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Indian Penal Code Offences Against Property of Cheating LLB Notes

 

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छल के विषय में (OF CHEATING )

LLB Notes Study Material

415. छल-जो कोई किसी व्यक्ति से प्रवंचना कर उस व्यक्ति को, जिसे इस प्रकार प्रवंचित किया गया है, कपटपूर्वक या बेईमानी से उत्प्रेरित करता है कि वह कोई सम्पत्ति किसी व्यक्ति को परिदत्त कर दे, या यह सम्मति दे दे कि कोई व्यक्ति किसी सम्पत्ति को रखे या साशय उस व्यक्ति को, जिसे इस प्रकार प्रवंचित किया गया है, उत्प्रेरित करता है कि वह ऐसा कोई कार्य करे, या करने का लोप करे जिसे वह यदि उसे इस प्रकार प्रवंचित न किया गया होता तो, न करता, या करने का लोप न करता, और जिस कार्य या लोप से उस व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, ख्याति सम्बन्धी या साम्पत्तिक नुकसान या अपहानि कारित होती है, या कारित होनी सम्भाव्य है, वह ‘‘छल” करता है, यह कहा जाता है।

स्पष्टीकरण- तथ्यों का बेईमानी से छिपाना इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत प्रवंचना है।

दृष्टान्त

(क) क सिविल सेवा में होने का मिथ्या अपदेश करके साशय य से प्रवंचना करता है, और इस प्रकार बेईमानी से य को उत्प्रेरित करता है कि वह उसे उधार पर माल ले लेने दे, जिसका मूल्य चुकाने का उसका इरादा नहीं है। क छल करता है।

(ख) क एक वस्तु पर कूटकृत चिन्ह बनाकर य से साशय प्रवंचना करके उसे यह विश्वास कराता है। कि वह वस्तु किसी प्रसिद्ध विनिर्माता द्वारा बनाई गई है, और इस प्रकार उस वस्तु, का क्रय करने और उसका मूल्य चुकाने के लिए य को बेईमानी से उत्प्रेरित करता है। क छल करता है।

(ग) क, य को किसी वस्तु का, नकली सैम्पल दिखला कर य से साशय प्रवंचना करके, उसे यह विश्वास कराता है कि वह वस्तु उस सैम्पल के अनुरूप है, और तद्द्वारा उस वस्तु को खरीदने और उसका मूल्य चुकाने के लिए य को बेईमानी से उत्प्रेरित करता है। क छल करता है।

(घ) क किसी वस्तु का मूल्य देने में ऐसी कोठी पर हुण्डी करके, जहाँ क का कोई धन जमा नहीं है, और जिसके द्वारा क को हुण्डी का अनादर किए जाने की प्रत्याशा है, साशय य से प्रवंचना करता है, और तदद्वारा बेईमानी से य को उत्प्रेरित करता है कि वह यह वस्तु परिदत्त कर दे जिसका मूल्य चुकाने का उसका आशय नहीं है। क छल करता है।

(ङ) क ऐसे नगों को, जिनको वह जानता है कि वे हीरे नहीं हैं, हीरों के रूप में गिरवी रख कर य से साशय प्रवंचना करता है, और तद्वारा धन उधार देने के लिए य को बेईमानी से उत्प्रेरित करता है। क छल करता है।

(च) क साशय प्रवंचना करके य को यह विश्वास कराता है कि क को जो धन य उधार देगा उसे वह चुका देगा, और तद्द्वारा बेईमानी से य को उत्प्रेरित करता है कि वह उसे धन उधार दे दे, जबकि क का आशय उस धन को चुकाने का नहीं है। क छल करता है।

(छ) क, य से साशय प्रवंचना करके यह विश्वास दिलाता है कि क का इरादा य को नील के पौधों का एक निश्चित परिमाण परिदत्त करने का है, जिसको परिदत्त करने का उसका आशय नहीं है, और तद्द्वारा ए परिदान के विश्वास पर अग्रिम धन देने के लिए य को बेईमानी से उत्प्रेरित करता है। क छल करता है याद भिप्राप्त करते समय नील परिदत्त करने का आशय रखता हो और उसके पश्चात् अपनी संविदा भग ’99. हरी सिंह, (1940) 2 कल० 9.

कर दे और वह उसे परिदत्त न करे, तो वह छल नहीं करता है, किन्तु संविदा भंग करने के लिए केवल सिविल कार्यवाही के दायित्व के अधीन है।

(ज) क साशय प्रवंचना करके य को यह विश्वास दिलाता है कि क ने य के साथ की गई संविदा के अपने भाग का पालन कर दिया है, जबकि उसका पालन उसने नहीं किया है, और तद्वारा य को बेईमानी से उत्प्रेरित करता है कि वह धन दे। क छल करता है।

(झ) क, ख को एक सम्पदा बेचता और हस्तान्तरित करता है। क यह जानते हुए कि ऐसे विक्रय के परिणामस्वरूप उस सम्पत्ति पर उसका कोई अधिकार नहीं है, ख को किए गए पूर्व विक्रय और हस्तान्तरण के तथ्य को प्रकट न करते हुए उसे य के हाथ बेच देता है या बन्धक रख देता है, और य से विक्रय या बन्धक धन प्राप्त कर लेता है। क छल करता है।

टिप्पणी

कोई व्यक्ति छल करता हुआ कहा जाता है यदि वह किसी दूसरे व्यक्ति से प्रवंचना कर उसे कपटपूर्वक या बेईमानी से उत्प्रेरित करता है कि वह कोई सम्पत्ति उसे परिदत्त कर दे या सम्मति दे दे कि वह कोई। सम्पत्ति रखेगा या इस प्रकार प्रवंचित व्यक्ति को साशय प्रेरित करता है कि वह कोई कार्य करे या करने का लोप करे जिसे यदि वह इस प्रकार प्रवंचित न किया गया होता तो न करता या लोप न करता तथा जिस कार्य का लोप से उस व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, ख्याति सम्बन्धित या साम्पत्तिक नुकसान या अपहानि कारित होती है, कारित होगी सम्भाव्य है।

अवयव-इस धारा के अन्तर्गत निम्नलिखित अपेक्षित है

(1) किसी व्यक्ति को प्रवंचित किया जाये,

(2) (अ) प्रवंचित व्यक्ति को कपटपूर्वक या बेईमानी से,

(क) किसी व्यक्ति को सम्पत्ति परिदत्त करे, या

(ख) किसी व्यक्ति को कोई सम्पत्ति रखने हेतु सम्पत्ति देने के लिये उत्प्रेरित किया जाये।।

(ब) साशय उस व्यक्ति को कोई कार्य करने या करने या करने का लोप करने के लिये उत्प्रेरित करना जिसे यदि उसे इस प्रकार प्रवंचित न किया गया होता तो न करता या लोप न करता तथा जिस कार्य या लोप से उस व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, ख्याति सम्बन्धित या साम्पत्तिक नुकसान या अपहानि कारित होती है या कारित होनी सम्भाव्य है।

रामदास बनाम उत्तर प्रदेश राज्य2 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारा 415 में वर्णित अपराध का विश्लेषण निम्नलिखित ढंग से किया था

(1) किसी व्यक्ति को प्रवंचित कर उसे कपटपूर्वक या बेईमानी से उत्प्रेरित करने का आशय होना। चाहिये।  (2) (क) इस प्रकार प्रवंचित व्यक्ति को किसी व्यक्ति की कोई सम्पत्ति परिदत्त करने या किसी व्यक्ति को कोई सम्पत्ति रखने हेतु सम्मति देने के लिये उत्प्रेरित किया जाना चाहिये, या ।

(ख) इस प्रकार प्रवंचित व्यक्ति को कोई कार्य करने या उसका लोप करने के लिये साशय उत्प्रेरित किया। जाना जिसे वह इस प्रकार प्रबंधित न किया गया होता तो न करता या लोप न करता;

(3) अवयव (2) (ख) में वर्णित मामलों में कार्य या लोप ऐसा होना चाहिये जिससे उत्प्रेस्ति व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, ख्याति सम्बन्धित या साम्पत्तिक अपहानि कारित हो या कारित होना सम्भाव्य हो।

छल के अपराध का सारांश यह है कि प्रवंचना द्वारा कारित क्षति या उपहति उस व्यक्ति के सम्बन्ध में सिद्ध किया जाना चाहिये जिसे प्रवंचित किया गया था। वाणिज्यिक प्रकृति के संव्यवहारों में स्वीकृतियों के उल्लंघन के फलस्वरूप कारित होती है परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वह छल की परिधि के अन्तर्गत हा आता हो।

1. हरीस साओ बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1970 सु० को० 843. (1971)

2 एस० सी० जे० 264.

फजलुर रहमान बनाम सुरिन्दर कुमार3 के बाद में शिकायतकर्ता ने अभियुक्त को उसके इस निवेदन पर

701 माल प्रेषित किया कि मूल्य का भुगतान किसी वाद की तिथि पर किया जाएगा। परन्तु मूल्य का भुगतान उस तिथि को नहीं किया गया, वह छल का प्रकरण नहीं होगा। यह केवल एक संविदा क्षेत्र का मामला है। प्रवंचना इस संहिता के अन्तर्गत परिभाषित नहीं है यद्यपि यह छल का एक अवयव है। कोई व्यक्ति प्रवंचित किया हुआ तब कहा जाता है जब उसे किसी असत्य वस्तु को सत्य मानने के लिये उत्प्रेरित किया जाता है। इस बेईमानीपूर्ण आशय को उस समय अस्तित्व में होना चाहिये जब कार्य किया गया था। रतन लाल शर्मा बनाम मांगेराम घनश्याम दास के वाद में अभियुक्त ने माल का परिदान इस आधार पर लने से इन्कार कर दिया कि कीमतें गिर गयीं हैं। यह अभिनिर्णीत हुआ कि जिस समय माल परिप्रेषित किया गया था उस समय अभियुक्त का कोई आशय नहीं था कि वह शिकायतकर्ता को उत्प्रेरित करे ताकि वह अपने माल से हाथ धो बैठे। अभियुक्त ने किसी प्रकार की प्रवंचना का प्रयोग नहीं किया था। वस्तुतः अधिकांश संविदात्मक संव्यवहारों में जहाँ प्रवंचना होती है, संव्यवहार करते समय आशय का अभाव रहता है। । सम्पत्ति के परिदान के सम्बन्ध में छल का प्रयोग होता है। यह आवश्यक नहीं है कि सम्पत्ति का मूल्य रूपये में या बाजार मूल्य के रूप में आंका जा सके। किन्तु यदि किसी व्यक्ति को उत्प्रेरित कर दिया जाता है।

और वह सम्पत्ति का परिदान कर देता है तो जिस व्यक्ति के पास उनका कब्जा रहता है उनके हाथों में यह मूल्यवान वस्तु बन जाती है और यह माना जाता है कि इस धारा के सभी अवयव पूर्ण हो गये हैं। अत: धारा 415 तथा 420 के अन्तर्गत एक पासपोर्ट सम्पत्ति होगी।

(1) किसी व्यक्ति को प्रवंचित करना-एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को प्रवंचित करता है यदि वह किसी तथ्य के साथ होने का विश्वास दिलाता है जबकि वह तथ्य मिथ्या या भ्रामक है या उसे भूल करने के लिये प्रेरित करता है। कपट करने के आशय से किसी निश्चित तथ्य का साशय दुर्व्यपदेशन करना छल का अपराध संरचित करता है। केवल यह सिद्ध किया जाना पर्याप्त नहीं है कि मिथ्या प्रदर्शन किया गया था। अपितु यह भी सिद्ध किया जाना चाहिये कि अभियुक्त को यह ज्ञात था कि प्रदर्शन मिथ्या था तथा परिवादकर्ता को प्रवंचित करने के आशय से किया गया था। एक प्रकरण में अभियुक्त ने अपनी उम्र तथा अर्हता के विषय में लोक सेवा आयोग को मिथ्या सूचना दिया। उसे इस अपराध का दोषी ठहराया गया। यह अभिनिर्धारित हुआ। कि यद्यपि आयोग एक स्वतंत्र सांविधिक संस्था था और इसका कार्य सलाह मशविरा देना था तथापि इस तरह की संस्था को प्रवंचित करना सरकार को प्रवंचित करने के तुल्य था। अतः अभियुक्त इस धारा के अन्तर्गत उत्तरदायी माना गया 6 अ, एम० ए० की परीक्षा में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में सम्मिलित होने के लिये आगरा यनिवर्सिटी की स्वीकृति हेतु आवेदन प्रस्तुत करता है। वह यह दर्शाता है कि उसने बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण कर लिया है तथा बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण किये गये लगभग 3 वर्ष हो गये हैं तथा तब से एक स्कूल में पढ़ा रहा है। अपने समर्थन में वह कुछ प्रमाण-पत्र लगाता है जिन्हें वह स्कल के प्रधान अध्यापक का प्रमाण-पत्र बताता है। यूनिवर्सिटी पहले तो स्वीकृति दे देती है पर बाद में यह पाये जाने पर कि उसके प्रमाण-पत्र असत्य हैं तथा वह न तो स्नातक है और न ही अध्यापक है, स्वीकृति वापस ले लेती है। इस मामले में अ छल के प्रयत्न का दोषी होगा। किन्तु यदि वह परीक्षा में प्रवंचना के आधार पर प्राप्त स्वीकृति से सम्मिलित हो गया होता तो वह छल के लिये दण्डनीय हुआ होता।

यदि कोई व्यक्ति यह जानता है कि एक दूसरे व्यक्ति द्वारा दिया गया वक्तव्य मिथ्या है फिर भी उसको फंसाने के उद्देश्य से उस वक्तव्य के आधार पर कोई कार्य करता है तो अभियुक्त इस अपराध को कारित करने के प्रयत्न का दोषी होगा। यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुये कि दूध जल मिश्रित है उसे खरीद लेता है जिससे विक्रेता पर अभियोग लगाया जा सके, ऐसी स्थिति में विक्रेता द्वारा कारित अपराध छल करने का प्रयत्न मात्र होगा।

3. (1977) क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 15 (हिमा०).

4(1977) क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 19 (मद्रास).

५. एन० एम० चक्रवर्ती बनाम राज्य, 1977 क्रि० लॉ ज० 961 (सु० को०).

6. के० कृष्णामूर्थी बनाम मद्रास राज्य, ए० आई० आर० 1965 सु० को० 333.

7. अभयानन्द, ए० आई० आर० 1961 सु० को० 1698.

8. काली मोडक, (1872) 18 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 61.

(2) इस प्रकार प्रबंधित व्यक्ति को कोई सम्पत्ति परिदत्त करने के लिये कपटप बेईमानी से प्रेरित करना-इस धारा के अन्तर्गत लगाये गये आरोप का स्तर यह है कि अभियने । व्यक्ति को कपटपूर्वक या बेईमानी से उत्प्रेरित किया। बेईमानीपूर्ण आशय या तो कार्य के पूर्व या उसके साथ साथ होना चाहिये। किसी व्यक्ति की योग्यता के सन्दर्भ में की गयी संस्तुति मिथ्या व्यपदेशन के तुल्य नहीं है। अतः उत्प्रेरण नहीं होगा। व्यपदेशन यह जानते हुये किया जाना चाहिये कि वह मिथ्या है और जिससे किसी व्यक्ति को सदोष लाभ या हानि कारित हो।10 अ और ब संयुक्त रूप में 15 वर्ष से कम आयु के एक बच्चे को उसकी हत्या करने के उद्देश्य से उसे फुसलाते हैं। बच्चे की सचमुच हत्या हो जाती है। अ तथा ब बिना अपना नाम जाहिर किये हुये उसके पिता फ से इस बहाने फिरौती (ransom) की माँग करते हैं कि यदि फिरौती का भुगतान कर दिया जाता है तो बच्चा वापस लौट जायेगा। फिरौती का भुगतान कर दिया जाता है परन्तु वह वापस नहीं लौटता है। यहाँ अ, तथा ब हत्या के लिये दण्डनीय होंगे साथ ही छल के लिये भी क्योंकि उन्होंने बेईमानीपूर्ण आशय से फ को फिरौती का भुगतान करने के उत्प्रेरित किया था। यह मामला उद्दापन के अन्तर्गत नहीं आयेगा, क्योंकि फिरौती धमकी या भय द्वारा नहीं प्राप्त की गयी थी।

उमा दत्ता बनाम महादेवन11 के वाद में यह मत व्यक्त किया गया कि छल का अपराध गठित करने हेतु अपराधी द्वारा बेईमानीपूर्ण आशय से प्रवंचित व्यक्ति को सम्पत्ति परिदत्त करने हेतु उत्प्रेरित किया जाना आवश्यक है। इस मामले में याचिकादाता उमा दत्ता ने 10,000 रुपये का भारतीय स्टेट बैंक से ऋण अपने 10 तोले सोने के आभूषणों को गिरवी रखकर लिया था। बैंक द्वारा उसे कई पत्र इस आशय के प्राप्त हुये कि वह शीघ्रातिशीघ्र अपना ऋण अदा कर दे। अन्त में 14-12-87 को उसे एक पत्र मिला कि यदि शीघ्र ऋण को अदा नहीं किया जाता तो 15-1-88 को आभूषणों को नीलाम कर दिया जायेगा। नीलामी की तारीख बढ़ा दी गयी थी और बढ़ी हुई तिथि के पहले ही शेष ऋण को अदा कर दिया गया। परन्तु इसके दो दिन पूर्व ही बैंक के मैनेजर ने पेटीसनर को एक पत्र द्वारा सूचित किया था कि आभूषणों को उच्च अधिकारियों से अनुमति प्राप्त होने के बाद ही वापस किया जायेगा क्योंकि पेटीसनर के पति जो बैंक के कर्मचारी थे, एक कपट के मामले में फंसे हैं। शिकायतकर्ता ने बैंक से कहा कि आभूषण उसकी स्त्रीधन सम्पत्ति है और उसे बैंक रोकने का अधिकारी नहीं है क्योंकि उसने बैंक का ऋण अदा कर दिया है। उच्च अधिकारियों की अनुमति न मिलने के कारण बैंक मैनेजर ने आभूषण वापस करने से मना कर दिया। यह आरोप लगाया गया कि मैनेजर को इस बात की पहले से ही जानकारी थी कि पेटीसनर का पति कपट के अपराध में फंसा है। अतएव उसका इरादा आभूषण वापस करने का नहीं था तथापि उसने ऋण की राशि की अदायगी हेतु उत्प्रेरित कर 9333.20 रुपये का, जो पेटीसनर ने बैंक को अदा किया, सदोष हानि कारित किया। यह निर्णय दिया गया कि मैनेजर छल के लिये अपराधी नहीं है क्योंकि आभूषण की वापसी हेतु ऋण की अदायगी हेतु उत्प्रेरित करने में उसका बेईमानीपूर्ण आशय नहीं था, क्योंकि उसने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उच्च अधिकारियों की अनुमति मिलने के बाद ही आभूषण वापस किया जायेगा।

सम्मति-सम्पत्ति चल या अचल किसी भी प्रकार की हो सकती है।12

(3) प्रवंचित व्यक्ति को कोई कार्य करने या लोप करने के लिये साशय उत्प्रेरित करना जिसे वह अन्यथा नहीं करेगा- जिस व्यक्ति के साथ छल किया गया हो उसे साशय कोई कार्य करने के लिये उत्प्रेरित किया गया हो जिसे उसने अन्यथा नहीं किया होता या किसी कार्य का लोप करने के लिये। उत्प्रेरित किया गया हो जिसे उसने अन्यथा किया होता।।

उदाहरण- यदि कोई व्यक्ति बिना टिकट खरीदे गुप्त रूप से किसी प्रदर्शनी में घुस जाता है और अन्दर उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है तो उसका कार्य छल नहीं माना जायेगा।13 किन्तु यदि अभियुक्त गेटकीपर से

9. वासुदेव कुलकर्नी, (1977) क्रि० लॉ ज० 1152.

10. हरी प्रसाद चमारिया, ए० आई० आर० 1974 सु० को० 301.

11. 1993 क्रि० लॉ ज० 3231 (उड़ीसा).

12. आर० के० डालमियाँ बनाम दिल्ली प्रशासन, ए० आई० आर० 1962 सु० को० 1821.

13. मेहरबान जी बेजानजी, (1969) 6 वी० एच० सी

यह कहता है कि उसके पास टिकट है और इस आधार पर वह अन्दर प्रदर्शनी में घुस जाता है तो वह

703 निश्चयतः छल करने का दोषी होगा। यदि कोई यात्री निम्न श्रेणी का रेलवे टिकट खरीद कर उच्च श्रेणी के डिब्बे में यात्रा करता है।14 या यदि कोई यात्री अपना कुछ सामान अपने सहयात्री को पकड़ा देता है जिससे वह अतिरिक्त सामान का भाड़ा देने से बच जाये15 तो छल का अपराध कारित हुआ नहीं माना जायेगा।

यदि अ एक चैक किसी व्यक्ति को देता है जिसके बारे में यह जानता है उस चैक पर भुगतान नहीं होगा। तो अ छल के लिये दण्डनीय होगा। इसी प्रकार यदि अ अपने आप को मिथ्या शीर्षक से कोई पुस्तक लिखता है तो वह छल के लिये दण्डनीय होगा।

सुबोध एस० सलास्कर बनाम जयप्रकाश एम० शाह एवं अन्य16 के बाद में अभियुक्त पर बाद के। दिनांक (post-dated) का चैक निर्गत करने का आरोप था। उस तिथि के कई दिन बाद बैंक में जमा किये जाने पर चैक इस आधार पर अनादर कर दिया गया कि खाता चालू नही रह गया था। यह अभिनिर्धारित किया। गया कि भले ही अभियुक्त ने बाद में अपना खाता बन्द कर दिया है परन्तु इससे अभियुक्त का चैक जारी करने की तारीख के प्रारम्भ से ही शिकायतकर्ता के साथ कपट करने के आशय का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। अतएव भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420 लागू नहीं मानी गयी।

यदि कोई शपथ कमिश्नर अपीलार्थी द्वारा दिये गये शिनाख्त के आधार पर किसी हलफनामे को प्रमाणित कर देता है तो इस धारा के अन्तर्गत अपराध संरचित नहीं होगा, क्योंकि प्रमाणीकरण मात्र से कमिश्नर को मानसिक, शारीरिक, ख्याति सम्बन्धित या साम्पत्तिक अपहानि कारित होना सम्भाव्य नहीं है।17 एक प्रकरण में फ अनेक व्यक्तियों के घर गया तथा उनसे फोटोग्राफ से चित्र तैयार करने की संविदा किया। वह सभी से। अग्रिम भुगतान तो लिया परन्तु किसी के लिये कार्य नहीं किया और यह भी प्रतीत हुआ कि उसका कोई कार्य। करने का आशय भी नहीं था। फ छल के अपराध का दोषी है क्योंकि उसने सभी को प्रवंचित करके उत्प्रेरित किया कि वे लोग उसे अग्रिम भुगतान कर दें।

किसी सादे कागज पर केवल अंगूठे का निशान लेना छल करने की तैयारी हो सकता है किन्तु जब तक पत्र का पूरा ब्यौरा तैयार नहीं कर लिया जाता तब तक यह कार्य न तो छल होगा और न ही छल करने का प्रयत्न।

ए० के० खोसला बनाम टी० एस० वेन्कटेसन19 के वाद में यह मत व्यक्त किया गया कि विक्रय हेतु माल के गुण की असत्य प्रशंसा छल का अपराध नहीं है।

जिबरियाल दीवान बनाम स्टेट आफ महाराष्ट्र20 के वाद में मंत्री महोदय के लेटर हेड पर पटेल नामक एक व्यक्ति ने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने हेतु दो निमंत्रण पत्र तैयार किया। यह पत्र मंत्री महोदय द्वारा हस्ताक्षरित नहीं था। श्री पटेल द्वारा तैयार किया गया यह निमंत्रण पत्र अपीलांट द्वारा दोनों आमंत्रित अतिथियों को दिया गया। श्री पटेल को उच्च न्यायालय द्वारा दोषमुक्त कर दिया गया, परन्तु अपीलांट को उच्च न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध किया गया। अतएव उसने उच्चतम न्यायालय में अपील किया। यह अभिनित किया गया कि अपीलांट भारतीय दण्ड संहिता की धारा 417 के अधीन दोषी नहीं है क्योंकि न तो उसके कार्य से किसी व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक अथवा ख्याति सम्बन्धी कोई क्षति कारित हुई थी और न तो उसके कारित होने की सम्भावना ही थी।

छल तथा उद्दापन में अन्तर-छल का अपराध उद्दापन के अपराध के समान है क्योंकि दोनों ही सदोष पूर्ण रीति से सम्मति प्राप्त कर कारित किये जाते हैं। परन्तु दोनों में अन्तर यह है कि उद्दापन में उद्दापन भय द्वारा सम्मति प्राप्त करता है जबकि छल में छल करने वाला व्यक्ति प्रवंचना द्वारा सम्मति प्राप्त करता है।

14. दयाभाई परजम, (1864) 1 बी० एच० सी० 140.

15. पारस राम, (1903) पी० आर० नं० 25 सन् 1903.

16. (2008) 4 क्रि० लॉ ज० 3953 (सु० को०).

17. | राम जस, ए० आई० आर० 1974 सु० को०

18. शिव प्रसाद, ए० आई० आर० 1926 पटना 267.

19. 1992 क्रि० लाँ ज० 1448 (कल०).

20. 1997 क्रि० लॉ ज० 4070 (एस० सी०).

प्रतिरूपण द्वारा छल-कोई व्यक्ति प्रतिरूपण द्वारा छल करता है, यह तब कहा जाता जब वह यह अपदेश करके कि वह कोई अन्य व्यक्ति है, या एक व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति के रूप में जानते हुए प्रतिस्थापित करके, या यह व्यपदिष्ट करके कि वह या कोई अन्य व्यक्ति, कोई ऐसा व्यक्ति है । वस्तुतः उससे या अन्य व्यक्ति से भिन्न है, छल करता है।

स्पष्टीकरण- यह अपराध हो जाता है चाहे वह व्यक्ति जिसका प्रतिरूपण किया गया है, वास्तविक व्यक्ति हो या काल्पनिक।

दृष्टान्त

(क) क, उसी नाम का अमुक धनवान बैंकर है, इस अपदेश द्वारा छल करता है। क प्रतिरूपण द्वारा छल करता है।

(ख) ख, जिसकी मृत्यु हो चुकी है, होने का अपदेश करने द्वारा क छल करता है। क प्रतिरूपण द्वारा छल करता है।

टिप्पणी

 जब कोई व्यक्ति शब्द, कृत्य, संकेत या वस्त्र द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाकर कोई अन्य व्यक्ति होने का अपदेश करता है तो यह माना जायेगा कि उसने इस धारा में वर्णित अपराध किया है किन्तु साथ ही यह भी आवश्यक है कि इस प्रक्रिया द्वारा उसे कोई लाभ हुआ हो या दूसरे पक्ष को कोई अपहानि हुई हो।

अवयव– इस धारा के निम्नलिखित अवयव हैं

(1) किसी व्यक्ति द्वारा कोई अन्य व्यक्ति होने का अपदेश करना,

(2) जानबूझ कर एक व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति के रूप में प्रतिस्थापित करना,

(3) यह व्यपदिष्ट करना कि वह या कोई अन्य व्यक्ति एक ऐसा व्यक्ति है जो वस्तुतः उससे या अन्य व्यक्ति से भिन्न है।

परीक्षा में किसी परीक्षार्थी, चुनाव में किसी वोटर का प्रतिरूपण या विवाह रचाने के प्रयोजन से अपने आपको अपनी वास्तविक जाति से भिन्न किसी अन्य जाति का प्रदर्शित करना ऐसे उदाहरण हैं जिनमें सामान्यतया यह माना जाता है कि इस धारा में वर्णित अपराध कारित हुआ।

417. छल के लिये दण्ड- जो कोई छल करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

टिप्पणी

जहाँ कोई व्यक्ति किसी होटल में भोजन करता है और बिना बिल का भुगतान किये अथवा अपना नाम और पता होटल मालिक को बताये चला जाता है, वह इस धारा के अन्तर्गत छल के अपराध का दोषी है।

रविन्द्रन बनाम मरियम्मल21 के मामले में पेटीसनर तथा प्रत्यर्थी एक दूसरे को प्यार करते थे और पेटीसनर शादी के पहले बार-बार प्रत्यर्थी के साथ सम्भोग का प्रयास करता रहा, परन्तु प्रत्यर्थी सदैव इसे टालती रही। परन्तु अन्त में एक दिन पेटीसनर ने उसे अपने साथ लेटने के लिये इस वादे पर निवेदन किया कि वह उसके साथ कुछ समय बाद शादी कर लेगा। इस प्रतिवेदन पर विश्वास करते हुये मरियम्मल ने उसका आवेदन स्वीकार कर लिया और उसके बाद वह गर्भवती हो गयी। गर्भवती होने की बात सब का मालूम हो गयी परन्तु पेटीसनर ने शादी करने से इन्कार कर दिया। यह निर्णय किया गया कि पेटीसनर था। 417 के अन्तर्गत छल के अपराध का दोषी है, क्योंकि उसके द्वारा किये गये व्यपदेशन और प्रवंचना के अभाव में मरियम्मल उसके साथ सहवास न करती जिसके फलस्वरूप वह गर्भवती हुयी थी। न्यायालय ने यह

21. 1992 क्रि० लॉ ज० 1675 (मद्रास).

स्पष्ट किया कि पेटीसनर का यह तर्क कि छल का अपराध सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध के अध्याय में है,

705 अतएव उसका मामला धारा 417 के अन्तर्गत नहीं आयेगा, स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि प्रथम दृष्ट्या पेटीसनर का तर्क उचित प्रतीत होता है परन्तु यदि आप धारा 415 के छल की परिभाषा का ध्यान से अवलोकन करें तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि भले ही ‘‘छल” सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध के अध्याय में हो परन्तु परिभाषा से यह स्पष्ट है कि किसी व्यक्ति को प्रवंचना द्वारा किसी कार्य को करने के लिये उत्प्रेरित किया जाना जिसे यदि उसे प्रवंचित न किया गया होता तो वह न करता छल का अपराध गठित करता है यदि ऐसे कार्य से उस व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, ख्याति सम्बन्धी या साम्पत्तिक नुकसान या अपहानि कारित होती है। परन्तु साथ ही लेखक का यह स्पष्ट मत है कि वर्तमान परिवेश एवं देश में महिलाओं के साथ किये जा रहे अत्याचारपूर्ण दुर्व्यवहार एवं अपराधों की बढ़ती संख्या को दृष्टि में रखते हुये विधि आयोग को इस सम्बन्ध में दण्ड संहिता में संशोधन कर अलग धारा में एतविषयक अपराध का सृजन कर उस हेतु धारा 417 से अधिक कठोर दण्ड का विधान किया जाना चाहिये।

418. इस ज्ञान के साथ छल करना कि उस व्यक्ति को सदोष हानि हो सकती है जिसका हित संरक्षित रखने के लिए अपराधी आबद्ध है– जो कोई इस ज्ञान के साथ छल करेगा कि यह सम्भाव्य है कि वह तद्वारा उस व्यक्ति को सदोष हानि पहुँचाए, जिसका हित उस संव्यवहार में जिससे वह छल सम्बन्धित है, संरक्षित रखने के लिए वह या तो विधि द्वारा, या वैध संविदा द्वारा, आबद्ध था, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

419. प्रतिरूपण द्वारा छल के लिए दण्ड-जो कोई प्रतिरूपण द्वारा छल करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

420. छल करना और सम्पत्ति परिदत्त करने के लिये बेईमानी से उत्प्रेरित करना-जो कोई छल करेगा और तद्वारा उस व्यक्ति को, जिसे प्रवंचित किया गया है, बेईमानी से उत्प्रेरित करेगा कि वह कोई सम्पत्ति किसी व्यक्ति को परिदत्त कर दे, या किसी भी मूल्यवान् प्रतिभूति को, या किसी चीज को, जो हस्ताक्षरित या मुद्रांकित है, और जो मूल्यवान प्रतिभूति में संपरिवर्तित किये जाने योग्य है, पूर्णत: या अंशत: रच दे, परिवर्तित कर दे या नष्ट कर दे वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

टिप्पणी

जब छल कर्ता के कार्यों के कारण सम्पत्ति नष्ट या परिदत्त हो जाती है या किसी मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित हो जाती है, या वह नष्ट हो जाती है, ऐसी दशा में यह धारा लागू होती है। साधारण छल धारा 417 के अन्तर्गत आता है।

हरमन प्रीत सिंह अहलुवालिया और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य21 के वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि छल करने का अपराध गठित करने के प्रयोजन हेतु शिकायतकर्ता को यह दर्शाने की आवश्यकता होती है कि अभियुक्त वादा करते समय अथवा व्यपदेशन करते समय कपटपूर्ण अथवा बेईमानीपूर्ण आशय रखता था। यहां तक कि ऐसे मामले में जहां कि अभियुक्त के ऊपर अपने वचन को निभाने की असफलता का आरोप लगाया जाता है, यदि प्रारम्भ में वचन देते समय दोषपूर्ण आशय नहीं होता है तो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420 के अधीन छल कारित करने का अपराध बनता नहीं माना जायेगा।

जहाँ पर संव्यवहार की प्रारम्भिक अवस्था में अभियुक्त का छल करने का आशय नह पक्षकारों के बीच कुछ मतभेद के फलस्वरूप अभियुक्त ने अपना विचार बदल ।।

१ आभयुक्त ने अपना विचार बदल दिया तथा भुगतान करने से

21कं. (2009) 3 क्रि० ला ज० 3462 (एस० सी०).

इन्कार कर दिया, उसके पश्चातुवर्ती आचरण से संव्यवहार छल की कोटि में नहीं आ जायेगा। यह विधि का पर्णरूपेण मान्यता प्राप्त सिद्धान्त है कि संव्यवहार की प्रारम्भिक अवस्था में बेईमानी आशय का परिलक्षित होना नितान्त आवश्यक है। उसके पश्चात्वती आचरण से संव्यवहार छल की कोटि में नहीं आयेगा 22

उदाहरण- एक प्रकरण में अभियुक्त का यह दायित्व था कि लोगों से बाजार भाव लेकर उसकी सचना भेजता रहे। किन्तु उसने प्रचलित रेट से अधिक रेट की सूचना भेजा जिससे विक्रेता को उचित से अधिक रकम प्राप्त हुई अभियुक्त को इस धारा के अन्तर्गत दोषी घोषित किया गया।23 ।

अपराधी ने यह मिथ्या बयान देकर कि वह कलकत्ता म्युनिसिपल कारपोरेशन का एक कर्मचारी है। उसी कारपोरेशन के स्वास्थ्य अधिकारी से, 10 रुपये अभिदान के रूप में लिया। उसका आशय इस रुपये को एक खैराती संस्था के खाते में जमा करना था। उसने संग्रहीत रुपये को खैराती संस्था को दे दिया था किन्तु बाद में उस पर छल करने का आरोप लगाया गया और विचारण न्यायालय द्वारा इस धारा के अन्तर्गत उसे दोषसिद्धि प्रदान की गयी। परन्तु कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारण प्रदान किया गया कि चूंकि उसने सदोष लाभ या हानि कारित करने के लिये किसी प्रकार की प्रवंचना का प्रयोग नहीं किया था, अत: वह इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी नहीं है।

अब्दुल्ला-24 के वाद में क ने एक अल्प मूल्य का जाली आभूषण तैयार किया और उस आभूषण को लेकर वह एक सुनार के पास गया तथा उसे दिखा कर कहा कि ये आभूषण स्वर्ण से बने हैं और वह चुराई हुई सम्पत्ति है जबकि दोनों ही वक्तव्य झूठे थे। उसने यह भी कहा कि वह इस आभूषण को बाजार में बेचना नहीं चाहता इसलिये सुनार खरीद ले। सुनार ने खरीदने से इन्कार कर दिया और बातचीत वहीं समाप्त हो गई। यह अभिनिर्धारण प्रदान किया गया कि अभियुक्त छल करने के प्रयत्न का दोषी है।।

एक अन्य प्रकरण में अ, ब को यह विश्वास दिलाता है कि वह जादू से करेन्सी नोटों को दुगुना कर सकता है। ब 1000 रुपये के मूल्य के करेन्सी नोट अ को दे देता है जो उन्हें एक काले बाक्स में रख देता है। अ तत्पश्चात् बक्स ब को दे देता है इस निर्देश के साथ कि बक्स को लगभग एक घण्टे बाद खोला जाये। अ के जाने के बाद ब बक्स खोलता है तो पाता है कि उसमें रद्दी टुकड़े भरे पड़े हैं। अ इस धारा के अन्तर्गत छल के लिये दण्डनीय होगा, क्योंकि उसने बेईमानीपूर्वक ब को उत्प्रेरित किया कि वह अपनी करेन्सी नोट उसे परिदत्त कर दे और इस प्रकार उसने उसे प्रवंचित किया। एक दूसरे प्रकरण में स, द को यह विश्वास दिलाता है कि वह एक विशिष्ट प्रकार का गेहूँ उसे परिदत्त करना चाहता है जबकि परिदत्त करने का उसका आशय बिल्कुल नहीं था। ऐसा विश्वास दिलाकर वह द को उत्प्रेरित करता है कि माल के लिये वह अग्रिम भुगतान कर दे । स इस धारा के अन्तर्गत छल के लिये दण्डनीय होगा। इस प्रकरण में यदि धन प्राप्त करते समय गेहूँ का परिदान करने का उसका आशय था किन्तु बाद में अपना आशय बदल दिया तब वह धारा 403 के अन्तर्गत आपराधिक दुर्विनियोग के लिये दण्डनीय होगा।

हीरालाल हरिलाल भगवती बनाम सी० बी० आई, नई दिल्ली, 25 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि छल के अपराध को साबित करने के लिये परिवादी से यह दर्शित करने की अपेक्षा की जाती है, कि संकल्प या अभ्यावेदन करते समय अभियुक्त का आशय कपटपूर्ण या बेईमानीपूर्ण था। बाद में संकल्पपूर्ण करने में विफल रहने का आपराधिक आशय का आरंभ में ही होना अर्थात् जब संकल्प किया गया है, की उपधारणा नहीं की जा सकती। प्रस्तुत मामले में अभिलेख से यह दर्शित है कि छूट वाले प्रमाणपत्र में कतिपय शर्ते थीं, जिन्हें पूर्ण करने की अपेक्षा गुजरात कैंसर सोसाइटी द्वारा मशीन आयात करने से पूर्व की जानी थी, इसलिये उसने छूट प्रमाणपत्र का लाभ लिये बिना आवश्यक शुल्कों का भुगतान किया। सोसाइटी के आचरण से स्पष्ट रूप से उपदर्शित होता है कि गुजरात कैंसर सोसाइटी या अपीलार्थियों का पदधारी के रूप में। अपनी हैसियत में छूट के लिये आवेदन करते समय कोई गलत आशय नहीं था। चूंकि कपटपूर्ण या । बेईमानीपूर्ण आशय नहीं था, इसलिये भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420 के अधीन अपराध होने का प्रश्न हो । नहीं उठता। आरोप-पत्र से दर्शित होता है कि प्रथम इत्तिला रिपोर्ट या आरोप-पत्र में ऐसा कोई आरोप नहीं है,

22. मनोरंजन हलदार बनाम मेसर्स मेंचफैब इन्जिनियरिंग इण्डस्ट्रीज, 1984 क्रि० लॉ ज० 1265 गौहाटी. 23. परमेश्वर दत्त, (1886) 8 इला० 201.

24. (1914) पी० आर० नं० 14 सन् 1914.

25. 2003 क्रि० लॉ ज० 3041 (सु० को०).

जिससे अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से अपीला – अभ्यावेदन के समय से ही साशय छल या नहीं कहा गया कि वे क्या गलत अभ्यावेदन थे और स्वा अभिकथित अपराध में अपीलार्थियों की गलत मय से ही साशय छल या कपटपूर्ण अथवा बेईमानीपूर्ण आशय रहा हो। इस संबंध में कछ। या गलत अभ्यावेदन थे और स्वास्थ्य मंत्रालय को कैसे धोखा दिया गया और अपराध में अपीलार्थियों की क्या भूमिका थी। इसलिये न्यायालय के मत में अपीलार्थियों में सीमा न भारत सरकार के साथ छल करने का आपराधिक आशय नहीं था, क्योंकि सोसाइटी लाभ या नहीं है और इसलिये अभियोजन द्वारा अपीलार्थियों के विरुद्ध लगाये गये आरोप कायम होने योग्य नहीं हैं।

केवल कष्ण एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य26 के मामले में अपीलांट ने उद्योग निदेशक से आदेश प्राप्त

अपनी फैक्ट्री के लिये लोहा और इस्पात प्राप्त किया। परन्तु उसने इसका प्रयोग उससे भिन्न कार्य के लिये किया जिस हेतु उसने आदेश प्राप्त कर उसे खरीदा था। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त धारा 420 के न तल के अपराध का दोषी नहीं होगा, क्योंकि उसने माल उसकी कीमत अदा करके प्राप्त किया था तथा उसने जब आवेदन पत्र दिया था और लोहा एवं इस्पात प्राप्त किया था तो उस समय इसका दुरुपयोग करने का उसका आशय नहीं था। इस धारा के अन्तर्गत अपराध हेतु यह सिद्ध किया जाना आवश्यक है कि प्रारम्भ से ही अभियुक्त का प्रवंचना या छल का आशय रहा है। परन्तु यदि कोई सद्भावपूर्वक किसी वस्तु के लिये आवेदन कर और प्राप्त कर किसी कारण बस उसने इसका उपयोग कारखाने में न करने की बात सोचा तो यह नहीं कहा जा सकता है कि उसने उद्योग विभाग के साथ छल किया है।

पूवालापिल डेविड बनाम केरल राज्य27 के मामले में पेटीसनर्स ‘‘ब्लु डायमण्ड” थियेटर जिसको वातानुकूलित थियेटर के रूप में लाइसेन्स दिया गया था, के मैनेजर और प्रबन्धकीय भागीदार (Managing partner) थे। विद्युत ऊर्जा की बचत कर अवैध लाभ कमाने के उद्देश्य से ग्राहकों के प्रवेश कर जाने के पश्चात् पेटीसनर्स वातानुकूलन यन्त्र बन्द कर देते थे। यह निर्णय दिया गया कि पेटीसनर्स का कार्य धारा 420 के अन्तर्गत छल का अपराध गठित करता है क्योंकि वे वातानुकूलित थियेटर का विज्ञापन देकर बेईमानी से ग्राहकों को ऊँची दर के टिकट लेकर प्रवेश हेतु प्रेरित करते थे।

शंकर लाल विश्वकर्मा बनाम मध्य प्रदेश राज्य28 के मामले में अपीलांट सहायक जिला विद्यालय निरीक्षक था। उसने कुछ ऐसे अध्यापकों का वेतन बिल झूठे दावों के आधार पर बनवाया जो अध्यापक उसके क्षेत्राधिकार में कार्यरत नहीं थे तथा जिनमें कुछ काल्पनिक भी थे। इन बिलों का नकदीकरण कोषागार से भी हो गया परन्तु उसने वेतन बिलों के पैसे का वितरण नहीं कराया। उसने असत्य भुगतान रोल भी बनवाया तथा उनकी प्राप्त रसीदों पर फर्जी हस्ताक्षर कराया। इस प्रकार समस्त निकाली गयी रकम वह खा गया।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि जो व्यक्ति दूसरे से छलबल द्वारा धन प्राप्त करता है वह उस धन का न्यासी नहीं होता है। इस प्रकार वह व्यक्ति उस धन को बाद में दुर्विनियोग करने के कारण आपराधिक न्यासभग कारित नहीं करता है क्योंकि वह धन उसे कभी न्यस्त नहीं किया गया था बल्कि उसके द्वारा दूसरे से छलबल से प्राप्त किया गया था। ऐसी दशा में वह छल के अपराध का दोषी होगा। यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि सम्बन्धित बिल फर्जी थे, क्योंकि वे असत्य दावों से सम्बन्धित थे, परन्तु यहाँ कूट रचना का अपराध भी नहीं बनता है क्योंकि अभियुक्त ने दूसरों के हस्ताक्षर अथवा लेख नहीं बनाये थे अथवा अनधिकृत रूप से वेतन बिलों को तात्विक रूप से परिवर्तित भी नहीं किया था।सम्बन्धित वेतन बिल स्वयं अभियुक्त धारा लिखे एवं हस्ताक्षरित थे और इसलिये उन्हें फर्जी अभिलेख नहीं कहा जा सकता है। अतएव यह कूट रचना का अपराध नहीं होगा।

सन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन बनाम ए० रविशंकर प्रसाद और अन्य लोग28 का वाद भारतीय साहता की धारा 420 के अन्तर्गत बैंक को धोखा देने से सम्बन्धित है। बैंक के अधिकारियों पर प्राइवेट नयुक्तगणों को जो विभिन्न कम्पनियों का प्रतिनिधित्व करते थे कम्पनियों को बड़ी मात्रा में

लन का आरोप है। इस मामले में प्रत्यर्थीगणों पर गम्भीर अपराध कारित करने जैसे कूटरचना, दस्तावेज गढना और उन दस्तावेजों को असली के तौर पर प्रयोग करने का उ

करते समय पक्ष लेने का आरोप है। ३

का असली के तौर पर प्रयोग करने का आरोप है। केन्द्रीय ब्यूरो

26. 1986 क्रि० लॉ ज० 1792 (पं० एवं हे०).

27. 1989 क्रि० लॉ ज० 2452 (केरल).

28. 1991 क्रि० लॉ ज० 2808 (म० प्र०).

आफ इन्वेस्टीगेशन द्वारा आरोप पत्र दाखिल करने के पश्चात् प्रत्यर्थियों ने सारी बकाया धनराशि का मार्च 2007 में 157 करोड़ रुपये अदा करके निपटारा कर लिया और ऋण वसूली ट्रिबुनल चेन्नई के समक्ष दाखिल याचिका न्यायालय के बाहर निपटारा के फलस्वरूप खारिज कर दी गयी। उच्च न्यायालय ने भी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुये दाण्डिक कार्यवाहियों को दो अभियुक्तों के विरुद्ध खारिज कर दिया। अपील में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि मात्र ऋण की। अदायगी का समझौता के अधीन ऋण की अदायगी द्वारा अभियुक्त को दाण्डिक कार्यवाही से मुक्त नहीं किया जा सकता है।

हरमन प्रीत सिंह अहलुवालिया और अन्य लोग बनाम पंजाब राज्य और अन्य28 के वाद में  शकायतकर्ता कनाडा का स्थायी निवासी ने अपनी पुत्री का विवाह भारत में भारतीय नागरिक अपीलांट से किया जो बाद में कनाडा चला गया। पक्षकारों का विवाह सन् 2000 में हुआ था। दोनों पक्षकारों के मध्य पहली बार विवाद सन् 2003 में हुआ। अपीलार्थी पति द्वारा अपनी जान का खतरा की आशंका सम्बन्धी प्रार्थनापत्र दाखिल करने के पश्चात पत्नी ने अपनी गलती और दोष को स्पष्ट शब्दों में स्वीकार कर लिया। उस समय भी छल करने अथवा स्त्रीधन वापस करने का कोई आरोप पति पर नहीं लगाया। लगभग तीन वर्ष बाद जब दोनों पक्षकारों के मध्य विवाद पुन: बढ़ गया और विवाह विच्छेद का प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया तब पत्नी के पिता कनाडा से जालन्धर (भारत) आये और अपीलार्थी तथा उसके जननी जनक के विरुद्ध दहेज में दी गयी वस्तुओं के सम्बन्ध में आपराधिक न्यास भंग और छल कारित करने की प्रथम सूचना रिपोर्ट दाखिल किया। | यह अभिनिर्धारित किया गया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप अपीलार्थी को प्रताड़ित करने के दूरस्थ/परवर्ती प्रयोजन से लगाये गये थे। अतएव उनके विरुद्ध कार्यवाही का जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इस प्रकार उक्त कार्यवाहियां दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन निरस्त किये जाने योग्य हैं।

मोहम्मद इब्राहिम और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य28 के वाद में अभियुक्त पर आरोप था कि उसने मिथ्या विक्रय विलेख बनाकर छल कारित किया है। सम्पत्ति के वास्तविक/असली मालिक द्वारा शिकायत दर्ज करायी गयी। अभियुक्त ने सद्भावपूर्वक यह विश्वास किया था कि सम्पत्ति उसकी है। क्रेता भी यह विश्वास करता था कि सम्पत्ति अभियुक्त की है। यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420 के अधीन कपट के अपराध का दोषी नहीं है क्योंकि कपट के आवश्यक तत्व उपस्थित नहीं हैं।

 छल के लिये दष्प्रेरण- मनोरंजनदास बनाम झारखण्ड राज्य29 वाले मामले में अपीलार्थी जमशेदपुर में व्यापार करता था। दिनांक 26-5-1972 को लोकनाथ आचार्य सेन्ट्रल बैंक जमशेदपुर में अपना एक चालू खाता खोलना चाहता था। अभियुक्त ने सहअभियुक्त लोकनाथ का लेखा खोलने के लिये बैंक में उसका सत्यापन पहचान किया। छह मास के बाद सह-अभियुक्त ने कुछ नकली बैंक ड्राफ्ट प्रस्तुत किये, जिसके जरिये एक लाख से अधिक की रकम दर्शित की गई। स्वयं के नाम आहरित 1,40,000 रु० का चैक प्रस्तुत किया गया, जिसे पहले तो पास कर दिया गया, किन्तु बाद में प्रबंधक को शंका हुई और उन्होंने प्रभारी । अधिकारी को ड्राफ्टों के सत्यापन का निदेश दिया। प्रभारी एकाउन्टेन्ट को कुछ अनियमिततायें दिखीं और उसे डाफ्टों की सत्यता पर सन्देह हुआ। प्रबंधक ने चैक का भुगतान रोक दिया और उस बैंक की श्रीनगर शाखा को फोन किया, जहाँ से ड्राफ्ट जारी किये गये थे। श्रीनगर शाखा से यह जानकारी प्राप्त हुई कि ऐसे कोई ड्राफ्ट जारी नहीं किये गये हैं, अत: पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई ।।

सह-अभियुक्त लोकनाथ द्वारा किये गये कपट में अभियुक्त का हाथ होने के बारे में कोई साक्ष्य नहीं था। और न ही उसने सह-अभियुक्त को नकली ड्राफ्ट प्रस्तुत करने के लिये दुष्प्रेरित ही किया था। बैंक ने सहअभियुक्त का स्वयं का चैक नकली ड्राफ्ट के बदले पास कर दिया था, जबकि उसके खाते में पर्याप्त रकम नहीं थी। यह अभिनिर्धारित किया गया कि इन परिस्थितियों में बैंक के साथ सह अभियुक्त द्वारा छल करने में

अधियक्त के विरुद किसी साक्ष्य के अभाव में बैंक को हुई, हानि के लिये अभियुक्त उत्तरदायी नहीं है और |

28ख. (2009) 3 क्रि० लॉ ज० 3462 (एस० सी०).

28ग. (2010) 2 क्रि० लॉ ज० 2223 (एस० सी०). |

29. 2004 क्रि० लॉ ज० 3042 (सु० को०).

बैंक के साथ छल करने के लिये दुष्प्रेरण के लिये अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित नहीं थी। अत: अपील मंजूर 709 की गई।

एन० वी० सुबाराव बनाम राज्य द्वारा इन्सपेक्टर आफ पुलिस, सी० बी० आई०/एस० पी० ई०29क के वाद में बैंक के मैनेजर अभियुक्त ने बहुत से सरकारी कर्मचारियों को अभियुक्त से प्लांट खरीदने के लिए ऋण (loan) मंजूर किया। ऋण बिना पहले स्थान (site) का मुआयना किये और बिना नियोजक से उत्तरदायित्व (undertaking) के लिये लिखा पढ़ी किये और कर्मचारियों का बिना बैंक में खाता खुलवाये। मंजूर कर दिया। केवल कुछ ही प्लाटों का साम्य (equitable) बन्धक (mortgage) प्राप्त किया गया था। सारे ऋण की राशि सहअभियुक्त के खातों में जमा (credit) कर दिया गया। साक्ष्य यह दर्शाता था कि बेची गयी सारी जमीन वर्षों में डूबी हुई (rainfed) थी और अभियुक्त ने सह-अभियुक्त को खेत की ऊंची कीमत बताने की अनुमति दिया। इस बात का स्पष्ट साक्ष्य था कि अभियुक्त ने सह-अभियुक्त से कई बार मुलाकात किया। और सह-अभियुक्त से धन लिया।

यह अभिधारित किया गया कि अभियुक्त और सह-अभियुक्त ने बैंक को धोखा देने के लिये षड्यंत्र (conspired) किया। अतएव अभियुक्त का भा० द० संहिता की धारा 120ख और 420 के अन्तर्गत दोषसिद्धि उचित थी। अभियुक्त A-1 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13 (2) के अधीन दण्डित किया गया। अतएव अपील निरस्त/खारिज कर दी गयी।

देवेन्द्र कुमार सिंगला बनाम बलदेव कृष्ण सिंगला30 वाले मामले में अभियुक्तगण द और म ने परिवादी ‘स’ से शेयर खरीदे। दोनों ने स के पक्ष में भविष्य की तारीख के चैक जारी किये जो बैंक द्वारा अनादृत हो गये। अभियुक्त द ने एक रसीद लिखा था कि उसे शेयर प्राप्त हो गये हैं। यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 420 के अधीन छल के लिये अभियुक्त द की दोषसिद्धि उचित थी और मात्र यह तथ्य कि परिवादी द्वारा चैक भरे गये थे, रसीद में दिये गये कथन के प्रभाव को समाप्त करने के लिये पर्याप्त नहीं थे कि उसे शेयर प्राप्त हो चुके हैं और परिवादी स द्वारा शेयरों को संख्या न बता पाना साक्षीय मूल्य वाली रसीद को नासाबित करने के लिये पर्याप्त नहीं है। धारा 313 के अधीन अभियुक्त द का बयान कि उसे कोई शेयर नहीं मिले हैं मात्र उसका अपना ही पक्ष कथन है, वह साक्ष्य नहीं है। जहाँ तक अभियुक्त म का प्रश्न है,उसने चैक पर हस्ताक्षर किया है, किन्तु वह परिवादी को अभियुक्त द द्वारा सौंपा गया है। संव्यवहार के समय उसकी उपस्थिति भी साबित नहीं की गई है। यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त म के विरुद्ध कोई धोखाधड़ी साबित नहीं की गई है, अत: उसकी दोषमुक्ति उचित है।

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