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Indian Penal Code Offences Against Property Robbery and Dacoity LLB Notes

 

 

Indian Penal Code Offences Against Property Robbery and Dacoity LLB Notes:- The next sentence of LLB Law 1st Year / 1st Semester Books Indian Penal Code 1860 IPC Chapter 17 Off Offenses Against Property is going to be read today, which we have prepared on the basis of the LLB Notes Study Material in PDF Download. Link to our website to get information from All Semester Notes of LLB. All our 1st Semester / 2nd Semester / 3rd Semester / 4th Semester / 5th Semester and 6th Semester Notes Study Material in LLB 1st Year / Second Year and 3rd Year in our website Answer: Previous Year Mock Sample Solved Demo Test Paper in Hindi English Gujarati Available in all languages.

LLB Law Notes Study Material

390. लूट-प्रत्येक प्रकार की लूट में या तो चोरी या उद्दापन होता है।

चोरी कब लूट है-चोरी ‘लूट” है, यदि उस चोरी को करने के लिए, या उस चोरी के करने में या उस चोरी द्वारा अभिप्राप्त सम्पत्ति को ले जाने या ले जाने का प्रयत्न करने में, अपराधी उस उद्देश्य से स्वेच्छया किसी व्यक्ति की मृत्यु, या उपहति या उसका सदोष अवरोध या तत्काल मृत्यु का, या तत्काल उपहति का, या तत्काल सदोष अवरोध का भय कारित करता है या कारित करने का प्रयत्न करता है।

उद्दापन कब लूट है-उद्दापन ‘लूट” है, यदि अपराधी वह उद्दापन करते समय भय में डाले गए व्यक्ति की उपस्थिति में है, और उस व्यक्ति को स्वयं उसकी या किसी अन्य व्यक्ति की तत्काल मृत्यु या तत्काल उपहति या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालकर वह उद्दापन करता है और इस प्रकार भय में डालकर इस प्रकार भय में डाले गए व्यक्ति को उद्दापन की जाने वाली चीज उसी समय और वहाँ ही परिदत्त करने के लिए उत्प्रेरित करता है।

स्पष्टीकरण- अपराधी का उपस्थित होना कहा जाता है, यदि वह उस अन्य व्यक्ति को तत्काल मृत्यु | के, तत्काल उपहति के, या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालने के लिए पर्याप्त रूप से निकट हो।

दृष्टान्त

(क) क, य को दबोच लेता है, और य के कपड़े में से य का धन और आभूषण य की सम्मति के बिना कपटपूर्वक निकाल लेता है। यहाँ, क ने चोरी की है और वह चोरी करने के लिए स्वेच्छया य को सदोष अवरोध कारित करता है। इसलिए क ने लूट की है।

(ख) क, य को राजमार्ग पर मिलता है, एक पिस्तौल दिखलाता है और य की थैली मांगता है। परिणामस्वरूप य अपनी थैली दे देता है। यहाँ, क ने य को तत्काल उपहति का भय दिखलाकर थैली उद्दापित की है और उद्दापन करते समय वह उसकी उपस्थिति में है। अतः क ने लूट की है।

(ग) क राजमार्ग पर य और य के शिशु से मिलता है। क उस शिशु को पकड़ लेता है और यह धमकी देता है कि यदि य उसको अपनी थैली नहीं परिदत्त कर देता है, तो वह उस शिशु को कगार के नीचे फेंक देगा। परिणामस्वरूप य अपनी थैली परिदत्त कर देता है। यहाँ, क ने य को यह भय कारित करके कि वह । उस शिशु को, जो वहाँ उपस्थित है, तत्काल उपहति करेगा. ये से उसकी थैली उद्दापित की है। इसलिए क ने य को लूटा है।

(घ) क, य से कहकर, सम्पत्ति अभिप्राप्त करता है कि ”तुम्हारा शिश मेरी टोली के हाथों में है, यदि तुम हमारे पास दज हजार रुपया नहीं भेज दोगे, तो वह मार डाला जाएगा।” यह उद्दापन है, और इसी रूप में दण्डनीय है, किन्तु यह लूट नहीं है, जब तक य को उसके शिशु की तत्काल मृत्यु के भय में न डाला जाए।

टिप्पणी

लूट, चोरी या उद्दापन या दोनों का गुरुतर स्वरूप है। हिंसा के आसन्न भय की उपस्थिति मात्र ही लूट के अपराध का सार है। लूट के अधिकतर मामले गुरुतर चोरी तथा उद्दापन के मिश्रित मामले होते हैं। इस धारा का पैराग्राफ 2 उन मामलों से सम्बन्धित है जिनमें चोरी, लूट होती है तथा पैराग्राफ 3, जिनमें उद्दापन लूट होती है।

चोरी कब लूट है?-निम्नलिखित परिस्थितियों में चोरी लूट होती है

(1) जब कोई व्यक्ति स्वेच्छया किसी व्यक्ति की

(क) मृत्यु, या उपहति या सदोष उपवरोध (restraint) या

(ख) आसन्न मृत्यु या आसन्न उपहति या आसन्न सदोष अवरोध का भय कारित करता है या कारित करने का प्रयत्न करता है।

(2) उपरोक्त कार्य निम्नलिखित में से किसी एक उद्देश्य की पूर्ति हेतु दिया गया हो

(क) चोरी करने के लिये, या

(ख) चोरी करने में, या

(ग) चोरी द्वारा अभिप्राप्त को ले जाने या ले जाने का प्रयत्न करने में।

सम्पत्ति को ले जाना-लूट के अपराध में मृत्यु या उपहति या सदोष अवरोध चोरी करते समय या चोरी करने के लिये या चोरी कर लेने के पश्चात् भी चोरी द्वारा अभिप्राप्त सम्पत्ति को ले जाने के लिये कारित की जा सकती है। तात्पर्य यह है कि मृत्यु या उपहति या सदोष अवरोध चोरी करने के पूर्व, चोरी के दौरान या चोरी के पश्चात् कारित की जा सकती है किन्तु ऐसा कोई भी कार्य पैरा 2 के प्रथम भाग में वर्णित किसी एक उद्देश्य की पूर्ति के लिये किया जाना चाहिये।

उस उद्देश्य के लिये- पदावली, “उस उद्देश्य के लिये” सुस्पष्ट करती है कि मृत्यु, उपहति या सदोष अवरोध चोरी करने के लिये, चोरी के करने में या चोरी द्वारा अभिप्राप्त सम्पत्ति को ले जाने में कारित हो। किन्तु यदि चोर अपनी गिरफ्तारी को निवारित करने के उद्देश्य मात्र से उस समय उपहति कारित करता है। जब चोरी करते समय मालिक उसे देख लेता है तो वह चोरी का मामला होगा न कि लूट का 70 | एक प्रकरण में स तथा द आम के एक वृक्ष से आमों की चोरी करते समय ब द्वारा देख लिये गये। इस पर स ने धक्का देकर ब को जमीन पर गिरा दिया और वह बेहोश हो गया। इसे लूट का मामला माना गया न कि चोरी। हिंसा के इस्तेमाल मात्र से ही चोरी का अपराध लुट में परिवर्तित नहीं हो जाता। हिंसा का प्रयोग इस धारा के पैराग्राफ 2 में वर्णित किसी एक उद्देश्य की पूर्ति के लिये होना आवश्यक है। अत: यदि अभियुक्त ने

70. कलियों केरियो, (1872) अनरिपोर्टेड क्रिमिनल केसेज 65.

71. हशरत शेख, (1866) 6 डब्ल्यू ० आर० (क्रि०) 85.

चोरी द्वारा अभिप्राप्त सम्पत्ति को फेंक दिया और पीछा करने वालों पर पत्थर फेंकने लगा जिससे वे लोग इसका पीछा करना छोड़ दें, तो वह चोरी का अपराधी होगा न कि लूट का।।2।

अ ने एक रेलवे कम्पार्टमेण्ट में जबकि ट्रेन एक स्टेशन पर रुकने वाली थी, द की घड़ी छीन लिया। द ने शोर मचाना प्रारम्भ कर दिया। ब ने उसके गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया तथा अ और ब दोनों ही कम्पार्टमेन्ट से कूद कर भाग गये। कुछ ही समय बाद दोनों को रेलवे स्टेशन के समीप एक चाय की दुकान पर चाय पीते हुये पकड़ा गया। अ तथा ब दोनों ही धारा 392 सपठित धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत दण्डनीय हैं क्योंकि ब ने लूट करने तथा अ को पकड़े जाने से बचाने के सामान्य आशय के अग्रसरण में सहायता किया था और दोनों चोरी का सामान लेकर भागने में सफल हो गये थे।

अकिब उर्फ जावेद बनाम एन० सी० टी० दिल्ली राज्य72 के वाद में चोरी की वस्तुयें अभियुक्त से बरामद की गयीं। इस प्रकार पकड़ी/बरामद की गयी चोरी की वस्तुयें सह शिकायतकर्ता द्वारा भी चोरी की वस्तुएं होने की पहचानी गयीं।

यह अभिधारित किया गया कि यह तथ्य कि अभियुक्त से बरामद की गयी घड़ी प्रथम सूचना रिपोर्ट में नहीं थी एक मामूली कमी (discrepancy) है। शिकायतकर्ता के साक्ष्य (Testimony) साक्ष्य को अस्वीकार करने के लिये यथेष्ट नहीं है। अभियुक्त द्वारा इस बात की कोई आख्या नहीं की गयी कि ये वस्तुयें उसके कब्जे में कैसे आयीं। अतएव यह अभिधारित किया गया कि उपरोक्त परिणामों (conclusions) को ध्यान में रखते हुये निचली अदालतें जिससे उच्चतम न्यायालय भी सहमत है और इसलिये वह संतुष्ट है कि दोषसिद्धि और अपीलार्थी को दिया गया दण्ड अच्छी प्रकार से उचित था और इसलिए न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिला। उच्चतम न्यायालय ने अपीलार्थी की दोषसिद्धि भा० द० संहिता की धारा 302 और 392 सपठित धारा 34 को पुष्ट (confirmed) कर दिया।

स्वेच्छया कारित करना-इस धारा में प्रयुक्त ‘‘स्वेच्छया कारित करता है” का बहुत ही महत्व है। क्योंकि आकस्मिक उपहति से अपराध लूट में परिवर्तित नहीं होता। उपहति निश्चयतः स्वेच्छया कारित की जानी चाहिये। एडवर्ड्स73 के बाद में अभियुक्त एक टोकरी चुराने के आशय से उस रस्सी को काट रहा था जिससे टोकरी बंधी हुई थी और इसके दौरान अकस्मात् उसने टोकरी के मालिक की कलाई काट दी जो उस समय टोकरी बचाने के उद्देश्य से उसे छीन कर भागना चाह रहा था। अभियुक्त चोरी के अपराध के लिये उत्तरदायी ठहराया गया। किन्तु यदि अभियुक्त किसी महिला की नाक से नथनी खींचकर उसे उपहति कारित करता है तथा महिला की नाक से खून बहने लगता है तो अभियुक्त ‘लूट’ के लिये दण्डित होगा।74

व्यक्ति- इस शब्द की परिभाषा इस संहिता की धारा 11 में दी गयी है। इसके अन्तर्गत प्राकृतिक तथा न्यायिक दोनों ही प्रकार के व्यक्ति आते हैं। सामान्यतया किसी मनुष्य का मृत शरीर ‘‘व्यक्ति नहीं हो सकता है किन्तु इस धारा के प्रयोजन हेतु उस मनुष्य शरीर को व्यक्ति” ही माना गया है जिसकी मृत्यु उस प्रक्रिया के दौरान की गयी थी जिसके अन्तर्गत चोरी कारित हुई थी।75

उद्दापन कब लूट है- यदि निम्नलिखित शर्ते पूरी हो रही हों तो उद्दापन लूट होता है

(1) यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को स्वयं उसको या किसी अन्य व्यक्ति को तत्काल मृत्यु या तत्काल उपहति या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालकर उद्दापन कारित करता है, और

(2) वह व्यक्ति इस प्रकार भय में डाले गये व्यक्ति को उत्प्रेरित करता है जिससे भय में डाला गया। व्यक्ति उद्दापन की जाने वाली वस्तु उसी समय और वहीं परिदत्त कर दे, और

72. (1865) 1 वेयर 442. | 72क. (2013) I क्रि० ला ज० 571 (एस० सी०).

73. 1883) 1 काक्स 32.

74, टिकई भोर, (1866) 5 डब्ल्यू० आर० ( क्रि०) 95.

75. जमनादास, ए० आई० आर० 1963 म० प्र० 106.

(3) उद्दापन कारित करते समय अभियुक्त भय में डाले गये व्यक्ति के समक्ष हो। इस धारा के दृष्टान्त (ख), (ग) तथा (घ) यह स्पष्ट करते हैं कि कब उद्दापन लूट बन जाता है।

भय में डाले गये व्यक्ति की उपस्थिति में-उद्दापन को लूट होने के लिये यह आवश्यक है कि अभियुक्त भय में डाले गये व्यक्ति के सम्मुख उपस्थित हो। इस धारा का स्पष्टीकरण यह स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति को उस समय उपस्थित कहा जाता है जब वह उस अन्य व्यक्ति की तत्काल मृत्यु के या तत्काल उपहति के या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालने के लिये पर्याप्त रूप से निकट हो। उद्दापन का अपराध लूट हो जाता है यदि अभियुक्त अपनी उपस्थिति के कारण दी गयी धमकी को तुरन्त कार्यान्वित करने के लिये पर्याप्त रूप से सक्षम है। दूसरे शब्दों में पीड़ित व्यक्ति अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को आसन्न उपहति से बचाने के लिये सम्पत्ति परिदत्त करता है। यदि अपेक्षित उपहति किसी अन्य व्यक्ति के लिये है तो वह अन्य व्यक्ति निश्चयतः ऐसा होगा, जिसमें लूटे गये व्यक्ति का विशेष सम्बन्ध होगा और उस अन्य व्यक्ति की। उपहति से बचाने के लिये ही वह माँगी गयी वस्तु को परिदत्त करता है। क एक छुरा निकालकर ब पर। निशाना लगाता है और स से कहता है कि वह उसके पुत्र ब की हत्या कर देगा यदि वह अपनी सोने की जंजीर न दे देगी। स वह जंजीर क को दे देती है। क लूट के अपराध का दोषी होगा, क्योंकि वह तात्कालिक उपहति कारित करने के भय में डालकर उद्दापन करता है।

जहाँ अ एक पुलिस अफसर ब से कुछ आभूषण उसे इस बात का भय दिखाते हुये प्राप्त करता है कि वह तत्काल जेल में बन्द कर दिया जायेगा और कई महीनों तक मुक्त नहीं किया जायेगा, पुलिस अफसर इस धारा के अन्तर्गत लूट का दोषी होगा।

उदाहरण- लूट के प्रकरण में जहां शिनाख्त परेड नहीं होती है भले ही उपहतिग्रस्त व्यक्ति अभियुक्तों को नहीं जानते थे तथा न्यायालय में क्षतिग्रस्त व्यक्ति द्वारा की गयी शिनाख्त के आधार पर जो घटना के लगभग चार माह बाद हुई थी तथा जिसका कोई भी वर्णन प्रथम सूचना रिपोर्ट में क्षतिग्रस्त व्यक्ति ने नहीं किया था, यदि अभियुक्तों को दोषसिद्धि प्रदान की जाती है तो ऐसी दोषसिद्धि को मान्यता नहीं प्रदान की जा सकती है।76

जहाँ अभियुक्त ने अपने शिकार पर चाकू से कई प्रहार किये जिससे वह उसके कान की बाली तथा। चाभियों का गुच्छा जो उसके सलवार के नाड़े से बंधा हुआ था, लेने में सफल हो गया, वह धारा 390 सपठित धारा 397 के अन्तर्गत दण्डनीय होगा।77 |

अ, ब और स ने एक घर, जिसमें ताला बन्द था, का भेदन किया और उसको लूटना शुरू कर दिया। जब घर के एक नौकर ने शोर मचाया तो उन लोगों ने उसे मार डालने की धमकी दिया। परन्तु वह किसी तरह। बचकर भाग निकला और सहायता के लिये शोर मचाया। अ, ब और स टैक्सी स्टैण्ड की ओर भागे परन्तु उनका गाँव की भीड़ द्वारा पीछा किया गया। अ को भीड़ में से एक व्यक्ति ने जब पकड़ लिया तो उसने उसे चाक मार दिया। इस मामले में अ, ब और स तीनों लूट का अपराध कारित करने के प्रयत्न के दोषी होंगे। चंकि घटनास्थल से भागते समय जब अ भीड़ के एक व्यक्ति द्वारा पकड़ लिया गया तो उसने उसे चाकू मार दिया अतएव अ चाकू मारने के लिये भी दायित्वाधीन होगा। और यदि चाकू मारने के परिणामस्वरूप उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उस दशा में ॐ उसकी हत्या कारित करने के लिये भी दोषी होगा। अ अपने शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का दावा नहीं कर सकता है क्योंकि वह स्वयं अपराधी था, क्योंकि वह स्वयं लूट कारित करने गया था। और उसने अपने को स्वयमेव ऐसी परिस्थिति में डाला था जहाँ उसे इस अधिकार के प्रयोग की आवश्यकता प्रतीत हुई। ब और स भी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 111 के अधीन हत्या के दुष्प्रेरण के लिये दोषी होंगे, क्योंकि अ, ब और स सभी एक षड्यंत्र के तहत लूट कारित करने गये थे और लूट के अपराध में चाकू मारने जैसा कार्य सम्भावित रहता है। अतएव अ द्वारा कारित चाकू मारने का कार्य दुष्प्रेरित अपराध लूट जिसमें ब और स भी भागीदार थे सम्भावित था। अत: ब और स भी भारतीय दण्ड।

76. मोहम्मद अब्दुल हफीज बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, 1983 क्रि० लॉ ज० 689 (सु० को०).

77. सिकन्दर बनाम राज्य, 1984 क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 103 (दिल्ली).

संहिता की धारा 111 के अधीन हत्या के दुष्प्रेरण के अपराध हेतु दायित्वाधीन होंगे। अ, ब, स और द चार व्यक्ति बन्दूक से सज्जित होकर य के घर जाते हैं। चूंकि य घर पर मौजूद नहीं था, स और द उस खेत पर जहाँ य गया था, इस इरादे से जाते हैं कि वे उसे तिजोरी की चाभी देने को मजबूर करेंगे। इसी बीच य का पुत्र म आ जाता है और वह घर के दरवाजे को धक्का देकर जैसे खोलता है अ उसे बन्दूक की गोली से मार डालता है। इस मामले में अ, म की हत्या कारित करने के लिये दायित्वाधीन होगा और ब, स तथा द लूट कारित करने का षड्यंत्र रचने हेतु दायित्वाधीन होंगे, क्योंकि अ, ब, स तथा द चारों लोग य के घर लूट का अपराध कारित करने के आशय से गये थे। ब, स तथा द हत्या कारित करने के लिये दोषी नहीं होंगे, क्योंकि हत्या लूट के दौरान कारित नहीं की गयी थी।

391. डकैती-जब कि पांच या अधिक व्यक्ति संयुक्त होकर लूट करते हैं या करने का प्रयत्न करते हैं। या जहाँ कि वे व्यक्ति, जो संयुक्त होकर लूट करते हैं, या करने का प्रयत्न करते हैं और वे व्यक्ति जो उपस्थित हैं और ऐसे लूट के किए जाने या ऐसे प्रयत्न में मदद करते हैं, कुल मिलाकर पांच या अधिक हैं, तब हर व्यक्ति जो इस प्रकार लूट करता है, या उसका प्रयत्न करता है या उसमें मदद करता है, कहा जाता है। कि वह ‘डकैती” करता है।

टिप्पणी

अकिब उर्फ जावेद बनाम एन० सी० टी० दिल्ली राज्य77क के बाद में शमा परवीन मकान न० ए32/15 मेनरोड न० 66, मैजपुर में रह रही थी। वह प्रथम तल को अपने निवास के रूप में उपयोग कर रही थी। भूतल में उसकी दुकान थी और वह रियल स्टेट का व्यापार कर रही थी। वह अपने तीन पुत्रों और माता के साथ रह रही थी। उसी परिसर के दूसरे भाग (portion) में उसका ममिया चाचा जिसका नाम मोहम्मद जमील उर्फ ममिस अपना खुद का धन्धा (business) कर रहा था। उसका एक मित्र सलविन्दर काके उसके यहां बहुत आता जाता था। दिनांक 27.10.1998 को शमा परवीन सलविन्दर के साथ बाजार से कुछ खरीदफरोख्त करने के बाद अपने घर वापस आयी। उसके लौटने के बाद अपीलार्थी और दो अन्य लोग उसके घर में घुसे और वे लोग रिवाल्वरों एवं एक छुरे के साथ लैश थे। घर में घुसने के बाद मम्मू के बारे में पूछताछ। किया जिसका उत्तर परवीन ने दिया कि वह सब्जी लाने गये हैं। उसके बाद अभियुक्त ने सलविन्दर की सोने की अंगूठी, लाकेट और 100/150 रुपये नकद छीन लिया। उन लोगों ने शमा परवीन से आलमारी की चाभियां मांगी और जब जोर जबर्दस्ती से उसने चाभियां दे दिया तब अभियुक्त ने आलमारी खोला और आलमारी में रखा 1500.00 रुपये और लाकर में रखे 25,000 रु० निकाल लिया। उन लोगों ने एक मोबाइल फोन और अंगूठी तथा नेकलेस के अलावा कुछ अन्य गहने भी ले लिया। जब वह सब हो गया उसके बाद जमील उर्फ मम्मू घर के अन्दर आया और परवीन की एक अन्य सहेली जिसका नाम नसरीन था और उसका पति जीता भी वहां आ गये। परवीन की मां पहले ही से घर में मौजूद थी। लूटपाट करने के बाद अपीलार्थी ने शमा परवीन के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश किया और जब सलविन्दर ने छेडछाड का विरोध किया और कहा कि मूल्यवान वस्तुयें लेने के बाद भी ऐसी छेड़छाड़ क्यों कर रहे हो। इस पर अपीलार्थी ने उसे चुप रहने के लिये कहते हुये उसके माथे पर गोली दागा जिससे सलविन्दर बिस्तर पर ही गिर पड़ा। उसके पश्चात् तीनों अभियुक्तों ने लूट के सामान और नकदी के साथ मकान के दरवाजे को बाहर से बन्द कर चले गये। 10-15 मिनट बाद परवीन का एक पुत्र जिसका नाम दानिश था, घर के अन्दर आया और उसने सभी पीडितों को जो बंधे थे, छुड़ा दिया और उसके पश्चात् घायल सलविन्दर को अस्पताल ले जाया गया जहां उसे मरा हुआ लाया गया, बताया गया। पुलिस ने शमा परवीन के बयान के आधार पर भा० द० संहिता की धाराओं 391/354/307 सपठित धारा 34 के अन्तर्गत अपराध पंजीकृत किया। सीक्रेट पुलिस सेल के अधिकारियों द्वारा एक गुप्त सूचना के आधार पर अपीलार्थी और दूसरा अभियुक्त भी गिरफ्तार किया गया। ।

पाँच या पाँच से अधिक व्यक्तियों द्वारा की गई लूट डकैती होती है। जब पाँच या पाँच से अधिक व्यक्ति संयक्त होकर या तो लूट करते हैं या लूट करने का प्रयत्न करते हैं तभी डकैती का अपराध गठित होता है।।

77क.(2013) I क्रि० ला ज० 571 (एस० सी०).

‘संयुक्त’ शब्द संव्यवहार में हिस्सा लेने वाले व्यक्तियों के एक होकर या सामूहिक रूप से कार्य करने को इंगित करता है। यदि उनके व्यक्तिगत कार्य तथा सामूहिक कार्य के बीच सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता हो तो यह कहा जायेगा, कि इस धारा में वर्णित अपराध कारित हुआ है।8।

डकैती के अपराध में पाँच या पाँच से अधिक व्यक्तियों का होना आवश्यक है और यह भी आवश्यक है। कि वे या तो लूट करें या करने का प्रयत्न करें।79 यह धारा तभी लागू होती है जब सभी व्यक्ति लूट कारित करने के सामान्य आशय के भागीदार हों।80 यह भी प्रतिषिद्ध किया जाना चाहिये कि अभियुक्त ने या तो लूट कारित किया या लूट कारित करने में सहायता किया और वह उन व्यक्तियों में से एक था जिन्होंने धन का। उद्दापन किया या उद्दापन में सहायता किया।81

इस धारा के प्रयोजन हेतु अभियुक्तों की गणना करते समय उन सभी व्यक्तियों को ध्यान में रखा जाना। चाहिये जिन्होंने सामूहिक रूप में लूट कारित किया या कारित करने का प्रयत्न किया तथा जो लूट कारित होते समय विद्यमान थे और सहायता पहुँचा रहे थे।

डकैती, केवल अभियुक्तों की संख्या के आधार पर लूट से भिन्न है। अत: डकैती अधिक कठोर दण्ड से दण्डनीय है क्योंकि यह लूट से अधिक उग्र है। डकैती में अधिक व्यक्तियों की उपस्थिति के कारण अधिक भय बना रहता है। अभियुक्तों की गणना करते समय उन दुष्प्रेरकों की भी गणना की जाती है जो अपराध स्थल पर उपस्थित रहते हैं और अपराध के सम्पादन में सहायता पहुँचाते हैं। डकैती में लूट सम्मिलित है और लूट, चोरी या उद्दापन का उग्र रूप है। अत: डकैती में चोरी और उद्दापन दोनों ही सम्मिलित हैं। पीड़ित व्यक्ति द्वारा प्रतिरोध प्रस्तुत किया जाना आवश्यक नहीं है। एक प्रकरण में घर के सदस्यों ने अधिक संख्या में डाकुओं को देखकर कोई प्रतिरोध प्रस्तुत नहीं किया, अत: डाकुओं ने किसी प्रकार के हिंसा या बल का प्रयोग नहीं किया। यह अपराध डकैती का अपराध माना गया न कि चोरी ।82

इसी प्रकार केवल यह पता लगने पर कि घर में डकैती होने वाली है, घर के सभी सदस्य घर छोड़कर चले गये। तत्पश्चात् बहुत से लोगों ने घर पर धावा बोल दिया और घर में रखी सम्पत्ति उठा ले गये। यह अभिनिर्धारण प्रदान किया गया कि यह अपराध, डकैती का अपराध है, क्योंकि यह तथ्य कि घर के सदस्य क्षति या सदोष अवरोध के भय से घर छोड़कर भाग गये, इस अपराध का पर्याप्त सबूत है।83 ।

पाँच से कम व्यक्तियों की दोषसिद्धि- यदि डकैती करने वाले केवल पाँच ही व्यक्ति हैं और इन पाँच में से केवल तीन ही दण्डित होते हैं तथा शेष दो को उन्मुक्ति प्रदान कर दी जाती है तो तीन व्यक्तियों की दोषसिद्धि न्यायसंगत नहीं मानी जायेगी क्योंकि डकैती का अपराध पाँच से कम व्यक्ति सम्पादित नहीं कर सकते ।84 किन्तु यदि अनेक व्यक्तियों को उन्मुक्ति प्रदान किये जाने के बावजूद यह पाया जाता है कि उन व्यक्तियों के साथ जिन्होंने अपराध में भाग लिया, भाग लेने वालों का योग पाँच या इससे अधिक हो जा रहा है तो पहचाने गये व्यक्तियों की दोषसिद्धि भले ही उनकी संख्या पाँच से कम हो, विधि-विरुद्ध नहीं होगी।85

डकैती के एक प्रकरण में यदि चुरायी वस्तु अभियुक्त के कथन के आधार पर घटना से तुरन्त बाद पुनः प्राप्त कर ली जाती है और यह प्राप्ति पुलिस अधिकारियों एवं उन पंचों, जिन्होंने इसी आशय का वक्तव्य दिया

78. डम्बरूधर इंजल, (1951) 3 असम 365.

79. श्याम बिहारी, ए० आई० आर० 1957 सु० को० 320.

80. नाहू लाल तुलसी, ए० आई० आर० 1956 आन्ध्र प्रदेश 18.

81. अटुम लेंगमी, ए० आई० आर० 1962 मनीपुर 7.

82. रामचन्द्र, (1932) 55 इला० 117. ।

83. कोसोरी पाटर, (1867) 7 डब्ल्यू ० आर० (क्रि०) 35.

84. लिंगय्या, ए० आई० आर० 1958 ए० पी० 510.

85. घमण्डी, 1970 क्रि० लाँ ज० 386.

था, की उपस्थिति में की जाती है तो अभियुक्त न केवल धारा 412 के अन्तर्गत दण्डित किया जाएगा अपित धारा 391 के अन्तर्गत भी दण्डित होगा। पंचों के साक्ष्य बहुत महत्वपूर्ण होते हैं विशेष कर तब जबकि वस्त एक ऐसे स्थान से प्राप्त की जाती है जहाँ सब की पहुँच नहीं है।86

लूट और डकैती में अन्तर (The difference between robbery and robbery)

(1) डकैती का प्रत्येक अपराध मूलत: लूट का मामला होता है किन्तु लूट का अपराध डकैती नहीं होता।

(2) डकैती में भाग लेने वालों की संख्या पाँच या पाँच से अधिक होनी चाहिये किन्तु लूट में इनकी

संख्या सदैव पाँच से कम हुआ करती है क्योंकि पाँच या अधिक व्यक्तियों द्वारा ही डकैती का अपराध कारित होता है।

392. लूट के लिए दण्डजो कोई लूट करेगा, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा, और यदि लूट राजमार्ग पर सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच की जाए, तो कारावास चौदह वर्ष तक का हो सकेगा।

टिप्पणी

डकैती यदि सूर्यास्त के बाद परन्तु सूर्योदय से पहले किसी राष्ट्रीय मार्ग पर डाली जाती है तो और कठोर दण्ड दिया जाता है। जहाँ अभियुक्त किसी शिकार को चाकू से चोट पहुँचाकर कान की बाली तथा उसके सलवार की डोरी में बंधी चाभी छीन लेता है तो वह धारा 392 सपठित धारा 397 के अन्तर्गत दण्डित किया जायेगा और धारा 397 के अनुसार कारागार 7 वर्ष से कम नहीं परन्तु जो 10 वर्ष तक का हो सकेगा, से दंडित किया जायेगा।87

जार्ज बनाम केरल राज्य88 के वाद में मृतक अभियोजन गवाह-28 के खेत पर काम कर रहा था। हमेशा की तरह 28-6-1995 को भी वह 7.00 बजे सुबह काम पर चला गया। घर छोड़ते समय अभियोजन। गवाह-3 और 7 ने देखा था कि वह दो सोने की अंगूठी और एक घड़ी पहने हुये था। अभि० ग०-28 ने भी उसे इन चीजों को पहने हुये देखा था। दोपहर तक वह खेत पर था और दोपहर को भोजनोपरान्त वह वहाँ से चला गया था। लगभग 9.30 बजे रात्रि में जब अभियोजन के गवाहान 10, 12 और 13 अपने घर पर थे, उन्होंने मृतक को यह कहते हुये सुना कि जो चाहो ले लो परन्तु उसको अकेले छोड़ दो”। अभियुक्त ग०-12 ने अपीलांट की आवाज भी सुना था। चूंकि दूसरे दिन सुबह मृतक अपने काम पर नहीं पहुँचा तो अभि० ग०28 ने अपने एक कर्मचारी को मृतक के घर पर काम पर न आने का कारण पूछने भेजा। इस प्रकार मृतक के भाई अभि० ग०-3 जिसके साथ मृतक रह रहा था, को पता चला कि उसका भाई गायब था और उसने उसे खोजना शुरू किया, परन्तु कोई पता नहीं चला। दिनांक 30-6-1995 को अभि० ग०-1 ने थाडू (Thodu) में एक लाश तैरते हुये देखा। इस सम्बन्ध में एक रिपोर्ट दर्ज की गई और शव को फोटो समाचार-पत्र में छापा गया जिसको अभि० ग० 3 ने 1-7-95 को देखा। उस आधार पर वह सरकारी अस्पताल गया और अपने भाई की लाश की पहचान किया। उसने आगे यह भी देखा कि दो सोने की अंगूठियाँ और घड़ी जो मृतक पहने हुये था। गायब थी। शव को पोस्टमार्टम रिपोर्ट में न्यायालय में मृत्यु का कारण पानी में डूबना बताया गया था। शव में किसी तरह की बाहरी अथवा अन्दरूनी चोट नहीं पाई गई थी। अन्वेषण अधिकारी को यह जानकारी हुई कि अभियुक्त ने सोने की एक अंगूठी अभि० ग०-19 के हाथ गिरवी रखा था, जिसके आधार पर अभियुक्त/अपीलांट को दिनांक 5-7-1995 को एक ताड़ी की दूकान पर से गिरफ्तार किया गया। अपीलांट की निशानदेही पर घड़ी और दूसरी अंगूठी भी बरामद की गई।

यह अभिनित किया गया कि वाद पारिस्थितिक साक्ष्य पर निर्भर है जिसमें यह निष्कर्ष निकलता है। कि अभियुक्त ने स्वयं लूट कारित किया है। चूंकि मृतक की मृत्यु पानी में डूबने से हुई थी और कोई बाह्य

86. लछमन राम इत्यादि बनाम उड़ीसा राज्य, 1985 क्रि० लॉ ज० 753 सु० को०.

87. शिकन्दर बनाम राज्य, 1984 क्रि० लाँ ज० (एन० ओ० सी०) 103 दिल्ली.

88. 2002 क्रि० लॉ ज० 2031 (एस० सी०)

अथवा आन्तरिक चोटें भी मृतक शरीर पर नहीं पाई गई थीं अतएव जल में डूबने से मृत्यु और लूट तथा 667 उसकी मृत्यु में कोई सम्बन्ध नहीं था। इसलिये यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अभियुक्त ने हत्या भी की थी। अभियुक्त की दोषसिद्धि और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के अधीन आजीवन कारावास का । दण्ड भी निरस्त कर दिया गया और धारा 392 के अधीन दण्ड को यथावत रखा गया।

एज़हिल बनाम तमिलनाडु राज्य89 के वाद में तीन व्यक्तियों एजहिल अभि०-1, सरनन अभि०-2 और मोहम्मद इकबाल अभि०-3 को भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 364, 392 और 302 सपठित धारा 34 और 120ख के अधीन आरोपित किया गया। मृतक, जिसकी मानवघाती (homicidal) मृत्यु हुई थी, का मृत शरीर गाँव में एक पुल के निकट पड़ा हुआ मिला। मृतक से सम्बन्धित वस्तुयें अभियुक्तगणों के कब्जे से जो एक कार में साथ यात्रा कर रहे थे, बरामद हुई। अभियुक्त के कब्जे से इन चीजों की बरामदगी मृतक की मृत्यु के बाद जल्द ही हुई थी। खून से भीगी वस्तुयें विशेष केर बिस्तर की चद्दर, लुंगी और चप्पल तथा पासपोर्ट आर मृतक का ड्राइविंग लाइसेंस का कार की डिक्की से बरामद किया जाना सिद्ध कर दिया गया। मृतक की इन वस्तुओं का वैध कब्जा अभियुक्तगणों के पास किस रूप में आया इसका कोई युक्तियुक्त और विश्वसनीय (plausible) उत्तर अभियुक्तों के पास नहीं था। यह अभिनित किया गया कि जब हत्या की गई मृतक का शव पाया गया और उसके सामान अभियुक्तगणों के पास से बरामद हुये इनमें समय की निकटता को ध्यान में रखते हुये केवल यह परिकल्पना नहीं की जा सकती है कि वे सब लूट के बाद अभियुक्तों के कब्जे में आई। थी, वरन् मृतक की हत्या भी इन्हीं लोगों ने की थी। अतएव अभियुक्तगणों की भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 302 और 392 सपठित धारा 34 के अधीन दोषसिद्धि उचित थी।

आगे यह भी अभिनित किया गया कि अभियुक्तगणों ने मृतक, जो उनकी राक्षसी योजना से अनभिज्ञ होने से अपने गन्तव्य तक सुरक्षित पहुँचने के लालच में उनके साथ फंस गया था, के भाग्य के बलपर अपने को मात्र धन बनाने के प्रयोजन से मृतक की मृत्यु कारित कर बहुत गम्भीर भ्रष्टता का कार्य कारित किया। अतएव लूट के लिये 10 वर्ष का सश्रम कारावास और हत्या के लिये आजीवन कारावास के दण्ड को कठोर और घोर रूप से अनुपातहीन नहीं कहा जा सकता है।

393. लूट करने का प्रयत्न-जो कोई लूट करने का प्रयत्न करेगा, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

394. लूट करने में स्वेच्छया उपहति कारित करना- यदि कोई व्यक्ति लूट करने में या लूट का प्रयत्न करने में स्वेच्छया उपहति कारित करेगा, तो ऐसा व्यक्ति और जो कोई अन्य व्यक्ति ऐसी लूट करने में, या लुट का प्रयत्न करने में संयुक्त तौर पर संपृक्त होगा, वह आजीवन कारावास से या कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

टिप्पणी

जहाँ अभियुक्तों पर यह आरोप लगाया गया था कि उन लोगों ने दण्ड संहिता की धारा 394 के अन्तर्गत अपराध कारित किया है तथा वे पुलिस स्टेशन जो घटनास्थल से एक मील से भी कम दूरी पर स्थित था उसी गाँव के रहने वाले थे। पुलिस अधिकारी जो शिनाख्त करने आये थे, अभियुक्तों को उस समय देखे थे जब वे भाग रहे थे तथा उपहति ग्रस्त आफीसर पहले से ही एक अभियुक्त को जानता था किन्तु उसका नाम उसने प्रथम सूचना रिपोर्ट में नहीं लिखाया परन्तु शिनाख्त कार्यवाही में उसे पहचान लिया। शिनाख्त कार्यवाही अभियुक्तों को गिरफ्तार करने के चार दिन बाद हुई और इस विलम्ब का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। यह अभिनित हुआ कि अभियुक्तों को इस धारा के अन्तर्गत दण्डित नहीं किया जा सकता।20 जहाँ एक डकैती मामले में डकैतों द्वारा खतरनाक हथियारों का प्रयोग किया गया था और उन्होंने डकैती के दौरान बम भी

89. 2002 क्रि० लॉ ज० 2799 (एस० सी०).

90. बाली अहीर तथा अन्य बनाम बिहार राज्य, 1983 क्रि० लाँ ज० 434 सु० का.

फेंके जिसे घर के एक सदस्य को चोटें पहुँची जिसके कारण वह 10 दिन तक अस्पताल में भर्ती रहा, वहाँ अपराधी को इस धारा के अन्तर्गत आजीवन कारावास से दण्डित किया जा सकता है।91

 

लालसिह बनाम उ० प्र० राज्य92 वाले मामले में कानपुर की फर्म पन्नालाल बनवारी लाल की एक शाखा चांदनी चौक दिल्ली में थी। अमरनाथ अ० सा० 1, हरि शंकर अभि० सा० 4 शारदा चरण और गया प्रसाद लाथ अभि० सा० 16 उक्त फर्म के कर्मचारी थे। फर्म चांदी का संव्यवहार तथा माल का परिवहन कानपुर से दिल्ली को करती थी। दिनांक 28 अक्टूबर, 1980 को हरि शंकर अभि० सा० 4 कानपुर से दिल्ली कार्यालय के लिये 5 लाख रुपये ले गया। अभि० सा० 1 अमरनाथ और शारदा चरण भी ट्रेन से चांदी लेकर दिल्ली गये थे। दिल्ली आने पर अगले दिन उन्होंने सुबह रुपये और चांदी गया प्रसाद लाथ अभि० सा० 16 को सौंप दिया, तथापि, बाद में अभि० सा० 16 को कानपुर से फोन पर निदेश मिला, कि 5 लाख रुपये अभि० सा० 1 अमरनाथ और शारदा चरन के जरिये कानपुर कार्यालय लौटा दिया जाय। तदनुसार उसने अपने 3.5 लाख रुपये अमरनाथ को दिये और बाकी 1.5 लाख शारदा चरण को कानपुर ले जाने के लिये दिये। अभि० सा० 1 ने रकम एक बैग में रख लिया और उसे होल्डाल के बाईं ओर रखा जब कि शारदा चरण ने 1.5 लाख रुपये अपनी कमर में बांध लिये। वे दिल्ली-हावड़ा ट्रेन से श्री टियर कोच में कानपुर लौट रहे थे। अभि० सा० 1 ने होल्डाल अपने सिर के नीचे रखा और अपनी बर्थ पर लेट गया। कुछ यात्री जिनका आरक्षण नहीं था, गैलरी में लेटे थे या बैठे हुये थे। दिनांक 30 अक्टूबर, 1980 को लगभग 4.45 बजे प्रातः ट्रेन शिकोहाबाद रेलवे स्टेशन से चली और बहुत धीमी गति से चल रही थी। अपराधियों में से एक ने अभि० सा० 1 जो अपना मुंह ढक कर बर्थ पर लेटा था, किन्तु जग रहा था, उसके सर के नीचे से होल्डाल खींचा। जब उसे लगा कि होल्डाल हटाया जा रहा है तब वह अपनी बर्थ से नीचे कूदा और होल्डाल पकड़ लिया। हाथापाई हो गई। बैग छीनने वाले के एक साथी ने उसकी टोड़ी में बन्दूक लगा दिया, जिससे उसकी टोड़ी में दायीं ओर मामूली चोट आई, इसके बाद जिसने होल्डाल छीना था, उसने अपने दूसरे साथी को होल्डाल दे दिया और दोनों ट्रेन से कूद गये। दो सहयात्री भी ट्रेन से उनके पीछे कूद गये। अभि० सा० 1 अमरनाथ ने अपराधियों का पीछा करने का प्रयास किया किन्तु अन्य साथियों ने पीछा करने से मना कर दिया क्योंकि अपराधी जिसके हाथ में रायफल थी, ने पीछा करने पर गोली मारने की धमकी दिया। इसलिये वह पुनः उसी बोगी में चढ़े। और चेन खींच कर ट्रेन रोकने का प्रयास किया किन्तु ट्रेन नहीं रुकी। दोनों अपराधी खाकी वर्दी पहने हुये थे और उनमे से एक के पास एक बैरल वाली राइफल थी, अन्य दो अपराधी पायजामा और बुशर्ट पहने थे, बोगी में पर्याप्त रोशनी थी, इसलिये उन्होंने और अन्य यात्रियों ने उनके चेहरे देखे थे। अभि० सा० 1 अमरनाथ ने प्रथम इत्तिला रिपोर्ट इटावा स्टेशन पर जी० आर० पी० के समक्ष दर्ज कराया। प्रथम सूचना रिपोर्ट में यह कहा गया कि किशन लाल टीटी जो उस बोगी में नियुक्त था, वह भी बदमाशों से मिला था और उसने उनसे पैसा लेकर बोगी में चलने दिया, जबकि उनका आरक्षण नहीं था। उन्होंने राइफलधारी बदमाशों को काफी देर तक टी० टी० से बात करते भी देखा था। यही टी० टी० उस समय भी ड्यूटी पर था, जब वे दिल्ली गये थे। ट्रेन में लूट का मामला दर्ज किया गया और अन्वेषण किया गया। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 394 और धारा 411 के अधीन आरोप पत्र सौंपा गया। अपीलार्थी हुकुम सिंह और प्रकाश चन्द्र भाई-भाई हैं और लाल सिंह उनका सहयोगी पुलिस बल का सदस्य है और अन्य अपीलार्थी चन्द्रिका प्रसाद भी उसी गांव का रहनेवाला है जहाँ का हुकुम सिंह है। अभियोजन के अनुसार अमरनाथ अभि० सा० 1 और शारदाचरण के अतिरिक्त गया प्रसाद लाथ अभि० सा० 16 ने भी, जो उन्हे स्टेशन पर छोडने गया था, दो व्यक्तियों को जो पुलिस वालों जैसे ड्रेस पहने हुये थे प्लेट फार्म पर टहलते देखा था। यह दोनों व्यक्ति उसी बोगी में चढे। जिसमें अभि० सा० 1 अमरनाथ और शारदाचरन का आरक्षण था। उन्होंने उन्हीं व्यक्तियों को चांदनी चौक में अपनी फर्म वाली दूकान से ठीक सामने चाय की दुकान पर चाट खाते भी देखा था। अन्वेषण अधिकारी को 17 दिसम्बर 1980 को सूचना मिली कि अपीलार्थी सिपाही ड्राइवर हुकुम सिंह और उसका भाई प्रकाश चन्द्र जो बरखास्त सिपाही है और जो रुपयों के लेनदेन का कारबार करता था, ने मोटर साइकिल और अन्य चीजें खरीदा है। अन्वेषण अधिकारी ने प्रकाश चन्द्र की जेब से 5000 रु० बरामद किये और 7500/- रु० चन्द्रिका

91. गफूर शेख एवं अन्य बनाम राज्य, 1984 क्रि० लॉ ज० 559 कल०.

92. 2004 क्रि० लॉ ज० 378 (सु० को०).

प्रसाद के पास से बरामद किये। यह सभी 100 रु० के करेंसी नोट थे, नोटों पर गया प्रसाद की सील और गया प्रसाद लाथ के हस्ताक्षर पाये गये। बाद में हुकुम सिंह और लाल सिंह के भी शामिल होने की बात साबित हो गई। चन्द्रिका सिंह के बताने पर बैंक पासबुक, फिक्स डिपाजिट की रसीदें और 500 रु० मूल्य के बारह राष्ट्रीय बचत पत्र प्रमाणपत्र भी बरामद हुये। लालसिंह भी गिरफ्तार हुआ और उसके यहाँ 63200 रुपये का। नकदी बरामद की गई। यह 10,000 रुपये के छह बण्डलों में और शेष 100 रु० के नोट थे। बण्डली पर फर्म की मोहर और गया प्रसाद लाथ के हस्ताक्षर थे। लाल सिंह की लाइसेंसी बंदूक और गोलियां भी बरामद हुई और जब्त की गयीं । हुकुम सिंह ने बताया कि लटे गये रुपयों से उसने और उसके भाई प्रकाश चन्द्र ने अपने-अपने हिस्से से बर्तन, गहने, और मोटर साइकिल खरीदा। उन्होंने राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र भी खरीदा, जो 20,000 हजार रुपये के थे और 20,000 रु० बैंक में जमा किया। अन्वेषण अधिकारी ने सभी सामान बरामद कर लिये।

 

पहचान परीक्षा परेड 4 फरवरी 1981 को जिला कारागार मैनपरी में कराई गई। अमरनाथ अभि० सा०- 1 ने सभी चारों अभियुक्तों की ठीक-ठीक पहचान कर ली। दुर्गा प्रसाद नामक एक सहयात्री ने अपीलार्थी हुकुम सिंह और लाल सिंह को पहचान लिया गया प्रसाद ने भी हुकुम सिंह और लाल सिंह का पहचान लिया। पहचान करने वाले तीनों साक्षियों ने अभियुक्तों को पहचानने में कोई गलती नहीं की। विचारण न्यायालय ने सभी चारों अपीलार्थियों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 394 और धारा 411 के अधान अपराधों का दोषी पाया। अपील किये जाने पर उच्च न्यायालय ने धारा 411 के अधीन दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया, क्योंकि उन्हें भारतीय दण्ड संहिता के अधीन मुख्य अपराध के लिये धारा 394 के अधीन दोषी पाया गया था। विचारण के दौरान प्रतिरक्षा पक्ष ने यह अभिवचन किया कि पहचान परीक्षा परेड में। अनियमितता बरती गई थी और यह कहा गया कि परेड विलम्ब से की गई थी। दूसरा अभिवचन यह किया गया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में पीड़ित (लूटे गये) व्यक्ति का नाम नहीं दर्ज किया गया। यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियोजन ने जो साक्ष्य प्रस्तुत किया है उससे यह तथ्य साबित होता है कि गिरफ्तारी की तारीख से ही अभियुक्तों को बापर्दा रखा गया था, जिससे कि पुलिस अभिरक्षा में रहते हुये उनके चेहरे न देखे जा सकें। यदि यह मान भी लिया जाए कि पहचान परीक्षा परेड कराने में कुछ विलम्ब हुआ भी है तो भी न्यायालय को सतर्कता बरतना था। इस मामले में अभियुक्तों की दोष सिद्धि प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के पहचान परेड की साक्ष्य पर ही आधारित नहीं है बल्कि की गई बरामदगी के साक्ष्य से संपुष्ट भी है जो लूटी गई करेंसी नोट जिस पर फर्म की सील थी, अपीलार्थी के कब्जे से बरामद हुई। प्रत्यक्षदर्शी साक्षी एक ही डिब्बे में लगभग सात घंटे तक यात्रा करते रहे, अत: कंपार्टमेंट की रोशनी में अभियुक्तों के चेहरे की बनावट को पहचानने का पर्याप्त अवसर था। इन परिस्थितियों में पहचान परेड़ कराने में कोई अनियमितता नहीं हुई है और प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों का साक्ष्य विश्वसनीय था और अभियुक्तों की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। यह तथ्य कि लुटे गये व्यक्ति का नाम प्रथम सूचना रिपोर्ट में नहीं है कोई अधिक महत्व नहीं रखता। इस प्रकति के मामलों में अभियोजन अपना पक्षकथन सामान की बरामदगी जो अपराध की विषय-वस्तु है, के आधार पर सिद्ध करता है।

395, डकैती के लिए दण्ड- जो कोई डकैती करेगा, वह आजीवन कारावास से, या कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

टिप्पणी

एक डकैती में 9 व्यक्तियों ने भाग लिया था जिसमें से पाँच को छोड़ दिया गया तथा शेष 4 को सत्र न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि प्रदान की गयी। उच्च न्यायालय ने 4 में से 3 को उन्मुक्त कर दिया केवल एक को दण्डित किया। ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति की दोषसिद्धि न्यायोचित नहीं कही जा सकती, क्योंकि डकैती में कम से कम 5 व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती है।93

एक प्रकरण में अभियुक्तों पर रेलवे सम्पत्ति के सम्बन्ध में डकैती डालने का आरोप लगाया गया था। किन्तु इस बात का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं था। केवल यह पाया गया था कि रेलवे पटरी के समीप एक ट्रक

93. रामलखन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1983 क्रि० लॉ ज० 697 सु० को०.

खड़ी थी जिस पर 63 सी० एस० टी० 9 प्लेटें रखी हुई थी। जब पुलिस कर्मियों ने टक रोकने । कर्मियों ने ट्रक रोकने से इन्कार कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने अभिनित किया कि इन तथ्यों के आधार पर अभियों को डकैती का दोषी नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रथमतः यह कि ट्रक में जो सामान जाया जा रहा था वह रेलवे की सम्पत्ति थी और उसकी चोरी की गयी थी, इस तथ्य की पुष्टि नहीं हो पायी द्वितीयतः यह कि पुलिस कर्मियों द्वारा ट्रक रोकने का आदेश देना तथा ट्रक कर्मियों द्वारा उस आदेश की अवहेलना करना डकैतों के अपराध का साक्ष्य नहीं हो सकता।24।

प्रतिवादी ने छ: अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर स्टेट बैंक आफ बीकानेर एण्ड जयपुर को लूटा था। बैंक लूटने के बाद में एक नीली अम्बेसडर कार से भागे जो रास्ते में दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। उस स्थान पर पुलिस से उनका मुकाबला हुआ तथा पर्याप्त लुका छिपी तथा भागदौड़ के बाद पुलिस उन्हें पकड़ने में सफल हो गयी। सत्र न्यायालय ने उन्हें डकैती के अपराध का दोषी पाया तथा इस धारा के अन्तर्गत दण्डित किया परन्तु उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष किया। अपील में उच्चतम न्यायालय ने उन्हें पुनः डकैती के अपराध के लिये दण्डित किया परन्तु इस धारा के अन्तर्गत दण्डित करने के बजाय प्रत्येक को उनके सामाजिक स्तर एवं भविष्य की सम्भावनाओं को ध्यान में रखकर 3000 रुपये के जुर्माने से दण्डित किया।95 |

प्रवीन बनाम म० प्र० राज्य96 के वाद में दिन-दहाड़े डकैती कारित की गई थी। बैंक के मैनेजर ने अभियुक्तों में से एक को पहचाना जिसकी बैंक वे एक अन्य कर्मचारी ने भी पुष्टि की। यह अभिनिर्धारित किया गया कि पहचान करने में तमाम कमियों के बावजूद विशेष तथ्यों के आधार पर साक्ष्य मान्य माना जायेगा। पहचान परेड कराने में आरोपित विलम्ब का कोई महत्व नहीं था। अभियुक्त के पास से 40,000 रुपये (चालीस हजार रुपये मात्र) की धनराशि बैंक स्लिपें और अन्य अभिलेख भी बरामद हुआ था। अतएव यह अभिनिर्धारित किया गया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के अन्तर्गत उपधारणा की जा सकती है। आगे यह भी कि अभियुक्त के पास से मिला बैंक के अधिकारी का झोला जिसमे उसके प्राइवेट अभिलेख थे। अत्यन्त महत्वपूर्ण था। अतएव इन तथ्यों और परिस्थितियों के आलोक में यह निष्कर्ष कि अभियुक्त डकैती अपराध का दोषी था हस्तक्षेप करने योग्य नहीं है।

डकैती के अपराध के लिये अभियुक्तों को एक प्रकार के दण्ड से दण्डित किया जाता है। जहाँ किसी। डकैती के वाद में कुछ अभियुक्तों को 10 वर्ष के कठोर कारावास के दण्ड से दण्डित किया जाता है और कुछ अन्य को 8 वर्ष के कारावास के दण्ड से और ऐसा विभेद करने का कोई कारण नहीं बताया जाता है, ऐसी स्थिति में निर्णय को रद्द कर दिया जाएगा और उन्हें समरूप दण्ड से दण्डित किया जायेगा।97 ।

396. हत्या सहित डकैती- यदि ऐसे पांच या अधिक व्यक्तियों में से, जो संयुक्त होकर डकैती कर रहे हों, कोई एक व्यक्ति इस प्रकार डकैती करने में हत्या कर देगा, तो उन व्यक्तियों में से हर व्यक्ति मृत्यु से, या आजीवन करावास से, या कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

टिप्पणी

हत्या सहित डकैती इस धारा के अन्तर्गत प्रत्येक भागीदार के लिये एक जैसे दायित्व का सृजन करती है।

अवयव-(1) अभियुक्तों ने अपने संयुक्त कार्य द्वारा डकैती किया हो,

(2) हत्या डकैती करने के दौरान की गई हो।

यदि पाँच या अधिक व्यक्तियों में से जो संयुक्त होकर डकैती कर रहे हों, कोई एक व्यक्ति इस प्रकार डकैती करने में हत्या कर देता है तो उस समूह का प्रत्येक व्यक्ति हत्या के लिये उत्तरदायी होगा। एक जैस

94डी० जी० सिद्ध गणेश तथा अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1984 क्रि० लॉ ज० 193 सु० को०.

95. राजस्थान बनाम सुखपाल सिंह तथा अन्य, 1983 क्रि० लॉ ज० 1923 सु० को०.

96. (2008) 3 क्रि० लॉ ज० 2980 (सु० को०).

97. लछमन राम इत्यादि बनाम उड़ीसा राज्य, 1985 क्रि० लॉ ज० 753 सु० को०.

उत्तरदायित्व के लिये हत्या स्थल पर सभी अभियुक्तों की उपस्थिति आवश्यक नहीं है। ख के मकान में पाँच 671 डकैतों के एक समूह ने धावा बोल दिया। उनमें से एक के पास बन्दूक थी। लूट करने के पश्चात् जबकि डाकू। लूट में प्राप्त सम्पत्ति के साथ भाग रहे थे, एक ग्रामवासी को मार डाले तथा दूसरे को घातक रूप में घायल कर दिये जिसकी बाद में मृत्यु हो गयी। यह अभिनिर्णीत हुआ कि यह हत्या सहित डकैती का मामला है और उस समूह का प्रत्येक व्यक्ति हत्या सहित डकैती का अपराधी है।।

अभियुक्त तथा मृतक के बीच दुश्मनी थी। अभियुक्त ने अपने साथियों के साथ एक चाँदनी रात्रि में मृतक के घर में डकैती डाला। डकैती के समय घर में एक लालटेन जल रही थी। डकैती के दौरान मृतक मारा गया, उसकी पत्नी तथा साला गम्भीर रूप में घायल हुये थे। डकैती में आभूषण, नकद रुपये तथा कपड़े जिसकी कीमत लगभग 2700 रुपये आंकी गयी थी डकैत उठा ले गये थे। डकैतों ने एक ग्रामवासी को भी घायल कर दिया था। चाँदनी रात तथा लालटेन की रोशनी में डकैतों को मृतक की पत्नी तथा उसके साले ने पहचान लिया था। इन परिस्थितियों में उच्चतम न्यायालय ने अभिनित किया कि धारा 396 के अन्तर्गत प्रदान की गयी दोषसिद्धि वैध है क्योंकि सभी युक्तियुक्त सन्देहों के परे मामले को सिद्ध कर दिया गया था।

जहाँ अभियुक्तों ने पूर्व नियोजित डकैती किया था तथा दो व्यक्तियों की क्रूरतापूर्वक हत्या कर उनके शरीर को दफना दिया था जिससे हत्या के साक्ष्य समाप्त हो जायें वहाँ मृत्यु की सजा को कम नहीं किया जा सकता है 99

उ० प्र० राज्य बनाम सुखपाल सिंह एवं अन्य के वाद में अभियुक्तगणों ने परिसर में प्रवेश किया, लाइसेंसी बन्दूक और अन्य वस्तुयें लूट लिया ओर दो लोगों की मृत्यु कारित कर दी और अन्य को चोटें कारित किया। सभी अभियोजन साक्षियों ने यह कथन किया कि वे अभियुक्तगणों को जानते थे और वे उनके लिये अजनबी नहीं थे। चन्द्रमा की तथा लालटेन की रोशनी में उन्हें भलीभांति पहचान लिये। अतएव यह अभिनिर्धारित किया गया कि पहचान परेड कराने की आवश्यकता नहीं थी। अतएव अभिलेख पर उपलब्ध समस्त साक्ष्य का गलत अर्थ लगाकर और पहचान परेड न कराने के आधार पर उच्च न्यायालय द्वारा अभियुक्तगणों को दोषमुक्त करना निरस्त करने योग्य था और विचारण न्यायालय का भारतीय दण्ड संहिता की धारा 396 के अधीन दोषसिद्धि का निर्णय उच्चतम न्यायालय द्वारा पुन: स्थापित किया गया।

कालिका तिवारी बनाम स्टेट ऑफ बिहार के बाद में सौफुल्ला देवी का विवाह जगनारायण के साथ हुआ था। उसके दो पुत्र और तीन पुत्रियाँ थीं। बड़े पुत्र गौरीशंकर का विवाह हो गया था और छोटा केशवराय भी विवाह योग्य उम्र का हो गया था। जब उसके पुत्र शैशवावस्था में थे तो उस अवधि में सौफुल्ला देवी की सम्पत्ति की देखभाल उसके भाई इन्द्र देव राय (अभियुक्त 4) द्वारा की जाती थी। परन्तु जब उसके पुत्रगण परिपक्व हो गये तो वे जिस प्रकार से उसकी सम्पत्ति के साथ संव्यवहार किया जा रहा था, उससे प्रसन्न नहीं। थे। घटना के कुछ दिन पूर्व इन्द्रदेव राय के पुत्र रमा शंकर राय (अभियुक्त-1) का गौरी शंकर से कुछ विवाद हो गया। घटना के दिन हरिनारायण नामक व्यक्ति सौफिल्ला देवी के घर उसके छोटे पुत्र केशव राय की शादी का प्रस्ताव लेकर आया था। शाम को भोजनोपरान्त जब घर के लोग आराम करने गये तो बन्दूक तथा अन्य घातक शस्त्रों से सुसज्जित डकैत वहाँ आ गये। रमा शंकर राय (अभियुक्त 1) ने सौफुल्ला देवी से तिजोरी की चाभी देने को कहा। डकैतों ने नकदी और जेवरात लूट लिये उसके बाद उन लोगों ने उस कमरे का दरवाजा जहाँ महिलायें बैठी थीं बाहर से बन्द कर दिया और तत्पश्चात् गौरीशंकर राय, केशव राय और उसके मेहमान हरिनारायण की गोली मार कर हत्या कर दी। उसके बाद वे सब लूटी हुई सम्पत्ति के साथ वहाँ से चले गये। कुल 14 लोगों के विरुद्ध आरोप लगाये गये परन्तु विचारण न्यायालय ने केवल 12 लोगों को धारा 302 के बजाय धारा 396/120-ख के अधीन दोष सिद्ध किया। परन्तु उच्च न्यायालय ने उनकी धारा 396/120-ख के अधीन दोषसिद्धि की पुष्टि किया और उसके अतिरिक्त उन्हें धारा 302 सपठित धारा 34

98. ओम प्रकाश तथा अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1983 क्रि० लाँ ज० 837 सु० को०.

99, लल्ली अलियास चिरंजीव भौमिक बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1986 क्रि० लॉ ज० 1083 सु० को०.

1. (2009) 2 क्रि० लॉ ज० 1556 (सु० को०).

2. 1997 क्रि० लॉ ज० 2531 (एस० सी०).

भा० द० संहिता के अधीन भी दोष सिद्ध कर दिया। ग्यारह लोगों ने उच्च न्यायालय के निर्णय के विरु अपील किया। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनित किया कि यदि कोई डकैत डकैती कारित करने के दौरान हत्या भी कर देता है तो उसके सभी साथी जो उस डकैती में भाग ले रहे होते हैं वे भारतीय ट संहिता की धारा 396 के अधीन दोषसिद्ध किये जा सकते हैं चाहे वे लूट में भाग लेने के अतिरिक्त हत्या कर में भागीदार नहीं भी रहे हों। यह आवश्यक नहीं है कि उन सबका अथवा कुछ का अभिप्राय हत्या करना रहा हो, जबकि डकैती की योजना बनाई गई थी। यह भी आवश्यक नहीं है कि उन सबने वास्तव में उसमें भाग लिया हो अथवा उस अपराध को कारित करने के लिए दुष्प्रेरित किया हो। वास्तव में उनका हत्या के स्थान पर उपस्थित होना भी आवश्यक नहीं है अथवा उन्हें इस बात का ज्ञान भी नहीं था कि हत्या कारित किया जाना है अथवा वास्तव में कारित किया गया है। तथापि वे सभी बढ़े हुये दण्ड के लिये दायित्वाधीन होंगे बशर्ते कि डकैती के दौरान उस गैंग के किसी सदस्य द्वारा किसी व्यक्ति की हत्या कारित की गई हो। ऐसे मामलों में अभियोजन द्वारा धारा 34 के अधीन सामान्य आशय अथवा धारा 149 के अधीन आशयित सामान्य उद्देश्य का विद्यमान होना सिद्ध किया जाना आवश्यक नहीं है।

उपरोक्त मामले में अपीलांट के वकील द्वारा यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया कि कमरे के अन्दर मिट्टी की चिमनी जल रही थी जो रोशीन सौफुल्ला देवी द्वारा अपराधियों को पहचानने के लिये बहुत ही कम थी। इस सम्बन्ध में यह अभिनित किया गया कि ग्रामवासियों के लिये इस कम रोशनी में अभियुक्तगणों को पहचानने में कोई समस्या नहीं होगी विशेषकर तब जब कि डकैतों में से कई उनके सगे सम्बन्धी हों। दूसरे शहरी लोगों की रोशनी में देखने की क्षमता चूंकि वे तेज रोशनी के अभ्यस्त होते हैं दूसरे प्रकार की होती है। और वही मानदंड ग्रामवासियों के सम्बन्ध में लागू नहीं किया जा सकता है क्योंकि वे गाँव के दीपक की रोशनी के अभ्यस्त रहते हैं। गाँव के लोग उस रोशनी के अभ्यस्त हो चुके रहते हैं अतएव उन्हें ऐसी रोशनी में किसी चीज या व्यक्ति को पहचानने में कोई कठिनाई नहीं होती है। शहर के लोग उस रोशनी में भले न पहचान सकें परन्तु ग्रामवासियों द्वारा उस कम रोशनी में भी लोगों का पहचान लेना सम्भव है। |

397. मृत्यु या घोर उपहति कारित करने के प्रयत्न के साथ लूट या डकैती- यदि लूट या डकैती करते समय अपराधी किसी घातक आयुध का उपयोग करेगा, या किसी व्यक्ति को घोर उपहति कारित करेगा, या किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करने या उसे घोर उपहति कारित करने का प्रयत्न करेगा, तो वह कारावास, जिससे ऐसा अपराधी दण्डित किया जाएगा, सात वर्ष से कम का नहीं होगा।

टिप्पणी

धारायें 397 तथा 398 किसी स्वतन्त्र अपराध का सृजन न कर लूट तथा डकैती के लिये पूर्व निर्धारित दण्ड को केवल नियन्त्रित करती हैं। यह धारा उन मामलों के लिये कारावास की न्यूनतम सीमा निर्धारित करती है जिनमें लूट या डकैती किसी उत्तेजक परिस्थिति से युक्त रहती है। उदाहरण के लिये घातक आयुधों का उपयोग, और उपहति कारित करना या मृत्यु अथवा घोर उपहति कारित करने का प्रयत्न करना। इस धारा को संरचित करने में इस संहिता की धारा 34 का उपयोग नहीं होता है। घातक आयुध का अभियुक्त के पास होना आवश्यक है। इस धारा के अन्तर्गत दायित्व न तो एक जैसा और न ही धारा 149 की तरह विवक्षित है 5 ।

महत्वपूर्ण वाद- यदि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की तरफ अपनी पिस्तौल उसे भयभीत करने के उद्देश्य से उठाता है तो पिस्तौल का इस उद्देश्य से उठाना ही पर्याप्त है। यह कहना उपयुक्त नहीं है कि कोई व्यक्ति तब तक अपनी पिस्तौल का इस्तेमाल करता नहीं कहा जायेगा जब तक वह उससे आक्रमण नहीं करता। एक प्रकरण में एक व्यक्ति एक खच्चर को चुराने के आशय से उस पर सवार था। अभियुक्त ने लाठी से उस पर

3 कालिका तिवारी बनाम स्टेट आफ बिहार, 1997 क्रि० लॉ ज० 2531 (एस० सी०).

4. अली मिर्जा, (1923) 51 कल० 265.

5. हजारा सिंह, (1946) 25 पटना 277.

6. चन्द्रनाथ, (1931) 1 लखनऊ 543.

एक या दो बार प्रहार किया जिससे सवार की एक बाँह टूट गई और जब जमीन पर गिर पड़ा, तत्पश्चात् 673 अभियुक्त उस खच्चर पर सवार होकर भागना चाहा परन्तु खच्चर की जीन टूट जाने के कारण वह ऐसा न कर सका। यह अभिनित हुआ कि अभियुक्त इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी है।

मुकुन्द बनाम स्टेट आफ मध्य प्रदेश के वाद में अनुज दुबे, उसकी पत्नी सरिता, पुत्री ज्योति तथा पुत्र दीपक विलासपुर पंचवटी कालोनी में रह रहे थे। घटना के दिन श्री दुबे अपने कारोबार के सम्बन्ध में बम्बई गई थे। अपीलांट/अभियुक्त मुकुन्द अनुज प्रसाद के चचेरे भाई सन्तोष दुबे का दामाद था। घटना के लगभग 7 या 8 माह पूर्व मुकुन्द ने अनुज प्रसाद से 10000 (दस हजार) रुपये का ऋण लिया था। इस ऋण । का कुछ समय के बाद भुगतान कर दिया गया था। परन्तु उसके शीघ्र ही बाद अभियुक्त ने कर्ज के लिये फिर मांग करना शुरू कर दिया था जिसे देने से उसने मना कर दिया था। 17 जनवरी, 1994 की शाम को अनुज दुबे की एक पड़ोसी शैलजा उसके घर गयी थी और सरिता के साथ एक प्याला चाय पीने के पश्चात् वह चली । गई और कम्पाउण्ड के दरवाजे में सरिता ने सदा की भाँति ताला बन्द कर दिया। 18 जनवरी, 1994 को दोपहर लगभग 12 बजे शैलजा ने एक चूड़ी विक्रेता को कुछ चूड़ियाँ खरीदने हेतु बुलाया और इस आशा में। कि सरिता को भी चूड़ियाँ खरीदने में दिलचस्पी होगी सरिता को बुलाने हेतु अपनी लड़की को भेजा। यह सूचित किये जाने पर कि सरिता नहीं मिली शैलजा खुद उसके घर गई और उसने सरिता को अपने सोने वाले कमरे में हाथ और बंधे हुये मृत अवस्था में फर्श पर पड़ा हुआ पाया। दोनों बच्चे बिस्तर पर मरे पड़े हुये थे। उसने घर के सामान को तितर बितर तथा स्टील की आलमारी खुली हुई पाया। शैलजा ने अन्य पड़ोसियों को भी इसकी सूचना दी। उनमें से एक डॉ० अवधेश सिंह ने पुलिस को सूचना दे दी और बम्बई में अनुज प्रसाद को भी इस घटना की सूचना दिया। दोनों अभियुक्त/अपीलांट को गिरफ्तार किया गया और उनकी सूचना के आधार पर बहुत सा सामान तथा हत्या में प्रयुक्त खून में सनी कटार (dagger) बरामद किया गया। यह पाया गया कि दुबे का सम्बन्धी होने के नाते अभियुक्त उसके घर बहुधा यहाँ तक कि उसकी अनुपस्थिति में भी जाया करता था। दूसरे पड़ोसियों के साक्ष्य से यह स्पष्ट रूप से सिद्ध था कि अपनी सुरक्षा के प्रति सचेत रहने के कारण सरिता के कम्पाउण्ड की दीवाल के चैनल गेट में प्रतिदिन रात्रि में काफी जल्दी ताला बन्द कर दिया जाता था और ताला तभी खोला जाता था जब वह इस बात से संतुष्ट हो जाती थी कि प्रवेश का इच्छुक व्यक्ति उसका परिचित है। इसके अतिरिक्त कई अन्य पारिस्थितिक साक्ष्य भी उपलब्ध थे। दोनों ही अभियुक्तों की दुर्घटना स्थल पर उपस्थिति सिद्ध कर दी गई थी। अभियुक्तगणों के विरुद्ध परिवादकर्ता के घर में अतिचार करने का आरोप था। अपीलांट लोगों को धारा 397 तथा धारा 302 सपठित धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत हत्या के साथ डकैती करने के लिये दोषी पाया गया। यह अभिनित किया गया कि यदि अभियोजन पक्ष सफलता पूर्वक यह सिद्ध कर देता है कि लूट और हत्या के अपराध एक ही संव्यवहार के दौरान कारित किये गये थे तथा उसके तत्काल बाद सम्पत्ति भी बरामद की गई तो न्यायालय इस आशय का निष्कर्ष निकाल सकता है कि वह व्यक्ति जिसके पास से लूट का माल बरामद होता है उसने न केवल लूट कारित किया है वरन् हत्या भी कारित किया है। साथ ही यदि लूट की सम्पत्ति का बंटवारा भी सिद्ध कर दिया जाता है जैसा कि इस मामले में स्पष्ट है, तो दोनों ही अभियुक्तों को अपराध कारित करने में संयुक्त भागीदारी सिद्ध माना जाता है। अतएव दोनों ही अभियुक्तों की दोषसिद्धि को उचित अभिनित किया गया।

पोथा कामुरी श्रीनिवासुलू बनाम आ० प्र० राज्य के वाद में अभियुक्त पर मृतका के कान की लोलकी (lobes) काट कर कान की बाली की लूट और हत्या का आरोप था। मृतक को कारित चोटों के कारण उसकी मृत्यु हो गई। घटना उस बाग में घटित हुई जहाँ अभियुक्त चौकीदार था। घटना के तुरन्त बाद मृतका ने अभियुक्त के नाम सहित घटना का वर्णन एक दुसरे चौकीदार और चरवाहे (गडरिया) से किया। उसने घटना की अपनी बहिन जो घटना की जानकारी पाकर आ गई थी से भी बताया। ये तीनों ही स्वाभाविक साक्षी है। और ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया जिससे यह लगे कि वे असत्य वर्णन करेंगे। न तो गवाहों से आर नेता

7. हनीमन, (1900) पी० आर० नं० 6 सन् 1901.

8. 1997 क्रि० लॉ ज० 3182 (एस० सी०).

9. 2002 क्रि० लॉ ज० 3569 (एस० सी०).

डाक्टर से ही यह पूछा गया था कि मृतक चोटों के कारण बयान देने की स्थिति में था या नहीं। मतक घटना के दो दिन बाद मृत्यु हो गई। यह तथ्य कि मृतका कान की बाली पहने थी और उन्हें पीड़ित के प्रीसे उसके कान की लोलकी काटकर अभियुक्त ने ले लिया था, उसके मृत्यु कालिक कथन से सिद्ध होता है। जिसमें उसने अभियुक्त का नाम बताया था।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि स्वतंत्र साक्षियों द्वारा वर्णित और शीघ्र दर्ज कराई गई प्रथम सूचना रिपोर्ट से सम्पुष्ट मृत्यु कालिक कथन इस पूर्वानुमान (assumption) पर कि चोटहिल बेहोश हो गया था और चोटों के कारण बोलने में असमर्थ था, अस्वीकार नहीं किया जा सकता है । चूंकि मृत्यु अभिन्न रूप से कान की। बाली के तोड़ने से सम्बन्धित है इसलिये मृत्युकालिक कथन को पूर्णरूपेण विश्वसनीय पाया गया। यह अभिनित किया गया कि अभियुक्त को निर्विवाद रूप से मृतक को चोट पहुंचाने और कान की बाली निकालने के लिये जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। यह तथ्य कि कान की बाली की अभियुक्त के पास से । बरामदगी संदेहास्पद थी, महत्वहीन है।

अशफाक बनाम राज्य (रा० रा० क्षेत्र दिल्ली )10 के मामले में यह अभिधारित किया गया कि नि:संदेह भा० द० संहिता की धारा 397 के प्रावधानों को आकृष्ट करने के लिए अभियुक्त का केवल वैयक्तिक कार्य ही सुसंगत है और इस प्रकार यह संहिता की धारा 34 में अन्तर्वलित आन्वयिक अथवा प्रतिनिधायी दायित्व के सिद्धान्त के प्रयोग को अवश्यम्भावी रूप से नकारता है। परिणामतः भा० द० संहिता की धारा 34 की प्रवर्तनीयता इस कारण तर्कसंगत नहीं होगी क्योंकि इस मामले में अभियुक्तों में से प्रत्येक द्वारा अपना-अपना घातक हथियार लहराया जा रहा था और इस प्रकार भा० द० संहिता की धारा 34 की सहायता लिये बिना ही संहिता की धारा 397 के संघटकों/अवयवों का होना पूर्ण हो रहा था। इस मामले में यद्यपि मात्र एक ही अभियुक्त के पास देशी पिस्तौल थी परन्तु अन्य लोग भी हथियार लिये हुये थे और चाकुओं का। प्रयोग भी किया और संहिता की धारा 397 के प्रयोजनों हेतु चाकू को भी घातक हथियार माना जायेगा। अतएव धारा 397 के अधीन दोषसिद्धि न्यायोचित है।

आगे यह भी अभिधारित किया गया कि ‘‘प्रयोग करता है” (uses) शब्द का भा० द० संहिता की धारा 397 के अधीन अर्थ यह है कि किसी ऐसे अपराधकर्ता, जो घातक हथियारों से लैश था, द्वारा लूट कारित किया जाना जिसे पीड़ित व्यक्ति देख सकता हो और जिसमें उसके मस्तिक में आतंक का भाव उत्पन्न करने की क्षमता हो। यह दर्शित करने की आवश्यकता नहीं है कि उस हथियार का प्रयोग वास्तव में काटने, घोंपने या शूट करने में, जैसा कि मामला हो, किया गया।

इस मामले में अभियुक्तों में से एक को घर के लोग जानते थे क्योंकि उसने घर में पुताई का काम किया था और वह अभियुक्त घर में काफी देर तक घरवालों को यह धमकाते हुए मौजूद था कि उनके कीमती सामनों को लूट लेगा। अतएव अभियोजन पक्ष के साक्षियों के साक्ष्य अभियुक्त की पहचान अच्छी तरह करने के लिये काफी थे और यह साक्ष्य पहिचान परेड के अभाव में भी विश्वसनीय था। उनमें से एक जिसकी पहचान कर ली गयी थी उसका पता भी चल गया था और इस खोज से अधिकारियों को शेष का पता लग गया। अतएव यह नहीं कहा जा सकता है कि बिना पहले पहिचान परेड कराये अभियुक्तों की न्यायालय में पहचान कराना साक्ष्य को पूर्ण रूपेण अविश्वसनीय बना देता है।

398. घातक आयुध से सज्जित होकर लूट या डकैती करने का प्रयत्न- यदि लूट या। डकैती करने का प्रयत्न करते समय, अपराधी किसी घातक आयुध से सज्जित होगा, तो वह कारावास, जिसस ऐसा अपराधी दण्डित किया जाएगा, सात वर्ष से कम का नहीं होगा।

399. डकैती करने के लिए तैयारी करना- जो कोई डकैती करने के लिए कोई तैयारी करेगा, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

10. 2004 क्रि लॉ ज० 936 (सु० को०).

टिप्पणी

जो कोई डकैती के लिये कोई तैयारी करता है वह इस धारा के अन्तर्गत दण्डित किया जायेगा। इस संहिता के अन्तर्गत केवल तीन मामलों में तैयारी को दण्डनीय बनाया गया है

(1) भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के आशय से तैयारी करना (धारा 122),

(2) भारत सरकार के साथ शान्ति का सम्बन्ध रखने वाली शक्ति के राज्य क्षेत्र में लूटपाट करने की तैयारी करना (धारा 126),

(3) डकैती करने की तैयारी (धारा 399)। |

प्रचलित अर्थों में डकैती करने के लिये मात्र एकत्रित होना ही तैयारी है। किन्तु केवल एकत्र होना बिना किसी अन्य तैयारी के इस धारा के अन्तर्गत तैयारी नहीं है। डकैती करने के लिये मात्र एकत्र होना ही बिना तैयारी के सबूत के धारा 402 के अन्तर्गत दण्डनीय बनाया गया है। कोई व्यक्ति डकैती डालने का अपराधी न होते हुये भी डकैती डालने की तैयारी का अपराधी हो सकता है। इसी प्रकार डकैती करने की तैयारी का दोषी न होते हुये भी डाका डालने के लिये एकत्र होने का दोषी हो सकता है।11

400, डाकुओं की टोली का होने के लिए दण्ड- जो कोई इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात् किसी भी समय ऐसे व्यक्तियों की टोली का होगा, जो अभ्यासत: डकैती करने के प्रयोजन से सहयुक्त हों, वह आजीवन कारावास से, या कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

टिप्पणी

इस धारा के अन्तर्गत उन व्यक्तियों को दण्डित किया गया है जो अभ्यासत: डकैती डालने वाले समूह से सहयुक्त होते हैं। इस धारा का उद्देश्य डाकुओं के समूह को नष्ट करना है। यह तथ्य कि कुछ औरतें डाकुओं के साथ उनकी पत्नियों या रखैलों के रूप में रह रही हैं, इस बात को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त नहीं है कि डाकुओं के गिरोह से उनका सम्बन्ध है। यह सिद्ध करना आवश्यक है कि औरतें स्वयं पतियों या रखवालों से अभ्यासत: स्वयं डकैती करने के लिये सहयुक्त थीं।12 |

इस धारा में प्रयुक्त टोली का होगा” पदावली से तात्पर्य किसी ऐसे व्यक्ति का जो साधारणतया ईमानदारी से जीवन व्यतीत कर रहा हो एक या दो डकैती करने के प्रयोजन हेतु सामयिक सहयुक्ति से कुछ अधिक है। यह पदावली उन व्यक्तियों को इंगित करती है जो डाकुओं के किसी गिरोह से अभ्यासत: सहयुक्त हैं तथा डाकुओं की कार्यवाही में सक्रिय भूमिका अदा करते हैं। किन्तु यदि कोई व्यक्ति जिसका पिछला रिकार्ड अच्छा नहीं था किसी जाने माने डाकू गिरोह से यह जानते हुये सहयुक्त हों कि वह एक डाकू गिरोह है, डकैती डालने में यदि एक बार भी हिस्सा लेता है तो यह निष्कर्ष निकाला जायेगा कि वह उस गिरोह का सदस्य है जबतक कि यह सिद्ध करने का तथ्य रिकार्ड पर न हो कि सहयुक्ति सामयिक प्रकृति की थी।13। ।

401. चोरों की टोली का होने के लिए दण्ड- जो कोई इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात किसी भी समय ऐसे व्यक्तियों की किसी घूमती-फिरती या अन्य टोली का होगा, जो अभ्यासत: चोरी या लुट करने के प्रयोजन से सहयुक्त हों और वह टोली ठगों या डाकुओं की टोली न हो, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

402, डकैती करने के प्रयोजन से एकत्रित होना- जो कोई इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात् किसी भी समय डकैती करने के प्रयोजन से एकत्रित पांच या अधिक व्यक्तियों में से एक होगा, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

11. जैन लाल, (1942) 21 पटना 667.

12. येल्ला, (1896) अनरिपोर्टेड क्रिमिनल केसेज 863.

13. भीम शा, (1956) कटक 195; बाई चतुरी, ए० आई० आर० 1960 गुज० 5.

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