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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 20 Notes

 

LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 20 Notes: LLB Bachelor of Law 1st Semester / 1st Year Jurisprudence and Legal Theory Section 3 Judicial Precedents Most Important Notes Study Material Question Answer With Papers in Hindi English PDF Download.

 

अध्याय 20 (Chapter 20)

न्यायिक पूर्व-निर्णय (Judicial Precedents)

LLB Notes Study Material

 विधि के स्रोत के रूप में न्यायिक पूर्व-निर्णयों का पर्याप्त महत्व है। पूर्व-निर्णय से आशय किसी ऐसे । चित प्रतिमान (set pattern) से है जिसके आधार पर लोग अपना भावी आचरण आधारित कर सकें सन्दर्भ में पूर्व-निर्णय का अर्थ है ” भूतकालीन निर्णयों को मार्गदर्शक के रूप में अपनाते हुए भावी के प्रति लागू करना।” बेबीलोनिया में 2000 ई० पू० भी न्यायालयीन निर्णयों को अभिलिखित जाने की परिपाटी प्रचलित थी ताकि कानूनी परामर्श के लिए इनकी सहायता ली जा सके। रोमन fशास्त्र के अन्तर्गत न्यायाधीशों को यह निर्देश दिया गया था कि वे समान प्रकरणों में विख्यात तेत्ताओं द्वारा दिये गये पूर्व-निर्णयों का अनुसरण करें। उल्लेखनीय है कि महाद्वीपीय पद्धति में पूर्वनिर्णयों को बन्धनकारी नहीं माना गया है तथा न्यायाधीशों को यह विवेकाधिकार प्राप्त है कि वे अपने निर्णय को पर्व-दृष्टान्त पर आधारित करें या न करें। परन्तु इंग्लिश विधि में कुछ दशाओं में पूर्व-निर्णय तधनकारी प्रभाव रखते हैं, अर्थात् न्यायाधीशों को समान प्रकरणों वाले वादों में पुर्व-निर्णयों का अनुसरण करना अनिवार्य होता है।

पूर्व-निर्णय का अर्थ (Meaning of Precedent)

सामण्ड (Salmond) के अनुसार न्यायिक पूर्व-निर्णय न्यायालय द्वारा दिया गया ऐसा निर्णय है जिसमें विधि का कोई सिद्धान्त निहित होता है। पूर्व-निर्णय में निहित सिद्धान्त जो उसे प्राधिकारिक तत्व प्रदान करता है, विधिशास्त्रीय भाषा में विनिश्चय-आधार’ (Ratio decidendi) कहलाता है। ऐसे ठोस निर्णय सम्बन्धित पक्षकारों पर बन्धनकारी प्रभाव रखते हैं तथा इन निर्णयों के आधार को विधि के रूप में स्वीकार किया जाता है। दूसरे शब्दों में, न्यायिक पूर्व-निर्णय न्यायालय द्वारा निर्धारित ऐसे सिद्धान्त होते हैं जो भविष्य में न्यायालय के समक्ष निर्णय हेतु आने वाले समान वादों में लागू किये जाते हैं। उल्लेखनीय है कि सभी । न्यायिक निर्णय पूर्व-निर्णय का रूप धारण नहीं करते बल्कि केवल ऐसे निर्णय ही पूर्वोक्ति का महत्व रखते । हैं जो किसी नये नियम या विधि-सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हों।

प्रोफेसर गुडहार्ट ने सामंड के निर्णयाधार के सिद्धांत की आलोचना करते हुए लिखा है कि वस्तुत: न्यायालय द्वारा प्रतिपादित प्रत्येक सिद्धान्त विनिश्चय-आधार नहीं हो सकता है क्योंकि या तो वह बहुत  अधिक विस्तृत होता है या अत्यधिक संकीर्ण । अतः निर्णय के किसी विशिष्ट भाग को उद्धृत करके उसे  विनिश्चय-आधार कहना अनुचित होगा। गुडहार्ट के विचार से न्यायाधीशों द्वारा किसी मामले के तथ्यों के आधार पर निकाला गया निष्कर्ष (conclusion) ही उस वाद का विनिश्चय-आधार होता है। उनका कहना। है कि किसी पूर्ववर्ती निर्णय का निर्णयाधार ही न्यायाधीशों द्वारा पश्चातवर्ती निर्णयों में लागू किया जाना चाहिये। यही न्यायिक विनिश्चय जो पश्चात्वर्ती वादों में निर्णय का आधार होता है, भविष्य के लिए विधि। की शक्ति रखता है।

यह सत्य है कि कॉमन-लॉ का अनुसरण करने वाले देशों में नई विधियों का निर्माण तथा विधियों में सुधार संसदीय अधिनियमों द्वारा ही किये गये हैं, परन्तु फिर भी विधि के स्रोत के रूप में दिये गये पूर्व-निर्णयों का भरपूर योगदान रहा है। किसी न्यायाधीश द्वारा किसी फैसले में किया गया

1. डायस एण्ड यूज : ज्यूरिसपूडेंस, पृ० 52.

2. कीटन : एलीमेंट्री प्रिंसिपल्स ऑफ ज्यूरिसपूडेंस, पृ० 96.।

3. पूर्व-निर्णय या पूर्वोक्ति को ‘नजीर’ भी कहते हैं.

4. Goodhart; “The Ratio Decidendi of a Case” in Essays in Jurisp a Case” in Essays in Jurisprudence and Common Law, Chapt.

अभिकथन अन्य न्यायाधीशों के लिये अनुकरणीय हो सकता है तथा अधीनस्थ न्यायालयों के लिये उसका बन्धनकारी प्रभाव होगा, और इस प्रकार यह परोक्षत: ‘विधि’ का रूप धारण कर लेगा। तथापि यह दो शर्तों पर निर्भर करेगा। प्रथम यह कि वह निर्णय पर्याप्त रूप से वरिष्ठ न्यायाधीश द्वारा दिया गया हो, तथा दूसरा यह कि उस फैसले का केवल निर्णय सार (ratio decidendi) ही बन्धनकारी प्रभाव रखेगा न कि पूरा निर्णय।।

विनिश्चय-आधार (Ratio decidendi) के उदाहरण के रूप में ब्रिजेश बनाम हाक्सवर्थ के वाद को उद्धत किया जा सकता है। इस वाद में यह निर्णीत किया गया कि किसी दुकान की फर्श पर पड़े हुए सिक्के पर यदि वहाँ आने वाले किसी ग्राहक की दृष्टि पड़ती है और वह उसे सर्वप्रथम पा लेता है, तो उस सिक्के पर दुकानदार की बजाय ग्राहक का ही कब्जा-अधिकार होगा। यह निर्णय इंग्लिश विधि के सुस्थापित सिद्धान्त ‘फाइन्डर्स-कीपर्स’ (finders-keepers) पर आधारित था और यही इस वाद का निर्णयाधार (ratio (accidendi) माना जाएगा।

जर्मी बेन्थम (Jeremy Bentham) ने पूर्व-निर्णय को ‘न्यायाधीशों द्वारा निर्मित नियम’ (Judge-made law) कहा है जबकि ऑस्टिन (Austin) इस प्रकार के नियमों को न्यायपालिका की विधि’ (judiciary’s law) मानते हैं । पूर्व-निर्णयों के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए ब्लैकस्टोन (Blackstone) ने कहा है कि पूर्ववती निर्णयों के प्रयोग द्वारा न्याय की तराजु सन्तुलित तथा स्थिर बनी रहती है। नये न्यायाधीशों की नियुक्ति के साथ विधि में एकाएक नवीन परिवर्तन नहीं लाये जा सकते हैं। जो बातें पहले अनिश्चित रही हैं, वे न्यायिक पूर्व-निर्णयों के द्वारा विनिश्चित हो जाती हैं।7 ब्लैकस्टोन के इस तर्क का समर्थन अमेरिकी विधिशास्त्री डॉ० कार्टर ने भी किया है।8

कीटन के अनुसार न्यायिक पूर्व-निर्णय न्यायालय द्वारा दिये गये ऐसे न्यायिक विनिश्चय हैं जिन्हें किसी प्रकरण में निर्णय देने के लिए आधार बनाया जाता है। इसीलिए इन्हें ‘निर्णयाधार’ कहा गया है।

विख्यात अमरीकी न्यायविद् बेन्जामिन कारडोजो (Benjamin Cardozo) ने भी न्यायालयीन पूर्वनिर्णय को विधि के स्रोत के रूप में स्वीकार किया है किन्तु वे इसका कट्टरता से पालन किये जाने के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि न्यायपीठों (Benches) में निरन्तर परिवर्तन होते रहने के कारण उनके द्वारा दिये गये निर्णयों को बंधनकारी प्रभाव देना अनेक व्यावहारिक कठिनाइयाँ उत्पन्न कर सकता है।

बिर्च बनाम ब्राउन के वाद में लार्ड मैकमिलन ने पूर्व-निर्णय या पूर्वोक्ति के विषय में अभिकथन किया कि इन्हें न्याय-प्रवेश के मार्ग के रूप में अपनाया जाना चाहिये न कि अन्तिम विश्राम स्थल की तरह 10

आशय यह है कि किसी मुकदमे के निर्णय तक पहुँचने के लिए न्यायाधीश पूर्व निर्णय का आधार ले सकते हैं। किन्तु उन्हें विवादग्रस्त मामले में अन्तर्निहित तकनीकी बारीकियों को नजरंदाज नहीं करना चाहिये। कुछ विद्वानों ने पर्व-निर्णय की तुलना मदिरा से की है और कहा है कि जिस प्रकार समय के साथ मदिरा एक विशिष्ट बिन्दु तक उत्कृष्ट होती है परन्तु तत्पश्चात् उसका बिगड़ना प्रारम्भ हो जाता है, उसी प्रकार पूर्वोक्तियाँ एक निश्चित सीमा के बाहर अपना महत्व खो देती हैं। 

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि पूर्व-निर्णय एक ऐसा निर्देश है जो भावी निर्णय का आधार हो सकता है। यह एक उपाय है जिसका निरन्तर उपयोग किया जाता है और जो विधि में व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है। उल्लेखनीय है कि पूर्व-निर्णय का प्रवर्तन न्यायिक विनिश्चयों की शुद्धता की विधिक धारणा पर आधारित है। एक बार विनिश्चित मामला सदैव के लिए विनिश्चित माना जाता है। किसी निर्णय में जो बात

5. (1851) 21 LJ QB 75.

6. ऑस्टिन : ज्यूरिसपूडेंस, पृ० 645.

7. ब्लैकस्टोन : कमेंट्रीज (ग्रन्थ 1), पृ० 69.

8. कार्टर : लॉ, इट्स ओरिजिन, ग्रोथ एण्ड फन्कशन, पृ० 185.

9. (1931) ए० सी० 631.

10. तत्रैव (Ibid).

कही जाती है वह स्थापित सच्चाई होती है। जब तक किसी उच्चतर न्यायालय द्वारा किसी विनिश्चय को । पलट नहीं दिया जाता, तब तक पूर्व-निर्णय को चुनौती नहीं दी जा सकती है। यदि इसके विषय में कोई आपत्ति हो, तो उच्चतर न्यायालय में अपील दायर करके उसे विनिश्चित कराया जा सकता है। निर्णयानुसरण का सिद्धान्त (Doctrine of Stare Decisis) निर्णयानुसरण का सिद्धान्त इंग्लिश विधि का एक सर्वमान्य सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार पूर्वनिर्णय प्राधिकारपूर्ण (authoritative) तथा बन्धनकारी (binding) होते हैं तथा इनका अनुसरण किया जाना अनिवार्य है। जब अनेक निर्णयों द्वारा किसी वैधानिक प्रश्न को स्पष्टतया सुनिश्चित कर दिया जाता है, तो उसका अनुसरण करने तथा उसे न बदलने के सिद्धान्त को निर्णयानुसरण का सिद्धान्त (Doctrine of store decisis) कहते हैं। इंग्लैण्ड के न्यायालयों द्वारा दिये गये निर्णय समान तथ्यों वाले मामलों में ब्रिटेन के न्यायालयों पर बन्धनकारी (binding) होते हैं। इसीलिए वहाँ न्यायिक पूर्व-निर्णयों को विधि के तात्विक स्रोत के रूप में मान्यता प्राप्त है। निर्णयानुसरण के लिए दो बातें आवश्यक हैं-

(1) प्रथम यह कि निर्णीत वादों की रिपोर्टिंग (Law Reporting) की समुचित व्यवस्था होनी चाहिये; था ।

(2) द्वितीय यह कि श्रेणीबद्ध न्यायालयों की निश्चित श्रृंखला (hierarchy of courts) होनी चाहिये।

1. निर्णयों का प्रकाशन

इंग्लैण्ड का कॉमन लॉ अथवा वहाँ की अलिखित प्राचीन विधि प्राय: पूर्ण रूप से विनिश्चित मामलों की ही उत्पत्ति है। ऐसे विनिश्चित मामले लॉ रिपोर्ट्स में संकलित किये जाते हैं और ये निचली अदालतों के लिए बन्धनकारी प्रभाव रखते हैं। इंग्लैण्ड में न्यायिक पूर्व-निर्णयों को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है। ये केवल विधि का साक्ष्य ही नहीं बल्कि विधि के स्रोत भी हैं। पूर्व-निर्णयों द्वारा स्थापित विधि का अनुसरण सभी अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा किया जाना अनिवार्य है।

अनेक विद्वानों का मत है कि इंग्लैण्ड में निर्णयानुसरण का सिद्धान्त वस्तुत: विधि-निर्णय पत्रिकाओं के प्रकाशन (Law Reporting) का इतिहास है।11 पन्द्रहवीं शताब्दी तक इंग्लैण्ड में विधि-निर्णयों को प्रकाशित कराने की परिपाटी प्रारम्भ नहीं हुई थी तथापि ब्रैक्टन (Bracton) ने अपनी ‘नोट बुक’ नामक कृति में लगभग दो हजार विनिश्चयों को संकलित किया तथा इनमें से लगभग पाँच सौ का प्रयोग उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘ट्रिटाइस’ (Treatise) में किया। फिर भी उस समय तक निर्णयानुसरण को बन्धनकारी नहीं माना गया था।12 बैक्टन द्वारा पूर्व-नियों का संकलन इस प्रयोजन से किया गया था कि न्यायाधीश अपने निर्णय की पुष्टि में पूर्ववर्ती विनिश्चित समान वादों का सन्दर्भ दे सकें।  

इंग्लैण्ड में वार्षिक विधि-निर्णय-पत्रिका” (Year Book) के प्रकाशन ने निर्णयानुसरण के सिद्धान्त (Doctrine of sure decisis) के विकास में नई गति ला दी। इसे इंग्लिश विधि-निर्णय-पत्रिका की 9-भक अवस्था कहा जा सकता है तथापि यह वर्तमान लाँ-रिपोर्टिंग से भिन्न थी। वार्षिक निर्णयपत्रिकाओं का उपयोग विधि के अध्ययन के लिए आवश्यक समझा जाता था। न्यायाधीश भी किसी पूर्वनिर्णीत वाद का हवाला दे सकते थे, परन्तु वे उस निर्णय का अनुसरण करने के लिए बाध्य नहीं थे। | सोलहवीं शताब्दी में अनेक निजी प्रकाशकों ने विधि-निर्णयों को प्रकाशित कराया जिनमें डायर (Dyer) का नाम विशेष उल्लेखनीय है जिन्होंने 1513 से 1582 के मध्य अनेक निर्णय-पत्रिकाएँ प्रकाशित कराई। इसी प्रकार प्लोडन, कोक (1616) आदि के रिपोर्ट्स का प्रकाशन भी हुआ। सन् 1636 में गोडन बनाम हेल्स के वाद में मुख्य न्यायाधीश हरबर्ट ने विनिश्चित किया कि किसी वाद में एक्सचेकर न्यायालय द्वारा एक निश्चित विधि का नियम प्रतिपादित हो जाने के पश्चात् वह निर्णय भविष्य में आने वाले समान

11. इंग्लण्ड़ में लॉ-रिपोटिंग के इतिहास के विस्तृत विवेचन के लिए पोलक दारा लिखित फर्स्ट बुक ऑफ ज्यूरिस, अध्याय 5 देखिये.

12. डायरस एण्ड यूज : ज्यूरिसडेंस (1957), पृ० 55.

13.  Codden vs. Hales (1636), 11, State Trials, 1166 (1254).

वादों में, बन्धनकारी प्रभाव रखेगा तथा इस न्यायालय के न्यायाधीश इस सम्बन्ध में विवाद प्रस्तुत नहीं कर सकते।” परन्तु प्रारम्भ में यह सिद्धान्त केवल एक्सचेकर न्यायालय के लिए ही लागू किया गया था। सम्राटीय न्यायालय (King’s Bench) या कॉमन प्लीज न्यायालय (Courts of Common Pleas) में इसे प्रयुक्त नहीं। किया जाता था। इस सिद्धान्त को हाउस ऑफ लाईस सदन (House of Lords) के विनिश्चयों के प्रति भी लागू नहीं किया गया था। 

न्यायाधीश कोक (Coke) के पश्चात् लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक इंग्लैण्ड में उत्कृष्ट निर्णय प्रकाशन का। अभाव रहा। अठारहवीं शताब्दी में बरो (Burrow) ने अपनी लॉ-रिपोर्ट्स में सन् 1757 से 1771 तक के निणीत वादों को प्रकाशित कराया। इस समय तक पूर्ववर्ती वादों में विनिश्चित विधि के नियमों को भविष्य में निर्णय हेतु आने वाले वादों के प्रति लागू करने की पद्धति पूर्णत: स्थापित हो चुकी थी तथा निर्णयानुसरण के सिद्धान्त (atio decedendi) के बन्धनकारी स्वरूप को मान्यता प्राप्त हो चुकी थी।

सन् 1833 में न्यायमूर्ति पार्क (Justice Park) ने मायरहाउस बनाम रेनर14 के ऐतिहासिक विनिश्चय में पूर्व-निर्णयों के बंधनकारी प्रभाव के सिद्धांत को सभी अधीनस्थ न्यायालयों के प्रति लागू किये जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके फलस्वरूप सन् 1873 के ज्यूडीकेचर एक्ट के अन्तर्गत सुप्रीम कोर्ट ऑफ ज्यूडीकेचर की स्थापना के साथ इंग्लिश न्यायालयों में पूर्व-निर्णय का सिद्धांत पूर्णत: स्थापित हो गया। इस सिद्धांत के अनुसार जब किसी न्यायालयीन-निर्णय में विधि का कोई नया सिद्धांत प्रतिपादित किया गया हो, तो वह सभी अधीनस्थ न्यायालयों के लिए बंधनकारी प्रभाव रखेगा तथा समकक्ष न्यायालयों (Equivalent Courts) के लिए उसका अनुनयी (persuasive) प्रभाव होगा।

सन् 1865 में ‘इन्कारपोरेटेड काउन्सिल ऑफ लॉ रिपोर्टिंग’ द्वारा इंग्लैण्ड के विधि-निर्णयों का प्रकाशन अपने हाथ में लिए जाने के बाद पूर्व-निर्णयों के प्रयोग को अधिकाधिक सफलता प्राप्त हुई। कालान्तर में सन् 1936 में ऑल इंग्लैण्ड लॉ रिपोर्ट्स का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इसी प्रकार सन् 1953 से काउन्सिल ऑफ लॉ रिपोर्टिंग द्वारा वीकली लॉ रिपोर्ट्स (Weekly Law Reports) शीर्षक से एक नया न्याय-निर्णय प्रकाशन प्रारम्भ किया गया।

2. श्रेणीबद्ध न्यायालयों की श्रृंखला (Hierarchy of Courts)

 पर्व-निर्णयों के प्राधिकारिक तथा बन्धनकारी प्रभाव के लिए निर्णयों के प्रकाशन के अतिरिक्त सुनिश्चित  श्रेणीबद्ध न्यायालयों की श्रृंखला (hierarchy of courts) का होना भी नितांत आवश्यक है। इंग्लैण्ड में शृंखलाबद्ध न्यायालयों की स्थापना सन् 1873-75 के ज्यूडीकेचर एक्ट के अन्तर्गत हुई जब विभिन्न प्रकार के न्यायालयों को क्रमबद्ध श्रृंखला में वर्गीकृत किया गया। न्यायालयों की इस क्रमबद्ध श्रृंखला में हाउस ऑफ लार्डस को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है तथा कोर्ट ऑफ अपील हाउस ऑफ लास से निचले परन्तु हाईकोर्ट से उच्चतर श्रेणी के न्यायालय हैं। गेली बनाम ली15 के बाद में लार्ड डेनिंग (Lord Denning M.R.) ने अभिकथन किया कि कोर्ट ऑफ अपील स्वयं के पूर्व-निर्णयों से बाध्य नहीं है क्योंकि हाउस ऑफ लार्डस ने भी स्वयं पर से यह बंधन हटा लिया है।

सन 1966 तक इंग्लैण्ड का हाउस ऑफ लास भी स्वयं के निर्णय से बाध्य था।16 परन्तु 26 जुलाई, 1966 को इस न्यायालय ने यह घोषणा की कि भविष्य में वह स्वयं के निर्णयों से सदैव बाध्य नहीं रहेगा क्योंकि पर्व-निर्णय के सिद्धान्त का कठोरता से पालन करने के परिणामस्वरूप वाद-विशेष में पक्षकारों के प्रति घोर अन्याय हो सकता है और विधि की प्रगति अवरुद्ध होने की सम्भावना रहती है। हाउस ऑफ लार्डस ने यह स्पष्ट किया कि स्वयं के निर्णय से बाध्य न रहने का निर्णय केवल हाउस ऑफ लाईसे तक ही। सीमित रहेगा तथा अन्य न्यायालयों के लिए पूर्व-निर्णय का प्रभाव यथावत् बना रहेगा।।7 एक हाईकोर्ट का

14. Mirehouse V. Rennet Luaer (1833) CL & Fin 527 (546).

15. Gallie vs. Lee & Another (1969) Ail. E.R. 1062.

16. लन्दन स्ट्रीट ट्रामवेज कम्पनी बनाम लन्दन काउन्टी कौंसिल, (1898) ए० सी० 375,  

17. Wade E.C.S.: Constitutional Law (8th Ed. 1971) p. 313.

निर्णय अन्य हाई कोर्टों पर बन्धनकारी प्रभाव नहीं रखता क्योंकि स्तर की दृष्टि से वे सभी समकक्ष हैं। अतः कोई हाईकोर्ट यदि चाहे तो, किसी अन्य हाईकोर्ट द्वारा दिये गये निर्णय का अनुसरण कर सकता है या अनुसरण करने से इन्कार भी कर सकता है।  निर्णयानुसरण (stare decisis) के सिद्धान्त के अनुसार हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश (Single Judge) के निर्णय की बजाय खण्डपीठ (Division Bench) द्वारा दिया गया निर्णय अधिक महत्वपूर्ण होता है। | ब्रिटेन की प्रीवी कौंसिल (Privy Council) जोकि ब्रिटिश उपनिवेशों तथा अधिराज्यों (British Colonies and Dominions) के न्यायालयों के लिए सर्वोच्च न्यायाधिकरण का कार्य करती है, स्वयं के विनिश्चियों से बाध्य नहीं है। यद्यपि सैद्धान्तिक दृष्टि से ब्रिटेन का हाउस ऑफ लास तथा प्रीवी कौंसिल की न्यायिक समिति (Judical Committee of Priyy Council) दो अलग-अलग न्याधिकरण हैं तथा उनकी अधिकारिता भी भिन्न-भिन्न होती है, परन्तु इन दोनों न्यायाधिकरणों के सदस्य एक ही व्यक्ति होते हैं। यही कारण है कि प्रीवी कौंसिल के निर्णयों को भी हाउस ऑफ लार्ड्स के निर्णयों की भांति अत्यंत सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त है। इन दोनों न्यायाधिकरणों में एक अन्तर यह भी है कि प्रीवी कौंसिल की न्यायिक समिति सिद्धान्ततः एक परामर्शदात्री समिति है जो सम्राज्ञी को उपनिवेशों से आई अपीलों के बारे में परामर्श देती है। इसीलिए इस समिति के केवल बहुमत निर्णय का ही प्रकाशन किया जाता है तथा विसम्मत निर्णय प्रकाशित नहीं होते हैं।

इंग्लिश विधि के पूर्व-निर्णय के सिद्धान्त को अमेरिका तथा भारत18 आदि देशों ने भी स्वीकार किया है। क्योंकि इन देशों की विधि व्यवस्था ब्रिटिश न्याय-प्रणाली पर आधारित है।

महाद्वीपीय न्याय-प्रणाली में पूर्व-निर्णय की उपेक्षा 

उल्लेखनीय है कि यूरोप की महाद्वीपीय न्याय-व्यवस्था में न्यायिक पूर्व-निर्णयों को विशेष महत्व नहीं दिया गया है और न वे बन्धनकारी प्रभाव ही रखते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत न्यायाधीश पूर्ववर्ती निर्णयों का अनुसरण करने के लिए बाध्य नहीं हैं। आंग्ल-विधि पद्धति तथा महाद्वीपीय विधि प्रणाली की पूर्व-निर्णय सम्बन्धी इस विषमता पर टिप्पणी करते हुए प्रोफेसर ग्रे (Prof. Gray) कहते हैं कि यह विधिशास्त्र की एक अद्भुत समस्या है। सम्भवतः इसका कारण यह है कि अंग्रेजों की तुलना में यूरोपीय महाद्वीप के लोग रोमन-विधि से अधिक प्रभावित हुए थे तथा रोमन-विधि के अन्तर्गत जस्टिनियन (Justinian) के मतानुसार प्रत्येक निर्णय विधि पर आधारित होना चाहिए न कि पूर्व-निर्णय पर।19 इसका कारण यह है कि यदि कोई न्यायाधीश किसी पूर्ववर्ती निर्णय में अन्तर्विष्ट विधि के सिद्धान्त को उचित नहीं मानता है, तो वह उसे मानने के लिए बाध्य क्यों किया जाय? फ्रांस के सिविल कोड के अनुच्छेद 5 में यह स्पष्ट किया गया है कि फ्रांस की विधि में पूर्व-निर्णय बन्धनकारी प्रभाव नहीं रखते हैं।

भारत में निर्णयानुसरण के सिद्धान्त की स्थिति

इंग्लैण्ड की भाँति भारत में भी निर्णयानुसरण के सिद्धान्त (doctrine of stare decisis) को स्वीकार किया गया है। भारतीय विधि अधिकांशतः ब्रिटिश विधि पर आधारित होने के कारण भारत में भी विधिनिर्णयों के प्रकाशन और प्रसारण में समुचित प्रगति हुई है। भारत के विधि आयोग की सन् 1995 की रिपोर्ट के अनुसार सम्पूर्ण भारत में उस समय में कुल मिलाकर 84 निर्णय-पत्रिकाओं का प्रसारण हो रहा था जिनमें 24 सरकारी, 47 गैर-सरकारी तथा 13 विशिष्ट पत्रिकाएँ थीं 20 इसमें ऑल इण्डिया रिपोर्ट्स, सुप्रीम कोर्ट जर्नल तथा विभिन्न राज्यों द्वारा प्रकाशित इण्डियन लॉ रिपोर्टर विशेष महत्वपूर्ण हैं। गत दशकों में हिन्दी

18. अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट तथा भारत का उच्चतम न्यायालय स्वयं के निर्णय से बाध्य नहीं हैं, अर्थात् यदि इनके द्वारा दिया गया कोई पूर्ववर्ती निर्णय असंगत हो, तो वे उसे पलट सकते हैं देखें, गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1967 सु० को० 1643; ज्ञानकौर बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1996 सु० को० 946 आदि.

19. ग्रे० जे० सी० : नेचर एण्ड सोर्सेज ऑफ ला, पृ० 212.

20. डॉ० : परांजपे, एन० वी० : भारत का विधिक एवं सांविधिक इतिहास (आठवाँ संस्करण, 2006), पृ० 370-378.

भाषा में भी अनेक मानक विधि-निर्णय पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं जिनमें उच्चतम न्यायालय निर्णय पत्रिका तथा उच्च न्यायालय निर्णय पत्रिका विशेष उल्लेखनीय हैं।  

भारत की न्याय-व्यवस्था में न्यायालयों की एक क्रमबद्ध श्रृंखला है जिनमें उच्चतम न्यायालय का सर्वोच्च स्थान है। उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के अधीनस्थ अनेक उच्च न्यायालय (Hich Court) कार्यरत हैं। प्रत्येक उच्च न्यायालय के अधीन जिला न्यायालय तथा अधीनस्थ न्यायालय हैं। उच्चतम न्यायालय का निर्णय सभी भारतीय न्यायालयों पर बन्धनकारी प्रभाव रखता है।21 उच्च न्यायालय के निर्णय उसके अधीनस्थ न्यायालयों के प्रति बन्धनकारी होते हैं22 किन्तु अन्य उच्च न्यायालयों पर वे बन्धनकारी नहीं होते हैं। एक उच्च न्यायालय (High Court) किसी अन्य उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये। निर्णय को मानने से इन्कार कर संकता है। क्योंकि ऐसा पूर्व-निर्णय केवल अनुभवी महत्व (Persuasive value) रखता है। किसी न्यायालय की पूर्ण न्यायपीठ (Full Bench) के निर्णय उस न्यायालय की खण्डपीठ (Division Bench) पर बन्धनकारी होंगे। इसी प्रकार खण्डपीठ के निर्णय उसी न्यायालय के एक न्यायाधीश की एकल न्याय-पीठ (Single Bench) पर बन्धनकारी होते हैं।23

सन् 1949 तक इंग्लैण्ड की प्रिवी कौंसिल (Privy Council) को भारत के न्यायालयों में सर्वश्रेष्ठ न्यायालय के रूप में मान्यता थी। उस समय तक भारत में उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की। स्थापना नहीं हुई थी। अत: भारत के उच्च न्यायालयों (High Courts) से अपील प्रिवी कौंसिल को होती थी। प्रिवी कौंसिल के निर्णय भारत के सभी न्यायालयों पर बन्धनकारी थे। परन्तु सन् 1949 से भारतीय न्यायालयों पर से प्रिवी कौंसिल की अधिकारिता समाप्त हो गई। उल्लेखनीय है कि भारत का उच्चतम न्यायालय स्वयं के निर्णय से बाध्य नहीं है।24 इसी प्रकार यह न्यायालय प्रिवी कौंसिल के निर्णय को मान्य करने के लिए बाध्य नहीं है,25 अर्थात् यदि वह चाहे, तो प्रिवी कौंसिल के निर्णय (ruling) को अमान्य कर सकता है। भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) इंग्लिश वादों के निष्कर्षों (dicta) को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।26 उल्लेखनीय है कि पूर्व-निर्णय के रूप में अप्रतिवेदित (unreported) निर्णयों का वही महत्व है जो कि प्रतिवेदित निर्णयों का है। 

भारतीय स्वतंत्रता के पहले पूर्व-निर्णयों के बन्धनकारी प्रभाव के सिद्धान्त को भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 212 के अन्तर्गत मान्यता प्रदान की गई थी। इस धारा के अनुसार प्रीवी कौंसिल तथा संघीय न्यायालय (Federal Court) के निर्णय ब्रिटिश भारत के सभी न्यायालयों के लिए बंधनकारी थे।

भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात् भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के अन्तर्गत पूर्व-निर्णयों की बाध्यता के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया था। इस धारा के अनुसार भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय सभी न्यायालयों के लिए बंधनकारी प्रभाव रखते हैं तथा न्यायालय स्वयं भी उनका अनुसरण करने के लिए बाध्य था। परन्तु सन् 1955 के बंगाल इम्यूनिटी कंपनी बनाम बिहार राज्य27 के निर्णय के बाद उच्चतम न्यायालय स्वयं के निर्णय से बाध्य नहीं रहा और अब न्यायोचित होने पर वह अपने पूर्व-निर्णय को पलट सकता है। ए० आर० अन्तुले बनाम आर० एस० नाईक28 के वाद में भी उच्चतम न्यायालय ने अपने पर्व-निर्णय को नजरअन्दाज करते हुए अवलोकन किया कि आवश्यक होने पर वह अपने गर्व-निर्णय । से हटकर निर्णय दे सकता है।

21. भारत का संविधान, अनुच्छेद 141.

22. रेक्स (Rex) बनाम रामदयाल, ए० आई० आर० 1950, इलाहाबाद 134.

23. तरपोंडा बनाम मृत्युंजय, ए० आई० आर० 1958 कलकत्ता 314.

24. बंगाल इम्यूनिटी कम्पनी लि० बनाम स्टेट ऑफ बिहार, ए० आई० आर० 1955, सु० को० 661; गोलकनाथ, केशवानन्द भारती तथा मिनर्वा मिल; ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य, 1996 सु० को० 946 आदि के वाद.

25. श्रीनिवास बनाम नारायण, ए० आई० आर० 1954 सु० को० 375.  

26. मणीपुर प्रशासन बनाम बीरा सिंह, ए० आई० आर० 1965 सु० को० 87.

27. ए० आई० आर० 1955 सु० को० 661.

28. ए० आई० आर० 1988 सु० को० 151.

सोमवंती बनाम पंजाब राज्य29 के विनिश्चय में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पूर्व-निर्णय का केवल निर्णयानुसार (ratio decidendi) ही बन्धनकारी प्रभाव रखता है न कि संपूर्ण निर्णय। अत: उच्चतम न्यायालय के निर्णय में दी गई इतरोक्ति (obiter dicta) निचले न्यायालयों के लिए बंधनकारी प्रभाव नहीं रखती है। परंतु उच्चतम न्यायालय ने श्रवण सिंह लांबा बनाम भारत संघ30 के वाद में स्पष्ट किया है कि उसके द्वारा दिये गए निर्णय की इतरोक्ति भी सभी निचली न्यायालयों के लिए बंधनकारी प्रभाव रखती है और वे उसका अनुसरण करने के लिए बाध्य हैं। 

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ के वाद में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निर्णयाधार (ratio decidendi) का नियम अनम्य नहीं है तथा सांविधानिक मामलों में उसकी सुसंगतता सीमित होती है। इसमें संदेह नहीं कि इस नियम से निर्णीत वादों में समानता और एकरूपता आती है, तथापि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा अपनी अन्तर्निहित शक्ति (Inherent power) का प्रयोग करते समय इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि क्या अपने पूर्व-निर्णय को पलटना लोकहित या किसी अन्य कारण से उचित होगा? ।

कृष्णा स्वामी बनाम भारत संघ32 के बाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्णयाधार के महत्व एवं उसकी सीमाओं की व्याख्या करते हुए अभिनिर्धारित किया कि अनु० 141 के अनुसार संविधान के निर्वचन के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए विनिश्चय में अंतिमता (finality) होती है और वह पूर्व-निर्णय के रूप में प्रयुक्त किये जाने के कारण उसमें स्थायित्व, निश्चितता एवं निरंतरता होना परम आवश्यक है। उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वयं के पूर्व-निर्णय का अनुसरण किये जाने में ही बुद्धिमत्ता है जब तक कि उससे हटने के लिए कोई युक्तियुक्त कारण न हो या वृहद लोकहित में ऐसा करना अत्यावश्यक न हो।

उच्चतम न्यायालय ने वचनसिंह बनाम पंजाब राज्य33 के फैसले में अभिनिर्धारित किया कि निर्णयाधार के नियम का आँख मूंदकर यंत्रवत अनुसरण किया जाए, तो यह विधि का विकास अवरुद्ध कर उसे बौना बना देगा और इससे समाज की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को ढालने की उसकी क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

दुरकिन (Dwerkin) के अनुसार पूर्वोक्त द्वारा किसी न्यायिक निर्णय को दो प्रकार का बल प्राप्त होता है। प्रथम यह कि भविष्य में उद्भूत होने वाले समान प्रक्रमों में उसे लागू किया जाता है तथा दूसरे समान प्रकरणों को समान नियमों या सिद्धान्तों के आधार पर निपटाया जाता है। पूर्वोक्त से नागरिकों को यह जानने में सुविधा होती है कि अमुक विषय पर न्यायालय की प्रतिक्रिया क्या होगी। इसके अतिरिक्त पूर्वोक्त विधि को निश्चितता, सम्भाव्यता (predictability) तथा निश्चितता प्रदान करती है, जो विधि के आवश्यक तत्व माने जाते हैं।

निर्णय-सार तथा प्राङ्गन्याय में विभेद (Distinction between ratio decidendi and res judicata) निर्णय-सार (ratio decidendi) के सन्दर्भ में इसमें तथा प्राङ्गन्याय (Res Judicata) में विभेद स्पष्ट करना उचित होगा। प्राङ्गन्याय का अर्थ है कि न्यायालय द्वारा दिये गये किसी अन्तिम फैसले (judgment) के बारे में सम्बन्धित पक्षकारगण या उनके उत्तराधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति किसी पश्चात्वर्ती प्रकरण में पुनः निर्णय की मांग नहीं कर सकेगा।

निर्णय-सार और प्राङ्गन्याय में मुख्य अंतर निम्नानुसार है-

29. ए० आई० आर० 1963 सु० को० 151.

30. ए० आई० आर० 1995 सु० को० 1729.

31. ए० आई० आर० 1994 सु० को० 268. 32. ए० आई० आर० 1993 सु० को० 1407.

33. ए० आई० आर० 1980 सु० को० 898.

(1) निर्णयानुसार किसी वाद में दिये गये फैसले का मूल विधिक आधार होता है जबकि प्राङ्गन्याय किसी वाद के विनिश्चय (decision) से सम्बन्धित होता है।

(2) निर्णय-सार सभी के प्रति लागू होता है, परन्तु प्राङ्गन्याय से केवल सम्बन्धित पक्षकार तथा उनके उत्तराधिकारी ही बाध्य होते हैं।

(3) निर्णय-सार का प्रश्न केवल तभी उठता है जब किसी उच्चतर न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट) का निर्णय सन्दर्भित हो, लेकिन प्राङ्गन्याय सभी न्यायालय के प्रति लागू होता है।

(4) निर्णयसार तत्काल उसी समय से प्रभावी हो जाता है जिस समय उच्चतर न्यायालय ने निर्णय दिया हो, परन्तु इसके विपरीत प्राङ्गन्याय तभी लागू होगा जब न्यायालय के निर्णय के पश्चात् अपील की समयावधि समाप्त हो चुकी हो।

इतरोक्ति (obiter dicta)

इतरोक्ति (obiter dicta) निर्णयाधार से भिन्न है। विधि की ऐसी घोषणाएँ जो निर्णयाधार का अंश नहीं हैं, इतरोक्ति कहलाती हैं और ये बन्धनकारी प्रभाव नहीं रखती हैं।34 न्यायिक निर्णय के आधारभूत विधिसिद्धान्त को निर्णयाधार कहते हैं जिसे विशिष्ट मामले में लागू किया जाता है। जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है, ये सिद्धान्त प्राधिकारिक तथा बन्धनकारी (authoritative and binding) प्रभाव रखते हैं। न्यायालय जब अपने तर्क के प्रवाह में किसी ऐसे सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं जिसे वे अपने किसी निर्णयविशेष का आधार नहीं मानते, तो उनके द्वारा किये गये ऐसे प्रतिपादन को इतरोक्ति (obiter dicta) कहते हैं। इतरोक्ति से तात्पर्य उन बातों से है जो आनुषंगिक रूप में कही जाती हैं। इनका प्रभाव केवल प्रत्ययकारी होता है तथा वे अनुनयात्मक (persuasive) होती हैं।

यदि कोई न्यायाधीश किसी वाद में दिये गये अपने निर्णय को एक काल्पनिक दृष्टान्त द्वारा समझाने का प्रयास करता है, तो उस काल्पनिक दृष्टान्त के प्रति लागू किया गया विधि का सिद्धान्त वास्तविक परिस्थितियों के संबंध में न होते हुए भी इतरोक्ति कथन (obiter dicta) का प्रभाव रखेगा क्योंकि बन्धनकारी न होते हुए भी वह समान वादों में न्यायाधीशों के लिए मार्गदर्शक का कार्य कर सकता है। । डॉ० ऐलन के मतानुसार इतरोक्ति अनेक बार उद्धृत होने के पश्चात् बन्धनकारी प्रभाव रखने लगती है। उनका कहना है कि इतरोक्ति तथा निर्णयाधार में अन्तर स्पष्ट करना कठिन है। प्रत्येक निर्णय न्यायाधीश के व्यक्तिगत विचारों से प्रभावित होता है। अतः इन दोनों का भेद प्रत्येक निर्णय में भिन्न-भिन्न कारणों पर निर्भर करता है। सामान्यतः किसी व्यक्ति को किसी निर्णय में जो बात रुचिकर लगती है, वह उसके लिए सुसंगत होती है और जो उसे रुचिकर नहीं लगती वह उसकी दृष्टि में असंगत होती है। फलत: ऐलन के अनुसार निर्णय-रूपी दुध से विनिश्चय-आधार रूपी मक्खन निकालने के लिए निश्चित मापदण्ड नहीं है, केवल कुछ निर्देशात्मक सिद्धान्त हो सकते हैं जिनका न्यूनाधिक पालन किया जा सकता है। 

पैटन के अनुसार इतरोक्ति से आशय न्यायाधीश द्वारा अपने निर्णय में विधि के बारे में व्यक्त वे विचार हैं। जो निर्णय में उत्पन्न समाधान के लिए किसी प्रश्न या मुद्दे से संबंधित बहस का भाग नहीं है।

एस० आर० बोम्मई बनाम भारत संघ35 के वाद में न्यायपीठ के विभिन्न सदस्यों द्वारा संविधान के मूल ढाँचे की विषयवस्तु के बारे में किये गये विभिन्न कथनों को इतरोक्ति माना गया है। इस वाद में नौ सदस्यीय न्यायपीठ ने सर्वसम्मति से धर्म निरपेक्षता को मूल ढाँचे का भाग माना लेकिन न्यायमूर्ति अहमदी ने अनुच्छेद 15, 16 एवं 25 में दिये गये मूल अधिकारों को मूल ढाँचे के रूप में सम्मिलित किया। इसी तरह न्यायमूर्ति सावंत और कुलदीप सिंह ने सामाजिक बहुलवाद को मूल ढाँचे का अंग निरूपित किया तथा न्यायमूर्ति रामास्वामी ने समाजवाद, सामाजिक न्याय, धार्मिक सहिष्णुता एवं बंधुत्व को संविधान के मूल ढाँचे का भाग माना। चूंकि ये प्रश्न इस वाद में उठे ही नहीं थे, अत: इन्हें इतरोक्ति माना गया है।

34. Pronouncements of law, which are not part of the ratio decidendi are called obiter dicta and they are not authoritative or binding on subordinate courts.

35. (1994) 3 एस० सी० सी० 1 (78, 118, 205).

निर्णयाधार (ratio decidendi) तथा इतरोक्ति (obiter dicta) में भेद समझने के लिए आर० बनामफ्रेंकलिन36 के वाद को उद्धृत करना उपयुक्त होगा।

इस वाद में मृतक ट्रेन्चार्ड (Trenchard) जुलाई, सन् 1882 को ब्राइटन (Brighton) नामक स्थान में समुद्र-स्नान कर रहा था। अभियुक्त फ्रेंकलिन ने उस समुद्र के किनारे पर स्थित उपहारगृह से एक बड़ी-सी पेटी उठाकर समुद्र में फेंक दी जो समुद्र में तैरते हुए ट्रेन्चार्ड को जा लगी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

कालने का मानव-वध (manslaughter) के अभियोग में न्यायाधीश फील्ड (Field J) के न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। अभियुक्त को न्यायाधीश द्वारा दो मास के कारावास से दंडित किया गया। न्यायमूर्ति फील्ड के अनुसार इस वाद का निर्णयाधार (ratio decidendi) यह था कि-

(1) यदि कोई व्यक्ति किसी अपकृत्य को करते समय या करने के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु के लिए कारणीभूत होता है, तो वह केवल इस कारणमात्र से कि उससे किसी की मृत्यु हो गई है, मानव-वध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

(2) वह व्यक्ति जो घोर असावधानी (gross negligence) के कारण किसी की मृत्यु कारित करता है, मानव-वध के लिए दोषी होगा, अर्थात् आपराधिक विधि में अपराध-कृत्य के साथ अपकृत्य घटित हुआ या नहीं, यह पूर्णतः असंगत (irrelevant) तथ्य है। इस वाद में इतरोक्ति (obiter dicta) के रूप में न्यायाधीश ने व्यक्त किया कि यदि अभियोजन-पक्ष (prosecution) द्वारा अभियुक्त के विरुद्ध उठाये गये सभी तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध हो भी जाए कि अभियुक्त ने आरोपित अपकृत्य (tort) किया है, फिर भी वह तब तक मानव-वध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि जूरी द्वारा इस आशय का अभिमत व्यक्त न किया जाये।

किसी विचाराधीन प्रकरण में निर्णय देने हेतु न्यायाधीशों द्वारा निगमनात्मक पद्धति (Deductive method) या आगमनात्मक पद्धति (Inductive method) अपनायी जाती है। निगमनात्मक पद्धति संहिताबद्ध विधि (codified law) पर आधारित होती है, अर्थात् न्यायाधीश प्रकरण से सम्बन्धित विधि को प्रकरण के तथ्यों के प्रति लागू करता है और तद्नुसार निर्णय देता है। अतः इसमें उसके वैयक्तिक विचार का कोई स्थान नहीं रहता है।

इसके ठीक विपरीत, आगनात्मक पद्धति, जो कि इंगलिश विधि की विशिष्टता है, में न्यायाधीश प्रकरण के तथ्यों एवं घटना के आधार पर विधि सम्बन्धी कोई विशिष्ट नियम का प्रतिपादन करते हैं, अर्थात् इस पद्धति में न्यायाधीश यह मानकर नहीं चलता कि अमुक विधि का नियम उसके समक्ष विचाराधीन प्रकरण में लागू होगा, अपितु प्रकरण के तथ्यों के अध्ययन के आधार पर अपनी विवेक-शक्ति का प्रयोग करते हुये यह निर्णय होता है कि उस प्रकरण में विधि का कौन-सा सिद्धान्त या नियम लागू किया जाये।37

इसीलिये प्राय: यह कहा जाता है कि निगमनात्मक पद्धति में विधि की स्थिरता (Stability) को तो। समझा जा सकता है, लेकिन विधिक परिवर्तनों के कारणों के लिये उसके पास कोई उत्तर नहीं होता है।38 पूर्व-निर्णयों के विभिन्न प्रकार (Defferent Kinds of Precedents)

सामण्ड के अनुसार न्यायिक पूर्व-निर्णयों को विभिन्न दृष्टिकोणों से अलग-अलग वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।39 प्रभाव की दृष्टि से पूर्व-निर्णय दो प्रकार के होते हैं-(1) प्राधिकारिक (Authoritative) तथा (2) अनुनयी (Persuasive)।

प्राधिकारिक पूर्व-निर्णय या तो ‘निरपेक्ष’ (absolute) होते हैं या ‘सशर्त’ (Conditional) । प्राधिकारिक-पूर्व-निर्णय को प्रामाणिक पूर्व निर्णय भी कहते हैं। ये ऐसे पूर्व-निर्णय होते हैं जिनका अनुसरण

36. R. vs. Franklin (1883) 15 Cox, 163.

37. G.W. Paton: A Text book of Jurisprudence, (1964) p. 172.

38. See Protection of Woman Against Domestic Violence Act, 2005, The ” Against Domestic Violence Act, 2005, The Welfare of Parents & Senior Act, 2007 (in deductive method. Judge’s decision is deduced from General to particular whereas inductive method implies movement from particular to general).

39. सामण्ड : ज्यूरिसपूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 165.

 करना न्यायाधीशों के लिए अनिवार्य होता है भले ही वे उससे सहमत हों या न हों। दसरे शब्दों में प्राधिकारिक पूर्व-निर्णय के बन्धनकारी प्रभाव के कारण न्यायाधीश के स्वविवेक की कोई गंजाइश नहीं रहती है। उदाहरण के लिए, भारत में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय प्राधिकारिक पूर्व-निर्णय होते हैं। इस प्रकार के निर्णय विधि के वैधानिक स्रोत (legal sources of law) के रूप में मान्य। हैं। अनुनयी पूर्व-निर्णय ऐसे न्यायिक निर्णय होते हैं जिनका अनुसरण करने के लिए न्यायाधीश बाध्य नहीं हैं। ऐसे विनिश्चयों पर न्यायाधीश विचार अवश्य करते हैं तथा उन्हें उचित महत्व भी देते हैं, परन्तु उनका अनुसरण करना या न करना उनके विवेक पर निर्भर करता है। उदाहरणार्थ, भारत के किसी एक उच्च न्यायालय (High Court) द्वारा दिया गया निर्णय अन्य उच्च न्यायालयों के स्वविवेक पर निर्भर रहता है कि वे उस निर्णय का अनुसरण करें या न करें। यही कारण है कि अनुनयी पूर्व-निर्णय को विधि का ऐतिहासिक स्रोत माना गया है न कि विधिक स्रोत।।

उल्लेखनीय है कि कभी-कभी एक ही पूर्व-निर्णय एक न्यायालय के लिए तो प्राधिकारिक होता है। परन्तु दूसरे के लिए वह अनुनयी होता है। अतः पूर्व-निर्णय प्राधिकारिक हैं अथवा अनुनयी, यह परिस्थितिविशेष पर निर्भर करेगा। उदाहरण के लिए, किसी उच्च न्यायालय का निर्णय उसके अधीनस्थ अदालतों के लिए प्राधिकारिक (authoritative) होगा4) जबकि अन्य उच्च न्यायालयों के लिए वह अनुनयी। (persuasive) होता है। इसी प्रकार अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी न्यायाधीशों के निर्णय भारतीय न्यायालयों के लिए केवल अनुनयी प्रभाव रखते हैं। इंग्लैण्ड में न्यायाधीशों द्वारा घोषित इतरोक्ति (abiter dicta) अनुनयी प्रभाव रखती है 41

पूर्व-निर्णय

EIF IP (bon U (Precedents) bonibos

प्राधिकारिक पूर्व-निर्णय (Authoritative)

अनुनयो पूर्व-निर्णय Persuasive)

निरपेक्षक प्राधिकारिक ।

पूर्व-निर्णय (Absolutely Authoritative)

सशर्त प्राधिकारिक | > विदेशी न्यायालयों के निर्णय

पूर्व-निर्णय (Foreign Judgments) spis (Conditional > प्रिवी कौंसिल के निर्णय Authoritative) (Judgments of the Privy Council)

? इतरोक्ति (obiter dicta) → प्राधिकारिक विधि

के पाठ्यग्रन्थ एवं टीकाएँ (Books & Commer.taries)

40. पमलाई पद्याची बनाम अन्नामलाई पद्याची, 56 एल० डब्ल्यू० 494.

41. एटार्नी जनरल बनाम डोन एण्ड केनन्स ऑफ विन्डसर, 8 एच० एल० 369..

निरपेक्ष तथा सशर्त प्राधिकारिक पूर्व-निर्णय

सामण्ड ने प्राधिकारिक पूर्व-निर्णयों (Absolute Precedents) को दो भागों में विभाजित किया है-(1) निरपेक्ष प्राधिकारिक पूर्व-निर्णय (Absolutely Authoritative Precedents) तथा (2) सशर्त प्राधिकारिक पूर्व-निर्णय (Conditional Authoritative Precedents) । निरपेक्ष प्राधिकारिक पूर्व-निर्णय न्यायालयों पर अनिवार्यतः बन्धनकारी होता है तथा अयुक्तियुक्त होने पर भी इन्हें न्यायालय अस्वीकार नहीं। कर सकते हैं।42

इसके विपरीत सशर्त प्राधिकारिक पूर्व-निर्णयों को कुछ परिस्थितियों में न्यायालयों द्वारा अनुसरण किये। जाने से इन्कार किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, इंग्लैण्ड के निचले न्यायालयों के लिए वहाँ के कोर्ट ऑफ अपील द्वारा दिये गये निर्णय निरपेक्ष प्राधिकारिक पूर्व-निर्णय (Absolutely Authoritative  precedents) का महत्व रखते हैं43 तथा वे प्रत्येक दशा में इन निर्णयों का अनुसरण करने के लिए बाध्य हैं। किन्तु हाउस ऑफ लास (House of Lords) के लिए ये निर्णय केवल सशर्त प्राधिकारिक पूर्व-निर्णय (Conditional Authoritative Precedents) होते हैं। अतः यदि हाउस ऑफ लाईस के विचार में कोर्ट ऑफ अपील द्वारा दिया गया कोई निर्णय न्याय-प्रशासन में प्रत्यक्ष रूप से बाधक होता है, तो वह उसे निराकृत (over-rule) कर सकता है। 

भारत में किसी उच्च न्यायालय की एकल न्यायपीठ (Single Bench) का निर्णय उसी न्यायालय की किसी अन्य एकल न्यायाधीश की न्यायपीठ द्वारा नहीं पलटा जा सकता है। यदि न्यायाधीश को निर्णय में कोई विसंगति दिखाई देती है, तो वह उस निर्णय को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को आवश्यक निर्देश हेतु भेज सकता है।44 सामान्यत: ऐसे मामले दो न्यायाधीशों की खंडपीठ को निर्दिष्ट (refer) किये जाते हैं 45 एकल न्यायपीठ के निर्णय को उसी न्यायालय की खण्डपीठ (Division Bench) के निर्णय द्वारा पलटा जा सकता है। इसी प्रकार उच्च न्यायालय की खण्ड-पीठ के निर्णय को उसी न्यायालय की किसी दूसरी खण्ड-पीठ द्वारा नहीं पलटा जा सकता।46

मौलिक तथा घोषणात्मक-पूर्व निर्णय

सामण्ड ने पूर्व-निर्णयों के स्वरूप की दृष्टि से उन्हें दो वर्गों में विभक्त किया है

(1) मौलिक पूर्व-निर्णय (Original Precedents); तथा 

(2) घोषणात्मक पूर्व-निर्णय (Declaratory Precedents)।।

मौलिक पूर्व-निर्णय विधि के लिए नये नियमों का निर्धारण करते हैं। जब न्यायालय नई-नई व्याख्याओं द्वारा नये नियमों का प्रतिपादन करते हैं तो मौलिक पूर्व-निर्णय का सृजन होता है। उदाहरणार्थ, गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य47 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने संविधान संशोधन से संबंधित अनुच्छेद 368 के संदर्भ में भविष्यलक्षी निराकृति (Prospective overruling) का मौलिक सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुए अभिनिर्धारित किया कि संसद द्वारा नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को इस निर्णय की तिथि से भविष्य में किसी भी प्रकार से सीमित नहीं किया जा सकेगा। अतः इस निर्णय को मौलिक पूर्व-निर्णय कहा जाएगा क्योंकि इसके द्वारा सांविधानिक विधि के क्षेत्र में सर्वप्रथम भविष्यलक्षी निराकृति का नियम लागू किया गया

42. प्रोड्यूस ब्रोकर्स कम्पनी बनाम आइल ओलम्पिया एण्ड कोक कं० (1916), 1 ए, सी 314.

43. कोर्ट ऑफ अपील स्वयं के निर्णय से भी बाध्य नहीं है, देखिये गेली बनाम ली तथा अन्य (1969) 1 All ER 1062 के वाद में लार्ड डेनिंग द्वारा दिया गया निर्णय।

44. त्रिभुवनदास बनाम रत्तीलाल, 70 बम्बई एल० आर० 73.

45. के० सी० नम्बियार बनाम मद्रास राज्य, ए० आई० आर० 1953 मद्रास 35.

46. शेशम्मा बनाम वेंकट नरसिंहराव, (1940), 1 एम० एल० जे० 400 एफ० बी० 412:

47. ए० आई० आई० 1965 सु० को० 845.

है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य48 के निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने भारत के संविधान के संदर्भ में प्रथम बार ‘मल-ढांचे का सिद्धान्त’ (Basic Structure Theory) प्रतिपादित किया जिसके अनुसार संसल संविधान के किसी भी भाग में कोई ऐसा संशोधन नहीं कर सकती जिसके परिणामस्वरूप संविधान के मल ढाँचे पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार शाहबानो49 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्णीत किया कि कोई भी पति वैयक्तिक विधि की आड़ में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 में उपबन्धित तलाकशुदा पत्नी को भरण-पोषण भत्ता देने के दायित्व से बच नहीं सकता है।  

घोषणात्मक पूर्व-निर्णय वे होते हैं जो पूर्व से ही विद्यमान विधि के नियमों की घोषणा करते हैं। इस प्रकार के पूर्व-निर्णय किसी नई विधि का सृजन नहीं करते। घोषणात्मक पूर्व-निर्णयों की संख्या मौलिक पूर्व-निर्णय की संख्या की तुलना में कहीं अधिक होती है। ये पूर्व-निर्णय अधिकांशत: प्रथाओं पर आधारित होते हैं। सामण्ड के अनुसार घोषणात्मक पूर्व-निर्णय को पृथक् वर्ग में स्वीकार करना उचित नहीं है, क्योंकि जो पूर्व-निर्णय विधि का निर्माण करता है, वह उसकी घोषणा भी करता है।

पूर्व-निर्णय के बन्धनकारी प्रभाव को नष्ट करने वाली विधियाँ 

(Circumstances destroying the binding force of Precedent)

विधि का यह सामान्य नियम है कि न्यायिक पूर्व-निर्णय का प्रभाव बन्थनकारी होता है। परन्तु इस सामान्य नियम के कतिपय अपवाद हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में या तो पूर्व-निर्णय प्रारम्भ से ही बन्धनकारी शक्ति नहीं रखते या उनकी बन्धनकारी शक्ति का कालांतर में लोप हो जाता है। ये स्थितियाँ निम्नलिखित हैं

1. प्रारम्भ से ही बन्धनकारी प्रभाव-रहित पूर्व-निर्णय  

(i) विधि की अनभिज्ञता (Ignorance of Statute)—यदि कोई पूर्व-निर्णय प्रचलित कानून या अधिनियम की अनभिज्ञता के कारण दिया गया है, तो वह बन्धनकारी प्रभाव नहीं रखे। इसी प्रकार यदि न्यायालय को किसी कानून के अस्तित्व के विषय में जानकारी होते हुए भी असावधानी के कारण वह उसके विपरीत निर्णय देता है, तो ऐसा निर्णय बन्धनकारी प्रभाव नहीं रखेगा। ऐसे पूर्व-निर्णय को निवले न्यायालय भी मानने से इंकार कर सकते हैं। 

(ii) उच्चतर न्यायालय के पूर्ववर्ती-निर्णयों के बीच विसंगति (Inconsistency with earlier decisions of higher Court)–यदि किसी न्यायालय द्वारा कोई ऐसा निर्णय दिया जाता होगा जो उच्चतर न्यायालय के किसी पूर्ववर्ती निर्णय की अनदेखी करता है, तो ऐसे निर्णय का पूर्वोक्ति के रूप में बन्धनकारी प्रभाव नहीं होगा। उदाहरणार्थ, यदि उच्च न्यायालय किसी मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय की अनदेखी करते हुए निर्णय देता है, तो उच्च न्यायालय का इस प्रकार दिया गया निर्णय उसकी निचली अदालतों पर भी बन्धनकारी प्रभाव नहीं रखेगा 50

(ii) उसी न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णय के बीच विसंगति (Inconsistency between earlier decisions of the same Court)-कोई न्यायालय अपने पूर्ववर्ती ऐसे निर्गयों से आबद्ध नहीं होगा जो परस्पर प्रतिकूल हों। ऐसी स्थिति में न्यायालय परस्पर-विरोधी निर्णयों में से किसी एक का अनुसरण कर सकता है। यदि नया निर्णय पुराने निर्णय के प्रतिकूल है, तो न्यायालय पहले मामले में दिये गये निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं है। यदि वह उचित समझे, तो बाद के निर्णय का अनुसरण कर सकता है। सारांश यह है कि एक ही न्यायालय या समान अधिकार रखने वाले न्यायालय भूर्ववर्ती निर्णय की तुलना में पश्चात्वर्ती निर्णय को या पश्चात्वर्ती निर्णय की तुलना में पूर्ववर्ती निर्णय को, प्रकाशित निर्णय की तुलना में

48. ए० आई० आर० 1973 सु० को० 1461.

49. मोहम्मद अफजल खान बनाम शाह बानो, ए० आई० आर० 1985 सु० को 945.

50. यंग बनाम ब्रिस्टल, एरोप्लेन कं० लि० (1944) के० बी० 729.

अप्रकाशित निर्णय को या अप्रकाशित निर्णय की तुलना में प्रकाशित निर्णय को और स्वयं अपने निर्णय की तुलना में समान अधिकार वाले किसी अन्य न्यायालय के निर्णय को स्वीकार करने के लिए स्वतन्त्र हैं। 

(iv) वाद से सम्बन्धित सुसंगत मुद्दे या निर्णय पर बहस पूरी किये बिना दिये गये निर्णय (precedent sub silentio)–यदि किसी विनिश्चय में अन्तग्रस्त विधि सम्बन्धी किसी महत्वपूर्ण मुद्दे की न्यायालय को जानकारी न रही हो, अथवा वह मुद्दा विचारार्थ प्रस्तुत न किया गया हो, तो ऐसा विनिश्चय अज्ञानतावश दिया गया माना जाता है। जेराड बनाम बथ ऑफ पेरिस लिमिटेड51 का वाद इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें कम्पनी के उन्मोचित कर्मचारी ने, जिसने कि सदोष पदच्युति के लिए कम्पनी के विरुद्ध नुकसानी प्राप्त कर ली थी, कम्पनी के परिसमापक के नाम बैंक लेखे पर गारनिशी52 आदेश के लिए आवेदन किया। केवल दावेदार के ऋण की पूर्विकता के प्रश्न पर बहस की गई थी और इस बहस की सुनवाई हो जाने पर अपीलीय न्यायालय ने आदेश मंजूर कर दिया था। इस प्रश्न पर कि क्या परिसमापक के नाम बैंक लेखे पर गारनिशी आदेश कानूनी रूप से दिया जा सकता है, कोई विचार नहीं किया गया था। अत: जब बाद में अपीलीय न्यायालय के समक्ष इस विषय पर बहस की गयी, तो न्यायालय ने यह विनिश्चित किया कि वह अपने पूर्ववर्ती निर्णय से आबद्ध नहीं है।

अज्ञानतावश दिये गये निर्णय और मामले से सम्बन्धित सुसंगत मुद्दे पर बहस पूरी हुए बिना दिये गये निर्णय में अन्तर है। यदि किसी मामले में न्यायालय के समक्ष उस मुद्दे पर थोड़ी भी बहस की जाती है जिस पर यह निर्णय दिया जाता है, तो निर्णय को अज्ञानतावश दिया गया नहीं कहा जा सकेगा। संक्षेप में अज्ञानतावश दिया गया निर्णय बहस न किये गये मुद्दे सम्बन्धी विशिष्ट प्रकार का निर्णय है। कुछ विधिवेत्ताओं की राय में अज्ञानतावश तथा बहस के बिना दिये गये निर्णय महत्वहीन होते हैं। यदि किसी पूर्व-निर्णय में बहस ठीक से नहीं हुई हो, तो वह पूर्व-निर्णय पूर्णत: नष्ट नहीं हो जाता है।

(v) समानतः विभक्त न्यायपीठों के निर्णय (Decision of equally divided court)- यदि किसी खंडपीठ में न्यायाधीशों का समान रूप से मत-विभाजन हो, वहाँ उस खंडपीठ द्वारा निर्णय नहीं दिया जाता, अपितु उसे पुनर्विचार हेतु किसी उच्चतर खंडपीठ या पूर्णपीठ के पास अन्तरित कर दिया जाता है।53

इंग्लैंड में कोर्ट ऑफ अपील की यह परिपाटी है कि खंडपीठ समान रूप से विभाजित होने की दशा में अपील खारिज कर दी जाती है, परन्तु भारत में ऐसा नहीं होता। ऐसी परिस्थिति बहुधा उत्पन्न नहीं होती क्योंकि अधिकतर खंडपीठों में न्यायाधीशों की संख्या विषम होती है जिसके कारण उनके समानतः विभक्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता है।

2. ऐसे पूर्व-निर्णय जिनकी बन्धनकारी शक्ति कालान्तर में नष्ट हो जाती है।

(i) निराकृत किये जाने योग्य विनिश्चय (Abrogative Decisions)–यदि न्यायालय द्वारा किसी मामले में निर्णय दिये जाने के बाद किसी ऐसे नियम या अधिनियम को अधिनियमित किया जाता है जो उस निर्णय के विपरीत हो या उससे विसंगत हो अथवा यदि उसे उच्चतर न्यायालय द्वारा पलट दिया जाता है या अस्वीकार किया जाता है, तो ऐसा निर्णय अपना बन्धनकारी प्रभाव खो देगा, अर्थात् उसकी बन्धनकारी शक्ति नष्ट हो जायेगी। इसके अतिरिक्त निराकृत (abrogate) कर दिये जाने के फलस्वरूप भी न्यायिक निर्णय का बन्धनकारी प्रभाव समाप्त हो जाता है। निर्णय पलट देने (over-ruling) का अर्थ यह है कि अपीलीय न्यायालय उस मामले की अपील में अथवा अन्य मामले में यह घोषणा करता है कि पूर्ववर्ती निर्णय गलत दिया गया है; अत: उसका अनुसरण नहीं किया जाना चाहिये। यह आवश्यक नहीं है कि पूर्व-निर्णय को भिव्यक्त रूप से ही निराकृत किया जाए। उसे विवक्षित (implied) रूप से भी नामंजूर किया जा सकता है।

51. (1936) ए० ई० आर० 905.

52. ‘अ’ द्वारा ‘ब’ को रकम देय है। ‘स’ ने ‘ब’ पर एक रकम की डिक्री प्राप्त की। ‘स’ के आवेदन पर न्यायालय ने आदेश दिया कि ‘अ’ डिक्री की रकम के बराबर रकम ‘स’ को देने के लिए न्यायालय में जमा करे अथवा इसके विरुद्ध कारण दर्शाये। ऐसा आदेश गारनिशी आदेश कहलाता है।

53. मानहासा के महाराज बनाम जगन्नाथ कुलू, 55 मद्रास 883.

वर्तमान में निर्णयों को प्राय: विवक्षित रूप से उलट देने की प्रवृत्ति ही देखी जाती है। यदि कोई निर्णय गलत होता है या तर्कसंगत नहीं है, तो किसी अधिनियम द्वारा या उच्चतर न्यायालय के निर्णय द्वारा उसे निराकृत किया जाता है। इस कथन की पुष्टि लैटिन सूत्र “Cessante ratione legis cessat ipsales” से हो जाती है। जिसका आशय यह है कि “जब विधि का तर्क ही समाप्त हो जाता है, तो विधि स्वयमेव समाप्त हो जाती

(ii) भिन्न आधार पर विनिश्चय की पुष्टि अथवा निराकृति-कभी-कभी अपीलीय न्यायालय द्वारा निचले न्यायालय के किसी निर्णय की पुष्टि तो की जाती है लेकिन यह निर्णय के आधार से भिन्न आधार पर की जाती है। इसी प्रकार अपील में भिन्न आधार पर उसे नामंजूर कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी उच्च न्यायालय में कोई मामला एक आधार पर विनिश्चित किया जाता है और बाद में जब इसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की जाती है तथा उच्चतम न्यायालय वही निर्णय देता है किन्तु दूसरे आधार पर, तो ऐसी स्थिति में उच्च न्यायालय का विनिश्चय (decision) निराकृत नहीं माना जायेगा वरन् उसकी निरपेक्ष शक्ति (absolutely binding force) समाप्त हो जायेगी तथा यदि अन्य न्यायालय चाहें तो उसका अनुसरण कर सकते हैं और यदि न चाहें तो वैसा करने के लिए वे बाध्य नहीं होंगे।

विधि के स्रोत के रूप में न्यायिक पुर्व-निर्णय का महत्व

(Importance of Judicial Precedents as a Source of Law)  

समाज की सामान्य धारणाएँ न्यायाधीश के निर्णयों में प्रतिबिम्बित होती रहती हैं। कभी-कभी न्यायाधीशों द्वारा दिये गये निर्णय विवाद को निपटाने के साथ-साथ सामान्य विधिक सिद्धान्तों को प्रतिस्थापित करते हैं जो न्यायालयों के लिए विधि का प्रभाव रखते हैं। इसी विधि-निर्माण की प्रक्रिया को न्यायिक पूर्व-निर्णय (Judicial precedent) कहते हैं। न्यायालयों को विधि का निर्माण करने की शक्ति है। अथवा नहीं, इस विषय में विधिशास्त्रियों में मतभेद है। तथापि इस सम्बन्ध में दो प्रमुख विचारधाराएँ हैं। जिनका उल्लेख सिद्धान्तों के रूप में किया गया है

(1) न्यायिक पूर्व-निर्णय का घोषणात्मक सिद्धान्त

(Declaratory Theory of Judicial Precedents)

इस सिद्धान्त (Theory) के अनुसार न्यायाधीशों का कार्य केवल घोषणात्मक है, सृजनात्मक नहीं। न्यायाधीशों द्वारा विवादों के विनिश्चय में पहले से विद्यमान किसी विधि के नियमों का निर्वचन किया जाता है और अपने निर्णय में इन नियमों को समाविष्ट करके उस विधि को घोषित किया जाता है। अत: वे किसी नई विधि का सृजन नहीं करते वरन् विद्यमान विधि का अर्थान्वयन मात्र करते हैं। न्यायिक पूर्व-निर्णय के घोषणात्मक सिद्धान्त के प्रणेता ब्लैकस्टोन हैं जिनके अनुसार न्यायाधीश का कार्य विधि की घोषणा करना है न कि विधि का निर्माण करना 54 उनका स्पष्ट मत था कि ‘न्यायिक विधान’ (judicial legislation) या ‘न्यायाधीश द्वारा निर्मित विधि’ (judge-made law) जैसी कोई चीज नहीं है। न्यायाधीशों का कार्य तो केवल यह है कि वे प्रचलित विधि को सुरक्षित रखें तथा आवश्यकतानुसार उसकी व्याख्या करते हुए अपने निर्णय में उसका उल्लेख करें।

लार्ड ईशर (Lord Esher) ने प्रमुख वाद विलीस बनाम बाडेली55 (Willis v. Baddeley) में अभिकथन किया कि वास्तव में न्यायाधीश-निर्मित विधि (Judge-made Law) जैसी कोई वस्तु नहीं है। क्योंकि न्यायाधीशगण विधि का निर्माण नहीं करते, अपितु वे विद्यमान विधि को ही अपने निर्णयाधीन वाद के तथ्यों के प्रति लागू करते हुये उसका इस प्रकार निर्वचन करते हैं जो पूर्व में न किया गया हो पूर्व-निर्णय सम्बन्धी ब्लैकस्टोन के घोषणात्मक सिद्धान्त की आलोचना करते हुए ऑस्टिन कहते हैं कि यह धारणा कि न्यायाधीश विधि का निर्माण नहीं करते बल्कि उसकी केवल घोषणा करते हैं, एक नादान

54. ब्लैकस्टोन : कमेन्ट्रीज, पृ० 69 (jus dicere et non jus dare].

55. (1892) 2 क्यू० बी० 324 (326).

परिकल्पना (childish-fiction) मात्र है।56 बेन्थम के अनुसार यह कहना कि न्यायाधीश विधि की केवल घोषणा करते हैं, ‘सरासर मिथ्या’ है। उनका तर्क है कि वस्तुतः घोषणात्मक सिद्धान्त की आड़ में न्यायाधीशगण विधायन के अधिकार को चुरा लेते हैं क्योंकि खुले-आम उन्हें ऐसा करने में संकोच होता है। डायसी (Diecy) के विचार से इंग्लैण्ड की विधि का सर्वोत्तम भाग न्यायाधीश द्वारा निर्मित विधि (Judge made law) है, अर्थात् कॉमन लॉ अधिकांशतः उन नियमों से मिल कर बना है जिनका संकलन न्यायाधीशों के निर्णयों में से किया गया है।57

डॉ० ऐलन (Allen) के विचार से ब्लैकस्टोन तथा बेन्थम, दोनों के ही विचार अतिशयोक्ति रंजित प्रतीत होते हैं। उन्होंने इन दोनों ही विधिशास्त्रियों के विचारों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते हुए कथन किया कि ‘न तो यह कहना गलत है कि न्यायाधीश विधि का निर्माण करते हैं और न यही गलत है कि वे विधि की घोषणा करते हैं।’ न्यायाधीश विचाराधीन मामले की परिस्थितियों के समाधान के लिए जब पहले से ही विद्यमान किसी विधिक नियम का प्रयोग करता है, तो वह निश्चित ही विधि में नवीन योगदान करता है; फिर भी वह एकदम नये तत्व उसमें नहीं ला देता। उसका यह प्रयास रहता है कि वह विधि का प्रयोग करे उसे बनाये नहीं।’58

सामण्ड ने भी ब्लैकस्टोन के पूर्व-निर्णय सम्बन्धी घोषणात्मक सिद्धान्त को त्रुटिपूर्ण निरूपित करते हुए कहा है कि यह ठीक है कि अनेक न्यायिक पूर्व निर्णय (Judicial Precedents) केवल पहले से ही विद्यमान विधि की घोषणा करते हैं; किन्तु ऐसे न्यायिक निर्णय भी हैं जो मौलिक होते हैं तथा विधिसंकलन में अभिवृद्धि करते हैं। जब न्यायाधीश को किसी ऐसे मामले में निर्णय देना होता है जो किसी कानून, रूढ़ि या पूर्व-निर्णय पर आधारित न किया जा सकता हो, तो उसे नये विधिक सिद्धान्त का सूत्रपात करना आवश्यक हो जाता है। परिणामतः उसके द्वारा इस प्रकार दिया गया निर्णय ऐसा होगा जिसका अनुसरण भविष्य में तत्सम वादों में किया जायेगा। ‘‘गोलक नाथ59 के वाद में भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया ‘भावी निराकृति’ (Prospective over-ruling) संबंधी निर्णय इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।” अपकृत्यविधि (Law of Torts) के अन्तर्गत अनेक निर्णय ऐसे हैं जिनके माध्यम से न्यायाधीशों ने इस विधि में अनेक नये सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं। उदाहरण के लिए राइलैण्ड्स बनाम फ्लेचर60 : डोनोघ बनाम स्टीवेन्सन61 तथा डेरी बनाम पीक62 पी० एण्ड ओ० स्टीम नेवीगेशन कम्पनी बनाम सेक्रेटरी ऑफ स्टेट इन इण्डिया इन कौन्सिल63 आदि के वाद इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय दिये हैं जो इस बात के प्रमाण हैं कि पूर्व निर्णय द्वारा न्यायाधीशों ने भविष्य के लिये नये विधि का निर्माण किया है। उदाहरणार्थ, ब्राउन बनाम बोर्ड ऑफ एजूकेशन64 के बाद में दिये गये अपने निर्णय द्वारा अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने एक अपूर्व विधिक एवं सामाजिक सुधार का शुभारम्भ करते हुये अभिकथन किया कि जातीय अस्पृश्यता (Racial segregation) जो अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में प्रचलित थी, पूर्णत: असंवैधानिक है और इस प्रकार पूर्व में दिये गये ‘पृथक् । लेकिन समान’ (Separate but equal) के सिद्धान्त को उलट (over-rule) दिया। न्यायालय ने विनिश्चित किया कि शैक्षणिक सुविधायें उपलब्ध कराना संविधान के समता के अधिदेश (mandate) के अनुरूप है।

56. ऑस्टिन : ज्यूरिसपूडेन्स, पृ० 655.

57. डायसी : लॉ एण्ड पब्लिक ओपीनियन इन इंग्लैण्ड, पृ० 361.

58. ऐलन : लॉ इन दि मेकिंग (6ठाँ संस्करण), पृ० 213.

59. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1976 एस० सी० 1643.

60. Rylands vs. Fletcher, (1868) LR 3 HL 330.

61. Donoghue vs. Stevenson, (1932) AC 562.

62. Derry V. Peek, (1889) 14 AC 337.

63. बाम्बे एच० सी० आर० एपेक्स 1.

64. (1954) 347 यू० एस० 483.

इसी प्रकार भारत के उच्चतम न्यायालय ने भी केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य65 के अपने ऐतिहासिक फैसले में गोलकनाथ06 में दिये गये निर्णय को उलटते हुये अभिकथन किया कि संसद संविधान के किसी भी उपबन्ध (प्रावधान) में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान के मूल ढांचे (Basic structure) में संशोधन करने की अधिकारिता उसे प्राप्त नहीं है। इस प्रकार इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने “मूल ढांचे’ सम्बन्धी नया सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

अमेरिकन विधिशास्त्री डॉ० जेम्स कार्टर (Dr. James Carter) ने ब्लैकस्टोन के घोषणात्मक सिद्धान्त का समर्थन करते हुए कहा है कि न्यायाधीश अपने निर्णयों में पूर्व-प्रचलित विधि की घोषणा मात्र करते हैं।67

आलोचना (Criticism)

यह तर्क कि न्यायाधीश विद्यमान विधि की घोषणामात्र करते हैं, न कि उसका निर्माण, इस धारणा पर आधारित है कि विधि इतनी व्यापक होती है कि न्यायालयों के समक्ष भविष्य में आने वाले सभी सम्भावित मामलों की पूर्व-कल्पना विधायकों द्वारा कर ली जाती है तथा इनसे निपटने के लिए विधि का निर्माण कर लिया जाता है। परन्तु बेकन (Bacon) ने ठीक ही कहा है कि मनुष्य की सीमित बुद्धि के लिए भविष्य में घटित होने वाले सभी प्रकरणों की पूर्व-कल्पना करना असम्भव है। समय-समय पर ऐसे अनेक विवाद उत्पन्न होते रहते हैं, जिन्हें विनिश्चित करने के लिए न्यायाधीश के पास कोई पूर्व-निर्धारित विधि नहीं होती है; अत: ऐरे प्रकरणों में न्यायाधीशों द्वारा दिये गये निर्णय का विधि के निर्माण में योगदान रहता है। उदाहरण के लिए राइलैंड्स बनाम फ्लेचर68 का नियम विधि के नये सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है जो ‘कठोर दायित्व का सिद्धान्त’ (Principle of Absolute Liability) के नाम से विख्यात है। यही नहीं, समस्त साम्या विधि इस तथ्य की पुष्टि करती है कि न्यायाधीश आवश्यकतानुसार विधि का सृजन करते है।

(2) पूर्व-निर्णय का सृजनात्मक सिद्धान्त (Theory that Judges are Law-makers)

इस सिद्धान्त के अनुसार न्यायिक पूर्व-निर्णय नई विधि का निर्माण करते हैं। इंग्लैण्ड में इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक डायसी थे, जिनके मतानुसार इंग्लिश विधि का अधिकांश भाग न्यायाधीशों द्वारा निर्मित किया गया है 69 प्रसिद्ध अमेरिकन विधिशास्त्री ग्रे ने केवल न्यायाधीश को ही विधि का एकमात्र निर्माता माना है। उनके अनुसार विधि का वास्तविक निर्माता वह व्यक्ति नहीं जो उसे प्रथमतः लेखबद्ध करता है या उसका कथन करता है, अपितु वह व्यक्ति होता है जिसे लिखित या कथित विधि की व्याख्या करने का अधिकार प्राप्त होता है ।70  

सृजनात्मक सिद्धान्त की समस्याएँ

ग्रे (Gray) का यह कथन कि न्यायाधीश अपने निर्णयों द्वारा विधि का सृजन करते हैं अत: केवल वे ही विधि के वास्तविक निर्माता होते हैं, पूर्णत: सही नहीं है। न्यायाधीश अपने निर्णयों द्वारा विधि का सजन अवश्य करते हैं परन्तु उनका यह अधिकार सीमित रहता है। विधि-निर्माण के सम्बन्ध में न्यायालयों पर अनेक प्रतिबन्ध हैं जिनमें निम्नलिखित विशेष उल्लेखनीय हैं-

(1) न्यायाधीशों को किसी वर्तमान या मौजूद अधिनियम या विधान (Legislation) के विरुद्ध कानून बनाने का अधिकार नहीं है चाहे वह अधिनियम या विधान कैसा भी क्यों न हो; अर्थात् यदि किसी विधान

65. ए० आई० आर० 1973 सु० को० 1481.

66. ए० आई० आर० 1965 सु० को० 845.

67. कार्टर : लॉ, इट्स ओरिजिन, ग्रोथ एण्ड फन्कशन, पृ० 185.

68. (1868), 3 एच० एल० 330.

69. डायसी, ए० सी० : लॉ एण्ड पब्लिक ओपीनियन इन इंग्लैण्ड, पृ० 36.

70. ग्रे (Gray) जे० सी० : नेचर एण्ड सोर्सेज ऑफ लॉ, पृ० 102.

या अधिनियम के कानूनी उपबन्ध स्पष्ट एवं विवाद-रहित हैं, तो न्यायाधीश को उसे कार्यान्वित करना अवश्यंभावी है और वह उसमें हेर-फेर नहीं कर सकता है।

(2) न्यायाधीश की विधि-निर्माण की शक्ति केवल उसके समक्ष प्रस्तुत वाद के तथ्यों तक ही सीमित रहती है। अत: वह उसी प्रकार के सम-विवादों के प्रति लागू की जा सकती है तथा विधान (Legislation) की भाँति उसे सामान्य रूप से लागू नहीं किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि न्यायाधीश द्वारा दिये गये निर्णय का केवल निर्णयाधार (ratio decidendi) ही तत्सम वादों में लागू किया जा सकता है तथा उनके द्वारा किये गये इतरोक्ति (obiter dicta) बन्धनकारी प्रभाव नहीं रखते हैं।

उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पूर्व-निर्णय सम्बन्धी घोषणात्मक सिद्धान्त (Declaratory Theory) तथा सृजनात्मक सिद्धान्त, दोनों में सच्चाई का कुछ अंश विद्यमान है। यथार्थ में पूर्व-निर्णय विधि की घोषणा तथा विधि का निर्माण दोनों ही करते हैं। एक ओर वे अस्पष्ट, अनिश्चित तथा बिखरी हुई विधियों को निश्चित, सुस्पष्ट तथा बोधगम्य रूप प्रदान करते हैं, तो दूसरी ओर वे विधानों द्वारा अनिर्धारित विषयों पर निर्णय देते समय विधि का सृजन भी करते हैं। इस प्रकार न्यायाधीश विधियों की कमियों को दूर करते हैं तथा उन्हें बोधगम्य बनाते हैं।

निर्णय को उलटना (Over-ruling)

न्यायिक निर्णय को उलटने (Over-ruling) से आशय है किसी उच्चतर न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय-सार को उलट देना या निष्प्रभावी करते हुये अपना स्वयं का निर्णय स्थापित करना। जब कोई निर्णय किसी संविधि के पारित हो जाने के कारण उलट जाता है, तो यह कहा जायेगा कि उस निर्णय के निर्णय-सार (Ratio decidendi) की प्राधिकारिता समाप्त हो चुकी है और वह निर्णयसार निष्प्रभावी हो गया है।72

किसी निर्णय को प्रथम किसी उच्चतर न्यायालय द्वारा उलट दिया गया हो, परन्तु अपील में वह पुनः विपर्यस्त (reversed) हो सकता है। इसी प्रकार कोई निर्णय पहले विपर्यस्त (reversed) किया जाकर बाद में उलट दिया जा सकता है।73

कोई निर्णय व्यक्त रूप से या विवक्षित रूप (Expressly or impliedly) उलटा जा सकता है। यह विवक्षित रूप से उलटा गया तब माना जाता है। जब किसी उच्चतर न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय निचले न्यायालय के निर्णय से असंगत हो। यदि न्यायालय द्वारा किसी निर्णय का इस उल्लेख के साथ उलटा जाता है। कि उसका केवल भविष्यलक्षी प्रभाव होगा और पूर्व में दिये समान वादों के निर्णयों के प्रति वह लागू नहीं। होगा, तो इसे भविष्यलक्षी उलटा जाना (Prospective overruling) कहा जाता है।

न्यायालय द्वारा उलटे हुए निर्णय का भविष्यलक्षी प्रभाव (Doctrine of Prospective Overruling)-कभी-कभी निर्णय देते समय न्यायालय इस दुविधा में पड़ जाता है कि उसे अपने पूर्व-निर्णय को उलटना तो आवश्यक होता है परंतु वह यह अनुभव करता है कि यदि उलटे हुए निर्णय को भूतलक्षी प्रभाव दिया गया, तो पूर्ववर्ती निर्णय के अनुसार दिये गए अन्य निर्णयों के परिणाम न केवल निष्प्रभावी हो जाएंगे अपितु उनसे प्रभावित पक्षकारों को अत्यधिक कठिनाई एवं असुविधा होगी। अतः ऐसी स्थिति को टालने के लिए न्यायालय अपने पूर्व निर्णय को पलटते हुए यह उल्लेख भी करता है कि इसका प्रभाव भविष्यलक्षी होगा, अर्थात् पूर्व में दिये गए सम-निर्णयों पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा और उनकी वैधता यथावत बनी रहेगी।

न्यायालय द्वारा उलट दिये गये निर्णय के भविष्यलक्षी प्रभाव का सिद्धान्त (Doctrine of Prospective Overruling) सर्वप्रथम अमेरिका के न्यायाधीश कारडोझो (Cardozo, J.) ने ग्रेट नॉदर्न रेलवे बनाम

71. Quinn vs. Leathem, (1901) AC 475

72. Thornson v, Movse, (1969) AC 969 (989).

73. डायस : ज्यूरिसपूडेन्स (5वां संस्करण 1994) पृ० 149.

सनबर्ट ऑइल74 के बाद में सन् 1932 में प्रतिपादित किया था। इस सिद्धान्त के अनुसार न्यायालय के समक्ष विचाराधीन प्रकरण को यद्यपि पुराने प्रचलित कानून के अनुसार निर्णीत किया जाता है, लेकिन न्यायालय अपने निर्णय में यह उल्लेख करता है कि भविष्य में ऐसे मामले नव-घोषित विधि के अनुसार निपटाये जायेंगे और वे भूतलक्षी प्रभाव (restrospective effect) नहीं रखेंगे। कारडोझो ने आगे अभिकथन किया कि न्यायाधीश ऐसे पुराने कानून को नि:सन्देह ही हटा सकते हैं या अमान्य कर सकते हैं, जो जनहित की दृष्टि में अनुपयोगी या व्यर्थ हो गया है, और उसके स्थान पर नये कानून को लागू कर सकते हैं, परन्तु उन्हें सदैव स्मरण रखना चाहिये कि भूत में भविष्य प्रतिबिम्बित होता है क्योंकि ऊंचाई की नींव गहराई में बसी रहती है। 

भारत के उच्चतम न्यायालय ने उलटे हुए निर्णय को भविष्यलक्षी प्रभाव देने के सिद्धांत को सर्वप्रथम गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य76 के निर्णय में अपनाया। इस निर्णय के द्वारा उच्चतम न्यायालय ने अपने दो पूर्व-निर्णय; शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ तथा सज्जन सिंह बनाम भारत संघ77 को पलट दिया जिनके अनुसार संविधान के क्रमशः प्रथम एवं सत्रहवां संशोधनों को वैध ठहराया गया था। गोलक नाथ के निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि अब अनु० 368 के अधीन संविधान में संशोधन का सहारा लेकर मूलभूत अधिकारों में परिवर्तन नहीं किया जा सकेगा। न्यायालय ने कहा कि संसद द्वारा किये गए संविधान का प्रथम, चतुर्थ एवं सत्रहवां संशोधन अनु० 31-क तथा 31-ख के उल्लंघन में होने के कारण अविधिमान्य था। परंतु न्यायालय ने गोलकनाथ के निर्णय को भूतलक्षी प्रभाव न देते हुए इसे भविष्य-लक्षी प्रभाव दिया। ताकि उक्त पूर्ववर्ती निर्णयों से उत्पन्न स्थिति यथावत बनी रहे और लोगों को असुविधा न हो।

नारायण नायर बनाम केरल राज्य78 के वाद में न्यायाधीश मेथ्यू (Mathew, J.) ने उलटे हुये निर्णय का भविष्यलक्षी प्रभाव के सिद्धान्त का औचित्य प्रतिपादित करते हुये अभिकथन किया कि यह पुरातन ब्लैकस्टोन के सिद्धान्त का पूरक न होकर विधि व्यवस्था का एक ऐसा आवश्यक तरीका है, जो वादकारी जनता (Litigant Public) को उस स्थिति में संरक्षण प्रदान करता है जब पुरानी विधि के अनुपयोगी हो जाने के कारण उसे नई विधि द्वारा स्थानापन्न की आवश्यकता हो गयी हो।

न्यायिक पूर्व-निर्णयों के गुण-दोष (Merits & Demerits of Precedents)

न्यायिक पूर्व-निर्णयों के महत्व की विवेचना करने के पूर्व इनके गुण-दोषों पर विचार करना उचित होगा। ये निम्नलिखित हैं

गुण (Merits)

(1) पूर्व-निर्णयों का सर्वश्रेष्ठ गुण यह है कि वे विधि के वैज्ञानिक विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं। न्यायिक पूर्व-निर्णयों का बन्धनकारी प्रभाव न्यायाधीशों की न्यायिक स्वच्छन्दता को अंकुशित करता है जो न्याय की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, पूर्व-निर्णय वरिष्ठ न्यायाधीशों के व्यावहारिक अनुभव पर आधारित होते हैं; अतः उनके द्वारा विनिश्चित विधि को लागू करना श्रेयस्कर होता है।79

(2) पूर्व-निर्णय वास्तविक प्रकरणों से उत्पन्न होने वाली व्यावहारिक विधि है जबकि विधान (Legislation) का सम्बन्ध अनुमानित सम्भाव्य तथा काल्पनिक विवादों से है। अत: निर्णय-विधि का विधान द्वारा निर्मित कानूनों की तुलना में अधिक व्यावहारिक होना स्वाभाविक है।

74. “”Great Northern Rly. V. Sunburt Oil Co., 187 US 358 (1932).

75. “The depth are the foundaiton of the height.”-Cardozo J.

76. ए० आई० आर० 1967 सु० को० 1643.

77. शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1951 सु० को० 458 तथा सज्जन सिंह बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1965 सु० को० 845.

78. ए० आई० आर० 1971 केरल 98.

79. हरवाय बनाम ओटोवे, (1915) वी० एल० आर० 520.

(3) न्यायिक पूर्व-निर्णयों का एक अन्य गुण यह है कि इनमें सुनिश्चितता रहती है। किसी वाद में एक बार निर्णय दे दिये जाने पर लोग इस बात से निश्चित हो जाते हैं कि तत्सम वादों में न्यायालय द्वारा उसी प्रकार की व्यवस्था (ruling) दी जायेगी। विधि के सूक्ष्म सिद्धान्तों को भली-भाँति समझने के लिए भी निर्णय-विधि पर्याप्त रूप से सहायक होती है। पूर्व-निर्णयों में न्यायालय द्वारा पूर्ववर्ती प्रकरणों का संदर्भ दिया रहता है; अत: इनमें व्यक्त की गई विधि को सरलता से समझा जा सकता है।

(4) पूर्व-निर्णय निचली अदालतों के न्यायाधीशों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करते हैं जिनसे उन्हें मामलों को विनिश्चित करने में पर्याप्त सहायता मिलती है।

(5) पूर्व-निर्णय अधिवक्ताओं को अपनी दलील की पुष्टि करने में सहायक होते हैं। इससे वकीलों और न्यायाधीशों का बहस के लिए लगने वाला बहुत-सा श्रम और समय बच जाता है।

(6) विधि को नम्य बनाने की दृष्टि से भी पूर्व-निर्णयों का अपना महत्व है। न्यायाधीश अपने समय की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक धारणाओं से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। अत: वे अपने निर्णय के माध्यम से प्रचलित विधि को आवश्यकतानुसार विकसित करने का प्रयास करते रहते हैं जिससे विधि अधिक प्रभावकारी बनती है।80 भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा विगत दो दशकों में लोक हित के फैसलों में दिये गए निर्णय इस बात की पुष्टि करते हैं।81

सारांश यह है कि यदि न्यायिक पूर्व-विधियों का उचित प्रयोग किया जाए, तो विधिक तर्क के रूप में इनका पर्याप्त महत्व है।82

दोष (Demerits)

(1) उपर्युक्त गुणों के होते हुए भी न्यायिक पूर्व-निर्णयों के कुछ दोष भी हैं। ऑस्टिन न्यायिक पूर्वनिर्णयों के दोषों की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि ये विनिश्चय निर्णय-पत्रिकाओं में प्रकाशित किये जाते हैं तथा इनकी संख्या इतनी अधिक होती है कि यह पता लगाना कठिन होता है कि कौन-सा पूर्व-निर्णय किस लॉ-रिपोर्ट में प्रकाशित हुआ है। कभी-कभी विभिन्न न्यायालयों द्वारा परस्पर विरोधी निर्णय दिये जाते हैं, उस स्थिति में पूर्व-निर्णय की वैधता के विषय में कोई निश्चित कसौटी नहीं होती; अत: इसमें भूल की संभावना सदैव बनी रहती है।

(2) पूर्व-निर्णयों के विषय में एक समस्या यह भी है कि इनसे निर्मित विधि की वैधता की कसौटी क्या हो? क्या यह कसौटी निर्णीत वादों की संख्या मानी जाए जिनमें किसी विधिक नियम का अनुसरण किया गया हो, या उस नियम की सुसंगतता को अधिकांश वैध प्रणालियों के आधार पर देखा जाय? या उस न्यायाधीश की ख्याति (reputation) को ही इस प्रकार निर्मित विधि की वैधता की कसौटी माना जाए जिसने उस वाद में निर्णय दिया हो? इस सम्बन्ध में कोई निश्चित मापदंड न होने के कारण पूर्व-निर्णय के आधार पर निर्मित विधि के औचित्य के बारे में सदैव संदिग्धता बनी रहती है।

(3) ऑस्टिन ने पर्व-निर्णयों पर आधारित विधि की आलोचना इस आधार पर की है कि यह प्रभुताधारी का समादेश न होने के कारण इसे सही अर्थ में ‘विधि’ नहीं कहा जा सकता। इसके अतिरिक्त इस

80. ऐलन : लॉ इन दि मेकिंग (5वाँ संस्करण), पृ० 34.

81. एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1987 सु० को० 965; एशियाड प्रकरण ए० आई० आर० 1982 सु० को० 1086; हुसैन आरा खातून बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1978 सु० को० 1675; रूदलशाह बनाम बिहार राज्य, पं० आई० आर० 1983 सु० को० 1086; शीला बारसे बनाम भारत संघ, (1986) 3 एस० सी० सी० 596: मेनका गांधी बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1978 सु० को० 597; नूर सबा खातून बनाम मोहम्मद कासिम, ए० आई० आर० 1997 सु० को 3280; ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1996 सु० को 946 आदि।

82. मामलेश्वर बनाम कन्हैया लाल, ए० आई० आर० 1935 सु० को 907; राजेन्द्र प्रसाद बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1979 सु० को 916 आदि.

विधि का सृजन करने वाले न्यायाधीश किसी के प्रति उस प्रकार उत्तरदायी नहीं होते जिस तरह कि विधानमण्डल अपनी विधियों के लिए मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होता है। परिणामतः न्यायाधीशों के स्वेच्छाचारी होने की सम्भावना को नहीं टाला जा सकता है। परन्तु यह तर्क युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता है। क्योंकि न्यायाधीशों की स्वच्छन्दता पर संहिताबद्ध विधि का नियन्त्रण रहता है तथा वे एक निश्चित सीमा से बाहर स्वविवेक का प्रयोग नहीं कर सकते हैं।

सम्भवतः इसी कारण से उच्चतम न्यायालय ने सायराबानो उर्फ सुल्तानिया बेगम बनाम महाराष्ट्र राज्य83 के वाद में अभिनिर्धारित किया कि आपराधिक प्रकरणों को पूर्व-निर्णीत वादों या पूर्वोक्तियों की बजाय उनके तथ्यों तथा उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर ही निपटाया जाना चाहिये। इस वाद में अपीलार्थी महिला को अपनी बहू को जला देने के आरोप में धारा 302 भा० द० सं०) के अन्तर्गत हत्या के अपराध का दोषी पाया गया था। अपील खारिज करते हुये उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि यद्यपि मृतका ने मजिस्ट्रेट के समक्ष किये गये अपने प्रथम मृत्यु कथन में अपनी सास (अपीलार्थी) तथा अन्यों को निर्मुक्त (absolve) कर दिया था, लेकिन उसी मजिस्ट्रेट के समक्ष दिये गये द्वितीय मृत्युकालिक घोषणा में सास के विरुद्ध उसे जलाये जाने का आरोप लगाया था। न्यायालय ने अभिकथन किया कि इस बात के अनेक सबूत उपलब्ध थे कि घटना के पूर्व अपीलार्थी अपनी बहू के साथ दुर्व्यवहार करती थी और उसे मारती-पीटती भी थी। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुये विचारण न्यायालय तथा उच्च न्यायालय, दोनों द्वारा अपीलार्थी की दोषसिद्धि की जाना। न्यायोचित था और मृतका द्वारा मजिस्ट्रेट को दिये दूसरे मृत्यु घोषणा कों विश्वसनीय मानने में दोनों न्यायालयों । ने कोई चूक नहीं की थी। अतः अपील खारिज करते हुये अपीलार्थी की दोषसिद्धि उचित ठहरायी गयी।

(4) फ्रेड्रिक पोलक के अनुसार पूर्व-निर्णयों पर आधारित विधि अधूरी तथा आंशिक होती है।

(5) पूर्व-निर्णय का एक अन्य दोष यह है कि इससे विधि का विकास वाद-कारण के संयोग पर निर्भर करता है। यदि किसी महत्वपूर्ण विषय पर पूर्व में कभी वाद संस्थित न किया गया हो, तो उससे सम्बन्धित पूर्व-निर्णय के अभाव में उस मुद्दे पर पूर्वोक्ति या नजीर उपलब्ध नहीं होगी।

(6) कभी-कभी उच्चतम न्यायालयों द्वारा दिये गये निर्णय त्रुटिपूर्ण होने के कारण वे निचली अदालतों के लिए समस्या उत्पन्न कर देते हैं क्योंकि वे कितने ही गलत क्यों न हों लेकिन इन न्यायालयों को उनका अनुसरण करना अनिवार्य होता है। इससे विधि के उचित विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 

न्यायिक पूर्व-निर्णयों के उपर्युक्त गुण-दोषों के आधार पर यह कहना पर्याप्त होगा कि कुछ दोषों के होते हुए भी विधि के विकास में उनका पर्याप्त योगदान रहा है। न्यायाधीशगण सामान्यतः निष्पक्ष, निपुण तथा दूरदर्शी होते हैं; अतः उनके निर्णयों से उत्पन्न होने वाली विधियाँ विधायकों द्वारा निर्मित विधानों की तुलना में कहीं अधिक अनुभव-सिद्ध तथा परिपक्व होती हैं।

न्यायिक पूर्व-निर्णयों का महत्व  

विधि के सृजन में न्यायिक पूर्व-निर्णयों का महत्वपूर्ण योगदान है। उच्चतर न्यायालयों द्वारा दिये गये विनिश्चय (decisions) निर्णय-पत्रिकाओं (Law Journals) में प्रतिवेदित किये जाते हैं ताकि निचली दालतें तथा अधिवक्तागण इनका प्रयोग कर सकें। जैसा कि कथन किया जा चुका है, न्यायिक पूर्व-निर्णय का प्रयोग दो प्रकार से किया जाता है-ऐसे पूर्व-निर्णय जिनका प्रभाव बन्धनकारी नहीं होता है, न्यायाधीशों

दवारा निर्णय देते समय प्रयुक्त किये जाते हैं; किन्तु यदि न्यायाधीश किसी पूर्व-निर्णय को अनुचित या त्रुटिपूर्ण समझता है, तो वह उसका अनुसरण करने के लिए बाध्य नहीं है। इसके अतिरिक्त, कुछ पूर्व-निर्णयों का अक्षरशः अनुसरण किया जाना अनिवार्य होता है क्योंकि वे निरपेक्ष रूप से बन्धनकारी प्रभाव रखते हैं। उदाहरणार्थ, इंग्लैण्ड के सभी न्यायालयों को हाउस ऑफ लार्डस (House of Lords) के निर्णय को मानना । अनिवार्य है परन्तु लार्ड चांसलर ने इस सम्बन्ध में 26 जुलाई, 1966 को एक नीति-निर्धारक वक्तव्य दिया तथा यह अभिकथन किया कि सामान्यत: लार्ड सदन अपने पूर्व-निर्णयों से बाध्य होगा तथापि जब कभी वह

83. क्रिमिनल अपील संख्या 141/2006, उच्चतम न्यायालय द्वारा दिनांक 8 फरवरी, 2007 को निर्णीत.

उचित समझे अपने पूर्व-निर्णय से हट भी सकता है।84 तद्नुसार सर्वप्रथम कानवे बनाम रीनर85 के वाद में लार्डस सदन ने अपने पूर्व-निर्णय को पलटते हुए भिन्न निर्णय दिया। इस वाद में हाउस ऑफ लास ने विनिश्चित किया कि सम्राट् के विशेषाधिकार के अन्तर्गत दस्तावेज प्रस्तुतीकरण से सम्बन्धित मिनिस्टर द्वारा दिये गये प्रमाणपत्र की अन्तिमता को विचारणीय प्रश्न मानकर उस पर निर्णय देने का अधिकार हाउस ऑफ लास को प्राप्त है। निवेदित है कि इस वाद द्वारा हाउस ऑफ लास ने डन्कन बनाम कारनियल लेस्डेन्ड कं०86 के वाद को केवल नामन्जूर ही नहीं किया वरन् आठ ऐसे कारण गिनाये जिनके आधार पर डन्कन के मामले को पूर्व-निर्णय न मानने का औचित्य था। तदुपरान्त सन् 1976 में मिलियनगोस बनाम जार्ज फ्रेन्क (टेक्स्टाइल्स ) लि०87 के मामले में हाउस ऑफ लार्ड्स ने यूनाइटेड रेल्वेज ऑफ हवाना88 में दिये गये। अपने पूर्व-निर्णय को पलट दिया। इंग्लैण्ड का कोट्स ऑफ अपील अपने पूर्व-निर्णय से बाध्य है। परन्तु लार्ड। डेनिंग ने इस परिपाटी के प्रति अपना असन्तोष व्यक्त करते हुए डेविस बनाम जॉनसन89 के वाद में अभिकथन किया कि यदि यह न्यायालय भी हाउस ऑफ लास की नीति का अनुसरण करे तो उचित होगा। 

इंग्लैण्ड की प्रिवी कौंसिल की न्यायिक-समिति (Judicial Committee of Privy Council) अपने पूर्व-निर्णयों को पलटने के लिए स्वतन्त्र है। आस्ट्रेलिया का उच्च न्यायालय न तो विधित: और न औपचारिकत: अपने पूर्व-निर्णयों से बाध्य है।

पूर्वोक्तियों के सन्दर्भ में यह उल्लेख किया जाना भी आवश्यक है कि इनका महत्व न्यायाधीशों की व्यक्तिगत धारणाओं तथा मान्यताओं पर निर्भर करता है। यद्यपि न्यायालयों द्वारा सामान्यतः पूर्वोक्त को मान्यता दी जाती है परन्तु यदि कोई न्यायाधीश इससे हटकर निर्णय देना चाहता है, तो वह पूर्वोक्ति की अनदेखी कर सकता है। इस सन्दर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि समय में बदलाव के साथ विधि के बारे में लोगों की धारणायें भी बदलती रहती हैं। अत: किसी पुरानी पूर्वोक्ति को नियम के रूप में हर स्थिति में स्वीकार करना उचित प्रतीत नहीं होता है। जैसा कि न्यायाधीश होम्स (Justice Holmes) ने अभिकथन किया है कि यह कहना उद्वेगकारी होगा कि अमुक विधि का नियम सही एवं उचित है क्योंकि वह हेनरी चतुर्थ के काल से चला आ रहा है जबकि सदियों बाद समय और समाज में आमूल परिवर्तन हो चुका है। अत: चूंकि एक विधि पुरातन काल से चली आ रही है, इसलिये उसका अन्धानुकरण करते रहना कहाँ तक उचित है।  

अमेरिका90 और भारत-जैसे देशों के उच्चतम न्यायालयों ने पूर्व-निर्णयों के सिद्धान्त को परिमार्जित रूप में मान्य किया है। भारत का उच्चतम न्यायालय स्वयं के पूर्व-निर्णय से बाध्य नहीं है; अर्थात् वह अपने किसी पूर्ववर्ती त्रुटिपूर्ण या अनुपयुक्त निर्णय को आवश्यकतानुसार पलट सकता है।91 इस प्रकार उसे अपनी गलती का परिमार्जन करने का अवसर मिलता है ।92 निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि न्याय–क्षेत्र में । पूर्व-निर्णय उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं परन्तु इन्हें आवश्यकता से अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिये।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि विधि के निर्माण तथा स्रोत के रूप में पूर्व-निर्णय बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं तथा वे समान-वादों के लिए भविष्य में मार्गदर्शक का कार्य करते हैं। परन्तु जैसा कि डायसी ने

84. Harvard Law Review, Vol. 8 N. 4, Feb. 1967.

85. (1968) AC 910.

86. (1942) ए० सी० 624.

87. (1976) ए० सी० 443.

88. (1961) ए० सी० 1007.

89. (1978) आई० ए० II ई० आर० 481 (857).

90. फाइडलिटी ट्रस्ट कं० बनाम फील्ड, 311 यू० एस० 169; स्मिथ बनाम अफरिट, (1944) 321 यू० एस० 649. स्टेट ऑफ वाशिंगटन बनाम डाउसन, (1923) 264 यू० एस० आदि के वाद. 

91. बंगाल इम्यूनिटी कम्पनी बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1955 सु० को० 661.

92. गोलकनाथ (1967), केशवानंद भारती (1973), मिनर्वा मिल (1980) आदि के वादों में दिये गये निर्णय।

अभिव्यक्त किया है कि पूर्व-निर्णयों की निरन्तर बढ़ती हुई संख्या के कारण सन्दर्भित निर्णय को ईंट निकालना कठिन कार्य है जिससे न्यायाधीशगण तथा अधिवक्ता वर्ग को व्यावहारिक कठिनाइयाँ अनुभव हो रही हैं।93 ऐलन ने भी यही विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि लॉ रिपोर्टों की बहुलता के परिणामस्वरूप पूर्व-निर्णयों का महत्व धीरे-धीरे घटता जा रहा है, फिर भी इसमें संदेह नहीं कि विधि-निर्माण में पर्वनिर्णय की भूमिका सदैव ही महत्वपूर्ण बनी रहेगी। विधि को समयोचित बनाने तथा उसे आवश्यकतानुसार विकसित करने में पूर्व-निर्णय आज भी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं।

न्यायिक पूर्वोक्ति के विषय में प्रोफेसर डब्ल्यू० गिल्डार्ट (W. Gildart) ने लिखा है कि विधि की निश्चितता तथा उसके विकसित होते रहने की सम्भावनायें पूर्वोक्तियों के महत्व को दर्शाते हैं, फिर भी उसकी अनम्यता तथा प्रतिबन्धात्मकता (Rigidity and restrictiveness) और बन्धनकारी प्रभाव के कारण न्यायाधीशों की विवेक शक्ति को अवरोधित करती है, जो न्यायिक दृष्टि से उचित नहीं है। वास्तविकता यह है कि न्यायाधीशगण अपने निर्णयों द्वारा विधियों का सृजन करते हैं भले ही यह कहा जाता रहा हो कि ‘न्यायाधीश विधि की व्याख्या करते हैं न कि उसका सृजन’।

न्यायाधीशों द्वारा अपने निर्णयों के माध्यम से विधि का सृजन किये जाने के विरुद्ध एक दलील यहं दी जा सकती है कि वे जन-प्रतिनिधि नहीं होने के कारण उन्हें विधि के निर्माण का जनादेश प्राप्त नहीं है। अत: उन्हें नया कानून बनाने की पहल केवल उस स्थिति में ही करनी चाहिये जब जनप्रतिनिधि (संसद) इसमें रुचि न ले रहे हों, या इसके प्रति उदासीन हों। 

सारांश यह कि ब्लैकस्टोन की रूढ़िगत मान्यता कि न्यायाधीश विधि का निर्माण नहीं करते अपितु उसका निर्वचन करते हुये यह घोषणा मात्र करते हैं कि विधि की वास्तविक स्थिति क्या है, अधिक तर्कसंगत प्रतीत होती है। शक्ति-पृथक्करण के सिद्धान्त (Doctrine of Separation of Powers) भी यही अपेक्षा करता है कि न्यायिक और विधायनी कार्यों का संचालन एक-दूसरे से पूर्णतः पृथक् रहे तथा न्यायाधीशगण स्वयं को प्रचलित विधि के अनुसार न्याय-निर्णय देने तक ही सीमित रखें 94 जब किसी निर्णय में सृजनात्मक तत्व का समावेश बरतता है, तो वह नि:सन्देह ही भविष्य में होने वाले तत्समय प्रकरणों के लिये मार्गदर्शक का कार्य करता है कि वास्तविक विधि क्या है और उसकी लोकहित में किस प्रकार व्याख्या की जा सकती है, परन्तु इस सम्बन्ध में नया कानून बनाने का कार्य तो विधायिका की ही अधिकारिता के अन्तर्गत आता है ।95

93. डायस एण्ड ह्यज : ज्यूरिसपूडेन्स, पृ० 60.  

94. Cassell & Co. Ltd. v. Broome, (1972) AC 1027.

95. डायस आर० एम० डब्ल्यू० : ज्यूरिसपूडेन्स (5वां संस्करण 1994) पृ० 152.

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