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Indian Penal Code Protection of the Accused LLB 1st Year Notes

  Indian Penal Code Protection of the Accused LLB 1st Year Notes: Indian Penal Code was implemented in India in the year 1862 under the British Government. Indian Penal Code is used on the crime of Indian citizens. Today, we are going to teach in both Indian and English languages, in 1860, Protection of the Accused LLB Notes Study Material 1st Year and 1st Semester in Hindi and English. Keeping our daily updates on our website for LL.B.

VII

अभियुक्त का संरक्षण

(PROTECTION OF THE ACCUSED)

(1) दुहरे खतरे का सिद्धान्त (Doctrine of Double Jeopardy)–दुहरे खतरे के सिद्धान्त का अर्थ है कि किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिये दो बार दण्डित न किया जाए। यह आपराधिक न्याय प्रशासन का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त का विवेचन हमें कामन लॉ के (Autre foks acquit and autre fois convict) (प्रांग दोषमुक्ति और पूर्व दोषसिद्धि) सूत्र में मिलता है। जिसका अर्थ है कि अभियुक्त पश्चात्वर्ती विचारण के दौरान पूर्व-दोषमुक्ति और पूर्व-दोषसिद्धि की सहायता ले सकता है। पूर्व दोषमुक्ति और पूर्वदोषसिद्धि पश्चात्वर्ती विचारण को वर्जित करती है। यह सिद्धान्त इंग्लिश कामन लॉ के (nemo debet proeaden causa bis vexari) नियम पर आधारित है। जिसका अर्थ है किसी भी व्यक्ति को एक ही हेतुक के लिये दो बार तंग नहीं किया जाना चाहिये। आंग्ल विधि- आंग्ल विधि के अन्तर्गत यह सिद्धान्त निम्नलिखित प्रकरणों पर लागू होता है(क) यदि दोषमुक्ति उसी अपराध के लिये थी जिसके लिये पश्चात्वर्ती अभियोजन चलाया गया था। (ख) यदि पश्चात्वर्ती अभियोग उसी कार्य या लोप पर आधारित है जिसके सम्बन्ध में पूर्ववर्ती दोषमुक्ति प्रदान की गयी थी, तथा कुछ विधान यह निर्देश देते हैं कि अभियुक्त उसी कार्य या लोप के सम्बन्ध में दुबारा विचारित और दण्डित नहीं होगा।79 यह अभिनिश्चित करने हेतु कि क्या किसी मामले में दुहरेखतरे की दलील ग्राह्य होगी या नहीं निम्नलिखित छानबीन महत्वपूर्ण है (1) क्या प्रथम अभियोग के दौरान अभियुक्त खतरे में था? (2) क्या प्रथम अभियोग में अन्तिम निर्णय दिया गया था? (3) क्या प्रथम आरोप वस्तुत: वही था जो कि वर्तमान आरोप है। यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक है तो दलील सफल होगी। अन्तिम आदेश का अर्थ यहाँ पर केवल दण्ड का निर्देश मात्र नहीं है, अपितु इसमें दोषमुक्ति भी सम्मिलित है। यदि पूर्व दोषसिद्धि अवैध थी, तो ऐसा नहीं समझा जायेगा कि वह खतरे में थे, क्योंकि अवैध आरोप पर दोषसिद्धि प्रभावकारी नहीं होगी। अतः। यदि अभियुक्त क्षेत्राधिकार की दलील प्रस्तुत करता है तो वह दलील सफल हो जाती है या उसका पूर्व आदेश रद्द कर दिया जाता है तो उसी आरोप पर उसका पुन: विचारण सम्भव होगा।
  1. ट्रैक्ट, थियोल पोलिट (Tract, Theol Polit), अध्याय 20.
  2. आर० बनाम सर्नी (1887) सी० सी० सी० सेस० पेप० सी० VII 418.
भारतीय विधि भारत में यह सिद्धान्त संविधान के अनुच्छेद 20(2) तथा दण्ड प्रक्रिया 1973 की धारा 300 की उपधारा (1) में उपबन्धित है। अनुच्छेद 20 (2) उपबन्धित करता है। | किसी भी व्यक्ति को उसी अपराध के लिये एक बार से अधिक अभियोजित व दण्डित न जाएगा।” अमेरिका में इस सिद्धान्त को संविधान के पाँचवें संशोधन द्वारा मान्यता प्रदान की गयी है। प्रतिपादित करता है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन या शरीर को एक ही अपराध के लिये दुबारा रखती हैं नही डाला जायेगा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(2) में वर्णित सुरक्षा अमेरिका तथा इंग्लैण्ड में सुरक्षा से संकीर्ण है। हमारे देश में केवल उसी अपराध के लिये द्वितीय विचारण वर्जित है जिसके लिये व अभियोजित ही नहीं हुआ था अपितु दण्डित भी हुआ था। अत: यदि किसी अपराध के लिये प्रथम विचारण के समय दण्ड नहीं प्रदान किया गया था तो द्वितीय अभियोजन वर्जित नहीं होगा। कुलवन्ती बनाम मध्य प्रदेश राज्य80 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि “यदि अभियोजन के परिणामस्वरूप अपराध के लिये दण्ड आरोपित नहीं हुआ था, तो अनुच्छेद 20 खण्ड (2) लागू नहीं होगा………और दोषमुक्ति के विरुद्ध कोई अपील, यदि प्रक्रिया द्वारा प्रतिपादित है तो सारवान रूप में अभियोजन की निरन्तरता है।’ अनुच्छेद 20(2) में तीन बातें अन्तर्विष्ट हैं-(1) कोई व्यक्ति किसी अपराध का दोषी हो; (2) अभियोजन या प्रक्रिया किसी न्यायालय या न्यायिक अधिकरण के समक्ष होनी चाहिये, और उसकी प्रकृति न्यायिक होनी चाहिये, (3) अभियोजन उस विधि से सम्बन्धित होना चाहिये जो अपराध का गठन करती है। और दण्ड का प्रावधान प्रस्तुत करती है। भारत में इस नियम को सांविधानिक मान्यता सामान्य खण्ड अधिनियम (The General Clauses Act), 1897 की धारा 26 द्वारा प्रदान की गयी है। इसको दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 302 (2) द्वारा भी मान्यता प्रदान की गयी है। दी जनरल क्लाजेज एक्ट, 1897 की धारा 26 प्रतिपादित करती है कि| “जहाँ कोई कार्य या लोप दो या अधिक अधिनियमों के अन्तर्गत कोई अपराध गठित करता है, वहाँ अभियुक्त उसके या उनमें से किसी एक के अन्तर्गत अभियोजित और दण्डित होगा; किन्तु उसी अपराध के लिये वह दुबारा दण्डनीय नहीं होगी।” दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 300 (1) प्रतिपादित करती है कि ‘जो कोई भी किसी सक्षम न्यायालय द्वारा एक बार किसी अपराध के लिये विचारित होने के पश्चात् दण्डित हुआ था या उसे दोषमुक्ति प्रदान की गयी थी, वह, जब तक ऐसी दोषसिद्धि या दोघमुक्ति प्रवृत्त रहती है तब तक न तो उसी अपराध के लिये पुन: विचारण का भागी होगा और न उन्हीं तथ्यों पर किसी ऐसे अन्य अपराध के लिये विचारण का भागी होगा जिसके लिये उसके विरुद्ध लगाये गये आरोप से भिन्न आरोप धारा 221 की उपधारा (1) के अधीन लगाया जा सकता था, या जिसके लिये वह उसकी उपधारा (2) के अधीन दोषसिद्ध किया जा सकता था। धारा 300 की उपधारा 2 से 6 तक, धारा 300 (1) के कुछ अपवाद उपबन्धित हैं। धारा 300 (1) के प्रवर्तन का मुख्य आधार यह है कि प्रथम विचारण एक ऐसे न्यायालय के समक्ष होना चाहिये जो मुकदमे को सुनने और निर्णय देने तथा दोषसिद्धि या दोषमुक्ति का निर्णय देने के लिये सक्षम हो। इस प्रयोजन हेतु संहिता में दोषमुक्ति (acquittal) तथा उन्मोचन (discharge) में सुस्पष्ट अन्तर स्थापित किया गया है। यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जहाँ दो क्रमिक आरोप एक ही विचारण में हैं वहाँ वह तथ्य कि एक आरोप के सम्बन्ध में उसे मुक्ति प्रदान कर दी गयी है, दूसरे आरोप के सम्बन्ध में दोषसिद्धि प्रदान करने से निवारित नहीं कर । सकेगा।81
  1. ए० आई० आर० 1953 सु० को 131.
  2. मध्य प्रदेश राज्य बनाम बीरेश्वर राव अग्निहोत्री, 1957 एस० सी० जे० 519.
उपरोक्त कथन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय विधि के अन्तर्गत दो प्रकार के बचावों का सृजन किया गया है; प्रथम वह जिसका वर्णन संविधान के अनुच्छेद 20(2) में किया गया है, तथा द्वितीय वह जिसका विधाने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 300 (1) में किया गया है। संवैधानिक गारन्टी केवल (duitre fois convict and not autre fois acquit) प्रांग दोषसिद्धि न कि प्रांग दोषमुक्ति का सिद्धान्त अन्तर्विष्ट करती है। उसी अपराध के द्वितीय विचारण के विरुद्ध संवैधानिक दलील प्रस्तुत करने के लिये पूर्व अभियोजन और पूर्व-दोषसिद्धि दोनों ही आवश्यक हैं। किन्तु दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की उपधारा 300 (1) पूर्व दोषसिद्धि तथा पूर्व दोषमुक्ति दोनों ही सिद्धान्तों को समावेशित करती है। अत: यदि किसी अपराध के लिये पूर्व-दोषसिद्धि प्रदान नहीं की गयी है, अपितु विचारण के अन्त में दोषमुक्ति प्रदान कर दी जाती है तो सम्बन्धित व्यक्ति को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 300 (1) का अवलम्बन लेना पड़ेगा।
  1. निर्दोषता की उपधारणा (Presumption of Innocence), कामन लॉ का यह सिद्धान्त है कि ‘हर व्यक्ति को तब तक निर्दोष प्रकल्पित किया जाए जब तक उसकी दोषसिद्धि न हो जाए।” विधि प्रत्येक व्यक्ति को निर्दोष मानता है। अतः अभियुक्त को दोषी सिद्ध करने का दायित्व अभियोजन पर होता है। अपराध, जिसका आरोप अभियुक्त पर लगाया गया है, को गठित करने वाले आवश्यक तत्वों को न्यायालय की सन्तुष्टि तक सिद्ध करने का दायित्व अभियोजन पर रहता है। न्यायालय अभियुक्त को तभी दण्डित कर सकता है, जब वह पूर्णरूप से सन्तुष्ट हो जाए कि अभियुक्त के विरुद्ध लगाये गये आरोपों की पुष्टि हो गयी है। इसका अर्थ यह है कि सभी युक्तियुक्त सन्देहों का लाभ अभियुक्त को मिलना चाहिये। यह सिद्धान्त इस आपराधिक नीति पर आधारित है कि कई दोषी व्यक्तियों को छोड़ देना एक निर्दोष व्यक्ति को दण्डित करने से श्रेयस्कर है। यद्यपि इस नियम के अनेक अपवाद हैं
(1) ऐसे सांविधिक अपराध जिनके पूर्णयन हेतु दुराशय (mens rea) आवश्यक है। ऐसे अपराधों में दायित्व के अनुपालन मात्र से ही अभियुक्त के दोषी होने की अवधारणा कर ली जाती है। (2) दूसरा अपवाद चोरी का सामान प्राप्त करने वाले व्यक्ति से सम्बन्धित है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 114, दृष्टान्त (क) उपबन्धित करती है कि ‘चोरी के तुरन्त बाद चोरी का माल धारण करने वाले व्यक्ति के सम्बन्ध में न्यायालय यह उपधारित कर सकती है कि वह या तो चोर है या यह जानते हुये कि माल चोरी का है उसने उसे प्राप्त किया जब तक कि वह अपने अधिधारण को स्पष्ट नहीं करता।” (3) अभियुक्त की पूर्वदोष-सिद्धि उसके विरुद्ध किसी मामले में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत की जा सकती है। दण्ड संहिता की धारा 75 के अन्तर्गत पूर्वदोष-सिद्धि को एक निश्चित सीमा तक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, किन्तु यह साक्ष्य तभी न्यायालय द्वारा स्वीकार किया जाएगा जब अभियुक्त विचाराधीन अपराध के लिये दोषी पाया जाता है। यदि न्यायालय की संतुष्टि तक अभियोजन द्वारा यह सिद्ध कर दिया जाता है कि अभियुक्त दोषी था तो यह सिद्ध करने का दायित्व कि अभियुक्त निर्दोष था, बचाव-पक्ष का होता है। दूसरे शब्दों में, यदि अभियुक्त अपने बचाव में कोई दलील प्रस्तुत करता है तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी दलील के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करे। युक्तियुक्त सन्देह से परे अभियुक्त के दोष को सिद्ध करने का दायित्व अभियोजन का होता है। संदेह का अर्थ यहाँ प्रत्येक सन्देह से नहीं है अपितु केवल युक्तियुक्त संदेह से है। केवल ऐसा सन्देह जिसके लिये कोई आधार प्रस्तुत किया जा सके। भारतीय विधि- भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 105 उपबन्धित करती है कि-“जबकि कोई व्यक्ति किसी अपराध का अभियुक्त है, तब उन परिस्थितियों के अस्तित्व को साबित करने का भार, जो उस मामले को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 के साधारण अपवादों में से किसी के अन्तर्गत या उसी संहिता के किसी अन्य भाग में, या उस अपराध की परिभाषा करने वाली किसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी विशेष अपवाद पर परन्तुक के अन्तर्गत कर देती है, उस व्यक्ति है और न्यायालय ऐसी परिस्थितियों के अभाव की उपधारणा करेगा।” प्रभु बनाम इम्परर82 के वाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह अभिनित किया कि वुल्मिंगटन बनाम डायरेक्टर ऑफ पब्लिक प्रासीक्यूशन के वाद में दिया गया निर्णय आंग्ल विधि के नियमों एवं सिद्धान्तों को उसके तर्कसम्मत परिणाम तक पहुंचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करता, अर्थात अपराधिता कभी भी उपधारित नहीं की जानी चाहिये और अभियुक्त को तब तक निर्दोष मानना चाहिये, जब तक इसके विपरीत न सिद्ध हो जाए।” न्यायालय ने यह घोषित किया कि ये मूलभूत सिद्धान्त हैं जो नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्त पर आधारित हैं। यद्यपि मामले को अपवाद के अन्तर्गत आने वाली परिस्थितियों को सिद्ध करने का दायित्व साक्ष्य अधिनियम की धारा 105 के अन्तर्गत अभियुक्त पर रहता है किन्तु यह किसी भी प्रकार अभियोजन को उसके दायित्व से जो उस पर साक्ष्य अधिनियम की धारा 102 द्वारा सौंपा गया है, मुक्त नहीं करता। यदि अभियुक्त द्वारा प्रस्तुत की गयी दलील न्यायालय को संतुष्ट करने में विफल रहती है, तो वह भी दोषमुक्ति का हकदार होगा यदि सम्पूर्ण साक्ष्य को देखने के पश्चात् न्यायालय को यह सन्देह हो जाता है कि अभियुक्त अमुक अपवाद का अधिकारी है या नहीं।83 परन्तु यह सिद्धान्त उस समय लागू नहीं होगा जब कि वह आत्मरक्षा की दलील प्रस्तुत करता है और इसको सिद्ध करने या उसके समर्थन में कोई साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहता है।84 अन्यत्र उपस्थिति की दलील को सिद्ध करने का दायित्व अभियुक्त पर होता है परन्तु उस दशा में भी अभियोजन का यह दायित्व होता है कि वह अभियुक्त के विरुद्ध मामले को सिद्ध करे।85 सन्तोषजनक साक्ष्य के अभाव में न्यायालय को ऐसा निष्कर्ष नहीं ग्रहण करना चाहिये कि मामला युक्तियुक्त सन्देह से परे सिद्ध हो गया है।86 हरीपद डे बनाम पश्चिम बंगाल राज्य87 के वाद में यह अभिनिर्धारित हुआ कि अभियोजन का यह दायित्व होता है कि वह अपने मामले को युक्तियुक्त सन्देह से परे सिद्ध करे, अभियुक्त कोई साक्ष्य प्रस्तुत करने या अपना मुँह खोलने के लिये बाध्य नहीं है। यदि अभियोजन अपने दायित्व का निर्वहन करने में विफल रहता है तो अभियुक्त दोषसिद्धि का अधिकारी होगा, अपने बचाव में भले ही उसने कुछ न कहा हो और कोई साक्ष्य न प्रस्तुत किया हो। निर्दोषता से सम्बन्धित विधि की विस्तृत व्याख्या न्यायमूर्ति सुब्बाराव ने के० एम० नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य88 के वाद में की थी। मामले में यह कहा गया था कि अभियुक्त के दोष को सिद्ध करने का दायित्व अभियोजन पर रहता है या अभियुक्त को तब तक निर्दोष समझना चाहिये जब तक उसका अपराध सिद्ध नहीं हो जाता। | इस वाद-विवाद से यह स्पष्ट है कि साक्ष्य का दायित्व, युक्तियुक्त सन्देह तथा अभियुक्त की निर्देषिता इत्यादि सम्बन्धी विधि उपरोक्त परिसीमाओं के अध्यधीन भारतीय आपराधिक विधिशास्त्र के अन्तर्गत उस अवस्था को प्राप्त कर चुकी है जहाँ इसकी आलोचना सम्भव नहीं है। (3) आत्म अपराधारोपण का सिद्धान्त (Doctrine of self-incrimination)-भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(3) उपबन्धित करता है कि किसी अपराध का अभियुक्त कोई भी व्यक्ति अपने ही विरुद्ध साक्ष्य देने के लिये बाध्य नहीं होगा।” संविधान के अनुच्छेद 20(3) में उपबन्धित इस इंग्लिश आपराधिक विधिशास्त्र तथा भारतीय सिद्धान्त की कि कोई भी व्यक्ति ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिये बाध्य नहीं होगा जो उसे आपराधिक अभियोजन की आशंका में डाल दे, एक शाखा मात्र है। अभियुक्त अपनी स्वतन्त्र
  1. ए० आई० आर० 1941 इला० 402.
  2. ए० आई० आर० 1941 इला० 402.
  3. बोधन बनाम इम्परर, 1948 इला० 223.
  4. गुरचरन सिंह बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1956 सु० को० 460.
  5. ज्विंगली एरियल बनाम मध्य प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1954 सु० को० 15.
  6. ए० आई० आर० 1956 सु० को० 757.
  7. ए० आई० आर० 1962 सु० को० 605.
इच्छा के विरुद्ध कोई संस्वीकृति करने या वक्तव्य देने के लिये बाध्य नहीं है और उसे निर्दोष समझना चाहिये जब तक कि इसके विपरीत न सिद्ध हो जाए। अनुच्छेद 20(3) की विवेचना उच्चतम न्यायालय ने एम० पी० शर्मा बनाम सतीश चन्द्र89 के वाद में किया था जिसके अनुसार इसके निम्नलिखित आवश्यक तत्व | (1) यह किसी अपराध के अभियुक्त का अधिकार है; (2) यह अपने विरुद्ध साक्ष्य प्रस्तुत करने के विरुद्ध एक संरक्षण है; (3) यह एक ऐसे दबाव के विरुद्ध संरक्षण है जिसका परिणाम अपने ही विरुद्ध साक्ष्य प्रस्तुत करना है। प्रथम अवयव यह स्पष्ट करता है कि यह अधिकार केवल एक ऐसे व्यक्ति को प्राप्त है जिस पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया है। किसी व्यक्ति को तब अभियुक्त कहा जाता है जब उसके विरुद्ध किसी अपराध के सम्बन्ध में औपचारिक अभियोग लगाया गया हो और सामान्य स्थिति में जिसका परिणाम, अभियोजन और दोषसिद्धि होता है।90 इसके लिये यह आवश्यक नहीं है कि किसी न्यायालय के समक्ष वास्तविक विचारण या छानबीन आरम्भ हो गया हो। एम० पी० शर्मा बनाम सतीश चन्द्र21 के बाद में यह अभिनिर्णीत हुआ कि कोई भी व्यक्ति जिसका नाम प्रथम सूचना रिपोर्ट (First Information Report) में अभियुक्त के रूप में पुलिस द्वारा दर्ज किया गया था और अन्वेषण का आदेश मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया था, अनुच्छेद 20(3) के संरक्षण की माँग कर सकता है। द्वितीय संरक्षण अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिये बाध्य किये जाने के विरुद्ध है। ‘गवाह बनने’ (to be a witness) का तात्पर्य है, “साक्ष्य प्रस्तुत करना और साक्ष्य होठों, किसी वस्तु, दस्तावेज या अन्य तरीकों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।”92 संक्षेप में हम कह सकते हैं कि मौखिक, दस्तावेजी या परिसाक्ष्यी साक्ष्य इसमें सम्मिलित हैं। । तीसरे अवयव के अन्तर्गत संरक्षण केवल तभी मिलता है जब साक्ष्य देने के लिये अभियुक्त को बाध्य किया गया हो। वह स्वेच्छया या प्रार्थना पर अपने इस विशेषाधिकार का अधित्यजन कर सकता है। चूंकि निवेदन या प्रार्थना में किसी प्रकार का दबाव नहीं होता इसलिये निवेदन पर दिया गया साक्ष्य, साक्ष्य देने वाले व्यक्ति के विरुद्ध ग्राह्य होगा।93 बाध्य करने का अर्थ है दबाव डालना जिसमें धमकी देना, मारना या उसके बच्चों, पत्नी आदि को बन्द करने की धमकी देना भी सम्मिलित है। अनुच्छेद 20(3) को आकर्षित करने के लिये यह सिद्ध करना आवश्यक है कि अभियुक्त को अपराध आरोपित करने योग्य वक्तव्य देने के लिये बाध्य किया गया। उच्चतम न्यायालय ने युसुफ अली बनाम महाराष्ट्र राज्य24 के वाद में अनुच्छेद 20(3) के विस्तार को और भी सीमित कर दिया। इस वाद में अभियुक्त के बयान को टेप रिकार्ड पर टेप कर लिया गया था, यद्यपि यह रिकार्डिंग अभियुक्त के ज्ञान के बिना की गयी थी कि इसका प्रयोग उसके विरुद्ध हो सकता था। चूंकि रिकार्डिंग बिना किसी बल या दबाव के की गयी थी इसलिये साक्ष्य के रूप में इसे ग्राह्य माना गया। | दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 भी आत्म अपराध आरोप के विरुद्ध अनेक संरक्षण प्रदान करती है। अभियुक्त के शपथ पर वक्तव्य देने की अपेक्षा नहीं की जाती। अभियुक्त यदि पूछे गये किसी प्रश्न का उत्तर देने से इन्कार कर देता है या गलत जवाब देता है तो वह दण्डनीय नहीं होगा। इस संहिता की धारा 313 में इस सम्बन्ध में नियम उपबन्धित हो। इसी प्रकार धारा 164(2) उपबन्धित करती है कि किसी भी अभियुक्त को प्रपीड़ित संस्वीकृति (Coerced Confession) के आधार पर दोषसिद्धि प्रदान नहीं की जा सकती है।
  1. ए० आई० आर० 1954 सु० को० 300.
  2. राज नरायन लाल बनाम एम० पी० मिस्त्री, ए० आई० आर० 1961 सु० को० 29.
  3. एम० पी० शर्मा बनाम सतीश चन्द्र, ए० आई० आर० 1954 सु० को० 300: देखें आर० बी० शाह बनाम डी० के० गुहा, ए० आई० आर० 1973 सु० को० 1196.
  4. उपरोक्त सन्दर्भ.।।
  5. बम्बई राज्य बनाम काथीकालू, ए० आई० आर० 1961 सु० को० 1808.
  6. ए० आई० आर० 1968 सु० को० 147; देखें एस० के० सिंह बनाम वी० वी० गिरि, ए० आई० आर० 1970 सु० को० 2097.
इसके अतिरिक्त साक्ष्य अधिनियम द्वारा भी संरक्षण प्रदान किया गया है। किसी अभियुक्त द्वारा की । इसी प्रकार संस्वीकृति असंगत होगी यदि वह उत्प्रेरण, भय या प्रतिज्ञा से प्रभावित था- किसी अभियुक्त द्वारा पुलिस अधिकारी के समक्ष की गयी संस्वीकृति उसके विरुद्ध सत्यापित नहीं की जा सकती 96 इसी कारावास में की गयी संस्वीकृति भी अभियुक्त के विरुद्ध सिद्ध नहीं की जा सकती 97 | (4) विधिक सहायता का अधिकार (Right to legal aids)-आपराधिक विधिशास्त्र का एक दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि अभियुक्त स्वच्छ विचारण (fair trial) का अधिकारी है। इसी उद्देश्य । ध्यान में रखकर साधारणतया अभियुक्त का विचारण खुले कमरे में और अभियुक्त की उपस्थिति में किया जात है। यदि अभियुक्त फरार है तो विचारण (trial) उस समय तक नहीं किया जायेगा जब तक कि वह गिरफ्तार नही हो जाता। इसी प्रकार विक्षिप्त व्यक्ति का विचारण उसके ठीक होने तक रुका रहता है। संक्षेप में हम कह। सकते हैं कि किसी व्यक्ति को आपराधिक आरोप के लिये तक तक विचारित नहीं किया जा सकता जब तक कि आरोपों का उत्तर देने के लिये उसे समुचित अवसर न प्राप्त हो। इसलिये यह आवश्यक है कि जितनी जल्दी हो सके और हर हालत में विचारण प्रारम्भ होने से पूर्व अभियुक्त को आरोपों के बारे में बता दिया। जाए। अभियुक्त को अपना मामला प्रस्तुत करने हेतु वकील नियुक्त करने का भी अधिकार है। दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 303 उपबन्धित करती है कि “जो व्यक्ति दण्ड न्यायालय के समक्ष अपराध के लिये अभियुक्त है या जिसके विरुद्ध इस संहिता के अधीन कार्यवाही संस्थित की गयी है, उसका यह अधिकार होगा कि उसकी पसंद के प्लीडर द्वारा उसकी प्रतिरक्षा की जाए।” यदि अभियुक्त कारावास में है तब भी उसे समुचित अवसर दिया जाता है कि वह अपने बचाव हेतु अपने अधिवक्ता से सम्पर्क कर सके। कुछ मामलों में अभियुक्त राज्य के खर्च पर विधिक सहायता प्राप्त करने का अधिकारी है। दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 304 उपबन्धित करती है कि जहाँ सेशन न्यायालय के समक्ष किसी विचारण में अभियुक्त का प्रतिनिधित्व किसी प्लीडर द्वारा न किया जाए और जहाँ न्यायालय को यह प्रतीत हो कि अभियुक्त के पास किसी प्लीडर को नियुक्त करने के लिये पर्याप्त साधन नहीं है वहाँ न्यायालय उसकी प्रतिरक्षा के लिये राज्य के व्यय पर प्लीडर प्रदान करेगा।” तारा सिंह बनाम राज्य98 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि धारा 34० (अब धारा 303) द्वारा प्रदत्त अधिकार का विस्तार यहाँ तक नहीं होता कि अभियुक्त को राज्य या पलिस या मजिस्ट्रेट द्वारा अधिवक्ता प्रदान किया जाए। यह अभियुक्त को दिया गया एक विशेषाधिकार है और यदि वह अधिवक्ता नियोजित करना चाहता है, तो इसकी माँग कर सकता है। मृत्यु-दण्ड से दण्डनीय किसी प्रकरण में यदि अभियुक्त गरीब है, अधिवक्ता नियोजित करने की उसकी सामर्थ्य नहीं है, तो उसके बचाव की व्यवस्था करने का दायित्व राज्य पर होता है। किन्तु इस सन्दर्भ में कोई अभिनिश्चित नियम नहीं है कि यदि अभियुक्त को अधिवक्ता की सुविधा नहीं प्रदान की गयी तो विचारण दूषित होगा।99 विधिक सहायता संविधान के अनुच्छेद 22 (1) के भाव-बोध के अन्तर्गत भी अनुज्ञेय है। अनुच्छेद 22 (1) के अन्तर्गत अभियुक्त को दो अधिकार प्राप्त हैं-(1) गिरफ्तारी के कारणों को शीघ्रातिशीघ्र बताये जाने का अधिकार, तथा ((2) अपनी रुचि के वकील से परामर्श करने और बचाव करवाने का अधिकार प्रथम अधिकार इसलिये आवश्यक है कि क्योंकि इसमें कैदी अपने बचाव की तैयारी करता है। द्वितीय अधिकार के अन्तर्गत न्यायालय अधिवा की सुविधा प्रदान करने के लिये बाध्य नहीं है जब तक कि अभियुक्त इसके
  1. धारा 24, साक्ष्य अधिनियम ।
  2. धारा 25, साक्ष्य अधिनियम ।
  3. धारा 26, साक्ष्य अधिनियम।
  4. 1951 एस० सी० आर० 729.
99, जनार्दन रेड्डी बनाम हैदराबाद राज्य, ए० आई० आर० 1951 सु० को 217 लिये आवेदन नहीं प्रस्तुत करता। अधिवक्ता के परामर्श करने के अधिकार से अभियुक्त को वंचित नहीं किया जा सकता, भले ही न्यायालय से उसने निवेदन न किया हो।’ एम० एच० हास्कट बनाम महाराष्ट्र के वाद में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के सन्दर्भ में यह अभिमत व्यक्त किया गया है कि यदि कोई कैदी निर्धन है अथवा विधिक सहायता प्राप्त करने में अक्षम है, और यदि न्याय के हित में ऐसी विधिक सेवा प्रदान करना आवश्यक है, तो उसे नि:शुल्क विधिक सहायता प्रदान की जानी चाहिये। विधिक सहायता प्रदान करना राज्य का कर्तव्य है, सरकारी दान धर्म नहीं। यह सहायता न केवल अनुच्छेद 22 (1) के भावबोध के अन्तर्गत अनुज्ञेय है, वरन् अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत भी ऐसी सहायता विस्तृत रूप से आज्ञापरक है। हुसेन आरा खातून बनाम स्टेट ऑफ बिहार के मामले में उच्चतम न्यायालय को बिहार सरकार द्वारा फाइल की गयी विचाराधीन कैदियों की सूची से यह पता लगा कि बहुत से कैदी इतने वर्षों से जेल में बंद हैं कि यदि उन्हें आरोपित अपराध हेतु दोषी पाये जाने के फलस्वरूप जितने वर्षों की सजा होती उससे भी अधिक अवधि की वे जेल यातना भुगत चुके हैं। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिमत व्यक्त किया कि राज्य सरकार के ऊपर शीघ्र विचारण सुनिश्चित करने का संवैधानिक दायित्व है और उच्चतम न्यायालय का भी यह संवैधानिक दायित्व है कि अभियुक्त के शीघ्र विचारण सम्बन्धी मौलिक अधिकार के क्रियान्वयन हेतु राज्य को आवश्यक निर्देश दे। ऐसे विचाराधीन कैदियों को जेल में बन्द, रखना पूर्णरूपेण अनुचित है, और न्यायालय ने यह निर्देश दिया कि उन्हें तत्काल रिहा किया जाये, क्योंकि उन्हें निरोधित करना संविधान के अनुच्छेद 21 का स्पष्ट उल्लंघन है। यह भी मत व्यक्त किया गया कि गरीब और जरूरत मन्द लोगों को नि:-शुल्क विधिक सेवा उपलब्ध कराना संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त अधिकार में शामिल है, क्योंकि नि:-शुल्क विधिक सेवा युक्तियुक्त, निष्पक्ष और उचित प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। | खत्री बनाम स्टेट आफ बिहार का मामला जो भागलपुर अन्धे कैदियों के मामले के नाम से भी जाना। जाता है, में ऐसे कैदियों को पहली बार के बाद कभी भी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया था। उन्हें बिना किसी रिमाण्ड आदेश के जेल में बन्द रखा गया। यह निर्णय दिया गया कि मजिस्ट्रेट अथवा सेशन जज जिस किसी के भी समक्ष अभियुक्तों को प्रस्तुत किया गया उनका यह कर्तव्य था कि वे उन्हें बतायें कि यदि कोई अभियुक्त गरीबी के कारण अपने बचाव हेतु विधिक सलाहकार नहीं रख सकता तो राज्य के खर्चे पर विधिक सेवा प्राप्त करने का उन्हें अधिकार है। आगे यह भी मत व्यक्त किया गया कि नि:शुल्क विधिक सेवा प्रदान करना केवल जब विचारण प्रारम्भ हो तभी ही नहीं वरन् जब कैदी प्रथम बार मजिस्ट्रेट के सामने प्रेषित किया जाता है तब भी उसका अधिकार है। यह अधिकार उसे संविधान द्वारा प्रदत्त है। कादरा पहाड़िया बनाम स्टेट आफ बिहार के मामले में उच्चतम न्यायालय ने दुमका के सेशन जज को यह निर्देश दिया कि 8 वर्ष से भी अधिक अवधि से जेल में सड़ रहे चारों विचाराधीन कैदियों को राज्य के खर्चे पर काफी सक्षम अधिवक्ताओं के माध्यम से अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाय। उपरोक्त उपबन्धों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि मृत्यु-दण्ड से दण्डनीय अपराधों को छोड़कर अन्य मामलों में गरीब अभियुक्त के संरक्षण हेतु राज्य के खर्च पर सुविधा प्रदान करने के सम्बन्ध में कोई उपबन्ध नहीं है। किन्तु वास्तविकता यह है कि मृत्यु दण्ड से दण्डनीय अपराधों की भी स्थिति सन्तोषजनक नहीं है, क्योंकि बहुधा अनुभवहीन और युवा अधिवक्ता ही अभियुक्त के लिये नियोजित किये जाते हैं। धारा 304(1) में वर्णित उपबन्धों का विस्तार राज्य सरकार द्वारा अन्य प्रकार के विचारणों के सम्बन्ध में भी किया जा सकता है। सेशन न्यायालय के अतिरिक्त अन्य न्यायालय के समक्ष विचारण के दौरान राज्य द्वारा अधिवक्ता
  1. रामस्वरूप बनाम यूनियन आफ इण्डिया, ए० आई० आर० 1965 सु० को० 247.
  2. 1978 क्रि० लॉ ज० 1678 (सु० को०).
  3. 1979 क्रि० लॉ ज० 1045 (सु० को०).
  4. 1981 क्रि० लॉ ज० 470 (सु० को०).
  5. धारा 304(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973.
की नि:शुल्क विधिक सहायता प्रदान किये जाने के सम्बन्ध में मौजूदा परिस्थितियों में कोई भी प्रावधान नहीं | फिर भी कुछ बार एसोसियेसन्स द्वारा स्वेच्छया विधिक सहायता सोसाइटीज की स्थापना की गयी । जिसका आशय गरीब अभियुक्त को नि:शुल्क विधिक सहायता प्रदान करना है। गरीब व्यक्तियों को नि:शुल्क विधिक सहायता प्रदान किये जाने की माँग दिनो-दिन बढ़ती जा रही है। इस सन्दर्भ में वर्तमान विधा। उपबन्धों को किसी प्रकार सन्तोषजनक नहीं कहा जा सकता। हम यह आशा करते हैं कि गरीबों को विधि सहायता प्रदान करने हेतु सरकार कुछ उपयोगी विधानों का निर्माण करेगी। पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु के विरुद्ध संरक्षण एवं गिरफ्तार किये गये व्यक्ति के अधिकार नीलावती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है। कि पुलिस अभिरक्षा में गिरफ्तार व्यक्ति तथा जेल में कैदियों की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है और यदि पुलिस अभिरक्षा या जेल में उसके मूल अधिकारों का राज्य या उसके सेवकों द्वारा उल्लंघन होता है तो राज्य को ऐसे नागरिक को प्रतिकर देना होगा। प्रस्तुत मामले में मृतक एक 22 वर्ष का व्यक्ति था जिसे पुलिस द्वारा किसी अपराध की जाँच के सम्बन्ध में दिसम्बर को शाम 8 बजे गिरफ्तार किया गया और थाने में बन्द कर दिया गया। उसे हथकड़ी लगी हुई थी और पुलिस का एक कान्स्टेबुल रात में पहरे पर था। 2 दिसम्बर को उसकी हथकड़ी लगी हुई लाश जिस पर अनेक चोटें थीं, रेलवे लाइन के किनारे पड़ी पायी गई। मृतक की माँ ने न्यायालय को पत्र द्वारा पुलिस अभिरक्षा में अपने पुत्र की मृत्यु की सूचना दी और नुकसानी की माँग की। उच्चतम न्यायालय ने उसके पत्र को रिट मानकर पूरे मामले की डाक्टरी जाँच कराया जिसमें यह पाया गया। कि मृतक की मृत्यु पुलिस के मारने-पीटने से हुयी थी अत: उसकी माँ को मृतक पुत्र की उम्र और 1200 से 1500 रु० की आय को ध्यान में रखे हुये 1,50,000 रुपये प्रतिकर दिलाया। अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय जोगिन्दर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय ने जाँच के दौरान एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धान्त विहित किया है ताकि व्यक्ति की अवैध गिरफ्तारी से संरक्षा की जा सके। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि किसी व्यक्ति को किसी अपराध के सहभागी होने के सन्देह मात्र पर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय पुलिस अधिकारी को इस बात से सन्तुष्ट होना आवश्यक है कि उसे गिरफ्तार करने का । युक्तियुक्त औचित्य है। न्यायालय ने इस सम्बन्ध में निम्नलिखित सिद्धान्त विहित किया है– (1) गिरफ्तार को यदि वह प्रार्थना करता है तो उसके किसी ऐसे मित्र, सम्बन्धी या किसी अन्य व्यक्ति को जिसे वह जानता है या जिससे उसके कल्याण में हित हो सकता है, उसकी गिरफ्तारी की तथा उस स्थान की जहाँ वह निरुद्ध है यथासम्भव शीघ्र सूचना दे। (2) पुलिस अधिकारी गिरफ्तार व्यक्ति को थाने में लाने पर यह बताए कि उसे उक्त अधिकार प्राप्त है। (3) पुलिस डायरी में इस बात की प्रविष्टि की जाएगी कि इस सम्बन्ध में किस व्यक्ति को सूचित किया गया था। उपर्युक्त संरक्षण संविधान के अनुच्छेद 21 तथा अनुच्छेद 22 में निहित है और इनका कठोरता से पालन किया जाना चाहिये। प्रस्तुत मामले में पिटिशनर, जो एक 28 वर्ष का नवयुवक अभिवक्ता था, को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गाजियाबाद ने किसी मामले के सम्बन्ध में अपने आफिस में बुलाया। 7.1.94 को 10 बजे दिन में अपने भाई के साथ एस० एस० पी० के आफिस गया। 12.55 पर पिटीशनर के भाई ने मुख्यमंत्री को तार द्वारा सूचना दी कि उसे पिटीशनर को किसी आपराधिक मामले में फंसाये जाने या पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की आशंका थी। शाम को यह पता चला कि उसे थाने में अवैध रूप से निरुद्ध कर दिया था। दूसरे दिन थाना इंचार्ज ने पिटीशनर को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने के बजाय उसके सम्बन्धियों से पुलिस अधीक्षक
  1. (1993) 2 एस० सी० सी०
  2. 746. (1994) 4 एस० सी० सी० 260
से मिलने को कहा। 9.1.94 को शाम को सम्बन्धियों को पता चला कि पिटिशनर को किसी अज्ञात Tथान पर ले जाया गया है। 11.4.94 को अनुच्छेद 32 के अधीन पिटिशनर को विमुक्त कराने के लिये उच्चतम न्यायालय में याचिका फाइल की गई। 14.1.94 को पुलिस अधीक्षक न्यायालय में स्वयं उपस्थित हुये और कहा कि पिटिशनर को निरुद्ध नहीं किया गया था। ऐसी स्थिति में न्यायालय ने कहा कि बन्दी प्रत्यक्षीकरण रिट में कोई उपचार नहीं दिया जा सकता है किन्तु पुलिस द्वारा अवैध गिरफ्तारी से निर्दोष व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करने के लिये कुछ सिद्धान्त विहित करना आवश्यक है, अतएव उपर्युक्त सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया जिसका पालन गिरफ्तारी करते समय पुलिस को करना होगा। किसी देश की सभ्यता का मापदण्ड इस । बात से लगाया जाता है कि वहाँ अपराध विधि को कैसे लागू किया जाता है। मानव अधिकारों का क्षितिज दिन प्रतिदिन विस्तृत हो रहा है। साथ ही साथ अपराधों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है। अंधाधुंध गिरफ्तारी के कारण मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायतें न्यायालय को लगातार मिल रही हैं। गिरफ्तारी की विधि के लागू करने के मामले में व्यक्तिगत अधिकारों और समाज के अधिकारों में सामंजस्य स्थापित करना आवश्यक है | अपने ऐतिहासिक महत्व के निर्णय डी० के० बासू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि किसी भी प्रकार का उत्पीड़न या क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार चाहे वह जाँच के दौरान प्रश्न पूछने के दौरान या अन्य स्थान पर हो अनु० 21 का अतिक्रमण करता है अत: वर्जित है। पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु होना विधि शासन द्वारा शासित सभ्य समाज में सबसे खराब अपराध है। न्यायालय ने केन्द्र और राज्यों की जाँच एवं सुरक्षा एजेन्सियों को सभी प्रकार की ‘गिरफ्तारी और निरोध’ के मामले में अनुसरण करने के लिये विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धान्त विहित किया है। यह मामला एक गैर राजनीतिक संस्था के अध्यक्ष श्री डी० के० बासु द्वारा लोकहित वाद के रूप में न्यायालय के समक्ष लाया गया था। याची ने उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति को एक पत्र लिखा था जिसमें पुलिस अभिरक्षा में हुई मौतों के विषय में देश के कतिपय समाचार पत्रों में छपे समाचार की ओर न्यायालय का ध्यान आकृष्ट किया था। न्यायालय ने उक्त पत्र को रिट पिटीशन मान कर मामले की सुनवाई की और पुलिस अभिरक्षा में हुई मौतों के बारे में चिन्ता व्यक्त करते हुये यह कहा कि जब तक विधानमण्डल इस सम्बन्ध में कोई विधि नहीं बनाता है, निम्नलिखित सिद्धान्तों का पालन किया जायेगा (1) गिरफ्तारी करने वाला या जाँच करने वाला कर्मचारी का पद नाम सही, प्रकट और स्पष्ट होना चाहिये। ऐसे सभी पुलिस कर्मचारी, जो गिरफ्तार व्यक्ति से पूछताछ करते हैं, का विवरण रजिस्टर में दर्ज होना चाहिये। (2) गिरफ्तारी करने वाला पुलिसकर्मी गिरफ्तारी के समय एक मेमो बनायेगा जो कम से कम 2 साक्षियों द्वारा प्रमाणित होगी, जो गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार के होंगे या मोहल्ले के प्रतिष्ठित व्यक्ति होंगे। (3) गिरफ्तार या निरुद्ध व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि उसके एक मित्र, सम्बन्धी या किसी अन्य व्यक्ति जिसको वह जानता हो या जिसे उसकी कुशलता में दिलचस्पी हो, को इसकी सूचना दी जाए। (4) पुलिस गिरफ्तारी का समय, स्थान, अभिरक्षा के स्थान की सूचना गिरफ्तार व्यक्ति के मित्र को देगी या यदि वह जिले से बाहर रहता है तो विधिक सहायता संस्था या उस क्षेत्र के पुलिस केन्द्र के माध्यम से तार द्वारा गिरफ्तारी की सूचना 8 से 12 घण्टे के भीतर अवश्य देना होगा। (5) गिरफ्तार व्यक्तियों को इस अधिकार के बारे में जानकारी होनी चाहिये कि उनकी गिरफ्तारी की सूचना यथाशीघ्र किसी को दी गई है। | (6) निरोध के स्थान पर गिरफ्तारी की सूचना डायरी में दर्ज करनी होगी जिसमें उस मित्र के नाम का उल्लेख होगा जिसे गिरफ्तारी की सूचना दी गई है और उस पुलिस कर्मचारी के नाम और विवरण का उल्लेख होगा जिसकी अभिरक्षा में गिरफ्तार व्यक्ति है।
  1. ए० आई० आर० 1997 एस० सी० 610
(7) गिरफ्तार व्यक्ति, यदि प्रार्थना करता है कि उसकी जाँच कराई जाए तो उसके शरीर में पायी गई। बड़ी और छोटी चोटों को भी दर्ज किया जाना चाहिये। | (8) व्यक्ति को गिरफ्तारी के 48 घण्टे में प्रशिक्षित डॉक्टरों द्वारा राज्य या केन्द्र राज्य क्षेत्र के स्वास्थ्य सेवा के निदेशक द्वारा अनुमोदित डाक्टरों के पैनल में से किसी डॉक्टर द्वारा डॉक्टरी जाँच कराना चाहिये। स्वास्थ्य निदेशक सभी तहसीलों और जिलों के लिये ऐसा पैनल बनायेगा। (9) सभी दस्तावेजों जिसमें मेमों भी शामिल है, की प्रतिलिपियाँ क्षेत्र के मजिस्ट्रेट को रिकार्ड के लिये भेजी जायेंगी। (10) गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपने अधिवक्ता से मिलने दिया जा सकता है यद्यपि पूछताछ के पूरे दौरान में यह आवश्यक नहीं है। | (11) सभी जिलों और राज्यों के हेड क्वार्टर में पुलिस नियन्त्रण या कक्ष बनाया जाना चाहिये जहाँ गिरफ्तारी और उसकी अभिरक्षा के स्थान की सूचना गिरफ्तार करने वाले पुलिस कर्मचारी को 12 घण्टे के भीतर देना होगा और उसे पुलिस नियंत्रण कक्ष के स्पष्ट स्थान पर प्रदर्शित करना होगा। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि उपर्युक्त मार्गदर्शक सिद्धान्तों के पालन में विफलता पर सम्बन्धित अधिकारी विभागीय कार्यवाही के अतिरिक्त न्यायालय अवमानना के लिये भी दायी होगा और उसके विरुद्ध देश के किसी भी उच्च न्यायालय में जिसे अधिकारिता है, कार्यवाही प्रारम्भ की जा सकेगी। उपर्युक्त अपेक्षाएं (requirements) संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(7) में निहित हैं और इनका कठोरता से पालन किया जाना चाहिये। ये सभी अपेक्षाएं अन्य गैर सरकारी अभिकरणों पर भी लागू होंगी जैसे, राजस्व निदेशालय, प्रवर्तन न्यायालय, तटरक्षक, केन्द्रीय सुरक्षा बल, सीमाबल, केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, राज्य सशस्त्र बल और अभिकरण जैसे-जाँच ब्यूरो रॉ, सी० बी० आई०, सी० आई० डी०, ट्रैफिक पुलिस, माउन्टेड पुलिस और तिब्बत सीमा पुलिस आदि। न्यायालय ने यह आदेश दिया कि उपर्युक्त निर्देशों को सम्बन्धित प्राधिकारियों में विस्तृत रूप से प्रसारित किया जाये और आल इण्डिया रेडियो और दूरदर्शन पर भी प्रसारण किया जाना चाहिये। पुलिस अभिरक्षा में हुई मौतों के मामले में प्रतिकर के सम्बन्ध में न्यायालय ने कहा कि इसके लिये धनीय प्रतिकर ही सबसे उपयुक्त उपचार है और राज्य अपने कर्मचारियों के लिये प्रतिनिधायी रूप में दायी ऐसे मामलों में नागरिकों का दावा कठोर दायित्व के सिद्धान्त पर आधारित होता है जिसके विरुद्ध संप्रभु के सिद्धान्त का बचाव उपलब्ध नहीं है नागरिक राज्य से प्रतिकर पाने का हकदार है जिसे दोषकर्ता द्वारा क्षतिपूर्ति करना होगा।

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