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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 16 Notes

 

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अध्याय 16 (Chapter 16)

न्याय-प्रशासन (Administration of Justice)

यह सर्वविदित है कि विधि का मुख्य उद्देश्य मानवीय आचरणों को नियंत्रित रखते हुए समाज में न्याय स्थापित करना है। अतः विधि और न्याय में निकटतम सम्बन्ध होना स्वाभाविक ही है। विधि द्वारा समाज में न्याय प्रस्थापित किया जाता है; अतः न्याय-प्रशासन ही विधि की मुख्य विषय-वस्तु है। न्याय-प्रशासन की परिभाषा देते हुए सामण्ड (Salmond) ने कहा है कि राजनीतिक समुदाय में राज्य की भौतिक शक्ति द्वारा अधिकारों तथा न्याय का संरक्षण किया जाना ही न्याय-प्रशासन कहलाता है। विधि और न्याय के परस्पर सम्बन्धों के महत्व के विषय में प्रसिद्ध फ्रान्सीसी दार्शनिक पास्कल (Pascal) लिखते हैं कि शक्ति के बिना। न्याय प्रभावहीन होता है तथा न्याय के बिना शक्ति निरंकुश होती है। विधि-विहीन न्याय एक कपोल कल्पना मात्र है क्योंकि समाज में अवांछनीय व्यक्तियों पर उचित नियंत्रण रखने के लिए शक्ति आवश्यक है। इसी प्रकार न्याय के बिना विधि स्वयं अपूर्ण मानी जाती है। अतः न्याय और विधि को एक साथ रखा जाना आवश्यक है। उपर्युक्त तर्क से पास्कल का आशय यह है कि विधि के बिना न्याय संभव नहीं है और इसी प्रकार बिना न्याय के विधि की कल्पना करना व्यर्थ है। अनेक विद्वान् न्याय को इतना अधिक महत्व देते हैं। कि वे उसे विधि का आदर्श मानते हैं। केल्सन न्याय को ही सामाजिक प्रसन्नता’ कहते हैं। विधि और न्याय को लागू करने वाली संस्थाएँ न्यायालय कहलाती हैं और विधि को लागू करने वाले व्यक्ति न्यायाधीश कहलाते हैं। विख्यात विधि-दार्शनिक स्टैम्लर (Stammler) का कथन है कि समस्त निश्चायक विधियाँ न्यायसंगत विधि स्थापित करने का प्रयत्न करती हैं। विनोग्रेडॉफ के अनुसार विधि का उद्देश्य न्याय और औचित्य की स्थापना करना है। न्याय की स्थापना से अभिप्राय यह है कि विधि का प्रवर्तन इस प्रकार किया। जाए कि प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों का उचित उपयोग कर सके।

न्याय-प्रशासन की आवश्यकता ।

विख्यात विचारक जर्मी टाइलर (Jermy Taylor) ने कहा है कि यदि मानव में तर्क-बुद्धि न होती और उस पर एक उच्चतर शक्ति न होती, तो भेड़ियों को झुण्ड (herd of wolves) मनुष्यों के झुण्ड की तुलना में अधिक शान्त और एकमत होता।2 तात्पर्य यह है कि मनुष्य में तर्क-बुद्धि होने के कारण वह अपने हितों, इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहता है। अत: उसमें परस्पर संघर्ष और टकराव की स्थिति प्राय: उत्पन्न होती रहती है। मानव की इस प्रवृत्ति को अंकुशित करने के लिए उस पर किसी सामान्य शक्ति का होना आवश्यक है ताकि वह उस शक्ति के भय से एक साथ मिलकर रह सके। राज्य की जा भय समाज में व्यक्तियों को एक साथ रखने तथा उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए परम आवश्यक है। जिससे न्याय की स्थापना की जा सके।

न्याय-प्रशासन में राज्य द्वारा निर्मित विधि की आवश्यकता को समझने के लिए हॉब्स (HARE.. ले विचारों को समझना होगा। उनके अनुसार मानव स्वभावत: संघर्षप्रिय है तथा उसका अस्तित्व ‘बल’ पर

आधारित रहता है। हॉब्स ने कथन किया कि समाज की प्राकृतिक अवस्था में मानव जीवन द:खमय तथा एकाकी था। इसका कारण यह था कि बलवान व्यक्ति कमजोर व्यक्ति के हितों और अधिकारों पर कठाराघात

1. यहाँ ‘शक्ति’ से तात्पर्य ‘विधि’ है.

2. सामण्ड : ज्यूरिस्पूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 101.

करते थे. अत: समाज में कुव्यवस्था और अशान्ति व्याप्त थी। किसी सामान्य उच्चतर शक्ति के अभाव में मानवो में आपसी संघर्ष निरंतर चलते रहते थे जिससे उनका जीवन दु:खी था। जीवन की असुरक्षितता तथा पत्य की आशंका सदैव बनी रहने के कारण सामाजिक उन्नति या सभ्यता का विकास असम्भव था। सारांश यह कि आदिम समाज में व्यक्तिगत बदले की भावना प्रबल थी। किसी सामान्य शक्ति (राज्य) के अभाव में लोग। स्वयं के बल के सहारे न्याय कर लेते थे। इस अराजकता की स्थिति से तंग आकर लोगों ने स्वयं को किसी श्रेष्ठतम शक्ति के अधीन समर्पित कर दिया और यहीं से राज्य का प्रारम्भ हुआ। अत: स्पष्ट है कि राज्य की स्थापना समाज में न्याय स्थापित करने के उद्देश्य से ही हुई है। यही कारण है कि न्याय-प्रशासन को सभ्यता के विकास का आवश्यक तत्व माना गया है। राज्य द्वारा निर्मित विधि के माध्यम से मानव के हित-सम्बन्धी संघर्षों को यथासम्भव कम करते हुए न्याय स्थापित करना ही वर्तमान समाज का प्रमुख उद्देश्य है।

सामण्ड ने यह स्वीकार किया है कि न्याय स्थापित करने में कानून के पूरक रूप में लोकमत (public opinion) की भूमिका महत्वपूर्ण है। परन्तु लोकमत के बन्धन का प्रभाव केवल उन सौम्य व्यक्तियों पर ही पड़ता है जिनकी अन्तरात्मा शुद्ध होती है। सामान्य व्यक्ति पर लोकमत के बन्धन का विशेष प्रभाव नहीं। पड़ता। अत: न्याय-प्रशासन की दृष्टि से विधि और लोकमत का सम्बन्ध परस्पर निर्भरता का है क्योंकि प्रभावी न्याय-प्रशासन के लिए देश में स्वस्थ लोकमत का समर्थन होना परम आवश्यक है जो कि स्वयं विधि और लोक-समर्थन पर निर्भर करता है। सामण्ड का मत है कि राज्य की विधि न्याय-परायण व्यक्ति के लिए नहीं है बल्कि अन्यायी के लिए है जबकि लोकमत की विधि न्याय-परायण के लिए है, अन्यायी के लिए नहीं । परिणामतः केवल लोकमत के द्वारा समाज-विरोधी तत्वों पर रोक नहीं लगायी जा सकती है। सारांश रूप में यह कहा जा सकता है कि मानवीय क्रिया-कलापों तथा संव्यवहारों पर उचित नियंत्रण रखने के लिए राज्य का होना अनिवार्य है जो विधि के माध्यम से अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए समाज में शान्ति तथा न्याय-व्यवस्था बनाये रखता है।

न्याय में निष्पक्षता का गुण विद्यमान रहना आवश्यक है। इसीलिए कहा गया है कि निष्पक्षता के अभाव में न्याय अपना महत्व खो देता है। इंग्लैंड के पूर्व मुख्य न्यायाधीश कोक (Chief Justice Coke) के शब्दों में विधि और न्याय की बुद्धिमत्ता मानव की बुद्धिमत्ता से गुरुतर है’, अर्थात् विधिक न्याय समाज की सामूहिक बुद्धिमत्ता का परिचायक है।

ए० वी० डायसी ने विधि के अनुसार न्याय को ही ‘विधि-सम्मत शासन’ (rule of law) की संज्ञा दी है। इससे तात्पर्य यह है कि विधि और न्याय समाज के सभी लोगों के प्रति बिना किसी भेदभाव के समानरूप से लागू होते हैं, अर्थात् न्याय की दृष्टि से विधि के अन्तर्गत सभी व्यक्ति समान हैं तथा कोई भी व्यक्ति विधि के ऊपर नहीं हो सकता (no one can be above law) । इसीलिए डायसी सिविल और आपराधिक न्याय में कोई विभेद नहीं मानते तथा दोनों को ही लोक-न्याय (public justice) का द्योतक मानते हैं।

न्याय-प्रशासन का उद्भव

मानव-सभ्यता के विकास की प्रारम्भिक अवस्था में मनुष्य प्रतिहिंसा (private vengeance) तथा हिंसात्मक आत्म-सहायता का अवलंबन करता था क्योंकि उसके पास अनेक अधिकारों को प्राप्त करने का एकमात्र साधन यही था कि वह अपने शारीरिक बल का प्रयोग करे। इसमें संदेह नही कि सभ्यता की प्रारम्भिक अवस्था में भी समाज अस्तित्व में था किन्तु तत्कालीन समाज में संगठित समुदाय की प्रवृत्ति जागृत नहीं हुई थी। अतः लोग अपने अधिकारों की रक्षा शारीरिक बल के प्रयोग द्वारा करते थे तथा अपने-हितैषियों की सहायता से शत्रुओं से बदला लेते थे या नुकसानी प्राप्त करते थे। उस समय प्रत्येक व्यक्ति अपने मामले में स्वयं ही निर्णायक होता था और जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत चरितार्थ थी। इसीलिए सर हेनरी मेन ने कहा है कि प्राचीन समाज की दण्ड-विधि आपराधिक विधि नहीं थी, वरन् अपकृत्य की विधि

3. हॉब्स : लेवियाथन (Leviathan) अध्याय 13. ।

4. सामण्ड : ज्यूरिस्पूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 102.

थी। इससे उनका आशय यह था कि आदिम समाज में दण्ड-विधि और अपकृत्य-विधि में कोई भेद नहीं था और जो विधि उस समय प्रचलित थी वह वर्तमान में अपकार-विधि (law of torts) कहलाती है। विद्वानों का मत है कि सभ्यता की प्राकृतिक अवस्था में समाज बल के आधार पर संगठित न होने के कारण उसने राज्य का रूप ग्रहण नहीं किया था।

मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ वैयक्तिक शक्ति के स्थान पर संगठित समुदाय की शक्ति को महत्व दिया जाने लगा। विकसित राज्य में अपराधों के प्रतिशोध की पुरातन प्रथाओं का स्थान न्याय प्रशासन ने ले लिया। विधिशास्त्रियों ने समाज की इस विकसित व्यवस्था को सिविल अवस्था कहा है। इस काल में वयाक्तक प्रतिहिंसा (private vengeance) दाण्डिक न्याय के रूप में परिवर्तित हुई जबकि हिंसात्मक स्वसाहाय्य (self-help) ने सिविल न्याय का रूप ग्रहण किया। कालान्तर में राज्य ने अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए इन प्राचीन, कठोर तथा बर्बरतापूर्ण व्यवस्थाओं को हटाकर यह सिद्धान्त प्रतिस्थापित किया कि प्रत्येक मामले का निपटारा चाहे वह अपराध हो या अपकृत्य, न्यायालय द्वारा ही किया जायेगा। अत: आधुनिक न्याय प्रशासन का विकास राज्य की शक्ति के विकास के आधार पर हुआ है।

न्याय-प्रशासन के गुण-दोष ।

वर्तमान समय में राज्य द्वारा न्यायालयों के माध्यम से न्याय प्रशासन का कार्य सम्पन्न किया जाना राज्य का महत्वपूर्ण दायित्व माना जाता है। न्यायालय विधान-मण्डलों द्वारा विनिर्मित कानूनों के आधार पर न्यायनिर्णय करने हैं। न्याय प्रशासन के प्रमुख गुण उसकी एकरूपता, निश्चितता, निष्पक्षता एवं समानता है। न्यायाधीशों द्वारा दिये गये निर्णय विधि के निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित होते हैं तथा वे सभी के प्रति एक समान रूप से लागू होते हैं। ये विधियाँ संहिताबद्ध (codified) होने के कारण लोगों को इनकी पूर्व जानकारी रहती है और वे अपने आचरण तदनुसार विनियमित कर सकते हैं। संहिताबद्ध विधि न्यायाधीशों को भी सभी के प्रति समान रूप से कानून लागू करने में सहायक होती है तथा वे अपने निर्णय निडरता एवं निष्पक्षता से दे सकते हैं।

न्याय-प्रशासन के उपर्युक्त गुणों के होते हुए भी इसमें कुछ दोष विद्यमान हैं। न्याय-प्रशासन के प्रमुख दोषों में इसकी अनम्यता, जटिलता एवं औपचारिकता है जिनके कारण न्याय प्रशासन से लोगों की अपेक्षाएँ पूरी नहीं हो पाती हैं। इन दोषों के परिणामस्वरूप न्याय में विलम्ब तथा पक्षकारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसीलिए सामंड ने कहा है कि इसमें संदेह नहीं कि विधि द्वारा न्याय प्रशासन गंभीरतम बुराइयों के लिए समुचित उपचार दिलाता है, लेकिन इसकी अपनी स्वयं की भी कुछ सीमाएं हैं। | जो भी हो, इसमें संदेह नहीं कि न्याय प्रशासन के दोषों की तुलना में इसके लाभ अधिक हैं और इसके माध्यम से समाज में विधि-सम्मत शासन (rule of law) स्थापित करने में पर्याप्त सहायता मिलती है।

प्राकृतिक न्याय और विधिक न्याय में विभेद

सामान्यतः न्याय के दो प्रकार मान्य किये गये हैं-(1) प्राकृतिक न्याय, और (2) विधिक न्याय। प्राकतिक न्याय उस आदर्श का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी पूर्ति के लिए विधिक न्याय प्रयत्नशील रहता। है। प्राकतिक न्याय स्वयंसिद्ध न्याय है। राज्य जब यह अनुभव करता है कि प्राकृतिक विधि के कुछ नियम इतने महत्वपूर्ण हैं कि वे प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयोगी होंगे, तो वह इन्हें अपनी विधियों में समाविष्ट कर लेता है तथा उनका पालन करना लोगों के लिए अनिवार्य हो जाता है।

सामण्ड के अनुसार विधि के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं-(1) अधिकारों का संरक्षण, (2) न्याय-व्यवस्था बनाये रखना; तथा (3) अपराधों का निवारण। न्यायालयों का उद्देश्य न्याय के स्तर में समानता तथा निष्पक्षता बनाये रखना है।

5. हेनरी मेन : एन्शिएन्ट लॉ (प्रथम प्रकाशन 1861, पुनर्मुद्रित संस्करण 1950), पृ० 307.

सिविल तथा दाण्डिक न्याय(Civil and Penal Justice)

समाज में राज्य की भौतिक शक्ति द्वारा मानव-अधिकारों को सुरक्षित रखना ही न्याय-प्रशासन का प्रमुख उद्देश्य है। इस दृष्टि से न्याय प्रशासन को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है—(1) सिविल या दीवानी न्याय-प्रशासन, तथा (2) आपराधिक या दाण्डिक न्याय-प्रशासन।

ऐसा अपकृत्य (wrong) जो दीवानी न्यायिक कार्यवाही (civil proceedings) का कारण बने, दीवानी। अपकार (civil wrong) कहलाता है जबकि ऐसा कृत्य जो आपराधिक कार्यवाही के अन्तर्गत आता हो, ‘अपराध’ (crime) कहलाता है। उस व्यक्ति की प्रास्थिति को, जिसने अपकृत्य या अपराध करके या करने की धमकी देकर स्वयं को विधिक कार्यवाही का भागी बना लिया है, ‘दायित्व’ (liability) कहा जाता है। यह दायित्व उसके कृत्य के अनुसार दीवानी या दाण्डिक स्वरूप का हो सकता है। सिविल तथा दाण्डिक न्यायप्रशासन में यह प्रक्रियात्मक भेद है।6

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि दोषपूर्ण कृत्यों (wrongs) को उनसे उत्पन्न होने वाले विधिक परिणामों (legal consequences) के आधार पर दीवानी या आपराधिक श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। ये दोनों प्रकार की कार्यवाहियाँ (दीवानी तथा आपराधिक) अलग-अलग न्यायालयों में भिन्न-भिन्न प्रक्रिया और औपचारिकताओं द्वारा प्रशासित होती हैं। दीवानी तथा आपराधिक कार्यवाहियों के परिणाम भी भिन्न-भिन्न होते हैं। दीवानी कार्यवाही के परिणामस्वरूप वादी को क्षतिपूर्ति (compensation) या निषेधाज्ञा (injunction), प्रत्यास्थापना (restitution), विनिर्दिष्ट पालन (specific performance), ऋण की अदायगी की आज्ञप्ति (decree for payment of debts) आदि के उपचार प्राप्त हो सकते हैं जबकि आपराधिक कार्यवाही के परिणामस्वरूप अपराधी को दण्डित किया जाता है। यह दण्ड मृत्युदण्ड, सश्रम अथवा सादा कारावास, निर्वासन, अर्थदण्ड या चेतावनी के रूप में हो सकता है।

सामण्ड का कथन है कि अनेक मामलों में दीवानी और आपराधिक कार्यवाही का परिणाम एक ही हो सकता है। उदाहरण के लिए कभी-कभी दोनों में प्रतिवादी को अर्थदण्ड ही दिया जा सकता है। इसी प्रकार यदि प्रतिवादी द्वारा दीवानी कार्यवाही के अन्तर्गत जारी की गई निषेधाज्ञा (injunction) का उल्लंघन किया जाता है, तो उसे कारावास का दण्ड दिया जा सकता है। यह कार्यवाही दीवानी प्रकृति की होते हुए भी कारावास के दण्ड की व्यवस्था करती है, जो सामान्यतः आपराधिक मामलों में होती है।

सिविल तथा दांडिक कार्यवाही में विभेद

सिविल तथा आपराधिक न्याय में निम्नलिखित प्रक्रियात्मक भेद हैं|

(1) दीवानी कार्यवाही का उद्भव किसी विधिक अधिकार के उल्लंघन के परिणामस्वरूप होता है जब कि विधि द्वारा निषिद्ध कोई अपराध-कृत्य कारित होने पर अपराधी के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही संस्थित की जाती है।

(2) सिविल कार्यवाही का उद्देश्य अधिकारों का प्रवर्तन करना है जबकि आपराधिक कार्यवाही का उद्देश्य अपराधी को दण्डित करना है।

(3) सिविल कार्यवाही में वादी (Plaintiff) किसी विधिक अधिकार का दावा करता है परन्त आपराधिक कार्यवाही में अभियोजक (Prosecutor) किसी अधिकार का दावा नहीं करता अपितु अभियक्त (accused) के विरुद्ध दोष आरोपित करता है।

(4) दीवानी कार्यवाही में प्रतिवादी के विरुद्ध निर्णय दिये जाने की दशा में उसे सामान्यत: वादी की क्षतिपूर्ति करनी पड़ती है परन्तु आपराधिक कार्यवाही में अभियुक्त के दोषसिद्धि होने पर उसे दण्डित किया जाता है।

6. Seaman v. Burlay, (1896) 2 OB 344

इसमें संदेह नहीं कि सामान्यत: आपराधिक मामलों में दण्ड की मात्रा दीवानी मामलों की तलना में = – होती है परन्त इसके कुछ अपवाद भी हैं। उदाहरणार्थ, बाल-अपराधियों (juveniles) को आपराधिक त्य के लिए दण्डित नहीं किया जाता बल्कि सुधारालयों (Reformatories) में रखा जाता है या परिवीक्षाधीन (probation) रखा जाता है। इसी प्रकार दीवानी-कार्यवाही में प्रतिवादी के विरुद्ध मन्जुर की। गई निषेधाज्ञा का पालन न होने पर उसे कारावास का दण्ड दिया जा सकता है।8 अनेक मामले ऐसे होते हैं। जिनके लिए दीवानी कार्यवाही या आपराधिक कार्यवाही में से किसी के भी अन्तर्गत वाद चलाया जा सकता है। उदाहरणार्थ, मानहानि के लिए दोषी व्यक्ति के विरुद्ध दीवानी कार्यवाही भी की जा सकती है या फिर उसके विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 499 के अन्तर्गत आपराधिक मुकदमा भी चलाया जा सकता है। इसीलिए ग्लेनवाइल विलियम्स (Glanwille Williams) का विचार है कि दीवानी और आपराधिक न्याय में वास्तविक अन्तर कार्य के भौतिक परिणामों के आधार पर न होकर उनके वैधानिक परिणामों के आधार पर होता है।

अपकृत्य तथा अपराध (Civil Wrongs and Crimes)

अपकृत्य और अपराध में मुख्य अन्तर यह है कि आपराधिक कृत्य सार्वजनिक अपकार (Public wrong) होता है जबकि दीवानी अपकृत्य वैयक्तिक अपकार (private wrong) माना जाता है। जैसा कि ब्लैकस्टोन (Blackstone) ने कहा है-”अपकारों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है : (1) वैयक्तिक अपकार (Private wrongs) तथा (2) सार्वजनिक अपकार (public wrongs) । प्रथम में व्यक्तियों के वैयक्तिक अधिकारों का उल्लंघन होता है जिसके लिए प्रायः नुकसानी (civil damages) दिलाई जाती है; द्वितीय में सार्वजनिक अधिकारों और कर्तव्यों का उल्लंघन होता है, जो सम्पूर्ण समाज को प्रभावित करता है। इसे अपराध कहते हैं क्योंकि यह आम जनता के विरुद्ध किया गया एक गैर-कानूनी कृत्य माना जाता है, भले ही उससे केवल एक ही व्यक्ति प्रभावित क्यों न हो।” इस अन्तर को एक उदाहरण द्वारा अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। हत्या (murder) के मामले में केवल उसी व्यक्ति को क्षति कारित होती है जिसकी हत्या की गई हो, फिर भी इसे वैयक्तिक अपकार नहीं माना जाता बल्कि सार्वजनिक अपकृत्य माना जाता है। इसका कारण यह है कि हत्या के कृत्य के परिणामस्वरूप जन-साधारण में भय और आतंक का वातावरण व्याप्त हो जाता है; अत: वह परोक्षत: समस्त समाज को प्रभावित करता है। इसके विपरीत, दीवानी अपकार, जैसे असावधानी (negligence), अतिचार (trespass), संविदा भंग (breach of contract) आदि में केवल व्यक्ति-विशेष ही प्रभावित होता है न कि समस्त समाज। फलत: यह अपकारित व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ दिया जाता है कि वह अपनी क्षतिपूर्ति के लिए न्यायालय में वाद प्रस्तुत करे या न करे। आपराधिक मामले में अपराधी के विरुद्ध राज्य द्वारा अनिवार्यतः अभियोजन चलाया जाता है तथा इसमें अपकारित या व्यथित व्यक्ति की इच्छा का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है।

ब्लैकस्टोन (Blackstone) के उपर्युक्त विचारों का खण्डन करते हुये सामण्ड ने कहा है कि अनेक मामलों में इन दोनों कार्यवाहियों के लिए एक ही उपचार दिलाया जा सकता है। इसी प्रकार समस्त सार्वजनिक अपकृत्य आपराधिक स्वरूप के नहीं होते। उदाहरणार्थ, राज्य को कर न चुकाना (non-payment of tax) या रात्रि के समय बिना रोशनी (हेडलाइट) के कार चलाना आदि सार्वजनिक अपराध माने जाते हैं; यद्यपि इनमें आपराधिक प्रवृत्ति का अभाव है। इसके विपरीत अनेक आपराधिक कृत्य सार्वजनिक स्वरूप के नहीं होते। बल्कि व्यक्तिगत स्वरूप के होते हैं; जैसे-विवाह सम्बन्धी अपराधों की सुनवाई न्यायालय द्वारा केवल तभी की जाती है यदि व्यथित व्यक्ति इसकी सुनवाई के लिए आवेदन प्रस्तुत करता है।

7. किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 धारा 15 (ङ) । यह अधिनियम 1 अप्रैल, 2001 से प्रवृत्त है। इस अधिनियम को सन् 2002 में संशोधित किया गया है।

8. Order 39 Rule 2-A of Civil Procedure Code, 1908 Rule 2-A is inserted by C.P.C. (Amendment) Act, 1976

9. दं० प्र० सं०, 1973 की धारा 198.

परिणाम की दृष्टि से भी अपकृत्य और अपराध एक-दूसरे से भिन्न हैं। दीवानी अपकृत्य (civil wrong) की तुलना में अपराध समाज के लिए अधिक घातक और हानिकारक होता है। परन्तु इस तर्क के खण्डन में यह कहा जा सकता है कि अनेक मामलों में एक ही कृत्य के लिए दीवानी या आपराधिक, दोनों में से किसी भी विधि के अधीन विधिक उपचार उपलब्ध हो सकते हैं; जैसे-मानहानि, षड्यन्त्र, न्यूसेंस (nuisance), विद्वेषपूर्ण अभियोजन आदि के वादों में होता है। वस्तुस्थिति यह है कि दीवानी अपकृत्य और अपराध में मुख्य भेद उनके विधिक परिणामों (legal consequences) में है न कि भौतिक परिणामों में। ।

उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि सामान्यत: सिविल न्याय का उद्देश्य अपकारित व्यक्ति को उपचार दिलाना है जबकि आपराधिक न्याय का उद्देश्य अपराधी को दण्डित करना है। उक्त भेद कार्यवाहियों की भिन्नता और उनके परिणामों पर आधारित है। वर्तमान प्रवृत्ति इस ओर है कि दीवानी और आपराधिक न्याय दोनों का प्रशासन-तन्त्र एक समान हो तथा इसे कार्यपालिका के प्रभाव से पूर्णत: मुक्त रखा जाये ताकि व्यवस्थापकीय प्रशासक न्यायाधिकारियों पर अनुचित दबाव न डाल सकें।

आपराधिक न्याय (Criminal Justice)

समय के अनुसार सामाजिक परिवर्तनों के साथ-साथ लोगों की अपराध तथा दण्ड सम्बन्धी धारणाएँ भी। बदलती रहती हैं। दण्डशास्त्रियों ने अपराध तथा दण्ड के विषय में अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं। हीगेल (Hegel) के अनुसार दण्ड का उद्देश्य मनुष्य को पाप कर्म से मुक्त करना है जब कि हिन्दू दण्डशास्त्र में लोगों को अपराधों से संरक्षण दिलाने के लिए दण्ड को अनिवार्य माना गया है। समाज में घटित होने वाले अपराधों की संख्या में कमी लाने के लिए अपराधियों को दण्डित किया जाना आवश्यक है। दण्ड का भय अपराधियों को अपराध-कृत्य से उपरत रहने के लिए विवश करता है। आपराधिक न्याय सम्बन्धी इन्हीं विचारों के आधार पर विभिन्न दाण्डिक सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं।

प्राचीन भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था

आपराधिक न्याय व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य अपराधी को दण्डित करना होता है। दण्ड में ‘यातना’ का तत्व विद्यमान रहता है। ताकि अपराधी को पुन: अपराध करने से परावृत्त रखा जा सके और उसे यह अनुभूति ही उसके अपराधकृत्य के प्रति समाज की नापसन्दी disappropriation) है। दण्ड का उद्देश्य अपराधी को समाज से पृथक् करके उसे सुधारने का अवसर देना भी हो सकता है। दण्ड का उद्देश्य कुछ भी क्यों न हो, इसमें सन्देह नहीं इसे सभी न्याय-प्रणालियों में किसी न किसी रूप में अवश्य अपनाया गया है। प्राचीन भारत में भी शासक का यह नैतिक और विधिक कर्तव्य था कि वह अपराधी या अनाचारी को दण्डित करे। मनु के अनुसार दण्ड को विधि का एक अभिन्न तत्व माना गया था। उनका मत था कि दण्ड प्रजाजनों को नियन्त्रण में रखने का सर्वोत्तम साधन है, दण्ड उनकी संरक्षा करता है, जब लोग सो रहे होते हैं, दण्ड जागते हुये उनकी सुरक्षा करता है। अतः दण्ड को धर्म (Dharma) का एक ही प्रकार माना जाना चाहिये।

भारत के वैदिक काल में प्रजा धर्म के नियमों द्वारा शासित थी तथा राजा से लेकर रंक तक सभी से यह अपेक्षा की जाती थी कि अपने ऐतिहासिक ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’10 में ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में भारत के आर्थिक, राजनीतिक, एवं विधिक एवं न्याय प्रशासन का विस्तृत विवरण दिया है जिसमें सिविल तथा आपराधिक मामलों में न्यायालय द्वारा अपनायी जाने वाली विधि तथा प्रक्रिया का सटीक वर्णन है। दण्ड के औचित्य को सर्वाधिक महत्व दिया जाता था तथा अपराध की प्रकृति तथा अपराधी की वैयक्तिक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुये शासक उसके दण्ड को लघुकृत या निलम्बित कर सकता था। अपराधी को दण्डित करने का एक उद्देश्य यह भी था कि उसे एकान्त में रहकर अपने द्वारा किये गये दुष्कृत्य के लिये पश्चाताप करने का अवसर मिल सके। मिथ्या साक्ष्य देने या गढ़ने वाले व्यक्ति के अपराध के लिये कठोर दण्ड का प्रावधान था।

10. काटिल्ट’ के अर्थशास्त्र’ नामक महाग्रन्थ में कल 15 अध्याय, 380 श्लोक तथा 4968 सूत्रों का समावेश था जिसमें सिविल एवं आध्यात्मिक न्याय, कराधान एवं राजस्व विधि, सामान्य प्रशासन, साक्ष्य विधि, विदेश-नीति, युद्ध, देश की सुरक्षा आदि विभिन्न विषयों का विस्तृत विवेचन किया गया था.

दण्ड का निर्धारण अधिकतर अपराध की घटना और अपराध के कारणों के आधार पर किया जाना था और अपराधी के पूर्वाचरण, चरित्र तथा सामाजिक प्रास्थिति को भी विचार में लिया जाना आवश्यक था। कौटिल्य । के अर्थशास्त्र में विभिन्न अपराधों तथा उनके लिये देय दण्डों तथा अर्थदण्ड आदि का सविस्तार उल्लेख किया गया है। अपराधी को दण्डादिष्ट करते समय उसकी जाति को ध्यान में रखा जाता था तथा अपराधी उच्च वर्ण या जाति का होने की दशा में उसे अपेक्षाकृत अधिक कठोर दण्ड दिया जाता था। यदि दण्डाधीश न्याय करने या अपराधी को दण्डादिष्ट करने में चूक करता था, जो वह स्वयं दण्ड का भागी माना जाता था। जो व्यक्ति, वृक्ष, पेड़-पौधे, जंगल, पशु-पक्षी आदि को हानि कारित करता था उसके लिये अर्थदण्ड का प्रावधान था।

भारत में मुगलों के आगमन के फलस्वरूप प्राचीन दण्ड व्यवस्था विलुप्त हो गयी और मुगल दण्डप्रणाली लागू की गयी जो कालान्तर में ब्रिटिश आपराधिक दण्ड प्रणाली में परिवर्तित कर दी गयी और भारतीय स्वतन्त्रता तक जारी रही।

आपराधिक न्याय-प्रशासन के उद्देश्य एवं इनकी उपयोगिता ( दंड के विभिन्न सिद्धान्त)

आपराधिक न्याय के पांच प्रमुख उद्देश्य हो सकते हैं-(1) दण्ड द्वारा अपराधियों में भय उत्पन्न करना, (2) अपराधी के प्रति प्रतिशोध की भावना से बदला लेना, (3) अपराधों का निरोध (prevention), (4) अपराधी को पश्चाताप करने का अवसर प्रदान करना, तथा (5) अपराधी में सुधार करना।11 इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए सामण्ड ने दण्ड के सम्बन्ध में निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं|

1. प्रतिरोधात्मक सिद्धान्त (Deterrent Theory),

2. प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त (Retributive Theory),

3. प्रायश्चित्तात्मक सिद्धान्त (Expiatory Theory),

4. निरोधात्मक सिद्धान्त (Preventive Theory),

5. सुधारात्मक सिद्धान्त (Reformative Theory)

उल्लेखनीय है कि समय एवं सामाजिक परिवर्तनों के साथ-साथ दण्ड के उद्देश्यों में भी बदलाव होते रहे हैं, इसीलिए कहा गया है कि किसी देश की दण्ड-व्यवस्था अपराधों के प्रति उसकी संवेदनशीलता का प्रतीक होती है।

1. प्रतिरोधात्मक सिद्धान्त (Deterrent Theory)

किसी समय प्राय: सभी देशों के दण्डशास्त्रियों की यह धारणा थी कि अपराधों की रोकथाम के लिए। मनुष्य में दण्ड का भय उत्पन्न कर देना सर्वोत्तम दाण्डिक सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार अपराधी को अपराध से विरत रखने के लिए कठोरतम दण्ड दिया जाना चाहिये। दण्ड जितना कठोर होगा, वह उतना ही, अधिक प्रभावकारी होगा। कठोर दण्ड अपराधी को पुन: अपराध न करने की सीख तो देता ही है, साथ ही वैसा अपराध करने की इच्छा रखने वाले अन्य व्यक्तियों को भी अपराध से उपरत रहने की चेतावनी दे देता है। यही कारण है कि प्राचीन काल तथा मध्ययुग में वीभत्स और भयावह दण्ड को अधिक महत्व दिया जाता था। उस समय अपराधियों को खुले स्थानों में फाँसी देना, कोड़े लगाना, उबलते तेल या पानी में डालना, दीवाल में जिन्दा चुन देना, खाल खींच लेना, नदी में बहा देना, आदि अनेक बर्बर एवं कठोर एवं यातनात्मक दण्ड प्रचलित थे। परन्तु निवेदित है कि व्यावहारिक रूप में दण्ड सम्बन्धी यह नीति कभी सफल नहीं रही। इसका सर्वोत्तम प्रमाण यह है कि ऐसे अनेक अपराधी होते हैं जो कारावास से मुक्त होते ही पुन: वही अपराध करते हैं जिसके लिए उन्हें दण्डित किया गया था।12 भारत में भी कुछ दशकों पूर्व तक मृत्यु-दण्ड से दंडित । अपराधी को खुले स्थानों में आम जनता के बीच फाँसी दी जाने की परिपाटी थी। परन्तु उल्लेखनीय है कि

11. सामण्ड : ज्यूरिस्पूडेन्स ( 12वाँ संस्करण), पृ० 111.

12. राजेन्द्र प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1979 सु० को० 916.

इस दृश्य को देखने के लिए एकत्रित जन-समुदाय में ही जेबकटी, चोरी या छेड़-छाड़ जैसी आपराधिक वारदातें हो जाया करती थीं। इससे भयावह दण्ड की प्रभावहीनता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।13 इसके अतिरिक्त अपराधी को कठोर दण्ड14 देकर उसे आत्मसुधार के अवसर से वंचित रखना मानवीय दृष्टिकोण से भी उचित नहीं कहा जा सकता है।

विख्यात अपराधशास्त्री बकारिया के अनुसार दंड का उद्देश्य न तो अपराध करने वाले व्यक्ति को घोर यंत्रणा देना या सताना है और न ही घटित अपराध को निराकृत करना है; इसका मूल उद्देश्य अपराधी को अपराध की पुनरावृत्ति करने से रोकना तथा अन्य लोगों को उस अपराध को करने से परावृत्त रखना है। अत: दंड इस प्रकार विनियोजित किया जाना चाहिए जिससे अपराधी को उसके अपराध कृत्य से प्राप्त लाभ/सुख की अपेक्षा हानि/कष्ट अधिक हो ताकि वह उस कृत्य को पुन: करने से परावृत्त रहे । उदाहरणार्थ, कर्नाटक राज्य बनाम कृष्णप्पा15 के वाद में आठ वर्षीय बालिका के साथ बलात्कार के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त का प्रतिरोधात्मक (या निवारणात्मक) दंड बहाल रखते हुए समाज के लिए इसे चेतावनी के रूप में यथावत रखना आवश्यक माना।

उल्लेखनीय है कि प्रतिरोधात्मक दण्ड का प्रादुर्भाव अपराध और अपराधियों से संबंधित आदिकालीन सिद्धान्तों से हुआ है जब अपराध को पैशाचिक प्रकोप का परिणाम माना जाता था। अत: सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से अभियुक्त को कठोरतम यातनात्मक दंड देना उचित माना जाता था ताकि अपराधी अपराध कृत्य से विमुख रहे और अन्य व्यक्ति भी दण्ड के भय से आपराधिकता से दूर रहें।16

प्रतिरोधात्मक दण्ड के समर्थकों की धारणा थी कि कठोर दण्ड की सम्भावना अपराधी को अपराध करने से परावृत्त रखने में सहायक होता था। परन्तु जस्टिस होम्स (Justice Holmes) इस विचार से सहमत नहीं । थे। उनका मानना था कि प्रतिरोधात्मक दण्ड न्यायाधीशों को मनमाने ढंग से दण्डादेश देने की छूट देता था, जो । न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है। तथापि इसमें सन्देह नहीं कि दण्ड नीति में प्रतिशोधात्मक दण्ड का महत्व आज भी बना हुआ है और इसे गम्भीर तथा घोर अपराधियों के प्रति आज भी लागू किया जाता है। विशेषतः घोर आतंकवादियों, धार्मिक या जातीय दंगों, अनेक हत्याओं के दोषी अपराधी को कठोर प्रतिशोधात्मक दण्ड से ही दण्डादिष्ट किया जाना न्यायोचित होता है।17

2. प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त (Retributive Theory)

दण्ड का प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त प्रतिशोध या बदले की भावना पर आधारित है। इस सिद्धान्त के अनुसार अपराधी को उसके अनुपात में ही दण्डित किया जाना चाहिये। कान्ट (Kant) के अनुसार यह सिद्धान्त ‘‘जैसे को तैसा”18 (tit for tat) वाली लोकोक्ति पर आधारित है; अर्थात् बुरे के साथ बुरा व्यवहार ही किया जाना। चाहिये।19 अमेरिका के प्रसिद्ध न्यायाधीश डगलस होम्स (Holmes) भी इसी मत का समर्थन करते हैं। यह सिद्धान्त मूलतः दो बातों पर आधारित है। प्रथम यह कि अपराध से समाज में अपराधी के प्रति प्रतिकार की भावना और क्षोभ उत्पन्न होता है तथा आपराधिक न्याय द्वारा अपराधी को दण्डित करके इस क्षोभ को शान्त किया जाता है। द्वितीय यह कि दण्ड स्वयं ही अपने में एक उद्देश्य है।

13. डॉ० परांजपे, एन० वी० : अपराधशास्त्र एवं दण्ड प्रशासन (छठा संस्करण 2009) पृ० 163

14. चोरी के अपराध में अपराधी का हाथ काट लेना, मिथ्या साक्ष्य के लिए जीभ काट डालना तथा बलात्कार के लिए। अपराधी को नपुंसकीकरण कर देना आदि अनेक बर्बर दंड मध्ययुग तक प्रचलित थे.

15. (2000)4 एस० सी० सी० 75, देखें दलबीर सिंह बनाम हरियाणा राज्य, (2000) 5 एस० सी० सी० 82.

16. बार्ल्स एण्ड टीटर्स : न्यू हॉरीझन्स इन क्रिमिनोलॉजी (तृतीय संस्करण) पृ० 216. ।

17. 13 दिसम्बर, 2001 को भारतीय संसद पर हुये आतंकवादी हमले का सरगना मो० अफजल को मृत्युदण्ड से दण्डित किये जाने पर भी विगत 2 वर्षों से उसकी क्षमायाचना के प्रकरण पर अन्तिम निर्णय न होना स्थापित दाण्डिक सिद्धान्तों के अनुसार नहीं है। इसी प्रकार 26 नवम्बर, 2008 को मुम्बई में हुये आतंकवादी हमले के दोषी अपराधियों को कड़ी से कड़ा दण्ड ही दिया जाना न्यायोचित होगा।

18. अंग्रेजी में इसे “eve for an eye, tooth for tooth” कहा गया है.

19. पी के० सैन : पेनालॉजी ओल्ड एण्ड य (1943), पृ० 27 (An evil should be returned for evil).

अधिकांश दण्डशास्त्री दण्ड के प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त का समर्थन नहीं करते क्योंकि उनके विचार से अपराधी को दण्डित इसलिए नहीं किया जाता कि वह अपनी करनी का फल भोगे, बल्कि इसलिए किया जाता है कि उसे समाज से दूर रखा जाना अपराधों के निवारण में सहायक होता है। यही कारण है कि वर्तमान दण्डशास्त्री इस सिद्धान्त में अधिक रुचि नहीं दिखाते हैं तथा प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त का महत्व दिनों-दिन घटता जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि दण्ड के प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त का समर्थन अरस्तू (Aristotle), स्टीफन तथा ब्रेडले । (Bradley) आदि विद्वानों ने भी किया है। ब्रेडले के अनुसार जिस प्रकार विवाह और प्रेम के परस्पर संबंध हैं। उसी प्रकार दंड विधि और प्रतिशोध में निकट संबंध है। इस संदर्भ में सुविख्यात दार्शनिक प्लेटो (Plato) ने कहा है कि ”न्याय आत्मा की अच्छाई एवं स्वास्थ्य है जबकि अन्याय इसकी बीमारी और शर्मिन्दगी है तथा दंड इस बीमारी का इलाज है।” | प्रतिशोधात्मक दण्ड का औचित्य इसलिये भी है कि अपराध कारित करने वाला व्यक्ति दुर्जन तथा संवेदनशील होता है, उसमें दूसरों के प्रति दया, प्रेम, आदर, सौहार्द आदि की भावनायें न होने के कारण उसे प्रतिशोधात्मक दण्ड देना दण्डाधीश का नैतिक दायित्व है। अतः ऐसे अपराधियों को शारीरिक दण्ड, कारावास, देशनिकाला तथा मृत्युदण्ड आदि से दण्डित किये जाने में भी कोई दोष नहीं है क्योंकि वे इसी के पात्र होते हैं। तथापि इस विचारधारा का वर्तमान प्रगतिवादी दण्डनीतियों में कोई महत्व नहीं रह गया है और सामान्य लोकमत प्रतिरोधात्मक दण्ड के विरोध में है।

इसीलिए अनेक आलोचकों ने प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त को मानव की निकृष्ट प्रवृत्ति का द्योतक माना है। क्योंकि यह ‘बदले की भावना पर आधारित है। उनके विचार से दंड स्वयं में लक्ष्य न होकर सामाजिक सुरक्षा के लक्ष्य का एक साधन मात्र है। सामंड ने तो प्रतिशोध को उपचार न मानते हुए इसे अपराध-वृद्धि का कारण निरूपित किया है।

3. प्रायश्चितात्मक सिद्धान्त

दण्ड के प्रायश्चितात्मक सिद्धान्त से आशय यह है कि अभियुक्त को दण्डित कर कारागार में इसलिए रखना आवश्यक है कि उसे अपने किये पर पश्चाताप करने का अवसर मिले। कारागार में जब दण्डित अपराधी एकान्त पाता है, तो उसके मन में सहज ही अपने कुकृत्य के प्रति पश्चाताप और आत्मग्लानि उत्पन्न होती है। पश्चाताप की अग्नि में जलकर वह स्वयं को सुधारने का संकल्प करता है और कारावधि समाप्त होने के पश्चात् समाज में एक सदाचारी व्यक्ति की भांति जीवन प्रारम्भ करता है। कारावधि में दण्ड भोग लेने के बाद यह मान लिया जाता है कि उसका कलंक धुल चुका है और वह नये सिरे से सामान्य जीवन बिताने के लिए स्वतन्त्र है। इसीलिए कहा गया है कि दोष सिद्ध को दंडित करने के परिणामस्वरूप वह निर्दोष हो जाता है।20 प्रसिद्ध दार्शनिक विधिशास्त्री हीगेल (Hegel) ने भी दंड के प्रायश्चितात्मक सिद्धान्त का समर्थन किया। है। निवेदित है कि इस सिद्धान्त के अन्तर्गत मानव के नैतिक पहलू पर अधिक बल दिया गया है जिसका मूल आधार धर्म तथा पाप और पुण्य की संकल्पनाओं से जुड़ा हुआ है, लेकिन वर्तमान में धार्मिक और नैतिक मान्यताओं के ह्रास के कारण इस सिद्धान्त का विशेष महत्व नहीं रह गया है। एकांत कारावास का उद्देश्य प्रायः यही है कि अभियुक्त को अपने अपराधकृत्य के लिए पश्चाताप करने का अवसर मिले और वह आत्मग्लानि के परिणामस्वरूप स्वयं को स्वस्थ नागरिक के रूप में पुनस्र्थापित कर सके।

4. निरोधात्मक सिद्धान्त (Preventive Theory)

इस सिद्धान्त के अनुसार अपराधी को कारावासित करके अपराध के प्रति उसमें अरुचि उत्पन्न करना अपराध की रोकथाम का सर्वोत्तम उपाय माना गया है। इस प्रकार का दण्ड अपराधी की अपराध करने की इच्छा को समाप्त कर देता है जिससे वह पुन: अपराध की ओर अग्रसर न हो। हत्या करने वाले अपराधी को

20. “Guilt plus punishment is equal to innocence.”

मृत्युदण्ड दिया जाना निरोधात्मक दण्ड का उदाहरण है। इसी प्रकार आजीवन कारावास, सम्पत्ति की जब्ती, बार-बार घूस लेने वाले कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त कर देना आदि निरोधात्मक दण्ड के प्रकार हैं। पैटन का कथन है कि निरोधात्मक सिद्धान्त अपना ध्यान कारावासित अपराधियों पर ही केन्द्रित करता है तथा भविष्य में उनकी अपराध करने की शक्ति समाप्त करने का प्रयत्न करता है। परन्तु यह सिद्धान्त अपराधी की प्रवृत्ति में सुधार की ओर विशेष ध्यान नहीं देता। इस सिद्धान्त के अनुसार मृत्युदण्ड या फाँसी का प्रभाव केवल यह नहीं होता कि इससे अन्य अपराधियों में भय उत्पन्न होने के कारण वे उस अपराध को करने से विरत रहेंगे, बल्कि इस सिद्धान्त की मान्यता है कि फाँसी के परिणामस्वरूप समाज से एक अपराधी कम हो जायेगा। उल्लेखनीय है कि इस सिद्धान्त के अनुसार भावावेश में अपराध करने वाले अपराधियों या प्रथमत: अपराध करने वाले अपराधियों (First offenders) या बाल अपराधियों (juveniles) के प्रति विशेष उदारता दिखाना आवश्यक नहीं माना गया है जो निश्चित ही वर्तमान दण्ड प्रणाली के परिप्रेक्ष में उचित नहीं है। ।

निवेदित है कि जहाँ एक ओर निरोधात्मक कठोर दण्ड लोगों में भय उत्पन्न करके उन्हें अपराध से परावृत्त रहने के लिए बाध्य करता है, वहाँ दूसरी ओर इससे अपराधी के अधिक क्रूर और समाज-विरोधी बन जाने की सम्भावना को भी नहीं टाला जा सकता है। प्रायः यह देखा गया है कि निरोधात्मक पद्धति के अन्तर्गत दिये जाने वाले दण्ड का अपराधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और वे समाज के लिए अधिक घातक सिद्ध हो सकते हैं 21 ।

सारांश यह है कि निरोधात्मक दंड-व्यवस्था के अन्तर्गत अपराधियों को समाज से पृथक रखने के दो तरीके अपनाये जाने का समर्थन किया गया है; जो हैं-(1) कारावास जो सश्रम अथवा सादा कारावास हो सकता है तथा (2) मृत्युदण्ड। इस सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार या तो अपराधी को प्राणदंड देकर समाज से अलग कर दिया जाये और समाज को उसके अपराधों से मुक्त रखा जाए या उसे कारागार में बंदी बनाकर रखा जाए ताकि वह पुनः अपराध न कर पाये और समाज से पृथक् रहे। ।

इंग्लैण्ड में जर्मी बेंथम, जॉन स्टुअर्ट मिल आदि उपयोगितावादी विचारकों ने निरोधात्मक सिद्धान्त का समर्थन किया और इसी समय से कारागार व्यवस्था को अधिक महत्व दिया जाने लगा। ” दंड के निरोधात्मक सिद्धान्त के आलोचकों का मत है कि यह सिद्धान्त अधूरा है क्योंकि इसके अन्तर्गत अपराधी को केवल समाज से पृथक् रखे जाने पर जोर दिया गया है न कि इस दौरान उसके सुधार पर। ज्ञातव्य है कि अपराधी को सदैव के लिए तो कारागार में नहीं रखा जा सकता है क्योंकि उसकी कारावधि समाप्त होते। ही उसे समाज में लौटना होगा और संभवत: समाज के प्रति आक्रोश के कारण वह पुन: अपराध करने की ओर प्रवृत्त हो। अत: कारावासी की मानसिकता में सुधार किया जाना परम आवश्यक है।

मृत्युदण्ड (Capital Punishment)

निरोधात्मक दण्ड के रूप में मृत्युदण्ड सबसे कठोरतम माना गया है क्योंकि इसके परिणामस्वरूप समाज से अपराधी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। प्रायः सभी देशों में मृत्युदण्ड सदियों से प्रचलित है। भारत में भी आदिकाल से वधदण्ड विभिन्न रूपों में प्रचलित था। जघन्य अपराधियों को फाँसी की सजा दी जाना। मृत्युदण्ड का ही एक स्वरूप है। अवांछित समाज-विरोधी तत्वों को समूल नष्ट करने का यह एक प्रभावकारी उपाय माना जाता रहा है।

भारतीय स्वतन्त्रता के पश्चात् मृत्युदण्ड के प्रति लोकमत में बदलाव आया है। विगत पाँच दशकों से मृत्युदण्ड को समाप्त किये जाने या इससे सम्बन्धित उपबन्धों को अधिक उदार बनाये जाने की माँग संसद के सदनों में लगातार उठाई जाती रही है। विगत दशकों में मृत्युदण्ड के औचित्य के विषय में दण्डशास्त्रियों के मन में शंकाएँ उत्पन्न होने लगी हैं तथा इस दण्ड को दण्ड विधि से पूर्णतः समाप्त किये जाने की माँग की जाती रही है। यद्यपि मृत्युदण्ड को भारतीय दण्ड विधि से पूर्णत: समाप्त नहीं किया गया है परन्तु इससे सम्बन्धित

21. देखें, राजेन्द्र प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1979 सु० को० 916.

विधि में संशोधनों तथा न्याय-निर्णयों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि इस दण्ड के प्रति लचीली नीति अपनाई जाना ही व्यावहारिक दृष्टि से श्रेयस्कर माना गया है।

भारत में मृत्युदण्ड के विषय में उदारता अपनाई जाने के परिणामस्वरूप सन् 1955 में दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 367 (5) में संशोधन किया गया। इस संशोधन से पूर्व मृत्युदण्ड देने सम्बन्धी प्रावधान यह था कि ऐसे अपराधों के लिए जो मृत्युदण्ड से दंडनीय थे, यदि न्यायाधीश अपराधी की परिस्थितियों को देखते हुए मृत्युदण्ड से कम दंड देना आवश्यक समझता था, तो इसके लिए उसे दंडादेश में कम दंड की अनुशंसा किये जाने के औचित्य के कारण का उल्लेख करना आवश्यक था। परन्तु 1955 के संशोधन द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 367 (5) के उपबन्ध का लोप कर दिया गया जिसके परिणामस्वरूप यह सामान्य नियम हो गया कि मृत्यु दण्ड से दंडनीय अपराधों के लिए न्यायालय कम दंड के रूप में आजीवन कारावास की सजा दे सकता है और यदि वह यह अनुभव करता है कि प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए मृत्युदण्ड की बजाय आजीवन कारावास की कम सजा देना अनुचित होगा, तो उसे मृत्युदण्ड ही क्यों न दिया जाये, इसका कारण अपने निर्णय में अभिलिखित करना होगा। सारांश यह कि सन् 1955 के संशोधन के पूर्व मृत्युदण्ड सामान्य नियम था और इससे कम दण्ड, अर्थात् आजीवन कारावास केवल अपवाद के रूप में ही दिया जा सकता था जबकि उपर्युक्त संशोधन के बाद स्थिति ठीक विपरीत हो गई; अर्थात् मृत्युदण्ड के स्थान पर आजीवन कारावास का दंड दिया जाना सामान्य नियम हो गया और मृत्युदण्ड ही दिया जाना अपवादात्मक हो गया। पांडुरंग बनाम स्टेट ऑफ हैदराबाद22 के बाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि मृत्युदण्ट केवल अनिवार्य स्थिति में ही दिया जाना चाहिए।

भारतीय दण्ड संहिता से मृत्युदण्ड को पूर्णत: समाप्त किये जाने का प्रस्ताव सर्वप्रथम लोकसभा में सन् 1949 में रखा गया था। परन्तु तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उसे समयोचित न मानते हुए अस्वीकार कर दिया । सन् 1958 में यही प्रश्न पुनः राज्य सभा में उठाया गया परन्तु इस बार भी इसे सदस्यों का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ। इस प्रस्ताव पर अगस्त 1961 में राज्य सभा में पुनः बहस हुई परन्तु बहुमत के अभाव में यह फिर से स्थगित रखा गया। सम्भवतः मृत्युदण्ड को भारतीय दण्ड विधि से न हटाये जाने के दो प्रमुख कारण हैं। प्रथम यह कि सांघातिक अपराधियों से समाज की सुरक्षा हेतु मृत्युदण्ड को यथावत बनाये रखना परम आवश्यक है तथा दूसरे यह कि भारतीय दण्ड संहिता में मृत्युदण्ड के विकल्प में अन्य दंड देने सम्बन्धी प्रावधान पर्याप्त रूप से उदार हैं।23।

सन् 1962 में मृत्युदण्ड को समाप्त किये जाने हेतु लोकसभा में पुन: प्रस्ताव आने पर सरकार ने इस मुद्दे को विधि आयोग की राय जानने हेतु निर्दिष्ट किया। भारतीय विधि आयोग की 35वीं रिपोर्ट में मृत्युदण्ड को कायम रखने या समाप्त किये जाने के प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया गया तथा समाज और मानव की सुरक्षा की दृष्टि से मृत्युदण्ड को यथावत जारी रखना उचित माना गया।

यद्यपि मृत्युदण्ड को समाप्त किये जाने के समर्थन में जोरदार दलील यह है कि यह दंड बर्बरतापूर्ण एवं कठोरतम है तथा मानवीय मूल्यों के विपरीत है। इसके अतिरिक्त मृत्युदण्ड को कार्यान्वित कर दिये जाने के बाद यदि यह पाया जाये कि दंडित व्यक्ति वास्तव में अपराधी नहीं था, तो इस भूल में सुधार करने की कोई

22. ए० आई० आर० 1955 सु० को० 216.

23. भारतीय दण्ड संहिता, 1860 के अनुसार धारा 121, 132, 194, 302, 305, 307 तथा 396 के अन्तर्गत हुए अपराधों। के लिए मृत्युदण्ड का प्रावधान है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 121 तथा 302 के अन्तर्गत हुए अपराध के लिए वैकल्पिक दंड केवल आजीवन कारावास है। धारा 132, 194, 305, 307 एवं 396 के अन्तर्गत हुए अपराधों के लिए वैकल्पिक दंड के रूप में अन्य कारावधि की सजा भी दी जा सकती है। उल्लेखनीय है कि मिथ्थू बनाम पंजाब राज्य, (ए० आई० आर० 1983 एस० सी० 473) के निर्णय के पूर्व भारतीय दण्ड संहिता की धारा 303 के अन्तर्गत आजीवन कारावास भोग रहे अभियुक्त द्वारा हत्या की जाने पर उसे एकमात्र मृत्युदण्ड की सजा से दंडित किया जाना था, लेकिन उक्त वाद में इस धारा के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 से विसंगत होने के कारण इसे असंवैधानिक ठहराया गया और यह धारा निरस्त हो गई है.

गुंजाइश नहीं रहती है। फिर भी भारतीय संदर्भ में कानून व्यवस्था में गड़बड़ी को ध्यान में रखते हुए मृत्युदण्ड को समाप्त करना समयोचित नहीं माना गया है।

भारतीय विधि आयोग ने अपनी 42वीं रिपोर्ट में यह अनुशंसा की थी कि अठारह वर्ष से कम आयु के बालक-बालिकाओं को मृत्युदण्ड से दण्डित नहीं किया जाना चाहिए। इसी आधार पर भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता में सन् 1973 में संशोधन भी किया गया था।

भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 354 (3) में यह स्पष्ट उल्लेख है कि मृत्युदण्ड देने की दशा में न्यायालय को दंडादेश के कारणों का उल्लेख करना अनिवार्य है। निवेदित है कि बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य-4 के मामले में दंड प्रक्रिया संहिता के उपर्युक्त प्रावधान को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह उपबन्ध संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन करता है। परन्तु उच्चतम न्यायालय की संविधान न्याय पीठ ने इसे असंवैधानिक और शून्य नहीं माना। तथापि उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि मृत्युदण्ड को ‘‘बिरले से बिरले मामले” (rarest of rare case) में ही लागू किया जाना चाहिए।

भारतीय दण्ड संहिता, 1860 के अन्तर्गत निम्नलिखित अपराधों के लिये वैकल्पिक दण्ड के रूप में मृत्युदण्ड का प्रावधान है

1. भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयास या दुष्प्रेरण करना। [ धारा 121]

2. विद्रोह का दुष्प्रेरण यदि उसके परिणामस्वरूप युद्ध किया जाये [ धारा 132]

3. मृत्युदण्ड से दण्डनीय अपराध के लिये मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना। [ धारा 194]

4. हत्या। [धारा 302]

5. शिशु या उन्मत्त व्यक्ति की आत्महत्या का दुष्प्रेरण। [ धारा 305]

6. आजीवन सिद्धदोष द्वारा हत्या कारित करने का प्रयास। [धारा 307]

7. हत्या सहित डकैती। [ धारा 396] ।

8. फिरौती के लिये व्यपहरण। [ धारा 364-क]

उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त सभी अपराधों के लिये मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास के वैकल्पिक दण्ड का प्रावधान है, अर्थात् इनमें से ऐसा कोई अपराध ऐसा नहीं है जिनके लिये मृत्युदण्ड एकमात्र दण्ड देय हो। यदि उपर्युक्त अपराधों में से किसी के लिये न्यायाधीश आजीवन कारावास के दण्ड के बजाय मृत्युदण्ड दिया जाना न्यायोचित समझता है, तो उसे अपने निर्णय में इसके कारणों का उल्लेख करना अनिवार्य होगा।

भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 366 (1) में यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि यदि मृत्यु का दण्डादेश सेशन न्यायालय द्वारा पारित किया जाता है, तो सम्बन्धित उच्च न्यायालय द्वारा उसकी सम्पुष्टि किया जाना आवश्यक है।

मृत्युदण्ड सम्बन्धी निर्णीत वाद

जगमोहन सिंह बनाम राज्य25 के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने मृत्युदण्ड को न्यायोचित ठहराया। इस प्रकरण में अभियुक्त ने पुरानी रंजिश के कारण किसी छोटेसिंह नामक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी। उच्चतम न्यायालय ने मृत्युदण्ड को बहाल रखते हुए विनिश्चित किया कि अभियुक्त को दी गई सजा दंड के सिद्धान्तों के अनुरूप एवं उचित है। |

परन्तु उपर्युक्त प्रकरण के डेढ वर्ष बाद ही एडिगा अन्नम्मा बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य26 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त की सामाजिक, पारिवारिक तथा वैयक्तिक परिस्थितियों पर विचार करने के

24. ए० आई० आर० 1980 सु० को० 898.

25. ए० आई० आर० 1973 सू० को० 947.

6. ए० आई० आर० 1974 सु० को० 729.

पश्चात् उसके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाया तथा उसके मृत्युदण्ड को आजीवन कारावास में पारवर्तित कर दिया। इस मामले में एक ग्रामीण महिला और गाँव के गड़रिये के बीच प्रेम-संबंध थे लेकिन गड़रिया विवाहित होने के कारण उसकी पत्नी इसमें बाधक हो रही थी। उसे रास्ते से हटाने की नीयत से उक्त ग्रामीण महिला (प्रेमिका) ने गड़रिये की पत्नी को खेत में जिंदा जला दिया और उसकी अस्थियों को नाले के किनारे गाड़ दिया। गड़रिये ने प्रेमिका के इस कृत्य से क्षुब्ध होकर इसकी रिपोर्ट पुलिस थाने में कर दी जिसके परिणामस्वरूप प्रेमिका के विरुद्ध हत्या का मुकदमा चलाया गया तथा दोषसिद्धि के परिणामस्वरूप उसे मृत्युदण्ड दिया गया। परन्तु अपील में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश कृष्णा अय्यर ने अभिकथन किया कि भारत के ग्रामीण परिदृश्य में प्रेम-प्रसंग की ऐसी वारदातें प्रायः होती रहती हैं। इस प्रकरण में अभियुक्त लैंगिक भावावेश में हत्या कर बैठी इसीलिए उसे मृत्युदण्ड की बजाय आजीवन कारावास का दंड दिया जाना न्यायोचित होगा।

मृत्युदण्ड को दंड विधि से पूर्णत: समाप्त करने का जोरदार समर्थन करते हुए उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वी० आर० कृष्णा अय्यर ने राजेन्द्र प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य27 के वाद में अभिकथन किया कि प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त का महत्व अब समाप्त हो चुका है क्योंकि वर्तमान में दंडनीति का प्रमुख लक्ष्य अपराधी में सुधार कर उसे समाज में पुनस्र्थापित करना है ताकि उसे एक बार पुन: सामान्य नागरिक की भाँति जीवन व्यतीत करने का अवसर मिल सके। वर्तमान में सामाजिक न्याय को संविधान के प्रमुख सिद्धान्त के रूप में स्वीकार किये जाने के कारण मृत्युदण्ड का औचित्य समाप्त होता जा रहा है। इस मामले में हत्या के अपराध में कारावास से छूटते ही अभियुक्त ने सबसे प्रथम उसे दंडित कराने वाले व्यक्ति को मार डालने की नीयत से उस पर संघातक हमला किया जिसमें बीच-बचाव करने वाले व्यक्ति की गंभीर चोट के कारण मृत्यु हो गई। परिणामतः अभियुक्त को पुनः हत्या कारित करने के आरोप में मृत्युदण्ड दिया गया जिसके विरुद्ध उसने उच्चतम न्यायालय में अपील की। न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने अभियुक्त की इस हिंसक प्रवृत्ति के लिए जेल प्रशासकों को दोषी माना क्योंकि वे अपराधी को सुधारने में असफल रहे थे और इस आधार पर अभियुक्त को मृत्युदण्ड के बजाय आजीवन कारावास से दण्डित किया जाना उचित माना।

उपर्युक्त निर्णय में न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर के मृत्युदण्ड को समाप्त किये जाने की दलील के सम्बन्ध में अपना विसम्मत निर्णय (Dissenting Judgment) देते हुए न्यायमूर्ति ए० पी० सेन ने अभिकथन किया कि संविधान के अनुच्छेद 136 के अधीन विशेष अनुमति से अपील (Appeal by Special Leave) पर विचार करते समय न्यायालय को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 तथा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354 (3) से सम्बन्धित मृत्युदण्ड को सीमित या समाप्त करने की अधिकारिता प्राप्त नहीं है।

मृत्युदण्ड के सन्दर्भ में पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री जुल्फिकार अली भुट्टो को चार अन्यों के साथ नवाब मुहम्मद अहमद हत्याकाण्ड के मामले में दिये गये मृत्युदण्ड का उल्लेख करना भी सुसंगत होगा। श्री भुट्टो की क्षमा की अपील के बावजूद उन्हें मृत्युदण्ड दिया गया। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ‘एमनेस्टी इन्टरनेशनल’ द्वारा पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउल-हक से भुट्रो के मृत्युदड को आजन्म कारावास में परिवर्तित करने की अपील इस आधार पर की गई थी कि वर्तमान समाज में मृत्युदण्ड को एक क्रूर, अमानवीय तथा हिंसक दंड माना जाता है और चूंकि श्री भुट्टो का विचारण तनावपूर्ण राजनीतिक वातावरण में किया गया था इसलिए उन्हें मृत्युदण्ड दिये जाने से न्याय की हत्या होने की सम्भावना थी। तथापि श्री भुट्टो को 4 अप्रैल, 1979 को रावलपिंडी जेल में फाँसी दे दी गई 28

भारत के उच्चतम न्यायालय ने ‘चोपड़ा बच्चों के हत्याकांड’29 (Chopra Children Murder Case) में अभियुक्त रंगा-बिल्ला को मृत्युदण्ड दिया जाना न्यायोचित ठहराया। न्यायालय ने रंगा-बिल्ला की अपील

27. ए० आई० आर० 1979 सु० को० 916.

28. श्री भुट्टो के चार साथियों को भी 25 जुलाई, 1979 को मृत्युदण्ड देकर फाँसी दिया गया.

29. कुलजीत सिंह बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1981 सु० को० 1572, यह मामला ‘रंगा-बिल्ला प्रकरण’ के नाम से प्रसिद्ध है.

खारिज करते हुए अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्तों द्वारा की गई इस पूर्व-नियोजित नृशंस और बर्बरतापूर्ण बहविध हत्या को ध्यान में रखते हुए मृत्युदण्ड को आजीवन या किसी अन्य अवधि के कारावास में बदलना उचित नहीं होगा। इस प्रकरण में अभियुक्तों ने एक किशोरी को अपनी हवस का शिकार बनाकर उसके भाई सहित उसकी नृशंस हत्या कर दी थी।

टी० वी० वाथेसरन बनाम तमिलनाडु राज्य30 के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि मत्यदण्ड की सजा को दो वर्षों तक लम्बित रखना इस सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर देने के लिए स्वयं में एक उचित आधार है क्योंकि सजा के प्रवर्तन में यह विलम्ब संविधान के अनु० 21 के अन्तर्गत न्याय और उचित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है, चाहे इस विलम्ब का कारण कुछ भी क्यों न हो।

परन्तु उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने शेरसिंह बनाम पंजाब राज्य1 के मामले में वाथेसरन में दिये गये विनिश्चय में को पलट दिया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति चन्द्रचूड ने विनिश्चत किया कि यह ठीक है कि मृत्युदण्ड केवल बिरले मामले में ही दिया जाना चाहिए लेकिन उच्चतम न्यायालय द्वारा संपुष्टित मृत्युदण्ड की सजा को किसी अन्य बहाने अवरोधित या लम्बित नहीं रखा जा सकता है।

त्रिवेणी बेन बनाम गुजरात राज्य2 के बाद में उच्चतम न्यायालय ने एक बार पुनः निर्णीत किया कि मृत्युदण्ड के प्रवर्तन में दो वर्ष के विलम्ब को आजीवन कारावास में परिवर्तित करने का उचित आधार नहीं माना जा सकता है। वस्तुत: मृत्युदण्ड के लघुकरण के लिए निश्चित सीमा केवल अवधि के आधार पर निर्धारित करना न्यायसंगत नहीं होगा क्योंकि यह वाद-विशेष के तथ्यों पर निर्भर करेगा कि दण्ड का लघुकरण उचित है अथवा नहीं।

मृत्युदण्ड के औचित्य सम्बन्धी एक अन्य निर्णय एटोर्नी जनरल बनाम लछमादेवी33 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि इसमें संदेह नहीं कि किसी अभियुक्त को फाँसी देकर मृत्युदण्ड देना एक अमानुषिक कार्य है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित वैयक्तिक स्वाधीनता के अधिकार का उल्लंघन होता है परन्तु जब तक जेल निर्देशिका (Jail Manual) में तत्सम्बन्धी उपबन्धों को संशोधित नहीं कर दिया जाता, तब तक फाँसी देकर मृत्युदण्ड को समाप्त नहीं किया जा सकता, फिर इस दण्ड का स्वरूप कितना ही नृशंस, अमानवीय या घृणित क्यों न हो। दूसरे शब्दों में इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने फाँसी पर लटका कर मृत्युदण्ड दिये जाने को अमानुषिक कृत्य माना है परन्तु इस दण्ड को समाप्त करने के लिए जेलनिर्देशिका में संशोधन आवश्यक है।

मृत्युदण्ड से दंडित व्यक्ति को फाँसी पर लटकाकर दण्ड का प्रवर्तन किये जाने के औचित्य को उच्चतम न्यायालय ने श्रीमती शशी नायर बनाम भारत संघ34 के वाद में एक बार पुनः चुनौती दी गयी। परन्तु उच्चतम न्यायालय ने पूर्व-निर्णयों के आधार पर विनिश्चित किया कि मृत्युदण्ड से दंडित अभियुक्त को फाँसी। पर लटकाकर दण्ड का प्रवर्तन करना पूर्णतः वैध है।

महेश बनाम मध्य प्रदेश राज्य35 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपीलार्थी के मृत्युदण्ड को बहाल रखते हुए अभिकथन किया कि मृत्युदण्ड के प्रत्येक प्रकरण में दंड को लघुकृत करके आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिये जाने से लोगों को न्याय के प्रति विश्वास उठ जायेगा। इस वाद में दो अभियुक्त, बाप-बेटे,

30. ए० आई० आर० 1983 सु० को० 361 तथा श्रीमती त्रिवेणी बेन बनाम गुजरात राज्य, ए० आई० आर० 1989 स० को० 142.

31. ए० आई० आर० 1982 सु० को० 465.

32. ए० आई० आर० 1989 सु० को० 1335.

33. ए० आई० आर० 1986 सु० को० 467.

34. ए० आई० आर० 1992 सु० को० 395.

35. ए० आई० आर० 1987 सु० को० 1346.

ने मिलकर एक ही परिवार के तीन सदस्यों की निर्मम हत्या कर दी क्योंकि इस बात पर विवाद उठा कि उस व्यक्ति की पुत्री ने एक हरिजन से विवाह किया था। । उच्चतम न्यायालय ने रामदेव चौहान बनाम असम राज्य एवं अन्य36 के वाद में अभियुक्त के मृत्युदण्ड को उचित ठहराते हुए न्यायालय ने अभिकथन किया कि जहाँ अभियुक्त ने एक ही परिवार के बच्चों तथा महिलाओं सहित चार व्यक्तियों की सुनियोजित ढंग से बर्बरतापूर्ण एवं नृशंस हत्या की हो, उसे विरलतम प्रकरण मानते हुए मृत्युदण्ड से दंडित किया जाना पूर्णतः न्यायोचित है क्योंकि अभियुक्त का आचरण पशुवत था तथा वह समाज के लिए गंभीर खतरा (menace) बन चुका था।

सुशील मुरमू बनाम झारखंड राज्य37 के वाद में अभियुक्त ने अपनी समृद्धि (Prosperity) के लिए एक नौ वर्ष के बालक का सिर काटकर देवता को बलि चढ़ा दिया, जबकि इसी आयु का उसका एक अपना स्वयं का पुत्र भी था। उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया इस प्रकार के सुनियोजित नृशंस हत्या के लिए अध-विश्वास कोई औचित्य प्रदान नहीं कर सकता। अतः अभियुक्त के मृत्युदंड में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता क्योंकि यह स्पष्टतः एक बिरले से बिरला (rarest of rare) मामला है।

जयकुमार बनाम मध्य प्रदेश राज्य38 के मामले में अभियुक्त के अपराध को विरलतम अपराध का प्रकरण मानते हुए उच्चतम न्यायालय ने मृत्युदण्ड की सजा बहाल रखी। इस वाद में एक बाईस वर्षीय युवक ने अपनी भाभी के साथ बलात्कार करने का प्रयास किया जिसमें विफल रहने पर उसकी हत्या कर दी और सिर काट कर पेड़ पर लटका दिया तथा इस हत्या की प्रत्यक्षदर्शी मृतिका की आठ वर्षीय पुत्री की भी हत्या कर दी। न्यायालय ने इसे एक जघन्य एवं सुनियोजित हत्या का मामला निरूपित करते हुए अभियुक्त को मृत्युदंड दिया जाना ही उचित माना।।

शंकर बनाम तमिलनाडु39 के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मृत्युदण्ड को केवल इस आधार पर अनुचित नहीं माना जा सकता है कि इससे घटित अपराध को निर्मूल (समाप्त) नहीं। किया जा सकता है। |

महेन्द्र नाथ दास बनाम असम राज्य40 के वाद में अभियुक्त ने हत्या करके मृतक का हाथ और सिर काट दिया तथा वह कटे हुए सिर को अपने हाथ में लेकर स्वयं पुलिस स्टेशन जा पहुँचा था और अपने अपराध की स्वीकारोक्ति की थी। उच्चतम न्यायालय ने इसे बर्बरतापूर्ण नृशंस हत्या का मामला मानते हुए अभियुक्त को मृत्युदण्ड की सजा को उचित ठहराया तथा इस दलील को अस्वीकार कर दिया कि अभियुक्त एक नवयुवक था तथा उस पर तीन बहनों तथा वृद्ध माता-पिता का दायित्व था।

उच्चतम न्यायालय ने लक्षमण नाईक बनाम उड़ीसा राज्य-1 के वाद में अभियुक्त को दी गई फांसी की सजा को न्यायोचित ठहराते हुए निर्णय दिया कि अभियुक्त द्वारा अपनी सात वर्षीय भतीजी के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या की जाना एक पाशविक एवं घृणित अपराध, जिसके लिए मृत्युदंड ही उपयुक्त सजा थी। ।

उल्लेखनीय है कि विगत कुछ वर्षों में भारत में बलात्कार की घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। जिनमें सामहिक बलात्कार तथा अबोध बालिकाओं या किशोरियों के साथ बलात्कार और हत्याओं के मामले विशेष चिंता का विषय है। इस गंभीर समस्या के निवारण हेतु कारगर उपाय के रूप में संसद में यह प्रस्ताव

36. ए० आई० आर० 2004 सु० को० 394.

37. ए० आई० आर० 2003 सु० को० 3915.

38. (1999) 5 एस० सी० सी० 1.

39. (1994)4 एस० सी० सी० 478.

40. (1999) 5 एस० सी० सी० 102.

41. (1994) 3 एस० सी० सी० 388.

(2004 में) विचाराधीन है कि बलात्कार (धारा 375 भा० दं० सं०) के अपराध के लिए धारा 376 में उपबंधित अधिकतम 10 वर्ष के कारावास के स्थान पर बलात्कारी अभियुक्त को मृत्युदंड दिया जाए क्योंकि इस प्रस्ताव को लोकमत का समर्थन भी प्राप्त है। अतः स्पष्ट है कि गत शताब्दी के अंतिम दशकों में मृत्युदंड को समाप्त किये जाने की पहल का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कोई औचित्य नहीं रहा है तथा आशा है कि शीघ्र ही दंड संहिता की धारा 376 में संशोधन द्वारा बलात्कार के लिए दोषी व्यक्ति को 10 वर्ष की बजाय मृत्युदंड की सजा दिये जाने संबंधी प्रावधान निविष्ट किया जाएगा।

बलात्कारी को मृत्युदण्ड से दंडित किये जाने के संदर्भ में धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य42 का वाद उल्लेखनीय है जिसे दिनांक 14 अगस्त, 2004 को पश्चिम बंगाल के अलीपुर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई। अभियुक्त धनंजय चटर्जी कोलकाता स्थित आनंद अपार्टमेंट में सुरक्षा गार्ड तथा लिफ्टमेन था जिसने उसी अपार्टमेंट में रहने वाली एक चौदह वर्षीय स्कूल-छात्रा हेतल पारेख की दिनांक 15 मार्च, 1990 को बलात्कार के बाद हत्या कर दी थी। अलीपुर सत्र-न्यायालय ने अभियुक्त के अपराधों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए उसे मृत्युदण्ड से दंडित किया। इस निर्णय के विरुद्ध धनंजय की अपीलें कलकत्ता उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज कर दी जाने के पश्चात् उसने जुलाई, 2004 को महामहिम राष्ट्रपति को तीसरी बार क्षमा-याचिका दायर की जिसे राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया। अन्ततोगत्वा धनंजय को दिनांक 14 अगस्त, 2004 को फांसी देकर उसके मृत्युदंड को कार्यान्वित किया गया। उल्लेखनीय है कि विधि-जगत में फांसी के औचित्य के बारे में कोई मतान्तर नहीं है तथापि मामले को चौदह वर्ष की लंबी अवधि तक लंबित रखे जाने के लिए न्याय व्यवस्था के प्रति रोष अवश्य है।

गुरमीत सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य43 के वाद में अपीलार्थियों ने 17 अगस्त, 1986 को अपने ही परिवार के तेरह सदस्यों की उस समय हत्या कर दी थी जब वे सभी रात में सो रहे थे। हत्यारे का नव विवाह हुआ था और वह अपने माता-पिता, बड़े भाई और उसके परिवार के साथ रह रहा था। उसकी नवविवाहिता पत्नी पर यह सन्देह था कि उसके लाखा सिंह नाम के किसी युवक से अवैध सम्बन्ध थे और वह हत्यारे के यहां प्रायः आकर ठहरा करता था। परिवारजनों द्वारा इस पर आपत्ति उठाये जाने पर हत्यारे ने लाखासिंह के साथ मिलकर अपने परिवार के सभी 13 सदस्यों की हत्या कर दी जिसमें उसका बड़ा भाई, पत्नी तथा छोटे बच्चे भी शामिल थे। अपीलार्थियों ने मृत्युदण्ड के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की तथा इसे आजीवन कारावास में लघुकृत किये जाने की प्रार्थना की परन्तु अपराध की बर्बरता तथा नृशंस स्वरूप को ध्यान में रखते हुये उच्चतम न्यायालय ने अपील खारिज करते हुये मृत्युदण्ड के दण्डादेश को न्यायोचित ठहराया।

सुशील मुरमू बनाम झारखण्ड राज्य44 के वाद में अभियुक्त ने अपनी समृद्धि के लिये नौ वर्ष के एक बालक को काली माता के समक्ष उसका सिर काटकर बलि चढ़ा दिया जबकि इसी आयु का उसका स्वयं का एक पुत्र था। इस निर्मम हत्या के बाद उसने शव को बोरे में बन्द करके तालाब में बहा दिया। अभिय विरुद्ध स्वयं के भाई की बलि चढ़ाने का विचारण पहले से ही न्यायालय में चल रहा था। इससे अभियक्त की पाशविक आपराधिक मनोवृत्ति सिद्ध होती थी। उच्च न्यायालय ने उसके मृत्युदण्ड को यथावत बहाल रश्ता क्योंकि यह मामला नि:सन्देह ही ‘विरलतम’ (Rarest of rare) कोटि में आता था। अपील में उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त के मृत्युदण्ड को उचित ठहराते हुये निर्णय दिया कि प्रकरण ‘विरले से विरलतम’ कोटि में आता है या नहीं, इस हेतु निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर तय किया जाना चाहिये

(1) यदि अभियुक्त के अपराध की प्रकृति ऐसी गम्भीर, बर्बर या पाशविक हो जिसने समाज की अन्तरात्मा को हिलाकर रख दिया हो;

42. क्रिमिनल अपील संख्या 394/2004 उच्चतम न्यायालय द्वारा दिनांक 26-3-2004 को निर्णीत.

43. ए० आई० आर० 2005 सु० को० 3616.

44. ए० आई० आर० 2004 सु० को० 394,

(2) यदि हत्या ऐसे निर्मम और नृशंस तरीके से की गयी हो, जिससे समाज में रोष और आतंक उत्पन्न हो जाये; ।

(3) यदि हत्या किसी अनुसूचित जाति या अल्पसंख्यक की हुयी हो तथा वह वैयक्तिक कारणों से न होकर साम्प्रदायिक उन्मादवश कारित हो;

(4) यदि किसी अन्य स्त्री से विवाह करने की नीयत से स्वयं की पत्नी की हत्या की गयी हो;

(5) यदि एक साथ अनेक लोगों की सामूहिक हत्या की गयी हो, जैसे सम्पूर्ण परिवार या जाति-विशेष के लोगों की सामूहिक हत्या;

(6) यदि हत्या का शिकार व्यक्ति कोई निरीह बालक, असहाय महिला, या वृद्ध या अपाहिज व्यक्ति हो, या कोई लोकप्रिय नेता या समाज का अति प्रतिष्ठित व्यक्ति हो।

मृत्यु दण्ड के सन्दर्भ में स्वामी श्रद्धानन्द उर्फ मुरली मनोहर मिश्रा बनाम कर्नाटक राज्य45 के वाद का उल्लेख किया जाना आवश्यक है। इस वाद में धन-लोलुप पति ने अपनी पत्नी को नींद की गोलियों का || ओवर-डोज (Over-doze) देकर बेहोश कर उसकी हत्या कर दी तथा साक्ष्य को मिटाने की नीयत से पत्नी की लाश को अपने निवास भवन के पिछवाड़े एक लकड़ी के सन्दूक में रखकर गाड़ दिया। मृतका ने सन्। 1986 में अपने भारतीय विदेश सेवारत (IFS) मुस्लिम पति को तलाक देकर अभियुक्त के साथ इस आशय से विवाह किया था कि इससे उसकी पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होंगी। क्योंकि पूर्व पति से उसे चार पुत्रियां थीं, जो प्रायः विदेश में रहती थीं। पुत्रियों द्वारा अपनी के बारे में पूछे जाने पर, जब अभियुक्त की ओर से कोई सन्तोषजनक जवाब नहीं मिला, तो उन्होंने माँ के अचानक गायब होने की शिकायत पुलिस में दर्ज करायी | और पुलिस द्वारा अन्वेषण के पश्चात् मृतका के जघन्य हत्या का भण्डाफोड़ हुआ और 39 साक्षियों के गहन । परीक्षण के पश्चात् अभियुक्त को हत्या के लिये दोषसिद्ध कर उसे मृत्युदण्ड से दण्डित किया गया। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अभियुक्त (अपीलार्थी) को दण्ड संहिता की धारा 300/302/201 के अन्तर्गत हत्या का दोषी मानते हुये उसका मृत्युदण्ड बहाल रखा। अपील में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि अभियुक्त योजनाबद्ध तरीके से अपनी पत्नी की जायदाद हड़पने की नीयत से उसकी निर्मम हत्या की थी इसलिये उसे मृत्युदण्ड दिया जाना न्यायोचित था क्योंकि यह ‘विरलतम प्रकरण’ की कोटि में आने वाला मामला था। विशेषकर इसलिये भी कि यद्यपि मृतका ने अपनी पूरी जायदाद अभियुक्त के नाम कर दी थी. लेकिन उसे यह पत्नी की मृत्यु के पश्चात् ही प्राप्त होती, जबकि अभियुक्त उसे तुरन्त हड़पना चाहता था। परन्तु खण्डपीठ के एक न्यायाधीश के अनुसार अभियुक्त विगत 16 वर्षों से जेल में बन्द था तथा वह 61 वर्ष का हो चुका था, इसलिये उसके मृत्युदण्ड को आजीवन कारावास में बदलना उचित होगा। परन्तु यह कारावास मृत्युपर्यन्त बना रहेगा और इसमें किसी प्रकार का लघुकरण की छूट प्राप्त नहीं होगी।

रेणुकाबाई उर्फ रिंकू एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य46 के प्रकरण में अपीलार्थी रेणुका उसकी सगी बहन सीमा तथा उनकी मां अंजलिबाई, (जिसकी विचारण के दौरान सन् 1997 में मृत्यु हो गयो) तथा भेदी साक्षी (Approver) किरण जो रेणुका का पति था, सभी पुणे निवासी चोरी तथा सोने की चेन झपटने के

अपराधों में लिप्त थे और इससे उन्होंने अपार सम्पत्ति जुटाई थी। आपराधिक वार्ताओं में शक के दायरे से दूर | रहने की नियत से ये महिलायें अपने साथ 5 वर्ष तक के छोटे बच्चे को साथ रखती थीं ताकि अपराधस्थल | पर इनके अपराधी होने के बारे में किसी को सन्देह न हो। ये दोनों बहनें किरन (जो बाद में सरकारी गवाह बन गया) के साथ मिलकर पांच वर्ष से छोटे बच्चों का व्यपहरण करती थीं तथा उनकी आयु बढ़ जाने पर उनकी हत्या कारित कर नये बच्चों का व्यपहरण करके उनका अपने अपराध के लिये इस्तेमाल करती थीं। इस प्रकार उन्होंने सन् 1990 से लेकर अक्टूबर, 1996 की अवधि में नौ बच्चों की हत्या कर उन्हें ठिकाने

45. ए० आई० आर० 2008 सु० को० 3040; इस वाद के विस्तृत तथ्यों के लिये देखें डॉ० एन० बी० परांजपे द्वारा लिखित भारतीय दण्ड संहिता, (5वां संस्करण 2008) पृ० 507-508.

46. ए० आई० आर० 2006 सु० को० 3056.

लगाया। दोनों अपीलार्थी बहनों को सेशन न्यायालय द्वारा इन नृशंस हत्याओं के लिये मृत्युदण्ड से दण्डित किया गया जिसकी उच्च न्यायालय ने सम्पुष्टि कर दी। किरण सिंह (Approver) को तेरह बच्चों के अपहरण के अपराध के लिये भारतीय दण्ड संहिता की धारा 364/120-ख/323 के लिये दोषी पाया गया।

मृत्युदण्ड के विरुद्ध अपील में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अपीलार्थी के दण्डादेश को लघुकृत किये जाने के लिये कोई कारण नहीं है सिवाय इसके कि वे दोनों महिलायें थीं। परन्तु उनके अपराध की संगीनता तथा जिस योजनाबद्ध तरीके से वे अपने आपराधिक कार्यों के लिये व्यपहृत बच्चों का प्रयोग कर। रही थीं और उनके बड़े होने पर उनकी हत्या कर देती थीं, उनके मस्तिष्क की दुराचारिता (Depravity of mind) का स्वयं प्रमाण था। अत: उनकी अपील खारिज करते हुये मृत्युदण्ड को यथावत् रखा जाना ही न्यायोचित था।

आत्महत्या का अपराध

किसी व्यक्ति द्वारा आत्महत्या कर ली जाने पर तो उसे दंडित करने का प्रश्न ही नहीं उठता। प्रश्न यह है कि क्या आत्महत्या के प्रयास को दण्डनीय अपराध माना जाए? इस संदर्भ में बम्बई उच्च न्यायालय ने मारुती श्रीपत दुब्बल बनाम बम्बई राज्य47 के वाद में अभिनिर्धारित किया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309 जिसके अन्तर्गत आत्महत्या का प्रयास करना एक दण्डनीय अपराध है, असंवैधानिक तथा अधिकारातीत है क्योंकि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित जीवन के अधिकार का उल्लंघन करती है। इस तर्क की पुष्टि में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जीवन के अधिकार में जीवन को समाप्त करने का अधिकार भी स्वयमेव शामिल है। अत: यदि कोई व्यक्ति चाहे तो आत्महत्या द्वारा अपना जीवन समाप्त कर सकता है और इसे उसके अधिकार के रूप में मान्य किया जाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने रथीनाम नागभूषण पटनायक बनाम भारत संघ48 के निर्णय में यही अभिनिर्धारित किया था कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309 के अधीन आत्महत्या के प्रयास के लिए दंड के उपबंध संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत जीवन के अधिकार के प्रावधान के प्रतिकूल है। क्योंकि जीवन के अधिकार में जीवन को समाप्त कर देने का अधिकार भी परोक्षतः समाविष्ट है। परन्तु सन् 1996 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य49 के निर्णय में रथीनाम पटनायक के निर्णय को पलट दिया तथा अभिनिर्धारित किया कि जीवन के अधिकार में स्वयं का जीवन समाप्त करने का अधिकार समाविष्ट नहीं है क्योंकि अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त शब्द जीवन का संरक्षण (Protection of Life) है, इसलिए इसमें जीवन की समाप्ति को शामिल नहीं किया जा सकता है। अतः भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309 में आत्महत्या के लिए दण्ड का उपबन्ध पूर्णत: वैध तथा न्यायसंगत है। तथापि किसी अन्य व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिये उकसाना धारा 306 (भा० दे० सं०) के अन्तर्गत एक दण्डनीय अपराध माना गया।

दया मृत्यु (Euthenasia)

इसे इच्छा-मृत्यु भी कहा गया है। आशय यह है कि जो व्यक्ति किसी असाध्य रोग से पीड़ित है तथा वर्षों से निर्जीव स्थिति में पड़ा असह्य शारीरिक कष्ट एवं यातनायें भोग रहा है, क्या उसे चिकित्सक की सहायता से स्वयं को जीवन को समाप्त करने की अनुमति दी जानी चाहिये । इसी प्रकार यदि कोई रोगी महीनों से बेहोशी की हालत में कृत्रिम श्वास संयन्त्र (Respirator) के सहारे जी रहा है, और चिकित्सक जानता है कि कृत्रिम श्वास नली हटाते ही उस व्यक्ति की मृत्यु होना सुनिश्चित है, तो क्या उस व्यक्ति की श्वास नली हटाकर उस व्यक्ति के परिवारजनों की मांग पर उसके जीवन की समाप्ति की अनुमति दी जा सकती है?

47. (1987) क्रि० लॉ ज० 743 (बम्बई).

48. ए० आई० आर० 1994 सु० को० 1844.

49. ए० आई० आर० 1996 सु० को० 946.

वर्तमान कानून (विधि) इसकी अनुमति नहीं देगा और ऐसा करने वाला चिकित्सक तथा मृतक के परिवारजन, दोनों ही हत्या के दोषी होंगे।

कभी-कभी अत्यधिक वृद्ध अवस्था के कारण शरीर के सभी गात्र शिथिल पड़ जाने के कारण व्यक्ति की जीवित रहने की इच्छा समाप्त हो जाती है और वह दूसरों पर बोझ बनकर जीवित बना रहना नहीं चाहता या कर्क रोग (Cancer) या एड्स (AIDS) जैसी असाध्य एवं भयंकर बीमारी के कारण मरना चाहता है, तो क्या ऐसे व्यक्ति को मरने की अनुमति देना उचित होगा। भारतीय विधि के अन्तर्गत इच्छा मृत्यु (या दया मृत्यु) को किसी भी स्थिति में वैधता प्राप्त नहीं है क्योंकि यह मान्यता है कि जीवन से बढ़कर अन्य कोई वस्तु इस संसार में नहीं है। भारतीय विधि के अन्तर्गत दया मृत्यु को वैधता प्रदान न किये जाने का मुख्य कारण यह है। कि ऐसा किये जाने पर धारा 309 (भा० द० सं०) में उपबन्धित आत्महत्या का प्रयास अपराध नहीं होगा। जो संविधान के अनुच्छेद 21 की मूल आत्मा के विपरीत होगा। इसी प्रकार धारा 300 ( भा० दे० सं०) के छठे अपवाद में यह जोड़ना आवश्यक होगा कि इच्छा मृत्यु से कारित जीवन का अन्त सदोष मानव-वध का अपराध नहीं होगा।

तथापि इंग्लैण्ड और हॉलैण्ड की दण्ड विधि के अनुसार इच्छामृत्यु को कानूनी वैधता प्राप्त है। हॉलैण्ड इच्छा मृत्यु को कानूनी वैधता प्रदान करने वाला प्रथम देश है। इसके बाद बेल्जियम ने भी मई, 2002 से इसे वैधता प्रदान की है। अमेरिका मे केवल ओरेगन राज्य में ही इच्छा मृत्यु को वैधता प्राप्त है। फ्रांस भी इस दिशा में अग्रसर है।

विधिज्ञों का मानना है कि इच्छा मृत्यु को वैधता प्रदान करने के फलस्वरूप उसका दुरुपयोग किये जाने की सम्भावनायें अधिक होंगी। उदाहरणार्थ, मृत्यु शैय्या पर पड़े व्यक्ति को उसके वारिस उसकी सम्पत्ति शीघ्र प्राप्त करने के लालच में आकर चिकित्सक की सहायता से उसे मरवा सकते हैं। अनेक बार जीवन की आस छोड़ चुके रोगी भी आश्चर्यजनक रूप से भले-चंगे हो जाते हैं इसलिये इच्छा मृत्यु को वैधता न देना ही उचित

प्रतिरोधात्मक दण्ड की आलोचना

प्रतिरोधात्मक दंड का मुख्य प्रयोजन अपराधियों को कठोरतम दंड देकर उन्हें अपराध की पुनरावृत्ति करने से परावृत्त रखना तथा घोर अपराधियों को समाज से बहिष्कृत करना है। परन्तु वर्तमान में दण्डशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त को मानवीयता के विरुद्ध बताते हुए कहा है कि ऐसे मामलों में जिनमें अपराधकृत्य भावावेश में या उत्तेजना या मानसिक असंतुलन के कारण किया गया है, मृत्युदण्ड या अन्य कठोर दंड देना न्यायसंगत नहीं है। इसके अलावा, प्रतिरोधात्मक सिद्धान्त के अन्तर्गत दिया जाने वाला कठोर दण्ड या मृत्युदण्ड घोर अपराधियों पर विशेष प्रभावकारी नहीं होता है क्योंकि वे एक बार दंड भोग चुकने के बाद समाज के प्रति बदले की भावना रखते हुए निर्भीकता से अपराध की पुनरावृत्ति करने में नहीं हिचकिचाते हैं।

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