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Indian Penal Code Elements of Crime LLB 1st Year Notes

  Indian Penal Code Elements of Crime LLB 1st Year Notes:- LLB Book Indian Penal Code in Topic of Elements of Crime Most Important part for LLB Low 1st Year | 1st Semester Notes Study Material in Hindi and English PDF File Download Online Free.

II

अपराध के तत्व (ELEMENTS OF CRIME)

अपराध के तत्वअपराध के निम्नलिखित प्रमुख तत्व हैं

(1) एक मानव जिसे एक विशिष्ट ढंग से वैधिक बाध्यता के अधीन कार्य करना है तथा जो दण्ड आरोपित करने के लिये उपयुक्त विषय है; (2) ऐसे मानव के मन में एक दुराशय (evil intent) है;। (3) ऐसे आशय को पूरा करने के लिये किया गया कोई कार्य; और (4) ऐसे कार्य द्वारा किसी दूसरे मानव या सम्पूर्ण समाज को एक क्षति। मानव-किसी कार्य को अपराध के रूप में विधि द्वारा दण्डनीय होने के लिये किसी मानव द्वारा किया जाना चाहिये। प्राचीन वैधिक संस्थाओं में क्षति के लिये पशुओं या निर्जीव पदार्थों को दण्ड दिये जाने के हमें पर्याप्त उदाहरण मिलते हैं। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि उन दिनों आपराधिक न्याय-प्रशासन मुख्यतः प्रतिशोध (Retribution) की भावना से प्रभावित था। अतएव यदि कोई पशु दण्डित किया जाता या निर्जीव पदार्थ राज्य सीमा के बाहर फेंक दिया जाता तो बदले की भावना सन्तुष्ट हो जाती थी। यह सम्भवतः मानवीय स्वभाव के अनुकूल है। जब कोई बच्चा जमीन पर गिर जाता है और उसे चोट लग जाती है तो बच्चे को सान्त्वना देने के लिये हम जमीन पर वाद प्रहार करते हैं। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि यह भावना सिर्फ बच्चों तक ही सीमित है। उन दिनों दोषकर्ता को दण्डित करने का अधिकार अपकारित (wronged) व्यक्ति के हाथ में होता था। कालान्तर में दण्ड देने का अधिकार व्यक्ति के हाथों से लेकर समाज को सौंप दिया गया। समाज ने उस व्यक्ति के लिये सब कुछ जिसे वह अभी तक अपने लिये स्वयं करता आ रहा था, करने का वादा किया। इस अवधि के दौरान भी पशुओं का परीक्षण एवं दण्ड आपराधिक न्याय प्रशासन की उल्लेखनीय विशेषता रही। बेयरिंग गोल्ड की पुस्तक ‘क्यूरियासिटीज आफ ओल्डेन टाइम्स’ (Curiosities of Olden Times) स्पष्ट रूप से इस तथ्य की पुष्टि करती है। उदाहरण के लिये, यदि किसी फसल उगे खेत में खेत के मालिक के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति का गधा पाया जाता था तो उसका एक कान काट लिया जाता था और यदि वह उसी अपराध को दुबारा करता था तो अपने दूसरे कान से भी हाथ धो बैठता था। मध्यकालीन यूरोप में अपराधी वन्य पशु द्वारा की गयी अपील कोई असाधारण बात नहीं थी। पशु के मालिक को पशु द्वारा किये गये दोषपूर्ण कार्य के लिये दण्ड दिये जाने के भी प्रमाण हमें मिलते हैं। उदाहरण के लिये, यदि किसी बैल ने किसी आदमी को सींग भोंक दी जिससे उसकी मृत्यु हो गयी तो बैल को पत्थरों से मारा जाता था तथा उसके मालिक को हमेशा के लिये समाप्त कर दिया जाता था। कभी-कभी न्यायालयों में
  1. पैट्रिक डेवलिन, दि इन्फोर्समेंट आफ मारल्स, (1965) पृ० 22.
  2. पूर्वोक्त संदर्भ.
पशओं को साक्षियों के रूप में स्वीकार किये जाने के भी प्रमाण मिलते हैं। ऐथेन्स में दर्घटना वश किसी की मत्य यदि बैल या किसी पत्थर से हो जाती थी तो उसे राज्य सीमा से बाहर कर दिया जाता था। यहाँ तक कि इंग्लैण्ड में भी यदि गाडी के पहिये या किसी वन्य पशु या वृक्ष से किसी की मृत्यु हो जाती थी तो उस व्यक्ति के लाभ के लिये उसे राज्य द्वारा अपहृत कर लिया जाता था। हमारे लिये यह गर्व की बात है कि प्राचीन हिन्दू आपराधिक विधिशास्त्र पशुओं तथा निर्जीव पदार्थों के परीक्षण तथा दण्ड के लिये प्राविधान नहीं करता। लगता है कि हिन्दू विधिवेत्ता अपराध के संघटक (constituent) के रूप में दुराशय (evil intent) में अच्छी तरह अवगत थे जो कि पाश्चात्य विधिशास्त्रियों के लिये एक नवीन विषय है। दूसरे शब्दों में हम मानते थे कि अभियुक्त एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिये जो उस कार्य को अच्छी तरह समझने की क्षमता रखता हो जिसके लिये उसे जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। अपराध के अनिवार्य तत्व के रूप में, “आपराधिक मन:स्थिति (Mens-rea)” की अवधारणा के विकास के साथ ही पशुओं तथा निर्जीव पदार्थों के परीक्षण और दण्ड को त्याग देना पड़ा। अब भी खतरनाक पशुओं को दण्ड की दृष्टि से नहीं अपितु सुरक्षा की दृष्टि से समाप्त कर दिया जाता है। कुछ परिस्थितियों में आज भी पशु के मालिक को उसके द्वारा की गयी क्षति के लिये जिम्मेदार ठहराया जाता है परन्तु यह जिम्मेदारी अब पशु द्वारा की गयी क्षति के लिये नहीं बल्कि मालिक द्वारा पशु की उपेक्षा के लिये होती है, अत: वैधिक बाध्यता के अधीन दण्डनीय मनुष्य आपराधिक विधि का विषय बन सकता है। अर्थात् उसका शरीरयुक्त या शरीरधारी होना आवश्यक है। आधुनिक विधिशास्त्र में मान्य निगम (Corporations) तथा अन्य कृत्रिम व्यक्ति (Artificial person) दण्ड के योग्य नहीं हैं क्योंकि समुचित दण्ड का तात्पर्य आर्थिक (Pecuniary) तथा शारीरिक (Bodily) दोनों से है परन्तु शारीरिक दण्ड कृत्रिम व्यक्तियों को नहीं दिया जा सकता। दुराशय (Mens rea)–“मात्र कार्य किसी को अपराधी नहीं बनाता यदि उसका मन अपराधी न हो।” (Acts On faci re14771 72isi naens sit rea) यह आपराधिक विधि की एक सुविदित उक्ति है। इसका अर्थ यह है कि कार्य स्वयं किसी को दोषी नहीं बनाता जब तक कि उसका आशय वैसा न रहा हो।” इस उक्ति से एक दूसरी उक्ति निकलती है ‘‘मेरे द्वारा, मेरी इच्छा के विरुद्ध किया गया कार्य मेरा नहीं है। (Actus me invito factus non est mens actus) i arre e for fort of a cus-ice to लिये इच्छित होना चाहिये या स्वेच्छा से किया गया कार्य आपराधिक आशय से किया गया होना चाहिये। अत: अपराध को गठित करने के लिये आशय एवं कार्य दोनों का संगामी होना आवश्यक है।19 जहाँ किसी अपराध को गठित करने के लिये आवश्यक आपराधिक आशय अनुपस्थित होता है वहाँ अभियुक्त दण्डित नहीं किया जा सकता जब तक कि कृत्य दोषकर्ता के आशय के बिना भी विवक्षित या स्पष्ट रूप से दण्डनीय न हों 20 आंग्ल विधि का आरम्भ कठोर दायित्व या पूर्ण दायित्व (strict liability) के सिद्धान्त के साथ हुआ है 21 लगभग प्रत्येक प्रकरण में ऐसा माना जाना चाहिये कि जिस कार्य को व्यक्ति ने किया है उसको करने का उसका आशय था। प्राचीन कालीन इंग्लैण्ड में इसी अवधारणा पर विचारण (trials) किये जाते थे। इसका कारण यह है कि उन दिनों अपराध (Crime) तथा अपकृत्य (Tort) के बीच अन्तर सुस्पष्ट नहीं था और दण्ड अपकारित (Wronged) व्यक्ति को प्रतिकर (Compensation) स्वरूप दिये गये धन के रूप में होता था। अत: विरोधी की मन:स्थिति लगभग नगण्य वस्तु थी 22 परन्तु वाद में जब उपयुक्त प्रकरणों में शारीरिक दण्ड को आर्थिक दण्ड का स्थान दे दिया गया तभी से कृत्य के पीछे आपराधिक आशय को भी महत्व मिला। अब अपराध के आवश्यक तत्व के रूप में दुराशय (Mens-rea) का प्रमुख स्थान है। इसकी हम विस्तृत चर्चा दुराशय (Mens-rea) के भाग में करेंगे। आपराधिक कृत्य (Actus-reus)-किसी अपराध के लिये एक व्यक्ति तथा उसका दुराशय (evilintention) ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि किसी मनुष्य के आशय को हम नहीं जान सकते। किसी व्यक्ति के
  1. फाउलर बनाम पैजेट, (1798) 7 टी० आर० 509.
  2. हडिग बनाम प्राइस, (1948) 1 के० बी० 695.
  3. पोलक एण्ड मेटलैण्ड, हिस्ट्री आफ इंगलिश लॉ, वाल्यूम II, पृ० 477.
  4. रसेल. क्राइम (11वाँ संस्करण) वाल्यूम 1, पृ० 20.
विचार (thought) विचारणीय नहीं है। दण्डनीय होने के लिये आपराधिक आशय को किसी स्वेच्छापूर्ण कार्य (Voluntary act) या लोप (omission) के रूप में अवश्य स्पष्ट होना चाहिये । केनी के अनुसार आपराधिक कृत्य मानव आचरण का वह परिणाम है जिसे विधि रोकना चाहता है, किया गया या लोपित (उपेक्षित) कार्य निश्चयतः किसी विधि द्वारा निषिद्ध (forbidden) या आदेशित (commanded) होना चाहिये। रसेल आपराधिक कृत्य को ”मानव आचार का भौतिक परिणाम बताते हैं।” आपराधिक नीति जब ऐसे कृत्य को पर्याप्त हानिकारक मानती है तब इस कृत्य का किया जाना पीड़ा के दण्ड से निषिद्ध कर दिया जाता है। कृत्यों। के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु के लिये दण्ड देने से विधि के इन्कार में निम्न चार बातें शामिल हैं— (1) मात्र निष्क्रियता (inactivity) के विपरीत विधि केवल सकारात्मक (positive) आचरण से। (2) विचारों एवं आशयों के विपरीत विधि केवल कृत्यों को निषिद्ध करता है। (3) अनैच्छिक आचरणों एवं शारीरिक अवस्थाओं के विपरीत विधि केवल कृत्यों को दण्डित करता (4) मनुष्य केवल अपने आचरण के लिये दण्डित होता है, दूसरों के आचरण के लिये नहीं। एक कृत्य के अन्तर्गत अवैध लोप (illegal omission) भी शामिल है। यदि विधि द्वारा किसी व्यक्ति पर कोई दायित्व सौंपा गया है और वह उस दायित्व का निर्वहन नहीं करता तो इस लोप या उपेक्षा (omission) के लिये उसे दण्डित किया जायेगा। तात्पर्य यह है कि लोप वैधिक दायित्व के उल्लंघन स्वरूप होना चाहिये। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 43 निर्धारित करती है कि ”अवैध” शब्द उस हर बात को लागू है जो अपराध को या जो विधि द्वारा प्रतिषिद्ध हो या जो सिविल कार्यवाही के लिये आधार उत्पन्न करती हो, और कोई व्यक्ति उस बात को करने के लिये वैध रूप से आबद्ध” कहा जाता है जिसका लोप करना उसके लिये अवैध हो। कुछ लोप ऐसे हैं जिन्हें दण्डनीय घोषित किया गया है परन्तु अन्य दण्डनीय नहीं हैं। यदि “अ’ अपनी पत्नी तथा बच्चों को भूख से मरने देता है तो वह एक अपराध करता है, क्योंकि पत्नी तथा बच्चों के भरण-पोषण के लिये विधितः दायित्वाधीन है। यदि नदी में तैरते हुये ‘म’ किसी कठिनाई का अनुभव करता है तथा बहुत से लोग जिनमें से कुछ अच्छे तैराक भी हैं नदी के किनारे खड़े ‘म’ को नदी में डूबते हुये देखे हैं परन्तु वे लोग उसे बचाने का कोई प्रयत्न नहीं करते हैं तो यहाँ किसी की भी निष्क्रियता को ‘म’ को मृत्यु का कारण नहीं कहा जा सकता। परन्तु यदि ‘अ’ ‘ब’ को नदी में ढकेल देता है और ब की डूबने से मृत्यु हो जाती है तो समस्या अलग किस्म की होगी। यहाँ ‘अ’ का कार्य ‘ब’ की मृत्यु का आधार है। पहले वाले प्रकरण में कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसे ‘म’ की मृत्यु के लिये दोषी ठहराया जा सके। परन्तु बाद वाले प्रकरण में ‘अ’ वह व्यक्ति है जिसे दोषी ठहराया जायेगा। यदि हम दोनों प्रकरणों की तुलना करें अर्थात् ‘म’ को मृत्यु डूबने से और छोटे बच्चों की मृत्यु भूख से तो हम पाते हैं कि पहला निष्क्रियता का तथा दूसरा अवैध लोप का मामला है। एक दर्शक जो किसी तैराक की कठिनाइयों में सहायता करने से इन्कार करता है नैतिक निंदा का पात्र हो सकता है किन्तु वह कोई दाण्डिक अपराध नहीं करता। मात्र निष्क्रियता के विपरीत लोप के प्रकरण में यह सत्य है कि विधि तथा नैतिकता दोनों एक दूसरे से अलग हो जाते हैं। लोकोपकारी (Humanitarian) विचारों के विकास के साथ हम आशा करते हैं कि एक की दूसरे के प्रति कर्तव्य की अवधारणा धीरे-धीरे विस्तीर्ण होगी कि मानव निष्क्रियता के ऐसे मामले जिन्हें सभ्य समाज कभी अनुमोदित नहीं करता, भी अवैध लोप (illegal omission) के अन्तर्गत आ जाएं। मानव की क्षति (Injury to human being)-भारतीय दण्ड संहिता की धारा 44 द्वारा परिभाषित * क्षति’ शब्द किसी इस प्रकार की हानि की द्योतक है, जो किसी व्यक्ति के शरीर, मन, ख्याति या सम्पत्ति को अवैध रूप से कारित हुई हो। क्षति किसी दूसरे व्यक्ति या किसी के शरीर अथवा सम्पूर्ण समाज को अवैध रूप से पहुँचायी गयी होनी चाहिये। इस प्रकार हम पाते हैं कि किसी अपराध के चार आवश्यक तत्व होते हैं परन्तु यह नियम अपवादरहित नहीं है। इसके कुछ अपवाद भी हैं। कभी-कभी दोषी मनोभाव के अभाव में भी अपराध बन जाता है। ये
  1. फिट्जेराल्ड, पी० जे०, क्रिमिनल लॉ एण्ड पनिशमेंट, पृ० 94.
कठोर दायित्व या पूर्ण दायित्व (Strict liability) के मामले होते हैं। उदाहरण के लिये, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 494 के अन्तर्गत द्विविवाह का अपराध। कुछ मामलों में आपराधिक कृत्य यद्यपि पूर्ण न हुआ हो अर्थात् किसी व्यक्ति को क्षति न हुई हो फिर भी अपराध गठित हो जाता है। ये प्रारम्भिक (inchoate) अपराध के मामले हैं। उदाहरण के लिये, प्रयत्ल (attempt), दुष्प्रेरण (abetment) और षड्यंत्र (conspiracy)। इसके अतिरिक्त ऐसा भी अपराध हो सकता है जिसमें न आपराधिक कृत्य हो और न ही किसी व्यक्ति को क्षति । ये गम्भीर अपराध के मामले हैं जिन्हें समाज में शान्ति बनाये रखने के उद्देश्य से राज्य घटना घटित होने के पूर्व ही अपने नियंत्रण में ले लेता है। निरोधक कार्यवाही के तहत इन्हें अपराध घोषित किया जाता है। उदाहरण के लिये, दण्ड संहिता की धारा 399 के अन्तर्गत डकैती डालने के लिये तैयारी करना तथा धारा 402 के अधीन डकैती डालने के उद्देश्य से इकट्ठा होना।

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