Select Page

LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 16 Part 2 Notes

 

LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 16 Part 2 Notes:- LLB 1st Semester Year Wise Study Material in Hindi English In this post of PDF today you are going to read Jurisprudence and Legal Theory Chapter 16 Reformative Theory Most Important Notes Question With Answer Paper Free Online.

 

Chapter 16 Part 2

सुधारात्मक सिद्धान्त (Reformative Theory)

पिछली दो शताब्दियों में हुई वैज्ञानिक प्रगति तथा सभ्यता के विकास के कारण सभी देशों में सुधारवाद एवं नवजागृति की लहर उठी है। फ्रांस में सन् 1879 ई० में मानव-अधिकारों की घोषणा के परिणामस्वरूप राज्य द्वारा अपराधियों को मनमाने ढंग से दण्डित किये जाने की पद्धति समाप्त कर दी गई। यूरोपियन देशों की दंड एवं न्याय-प्रशासन पद्धति में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए तथा दंडशास्त्र (penology) को अपराधशास्त्र की एक स्वतन्त्र शाखा के रूप में विकसित किया गया। इस नवोदित शास्त्र के अन्तर्गत अपराधियों को दण्डित करने के बजाय उनके सुधार पर अधिक ध्यान दिया गया तथा उनके सुधार हेतु उपचारात्मक दण्ड-पद्धति अपनायी जाने लगी। अपराध एवं अपराधियों के प्रति वैज्ञानिक उपागमन (scientific approach) पूर्णतः सिद्ध कर दिया कि यातनात्मक दंड प्रभावोत्पादक न होकर अपराधियों को अधिक खतरनाक समाजद्रोही बना देता है। आपराधिक न्याय-प्रशासन में अमानुषिक एवं क्रूर दंड व्यवस्था के कारण अपराधियों में निर्दयता, क्रूरता तथा प्रतिहिंसा की भावना जागृत होना स्वाभाविक है। दंड के सुधारात्मक सिद्धान्त के अन्तर्गत अपराधी को अपराध के रोग से पीड़ित रोगी माना जाता है। अतः अपराधी को कठोर दंड देकर उसके व्यक्तित्व को नष्ट नहीं किया जाना चाहिये। बल्कि उपचारात्मक दंड पद्धति द्वारा उसे समाज में पुनर्वासित करने का प्रयास किया जाना चाहिये। वर्तमान में परिवीक्षा, पैरोल, आदर्श कारावास आदि सुधारात्मक पद्धतियाँ पाय: सभी देशों में अपनाई गई हैं। इसलिए कहा गया है कि ‘अपराधी द्वारा किये गये अपराध के कारणों की छानबीन किये बिना उसे दंडित करना महँगा मनोरंजन है। वस्तुत: दण्ड स्वयं में कोई उद्देश्य नहीं है यह तो किसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति का एक साधन मात्र है और जिसका उद्देश्य सुधार द्वारा अपराधी को उपयोगी। नागरिक के रूप में पुनः स्थापित (rehabilitate) करना है। इसी कारण सुधारात्मक सिद्धान्त के अन्तर्गत कठोर, बर्बर तथा अमानुषिक दंड वर्जनीय माने गये हैं क्योंकि वे अपराधी को सुधारने के बजाय उसके व्यक्तित्व को समाप्त कर उसे और अधिक समाजद्रोही बना देते हैं 50 भारत के उच्चतम न्यायालय ने भी यह अभिमत व्यक्त किया है कि दंड का मुख्य प्रयोजन अपराधी में सुधार कर उसे समाज में पुनस्र्थापित करना है।1।

सामंड ने सुधारात्मक दंड-पद्धति के विषय में तीन प्रमुख आपत्तियाँ प्रस्तुत की हैं। प्रथम यह कि इस पद्धति के अन्तर्गत अपराधियों को शारीरिक, बौद्धिक तथा नैतिक प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए कारागारों को सुखद आवास-गृहों में परिवर्तित करना होगा। ऐसे आरामदेह कारागारों में रहने वाले कैदियों के मन से दंड का भय पूर्णत: समाप्त हो जायेगा और वे स्वयं के सुधार की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं देंगे। द्वितीय यह कि सुधारात्मक दंड का उन अपराधियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जो स्वभावतः, दुश्चरित्र, कुकर्मी या हिंसात्मक प्रवृत्ति के हैं। तृतीय यह कि कारागार का जीवन बाहरी जीवन की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक सुखद बना दिये जाने पर लोग परिश्रम करके रोटी कमाने की बजाय अपराध करके कारागारों में रहना अधिक पसन्द करेंगे। अतः अपराधियों के लिए अपराध करना एक लाभप्रद धन्धा बन जायेगा।

सामंड का विचार है कि न्याय-प्रशासन के, औचित्य की दृष्टि से न तो केवल सुधारात्मक पद्धति ही उपयुक्त है और न प्रतिरोधात्मक पद्धति । वस्तुतः दंड का निर्धारण अपराधी की वैयक्तिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिये। उनका मत है कि अधिकांश अपराधी सामान्य एवं स्वस्थ प्रकृति के नहीं होते और शारीरिक या मानसिक विकृति के कारण ही अपराध करने की ओर प्रवृत्त होते हैं। ऐसे अपराधियों के प्रति सुधारात्मक दंड-पद्धति लागू करना निष्प्रभावी होगा। इसी प्रकार महिला अपराधियों, बाल-अपराधियों या प्रथमतः अपराध करने वाले अपराधियों को कठोर दंड देना अनुचित होगा। उन्हें सुधारात्मक दण्ड-पद्धति से सामान्य नागरिक के रूप में पुनस्र्थापित किया जाना चाहिये।।

सुधारात्मक सिद्धान्त के अन्तर्गत यह मान्यता है कि दण्ड की सफलता के लिए अपराधी के भविष्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए न कि उसके बीते हुए आचरण को। दंड का उद्देश्य अपराधी द्वारा किये गये अपराध का बदला लेना न होकर उसे भविष्य में एक बार पुनः स्वस्थ जीवन जीने का अवसर प्रदान करना है। अत: कारागारों का उपयोग केवल अपराधियों को समाज से पृथक रखने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि उनकी मानसिकता में सुधार लाने हेतु साधन के रूप में किया जाना चाहिए।

सुधारात्मक दंड के समर्थकों के अनुसार समाज का वातावरण ही मुख्य रूप से आपराधिकता के लिए कारणीभूत होता है। अत: आपराधिक कारणों को सामाजिक व्यवस्था में ही खोजा जाना चाहिए। सधारवादियों के अनुसार अपराध के बजाय अपराधी के व्यक्तित्व पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि उन्हें पधार कर पुनः समाजोपयोगी बनाया जा सके। सुधारात्मक दंडशास्त्रियों की यह धारणा है कि अपराधी एक राह भटका हुआ व्यक्ति है अत: उसे सुधरने के लिए समुचित अवसर प्रदान किया जाना चाहिए ताकि वह सामान्य जीवन

50. मोहम्मद गयासुद्दीन बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1977 सु० को० 1927.

51. राकेश बनाम जेल अधीक्षक, बिहार, ए० आई० आर० 1981 सु० को० 1767.

में लौट सके। सारांश यह कि अपराधियों के प्रति मानवीय व्यवहार किया जाना चाहिए ताकि सामाजिक व्यवस्था के प्रति उनकी आस्था बनी रहे।

सुधारात्मक दण्ड के सिद्धान्त का केन्द्र बिंदु यह है कि न्याय-प्रशासन द्वारा यथासम्भव यह प्रयास किया जाना चाहिये कि दण्डावधि के दौरान अपराधी को सुधार का अवसर प्रदान कर उसे विधि का अनुसरण करने वाले एक सामान्य व्यक्ति की तरह समाज को लौटा देना चाहिये। यदि संदिग्ध चरित्र वाले दुराचारियों को उचित शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जाये तो, वे एक विधि का पालन करने वाले अच्छे नागरिक की तरह समाज में पुन:स्थापित हो सकते हैं। परन्तु ओपनहेम (Oppenheim) ने इस विचार से असहमति दर्शाते हुये कहा है। कि दण्ड में अपराधी के प्रति अनावश्यक उदारता, दण्ड में अन्तर्निहित क्लेश, पीड़ा या दंश (sting) को ही समाप्त कर देगी और यह एक दान मात्र (Charity) बनकर रह जायेगा52 जो सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है। टर्नर (Turmer) ने भी दण्ड के सुधारात्मक सिद्धान्त का इस आधार पर विरोध किया है कि इससे भय तथा कष्ट या पीड़ा जो दण्ड के अनिवार्य तत्व हैं, इनका प्रभाव समाप्त हो जायेगा और दण्ड एक निष्प्रभावी औपचारिक प्रक्रिया मात्र बनकर रह जायेगा।

सुधारात्मक उपाय -परोल एवं परिवीक्षा : (Reformative Measures : Parole and Probation)

दण्ड के सुधारात्मक सिद्धान्त के अनुसरण में अपनाई जाने वाली मुख्य तकनीकों में परोल एवं परिवीक्षा का उल्लेख किया जाना समीचीन होगा। |

परोल (Parole)-कारागारों में कारावासियों की भीड़ को कम करने के लिए तथा कारावासियों के सुधार की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए कारावास की अवधि में सदाचरण रखने वाले कतिपय चुनिंदा कैदियों को कुछ शर्तों के साथ बन्धनमुक्त किया जाता है ताकि वे समाज में सामान्य जीवन बिताते हुए स्वयं को पुनर्वासित कर सकें। कारावासी की इस प्रकार सशर्त उन्मुक्ति को परोल कहते हैं। डोनाल्ड टेफ्ट के अनुसार कारावासी की ऐसी रिहाई को परोल कहते हैं जो उसे कारागार की कुछ सजा भुगत लेने के पश्चात् प्राप्त होती है और जिसके अन्तर्गत कारावासी पर कतिपय शर्तों का बंधन रहता है, जिनका उल्लंघन किया जाने पर उसे पुन: कारावासित करके शेष सजा कारावास में भुगतनी पड़ती है।

परिवीक्षा (Probation)-अपराधी को परिवीक्षा का लाभ देकर शर्त सहित या रहित समाज में विचरते हुए स्वयं में सुधार करने का अवसर देने की तकनीक को ‘परिवीक्षा’ कहा जाता है।53 अतः परिवीक्षा के अन्तर्गत अपराधी को दंडित करके जेल भेजने की बजाय उसे परिवीक्षा का लाभ देकर समाज में ही परिवीक्षा अधिकारी की निगरानी और निर्देशन में रखा जाता है ताकि उसे समाज में ही रहकर सुधरने का सुअवसर प्राप्त हो सके। डोनाल्ड टेफ्ट के अनुसार किसी आपराधिक विचारण में दोषी अपराधी के विरुद्ध न्यायालय में अंतिम दण्डादेश के निलंबन (suspension of sentence) को परिवीक्षा कहते हैं ताकि अपराधी को अपना आचरण सुधारने का अवसर मिल सके और वह स्वयं को समाज में समायोजित कर सके। परिवीक्षा की अवधि में अपराधी प्राय: न्यायालय द्वारा निर्देशित शर्तों के अधीन परिवीक्षा अधिकारी की निगरानी या निर्देशन में बना रहता है।

यद्यपि परोल तथा परिवीक्षा दोनों ही, अपराधी के वैयक्तीकरण (individualisation) पर आधारित सुधारात्मक उपाय हैं फिर भी दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। परोल पर किसी ऐसे कारावासी को रिहा किया जाता है जिसने निर्धारित न्यूनतम कैद की सजा (सामान्यतः 1/3) जेल में काट ली हो, लेकिन परिवीक्षा का लाभ ऐसे सिद्धदोष अपराधी को उपलब्ध हो सकता है, जिसका दंड सुना देने के बाद से स्थगित रखा गया हो, या उचित मामले में, दण्ड बिना सुनाए ही स्थगित रखा गया हो।

52. Oppenheim : Rationale of Punishment (1975) p. 275.

53. विस्तृत विवेचन के लिए देखें-परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (The Probation of Ofender’s Act, 1958).

किशोर अपराधियों के प्रति सुधारात्मक दृष्टिकोण

दण्ड के सुधारात्मक सिद्धान्त के संदर्भ में वर्तमान में किशोर तथा बाल अपराधियों के लिए जो उपचारात्मक पद्धति अपनाई गई है उसका उल्लेख करना उचित होगा। भारत में बाल अपराधियों के सुधार हेतु शैक्षणिक तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था सर्वप्रथम सन् 1897 के बोर्टल तथा रिफार्मेटरी स्कूल्स एक्ट में की गई थी। इन सुधारात्मक संस्थाओं में किशोर आयु के अपराधियों को औद्योगिक प्रशिक्षण दिया जाना था। इन बोर्टल्स के रखरखाव का दायित्व राज्य सरकारों पर था। इस अधिनियम के अन्तर्गत अनेक राज्य विधान मण्डलों ने अपने राज्य के लिए विस्तृत कानून पारित किये।

बाल अपराधियों के प्रति सुधारात्मक नीति अपनाई जाने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार ने सन् 1960 में बाल अधिनियम पारित किया जिसके अन्तर्गत प्रायः सभी राज्यों ने अपने बाल अधिनियम पारित किये तथा उनके अधीन नियम बनाये। इस अधिनियम का मूल उद्देश्य बाल एवं किशोर अपराधियों को रूढ़िगत न्यायालयीन कार्यवाहियों तथा प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं से दूर रखना था ताकि उन्हें सहज रूप से सुधरने का अवसर मिल सके। इन बाल-न्यायालयों की कार्यप्रणाली अपेक्षाकृत सरल, अनौपचारिक, लचीली तथा मानवीय सिद्धान्तों पर आधारित थी 54 ।

सन् 1960 के बाल अधिनियम को सन् 1978 में संशोधित किया गया जिसके अनुसार बाल अपराधियों के सर्वांगीण विकास और प्रगति के लिए बाल-सदनों (Children Homes) की स्थापना की गई। । उल्लेखनीय है कि भारत के सन् 1986 के बाल-न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act, 1986) पारित हो जाने के परिणामस्वरूप बाल अधिनियम, 1960 का निरसन हो गया। इस अधिनियम द्वारा बालअपराधियों के अलावा उपेक्षित तथा नियंत्रण-विहीन किशोर-किशोरियों के सुधार हेतु भी विशेष प्रक्रिया अपनाई गई तथा उनका परीक्षण बाल न्यायालय की बजाय बाल-कल्याण मंडलों (Child Welfare Boards) द्वारा किये जाने की व्यवस्था की गई तदोपरान्त, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम,55 2000 पारित हो जाने के फलस्वरूप सन् 1986 के बाल-न्याय अधिनियम का स्वयमेव निरसन हो गया। इस नवीन अधिनियम के प्रयोजनार्थ अठारह वर्ष से कम आयु के बालक एवं बालिकाओं को ऐसे ‘किशोर’ माना गया है जिन्हें देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता है। ।

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2000 का विशेष लक्षण यह है कि यह अपराधी बालकों को दण्डादिष्ट अथवा अर्थदण्ड से दण्डित किये जाने के विकल्प में अपनाया गया एक सुधारात्मक प्रयास है 56 इस अधिनियम के अन्तर्गत सिद्धदोष पाये गये किशोर या बालक को दण्डादिष्ट किया जाने के बजाय समाज में कोई जनहितकारी कार्य करने का आदेश दिया जाता है ताकि स्वयं पर नियन्त्रण रखते । हुये अन्य साथियों के साथ सहभागी होकर कार्य करने के लिये प्रेरित हो। ये किशोर/बालक सामुदायिक कार्य । की निर्धारित अवधि पूरी कर लेने के पश्चात् समाज में विचरण हेतु स्वतन्त्र होते हैं। ।

उल्लेखनीय है कि यदि वयस्क अपराधियों के लिये भी दण्डावधि की बजाय सामुदायिक कार्य का विकल्प लागू किया जाये तो उनके सुधार की दृष्टि से यह अधिक कारगर सिद्ध होगा। परन्तु यह विकल्प केवल ऐसे दण्डादिष्ट अपराधियों के लिये ही उपलब्ध किया जाना चाहिये जो समाज के लिये घातक न हों, । अर्थात् घोर अपराधी या आदतन अपराधियों के लिये सुधारात्मक उपाय उपलब्ध नहीं होना चाहिये। यह प्रणाली अमेरिका में वर्षों से सफलतापूर्वक लागू है।

किशोर न्याय अधिनियम के उपबन्धों के अलावा भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 27 में बाल अपराधियों सम्बन्धी प्रावधान हैं। इसी प्रकार परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (Probation of Offenders |

54. हीरालाल मलिक बनाम बिहार राज्य, (1977) 4 एस० सी० सी० 44.

55. यह अधिनियम 1 अप्रैल, 2001 से लागू हुआ है।

56. देखें, किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 15, इस अधिनियम को सन् 2006 में संशोधित किया गया है.

Act, 1958) में भी बाल एवं किशोर अपराधियों को परिवीक्षा का लाभ देकर छोड़े जाने सम्बन्धी उपबन्ध हैं 57

बाल अपराधियों के दंडादेश के विषय में भारतीय विधि आयोग ने अपनी पैतीसवीं रिपोर्ट58 में यह अनुशंसा की है कि अठारह वर्ष से कम आयु के अपराधियों को मृत्यु का दंडादेश नहीं दिया जाना चाहिये। भारतीय दण्ड संहिता से सम्बन्धित अपनी 42वीं रिपोर्ट में भी विधि आयोग ने इस सुझाव से सहमति व्यक्त की है। हरनाम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के वाद में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पी० एन० भगवती ने यह अभिनिर्धारित किया कि यदि अपराधी की आयु 18 वर्ष से कम हो, तो उसे मृत्युदण्ड नहीं दिया जाना चाहिये।

इस सन्दर्भ में सुविख्यात दंडशास्त्री (Penologist) डॉ० पी० के० सेन के विचारों का उल्लेख करना भी उचित है। उनके अनुसार दंड आवश्यक रूप से मानव आचरणों से सम्बन्धित होने के कारण उनमें एकरूपता का अभाव रहता है क्योंकि मनुष्य के आचरण परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। इसलिए उनका मत है। कि दंड का निर्धारण अपराधी की परिस्थितियों तथा अपराध के तथ्यों के अनुसार किया जाना चाहिये ताकि उसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन करना सम्भव हो सके। प्राचीन भारत की सुविकसित दंड-व्यवस्था के अस्तित्व का उल्लेख करते हुए डॉ० सेन ने कहा है कि उस समय दंड का उद्देश्य अपराधों की पुनरावृत्ति तथा विधि के उल्लंघन पर रोक लगाना था। तत्कालीन भारतीय दण्ड नीति के अन्तर्गत दण्ड व्यवस्था का आधार प्रतिवैर, भय अथवा प्रतिरोध आदि में से कुछ भी क्यों न रहा हो, परन्तु उसका अन्तिम लक्ष्य सामाजिक संरक्षण’ (social defence) ही था। अत: वे दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि भारत में दण्ड का अन्तिम लक्ष्य आज भी वही है जो सदियों पूर्व था। अन्तर केवल यह है कि वर्तमान समय में दंड को अपराधी के विरुद्ध अपकारित की प्रतिक्रिया मात्र न मानकर उसे सामाजिक सुरक्षा एवं न्याय से संरक्षण का साधन माना गया है 60

प्रत्यावर्तनीय न्याय (Restorative Justice)

बीसवीं सदी के सत्तर के दशक में अमेरिकन दण्ड प्रणाली में प्रत्यावर्तनीय न्याय (restorative justice) का सूत्रपात हुआ जिसके अन्तर्गत अपराधी और अपराध से व्यथित व्यक्ति के मध्य वार्तालाप द्वारा, दण्ड का निर्धारण किये जाने की परिपाटी प्रारम्भ हुयी। इसे ‘अपराधी और अपराध से व्यथित व्यक्ति के बीच मध्यस्थता’ (victim-offender mediation) कहा गया है। इस प्रक्रिया में अपराधी और उसके अपराध से व्यथित व्यक्ति के बीच अनेक बैठक आयोजित की जाती है जिनमें एक निष्पक्ष व्यक्ति मध्यस्थ (Mediator) की भूमिका निभाता है। इन बैठकों में अपराधी को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का पूर्ण अवसर प्रदान किया जाता है तथा इस पर व्यथित व्यक्ति की प्रतिक्रिया जानने का प्रयास किया जाता है। दोनों पक्षों के परिवार के सदस्यों को भी इन बैठकों में शामिल होने की छूट दी जाती है कि व्यथित व्यक्ति अपनी व्यथा, मानसिक, शारीरिक या प्रतिष्ठा को हुयी हानि से अपराधी को अवगत कराता है और तत्पश्चात् अपराधी से अपेक्षा की जाती है कि वह व्यथित व्यक्ति को न्याय प्रत्यावर्तित (restore justice) करे। इस प्रकार दोनों पक्षों से वार्तालाप के पश्चात् दण्ड का निर्धारण किया जाता है।

यद्यपि प्रत्यावर्तनीय न्याय (restorative justice) दण्ड निर्धारण में अधिक पारदर्शिता लाने की दिशा में एक अच्छा प्रयास है, लेकिन अनेक दण्डशास्त्रियों ने इसे अव्यावहारिक मानते हुये इसकी आलोचना की है। उनका मानना है कि इससे दण्ड का तत्व समाप्त हो जायेगा जो इस मूल दाण्डिक सिद्धान्त के विरुद्ध होगा कि अपराधी व्यक्ति को उसके अनुपात में हानि या कष्ट कारित किया जाना चाहिये। इसके अलावा प्रत्यावर्तनीय दण्ड में दण्ड का स्वरूप एवं उसकी मात्रा, अपराधी और उसके अपराध से व्यथित हुये व्यक्ति की मनोदशा

57. धारा 5 एवं 6.

58. विधि आयोग की 35वीं रिपोर्ट पृ० 354-355.

59. ए० आई० आर० 1976 सु० को० 2073.

60. सेन पी० के० : पेनालॉजी ओल्ड एण्ड न्यू (1943) पृ॰ 107.

तथा व्यक्तित्व पर निर्भर करेगी जो न्यायोचित नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप दण्ड न्याय, सिविल न्याय के रूप में परिवर्तित होकर रह जायेगा क्योंकि उसका दाण्डिक प्रभाव समाप्तप्राय हो जायेगा। यही कारण है कि इस पद्धति को भारतीय दण्ड व्यवस्था में स्वीकार नहीं किया गया है।

आदर्श दण्ड नीति के आवश्यक तत्व (Essentials of an Ideal Penal Policy)

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि दण्ड की प्रभावोत्पादकता उसके प्रति समाज की प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है। यद्यपि दण्ड एक बुराई है लेकिन सामाजिक सुरक्षा के लिए यह अनिवार्य है। किसी भी समाज में। अपराधों का होना अवश्यंभावी है। अतः दण्ड की व्यवस्था भी अत्यावश्यक है। मेक्स ीनहट (Max Greenhut) ने अपराध निवारण के साधन के रूप में प्रभावी होने के लिए दण्ड में तीन लक्षणों का होना आवश्यक बताया है-(1) अपराध और अपराधी को तत्काल खोज निकालना, (2) अपराधी को सुधरने के लिए समुचित अवसर दिया जाना, तथा (3) राज्य द्वारा ऐसे नैतिक मूल्यों को स्थापित किया जाना जिन्हें अपराधी भी अभिस्वीकृति दें 61

एक आदर्श दण्ड प्रणाली में निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है

(1) प्रत्येक दण्ड नीति का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य समाज का अपराध और अपराधियों से संरक्षण करना होना चाहिए। इस हेतु अपराधियों के उपचार के बजाय अपराधों की रोकथाम को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

(2) दंड का निर्धारण उपयोगितावादी सुख-दु:ख के सिद्धान्त के अनुरूप होना चाहिए। अत: दण्ड की पीड़ा अपराध से होने वाले सुख की तुलना में अधिक होनी चाहिए, अन्यथा दण्ड का महत्व ही समाप्त हो जायेगा।

(3) यह सर्वविदित है कि विलंब से किया गया न्याय, न्याय से इन्कार करना (justice delayed is justice denied) है। अत: न्यायदान में विलंब न होने देना दण्ड की प्रभावोत्पादकता के लिए परम आवश्यक है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हत्या जैसे जघन्य अपराध के दोषी अभियुक्त भी वर्षों तक बिना परीक्षण के रखे जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप वे अपने अपराध की गंभीरता को कब का भुला चुके होते हैं।62

(4) आदतन घोर अपराधियों के प्रति कठोर दंड की व्यवस्था होनी चाहिए जबकि प्रथमतः अपराध करने वाले; भावावेश में अपराध करने वाले अथवा बाल या किशोर अपराधियों के प्रति उदारता बरतना न्यायोचित होगा।

(5) यह सर्वविदित है कि पुलिस, न्यायालय तथा कारागार ये आपराधिक न्याय-प्रशासन के तीन प्रमुख अभिकरण हैं। अत: दण्ड को प्रभावी बनाने के लिए इन तीनों अभिकरणों में परस्पर सहयोग होना परम आवश्यक है। इनकी कार्यकुशलता के परिणामस्वरूप अपराधों में कमी आ सकती है।

(6) इसके अतिरिक्त अपराधियों को बढ़ा-चढ़ा कर महत्व न दिया जाना, उचित मामलों में मृत्युदंड का प्रयोग, निष्पक्षता आदि भी दंड को प्रभावी बनाने में सहायक हो सकते हैं। दण्ड का अंतिम उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

दण्ड नीति के प्रति उच्चतम न्यायालय का दृष्टिकोण

दण्ड व्यवस्था के विषय में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुये उच्चतम न्यायालय ने अभिकथन किया कि देश की दण्डविधि में देशवासियों की आपराधिकता के प्रति संवेदनशीलता का प्रतिबिम्ब दिखलाई देता है। दण्ड चाहे प्रतिशोधात्मक हो अथवा सुधारात्मक वह सामाजिक सुरक्षा की ओर लक्षित होना चाहिये क्योकि देशवासियों की जान-माल की रक्षा करना राज्य का परम कर्तव्य है। न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है।

61. डॉ० वाल्टर रेक्लेस : दि क्राइम प्राब्लम पृ० 487.

62. धनंजय चटर्जी का मामला इसका ज्वलंत उदाहरण है जिसे 15 मार्च, 1990 को कारित बलात्कार सहित हत्या के अपराध के लिए 14 वर्ष बाद 14 अगस्त, 2004 को मृत्युदंड दिया गया।

कि वे यह सुनिश्चित करें कि सिद्धदोष अपराधी को दिया गया दण्ड उसके अपराध की गम्भीरता के अनुरूप है।63 ।

उच्चतम न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों64 द्वारा अवैध गिरफ्तारी या अवैध निरोध के शिकार हुये व्यथित व्यक्तियों को उनके वैध अधिकारों के उल्लंघन के लिये प्रतिकर (compensation) के रूप में राज्य से क्षतिपूर्ति किये जाने के आदेश दिये हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बलात्कार के प्रकरणों में दिये गये। अनेक निर्णयों65 से भी यह स्पष्ट होता है कि न्याय के रक्षक के रूप में न्यायालय की भूमिका सराहनीय रही।

दाण्डिक न्याय में सुधार हेतु मलीमथ समिति की रिपोर्ट

दण्ड प्रणाली के सुधार हेतु गठित मलीमथ समिति (Malimath Committee) ने अपने प्रतिवेदन (Report) में यह अनुशंसा की है कि इस हेतु एक स्थायी सांविधिक समिति का गठन किया जाये जो दण्ड प्रणाली में सुधार के लिये मार्गदर्शक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करे। उदाहरणार्थ, कभी-कभी अपराधी पर अधिरोपित अर्थदण्ड की मात्रा अत्यन्त नगण्य होती है जिसका अपराधी पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी प्रकार अर्थदण्ड की राशि अपराधी की आर्थिक स्थिति अधिक होने पर उसे कारावास भोगने के सिवा कोई विकल्प नहीं रह जाता, जो अनुचित है।

सिविल ( या दीवानी ) न्याय (Civil Justice)

सिविल न्याय का मुख्य उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों को प्रवर्तित कराना है। नागरिकों के सिविल अधिकार दो प्रकार के होते हैं

(1) प्राथमिक अधिकार (Primary Rights)

(2) अनुशास्तिक अधिकार (Sanctioning Rights)

प्राथमिक अधिकार (Primary Rights)

ये ऐसे अधिकार होते हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं ही प्राप्त हो जाते हैं; जैसे-वैयक्तिक स्वतंत्रता का अधिकार, शारीरिक सुरक्षा का अधिकार या प्रतिष्ठा सम्बन्धी अधिकार (right to personal liberty, security and reputation) । प्रत्येक व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह दूसरों के प्राथमिक अधिकारों में हस्तक्षेप न करे। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि ऐसे अधिकार जो किसी व्यक्ति को जन्मतः प्राप्त होते हैं और जिनका दायित्व किसी अन्य व्यक्ति से उत्पन्न नहीं होता, प्राथमिक अधिकार कहलाते हैं। इन अधिकारों को पूर्वगामी अधिकार (antecedent rights) भी कहते हैं।

अनुशास्तिक अधिकार (Sanctioning Rights)

यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के प्राथमिक अधिकार में बाधा पहुँचाता है या हस्तक्षेप करता है, तो इसके परिणामस्वरूप अपकारित व्यक्ति का यह अधिकार होगा कि वह उल्लंघनकारी से हर्जाना वसूल करे। प्राथमिक अधिकार के उल्लंघन के परिणामस्वरूप जिन उपचारात्मक अधिकारों का सृजन होता है उन्हें

63. शैलेश जसवन्त भाई बनाम गुजरात राज्य, (2006) 2 एस० सी० सी० 359.

64 रुटलशाह बनाम बिहार राज्य, (1983); सेबेस्टीन होंगरी, (1984); भीम सिंह बनाम जम्मू एवं कश्मीर राज्य, (1986): नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य, (1993); सहेली बनाम दिल्ली पुलिस कमिश्नर (1990); गुजरात राज्य बनाम गुजरात हाई कोर्ट, ए० आई० आर० 1998 सु० को० 3164; डी० के० बस बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, ए० आई० आर० 1997 सु० को० 610; आन्ध्र प्रदेश राज्य बनाम चल्ला रामकृष्णा रेडी, ए० आई० आर० 2000 सु० को 2083; आदि।

65. देखें, बोधिसत्व गौतम बनाम शुभ्रा चक्रवर्ती, ए० आई० आर० 1996 सु० को० 922; चेयरमैन रेलवे बोर्ड बनाम। श्रीमती चंद्रिमादास, ए० आई० आर० 2000 सु० को० 988; प्रेमचन्द्र बनाम हरियाणा राज्य, ए० आई० आर० 1989 सु० को० 1441; आदि।

अनशास्तिक अधिकार कहते हैं। उदाहरण के लिए प्रत्येक व्यक्ति का यह प्राथमिक-अधिकार है कि कोई उसकी मानहानि न करे या उसके शरीर को क्षति न पहुँचाये ! परन्तु यदि कोई व्यक्ति उसके इस अधिकार का उल्लंघन करता है, तो अपकारित व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि इसके लिए वह अपकारी से हर्जाने की माँग करे। हर्जाने की वसूली का अधिकार उस व्यक्ति का शास्तिक अधिकार (sanctioning right) कहा जायेगा। तात्पर्य यह है कि शास्तिक अधिकारों का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है तथा वे तभी उत्पन्न होते हैं जब किसी प्राथमिक अधिकार का उल्लंघन किया गया हो। अनुशास्ति अधिकारों को उपचारात्मक अधिकार (remedial rights) भी कहते हैं क्योंकि वे अपकारित व्यक्ति को उल्लंघनकारी से उपचार दिलाते

प्राथमिक अधिकार के प्रवर्तन को विनिर्दिष्ट प्रवर्तन (specific enforcement) कहते हैं तथा अनुशास्तिक अधिकारों के प्रवर्तन को अनुशास्तिक प्रवर्तन (Sanctional enforcement) कहा जा सकता है। ऐसी न्यायिक प्रक्रिया जिसमें प्रतिवादी को उसके द्वारा गलत ढंग से छीनी गई वस्तु वापस लौटाने के लिए बाध्य किया जाये या ऋण के भुगतान करने के लिए विवश किया जाय या संविदा की शर्तों का पालन करने के लिए बाध्य किया जाय, विनिर्दिष्ट अनुपालन कहलाती है। संविदा के अनुपालन हेतु भी विनिर्दिष्ट अनुतोष प्राप्त किया जा सकता है।66 । । अनुशास्तिक अधिकार (sanctioning rights) के अन्तर्गत वादी को निम्नलिखित उपचार (remedies) प्राप्त होते हैं

1. आर्थिक शास्ति (Pecuniary Penalty)

सिविल वाद में वादी को यह अधिकार होता है कि वह प्रतिवादी से हर्जाने के रूप में नुकसानी वसूल कर सकता है जिसे क्षतिपूर्ति या प्रतिकर (Damages or Compensation) कहा जाता है।

यदि वादी को प्रतिवादी के किसी अपकृत्य या वचन-भंग के कारण कोई हानि हुई है, तो वह प्रतिवादी से उस हानि के लिए क्षतिपूर्ति प्राह कर सकता है। इस प्रकार की क्षतिपूर्ति दो प्रकार से हो सकती है। एक तो प्रत्यास्थापन (restitution) के रूप में, जिसके अन्तर्गत प्रतिवादी को उस लाभ का आर्थिक मूल्य वादी को। लौटाना होता है, जो उसने वादी से अनुचित ढंग से प्राप्त किया है। दूसरे शास्तिक-प्रतितोष (penal redress) के रूप में, जिसके अन्तर्गत प्रतिवादी द्वारा वादी की हानि-पूर्ति की जाती है। परन्तु प्रतिवादी द्वारा वादी को इस प्रकार दी जाने वाली राशि वादी की वास्तविक हानि की अपेक्षा कहीं अधिक रहती है।

शास्तिक तथा उपचारात्मक कार्यवाहियाँ (Penal and Remedial Proceedings)

दीवानी अदालतों (Civil courts) की कानूनी प्रक्रिया दो प्रकार की हो सकती हैं-(1) शास्तिक और (2) उपचारात्मक। शास्तिक कार्यवाही में विधि का उद्देश्य प्रतिवादी को दंडित करना होता है। इस श्रेणी में शास्तिक प्रतितोष (Penal Redress), शास्तिक कार्यवाही (Penal action) तथा आपराधिक अभियोजन । (criminal prosecution) का समावेश है।

उपचारात्मक प्रक्रिया में दंड की भावना बिल्कुल नहीं रहती। इस श्रेणी में विनिर्दिष्ट प्रवर्तन (specific । enforcement) तथा पुनःस्थापन (restitution) की कार्यवाही का समावेश है।

शास्तिक प्रक्रिया (penal proceedings) से शास्तिक दायित्व (penal liability) उत्पन्न होता है जबकि उपचारात्मक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप उपचारात्मक दायित्व (remedial liability) उत्पन्न होता है। यह आवश्यक नहीं है कि सभी दीवानी कार्यवाहियाँ उपचारात्मक ही हों। अनेक दीवानी कार्यवाहियों के , परिणाम शास्तिक (penal) भी हो सकते हैं। तथापि यह सच है कि अधिकांशतः दीवानी कार्यवाहियाँ। उपचारात्मक (remedial) स्वरूप की होती हैं।

66. धारा 10, विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963.

सिविल वादों में विलंब के कारण

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (जिसमें 1976 में संशोधन किये गये हैं) की धारा में सिविल वाद’ (Civil suit) को परिभाषित किया गया है। भारत के सभी सिविल न्यायालय सिविल वादों का निपटारा कर सकते हैं, जबकि इनका संज्ञान व्यक्त रूप से या विवक्षित रूप (expressly or impliedly) से प्रतिबन्धित न हो। इन न्यायालयों को घोषणात्मक, निषेधात्मक तथा आज्ञापक (declaratory, prohibitoy and mandatory injunctions) स्वीकृत करने की शक्ति प्राप्त है। | सिविल न्यायालयों के अधिक्रम (Hierarchy) में (1) प्रारम्भिक अधिकारिता प्राप्त सिविल न्यायालय, (2) प्रथम अपीलीय अधिकारिता प्राप्त न्यायालय, (3) द्वितीय अपीलीय अधिकारिता प्राप्त न्यायालय, तथा (4) अन्तिम अपीलीय न्यायालय, अर्थात् उच्चतम न्यायालय का समावेश है। सामान्यत: जिला न्यायालय प्रथम अपीलीय न्यायालय होता है तथा राज्य का उच्च न्यायालय द्वितीय अपीलीय न्यायालय होता है।

सिविल वादों के निपटाने में अत्यधिक विलम्ब एक चिन्ता का विषय है लेकिन इसके अनेक कारण हैं। जिनमें दस्तावेजों का निरीक्षण, पूछताछ, साक्षियों का परीक्षण आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। विलम्ब का एक कारण यह भी है कि अन्तरिम आदेश लम्बे समय तक जारी रहता है और उच्चतर न्यायालय प्रायः इसे हटाने का आदेश देने से बचे रहना चाहते हैं।

सिविल वादों में न्यायालयों द्वारा अपनायी जाने की प्रक्रिया भी जटिल एवं विलम्बकारी होती है। वादी को अपने वाद-पत्र में वह सभी जानकारियां देनी होती हैं जिनका उल्लेख सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7, नियम 1 से 18 में किया गया है। इसी प्रकार प्रतिवादी को भी अपने जवाबदावे (written statement) में सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 8 के नियम 1 से 10 में वांछित जानकारी देना अनिवार्य होता है। इन औपचारिकताओं की पूर्ति में बहुत समय नष्ट होता है।

जहां तक साक्षियों के परीक्षण का प्रश्न है इनकी कोई अधिकतम संख्या निर्धारित न होने के कारण पक्षकारगण, विशेषत: प्रतिवादी अनावश्यक साक्षियों को प्रस्तुत करने का निवेदन करना ताकि इस बहाने मामले आगे टलता रहे। साक्षियों के कूट-परीक्षण और पुनः परीक्षण में भी काफी समय लगता है। । साक्ष्य पूरी होने पर जिरह (argument) के लिये पक्षकारों के अधिवक्ता न्यायालय के समक्ष अपनी दलील प्रस्तुत करते हैं और वह मामले को येन-केन-प्रकारेण आगे बढ़वाते रहते हैं।

वाद में निर्णय प्रकरण का अन्तिम चरण होता है जिसमें न्यायाधीश को विवाद्यक मुद्दे, दोनों पक्षों की दलीलें, सुसंगत विधि तथा निर्णय के कारण आदि का उल्लेख करना होता है जिसमें बहुत समय लगता है। इसीलिये अनेक बार न्यायाधीश निर्णय को सुरक्षित रखते हैं। – अनेक बार प्रतिवादी की लगातार अनुपस्थिति के कारण न्यायालय एक तरफा फैसला (ex-parte decision) देने के लिये बाध्य होते हैं जिस पर प्रतिवादी अपनी आपत्ति लगाते हुये पुनः विचारण की मांग करता है। इन सब कारणों से सिविल वादों के निपटारे में विलम्ब होना स्वाभाविक है।

सिविल वादों के त्वरित निपटारे हेतु आदर्श नियम (Model Rules for Quicker Dispensation of Civil Cases)

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 89 को अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित करके सिविल न्याय में विलम्ब निवारण का प्रयास किया गया है। इस हेतु उच्चतम न्यायालय भारत के विधि आयोग के अध्यक्ष (Chairman of the Law Commission of India) श्री जगन्नाथ राव की अध्यक्षता में एक समिति का । गठन किया था जिसे सिविल न्याय प्रक्रिया में वैकल्पिक वाद निवारण पद्धति को अपनाये जाने हेतु आदर्श वाद-प्रबन्धन (Model case management) के तरीके सुझाने का कार्य सौंपा गया था। समिति ने अपनी । अनुशंसा में मध्यस्थ, सुलह, माध्यस्थम तथा आपसी बातचीत द्वारा सिविल वादों को निपटाये जाने पर बल । देते हुये इन्हें सिविल मुकदमेबाजी के स्थान पर विकल्प के रूप में अपनाये जाने की आवश्यकता जताई। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट तीन खण्डों में प्रस्तुत की। प्रथम खण्ड में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 89 में

संशोधन के परिणामस्वरूप पक्षकारों, वकीलों आदि को उत्पन्न हुयी कठिनाइयों तथा परेशानियों को दूर करने हेतु सुझाव दिये गये थे जबकि द्वितीय खण्ड में माध्यस्थम् एवं सुलह तन्त्र द्वारा विवादों के निपटारे को प्राथमिकता दिये जाने का सुझाव था। रिपोर्ट के तृतीय भाग में सिविल वाद केस मैनेजमेण्ट का विस्तृत ब्यौरा था। उच्चतम न्यायालय ने इन सभी अनुशंसाओं का अनुमोदन करते हुये सेलम एडवोकेट्स बार एसोसिएशन तमिलनाडु बनाम भारत संघ07 के वाद में इन्हें समाविष्ट किया।

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 89 में संशोधन के परिणामस्वरूप विवादित पक्षकारों को अपना वाद न्यायालय में दायर करने के पूर्व उसे आपसी समझौते या मध्यस्थ से निपटाने की सलाह दी जाती है और इसके लिये प्रयास किया जाता है और यह प्रयास पूर्णत: विफल हो जाने के बाद ही न्यायालय वाद स्वीकार करता है।

न्याय-प्रशासन से सम्बन्धित विभिन्न विधिक कार्यवाहियां निम्नलिखित तालिका में दर्शायी गयी हैं।

(Penal Redress) न्यायालयों के गौण कार्य (Secondary Functions of Courts)

यह सर्वविदित है कि न्यायालयों का प्रमुख कार्य न्याय-प्रशासन का सुचारु रूप से संचालन करना है। न्यायालय अपनी दाण्डिक शक्ति के द्वारा न्याय की स्थापना करते हैं। व्यक्तियों के अधिकारों के प्रवर्तन (Enforcement of rights) तथा अपराधों के शमन में न्यायालयों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह सर्वविदित है कि प्रत्येक मकदमे में दो पक्ष होते हैं। सिविल वाद में इन्हें ‘वादी’ और ‘प्रतिवादी’ कहा जाता। है जबकि आपराधिक कार्यवाही में ये ‘ अभियोजन पक्ष’ और ‘बचाव-पक्ष’ कहलाते हैं। सिविल वाद में वादी । द्वारा प्रतिवादी के विरुद्ध विधिक अधिकार के हनन के लिए हर्जाने या विनिर्दिष्ट प्रवर्तन की माँग की जाती है। आपराधिक वाद में अपराध से व्यथित व्यक्ति की शिकायत पर राज्य द्वारा अपराधी के विरुद्ध अभियोजन ।

67. रिट पिटीशन संख्या 496/2002 उच्चतम न्यायालय द्वारा दिनांक 2 अगस्त, 2005 को निर्णात,

चलाया जाता है तथा सिद्धदोष होने पर उसे दंडित किया जाता है। इस प्रकार दीवानी तथा आपराधिक, दोनों। ही प्रकार के वादों में न्यायालय द्वारा सुनवाई के पश्चात् निर्णय दिया जाता है तथा निर्णय का निष्पादन भी न्यायालय के माध्यम से ही कराया जाता है।

न्यायालयों का प्राथमिक कार्य न्याय की स्थापना करना है परन्तु समाज में प्रगति तथा सभ्यता के विकास के साथ न्यायालयों को कुछ गौण कार्य (secondary functions) भी करने पड़ते हैं। सामंड के अनुसार न्यायालयों के गौण कार्य निम्नलिखित हैं08

1. राज्य के विरुद्ध अधिकार-याचिका की सुनवाई (Petitions of Right against the State)

– यदि किसी व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध ऋण की अदायगी, संविदा-भंग या किसी प्रकार के अधिकारहनन का प्रश्न उठाना है, तो उसे न्यायालय में अधिकार-याचिका (petition of right) दायर करनी होगी। न्यायालय उसकी याचिका पर सुनवाई करेगा और विधि के अनुसार निर्णय देगा। उल्लेखनीय है कि न्यायालय स्वयं ही राज्य का एक अंग होने के कारण अपने निर्णय को मानने के लिए राज्य को बाध्य नहीं कर सकता है, तथापि वह अपने निर्णयों को राज्य पर लागू करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता है। 2. अधिकार-घोषणा (Declaration of Rights)

कभी-कभी व्यक्ति को अपने किसी अधिकार के अस्तित्व के बारे में निश्चितता नहीं रहती, अर्थात् वह अपने किसी अधिकार के विषय में शंकित रहता है। ऐसी स्थिति में यदि वह चाहे, तो न्यायालय में अपने अधिकार के बारे में घोषणा हेतु प्रार्थना-पत्र दे सकता है। इस प्रकार का प्रार्थना-पत्र दिये जाने पर न्यायालय केवल यही विचार करेगा कि प्रार्थी को अमुक अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं। परन्तु न्यायालय इस अधिकार के उल्लंघन के विषय में कोई निर्णय नहीं देगा। उदाहरणार्थ, कोई व्यक्ति अपनी औरसता सम्बन्धी घोषणा (Declaration of legitimacy) या विवाह की अकृतता (nullity of Marriage) की घोषणा आदि के विषय में न्यायालय में प्रार्थना-पत्र देकर अपने इस अधिकार की स्थिति स्पष्ट करवा सकता है।69 परन्तु न्यायालय इस विवाद के परिणामस्वरूप उद्भूत किसी विवाद पर निर्णय नहीं देगा।।

3. परिसम्पत्ति का प्रशासन (Administration of Assets)

न्यायालय को मृत व्यक्ति की परिसम्पत्ति के प्रबन्ध तथा बँटवारे का कार्य भी करना पड़ता है। इसी प्रकार उसे न्यास-सम्पत्ति का प्रशासन अथवा परिसमापन या दिवालियापन की स्थिति में कम्पनी की परिसम्पत्ति का प्रबन्ध आदि भी करना पड़ता है। विभिन्न परिस्थितियों में परिसम्पत्ति का प्रशासन न्यायालय के गौण कार्यों के अन्तर्गत किया जाता है।

4. अधिकार स्वत्व (Title of Right)

न्यायालय का एक गौण कार्य यह भी है कि वह न्यायिक आज्ञप्तियों (judicial decrees) द्वारा अधिकारों को उत्पन्न करने, उनमें परस्पर अन्तर स्पष्ट करने या उन्हें अन्तरित करने आदि सम्बन्धी मामलों का निर्धारण करता है। उदाहरण के लिए, न्यायालय द्वारा तलाक (divorce), न्यायिक पृथक्करण (judicial spearation), दिवालियापन (insolvency) या न्यायिक विभाजन के अधिकार-स्वत्व की घोषणा सम्बन्धी न्यायिक आज्ञप्ति (decree) दी जा सकती है। उल्लेखनीय है कि इन मामलों में न्यायालय की आज्ञप्ति का प्रभाव वादी को उपचार दिलाना न होकर उसके अधिकार-स्वत्व की घोषणा करना मात्र होता है।

सामान्यत: न्यायालयों के गौण कार्यों को सिविल न्याय-प्रशासन के अधीन माना जाता है, क्योंकि ये प्रायः दीवानी स्वरूप के होते हैं। यहाँ ‘सिविल’ से आशय उन सभी अवशिष्ट (residuary) मामलों से है जो आपराधिक स्वरूप के नहीं होखे हैं।

68. सामंड : ज्यूरिस्थूडेंस (12वाँ संस्करण), पृ० 104-6.

69. धारा 34 तथा 35, भारतीय विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963.

 

विधि के अनुसार न्याय

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि विधि का अस्तित्व समाज में न्याय स्थापित करने के लिए है। जैसा कि सामण्ड ने कहा, “विधि ऐसे सिद्धान्तों का समूह है जो राज्य में न्याय-प्रशासन हेतु लागू किये जाते हैं और जिन्हें न्यायालयों द्वारा मान्य तथा लागू किया जाता है। आशय यह है कि विधि’ के बिना न्याय-प्रशासन सम्भव नहीं है। न्यायाधीशों को वाद-निर्णय के लिए प्राधिकार (authority) की आवश्यकता होती है जो उन्हें स्थान-विशेष की विधि या कानूनों द्वारा प्राप्त होता है। अतः विधि सभी व्यक्तियों के प्रति समान रूप से लागू की जाती है तथा इसमें किसी के प्रति भेदभाव की गुंजाइश नहीं रहती है। न्याय-प्रशासन का यह मूलभूत सिद्धान्त प्रायः सभी प्रगतिशील देशों ने अपनाया है।70 ।

वितरणात्मक न्याय (Distributive Justice)

सामाजिक न्याय के दो मुख्य स्वरूप हैं–(1) वितरणात्मक न्याय, तथा (2) सुधारक न्याय (Corrective Justice)!

वितरणात्मक न्याय (distributive justice) से आशय यह है कि समाज के विभिन्न फायदे या लाभ सभी वर्गों के लोगों को समान रूप से अभिप्राप्त होना चाहिये और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि कोई भी व्यक्ति या वर्ग इन फायदों या हितों से वंचित न रह जाये। उदाहरणार्थ, मजदूरी, बोनस, अनुग्रह-धन (Gratuity), पारिवारिक पेंशन, इमदादी रेशन धान्य (subsidised ration) आदि की योजनायें गरीबों तथा उपेक्षितों के हित के लिए लागू की जाती हैं ताकि वे जीवन की न्यूनतम आवश्यकता से वंचित न रहें। यह वितरणात्मक न्याय सम्बन्धी योजनायें ही हैं।

वितरणात्मक न्याय को सामाजिक न्याय का ही एक स्वरूप निरूपित करते हुये न्यायमूर्ति ए० पी० सेन ने लिंगप्पा पोचन्ना बनाम महाराष्ट्र राज्य71 के वाद में अभिकथन किया कि।

“हमारा संविधान वितरणात्मक न्याय पद्धति लागू किये जाने के लिये निर्देशित भी करता है ताकि आर्थिक समानताओं को दूर किया जा सके और उपेक्षितों के प्रति होने वाले अन्याय का निवारण हो सके। समाज के विभिन्न वर्गों में धन (wealth) का उचित वितरण हो, इस हेतु विधि का प्रयोग किया | जाना चाहिये तथा ऐसी विधियाँ निर्मित की जानी चाहिये जिनसे समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमता और योग्यता के अनुरूप धन अर्जित करने के अवसर मिल सके और वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके।”

इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि वितरणात्मक न्याय का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों में व्याप्त विषमताओं तथा असमानताओं को दूर करना है जिसके लिए कराधान, कृषि एवं शहरी भूमि की अधिकतम सीमा (Agricultural and Urban Land Ceiling) आदि विधियों में समुचित प्रावधान रखे जाने चाहिये। यह सुनिश्चित भी किया जाना आवश्यक है कि धनहीन गरीब अपनी दरिद्रता के कारण धन-सम्पन्न लोगों के शोषण का शिकार न हो। समाज में धन के उचित वितरण का कार्य विधि द्वारा सम्पन्न । होना चाहिये ताकि समाज के सभी वर्गों को वितरणात्मक न्याय उपलब्ध हो सके।72

भारत में विधि के अनुसार न्याय (Justice According to Law in India)

भारतीय संविधान में विधि के अनुसार न्याय के सिद्धान्त को पूर्णतः अपनाया गया है।73 संविधान के अनुच्छेद 20, 21 व 22 में दिये गये मुलभूत अधिकारों को कार्यपालिका या विधायिनी शक्ति के अनुचित

70. The concept of ‘rule of law’ in England and India and the ‘Due Process’ clause and the doctrine of

’eminent domain’ in the American Constitution aim at the establishment of justice according to law in these countries.

71. ए० आई० आर० 1985 सु० को० 389.

72. Dr. Vinay N. Paranjape : Dimensions of Reference Making Power of the Government in Industrial Adjudication, (2004) p. 55.

73. उमाजी केशव मेशराम बनाम श्रीमती राधिकाबाई, (ए० आई० आर० 1986 सु० को० 1272); राजकृष्ण बोस बनाम विनोद कानूनगो, ए० आई० आर० 1954 सु० को 202) आदि.

हस्तक्षेप से बाहर रखा गया है तथा इनके विषय में निर्णय देने की अधिकारिता केवल न्यायपालिका को ही। प्राप्त है।

इस सन्दर्भ में यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि न्याय-प्रशासन की प्रक्रिया में विधि के प्रवर्तन हेत। लोक मत का समर्थन प्राप्त होना परम आवश्यक है। लोक-मत के समर्थन बिना जोर-जबर्दस्ती से लागू की गई विधि का प्रवर्तन अधिक समय तक नहीं टिक सकता है। अत: विधि के सफल प्रवर्तन हेतु उसे जन आकांक्षाओं पर आधारित होना आवश्यक है जिससे वास्तविक न्याय की प्रतिस्थापना हो सके। भारत में सन्। 1975 में लागू की गई आपातकालीन घोषणा के परिणामस्वरूप जो संवैधानिक संशोधन74 लागू किया गया था वह इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस संशोधन के अन्तर्गत लागू की गई विधि-व्यवस्था जन-आकांक्षाओं के पूर्णतः विपरीत होने के कारण अधिक समय तक न चल सकी और इसे शीघ्र सांविधानिक संशोधन द्वारा पुनः परिवर्तित करना आवश्यक हो गया।

उपर्युक्त कथन की पुष्टि में भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम76 के वाद की प्रतिक्रिया का उल्लेख करना उचित होगा। इस निर्णय में मुख्य न्यायाधीश माननीय वी०वाई० चन्द्रचूड ने अभिनिर्धारित किया कि भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के प्रावधान वस्तुत: संविधान के ‘एक-समान सिविल कोड’ सम्बन्धी नीति निदेशक सिद्धान्त77 के अनुसरण में ही है। क्योंकि इसके द्वारा भारत के सभी धर्मावलम्बियों पर अपने निकटस्थ रिश्तेदारों के भरण-पोषण का दायित्व अधिरोपित किया गया है। यह प्रावधान निश्चित ही सभी लोगों के प्रति एक-समान, बिना किसी जाति या धर्म के भेदभाव के लागू किये गये हैं। इसका मूल उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक तथा नैतिक दृष्टि से दलित, शोषित तथा विशेषत: मुस्लिम महिला को पति के शोषण के विरुद्ध समुचित संरक्षण दिलाना है। निवेदित है। कि उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय के अनुसरण में ही लोकसभा ने सन् 1986 में देश में एक समान सिविल कोड (uniform civil code) लागू किये जाने सम्बन्धी एक बिल पारित किया। परन्तु दुर्भाग्यवश देश के कुछ स्वार्थी तत्वों ने इस मुद्दे को धार्मिक तूल देकर इस बिल को कानून का रूप दिये जाने का घोर विरोध किया। भारत के सन् 1989 में हुए लोकसभा के चुनावों में राष्ट्रीय मोर्चा पार्टी (National Front Party) सत्ता में आने के पश्चात् समाज के सभी वर्गों के लिए समान व्यवहार संहिता लागू करने हेतु एक बार पुन: प्रयास किये गये परन्तु इस सरकार का शीघ्र ही पतन हो जाने के कारण इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई। देश की वर्तमान परिस्थिति में इस बिल के पारित हो जाने की आशा करना व्यर्थ है क्योंकि भारतीय राजनेताओं में इसके लिए आवश्यक नैतिक साहस का अभाव है।

भारत में एक-समान सिविल कोड’ लागू करने हेतु आवश्यक कानुन पारित करने में संसद की इच्छाशक्ति के अभाव का उल्लेख करते हुए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी० एन० खरे ने जान वेल्लामट्टम तथा अन्य बनाम भारत संध78 के वाद में कहा है कि देश के लिए एक-समान सिविल कोड लागू करने से विभिन्न धर्मों के वैचारिक मतभेदों को समाप्त किया जा सकेगा जो निश्चित ही राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने में कारगर सिद्ध होगा।

74. बयालीसवाँ संविधान संशोधन, 1976.

75. चौवालीसवाँ संविधान संशोधन, 1978.

76. ए० आई० आर० 1985 सु० को० 945.

77. अनुच्छेद 44, भारत का संविधान.

78. ए० आई० आर० 2003 सु० को 2902.

Follow me at social plate Form