Select Page

Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 2 LLB Notes

Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 2 LLB Notes:- Law LLB  Indian Penal Code 1st Year / 1st Semester Online Book Notes Study Material Question With Answer Previous Year Mock Test Paper in PDF Download.  

 

 
 
  1. हत्या एतस्मिन् पश्चात् अपवादित दशाओं को छोड़कर आपराधिक मानव वध हत्या है, यदि वह कार्य, जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई हो, मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया हो, अथवा

दूसरा-यदि वह ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया हो जिससे अपराधी जानता हो कि उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है, जिसको वह अपहानि कारित की गई है, अथवा । तीसरा-यदि वह किसी व्यक्ति को शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया हो और वह शारीरिक क्षति, जिसके कारित करने का आशय हो, प्रकृति के मामूली अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए। पर्याप्त हो, अथवा चौथा-यदि कार्य करने वाला व्यक्ति यह जानता हो कि वह कार्य इतना आसन्न संकट है कि पूरी अधिसम्भाव्यता है कि वह मृत्यु कारित कर ही देगा या ऐसी शारीरिक क्षति कारित कर ही देगा जिससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है और वह मृत्यु कारित करने या पूर्वोक्त रूप की क्षति कारित करने की जोखिम उठाने के लिए किसी प्रतिहेतु के बिना ऐसा कार्य करे। दृष्टान्त (क) य को मार डालने के आशय से क उस पर गोली चलाता है, परिणामस्वरूप य मर जाता है। क हत्या करता है। (ख) क यह जानते हुए कि य ऐसे रोग से ग्रस्त है कि सम्भाव्य है कि एक प्रहार उसकी मृत्यु कारित कर दे, शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से उस पर आघात करता है। ये उस प्रहार के परिणामस्वरूप मर जाता है। क हत्या का दोषी है, यद्यपि वह प्रहार किसी अच्छे स्वस्थ व्यक्ति की मृत्यु करने के लिए प्रकृति के मामूली अनुक्रम में पर्याप्त न होता। किन्तु यदि क, यह न जानते हुए कि य किसी रोग से ग्रस्त है, उस पर ऐसा प्रहार करता है, जिससे कोई अच्छा स्वस्थ व्यक्ति प्रकृति के मामूली अनुक्रम में न मरता, तो यहाँ, क, यद्यपि शारीरिक क्षति कारित करने का उसका आशय हो, हत्या का दोषी नहीं है, यदि उसका आशय मृत्यु कारित करने का या ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने का नहीं था, जिससे प्रकृति के मामूली अनुक्रम में मृत्यु कारित हो जाए।

  1. (1883) 15 काक्स 174.
  2. एम० एण्ड एम० 231.

(ग) य को तलवार या लाठी से ऐसा घाव क साशय करता है, जो प्रकृति के मामूली अनक्रम में लि मनुष्य की मत्य कारित करने के लिए पर्याप्त है। परिणामस्वरूप य की मृत्यु कारित हो जाती है, यहाँका का दोषी है, यद्यपि उसका आशय य की मृत्यु कारित करने का न रहा हो। (घ) क किसी प्रतिहेतु के बिना व्यक्तियों के एक समूह पर भरी हुई तोप चलाता है और उनमें से एक का वध कर देता है। क हत्या का दोषी है, यद्यपि किसी विशिष्ट व्यक्ति की मृत्यु कारित करने की उसकी पूर्वचिन्तित परिकल्पना न रही हो।। अपवाद 1-आपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है-आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है। यदि अपराधी उस समय जब कि वह गम्भीर और अचानक प्रकोपन से आत्म-संयम की शक्ति से वंचित हो, उस व्यक्ति की, जिसने कि वह प्रकोपन दिया था, मृत्यु कारित करे या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु भूल या दुर्घटनावश कारित करे। ऊपर का अपवाद निम्नलिखित परन्तुकों के अध्यधीन है। पहला-यह कि वह प्रकोपन किसी व्यक्ति का वध करने या अपहानि करने के लिए अपराधी द्वारा। प्रतिहेतु के रूप में ईप्सित न हो या स्वेच्छया प्रकोपित न हो। दूसरा-यह कि वह प्रकोपन किसी ऐसी बात द्वारा न दिया गया हो जो विधि के पालन में या लोक सेवक द्वारा ऐसे लोक सेवक की शक्तियों के विधिपूर्ण प्रयाग में, की गई हो। तीसरा-यह कि वह प्रकोपन किसी ऐसी बात द्वारा न दिया गया हो, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के विधिपूर्ण प्रयोग में की गई हो। स्पष्टीकरण– प्रकोपन इतना गम्भीर और अचानक था या नहीं कि अपराध को हत्या की कोटि में जाने। से बचा दे, यह तथ्य का प्रश्न है। दृष्टान्त (क) य द्वारा दिए गए प्रकोपन के कारण प्रदीप्त आवेश के असर में म का, जो य का शिशु है, क साशय वध करता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन उस शिशु द्वारा नहीं दिया गया था और उस शिशु की मृत्यु उस प्रकोपन से किए गए कार्य को करने में दुर्घटना या दुर्भाग्य से नहीं हुई है। (ख) क को म गम्भीर और अचानक प्रकोपन देता है। क इस प्रकोपन से म पर पिस्तौल चलाता है, जिसमें न तो उसका आशय य का, जो समीप ही है किन्तु दृष्टि से बाहर है, वध करने का है, और न वह यह जानता है कि सम्भाव्य है कि वह य का वध कर दे। क, य का वध करता है। यहाँ, क ने हत्या नहीं की है, किन्तु केवल आपराधिक मानव वध किया है। (ग) य द्वारा, जो एक बेलिफ है, क विधिपूर्वक गिरफ्तार किया जाता है। उस गिरफ्तारी के कारण क को अचानक और तीव्र आवेश आ जाता है और वह य का वध कर देता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन ऐसी बात द्वारा दिया गया था, जो एक लोक सेवक द्वारा उसकी शक्ति के प्रयोग में की गयी थी। (घ) य के समक्ष, जो एक मजिस्ट्रेट है, साक्षी के रूप में क उपसंजात होता है। य यह कहता है कि वह क के अभिसाक्ष्य के एक शब्द पर भी विश्वास नहीं करता और यह कि क ने शपथ भंग किया है। क को इन शब्दों से अचानक आवेश आ जाता है और वह य का वध कर देता है। यह हत्या है। (ङ) य की नाक खींचने का प्रयत्न क करता है। य प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में ऐसा करने से रोकने के लिए क को पकड़ लेता है। परिणामस्वरूप क को अचानक और तीव्र आवेश आ जाता है और वह य का वध कर देता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन ऐसी बात द्वारा दिया गया था जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की गई थी। (च) ख पर य आघात करता है। ख को इस प्रकोपन से तीव्र क्रोध आ जाता है। क, जो निकट ही खड़ा हुआ है, ख के क्रोध का लाभ उठाने और उससे य का वध कराने के आशय से उसके हाथ में एक छुरी उस प्रयोजन के लिए दे देता है। ख उस छुरी से य का वध कर देता है। यहाँ ख ने चाहे केवल आपराधिक मानव वध ही किया हो, किन्तु क हत्या का दोषी है। अपवाद 2-आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि अपराधी, शरीर या सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार को सद्भावपूर्वक प्रयोग में लाते हुए विधि द्वारा उसे दी गई शक्ति का अतिक्रमण कर दे, और पूर्वचिन्तन बिना और ऐसी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से जितनी अपहानि करना आवश्यक हो, उससे अधिक अपहानि करने के किसी आशय के बिना उस व्यक्ति की मृत्यु कारित कर दे जिसके विरुद्ध वह प्रतिरक्षा का ऐसा अधिकार प्रयोग में ला रहा हो। दृष्टान्त क को चाबुक मारने का प्रयत्न य करता है, किन्तु इस प्रकार नहीं कि क को घोर उपहति कारित हो। क एक पिस्तौल निकाल लेता है। य हमले को चालू रखता है। क सद्भावपूर्वक यह विश्वास करते हुए कि वह अपने को चाबुक लगाए जाने से किसी अन्य साधन द्वारा नहीं बचा सकता है, गोली से य का वध कर देता है। क ने हत्या नहीं की है, किन्तु केवल आपराधिक मानव वध किया है। अपवाद 3-आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि वह अपराधी ऐसा लोक सेवक होते हुए, या ऐसे लोक सेवक को मदद देते हुए, जो लोक न्याय की अग्रसरता में कार्य कर रहा है, उसे विधि द्वारा दी गई शक्ति से आगे बढ़ जाए, और कोई ऐसा कार्य करके, जिसे वह विधिपूर्ण और ऐसे लोक सेवक के नाते उसके कर्तव्य के सम्यक निर्वहन के लिए आवश्यक होने का सद्भावपूर्वक विश्वास करता है, और उस व्यक्ति के प्रति, जिसकी कि मृत्यु कारित की गई है, वैमनस्य के बिना, मृत्यु कारित करे। अपवाद 4-आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है यदि मानव वध अचानक झगड़ा जनित आवेश की तीव्रता में हुई अचानक लड़ाई में पूर्वचिन्तन बिना और अपराधी द्वारा अनुचित लाभ उठाए बिना या क्रूरतापूर्ण या अप्रायिक रीति से कार्य किए बिना किया गया हो। स्पष्टीकरण- ऐसी दशाओं में यह तत्वहीन है कि कौन पक्ष प्रकोपन देता है या पहले हमला करता अपवाद 5-आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि वह व्यक्ति जिसकी मृत्यु कारित की जाए, अठारह वर्ष से अधिक आयु का होते हुए, अपनी सम्मति से मृत्यु होना सहन करे, या मृत्यु की जोखिम उठाए। दृष्टान्त य को, जो अठारह वर्ष से कम आयु का है, उकसाकर क उससे स्वेच्छया आत्महत्या करवाता है। यहाँ, कम उम्र होने के कारण य अपनी मृत्यु के लिए सम्मति देने में असमर्थ था, इसलिए क ने हत्या का दुष्प्रेरण किया है। टिप्पणी धारा 300 उन मामलों से सम्बन्धित है जिनमें आपराधिक मानव-वध हत्या होता है। अत: कोई भी अपराध तब तक हत्या की कोटि में नहीं आ सकता जब तक वह आपराधिक मानव-वध की कोटि में नहीं आता। हत्या में आपराधिक मानव-वध भी सम्मिलित है किन्तु आपराधिक मानव-वध हत्या हो भी सकता है। और नहीं भी। आपराधिक मानव-वध का कोई मामला हत्या होगा यदि वह धारा 300 के चार खण्डों में से किसी भी एक खण्ड के अन्तर्गत आता है। हत्या के विचारण में न्याय सुनिश्चित करने के लिये न्यायालय को अपने समक्ष प्रस्तुत किये गये सा तक ही सीमित रहना चाहिये। न्यायालय कक्ष के बाहर की गर्मा-गर्मी, चाहे वह समाचार माध्यमों के अथवा लोकमत के फड़फड़ाहट के द्वारा पैदा की गयी हो, से इसे अपने को पृथक रखना चाहिये 42 । खण्ड 1-वह कार्य जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गयी है मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया हो-जैसा कि धारा 299 में स्पष्ट किया गया है, कि कार्य के अन्तर्गत अवैध लोप भी आता है। अत: अवैध लोप द्वारा भी मृत्यु कारित की जा सकती है। यदि माता-पिता अपने बच्चों को समुचित आहार प्रदान करने में उपेक्षा करते हैं और यदि किसी बच्चे की मृत्यु हो जाती है तो माता-पिता हत्या कारित करने के दोषी होंगे 43 आर० वेंकलू44 के वाद में अभियुक्त ने उस झोपड़ी में आग लगा दिया जिसमें द सो रहा था। आग लगाते समय अभियुक्त ने झोपड़ी का दरवाजा बन्द कर उसमें ताला लगा दिया था, जिससे झोपड़ी के बाहर सो रहे द के नौकर उसकी सहायता के लिये न आ सकें। उसने इस बात की भी सावधानी बरती थी कि गांव वाले द की मदद के लिये न आ सकें। यहाँ यह स्पष्ट है कि अभियुक्त का आशय द की हत्या करना था। यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के मर्मस्थल पर छुरा भोंक देता है और यदि इस चोट से प्रत्यक्षत: या परोक्षत: उसकी मृत्यु हो जाती है तो यह माना जायेगा कि उसका आशय मृत्यु कारित करना था। और उपहति कारित करने वाले व्यक्ति को हत्या के लिये दण्डित किया जायेगा +5 स्टेट आफ कर्नाटक बनाम गंगाधरैय्या46 के मामले में रेस्पोंडेन्ट का विवाह मृतक के साथ सन् 1971 के आसपास हुआ था। शादी के समय से ही रेस्पोंडेन्ट बहुधा शराब पीकर घर आता था और मृतक को मारता तथा दुर्व्यवहार करता था। दुर्घटना के दिन 17 अप्रैल, 1985 को शाम को रेस्पान्डेन्ट अपनी पत्नी से झगड़ना शुरू कर दिया और जब अभियोजन के गवाह-5 ने बीच बचाव करने का प्रयास किया तब उसे मृतक ने वापस कर दिया। लगभग 9 बजे रात्रि में जब झगड़ा अपनी चरमसीमा पर पहुँच गया तो मृतक ने अपने पड़ोसी गवाह नं० 4 काला को पुकारा और उससे अपनी माँ नरसम्म गवाह नं० 6 जो पड़ोस में ही रहती थी, को बुला लाने के लिये कहा। परन्तु उन लागों के पहुंचने के पहले ही रेस्पान्डेन्ट ने चाकू से अपनी पत्नी के गर्दन पर आघात किया जिसके कारण ऐसी चोट आई कि जोर से खून बहने लगा। इस प्रकार घायल किये जाने के बाद उसने भागने का प्रयास किया परन्तु एक घर के सामने गिर पड़ी। जब नरसम्मा गवाह नं० 6 और काला गवाह नं० 4 पहुँचे तब उन्होंने पापच्या को मरा पड़ा हुआ देखा। घटना के समय अभियुक्त की उपस्थिति सिद्ध की गयी। गवाहों ने अभियुक्त को उसकी पत्नी की मृत्यु के पश्चात् घर से भागते हुये देखा और उसे तीन सप्ताह बाद ही पकड़ा जा सका। इस बात का कोई तथ्य नहीं था जिससे यह सिद्ध हो सके कि चश्मदीद गवाहों की अभियुक्त से कोई दुश्मनी थी अथवा वह हितबद्ध गवाह था। यह अभिनिर्धारित किया गया कि उपरोक्त तथ्यों और साक्ष्य के आलोक में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मात्र अभियुक्त ने ही मृतक की हत्या की है और अन्य किसी ने नहीं। अतएव अभियुक्त को हत्या के अपराध के लिये दायित्वाधीन पाया। गया। एम० सुशीला बनाम स्टेट आफ तमिलनाडु47 के वाद में सेलवाराज और सेलवाराज के बड़े भाई की पत्नी सशीला का सेलवाराज अभियुक्त-1 की पत्नी गीथा लक्ष्मी की हत्या करने हेतु धारा 302 सपठित धारा। 23 भा० ० संहिता के अधीन विचारण किया गया। अभियुक्त सेलवाराज और उसके बड़े भाई का परिवार एक साथ एक कमरे में रह रहा था और अभियुक्त एक रिक्शा चालक था। मृतक और अभियुक्त सेलवाराज का विवाह अक्टूबर 1984 में हुआ था परन्तु उनके आपस में सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। मृतक के साथ दुर्व्यवहार किया जाता था और यह भी चर्चा थी कि सेलवाराज का सुशीला के साथ अवैध सम्बन्ध था। इस प्रकार के

  1. राज्य (दिल्ली प्रशासन) बनाम लक्ष्मण कुमार, 1986 क्रि० लॉ ज० 155(एस० सी०). __
  2. गंगा सिंह, (1873) 5 एन० डब्ल्यू ० पी० 44.
  3. ए० आई० आर० 1956 सु० को० 171.
  4. गा डबे, (1904) 1 क्रि० लॉ ज० 909.
  5. 1997 क्रि० लॉ ज० 4068 (एस० सी०).
  6. 1997 क्रि० लॉ ज० 4390 (एस० सी०).

वातावरण से ऊब कर सीथालक्ष्मी अपने माता-पिता के घर चली आई परन्तु उसकी माता गवाह नं०-1 विजय । लक्ष्मी और पिता गवाह नं०-2 थ्यागराजन ने उसे ढांढस बंधाया और समझा-बुझाकर वापस भेज दिया। दुर्घटना के कुछ दिन पहले अभियुक्त और उसका भाई सुब्रनियम, सुशीला और मृतक किसी त्योहार के सम्बन्ध में सीथा लक्ष्मी के माता पिता के घर गये थे। इस अवसर पर अभियुक्त ने यह दबाव डाला कि उसकी सास उसे कुछ पैसा दे परन्तु वह उसकी माँग को पूरा नहीं कर सकी। मृतक भी अपने ससुराल वापस आ गयी। परन्तु उसके एक सप्ताह बाद उसके माता पिता को यह सूचना मिली कि अभियुक्तगण उसकी पुत्री के साथ दुर्व्यवहार कर रहे थे। झगड़ा की बात पड़ोसियों को भी अच्छी तरह मालूम थी। घटना के दिन अर्थात् 11 अप्रैल, 1985 को दोनों अभियुक्तों और मृतक के बीच झगड़ा काफी समय तक चलता रहा जिसे बहुत से। पड़ोसियों द्वारा देखा गया। गवाह नं० 3 शनमुधम ने झगड़े के बारे में पूछताछ की। दोपहर लगभग 12 बजे गवाह नं० 6 कृष्णमूर्ति जो एक नजदीकी रिश्तेदार था सीथा लक्ष्मी से मिलने के लिये आया और पूछने पर अभियुक्त ने बताया कि वह कुम्बकोनम के यहाँ गई है। थोड़ी देर बाद दोनों अभियुक्त एक सायकिल पर बैठकर चले गये। जब लगभग 1.30 बजे अपरान्ह शनमुधम वापस आया तो अभियुक्त-1 सेलवाराज ने उससे कहा कि सीथालक्ष्मी ने आत्महत्या कर लिया था और उसकी शरीर सीलिंग से लटक रही थी। अभियुक्त ने उसकी लाश को नीचे लाने के लिये उससे आग्रह किया परन्तु उसने ऐसा करने से मना कर दिया। अभियुक्त ने स्वयं लगभग 8.00 बजे रात्रि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराया। यह मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था। परन्तु न्यायालय ने इसे आत्महत्या का मामला मानने से इंकार कर दिया, क्योंकि छत और कड़ी की ऊँचाई 12 फिट थी और सीथा लक्ष्मी के लिये सीलिंग की कड़ी में नाइलान की साड़ी इतनी ऊँचाई पर बांधना और फिर अपने को लटकाना कठिन कार्य था। आगे यह भी अभिनिर्धारित किया पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार कि मृतक की गर्दन पर नाखून के निशान और गला घोंटने के कारण कण्ठिका का भंग होना और सांस फूलने के लक्षण यह सिद्ध करते हैं कि मृतक की मृत्यु मानवघाती (homicidal) थी। अभियुक्त को अपनी भाभी के साथ अवैध सम्बन्ध था और इसी कारण उसने इस अपराध में भागिता की थी इस बात को सिद्ध करने हेतु केवल अनुश्रुत साक्ष्य के अतिरिक्त कोई अन्य विश्वसनीय साक्ष्य नहीं था। अतएव सन्देह का लाभ देते हुये सुशीला की दोषसिद्धि निरस्त कर दी गई परन्तु मृतक के पति की दोषसिद्धि को मान्य किया गया। नामदेव बनाम महाराष्ट्र राज्य18 के वाद में अपीलांट नामदेव और मृतक निनाजी एक ही गांव में रह रहे थे और उनके आपसी सम्बन्ध तनावपूर्ण थे। इस तनाव का कारण यह था कि अभियुक्त को इस बात का सन्देह था कि उसके कुछ जानवरों की मृत्यु मृतक द्वारा जादू टोना किये जाने के परिणामस्वरूप हो गयी थी। 25 अक्टूबर, 2000 को मृतक निनाजी अपने मकान की पिछले आंगन में सो रहा था। रात्रि में लगभग 2.00 बजे से 3.00 बजे के मध्य मृतक निनाजी के पुत्र सोपान अभि० सा० 6 अपने पिता के चिल्लाने की आवाज सुनी कि वह ‘‘बाप रे, बाप रे” कहते हुये चिल्ला रहे हैं। उनका चिल्लाना सुनकर सोपान और उसकी पत्नी मकान के पिछले भाग की ओर दौड़े जहाँ पर उसके पिता सो रहे थे। अभि० सा० 6 सोपान ने वहाँ देखा कि अभियुक्त उसके पिता निनाजी के सर पर कुल्हाड़ी से मार रहा था। सोपान को देखते ही अभियुक्त वहाँ से कुल्हाड़ी हाथ में लेकर भाग गया। सोपान ने उसे दौड़ा कर पकड़ने का प्रयास किया परन्तु पकड़ नहीं पाया। चिकित्सक की राय में सर में पहुँचायी गयी चोटें प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में चोटहिल की मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त थीं। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि अभियुक्त द्वारा प्रयोग किये गये हथियार (कुल्हाड़ी) और मृतक के शरीर के महत्वपूर्ण अंग अर्थात् सर जिसे चोट पहुंचाने के लिये चुना गया, उससे यह स्पष्ट था। कि अभियुक्त का आशय मृतक की मृत्यु कारित करना था। अतएव अपराध की परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुये वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 भाग II के अन्तर्गत नहीं बल्कि धारा 300 के अधीन दोषी था। जलालसाब शेख बनाम स्टेट ऑफ गोवा49 के मामले में अभियुक्त उसकी पत्नी और एक बच्चा। अभियोजन गवाह नं० 2 गणेश कर्मा के एक कमरे में रह रहे थे। अभियुक्त अपीलाण्ट लगभग प्रतिदिन शराब

  1. 2007 क्रि० लॉ ज० 1819 (एस० सी०).
  2. 2000 क्रि० लॉ ज० 762 (एस० सी०).

पीता था अपनी पत्नी को मारता पीटता और ‘न्यूसेन्स पैदा करता था। मकान मालिक गणेश कर्मा ने दिन में शराब पीकर न्यसेन्स न करने की हिदायत दिया था। गणेश की शाम को लगभग 7.00 बजे अपील कमरे पर गया था और यह देखा कि वह उस समय नशे की हालत में था उसने अभियुक्त को किसी प्रकार उत्पात न करने की सलाह दिया और उसके बाद वहाँ से चला गया। अभियोजन गवाह नं० 8 सुनीता के साक्ष्य से यह सिद्ध है कि देर शाम को किसी समय अपीलांट और उसकी पत्नी से आपस में झगड़ा हुआ । इन दोनों साक्षियों के साक्ष्य से यह भी सिद्ध होता है कि दूसरे दिन सुबह लगभग 7.00 बजे अपीलांट का बच्चा कमरे के बाहर रोता हुआ पाया गया और जब वे लोग वहाँ यह पता लगाने गये कि क्या हुआ है तो देखा कि अपीलांट की पत्नी चारपाई पर मृत पड़ी है और उसके सर में एक गैंती मारा गया है। अभियुक्त घर छोड़कर भाग गया था और 10 दिन बाद पकड़ा गया। अभियुक्त की ओर से यह तर्क दिया गया कि वह उस कमरे में नहीं रहता था। यह तथ्य इस कारण असत्य साबित हो गया, क्योंकि यदि वह सचमुच उस जगह पर नहीं था तो अपनी पत्नी के मरने की खबर सुनने के बाद उसे तुरन्त भाग कर गांव आना चाहिये था। परन्तु इसके ठीक विपरीत पुलिस को अपीलांट की खोज करने जाना पड़ा और उसे 10 दिन के बाद ही गिरफ्तार किया जा सका। अपीलांट द्वारा दी गई यह झूठी सफाई घटनाओं की श्रृंखला की खोई हुई कड़ी को पूरा करती है। अतएव यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त की भा० द० सं० के अधीन हत्या के अपराध हेतु दोषसिद्धि उचित थी। हत्या में हेतु (motive) कब आवश्यक है-अबु ठाकिर और अन्य बनाम राज्य49 के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि हेतु का महत्व हत्या के अपराध में तब समाप्त हो जाता है जब प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध होता है। आत्माराम और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य49 के वाद में अभियुक्त ने विभिन्न शस्त्रों से लैस होकर मृतक पर हमला किया यहां तक कि जब वह गिर पड़ा, उसके शरीर के अंगों पर चोटें कारित की गयीं। मर्मस्थानों (vital) हमले की प्रकृति से उसे समाप्त कर देने का आशय स्पष्ट था। यह अभिधारित किया गया कि मात्र यह तथ्य कि कोई एक चोट प्रकृति के सामान्य क्रम में मृत्यु कारित करने के लिये यथेष्ट नहीं पाई। गयी। अपराध को हत्या से भा० द० संहिता की धारा 304 खण्ड II अथवा धारा 326 में परिवर्तित नहीं करती राम पाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य9 के वाद में यह अभिधारित किया गया कि सदोष मानव वध भा० द० सं० की धारा 300 के अन्तर्गंत हत्या हो सकता है और नहीं भी हो सकता है। जब कभी भी सदोष मानववध हत्या होता है तो दण्डात्मक (punitive) प्रतिफल भी, धारा 302 के अनुसार होगा जबकि अन्य मामलों में यानि जहां कोई अपराध सदोष मानव वध हत्या नहीं होता तो दण्ड भा० दं० संहिता की धारा 304 के अनुसार दिया जायेगा। दण्ड संहिता की धारा 300 में यह वर्णित है कि किस प्रकार के कार्य जब, मृत्यु कारित करने के आशय से किये जाते हैं अथवा ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से जिसे अपराध कर्ता जानता है कि कार्य मृत्यु कारित करने अथवा ऐसी शारीरिक क्षति जिसे वह जानता है कि वह प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में किसी की मृत्यु कारित करने के लिए काफी है अथवा चोट पहुंचाने वाला व्यक्ति जानता है कि यह आसन्न (imminently) संकट से इतना खतरनाक है कि सारी अधिसम्भाव्यता के अन्तर्गत उस कार्य से मृत्यु हो। जायेगी तो वह हत्या होता है। यह हत्या है जब ऐसा कार्य बिना ऐसे किसी कारण के मृत्यु कारित करने के कारण के बिना अथवा शारीरिक क्षति कारित करने के बिना किसी क्षमायोग्य कारण के किया जाता है तो यह हत्या होता है। सदोष मानव वध जो हत्या होते हैं समाज उनके कतिपय अपवाद भी विहित करता है। ऐसे अपवादों के लागू होने के लिए जो तत्व आवश्यक हैं उन्हें व्याख्या (explanation) बताता है और उन्हें सिद्ध करना आवश्यक है। ऐसे अपवाद हैं कि कार्य बिना किसी पुर्वचिन्तन के (premeditation) और भाववेश में (heat of passion) में किया जाय, जबकि अपराधी आत्म नियंत्रण की शक्ति से हीन रहता है बिना किसी गम्भीर 49क. (2010) 3 क्रि० ला ज० 2480 (एस० सी० ). 49ख. (2012) 3 क्रि० ला ज० 2882 (एस० सी०), 49ग. 2003 क्रि० ला ज० 3760. और तत्कालिक उत्तेजना (provocation) के उसकी मृत्यु कारित करता है जिसने उत्तेजना कारित किया है। अथवा किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु भूल से (by mistake) या दुर्घटनावश बशर्ते कि ऐसा भावावेश (provocation) अपराधी के स्वयं के कारण न रहा हो तो ऐसी दशा में मानव वध हत्या नहीं होगा। इस अपवाद की तीन परिसीमाएं (limitation) हैं। ये सभी तथ्य विषयक प्रश्न हैं और इन्हें किसी मामले की परिस्थितियों और तथ्यों के अनुसार तय किया जायेगा। धारा 300 इन दोनों ही परिस्थितियों का वर्णन करती है। धारा 300 यह भी बताती है कि कब हत्या होगी और कब हत्या नहीं। पहला धारा 300 में वर्णित चार श्रेणियों में दिया है जब कि दूसरा धारा 300 में दिये गये पांच अपवादों में दिया है। व्यवस्थापिका ने सारे मामले जो सदोष मानव वध हत्या होंगे उन्हें बताये हैं और उन्हें भी जो मानववध हत्या नहीं होंगे। संहिता की धारायें 302 और 304 मुख्य रूप से दण्ड सम्बन्धी प्रावधान हैं। यह धारायें बताती हैं कि अपराधी जो इन दोनों में से कोई अपराध करता है वह किस दण्ड का भागी होगा 99 खण्ड 2-ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से जिससे, अपराधी जानता हो कि मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है- इस खण्ड के अन्तर्गत आने वाले अपराधों में अभियुक्त की। मानसिकता दो प्रकार की होती है। प्रथमत: इसमें शारीरिक उपहति कारित करने का आशय होता है तथा द्वितीयत: अभियुक्त को यह ज्ञात रहता है कि आशयित उपहति का सम्भावित परिणाम मृत्यु होगी। यहाँ अपराधी यह जानता है कि आशयित शारीरिक उपहति से मृत्यु कारित किया जाना सम्भाव्य है। यह उन विशिष्ट मामलों में लागू होता है जिसमें क्षतिग्रस्त व्यक्ति का स्वास्थ्य या शरीर रचना ऐसी होती है कि उसकी मृत्यु किसी उपहति से कारित होनी सम्भाव्य होती है जिससे साधारणतया सामान्य हालत में मृत्यु नहीं हो सकती और जिनमें उपहति कारित करने वाला व्यक्ति यह जानता है कि ऐसी शरीर रचना या स्वास्थ्य के कारण क्षतिग्रस्त व्यक्ति की मृत्यु होनी सम्भाव्य है। इस खण्ड के अन्तर्गत कोई मामला तभी आता है जब अपराधी यह जानते हुये कि कोई व्यक्ति रोगग्रस्त है या अस्वस्थ है उसे उपहति कारित करता है जो प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिये तो पर्याप्त नहीं होती, यदि मृतक स्वस्थ व्यक्ति रहा होता और जिसका ज्ञान हत्यारे को था और इस ज्ञान के तहत ही उसने उपहति कारित किया। यहाँ पदावली ‘‘अपराधी को यह ज्ञात था” से तात्पर्य है मृत्यु कारित करने की निश्चितता न कि केवल सम्भावना।20। | उदाहरण- एक प्रकरण में ब ने एक नौ वर्षीय लडके द को आर्सेनिक खिला दिया। उसने ऐसा इस आशय से किया कि द का पिता उसके विरुद्ध साक्ष्य न दे सके। ब को हत्या के लिये दोषसिद्धि प्रदान की गयी 51 एक दूसरे प्रकरण में एक बीस वर्षीया महिला ने अपने घर के तीन सदस्यों को धतूरा खिला दिया। यह अभिनिर्धारण प्रदान किया गया कि भले ही उस महिला का आशय मृत्यु करना न रहा हो किन्तु उसके इस्तेमाल से मृत्यु कारित होनी सम्भाव्य थी 52 एक प्रकरण में एक महिला ने अपने पति के झगड़ालू स्वभाव से मुक्ति पाने के आशय से उसे धतूरा खिला दिया। वह सख्त रूप से बीमार हो गया किन्तु उसकी मृत्यु नहीं हुई । वह महिला यह नहीं जानती थी कि जो सामग्री उसने अपने पति को खिलाया था वह क्या थी, क्योंकि सामग्री उसके प्रेमी से उसे प्राप्त हुई थी। उसे धारा 337 के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान की गयी क्योंकि उसने अनजाने पाउडर का इस्तेमाल बिना कोई सावधानी बरते ही किया था किन्तु उसके प्रेमी को धारा 307 सपठित 309 के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान की गयी 53 एक प्रकरण में दो व्यक्तियों ने एक वृद्ध व्यक्ति का पीछा किया और उनमें से प्रत्येक ने उसके सिर पर इतनी शक्ति से प्रहार किया कि उसकी खोपड़ी टूट गयी। दोनों को हत्या के लिये दोषी ठहराया गया।4। कारु मारिक बनाम बिहार राज्य के वाद में अभियुक्त चुर्रा (एक तेज धार वाला हथियार) से मृतक के सीने पर प्रहार किया। मृतक के भागने का प्रयास करने पर अभियुक्त ने मृतक का बाल पकड़ कर उसे जमीन पर धकेल कर गिरा दिया और उसके पेट तथा पीठ पर दो बार और प्रहार किया। पहँचाई गई चोटें गम्भीर प्रकृति की थीं और वे जीवन के लिये खतरनाक थीं, जिसके कारण मृतक की मृत्यु हो गई। यहे। निर्णीत किया गया कि कारित चोटों से यह स्पष्ट है कि अभियुक्त का आशय कम से कम ऐसी शारीरिक क्षति 49घ, (2012) I11 क्रि० ला ज० 3765 (एस० सी० ).!

  1. गब्बर पाण्डे, (1927) 7 पटना 638.
  2. गौरी शंकर, (1918) 40 इला० 360.
  3. तुलसा, (1897) 20 इला० 143. |
  4. भगवा, (1916) 19 बाम्बे एल० आर० 54.
  5. राँझा, (1947) 49 पी० एल० आर० 305.
  6. 2001 क्रि० लॉ ज० 2615 (एस० सी०).

कारित करना था जिससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य था। अतएव अभियुक्त की हत्या के लिये दोषसिद्धि थी। बाबी सेदी कामेश्वर राव उर्फ बबई बनाम आ० प्र० राज्य-0 के बाद में अभियुक्त एक मोटर मि (मैकेनिक) था। अभियुक्त और मृतक के मध्य कुछ मौखिक कहासुनी हो गयी। उसके पश्चात् अभिय मतक के पेट में स्क्रू ड्राइवर से चोट पहुंचायी। चोट 12 सेमी० गहरी थी जिससे लीवर और तिल्ली (Spl… क्षतिग्रस्त हो गये। लगभग तत्काल मृत्यु हो गयी। यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त को मुत्य का करने के लिये यथेष्ट चोट कारित करने का आशय होना कहा जा सकता है। मैकेनिक के द्वारा एक सामान्य हथियार स्क्रू ड्राइवर का प्रयोग करना अनुपघातक/अहानिकर नहीं कहा जा सकता है। अभियुक्त का यह तर्क कि घटना एकाएक और बिना किसी पूर्व चिन्तन के हुयी तर्कसंगत नहीं है और अभियुक्त हत्या के अपराध हेतु दोषसिद्ध किये जाने के दायित्वाधीन है। यह भी संकेत किया गया कि केवल मात्र एक चोट पहुंचाने का तर्क स्वयमेव में अपराध की प्रकृति विनिश्चित करने हेतु यथेष्ट नहीं है वरन् यह अन्य मौजूद परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। मृत्युकारित करने का आशय न होना (No intention t; cause death)-राजस्थान राज्य बनाम हुकुम सिंह 6क के वाद में अभियुक्त स्वयं मृतक को अस्पताल ले गया था। यह तथ्य अपने आप में यह संकेत करता है कि उसका अपराध कारित करने का आशय नहीं था और वह भी बन्दूक से शाट (shot) लगाने का जो कि हर हालत में (inevitably) पीड़ित (victim) की मृत्यु कारित करेगा। अतएव उच्चतम न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि निचली अदालत का दोषमुक्त करने का निर्णय विकृत (perverse) नहीं और इसलिए उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। वेलु उर्फ वेलमुरूगन और अन्य बनाम राज्य द्वारा इन्सपेक्टर आफ पुलिस, के वाद में यह आरोपित था कि अभियुक्तगण ने छूरे चाकू और छड़ी से लैश होकर मृतक और सूचनादाता पर हमला किया। घटना का एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी घायल हो गया और उसने अभियुक्तों में से प्रत्येक के द्वारा किये गये कार्य का विस्तृत विवरण दिया था। गवाह को पहुंची क्षति/चोटों से घटना के समय उसकी उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता इस मामले में घटना शाम को घटी जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट छ: घंटे बाद रात्रि में दर्ज की गयी। मृतक और सूचना देने वालों को अनेकों चोटें लगी थीं । मानव प्राणियों का सामान्य व्यवहार (conduct) ऐसे यह होता है कि वे पहले अपने जीवन की रक्षा करें और घायलों को अस्पताल पहुंचायें। जब पुलिस के रूइन्सपेक्टर को घटना की जानकारी हुई तो वह अस्पताल गये और अस्पताल में ही सूचनादाता ने पुलिस को रिपोर्ट दिया। प्रथम सूचना रिपोर्ट देने में विलम्ब किसी भी प्रकार से अभियोजन के मामले को प्रभावित नहीं करता है। अतएव यह अभिधारित किया गया कि प्रत्यक्षदर्शी गवाह का साक्ष्य (testimony) विश्वसनीय है और मेडिकल साक्ष्य द्वारा परिपुष्ट (corroborated) है। साथ ही डॉक्टर जिसने मृतक का मृत्युकालिक कथन रिकार्ड किया था, का साक्ष्य भी अभियोजन (prosecution) पक्ष उसका समर्थन करता है। अतएवं अभियुक्तगणों की दोषसिद्धि (conviction) को उचित धारित किया गया।

Follow me at social plate Form