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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 18 Notes

 

LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 18 Notes:- LLB 1st Semester all Year Topic Wise Study Material Notes in Hindi English and Other Language Available on This Post, Online Free Books Previous Year and Current Jurisprudence & Legal Theory Section 3 Chapter 18 Custom as a Source of Law Question Answer Sample Mode Paper in PDF Download.

अध्याय 18 (Chapter 18)

रूढ़ि (Custom as a Source of Law)

LLB Notes Study Material

कोई व्यक्ति यदि किसी कार्य को दीर्घकाल से नियमित रूप से करता चला आ रहा हो, तो हम प्राय: कहते हैं कि वह उस काम को करने का आदी हो गया है। सम्भव है कि उसकी यह आदत किसी को प्रभावित न करती हो, या केवल उन थोड़े से गिने-चुने व्यक्तियों को प्रभावित करती हो जिनके सम्पर्क में वह आता है। परन्तु यदि मानव-समुदाय के असंख्य व्यक्ति किसी काम को दीर्घकाल से करते चले आ रहे हों, तो । उस समुदाय के अन्य व्यक्तियों के लिए यह अपरिहार्य हो जाता है कि वे इन व्यक्तियों की आदत की ओर ध्यान दें। अन्य व्यक्ति उसी आदत का अनुसरण करें या न करें, यह अनेक बातों पर निर्भर रहेगा जिनमें आचार की सामान्यता’ (generality of practice) भी एक है। किसी समुदाय-विशेष में अनेक प्रथाएँ प्रचलित रहती हैं; परन्तु यह आवश्यक नहीं कि न्यायालय उन सभी को स्वीकार करे। उदाहरण के लिए। पाश्चात्य देशों में शव-यात्रा में सामान्यतः काले वस्त्र पहनने की प्रथा पुरातन काल से प्रचलित है परन्तु इंग्लैण्ड के न्यायालयों द्वारा इस प्रथा का प्रवर्तन नहीं कराया जाता। इसी प्रकार हिन्दुओं में किसी निकटस्थ सम्बन्धी की मृत्यु होने पर पुरुषों द्वारा सिर मुड़ा लेने की प्रथा आज भी प्रचलित है परन्तु यदि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करता, तो न्यायालय उसे दण्डित नहीं करेगा। तात्पर्य यह कि प्रथाएँ अनेक प्रकार की हो सकती हैं। प्रस्तुत अध्याय में केवल उन प्रथाओं या रूढ़ियों की विवेचना की गई है, जिन्हें न्यायालयीन मान्यता प्राप्त है। ‘

रूढ़िका अर्थ (Meaning of the term “Custom”)  

समाज में मानव के प्रत्येक व्यवहार के लिए कानून बनाना सम्भव नहीं है। अतः अनेक कार्यों का औचित्य रूढ़ि या प्रथा के आधार पर आँका जाता है। अनेक रूढ़ियों को विधि की मान्यता प्राप्त होती है। इस दृष्टि से समाज में रूढ़ि का पर्याप्त महत्व है। समान परिस्थितियों में मानव आचरण की एकरूपता को ही ‘रूढ़ि’ (custom) कहते हैं। यदि किसी समुदाय-विशेष के लोगों द्वारा किसी परम्परा का स्वेच्छा से पालन किया जाता है, तो कालान्तर में वही आचरण रूढ़ि का रूप ग्रहण कर लेता है और अतीत काल से उसके निरन्तर प्रचलन के परिणामस्वरूप वह रूढ़ि अन्ततोगत्वा विधिक शक्ति प्राप्त कर लेती है।

आदिम समुदायों में यदि कोई विधि अस्तित्व में थी, तो वह रूढिजन्य विधि ही थी। समाज की प्रारम्भिक अवस्था में विधान (Legislation) द्वारा विधि निर्माण की व्यवस्था नहीं थी। अतः शक्ति और संव्यवहारों का नियंत्रण उन प्रथाओं या रूढ़ियों द्वारा होता था जो स्वाभाविक रूप से प्रचलन में आ गई थीं। हर्बर्ट स्पेंसर ने इसे सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं कि सामाजिक नियंत्रण के किसी निश्चित माध्यम के विकसित होने के पूर्व एक ऐसे नियंत्रण का अस्तित्व रहता है जो अंशतः जीवित व्यक्तियों से तथा अधिकांशत: मृत व्यक्तियों की मान्यताओं से उत्पन्न होता है। अतः पीढ़ियों से प्रचलित परिपाटियाँ ही मानवीय क्रिया-कलापों को अनुशासित करती रही हैं। इन्हीं परिपाटियों (traditions) को ‘प्रथा’ या ‘रूढ़ि’ कहा जाता है।

उल्लेखनीय है कि ऐसी रूढ़ि को विकसित करने में ‘अनुकरण’ (imitation) का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। समुदाय के व्यक्ति किसी प्रथा का अन्धानुकरण नहीं करते, बल्कि जिस तर्क के आधार पर वे उसका अनुकरण करते हैं वह धर्म, श्रद्धा या अन्धविश्वास, इनमें से कुछ भी हो सकता है। आदत (habit), संवेदना

1. डायस एण्ड ह्यज : ज्यूरिसपूडेन्स (1957), पृ० 34. ।

2. Tanistry Case, (1608) 30 E R 516.

(feeling) या लोकमत की संतुष्टि आदि कुछ ऐसे अन्य तत्व हैं जो परिपाटियों को ‘रूढ़ि’ का रूप प्रदान करने है।

प्रारम्भिक अवस्था में प्रथा का रूप प्रायः अस्पष्ट रहता है किन्तु कालान्तर में लोग इसके अभ्यस्त हो जाते हैं और यह निश्चित रूप धारण करने लगती है। जब किसी रूढ़ि को न्यायालयों द्वारा पूर्वोक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है या उसे विधान (Legislation) द्वारा अधिनियमित कर लिया जाता है, तो वह विधि के रूप में परिवर्तित हो जाती है। हिन्दु-विधि की अधिकांश व्यवस्थाएँ रूढ़ियों पर आधारित हैं। स्मृतियों और भाष्यों में दी गई अधिकांश विधि की उत्पत्ति रूढ़ियों से ही हुई है। मनुस्मृति में शासक को यह निर्देश दिया गया था कि वह अपने न्याय-निर्णय को रूढिगत प्रथाओं तथा धर्मशास्त्रों के सिद्धान्तों पर आधारित करे। नारदस्मृति में यह उल्लेख है कि सशक्त होने के कारण ही प्रथा विधि की अध्यारोही होती है। बृहस्पति ने रूढ़ि के महत्व पर टीका करते हुए लिखा है कि स्थान-विशेष के जाति तथा परिवार में प्रचलित रूढ़ियों का पूर्ववत अनुसरण किया जाना चाहिए अन्यथा लोगों में असंतोष तथा क्षोभ उत्पन्न हो जायेगा। इसी प्रकार याज्ञवल्क्य के अनुसार किसी देश पर विजय प्राप्त कर ली जाने पर विजेता का कर्तव्य है कि वह विजित लोगों को उन्हीं की रूढ़ियों, प्रथाओं तथा पारिवारिक परंपराओं का अनुसरण करने दे, जैसा कि वे पूर्व से करते चले आ रहे हैं।5 

विधि के स्रोत के रूप में रूढ़ि के महत्व को स्वीकार करते हुए प्रिवी कौंसिल ने कलेक्टर ऑफ मदुरा बनाम मोतूरामलिंगा के वाद में अभिनिर्धारित किया कि स्पष्ट रूप से स्थापित रूढ़ि विधि के लिखित पाठ से कहीं अधिक प्रभावकारी होती है।

मुस्लिम विधि के अन्तर्गत रूढ़ियों को विशेष महत्व नहीं दिया गया है। तथापि सुन्नी समुदाय के मुस्लिमों के तलाक तथा दाय सम्बन्धी विधि की व्याख्या परम्परागत रूढ़ियों के आधार पर ही की जाती है।  

इंग्लैण्ड का कॉमन लॉ भी प्रथागत रूढियों पर ही आधारित है। ब्रिटेन में कॉमन लॉ (Common Law) और सामान्य रूढ़ियाँ (customs) प्राय: पर्यायवाची शब्द माने जाते थे। न्यायिक पूर्वोक्तियों को प्रथाओं के साक्ष्य के रूप में मान्यता प्रदान की गई थी जिनसे कॉमन लॉ की उत्पत्ति हुई। ब्लेकस्टोन तथा पोलक ने कॉमन लॉ को रूढ़ि पर आधारित माना है।  

हालैण्ड ने रूढ़ि को ऐसी व्यवहार-चर्या (course of conduct) कहा है जिसका समाज में सामान्य रूप से अनुपालन किया जाता है। उनके अनुसार आदिम समुदायों में मानवीय व्यवहार परिपाटियों द्वारा संचालित होते थे जो नैसर्गिक रूप से उत्पन्न हो जाया करती थीं और जिन्हें बाद में लोगों द्वारा अपना लिया जाता था। हॉलैण्ड का कथन है कि सामान्यतः समाज में प्रथाओं की उत्पत्ति का कारण यह है कि यदि किसी कार्य के सम्बन्ध में मनुष्य के दो विकल्प होते हैं, तो वह अपेक्षाकृत सुविधाजनक विकल्प को ही अपनाने की चेष्टा करता है। तथापि कभी-कभी वह दो समान विकल्पों में से किसी एक को आकस्मिक रूप से भी अपना लेता है। अत: किसी कार्य को करना या तो मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर रहता है अथवा दूसरे लोगों का अनुसरण करने की उसकी प्रवृत्ति पर। धीरे-धीरे लोगों में उस कार्य को करने की आदत सी बन जाती है जिसे कालान्तर में न्यायालय विधिक मान्यता प्रदान कर देते हैं। हालैण्ड इस तर्क की पुष्टि एक उदाहरण द्वारा करते हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति मुख्य मार्ग से जाने के बजाय किसी नजदीकी रास्ते (लघु मार्ग) का अवलम्बन

3. ‘व्यवहारो हि बलवान् धर्मस्तेनावहीयते ।’

4. देहजातिकुलानां च ये धर्मा: प्राक्प्रवर्तिताः।

तथैव ते पालनीया: प्रजा प्रक्षुभ्यतेऽन्यथा ॥

5. यस्मिन देशे य: आचारो व्यवहार: कुलस्थितिः।

तथैव परिपाल्योऽसौ यदा वंशमुपागतः  

6. (1868) 12 एम० आई० ए० 397.

7. हॉलैण्ड टी० ई० : एलीमेन्ट्स ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स (1900) पृ० 54.

करे, तो हो सकता है कि उसने ऐसा अपनी सुविधा की दृष्टि से किया हो या अकस्मात् ही उसके मन में ऐसा करने का विचार आया हो। तथापि उसे नजदीकी मार्ग से आते-जाते देख दूसरे व्यक्ति ने भी उसका अनुसरण किया, फिर तीसरे ने और फिर चौथे ने। इस प्रकार एक-दूसरे को उस रास्ते से आते-जाते देखकर लोगों ने उस मार्ग को पगडण्डी के रूप में अपना लिया। रूढ़ियों का प्रचलन भी ठीक इसी प्रकार हुआ है।

रूढ़ि की परिभाषा

रूढिजन्य विधि (Customary Law) प्राय: सभी देशों में प्रचलित है। रूढ़ि को परिभाषित करते हुए विधिशास्त्रियों ने भिन्न-भिन्न विचार व्यक्त किये हैं जिनमें सामण्ड, ऐलन, ऑस्टिन तथा हालैण्ड आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

सामण्ड के अनुसार रूढ़ि ऐसे सिद्धान्तों की अभिव्यक्ति है जिन्हें न्याय और लोकोपयोगिता के सिद्धान्तों के रूप में राष्ट्रीय चेतना के अन्तर्गत स्वीकार कर लिया गया है।8

डॉ० ऐलन (Allen) के अनुसार विधिक एवं सामाजिक विषय के रूप में रूढ़ि का उद्भव अंशत: तर्क और आवश्यकता तथा अंशत: आपसी विश्वास और अनुकरण की शक्तियों द्वारा होता है। । ऑस्टिन ने रूढ़ि को परिभाषित करते हुए कहा है कि रूढ़ि आचरण का वह नियम है जिसका अनुपालन शासित वर्ग द्वारा इसलिए नहीं किया जाता है कि वह किसी राजनीतिक प्रभुतासम्पन्न (Political superior) द्वारा स्थापित विधि है बल्कि इसलिए किया जाता है कि वह अपनी स्वेच्छा से उसका अनुकरण करता है।10

हालैण्ड के अनुसार ‘‘रूढ़ि आचरण की वह प्रणाली है जिसका सामान्यतः पालन किया जाता है। जिस प्रकार किसी घास के मैदान में पैरों के पड़ते-पड़ते एक पगडण्डी-सी तैयार हो जाती है, ठीक उसी प्रकार नित्य-प्रति के व्यवहारों के अनुकरण से प्रथा का जन्म होता है।”

कार्टर के अनुसार समान परिस्थितियों में समस्त व्यक्तियों के कार्यों की एकरूपता को ‘रूढ़ि’ कहते हैं। फेड्रिक पोलक ने इंग्लैण्ड के कॉमन लॉ को रूढिजन्य विधि निरूपित किया है।

हेल्सबरी (Halsbury) के अनुसार- रूढ़ि” एक प्रकार का विशिष्ट नियम है जो वास्तविक या सम्भावित रूप से अनादि काल से विद्यमान है और जिसे एक विशिष्ट भू-क्षेत्र में विधि का बल प्राप्त हो गया है, भले ही वह नियम देश की सामान्य विधि के प्रतिकूल या असंगत ही क्यों न हो।”11

इंग्लैण्ड की प्रिवी कौंसिल की जुडीशियल कमेटी ने हर प्रसाद बनाम शिवदयाल12 के वाद में रूढ़ि की परिभाषा देते हुए कहा है कि रूढ़ि वह नियम है जिसे किसी विशिष्ट परिवार में अथवा क्षेत्र विशेष में दीर्घकालिक अनुसरण से विधि की शक्ति प्राप्त हो जाती है।”

रूढ़ि की उत्पत्ति (Origin of Custom) 

जैसा कि पूर्व में कथन किया जा चुका है, प्रारम्भिक समुदायों में मानव-व्यवहार रूढ़ियों से ही। अनुशासित होते थे। इसीलिए हॉलैण्ड ने कहा है कि सामान्य रूढ़ि के रूप में प्रयोग में लाया जाने वाला आचार । ही रूढ़ि या प्रथा के रूप में विकसित हो जाता है।

8. “Custom is the embodiment of those principles which have commanded themselves to the national

9. Conscience as principles of justice and public utility’–Salmond. ज्यूरिसपूडेस (12वाँ संस्करण), पृ० 193. Custom as a legal and social phenomenon grows up partly by forces inherent in society, forces having purity of reason and necessity and partly of suggestions and imitation.–Allen, : लॉ इन दि मेकिंग पृ० 87.

10. ऑस्टिन : दि प्राविन्स ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स (1954), पृ० 162.  

11. Halsbury’s Law of England Vol. X, P. 2.

12. (1876) 3 इण्डियन अपील्स 259.

सुविधा की दृष्टि से रूढ़ि की उत्पत्ति और विकास का अध्ययन तीन चरणों में किया जा सकता है। रूढि के विकास के प्रारम्भिक चरण में वह अनिश्चित होती है। कुछ समय तक प्रचलन में रहने के बाद उसमें निश्चितता आ जाती है तथा उसके अस्तित्व और प्रचलन को न्यायालय के समक्ष सिद्ध करना पड़ता है ताकि न्यायिक निर्णयों द्वारा उसे मान्यता प्राप्त हो सके।13 निर्णयों द्वारा रूढ़ि को मान्यता प्रदान कर दिये जाने पर वह विधि का रूप ग्रहण कर लेती है और उसे रूढिजन्य विधि (customary law) कहा जाता है। एक बार न्यायिक निर्णय द्वारा मान्यता प्राप्त हो जाने पर रूढ़ि को सिद्ध करना आवश्यक नहीं होता है ।14 रूढ़ि के विकास के तृतीय चरण में न्यायिक निर्णयों द्वारा मान्यता प्राप्त रूढिजन्य विधि को विधान (Legislation) द्वारा लिखित रूप दे दिया जाता है, अर्थात् उसे अधिनियमित कर लिया जाता है। भारत की हिन्दू विधि के अनेक उपबन्ध प्राचीन रूढ़ियों और प्रथाओं पर आधारित हैं जिन्हें सन् 1955-56 में संहिताबद्ध करके अधिनियमित विधि के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। विशेषतः हिन्दू विवाह अधिनियम, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, हिन्दू दत्तक ग्रहण तथा भरण-पोषण अधिनियम आदि इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इंग्लैण्ड का कॉमन लॉ भी अधिकांशतः रूढ़िगत विधि पर ही आधारित है।

उल्लेखनीय है कि प्रथा के विकास में अनुकरण का पर्याप्त महत्व है। परन्तु अनुकरण अन्धानुकरण न होकर तर्क पर आधारित होना चाहिये। प्रारम्भिक समाज में शासक विधि-निर्माण का कार्य नहीं करता था। उसका न्याय जन-साधारण की उचित-अनुचित की धारणाओं पर निर्भर रहता था। उचित-अनुचित का विचार लोगों के व्यवहार या रूढ़ियों में ही निहित था। परिणामस्वरूप प्राचीन समाज में सामान्य रूप से प्रचलित रूढ़ियों का महत्व विधि के समान ही था।

रूढ़ि के विधि में परिवर्तन संबंधी विभिन्न सिद्धान्त

(Theories regarding transformation of Custom into Law)

रूढ़ि विधि के रूप में किस प्रकार परिवर्तित होती है, इस विषय में दो सिद्धांत प्रमुख हैं-(1) ऐतिहासिक सिद्धांत, तथा (2) विश्लेषणात्मक सिद्धान्त।।

1. ऐतिहासिक सिद्धांत (Historical Theory)

रूढ़ियों के विधि में परिवर्तित होने संबंधी ऐतिहासिक सिद्धांत के समर्थकों में सैविनी, हेनरी मेन, विनोग्रॉफ के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

सैविनी (Savigny)

विधिशास्त्र की ऐतिहासिक शाखा के प्रणेता सैविनी के अनुसार रूढ़ियों का उद्भव लोगों की अन्तर्चेतना (Volkegeist) से होता है। वस्तुतः रूढ़ियाँ उन सिद्धान्तों का प्रतीक हैं जो राष्ट्रीय चेतना में सत्य, न्याय एवं लौकिक उपयोगिता के रूप में समाविष्ट हैं। परन्तु ऐलन ने सैविनी के इन विचारों का खण्डन करते हुए कहा है कि यह कहना सही नहीं है कि किसी समुदाय की समस्त रूढ़ियाँ जन-साधारण के सामान्य विश्वास तथा न्याय की धारणाओं की प्रतीक होती हैं। अनेक रूढ़ियाँ शासक वर्ग द्वारा जन-इच्छा के विरुद्ध थोपी जाती हैं। ग्रे के अनुसार कुछ रूढिजन्य विधियाँ तो केवल जन-सामान्य की इच्छा के बिना ही नहीं, बल्कि उनकी इच्छा के विपरीत उन पर लागू की जाती हैं। सैविनी के तर्क के विरुद्ध ऐलन की दूसरी आपत्ति यह है कि स्थानीय रूढियाँ या प्रथाएँ (local customs) राष्ट्र की इच्छा की प्रतीक नहीं होती हैं। इसके अतिरिक्त अनेक रूढ़ियों के पीछे युक्तियुक्त तार्किक कारण नहीं होता, केवल अन्धानुकरण द्वारा उन्हें जनता द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है।15

13. अहमद खाँ बनाम चम्मू बीबी, 6 लाहौर, 502 (पी० सी०).

14. दशरथ लाल बनाम धौंडूबाई, आई० एल० आर० (1941), बाम्बे 460.

15. ऐलन : लॉ इन दि मेकिंग, पृ० 104.

रूढ़ियों की उत्पत्ति के विषय में सेविनी के विचारों को पैटन (Paton) ने भी स्वीकार नहीं किया है। इस सन्दर्भ में वे यह प्रश्न उठाते हैं कि विश्वास आदत को जन्म देता है या आदत विश्वास को? उनका विचार है। कि आदत (habit) ही विश्वास को जन्म देती है। अतः यह कहना उचित नहीं है कि अधिकांश रूढियों की उत्पत्ति जन-चेतना से हुई है बल्कि वे तो अनवरत आदत या अभ्यास का ही परिणाम मात्र हैं।16

सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine)

रूढियों की उत्पत्ति और उनके विधि में परिवर्तन पर प्रकाश डालते हुए सर हेनरी मेन17 का कथन है। कि रूढ़ि या प्रथा एक ऐसी धारणा है जो थिमिस्टीज (Thennistes) के बाद अस्तित्व में आयी।18 जेथ्रो-ब्राउन (Jethro Brown) का भी यही मत है कि रूढ़ियाँ प्रायः न्यायिक निर्णय की उत्तरगामी (posterior) होती हैं। तथा इनके विषय में मतभेद उचित नहीं है। प्रायः यह देखा जाता है कि रूढ़ियों की घोषणा करने की ओट में न्यायाधीश उनकी उत्पत्ति कर देते हैं।19।

सर हेनरी मेन के उपर्युक्त विचारों का खण्डन करते हुए विनोग्रेडॉफ (Vinogradoff) कहते हैं कि वस्तुत: रूढ़ियों का विकास घरेलू वातावरण में विभिन्न जातियों के दैनिक सम्बन्धों के बीच क्रमिक रूप से हुआ है। अत: न्याय-निर्णय का उदय तो बहुत बाद में हुआ जब रूढ़ियाँ पहले से ही व्यवहार में आ चुकी थीं। रूढ़ियों ने ही सामान्य मान्यताओं को न्यायिक अनुशास्ति प्रदान की है। सर फ्रेडरिक पोलक भी यूनानी समाज की रूढ़िजन्य विधि का संदर्भ देते हुए हेनरी मेन के विचारों का खण्डन करते हैं। उनका विचार है कि रूढ़िजन्य विधि न्यायिक निर्णयों (Themistes) के पूर्व भी परम्परा के रूप में विद्यमान थी। तथापि हेनरी मेन के रूढिजन्य विधि सम्बन्धी विचारों के विषय में यह कहना पर्याप्त होगा कि उनके कथन में सत्यता का अंश केवल इतना है कि न्यायिक निर्णयों ने रूढ़ियों को परिमार्जित किया है तथा उन्हें निश्चित रूप दिलाया है।

2. विश्लेषणात्मक सिद्धान्त (Analytical Theory)

इस सिद्धांत के मुख्य समर्थक ऑस्टिन हैं जिन्होंने रूढ़ि को विधि का ऐतिहासिक भौतिक स्रोत (historical material source) माना है। उनके विचार से रूढ़ि केवल राज्य द्वारा मान्यता होने पर ही विधि का रूप ग्रहण करती है। अत: कोई रूढ़िगत नियम विधि में रूपांतरित तभी होगा यदि उसे राज्य द्वारा अधिनियमित कर लिया जाए या किसी पूर्व-निर्णय में उसे मान्यता प्रदान की गई हो। उदाहरणार्थ, भारत में इंडियों संबंधी कानून पुरातन रूढ़ि पर आधारित है जिसका प्रयोग साहूकार (money lender) ऋणी व्यक्ति से अपने ऋण की अदायगी सुनिश्चित करने हेतु करते थे।

ऑस्टिन के अनुसार रूढ़िगत प्रथाएं अनुनयी प्रभाव तभी रखती हैं जब इन्हें न्यायालय द्वारा किसी निर्णय में मान्य कर लिया गया हो। न्यायालय अपने न्याय-निर्णय में रूढ़ि की सहायता तभी ले सकते हैं जब उस विषय पर कोई संविधि (statute) या अधिनियमित कानून उपलब्ध न हो। अतः रूढ़ि को कानून का रूप देना पूर्णतः न्यायालयीन विवेक पर निर्भर करता है।20  

हालैंड ने भी ऑस्टिन के उपर्युक्त विचारों का समर्थन करते हुए कहा है कि रूढ़ि विधि का रूप तभी ग्रहण करती है जब उसे राज्य की मान्यता प्राप्त हो। सामंड ने भी इस विचार का समर्थन किया है। उनके अनुसार रूढि का विधि में परिवर्तन तभी संभव है जब वह न केवल औचित्यपूर्ण हो, अपितु राज्य द्वारा मान्य भी हो।

16. पैटन : ए टेक्स्ट बुक ऑफ ज्यूरिसपूडेंस, पृ० 145.

17. हेनरी मेन : अर्ली लॉ एण्ड कस्टम, पृ० 667.  

18. ‘थिमिस्टीज’ थिमिस (thentis) शब्द का बहुवचन है। ‘थिमिस’ का अर्थ है ‘न्याय की देवी’ (Goddess of

Justice) थिमिस्टीज से आशय ऐसे निर्णयों से था जो न्यायाधीश द्वारा न्याय-देवता की प्रेरणा से दिये जाते थे। रोमवासियों की यह धारणा थी कि यदि शासक किसी को दण्डित किये जाने का निर्णय देता है तो वह न्याय की देवी की इच्छामात्र से ऐसा करता है.

19. जेथ्रोब्राउन : ऑस्टीनियन थ्योरी ऑफ लॉ, पृ० 208.

20. ऑस्टिन : प्रॉव्हिन्स ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स (1945) पृ० 165.

प्रोफेसर ग्रे ने रूढ़ि को विधि के एक स्रोत के रूप में स्वीकार किया है लेकिन उनके अनुसार यह एकमात्र स्रोत न होकर विधि के विभिन्न स्रोतों में से एक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायालय द्वारा किसी रूढि को स्वीकार किये जाने के पूर्व संविधि, पूर्व निर्णय, विधि-विशेषज्ञों के अभिमत आदि अन्य स्रोतों पर भी विचार करना आवश्यक होता है।  

ऐलन ने ऑस्टिन के सिद्धांत की आलोचना करते हुए कहा है कि कोई विधि केवल राज्य की मान्यता मात्र से विधि का रूप ग्रहण नहीं कर सकती जब तक उसे समाज का अनुसमर्थन प्राप्त न हो।

रूढ़ि के प्रकार (Kinds of Custom)

सामण्ड के अनुसार ऐसी रूढ़ियाँ जिन्हें विधि की शक्ति प्राप्त है, दो प्रकार की होती हैं

(1) विधिक रूढ़ियाँ (Legal Customs)

(2) अभिसमयात्मक रूढ़ियाँ (Conventional Customs)

1. विधिक रूढ़ियाँ

विधिक रूढ़ियाँ विधि के बन्धनकारी नियम के रूप में स्वयमेव निर्मित होती हैं; अर्थात् ये व्यक्तियों के मध्य किये गये समझौते, या करार पर आधारित नहीं होती हैं। इन रूढ़ियों की विधिक प्राधिकार शक्ति निरपेक्ष (absolute) होती है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि विधिक रूढ़ियों का आधार स्वतन्त्र होता है तथा वे विधि बनने की क्षमता रखती हैं। विधिक रूढ़ियों के दो प्रकार होते हैं-

 (i) स्थानीय रूढ़ियाँ (Local Customs)–स्थानीय रूढ़ियाँ किसी क्षेत्र-विशेष में विधि के रूप में प्रचलित होती हैं और उस विशिष्ट क्षेत्र के निवासी ही उनका अनुसरण करते हैं। स्थानीय रूढ़ि की वैधता के लिए यह आवश्यक है कि वह युक्तियुक्त, तर्कसंगत, निश्चित, निरन्तर तथा स्थायी हो और किसी प्रचलित कानून के विपरीत न हो। यह भी आवश्यक है कि लोग इसका अनुकरण स्वेच्छा से करते हों, न कि राज्य के बल पर। रूढ़ि वैकल्पिक स्वरूप की न हो, अर्थात् ऐसी न हो कि व्यक्ति चाहे तो इसका पालन करे या न करे। रूढ़ि ऐसी होनी चाहिये कि उसका शान्तिपूर्ण उपयोग किया जा सके तथा वह उस स्थान-विशेष की किसी अन्य रूढ़ि से असंगत न हो। रूढ़ि पुरातन तथा चिरकालीन होनी चाहिये। उल्लेखनीय है कि एक भू-क्षेत्र के रहिवासी (inhabitants) यदि किसी अन्य भू-क्षेत्र पर अपना कोई रूढ़िगत अधिकार बतलाते हैं तो इसे स्थानीय रूढ़ि के रूप में वैधता प्राप्त नहीं होती। अतः सोवरबी बनाम कोलमेन21 के वाद में एक गाँव के लोगों द्वारा अपने घोड़ों को दूसरे गाँव की भूमि में प्रशिक्षित किया जाना स्थानीय रूढ़ि के रूप में मान्य नहीं किया गया।

(ii) सामान्य रूढ़ियाँ (General Customs)–ये ऐसी रूढ़ियाँ हैं जो समस्त देश में प्रचलित हों तथा राष्ट्र के सभी लोगों पर सामान्य रूप से लागू होती हों। यद्यपि अठारहवीं शताब्दी तक इंग्लैण्ड में सामान्य रूढ़ियों को ही कॉमन लॉ माना जाता था22 परन्तु अब ऐसा नहीं है। वर्तमान समय में विधान (ब्रिटिश संसद्) तथा पूर्वोक्तियाँ ही कॉमन लॉ के स्रोत हैं जिनके अन्तर्गत अधिनियमित विधियाँ तथा निर्णय विधियाँ आती हैं। अत: वर्तमान में इंग्लैण्ड का कॉमन लॉ देश की सामान्य रूढ़ियों (general customs) से भिन्न हैं। देश की सामान्य रूढ़ियों का स्मरणातीत होना आवश्यक है अथवा नहीं, इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। सामण्ड तथा कीटन के अनुसार सामान्य रूढ़ियाँ स्मरणातीत होनी चाहिये तथा विधि के स्रोत के रूप में मान्य होने के लिए वे समस्त शर्ते पूरी करती हों, जो स्थानीय रूढ़ि के लिए आवश्यक मानी गयी हैं।

भारत में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 पारित होने के पूर्व यह सुस्थापित प्रथा थी कि कर्ता के उत्तराधिकारी के रूप में परिवार का सबसे ज्येष्ठ पुरुष व्यक्ति ही पूरी सम्पत्ति का स्वामी होगा। इसी प्रकार

21. Sowerby v. Coleman (1867) L. R. Exch. 96. 22. Best J., in Blundell v. Catterall, (1821) 5 B & Alld. 297.

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