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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 22 Notes

 

LLB 1sLLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 22 Notes:- In this post of LLB 1st Year Semester Notes Sites today you are going to read Jurisprudence & Legal Theory Section 3 Chapter 22 Other Sources of Law Study Material in Hindi English PDF Download. The full name of the LLB is Bachelor of Law, after which the person becomes a lawyer. LLB Question Answer with Sample Model Paper Please comment on us.

अध्याय 22 (Chapter 22)

विधि के अन्य स्त्रोत (Other Sources of Law)

 

LLB Notes Study Material

गत अध्यायों में वर्णित विधि के प्रमुख स्रोतों के अलावा अनेक विधिशास्त्रियों ने साम्या (Equity) तथा विख्यात विधिवेत्ताओं द्वारा रचित मानक विधि-ग्रन्थों को भी विधि के स्रोत के रूप में स्वीकार किया है। जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है रूढ़ियाँ, न्यायालयीन पूर्व-निर्णय तथा विधान, ये विधि के तीन प्रमुख स्रोत हैं तथा न्यायाधीशों को अपने न्यायिक निर्णयों में इन स्रोतों से उत्पन्न विधियों के अनुसार न्याय निर्णय करना आवश्यक होता है। परन्तु विधि के इन प्रमुख स्रोतों के अलावा साम्या तथा समाज की धार्मिक एवं नैतिक मान्यताएँ भी न्यायाधीशों के निर्णयों को पर्याप्त रूप से प्रभावित करती हैं। इसी प्रकार विधिवेत्ताओं द्वारा रचित मानक विधि-ग्रन्थों में अभिव्यक्त विचारों का भी न्यायाधीशों के निर्णयों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि उन्हें विधिशास्त्रियों ने विधि के परोक्ष स्रोतों के रूप में मान्य किया है। प्रस्तुत अध्याय में विधि के इन दुय्यम स्रोतों के महत्व का विवेचन किया गया है।

1. साम्या (Equity) 

‘साम्या’ अर्थात् ‘इक्विटी’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘एक्विटास’ (acquitas) से हुई है, जिसका अर्थ है समानीकरण (to equalise)। विधिशास्त्र के अन्तर्गत ‘साम्या’ से तात्पर्य ‘औचित्य’ या न्यायिकता से है। साम्या एक ऐसा साधन है जिसके माध्यम से न्याय प्रशासन को न्यायिक आदर्शों के अनुकूल बनाया जा सकता है। डायस के अनुसार ‘साम्या’ से तीन आशय प्रकट होते हैं। प्रथम यह कि विधि की व्याख्या उचित और तर्कसंगत होनी चाहिये। द्वितीय यह कि विधि के प्रवर्तन में सामान्यीकरण (generality in its application) की ओर उचित ध्यान दिया जाना चाहिये, यद्यपि प्रकरण-विशेष के अनुसार उसे संशोधित करने की आवश्यकता पड़ सकती है। साम्या से तृतीय आशय यह है कि विधि की कमियों या दोषों को दूर किया जाये। विधि के दोषों या कमियों के कारण पक्षकारों के प्रति अन्याय होने की सम्भावना बनी रहती है। प्रारम्भिक काल एवं मध्य युग में जब अधिकांश विधियाँ अधिनियमित नहीं थीं तथा विधायन द्वारा संविधियों की रचना केवल कुछ विशिष्ट मामलों तक ही सीमित थी, साम्यिक सिद्धान्तों के माध्यम से प्रचलित विधि के दोषों तथा कमियों को दूर करने की पद्धति अपनाई गई थी। यह प्रवृत्ति इंग्लैंड में प्रचलित कॉमन लॉ में विशेष रूप से दिखलाई देती है जिसे साम्यिक सिद्धान्तों द्वारा अधिक समृद्ध, उपयुक्त तथा व्यावहारिक बनाया गया है।

साम्या की परिभाषा

साम्या के इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए विधिशास्त्रियों ने इसकी अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं

सर हेनरी मेन (Sir Henery Maine) के अनुसार ‘साम्या’ नियमों का ऐसा समूह है जो मौलिक विधि के साथ-साथ अस्तित्व में था तथा जो सुस्पष्ट सिद्धान्तों पर आधारित था। इन नियमों की अन्तर्निहित शद्धता (inherent sanctity) इन्हें प्रचलित सिविल विधि से अपेक्षाकृत ग्राह्य एवं प्रवर्तनीय बनाती है जिसके कारण य नियम प्रसंगवश सामान्य विधि का अतिलंघन करने की क्षमता रखते हैं।

1. डायस एण्ड ह्यज : ज्यूरिसप्रूडेन्स (1957 संस्करण), पृ० 151.

2. हेनरी मेन : एन्शिएण्ट लॉ, पृ० 34.

डॉ० ऐलन (Dr. Allen) के अनुसार अनेक विधि-प्रणालियों में प्रचलित विधि के अलावा न्यायाधीश को स्वविवेक की शक्ति प्रदान की जाती है ताकि वे प्रचलित विधि की अनम्यता या अन्य कमियों को दर कर सकें। इस विशिष्ट व्यवस्था को ही ‘साम्या’ कहते हैं।

विख्यात विधिवेत्ता स्टोरी (Story) ने ‘साम्या’ को उपचार-न्याय का वह भाग निरूपित किया है जो एकाधिकार के रूप में कोर्ट ऑफ इक्विटी द्वारा प्रशासित होता था और यह उपचार उन सिद्धान्तों के विपरीत हुआ करता था, जिनका प्रवर्तन ‘कॉमन लॉ’ न्यायालयों द्वारा किया जाता था।

प्राचीन काल में साम्या की स्थिति

प्राचीनकाल में यूनानी दार्शनिकों (Greek Philosophers) ने इस ओर विशेष ध्यान दिया था कि विधि के सामान्यीकरण में प्रकरण-विशेष के अनुसार साम्यिक सिद्धान्तों के आधार पर ढील दी जानी चाहिये ताकि इसके कठोर अनुपालन से होने वाले दुष्परिणामों से बचा जा सके। इस प्रकार साम्या के सिद्धान्तों के सहारे यूनानी न्याय-प्रशासन में विधियों के कठोर प्रवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों का निवारण किया गया था। रोमन न्याय-प्रणाली में भी विधि की अनम्यता (rigidity) कम करने के लिए साम्या के सिद्धान्तों का प्रयोग किया गया था। रोम की प्राचीन सिविल विधि अपनी प्रक्रियात्मक जटिलताओं के कारण अपरिवर्तनशील थी तथा औपचारिकताओं में जकड़ी हुई थी। अत: रोमन सभ्यता की प्रगति के साथ-साथ वह अनुपयुक्त सिद्ध होती गई। परिणामतः तत्कालीन सिविल विधि की कठोरता को कम करने के लिए प्रेयटर (Praetor)3 द्वारा नयी व्यवस्थायें दी जाने लगी जो अधिकांशत: साम्यिक सिद्धान्तों पर आधारित थीं। उल्लेखनीय है कि रोम में साम्या के सिद्धान्तों को लागू करने के लिए पृथक् न्यायालयों की स्थापना की गई थी जैसा कि पश्चात्वर्ती वर्षों में इंग्लैंड में किया गया था।

साम्या का विकास

इंग्लैण्ड में साम्या का विकास एक विशिष्ट प्रकार के न्यायालयों से हुआ जिन्हें कोर्ट ऑफ चांसरी (Court of Chancery) कहा जाता था। ऐतिहासिक आधार पर यह कहा जा सकता है कि इंग्लैण्ड में साम्या का प्रयोग चांसरी न्यायालयों द्वारा कॉमन विधि की कठोरता को दूर करने के लिए किया गया ताकि न्यायप्रशासन को उचित तथा मानवीय स्वरूप दिया जा सके। परन्तु इसका आशय यह कदापि नहीं है कि चांसरी न्यायालयों की स्थापना के पूर्व इंग्लिश विधि-व्यवस्था में विधियों के अवांछित दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए उसमें ढील नहीं दी जाती थी। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें इंग्लिश कॉमन-लॉ न्यायालयों ने विधि को उदारतापूर्वक लागू करते हुए उसके दुष्परिणामों को दूर करने का प्रयत्न किया था। परमाधिकार (Prerogative) का प्रयोग करते हुए सम्राट् द्वारा अपराधियों को क्षमादान किया जाना इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। इसी प्रकार ब्रिटिश सम्राट को यह अधिकार भी था कि यदि वह उचित समझे, तो व्यक्तिविशेष के प्रति किसी संविधि को लागू किया जाना निलम्बित कर सकता था।

इंग्लैंड में साम्या के विकास का वास्तविक प्रारम्भ तेरहवीं शताब्दी में एडवर्ड प्रथम के काल खण्ड से माना जाता है। उस समय वहाँ तीन प्रकार के न्यायालय कार्यरत थे; जिन्हें (1) सम्राट का न्यायालय (King’s Bench), (2) कॉमन लॉ न्यायालय (Common Law Court) तथा (3) एक्सचेकर न्यायालय (Court of Exchequer) कहा जाता था। इन सभी न्यायालयों का प्रशासन कॉमन लॉ के अनुसार हुआ करता था जो देश में प्रचलित रूढ़ियों तथा प्रथाओं पर आधारित था।

3. रोमन विधि में मुकदमों को निर्णीत करने वाले दण्डाधिकारियों को ‘प्रेयटर’ (Praetor) कहा जाता था। रोमन विधि-व्यवस्था में इनका वही स्थान था जो इंग्लैंड की साम्या विधि में चासरी न्यायालयों के चांसलर का था बकलैंड : ‘प्रेयटर एण्ड चांसलर’ (1939) 13 टरलेन लॉ रिव्यू 163.

4 स्टअर्ट राजाओं के समय में इस अधिकार-शक्ति का इतना अधिक दुरुपयोग कया गया कि अन्ततः सन् 1689 के

‘बिल ऑफ राइट्स’ द्वारा इसे अत्यधिक सीमित कर दिया गया.

रिट पद्धति5

आपराधिक न्याय-प्रशासन का कार्य सम्राट के न्यायालय द्वारा स्वयं किया जाता है जब कि दीवानी मामलों के लिए ‘रिट व्यवस्था’ (Writ System) अपनाई गई थी। इस व्यवस्था के अनुसार न्यायालय में वाद ले जाने के पूर्व वादी को एक्सचेकर के चांसलर (Chancellor of Exchequer) से ‘रिट’ (writ) की याचना करना आवश्यक था। रिट (writ) चांलसर द्वारा जारी किया गया एक प्रकार का अनुमति-पत्र होता था जो वादी को कॉमन लॉ न्यायालय में वाद प्रस्तुत करने के लिए अधिकृत करता था। परन्तु उल्लेखनीय है कि रिट केवल उन विशिष्ट मामलों के लिए ही जारी की जा सकती थी जो अपकार के रूप में मान्य थे। अतः रिट-व्यवस्था के कारण अनेक ऐसे मामलों में, जिनमें रिट उपलब्ध नहीं थी, वादी को क्षति होने पर भी प्रतिवादी के विरुद्ध न्यायालय में वाद दायर करने के अधिकार से वंचित रह जाना पड़ता था। निःसन्देह ही कॉमन विधि का यह एक महान् दोष था। इसके अतिरिक्त, अनेक वादों में कॉमन लॉ के अन्तर्गत उपचार उपलब्ध तो था, परन्तु यह यथेष्ट (adequate) नहीं था; परिणामतः वादियों को पूर्ण न्याय नहीं मिल पाता था। उदाहरणार्थ, संविदा-भंग के लिए केवल हानिपूर्ति का उपचार उपलब्ध था लेकिन संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन (specific performance of the contract) का कोई विधिक उपबंध नहीं था। कॉमन लॉ का एक अन्य दोष यह भी था कि इसमें औपचारिकताओं की बहुलता तथा दोषपूर्ण प्रक्रिया के कारण साधारण व्यक्ति को न्याय प्राप्त करने में अनेक व्यावहारिक कठिनाइयाँ होती थीं। सारांश यह कि तत्कालीन सामान्य विधि व्यवस्था में मुख्यतः तीन गंभीर दोष थे-(1) उपचार का अभाव (Absence of Remedy); (2) उपचार की अपर्याप्तता (Inadequacy of Remedy) तथा (3) औपचारिकता की अत्यधिकता (Excessive Formalism)। इन दोषों के कारण विवादियों को उचित न्याय मिलना कठिन था। इन दोषों को साम्या विधि द्वारा दूर करने का प्रयास किया गया।

चांसरी न्यायालय (Chancery Courts)

एक्सचेकर (Exchequer) विभाग सम्राट का प्रशासकीय विभाग था जिसके मुख्याधिकारी को चांसलर (Chancellor) कहा जाता था। सम्राट के नाम पर सभी लिखित आदेश चांलसर द्वारा ही जारी किये जाते थे। अत: इसे सम्राट की अन्तरात्मा का संरक्षण करने वाला (Keeper of the king’s conscience) माना गया था। ऐसे विवादी जिन्हें कॉमन विधि के उपर्युक्त वर्णित दोषों में से किसी का शिकार होना पड़ता था, सम्राट के समक्ष याचिका (petition) प्रस्तुत करते थे। ये याचिकाएँ सम्राट् द्वारा चांसलर के पास भेज दी जाती थीं, जो सम्राट की ओर से इन पर निर्णय देता था। परन्तु याचिकाओं की संख्या में निरंतर वृद्धि होने के कारण कालान्तर में सम्राट ने इनका निर्धारण पूर्णत: चांसलर को ही सौंप दिया।

प्रशासकीय विभाग के रूप में कार्य करने के अतिरिक्त चांसरी न्यायालय द्वारा राजस्व सम्बन्धी मामलों का निर्धारण भी किया जाता था।

सन् 1529 तक चांसलर के पद पर धर्म-गुरुओं की ही नियक्ति होती थी ताकि वे अपने स्वविवेक तथा अन्तर्चेतना के आधार पर ऐसे मामलों में न्याय दे सकें जिनके लिए कॉमन लॉ में कोई व्यवस्था नहीं थी। कालान्तर में इन मामलों को विनिश्चित करने की चांसलर की अधिकारिता पूर्णतः प्रतिस्थापित हो गयी।  

चांसलर की निरन्तर बढ़ती हुई न्यायिक अधिकार-शक्ति के साथ-साथ इंग्लैण्ड में साम्या विधि का विकास होता गया। विचाराधीन मामलों के निर्धारण में चांसलर द्वारा साम्या के सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता था, जो प्रायः प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों के अनुरूप होते थे। अत: चांसलर के न्यायालय में न्याय का आधार उसको अन्तर्चेतना तथा स्वविवेक बुद्धि होती थी न कि कोई निश्चित विधि। दूसरे शब्दों में, चांसरी

5. रट पद्धात को लेटिन सूत्र ubi remedium ibi jus द्वारा व्यक्त किया गया है जिसका अर्थ है जहाँ उपचार वहाँ 22 न्याय” अर्थात बिना रिट से न्याय मिलना सम्भव नहीं था.

6. तत्कालीन समाज में धर्म की प्रधानता के कारण धर्म-गुरुओं द्वारा दी गई व्यवस्था के प्रति किसी प्रकार का संदेह व्यक्त नहीं किया जा सकता था। वे सांसारिक प्रलोभनों के परे माने जाते थे। सर थॉमस मोर (Sir Thomas More) ऐसे प्रथम चांसलर थे जो विधि में पारंगत थे। वे सन् 1529 तक चांसलर के पद पर रहे.

विधि की तीक्ष्णता तथा कठोरता को कम करते हुए उपचार व्यवस्था को अधिक समृद्ध बनाना था। साम्या का उद्देश्य न तो कॉमन विधि को नष्ट करना था और न उसकी संरचना करना था बल्कि उसकी सहायता करना था। अतः साम्या कॉमन विधि की प्रतिद्वन्द्वी न होकर एक पूरक व्यवस्था के रूप में कार्य कर रही थी।

अठारहवीं शताब्दी तक साम्या-विधि इंग्लैण्ड की कॉमन लॉ विधि के समानान्तर व्यवस्था के रूप में पूर्णतः स्थापित हो चुकी थी। साम्या विधि का मुख्य कार्य कॉमन विधि के दोषों तथा कमियों को दूर करते हुए उसकी उपचार-व्यवस्था में पूर्णता लाना था। परन्तु उल्लेखनीय है कि कॉमन लॉ की कमियों को दूर करने के प्रयास में साम्या ने स्वयं ऐसे अनेक विधि-सिद्धान्तों को जन्म दिया जिन्हें वर्तमान इंग्लिश विधिव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो चुका है। इंग्लिश विधि की न्यास, बन्धक, कपट (fraud), सम्परिवर्तन (Conversion), संरक्षकता (Guardianship) आदि सम्बन्धी व्यवस्थाएँ निस्संदेह ही ‘साम्या’ की महान् उपलब्धियाँ हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि विकास की प्रारम्भिक अवस्था में साम्या को अपने औचित्यपूर्ण तथा समन्यायिक सिद्धान्तों के कारण पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त हुई, परन्तु इसके परिणामस्वरूप इसमें और कॉमन विधि में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई। कॉमन विधि के रूढ़िवादी समर्थक साम्या के महत्व को स्वीकार करने के लिए कदापि तैयार नहीं थे।

जूडीकेचर एक्ट 1873 तथा 1875 (Judicature Act, 1873 & 1875)

साम्या न्यायालयों में विधि-व्यवसायी चांसलरों की नियुक्ति के साथ साम्या के स्वरूप तथा कार्य-पद्धति में परिवर्तन आना स्वाभाविक था। अब यह केवल ‘अन्तरात्मा की आवाज’ पर आधारित कॉमन विधि से. पृथक् नहीं रही अपितु उसने स्वयं एक अनम्य (rigid) विधि-व्यवस्था का रूप ग्रहण कर लिया। स्पष्टतः इसी परिवर्तन के कारण अब इसे कॉमन विधि से भिन्न व्यवस्था के रूप में कायम रखने में कोई औचित्य नहीं था, क्योंकि एक ही समय दो समान विधि-व्यवस्थाएँ लागू करना न्यायोचित नहीं था। अतः लार्ड मेन्सफील्ड (Lord Mansfield) ने कुछ विषयों से सम्बन्धित कॉमन विधि और साम्या के सिद्धान्तों को एकल व्यवस्था के रूप में समेकित करने का प्रयास किया। परन्तु मेन्सफील्ड को इस कार्य में विशेष सफलता नहीं मिल सकी क्योंकि उनके निर्णय हाउस ऑफ लार्ड्स द्वारा प्रायः पलट दिये (over-rule) जाते थे।  

उल्लेखनीय है कि मेन्सफील्ड द्वारा किये गये कॉमन लॉ तथा साम्या के सिद्धान्तों के एकीकरण के प्रयासों की असफलता के कारण इंग्लैण्ड में कॉमन विधि और साम्या का विलयन (fusion) लगभग सौ वर्षों तक लम्बित रहा। परन्तु अठारहवीं शताब्दी के लगभग ब्रिटिश पार्लियामेन्ट ने अपनी विधायिनी शक्ति का प्रयोग करते हुए अनेक साम्यिक सिद्धान्तों को कॉमन विधि में उपबन्धित कर लिया। उदाहरण के लिए जार्ज द्वितीय के शासन-काल में पार्लियामेन्ट ने सन् 1731 एवं 1734 के कानूनों द्वारा कॉमन लॉ न्यायालयों को यह अधिकार दिया कि वे शास्तियों के विरुद्ध उपचार (Relief against Penalties) दे सकते थे तथा लगान के असंदाय (non-payment of rent) के लिए जब्ती (forfeiture) की कार्यवाही कर सकते थे। इसी प्रकार कॉमन लॉ में बन्धनकर्ता के मोचनाधिकार (Mortagagor’s right of Redemption) को भी विधिक मान्यता प्राप्त हुई।10 उल्लेखनीय है कि इन कानूनों के पारित होने के पूर्व ये सभी व्यवस्थाएँ साम्या की अधिकारिता (Jurisdiction) के अन्तर्गत थीं तथा कॉमन लॉ न्यायालय को इन पर सुनवाई करने का अधिकार नहीं था। यद्यपि इन परिवर्तनों से न्याय-प्रशासन में सुधार अवश्य हुआ परन्तु न्याय की दो भिन्न व्यवस्थाओं में अलगाव अभी भी बना रहा।

8. इस संघर्ष के परिणामस्वरूप जेम्स प्रथम के काल में कॉमन लॉ न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कोक (Coke) तथा चांसरी न्यायालय के चांसलर लार्ड एलिसमियर के बीच इन न्यायालयों की अधिकारिता को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ। हीथ बनाम रैडले (1614) के वाद में मुख्य न्यायाधीश कोक ने साम्या की अधिकारिता को चुनौती देते हुए कहा कि जो मामले कॉमन लॉ के क्षेत्राधीन हैं अत: उनमें साम्या का हस्तक्षेप सहन नहीं किया जा सकता है। परन्तु यह मामला सम्राट् के समक्ष लाया जाने पर इसमें साम्या के पक्ष में ही निर्णय दिया गया.

9. पिलान्स एण्ड रोज बनाम घान मिरोप एण्ड हापकिन्स, (1765) 3 Burr 1663.2000 (GAT

10.1731 (4Geo. II c. 28); see also 1734(7Geo. II c. 20).

उन्नीसवीं शताब्दी तक साम्या-विधि की औपचारिकताएँ तथा प्रक्रिया सम्बन्धी जटिलताएँ इतनी अधिक बढ़ गईं कि लोग चांसरी न्यायालय में वाद प्रस्तुत करने में हिचकिचाने लगे। विवादियों की असविधा को टा करने के लिए यह अनुभव किया गया कि यदि कामन लॉ न्यायालयों तथा साम्या-न्यायालय को एक-दूसरे के अधिकारों के प्रयोग की छूट दे दी जाए तो न्याय-प्रशासन को सुलभ बनाया जा सकता है। इस विचार को कार्यान्वित करने के उद्देश्य से सन् 1854 में दि कॉमन लॉ प्रोसीजर कोड पारित किया गया जिसके द्वारा कॉमन लॉ न्यायालय को व्यादेश (injunctions) तथा विनिर्दिष्ट अनुतोष (Specific Performance) की सीमित अधिकार-शक्ति प्रदान की गई जो अब तक केवल चांसरी न्यायालय को ही प्राप्त थी। इस प्रकार सन् 1858 में पारित चांसरी अमेन्डमेन्ट एक्ट, 1858 द्वारा चांसरी न्यायालय को यह अधिकार दिया गया कि वह उपचार के रूप में क्षतिपूर्ति के आदेश दे सकता था।11 परन्तु कॉमन लॉ और साम्या का वास्तविक विलय (fusion) सन् 1873 के जुडीकेचर एक्ट से ही माना जाता है। यह अधिनियम 1 नवम्बर, 1875 से प्रभावी हुआ। इसके प्रभावशाली होते ही पुराने चांसरी न्यायालय तथा कॉमन लॉ न्यायालय समाप्त कर दिये गये तथा इनके स्थान पर एक सुप्रीम कोर्ट ऑफ जुडीकेचर (Supreme Court of Judicature) की स्थापना हुई। सुप्रीम कोर्ट ऑफ जुडीकेचर के अधीनस्थ हाईकोर्ट को वे सभी अधिकारिताएँ प्रदान की गईं जो अब तक कॉमन लॉ तथा चांसरी न्यायालयों को प्राप्त थीं। 

प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से जुडीकेचर एक्ट द्वारा हाईकोर्ट को पाँच खण्ड-पीठों में बाँट दिया गया जो क्रमशः (1) चांसरी, (2) क्वीन्स बेंच, (3) कामन प्लीज (Common Pleas), (4) एक्सचेकर (Exchequer) तथा (5) प्रोबेट, डायवोर्स और एडमिरेल्टी डिवीजन कहलाते थे। इस प्रकार जुडीकेचर एक्ट पारित होने के परिणामस्वरूप कॉमन लॉ तथा साम्या, दोनों विधियाँ एक ही न्यायालय से प्रशासित होने लगीं जबकि इसके पूर्व वे भिन्न-भिन्न न्यायालयों से प्रशासित होती थीं। इस नवीन व्यवस्था के अन्तर्गत उक्त सभी विभागों के न्यायाधीश कॉमन लॉ तथा साम्या विधि, दोनों प्रकार के मामलों को निर्णीत करने की अधिकार शक्ति रखते थे।12

विधिवेत्ताओं में इस विषय पर मतभेद है कि सन् 1873 के जुडीकेचर एक्ट ने कॉमन लॉ और साम्या, दोनों के स्वतन्त्र अस्तित्व को मिटा दिया या केवल सामान्य न्यायालय और चांसरी न्यायालय को ही समाप्त किया जो इन दो विधियों को प्रशासित करते थे। इस सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए ऐशबर्नर (Ashburner) ने लिखा है कि यद्यपि वर्तमान में कॉमन विधि और साम्या का प्रवर्तन एक ही न्यायालय से होता है. परन्त विधिक और साम्यिक उपचारों और बचावों का भेद विधानों में आज भी विद्यमान है। यही विचार हेन्बरी की ‘माडर्न इक्विटी’ नामक ग्रन्थ के पाँचवें संस्करण के सम्पादक राक्सबर्ग (Roxburgh) ने भी व्यक्त किया है। इस तर्क की पुष्टि में वे लिखते हैं कि ‘माडर्न इक्विटी’ नामक ग्रन्थ का सन् 1949 में पाँचवें संस्करण में पदार्पण करना ही इस बात का द्योतक है कि साम्या का अस्तित्व आज भी यथावत बना हआ है। अत: यह कहना व्यर्थ है कि जुडीकेचर एक्ट, 1873 ने विधि और साम्या का विलयन (fusion) कर दिया है।13 इस सम्बन्ध में अधिकांश वर्तमान आंग्ल-विधिवेत्ताओं की भी यही धारणा है कि सन् 1873 के जूडीकेचर एक्ट ने केवल दो भिन्न न्यायालयों को समाप्त किया है, न कि कामन लॉ और साम्या विधि के भेद को।14

विधि के स्रोत के रूप में साम्या (Equity as a source of law)

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि विधि के विकास में साम्या का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। विधि के स्रोत के रूप में साम्या की मान्यता के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए सर हेनरी मेन (Sir Henry

11. इसे लार्ड कैरन्स एक्ट (Lord Cairans Act) भी कहा गया है.

12. जूडीकेचर एक्ट, 1873 धारा 25.

13. (1949), 66 LQR 524.

14. भारतीय न्याय-व्यवस्था में साम्या का स्वतन्त्र रूप से अस्तित्व कभी नहीं रहा तथापि साम्या के सिद्धान्त भारत का प्राचीन एवं वर्तमान विधियों में समाविष्ट हैं। उदाहरणार्थ, संपत्ति विधि, न्यास विधि, विनिर्दिष्ट अनुतोष विधि आदि.

Maine) ने कहा है कि विधि का स्थायित्व तथा इसकी अनम्यता (rigidity) प्रगतिशील समाज की नई आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधक होती है; अतः विधि को आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने के लिए अन्य साधनों15 का प्रयोग किया जाना आवश्यक है। इन साधनों में साम्या ही एक ऐसा साधन है, जो अपने गुरुतर सैद्धान्तिक शास्ति के कारण प्रचलित विधि पर बन्धनकारी प्रभाव रखती है। उल्लेखनीय है कि सर हेनरी मेन का यह अभिमत मूलतः इंग्लिश विधि के विकास पर ही आधारित है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि साम्या को विधि के स्रोत के रूप में स्वीकार करने का औचित्य इसलिए है कि यदि साम्या के किसी नियम या सिद्धान्त को किसी बन्धनकारी प्रभावयुक्त पूर्व-निर्णय (binding precedent) के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, तो उस पूर्व-निर्णय को विधि के स्रोत के रूप में मान्यता प्राप्त हो जाती है तथा भविष्य में आने वाले सम-प्रकरणों में न्यायालय उस पूर्व-निर्णय को अपने निर्णय का आधार बनाते हैं। परन्तु वस्तुत: व्यापक अर्थ में साम्या का वह नियम या सिद्धान्त ही उस पर्वनिर्णय का स्रोत का स्थान दिलाने के लिए कारणीभूत होता है। अतः स्पष्ट है कि परोक्षतः विधि के स्रोत के रूप में साम्या की भूमिका महत्वपूर्ण है।

2. विधि के स्रोत के रूप में धर्म तथा नैतिक धारणाएँ

प्राचीन काल में धर्म को विधि के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में मान्यता प्राप्त थी। अधिकांश समुदायों के प्रारम्भिक विकास के चरण में अनेक विधियाँ धर्म से ही अपना रूप ग्रहण करती थीं। भारत की प्राचीन हिन्दू विधि का आधार-बिन्दु मूलतः ‘धर्म’ ही रहा है। मुस्लिम विधि भी मूलत: कुरान तथा हिदाया जैसे धर्मग्रन्थों पर ही आधारित है।

धर्म (Religion)

पुरातन समय में यह आम धारणा थी कि विधि की उत्पत्ति दैवी-शक्ति से हुई। प्राचीन हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार वेदों को ईश्वर का वाक्य माना गया है। इसी प्रकार मुस्लिम विधि में कुरान को पीर गेब्रियल द्वारा पैगम्बर को दिये गये आदेश माना गया है। यही नहीं, यूनानी दार्शनिकों ने भी विधि की उत्पत्ति न्याय का देवता ‘थेमेस्टीज’ (Themestes) की दैवी-शक्ति से मानी है। यहाँ तक कि इंग्लिश विधि की उत्पत्ति में भी धर्म का प्रबल योगदान रहा है। साम्या के विकास के प्रारम्भिक चरण में चांसरी के धर्म-प्रधान चांसलरों का न्याय उनकी अन्तर्चेतना पर आधारित रहता था जो धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत रहती थी। यहाँ तक कि सन् 1857 में क्राउन बनाम मेलबॉन16 के वाद में न्यायाधिपति केली (Kelly) ने ईसाइयत को इंग्लिश विधि का एक अंग निरूपित किया था। यद्यपि इस सिद्धान्त को बाद में बोमैन बनाम सेक्युलर सोसाइटी17 के वाद में अपास्त (set aside) कर दिया गया। परन्तु ईसाई धर्म की निन्दा करना इंग्लिश विधि के अन्तर्गत आज भी अपराध माना गया है।18 

प्राचीन भारत में धर्म और विधि, दोनों में ही ‘कर्तव्य’ को प्रधानता दी गई थी। अतः विधि को एक कर्तव्य-संहिता (Code of Duties) का स्थान प्राप्त था जिसका मूल उद्गम श्रुति, स्मृति, वेद एवं उपनिषदों आदि धर्मग्रंथों से हुआ था। मेक्स मूलर (Max Muller) ने उपनिषदों को भारतीय पुरातन विधि का अभिनय स्रोत निरूपित किया है। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ नामक कृति में राजधर्म के कर्त्तव्यों का विस्तृत वर्णन के साथ-साथ तत्कालीन प्रचलित विधियों का भी उल्लेख है, जो विधि के स्रोत के रूप में एक अमूल्य कृति है।

15. हेनरी मेन के अनुसार विधि की परिकल्पनाएँ (legal fictions), साम्या (equity) तथा विधान (legislation), ये तीन ऐसे साधन हैं जिनके द्वारा विधि को समयानुकूल बनाया जा सकता है.

16. (1867) HL 2, Ex 280.

17. (1917) AC 406.

18.48 LT 733.

उल्लेखनीय है कि भारत में प्रचलित अनेक पुरातन विधियाँ भी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित थीं। उदाहरण के लिए असंहिताबद्ध हिन्दू विधि में ‘पुनीत बाध्यता’ (Pious Obligation) का सिद्धान्त जिसके अन्तर्गत पुत्र, पौत्र तथा प्रपौत्र का यह विधिक कर्त्तव्य था कि वे अपने पिता, दादा या परदादा द्वारा लिए गये व्यावहारिक ऋणों की अदायगी करें, पूर्णतः इस धार्मिक भावना पर आधारित था कि इससे मृत पिता, दादा या परदादा की आत्मा को शान्ति मिल सकेगी। तथापि धार्मिक विचारों में परिवर्तन के साथ-साथ विधि के स्वरूप में भी परिवर्तन होते रहते हैं, जैसा कि वर्तमान में भारत में जाति-पांति के आधार पर किसी व्यक्ति को देवालयों या मन्दिरों में प्रवेश निषेध करना एक दण्डनीय अपराध है।

नैतिक धारणाएँ

धर्म की भाँति नैतिकता सम्बन्धी धारणाएँ भी देश-विदेश की विधि को प्रभावित करती हैं। यह निर्विवाद है कि बदलती हुई सामाजिक तथा धार्मिक परिस्थितियों के साथ लोगों की नैतिक धारणाओं में परिवर्तन होता रहता है। उदाहरणार्थ, भारत में विधवा-पुनर्विवाह सम्बन्धी कानून, बाल-विवाह तथा दहेज पर पाबन्दी लगाने वाला कानून गर्भपात को अवैध घोषित किये जाने सम्बन्धी कानून तथा राज्यों द्वारा पारित लाटरी पर प्रतिबन्ध सम्बन्धी अधिनियम आदि इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि प्रचलित नैतिक मान्यताएँ परोक्षतः विधि के स्रोत के रूप में कार्य करती हैं।

इंग्लैण्ड में भी आंग्ल समाज की नैतिक मान्यताएँ इंग्लिश विधि को निरन्तर प्रभावित करती रही हैं। इस कथन की पुष्टि लार्ड मेन्सफील्ड द्वारा जोन्स बनाम रेन्डाल19 के वाद में दिये गये निर्णय से हो जाती है। इस वाद में उन्होंने विनिश्चित किया कि “ऐसी सभी बातें आंग्ल-विधि के अन्तर्गत वर्जित हैं जो नैतिकता के विपरीत हैं।” विख्यात आंग्ल-विधिशास्त्री ऑस्टिन (Austin) ऐसे प्रथम विधिवेत्ता थे जिन्होंने विधि और नैतिकता में भेद करते हुए स्पष्ट किया कि विधि में नैतिकता को कोई स्थान नहीं है। ऑस्टिन का मत था कि कानून को ज्यों-का-त्यों लागू किया जाना चाहिये तथा उसके प्रवर्तन में धर्म, नैतिकता आदि न्यायातिरेक बातों पर विचार करना व्यर्थ है। ऑस्टिन की उन्नीसवीं शताब्दी की प्रयोजनात्मक विचारधारा (pragmatism) का मूल लक्ष्य यही था।

3. सामाजिक मान्यताएँ तथा लोकमत (Social values and Public Opinion)

धर्म तथा नैतिकता के अतिरिक्त सामाजिक मान्यताएँ भी विधि को पर्याप्त रूप से प्रभावित करती हैं। किसी देश का लोकमत (Public Opinion) वहाँ की सामाजिक, आर्थिक एवं वैयक्तिक मान्यताओं पर निर्भर रहता है जिसकी अभिव्यक्ति उस देश की विधियों में परिलक्षित होती है। यह प्रवृत्ति अमेरिका और भारत की विधि में विशेष रूप से दिखलाई देती है। अमेरिकन सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस होम्स (Justice Holmes) ने इस सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि न्यायाधीशगण समाज का ही एक अंग होने के कारण वे सामाजिक एवं वैयक्तिक परिवर्तनों के प्रभाव से मुक्त नहीं रह पाते, अत: उनके निर्णयों में सामाजिक मान्यताओं का प्रतिबिम्बित होना स्वाभाविक ही है। इसी प्रकार भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा समय-समय पर दिये गये निर्णयों20 में वर्तमान भारतीय समाज की बदलती हुई परिस्थितियों की झलक स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ती है।

पैटन (Paton) का भी यही मत है कि विधि का मुख्य कार्य मानव के परस्पर विरोधी सामाजिक हितों में सन्तुलन बनाये रखना है। निवेदित है कि वर्तमान भारत के सम्पत्ति सम्बन्धी कानून (Property law) में

19. (1774) Crown. 17 (39).

20. मथुराबाई का वाद (तुकाराम बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए० आई० आर० 1979 सु० को० 185); बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1980 सु० को० 898; शीला बारसे बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए० आई० आर० 1989 सु० को० 378; ओल्गा टेलिस बनाम बम्बई म्युनिसिपल कार्पोरेशन, ए० आई० आर० 1986 सु० को० 180; विशाखा बनाम राजस्थान राज्य, ए० आई० आर० 1997 सु० को० 3011; राउरकेला श्रमिक संघ बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, ए० आई० आर० 2003 सु० को० 1060 आदि.

द्रतगति से हो रहे परिवर्तन21 इस बात के प्रतीक हैं कि विधि को सामाजिक मान्यताओं के अनुकूल बनाना ही होगा अन्यथा वह प्रभावहीन हो जायेगी। सारांश यह कि विधि का मूल उद्देश्य वैयक्तिक हितों और सामाजिक मान्यताओं में समन्वय स्थापित करना है।

विगत कुछ वर्षों में उच्चतम न्यायालय ने ऐसे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय दिये हैं जिनमें भारतीय समाज की बदलती हुई सामाजिक मान्यताओं एवं प्रगतिवादी लोकमत की झलक स्पष्टतः दिखलाई देती है। उदाहरणार्थ, इंडियन कौंसिल फॉर ईको-लीगल ऐक्शन बनाम भारत संघ22 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने प्रदूषण रोके जाने के प्रति अपनी गहरी चिंता व्यक्त की। इसी प्रकार विशाखा बनाम राजस्थान राज्य23 के वाद में न्यायालय ने कामकाजी महिला के लैंगिक शोषण तथा प्रताडन के प्रति अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए इसे रोकने हेतु कतिपय मार्गदर्शक नियम प्रतिपादित किये तथा इस संबंध में संसद् से अपेक्षा की कि वह महिलाओं के शोषण रोकने हेतु यथाशीघ्र समुचित कानून पारित करे। कन्जूमर एजूकेशन रिसर्च सेन्टर बनाम भारत संघ24 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने उपभोक्ता संरक्षण कानून को अधिक लोकोपयोगी बनाए जाने पर बल दिया जबकि इंडियन मेडीकल एसोसियेशन बनाम वी० पी० शांता25 के वाद में चिकित्सीय व्यवसाय में कार्यरत चिकित्सकों से अपने व्यवसाय के प्रति अधिक जागरूक एवं निष्ठावान होने की अपेक्षा सेवाभाव की आवश्यकता पर बल दिया। इसके अतिरिक्त बंधुआ मजदूरों की उन्मुक्ति, बालकों के संरक्षण, कैदियों के प्रति मानवीय व्यवहार, पुलिस अभिरक्षा में मौत के प्रकरणों के प्रति रोष आदि से संबंधित ऐसी अनेक ज्वलंत समस्याओं के मामलों में भी न्यायालय ने पर्याप्त रुचि दर्शाते हुए सामाजिक एवं आर्थिक न्याय को अधिक सार्थक बनाये जाने की दिशा में पहल की है।

4. विधिक स्रोत के रूप में मानक विधि-ग्रन्थ, सार-संग्रह तथा विधिवेत्ताओं की राय आदि  

रोमन विधि में विधिवेत्ताओं की विधि विषयक कृतियों का विशेष महत्व रहा है। रोमन सम्राट ऑगस्टस (Augustus) ने अपने समय के कुछ विधिवेत्ताओं की विधि-सम्बन्धी राय26 को प्राधिकार के रूप में मान्यता दी थी जिसका तत्कालीन न्याय-व्यवस्था में पर्याप्त महत्व था। दूसरी तथा तीसरी शताब्दी की रोमन विधि अधिकांशतः विधिवेत्ताओं की टीकाओं और भाष्यों पर आधारित थी। सन् 426 ई० में रोम के पाँच प्रमुख विद्वानों27 की कृतियों को बन्धनकारी प्रभावयुक्त घोषित किया गया। जस्टीनियन का सार-संग्रह (Digest of Justinian) जिसमें द्वितीय एवं तृतीय शताब्दी के विधिवेत्ताओं की विधि-विषयक रचनाओं का समावेश है, आज भी रोमन विधि के प्रमुख स्रोत के रूप में माना जाता है।  

इंग्लैण्ड में विधिवेत्ताओं के विधि-ग्रन्थों को उतना महत्व नहीं दिया गया जितना कि अमेरिका में। तथापि ब्रेक्टन, कोक, ब्लैकस्टोन, हेनरी मेन आदि की कृतियों का महत्व आज भी कम नहीं है। यह बात अलग है कि इन्हें बन्धनकारी प्राधिकार (binding authority) के रूप में मान्य नहीं किया गया है। वर्तमान में मेटलैंड, बेन्थम, सामण्ड, ग्लेनविल विलियम्स, विनफील्ड, पोलक, डेरेट, डायसी, जेथ्रोब्राउन, कीटन एच० डब्ल्यू० वेड, डि० स्मिथ, ग्रिफिथ आदि अनेक विधिवेत्ताओं की रचनाओं तथा कृतियों को विधि-क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

21. भारत के संविधान में हुए प्रथम, चतुर्थ, सत्रहवां, चौबीसवाँ, पच्चीसवाँ, उन्तालीसवाँ, बयालीसवाँ, चौवालीसवां तथा बासठवाँ संशोधन। गोलकनाथ बनाम राज्य, ए० आई० आर० 1967 सु० को० 1643 तथा केशवानन्द भारती, 1973 – सु० को० 1467; मिनर्वा मिल्स का वाद आदि.

22. ए० आई० आर० 1996 सु० को० 1476. कार र मनमान

23. ए० आई० आर० 1997 सु० को० 3011.

24. ए० आई० आर० 1995 सु० को० 922.

25. ए० आई० आर० 1996 सु० को० 550.

26. इसे जस-रेस्पान्डेन्डी Jus respondendi कहा गया है.

27. इन पाँच विधिशास्त्रियों के नाम थे-गेयस (Gaius), पेपीनियन (Papinian), पॉल (Paul), उल्पियन (UIpian) तथा माडेस्टिनस (Modestinus).

अमेरिकन विधिवेत्ताओं में होम्स, कार्डोजो, एच० एल० ए० हार्ट, रास्को पाउंड, कोहेन, ग्रे, जॉन रॉल्स आदि के नाम प्रमुख हैं, जिनकी कृतियों तथा विधिक विचारों ने अमरीकी विधि को वर्तमान स्वरूप दिया. जिसके परिणामस्वरूप वहाँ एक सुस्थापित प्रगतिगामी न्याय-व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ है।

फ्रांस की विधि संहिता मुख्यत: डोमेट (Domat) तथा पोथियर (Pothier) की कृतियों पर आधारित है विशेषज्ञों की राय को विधि के रूप में सफलतापूर्वक परिणित करने में अमेरिका में विधि के पुनर्लेखन (Restatement of Law) की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसमें न्यायाधीशों, वकीलों तथा विधि-प्राध्यापकों का सक्रिय योगदान रहा है। पैटन ने इसे आधुनिक विधि का प्रभावी स्रोत निरूपित किया है।

भारत में मुगल काल में औरंगजेब ने अपने शासनकाल में तत्कालीन हिन्दू-विधि का सार-संग्रह (Digest) तैयार करने हेतु बंगाल के पंडित रघुनन्दन शास्त्री की सेवाएं ली थीं जिन्होंने ‘फतवा-एआलमगिरी’ नामक ग्रंथ की रचना की जो सत्ताईस खण्डों में प्रकाशित हुई। यह कृति तत्कालीन हिन्दू विधि पर एक मानक सार-संग्रह के रूप में काफी लोकप्रिय हुई। 

ब्रिटिश शासन काल में भी भारत में कार्यरत अंग्रेज न्यायाधीशों की जानकारी तथा मार्ग-दर्शन हेतु स्थानीय भारतीय विधियों के अनेक मानक विधिग्रंथ तैयार कराये गए। इनमें सर विलियम जेम्स द्वारा रचित ग्रंथ ‘ऑर्डीनेन्सेस ऑफ मनु’ सन् 1794 में प्रकाशित हुआ जो हिन्दू विधि पर एक उत्कृष्ट कृति है। सन् 1797 में कोलबुक (Colebrook) ने भी हिन्दू विधि पर एक अन्य संहिता तैयार की। तत्पश्चात् सन् 1810 में उन्होंने ‘ट्रिटाइस ऑन हिन्दू लॉ ऑफ इनहेरिटेन्स’ (Treatise on Hindu Law of Inheritance) नामक ग्रंथ प्रकाशित किया जिसे हिन्दू विधि के अधीन दाय एवं उत्तराधिकार विषय पर प्रामाणिक सार-संग्रह की मान्यता प्राप्त हुई। इसके अतिरिक्त जे० डी० मेन (J. D. Maine) द्वारा रचित ‘हिन्दू लॉ एण्ड यूसेज’; सर थामस स्ट्रेंज द्वारा लिखित ‘हिन्दू लॉ ऑफ एडाप्शन्स’ (Hindu Law of Adoptions) आदि नेक मानक ग्रंथों का प्रकाशन भी भारतीय विधि के विकास एवं स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण माने गए हैं।

भारत की वर्तमान विधि में भी गणमान्य विधिवेत्ताओं तथा कानून-पण्डितों की कृतियों को पर्याप्त महत्व दिया गया है। भारत के उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर, हिदायतुल्ला, चन्द्रचूड, पी० एन० भगवती, पूर्व न्यायाधीश कृष्ण अय्यर, भूतपूर्व महाधिवक्ता सीतलवाड, सीरवाई, पालकीवाला आदि की रचनाओं के उद्धरण अनेक वादों में प्रायः उद्धृत किये जाते हैं। इसी प्रकार पराधिक विधि से सम्बन्धित अमीर अली, हरिसिंह गौड़, रतनलाल आदि की टीकाओं को अधिकृत विधि-ग्रन्थों के रूप में वर्षों में मान्यता प्राप्त है। धर्मशास्त्र पर लिखी गई काणे (Kane) की टीकाएँ हिन्दू विधि की प्राधिकत रचनाओं के रूप में मान्य हैं। इसी प्रकार अमीर अली, तैय्यबजी, मुल्ला तथा फैजी की मुस्लिम विधि पर लिखी गई कृतियों को इस विषय पर प्राधिकृत ग्रन्थों के रूप में मान्य किया गया है। स्वर्गीय श्री राधा विनोद पाल तथा डॉ० नगेन्द्र सिंह को सविख्यात अन्तर्राष्ट्रीय विधिशास्त्री के रूप में कौन नहीं जानता। दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व-कुलपति प्रोफेसर उपेन्द्र बक्षी का नाम बुद्धिजीवी अधिवक्ताओं में अग्रगण्य है जिन्होंने विधि सम्बन्धी अपने मौलिक विचारों द्वारा भारतीय विधिशास्त्र को नई दिशा लाने में सक्रिय योगदान दिया है। विधि से सम्बन्धित समस्याओं पर उनके द्वारा लिखे गए शोधपत्र तथा पुस्तकें निश्चित ही भारतीय विधिशास्त्र को संवर्धित करने में सहायक होंगी।28 सांविधानिक विधि की मौलिक कृतियों में एच० एम० सिरवई, एन० ए० पालकीवाला, डी० डी० बसु, बी० एन० शुक्ला, डॉ० पी० के० त्रिपाठी आदि के उद्धरण न्यायालयों द्वारा प्रायः प्रयुक्त किये जाते हैं।29

28डॉ. उपेन्द्र बक्षी द्वारा लिखित ‘भोपाल गैस ट्रेजेडी’ नामक कृति इसका प्रमाण है। आपकी अन्य कृतियों में ‘दि क्राइसिस ऑफ इंडियन लीगल सिस्टम’ (1982); ‘लॉ एण्ड पावर्टी’ (1988), ‘दि इंडियन सुप्रीम कोर्ट एण्ड पोलिटिक्स’ (1980) आदि विशेष उल्लेखनीय हैं.

29. सभी विख्यात विधिवेत्ताओं की रचनाओं का उल्लेख करना स्थानाभाव के कारण संभव नहीं है। अतः उल्लिखित विधिज्ञों तथा उनकी कृतियों के नाम केवल उदाहरण के रूप में दिए गये हैं.

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि यद्यपि साम्या, धार्मिक एवं नैतिक धारणाओं तथा विधिवेत्ताओं द्वारा रचित मानक विधि-ग्रन्थों को विधि के वास्तविक स्रोत के रूप में मान्य करना विवादास्पद है फिर भी इसमें सन्देह नहीं कि ये विधि के वास्तविक ‘स्रोत’ को बल प्रदान अवश्य करते हैं। समाज की प्रगति के साथ विधि को नई परिस्थितियों के अनुरूप बनाना आवश्यक होता है। विधि को आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने में साम्या तथा सामाजिक विचारधाराओं और विधि-वेत्ताओं की विधि सम्बन्धी रचनाओं में व्यक्त किये गये विचारों से निस्सन्देह ही पर्याप्त सहायता मिलती है। यही कारण है कि इन साधनों को भी विधि के स्रोत के समतुल्य मान्य किया जाता है। तथापि इसमें सन्देह नहीं कि विधि के स्रोत के रूप में इन्हें रूढ़ि, पूर्व-निर्णय तथा विधायन की तुलना में गौण स्थान प्राप्त है।

उल्लेखनीय है कि वर्तमान में भारत में अनेक विख्यात वृत्तिक तथा बौद्धिक विधि-व्यवसायी विधि के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं, जिससे भविष्य में अनेक उत्कृष्ट विधि-ग्रन्थों तथा मौलिक रचनाओं के सृजन की आशा की जा सकती है। परन्तु इसके लिए विधिक क्षेत्र में गुणात्मक सुधार लाना परम आवश्यक है जो उचित लोकमत तैयार करके तथा शासन-तन्त्र के क्रियात्मक सहयोग से ही सम्भव है। भारतीय विधि संस्थान जैसी संस्थाएँ भी इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं। वर्तमान परिस्थितियों में विधि के अध्ययन तथा प्रवर्तन के प्रति वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जाना आवश्यक है ताकि उसे सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप ढाला जा सके।

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