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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 23 Notes

 

LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 23 Notes: LLB Bachelor Of Law 1st Semester / 1st Year Jurisprudence & Legal Theory Free Offline and Online Books Section 4 Chapter 23 Legal Rights and Duties Most Important Study Material in Hindi English PDF File Format Download on This Website Available any Time, LLB Notes for Students All University Delhi, Meerut and All India Question Paper With Answer Sample Model Solved Questions Available.

 

अध्याय 23 (Chapter 23)

विधिक अधिकार और कर्तव्य (Legal Rights and Duties)

मानव सभ्यता के विकास का वास्तविक श्रेय विधि और उसकी निषेधात्मक प्रक्रिया को है, जिसने व्यक्ति को समाज के सदस्यों के रूप में अपने कर्तव्यों और अधिकारों का बोध कराया है। जब समाज के व्यक्ति परस्पर सम्पर्क में आते हैं, तो उनके एक दूसरे के प्रति कुछ विधिक अधिकार और कर्तव्य होते हैं, जिन्हें प्रचलित विधि द्वारा नियंत्रित किया जाता है। यह सर्वविदित है कि विधि का मूल उद्देश्य मानवीय हितों को संरक्षित करते हुए व्यक्तियों के संव्यवहारों को विनियमित करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्तियों के अधिकारों को प्रवर्तित कराने तथा उनका अतिक्रमण करने वालों को दण्डित करने के लिए राज्य अपनी भौतिक शक्ति का प्रयोग करे। यह कार्य राज्य द्वारा किया जाता है जो कानून के प्रवर्तन से लोगों को अपने विधिक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए बाध्य करते हुए उनके अधिकारों की संरक्षा करता है।

अधिकार की परिभाषा

विधिवेत्ताओं ने विधिक अधिकार की व्याख्या भिन्न-भिन्न प्रकार से की है। सैविनी (Savigny) ने इसे ‘शक्ति’ (power) माना है जबकि हॉलैण्ड (Holland) के अनुसार यह ‘सामर्थ्य’ या क्षमता का द्योतक है। काण्ट (Kant) के अनुसार विधिक अधिकार व्यक्ति को प्राप्त एक विशेषाधिकार है। इहरिंग (Ihering) इसे विधि द्वारा संरक्षित हित मानते हैं।

सामण्ड ने इहरिंग के विचारों का समर्थन करते हुए विधिक अधिकार को विधि द्वारा मान्य तथा संरक्षित कहा है 2 डॉ० ऐलन (Allen) के अनुसार अधिकार’ किसी हित (interest) को प्राप्त करने के लिए विधि द्वारा प्रत्याभूत शक्ति है।

ग्रे (Gray) के अनुसार अधिकार स्वयं कोई हित नहीं है, अपितु वह हितों के संरक्षण का एक साधनमात्र है। इस कथन की पुष्टि में एक उदाहरण देते हुए ग्रे कहते हैं कि यदि एक व्यक्ति दूसरे को ऋण देता है, तो ऋणदाता का यह हित (interest) कि वह ऋणी व्यक्ति से अपनी ऋण-राशि वापस प्राप्त करे, उसका वास्तविक विधिक अधिकार नहीं है बल्कि उसे कानून द्वारा दी गई यह शक्ति या क्षमता कि वह दिया गया ऋण वसूल कर सकता है, उसका विधिक अधिकार होगा। दूसरे शब्दों में, ऋणी व्यक्ति से ऋण की राशि प्राप्त करना ऋणदाता का हित है जो विधि द्वारा संरक्षित है। परन्तु यह हित स्वयं अधिकार नहीं है। अतः ग्रे के अनुसार विधिक अधिकार ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को कोई कार्य करने या कार्य करने से उपरत रहने के लिए वैधानिक कर्तव्य द्वारा बाध्य करता है।”3

नैतिक अधिकार तथा विधिक अधिकार में भेद

नैतिक अधिकार (moral rights) जिसे नैसर्गिक या प्राकृतिक अधिकार भी कहा जाता है, विधिक अधिकार (legal rights) से भिन्न होते हैं। नैतिक अधिकार प्राकृतिक न्याय के नियमों द्वारा मान्य एवं संरक्षित

1. सुब्बाराव जी० सी० : ज्यूरिसपूडेन्स (तृतीय संस्करण), पृ० 161.

2. “Right is an interest recognised and protected by law” Salmond : Jurisprudence, (12th Edn.) p. 218.

3. “Legal right is that power which a man has to make a person or persons do or refrain from doing a certain act or certain acts, so far as the power arises from society imposing a legal duty upon a person or persons.”-J. G.

होते हैं तथा उनका उल्लंघन नैतिक अपकार (moral wrong) कहलाता है। विधिक अधिकार ऐसे हितों से सम्बन्धित होते हैं जो राज्य की विधि द्वारा मान्य तथा संरक्षित हैं।

जर्मी बेन्थम (Jeremy Bentham) ने नैतिक तथा विधिक अधिकारों के भेद को स्वीकार नहीं किया है। उनके अनुसार समस्त अधिकार विधिक अधिकार होते हैं और सभी का उद्भव राज्य से होता है। परन्तु निवेदित है कि बेन्थम की यह धारणा भ्रामक प्रतीत होती है क्योंकि नैतिक अधिकारों (moral rights) के अस्तित्व को स्वीकार न करने का अर्थ नैतिक कर्तव्यों को भी अस्वीकार करना होगा। अधिकार तथा कर्तव्य एक दूसरे के सहवर्ती (co-relative) हैं। अनेक कर्तव्य ऐसे हैं जो केवल नैतिक स्वरूप के होते हैं तथा जिनका पालन न किया जाना विधिक दृष्टि से अपकार (wrong) नहीं माना जाता है। उदाहरण के लिए, किसी तैराक द्वारा डूबते हुए बालक को बचाने की कोशिश न करना नैतिक दृष्टि से गलत है किन्तु विधिक दृष्टि से कोई अपकार नहीं है। इसी प्रकार परिसीमा से बाधित ऋण को वसूल करना लेनदार का नैतिक अधिकार है। परन्तु विधिक अधिकार नहीं है।

अधिकार और शक्ति में भेद

हालैंड ने अधिकार को शक्ति (inight) से भिन्न बताते हुए कहा है कि शक्ति में व्यक्ति अपने शारीरिक बल के प्रयोग द्वारा दूसरों को कुछ करने या करने से विमुख रहने की सामर्थ्य रखता है। दूसरे शब्दों में इसमें स्वयं की शक्ति द्वारा किसी को पीडा पहुँचाने या बुरा करने की शक्ति निहित रहती है। परन्तु अधिकार में शक्ति व्यक्ति की स्वयं की न होकर किसी अन्य अर्थात् दैवी शक्ति, नैतिक शक्ति या राज्य की शक्ति के आधार पर वह दूसरों से कुछ कराने या करने से उपरत रहने की सामर्थ्य रखता है। सारांश यह कि हालैंड ने विधिक अधिकार को एक ऐसी सामर्थ्य या क्षमता माना है जिसके द्वारा वह समाज की सहायता से अन्यों के कृत्यों पर उचित नियंत्रण रखने में सफल होता है।

ऑस्टिन ने अधिकार को शक्ति (might) का प्रतीक माना है, क्योंकि उनके विचार से प्रत्येक अधिकार की उत्पत्ति बल या शक्ति से होती है। अधिकार चाहे नैतिक, दैविक या विधिक, इनमें से कोई भी क्यों न हो, इसके साथ एक सहवती कर्तव्य अवश्य जुड़ा रहा है। नि:सन्देह ही यदि इस कर्तव्य के अधिरोपण में बल या शक्ति (might) निहित न हो तो, यह कर्तव्य सारभूत कर्तव्य नहीं रह जाएगा।

अधिकार के संदर्भ में कर्तव्यों का अर्थ

अधिकार और कर्तव्य में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रत्येक अधिकार के साथ एक सहवर्ती कर्तव्य जुड़ा रहता है। सामण्ड ने कर्तव्य की परिभाषा देते हुए कहा है कि यह एक ऐसा बन्धनकारी कार्य होता है जिसका विरोधी शब्द ‘अपकार’ है। दूसरे शब्दों में, कर्तव्य-भंग होने पर अपकार (wrong) उत्पन्न होता है।

कर्तव्य के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए ग्रे (Gray) ने कथन किया है कि विधि का मुख्य उद्देश्य यह है कि लोगों को कुछ विशिष्ट कार्यों को करने या न करने के लिए बाध्य करके मानवीय हितों का संरक्षण किया जाए। अत: उनके अनुसार कार्यों को करने’ या न करने की बाध्यता को ही कर्तव्य कहते हैं।

हिबर्ट (Hibbert) के अनुसार ‘कर्तव्य’ किसी व्यक्ति में निहित वह बाध्यता है जिसके कार्यों को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा राज्य की अनुमति तथा सहायता से नियंत्रित किया जाता है।

कीटन ने कर्तव्य को एक ऐसा कार्य निरूपित किया है, जो किसी दूसरे व्यक्ति के सदर्भ में राज्य द्वारा बलात् लागू किया जाता है और जिसकी अवहेलना करना एक ‘अपकार’ (wrong) है।

4. ‘A duty is roughly speaking an act which one ought to do, an act the opposite of which would be a wrong’. : Salmond Jurisprudence (12th Edn.), p. 216.

5. ग्रे० जे० सी० : नेचर एण्ड सोर्सेज ऑफ लॉ, पृ० 18.

कर्तव्य और अधिकार में परस्पर सम्बन्ध (Co-relation between Duties and Rights)

प्राय: सभी विधिशास्त्री इस बात से सहमत हैं कि प्रत्येक अधिकार के साथ एक सहवर्ती कर्तव्य जुड़ा रहता है। अतः विधिक अधिकार और कर्तव्य के परस्पर सम्बन्ध के विषय में कोई मतभेद नहीं है। अधिकार और कर्तव्य को एक दूसरे के सहवर्ती निरूपित करते हुए उच्चतम न्यायालय ने पंजाब राज्य बनाम रामलुभाया* के वाद में विनिश्चित किया कि एक व्यक्ति का अधिकार दूसरे व्यक्ति का कर्तव्य होता है। अतः स्वस्थ जीवन का अधिकार प्रत्येक नागरिक का अधिकार है और राज्य का कर्तव्य है कि वह नागरिकों की स्वास्थ्य सेवाओं की उचित व्यवस्था करे।

परन्तु उक्त नियम के अपवाद का उल्लेख करते हुए उच्चतम न्यायालय ने एक्स बनाम झेड अस्पताल के वाद में स्पष्ट किया कि यदि एच-आई-वी पाजीटिव से पीड़ित कोई व्यक्ति विवाह करना चाहता है, तो विवाह के अधिकार के साथ-साथ उसका यह कर्तव्य भी है कि वह जिससे विवाह करना चाहता है उसे अपनी इस बीमारी के बारे में बताए। अत: यह ऐसा अधिकार नहीं है जिसके बारे में सहवर्ती कर्त्तव्य की अपेक्षा वह दूसरे व्यक्ति से करे।

सापेक्ष और निरपेक्ष कर्तव्य (Relative & Absolute Duty)

विधिवेत्ताओं में इस बात पर मतभेद है कि प्रत्येक कर्तव्य के साथ सहवर्ती अधिकार का होना अनिवार्य है। परंतु ऑस्टिन (Austin) के अनुसार कर्तव्य सापेक्ष (relative) तथा निरपेक्ष (absolute) , दोनों ही एक प्रकार के हो सकते हैं। सापेक्ष कर्तव्यों (relative duties) से उनका अभिप्राय ऐसे कर्तव्यों से है जिनके साथ कोई सहवर्ती अधिकार अवश्य रहता है। परन्तु कुछ कर्त्तव्य ऐसे होते हैं जिनके साथ किसी प्रकार का सहवर्ती अधिकार नहीं होता है। इन कर्तव्यों को ऑस्टिन ने निरपेक्ष कर्तव्य (absolute duties) कहा है। निरपेक्ष कर्तव्य-भंग को सामान्यत: अपराध माना जाता है जिसके लिए अपराधकर्ता को दण्डित किया जाता है जबकि सापेक्ष कर्तव्य (relative duty) का भंग होना प्राय: एक अपकार (civil wrong) माना जाता है जिसके लिए अपकारित व्यक्ति (victim of the wrong) की क्षतिपूर्ति की जाती है। ऑस्टिन ने निरपेक्ष कर्तव्यों (absolute duties) के निम्नलिखित चार भेद बताये हैं

(1) स्वयं से सम्बन्धित कर्तव्य (self-regarding duties) जैसे किसी व्यक्ति का आत्महत्या न करने का कर्तव्य या नशा न करने का कर्तव्य आदि।

(2) अनिश्चित लोगों या जन-साधारण के प्रति कर्तव्य, जैसे-न्यूसेन्स (nuisance) न करने का कर्त्तव्य

(3) ऐसे कर्तव्य जो मानव जाति के प्रति न होकर अन्य के प्रति होते हैं; जैसे-ईश्वर के प्रति कर्तव्य या पशुओं के प्रति कर्तव्य आदि।

(4) प्रभुताधारी या राज्य के प्रति कर्त्तव्य

कर्तव्यों की निरपेक्षता सम्बन्धी ऑस्टिन के विचारों का डॉ० ऐलन (Allen) ने भी समर्थन किया , परन्तु उन्होंने राज्य के प्रति किये जाने वाले सभी कर्तव्यों को निरपेक्ष नहीं माना है। ऐलन के विचार से प्रभुताधारी की हैसियत से राज्य के जो कार्य होते हैं उनके प्रति किये जाने वाले कर्तव्य निरपेक्ष (absolute duties) होते हैं। परन्तु प्रभुत्व शक्ति के अधीन राज्य द्वारा किये गये कार्यों (sovereign acts) के लिए उसके कर्तव्य ठीक उसी प्रकार होते हैं जैसे कि एक सामान्य व्यक्ति के। दूसरे शब्दों में, राज्य की गैर-प्रभताशक्ति के अधीन किये गये कार्यो (non-sovereign acts) के लिए राज्य कर्तव्यबद्ध रहता है तथा अपकारित व्यक्ति को तत्सम्बन्धी समवर्ती अधिकार प्राप्त हैं। अतः राज्य के ऐसे कर्तव्यों को निरपेक्ष नहीं माना जा सकता।8 हिबर्ट तथा माक्र्सबी (Hibert and Marksby) ने भी ऐलन के इन विचारों से सहमति व्यक्त की है।

6. (1998) 4 एस० सी० सी० 117.

7. (1998) 8 एस० सी० सी० 296.

8. ऐलन : लीगल ड्यूटीज एण्ड सोर्सेज, पृ० 189.

सर सामण्ड, पोलक, कीटन (Keeton) तथा पैटन (Paton) आदि विधिवेत्ताओं ने कर्तव्य की निरपेक्षता को स्वीकार नहीं किया है। सामण्ड के अनुसार कोई भी कर्तव्य किसी भी दशा में निरपेक्ष नहीं हो सकता इस धारणा को भ्रामक मानते हैं कि राज्य के प्रति कर्तव्य निरपेक्ष स्वरूप के होते हैं। पैटन भी इसी विचार समर्थक हैं कि अधिकार और कर्तव्य में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है, अर्थात् एक के सिवाय दूसरे का अस्तित्त्व उतना ही असम्भव है जिस प्रकार कि पिता के बिना पुत्र का उत्पन्न होना । कीटन ने भी इसी विचार का समर्थन किया है कि निरपेक्ष अधिकार-जैसी कोई वस्तु नहीं है तथा अधिकार और कर्तव्य परस्पर सहवर्ती हैं।

कर्तव्यों का वर्गीकरण

विधिक कर्तव्यों को मुख्यत: निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया गया है

1. सकारात्मक तथा नकारात्मक कर्तव्य-सकारात्मक कर्तव्य व्यक्ति को कुछ कार्य करने हेतु अधिरोपित होते हैं जैसे ऋणी व्यक्ति का ऋणदाता को ऋण की अदायगी का कर्तव्य सकारात्मक है। नकारात्मक कर्तव्य के अधीन व्यक्ति, जिस पर कर्तव्य अधिरोपित हैं किसी कार्य को करने से प्रविरत (forbearance) रहता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति किसी भूमि का स्वामी है, तो अन्य व्यक्ति उस व्यक्ति के भूमि के उपयोग में हस्तक्षेप न करने के लिए कर्तव्याधीन है। अत: यह एक नकारात्मक कर्तव्य है।

2. प्राथमिक तथा द्वितीयक कर्तव्य-प्राथमिक कर्तव्य ऐसा कर्तव्य है जो बिना किसी अन्य कर्तव्य के स्वतन्त्र रूप से अस्तित्व में है। उदाहरणार्थ, किसी को उपहति (चोट) न पहुँचाने का कर्तव्य प्राथमिक कर्तव्य है। द्वितीयक कर्तव्य वह कर्तव्य है जिसका प्रयोजन किसी अन्य कर्त्तव्य को प्रवर्तित करना है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को क्षति पहुँचाता है, तो प्रथम व्यक्ति का दूसरे की क्षतिपूर्ति करने का कर्तव्य द्वितीयक कर्तव्य है।

विधिक अधिकार का अर्थ

जैसा कि कथन किया जा चुका है, सामण्ड ने विधिक अधिकार को एक ऐसा हित माना है जिसे राज्य की विधि द्वारा मान्यता प्राप्त है और जो विधि द्वारा संरक्षित है।10 सामण्ड द्वारा दी गई ‘अधिकार’ की इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि विधिक अधिकार का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण उस अधिकार के स्वामी के हित के अस्तित्व में है, जिसे विधि द्वारा संरक्षण प्रदान किया जाता है। हित’ की व्याख्या करते हुए सामण्ड कहते हैं कि “हित वह है जिसका ध्यान रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है तथा जिसकी अवहेलना करना अपकार है।” तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति से यह अपेक्षित है कि वह दूसरों के अधिकारों का सम्मान करे। एक व्यक्ति का अधिकार दूसरे का कर्तव्य होता है क्योंकि प्रत्येक अधिकार के साथ एक सहवर्ती कर्तव्य (correlative duty) जुड़ा रहता है।11 किसी व्यक्ति द्वारा अपने विधिक कर्तव्य का पालन न किया जाना या दूसरे के विधिक अधिकार में अनुचित हस्तक्षेप या अतिक्रमण करना अपकृत्य’ (wrong) होगा। सामण्ड के अनुसार मनुष्य का ऐसा कार्य जो अधिकार तथा न्याय के नियम के प्रतिकूल होता है, अपकृत्य (wrong) कहलाता है।

जॉन ऑस्टिन के अनुसार किसी व्यक्ति का अधिकार तब माना जाता है जब अन्य व्यक्ति उसके प्रति कुछ करने या न करने के लिये बाध्य या दायित्वाधीन होते हैं। परन्तु इस परिभाषा की आलोचना इस आधार पर की गयी है कि इसमें विधिक अधिकार में सन्निहित ‘हित’ (interest) के तत्व की पूर्णत: अनदेखी की गयी है। इस आलोचना को उचित ठहराते हुये जॉन स्टुअर्ट मिल (John Stuart Mill) ने उदाहरण के रूप में | अभिकथन किया है कि जब किसी कैदी को मृत्युदण्ड से दण्डित किया जाता है, तो जेलर कर्तव्यबद्ध होगा। कि वह उस कैदी को फांसी पर लटकाये, तो इस स्थिति में क्या यह कहना उचित होगा (जैसा कि आस्टिन |

9. पैटन जी० डब्ल्यू० : ए टेक्स्ट बुक ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स (द्वितीय संस्करण), पृ० 219.

10. सामण्ड : ज्यूरिसपूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 218.

11. राजस्थान बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, ए० आई० आर० 1977 सु० को० 1361.

की परिभाषा दर्शाती है) कि फांसी पर लटकाया जाना उस कैदी का विधिक अधिकार है। वस्तुत: यह विधि  द्वारा अधिरोपित (Imposed by law) निर्योग्यता-मात्र (disability) है न कि कोई विधिक अधिकार।

हॉलैण्ड ने विधिक अधिकार को परिभाषित करते हुये कहा है कि यह व्यक्ति को प्राप्त वह सामर्थ्य या क्षमता है, जो उसे राज्य की अनुमति और सहायता से अन्य व्यक्तियों के कार्यों को नियन्त्रित रखने हेतु प्राप्त है। इस प्रकार स्पष्ट है कि हॉलैण्ड ने विधिक अधिकार में सन्निहित प्रवर्तन (enforcement) के तत्व पर अधिक जोर दिया है जबकि सामण्ड विधिक अधिकार को राज्य द्वारा मान्यता (recognition) दिये जाने के तत्व को अधिक महत्व देते हैं।

इहरिंग (Ihring) ने विधिक अधिकार को राज्य द्वारा मान्य संरक्षित हित निरूपित किया है। यह स्वयं लक्ष्य न होकर एक साधन मात्र है।

पेटन (G.W. Paton) ने भी इस बात से सहमति व्यक्त की है कि अधिकार का एक प्रमुख तत्व यह है। कि वह राज्य की विधिक प्रक्रिया (legal process) द्वारा प्रवर्तनीय होना चाहिये। तथापि, उन्होंने इसके तीन अपवादों का उल्लेख किया है जो निम्नानुसार है

(1) यह आवश्यक नहीं है राज्य सदैव आवश्यक रूप से ही अधिकार का प्रवर्तन कराये, इसके बजाय वह क्षतिग्रस्त व्यक्ति को अपकारकर्ता से प्रतिकर (compensation) भी दिला सकता है।

(2) कतिपय ऐसे अधिकार होते हैं, जो अपूर्ण अधिकार (imperfect rights) कहलाते हैं। इन्हें राज्य मान्य (recognize) करता है लेकिन प्रवर्तित नहीं करा सकता। उदाहरणार्थ, परिसीमा बाधित ऋण (Time-barred debt), क्योंकि यह समय-सीमा समाप्त हो जाने पर अपूर्ण अधिकार में परिवर्तित हो जाता है।

(3) कुछ विधियां ऐसी हैं जो न्यायालय को यह शक्ति प्रदान नहीं करतीं कि वह अधिकार के प्रवर्तन हेतु आदेश पारित करे। उदाहरणार्थ, अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय को यह अधिकारिता प्राप्त नहीं है कि वह स्वयं द्वारा पारित डिक्रियों का प्रवर्तन करा सके।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ12 के वाद में विधिक अधिकार की परिभाषा देते हुये अभिकथन किया है कि सही अर्थ में विधिक अधिकार विधिक कर्तव्य का सहवर्ती (corelated) है और यह ऐसा हित है जो विधि द्वारा अन्यों को तदनुरूप कर्तव्यों (corresponding duties) का पालन करने के लिये अधिरोपित करके, संरक्षित किया जाता है। इसका अर्थ है कि किसी अन्य की विधिक शक्ति से उन्मुक्ति को विधिक अधिकार कहा जा सकता है। उन्मुक्ति से आशय अधीनस्थता (subjection) से छूट है।

विधिक अधिकार और अनुमति (permission) में विभेद करते हुये मार्टिन ने कहा है कि ये दोनों एकदूसरे से भिन्न हैं। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य की भूमि में उसकी अनुमति से प्रवेश करता है, तो वह उस व्यक्ति की अनुज्ञा (licence) के कारण करता है न कि स्वयं के अधिकार के कारण।

मिस्टर ‘X’ बनाम अस्पताल ‘Y:13 के बाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि विधिक अधिकार व्यक्ति का ऐसा हित है जो राज्य द्वारा मान्य एवं प्रवर्तनीय है। इस हित का सम्मान करना प्रत्येक व्यक्ति का विधिक कर्तव्य है। यदि किसी व्यक्ति में कोई विधिक अधिकार निहित है, तो वह इस अधिकार के संरक्षण के लिये अन्य व्यक्ति से तदनुरूप इस कर्तव्य की मांग कर सकता है कि उसके अधिकार में हस्तक्षेप करने से परावृत्त रहे।

इस वाद में अपीलार्थी के निजी अधिकार तथा प्रत्युत्तरदाता हास्पिटल ‘Y’ के निजता बनाये रखने के *य के बीच टकराव न्यायालय के समक्ष विचाराधीन था। इस प्रकरण में अपीलार्थी का रक्त किसी अन्य

12. ए० आई० आर० 1977 सु० को० 1361.

13. (1998); एस० सी० सी० 296.

व्यक्ति को दिया जाना था इसलिये जब रक्त परीक्षण किया गया, तो वह HIV + पाया गया। अस्पताल ४ दाना इसकी सूचना अपीलार्थी की मंगेतर को दी जाने पर उसकी सगाई टूट गयी और समाज में उसकी उपेक्षा होने लगी। इससे व्यथित होकर अपीलार्थी ने हास्पिटल ‘Y’ के विरुद्ध राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम में वाद प्रस्तत करते हुए कहा कि Y द्वारा उसके निजी अधिकार (Right of privacy) का उल्लंघन किये जाने के कारण ? ने इसे गुप्त रखने की अपेक्षा कर्तव्य भंग किया। इस पर राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम (NCDC) ने वाद खारिज करते हुये निर्णय दिया कि यह प्रकरण उपभोक्ता संरक्षण से सम्बन्धित न होकर सिविल न्यायालय द्वारा निर्णीत किया जाना चाहिये। इस पर अपीलार्थी ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की। उसका तर्क था कि हास्पिटल ‘Y’ ने उसके HIV + होने की बात गुप्त न रखने के कारण उसके प्रति कर्तव्य भंग किया है जिससे उसके निजता के अधिकार का हनन हुआ है। उच्चतम न्यायालय ने अपील खारिज करते हुये अभिकथन किया कि हास्पिटल ‘Y’ ने AIDS की सूचना अपीलार्थी की मंगेतर को देकर किसी कर्तव्य का उल्लंघन नहीं किया था क्योंकि उसकी होने वाली पत्नी को इसकी सूचना देना उसका कर्तव्य था ताकि वह भी AIDS के संक्रमण से बच जाये। इसके उलटे जो व्यक्ति AIDS से पीड़ित होते हुये भी इस तथ्य को छिपाकर विवाह करने जा रहा है वही दोषी है।

विधिक अधिकार के सिद्धान्त (Theories of Legal Rights)

विधिक अधिकारों के संदर्भ में इनसे संबंधित दो सिद्धान्तों का विवेचन करना उपयुक्त होगा, जो

(1) हित-सिद्धान्त, तथा (2) इच्छा सिद्धान्त कहलाते हैं।

1. हित-सिद्धान्त (Interest Theory)

इहरिंग (Ihering) ने विधिक अधिकार को ‘हित’ पर आधारित माना है। उनके अनुसार अधिकार विधि द्वारा संरक्षित हित है।’ विधि का मूल उद्देश्य मानवीय हितों का संरक्षण करते हुए मानव के परस्पर विरोधी हितों के संघर्ष को टालना है। परन्तु सामण्ड ने इहरिंग द्वारा दी गई ‘अधिकार’ की परिभाषा को अपूर्ण मानते हुए कहा है कि विधिक अधिकार के लिए केवल विधिक संरक्षण दिया जाना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसे वैधानिक मान्यता भी प्राप्त होनी चाहिये। इस तर्क की पुष्टि सामण्ड एक दृष्टान्त द्वारा करते हैं। उनके विचार से पशुओं के प्रति क्रूरतापूर्ण व्यवहार करना विधि द्वारा निषिद्ध (prohibited) है तथा इसके लिए दोषी व्यक्ति को दण्डित किये जाने का प्रावधान है।14 अत: क्या यह कहना उचित होगा कि पशुओं को आत्म सुरक्षा का विधिक अधिकार प्राप्त है? आशय यह है कि पशुओं सम्बन्धी इस अधिकार को विधिक संरक्षण प्राप्त है, परन्तु । विधिक मान्यता प्राप्त न होने के कारण इसे ‘विधिक अधिकार’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। यही कारण है कि सामण्ड ने पशुओं के इस अधिकार को केवल नैतिक अधिकार के रूप में ही स्वीकार किया है |

विख्यात विधिशास्त्री ग्रे भी सामण्ड के अधिकार सम्बन्धी विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए बिना नहीं रहे, परन्तु फिर भी उन्होंने इसे केवल आंशिक रूप में स्वीकार करना ही उचित समझा। ग्रे के अनुसार ‘अधिकार’ स्वयं हित नहीं है अपितु ‘हित’ को संरक्षित करने वाला एक साधन मात्र है। विधिक अधिकार को परिभाषित करते हुए ग्रे (Gray) कहते हैं कि ”यह वह शक्ति है जिसमें कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को किसी कार्य या कार्यों को करने या न करने के लिए उस सीमा तक बाध्य कर सकता है, जहाँ तक समाज से उसे यह शक्ति अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों पर लागू करते हुए प्राप्त होती है।”15 इस प्रकार ग्रे विधिक अधिकार को एक ऐसी शक्ति मानते हैं जिसके आधार पर कोई व्यक्ति किसी विषय पर अपनी इच्छा की पूति के लिए न्यायालय की सहायता प्राप्त कर सकता है। अत: ऋणी व्यक्ति से धन वापस पाना ऋणदाता का हित है। जो विधि द्वारा संरक्षित है परन्तु यह हित ही स्वयं विधिक अधिकार नहीं है बल्कि केवल लक्ष्य या उद्देश्य मात्र है। ऋण प्राप्त करने की क्षमता या शक्ति ही उसका वास्तविक विधिक अधिकार है।

14. भारत का पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960.

15. ग्रे ० जे० सी० : नेचर एण्ड सोर्सेस ऑफ लॉ, पृ० 18.

2. इच्छा सिद्धान्त (Will Theory)

हीगल, कान्ट तथा ह्यम आदि विधिशास्त्रियों ने विधिक अधिकार सम्बन्धी हित सिद्धान्त का समर्थन = करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति का अधिकार उसकी इच्छा को प्रदर्शित करता है। पुश्ता (Puchta) ने यह । विचार व्यक्त किया कि अधिकार के माध्यम से व्यक्ति किसी वस्तु पर अपनी इच्छा शक्ति को अभिव्यक्त करता है। जर्मनी के ऐतिहासिक विधिशास्त्र के समर्थकों ने अधिकार सम्बन्धी इच्छा सिद्धान्त को स्वीकार किया है।

ड्यूगिट ने इच्छा-सिद्धान्त की आलोचना करते हुए सामाजिक समेकता (social solidarity) को ही। अधिकार का मूल स्रोत माना है। वे इच्छा को अधिकार का एक महत्वपूर्ण तत्व मात्र मानते हैं। पैटन ने भी। इच्छा को अधिकार के एक तत्व के रूप में ही स्वीकार किया है।

हॉलैण्ड ने ग्रे के विचारों का समर्थन करते हुए कहा है कि, “विधिक अधिकार किसी व्यक्ति में रिहित । वह क्षमता है जिससे वह राज्य की सहमति और सहायता से अन्य व्यक्तियों के कृत्यों को नियंत्रित करा सकता है।”16 हॉलैण्ड के अनुसार विधिक अधिकार को राज्य की शक्ति से वैधानिकता प्राप्त होती है। इस प्रकार वे विधिक अधिकार को नैतिक अधिकार से पूर्णतः भिन्न मानते हैं।

विनोग्रेडॉफ (Vinogradoff) ने मनोवैज्ञानिक परिस्थिति को अधिकारों का आधार माना है। उनके अनुसार दावे (claim) की मानसिक प्रवृत्ति ही अधिकारों का आधार है। विधि द्वारा स्थापित सामाजिक व्यवस्था में . किसी भी व्यक्ति को अपने कार्यों के लिए पूर्ण स्वच्छन्दता प्राप्त नहीं होती, बल्कि दूसरे के अधिकारों के कारण। उसे अपने कार्यों को करने की केवल सीमित स्वतन्त्रता प्राप्त होती है।

ऑस्टिन के अनुसार किसी व्यक्ति के अधिकार का अर्थ यह है कि दूसरे व्यक्ति उसके सम्बन्ध में कुछ करने या न करने के लिए विधि द्वारा बाध्य हैं। स्पष्टत: ऑस्टिन द्वारा दी गई अधिकार की यह परिभाषा राज्य । की प्रभुताशक्ति पर आधारित है। ऑस्टिन ने कर्तव्य की व्याख्या करते हुए कथन किया है कि यह एक ऐसा दायित्व है जिसकी अवहेलना की जाने पर इसके साथ सम्बद्ध शास्ति के कारण यह दण्डनीय है। परन्तु जॉन स्टुअर्ट मिल (Stuart Mill) ने ऑस्टिन के उपर्युक्त विचार की आलोचना इस आधार पर की है कि अधिकार के साथ हित सन्निहित होना प्रायः अनिवार्य है।

अमेरिका के न्यायाधिपति जस्टिस डगलस होम्स के अनुसार विधिक अधिकार कतिपय दशाओं में प्राकृतिक शक्तियों का प्रयोग करने की अनुमति मात्र है, जिससे लोक-बल (public force) के आधार पर संरक्षण, प्रत्यास्थापन या प्रतिकर प्राप्त करने का अधिकार मिल सके।

विधिक अधिकार सम्बन्धी सामान्य धारणाएँ।

विधिक अधिकारों के विषय में विधिवेत्ताओं के उपर्युक्त विचारों के आधार पर इनके बारे में कुछ > सामान्य धारणाएँ स्थापित हो चुकी हैं जिनका उल्लेख करना आवश्यक है

(1) विधिक अधिकार राज्य द्वारा प्रदत्त संरक्षण है

(Right is a protection afforded by the State)

इस धारणा के समर्थकों का कहना है कि विधिक अधिकार की मुख्य विशेषता यह है कि वह राज्य की विधि-व्यवस्था द्वारा मान्य तथा संरक्षित होना चाहिये; अर्थात् यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के अधिकार में हस्तक्षेप या अतिक्रमण करता है, तो राज्य द्वारा उसके अधिकार की रक्षा की जानी चाहिये। पैटन (Paton) के विचार से प्रत्येक विधिक अधिकार की आवश्यक शर्त यह है कि राज्य की विधिक प्रक्रिया द्वारा वह प्रवर्तनीय होना चाहिये। परन्तु वे इस कथन के अपवादों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि- । | (i) यह आवश्यक नहीं कि राज्य की विधि सदैव ही व्यक्तियों के अधिकारों का प्रवर्तन कराये, अनेक मामलों में वह अपकारित व्यक्ति (injured party) को केवल प्रतिकर (compensation) का उपचार ही दिलाती है।

16. हालैण्ड टी० ई० : एलीमेण्ट्स ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स, पृ० 79.

(ii) कुछ अधिकार अपूर्ण (imperfect) होते हैं जिन्हें विधि द्वारा मान्य तो किया जाता है, परन्तु उनका । प्रवर्तन नहीं करवाया जा सकता है। उदाहरणार्थ, अवधि सीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) द्वारा निर्धारित अवधि बीत जाने पर ऋणदाता को ऋणी व्यक्ति से ऋण की राशि प्राप्त करने का अधिकार है, किन्तु यह एक अपूर्ण अधिकार है क्योंकि इसका विधि द्वारा प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता है। परन्तु यदि ऋणी व्यक्ति अवधि बाधित (time barred) ऋण की राशि की अदायगी ऋणदाता को कर देता है, तो बाद में वह उस अदा की गई राशि को वापस प्राप्त करने के लिए इस आधार पर वाद नहीं ला सकता कि वह ऋण परिसीमा से बाधित होने के कारण उसकी अदायगी करने के लिए वह बाध्य नहीं था। इसी प्रकार परिसीमा से बाधित ऋण को किसी पश्चात्वर्ती लिखित स्वीकृति पत्र द्वारा पुनर्जीवित किया जा सकता है, भले ही उसके लिए कोई नया प्रतिफल निर्धारित न किया गया हो।

(iii) कुछ विधियां (कानून) ऐसी भी हैं जिनके अन्तर्गत अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए। न्यायालयों के पास समुचित नियंत्रण शक्ति नहीं होती। उदाहरणार्थ, अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अधीन अन्तर्राष्ट्रीय । न्यायालय में यह सामर्थ्य नहीं है कि वह अपनी डिक्री या आदेशों का प्रवर्तन करा सके।

2. विधिक अधिकार मानवीय इच्छा का अन्तर्निहित लक्षण है

(Right is an inherent attribute of human will)

विधिक अधिकार सम्बन्धी इस धारणा का समर्थन अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधिपति डगलस होम्स (Duglus Holmes) ने किया है। उन्होंने विधिक अधिकार को मानवीय इच्छा का प्रतीक माना है। हॉलैण्ड ने भी विधिक अधिकार के प्रति वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण (objective view) अपनाते हुए इसे मनुष्य के सामर्थ्य का प्रतीक माना है जिससे वह राज्य की सहायता से दूसरे व्यक्ति के कार्यों को नियन्त्रित करा सकता।

फ्रांस के विख्यात विधिवेत्ता ड्यूगिट (Duguit) विधिक अधिकार को मानवीय इच्छा पर आधारित नहीं मानते । इस सिद्धान्त की आलोचना करते हुए वे कहते हैं कि विधिक अधिकार को मानव इच्छा पर आधारित मानना उचित नहीं है क्योंकि विधि का वास्तविक स्रोत तो सामाजिक एकात्मकता (social solidarity) में है। अत: ड्यूगिट अधिकार के अस्तित्व को पूर्णतः अस्वीकार करते हुए कहते हैं कि मनुष्य के अधिकार होते ही नहीं, बल्कि केवल कर्तव्य ही होते हैं। ड्यूगिट (Duguit) मानवीय इच्छा को समाज विरोधी धारणा मानते हैं क्योंकि वह मनुष्य में परस्पर संघर्ष के लिए कारणीभूत होती है। अतः सुस्थापित समाज में विधि द्वारा केवल मनुष्यों के कर्तव्यों को ही निर्धारित किया जाता है तथा अधिकार की परिकल्पना (concept of right) को कोई स्थान नहीं है ।17 ड्यूगिट के अनुसार विधि सामाजिक समेकता (social solidarity) तथा समाज को गठित करने वाले व्यक्तिगत सदस्यों के अनुशासन की अभिव्यक्ति की प्रतीक होती है। उनका मानना है कि विधि प्रत्येक व्यक्ति से यह आशा करती है कि वह अपने कर्तव्यों का पालन करे तथा उसे अधिकारों की याचना करने का कोई अधिकार नहीं है। इसीलिए वे अधिकार की धारणा को अनैतिक, अराजकतावादी तथा समाज-विरोधी मानते हुए उसे विधि से बहिष्कृत किये जाने पर बल देते हैं।

ड्यूगिट की विधिक अधिकार के अनस्तित्व (absence of right) सम्बन्धी धारणा से अनेक विधिशास्त्रियों ने असहमति व्यक्त की है। लास्की के विचार से ड्यूगिट का अधिकार सम्बन्धी सिद्धान्त पारिभाषिक आत्मनिष्ठ अधिकार का विरोध करता है न कि तथ्यगत अधिकार का।18 डॉ० एडवर्ड जेन्क्स (Dr. Edward Jerks) ने ड्यूगिट के विचारों की आलोचना करते हुए लिखा है कि इसमें सन्देह नहीं कि राज्य का प्रमख कार्य कर्तव्यों को प्रवर्तित कराना है परन्तु ये कर्तव्य लोगों के हितों के लिए ही प्रवर्तित कराये जाते हैं। दसरे शब्दों में, जब अपकारित व्यक्ति राज्य के माध्यम से कर्तव्य का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को दण्डित ।

17. पैटन : ए टैक्स्ट बुक ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स, पृ० 222.

18. हेरोल्ड लॉस्की : ड्यूगिट्स कान्सेप्शन ऑफ दि स्टेट इन मॉडर्न थ्योरीज ऑफ लॉ, पृ० 52.

किये जाने की याचना करता है, तो अपकारित व्यक्ति में उल्लंघनकारी से कर्तव्यों का पालन कराने की जो शक्ति है, उसे विधिक अधिकार कहा जाता है।9।

(3) विधिक अधिकार का आधार हितहै (Interest is the basis of a legal right)

अनेक विधिशास्त्री मानवीय हित (human interest) को विधिक अधिकार का मूल आधार मानते हैं। तथा अधिकार की धारणा में ‘इच्छा’ के तत्व को स्वीकार नहीं करते। इस मत के मुख्य समर्थक बकलैण्ड, इहरिंग तथा सामण्ड आदि हैं। बकलैण्ड (Buckland) के विचार से ‘विधि द्वारा संरक्षित हित या आकांक्षा को ही विधिक अधिकार कहा जाता है।’20 इहरिंग (Ihering) ने भी इसी विचार का समर्थन किया है। विधिक अधिकार में ‘इच्छा’ के औपचारिक तत्व को अस्वीकार करते हुए इहरिंग ने कहा है कि एक शिशु या मूढ़ व्यक्ति की कोई इच्छा नहीं होती फिर भी विधि द्वारा उसे विधिक अधिकार प्राप्त होते हैं। सामण्ड ने विधिक अधिकार को एक ऐसा हित कहा है जो विधि के नियमों द्वारा मान्य तथा संरक्षित है।21

विधिक अधिकार सम्बन्धी उपर्युक्त तीन धारणाओं के विश्लेषण के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि इनमें प्रथम एवं तृतीय वस्तुतः एक ही सिद्धान्त के दो पहलू हैं। पहला राज्य के संरक्षण को ‘अधिकार’ का आवश्यक तत्व मानता है जबकि तीसरा राज्य द्वारा संरक्षित हित को। अत: वास्तविक दृष्टि में विधिक अधिकार सम्बन्धी केवल दो ही सिद्धान्त हैं जो क्रमशः ‘इच्छा शक्ति तथा संरक्षित हित’ पर आधारित हैं। इन दोनों सिद्धान्तों में समन्वय स्थापित करते हुए डॉ० ऐलन (Allen) कहते हैं कि विधिक अधिकार किसी हित को प्राप्त करने के लिए विधि द्वारा प्रत्याभूत शक्ति है

विधिक अधिकार के आवश्यक तत्व (Elements of a Legal Right)

सामण्ड के अनुसार विधिक अधिकार में निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है

(1) अधिकार का धारणकर्ता (Person of inherence)

विधिक अधिकार किसी व्यक्ति में निहित होता है। ऐसे व्यक्ति को संदर्भानुसार अधिकार का स्वामी या उसका कर्ता (subject of right) अथवा हकदार व्यक्ति (person of inherence) कहा जाता है। बिना व्यक्ति के विधिक अधिकार का अस्तित्व नहीं हो सकता। तथापि यह आवश्यक नहीं कि अधिकार का हकदार व्यक्ति कोई निश्चित या निर्धारित व्यक्ति ही हो। उदाहरण के लिये, अजन्मा बालक (unborn child) भी अधिकार का हकदार हो सकता है, यद्यपि उसके जीवित जन्म लेने के बारे में कोई निश्चितता नहीं रहती है। इसी प्रकार किसी संस्था या समिति के विधिक अधिकार हो सकते हैं भले ही उसके सदस्यों की संख्या अनियत हो

2. अधिकार से आबद्ध व्यक्ति (Person of incidence)

विधिक अधिकार का प्रयोग किसी व्यक्ति के विरुद्ध किया जाता है। ऐसे व्यक्ति पर तत्सम्बन्धी कर्तव्य करने का भार होता है। अत: जिस व्यक्ति को कर्तव्य करते हुए अधिकार का भार वहन करना पड़ता है उसे ‘कर्तव्य का कर्ता’ (subject of duty) या अधिकार से आबद्ध व्यक्ति कहते हैं।

(3) अधिकार की अन्तर्वस्तु (Contents of legal right)

विधिक अधिकार आबद्ध व्यक्ति को हकदार व्यक्ति के पक्ष में कोई कार्य करने या न करने के लिए बाध्य करता है। इस प्रकार कार्य (act) या कार्यलोप (omission) को अधिकार की अन्तर्वस्तु कहते हैं।

19. जेन्क्स, एडवर्ड : दि न्यू ज्यूरिसपूडेन्स, पृ० 176.

20. “Legal right is an interest or an expectation guaranteed by law.”-Buckland.

21. “Right’ is an interest recognised and protected by a rule of justice.–Salmond.

22. ऐलन : लीगल ड्यूटीज, पृ० 183.

(4) अधिकार की विषय-वस्तु (Subject-matter of right)

अधिकार के धारणकर्ता को जो विधिक अधिकार रहता है, वह किसी वस्तु’ (object) से सम्बन्धित होता है। परन्तु हॉलैण्ड का मत है कि सभी विधिक अधिकारों में इस तत्व का होना आवश्यक नहीं है 23 उदाहरणार्थ ‘ख’ ‘क’ का नौकर है। यहाँ ‘क’ अधिकार का धारणकर्ता है तथा ‘ख’ उस अधिकार से बाध्य व्यक्ति है। ‘ख’ द्वारा ‘क’ की सेवा की जाना अधिकार की अन्तर्वस्तु (contents) है। परन्तु इसमें अधिकार की विषय-वस्तु (subject matter of might) कहीं नहीं है।

अधिकार की विषय-वस्तु निश्चित, अनिश्चित अथवा प्रत्यक्ष या परोक्ष, कैसी भी हो सकती है, जैसे ‘ख्याति’, “कौशल’, ‘ज्ञान’ आदि किसी व्यक्ति के अधिकार की विषय-वस्तु हो सकती है जिसका कोई निश्चित स्वरूप नहीं है।

(5) अधिकार का स्वत्व या हक‘ (Title of the right)

प्रत्येक विधिक अधिकार के साथ अधिकार के धारणकर्ता का स्वत्व या ‘हक’ (title) जुड़ा होता है। स्वत्व (title) उन तथ्यों अथवा घटनाओं से उत्पन्न होता है जिनके कारण विधिक अधिकार धारणकर्ता में । निहित होता है।

विधिक अधिकार के उपर्युक्त तत्वों को अधिक स्पष्ट करते हुए सामण्ड (Salmond) एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यदि ‘क’ कोई जमीन ‘ख’ से खरीदता है, तो इस दृष्टान्त में ‘क’ अधिकार का धारणकर्ता या स्वामी है। चूंकि इस प्रकार के अधिकार का प्रयोग समस्त विश्व के विरुद्ध किया जाता है, अतः इस उदाहरण में समस्त व्यक्ति कर्तव्य से आबद्ध हैं। ‘क’ को खरीदी हुई भूमि का अनन्य उपयोग करने सम्बन्धी जो अधिकार प्राप्त है, उसे अधिकार की अन्तर्वस्तु कहा जायेगा। क्रय की गई भूमि अधिकार की विषय-वस्तु है। तथा उस भूमि के अधिकार का स्वत्व वह अन्तरण-पत्र है जिसके द्वारा ‘क’ ने ‘ख’ से जमीन का स्वामित्व अर्जित किया है।

उपर्युक्त दृष्टान्त से यह स्पष्ट है कि प्रत्येक अधिकार में तीन प्रकार के सम्बन्ध अन्तर्निहित होते हैं

(1) यह किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के विरुद्ध अधिकार होता है;

(2) यह ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा कोई कृत्य करने (act) या न करने (omission) का अधिकार होता है, |

(3) वह जिस वस्तु से सम्बन्धित यह कृत्य या अकृत्य (act or omission) है, उस पर या उसके बारे में अधिकार होता है।

कुछ ऐसे अधिकार भी हैं जो व्यक्ति के स्वयं के प्रति हैं। उदाहरणार्थ, प्रत्येक व्यक्ति का यह अधिकार होता है कि उसकी मृत्यु कारित न की जाये, और इस अधिकार की विषयवस्तु उस व्यक्ति का जीवन (life) है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है कि उसके विरुद्ध प्रहार (हमला) न किया जाये या उसे धोखा न दिया जाये या अपमानित न किया जाये। प्रत्येक व्यक्ति का यह भी अधिकार है कि उसकी अचल सम्पत्ति, जिसका वह उपभोग (enjoyment) कर रहा है, उसमें कोई अन्य व्यक्ति अनुचित हस्तक्षेप न करे।

हॉलैण्ड के विचार से विधिक अधिकार में उपर्युक्त तत्वों में केवल चार तत्व होना ही आवश्यक है तथा वे ‘स्वत्व’ या ‘हक’ को अधिकार का आवश्यक तत्व नहीं मानते हैं। जी० डब्ल्यू० कीटन (G. W. Keeton) का भी यही मत है कि स्वत्व या हक अधिकार का साक्ष्य या अधिकार का स्रोत मात्र होता है, अतः इसे अधिकार का स्वत्व नहीं माना जा सकता है। इन विद्वानों के अनुसार विधिक अधिकार में निम्नलिखित चार तत्व होने चाहिये

1. वह व्यक्ति जिसमें अधिकार निहित है,

23. हॉलैण्ड : एलीमेन्ट्स ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स, पृ० 245.

2. अधिकार किसी कार्य या कार्य के लोप से सम्बद्ध होता है, ।

3. अधिकार की विषय-वस्तु, तथा

4. एक या अनेक व्यक्ति जिनके विरुद्ध अधिकार का प्रयोग किया जा सके; अर्थात् अधिकार द्वारा आबद्ध व्यक्ति ।

क्या स्वामीविहीन अधिकार सम्भव है? (Can there be an ownerless Right?)

इंग्लिश विधि स्वामीविहीन अधिकार को स्वीकार नहीं करती क्योंकि स्वामी (धारणकर्ता) के बिना विधिक अधिकार का अस्तित्व असम्भव है। तथापि अधिकार का स्वामी अनिश्चित (uncertain) या समाश्रित (contingent) व्यक्ति हो सकता है। उदाहरणार्थ, एक अजन्मा बालक (unborn child) भी अधिकार का स्वामी (धारणकर्ता) हो सकता है यद्यपि उसके जन्म लेने या जीवित रहने के विषय में कोई निश्चितता नहीं। रहती है।

विधिक अधिकार के सम्बन्ध में दूसरा विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या विषय-वस्तु (object) के बिना विधिक अधिकार सम्भव है? अधिकार के संदर्भ में विषय-वस्तु (object) से आशय ऐसी पार्थिव वस्तु से है। जिससे वह अधिकार उद्भवित होता है; सामण्ड के अनुसार अधिकार की विषय-वस्तु (object) केवल पार्थिव वस्तुएँ (material objects) ही हो सकती हैं। परन्तु हालैण्ड के विचार से अनेक अधिकार ऐसे होते हैं जिनमें विषय-वस्तु (object) अन्तर्भूत तत्व के रूप में विद्यमान नहीं रहती है, जैसे कीर्ति का अधिकार, नौकर से सेवा प्राप्त करने का अधिकार, माता-पिता का अपने बच्चों पर अधिकार या पति का पत्नी पर दाम्पत्तिक अधिकार आदि। परन्तु निवेदित है कि इन अधिकारों से सम्बन्धित व्यक्ति ही अधिकार की विषयवस्तु है। किसी विधिक अधिकार में विषय-वस्तु का होना उतना ही आवश्यक है जितना कि अधिकार के स्वामी का होना। सारांश यह है कि विषय-वस्तु के बिना अधिकार का होना सम्भव नहीं है। हाँ, यह अवश्य है कि अधिकार की विषय-वस्तु किसी पदार्थ के रूप में हो सकती है अथवा वह व्यक्ति के रूप में भी हो सकती है।

क्या राज्य के विरुद्ध अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है? (Can a Right be used against the State?)

विधिक अधिकार के संदर्भ में एक अन्य महत्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या अधिकारों का प्रयोग राज्य (State) के विरुद्ध किया जा सकता है? ऑस्टिन (Austin) के विचार से राज्य के विरुद्ध प्रजा के कोई अधिकार नहीं हो सकते हैं। उनके अनुसार किसी भी विधिक अधिकार में तीन पक्षों का होना आवश्यक होता है जिन्हें क्रमशः (1) अधिकार का धारणकर्ता (bearer of right), (2) कर्त्तव्य को धारण करने वाला (bearer of the duty) तथा (3) अधिकार लागू करने वाली प्रभुता-शक्ति जिसे ‘राज्य’ कहा जाता है। अत: यदि कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध अधिकार का प्रयोग करना चाहता है, तो उस स्थिति में स्वयं ही कर्तव्य का धारक (bearer of duty) होने के कारण प्रभुताधारी की भूमिका कैसे निभा सकेगा? उल्लेखनीय है कि ऑस्टिन ने राज्य को सर्वोच्च प्रभुताधारी माना है जिससे उच्चतर कोई और अन्य शक्ति नहीं होती तथा राज्य से अपने कर्तव्यों का पालन कराने के लिए किसी अन्य बाहरी शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता है । कारण है कि ऑस्टिन के अनुसार राज्य के विरुद्ध प्रजा कोई अधिकार नहीं रख सकती है। सम्भवतः ऑस्टिन के इस निष्कर्ष का आधार यह था कि सन् 1947 के क्राउन प्रोसीडिंग्स एक्ट के पूर्व इंग्लैण्ड में सम्राट के विरुद्ध किसी भी प्रकार का वाद नहीं लाया जा सकता था। अपकृत्यों के लिए राज्य को पूर्ण उन्मक्ति (Immunity) प्राप्त थी तथा राज्य द्वारा की गई संविदाओं के सम्बन्ध में केवल सम्राट (Crown) की पर्वानमति सही वाद संस्थित किया जा सकता था। परन्तु निवेदित है कि सन् 1947 के इस अधिनियम के बाद राज्य के काया के लिए जो सामान्य व्यक्ति द्वारा किये जा सकते हैं, वाद लाया जा सकता है। इसका अर्थ यह हुआ । राज्य स्वयं पर कर्तव्य का अधिरोपण (imposition) कर सकता है। अतः राज्य के विरुद्ध प्रजा के अधिकारों को मान्यता देने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये।

सामण्ड ने राज्य के विरुद्ध अधिकार के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए सुझाव दिया है कि इन अधिकारों को अपूर्ण अधिकार (imperfect right) माना जाना चाहिये क्योंकि इन्हें राज्य की स्वयं की सहायता से लागू किया जाता है। यदि इन्हें लागू करने में राज्य की सहायता प्राप्त न हो, तो उस दशा में इन अधिकारों को न्यायालयीन मान्यता प्राप्त होते हुए भी इनका प्रवर्तन सम्भव नहीं होगा।

फेड्रिक पोलक (Pollock), जेन्क्स (Jenks) तथा जेथ्रो ब्राउन (Jethro Brown) आदि विधिवेत्ताओं ने भी राज्य के विरुद्ध प्रजा के अधिकारों को मान्यता दी है। भारतीय संविधान के भाग III में उन मूलभूत अधिकारों का उल्लेख है जो नागरिकों को राज्य के विरुद्ध प्राप्त हैं। अमेरिका के संविधान में भी मूलभूत अधिकारों सम्बन्धी व्यवस्था है।

विधिक अधिकारों का प्रवर्तन (Enforcement of Legal Rights)

विधिक अधिकारों का प्रवर्तन राज्य द्वारा स्थापित न्यायालयों के माध्यम से कराया जाता है। सामान्यत: इन अधिकारों का प्रवर्तन सिविल वादों में न्यायालय द्वारा अपकारित (व्यथित) व्यक्ति को प्रतिकर या क्षतिपूर्ति दिलाकर कराया जाता है। यदि न्यायालय क्षतिपूर्ति को अपर्याप्त उपचार मानता है, तो वह क्षतिग्रस्त व्यक्ति को क्षतिपूर्ति कराने के बजाय वस्तु उसे वापस लौटाये जाने (restitution) का आदेश दे सकता है जिसके कारण उस व्यक्ति के अधिकार का हनन हुआ है। कतिपय प्रकरणों में न्यायालय द्वारा अपकारित (व्यथित) व्यक्ति को विनिर्दिष्ट अनुतोष (specific performance) दिलाकर भी उसके अधिकार का प्रवर्तन कराया जाता है। इसी प्रकार व्यादेश (injunction) भी व्यक्ति के विधिक अधिकार को प्रवर्तन कराने का एक माध्यम है।

विधिक अधिकार और नैतिक अधिकार में विभेद (Distinction between Legal Rights and moral | Rights)

नैतिक अधिकार एक ऐसा अधिकार है जो प्राकृतिक न्याय के नियम द्वारा मान्य तथा संरक्षित होता है।24 उदाहरणार्थ, माता-पिता का यह अधिकार है कि उनके बच्चे उनकी आज्ञा का अनुपालन करें। इसी प्रकार अपने माता-पिता का स्नेह पाने का बच्चों का अधिकार है। अतः स्पष्ट है कि नैतिक एवं विधिक अधिकार, दोनों ही संरक्षित हित (protected interests) हैं, इनमें विभेद केवल इतना है कि नैतिक अधिकार प्राकृतिक न्याय के नियम द्वारा संरक्षित होता है जबकि विधिक अधिकार राज्य की विधि द्वारा संरक्षित होता है।

उल्लेखनीय है कि पशुओं के सम्बन्ध में अधिकार एकमात्र ऐसा अधिकार है जिसमें नैतिक एवं विधिक अधिकार दोनों के तत्व विद्यमान हैं। पशु के प्रति क्रूरता दण्ड विधि के अन्तर्गत एक दण्डनीय अपराध है, इसलिये यह एक विधिक अधिकार माना गया है क्योंकि इसे राज्य द्वारा मान्य एवं संरक्षित (recognized and protected) किया गया है। परन्तु मनुष्य पर अधिरोपित यह कर्तव्य विधि की परिधि के बाहर होने के कारण एक नैतिक अधिकार मात्र बनकर रह जाता है क्योंकि पशु स्वयं इस अधिकार का प्राख्यापन (assert) नहीं करा सकते हैं।

विधिक अधिकार तथा अन्य समानार्थी संकल्पनाएँ। (Legal Right and other related concepts)

जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है, शुद्ध अर्थ में विधिक अधिकार का सम्बन्ध विधिक कर्तव्यों से है। हालैंड ने अधिकार को परिभाषित करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति में किसी विधिक अधिकार का होना तभी माना जायेगा यदि कोई अन्य एक या अनेक व्यक्ति उस व्यक्ति के प्रति कुछ करने या न करने के लिए विधिक रूप से आबद्ध हैं, अर्थात् सहवर्ती कर्तव्य के बिना अधिकार का अस्तित्व सम्भव नहीं है। दूसरे शब्दों में अधिकारों को ऐसा ‘हित’ कहा जा सकता है जो विधि द्वारा मान्य होता है तथा जिसका संरक्षण विधि द्वारा अन्य व्यक्तियों पर कर्तव्य अधिरोपित करके किया जाता है।

24 A moral right may be defined as a right which is recognized and protected by a rule of natural justice whereas a legal right is an interest recognised and protected by rule of law or legal justice.

कर्तव्य की अवधारणा (The concept of Duty)

कर्तव्य को दायित्व (obligation) का ही एक प्रकार (species) माना गया है। इसमें ऐसा आचरण विहित है जो किसी लक्ष्य की पूर्ति की ओर इंगित करता है। यह लक्ष्य नैतिक, सामाजिक या अन्य कोई हो सकता है। इस सन्दर्भ में प्रोफेसर फुलर (Fuller) के अनुसार कर्तव्य में निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक

(i) कर्तव्य सामान्य हो, यद्यपि इसके सीमित अपवाद हो सकते हैं;

(ii) कर्तव्य प्रख्यापित (promulgated) होना चाहिये;

(iii) कर्तव्य भावी तथा बुद्धिगम्य हो (it should be prospective and intelligible);

(iv) कर्तव्य स्वयं में अनुरूप (consistent) हो; तथा ।

(V) कर्तव्य पालनीय (capable of fulfilment) तथा आन्तरिक नैतिकता के अनुरूप हो।

चूंकि कर्तव्य एक विहित आचरण (prescribed behaviour) है, अत: लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे उसका अनुपालन करें ताकि अन्यों के तत्समान अधिकारों का हनन न हो। इसीलिये कर्तव्य और अधिकारों को सहसम्बद्ध (co-related) माना गया है सामण्ड के विचार से उपर्युक्त नपे-तुले अर्थ के अतिरिक्त विधिक अधिकार का प्रयोग व्यापक अर्थ में भी किया जा सकता है। इस अर्थ में अधिकार का उपयोग स्वतन्त्रता (liberty), शक्ति (power) या उन्मुक्ति (immunity) के रूप में किया जा सकता है। इसका अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जाना उचित होगा

(1) स्वतन्त्रता और अधिकार शून्यता (Liberty and No Right)

व्यक्ति की विधिक स्वतन्त्रता (liberty) से आशय उन लाभों से है जो वह स्वयं पर विधिक कर्तव्यों के अधिरोपण के अभाव में प्राप्त करता है। स्वतन्त्रता (liberty) के अधीन कोई व्यक्ति अपने कार्य को अपनी इच्छानुसार बिना विधि की रोक-टोक के कर सकता है, किन्तु वह दूसरे के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। उदाहरणार्थ, यदि किसी व्यक्ति को अपने विचार अभिव्यक्त करने की स्वतन्त्रता (liberty) है, तो उसे यह अधिकार प्राप्त नहीं है कि वह अपमानलेख या अपमान-वचन द्वारा दूसरे व्यक्ति को हानि  हुँचाए। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को हिंसा के विरुद्ध अपनी रक्षा करने का अधिकार प्राप्त है, परन्तु जो व्यक्ति उसे क्षति पहुँचाता है उससे बदला लेने का उसे अधिकार नहीं है।

यद्यपि ऑस्टिन ने स्वतन्त्रता (liberty) को अधिकार (right) का पर्यायवाची माना है। परन्तु वस्तुतः। दोनों में सूक्ष्म अन्तर है। इसमें सन्देह नहीं कि ये दोनों ही विधिक रूप से मान्यता प्राप्त हित हैं परन्तु फिर भी ये एक ही वर्ग के दो भिन्न-भिन्न पहलू हैं। विधिक अधिकार वे लाभ होते हैं जिन्हें अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के विधिक कर्तव्यों द्वारा प्राप्त किया जाता है। अधिकार के अन्तर्गत कर्तव्यों को प्रवर्तित राने के लिए विधि की शक्ति का प्रयोग किया जाता है। परन्तु इसके विपरीत स्वतन्त्रता (liberty) वह लाभ है जिसे व्यक्ति कर्तव्यों की अनुपस्थिति (absence of duty) से प्राप्त करता है। इस प्रकार स्वतन्त्रता वरोध के न होने को प्रदर्शित करती है। इसीलिए सामण्ड ने कहा है कि अधिकार से आशय उन कर्तव्यों से है जो दूसरे व्यक्ति मेरे प्रति करने के लिए बाध्य हैं और विधिक स्वतन्त्रता वह है जिसे मैं अपनी इच्छानुसार बिना किसी प्रकार के कर्तव्यों के बन्धन के बेरोक-टोक कर सकता हूँ।26

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ऑस्टिन की यह धारणा कि अधिकार और स्वतन्त्रता (rights and liberties) एक दूसरे के पर्यायवाची हैं, उचित नहीं है क्योंकि विधि किसी भी स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं।

25. Liberty connotes absence of restraint.

26. “Rights are what other are to do for me, liberties are what I may do for myself.”-Salmond.

करती, बल्कि केवल तभी हस्तक्षेप करती है यदि किसी के विधिक अधिकार का उल्लंघन या अतिक्रमण होता है।27

सामण्ड ने अधिकार-शून्यता (absence of right) को स्वतन्त्रता (liberty) का सहवर्ती (co-relative) माना है। इसका अर्थ है, एक की स्वतन्त्रता के विरुद्ध किसी अन्य व्यक्ति में अधिकार का न होना। उदाहरणार्थ, यदि ‘क’ को कोई कार्य करने की स्वतन्त्रता (liberty to do a certain act) है, तो ‘ख’ को यह अधिकार नहीं है कि ‘क’ को वह कार्य न करने दे। इसी प्रकार यदि ‘क’ का कोई कार्य न करने की स्वतन्त्रता (liberty) है तो ‘ख’ का यह अधिकार नहीं है कि ‘क’ द्वारा वह कार्य करवाया ही जाए। ‘ख’ यदि ‘क’ की भूमि पर अतिचार (trespass) करता है, तो ‘क’ को यह स्वतन्त्रता (liberty) है कि वह ‘ख’ | को यदि उस भूमि से निकाल बाहर करे परन्तु ‘ख’ को यह अधिकार नहीं कि उसे भूमि से बाहर न निकाला जाए।28

(2) शक्ति और अधीनता (Power and Subjection)

सामण्ड के अनुसार शक्ति (Power) वह सामर्थ्य है जो किसी व्यक्ति को विधि द्वारा या तो स्वयं के अथवा अन्य व्यक्तियों के अधिकार, कर्तव्य, दायित्व या अन्य विधिक सम्बन्ध अपनी निजी इच्छानुसार विनियमित या परिवर्तित करने के लिए प्रदान किया जाता है। अतः एक व्यक्ति दूसरे के प्रति या उसके विरुद्ध क्या कर सकता है इसे ‘शक्ति’ (Power) कहते हैं।” उदाहरण के लिए, सम्पत्ति विक्रय करने का अधिकार, बन्धकदार का बन्धक सम्पत्ति को बेचने का अधिकार, वसीयत करने का अधिकार आदि।

सामण्ड के अनुसार शक्ति (power) दो प्रकार की होती है

(1) सार्वजनिक; तथा (2) व्यक्तिगत।

ऐसी शक्ति जो किसी व्यक्ति में राज्य के अभिकर्ता (agent) के रूप में निहित होती है, सार्वजनिक शक्ति कहलाती है। इसका प्रयोग राज्य के कार्यों के संचालन के लिए किया जाता है। राज्य के कार्यों के अन्तर्गत विधायी, न्यायिक तथा कार्यपालिका के कार्यों आदि का समावेश है।

व्यक्तिगत शक्ति ऐसी शक्ति होती है जो व्यक्ति में वैयक्तिक प्रयोजनों के लिए प्रयोग में लाई जाने के लिए निहित होती है। इनमें राज्य के माध्यम की आवश्यकता नहीं रहती है।

उल्लेखनीय है कि शक्ति (power) और अधिकार (right) एक दूसरे से भिन्न हैं। एक व्यक्ति की शक्ति (power) किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों पर कर्तव्य का भार नहीं डालती जबकि अधिकार के साथ कर्तव्य जुड़ा रहता है, अर्थात् प्रत्येक अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों को कर्तव्य से आबद्ध अवश्य करता है।

इसी प्रकार शक्ति (power) तथा स्वतन्त्रता (liberty) में भी अन्तर है। यह आवश्यक नहीं कि किसी व्यक्ति द्वारा स्वतन्त्रता (liberty) का प्रयोग जान-बूझकर ही किया जाए, वह इसका प्रयोग बिना उसकी अनुभूति के या अज्ञात रूप से भी कर सकता है। परन्तु शक्ति (power) का प्रयोग सदैव जान-बूझकर अर्थात् सज्ञान ही किया जाता है।

शक्ति का आपेक्षिक तत्व अधीनता (subjection) है, जो यह अभिप्रेत करता है कि अधीन व्यक्ति के विरुद्ध अन्य व्यक्ति में शक्ति (power) निहित है। दूसरे शब्दों, में अधीनता उस व्यक्ति की स्थिति को प्रदर्शित करती है जिसका विधिक अधिकार शक्ति के प्रयोग द्वारा परिवर्तित किया जा सकता है। जैसे बन्धकदार द्वारा सम्पत्ति के विक्रय के लिए बन्धककर्ता की अधीनता।

उल्लेखनीय है कि सामण्ड ने अधीनता (subjection) की बजाय दायित्व (liability) को ही अधिकार का सापेक्षिक तत्व माना है। हॉहफेल्ड (Hohfeld) तथा कीटन (Keeton) ने भी इसी मत का समर्थन किया

27. सामण्ड : ज्यूरिसपूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 227-28.

28. तत्रैव.

है। परन्तु सामण्ड के ज्यूरिसपूडेंस के दसवें संस्करण के सम्पादक डॉ० ग्लेनविल विलियम्स ने दायित्व (liability) शब्द के स्थान पर अधीनता (subjection) शब्द का प्रयोग किया ताकि अधिकार के विषय में कोई भ्रांति न रहे।

(3) उन्मुक्ति तथा निर्योग्यता (Immunity and Disability)

उन्मुक्ति से आशय है किसी दूसरे की शक्ति (power) से उन्मुक्त होना। जिस प्रकार शक्तिधारी की शक्ति अथवा व्यक्तियों के कुछ करने या न करने के दायित्व के रूप में अभिव्यक्त होती है, ठीक उसी प्रकार उन्मुक्तिधारी की उन्मुक्ति अन्य व्यक्तियों के द्वारा उसके प्रति या विरुद्ध कुछ कर सकने की अक्षमता के रूप में प्रकट होती है। उदाहरणार्थ, किसी मामले के विचारण में न्यायाधीश द्वारा सद्भावनापूर्वक कहे गये कथन उसे मानहानि के दायित्व से उन्मुक्ति दिलाते हैं।

उन्मुक्ति का सहवर्ती (co-relative) तत्व अन्य व्यक्तियों की निर्योग्यता (disability) है जिसमें शक्ति (power) का अभाव रहता है।29 इसे एक उदाहरण द्वारा समझना उचित होगा। अन्तर्राष्ट्रीय विधि में प्रत्येक राष्ट्र के प्रभुताधारी को यह उन्मुक्ति (immunity) प्राप्त है कि उस पर अन्य देशों के न्यायालयों में वाद नहीं। लाया जा सकता है। इस प्रकार समस्त देशों के नागरिक इस निर्योग्यता (disability) के अधीन हैं कि वे विदेशी प्रभुताधारी के विरुद्ध अपने देश के न्यायालय में वाद नहीं ला सकते !

उन्मुक्ति (immunity) के विषय में सामण्ड का कहना है कि उचित अर्थ में उन्मुक्ति न तो अधिकार है, न दायित्व है और न शक्ति ही है, बल्कि वह दूसरे पक्ष की निर्योग्यता को प्रदर्शित करती है। अतः स्पष्ट है। कि उन्मुक्ति (immunity) विधिक अधिकार (legal right) से भिन्न है तथा इसका सहवर्ती तत्व निर्योग्यता है, न कि कर्तव्य।

अधिकार, स्वतन्त्रता, शक्ति तथा उन्मुक्ति (Right, Liberty, Power and Immunity) की धारणाओं के सारभूत तत्वों को स्पष्ट करते हुए सामण्ड ने कथन किया है कि

(1) शुद्ध अर्थ (stricto senst) में अधिकार वह है जिसे मेरे प्रति करने के लिए अन्य व्यक्ति | कर्तव्यबद्ध हैं।

(2) स्वतन्त्रता (Liberty) वह है जो मैं स्वयं के लिए बिना कानूनी रोक-टोक के कर सकता हूँ।

(3) शक्ति (Power) वह है जो मैं दूसरों के विरुद्ध कर सकता हूँ।

(4) उन्मुक्ति (Immunity) उसे कहते हैं जो दूसरे मेरे सम्बन्ध में नहीं कर सकते।

हॉहफेल्ड के विधिक अधिकार संबंधी विचार

अधिकारों से सम्बन्धित उपर्युक्त धारणाओं को भली-भाँति समझने के लिए हॉहफेल्ड (Hohfeld) के विधिक अधिकारों सम्बन्धी विचारों की विवेचना करना उचित होगा। उन्होंने अधिकार, स्वतन्त्रता, शक्ति तथा उन्मुक्ति की सहवर्ती और विपरीतार्थी अवधारणाओं को निम्नलिखित तालिकाओं द्वारा समझाने का प्रयास किया है-

LLB-Study-Material
LLB-Study-Material

29. विधिशास्त्र में उन्मुक्ति की संकल्पना का आधार-सूत्र यह है कि “जिसके पास कुछ नहीं है, वह कुछ नहीं दे सकता ” (nemo dat quod non habet).

उपर्युक्त तालिका में अधिकार सम्बन्धी विभिन्न धारणाएँ एक-दूसरे से किस प्रकार सम्बद्ध हैं, यह निर्देशन-चिन्हों (Arrows) द्वारा दर्शाया गया है।

मानचित्र के ऊर्ध्ववर्ती निर्देशित चिन्ह (vertical arrows) विधिक सहवर्तिता (jural co-relative) को दर्शाते हैं। अत: अधिकार का सहवर्ती कर्तव्य है; स्वतन्त्रता (liberty) का सहवर्ती अधिकार-शून्यता (No duty) है; शक्ति का सहवर्ती अधीनता (या दायित्व) है तथा उन्मुक्ति का सहवर्ती निर्योग्यता (disability) है।

तालिका के कर्णवत् या एक दूसरे को काटते हुए निर्देशन चिन्ह (diagonal arrows) विधिक धारणा के ठीक विपरीत अर्थ को प्रकट करते हैं। अतः अधिकार-शून्यता का अर्थ है अधिकार का न होना; कर्तव्य का अर्थ है स्वतन्त्रता का न होना; निर्योग्यता (disability) का अर्थ है शक्ति (power) का न होना तथा अधीनता का अर्थ है उन्मुक्ति का न होना।

उपर्युक्त तालिका के समतल निर्देशन-चिह्न (horizontal arrows) सहवर्ती तत्वों के उलटे या विरोधी अर्थ को प्रकट करते हैं। अत: कर्तव्य का न होना (no duty) दूसरे में अधिकार के न होने (absence of right in another) को प्रदर्शित करता है। इसी प्रकार उन्मुक्ति (immunity) किसी दूसरे में शक्ति के न होने (absence of power in another) का द्योतक है।30

हॉहफेल्ड के उपर्युक्त वर्गीकरण का महत्व इसलिए है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी एक विधिक सम्बन्ध के परिणामस्वरूप केवल एक ही अधिकार तथा कर्तव्य का उद्भव नहीं होता बल्कि इससे अनेक दावे, उन्मुक्तियाँ तथा शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं जिन पर विचार किया जाना आवश्यक होता है।

परन्तु जूलियस स्टोन ने हॉहफेल्ड के अधिकार सम्बन्धी उपर्युक्त विश्लेषण की आलोचना की है। उनका मत है कि अधिकार की समवर्ती संकल्पना का कोई औचित्य नहीं है तथा यह भी आवश्यक नहीं कि प्रत्येक मूल संकल्पना का एक ही समवर्ती हो।

अमेरिका के विख्यात विधिशास्त्री डीन रास्को पाउण्ड ने भी हॉहफेल्ड के अधिकार सम्बन्धी उक्त विश्लेषण की आलोचना की है।31

विधिक अधिकारों का वर्गीकरण (Classification of Legal Rights) 

विधिशास्त्रियों ने विधिक अधिकारों का वर्गीकरण भिन्न-भिन्न प्रकार से किया है। तथापि सामान्यतः विधिक अधिकारों को निम्नलिखित वर्गों में रखा जा सकता है

(1) पूर्ण तथा अपूर्ण अधिकार (Perfect and Imperfect Rights)

पूर्ण अधिकार उसे कहते हैं जिसमें हस्तक्षेप या उल्लंघन किये जाने पर न्यायालय में सफलतापूर्वक वाद संस्थित किया जा सकता है जबकि अपूर्ण अधिकार वह होता है जिसे विधि के अन्तर्गत मान्यता तो प्राप्त होती है परन्तु विधि द्वारा उसे प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, पूर्ण अधिकार विधि द्वारा मान्य तथा प्रवर्तनीय होता है किन्तु अपूर्ण अधिकार विधि द्वारा केवल मान्य होता है परन्तु प्रवर्तनीय नहीं होता। आशय यह कि अपूर्ण अधिकार के प्रवर्तन के लिए न्यायालय में वाद संस्थित नहीं किया जा सकता है।32 उदाहरणार्थ, परिसीमा अधिनियम, 1963 द्वारा अवधि बाधित ऋण अपूर्ण अधिकार का उदाहरण है। इसमें ऋण समाप्त नहीं होता अपितु परिसीमा बीत जाने पर उसकी वसूली के लिए वाद नहीं लाया जा सकता। अतः अवधि बीत जाने से अधिकार का लोप नहीं होता बल्कि उसके लिए उपचार का लोप हो जाता है। उल्लेखनीय है कि कभी-कभी पूर्ण अधिकार किसी विधिक त्रुटि के कारण अपूर्ण अधिकार में परिवर्तित हो जाता है।

30. सामुण्ड : ज्यूरिसपूडेन्स (12वाँ संस्करण) पृ० 232-33.

31. रास्को पाउण्ड : लीगल राइट्स (1975), पृ० 26.  

32. Allen v. Waters & Co., (1935) 1 KB 200.

इस संदर्भ में विचारणीय प्रश्न है कि अप्रवर्तनीय होते हुए भी विधि द्वारा अपूर्ण अधिकारों को मान्यता क्यों दी गयी है? सामण्ड के अनुसार विधि द्वारा अपूर्ण अधिकारों को मान्यता दिये जाने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं

(i) अपूर्ण अधिकार अनुयोज्य (actionable) न होते हुए भी प्रतिरक्षण के रूप में उनका उपयोग किया जा सकता है।

(ii) कोई भी अपूर्ण अधिकार उसके लिए दी गई किसी भी प्रतिभूति का समर्थन करने के लिए पर्याप्त है। उदाहरणार्थ, बन्धक (mortgage) द्वारा सुरक्षित ऋण के वसूली योग्य न रहने पर भी बन्धक विधिक दृष्टि से पूर्णतः विधि-मान्य रहता है।  

(iii) कभी-कभी अपूर्ण अधिकार पूर्ण अधिकार में परिवर्तित हो जाता है। जैसे परिसीमा से बाधित ऋण की वसूली के लिए न्यायालय में वाद नहीं लाया जा सकता, किन्तु अभिस्वीकृति (acknowledgment) या आशिक सदाय (part payment) के कारण वह वसूली योग्य हो जाता है। इसी प्रकार ऐसा अवधि-बाध्य ऋण किसी सम्पत्ति के अन्तरण के प्रति मूल्य के रूप में वैध होता है।

सामण्ड के विचार से राज्य के विरुद्ध नागरिकों के अधिकार को अपूर्ण अधिकारों की श्रेणी में रखा जाना चाहिये क्योंकि न्यायालय द्वारा राज्य के विरुद्ध निर्णीत किये जाने के बाद भी उनका प्रवर्तन तो राज्य के हाथों में ही रहता है। परन्तु निवेदित है कि यह धारणा विधिक परम्पराओं के विपरीत है। गैर- प्रभुताशक्ति के अधीन किये गये कार्यों, संविदाओं या अपकृत्यों के लिए राज्य ठीक उसी प्रकार दायित्वाधीन होता है जिस प्रकार कि अन्य निजी पक्षकार।

अपूर्ण अधिकार का पूर्ण अधिकार में सम्परिवर्तन-उल्लेखनीय है कि कतिपय परिस्थितियों में किसी अपूर्ण अधिकार का पूर्ण अधिकार में सम्परिवर्तन किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई बन्ध-पत्र  अधोस्टाम्पित (under-stamped) है, तो इससे उद्भूत अधिकार अपूर्ण अधिकार होगा, जो कि विधि को अंतर्गत प्रवर्तनीय होगा, परन्तु यदि इसके लिये विहित शास्ति या अर्थदण्ड (penalty) का भुगतान कर दिया जाये, तो यह पूर्ण अधिकार में परिवर्तित होकर प्रवर्तनीय हो जायेगा।

(2) सकारात्मक तथा  नकारात्मक अधिकार (Positive and Negative Rights)

सकारात्मक अधिकार सकारात्मक कर्तव्य (positive duty) के समरूप है। यह ऐसा अधिकार है जिसके अंतर्गत वह व्यक्ति जिसके ऊपर कर्तव्य आरोपित है, अधिकार के धारणकर्ता के लिए कोई कार्य करने के लिए। बाध्य होता है। इसी प्रकार नकारात्मक अधिकार नकारात्मक कर्तव्य के समरूप है, अर्थात् इसमें कर्तव्य से आबद्ध व्यक्ति ऐसे कार्य करने से विरत रहेगा (refrain) जो अधिकार के धारणकर्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता हो।

सकारात्मक अधिकार निश्चित रूप से लाभ के लिए होता है जबकि नकारात्मक अधिकार हानि न होने देने के लिए होता है। दूसरे शब्दों में, किसी व्यक्ति को जो कुछ पहले से ही प्राप्त है, उससे कुछ अधिक प्राप्त करने का अधिकार सकारात्मक अधिकार कहलाता है, जैसे-लेनदार (creditor) का ऋणी व्यक्ति (ack, ऋण की राशि वसूल करने का अधिकार सकारात्मक अधिकार है। इसके विपरीत, किसी व्यक्ति को जो कल पहले से ही प्राप्त है, उसी को बना रहने देने का अधिकार नकारात्मक अधिकार होगा, जैसे-किसी व्यhि जेब में रखे हुए धन के प्रति उसका यह अधिकार कि अन्य व्यक्ति उसे अकारण न छीन ले नकारात्मक अधिकार होगा।

(3) सर्वबन्धी तथा व्यक्तिबन्धी अधिकार (Rights in rem and Rights in personang)

सर्वबन्धी तथा व्यक्तिबन्धी33 में जो भेद है वह सकारात्मक और नकारात्मक अधिकार के अन्तर से घनिष्टतः सम्बद्ध है। लगभग सभी सर्वबन्धी अधिकार नकारात्मक होते हैं जबकि अधिकांश व्यक्तिबन्धी

33. सर्वबंधी अधिकार (Rights in Renn) तथा व्यक्तिबन्धी अधिकार (Rights in persona) की संकल्पना रोमन विधि | से ली गई है। रोमन विधि में किसी विनिर्दिष्ट वस्तु की उगाही के लिए अनुयोज्य दावे (actionable, ‘एशियो इन रेम’ तथा विनिर्दिष्ट व्यक्ति के विरुद्ध कुछ व्यक्तियों के बीच हुए करार से उद्भावित दावे को ‘एशियो। इन परसोना’ कहा जाता था।

अधिकार सकारात्मक होते हैं। सर्वबन्धी अधिकार (Rights in Rem) सामान्यत: व्यक्तियों पर अधिरोपित कर्तव्यों के साथ चलते हैं जबकि व्यक्तिबन्धी अधिकार निश्चित व्यक्तियों पर अधिरोपित कर्तव्य के साथ चलते हैं। सर्वबन्धी अधिकार समस्त संसार के व्यक्तियों के विरुद्ध प्रयोज्य होते हैं जबकि व्यक्तिबंधी अधिकार केवल विशिष्ट व्यक्तियों के विरुद्ध ही प्रयोज्य हैं। प्रत्येक व्यक्ति का अपने निवास-गृह में रहने का अधिकार सर्वबन्धी अधिकार है क्योंकि समस्त व्यक्तियों का यह कर्तव्य है कि वे किसी के उक्त अधिकार में हस्तक्षेप न करें। लेनदार का ऋणी से ऋण राशि प्राप्त करने का अ . व्यक्तिबन्धी अधिकार (right in personam) है क्योंकि वह उस विशिष्ट ऋणी व्यक्ति तक ही सीमित है।

सर्वबन्धी तथा व्यक्तिबन्धी अधिकार में विभेद को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। जैसे ही कोई व्यक्ति किसी भूखण्ड के क्रय हेतु करार पर हस्ताक्षर कर देता है,उसे उस भूखण्ड पर विक्रेता के विरुद्ध व्यक्तिबन्धी (rights in personam) अधिकार प्राप्त हो जाता है, जो विक्रेता से अपेक्षा करता है कि वह क्रेता के नाम विक्रय-विलेख (sale-deed) निष्पादित करे और उस भूखण्ड का क्रेता को हस्तान्तरण कर दे। परन्तु जैसे ही विक्रय-विलेख निष्पादित कर दिया जाता है, क्रेता का व्यक्तिबन्धी अधिकार, सर्वबन्धी अधिकार में परिवर्तित हो जायेगा, जिसका आशय यह होगा कोई भी व्यक्ति क्रेता के भूखण्ड सम्बन्धी स्वामित्व में हस्तक्षेप न करे।

(4) साम्पत्तिक तथा वैयक्तिक अधिकार (Proprietary and Personal Rights)

साम्पत्तिक अधिकार मनुष्य की सम्पत्ति या सम्पदा में निहित होते हैं। इन अधिकारों का वित्तीय महत्व होता है तथा वे व्यक्ति की संपत्ति, उसकी आस्तियों (assets) अथवा कीर्तिस्व आदि से सम्बन्धित होते हैं। परन्तु मनुष्य के वैयक्तिक अधिकारों का सम्बन्ध उसके व्यक्तित्व, प्रतिष्ठा या हैसियत (status) से होता है। ऐसे अधिकार व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् पूर्णत: समाप्त हो जाते हैं। अत: किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा या उसकी हैसियत (status) उसके वैयक्तिक अधिकारों के अन्तर्गत आती है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को पिता या पति की हैसियत से जो अधिकार अपने बच्चों या पत्नी के प्रति प्राप्त हैं, वे उसके वैयक्तिक अधिकार होते है।

साम्पत्तिक अधिकार और वैयक्तिक अधिकार में मुख्य भेद इस प्रकार हैं

(i) मनुष्य के साम्पत्तिक अधिकारों के योग से उसकी सम्पत्ति या सम्पदा गठित होती है जबकि उसके समस्त वैयक्तिक अधिकारों के योग से उसकी प्रास्थिति (status) स्थापित होती है।

(ii) साम्पत्तिक अधिकार अन्तरणीय होते हैं जबकि वैयक्तिक अधिकारों का अन्तरण नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार साम्पत्तिक अधिकारों पर उत्तराधिकार होता है परन्तु वैयक्तिक अधिकारों पर उत्तराधिकार नहीं होता है।

(iii) साम्पत्तिक अधिकार वैयक्तिक अधिकार की तुलना में अधिक स्थायी होते हैं।

(5) स्व-साम्पत्तिक तथा पर-साम्पत्तिक अधिकार 

(Rights in re-propria and Rights in re-aliena)

जब किसी व्यक्ति का उसकी निजी सम्पत्ति पर अधिकार होता है तब वह अधिकार स्व-साम्पत्तिक अधिकार (Right in re-propria) कहलाता है, परन्तु जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की सम्पत्ति पर अधिकार रखता है, तो वह अधिकार पर-साम्पत्तिक (Right in re-aliena) कहलाता है। किसी भू-स्वामी का उसकी भूमि पर स्व-साम्पत्तिक अधिकार होता है परन्तु उसकी भूमि से लगी हुई दूसरे की भूमि पर से आने-जाने का उसका अधिकार पर-साम्पत्तिक अधिकार होगा। पर-साम्पत्तिक अधिकार को विल्लंगम (encumbrance) भी कहते हैं। यह एक ऐसा अधिकार है जो एक ही विषय-वस्तु के सम्बन्ध में किसी दूसरे व्यक्ति के अधिक व्यापक अधिकार से लिया जाता है। पर-साम्पत्तिक अधिकार (right in re-aliena) में। अधिकार का धारणकर्ता संपत्ति पर पूर्ण अधिकार नहीं रखता। संपत्ति पर पूर्ण स्वामित्व का अधिकार तो किसी दूसरे ही व्यक्ति में निहित होता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति अपना मकान किसी दूसरे व्यक्ति के पास बंधक (mortgage) रखता है, तो बंधककर्ता (mortgagor) ने मकान सम्बन्धी अपने साम्पत्तिक अधिकार का विभाजन करके उस पर भार (charge) या विल्लंगम (encumbrance) उत्पन्न कर लिया है। ऐसी स्थिति में बन्धकी (mortgagee) को उस मकान पर पर-साम्पत्तिक अधिकार प्राप्त हो जाता है और यदि यह बन्धक कब्जे के साथ हो, तो उसे अस्थायी स्वामित्व भी प्राप्त हो जायेगा। परन्तु किसी भी स्थिति में बन्धकी का यह अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं रहेगा क्योंकि बन्धककर्ता को बन्धक के मोचन का अधिकार (mortgagor’s right of redemption) रहता है। इस दृष्टान्त में बन्धककर्ता का मकान सम्बन्धी जो पूर्ण स्वामित्व अलग हो गया वह पर-साम्पत्तिक अधिकार (right in re-aliena) कहा जायेगा और उसका मकान भारग्रस्त मात्र हो जायेगा। दूसरे शब्दों में, बन्धकी का पर-साम्पत्तिक अधिकार बन्धककर्ता के स्व-साम्पत्तिक अधिकार पर विल्लंगम (encumbrance) होगा।

सामण्ड के अनुसार विल्लंगम (encumbrance) के चार34 मख्य प्रकार हैं

(i) पट्टा (Lease)

पट्टे में सम्पत्ति का स्वामित्व किसी एक व्यक्ति में निहित रहता है जबकि उस सम्पत्ति का कब्जा तथा उपयोग किसी अन्य व्यक्ति में निहित होता है। अत: स्वामित्व (Ownership) और आधिपत्य (possession) के न्यायोचित बंटवारे को पट्टा या लीज कहते हैं।

(ii) सुविधाभार (Servitude)

सुविधाभार (servitude) में व्यक्ति को केवल भूखण्ड के सीमित उपयोग का अधिकार प्राप्त होता है तथा स्वामित्व तथा कब्जा उसे अन्तरित नहीं किया जाता। सुविधाभार सम्बन्धी अधिकार या तो सामूहिक या व्यक्तिगत हो सकता है। उदाहरणार्थ, किसी मार्ग पर से आने-जाने का अधिकार यदि जनसाधारण को प्राप्त है, तो वह सामूहिक सुविधाभार अधिकार होगा। किन्तु यदि वह किसी व्यक्ति विशेष या कुछ निश्चित व्यक्तियों को ही प्राप्त है, तो वह व्यक्तिगत सुविधाभार अधिकार होगा।

सामंड ने सुविधाभार को परिभाषित करते हुए कहा है कि सुविधाभार विल्लंगम का एक ऐसा रूप है। जो व्यक्ति को किसी भू-खण्ड पर कब्जे के बिना सीमित उपयोग का अधिकार देता है तथा यह पट्टे (Lease) से इस अर्थ में भिन्न है कि उसमें (अर्थात् पट्टे में) उपयोग के साथ कब्जे का अधिकार भी प्राप्त होता है। सुखाधिकार (easement right) या परस्व-भोग (profit-d-prendre) सुविधाभार के सर्वोत्तम उदाहरण

(iii) प्रतिभूति (Security)

प्रतिभूति एक ऐसा भार (charge) या विल्लंगम (encumbrance) है जो किसी लेनदार (creditor) को उसके ऋणी की सम्पत्ति के विरुद्ध प्राप्त होता है ताकि ऋण की वसूली की सुरक्षा बनी रहे। प्रतिभूति या तो बन्धक (mortgage) के रूप में हो सकती है या धारणाधिकार (lien) के रूप में।

(iv) न्यास (Trust)

न्यास एक ऐसा विल्लंगम (encumbrance) है जिसमें सम्पत्ति का स्वामित्व किसी अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए साम्यिक बाध्यता (equitable obligation) द्वारा सीमित होता है। उदाहरण के लिए, यदि एक व्यक्ति अपनी कोई सम्पत्ति किसी दूसरे व्यक्ति के हित या लाभ के लिए तीसरे व्यक्ति को सौंपता है, तो यहाँ न्यास का निर्माण हुआ है तथा वह तीसरा व्यक्ति उस सम्पत्ति का न्यासी कहलायेगा। जिस व्यक्ति के हित के लिए न्यास की निर्मिति होती है उसे हितग्राही (beneficiary) कहते हैं।

34. सामण्ड : ज्यूरिसपूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 243.

6. प्रधान तथा सहायक अधिकार (Principal and Accessory Rights)

प्रधान अधिकार का अस्तित्व अन्य अधिकारों से स्वतन्त्र होता है, परन्तु सहायक अधिकार (accessory rights) प्रधान अधिकार के अनुषंगी (ancillary) होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई ऋण बन्धक द्वारा प्रतिभूत है, तो ऋण प्रधान अधिकार होगा और प्रतिभूति सहायक अधिकार (Accessory Right) होगा। इसी प्रकार यद किसी खेत के मालिक को यह अधिकार प्राप्त है कि वह उस खेत से लगे दूसरे खेत में होकर जा सकता है, तो यहाँ पहले खेत का स्वामित्व प्रधान अधिकार (principal right) होगा और दूसरे खेत में से होकर जाने का अधिकार सहायक अधिकार (accessory right) होगा।

(7) प्राथमिक तथा अनुशास्तिक अधिकार (Primary and Sanctioning Rights)

प्राथमिक अधिकारों को पूर्ववृत्त अधिकार (Antecedent Rights) या सारभूत अधिकार (Substantive Rights) भी कहा जाता है। इसी प्रकार अनुशास्तिक अधिकारों को उपचारात्मक अधिकार (Remedial Rights) या प्रक्रियात्मक अधिकार (Adjectival Rights) भी कहते हैं। अनुशास्तिक अधिकार किसी अपकार या अपकृत्य से उत्पन्न होते हैं जबकि प्राथमिक अधिकार का उद्भव अपकार को छोड़कर किसी अन्य स्रोत से होता है।

सामण्ड के अनुसार प्राथमिक अधिकार एक सर्वबन्धी अधिकार (Right in rem) या व्यक्तिबन्धी अधिकार (Right in personant) भी हो सकता है। उदाहरणार्थ, प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार कि उसे अपमानित न किया जाए, सर्वबन्धी अधिकार है तथा वचनग्रहीता (promisec) का यह अधिकार है कि वचनदाता (promiser) संविदा का अनुपालन करे, व्यक्तिबन्धी अधिकार है, और ये दोनों ही प्राथमिक अधिकार के अन्तर्गत आते हैं। यदि वचनदाता संविदा भंग करता है, तो वचनग्रहीता को यह अनुशास्तिक (या उपचारात्मक) अधिकार होगा कि वह वचनदाता से क्षतिपूर्ति प्राप्त करे। अनुशास्तिक अधिकार व्यक्तिबन्धी स्वरूप के होते हैं क्योंकि वे विनिर्दिष्ट व्यक्ति (specific person) द्वारा अधिकार भंग किये जाने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। किसी व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में दावा दाखिल करना एक अनुशास्तिक अधिकार है जिसका स्वरूप उपचारात्मक होता है।

अनुशास्तिक अधिकार के उल्लंघन के लिये व्यक्ति के विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही (Penal action) भी की जा सकती है, जैसे उस पर अर्थदण्ड अधिरोपित किया जाना। परन्तु इसमें व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही संस्थित कराने का उपचार उपलब्ध नहीं होगा क्योंकि यह अधिकार मूलत: दीवानी कार्यवाही से उदभूत होता है। हाँ, अधिकार के उल्लंघनकारी को उस वस्तु को वापस लौटाने के लिये बाध्य किया जा सकता है जिसके कारण किसी के अधिकार का हनन हुआ है।

( 8 ) विधिक तथा साम्यिक अधिकार (Legal and Equitable Rights)

इंग्लैंड में सन् 1873 का जूडीकेचर एक्ट पारित होने के पूर्व विधिक अधिकार वे अधिकार होते थे जिन्हें इंग्लैण्ड के कॉमन लॉ (Common Law) द्वारा मान्यता दी गई थी बकि साम्यिक अधिकार (equitable rights) केवल चांसरी न्यायालय (Chancery Court) द्वारा मान्य किये गये थे। तथापि इंग्लैण्ड में सन् 1873 का ज्यूडीकेचर एक्ट पारित हो जाने के परिणामस्वरूप इन दो प्रकार के न्यायालयों का अन्तर तो समाप्त हो गया, परन्तु कॉमन विधि और साम्यिक विधि का पृथक्-पृथक् अस्तित्व अभी भी बना हुआ है। विधिक और सायिक अधिकार एक दूसरे से निम्नलिखित बातों में भिन्न हैं

(i) विधिक तथा साम्यिक अधिकारों के सृजन एवं व्ययन (disposition) की रीति भिन्न-भिन्न होती है। उदाहरणार्थ, किसी बन्धक रखी गई भूमि के सम्बन्ध में विधिक अधिकार उसके बन्धक-विलेख (mortgage-deed) द्वारा सृजित होता है, किन्तु बन्धक स्वत्व विलेख के निक्षेप (deposit of title deed) द्वारा किया गया है, तो ऐसे बन्धक में साम्यिक अधिकार का निर्माण स्वत्व-विलेख के निक्षेप में हुआ माना। जायेगा।

(ii) साम्यिक अधिकार की तुलना में विधिक अधिकार को अधिमान्यता प्राप्त है क्योंकि ये अधिकार सायिक अधिकारों से गुरुतर होते हैं। इस सम्बन्ध में नियम यह है कि जहाँ भिन्न-भिन्न व्यक्तियों ने एक ही वस्तु के प्रति दो परस्पर विरोधी विधिक अधिकारों के लिए दावा किया है, तो उस स्थिति में इन दो विधिक अधिकारों में से उस अधिकार को अधिमान्यता दी जायेगी जो कालक्रम के अनुसार प्रथम (first in point of time) है। यही नियम दो विरोधी साम्यिक अधिकारों की दशा में भी लागू होता है। परन्तु यदि इन दो अधिकारों में से एक विधिक अधिकार है तथा दूसरा साम्यिक अधिकार है, तो उस स्थिति में साम्यिक अधिकार की तुलना में विधिक अधिकार को अधिमान्यता दी जायेगी 35

(iii) साम्यिक अधिकारों की तुलना में विधिक अधिकार अधिक सुस्पष्ट एवं सुनिश्चित होते हैं।

भारत में विधि और साम्या में भेद नहीं माना गया है; अतः विधिक तथा साम्यिक अधिकार का भेद भी निरर्थक है। साम्यिक अधिकार पूर्णत: इंग्लिश विधि-पद्धति की देन है। इस सम्बन्ध में स्थिति स्पष्ट करते हुए। प्रिवी कौंसिल ने अभिनिर्धारित किया कि भारत में सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 पारित हो जाने के पश्चात् विधिक तथा साम्यिक अधिकार व हितों में कोई भेद नहीं रह गया है।36 फलतः भारत में बन्धक मोचन का अधिकार साम्यिक अधिकार न होकर विधिक अधिकार है तथा बन्धककर्ता का हित विधिक स्वरूप का होता है न कि साम्यिक स्वरूप का।

(9) प्राथमिक तथा शास्तिक अधिकार (Primary and Sanctional Rights)

प्राथमिक अधिकारों (primary rights) को पूर्ववर्ती (antecedent) या सारभूत (substantive) अधिकार भी कहा जाता है। इसी प्रकार शास्तिक अधिकारों (sanctional rights) को उपचारात्मक (remedial) या अनुपूरक (adjectival) अधिकार भी कहते हैं।

प्राथमिक अधिकारों (primary rights) का स्रोत अपकृत्य (wrong) के अलावा अन्य कुछ भी हो सकता है, परन्तु शास्तिक अधिकार (sanctional right) किसी प्राथमिक अधिकार के उल्लंघन या अतिक्रमण37 से ही उत्पन्न होता है। इस अन्तर को एक उदाहरण द्वारा सरलता से समझा जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वतन्त्रता का प्राथमिक अधिकार प्राप्त है परन्तु यदि उसके इस अधिकार में कोई अन्य व्यक्ति अनुचित हस्तक्षेप करता है, तो यह उस व्यक्ति के प्रति ऐसा अपकृत्य (wrong) होगा जिसके लिए वह व्यक्ति अपकारी के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का वाद संस्थित कर सकता है। अतः उस व्यक्ति का न्यायालय में वाद संस्थित करने का अधिकार शास्तिक अधिकार या उपचारात्मक अधिकार कहलायेगा।

(10) लोक-अधिकार तथा प्राइवेट अधिकार (Public and Private Rights)

ऐसे अधिकार जो राज्य में निहित होते हैं, लोक अधिकार कहलाते हैं। राज्य इन अधिकारों को लोक प्रतिनिधि की हैसियत से प्रजा के हित के लिए प्रवर्तित कराता है। ऐसे अधिकार जो व्यक्तियों में निहित होते। हैं प्राइवेट अधिकार (private rights) कहलाते हैं। ब्लैकस्टोन (Blackstone) ने अपकृत्यों (wrongs) का (1) लोक-अपकार तथा (2) वैयक्तिक अपकार में विभाजन, इन दो अधिकारों के आधार पर ही किया है।

(11) निहित तथा समाश्रित अधिकार (Vested and Contingent Rights)

समस्त साम्पत्तिक अधिकारों की उत्पत्ति स्वत्व (title) से होती है। यदि स्वत्व पूर्ण है, तो अधिकार निहित (vested) कहलाता है। दूसरे शब्दों में, निहित अधिकार (vested right) वह है जिसमें अधिकार प्राप्त करने के लिए आवश्यक सभी शर्ते घटित हो चुकती हैं। इसके विपरीत, समाश्रित अधिकार (contingent

35. According to the maxim “Equity follows the law.”.

36. Tagore v. Tagore, (1872) IA Sup. Vol. 57 : Beb v. Macferson, (1904) 30 IA 238; Chattra Kumari Devi v. Mohani Vikram, (1931) 58 IA 279.

37. किसी प्राथमिक अधिकार के उल्लंघन या अतिक्रमण को विधि के अन्तर्गत ‘अपकार’ (tort) कहा जाता है.

right) वह है जिसके सम्बन्ध में अधिकार निहित करने के लिए केवल कुछ शर्ते घटित होती हैं और उसका निहित होना (vesting) नियत, किन्तु अनिश्चित घटना के घटित होने अथवा न होने पर निर्भर करता है। ऐसी घटना के घटित होने (या न होने) पर समाश्रित अधिकार पूर्ण होकर निहित अधिकार (vested right) में परिवर्तित हो जाता है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति किसी विलेख द्वारा अपनी सम्पत्ति किसी दूसरे जीवित व्यक्ति को अन्तरित करता है, तो दूसरे व्यक्ति को उस सम्पत्ति पर निहित अधिकार (vested right) प्राप्त होगा। परन्तु यदि सम्पत्ति का अन्तरण किसी अजन्मे बालक (unborn child) के हक में किया जाता है, तो वह अजन्मा बालक केवल समाश्रित अधिकार (contingent right) अर्जित करेगा, जिसका निहित अधिकार में परिवर्तित होना उस अजन्मे बालक के जन्म लेने तथा जीवित रहने पर निर्भर करेगा।

(12) अधिसेवी तथा अधिभावी अधिकार (Servient and Dominant Rights)

अधिसेवी अधिकार एक ऐसा अधिकार होता है जो किसी विल्लंगम (encumbrance) के अधीन होता है। परन्तु जब ऐसे अधिकार में से विल्लंगम हट जाता है, तो वह अधिभावी अधिकार का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। वह भूमि जिसके फायदेमंद उपभोग के लिए अधिकार अस्तित्व में है, अधिभावी दाय (dominant heritage) कहलाती है तथा उस भूमि के स्वामी को अधिभावी स्वामी कहते हैं। इसके विपरीत, वह भूमि, जिस पर दायित्व अधिरोपित किया जाता है, अधिसेवी दाय (servient heritage) कहलाती है और ऐसी भूमि का स्वामी अधिसेवी स्वामी कहलाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी मकान के स्वामी के नाते ‘अ’ को अपने पड़ोसी ‘ब’ की भूमि पर से आने-जाने का सुखाधिकार प्राप्त है, तो ‘अ’ का मकान अधिभावी दाय होगी और ‘अ’ उसका अधिभावी स्वामी कहलायेगा; तथा ‘ब’ का मकान अधिसेवी दाय होगी व उस मकान के स्वामी के नाते ‘ब’ को अधिसेवी स्वामी कहा जायेगा।

(13) नगरीय अधिकार तथा अन्तर्राष्ट्रीय अधिकार (Municipal and International Rights)

नगरीय अधिकार (Municipal Rights) देशवासियों को देश की विधि द्वारा प्रदत्त किये जाते हैं जबकि अन्तर्राष्ट्रीय अधिकारों को अन्तर्राष्ट्रीय विधि द्वारा प्रदत्त किया जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय अधिकारों के संबंध में एक धारणा यह है कि केवल राज्य ही इसकी विषय-वस्तु होने के कारण ये अधिकार केवल राज्य को ही प्रदत्त किये जा सकते हैं न कि व्यक्तियों को। परन्तु कुछ विद्वान इस धारणा को उचित नहीं मानते क्योंकि उनके विचार से व्यक्ति’ भी अन्तर्राष्ट्रीय अधिकार की विषय-वस्तु हो सकते हैं। वस्तुलक्षी-न्यायसंगत अधिकार या जस एड रेम‘ (Jus ad rem)

किसी अधिकार से उत्पन्न अधिकार को ‘जस एड रेम’ कहते हैं। इसका आशय यह है कि अधिकार के धारणकर्ता या स्वामी (Person of inherence) को यह अधिकार रहता है कि वह कोई अन्य अधिकार स्वयं को अन्तरित करा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि ‘क’ अपनी भूमि ‘ख’ को बेचने की संविदा करता है, तो ‘ख’ को यह अधिकार प्राप्त हो जाता है कि वह ‘क’ से वह भूमि स्वयं के नाम अन्तरित करा सकता है। यहाँ भूमि को स्वयं के नाम अन्तरित करा लेने का ख का अधिकार जस एड रेम’ (Jus ad rem) कहलायेगा क्योंकि यह अधिकार उसे ‘क’ से की गई संविदा से उत्पन्न अधिकार के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ है। इसे वस्तुलक्षी न्यायसंगत अधिकार कहा गया है।

विधिशास्त्र में विधिक अधिकारों तथा कर्तव्यों का विशिष्ट महत्व है क्योंकि इनके आधार पर व्यक्ति की प्रास्थिति या हैसियत (status) का निर्धारण होता है। सर हेनरी मेन ने व्यक्ति की प्रास्थिति (status) के विषय में कहा है कि मनुष्य की वह विधिक स्थिति जिसमें विधि के प्रवर्तन द्वारा उस पर अधिकारों और कर्तव्यों का आरोपण किया जाता है, उसकी ‘प्रास्थिति’ (status) कहलाती है।”38 यह उस स्थिति से भिन्न है, जो व्यक्ति स्वयं के स्वैच्छिक कार्यों द्वारा प्राप्त करता है। सारांश यह है कि व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यो।

38. Status’is a legal condition in which rights and duties are imposed by operation of law as distinct from a condition in which they are acquired by the person’s own voluntary acts.

के योग से समाज के वर्ग-विशेष में जो प्रास्थिति प्राप्त करता है, वह विधि द्वारा प्रदत्त होने के कारण अन्य व्यक्ति उसे उस प्रास्थिति से वंचित नहीं कर सकते हैं 39

डायसी ने जिन विभिन्न प्रकार की प्रास्थिति (हैसियतों) का उल्लेख किया है उनमें-(1) शैशव (Infancy), (2) संरक्षकता (Guardianship), (3) औरसता (Legitimacy), (4) पति-पत्नी संबंध (Husband-Wife relationship), (5) विक्षिप्त और संग्रहालयाध्यक्ष (Insane and Curator), (6) निगम (Corporation) आदि का समावेश है। । अन्त में यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि विभिन्न प्रकार के अधिकारों का विश्लेषण उस विधि के संदर्भ में ही किया जाना चाहिये जिसके अंतर्गत इन अधिकारों का सृजन हुआ है और जिसने उन्हें संरक्षण दिया है। जो व्यक्ति किसी अधिकार का दावा करता है, उसे उस अधिकार के प्रति अपना स्वयं का हक य स्वत्व (title) स्थापित करना आवश्यक होता है। अधिकार और कर्तव्यों की धारणाओं के कारण ही विधिक क्षेत्र में वैधानिक व्यक्तित्व की संकल्पना प्रतिस्थापित हुई क्योंकि व्यक्तियों के अधिकारों और कर्तव्यों को सुनियोजित करने की समस्या को हल करने के लिए वैधानिक व्यक्तित्व ही एकमात्र वैधानिक साधन है।

39. Niboyat v. Niboyat (1878) LR 4 PD1; See also In Re Luck’s Settlement Trusts,(1940) 1 Ch.D.864.

के योग से समाज के वर्ग-विशेष में जो प्रास्थिति प्राप्त करता है, वह विधि द्वारा प्रदत्त होने के कारण अन्य व्यक्ति उसे उस प्रास्थिति से वंचित नहीं कर सकते हैं ।39

डायसी ने जिन विभिन्न प्रकार की प्रास्थिति (हैसियतों) का उल्लेख किया है उनमें-(1) शैशव (Infancy), (2) संरक्षकता (Guardianship), (3) औरसता (Legitimacy), (4) पति-पत्नी संबंध (Husband-Wife relationship), (5) विक्षिप्त और संग्रहालयाध्यक्ष (Insane and Curator), (6) निगम (Corporation) आदि का समावेश है।

अन्त में यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि विभिन्न प्रकार के अधिकारों का विश्लेषण उस विधि के संदर्भ में ही किया जाना चाहिये जिसके अंतर्गत इन अधिकारों का सृजन हुआ है और जिसने उन्हें संरक्षण दिया है। जो व्यक्ति किसी अधिकार का दावा करता है, उसे उस अधिकार के प्रति अपना स्वयं का हक य स्वत्व (title) स्थापित करना आवश्यक होता है। अधिकार और कर्तव्यों की धारणाओं के कारण ही विधिक क्षेत्र में वैधानिक व्यक्तित्व की संकल्पना प्रतिस्थापित हुई क्योंकि व्यक्तियों के अधिकारों और कर्तव्यों को सुनियोजित करने की समस्या को हल करने के लिए वैधानिक व्यक्तित्व ही एकमात्र वैधानिक साधन है।

39. Niboyat v. Niboyat (1878) LR 4 PD1; See also In Re Luck’s Settlement Trusts,(1940) 1 Ch.D.864.

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