अधिकार पर कब्जा नहीं होता बल्कि स्वामित्व होता है। अतः निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि सर्वबन्धी अधिकारों (rights in renu) पर कब्जा तथा स्वामित्व दोनों ही हो सकते हैं किन्तु व्यक्तिबन्धी अधिकार (right in “Personam) पर केवल स्वामित्व ही प्राप्त किया जा सकता है, कब्जा नहीं।

सर हेनरी मेन ने कब्जा और स्वामित्व के परस्पर सम्बन्ध की विवेचना ऐतिहासिक आधार पर की है। विचार से ऐतिहासिक दृष्टि से कब्जे की संकल्पना स्वामित्व से पूर्ववती है। वस्तुतः स्वामित्व की संकल्पना ‘कब्जे से ही विकसित हुई है।

44. सामण्ड : ज्यूरिसपूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 295.

अनेक विधिशास्त्रियों के विचार से स्वामित्व एक ऐसा अधिकार है जो राज्य की इच्छा द्वारा विधित: संरक्षित है, जबकि कब्जा किसी सम्पत्ति को धारण करने वाले व्यक्ति की इच्छाओं और क्रियाओं के दावे से संरक्षित होता है। |

सुप्रसिद्ध जर्मन विधिवेत्ता इहरिंग (Ihering) ने कब्जा और स्वामित्व के सम्बन्धों का विश्लेषण करते हुए कहा है कि कब्जा स्वामित्व की वस्तुनिष्ठ अनुभूति है।45 वस्तुतः कब्जा उसी तथ्य का नाम है जिसे विधिक दृष्टि में स्वामित्व’ कहते हैं। ‘कब्जा’ किसी दावे (claim) का तथ्यतः (de facto) व्यवहार है और स्वामित्व उसकी विधितः (de jure) मान्यता है। कब्जा वास्तविक तथ्यों का संरक्षण करता है जबकि स्वामित्व विधि द्वारा संरक्षित होता है।

कब्जा स्वामित्व का साक्ष्य है

कब्जे को स्वामित्व का बाह्य साक्ष्य माना गया है, अर्थात् किसी वस्तु को कब्जे में रखने वाले व्यक्ति के बारे में यह धारणा रहती है कि वह उस वस्तु का स्वामी भी होगा। जिस व्यक्ति के पास कब्जा होता है, उसे अपना स्वामित्व सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती वरन् उसके स्वामित्व को चुनौती देने वाले व्यक्ति को कब्जाधारक की स्वामित्वहीनता साबित करनी पड़ती है। किसी सम्पत्ति पर लम्बे समय तक कब्जा धारण किये रहना उस पर स्वामित्व प्राप्त करने का एक अच्छा साधन है।

सामण्ड के अनुसार चिरभोगाधिकार (Right of prescription) इस बात का अच्छा उदाहरण है कि यदि कोई दीर्घ समय तक किसी भूमि पर काबिज रहता है, तो ऐसा कब्जा बिना उस पर हक के भी स्वामित्व में परिवर्तित हो जायेगा और उस भूमि के वास्तविक स्वामी का स्वामित्व दीर्घकालीन कब्जे के अभाव में समाप्त हो जायेगा।

कब्जे सम्बन्धी उपचार (Possessory Remedies)

इंग्लिश विधि के अन्तर्गत ‘कब्जे’ को समस्त लोगों के विरुद्ध एक अच्छा हक (title) माना गया है। विधि की मान्यता यह है कि किसी सम्पत्ति पर सदोष कब्जा धारण करने वाला व्यक्ति उस सम्पत्ति के वास्तविक स्वामी के अलावा अन्यों की तुलना में बेहतर हक रखता है। इस सन्दर्भ में आरमोरी बनाम डेलामिरी46 का वाद उल्लेखनीय है जिसमें वादी को कारखाने में चिमनी की सफाई करते समय एक अंगूठी पड़ी हुयी मिली। उसने उस अंगूठी की वास्तविक कीमत जानने के आशय से उसे एक सुनार को दिखाया। उस मूल्यवान अंगूठी को देखकर सुनार की नियत में खोट आयी और उसने वह अंगुठी वादी को लौटाने से इस आधार पर इन्कार कर दिया कि वह उसकी स्वयं की न होकर किसी अन्य तीसरे व्यक्ति की थी। वादी द्वारा प्रतिवादी (सुनार) के विरुद्ध अंगूठी वापसी हेतु वाद लाया जाने पर न्यायालय ने विनिश्चित किया कि प्रतिवादी की तुलना में वादी को अंगूठी पर बेहतर हक प्राप्त था इसलिये प्रतिवादी का जस टर्शी (Jus tertei) का अभिवाक ( अर्थात् यह तर्क कि वह अंगूठी वादी की न होकर किसी अन्य अनजान व्यक्ति की थी) खारिज कर दिया।

अनेक विधि प्रणालियों में सम्पत्ति का वास्तविक स्वामी भी सदोष कब्जाधारक (adversary possessor) को सम्पत्ति से बेदखल नहीं कर सकता। इसके लिए उसे सदोष कब्जाधारक के विरुद्ध न्यायालयीन कार्यवाही का सहारा लेना होगा। विधि की मान्यता यह है कि किसी वस्तु पर कब्जा रखने वाला व्यक्ति उस समय तक कब्जे को धारण किये रहने का अधिकारी बना रहता है जब तक कि कोई व्यक्ति उसके विरुद्ध न्यायिक कार्यवाही द्वारा अपना बेहतर स्वत्व या हक सिद्ध नहीं कर देता +7

कब्जे को संरक्षित रखने सम्बन्धी वैध उपचारों को ‘कब्जा सम्बन्धी उपचार’ (possessory remedies) कहते हैं, जबकि स्वामित्व को संरक्षित रखने वाले वैध उपचारों को सांपत्तिक उपचार’ (proprietary

45. Possession is the objective realisation of ownership.

46. Amory v. Dalanmiri, (1722) 1 स्ट्रेन्ज 505; तथा बर्ड बनाम फोर्ट फ्रांसिस (1949) 5 DLR 791.

47. विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 9; दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 145.

remedies) कहते हैं। रोमन विधि के अन्तर्गत इन्हें क्रमशः ‘पोजेसोरियम’ (Possessorium) तथा ‘पेटीटोरियम’ (Petitorium) के नाम से सम्बोधित किया गया है।

कब्जा धारण हेतु उपचार (Possessory Remedies)

सामण्ड के अनुसार कब्जे को अस्थायी संरक्षण (Provisional protection) दिये जाने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

(1) हिंसात्मक स्व-साहाय्य के दुष्परिणाम इतने गम्भीर हो सकते हैं कि इससे शान्ति-व्यवस्था में गड़बड़ी उत्पन्न होने की सम्भावना बनी रहती है। अत: कानून इसे एक विशिष्ट सीमा के आगे प्रोत्साहन न देना ही उचित समझता है। किसी व्यक्ति द्वारा अनावश्यक बल प्रयोग द्वारा अपनी वस्तु पुन: प्राप्त करने का। प्रयत्न करना कानून के अन्तर्गत ‘अतिचार’ (trespass) कहलाता है। तथापि जहाँ तक जंगम सम्पत्ति (chattels) की पुनः प्राप्ति का प्रश्न है; विधि यह अनुमति देती है कि स्वामी को अपनी जंगम सम्पत्ति स्वसाहाय्य (self-help) द्वारा पुन: प्राप्त करने का अधिकार है।

(2) कब्जा सम्बन्धी उपचारों को विधिक मान्यता देने का दूसरा कारण सम्भवत: यह है कि प्राचीन विधियों में सांपत्तिक उपचारों (proprietary rights) की व्यवस्था में गम्भीर दोष थे। अपनी सम्पत्ति को पुनः प्राप्त करने के लिए स्वामी (owner) को जटिल, दीर्घकालिक तथा खर्चीली प्रक्रिया अपनानी पड़ती थी जो अधिक प्रभावी नहीं होती थी। अतः स्वामित्व का दावा करने वाले व्यक्ति की स्थिति बड़ी शोचनीय होती थी क्योंकि विधि की दृष्टि से कब्जाधारक की स्थिति सुदृढ़ होती थी विधि के अन्तर्गत वास्तविक स्वामित्वधारी की बजाय कब्जाधारी व्यक्ति के अधिकार को अधिमान्यता दी जाने के कारण मुकदमे में उसकी जीत होने की सम्भावना ही अधिक रहती थी। किन्तु वर्तमान विधिप्रणालियों में कब्जे या स्वामित्व सम्बन्धी वादों में वादी तथा प्रतिवादी, दोनों की ही स्थिति समान रखी गई है।

(3) विधि द्वारा कब्जे को संरक्षित किये जाने का एक अन्य कारण यह है कि इसे स्वामित्व का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य (prima facie evidence) माना गया है। विधि की मान्यता यह है कि एक निर्धारित कालावधि के पश्चात् कब्जाधीन वस्तु पर कब्जाधारी स्वामित्व प्राप्त कर लेता है। प्राचीन विधियों के अन्तर्गत स्वत्व (title) के लिए रजिस्ट्रेशन आवश्यक न होने के कारण व्यक्ति को अपना स्वामित्व सिद्ध करना बहुत कठिन होता था, जबकि कब्जा सिद्ध करना अपेक्षाकृत सरल था। इसी कारण स्वयं स्वामी भी विधिक कार्यवाही का मार्ग अपनाये बिना किसी अतिचारी (trespasser) को बलपूर्वक बेदखल नहीं कर सकता था। ‘कब्जा’ सम्बन्धी वादों में वादी को केवल यह सिद्ध करना पड़ता है कि उसका कब्जा प्रतिवादी की तुलना में पर्ववर्ती है क्योंकि विधि की उपधारणा यह है कि पूर्व-कब्जा (prior possession) हक का अच्छा प्रमाण है 48 तथापि प्रतिवादी अपना अधिक अच्छा हक (better title) साबित करके उक्त उपधारणा का विखण्डन कर सकता है।

ज्ञातव्य है कि इंग्लिश विधि में कब्जे संबंधी उपचार (Possessory Remedies) को मान्यता प्रदान नहीं की गई है। अतः कब्जे संबंधी विवादों के निपटारे के लिए ऑग्ल-विधि के निम्नलिखित नियमों को लाग किया जाता है

(1) व्यक्ति का पूर्व-कब्जा (Prior possession) उसके हक का प्रथम दृष्ट्या प्रमाण माना गया।

(2) उपरोक्त नियम खंडनीय (rebuttable) प्रकृति का होने के कारण वास्तविक स्वामी जो कब्जे से वंचित है, अपने स्वामित्व का हक सिद्ध करके कब्जाधारी से कब्जा प्राप्त कर सकता है;

(3) कब्जे संबंधी विवादों में प्रतिवादी को अपने बचाव में पर-व्यक्ति-अधिकार (Jus tertii) की दलील प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं होगी।

48. Possession is nine points in law.

पर-व्यक्ति अधिकार का सिद्धांत (Doctrine of Jius Tertii)

यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे के कब्जे में अनुचित हस्तक्षेप करता है तथा कब्जाधारक हस्तक्षेप करने वाले के विरुद्ध वाद लाता है, तो उस स्थिति में प्रतिवादी अपने बचाव में यह तर्क प्रस्तुत नहीं कर सकता कि विवादग्रस्त सम्पत्ति का वास्तविक स्वामी न तो वह है और न वादी बल्कि कोई अन्य तीसरा ही व्यक्ति उसका वास्तविक स्वामी है। दूसरे शब्दों में, प्रतिवादी द्वारा वादी के कब्जे का खण्डन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उस सम्पत्ति का स्वामित्व वादी के बजाय किसी अन्य व्यक्ति में निहित है।49 कानून किसी व्यक्ति को पराए व्यक्ति के अधिकार (जस टर्शियाई) का प्रतिवाद स्थापित करने की अनुज्ञा नहीं। देता बल्कि यह अपेक्षा करता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वयं के ही हक की प्रतिरक्षा करे। अतः वादी और प्रतिवादी के बीच चल रहे वाद में प्रतिवादी द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति का अधिकार साबित किया जाना असंगत एवं व्यर्थ होगा। परन्तु इसके तीन अपवाद हैं

(i) यदि प्रतिवादी वास्तविक स्वामी की ओर से तथा उसके प्राधिकार द्वारा अनुयोजन (action) का प्रतिरक्षण करता है;

(ii) यदि प्रतिवादी ने उल्लंघन का कार्य वास्तविक स्वामी की अनुमति से किया है; तथा

(iii) यदि प्रतिवादी ने वास्तविक स्वामी को विवादग्रस्त संम्पत्ति के बदले अपनी कोई सम्पत्ति देकर उसे पहले ही सन्तुष्ट कर दिया है।

उपर्युक्त तीनों दशाओं में प्रतिवादी अपने बचाव में पर-व्यक्ति अधिकार का तर्क प्रस्तुत कर सकता है। जो न्यायालय द्वारा ग्राह्य होगा। |

सामण्ड के अनुसार वर्तमान विकसित विधि-व्यवस्थाओं में कब्जा तथा स्वामित्व संबंधी उपचारों में भेद अनावश्यक माना गया है। आधुनिक युग में स्व-साहाय्य के दुष्परिणामों का निवारण दाण्डिक उपबन्धों तथा अपकृत्य विधि की शास्तियों के माध्यम से किया जा सकता है। अतः यदि किसी सम्पत्ति के वास्तविक स्वामी ने अतिचारी को उसकी सम्पत्ति से बेदखल कर दिया है, तो वर्तमान विधि यह आवश्यक नहीं समझती कि स्वामी प्रथम उस सम्पत्ति को अतिचारी के कब्जे में वापस करे और तत्पश्चात् उस सम्पत्ति पर स्वामित्व प्राप्त करने के लिए अतिचारी के विरुद्ध न्यायिक कार्यवाही करे। इसका कारण यह है कि वर्तमान दण्ड-विधि या अपकृत्य विधि में वास्तविक स्वामी को ‘अतिचार के लिए सीधा (direct) उपचार उपलब्ध

भारतीय विधि में कब्जे की स्थिति

प्राचीन भारत में भू-सम्पत्ति का स्वत्व वैयक्तिक कब्जे पर आधारित था। कात्यायन ने कब्जे के दो प्रकार बताये हैं-स्वत्व सहित कब्जा तथा स्वत्व रहित कब्जा 50 स्वत्व-रहित कब्जाधारी को वस्तु पर स्वामित्व प्राप्त नहीं हो सकता था। याज्ञवल्क्य स्मृति में यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि यदि कोई व्यक्ति यह देखता है कि उसकी सम्पत्ति बीस वर्ष तक निरन्तर किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा उपयोग में लाई जा रही है और फिर भी वह इस पर आपत्ति नहीं उठाता, तो वह उस सम्पत्ति पर से अपना स्वामित्व खो देगा। गौतम और नारद पुराण में भी यह उल्लेख है कि भूमि पर निरन्तर बीस वर्ष तक तथा जंगम वस्तु (movable things) पर। निरंतर दस वर्ष तक कब्जा बना रहने पर कब्जाधारी को स्वामित्व प्राप्त हो जायेगा।

भारत में इंग्लिश विधि लागू होने के परिणामस्वरूप कब्जे के लिए काय (corpus) और धारणाशय (animus) आवश्यक तत्व माने गये हैं। भारतीय विधि अभिरक्षा (custody) और कब्जे के भेद को स्वीकार नहीं करती है। तथापि इसमें सन्देह नहीं है कि सम्पत्ति,सम्बन्धी अधिकार तथा स्वत्व के निर्धारण में कब्जे का व्यावहारिक महत्व है। भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 145 में कब्जे को उचित संरक्षण दिये। जाने सम्बन्धी निम्नलिखित उपबंध हैं—

49. Armory v. Dalamiri, (1722) 1 Strange 505. 50. Possession with title and without title.

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 145 (1) के अनुसार जहाँ भूमि या जल से संबंधित किसी विवाद से परिशान्ति भंग होने की संभावना हो, तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट ऐसी सूचना प्राप्त होने पर उस विवाद से संबंधित सभी पक्षकारों को आदेशित करेगा कि वे आदेश में उल्लिखित दिनांक एवं समय पर उसके न्यायालय में उपस्थित होकर कब्जे संबंधी अपने-अपने दावे पेश करें।

इस धारा की उपधारा (4) के अनुसार विवाद से संबंधित पक्षकारों को सुनने तथा उनके साक्ष्य रिकार्ड करने के पश्चात् मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेगा कि आदेश की तिथि को उन पक्षकारों में से कौन सा पक्षकार विवादित भूमि या जल, यथास्थिति, पर काबिज था। यदि कोई अन्य पक्षकार काबिज पक्षकार से बलपूर्वक कब्जा छीनने के लिए प्रयासरत हो, तो ऐसी दशा में मजिस्ट्रेट धारा 107 के अधीन कार्यवाही करेगा

भारतीय विधि के अन्तर्गत भी कब्जे के काय (corpus) और धारणाशय (anira12s) को कब्जा निर्धारण के लिए आवश्यक माना गया है। विधि की यह उपधारणा रहती है कि कब्जाधारी ही वास्तविक स्वामी है। अतः यदि वादी बेदखल कर दिया जाता है, तो उसे यह साबित करना होगा कि वह कब्जा धारण किये था और भूमि पर उसका हक अतिचारी से बेहतर है।51 लल्लू यशवंत सिंह बनाम राव जगदीश सिंह2 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मकान पर कब्जाधारी किरायेदार अपनी जबरन बेदखली के लिए मकान-मालिक के विरुद्ध वाद संस्थित कर सकता है।

उच्चतम न्यायालय ने पूरन सिंह बनाम पंजाब राज्य3 के वाद में अभिनिर्धारित किया कि जहाँ कोई अतिचारी भूमि पर स्थिर कब्जा (settled possession) रखता हो, तो उसे सम्यक् अनुक्रम (due process) के सिवाय बेदखल नहीं किया जा सकेगा। उसे यह हक होगा कि वह उस भूमि के अधिकारवान स्वामी (rightful owner) के विरुद्ध भी अपना कब्जा बनाए रखे। यही बात उच्चतम न्यायालय ने राम रतन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के वाद में पुन: दोहराते हुए स्पष्ट किया कि यदि अतिवारी का कब्जा स्थिर है, तो उस दशा में स्वामी विधि के अन्तर्गत उपलब्ध उपचार द्वारा ही अतिचारी को बेदखल करके उससे कब्जा प्राप्त कर सकता है अन्यथा नहीं।

बिमला देवी बनाम प्रथम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के बाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि यदि मकान मालिक ने अपने परिसर के एक हिस्से में घरेलू कामकाज की वस्तुएं रखी हों और वह स्वयं कहीं बाहर दूसरी जगह नौकरी कर रहा हो, परंतु बीच में कभी-कभी अपने घर पर आता रहा हो, तो पूरी संपत्ति पर उसका ही कब्जा माना जाएगा और विधि के अन्तर्गत वही उस परिसर का कब्जाधारी होगा। ।

शेषमणि बनाम डिप्टी डायरेक्टर कनसालिडेशन56 के बाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रतिकूल कब्जे (adverse possession) के लिए केवल इतना मात्र साबित कर देना पर्याप्त नहीं होगा कि वह व्यक्ति भूमि पर कब्जा धारण किये हुए है अपितु उसे यह भी साबित करना होगा कि वह ऐसा कब्जा स्थिर रूप से निरंतर, निर्बाध एवं अनन्य प्रकार से धारण किये हुए है।

त्रिंबक बनाम मध्य प्रदेश राज्य7 के बाद में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई वस्तु अभियुक्त के कब्जे वाले स्थान से प्राप्त हुई हो, परन्तु वह स्थान सर्व साधारण की पहुंच में हो, तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह वस्तु अभियुक्त के कब्जे में थी। वह वस्तु अभियुक्त के स्वत्वाधीन होने के साथ-साथ वह इस बात से अवगत हो कि वस्तु उसके नियंत्रण में है, तभी उसे उस वस्तु का कब्जाधारी माना जाएगा।

51. प्रेमराज भवानीराम बनाम एन० एस० खिस्ती (1882) 6 बंबई 215.

52. ए० आई० आर० 1986 सु० को० 274.

53. (1975) 3 उम० नि० प० 1510.

54. 1977 एस० सी० सी० 232.

55. ए० आई० आर० 1984 सु० को० 1376.

56. (2000) 2 एस० सी० सी० 523.

57. ए० आई० आर० 1954 सु० को० 39.

उल्लेखनीय है कि आपराधिक दायित्व का निर्धारण करते समय कब्जे के धारणाशय (aninmus), अर्थात मानसिक तत्व पर विशेष बल दिया जाता है, जिससे तात्पर्य सचेत कब्जा (conscious possession) से है। संजय दत्त बनाम केन्द्रीय जांच ब्यूरो, मुंबई58 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारणाशय (animus) के तत्व की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि यद्यपि ‘कब्जा’ शब्द के पूर्व जानबूझकर’ विशेषण नहीं लगाया गया है फिर भी संदर्भानुसार इसका तात्पर्य कब्जा धारण किये रहने की वांछित मानसिक इच्छा से है। इस संदर्भ में प्रसाद रमाकांत खाड़े बनाम महाराष्ट्र राज्य के निर्णय को उद्धृत करना उचित होगा। इस वाद में अभियुक्त ने हथियार और गोला-बारूद तथा कारतूस ‘क’ के घर पर उन्हें सुरक्षित रखने हेतु दिये। तत्पश्चात् अभियुक्त की ही संस्वीकृति के आधार पर उस अवैध सामग्री को ‘क’ के घर से बरामद किया गया। उच्चतम न्यायालय ने निर्णीत किया कि हथियारों एवं बारूदों व कारतूसों पर अभियुक्त का नियंत्रण बना हुआ था, अत: उन पर अभियुक्त का कब्जा ही माना जाएगा।

बनोबी बनाम महाराष्ट्र राज्य60 के बाद में पति-पत्नी एक ही मकान में रह रहे थे। पुलिस ने पत्नी की उपस्थिति में जब उसका पति घर पर उपस्थित नहीं था, चरस का पैकेट बरामद किया। इस वाद में न्यायालय ने NDPS Act, 1985 के अधीन पत्नी के साथ पति को भी कब्जाधारी मानते हुए, दोनों को दंडित किया।

उच्चतम न्यायालय ने बी० गंगाधर बनाम बी० आर० राजलिंगम61 के वाद में विनिश्चित किया कि विधि के अन्तर्गत ‘कब्जे’ से आशय ऐसे कब्जे से है जो विधि द्वारा मान्य एवं संरक्षित हो। साधारणतः वास्तविक कब्जाधारी का ही विधितः कब्जा माना जाता है। वैध कब्जाधारी को कानून यह अधिकार देता है। कि वह अन्य व्यक्तियों को उस वस्तु के उपयोग या उपभोग से अपवर्जित रखे।

ज्ञातव्य है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 441 कब्जे को अवैध हस्तक्षेप के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करती है। इस धारा के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसी सम्पत्ति में या ऐसी सम्पत्ति पर, जो किसी दूसरे के कब्जे में है, कोई अपराध करने के आशय से प्रवेश करता है या कब्जाधारी को अभित्रस्त, अपमानित या क्षुब्ध करने के आशय से प्रवेश करता है, या ऐसी सम्पत्ति पर विधिपूर्वक प्रवेश करके वहाँ कोई विधि विरुद्ध कार्य करता है, तो उसे आपराधिक अतिचार (Criminal Trespass) का दोषी मानकर दंडित किया जाएगा। दण्ड संहिता की धारा 447 के अन्तर्गत इस अपराध के लिए दोषी व्यक्ति को तीन माह तक का कारावास या पाँच सौ रुपये अर्थदंड, या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

नरेन्द्रनाथ बनाम राज्य62 के वाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने विनिश्चित किया कि आयुध अधिनियम, 1959 (Arms Act, 1959) के प्रयोजन के लिए कब्जे की धारणा दंड संहिता में दर्शाई गई। संकल्पना से भिन्न है। किसी आयुध को बिना लायसेंस के कब्जे में रखना आयुध अधिनियम की धारा 30 के अन्तर्गत दंडनीय अपराध है। इस अपराध के लिए आयुध कब्जे में रखने का आशय, ज्ञान या इसकी जानकारी होना आवश्यक तत्व है। यह महत्वहीन है कि कब्जा वास्तविक है या आन्वयिक, प्रत्यक्ष है या परोक्ष, एकल है अथवा सहवर्ती या अनन्य। उल्लेखनीय है कि कब्जे संबंधी यही सिद्धांत मद्य निषेध अधिनियम, अफीम अधिनियम, आबकारी अधिनियम, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम तथा अन्य निषेधात्मक कानूनों के प्रति भी लागू होता है।

58. (1994) 5 एस० सी० सी० 410 (पूर्ण पीठ).

59. (1999) 8 एस० सी० सी० 493.

60. (1999) 8 एस० सी० सी० 463.

61. (1995) 5 एस० सी० सी० 241.

62. ए० आई० आर० 1951 कलकत्ता 140.

 

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