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Indian Penal Code Offences Relating Marriage LLB Notes

 

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अध्याय 20

विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में

(OF OFFENCES RELATING TO MARRIAGE)

493. विधिपूर्ण विवाह का प्रवंचना से विश्वास उत्प्रेरित करने वाले पुरुष द्वारा कारित सहवास- हर पुरुष, जो किसी स्त्री को, जो विधिपूर्वक उससे विवाहित न हो, प्रवंचना से यह विश्वास कारित करेगा कि वह विधिपूर्वक उससे विवाहित है और इस विश्वास में उस स्त्री का अपने साथ सहवास या मैथुन कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

टिप्पणी

अवयव- इस धारा के दो अवयव हैं

(1) वैध विवाह के अस्तित्व के सम्बन्ध में मिथ्या विश्वास दिलाना,

(2) ऐसा विश्वास दिलाये गये व्यक्ति के साथ सहवास या मैथुन कारित करना।

यह धारा एक ऐसे विवाहित या अविवाहित पुरुष को दण्डित करती है जिसने प्रवंचना के माध्यम से किसी महिला में यह विश्वास उत्पन्न कर दिया है कि वह उसकी पत्नी है, किन्तु वास्तव में यह उसकी रखैल होती है। अपराध की पूर्णता के लिये यह आवश्यक है कि पत्नी होने के विश्वास के परिणामस्वरूप वह महिला ऐसे पुरुष के समक्ष सहवास या मैथुन के लिये अपने को समर्पित कर दे और वह पुरुष ऐसी महिला के साथ सहवास या मैथुन कारित करे। विवाहोत्सव का स्वरूप उस जाति अथवा धर्म पर निर्भर करता है कि जिस जाति या धर्म से विवाह के पक्षकार सम्बन्धित हैं। यदि विवाह के पक्षकार एक जाति या धर्म के नहीं हैं तो वे अपना धर्म परिवर्तित कर सकते हैं। किन्तु यह अपराध उस समय कारित हुआ समझा जायेगा। जब एक व्यक्ति एक महिला को प्रवंचनापूर्वक यह विश्वास दिलाता है कि वह उसी जाति, वर्ण या धर्म से सम्बन्धित है जिससे कि वह और इस विश्वास पर उससे विवाह रचाता है जो वास्तव में अवैध है किन्तु जो उस विधि के अनुसार जिससे वह नियन्त्रित होती है, वैध है।

इस धारा में वर्णित अपराध के लिये धारा 375 खण्ड 4 के अन्तर्गत भी अपराधी को दण्डित किया जा सकता है।

494. पति या पत्नी के जीवनकाल में पुनः विवाह करना- जो कोई पति या पत्नी के जीवित होते हुए किसी ऐसी दशा में विवाह करेगा जिसमें ऐसा विवाह इस कारण शून्य है कि वह ऐसे पति या पत्नी के जीवनकाल में होता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

अपवाद- इस धारा का विस्तार किसी ऐसे व्यक्ति पर नहीं है, जिसका ऐसे पति या पत्नी के साथ विवाह सक्षम अधिकारिता के न्यायालय द्वारा शून्य घोषित कर दिया गया हो,

और न किसी ऐसे व्यक्ति पर है, जो पूर्व पति या पत्नी के जीवनकाल में विवाह कर लेता है, यदि ऐसा पति या पत्नी उस पश्चात्वर्ती विवाह के समय ऐसे व्यक्ति से सात वर्ष तक निरन्तर अनुपस्थित रहा हो, और

1. एम० एण्ड एम० 32.

उस काल के भीतर ऐसे व्यक्ति ने यह नहीं सुना हो कि वह जीवित है, परन्तु यह तब जब कि ऐसा पश्चात्वर्ती विवाह करने वाला व्यक्ति उस विवाह के होने से पूर्व उस व्यक्ति को, जिसके साथ ऐसा विवाह होता है, तथ्यों की वास्तविक स्थिति की जानकारी, जहाँ तक कि उनका ज्ञान उसको हो, दे दे।

टिप्पणी

इस धारा के अन्तर्गत एक ऐसे विवाह के लिये दण्ड का प्रावधान प्रस्तुत किया गया है जिसे इंगलिश विधि में द्विविवाह (Bigamy) कहा जाता है। यह धारा सभी हिन्दुओं, ईसाइयों तथा पारसियों पर समान रूप से लागू होती है चाहे वे पुरुष हों या स्त्री। किन्तु मुसलमानों में यह केवल स्त्रियों पर लागू होती है क्योंकि मुस्लिम वैयक्तिक विधि के अन्तर्गत कोई मुसलमान पुरुष एक समय चार पत्नियाँ रख सकता है परन्तु कोई मुस्लिम स्त्री एक समय एक से अधिक पुरुष का पति के रूप में स्वीकार करने की अधिकारिणी नहीं है।

अवयव-इस धारा के निम्नलिखित प्रमुख अवयव हैं

1. अभियुक्त एक पूर्व विवाहित व्यक्ति था,

2. उसका पूर्व विवाह विधिपूर्ण था, ।

3. वह व्यक्ति, जिसके साथ उसका विवाह हुआ था, जीवित था,

4. विवाह के दूसरे पक्षकार के जीवन काल में ही अभियुक्त ने दूसरा विवाह किया था।

(1) अभियुक्त एक पूर्व विवाहित व्यक्ति था-धारा 494 को लागू होने के लिये आवश्यक है। कि अभियुक्त का एक विवाह उस समय हो चुका था जिस समय उसने दूसरा विवाह किया। अभियुक्त का प्रथम विवाह विधिपूर्ण तथा अस्तित्ववान होना चाहिये। यदि प्रथम विवाह अवैध है या समाप्त हो चुका है। तो दूसरा अवैध नहीं होगा। तलाक द्वारा विवाह समाप्त हो जाता है। अतः यदि किसी पक्षकार ने तलाक प्राप्त कर लिया है तो वह दूसरा विवाह करने का अधिकारी होगा। मुस्लिम विधि के अन्तर्गत कोई मुसलमान स्त्री, जिसका विवाह-विच्छेद या तो पति की मृत्यु के कारण या तलाक द्वारा हो चुका है, इद्दत की अवधि व्यतीत करने के लिये बाध्य है, और इद्दत की अवधि व्यतीत करने के पश्चात् ही वह दूसरा वैध विवाह कर सकती है। किन्तु यदि वह इद्दत की अवधि व्यतीत करने के पूर्व ही दूसरा विवाह कर लेती है तो भी वह द्विविवाह की अपराधिनी नहीं होती। |

यौवनागम का विकल्प (Option of Puberty)-मुस्लिम वैयक्तिक विधि का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू, है ‘यौवनागम का विकल्प’ अर्थात् यदि किसी शिशु का विवाह पिता या प्रपिता के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति सम्पन्न कर देता है तो उस शिशु को यह अधिकार होता है कि वह यौवनागम की आयु प्राप्त करने पर उस विवाह को नकार दे या अनुसमर्थित कर दे किन्तु यह आवश्यक है कि इस समय तक सहवास न हुआ। हो। यदि लड़की यौवनागम की आयु प्राप्त करने के उपरान्त दूसरा विवाह कर लेती है तथा प्रथम विवाह को नकार देती है तो वह इस धारा में वर्णित अपराध की अपराधिनी नहीं होगी। यदि ब नामक एक मुस्लिम लडकी का विवाह यौवनागम की आयु प्राप्त करने के पूर्व उसकी माँ द्वारा ज के साथ सम्पन्न करा दिया जाता है और यौवनागम की आयु प्राप्त करने पर वह य नामक व्यक्ति से विवाह कर लेती है तो ब तथा य द्विविवाह के अपराधी नहीं होंगे क्योंकि ब का विवाह उस समय हुआ था जब वह अवयस्क थी और यौवनागम की आय पराप्त करने पर उसे यह अधिकार होगा कि वह पूर्व-विवाह को या तो नकार दे या अनुसमर्थित कर दे। जब त ने य के साथ अपना दूसरा विवाह रचाया तो उसका आशय यह था कि वह अपने प्रथम विवाह को नकारी है।

अपने आप को तलाक देने की संविदा- यदि विवाह के दोनों पक्षकार मुस्लिम हैं और उनके बीच इस आशय की कोई संविदा है कि यथोल्लिखित परिस्थितियों में पत्नी अपने आप को तलाक दे सकेगी

2. श्रीमती पड़ी बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, ए० आई० आर० 1963 हिमां० प्रदेश 16.

3. अब्दुल गनी बनाम अजीजुल हक, (1911) 39 कल० 409.

4. बादल औरा, (1891) 19 कल० 79, पृष्ठ 82.

तथा वह यथोल्लिखित परिस्थितियों में से किसी एक के घटने पर अपने अधिकार का प्रयोग करती है तो तलाक उसी प्रकार प्रभावी होगा मानों पति ने पत्नी को तलाक दिया हो। तलाक की घोषणा किसी न्यायालय दारा आवश्यक नहीं होगी। इस प्रकार तलाक लेने के पश्चात् लड़की द्वारा दूसरा विवाह करना इस धारा के अन्तर्गत नहीं आता।

(2) पूर्व-विवाह विधिपूर्ण था- इस धारा में वर्णित अपराध को गठित करने के लिये यह आवश्यक है कि उसका प्रथम विवाह विधिपूर्ण हो । यदि प्रथम विवाह शून्य है तो शून्य विवाह के दोनों पक्षकार इस बात के लिये स्वतन्त्र हैं कि वे दूसरा विवाह रचा सकें। प्रथम विवाह की वैधता का निर्धारण वैयक्तिक विधि के आधार पर किया जाता है। यदि वैयक्तिक विधि के आधार पर प्रथम विवाह शून्य था तो धारा 494 लागू नहीं होगी। किन्तु यदि प्रथम विवाह मात्र शून्यकरणीय है तथा किसी सक्षम न्यायालय द्वारा। विवाह को शून्य घोषित नहीं कराया गया है तो ऐसी स्थिति में धारा 494 लागू होगी। यदि कोई विवाह न तो शून्य है और न ही शून्यकरणीय है, अपितु अनियमित है, और ऐसे अनियमित विवाह का कोई पक्षकार दूसरा विवाह कर लेता है तो वह चाहे पुरुष हो या स्त्री इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय होगी।

(3) पति या पत्नी जीवित हो- इस अपराध के निर्धारण हेतु यह सिद्ध करना आवश्यक है कि दूसरे विवाह के समय पूर्व विधिपूर्ण विवाह अस्तित्ववान था।6 अर्थात् पूर्व-विवाह के दोनों पक्षकारों का जीवित होना आवश्यक है। मुस्लिम तथा ईसाई वैयक्तिक विधि के अन्तर्गत कोई विधिपूर्ण विवाह, विवाह के एक पक्षकार की मृत्यु द्वारा समाप्त हो जाता है और मृत्यु के पश्चात् किया गया दूसरा विवाह विधिपूर्ण होगा। इसी प्रकार हिन्दू विधि के अन्तर्गत विवाह के एक पक्षकार की मृत्यु के पश्चात् जीवित पक्षकार इस धारा के दाण्डिक प्रावधानों को अपनी ओर आकर्षित किये बिना दूसरा विवाह कर सकेगा। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के पारित होने के पश्चात् यदि कोई हिन्दू पुरुष अपनी प्रथम पत्नी के जीवन-काल में किसी दूसरी स्त्री से विवाह-संविदा करता है तो वह संविदा धारा 5, 11 तथा 17 के अन्तर्गत शून्य होगी, और वह स्त्री यदि किसी अन्य पुरुष के साथ अपना दूसरा विवाह कर लेती है तो वह इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय नहीं होगी।7 मुस्लिम विधि के अन्तर्गत कोई भी विवाहित स्त्री अपने पति के जीवन-काल में जबकि उसका विवाह-विच्छेद नहीं हुआ है, दूसरा विवाह नहीं कर सकता है क्योंकि मुस्लिम विधि के अन्तर्गत बहुपति (Polyandry) प्रथा को मान्यता नहीं दी गयी है।

(4) दूसरा विवाह करना- यह धारा तभी लागू होती है जबकि अभियुक्त का एक बार विवाह हो चुका था और दूसरा उस समय भी अस्तित्ववान था जिस समय उसने दूसरा विवाह किया था। इस धारा में प्रयुक्त विवाह करता है’ शब्द का अर्थ है, कि वह विधि द्वारा मान्यताप्राप्त किसी रीति से विवाह करता है। वस्तुत: यह धारा विधिपूर्ण विवाह की ओर संकेत नहीं करती फिर भी यदि द्वितीय विवाह का स्वरूप विधि द्वारा मान्यता प्राप्त है तो वह इस धारा के प्रावधान के लिये उपयुक्त होगा।8 धारा 494 में प्रयुक्त ‘विवाह’ शब्द का अर्थ है, विवाह के किसी प्रकार द्वारा वैवाहिक क्रिया को सम्पन्न करना चाहे वह विधि और विधिपूर्ण हो चाहे अवैध व शून्य हो । उच्चतम न्यायालय ने प्रेक्षित किया है कि इन शब्दों का अर्थ है ‘जो कोई विधिपूर्ण रीति से विवाह करता है। यदि पक्षकारों पर प्रवर्तित वैयक्तिक विधि के अन्तर्गत विवाह विधिपूर्ण नहीं है तो इसकी वैधता को लेकर कोई प्रश्न उठ ही नहीं सकता। ऐसा विवाह जो अवैध है, विधि के दृष्टिकोण में विवाह है नहीं।10 केवलराम11 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि द्वितीय विवाह के मामले में यह सिद्ध करना आवश्यक है कि उन सभी वैवाहिक क्रियाओं को सम्पादित किया गया था जो किसी भी विधिपूर्ण विवाह के लिये आवश्यक हैं। अभियुक्त द्वारा दुसरे विवाह की स्वीकारोक्ति मात्र

5. सिराज मियाँ बनाम ए० मजीद, (1953) क्रि० लॉ ज० 1504.

6. उस्मान बनाम बुद्ध, ए० आई० आर० 1942 सिन्ध, 92.

7. श्रीमती पडी बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, ए० आई० आर० 1963 हि० प्रदेश 16.

मुसम्मात कल्लन बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1938 सिन्ध 127.

9. इम्परर बनाम मुसम्मात सोनी, ए० आई० आर० 1936 नाग० 13.

10. भाऊराव, (1965) 67 बाम्बे एल० आर० 423 सु० को०.

11. केवल राम बनाम हिमांचल प्रदेश प्रशासन, ए० आई० आर० 1966 सु० को० 614.

ही इस अपराध के गठन हेतु पर्याप्त नहीं है। यदि दूसरा विवाह विधि द्वारा मान्यता प्राप्त रीति से नहीं रचाया गया था तो यह केवल एक व्यभिचारपूर्ण सम्बन्ध होगा।12।

यह तथ्य कि पति ने पत्नी को मुक्ति-विलेख प्रदान कर दिया था, और विलेख-पत्र, उस समुदाय की प्रथा के अनुसार जिससे पति सम्बन्धित था, विवाह सम्बन्ध विच्छेद कर देता है, इस धारा के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद के रूप में प्रभावी नहीं होगा।13 प्रथम पति के जीवन-काल में विवाह को शून्य घोषित कराये बिना दूसरा विवाह रचना इस धारा के अन्तर्गत अपराध है। दूसरा विवाह भले ही पक्षकारों की प्रथा द्वारा मान्यता प्राप्त हो, लोकनीति के विरुद्ध होगा और न्यायालयों द्वारा ऐसे विवाह को मान्यता नहीं प्रदान की जायेगी।14

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 494 के अन्तर्गत अपराध गठित करने के लिये आपराधिक मन:स्थिति अर्थात् दूषित ज्ञान का एक आवश्यक अवयव है। जब कोई अभियुक्त इस विश्वास में कार्य करते हुये कि उसके साथ उसकी पत्नी के बीच हुये तलाक के समझौते के अन्तर्गत उनका वैवाहिक सम्बन्ध समाप्त हो चुका है, दूसरा विवाह करता है तो उसे इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान नहीं की जा सकती।15

हिन्दुत्व से संपरिवर्तन- हिन्दुत्व का परित्याग करने वाला व्यक्ति अपनी सिविल बाध्यताओं से उन्मुक्त नहीं होता। वैवाहिक सम्बन्ध समाप्त नहीं होता। हिन्दू विधि के अन्तर्गत बहु विवाह को मान्यता नहीं प्रदान की गयी है। अत: यदि कोई हिन्दू स्त्री अपने पति के जीवन-काल में किसी मुस्लिम या ईसाई पुरुष के साथ मुस्लिम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लेने के पश्चात् विवाह कर लेती है तो भी वह द्विविवाह की अपराधिनी होगी।16

इस्लाम धर्म से परिवर्तन-यदि कोई इस्लाम धर्म का परित्याग करता है तो इसका वैवाहिक सम्बन्ध समाप्त नहीं हो जाता है और ऐसे व्यक्ति की पत्नी यदि दूसरा विवाह रचा लेती है तो वह द्विविवाह की अपराधिनी नहीं होती। परन्तु अब मुसलमान विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1939 की धारा 4 उपबन्धित करती है कि इस्लाम धर्म के परित्याग से स्वतः वैवाहिक सम्बन्ध समाप्त नहीं होता। जब कोई व्यक्ति इस्लाम धर्म त्याग कर कोई दूसरा धर्म ग्रहण करता है तो उसकी पत्नी का यह दायित्व होता है कि वह न्यायालय से विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त करे।।

ईसाई धर्म से परिवर्तन– यदि कोई हिन्दू ईसाई धर्म ग्रहण करता है और रोमन कैथोलिक रीति से किसी ईसाई महिला से विवाह कर लेता है और बाद में वह हिन्दू धर्म ग्रहण कर किसी हिन्दू लड़की से अपनी ईसाई पत्नी के जीवन-काल में ही दूसरा विवाह कर लेता है तो वह द्विविवाह का अपराधी नहीं होगा।17 यदि कोई भारतीय ईसाई जिसका अधिवास भारत में है, किसी भारतीय ईसाई महिला, जिसका अधिवास भी भारत में है, से विवाह करता है और बाद में इस्लाम धर्म स्वीकार कर मुस्लिम लड़की से विवाह कर लेता है तो उसका द्वितीय विवाह वैध होगा।18 किन्तु यदि कोई ईसाई महिला, ईसाई रीति द्वारा ईसाई पुरुष से विवाहित थी, अपने पति के जीवन काल में इस्लाम धर्म स्वीकार कर किसी मुस्लिम पुरुष के साथ विवाह कर लेती है तो वह द्विविवाह की अपराधिनी होगी।19

पारसी धर्म से परिवर्तन-यदि विवाह के दोनों पक्षकारों में से किसी भी जिनका विवाह पारसी रीति के अनसार हुआ था, पारसी धर्म का परित्याग कर इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेता है तो उसका वैवाहिक सम्बन्ध समाप्त नहीं होता।20

12. आई० एल० आर० (1963) कटक 464.

13. गुअनासौन्दरी बनाम नल्लाक्षनवी, ए० आई० आर० 1945 मद्रास 516.

14. नारायण बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1932 मद्रास 561.

15. संकरन सुकुमारन बनाम कृष्णन सरस्वती एवं अन्य, 1984 क्रि० लॉ ज० 317 केरल

16. नन्दसा रोथर बनाम फातिमा बाई, 26 एम० एल० जे० 260.

17 ए० मरथम्मा बनाम ए० मुन्नुस्वामी,ए० आई० आर० 1951 मद्रास 888.

18. जे० जे० सी० दत्त बनाम ए० सी० सेन, ए० आई० आर० 1939 कल० 417.

19. मुसम्मात रूसी (1918) पी० आर० नं० 5 सन् 1919.

20. आर० खानम बनाम बामनजी कें०, 49 बाम्बे एल० आर० 864.

अपवाद-इस धारा के अन्तर्गत लगाये गये आरोप से उन्मुक्ति पाने के लिये अभियन्न –

बचाव प्रस्तुत कर सकता है

(1) यह कि उसका प्रथम विवाह शून्य या भले ही तलाक अधिनियम की धारा 18 के अन्तर्गत उसने इस तथ्य की घोषणा न करा लिया हो 21

(2) यह कि विवाह का दूसरा पक्षकार सात साल या इससे अधिक की अवधि से अनुपस्थित था या थी। दूसरा विवह सात साल की अवधि बीत जाने के पश्चात् रचाया जाता है तो अभियक्त इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी नहीं होगा बशर्ते उसने युक्तियुक्त विश्वास से ऐसा किया था 22

(3) यदि यह प्रमाणित हो जाता है कि अभियुक्त और उसकी पत्नी पिछले सात वर्षों से अलग-अलग रह रहे थे तो अभियुक्त यह सिद्ध करने के दायित्वाधीन होगा कि पृथक्करण की अवधि के दौरान वह अपनी पत्नी के विषय में जानता था। ऐसे लक्ष्य के अभाव में अभियुक्त का दूसरा विवाह वैध माना जायेगा।23

(4) यह कि द्वितीय विवाह के समय अभियुक्त ने विवाह के दूसरे पक्षकार को इस तथ्य से अवगत | करा दिया था।24

यदि अभियुक्त इन तथ्यों को प्रमाणित करने में सफल हो जाता है तो वह इस धारा के अन्तर्गत वर्णित अपराध का दोषी नहीं होगा।

दुष्प्रेरण- इस धारा के अन्तर्गत दुष्प्रेरण हेतु यह सिद्ध करना आवश्यक है कि जिस व्यक्ति पर दुष्प्रेरण का आरोप लगाया गया वह जानता था कि जिस स्त्री से विवाह करा रहा है, किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है। यद्यपि वह लड़की अज्ञान वश यह अपराध कारित करने के लिये सक्षम रही थी 25 जो पुजारी दूसरे विवाह के समय उपस्थित रहता है इस धारा तथा धारा 109 के अन्तर्गत दुष्प्रेरक माना जायेगा और दुष्प्रेरण के लिये दण्डनीय होगा।26 किन्तु किसी अवैध विवाह के अवसर पर उपस्थित होने की सम्मति, या ऐसी सम्मति के अनुसरण में उपस्थिति, विवाह के लिये मकान में आवास की सुविधा प्रदान करना इत्यादि ऐसे कृत्य हैं जिनसे दुष्प्रेरण का निष्कर्ष निकाला जा सकता है किन्तु वे कार्य सदैव दुष्प्रेरण के तुल्य नहीं होते।27 दुष्प्रेरण के आरोप में सफलता पाने के लिये यह सिद्ध करना आवश्यक है कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध द्विविवाह का आरोप लगाया गया है, वह पहले से ही पूर्ण रूप से विवाहित था जिस व्यक्ति ने दूसरे विवाह के लिये उसे उत्प्रेरित किया था वह जानता था कि अभियुक्त पूर्णतया विवाहित था तथा उसकी पत्नी जीवित थी 28 यह भी सिद्ध करना आवश्यक है कि दुष्प्रेरक अभियुक्त ने साशय किसी स्त्री को दुष्प्रेरित किया था।29 ।

इन्दु भाग्यानटेकर बनाम भाग्या पांडुरंग नटेकर30 के मामले में अपीलाण्ट इन्दु नटेकर, भाग्या पांडुरंग नटेकर की विधिवत् विवाहित पत्नी थी। उसने एक परिवाद-पत्र दाखिल किया कि उसके पति ने मंजुला नारायण कदम नामक महिला से दिनांक 15-11-1978 को दूसरा विवाह कर लिया है। उसने अपनी शिकायत का आधार रजिस्ट्रार द्वारा निर्गत किये गये उस वैवाहिक प्रमाण-पत्र को बनाया जिसमें अभियुक्त नं० 2 गनपत शर्मा नटेकर जो उसके पति का चचेरा भाई था, शादी का गवाह था। विवाह जिस पुरोहित द्वारा सम्पन्न कराया गया था उसने भी विवाह के पंजीकरण सम्बन्धी प्रार्थना-पत्र पर हस्ताक्षर किया था।

21. गुअनासौन्दरी बनाम नल्लाक्षनवी, ए० आई० आर० 1945 मद्रास 516.

22. टाल्सन, (1889) 23 क्यू० बी० डी० 168.

23. कुर्जर्वेन, (1865) एल० आर० 1, सी० सी० आर० 1.

24. ईनाई बीबी, (1865) 3 डब्ल्यू० आर० क्रि० 25.

25. नन्दलाल सिंह, (1902) 6 सी० डब्ल्यू० एन० 343.

26. उमी, (1882) 6 बाम्बे 126.

27. पूर्वोक्त सन्दर्भ.

28. शफी उल्ला बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1934 इला० 589.

29. बी० बी० सरकार बनाम इम्परर, ए० आई० आर० (1940) कल० 477.

30. 1992 क्रि० लाँ ज० 601 (बम्बई).

यह निर्णय दिया गया कि ऐसी दशा में यह उपधारणा होगी कि विधिमान्य विवाह को संरचित करने वाली आवश्यक प्ररूप तथा रश्में पूरी की गयी हैं और तत्सम्बन्धी अभिलेख तथा परिवादकर्ता का प्रतिपरीक्षण के अभाव में अविवादित साक्ष्य पर अभिनिर्धारण करने हेतु यथेष्ट था कि आरोप सिद्ध हो गया है। यह कहना उचित नहीं है कि द्विविवाह के प्रत्येक मामले में जब तक रश्मों की अदायगी के साथ दूसरा विवाह होना सिद्ध नहीं कर दिया जाता तब तक धारा 494 के अन्तर्गत दोषसिद्धि असम्भव है। यदि आरोप को सिद्ध करने वाले अन्य विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध हैं तो अपराधी को दोषी ठहराया जा सकता है।

पी० सत्यनारायण बनाम पी० मल्लैया31 के वाद में रेस्पाण्डेण्ट अपीलाण्ट की प्रथम विधिवत् । विवाहिता पत्नी थी जिसके विरुद्ध आरोप था कि दूसरा विवाह कर लिया है अतएव अपीलाण्ट को भा० द०। संहिता की धारा 494 के अधीन द्विविवाह के अपराध हेतु आरोपित किया गया। अभियुक्त/अपीलाण्ट ने यह तर्क दिया कि उसने अपनी प्रथम पत्नी द्वारा परित्याग कर चले जाने के दस वर्ष बाद दूसरा विवाह किया था। यह अभिनित किया गया कि अपराध के सम्बन्ध में ऐसे तर्क का अधिक से अधिक यह अर्थ लगाया जाना चाहिये कि पति ने एक पत्नी रख ली है परन्तु उस स्वीकारोक्ति का आवश्यक रूप से यह अर्थ नहीं होता कि उसकी दूसरी पत्नी का उसके साथ हिन्दू विवाह पद्धति के अनुसार विधिवत् विवाह आवश्यक अनुष्ठानों के बाद सम्पन्न किया गया था। इस प्रकार के तर्क जिसे उसे सम्भवतः प्रस्तुत करने की भी आवश्यकता नहीं थी और जिसे न्यायालय द्वारा अस्वीकार या उपेक्षित किया जा सकता था, के कारण अभियोजन पक्ष को अपने मामले को सिद्ध करने के दायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता है। यह सिद्ध करने का भार अभियोजन पक्ष पर था कि प्रश्नगत विवाह विधिपूर्ण रीति से किया था और जिसके परिणामस्वरुप उसके विरुद्ध दाण्डिक कार्रवाई की जा सकती है। अतएव वह द्विविवाह का दोषी नहीं था।

495. वही अपराध पूर्ववर्ती विवाह को उस व्यक्ति से छिपा कर जिसके साथ पश्चात्वर्ती विवाह किया जाता है- जो कोई पूर्ववर्ती अन्तिम धारा में परिभाषित अपराध अपने पूर्व विवाह की बात उस व्यक्ति से छिपा कर करेगा, कि जिससे पश्चातुवर्ती विवाह किया जाए, यह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा। |

496. विधिपूर्ण विवाह के बिना कपटपूर्ण विवाह कर्म पूरा कर लेना-जो कोई बेईमानी से या कपटपूर्वक आशय से विवाहित होने का कर्म यह जानते हुए पूरा करेगा कि तद्द्वारा वह विधिपूर्वक विवाहित नहीं हुआ है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो। सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

टिप्पणी

यह धारा कपटपूर्ण अथवा कृत्रिम (Mock) विवाहों को दण्डनीय बनाती है।

अवयव-इस धारा के निम्नलिखित दो तत्व हैं

(1) बेईमानी अथवा कपटपूर्ण आशय से विवाहित होने का कर्म पूरा करना।

(2) इस कर्म को यह जानते हुये पूरा करना कि इसके द्वारा वह विधिपूर्वक विवाहित नहीं हुआ है।

यह धारा उन मामलों में लागू होती है जिसमें विवाह प्रक्रिया तो पूर्ण होती है किन्तु जो किसी भी हालत में वैध विवाह की संरचना नहीं करती है तथा जिसमें एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को यह विश्वास दिलाया जाता है कि इस प्रक्रिया द्वारा वैध विवाह गठित होता है।

धारा 493 तथा 496 में अन्तर-यद्यपि दोनों धारायें एक जैसी हैं फिर भी दोनों में अन्तर है। धारा 493 के अन्तर्गत परुष द्वारा महिला को प्रवंचित किया जाना और इस प्रवंचना के परिणामस्वरूप उसके साथ सहवास या मैथुन होना आवश्यक है, जबकि धारा 496 के अन्तर्गत किसी प्रवंचना, सहवास या मैथन की

31. 1997 क्रि० लॉ ज० 211 (एस० सी०).

आवश्यकता नहीं होती। धारा 496 को लागू होने के लिये यह आवश्यक है कि विवाह से किसी पक्षकार ने बेईमानी अथवा कपटपूर्ण आशय से विवाह कर्म का दुरुपयोग किया हो। संक्षेप में धारा 493 में, अपराध केवल पुरुष द्वारा किया जाता है तथा धारा 496 में अपराध पुरुष या महिला किसी के भी द्वारा किया जा सकता है।

497. जारकर्म- जो कोई ऐसे व्यक्ति के साथ, जो कि किसी अन्य पुरुष की पत्नी है, और जिसका। किसी अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष की सम्मति या मौनानुकूलता के बिना ऐसा मैथुन करेगा, जो बलात्संग के अपराध की कोटि में नहीं आता, वह जारकर्म के अपराध का दोषी होगा, और दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। ऐसे मामले में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं होगी।

टिप्पणी 

यदि कोई पुरुष किसी विवाहित स्त्री के साथ उसके पति की सम्मति या मौनानुकूलता के बिना जारकर्म करता है तो वह इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय होगा। इस अपराध की प्रमुख विशेषता यह है कि इसके अन्तर्गत केवल पुरुष अपराधी को ही दण्डनीय बनाया गया है।32 यह अपराध एक तीसरे व्यक्ति द्वारा किसी पति के विरुद्ध उसकी पत्नी के सम्बन्ध में कारित किया जाता है। यदि किसी विवाहित पुरुष तथा अविवाहित या विधवा स्त्री के बीच मैथुन होता है या किसी विवाहित स्त्री के साथ उसके पति की सम्मति से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित होता है तो इस धारा में वर्णित अपराध की संरचना नहीं होती। इस धारा में वर्णित अपराध के लिये यह अपेक्षित नहीं है कि अभियुक्त यह जानता हो कि वह स्त्री किस व्यक्ति की पत्नी है, किन्तु उसे यह ज्ञात होना चाहिये कि वह एक विवाहित स्त्री है।33

अवयव- इस अपराध के निम्नलिखित अवयव हैं|

1. किसी व्यक्ति द्वारा किसी महिला के साथ मैथुन करना जो किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है या

जिसके विषय में वह जानता है या विश्वास करने का कारण है कि वह किसी अन्य व्यक्ति की

पत्नी है।

2. ऐसा मैथुन उस महिला के पति की सम्मति या मौनानुकूलता के बिना करना। | 3. ऐसा मैथुन बलात्संग की कोटि में न आता हो।।

महिला विवाहित हो-चूँकि विवाह जारकर्म के अपराध का एक आवश्यक अवयव है, अतः वैवाहिक तथ्य को पूर्णरूप से सिद्ध करना आवश्यक है।34 यह सिद्ध करना आवश्यक है कि विवाह एक घटना के रूप में अस्तित्व में आया था। केवल यह प्रमाणित करना पर्याप्त नहीं है कि पति तथा पत्नी दोनों साथ-साथ रह रहे हैं। पति-पत्नी के बीच वैवाहिक सम्बन्ध कायम हुआ था, इस तथ्य को प्रमाणित करने के | लिये साक्षियों की सहायता ली जानी चाहिये 35 इस हेतु केवल पति और पत्नी द्वारा दिया गया साक्ष्य पर्याप्त नहीं होगा।36 रंगून उच्च न्यायालय के अनुसार यदि कोई पुरुष और स्त्री एक साथ पति-पत्नी के रूप में लम्बे अरसे से रह रहे थे तो उनके वैवाहिक सम्बन्ध को स्वीकार किया जा सकता है किन्तु इस उपधारणा को खण्डित किया जा सकता है 37

मौनानुकूलता-मौनानुकूलता का अर्थ है, मैथुन क्रिया के लिये साशय सम्मति देना या ऐसा आपराधिक संस्वीकृति देना जिससे इस अपराध का कारित होना सम्भाव्य हो 38 यह मस्तिष्क का एक कृत्य

32. जेड० ए० अजीज बनाम बाम्बे राज्य, ए० आई० आर० 1954 सु० को० 321.

33. मधुव चन्दर गिरि, (1873) 21 डब्ल्यू ० आर० (क्रि०) 13.

34. दलीप सिंह बनाम रेक्स, ए० आई० आर० 1949 इला० 237.

35. अजीज खान बनाम इकराम हुसैन, ए० आई० आर० 1937 पटना 219.

36. उपरोक्त सन्दर्भ. ।

37. ए० आई० आर० 1947 रंगून 261. |

38. स्टाउडस जुडिशियल डिक्शनरी, जिल्द 1, पृ० 580.

है। इसमें ज्ञान तथा संस्वीकृति दोनों ही सन्निहित होते हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अनुसार मौनानुकुलता एक आलंकारिक प्रस्तुतिकरण है जिसका अर्थ है, किसी वर्तमान कृत्य या आचरण के प्रति स्वेच्छया आँख मूंद लेना या आँखों के सामने बिना किसी विरोध के हो रहे कार्य को स्वीकार कर लेना या उसमें किसी प्रकार का विघ्न या बाधा उत्पन्न न करना।39 जहाँ कि पति ने पत्नी का परित्याग कर दिया है। वहाँ न्यायालय मौनानुकूलता का निष्कर्ष नहीं निकाल सकता।40 एक मामले में पति, पत्नी द्वारा घर के बाहर निकाल दिया गया था और अभियुक्त उसके साथ रह रहा था। पति इस परिस्थिति से अच्छी तरह परिचित था। किन्तु सहवास प्रारम्भ होने के 18 महीने बाद उसने मुकदमा चलाया। पति इस विलम्ब के लिये कोई उपयुक्त आधार प्रस्तुत न कर सका। अत: उसके आचरण को मौनानुकूलता के तुल्य माना गया ।41

पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं है-धारा 497 के अन्तर्गत पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं है क्योंकि संहिता के लेखकों का यह विचार था कि भारतीय समाज एक अलग प्रकार का समाज है जो किसी व्यक्ति को, पत्नी को अस्तित्व के लिये दण्डित करने से पहले कुछ सोचने पर मजबूर करता है 42 किन्तु संहिता के लेखकों द्वारा दिये गये तर्क की बहुत अधिक आलोचना की गयी है। जहां स्त्री स्वयं जारकर्म की दुष्प्रेरक है उसे पुरुष की ही भाँति दण्डित किया जाना चाहिये।

श्रीमी सौमिथी विष्णु बनाम भारत संघ एवं अन्य43 के वाद में यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि धारा 497 संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 15 का उल्लंघन करती है क्योंकि यह पुरुष तथा स्त्री में युक्तिहीन वर्गीकरण करती है। दोनों भिन्नता इस प्रकार हैं-(1) धारा 497 जारकर्म करने वाले को अभियोजित करने का अधिकार पति को प्रदान करती है परन्तु यह स्त्री को अधिकार नहीं देती है कि वह उस औरत को अभियोजित कर सके जिसके साथ पति ने जारकर्म किया है-(2) धारा 497 स्त्री को यह अधिकार नहीं देती। है कि वह पति को अभियोजित कर सके जिसने एक अन्य औरत के साथ जारकर्म किया है; तथा (3) धारा 497 के अन्तर्गत वे मामले नहीं आते हैं जिनमें पति एक अविवाहिता स्त्री के साथ लैंगिक सम्बन्ध स्थापित करता है, जिसका परिणाम यह है कि इस विधि के अन्तर्गत पति अविवाहिता औरत के साथ विवाहोत्तर सम्बन्ध स्थापित करने के लिये पूर्ण स्वतन्त्र है। किन्तु न्यायालय ने इन तर्को को अस्वीकार कर दिया और यह मत व्यक्त किया कि, इस धारा का इस रूप में सृजन कर विधानांग ने संविधान के किसी अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं किया है। साधारणतया यह माना जाता है कि पुरुष इस अपराध के लिये प्रेरित करता है न कि औरत । न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि यह सम्भव है कि विगत वर्षों में इस स्थिति में कुछ परिवर्तन हुआ हो परन्तु यह विधानांग का दायित्व है कि वह इस परिवर्तन को ध्यान में रखे और तद्नुसार इस धारा को संशोधित करे।

इस वाद में यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया था कि इस धारा में स्त्री को सुने जाने के सम्बन्ध में कोई उपबन्ध नहीं है। अतः यह संविधान के अनुच्छेद 21 अर्थात् व्यक्तिगत स्वाधीनता की स्वतन्त्रता का उल्लंघन करती है। किन्तु इस तर्क को भी न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया और कहा कि अनुच्छेद 21 का उल्लंघन इस धारा से नहीं होता है क्योंकि यद्यपि इस धारा में विवाहित स्त्री जिसके साथ जारकर्म करने का आरोप अभियक्त पर लगाया जाता है,को सुने जाने के सम्बन्ध में कोई उपबन्ध नहीं है किन्तु यदि वह विचारण न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत करती है कि उसे सुने जाने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिये, तो उसे सने जाने का अवसर न्यायालय अवश्य प्रदान करेगा। न तो मौलिक आपराधिक विधि और न ही आपराधिक प्रक्रिया विधि एक पक्षकार को जिसके न्यायालय के निर्णय से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होने की सम्भावना है, को सुनवाई का अवसर प्रदान करने से न्यायालय को प्रतिबन्धित करती है।

जारकर्म क्या निरन्तर चालू रहने वाला अपराध है?-सम्भोग का प्रत्येक कृत्य जारकर्म के तुल्य है और यदि कोई व्यक्ति किसी स्त्री के साथ अनेक बार सम्भोग करता है तो यह नहीं कहा जा सकता है कि

39. मुनीर, (1925) 24 ए० एल० जे० आर० 155.

40. पोथी गोल्लारी बनाम धनी मण्डल, ए० आई० आर० 1963 ओड़ीसा 60.

41. पोथी गोल्लारी बनाम धनी मण्डल, (1963) 1 क्रि० लॉ ज० 312.

42. मोती, आर०पी० 175. ।

43, 1985 क्रि० लॉ ज० 1302 सु० को०.

अपराधों  निरन्तर हो रहा है 44 नागपुर उच्च न्यायालय के अनुसार यह सर्वथा अनुचित है कि सम्भोग के – कत्य के लिये अलग-अलग अभियोजन चलाया जाये 45 क्षतिग्रस्त व्यक्ति द्वारा शिकायत आवश्यक है। धारा के अन्तर्गत न्यायालय अपराध पर तभी विचार करेगा जब स्त्री के पति द्वारा न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत किया गया हो।

पति की अनुपस्थिति में परिवाद उस व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है जिसे उस स्त्री का संरक्षण यौंपा गया है और ऐसे व्यक्ति के लिये न्यायालय की पूर्वानुमति आवश्यक होगी। यदि पति जड़ या उन्मत्त (पागल) है या बीमारी के कारण परिवाद प्रस्तुत करने की असमर्थ है तो उसके बदले कोई अन्य व्यक्ति परिवाद प्रस्तुत कर सकता है। परिवाद दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 199 के अन्तर्गत यो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 198 (2) के अन्तर्गत प्रस्तुत की जाती है।

जहाँ इस धारा के अन्तर्गत जारकर्म का आरोप लगाया जाता है और वह आरोप स्थान को लेकर सुनिश्चित है किन्तु उन विशिष्ट तिथियों को, जिन पर वास्तविक सम्भोग हुआ था, प्रमाणित करना सम्भव नहीं है तो कलकत्ता उच्च न्यायालय के अनुसार उस अवधि को सुस्पष्ट कर देना पर्याप्त होगा जिसके दरम्यान अपराध कारित हुआ तथा विशिष्ट तिथि के सम्बन्ध में लोप किसी प्रकार पति के आरोप को प्रभावित नहीं करेगा +6

दण्ड-जिस समय अपराध कारित हुआ था उस समय विधि द्वारा निर्धारित दण्ड की सीमा की उपेक्षा नहीं की जा सकती। दण्ड की अवधि का निर्धारण करते समय इसको ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।47

जारकर्म और बलात्संग में अन्तर– जारकर्म और बलात्संग में कतिपय महत्वपूर्ण विभेद निम्न हैं

(1) जारकर्म भा० द० संहिता की धारा 497 के अधीन अपराध है। यह अपराध विवाह से सम्बन्धित

बलात्संग का अपराध भा० द० संहिता की धारा 375 एवं 376 में परिभाषित किया गया है। यह मानव शरीर सम्बन्धी अपराधों के अध्याय में शामिल किया गया है और यह उस महिला की शरीर के विरुद्ध अपराध है जो बलात्संग का शिकार होती है। जारकर्म के अपराध में महिला की सहमति नगण्य है क्योंकि चूंकि महिला का विवाह हो गया रहा है अतएव उस महिला का पति वास्तविक व्यथित पक्षकार होता है। वास्तव में

2. जारकर्म के अपराध में महिला सदैव लैंगिक सम्भोग हेतु इच्छुक और सहमति देने वाली पक्षकार होती है।

परन्तु बलात्संग का अपराध किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध और उसकी सहमति के बिना कारित किया जाता है अथवा यह स्त्री की सहमति से भी हो सकता है बशर्ते कि लड़की की

उम्र 16 वर्ष से कम हो।

(3) जारकर्म पति के विरुद्ध अपराध है। बलात्संग स्वयमेव सम्बन्धित महिला के विरुद्ध अपराध है।

(4) जारकर्म का अपराध तभी कारित हो सकता है जबकि महिला विवाहित हो और उस दशा में

जब वह अविवाहित हो तो जारकर्म का अपराध नहीं बनता। यदि महिला का पति किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध सम्बन्ध रखने हेतु अपनी सहमति दे देता है तो जारकर्म का अपराध गठित नहीं होता है। बलात्संग किसी ऐसी महिला के साथ कारित किया जा सकता है जो चाहे विवाहित हो अथवा अविवाहित हो। यदि महिला विवाहित है और उसके साथ लैंगिक सम्भोग बिना उसकी सहमति के किया जाता है तो ऐसी दशा में बलात्संग और जारकर्म दोनों ही अपराध कारित माने जायेंगे।

44. इन रे एन० एस० नवले, ए० आई० आर० 1928 बाम्बे 530.

45. रेवा, 1941 एन० एल० टी० 686.

46. भोलानाथ मित्तर, (1924) 51 कल० 448.

47. के० के० नारन बनाम के० डी० नारन, ए० आई० आर० (1951) कच्छ 17.

498. विवाहिता स्त्री को आपराधिक आशय से फुसला कर ले जाना, या ले आना या निरुद्ध रखना- जो कोई किसी स्त्री को, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है, और जिसका अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है, या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष के पास से, या किसी ऐसे व्यक्ति के पास से, जो उस पुरुष की ओर से उसकी देखरेख करता है, इस आशय से ले जाएगा, या फुसलाकर ले जाएगा कि वह किसी व्यक्ति के साथ अयुक्त सम्भोग करे या इस आशय से ऐसी किसी स्त्री को छिपाएगा या निरुद्ध करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।

टिप्पणी

यह धारा ऐसे व्यक्ति के लिये दण्ड का प्रावधान प्रस्तुत करती है जो किसी आपराधिक आशय से किसी विवाहिता स्त्री को फुसलाता है या ले जाता है या निरुद्ध करता है। इस धारा का सार यह है कि पति के अभिरक्षण और उचित नियन्त्रण में पत्नी को वंचित कर दिया जाता है और वंचित इस उद्देश्य से किया जाता है। ताकि पत्नी के साथ अयुक्त सम्भोग किया जा सके।48 अत: यह धारा पति को सुरक्षा प्रदान करती है। क्योंकि इस प्रकृति के अपराध के लिये केवल पति ही अभियोजन दायर कर सकता है। कोई विवाहिता स्त्री ही इस अपराध की विषयवस्तु बन सकती है।

यह धारा, धारा 361 तथा 366 से मिलती-जुलती है किन्तु यह तभी प्रवर्तित होती है जब वे दोनों धारायें विफल हो जाती हैं।

अवयव-इस अपराध के निम्नलिखित अवयव हैं

(1) प्रश्नगत स्त्री किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी होती है;

(2) वह अपने पति या पति के बदले किसी अन्य व्यक्ति की अभिरक्षा में थी;

(3) अभियुक्त उसे उसके पति की अभिरक्षा में फुसला या बहका कर ले गया या उसे निरुद्ध किया;

(4) अभियुक्त को यह ज्ञात था या ऐसा विश्वास करने का कारण था कि वह स्त्री किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी थी;

(5) अभियुक्त ने ऐसी स्त्री को इस आशय से निरुद्ध किया, फुसलाया या छिपाया कि वह किसी व्यक्ति के साथ अयुक्त सम्भोग करेगी।

(1) किसी स्त्री को ले जाना, फुसलाना या निरुद्ध करना-इस धारा के अन्तर्गत ‘ले जाने’, शब्द का तात्पर्य बलपूर्वक ले जाने से नहीं हैं। इसके अन्तर्गत अभियुक्त द्वारा शारीरिक या नैतिक प्रभाव का प्रयोग निहित है। प्रयुक्त प्रभाव ऐसा हो जिससे वह स्त्री अपने पति का साथ छोड़कर चली जाये 49 पति या वह व्यक्ति, जिसकी अभिरक्षा में वह स्त्री थी, कि सम्मति से उसे आना इस धारा के अन्तर्गत अपराध संरचित करने हेतु पर्याप्त नहीं है।50 यह तथ्य कि वह स्त्री अपनी इच्छा से अभियुक्त के साथ चली गयी उसकी अपराधिता को कम नहीं करेगा 51 ।

किसी स्त्री को उस समय फुसलाया हुआ कहा जाता है जब किसी व्यक्ति ने उसे इस आशय से प्रेरित किया हो कि वह अपने पति का घर छोड़ दे। अत: फुसलाने के कृत्य के अन्तर्गत सक्रिय उत्प्रेरण या नैतिक बल का प्रयोग सम्मिलित है।

इस अपराध के गठन हेतु यह आवश्यक नहीं है कि स्त्री को ले जाया गया हो या फुसलाया गया हो। यदि अभियुक्त ने इस आशय से कि वह स्त्री किसी अन्य पुरुष के साथ अयुक्त सम्भोग करे, उसे छिपाया या निरुद्ध किया तो वह इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय होगा 52

48. आलमगीर, (1959) पटना 334.

49. महादेवराम, (1942) 45 बाम्बे एल० आर० 295.

50. अब्दुल रहमान, (1935) 39 सी० डब्ल्यू० एन० 1055.

51. इम्परर बनाम जान मुहम्मद, 4 बाम्बे एल० आर० 435.

52, (1962) 2 क्रि० लॉ ज० 159.

जहाँ कोई स्त्री स्वेच्छया अभियुक्त के साथ चली जाती है तो यह तथ्य अभियुक्त की अपराधिता को किसी भी प्रकार कम नहीं करेगा यदि इस अपराध के अन्य अवयव सिद्ध हो जाते हैं 53 ।

(2) किसी व्यक्ति को अभिरक्षा से ले जानारामनारायन कपूर54 के बाद में बम्बई उच्च न्यायालय ने यह प्रेक्षित किया था कि जहाँ किसी ऐसी विवाहिता स्त्री का भाई जो अभियुक्त के साथ गायब हो गयी थी, अभियुक्त के विरुद्ध इस धारा में वर्णित अपराध के लिये परिवाद दर्ज करता है तो न्यायालय ऐसे मामले में कोई निर्णय देने के लिये बाध्य नहीं होगा क्योंकि परिवादकर्ता ने अपनी रिपोर्ट में यह नहीं स्पष्ट किया था कि उस स्त्री के पति ने उसकी अभिरक्षा उसके भाई को सौंप दी थी। अत: यह आवश्यक है कि, ले। जाना या फुसलाना पति की अभिरक्षा से होना चाहिये या उस व्यक्ति की अभिरक्षा से जिसे उसका दायित्व सौंपा गया था।

( 3 ) स्त्री विवाहिता हो इस अपराध के लिये यह आवश्यक है कि फुसलायी गयी स्त्री विवाहित हो। किसी ऐसी स्त्री को फुसलाना जिसका विवाह शून्य है, इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय नहीं है। यदि पति । अपनी पत्नी का परित्याग कर देता है और उसे एक स्वतन्त्र व्यक्ति के रूप में स्वीकार कर लेता है तो पति इस धारा के अन्तर्गत परिवाद दायर करने के लिये सक्षम नहीं होगा भले ही उस स्त्री के पिता के घर से जहाँ वहे। रह रही थी, कोई व्यक्ति उसे फुसला ले गया हो। स्त्री को फुसलाना या ले जाना इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत कोई अपराध नहीं है।55

(4) अभियुक्त यह जानता हो कि वह एक विवाहिता स्त्री थी-इस धारा की संरचना हेतु यह आवश्यक है कि अभियुक्त को यह ज्ञात हो कि वह स्त्री किसी अन्य पुरुष की पत्नी है। इस धारा में प्रयुक्त | ‘ऐसी स्त्री’ शब्द का आशय उस स्त्री से नहीं है जो इस प्रकार फुसलाकर ले जायी गयी है अपितु उस स्त्री से है जिसका अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है या विश्वास करने का कारण रखता है।56

(5) आशय-इस धारा में वर्णित अपराध के गठन हेतु यह आवश्यक है कि अभियुक्त ने स्त्री को निरुद्ध किया हो और उसे निरुद्ध इस आशय से किया हो कि वह किसी पुरुष के साथ अयुक्त सम्भोग करे। प्रोत्साहन, प्रलोभन या चाटुकारिता निश्चयतः इस आशय से की जानी चाहिये कि वह स्त्री किसी अन्य पुरुष । के साथ सम्भोग करे 57 एक प्रकरण में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया था कि किसी स्त्री। तथा उसके पति के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति के बीच सम्भोग इस धारा के अन्तर्गत अवैध होगा यदि ऐसा सम्भोग पति के जीतनकाल में होता है।28 इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि केवल इस आधार पर अनुचित नहीं होगी क्योंकि पति ने पत्नी को ले जाने या छिपाने के लिये मौन सम्मति दिया था।59 |

(6) पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं है-चूंकि जारकर्म के अपराध के लिये दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं है। अत: इस धारा में वर्णित तुच्छ अपराध के लिये दुष्प्रेरक के रूप में उसे दण्डित करना न्यायसंगत न होगा 60

53. नारायण चन्द्र दास बनाम कमलक्ष्या दास तथा अन्य, 1984 क्रि० लाँ ज० (एन० ओ० सी०) 101 कल०.

54. (1936) 39 बाम्बे एल० आर० 61.

55. पहलवान, 16 क्रि० लॉ ज० 216.

56. जगन्नाथ, ए० आई० आर० 1937 इला० 353 (खण्डपीठ).

57. जेसीमुद्दीन बनाम इशहाक, 1 सी० डब्ल्यू० एन० 498. । 58. २

58.  नवरंग, ए० आई० आर० (1915) 13 ए० एल० जे० 251.

59. गणेशराम बनाम रामचन्द्र ए० आई० आर० 1920 (पी० सी०) 522.

60. फुल्ला बनाम जीवन सिंह, (1871) पी० आर० नं० 6 सन् 1871.

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