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Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 20 LLB Notes

 

Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 20 LLB Notes:- The Indian Penal Code 1860 (IPC) Legal Bites Criminal Law Notes CLAT Notes Available This Post Online Free Website, LLB Law 1st Year / 1st Semester Study Material in Hindi English Gujarati Punjabi Marathi Language in PDF Download.

 

 

  1. स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना- जो कोई स्वेच्छया उपहति कारित करता है, यदि वह उपहति, जिसे कारित करने का उसका आशय है या जिसे वह जानता है कि उसके द्वारा उसका किया जाना सम्भाव्य है घोर उपहति है, और यदि वह उपहति, जो वह कारित करता है, घोर उपहति हो, तो वह ‘स्वेच्छया घोर उपहति करता है” यह कहा जाता है।

स्पष्टीकरण– कोई व्यक्ति स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है, यह नहीं कहा जाता है। सिवाय जबकि वह घोर उपहति कारित करता है और घोर उपहति कारित करने का उसका आशय हो या घोर उपहति कारित होना वह सम्भाव्य जानता हो, किन्तु यदि वह यह आशय रखते हुए या यह सम्भाव्य जानते हए कि वह किसी एक किस्म की घोर उपहति कारित कर दे, वास्तव में दूसरी ही किस्म की घोर उपहति। कारित करता है, तो वह स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है, यह कहा जाता है।

दृष्टान्त

क यह आशय रखते हुए या यह सम्भाव्य जानते हुए कि वह य के चेहरे को स्थायी रूप से विद्रपित कर दे, य के चेहरे पर प्रहार करता है जिससे य का चेहरा स्थायी रूप से विद्रूपित तो नहीं होता, किन्तु जिससे य को बीस दिन तक तीव्र शारीरिक पीड़ा कारित होती है। क ने स्वेच्छया घोर उपहति कारित की है।

  1. स्वेच्छया उपहति कारित करने के लिए दण्ड-उस दशा के सिवाय, जिसके लिए धारा 334 में उपबन्ध है, जो कोई स्वेच्छया उपहति कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

टिप्पणी

भीमा बनाम महाराष्ट्र राज्य31 के मामले में यह आरोपित किया गया कि लगभग 22 व्यक्तियों ने विठ्ठल की हत्या करने और विट्ठल के भाई भीमराव को क्षति कारित करने, दमबलदार में वाडा क्षतिग्रस्त करने 29. ए० आई० आर० 1932 अवध 279.

  1. ए० आई० आर० 1919 इला० 379.
  2. 2602 क्रि० लाँ ज० 4293 (सु० को०).

आशय से विधि विरुद्ध जमाव गठित किया। हमला करने वालों ने लाठी से हमला किया तथा । उन्हें खेतों के पास या रास्ते में मिले पत्थरबाजी किया यह सिद्ध नहीं हो सका कि विनिर्दिष्ट रूप । किस पर हमला किया। यह स्पष्ट नहीं है कि मृत्यु कारित करने का आशय था । यह बहत सं आशय कठोरतापूर्वक मारने पीटने का रहा हो। न्यायालय ने कहा कि यदि हम यह स्वीकार भी कर मतक विटूल का ‘‘वाडा” तक पीछा किया गया, तो भी जमाव का उद्देश्य उसे कठोरतापूर्वक सबक था क्योंकि वह गांव का उपद्रवी था। परिस्थितियों एवं साक्ष्य को ध्यान में रखते हुये न्यायालय ने य अभिनिर्धारित किया कि युक्तियुक्त रूप से यह आशय निकाला जा सकता है कि सामान्य उद्देश्य भारतीय दण्ट संहिता की धारा 147/149 के साथ पठित 325 और धारा 323 के अधीन अपराध कारित करना था, न कि धारा 149 के साथ पठित धारा 302 के अधीन हत्या करना। इस प्रकार अभियुक्त अपीलार्थी व्यक्ति भारतीय दण्ड संहिता की धारा 149 के साथ पठित धारा 302 के अधीन आरोपों से दोषमुक्त किये जाने के हकदार हैं।

  1. खतरनाक आयुधों या साधनों द्वारा स्वेच्छया उपहति कारित करना- उस दशा के सिवाय, जिसके लिए धारा 334 में उपबन्ध है, जो कोई असन, वेधन या काटने के किसी उपकरण द्वारा या किसी ऐसे उपकरण द्वारा जो यदि आक्रामक आयुध के तौर पर उपयोग में लाया जाए तो उससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है, या अग्नि या किसी तप्त पदार्थ द्वारा, या किसी विष या किसी संक्षारक पदार्थ द्वारा या किसी विस्फोटक पदार्थ द्वारा या किसी ऐसे पदार्थ द्वारा, जिसका श्वास में जाना या निकलना या रक्त में पहुँचना मानव शरीर के लिए हानिकारक है, या किसी जीवजन्तु द्वारा स्वेच्छया उपहति कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

टिप्पणी

पामूला सरस्वती बनाम आंध्र प्रदेश राज्य32 वाले मामले में दस अभियुक्तों ने विधि विरुद्ध जमाव किया और पामूला नारायण की हत्या कारित किया। उन्होंने 8000 रु० मृतक के कब्जे से चुराये और हमला किया तथा मृतक की पत्नी को भी घायल कर दिया और मृतक की पत्नी के कान के बुन्दे चुरा लिये। दसों अभियुक्तों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 148, 324, 326, 379 और 302 के अधीन आरोपित किया गया। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 या 149 के अधीन कोई आरोप विरचित नहीं किया गया। मृतक की पत्नी ही एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी साक्षी थी। उसने यह बयान दिया कि अ-1 ने मृतक के माथे पर बाईं ओर और दाएं घुटने के नीचे प्रहार किया। अभियुक्त-2 ने मृतक के माथे पर दाईं ओर और दाएं कंधे पर प्रहार किया। अ-6 ने मृतक के सिर पर और माथे पर बाईं ओर प्रहार किया तथा अ-3′ ने मृतक पर कुल्हाड़ी से दाहिनी पसली पर प्रहार किया। इस प्रकार उसने इन चार व्यक्तियों के द्वारा किये गये कृत्यों का वर्णन किया और उनमें से प्रत्येक द्वारा पहुँचाई गई क्षति को विनिर्दिष्ट किया। चिकित्सक की राय में मृतक की पसली में आई क्षति से उसकी मृत्यु हुई और वह प्रहार अ-3 ने किया था।

विचारण न्यायालय ने अ-1, अ-2 और अ-6 इन तीन को छोड़कर शेष सभी को दोषमुक्त कर दिया और तीन अभियुक्तों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के अधीन अर्थात् भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 या 149 की सहायता के बिना दोषसिद्ध कर दिया। विचारण न्यायालय ने उन्हें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 और 379 के अधीन भी दोषसिद्ध किया। विचारण न्यायालय ने अभि सा०-1 के साक्ष्य को विश्वसनीय माना तथापि अ-3 को दोषमुक्त करना समझ से परे है। अपील में उच्च न्यायालय ने भी तीनों अपीलार्थियों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 के अधीन दोषी पाया परन्तु धारा 302 के अधीन आरोप मुक्त कर । दिया।

उतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि प्रत्यर्थीगण पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 205 के साथ पठित धारा 34 या 149 के अधीन आरोप नहीं था। इसलिये उच्च न्यायालय ने भारतीय दण्ड ।

संहिता की धारा 302 के अधीन की गई दोषसिद्धि को अपास्त करके ठीक काम किया। उच्च न्यायालय ने अन्य क्षतियों को साधारण माना जो शरीर के संवेदनशील अंगों पर नहीं थीं, जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 320 के अधीन गंभीर नहीं थी। स्पष्ट है कि अभिलेख पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है कि अन्य कोई भी क्षति ऐसी है जो सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित कर सके। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 के अधीन दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने के लिये कोई कारण नहीं पाया।

परशुराम पाण्डे बनाम बिहार राज्य33 वाले मामले में 24-12-1989 को लगभग 1.30 बजे अपरान्ह जिस समय वीरेन्दर पाण्डे (अभि० सा० 6), भरत पाण्डे (अभि० सा० 5) और कन्हैया पाण्डेय (मृतक) अपने खेत में खड़े थे, उसी समय रघुनाथ पाण्डे ने अपनी भैंसे वीरेन्दर पाण्डे के खेत में चरने के लिये हाँक दी, जिस पर वीरेन्द्र पाण्डे ने आपत्ति किया। इस पर रघुनाथ पाण्डे ने उसे गाली दिया, इस पर मृतक कन्हैया पाण्डेय ने उसका प्रतिरोध किया। इस पर रघुनाथ पाण्डे अपने घर गया और अन्य अभियुक्तों के साथ। हथियारबंद होकर लौटा। रघुनाथ के हाथ में रायफल थी, विशराम पांडे के पास बन्दूक थी और सोमारु पाण्डे (प्र० सा० 2) के हाथ में फरसा था। सोमारु पाण्डे और शारदा राम द्वारा उकसाए जाने पर रघुनाथ पाण्डे ने रायफल से चार गोलिया चलाईं। दो गोली कन्हैया को लगी जो गोली लगते ही गिर गया। इसके बाद अपीलार्थीगण और अन्य अपनी बंदूकों से अंधाधुंध गोली चलाने लगे, जिससे ग्रामीणों को भी क्षतियाँ कारित हुई। सोमारु पाण्डेय ने वीरेन्दर और भरत पाण्डे पर फरसा चलाया, जिससे भरत पाण्डे को फरसे के लाठी वाले भाग से चोट आई। इसी बीच सुरेन्द्र पाण्डे (अभि० सा० 3) और राम इकबाल पाण्डे (अभि० सा० 4) घटनास्थल पर पहुँचे और यह सब देखा। इसके बाद अभियुक्तगण भाग गये ! कन्हैया पाण्डे को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया। मृत्यु अत्यधिक रक्तस्राव और आग्नेयास्त्र से गोली लगने के सदमे के कारण हुई। अन्य क्षतिग्रस्त जिनमें हृदयनाथ राय, शंभूकुमार सिंह, राजेश सिंह और मथुरा सिंह थे, जिन्हें साधारण क्षतियाँ कारित हुई जो बन्दूक के छरों से आई हुई अनुमानित थीं। विचारण न्यायालय तथा उच्च न्यायालय ने (अभि० सा० 3) सुरेन्द्र पाण्डे, राम इकबाल पाण्डे (अभि० सी० 4), भरत पाण्डे (अभि० सा० 5) और बीरेन्द्र पाण्डे (अभि० सा० 6) के परिसाक्ष्य के आधार पर अभियुक्त परसुराम पाण्डे, विशराम पाण्डे और सोमारु पाण्डे की भारतीय दण्ड संहिता की धारा 149 के साथ पठित धारा 302 के अधीन दोषसिद्ध किया।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये कि मौखिक कहा सुनी के बाद अभियुक्त अपने घर गया और अन्य सहअभियुक्तों के साथ हथियारों से लैस होकर वापस आया और अंधाधुंध फायरिंग आरंभ कर दिया, किन्तु सहअभियुक्तों ने न तो मृतक पर गोली चलाया और न ही साथियों पर जो मृतक के साथ थे, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि अभियुक्तगण विधि-विरुद्ध जमाव के सदस्य थे जो मृतक की हत्या करने के सामान्य उद्देश्य से गये थे, क्योंकि घटना बहुत कम समय में घटी। अतः सह अभियुक्त परसुराम पाण्डे, विशराम पाण्डे और सोमारु पाण्डे को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/149 के आरोप से दोषमुक्त कर दिया गया और उन्हें धारा 34 के साथ पठित धारा 324 के अधीन दोषसिद्ध किया गया।

दो अभियुक्त परशुराम और विशराम को धारा 307 के अधीन दोषसिद्ध किया गया। इस संबंध में यह अभिनिर्धारित किया गया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 के अधीन अपराध को लाने के लिये मृत्यु कारित करने का आशय या जानकारी आवश्यक है। इस मामले में अभिकथित रूप से सह-अभियुक्तों ने ग्रामीणों पर अंधाधुंध गोली चलाई, जिससे उन्हें साधारण क्षतियाँ कारित हुई। किसी साक्षी ने यह कथन नहीं किया कि सहअभियुक्त ने बंदूकों का प्रयोग उन्हें क्षति पहुँचाने के लिये किया था। इसलिये मृत्यु कारित करने की जानकारी या आशय साबित नहीं होता और सहअभियुक्त धारा 307 के आरोप से मुक्त किये जाने के हकदार हैं तथापि, सहअभियुक्तों ने अंधाधुंध फायर किया है। ऐसा उन्होंने प्रत्याक्रमण को रोकने के सामान्य

६२यस किया, अत: वे विधि-विरुद्ध जमाव के दोषी हैं, अतः सभी सह अभियुक्त भारतीय दण्ड संहिता का ‘धारा 149 के साथ पठित धारा 324 के अधीन दोषसिद्ध किये जाने के दायी हैं।

  1. 2004 क्रि० लॉ ज० 4978 (सु० को०).
  2. स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने के लिए दण्ड-उस दशा के सिवाय, जिसके धारा 335 में उपबन्ध है, जो कोई स्वेच्छया घोर उपहति कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी टपट होगा।

टिप्पणी

धारा 325 स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने के अपराध हेतु दण्ड का विधान करती है।

दुखमोचन पाण्डेय बनाम स्टेट आफ बिहार, 34 के बाद में लगभग 200 व्यक्तियों की एक भीड विभिन्न अस्त्र शस्त्रों से लैश होकर अभियोजन पक्ष को खेत में रोपाई (Transplantation) का कार्य करने से विरत करने के एक मात्र उद्देश्य से खेत में आयी। कतिपय अभियुक्तगणों द्वारा तत्काल मौके पर ललकारने के फलस्वरूप उनमें से कुछ जो अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित थे, मृतक पर हमला बोल दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गई। अभियुक्तगणों के ऊपर धारा 302 सपठित धारा 34 के अधीन आरोप लगाया गया और विचारण किया गया। यह अभिनित किया गया कि सभी अभियुक्त गणों को हत्या कारित करने के अपराध हेतु दण्डित नहीं किया जा सकता है। मात्र यह तथ्य कि अभियुक्तगण कतिपय शस्त्रों से लैश थे अपने आप में उन सब का हत्या का सामान्य आशय होना मानने के लिये यथेष्ट नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने केवल हमला किया था वह भी शरीर के मर्म अंग पर नहीं और जिससे कि अन्तत: कुछ मामूली चोटें ही पहुँची। इन तथ्यों के आधार पर संदेह से परे यह सिद्ध किया गया मानना सम्भव नहीं है कि उन सबका सामान्य आशय मृतक की हत्या करना था। ऐसी स्थिति में सभी अभियुक्तगण का धारा 302 सपठित धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता दोषसिद्धि ग्रहणीय नहीं अतएव वे मात्र धारा 325 सपठित धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन अपराध कारित करने हेतु दण्डनीय होंगे। परन्तु ललकार सुनकर बन्दूक से गोली चलाने वाले अभियुक्तगण धारा 302 सपठित धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दण्डित किये जायेंगे।

हरियाणा राज्य बनाम मांगे राम35 के मामले में प्रत्यर्थी मांगेराम ने मृतक पर हमला किया और उसके बाएं टखने पर लाठी से प्रहार किया, उसके पुत्र किशन ने दाएं पैर में फरसे से प्रहार किया और दूसरे पुत्र जोगिन्दर सिंह ने दाएं टखने पर वल्लम से प्रहार किया और मांगे राम के साले कप्तान सिंह ने बांई कलाई पर लाठी से प्रहार किया। जोगिन्दर ने मृतक की बाईं कोहनी पर बल्लम से प्रहार किया जिस पर वह भूमि पर गिर गया। इसके बाद चारों अभियुक्तों ने गिरने के बाद कुछ और क्षतियाँ पहुँचाईं। क्षतियाँ कारित करने के बाद अभियुक्त मौके से भाग गये। घटना को अभि० सा० 5 भीम सिंह और संतराम ने देखा, जिसके घर के सामने मृतक हुक्का पी रहा था। घटना के बारे में सूचना अभि० सा० 5 ने सूबे सिंह (अभि० सा० 8) मृतक के पिता को दिया। अभि० सा० 8 मौके पर पहुँचा। मृतक को सिविल अस्पताल ले जाया गया जहाँ डॉ० डी० एस० राणे द्वारा उसकी चिकित्सीय परीक्षा की गई। चिकित्सा रिपोर्ट के अनुसार 10 क्षतियाँ पाई गई जिनमें से रिपोर्ट में दर्शित क्षति सं० 1, 2 और 8 गंभीर प्रकृति की थीं। डॉ० राणे ने अभिकथन किया कि कोई भी क्षति अलग रूप से या सबको मिलाकर जान के लिये खतरनाक नहीं थी। घायल को अंतिम बार डॉ० ए० एन० गुप्ता (अभि० सा० 7) चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल रोहतक में देखा था। उनके अनुसार घायल को प्रथमत: एग्रप का रक्त चढ़ाया गया, बाद में उस ग्रुप का रक्त समाप्त हो गया। इसलिये उसे ओ-पाजिटिव ग्रुप का रक्त चढ़ाया गया। उन्होंने आगे यह परिसाक्ष्य दिया कि वह नहीं कह सकते कि मृत्यु रक्त की प्रतिक्रिया के कारण हई या उसे लगी चोटों के कारण हुई किन्तु उन्होंने कहा कि उनके मन में रक्त के प्रतिक्रिया का भय बना था, अतः उसे रोकने के लिये औषधि दी थी। इन परिस्थितियों में सत्र न्यायाधीश ने यह निष्कर्ष दिया कि घायल व्यक्ति के रक्त प्रतिक्रिया से मरने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, यद्यपि शव परीक्षण करने वाले चिकित्सक ने क्षतियों के कारण लीवर कट-फट जाने को मृत्यु का कारण बताया था।

उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि उपलब्ध चिकित्सीय साक्ष्य के आधार पर सत्र न्यायाधीश दारा अपनाया गया मत संभव हो सकता है अतः अभियुक्तों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34

  1. 1998 क्रि० लॉ ज० 66 (एस० सी०).
  2. 2003 क्रि० लॉ ज० 830 (सु० को०).

के साथ पठित धारा 325 और 326 के अधीन अपराध के लिए ठीक ही दौशिसिद्ध किया गया है, और भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के साथ पठित धारा 302 के अधीन दोषिसिद्ध नही किया जा सकता है |

मथाई बनाम केरल राज्य36 वाले मामले में कृष्ठान कुट्टी (अभि० सा० 1) सार्वजनिक सड़क पर जा रहा था, अभियुक्त ने पत्थर से उसके सिर और चेहरे पर प्रहार किया, जिससे उसे चोटें आई । क्षतिग्रस्त को उपचार के लिये अस्पताल ले जाया गया। क्षतिग्रस्त कृष्ठान द्वारा दिये गये बयान के आधार पर (अभि० सा० । 7) हेड कान्स्टेबिल ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराया और सहायक निरीक्षक राधाकृष्णन ने अन्वेषण आरंभ किया और अन्वेषण पूर्ण होने पर आरोप-पत्र फाइल किया। विचारण के दौरान अभि० सा० 1 को आई क्षतियों का अभियोजन द्वारा गंभीरतापूर्वक खण्डन नहीं किया गया और जिस चिकित्सक ने चिकित्सा परीक्षा किया। था, उसके प्रमाणपत्र द्वारा क्षतियों का समर्थन प्राप्त हुआ। क्षतियों की संपुष्टि एक प्रत्यक्षदर्शी साक्षी द्वारा भी। किया गया जो मौके पर उपस्थित था। इस प्रकार विचारण न्यायालय ने अभियुक्त को घातक हथियार से क्षति कारित करने के लिये भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326 के अधीन दोषसिद्ध किया। दोषसिद्धि को उच्च न्यायालय द्वारा भी पुष्ट किया गया। अपील किये जाने पर उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि कोई विशिष्ट वस्तु इतनी गंभीर थी, जो उपहति कारित कर सकती है या नहीं, यह तथ्यात्मक रूप से सिद्ध किया जाना चाहिये। चिकित्सक के साक्ष्य से यह स्पष्ट रूप से दर्शित होता है कि कारित की गई क्षति स्पष्टत: ‘गंभीर उपहति” के प्रवर्ग में आती है, जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 320 के अधीन परिभाषित की गई। है। इससे आवश्यक रूप से निष्कर्ष यह निकलता है कि ”गंभीर उपहति” कारित की गई थी। ऐसा नहीं है। कि प्रत्येक मामले में पत्थर को घातक हथियार माना जाय। यह तथ्यों पर आधारित होगा। किसी विशिष्ट मामले के तथ्यों से जिनमें पत्थर का आकार, बनावट, तीखापन, आदि ऐसे तत्व हैं जिन पर यह निर्भर करेगा कि हथियार खतरनाक या घातक था या नहीं और इसी पर यह निर्भर होगा कि धारा 325 लागू होगी या धारा 326 लागू होगी। प्रस्तुत मामले में प्रयोग किये गये पत्थर के आकार को ध्यान में रखते हुये जो अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से दर्शित है, यह नहीं कहा जा सकता है कि घातक हथियार का प्रयोग किया गया है। इसलिये उच्चतम न्यायालय ने दोषसिद्धि को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326 से बदल कर 325 के अधीन कर दिया।

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