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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 13 Notes

 

LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 13 Notes:- LLB 1st Semester / 1st Year Online Free Books Study Material Notes Jurisprudence & Legal Theory Section B State Sovereignty Law and Administration of Justice of Chapter 13 Sovereignty Most Important Study Material in Hindi English Questions Answer Sample Model Paper in PDF Download 2019 2020.

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अध्याय 13 (Chapter 13)

प्रभुता-शक्ति (Sovereignty)

LLB Notes Study Material

प्रभुसम्पन्नता को राज्य का एक आवश्यक घटक माना गया है।

‘प्रभुता’ शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच शब्द सॉवरेन (Souverain) से हुई है जिसका तात्पर्य ऐसी सर्वोच्च शक्ति से है जिसके ऊपर कोई अन्य शक्ति न हो। प्रसिद्ध फ्रांसीसी विद्वान बोदाँ (Bodin) ने ‘प्रभुता’ को परिभाषित करते हुए कहा कि “यह राज्य की पूर्ण एवं शाश्वत शक्ति होती है।” यह प्रभुतासम्पन्न व्यक्ति (Sovereign) की सत्ता है जिसे सीमित नहीं किया जा सकता है।

हॉब्स ने बोदाँ के विचारों से प्रभावित होकर कथन किया कि प्रभुता सर्वश्रेष्ठ शक्ति होती है जो धर्म से भी श्रेष्ठतर है। राज्य की समस्त विधियाँ प्रभुतासम्पन्न से निकलती हैं; अत: वह स्वयं इन विधियों को मान्य करने के लिए बाध्य नहीं है।  

प्युफेन्डार्फ (Pufendorf) ने हॉब्स के विचारों का खण्डन करते हुए कहा है कि यह कहना उचित नहीं है कि प्रभुता सर्वशक्तिशाली होती है। उन्होंने कहा कि प्रभुता शक्ति राज्य में सर्वश्रेष्ठ अवश्य है किन्तु वह पूर्ण शक्ति नहीं है। इसे संविधान द्वारा सीमित किया जा सकता है।

ब्राइस (Bryce) ने प्रभुता के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि यह ऐसे व्यक्ति में निहित होती है जिसकी इच्छा दूसरे व्यक्तियों को उसकी आज्ञा-पालन करने के लिए बाध्य कर देती है। प्रभुतासम्पन्न की इच्छा किसी अन्य व्यक्ति की इच्छा से शासित नहीं हो सकती 2  

प्राचीन यूनान में सम्राट अपनी परिषद् की सहायता से शासन चलाता था परन्तु वह परिषद् की राय से आबद्ध नहीं था। तथापि कालान्तर में शासक की परामर्शदात्री परिषद् काफी सशक्त हो गई; अतः यूनानी नगरराज्यों में प्रभुता लोकमत में निहित होने लगी।

रोम की अर्वाचीन राज्य-व्यवस्था में भी शासक अपने समस्त कार्य एक सलाहकार समिति की सहायता से चलाता था। यह समिति एक विशिष्ट प्रकार की सभा (comitig Curiate) की राय के अनुसार कार्य करती थी। ‘कोमिटा-क्यूरिएटा’ राज्य के समर्थ व्यक्तियों की एक सभा होती थी जिसे लोकमत प्राप्त होने के कारण सम्प्रभुता-सम्पन्न माना जाता था। परन्तु राजसत्तात्मक शासन में यह निष्प्रभावी होती गई। सामान्यत: प्रभुता से आशय सर्वोपरि शक्ति या अधिकारों से है। कोई भी प्रभुतासम्पन्न राज्य किसी अन्य के अधीन नहीं होता। उस राज्य के सभी व्यक्ति प्रभुतासम्पन्न की आज्ञा का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं। प्रभुतासम्पन्न राज्य बाह्य नियन्त्रणों से पूर्णत: मुक्त रहता है। प्रभुता के सिद्धान्त (Theory of Sovereignty) के विषय में विधिशास्त्रियों ने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण अपनाये हैं जिनमें ऑस्टिन, सामण्ड, हालैण्ड, पैटन, जेनिंग्स आदि के विचार विशेष उल्लेखनीय हैं।

ऑस्टिन का प्रभुता-सम्बन्धी सिद्धान्त (Austin’s Theory of Sovereignty)

विधिशास्त्र की विश्लेषणात्मक शाखा के प्रवर्तक जॉन ऑस्टिन (John Austin) ने अपने प्रभुता सम्बन्धी सिद्धान्त को हॉब्स के विचारों पर आधारित करते हुए व्यक्त किया कि यदि कोई सुनिश्चित वरिष्ठ व्यक्ति

1. यह शब्द स्वयं ही लैटिन शब्द ‘सुपरनस’ (Supermus) से निकला है.

2. ब्राइस : स्टडीज इन ज्यूरिस्थूडेन्स (ग्रन्थ 2), पृ० 507.

जो किसी अन्य समान वरिष्ठ व्यक्ति की आज्ञा का पालन करने का आदी न हो और किसी समाज विशेष के अधिकांश लोगों द्वारा उसकी आज्ञाओं का पालन किया जाता है, तो ऐसा सुनिश्चित वरिष्ठ व्यक्ति उस समाज का प्रभुताधारी होगा और वह समाज (उस वरिष्ठ व्यक्ति को मिलाकर) राजनीतिक एवं स्वतन्त्र समाज कहलायेगा।”3

ऑस्टिन द्वारा दी गई प्रभूता की परिभाषा से यह स्पष्ट है कि प्रभुता-शक्ति सकारात्मक (positive) भी। हो सकती हैं और नकारात्मक (negative) भी। ऑस्टिन के अनुसार किसी समाज विशेष के अधिकांश लोगों द्वारा किसी सुनिश्चित सामान्य वरिष्ठ व्यक्ति की आज्ञा का पालन किया जाना प्रभुता-शक्ति का सकारात्मक रूप है। प्रभुता का नकारात्मक पक्ष यह है कि प्रभुता-सम्पन्न व्यक्ति स्वयं अन्य किसी वरिष्ठ व्यक्ति की आज्ञा । के पालन का आदी नहीं होता है। ऑस्टिन के मतानुसार प्रभुता के उद्भव के लिए सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों ही लक्षणों का होना आवश्यक है तथा ये दोनों लक्षण एक साथ विद्यमान होने चाहिये। सकारात्मक लक्षण के लिये ऑस्टिन निम्नलिखित तत्व आवश्यक मानते हैं

1. प्रभुतासम्पन्न की आज्ञा का पालन प्रजा द्वारा आदत के रूप में स्थायी रूप से किया जाना चाहिये न कि केवल कुछ समय के लिए।

2. प्रभुतासम्पन्न की आज्ञा का पालन राज्य के अधिकांश लोग करते हों न कि केवल कुछ ही लोग।

3. प्रजा द्वारा आज्ञा का पालन ‘एक सामान्य श्रेष्ठ’ के प्रति किया जाना चाहिये। यदि कुछ लोग एक सत्ताधारी की आज्ञा का पालन करते हैं और अन्य लोग दूसरे की, तो उस स्थिति में यह माना जाएगा कि दो पृथक् राजनीतिक समाज हैं।

4. प्रभुतासम्पन्न कोई निश्चित व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह होना चाहिये। कोई अजीवित व्यक्ति या ईश्वर आदि जैसी संकल्पना को प्रभुतासम्पन्न नहीं माना जा सकता है।

प्रभुता के नकारात्मक लक्षण के सम्बन्ध में इतना कह देना पर्याप्त होगा कि अपवाद के रूप में यदि कोई प्रभुताधारी किसी अन्य समान सत्ताधारी के आदेश को कभी-कभी मानता हो, तो केवल इतने से वह प्रभुताधारी अपनी प्रभुता के गुण से वंचित नहीं माना जायेगा।

हेरॉल्ड लास्की और कोल (Laski and Cole) जैसे बहुलवादी (Pluralists) विचारकों के अनुसार राज्य अनेक संगठनों में से एक संगठन है इसलिए उसे अन्य संगठनों से श्रेष्ठतर नहीं माना जा सकता। राज्य की भाँति अन्य संगठनों को भी अपना स्वशासन चलाने का पूर्ण अधिकार होता है। अत: राज्य इनके कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

ऑस्टिन ने प्रभुता सम्पन्न की शक्ति सम्बन्धी सिद्धान्त में प्रभुता की तीन विशेषताओं को प्रधानता दी है, जो निम्नलिखित हैं।

प्रभुता की अनिवार्यता (Imperativeness of Sovereignty)

ऑस्टिन का मत है कि प्रत्येक राजनीतिक समाज में एक सर्वोपरि शक्ति अवश्य होती है। यह प्रभुता शक्ति एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के एक समूह में निहित हो सकती है तथापि यह आवश्यक नहीं है कि प्रभुता (sovereignty) राज्य के भीतर ही निहित हो। वह आंशिक रूप से या पूर्णत: राज्य के बाहर भी हो सकती है। यदि कोई राज्य पूरी तरह स्वतन्त्र एवं प्रभुतासम्पन्न हो, तो उसकी प्रभुता पूर्ण रूप से उसी में निहित रहेगी। परन्तु यदि कोई राज्य किसी अन्य राज्य के अधीनस्थ है, अर्थात् वह किसी वृहद् राज्य का भाग है, तो उस स्थिति में प्रभुता उस वृहद् राज्य में निहित होगी। इसी प्रकार कोई राज्य स्वतन्त्र होते हुए भी ६ अर्द्ध-प्रभुतासम्पन्न (semi-sovereign) है, तो उसकी आत्म-स्वतन्त्रता का हनन हो जाता है क्योंकि

3. “If a determina Tlf a determinate human superior not in the habit of obedience to a like superior, receives habitual obedience from a bulk or a given society, that determinate superior is sovereign in that society.”Austin : Jurisprudence, Part II, p. 221.

उसकी प्रभुता-शक्ति का एक भाग किसी अन्य श्रेष्ठतर राज्य के अधीन रहता है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक राज्य में प्रभुता शक्ति कहीं-न-कहीं विद्यमान अवश्य रहती है। ऑस्टिन इस बात पर जोर देते। हैं कि प्रभुता राज्य के भीतर ही विद्यमान होनी चाहिये जबकि सामण्ड के अनुसार वह अंशत: उसी राज्य में और अंशत: किसी वृहद् राज्य में निहित रह सकती है।

2. प्रभुता की अविभाज्यता (Indivisibility of sovereignty)

प्रत्येक राज्य में केवल प्रभुता शक्ति का होना मात्र पर्याप्त नहीं है बल्कि उसमें प्रभुताधारी भी होना चाहिये, अर्थात् राज्य में एक ऐसा व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह होना चाहिये जिसमें प्रभुताशक्ति निहित हो। तात्पर्य यह है कि प्रभुता किसी एक ही व्यक्ति या व्यक्तियों के एक ही समूह (जैसे संसद्) में निहित होनी चाहिये तथा उसे एक से अधिक व्यक्ति में या एक से अधिक व्यक्तियों के समूहों में विभाजित नहीं किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अविभाज्य होने के कारण प्रभुसत्ता का विभाजन नहीं किया जा सकता है। एक से अधिक व्यक्ति प्रभुता शक्ति को सामूहिक रूप से (वह समूह भी एक से अधिक न हो) धारण कर सकते हैं। किन्तु वे सामूहिक रूप से प्रभुता धारण करते हुए अपनी एकाकी सत्ता प्रदर्शित नहीं कर सकते। ऑस्टिन का कहना है कि प्रभुता अविभाज्य होती है तथा उसे विभाजित करने का अर्थ उसे सीमित करना होगा, जो कदापि उचित नहीं है।

3. प्रभुता की असीमितता (Illimitability of Sovereignty)

विधिक दृष्टि से प्रभुता असीमित होती है। इसका आशय यह है कि प्रभुतासम्पन्न बाह्य तथा आन्तरिक नियन्त्रणों से मुक्त रहता है, अर्थात् उसकी वैधानिक शक्ति को सीमित नहीं किया जा सकता। ऑस्टिन के अनुसार विधि प्रभुताधारी की इच्छा या आदेश होती है। प्रभुताधारी राज्य के भीतर एक ऐसा प्राधिकारी होता है जो कोई भी विधि किसी भी प्रकार से बना सकता है या किसी भी विधि को इच्छानुसार समाप्त कर सकता है। दूसरे शब्दों में, उसकी विधि-निर्माण और विधि को समाप्त करने की शक्ति असीमित होती है। 

उल्लेखनीय है कि ऑस्टिन ने प्रभुताधारी की विधित: (de Jure) असीमित प्रभुता को ही मान्य किया है तथा उनके अनुसार प्रभुताधारी की तथ्यगत (de facto) सीमाओं को नियन्त्रित किया जा सकता है। ऑस्टिन का कहना है कि प्रभुताधारी की शक्ति उसके दाण्डिक अधिकारों तथा प्रजा की आज्ञापालन की प्रवृत्ति पर निर्भर रहती है। इस प्रकार ऑस्टिन के अनुसार प्रभुता शक्ति की कुछ तथ्यगत (de facto) सीमाएँ होती हैं। 

इस प्रकार ऑस्टिन ने राज्य की प्रभुता के तत्व को अनिवार्य, अविभाज्य और असीमित मानते हुए उसके दो स्वरूपों को स्वीकार किया है, जिन्हें वे (1) आन्तरिक प्रभुता, और (2) बाह्य प्रभुता कहते हैं। आन्तरिक प्रभुता से आशय राज्य की उस अधिकार-शक्ति से है जिसका अनुपालन करने के लिए उसके समस्त नागरिक बाध्य होते हैं। बाह्य प्रभुता से तात्पर्य राज्य की अधिकार-शक्ति से है जो उसे अन्य राज्यों के प्रभुत्व और नियंत्रण से मुक्त रखती है। हालैंड के अनुसार आन्तरिक प्रभुता राज्य के आन्तरिक कार्यों में सर्वोच्च शक्ति है। जबकि बाह्य प्रभुता किसी अन्य राज्य के नियंत्रण से बाहर रहने की शक्ति है।

ऑस्टिन के सिद्धान्त की आलोचना

ऑस्टिन ने अपने प्रभुता संबंधी सिद्धान्त में इस बात पर जोर दिया है कि राज्य की प्रभुता उस व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह में निहित रहती है, जो विधियों के निर्माण और निरसन का कार्य करती है। प्रभुताधारी की विधि-निर्माण की शक्ति असीमित रहती है। डायसी ने भी ऑस्टिन के इस विचार का समर्थन किया है। तथापि अनेक विद्वानों ने ऑस्टिन के सिद्धान्त की कटु आलोचना की है। ऑस्टिन के सिद्धान्त की आलोचना । करते हुए वे निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं-

(1) ऑस्टिन के प्रभुता शक्ति सम्बन्धी विचार राज्य के यथार्थवादी सिद्धान्त की अवहेलना करते हैं। ऑस्टिन का कहना है कि प्रभुतासम्पन्न की इच्छा ही विधि’ है और लोग इन विधियों का पालन इसलिए

4. सामण्ड : ज्यूरिस्पूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 517.

 अमेरिका में भी कांग्रेस या राज्य विधान मंडलों को असीमित अधिकार शक्ति प्राप्त नहीं है। अत: ये संविधान में संशोधन नहीं कर सकती जब तक कि इन्हें तीन-चौथाई राज्य विधानमंडलों और दो-तिहाई कांग्रेस का बहुमत प्राप्त न हो।

सामण्ड ने ऑस्टिन के इस विचार का खण्डन किया है कि प्रभुता-शक्ति अविभाज्य होती है। सामण्ड के अनुसार प्रभुता-शक्ति का विभाजन हो सकता है। उदाहरणार्थ, राज्य की प्रभुता को वैधानिक (Legislative), न्यायिक (Judicial) और प्रशासनिक (Executive) अंगों में विभाजित किया जा सकता है। राज्य के तीनों अंग अपने-अपने क्षेत्राधिकार में नियन्त्रण रहित होते हैं तथा स्तर की दृष्टि से वे एक-दूसरे के समतुल्य होते हैं। 

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ऑस्टिन ने प्रभुता-शक्ति को असीमित और अविभाज्य माना है जब कि सामण्ड के अनुसार वह सीमित और विभाज्य भी हो सकती है। जेनिंग्स (Jennings) ने भी सामण्ड के विचारों का समर्थन किया है तथा वे प्रभुता की असीमितता तथा अविभाज्यता को अस्वीकार करते हैं। इस विवादास्पद पहलू को भलीभाँति समझने के लिए हमें ब्रिटेन, अमेरिका तथा भारत जैसे देशों में प्रभुतासम्पन्न की स्थिति पर विचार करना होगा।

ब्रिटेन के संविधान में प्रभुता

ब्रिटेन में एकात्मक शासन-प्रणाली (Unitary System of Government) अपनायी गई है; अत: वहाँ के संविधान के अन्तर्गत प्रभुता केवल ब्रिटिश-संसद् (British Parliament) में ही निहित है। ब्रिटिश-संसद् की प्रभुता की असीमितता के विषय में प्राय: यह कहा जाता है कि वह स्त्री को पुरुष और पुरुष को स्त्री बनाने के अतिरिक्त और सब कुछ कर सकती है।’ ब्राइस ने ब्रिटिश संसद् की शक्ति के विषय में लिखा है कि ‘ब्रिटिश-संसद् जैसा चाहे कानून बना सकती है और जिस कानून को जब चाहे समाप्त कर सकती है। वह शासन-पद्धति को भी बदल सकती है या सम्राट (Crown) के उत्तराधिकार में परिवर्तन कर सकती है। इतना ही नहीं, वह अपनी इच्छानुसार नागरिकों के अधिकारों को समाप्त कर सकती है और इसीलिए विधि के क्षेत्र में वह अनुत्तरदायी और सर्वशक्तिमान (irresponsible and omnipotent) है।” इससे ऐसा प्रतीत होता है। कि संसद् असीमित और अविभाज्य प्रभु-शक्ति का प्रत्यक्ष उदाहरण है।

परन्तु सामण्ड ने उपर्युक्त मत का खण्डन किया है। उनका कथन है कि ब्रिटेन के संवैधानिक सिद्धान्त के अनुसार सम्राट (Crown) ही कार्यपालक प्रभुताधारी है। संसद् क्राउन की सम्मति के बिना उसकी (क्राउन की) शक्ति को नहीं छीन सकती है। संसद् एक ऐसी निकाय है जो कामन्स, लास सदन तथा क्राउन से मिलकर बनी है। संसदीय कार्यवाही के लिए सम्राट की सम्मति अनिवार्य होती है क्योंकि सम्राट की शक्तियाँ उसकी सहमति के बिना कम नहीं की जा सकतीं। अत: सम्राट (Crown) को कार्यपालक प्रभुताधारी मानना होगा जब कि वैधानिक प्रभुता-शक्ति संसद् में निहित है। इस प्रकार ब्रिटिश संविधान में प्रभुता दो भागों में बँटी हुई है-(1) कार्यपालक-सत्ताधारी अर्थात् क्राउन में; तथा (2) विधायी सत्ताधारी अर्थात् संसद् में।

संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में प्रभुता-शक्ति

अमेरिका का संविधान संघात्मक है तथा संघ और घटक राज्यों के बीच विधायी शक्ति का विभाजन किया गया है। इस प्रकार का शक्ति विभाजन ऑस्टिन के प्रभुता संबंधी सिद्धान्त के विरुद्ध है, क्योंकि वे प्रभतासम्पन्न को अविभाज्य मानते हैं। परन्तु ऑस्टिन कहते हैं कि अमेरिका के संविधान में प्रभुता न तो। संघीय विधान मण्डल (कांग्रेस) में और न घटक राज्यों के विधान-मण्डलों में निहित है, बल्कि वह

7. Austin makes no distinction between de facto sovereign and the de Jure sovereign. In England the British Crown is de facto sovereign while the Parliament is de jure sovereign. “Thus, the true position in England today is that the actual sovereignty is exercised by the executive by means of subordinate or delegated legislation which is subject to judicial review.”

संविधान-संशोधन-प्राधिकारी (Constitution Amending Authority) में निहित रहती है। इस तर्क की पुष्टि में ऑस्टिन कहते हैं कि संशोधन की प्रस्थापना कांग्रेस के दो-तिहाई बहुमत द्वारा की जा सकती है जिसे राज्यों के तीन-चौथाई विधान-मण्डलों का अनुसमर्थन प्राप्त होना चाहिये। अत: वास्तविक प्रभुता-शक्ति संविधान-संशोधन निकाय में ही निहित मानना चाहिये। परन्तु ब्राइस ने ऑस्टिन के इस तर्क से असहमति व्यक्त करते हुए कहा है कि संविधान का संशोधन करने वाली शक्ति का प्रयोग यदाकदा ही किया जाता है; अत: इस निकाय में प्रभुता-शक्ति निहित करना सर्वथा अनुचित है।

ब्राइस के विचारों का समर्थन करते हुए सिडविक (Sidwick) ने कहा है कि यदि मान भी लिया जाए कि प्रभुता-शक्ति संविधान संशोधन निकाय (Consititution Amending Body) में निहित है, तो इसका अर्थ यह होगा कि उसकी प्रभुता असीमित है। परन्तु वस्तुत: ऐसा नहीं है। संविधान के संशोधन पर भी अनेक सीमाएँ रखी गई हैं। जब तक कि संवैधानिक संशोधन प्राधिकारी द्वारा सम्पूर्ण प्रक्रिया का पालन नहीं। कर लिया जाता, तब तक उसे वैध क्षमता प्राप्त नहीं होती है।’

अमेरिका के संविधान के अन्तर्गत शक्ति-पृथक्करण (Separation of Power) का सिद्धान्त अपनाया गया है जिसके अनुसार कार्यपालिका (Executive), विधायिनी (Legislature) तथा न्यायपालिका अपनेअपने क्षेत्र में कार्य करने हेतु स्वतन्त्र हैं और ये एक-दूसरे के नियन्त्रण से पूर्णत: मुक्त हैं। इस स्थिति में यह कहना कठिन है कि अमेरिका के संविधान में अविभाज्य प्रभता इनमें से किस निकाय में निहित है। यदि यह मान भी लिया जाये कि प्रभुता-शक्ति केन्द्रीय विधायिनी8 में निहित है, तो भी उसे असीमित कहना कठिन होगा क्योंकि कांग्रेस केवल उन्हीं विषयों से सम्बन्धित कानून बना सकती है जिन पर संविधान द्वारा उसे लिखित अधिकार दिया गया हो। ऐसे अधिकार जो कांग्रेस को व्यक्त रूप से लिखित में नहीं दिये गये हैं, वे राज्य विधान-मण्डल के अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत माने जाते हैं। वे राज्य के ‘सुरक्षित अधिकार’ (Reserved Rights) कहलाते हैं; इन सुरक्षित अधिकारों पर कांग्रेस (केन्द्रीय विधान-मण्डल) का कोई अधिकार नहीं होता है अत: कांग्रेस की प्रभुता-शक्ति असीमित नहीं कही जा सकती है। इसी प्रकार संघ (केन्द्र) और संघटक राज्यों में स्पष्ट शक्ति-विभाजन होने के कारण प्रभुता को अविभाज्य कहना उचित नहीं है।

अमेरिका के संविधान में प्रभुतासम्पन्न के विषय में हेराल्ड लॉस्की (Herald Laski) का कथन है कि वहाँ कांग्रेस की शक्ति सीमित है तथा राज्यों की शक्ति भी संविधान के दायरे में सीमित है। संविधान के संशोधन को भी एक अपवाद द्वारा सीमित कर दिया गया है। यह अपवाद है कि कोई भी राज्य बिना स्वेच्छा के सीनेट में समान प्रतिनिधित्व (Equal suffrage) के अधिकार से वंचित नहीं रखा जायेगा। संवैधानिक दृष्टि से इसका अर्थ यह हुआ कि अमेरिका में प्रभुता-शक्ति किसी एक निकाय में केन्द्रित नहीं है ।

भारतीय संविधान में प्रभुता-शक्ति की स्थिति

संयुक्त राज्य अमेरिका की भाँति भारत का संविधान भी संघात्मक (federa!) स्वरूप का है। यद्यपि भारत के संविधान में ऐसे अनूठे तत्व10 (unique features) हैं जो अमेरिका की संघात्मक प्रणाली में विद्यमान नहीं हैं, परन्तु भारतीय संविधान में प्रभुतासम्पन्न की वही स्थिति है जो अमेरिका के संविधान में है, अर्थात प्रभुता-सम्पन्न शक्ति कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में विभाजित है। इसे अधिक स्पष्ट समझने के लिए भारतीय संविधान के संदर्भित उपबन्धों का उल्लेख करना उचित होगा।

भारतीय संविधान के अन्तर्गत प्रशासनिक अधिकार राष्ट्रपति (President) में निहित है।11 इसी प्रकार विधायिनी अधिकार-शक्ति संसद में निहित है जो राष्ट्रपति और लोकसभा तथा राज्यसभा का संयुक्त स्वरूप

8. अमेरिकन शासन प्रणाली में केन्द्रीय विधान-मण्डल को ‘कांग्रेस’ (Congress) कहा जाता है।

9. हेराल्ड लॉस्की : ग्रामर आफ पॉलिटिक्स, पृ० 49.

10. भारत का संविधान, अनुच्छेद 249 से 253; 356 और 357.

11. अनुच्छेद 43.

होती है। भारतीय संविधान के संशोधन के लिए एक विशिष्ट प्रक्रिया अपनायी जाना आवश्यक है जो संविधान के अनुच्छेद 368 में वर्णित है। संशोधन सम्बन्धी विधेयक को कार्यान्वित करने के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है। तात्पर्य यह है कि भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति सर्वोच्च कार्याधिकारी है। और उसका पद उसकी अनुमति के बिना उससे नहीं छीना जा सकता है। दूसरे शब्दों में, राष्ट्रपति को प्रशासनिक प्रभुसत्ताधारी (Executive Sovereign) कहा जा सकता है।

भारत का संविधान संघात्मक होने के कारण विधायिनी शक्ति का विभाजन केन्द्र और राज्यों के बीच कर दिया गया है।12 केन्द्र और विभिन्न राज्य अपने-अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र हैं और वे एक-दूसरे के अधिकार-क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं कर सकते हैं। यदि वे एक-दूसरे के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप करते हैं, तो ऐसा अतिक्रमण उच्चतम न्यायालय में वाद-योग्य होगा।13 इस प्रकार भारत के संविधान में शक्ति-विभाजन का स्पष्ट उल्लेख है, परन्तु कुछ विशेष14 परिस्थितियों में केन्द्र को राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप करने का अधिकार है। आपातकालीन स्थिति की उद्घोषणा होने पर या राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए संसद् को यह अधिकार है। कि वह राज्य के विधान-मण्डलों को अपने अधिकार में ले सकती है। उस स्थिति में प्रभुता-शक्ति का विभाजन आपातकाल तक के लिए निलम्बित रहता है।

भारतीय संविधान के उपबन्धों के आधार पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि संसद् की विधायिनी शक्ति असीमित नहीं है। संविधान में कुछ विशिष्ट15 परिवर्तन करने के लिए आधे से अधिक राज्यों का अनुमोदन (rectification) प्राप्त होना अनिवार्य है। इस उपबन्ध से यह निष्कर्ष निकलता है। कि भारत की संसद् अपने क्षेत्र में प्रभुता-सम्पन्न है लेकिन यह कहना उचित नहीं है कि उसका क्षेत्र असीमित है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि ऑस्टिन द्वारा प्रतिपादित प्रभुता शक्ति के सिद्धान्त की अपरिमितता तथा अविभाज्यता भारत के संविधान के प्रति लागू नहीं होती है। भारत में प्रशासनिक प्रभुता राष्ट्रपति में निहित है किन्तु विधायिनी प्रभुता केन्द्रीय संसद में है।

अन्तर्राष्ट्रीय विधि और प्रभुता शक्ति

जैसा कि कथन किया जा चुका है, प्रभुता से तात्पर्य इस सर्वोच्च शक्ति से है जिससे कोई राज्य स्वयं को प्रशासित करता है। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय विधि के प्रणेता ह्यगो ग्रोशियस (Hugo Grotius) ने प्रभुताधारी को सर्वश्रेष्ठ शक्ति माना है। अन्तर्राष्ट्रीय विधि की प्रगति के साथ प्रभुता सम्बन्धी परम्परागत धारणाएँ भी बदलने लगी हैं। पूर्व से ही यह धारणा रही है कि प्रभुतासम्पन्न राज्यों को यह परमाधिकार (prerogative) है कि वे एक-दूसरे के हित के लिए आपस में सन्धियाँ (Treaties) कर सकते हैं। परन्तु इन सन्धियों का परिणाम यह होता है कि सशक्त राज्य कमजोर राज्यों पर दबाव डालने लगते हैं और इस प्रकार प्रभुता शक्ति परोक्षतः विभाजित होने लगती है। यद्यपि राष्ट्र संघ की स्थापना का मूल आधार यही था कि सभी छोटे-बड़े राज्य एक-दूसरे को समान मानें । परन्तु वास्तविक स्थिति कुछ दूसरी ही है। अन्तर्राष्ट्रीय विधि के उत्तरोत्तर विकास के साथ प्रभुता का महत्व कम होता जा रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय विधि के बन्धन के कारण वर्तमान राज्य अन्य राज्यों के साथ स्वेच्छाचारी व्यवहार करने के लिए स्वतन्त्र नहीं हैं। आन्तरिक मामलों में पूर्णत: शक्ति सम्पन्न होते हुए भी बाह्य मामलों में उनकी प्रभुता सीमित हो जाती है। इसलिए ओपेनहाइम ने कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय विधि की प्रगति तथा अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति की स्थापना के कारण स्वतन्त्र राष्ट्रों को अपनी प्रभुता का कुछ अंश अवश्य खोना पड़ा है।

12. अनुच्छेद 245 तथा 246.

13. भारत बैंक लि० बनाम भारत बैंक कर्मचारी, ए० आई० आर० 1950 सु० को० 188; बंबई राज्य बनाम भार० एम०

डी० सी०, ए० आई० आर० 1957 सु० को 799 आदि 

14. उदाहरण के लिए आपातकालीन स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 352 से 359.

15. केन्द्र-सूची या राज्य-सूची में परिवर्तन हेतु.

अनेक विधिवेत्ताओं का विचार है कि वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) स्वयं ‘अनेक राज्यों युक्त श्रेष्ठतम राज्य’ है क्योंकि वह राष्ट्रों की स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप कर सकता है तथा राज्यों को ‘अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय मानने के लिए बाध्य कर सकता है।16 राष्ट्र संघ अन्य राष्ट्रों को सैन्य बल तथा आर्थिक सहायता देने का आदेश भी देता है; अतः उसे ऐसी शक्ति प्राप्त है जो अन्य राष्ट्रों को उसके आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य करे। परन्तु निवेदित है कि यह तर्क निराधार है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना से राष्ट्रों की प्रभुता समाप्त हो गई है। यद्यपि वर्तमान राज्य संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं परन्तु यदि कोई राज्य इन आदेशों की बलात् अवहेलना करता है, तो राष्ट्र संघ की आदेशात्मक शक्ति प्रभावहीन सिद्ध होती है।17 इसके अतिरिक्त कोई भी राष्ट्र स्वेच्छा से राष्ट्र संघ से किसी भी समय अलग हो सकता है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि राष्ट्र संघ की सदस्यता राज्यों की प्रभुता सम्पन्नता पर ही आधारित है।18 अतः यह कहना उचित नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के परिणामस्वरूप राष्ट्रों की प्रभुता शक्ति का हनन हुआ है। इस सम्बन्ध में फेनविक (Fenwick) के विचार उल्लेखनीय हैं। उनका कथन है कि वर्तमान में ‘प्रभुता’ शब्द के अर्थ को अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में शान्ति और सुरक्षा के सन्दर्भ में ही समझना उचित होगा। राज्यों को अपने आपसी झगड़े स्वयं निपटाने की प्रवृत्ति छोड़ देनी चाहिये तथा अपने इस अधिकार को ‘अन्तर्राष्ट्रीय परिवार को अधिकाधिक समर्पित करना चाहिये।

प्रभुता-शक्ति के विषय में अन्य विधिवेत्ताओं के विचार

हालैण्ड

हालैण्ड ने राज्य के प्रभुताधारी को सर्वशक्ति-सम्पन्न माना है। उनके अनुसार प्रभुताधारी ही विधि का स्रोत होता है। अत: प्रभुता-सम्पन्न का कोई भी कार्य अवैधानिक नहीं कहा जा सकता। राज्य में प्रभुता का तत्व सभी विधियों का मूल आधार है। अतः हालैण्ड के अनुसार प्रभुताशक्ति के अभाव में राज्य में विधि का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है।

जी० डब्ल्यू० पैटन

पैटन (Paton) ने प्रभुता की व्याख्या एक अधिवक्ता के दृष्टिकोण से की है। उनके अनुसार राज्य की प्रभुता का व्यावहारिक महत्व है। वे कहते हैं कि किसी अंग्रेज अधिवक्ता के लिए ब्रिटिश-संसद् की प्रभुता का अर्थ यह होगा कि वहाँ के न्यायालय केवल संसद् द्वारा विधायिनी की हैसियत से पारित नियमों को ही ‘विधि’ के रूप में मान्य करेंगे।19 पैटन ने विधायिनी के अलावा अन्य किसी निकाय को प्रभुता-सम्पन्न नहीं। माना है।

प्रभुता-शक्ति के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए आइवर जेनिंग्स (Iver Jennings) ने कहा है कि ब्रिटेन जैसे एकात्मक राज्य-प्रणाली में ऑस्टिन द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धान्त कि प्रभुता शक्ति सर्वशक्तिमान, असीमित तथा अविभाज्य है, पूर्णतः लागू होता है; परन्तु संघात्मक राज्यों के प्रति यह लागू नहीं होता है। जेनिंग्स ने ऑस्टिन के सिद्धान्त की आलोचना करते हुए कहा कि ‘सम्भवत: ऑस्टिन ने भावावेश में आकर ब्रिटिश संसद् की असीमितता, अविभाज्यता तथा सर्वसम्पन्नता आदि विशिष्टताओं का सामान्यीकरण करके इन्हें सभी संविधानों के प्रति लागू होने योग्य माना है, पर्तु यह उचित नहीं है। किसी संघात्मक राज्य में सर्वशक्तिमान प्रभुताधारी को ढूँढ़ना केवल हवाई महल बनाने के समान होगा।20

16. संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर का अनुच्छेद 25.

17. ईरान में अमरीकी-बन्धकों का मामला (1980), ईराक-ईरान युद्ध (1980-88), खाड़ी युद्ध जनवरी-फरवरी 1991;

ईराक पर अमेरिका का आक्रमण, 2004 आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं.

18. यू० एन० चार्टर का अनुच्छेद 2 (1)

19. पैटन : ए टेक्स्ट बुक ऑफ ज्यूरिस्पूडेन्स, पृ० 27.

20. जेनिंग्स : दि ला एण्ड कान्स्टीट्यूशन, पृ० 140.

विनोग्रेडाफ (Vinogradoff)

आधुनिक राज्यों के संविधान के आधार पर यह निश्चित करना कठिन है कि राज्य की वास्तविक प्रभुता शक्ति किसमें निहित है। सुविख्यात विधिशास्त्री विनोग्रेडाफ (Vinogradoff) ने तो यहाँ तक कहा है कि प्रत्येक राज्य में प्रभुता का होना आवश्यक नहीं है। इस तर्क की पुष्टि में वे राष्ट्र-मण्डल (Commonwealth) के सदस्य-राष्ट्रों का उदाहरण देते हैं। उनका कथन है कि राष्ट्र-मण्डल के सदस्यराष्ट्रों को ‘शासक’ और ‘शासित’ वर्गों में विभक्त करना तथा यह निश्चित करना कि राज्य में प्रभुता किसके पास है, एक अत्यन्त कठिन कार्य है 21 ब्राइस के अनुसार भी अनम्य (rigid) संविधानों में वैधानिक प्रभुता किसमें निहित है यह पता लगाना कठिन है। तात्पर्य यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में सह-अस्तित्व की भावना प्रबल होती जा रही है जिसके परिणामस्वरूप प्रभुता-शक्ति का महत्व निरन्तर कम होता जा रहा है।

जर्मी बेन्थम (Jermey Bentham)

ब्रिटेन के उन्नीसवीं सदी के महान विधि सुधारक जर्मी बेन्थम ने भी प्रभुता को राज्य का अविच्छिन्न तत्व माना है परन्तु उन्होंने इसे अपने उपयोगितावादी सिद्धान्त के आधार पर उचित ठहराया है। नि:सन्देह ही राज्य को अपनी प्रभुता शक्ति का प्रयोग करते हुये विधियों का निर्माण करने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन ये विधियां अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख के संवर्धन के लिये होनी चाहिये । बेन्थम का मानना था कि कतिपय परिस्थितियों में राज्य की प्रभुता पर विधिक प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं, यदि ऐसा करना लोगों के लिये हित में हो।

ए० वी० डायसी

डायसी ने प्रभुता शक्ति के दो प्रकार बताये हैं–राजनीतिक तथा विधिक। उनका तर्क है कि विधानमण्डल (संसद्) को विधि-निर्माण की सर्वोच्च शक्ति प्राप्त होने के कारण विधिक प्रभुता उसमें निहित होती है। परन्तु संसद् के निर्वाचन के पूर्व जिस समय विधायनी अस्तित्व में नहीं होती उस समय प्रभुसत्ता सीधे राजनीतिक प्रभुता-सम्पन्न में निहित होती है। तथापि डायसी के इस दोहरी प्रभुता के सिद्धान्त को अधिक तर्कसंगत नहीं माना गया है।

जेथो ब्राउन (Jethro Brown)

प्रभुता-शक्ति के विषय में जेथ्रो ब्राउन के विचार अधिक ग्राह्य एवं तर्कसंगत प्रतीत होते हैं। उनके विचार से एक निगम या निकाय के रूप में राज्य प्रभुता-सम्पन्न होता है। जनहित की प्राप्ति के लिए राज्य अपनी प्रभुता शक्ति का प्रयोग अपने विभिन्न अंगों या अभिकरणों द्वारा करता है अर्थात् राज्य के समस्त जन-समुदाय की सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति सरकार के विभिन्न अंगों के माध्यम से होती है; अत: वास्तविक प्रभुता शक्ति जन-समुदाय में ही निहित है।

लियान ड्यूगिट (Leon Duguit)

ड्यूगिट ने राज्य के प्रभुता सम्बन्धी सिद्धान्त को कोरी कल्पना (Myth) निरूपित करते हुये कहा है कि वास्तव में राज्य में कोई गुरुतर या श्रेष्ठतम शक्ति निहित नहीं होती है। उनके अनुसार राज्य सहित सभी मानवीय संस्थाओं का अन्तिम लक्ष्य सामाजिक समेकता (Social Solidarity) में सन्निहित होता है। अतः यह मानना व्यर्थ है कि राज्य को असीमित और अकाट्य शक्ति प्राप्त है क्योंकि राज्य भी सामाजिक समेकता के नियमों से बाध्य है। अत: राज्य की प्रभु सम्पन्नता जैसी कोई संकल्पना अस्तित्व में नहीं है।

मार्क्सवादी विचारधारा

माक्र्सवादी विचारधारा के अनुसार राज्य केवल समाज के एक वर्ग का दूसरे वर्ग पर श्रेष्ठता का प्रतीक है। राज्य की प्रभुता केवल उसी वर्ग में निहित होती है जिसे उत्पादन के साधनों पर नियन्त्रण प्राप्त है। एक

21. विनोग्रेडाफ : हिस्टोरिकल ज्यूरिस्पूडेन्स, पृ० 221.

वर्गहीन समाज में प्रभुता-शक्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। परन्तु हाल के वर्षों में इस विचारधारा में आमूल परिवर्तन हुआ है और अब राज्य की प्रभुता को वहाँ भी स्वीकार किया जाने लगा है।

प्रभुता सम्बन्धी आधुनिक विचारधारा

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि रोमन काल से ही प्रभुता (sovereignty) के विषय में विद्वानों में मतभेद रहा है। इस दिशा में आधुनिक विधिवेत्ताओं का योगदान केवल यह है कि वे वैधानिक प्रभुता और वास्तविक प्रभुता में भेद मानते हुए विधि के प्रयोजनों के लिए केवल उस व्यक्ति या संस्था को ही प्रभुतासम्पन्न मानते हैं जो सम्पूर्ण वैधानिक अधिकार धारण किये हो। वर्तमान विधिशास्त्री राज्य के वैधानिक प्रभुताधारी को ही प्रभुता-सम्पन्न मानते हैं तथा वे राजनीतिक प्रभुता को अनावश्यक समझते हैं। 

गत दशकों में अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश में विभिन्न राष्ट्र एक-दूसरे के इतने निकट आ चुके हैं कि उन्हें अपनी आन्तरिक प्रभुता को यथावत् बनाये रखते हुए बाह्य प्रभुता को कुछ सीमा तक त्यागना अनिवार्य-सा हो गया है। उदाहरणार्थ-वर्तमान नाटो (NATO), सीटो (SEATO), सेन्टो (CENTO) आदि जैसे सैनिकसंगठन आपसी समझौते द्वारा यह स्वीकार करते हैं कि किसी सदस्य-राष्ट्र पर बाह्य आक्रमण होने की दशा में अन्य सदस्य-राष्ट्र इसे स्वयं पर आक्रमण मानते हुए उस राष्ट्र की सैनिक सहायता करेंगे।22 इसी प्रकार विश्व-व्यापार की सुविधा की दृष्टि से संसार के अनेक राष्ट्रों ने अन्तर्राष्ट्रीय संगठन23 स्थापित किये हैं, जो परोक्षत: इनकी बाह्य प्रभुता को कुछ सीमा तक परिसीमित करते हैं। अतः स्पष्ट है कि वर्तमान सन्दर्भ में ऑस्टिन की प्रभुता सम्बन्धी धारणा का व्यावहारिक महत्व कम हो गया है। विश्व के राष्ट्रों में अन्तर्राष्ट्रीयता की प्रवृत्ति निरन्तर बढ़ती जा रही है, जिससे प्रभुता विषयक रूढ़िवादी धारणाओं में परिवर्तन आना स्वाभाविक है। वर्तमान में विश्व-स्तर पर राज्य की शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की माँग बढ़ रही है जिससे प्रभुता की संकल्पना दुर्बल पड़ती जा रही है। इसीलिए रेम्जे म्योर (Ramsay Muir) तथा सिडनी वेब (Sidny Webb) जैसे विद्वानों ने प्रभुता-शक्ति के न्यागमन (devolution) का समर्थन किया है। विश्व-शांति और विश्व-बन्धुत्व की बढ़ती हुई माँग के कारण राज्यों की प्रभुता-शक्ति संबंधी धारणा का अब केवल सैद्धांतिक महत्व ही रह गया है।

22. NATO (नार्थ एटलांटिक ट्रीटी आर्गेनाइजेशन) के अन्तर्गत 16 राष्ट्रों ने एक प्रकार का सैनिक-गठबन्धन कर लिया है.

23. EEC (European Economic Committy (1957); SARC (1985): NAM (1961); IMCO-Inter

Governmental Maritime Consultative Organisation जिसका मुख्यालय लंदन में है, समुद्री व्यापार की सुरक्षा संबंधी कार्य कर रहा है। सन् 2008 में भारत द्वारा अमेरिका से की गई परमाणु संधि (CTBT) इसका अद्यतन उदाहरण है जिसका जी-20 देशों को भी अमेरिका की पहल पर समर्थन करना पड़ा।

1. प्रभुतासम्पन्न की आज्ञा का पालन प्रजा द्वारा आदत के रूप में स्थायी रूप से किया जाना चाहिये न कि केवल कुछ समय के लिए।

2. प्रभुतासम्पन्न की आज्ञा का पालन राज्य के अधिकांश लोग करते हों न कि केवल कुछ ही लोग।

3. प्रजा द्वारा आज्ञा का पालन ‘एक सामान्य श्रेष्ठ’ के प्रति किया जाना चाहिये। यदि कुछ लोग एक सत्ताधारी की आज्ञा का पालन करते हैं और अन्य लोग दूसरे की, तो उस स्थिति में यह माना जाएगा कि दो पृथक् राजनीतिक समाज हैं।

4. प्रभुतासम्पन्न कोई निश्चित व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह होना चाहिये। कोई अजीवित व्यक्ति या ईश्वर आदि जैसी संकल्पना को प्रभुतासम्पन्न नहीं माना जा सकता है।

प्रभुता के नकारात्मक लक्षण के सम्बन्ध में इतना कह देना पर्याप्त होगा कि अपवाद के रूप में यदि कोई प्रभुताधारी किसी अन्य समान सत्ताधारी के आदेश को कभी-कभी मानता हो, तो केवल इतने से वह प्रभुताधारी अपनी प्रभुता के गुण से वंचित नहीं माना जायेगा।

हेरॉल्ड लास्की और कोल (Laski and Cole) जैसे बहुलवादी (Pluralists) विचारकों के अनुसार राज्य अनेक संगठनों में से एक संगठन है इसलिए उसे अन्य संगठनों से श्रेष्ठतर नहीं माना जा सकता। राज्य की भाँति अन्य संगठनों को भी अपना स्वशासन चलाने का पूर्ण अधिकार होता है। अत: राज्य इनके कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

ऑस्टिन ने प्रभुता सम्पन्न की शक्ति सम्बन्धी सिद्धान्त में प्रभुता की तीन विशेषताओं को प्रधानता दी है, जो निम्नलिखित हैं।

प्रभुता की अनिवार्यता (Imperativeness of Sovereignty)

ऑस्टिन का मत है कि प्रत्येक राजनीतिक समाज में एक सर्वोपरि शक्ति अवश्य होती है। यह प्रभुता शक्ति एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के एक समूह में निहित हो सकती है तथापि यह आवश्यक नहीं है कि प्रभुता (sovereignty) राज्य के भीतर ही निहित हो। वह आंशिक रूप से या पूर्णत: राज्य के बाहर भी हो सकती है। यदि कोई राज्य पूरी तरह स्वतन्त्र एवं प्रभुतासम्पन्न हो, तो उसकी प्रभुता पूर्ण रूप से उसी में निहित रहेगी। परन्तु यदि कोई राज्य किसी अन्य राज्य के अधीनस्थ है, अर्थात् वह किसी वृहद् राज्य का भाग है, तो उस स्थिति में प्रभुता उस वृहद् राज्य में निहित होगी। इसी प्रकार कोई राज्य स्वतन्त्र होते हुए भी ६ अर्द्ध-प्रभुतासम्पन्न (semi-sovereign) है, तो उसकी आत्म-स्वतन्त्रता का हनन हो जाता है क्योंकि

3. “If a determina Tlf a determinate human superior not in the habit of obedience to a like superior, receives habitual obedience from a bulk or a given society, that determinate superior is sovereign in that society.”Austin : Jurisprudence, Part II, p. 221.

 

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