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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 11 A Notes

 

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अध्याय 11-  (Chapter 11 A)

भारतीय विधि दर्शन (Indian Legal Philosophy)

LLB Notes Study Material

भारत में दो शताब्दियों से अधिक समय तक अंग्रेजी प्रभुत्व के कारण यहाँ की वर्तमान विधि-प्रणाली पूर्णत: अंग्रेजी विधि पर आधारित है। भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात् देश की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दशा में आमूल परिवर्तन हुए जिसके परिणामस्वरूप प्रचलित विधियों में परिवर्तन किया जाना आवश्यक हुआ। फिर भी आंग्ल विधि के प्रमुख सिद्धान्तों का समावेश प्राय: विविध भारतीय कानूनों में आज भी दृष्टिगोचर होता है जिनमें विधिसम्मत शासन (rule of law), नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्त, मूलभूत अधिकार, मानवाधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संसदीय प्रणाली, न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review), शक्ति पार्थक्य (separation of powers) का सिद्धांत आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। भारत की दंड विधि तथा साक्ष्य विधि पूर्णत: अंग्रेजी विधि पर आधारित होने के कारण इनमें अनेक जगह साम्या विधि (equity law) के सिद्धान्तों को समाविष्ट किया गया है। भारतीय न्यास अधिनियम, विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act), सिविल प्रक्रिया संहिता तथा सम्पत्ति विधि के अनेक प्रावधान आदि भी। साम्या विधि के सिद्धान्तों पर आधारित हैं। भारतीय प्रशासनिक विधि का मूल ढाँचा भी आँग्ल प्रशासी विधि के ही समरूप है। सारांश यह कि भारतीय विधि अधिकांशतः एंग्लो-अमेरिकन विधि प्रणाली से ही निर्मित होने के कारण इन दोनों में निकटतम साम्य होना स्वाभाविक है। भारतीय विधि आयोग इसमें समयोचित परिवर्तन कर इसे वर्तमान भारतीय समाज के अनुरूप ढालने के लिए निरंतर प्रयासरत है।

भारत की वर्तमान विधि के संदर्भ में यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात् विगत साठ वर्षों में हुए सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक परिवर्तनों के कारण भारतीय विधियों का पुनर्लेखन आवश्यक हो गया है ताकि इन्हें भारतीय मूल्यों के अनुकूल बनाया जा सके। इस संदर्भ में भारत की प्राचीन विधि-प्रणाली पर दृष्टिपात करना समीचीन होगा जो भारत की संस्कृति, परंपरा तथा मूल्यों को बनाये रखने में आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि वह अपने समय में थी। भारत के प्राचीन विधि-चिंतकों ने एक ऐसी विधि-प्रणाली विकसित की जो अनेक अर्थों में तत्कालीन अन्य विधि पद्धतियों में उत्कृष्ट थी। सर हेनरी मेन ने पुरातन भारतीय विधि की सराहना करते हुए कहा है कि यह विधि आज भी भारतीय विधिशास्त्र की एक प्राचीनतम अमूल्य धरोहर है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक बसे सभी भारतीयों को समान रूप से प्रशासित करती है। इस विधि के अनेक सिद्धान्त वर्तमान परिवेश में भी उतने ही प्रभावशील हैं। जितने कि वे प्राचीन काल में थे। भारत की पुरातन विधि को धर्म की संज्ञा दी गई थी जिसमें विधि’ के अलावा मानव के कर्तव्यों, अधिकारों तथा सदाचरण संबंधी अन्य नियमों का भी समावेश था। जैमिनी के अनुसार ‘धर्म’ का उद्देश्य मानव-कल्याण था जो संयम तथा कर्तव्यपालन से संभव था 2 प्रोफेसर पी० वी० काणे ने अपने धर्मशास्त्र’ में ‘धर्म:’ की व्याख्या करते हुए लिखा है कि समय के साथ-साथ इस शब्द का अर्थ बदलता रहा है लेकिन इसमें सदैव ही मानव के कर्तव्यों, दायित्वों, अधिकारों तथा आचरणों का बोध कराने का प्रयास किया जाता रहा है। भगवत् गीता में भी यह उल्लेख है कि धर्म या विधि-संगत आचरण वही है। जो कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए मानव तथा समाज कल्याण के लक्ष्य की ओर अग्रसर हो।3

1. Maine : Hindu Law and Usage Preface to 1st Ed. p. 1.

2. मीमांसा अध्याय 2.

3. डॉ० काणे पी० बी० : हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र (2 संस्क०), खंड 1 पृ० 3-4.

वैदिक काल में विधि को ‘ऋत’ की संज्ञा दी गई है जो शाश्वत और सनातन स्वरूप की थी तथा जिसका उद्गम दैवी स्रोत से माना गया है। यह विधि सर्वव्यापी होने के कारण मानव जीवन के भौतिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में समान रूप से लागू थी। उपनिषदों में भी विधि के दैविक स्वरूप को स्वीकार करते हुए उसे मानव जीवन के नियंत्रण का साधन माना गया है। विधि का अस्तित्व राज्य के उद्गम से पूर्ववर्ती होने के कारण यह राज्य से श्रेष्ठतर है। विधि को सामाजिक बल और समर्थन प्राप्त होने के कारण यह राज्य की अपेक्षा अधिक प्रभावी होती है।

मनु ने विधि को मानव आचरणों को नियंत्रित रखने वाला एक साधन निरूपित किया है तथा इसका मूल उद्देश्य मानव जीवन को संरक्षित एवं संवर्धित करना है। उनके अनुसार मनुष्य में अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों का बोध जन्मत: ही विद्यमान रहता है, विधि केवल इनका अनुपालन सनिश्चित कराती है। प्रत्येक व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने कर्तव्यों तथा आचरणों को विधि की सीमा में रखे तथा इनका उल्लंघन न होने दे। पुरातन काल में विधि को ‘क्षत्रों का क्षत्र’, माना जाने के कारण वह सर्वोपरि था तथा उससे श्रेष्ठतर कोई अन्य वस्तु नहीं थी। इस प्रकार स्पष्ट है वर्तमान विधि-सम्मत शासन (Rule of Law) की संकल्पना भारतीय विधिशास्त्र में सहस्रों वर्ष पूर्व से विद्यमान थी, जो मुख्यत: धर्म, कर्तव्य तथा विश्व-बंधुत्व पर आधारित थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ विद्वानों ने तत्कालीन धर्म (विधि) की संकल्पना को धर्म के वर्तमान विकृत स्वरूप से जोड़कर उसे एक निष्क्रिय आदर्शात्मक कोरी कल्पना निरूपित किया है तथा अनेक विधिवेत्ताओं ने इसे शुद्ध नैतिकता निरूपित किया है। परंतु निवेदित है कि स्मृतिकारों ने नैतिकता, विधि तथा धर्म में विभेद करते हुए इन्हें मानव आचरण के अलग-अलग पहलु बताया है तथा इन सभी का उद्देश्य, सामाजिक सुरक्षा, लोकशांति तथा समाज की प्रगति था। धर्मशास्त्रों में एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की गई है जिसमें सामाजिक, नैतिक, धार्मिक और विधिक नियमों का समान रूप से अनुपालन सुनिश्चित हो। स्मृतिकारों ने इन नियमों को आचार, व्यवहार तथा प्रायश्चित’ की संज्ञा दी तथा इनमें से व्यवहार’ के अन्तर्गत केवल विधि संबंधी नियमों का समावेश था जो कि न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय होते थे।  

मनु ने विधि में समानता’ पर विशेष बल दिया लेकिन ‘समानता’ से उनका आशय सांख्यिक समानता से न होकर साम्यिक समानता से था, अर्थात् इसमें व्यक्ति के गुणों तथा उसकी योग्यता व पात्रता को ध्यान में रखा जाना आवश्यक था। मनु ने मानव जीवन में श्रम-विभाजन के सिद्धान्त को भी महत्वपूर्ण माना ताकि सामाजिक समेकता (social solidarity) स्थापित की जा सके।

मनुस्मृति में यह उल्लेख है कि पुरातन विधि-दर्शन का मूल सार समाज और व्यक्ति में सामंजस्य तथा एकता स्थापित करना है। विधि संहिता तथा धर्म-संहिताओं का प्रयोजन निर्बन्धनों द्वारा व्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन करना न होकर उसकी तथा समाज की प्रगति करना था। अत: प्रत्येक व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती थी। कि वह स्वयं के हित के साथ-साथ समाज के हित का भी संवर्धन करे। मनु के अनुसार व्यक्ति और समाज के परस्पर संबंध न्यासवत होते हैं, अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति से यह अपेक्षित है कि वह केवल उतना ही धन ग्रहण करे जितना उसकी आजीविका के लिए परम आवश्यक हो, क्योंकि इससे अधिक लेना चोरी के समान होगा। जिसके लिए वह दंड का भागी होगा। अत: व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर काबू रखते हुए समाज के प्रति न्यासधारी के समान भूमिका निभानी चाहिए और यही उसका मानव-धर्म है। इसके लिए उसमें सहिष्णता हितैषिता तथा सह-बंधुत्व की भावना होना आवश्यक है जो विधि (धर्म) के अनुसार आचरण से ही संभव है।

ज्ञातव्य है कि पुरातन भारतीय विधि दर्शन के प्रणेताओं ने विधि को ‘औचित्य’ (reasoning) तथा मानव कल्याण के मूल सिद्धान्तों पर आधारित किया था। माइने (Mayne) ने पुरातन भारतीय विधि-दर्शन पर

4. इन आलोचकों में जे० एच० नेल्सन, मेक्स-मुलर तथा डॉ० अल्बर्ट स्केविटझर (Schweitzer) के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं.

5. यावत् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।

अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥

टिप्पणी करते हुये अभिकथन किया कि विश्व की सभी विधि-व्यवस्थाओं में भारत का विधि-दर्शन सर्वोत्कृष्ट एवं अर्वाचीन है जिसमें किसी प्रकार की जीर्णता का आभास नहीं मिलता है, यही कारण है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत की सभी जातियों, व्यक्तियों आदि पर प्रभावी रूप से लागू है जिसे लोगों ने स्वेच्छया स्वीकार किया है।6

प्राचीन भारतीय विधि-दर्शन की उत्कृष्टता को स्वीकार करते हुये सर फ्रांसिस मेक्नाटन (Sir Fransis Mac Naughton) ने कथन किया है कि स्वत: की विधि को पूर्णरूप से विकसित करते हुये उसे अधिकतम लोकोपयोगी बनायी जाने का श्रेय वास्तव में प्राचीन भारत के विधिशास्त्रियों को दिया जाना चाहिये ।।

भारतीय विधि उतनी ही पुरानी है जितनी कि मानवता, और आदिकाल से ही विधि सनातन धर्म के अनिवार्य भाग के रूप में मान्य होती रही है।

जैमिनी के अनुसार प्राचीन भारत में विधि और धर्म समानार्थक थे क्योंकि विधिक नियमों को धर्मग्रन्थों में समाविष्ट किया गया था और दोनों का ही अनुपालन किया जाना अनिवार्य था। धर्म से आशय था ईश्वर निर्मित नियमों का अनुसरण करते हुये अपने कर्तव्यों का पालन करना तथा सदाचारी जीवन व्यतीत करना। धर्म (Dharma) का प्रमुख तत्व कर्तव्य-बोध था, जिस प्रकार अग्नि (Fire) का लक्षण है उसके सम्पर्क में आने वाली किसी भी वस्तुओं को जला देना या पानी का लक्षण है जलती हुयी आग को बुझा देना, ठीक उसी प्रकार मानव आचरण का लक्षण अपने कर्तव्यों का अनुपालन करना था, तथा इसके सिवाय उसके पास कोई विकल्प नहीं था।

डॉ० पी० वी० काणे ने पुरातन धर्म के विषय में लिखा है कि कालान्तर में इसके नियमों में बदलाव होते रहे और यदि इसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाये, तो इससे आशय है मानव अपने अधिकारों, कर्तव्यों तथा दायित्वों का यथावत् अनुपालन करते हुये समाज में अपने आचरण को संयमित रखे।9  

धर्म के स्रोतपुरातन भारतीय विधि के स्रोत के रूप में वेदों को सर्वसामान्य रूप से स्वीकार किया गया है। वेदों की व्याख्या करने वाले प्रमुख ऋषियों में मनु, याज्ञवल्क्य, बृहस्पति तथा नारद, इन चारों के नाम प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त व्यास, अंगिरस, पराशर, विष्णु तथा सांख्य आदि को भी धर्मशास्त्र के टीकाकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। श्रुति, स्मृति तथा पुराणों 10 में भी धर्मशास्त्र की मीमांसा की गई है। प्राचीन विधिवेत्ता इस सम्भावना से भलीभांति परिचित थे। विधि के विभिन्न स्रोतों के मूल पाठों में विसंगति या विरोधाभास की स्थिति में भ्रमपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो सकती है, इसलिये उन्होंने इस सम्बन्ध में स्थिति को स्पष्ट करते हुये इस नियम का उल्लेख किया कि श्रुति, स्मृति एवं पुराण में दी गयी विधियों में विरोधाभास की स्थिति में श्रुति में वर्णित विधि को प्राथमिकता दी जायेगी परन्तु केवल स्मृति और पुराण की विधि में विसंगति की दशा में स्मृति में वर्णित विधि ग्राह्य होगी ।।1

प्रथाओं का महत्व

स्मृति के टीकाकारों ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख करना आवश्यक समझा कि किसी मुद्दे पर स्मृति में कोई व्यवस्था न होने की दशा में तत्कालीन समाज में प्रचलित प्रथा को विधितुल्य मान्यता प्राप्त होगी। इस नियम की पुष्टि प्रीवी कौन्सिल द्वारा विनिश्चित मदुरा के कलेक्टर बनाम मोट्ट रामलिंगा12 के निर्णय से हो जाती है जिसमें कहा गया था कि हिन्दू विधि के अन्तर्गत किसी सुस्थापित प्रथा को विधि के समान मान्यता

6. Mayne : Hindu Law & Usage; Preface p. 1.

7. Sen P.N. General Principles of Hindu Jurisprudence 374.

8. ‘सनातन’ से आशय है वह जो प्राचीनतम एवं चिरस्थायी है.

9. डॉ० पी० वी० काणे, हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र (ग्रन्थ-1 द्वितीय संस्करण) पृ० 3-4.

10. कुल अठारह पुराण हैं जिनके नाम हैं-ब्रह्म, पद्म, वैष्णव, शैव, भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नेय, भविष्य, ब्रह्मावर्त,

लिंग, वराह, स्कन्ध, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ एवं ब्रह्माण्ड पुराण.

11. व्यास संहिता, अध्याय-I, श्लोक V. 12. Moore, Indian Appeals 397.

प्राप्त थी। इसका अप्रत्यक्ष अर्थ यह हुआ कि प्राचीन हिन्दू विधि दार्शिनिकों को यह भली भांति ज्ञात था कि विधि का स्वरूप सामाजिक बदलाव के साथ परिवर्तनशील है, इसलिये विधि में लचीलापन तथा समयानुसार बदलाव को स्वीकारा जाना चाहिये।

वेदान्तिक विधि सम्बन्धी धारणा (Vedantic Concept of Law)

वेदों के अनुसार विधि का उद्गम दैवीय (divine origin) है। ऋग्वेद में विधि को मानव आचरण को नियन्त्रित रखने का साधन माना गया है। मनु ने भी इस विचार से सहमति दर्शाते हुये कहा कि मानव का औचित्यपूर्ण आचरण दैविक प्रेरणा से उद्भूत है इसलिये मानव अपने कर्तव्यों का अनुपालन की ओर प्रवृत्त होता है और ऐसा न करने पर उसे दैवी-कोप का भय सतत् सदाचरण की ओर प्रेरित करता रहा है।  

उपनिषदों में समाविष्ट विधि के अनुसार विधि का उद्देश्य समाज की सुरक्षा करना है ताकि मानव आपसी टकरावों से मुक्त रहें और सामाजिक शान्ति बनी रहे। इस सन्दर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद में उल्लेख है कि, “विधि छत्रों का छत्र है जिससे श्रेष्ठ कोई अन्य विधि नहीं है, अतः विधि की सहायता से यदि शासक चाहे तो एक कमजोर व्यक्ति भी बलशाली व्यक्ति पर शासन कर सकता है…..यह विधि वह है जिसे ‘सत्य’ की संज्ञा दी गयी है, अर्थात् ‘सत्य’ और विधि, एक ही हैं।”13  

वैदिक विधि में अधिकारों की बजाय कर्तव्य पर अधिक बल दिया गया था। धर्म का अर्थ था लोगों एवं समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक अनुपालन करना । ज्ञातव्य है कि संयोगवश आगे चलकर आगस्टे काम्टे (Auguste Compte) केल्सन, ड्यूगिट आदि पाश्चात्य विधिशास्त्रियों ने भी ‘कर्तव्य’ को विधि के प्रधान तत्व के रूप में स्वीकार किया।

न्याकोपनिषद में भी विधि को राजाओं का राजा (King of Kings) माना गया है तथा यह कहा गया है। कि इससे अधिक बलशाली अन्य कुछ भी नहीं हो सकता है। बाद में अरस्तू और सिसरो ने भी कुछ इसी प्रकार के विचार व्यक्त किये हैं।

धर्म, नैतिकता और विधि एक-दूसरे के पूरक थे-प्राचीन भारतीय विधि प्रणाली में धर्म, नैतिकता और विधि का समान रूप से समावेश था। सदाचार में विधि के नियमों की तुलना में नैतिक मूल्यों पर अधिक जोर दिया गया था। धर्म को गुणी व्यक्ति की आत्मा की पुकार माना जाता था जिसमें सांसारिक प्रलोभनों (काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि) को कोई स्थान नहीं था।14

उस समय सामान्य धारणा यह थी कि मानव जन्मतः निष्पाप एवं सद्गुणी जन्मता है लेकिन बाद में वह सांसारिक मोहमाया के बन्धन में बंधकर आपने कर्तव्यों से विमुख हो जाता है इसलिये धर्म और विधि का उद्देश्य मानव को अपने मानव धर्म से परावृत्त होने से रोकना है।

सारांश यह है कि आज की भाँति प्राचीन भारत की विधि भी प्रजातान्त्रिक मूल्यों पर आधारित थी, फिर प्रश्न यह उठता है कि वर्तमान परिदृश्य में क्या पुरातन भारतीय विधि एवं संस्कृति को भुलाना या उसकी अनदेखी करना उचित है? सच तो यह है कि भारत की वर्तमान विधि व्यवस्था को अधिक सार्थक और समयोचित बनाने के लिए पुरातन भारतीय विधि को बदली हुई परिस्थितियों के अनकल परिमार्जित करके उसका पनरुत्थान किया जाना चाहिए ताकि वह पाश्चात्य प्रभाव से मुक्त हो सके। संभवतः वर्तमान संघर्षमय जीवन की जटिलताओं से उभरने के लिए सहिष्णुता, सह-अस्तित्व, परस्पर प्रेम, बंधुत्व तथा सौहार्द की स्थापना आवश्यक है जो पुरातन भारतीय विधि के मूल तत्व माने गये हैं।

सारांश रूप में यह कहा जा सकता है कि धर्मशास्त्रों में वर्णित भारत के प्राचीन विधि-दर्शन में धर्म विधि एवं नैतिकता का अनोखा समन्वय मिलता है। प्राचीन भारत के विधि-निर्माताओं ने सामाजिक समेकता (social solidarity) तथा विधि की शुचिता को सर्वोपरि मानते हुए विधियों का निर्वचन तदनुसार किया।

13. उपनिषद् अध्याय 4 श्लोक 4.

14. मनु संहिता अध्याय-II श्लोक 1.

यहाँ तक कि सर विलियम जोन्स, विक्टर कजिन तथा मेक्समूलर आदि पाश्चात्य विद्वानों ने भी पुरातन भारतीय वेदान्त-दर्शन की सराहना की है। यह बात अलग है कि समय के साथ प्राचीन विधि-दर्शन का प्रभाव धूमिल होता गया और पश्चातवर्ती मुगल तथा ब्रिटिश शासन के फलस्वरूप उसकी गरिमा लुप्त होती गई। तथापि प्राचीन भारतीय विधि दर्शन के स्वर्णिम आदर्श एवं सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि पूर्व में थे। आवश्यकता केवल इस बात की है कि उनमें समायानुसार परिवर्तन करके उन्हें वर्तमान विधि-प्रणाली में समाविष्ट किया जाए। 

उल्लेखनीय है कि 20वीं सदी के विधिज्ञों तथा भारतीय विधि-वेत्ताओं में जिनका प्रमुख योगदान रहा है वे हैं-डॉ भीमराव अंबेडकर, न्यायमूर्ति छागला, डॉ पी० वी० गजेन्द्रगडकर, न्यायमूर्ति पी० एन० भगवती, डी० एन० देसाई, वी० आर० कृष्णा अइयर, नानी पालकीवाला, डॉ एम० सी० सीतलवाड, एम० एल० सिंगवी, पी० के० सेन, डॉ पी० के० त्रिपाठी, डॉ उपेन्द्रबक्षी डॉ एन० आर० माघवन मेनन आदि। 

प्राचीन भारतीय विधि-दर्शन के उद्गम एवं विकास का इतिहास कि ‘धर्म’ के नियम ही समाज का एक सूत्र में बांधे रखने का कार्य करता था। जैसा कि एस० वर्धाचारियर15 ने कहा है कि तत्कालीन विधि प्रणाली न्याय की सुनिश्चित तथा विधि की मर्यादा बनाये रखना ही लोगों का सर्वश्रेष्ठ धर्म एवं कर्तव्य था तथा इन दोनों पर लोकमत का गहरा प्रभाव था। कोहलर16 ने भी इस विचार से सहमति दर्शाते हुये कहा है कि प्राचीन भारतीय विधि का मूल तत्व यह था कि न्याय-प्रशासन में विधि को सर्वोपरि माना जाये ताकि धर्म (सदाचरण) को सुनिश्चित किया जा सके।

15. एस० वर्धाचारियर : दि हिन्दू जूडिशियल सिस्टम पृ० 162. 

16. जोसेफ कोहलर : सर्वे ऑफ इण्डियन लॉ एण्ड इण्डियन एन्शियण्ट इन्स्टीच्यूशन्स (PLI) पृ० 576.

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