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Indian Penal Code Criminal Intimidation Insult Annoyance LLB Notes

 

Indian Penal Code Criminal Intimidation Insult Annoyance LLB Notes:- All the candidates are welcome in this new post of Indian Penal Code Notes for Students PDF. Indian Penal Code IPC Important Case Laws PDF Download Our website is very important. You can find Indian Penal Code Notes PDF in Hindi English and in many languages from our website. IPC Notes for Judiciary Please comment to us. The IPC Book Chapter No 22 is going to read Criminal Intimidation, Insult and Annoyance, which comes in LLB Law 1st Year 1st Semester.

अध्याय 22 (Chapter 22)

आपराधिक अभित्रास, अपमान और क्षोभ के विषय में

(OF CRIMINAL INTIMIDATION, INSULT AND ANNOYANCE)

LLB Notes Study Material

503. आपराधिक अभित्रास- जो कोई किसी अन्य व्यक्ति के शरीर, ख्याति या सम्पत्ति को. या किसी ऐसे व्यक्ति के शरीर या ख्याति को, जिससे कि वह व्यक्ति हितबद्ध हो, कोई क्षति करने की धमकी उस अन्य व्यक्ति को इस आशय से देता है कि उसे संत्रास कारित किया जाए, या उससे ऐसी धमकी के निष्पादन का परिवर्जन करने के साधन स्वरूप कोई ऐसा कार्य कराया जाए, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध न हो, या किसी ऐसे कार्य को करने का लोप कराया जाए, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से हकदार हो, वह आपराधिक अभित्रास करता है।  

स्पष्टीकरण- किसी ऐसे मृत व्यक्ति की ख्याति को क्षति करने की धमकी जिससे वह व्यक्ति, जिसे धमकी दी गई है, हितबद्ध हो, इस धारा के अन्तर्गत आता है।

 दृष्टान्त

सिविल वाद चलाने से प्रतिविरत रहने के लिए ख को उत्प्रेरित करने के प्रयोजन से ख के घर को जलाने की धमकी क देता है। क आपराधिक अभित्रास का दोषी है।

टिप्पणी

आपराधिक अभित्रास के अपराध के गठन हेतु यह आवश्यक है कि कोई एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को जिससे वह दूसरा व्यक्ति हितबद्ध हो, धमकी दे। धमकी का आशय संत्रास कारित करना होना चाहिये।

अवयव-इस धारा के निम्नलिखित अवयव हैं|

1. किसी व्यक्ति को क्षति कारित करने की धमकी देना

(क) क्षति की धमकी ऐसे व्यक्ति के शरीर, उसकी सम्पत्ति या ख्याति के विपरीत, या (ख) ऐसे व्यक्ति से हितबद्ध किसी अन्य व्यक्ति के शरीर, उसकी सम्पत्ति अथवा ख्याति के

विपरीत दी गयी है। 2. धमकी इस आशय से दी गयी हो कि

(क) ऐसे व्यक्ति को क्षति कारित करने गी धमकी देना-

(ख) ऐसे व्यक्ति से हितबध्द किसी अन्य व्यक्ति के शरीर, उसकी सम्पति अथवा ख्याति के विपरित दी गयी है।

(ग) ऐसे व्यक्ति से किसी ऐसे कार्य को करने का लोप कराया जाये, जिसे करने के लिये वह वैध रूप से हकदार हो।

किसी व्यक्ति को किसी क्षति की धमकी देना- इस तथ्य के विनिश्चय हेतु कि क्या इस धाराम वर्णित अपराध कारित हुआ है या नहीं, अभित्रस्त व्यक्ति के मस्तिष्क पर धमकी के प्रभाव

1. रमेश चन्द्र अरोरा, ए० आई० आर० 1960 सु० को० 154.

जाना चाहिये। अतः संत्रस्त व्यक्ति को किसी न किसी प्रकार धमकी की सूचना दे दी जानी चाहिये। यदि धमकी की सूचना नहीं दी जाती है तो कभी भी अभित्रास का प्रश्न ही नहीं उठेगा। यह भी आवश्यक है कि धमकी ऐसी हो जिसे धमकी देने वाला व्यक्ति निष्पादित कर सके। किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि उपहति अपराधी द्वारा ही अभ्यारोपित की जाये, इतना ही पर्याप्त है कि वह इसे किसी अजनबी द्वारा कार्यान्वित करा सकता है। ईश्वर का दण्ड वह नहीं है जिसे कोई व्यक्ति अभ्यारोपित करा सके या जिसके निष्पादन का परिहार कर सके।2

किसी व्यक्ति द्वारा लगाया गया कोई संदिग्ध अभियोग कि वह मिथ्या परिवाद द्वारा बदला लेगा; आपराधिक अभित्रास के तुल्य नहीं है। दण्डनीय होने के लिये यह आवश्यक है कि परिवादकर्ता को संत्रास कारित करने के आशय से धमकी दी गयी हो।

ख्याति की क्षति कारित करने की धमकी- यदि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को ख्याति की क्षति कारित करने की धमकी देता है तो वह इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी होगा। रमेश चन्द्र अरोरा के वाद में अभियुक्त ने एक लड़की का कुछ अश्लील चित्र ले लिया था। उसने लड़की के पिता को यह धमकी दिया कि यदि मुंहभराई (Hush money) की अदायगी वह नहीं करेगा तो वह उन अश्लील चित्रों को प्रकाशित कर देगा। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारण प्रदान किया कि अभियुक्त आपराधिक अभित्रास का दोषी था।

जहाँ अ, ब को इस कदर गाली देता है कि ब बुरी तरह भयभीत हो जाता है तो यह कहा जा सकता है। कि अ आपराधिक अभित्रास का दोषी है क्योंकि अ द्वारा ब को गाली इस आशय से दी गयी थी कि उसके सम्मान को क्षति पहुंचे और वह उससे बुरी तरह भयभीत हो गया था।

मिथ्या वाद द्वारा विनष्ट करने की धमकी-यदि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को मुकदमेबाजी द्वारा नष्ट करने की धमकी देता है तो उसे इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान नहीं की जायेगी इस कार्य द्वारा वह कोई अपराध नहीं करता है। किन्तु यदि वह मिथ्या वाद द्वारा नष्ट करने की धमकी देता है तो उसे इसके अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान की जायेगी। धमकी तभी दण्डनीय होगी जब वह परिवादकर्ता को संत्रास कारित करने के आशय से युक्त हो। कुर्की आदेश के अन्तर्गत भवन-कर की अदायगी करने वाला व्यक्ति यदि यह धमकी देता है कि वह विधिक कार्यवाही करेगा तो ऐसी धमकी इस संहिता के अन्तर्गत क्षति कारित करने की धमकी के तुल्य नहीं है।

धरना की धमकी-जहाँ कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को यह धमकी देता है कि वह उसके घर पर धरना देगा, इस अपराध का अपराधी होगा तथा इस धारा के अन्तर्गत उसे दोषसिद्धि प्रदान की जायेगी।7।।

सामाजिक बहिष्कार की धमकी- सामाजिक बहिष्कार की धमकी इस धारा के अन्तर्गत नहीं आती क्योंकि इस मामले में कारित क्षति उसी प्रकृति को नहीं होती जिस प्रकृति की क्षति इस धारा के अन्तर्गत अपेक्षित है।8।

जाति से बहिष्कार करने की धमकी- यदि कोई अभियुक्त परिवादकर्ता से यह कहता है कि वह अपना खेत छोड़ दे अन्यथा उसे अछूत घोषित कर दिया जायेगा, तो अभियुक्त इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी नहीं होगा क्योंकि ऐसी धमकी इस धारा के अन्तर्गत नहीं आती।9

2. डोरा स्वामी अय्यर, (1924) 48 मद्रास 774,

3.  गोविन्द, (1900) 2 बाम्बे एल० आर० 55.

4. ए० आई० आर० 1960 सु० को० 154.

5. जवाहर पाठक बनाम प्रभू अहीर, (1902) 30 कल० 418.

6. दयाभाई बनाम नरोत्तमदास, (1906) क्रि० रि० नं० 67 सन् 1906.

7. रघुबर दयाल, (1930) 53 इला० 407. ।

8. हनुमान प्रसाद मातादीन, ए० आई० आर० 1949 मद्रास 546.

9. अल्य धुर्मा, (1870) अनरिर्पोटेड क्रि० के० 37.

मार डालने की धमकी-मार डालने की धमकी के लिये दोषसिद्धि धमकी की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। जहाँ एक भाई दूसरे भाई की ओर तलवार लेकर दौड़ा किन्तु एक दूसरे व्यक्ति ने उसकी तलवार छीन कर उसे अस्त्र रहित कर दिया; तब भी उसने यह धमकी दिया कि जब भी वह मुक्त होगा, उसे मार डालेगा, यह अभिनिर्णीत हुआ कि कोई अपराध कारित नहीं हुआ था।10 किन्तु यदि कोई अभियुक्त रेवेन्यू इन्सपेक्टर को इसलिये धमकी देता है कि इन्सपेक्टर अभियुक्त की सम्पत्ति नष्ट करने से अपने को विरत रखे अन्यथा उसे मार डाला जायेगा तो उसे इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान की जायेगी।11

प्रतिशोध की धमकी-प्रतिशोध लेने की धमकी इस धारा के अन्तर्गत एक अपराध है।12। |

आपराधिक अभित्रास तथा उद्दापन-आपराधिक अभित्रास तथा उद्दापन दोनों एक जैसे हैं, फिर भी इनमें कुछ अन्तर है। उद्दापन का तात्कालिक उद्देश्य धन या धन के मूल्य की कोई वस्तु प्राप्त करना है। आपराधिक अभित्रास का तात्कालिक उद्देश्य धमकाये गये व्यक्ति को इस बात के लिये प्रेरित करना है कि जिस कार्य को करने के लिये वह वैधतः बाध्य नहीं है उसे करे, या जिसे करने के लिये वह बाध्य है उससे विरत रहे।

हितबद्ध व्यक्ति को क्षति कारित करना- यदि किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति को हुयी क्षति के विषय में सूचना मिलती है तो यह इस धारा के अन्तर्गत वाद दायर कर सकता है यदि वह यह प्रमाणित कर सके कि वह उससे हितबद्ध है। एक प्रकरण में एक जाली या मनगढन्त याचिका रेवेन्यू कमिश्नर के पास भेजी गयी जिसमें यह धमकी दी गयी थी कि यदि विशिष्ट फारेस्ट आफिसर को कथित स्थान से हटाया न गया तो उसकी मृत्यु कर दी जायेगी। यह अभिनिर्णीत हुआ कि जिस व्यक्ति के पास याचिका भेजी गयी थी, धमकी दिये गये व्यक्ति से हितबद्ध नहीं था, अत: अभियुक्त का कृत्य आपराधिक अभित्रास के तुल्य नहीं था।13 यदि रेवेन्यू कमिश्नर फारेस्ट आफिसर से हितबद्ध रहा होता तो धमकी आपराधिक अभित्रास की कोटि में आती। आत्म-हत्या करने की धमकी इस धारा के अन्तर्गत अपराध नहीं है जब तक कि दूसरा व्यक्ति धमकाये गये व्यक्ति से हितबद्ध न हो।14

504. लोक शांति भंग कराने को प्रकोपित करने के आशय से साशय अपमान- जो कोई किसी व्यक्ति को साशय अपमानित करेगा और तद्वारा उस व्यक्ति को इस आशय से, या यह सम्भाव्य जानते हुए, प्रकोपित करेगा कि ऐसे प्रकोपन से वह लोक शान्ति भंग या कोई अन्य अपराध कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।

टिप्पणी

यह धारा गाली गलौज तथा अपमानकारी भाषा के प्रयोग के विपरीत उपचार प्रदान करती है। गाली गलौज की भाषा (Abusive language) जो लोकशान्ति को भंग करने की क्षमता से युक्त है, इस धारा के अन्तर्गत अपराध नहीं है। अपमानित करने के आशय से ही ऐसी भाषा का प्रयोग होना चाहिये। किसी व्यक्ति को शब्दों अथवा आचरण द्वारा अपमानित किया जा सकता है। यदि अपमान शब्दों द्वारा किया जाता है तो प्रयुक्त शब्द केवल अश्लील बोधक ही नहीं होने चाहिये बल्कि उससे कुछ अधिक होने चाहिये।15 अच्छे आचरण का उल्लंघन मात्र इस धारा के अन्तर्गत अपराध गठित नहीं करता ।16 यदि अपमान की प्रकृति ऐसी है कि कोई अन्य अपराध कर डाले तभी इस धारा के अन्तर्गत अपराध गठित होगा।’17

10. दाता राम, (1882) पी० आर० नं० 45 सन् 1880.

11. इन रे अन्नाकाम चेट्टियार, ए० आई० आर० 1959 मद्रास 342.

12. पुरुषोत्तम वनमाली, (1896) अनरिपोर्टेड क्रि० के० 850.

13. मन्गेस जिवाजी, (1887) 11 बाम्बे 376. 14.

14. नवी बक्स बनाम मुसम्मात ओम्ना, (1866) पी० आर० न० 109, सन् 1866. 15.

15. पुखराज (1953) 3 राज० 983.

16. अब्राहम, ए० आई० आर० (1960) केरल 236.

17. मुहम्मद सबद अली बनाम थुलेश्वर बोरा, (1954) 6 279.

जाना चाहिये। अतः संत्रस्त व्यक्ति को किसी न किसी प्रकार धमकी की सूचना दे दी जानी चाहिये। यदि धमकी की सूचना नहीं दी जाती है तो कभी भी अभित्रास का प्रश्न ही नहीं उठेगा। यह भी आवश्यक है कि धमकी ऐसी हो जिसे धमकी देने वाला व्यक्ति निष्पादित कर सके। किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि उपहति अपराधी द्वारा ही अभ्यारोपित की जाये, इतना ही पर्याप्त है कि वह इसे किसी अजनबी द्वारा कार्यान्वित करा सकता है। ईश्वर का दण्ड वह नहीं है जिसे कोई व्यक्ति अभ्यारोपित करा सके या जिसके निष्पादन का परिहार कर सके।2

किसी व्यक्ति द्वारा लगाया गया कोई संदिग्ध अभियोग कि वह मिथ्या परिवाद द्वारा बदला लेगा; आपराधिक अभित्रास के तुल्य नहीं है। दण्डनीय होने के लिये यह आवश्यक है कि परिवादकर्ता को संत्रास कारित करने के आशय से धमकी दी गयी हो।

ख्याति की क्षति कारित करने की धमकी- यदि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को ख्याति की क्षति कारित करने की धमकी देता है तो वह इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी होगा। रमेश चन्द्र अरोरा के वाद में अभियुक्त ने एक लड़की का कुछ अश्लील चित्र ले लिया था। उसने लड़की के पिता को यह धमकी दिया कि यदि मुंहभराई (Hush money) की अदायगी वह नहीं करेगा तो वह उन अश्लील चित्रों को प्रकाशित कर देगा। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारण प्रदान किया कि अभियुक्त आपराधिक अभित्रास का दोषी था।

जहाँ अ, ब को इस कदर गाली देता है कि ब बुरी तरह भयभीत हो जाता है तो यह कहा जा सकता है। कि अ आपराधिक अभित्रास का दोषी है क्योंकि अ द्वारा ब को गाली इस आशय से दी गयी थी कि उसके सम्मान को क्षति पहुंचे और वह उससे बुरी तरह भयभीत हो गया था।

मिथ्या वाद द्वारा विनष्ट करने की धमकी-यदि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को मुकदमेबाजी द्वारा नष्ट करने की धमकी देता है तो उसे इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान नहीं की जायेगी इस कार्य द्वारा वह कोई अपराध नहीं करता है। किन्तु यदि वह मिथ्या वाद द्वारा नष्ट करने की धमकी देता है तो उसे इसके अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान की जायेगी। धमकी तभी दण्डनीय होगी जब वह परिवादकर्ता को संत्रास कारित करने के आशय से युक्त हो। कुर्की आदेश के अन्तर्गत भवन-कर की अदायगी करने वाला व्यक्ति यदि यह धमकी देता है कि वह विधिक कार्यवाही करेगा तो ऐसी धमकी इस संहिता के अन्तर्गत क्षति कारित करने की धमकी के तुल्य नहीं है।

धरना की धमकी-जहाँ कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को यह धमकी देता है कि वह उसके घर पर धरना देगा, इस अपराध का अपराधी होगा तथा इस धारा के अन्तर्गत उसे दोषसिद्धि प्रदान की जायेगी।7।।

सामाजिक बहिष्कार की धमकी- सामाजिक बहिष्कार की धमकी इस धारा के अन्तर्गत नहीं आती क्योंकि इस मामले में कारित क्षति उसी प्रकृति को नहीं होती जिस प्रकृति की क्षति इस धारा के अन्तर्गत अपेक्षित है।8।

जाति से बहिष्कार करने की धमकी– यदि कोई अभियुक्त परिवादकर्ता से यह कहता है कि वह अपना खेत छोड़ दे अन्यथा उसे अछूत घोषित कर दिया जायेगा, तो अभियुक्त इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी नहीं होगा क्योंकि ऐसी धमकी इस धारा के अन्तर्गत नहीं आती।

2. डोरा स्वामी अय्यर, (1924) 48 मद्रास 774, गोविन्द,

3. (1900) 2 बाम्बे एल० आर० 55.

4. ए० आई० आर० 1960 सु० को० 154.

5. जवाहर पाठक बनाम प्रभू अहीर, (1902) 30 कल० 418.

6. दयाभाई बनाम नरोत्तमदास, (1906) क्रि० रि० नं० 67 सन् 1906.

7. रघुबर दयाल, (1930) 53 इला० 407. ।

8. हनुमान प्रसाद मातादीन, ए० आई० आर० 1949 मद्रास 546.

9. अल्य धुर्मा, (1870) अनरिर्पोटेड क्रि० के० 37.

मार डालने की धमकी-मार डालने की धमकी के लिये दोषसिद्धि धमकी की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। जहाँ एक भाई दूसरे भाई की ओर तलवार लेकर दौड़ा किन्तु एक दूसरे व्यक्ति ने उसकी तलवार छीन कर उसे अस्त्र रहित कर दिया; तब भी उसने यह धमकी दिया कि जब भी वह मुक्त होगा, उसे मार डालेगा, यह अभिनिर्णीत हुआ कि कोई अपराध कारित नहीं हुआ था।10 किन्तु यदि कोई अभियुक्त रेवेन्यू इन्सपेक्टर को इसलिये धमकी देता है कि इन्सपेक्टर अभियुक्त की सम्पत्ति नष्ट करने से अपने को विरत रखे अन्यथा उसे मार डाला जायेगा तो उसे इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान की जायेगी।11

प्रतिशोध की धमकी-प्रतिशोध लेने की धमकी इस धारा के अन्तर्गत एक अपराध है।12। |

आपराधिक अभित्रास तथा उद्दापन-आपराधिक अभित्रास तथा उद्दापन दोनों एक जैसे हैं, फिर भी इनमें कुछ अन्तर है। उद्दापन का तात्कालिक उद्देश्य धन या धन के मूल्य की कोई वस्तु प्राप्त करना है। आपराधिक अभित्रास का तात्कालिक उद्देश्य धमकाये गये व्यक्ति को इस बात के लिये प्रेरित करना है कि जिस कार्य को करने के लिये वह वैधतः बाध्य नहीं है उसे करे, या जिसे करने के लिये वह बाध्य है उससे विरत रहे।

हितबद्ध व्यक्ति को क्षति कारित करना- यदि किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति को हुयी क्षति के विषय में सूचना मिलती है तो यह इस धारा के अन्तर्गत वाद दायर कर सकता है यदि वह यह प्रमाणित कर सके कि वह उससे हितबद्ध है। एक प्रकरण में एक जाली या मनगढन्त याचिका रेवेन्यू कमिश्नर के पास भेजी गयी जिसमें यह धमकी दी गयी थी कि यदि विशिष्ट फारेस्ट आफिसर को कथित स्थान से हटाया न गया तो उसकी मृत्यु कर दी जायेगी। यह अभिनिर्णीत हुआ कि जिस व्यक्ति के पास याचिका भेजी गयी थी, धमकी दिये गये व्यक्ति से हितबद्ध नहीं था, अत: अभियुक्त का कृत्य आपराधिक अभित्रास के तुल्य नहीं था।13 यदि रेवेन्यू कमिश्नर फारेस्ट आफिसर से हितबद्ध रहा होता तो धमकी आपराधिक अभित्रास की कोटि में आती। आत्म-हत्या करने की धमकी इस धारा के अन्तर्गत अपराध नहीं है जब तक कि दूसरा व्यक्ति धमकाये गये व्यक्ति से हितबद्ध न हो

504. लोक शांति भंग कराने को प्रकोपित करने के आशय से साशय अपमान- जो कोई किसी व्यक्ति को साशय अपमानित करेगा और तद्वारा उस व्यक्ति को इस आशय से, या यह सम्भाव्य जानते हुए, प्रकोपित करेगा कि ऐसे प्रकोपन से वह लोक शान्ति भंग या कोई अन्य अपराध कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।

टिप्पणी

यह धारा गाली गलौज तथा अपमानकारी भाषा के प्रयोग के विपरीत उपचार प्रदान करती है। गाली गलौज की भाषा (Abusive language) जो लोकशान्ति को भंग करने की क्षमता से युक्त है, इस धारा के अन्तर्गत अपराध नहीं है। अपमानित करने के आशय से ही ऐसी भाषा का प्रयोग होना चाहिये। किसी व्यक्ति को शब्दों अथवा आचरण द्वारा अपमानित किया जा सकता है। यदि अपमान शब्दों द्वारा किया जाता है तो प्रयुक्त शब्द केवल अश्लील बोधक ही नहीं होने चाहिये बल्कि उससे कुछ अधिक होने चाहिये।15 अच्छे आचरण का उल्लंघन मात्र इस धारा के अन्तर्गत अपराध गठित नहीं करता ।16 यदि अपमान की प्रकृति ऐसी है कि कोई अन्य अपराध कर डाले तभी इस धारा के अन्तर्गत अपराध गठित होगा।’

10. दाता राम, (1882) पी० आर० नं० 45 सन् 1880.

11. इन रे अन्नाकाम चेट्टियार, ए० आई० आर० 1959 मद्रास 342.

12. पुरुषोत्तम वनमाली, (1896) अनरिपोर्टेड क्रि० के० 850.

13. मन्गेस जिवाजी, (1887) 11 बाम्बे 376.

14. वा बक्स बनाम मुसम्मात ओम्ना, (1866) पी० आर० न० 109, सन् 1866.

15. पुखराज (1953) 3 राज० 983.

16. अब्राहम, ए० आई० आर० (1960) केरल 236.

17. मुहम्मद सबद अली बनाम थुलर बोरा, (1954) 6 असम 279.

अवयव-इस धारा के निम्नलिखित दो अवयव हैं

(1) साशय किसी व्यक्ति को अपमानित करना तथा तद्द्वारा उसे प्रकुपितं करना,

(2) अपमानित करने वाला व्यक्ति यह जानता हो या उसे इस तथ्य का ज्ञान हो कि ऐसा प्रकोपन

सम्भाव्यत: ऐसे व्यक्ति द्वारा लोक-शान्ति का भंग अथवा कोई अन्य अपराध करायेगा। |

मोहम्मद इब्राहिम और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य18 के वाद में अपीलांट पर शिकायतकर्ता का सम्पत्ति का मिथ्या (forged) विक्रय पत्र बनाने का आरोप था। अभियुक्त पर यह आरोप था कि शिकायतकर्ता द्वारा पूछतांछ करने पर उसने यह कहा कि वह उस सम्पत्ति पर विक्रय विलेख के अनुसार कब्जा कर लेगा और शिकायती की जो इच्छा हो वह कर सकता है। यह अभिनिर्धारित किया गया कि इस कथन से ऐसा अपमान नहीं बनता जिसका आशय भारतीय दण्ड संहिता की धारा 504 के अधीन शांतिभंग को उत्तेजित करना हो।

धारा 499 एवं 504-धारा 499 में वर्णित मानहानि’ (Defamation) तथा धारा 504 में परिभाषित ‘अपमान’ (Insult) में प्रमुख अन्तर यह है कि धारा 499 के अन्तर्गत स्वयं परिवादकर्ता मात्र को मानहानिकारक कथन का प्रकाशन अपराध नहीं है क्योंकि इस प्रकार लगाया गया लांछन, ख्याति को क्षति नहीं पहुँचाता, किन्तु धारा 504 के अन्तर्गत यह अपराध माना जायेगा यदि इससे परिवादकर्ता में इतना प्रकोपन उत्पन्न हो जाये कि इसके परिणामस्वरूप उसके द्वारा लोक शान्ति भंग करने अथवा कोई अपराध कारित किये। जाने का आदेश उत्पन्न हो जाये।

505. लोक-रिष्टि कारक वक्तव्य- (1) जो कोई किसी कथन, जनश्रुति या रिपोर्ट को

(क) इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, भारत की सेना, नौसेना या वायु सेना का कोई आफिसर, सैनिक (नाविक या वायु सैनिक) विद्रोह करे या अन्यथा वह अपने उस नाते अपने कर्तव्य की अवहेलना करे या उसके पालन में असफल रहे, अथवा

(ख) इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि लोक के किसी भाग को ऐसा भय या संत्रास |  कारित हो जिससे कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध या लोक प्रशान्ति के विरुद्ध अपराध करने के लिए उत्प्रेरित हो, अथवा ।

(ग) इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, उससे व्यक्तियों का कोई वर्ग या समुदाय किसी दूसरे वर्ग या समुदाय के विरुद्ध अपराध करने के लिए उद्दीप्त किया जाए, रचेगा, प्रकाशित करेगा या परिचालित करेगा, वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या | जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

(2) विभिन्न वर्गों में शत्रुता, घृणा या वैमनस्य पैदा या सम्प्रवर्तित करने वाले कथन- जो कोई जनश्रुति या संत्रासकारी समाचार अन्तर्विष्ट करने वाले किसी कथन या रिपोर्ट को, इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय, भाषाई या प्रादेशिक समूहों या जातियों या समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा या वैमनस्य की भावनाएं, धर्म, मूलवंश, जन्म-स्थान, निवासस्थान, भाषा, जाति या समुदाय के आधारों पर या अन्य किसी भी आधार पर पैदा या संप्रवर्तित हो, रचेगा, प्रकाशित करेगा या परिचालित करेगा, वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

(3) पूजा के स्थान आदि में किया गया उपधारा (2) के अधीन अपराध- जो कोई उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट अपराध किसी पूजा के स्थान में या किसी जमाव में, जो धार्मिक पूजा या धार्मिक कर्म करने में लगा हुआ हो, करेगा, वह कारावास से, जो पांच वर्ष तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

18. (2010) 2 क्रि० ला ज० 2223 (एस० सी०).

अपवाद-ऐसा कोई कथन, जनश्रुति या रिपोर्ट इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत अपराध की कोटि में नहीं आती, जब उसे रचने वाले, प्रकाशित करने वाले या परिचालित करने वाले व्यक्ति के पास इस विश्वास के लिए युक्तियुक्त आधार हो कि ऐसा कथन, जनश्रुति या रिपोर्ट सत्य है और वह उसे सद्भावपूर्वक तथा पूर्वोक्त जैसे किसी आशय के बिना रचता है, प्रकाशित करता है या परिचालित करता है।

टिप्पणी

यह धारा उन वक्तव्यों को दण्डित करने का प्रयत्न करती है, जिनसे सैन्य विद्रोह की उत्पत्ति होती है। या जनसंख्या के एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के विरुद्ध अपराध उत्पन्न होता है। इसका उद्देश्य जातीय एवं धार्मिक तनावों को निवारित करना तथा समाप्त करना भी है। केदारनाथ19 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह भिकथित किया है कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19 (क) में प्रत्याभूत वाक् एवं अभिव्यक्ति के मूलभूत अधिकार का अतिलंघन नहीं करती।

506. आपराधिक अभित्रास के लिए दंड- जो कोई आपराधिक अभित्रास का अपराध करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

यदि धमकी मृत्यु या घोर उपहति इत्यादि कारित करने की हो- तथा यदि धमकी मृत्यु या घोर उपहति कारित करने की, या अग्नि द्वारा किसी सम्पत्ति का नाश कारित करने की या मृत्यु दण्ड से या आजीवन कारावास से, या सात वर्ष की अवधि तक के कारावास से दण्डनीय अपराध कारित करने की, या किसी स्त्री पर असतीत्व का लांछन लगाने की हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

507. अनाम संसूचना द्वारा आपराधिक अभित्रास- जो कोई अनाम संसूचना द्वारा या उस व्यक्ति का, जिसने धमकी दी हो, नाम या निवास स्थान छिपाने की पूर्वावधानी करके आपराधिक अभित्रास का अपराध करेगा, वह पूर्ववर्ती अन्तिम धारा द्वारा उस अपराध के लिए उपबन्धित दण्ड के अतिरिक्त, दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा।

टिप्पणी

इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि के लिये यह दर्शाना आवश्यक है कि अभियुक्त ने अनाम संसूचना (Anonymous Communication) द्वारा आपराधिक अभित्रास किया है। यदि कोई व्यक्ति किसी के नाम अनाम पत्र भेजकर यह संसूचित करता है कि यदि उसने अमुक व्यक्ति को एक निश्चित धनराशि नहीं प्रदान की तो उस पर दैविक आपदा आ पड़ेगी, वह व्यक्ति इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय नहीं होगा क्योंकि न तो वह दैविक दण्ड की प्रणीति ही कर सकता है और न ही उसे कारित कर सकता है।20।

508. व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करके कि वह दैवी अप्रसाद का भाजन होगा, कराया गया कार्य- जो कोई किसी व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करके, या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न करके, यदि वह उस बात को न करेगा, जिसे उससे कराना अपराधी का उद्देश्य हो, या यदि वह उस बात को करेगा, जिसका उससे लोप कराना अपराधी का उद्देश्य हो, तो वह या कोई व्यक्ति, जिससे वह हितबद्ध है, अपराधी के किसी कार्य से दैवी अप्रसाद का भाजन हो जाएगा, या बना दिया जाएगा, स्वेच्छया उस व्यक्ति से कोई ऐसी बात करवाएगा या करवाने का प्रयत्न करेगा, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध न हो, या किसी ऐसी बात के करने का लोप करवाएगा या करवाने का प्रय जिसे करने के लिए वह वैध रूप से हकदार हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसका एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।

19. ए० आई० आर० 1962 एस० सी० 955.

20. डोरास्वामी अय्यर, (1924) 48 मद्रास 774.

दृष्टान्त

(क) क, यह विश्वास कराने के आशय से य के द्वार पर धरना देता है कि इस प्रकार धरना देने से वह य को दैवी अप्रसाद का भाजन बना रहा है। क ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।

(ख) क, य को धमकी देता है कि यदि य अमुक कार्य नहीं करेगा, तो क अपने बच्चों में से किसी एक का वध ऐसी परिस्थितियों में कर डालेगा जिससे ऐसे वध करने के परिणामस्वरूप यह विश्वास किया जाए, कि य दैवी अप्रसाद का भाजन बना दिया गया है। क, ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।

टिप्पणी

 इस धारा का आशय धरना जैसी कार्यवाहियों को निवारित करना है। यदि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को दैवी अप्रसाद का भाजन बनाने के लिये उसके द्वार पर धरना देता है या अपने किसी पुत्र का वध कर देता है तो वह व्यक्ति इस धारा के अन्तर्गत दण्डित किया जायेगा। किसी व्यक्ति को धर्मगुरु द्वारा जाति बहिष्कृत करना दैवी अप्रसाद का भाजन बनाना नहीं है 21

509. शब्द, अंग विक्षेप या कार्य जो किसी स्त्री की लज्जा का अनादर करने के लिए आशयित है- जो कोई किसी स्त्री की लज्जा का अनादर करने के आशय से कोई शब्द कहेगा, कोई ध्वनि या अंगविक्षेप करेगा, या कोई वस्तु प्रदर्शित करेगा, इस आशय से कि ऐसी स्त्री द्वारा ऐसा शब्द या ध्वनि सुनी जाए या ऐसा अंग विक्षेप या वस्तु देखी जाए अथवा ऐसी स्त्री की एकान्तता का अतिक्रमण करेगा, 22[वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

टिप्पणी

इस धारा के अनुसार किसी महिला की लज्जा का अनादर इस अपराध का आवश्यक तत्व है।23 यदि एक व्यक्ति महिला की लज्जा का अनादर करने के आशय से उसके समक्ष अपने गुप्तांग का प्रदर्शन करता है अथवा उसे सुनाने के आशय से अश्लील शब्दों का उच्चारण करता है, या उसके समक्ष अश्लील चित्र प्रस्तुत करता है। तो वह इस धारा के अन्तर्गत अपराध करता है।

अवयव- इस धारा के निम्नलिखित अवयव हैं

(1) किसी महिला की लज्जा का अनादर करने का आशय,

(2) अनादर|

(क) कहे गये शब्दों या किसी ध्वनि द्वारा, या अंग विक्षेप या किसी वस्तु के प्रदर्शन द्वारा इस आशय से किया जाये कि वह महिला ऐसे शब्द या ध्वनि को सुने या ऐसे अंग विक्षेप या वस्तु को देखे; या

(ख) ऐसी महिला की एकान्तता (privacy) का अतिक्रमण करके किया जाये।

तारक दास गुप्ता24 के बाद में अभियुक्त विश्वविद्यालय का एक स्नातक था। उसने एक अपरिचित अंग्रेज परिचारिका को सम्बोधित करके अश्लील प्रस्तावों से युक्त एक पत्र लिखा और उसे एक लिफाफे में बन्द कर उसके पास भेज दिया। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त ने उस परिचारिका की लज्जा का अनादर किया था।

510. मत्त व्यक्ति द्वारा लोकस्थान में अवचार-जो कोई मत्तता की हालत में किसी लोक स्थान में या किसी ऐसे स्थान में, जिसमें उसका प्रवेश करना अतिचार हो, आएगा और वहाँ इस प्रकार का आचरण

21. डी क्रूज, (1884) 8 मद्रास 110.

22. दण्ड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 (2013 का 13) की धारा 10 शब्दों ‘‘वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि। एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्मान से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगाके स्थान पर प्रतिस्थापित (दिनांक 3-22013 से प्रभावी) ।।

23. फैयाज मुहम्मद, (1903) 5 बाम्बे एल० आर० 502.

24. तारकदास गुप्ता, (1925) 28 बाम्बे एल आर० 90.

करेगा जिससे किसी व्यक्ति को क्षोभ हो, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि चौबीस घण्टे तक की हो। सकेगी, या जुर्माने से, जो दस रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

टिप्पणी

इस धारा को लागू होने के लिये दो तत्व आवश्यक हैं

(1) मत्तता की हालत में किसी व्यक्ति का

(क) किसी लोक स्थान में, या

(ख) किसी ऐसे स्थान में प्रवेश करना जिसमें उसका प्रवेश करना अतिचार होगा;

(2) इस प्रकार प्रवेश करने वाला व्यक्ति ऐसा आचरण करे जिससे किसी व्यक्ति को क्षोभ हो।

इस धारा द्वारा केवल मत्तता की स्थिति को दण्डनीय नहीं बनाया गया है। यह स्थिति उसी वक्त दण्डनीय है जब ऐसा व्यक्ति किसी सार्वजनिक स्थान अथवा किसी ऐसे स्थान पर जाता है, जहाँ जाने का उसे अधिकार नहीं होता तथा वहाँ जाकर वह लोगों को विक्षुब्ध करता है।

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