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Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 16 LLB Notes Study Material

Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 16 LLB Notes Study Material : The Indian Penal Code Law Commission of India, LLB 1st Year / Semester Wise Notes Study Material in Hindi English in PDF Download Previous Year Mock Test Solved Sample Model Papers.

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  1. शिशु या उन्मत्त व्यक्ति की आत्महत्या का दुष्प्रेरण-यदि कोई अठारह वर्ष से कम आय का व्यक्ति, कोई उन्मत्त व्यक्ति, कोई विपर्यस्त चित्त व्यक्ति, कोई जड़ व्यक्ति, या कोई व्यक्ति जो मनता की। अवस्था में है. आत्महत्या कर ले तो जो कोई ऐसी आत्महत्या के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, वह मृत्य, या आजीवन कारावास या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से अधिक की न हो। सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

टिप्पणी

अनिल कुमार गुप्ता बनाम उ० प्र० राज्य47 के वाद में मृतक का पति अपीलाण्ट अपने परिवार के सदस्यों के साथ दहेज हत्या और क्रूरता के लिये आरोपित था। मृतक की मृत्यु विषाक्तीकरण के कारण हुयी। थी। दहेज की मांग के सम्बन्ध में कोई साक्ष्य नहीं था। मृतक द्वारा अपीलाण्ट पति को लिखे गये पत्र उन ६ के मध्य स्नेहपूर्ण सम्बन्ध दर्शाते थे। वास्तव में मृतक स्वयं अपीलाण्ट द्वारा ही अस्पताल में भर्ती था। यह अभिनिधारित किया गया कि अपीलाण्ट की मात्र दस कारण से दोषसिद्धि कि दोनों रात्रि में पर इस प्रकल्पना के आधार पर कि अभियुक्त एक दवा की कम्पनी का कर्मचारी था इस कारण उसे विष के गया।

47क. (2011) 2 क्रि० लॉ ज० 2131 (एस० सी०).

विषय में विशेष ज्ञान था और उसने उसे विष दिया अनुचित था। साथ ही यह भी कि अपीलीय या द्वारा यह निष्कर्ष नहीं निकाला गया कि विचारण न्यायालय का निष्कर्ष दोषपूर्ण था। अतएव अ न्यायालय दोषमुक्ति के आदेश को उलटना अनुचित अभिनिर्धारित किया गया।

  1. आत्महत्या का दुष्प्रेरण- यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या करे, तो जो कोई ऐसी आत्महत्या का दष्प्रेरण करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

टिप्पणी

इस धारा के अन्तर्गत उन लोगों के लिये दण्ड का प्रावधान प्रस्तुत किया गया है जो आत्महत्या का दुष्प्रेरण करते हैं या जो आत्महत्या में किसी प्रकार की सहायता करते हैं। जो कोई आत्महत्या का दुष्प्रेरण करता है या सहायता करता है, धारा 300 के अपवाद 5 के अन्तर्गत आपराधिक मानव-वध का दोषी होगा। जो कोई हिन्द विधवा को सती हो जाने के लिये दुष्प्रेरित करेगा, वह इस धारा के अन्तर्गत अपराधी होगा +8

ब स्वेच्छया स को दुष्प्रेरित करता है कि वह आत्महत्या कर ले तथा स एक 18 वर्षीय युवक आत्महत्या कर लेता है। ब इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय होगा। जहां यह आरोप लगाया जाता है कि अभियुक्त ने आत्महत्या के लिये दुष्प्रेरित किया था परन्तु जहाँ इस आशय का कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं उपलब्ध हो रहा है, वहाँ अभियुक्त दोषमुक्ति का हकदार होगा।49

पंजाब राज्य बनाम इकबाल सिंह0 के मामले में मृतक मोहिन्दर कौर एक अध्यापिका थी तथा उसका पति इकबाल सिंह राज्य विद्युत परिषद् पंजाब में लिपिक था। दहेज को लेकर पति एवं पत्नी के सम्बन्ध इस सीमा तक तनावपूर्ण थे कि पत्नी ने अपनी जान की सुरक्षा हेतु पुलिस सहायता की भी माँग किया था। 31 दिसम्बर, 1977 को एक विवाह-विच्छेद विलेख की तैयारी की गयी थी परन्तु उसे कार्य रूप में परिणत नहीं किया गया। पत्नी ने अपने स्थानान्तरण का भी प्रयास किया जिसे उसके पति द्वारा विफल कर दिया गया। श्रीमती कौर के पिता की मृतक के पश्चात् दहेज की माँग और तेज कर दी गयी। 7 जून, 1983 को श्रीमती मोहिन्दर कौर ने स्वयं एवं अपने तीन बच्चों के साथ अपने पति के निवास पर आग लगा ली। उसने अपने तीनों बच्चों को आग इस कारण लगाया क्योंकि उसे आशंका थी कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके बच्चों का जीवन और संकटपूर्ण हो जायेगा। मृत्यु के समय वह एक पत्र छोड़ गयी थी जिसमें लिखा था कि उसका पति 35,000 से 40,000 हजार और दहेज की मांग कर रहा है तथा शराब के नशे में उसके साथ दुर्व्यवहार करता है। पत्र में यह भी लिखा था कि उसकी सास एवं ननद भी इस षड्यंत्र में शामिल हैं तथा उसके विरुद्ध वह असत्य आरोप लगाती हैं, एवं 6 जून, 1983 की रात्रि में मिट्टी का तेल अथवा पेट्रोल छिड़क कर उसे मार-डालने का षड्यंत्र रचा था, जो सफल नहीं हुआ। बच्चों के साथ भी दुर्व्यवहार किया जाता है और मारे-पीटे जाने से वह तंग आ गयी है, इस कारण अपना एवं अपने बच्चों का जीवन समाप्त करने का निर्णय लिया है। यह अभिनित किया गया कि पति ऐसी परिस्थितियों को पैदा करने के लिये जिम्मेदार था जिनके कारण उसकी पत्नी को विवश होकर आत्महत्या करने के लिये बाध्य होना पड़ा। अतएव वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अन्तर्गत दोषी है।

एम० मोहन बनाम राज्य0 के मामले में आत्महत्या में दुष्प्रेरण हेतु कार्यवाही अन्य अपीलार्थियों के साथ ही मृतक के बड़े साले और सास के विरुद्ध भी प्रारम्भ की गयी। यह आरोप था कि मृतक ने बड़े साले की पत्नी के द्वारा कार का प्रयोग करने से मना किये जाने के कारण आत्महत्या कर लिया। उसके तानों से वह क्षुब्ध (disturbed) हो गया। निश्चित रूप से मृतक जो सम्मिलित परिवार में घटित होती रहने वाली सामान्य बदमिजाजी, मनमुटाव या अनबन (discord) और मत भिन्नता के प्रति अधिक संवेदनशील (over sensitive) था। परन्तु अपीलार्थियों के विरुद्ध ऐसा कोई आरोप नहीं लगा पाया गया। यह अभिनिर्धारित किया गया कि अपीलाण्ट का अपराध से दूरदराज से भी सम्बन्ध नहीं था। अतएव अपीलाण्ट के विरुद्ध कार्यवाही निरस्त कर दी गयी।

  1. राम दयाल, (1913) 36 इला० 26; तेज सिंह, ए० आई० आर० 1958 राज० 169.
  2. चंचल कुमारी तथा अन्य बनाम यूनियन टेरीटरी, चंडीगढ़, 1986 क्रि० लॉ ज० 816 (सु० को०).
  3. 1991 क्रि० लाँ ज० 1897 (एस० सी०).

50क. (2011) 2 क्रि० लॉ ज० 1900 (एस० सी०).

यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि किसी दुष्प्रेरण को भी उकसाने अथवा किसी को करने में साशय सहायता करने की मानसिक प्रक्रिया होती है। अभियुक्त का जब तक कोई सकारात्मक कृत्य आत्महत्या को उकसाने या सहायता करने का नहीं हो उसकी दोषसिद्धि को उचित नहीं कहा जा सकता है। विधायिका का आशय स्पष्ट है कि भा० दे० संहिता की धारा 306 के अन्तर्गत किसी के अपराध करने हेतु आपराधिक मन:स्थिति का स्पष्ट रूप से होना आवश्यक है। इसमें सक्रिय कार्य या प्रत्यक्ष (direct) कार्य जिसके कारण मृतक ने आत्महत्या किया होना आवश्यक है और यह कि मृतक के सामने आत्महत्या करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं बचा रहा और यह कार्य मृतक को ऐसी स्थिति में डालने हेतु आशयित था कि जिससे उसने आत्महत्या कर लिया। ।

बसन्त तुलसी राम भोपर बनाम महाराष्ट्र राज्य51 के मामले में बम्बई उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी विवाहित स्त्री द्वारा आत्महत्या के दुष्प्रेरण के अपराध पर विचारण करते समय क्रूरता सम्बन्धी भूत घटनाओं पर विचार किया जा सकता है भले ही ये क्रूर घटनायें संशोधन अधिनियम के लागू होने की तिथि 25 दिसम्बर सन् 1983 से पहले ही क्यों न हों। इनको विचार में लेने का यह अर्थ नहीं होता है कि संशोधित विधि अर्थात् धारा 498क को भूतलक्षी तिथि से लागू किया जा रहा हैं। धारा 306 एवं 498क के अन्तर्गत अपराध पर विचारण के समय यदि भूत की घटनाओं, जो क्रूरता की साक्ष्य हैं, को ध्यान में नहीं रखा जाता तो विधि का सारा उद्देश्य ही व्यर्थ हो जाता है। परन्तु पत्नी द्वारा आत्महत्या के अपराध के दुष्प्रेरण के लिये पति तभी दोषी कहा जायेगा जब वह पत्नी के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने का दोषी हो।2 आत्महत्या के दुष्प्रेरण के अपराध का मूल तत्व साशय सहायता करना एवं सक्रिय सह अपराधिता (complicity) है 23

सोहनराज शर्मा बनाम हरियाणा राज्य4 के वाद में राजीव लोचन शर्मा द्वारा दायर की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट में यह कहा गया था कि ज्योति (जिसे वाद में मृतका कहेंगे) ने अपने आत्महत्या वाले पत्र में यह लिखा था कि उसके पति सोहनराज शर्मा अभियुक्त/अपीलाण्ट विकृत तरीके से लैंगिक सम्बन्ध के लिये विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित कर रहे थे इससे थककर उसने अपने बच्चों को विष दे दिया और खुद भी जहर खा लिया है। प्रथम सूचना रिपोर्ट में आगे यह भी लिखा था कि परिस्थितियों के कारण अपीलाण्ट सोहनराज शर्मा ने ज्योति को विष खाने को बाध्य कर दिया था। आत्महत्या नोट में अभियुक्त पति को भ्रष्ट कामुक कहा गया था। यह भी कहा गया था कि अभियुक्त नपुंसक था और उसे अपमानित करने का प्रयत्न कर रहा था। उसने यह भी लिखा था कि वह उसका जीवन अपने सब के साथ ही समाप्त करना चाहती थी। परन्तु ऐसा नहीं कर रही है क्योंकि यदि तुझमें तनिक सी शर्म होगी तो इन घटनाओं के बाद तुम स्वयं शर्म से मर जाओगे। तुमने आठ वर्ष में मुझे आठ दिन भी शांति से नहीं रहने दिया। इन बच्चों की मृत्यु के लिए तुम स्वयं जिम्मेदार हो। यह अभिनिर्धारित किया गया कि उसका क्रूर और अपमानजनक व्यवहार आत्महत्या के दुष्प्रेरक रूप में नहीं माना जा सकता है अत: भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के तत्व सिद्ध नहीं हुये अतएव अभियुक्त की दोषसिद्धि अनुचित थी।

यह भी सम्प्रेक्षित किया गया कि किसी व्यक्ति को उकसाने में अथवा किसी कार्य को करने में उसे साशय सहायता करने में एक मानसिक प्रक्रिया होती है। इसके पूर्व कि किसी व्यक्ति को आत्महत्या के उकसाने वाला कहा जाये इसमें उसकी अधिक सक्रिय भूमिका जिसे उकसाना या किसी काम को करने में सहायता करना आवश्यक होता है।

गन्गुला मोहन रेड्डी बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य4 के मामले में गंगुला मोहन नामक खेतिहर किसान पर यह आरोप था कि उसने अपने कृषक मजदूर मृतक रामुल को यह आरोप लगाते हुये प्रताडित किया कि उसने कुछ सोने के आभूषण मृत्यु के दो दिन पहले चुरा लिया। यह भी आरोप था कि अपीलांट ने मृतक स 7000 रुपये की मांग किया जो उसने उसे नियोजन में रखते समय अग्रिम दिया था। अभियोजन ने यह का भी लगाया कि मृतक रामुल प्रताडना को बर्दास्त नहीं कर सका। इस कारण उसने जीव मारक (pesticide) दवइयां खाकर आत्महत्या कर लिया। यह अभिनिर्धारित किया गया कि मृतक नि:सन्दह सामान्य