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Indian Penal Code 1860 Of Abetment Part 2 LLB 1st Year Notes

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  1. दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित कार्य उसके परिणामस्वरूप किया जाए, और जहाँ कि उसके दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं है– जो कोई किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है, यदि दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाता है, और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए इस संहिता द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है, तो वह उस दण्ड से दण्डित किया जाएगा, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है।
स्पष्टीकरण- कोई कार्य या अपराध दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया तब कहा जाता है, जब वह उस उकसाहट के परिणामस्वरूप या उस षड्यंत्र के अनुसरण में या उस सहायता से किया जाता है, जिससे दुष्प्रेरण गठित होता है। दृष्टान्त (क) ख को, जो एक लोकसेवक है, ख के पदीय कृत्यों के प्रयोग में क पर कुछ अनुग्रह दिखाने के लिए इनाम के रूप में क रिश्वत की प्रस्थापना करता है, ख वह रिश्वत प्रतिगृहीत कर लेता है। क ने धारा 161 में परिभाषित अपराध का दुष्प्रेरण किया है। (ख) ख को मिथ्या साक्ष्य देने के लिए क उकसाता है। ख उस उकसाहट के परिणामस्वरूप, वह अपराध करता है। क उस अपराध के दुष्प्रेरण का दोषी है, और उसी दण्ड से दण्डनीय है, जिससे ख है। (ग) य को विष देने का षड़यंत्र क और ख रचते हैं। क उस षड़यंत्र के अनुसरण में विष उपाप्त करता है। और उसे ख को इसलिए परिदत्त करता है कि वह उसे य को दे। ख उस षड़यंत्र के अनुसरण में वह विष क की अनुपस्थिति में य को देता है और उसके द्वारा य की मृत्यु कारित कर देता है। यहाँ ख हत्या का दोषी है। क षड़यंत्र द्वारा उस अपराध के दुष्प्रेरण का दोषी है और वह हत्या के लिए दण्ड से दण्डनीय है। टिप्पणी यह धारा दुष्प्रेरक के लिये उसी दण्ड का उपबन्ध करती है जो प्रमुख अपराधी के लिये उपबन्धित है। यदि (क) दुष्प्रेरण के अनुसरण में दुष्प्रेरित कार्य किया गया है; तथा (ख) ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिये इस संहिता द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है। यह धारा मात्र यह उपबन्धित करती है कि यदि किसी दुष्प्रेरण के लिये इस संहिता द्वारा कोई अलग उपबन्ध नहीं किया गया है तो वह उसी दण्ड से दण्डनीय होगा जो मौलिक अपराध के लिये उपबन्धित है।48 यह स्पष्टीकरण यह स्पष्ट करता है कि दुष्प्रेरण निम्नलिखित में से किसी एक प्रकार का हो सकता है–उकसाना, सहायता पहुँचाना तथा षड्यंत्र ।। इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान करने के लिये अलग आरोप का लगाया जाना आवश्यक नहीं है। पंजाब उच्च न्यायालय के मतानुसार इस विषय पर उपलब्ध पूर्व निर्णयों को पुनर्विलोकन करने पर यह सुस्पष्ट है कि अनावर्त्य नियम के रूप में यह प्रतिपादित नहीं किया जा सकता है कि किसी प्रकरण में अभियुक्त को दष्प्रेरण के लिये दण्डित नहीं किया जा सकता यदि अभियुक्त पर केवल मुख्य अपराध के लिये आरोप लगाया गया है और दुष्प्रेरण के लिये अलग आरोप नहीं लगाया गया है। यदि अभियुक्त को उन तथ्यों का ज्ञान था। जिनमें दष्प्रेरण का गठन हुआ था, तो भले ही उस पर केवल मुख्य अपराध का आरोप लगाया गया हो, और यदि दुष्प्रेरण के लिये अलग आरोप लगाने से अभियुक्त को कोई नुकसान नहीं हुआ था, उसे दुष्प्रेरण के लिये दोषसिद्धि प्रदान की जा सकती है यद्यपि मुख्य अपराध के लिये आरोप सफल न हुआ हो।
  1. शेष अय्यर बनाम वेंकट सुब्बा शेट्टी, ए० आई० आर० 1924 मद्रास 487.
मुन्नू स्वामी एवं अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य-9 वाले मामले में क सड़क के किनारे घ का इंतजार कर रहा था। स ने साइकिल से घ का पीछा किया। घ भी साइकिल पर था। अ, ब और स ने घ को रोका। खतरा महसूस करते हुये घ जान बचाने के लिये भागने लगा, किन्तु क और ख ने उसे पकड़ लिया। इसके बाद क और ख ने घ के हाथ पकड़ लिये। क द्वारा घ को चाकू मारने के लिये उकसाए जाने पर तीसरे अभियक्त ग ने। चाकू से घ के संवेदनशील अंगों पर चाकू से प्रहार किये। संवेदनशील अंगों जैसे सीना और पैरिएटल भाग में चाकू मारा, जिससे घ की मृत्यु हो गई। तथ्यों और परिस्थितियों से यह स्पष्ट है कि तीनों अभियुक्तों ने घ की हत्या करने का षड़यंत्र किया होगा और उसके अनुसरण में क मौके पर इंतजार करता रहा, जबकि ख और ग ने साइकिल पर मृतक का पीछा किया। उन सभी ने घ को खदेड़ा और जब वह क और ख की पकड़ में आ गया, तब क के आदेश पर ग ने क्षतियाँ कारित की। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में यह नहीं कहा जा सकता कि ग का कृत्य व्यक्तिगत कृत्य है। यह अभिनिर्धारित किया गया कि यह षड़यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण का मामला है, जिसमें योजना को कार्यरूप देते समय तीन षडयंत्रकारी उपस्थित थे, और सक्रिय रूप से भाग लिया। इसलिये ग धारा 302 के अधीन हत्या के लिये दोषी है तथा क और ख भा० द० सं० की धारा 109 के साथ पारित धारा 302 के अधीन अपराध के दोषी थे। आनन्दमोहन बनाम बिहार राज्य0 के वाद में मृतक की मृत्यु चार अभियुक्तों द्वारा प्रबोधन दिये जाने के कारण हुई थी। गवाहों में से बहुमत ने भीड़ में से एक के द्वारा प्रबोधन दिये जाने की बात कहा परन्तु अन्य तीन के बारे में वे चुप थे। अतएव केवल एक अभियुक्त की भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309/109 के अधीन दोषसिद्धि उचित कही गयी। आगे यह भी स्पष्ट किया गया कि गवाहों में से बहुमत के साक्ष्य पर। आधारित दोषसिद्धि को मात्र इस कारण कि मृतक का ड्राइवर और अंगरक्षक दोनों प्रबोधन दिये जाने । (exhortation) और मृत्यु कारित करने के बारे में चुप थे, गलत नहीं कहा जा सकता है।
  1. दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न आशय से कार्य करता है- जो कोई किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति ने दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से भिन्न आशय या ज्ञान से वह कार्य किया हो, तो वह उसी दण्ड से दण्डित किया जाएगा, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, जो किया जाता यदि वह कार्य दुष्प्रेरक के ही आशय या ज्ञान से, न कि किसी अन्य आशय या ज्ञान से, किया जाता।
टिप्पणी यह धारा यह उपबन्धित करती है कि यद्यपि दुष्प्ररित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से भिन्न आशय या ज्ञान से अपराध कारित करता है फिर भी दुष्प्रेरक दुष्प्रेरित अपराध के लिये उपबन्धित दण्ड द्वारा दण्डनीय होगा। इस धारा को धारा 108 स्पष्टीकरण 3 के साथ पढ़ा जाना चाहिये। यदि दोनों को एक साथ पढ़ा जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि दुष्प्रेरित व्यक्ति का दायित्व इस धारा द्वारा प्रभावित नहीं होता है तथा एक व्यक्ति दुष्प्रेरण का दोषी हो सकता है भले ही दुष्प्रेरित व्यक्ति अपराध कारित करने हेतु विधित: सक्षम भी न हो या उसका भी वही अपराधिक आशय या ज्ञान न रहा हो जो दुष्प्रेरक का था।51 |
  1. दुष्प्रेरक का दायित्व जब एक कार्य का दुष्प्रेरण किया गया है और उससे भिन्न कार्य किया गया है जबकि किसी एक कार्य का दुष्प्रेरण किया जाता है, और कोई भिन्न कार्य किया जाता है, तब दुष्प्रेरक उस किए गए कार्य के लिए उसी प्रकार से और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है, मानो उसने सीधे उसी कार्य का दुष्प्रेरण किया हो;
परन्तुक- परन्तु यह तब जबकि किया गया कार्य दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम था और उस उकसाहट के असर के अधीन या उस सहायता से या उस षडयंत्र के अनुसरण में किया गया था जिससे वहे। दुष्प्रेरण गठित होता है।
  1. 2002 क्रि० लॉ ज० 3915 सु० को०.
  2. (2013) III क्रि० लॉ ज० 2644 (एस० सी०).
  3. प्रमथनाथ हरबाव, (1953) 1 कल० 81.
दृष्टान्त (क) एक शिशु को य के भोजन में विष डालने के लिए क उकसाता है, और उस प्रयोजन से उसे विष परिदत्त करता है। वह शिशु उस उकसाहट के परिणामस्वरूप भूल से म के भोजन में, जो य के भोजन के पास रखा हुआ है, विष डाल देता है। यहाँ, यदि वह शिशु क के उकसाने के असर के अधीन उस कार्य को कर रहा था, और किया गया कार्य उन परिस्थितियों में उस दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम है, तो क उसी प्रकार और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है, मानो उसने उस शिशु को म के भोजन में विष डालने के। लिए उकसाया हो। (ख) ख को य का गृह जलाने के लिए क उकसाता है। ख उस गृह को आग लगा देता है और उसी समय वहाँ सम्पत्ति की चोरी करता है। क यद्यपि गृह को जलाने के दुष्प्रेरण का दोषी है, किन्तु चोरी के दुष्प्रेरण का दोषी नहीं है, क्योंकि वह चोरी एक अलग कार्य थी और उस गृह के जलाने का अधिसम्भाव्य परिणाम नहीं थी। (ग) ख और ग को बसे हुए गृह में अर्धरात्रि में लूट के प्रयोजन से भेदन करने के लिए क उकसाता है, और उनको उस प्रयोजन के लिए आयुध देता है। ख और ग वह गृह भेदन करते हैं, और य द्वारा, जो निवासियों में से एक है, प्रतिरोध किए जाने पर, य की हत्या कर देते हैं। यहाँ, यदि वह हत्या उस दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम थी, तो क हत्या के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है। टिप्पणी यह धारा इस सूत्र पर आधारित है कि यह एक प्रकल्पना है कि व्यक्ति के कार्यों का स्वाभाविक प्रतिफल ही उसका आशय है” (every man is presumed to intend the natural consequences of his act)। अत: यह धारा तभी प्रवर्तित होती है जबकि किया गया कार्य दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम हो।52 यदि दुष्प्रेरित कार्य से भिन्न कोई कार्य किया जाता है तो दुष्प्रेरक उसी अपराध के दुष्प्रेरण के लिये उत्तरदायी होगा यदि (क) किया गया कार्य दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम था, तथा (क) कार्य उस उकसाहट के असर के अधीन या उस सहायता या उस षड्यंत्र के अनुसरण में किया गया था जिससे वह दुष्प्रेरण गठित होता है। । मथुरा दास3 के वाद में स्ट्रेट जज ने यह प्रेक्षित किया कि यदि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को । एक विशिष्ट अपराध कारित करने के लिये उकसाता है और वह दूसरा व्यक्ति ऐसे उकसाहट के अनुसरण में केवल उसी अपराध को नहीं करता है, अपितु ऐसा करने के दौरान, उसके अग्रसरण में एक दूसरा अपराध कारित करता है, तो पहला व्यक्ति बाद वाले अपराध के लिये दुष्प्रेरक के रूप में उत्तरदायी होगा यदि कार्य । ऐसा है जिसे एक युक्तियुक्त व्यक्ति की तरह उकसाने के समय ही उसे जान लेना चाहिये था कि मौलिक अपराध को कारित करते समय ही उसका कारित किया जाना सम्भाव्य है।” । उपरोक्त प्रेक्षण से जो बात स्पष्ट होती है वह यह है कि जब दुष्प्रेरित कार्य से भिन्न कोई कार्य किया जाना है तो वह निश्चयत: दुष्प्रेरित कार्य के किये जाने के दौरान किया जाता है और वह ऐसा होता है जिससे यह कहा जा सकता है कि दुष्प्रेरक ने इस तथ्य की प्रकल्पना कर ली थी कि उसके उकसाने का सम्भाव्य परिणाम क्या होगा, फिर भी यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरक उसे सम्भाव्य परिमाण के रूप में जानता ही हो।54 अधिसम्भाव्य परिणाम (Probable Consequence)—गिरजा प्रसाद5 के बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह प्रेक्षित किया कि किसी कार्य का अधिसम्भाव्य परिणाम वह है जो उस कार्य के परिणामस्वरूप घटित होने के लिये सम्भाव्य है या युक्तियुक्त रूप में जिसके घटित होने की अपेक्षा की जा सकती है, किसी असाधारण अथवा अनपेक्षित परिणाम को अधिसम्भाव्य नहीं कहा जा सकता। यदि किया
  1. मुमताज अली, ए० आई० आर० 1925 अवध 473.
  2. (1884) 6 इला० 491 पृ० 494. एम० एण्ड एम० १.
  3. (1934) 57 इला० 717.
गया। कार्य जारी गरी कार्य से 1 है, तो दुष्प्रेरक उस भिन्न कार्य के लिये तभी उत्तरदायी होगा यदि वह उसाने ।। ।भा परिणाम है या यदि वह एक ऐसा कार्य है जिसकी दुष्प्रेरक युक्तियुक्त रूप में प्रकल्पना कर सकता था कि वह उसके उकसाने का परिणाम है। इस धारा में वर्णित तीन दुष्टान्त इस धारा को अच्छी प्रकार स्पष्ट करते हैं। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि धारा ।।। केवल तभी पति नहीं होती जबकि दुष्प्रेरित अपराध से भिन्न कोई अन्य अपराध कारित किया जाता है अपित तब भी पवर्तित होती है जब षडयंत्र के अनुसरण में एक भिन्न व्यक्ति पर हमला होता है 56 रा। परीक्षण यह है कि क्या उकसाहट अथवा षड़यंत्र के सन्निहित प्रयोजन को ध्यान में रखते हुये यह कहा जा सकता है, कि प्रमुख कर्ता द्वारा किया गया कार्य साधारण अनुभव तथा सामान्य ज्ञान के अनुसार ऐसा है |जसे दुष्प्रेरक ने निश्चयत: सम्भाव्य समझा था।7। जहाँ अ, ब को स का सामान सड़क पर चुराने के लिये प्रेरित करता है किन्तु ब, स के घर में घुस जाता है, अ दुष्पेरण के लिये दोषी होगा यदि गृहभेदन अ के उत्प्रेरण का ही परिणाम था। इस मामले में यह अ के उत्प्रेरण का ही अधिसम्भाव्य परिणाम प्रतीत होता है अत: वह दण्डनीय होगा। जहाँ ब, अ को स की हत्या करने के लिये प्रेरित करता है किन्तु अ एक अन्य व्यक्ति द को समझ कर उसकी हत्या कर देता है और यह पता चलता है कि द तथा अभिन्न थे तथा ब का द के प्रति विद्वेष नहीं था और दोनों ही इस बात के लिये | दुखी थे कि द की मृत्यु हो गयी है, वहाँ ब दुष्प्रेरण के लिये तथा अ हत्या के लिये दण्डनीय होगा, क्योंकि किया गया कार्य दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम था। ‘क’, ‘ख’ को ‘स’ के मकान में चोरी करने को उत्प्रेरित करता है। ‘ख’, ‘स’ के मकान में चोरी करता है, तत्पश्चात् उसमें आग लगा देता है। इस मामले में क का दायित्व केवल चोरी के दुष्प्रेरण हेतु होगा, परन्तु । मकान में आग लगाने के दुष्पेरण का वह दोषी नहीं होगा, क्योंकि चोरी के अपराध के लिये उकसाने का स। परिणाम मकान में आग लगाना नहीं कहा जा सकता है। ख चोरी एवं मकान में आग लगाने दोनों के लिये दोषी होगा। ख भारतीय दण्ड संहिता की धारा 436 के अधीन अग्नि द्वारा रिष्टि कारित करने का दोषी होगा।
  1. दुष्प्रेरक कब दुष्प्रेरित कार्य के लिए और किए गए कार्य के लिए आकलित दण्ड से दण्डनीय है- यदि वह कार्य, जिसके लिए दुष्प्रेरक अन्तिम पूर्वगामी धारा के अनुसार दायित्व के अधीन है, दुष्प्रेरित कार्य के अतिरिक्त किया जाता है और वह कोई सुभिन्न अपराध गठित करता है तो दुष्प्रेरक उन अपराधों में से हर एक के लिए दण्डनीय है।
दृष्टान्त ख को एक लोक सेवक द्वारा किए गए करस्थम् का बलपूर्वक प्रतिरोध करने के लिए क उकसाता है। ख परिणामस्वरूप उस करस्थम् का प्रतिरोध करता है। प्रतिरोध करने में ख करस्थम् का निष्पादन करने वाले आफिसर को स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है। ख ने करस्थम् का प्रतिरोध करने और स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने के दो अपराध किए हैं। इसलिए ख दोनों अपराधों के लिए दण्डनीय है, और यदि क यह सम्भाव्य जानता था कि उस करस्थम् का प्रतिरोध करने में ख स्वेच्छया घोर उपहति कारित करेगा, तो क। भी उनमें से हर एक अपराध के लिए दण्डनीय होगा। टिप्पणी यह धारा पिछली धारा में व्यक्त सिद्धान्त को और विस्तृत करती है। यह दुष्प्रेरक के दायित्व का विस्तृत करती है जो दुष्प्रेरित अपराध तथा कारित अपराध दोनों के लिये दण्डनीय होगा बशर्ते दोनों अपराध सुभिन्न हों।
  1. देखिये दन्त ( क),
  2. मधुरा दास (1884) 6 इला० 491 में डग्लस स्टेट जज का मत.
  3. दुष्प्रेरित कार्य से कारित उस प्रभाव के लिए दुष्प्रेरक का दायित्व जो दुष्प्रेरक द्वारा आशयित से भिन्न हो-जबकि कार्य का दुष्प्रेरण दुष्प्रेरक द्वारा किसी विशिष्ट प्रभाव को कारित करने के आशय से किया जाता है और दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप जिस कार्य के लिए दुष्प्रेरक दायित्व के अधीन है, वह कार्य दुष्प्रेरक के द्वारा आशयित प्रभाव से भिन्न प्रभाव कारित करता है तब दुष्प्रेरक कारित प्रभाव के लिए उसी प्रकार और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है मानो उसने उस कार्य का दुष्प्रेरण उसी प्रभाव को कारित करने के आशय से किया हो, परन्तु यह तब जबकि वह यह जानता था कि दुष्प्रेरित कार्य से यह। प्रभाव कारित होना सम्भाव्य है।
दृष्टान्त य को घोर उपहति करने के लिए ख को क उकसाता है। ख उस उकसाहट के परिणामस्वरूप य को घोर उपहति कारित करता है। परिणामत: य की मृत्यु हो जाती है। यहाँ, यदि क यह जानता था कि दुष्प्रेरित घोर उपहति से मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है, तो क हत्या के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है। टिप्पणी यह धारा, धारा 111 की अनुपूरक है। यह धारा उन मामलों से सम्बन्धित है जिसमें किया गया कार्य वही होता है जिसको करने के लिये दुष्प्रेरण किया गया था। परन्तु कार्य का परिणाम अपेक्षित परिणाम से भिन्न होता है। इस धारा के अन्तर्गत दुष्प्रेरक का दायित्व परिणाम की सम्भावना के उसके ज्ञान (his knowledge of the likelihood of the effect) पर निर्भर करता है। धारा 111 के अन्तर्गत आपराधिक दायित्व परिणाम की अधिसम्भाव्यता के ज्ञान पर निर्भर करता है जबकि इस धारा के अन्तर्गत सम्भाव्यता पर नहीं बल्कि सम्भावना के ज्ञान पर निर्भर करता है। ज्ञान चेतना विषयक (subjective) है जबकि अधिसम्भाव्यता पदार्थ विषयक (Objective) है। कोई कार्य सम्भाव्य हो सकता है भले ही दुष्प्रेरक उसकी सम्भावना के विषय में न जानता हो। इसी प्रकार दुष्प्रेरक कार्य की सम्भावना के विषय में जानता हो फिर भी उसका परिणाम सम्भाव्य नहीं हो सकता। । धारा 111 के अन्तर्गत आने वाला मामला भी इस धारा के अन्तर्गत आ सकता है क्योंकि कार्य दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम भी हो सकता है तथा ऐसा प्रभाव भी उत्पन्न कर सकता है जिसका ज्ञान दुष्प्रेरक को हो। उदाहरण के लिये, ब को अ आदेश देता है कि वह भरी बन्दूक लेकर रास्ते में रहे तथा स को लूट ले । स के पास तलवार थी। ब को अ सावधान करता है कि वह अपनी सुरक्षा के अतिरिक्त किसी भी हालत में स की हत्या न करे। स पर ब हमला करता है इस पर स अपनी तलवार खींच लेता है और ब उस पर गोली चलाकर उसे मार डालता है, साथ ही उसे लूट भी लेता है। यहाँ अ धाराओं 111 तथा 113 दोनों के ही अन्तर्गत दण्डनीय है क्योंकि वह जानता था कि स की हत्या सम्भाव्य है।
  1. अपराध किए जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति- जब कभी कोई व्यक्ति, जो अनुपस्थित होने पर दष्प्रेरक के नाते दण्डनीय होता, उस समय उपस्थित हो जब वह कार्य या अपराध किया जाए जिसके लिए वह दष्प्रेरण के परिणामस्वरूप दण्डनीय होता, तब यह समझा जायेगा कि उसने ऐसा कार्य या अपराध किया है।
टिप्पणी इस धारा के प्रवर्तन के लिये निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक है (क) किये गये कार्य की प्रकृति निश्चयत: अपराध गठित करे; (ख) दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप एक कार्य या अपराध कारित किया गया हो; (ग) कार्य या अपराध करते समय दुष्प्रेरक घटनास्थल पर उपस्थित हो, भले ही कोई अन्य व्यक्ति वास्तविक अपराध कारित करता हो। वारेन्द्र कमार घोष बनाम इम्परर58 के बाद में यह प्रेक्षित किया गया है कि यह धारा केवल तभी प्रयोग में आती है जब सर्वप्रथम दुष्प्रेरण के तुल्य परिस्थितियों को सिद्ध कर दिया जाता है और तब इसके अतिरिक्त अपराध कारित होते समय अभियुक्त की उपस्थिति सिद्ध हो जाती है। धारा 114 उन मामलों से सम्बन्धित है जहाँ दुष्प्रेरण का अपराध तो हुआ ही हैं साथ ही साथ दुष्प्रेरित अपराध यथार्थतः कारित हुआ है। तथा घटनास्थल पर दष्प्रेरक विद्यमान भी था। अपराध अब भी दुष्प्रेरण होने के बावजूद विस्तारित करने वाली परिस्थितियों के कारण यह दष्प्रेरित अपराध ही बन जाता है। यह धारा स्पष्टत: दण्डात्मक प्रकृति की नहीं है। क्योंकि वस्तुत: भागीदारी कभी-कभी अस्पष्ट होती है। इसे इस अवधारणा द्वारा सिद्ध किया जाता है कि वास्तविक उपस्थिति एवं पूर्व दुष्प्रेरण का अर्थ भागीदारी (Participation) के अतिरिक्त कुछ नहीं हो सकता (Juris et de jire) । धारा 114 द्वारा सृजित अवधारणा मामले को धारा 34 के दायरे के अन्तर्गत लाती है।”अत: दुष्प्रेरण का अपराध मात्र दुष्प्रेरक की उपस्थिति के अतिरिक्त पूर्ण भी होना चाहिये तथा दुष्प्रेरित अपराध कारित होना चाहिये। उदाहरण के लिये ‘अ’ ‘ब’ को प्रेरित करता है कि वह स को मार डाले, अ दुष्प्रेरण के लिये दण्डनीय है। यदि दुष्प्रेरित अपराध कारित हो जाता है और अ अनुपस्थित रहता है तो वह धारा 109 के अन्तर्गत दण्डनीय होगा, और यदि वह अपराध कारित होते समय उस स्थल पर मौजूद रहता है। तो यह माना जायेगा कि उसने स्वयं अपराध किया है और प्रमुख कर्ता की तरह दण्डनीय होगा। दुष्प्रेरण वास्तविक अपराध कारित होने के पूर्व ही पूर्ण हो जाना चाहिये ।60 इस धारा के प्रवर्तन के लिये यह आवश्यक है कि एक व्यक्ति किसी अपराध का दुष्प्रेरण एक स्थान पर करे तत्पश्चात् अपराध कारित होते समय उस स्थान पर मौजूद रहे।61 अत: सर्वप्रथम दुष्प्रेरण गठित करने वाली परिस्थितियाँ सिद्ध होनी चाहिये ताकि यदि वह अनुपस्थित था तो वह दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय हुआ होता और तब यह दर्शाया जाना चाहिये कि वह अपराध होते समय वहाँ उपस्थित था।62 यह धारा वहाँ नहीं लागू होती, जहाँ दुष्प्रेरण अपराध होते समय किया जाता है तथा दुष्प्रेरक अपराध कारित करने में मदद करता हो। अ, य की हत्या कारित करने के आशय से ब को र के खाने में विष मिलाने के लिये उकसाता है। ब जो एक 6 वर्ष का शिशु है अ द्वारा दिये गये विष को य के खाने में मिला देता है जिसके परिणामस्वरूप य की मृत्यु हो जाती है। जब ब ने खाने में विष मिलाया उस समय अ भी उपस्थित था। इस मामले में ब जो 6 वर्ष का शिशु है किसी अपराध का दोषी नहीं होगा परन्तु अ जिसने अपराध को दुष्प्रेरित किया है और जब ब ने अ द्वारा दिये गये विष को य के खाने में मिलाया उस समय उपस्थित भी था यद्यपि अ का आशय इस विष को र के खाने में मिलाने का था, ऐसी दशा में अ, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 114 के अधीन य की हत्या के दुष्प्रेरण का दोषी होगा। ब जो शिशु था उसने भूलवश उस विष को य के भोजन में अ की उपस्थिति में मिलाया था। अतएव अ हत्या के दुष्प्रेरण हेतु दायित्वाधीन है। उपस्थितिका अर्थ (Meaning of “Presence’)–उपस्थिति उस समय अपेक्षित है जबकि दुष्प्रेरित कार्य किया जाता है। उपस्थिति के लिये यह आवश्यक नहीं है कि उस संव्यवहार को आंखों से देखा जाये अथवा कानों से सुना जाये। सम्पूर्ण कार्यवाही के दौरान उनका उपस्थित रहना भी आवश्यक नहीं है। विधि के दृष्टिकोण से एक व्यक्ति उपस्थित है यदि सहायता देने के आशय से वह ऐसी जगह विद्यमान है। ताकि यदि अवसर आये तो वह सहायता पहुँचा सके।63 उपस्थिति शब्द का अर्थ है, सहायता प्रदान करने हेतु पर्याप्त नजदीक होना 04 उदाहरण के लिये, एक षड्यंत्रकारी जो बाहर खड़ा होकर चौकसी रखता है।
  1. (1924) 52 आई० ए० 40.
  2. कृष्णसामी नायड़, (1927) 51 मद्रास 263.
  3. रामरंजन राय (1914) 42 कल० 422; कोचू चेरुका, (1964) 1 क्रि० लॉ ज० 375,
  4. नन्हू केदार, ए० आई० आर० 1962 म० प्र० 91.
  5. छोटे (1948) इला० 114.
  6. स्टेवर्ट, आर० एण्ड आर० 363; केली आर० एण्ड आर० 421.
  7. बिंग्ले, आर० एण्ड आर० 446.
जबकि उसके अन्य साथी सामान्य प्रयोजन के अनुसरण में घर को लूटते हैं, दायित्व से बच नहीं सकता क्योंकि उसे घटनास्थल पर उपस्थित माना जायेगा (65 धारा 114 तथा धारा 34 में अन्तर- धारा 34 के अन्तर्गत यदि एक आपराधिक कृत्य कई व्यक्तियों द्वारा उन सब के सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है तो उनमें से प्रत्येक व्यक्ति उस कार्य के लिये उसी प्रकार उत्तरदायी है मानों वह कार्य अकेले उसी ने किया हो। धारा 114 उन मामलों से सम्बन्धित है जिनमें एक व्यक्ति अपराध होने के पूर्व उकसाने द्वारा या सहायता द्वारा अथवा षड्यंत्र द्वारा अपने को दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय बना लेता है, कार्य होते समय घटनास्थल पर अपनी मात्र उपस्थिति द्वारा, भले ही उसने कार्य सम्पादन में सक्रिय रूप से भाग न लिया हो। दोनों ही धारायें उन मामलों की प्रकल्पना करती हैं जिनमें अपराध सिद्ध हो चुका है। धारा 114 का प्रभाव दुष्प्रेरण के लिये दण्ड को जैसा कि धारा 109, 115 तथा 116 में वर्णित है, उन व्यक्तियों तक सीमित रखना प्रतीत होता है जो किसी अपराध को दुष्प्रेरित करते हैं और उस समय अनुपस्थित रहते हैं जबकि दुष्प्रेरित कार्य सम्पादित होता है तथा जो उपस्थित रहते हैं उन्हें प्रमुख अपराधी माना जाता है। धारा 114 के अन्तर्गत आने वाले मामलों का धारा 107 के भी अन्तर्गत आना आवश्यक है और इसके अतिरिक्त अपराध होते समय दुष्प्रेरक घटना स्थल पर उपस्थित भी हो। धारा 34 के अन्तर्गत आने वाले मामले दुष्प्रेरण के मामलों से भिन्न हैं तथा दण्ड संहिता में वर्णित सभी अपराधों को लागू होंगे अन्यथा यह धारा महत्वपूर्ण भूमिका नहीं अदा कर पायेगी। एक संदर्भ में धारा 114 को धारा 34 से विस्तृत कहा जा सकता है। उदाहरण के लिये, किसी निर्दोष अभिकर्ता के माध्यम से कार्य करने वाला एक व्यक्ति धारा 34 के अन्तर्गत दण्डनीय नहीं है जबकि यह धारा 114 के अन्तर्गत दण्डनीय होगा। धारा 114 एक सांविधिक कल्पना प्रतिपादित करती है जिसके कारण यह माना जाता है कि दुष्प्रेरक ने स्वयं वह अपराध किया है क्योंकि वह अपराध होते समय अपराध स्थल पर विद्यमान था। धारा 34 के अन्तर्गत किसी दुष्प्रेरण का होना आवश्यक नहीं है। इसी प्रकार किसी मामले को धारा 114 के अन्तर्गत लाने के लिये सामान्य आशय को होना आवश्यक नहीं है।
  1. मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण-यदि अपराध नहीं किया जाता- जो कोई मृत्यु (या आजीवन कारावास) से दण्डनीय अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, यदि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप न किया जाए, और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता में नहीं किया गया है, तो वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
यदि अपहानि करने वाला कार्य परिणामस्वरूप किया जाता है और यदि ऐसा कोई कार्य कर दिया जाए जिसके लिए दुष्प्रेरक उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप दायित्व के अधीन हो और जिससे किसी व्यक्ति को उपहति कारित हो, तो दुष्प्रेरक दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। दृष्टान्त ख को य की हत्या करने के लिए क उकसाता है। वह अपराध नहीं किया जाता है। यदि य की हत्या ख कर देता, तो वह मृत्यु या आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डनीय होता। इसलिए, क कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय है और जुर्माने से भी दण्डनीय है, और यदि दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप य को कोई उपहति हो जाती है, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
  1. खण्डू (1899) 1 बाम्बे लॉ रि० 351.
यह धारा दुष्प्रेरण के उन मामलों से सम्बन्धित है जिनमें या तो अपराध बिल्कुल कारित ही नहीं होते दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप नहीं कारित होते अथवा केवल अंशतः कारित होते हैं। यह धारा उन मामलों में लागू होती है जो मृत्यु दण्ड अथवा आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डनीय है परन्तु जिनके दुष्प्रेरण को दण्डित करने के लिये संहिता द्वारा कोई स्पष्ट उपबन्ध नहीं बनाया गया है। शब्द “स्पष्ट उपबन्ध” उन धाराओं को इंगित करता हुआ प्रतीत होता है जिनमें मृत्यु दण्ड अथवा आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डनीय अपराधों के दुष्प्रेरण को वर्णित किया गया है।66 धारा 121 तथा 131 मृत्यु दण्ड अथवा आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डनीय अपराध के दुष्प्रेरण के लिये स्पष्ट उपबन्ध बनाती हैं। धारा 115 के पैराग्राफ 1 के प्रवर्तन के लिये दो शर्ते आवश्यक हैं (1) दुष्प्रेरित अपराध कारित न किया गया हो, तथा (2) ऐसे दुष्प्रेरण को दण्डित करने के लिये संहिता में कोई स्पष्ट उपबन्ध नहीं किया गया हो।
  1. कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण-यदि अपराध न किया जाए- जो कोई कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण करेगा, यदि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप न किया जाए और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता में नहीं किया गया है, तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भांति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि के एक चौथाई भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है, जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना हो-और यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक हो, जिसका कर्तव्य ऐसे अपराध के किए जाने को निवारित करना हो, तो वह दुष्प्रेरक उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भाँति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि के आधे भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से, जो अपराध के लिए उपबन्धित है, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा। दृष्टान्त (क) ख को, जो एक लोक सेवक है, ख के पदीय कृत्यों के प्रयोग में क अपने प्रति कुछ अनुग्रह दिखाने के लिए इनाम के रूप में रिश्वत की प्रस्थापना करता है। ख उस रिश्वत को प्रतिगृहीत करने से इन्कार कर देता है। क इस धारा के अधीन दण्डनीय है। (ख) मिथ्या साक्ष्य देने के लिए ख को क उकसाता है। यहाँ, यदि ख मिथ्या साक्ष्य न दे, तो भी क ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है, और वह तदनुसार दण्डनीय है। (ग) क, एक पुलिस आफिसर, जिसका कर्तव्य लूट को निवारित करना है, लूट किए जाने का दुष्प्रेरण करता है। यहाँ, यद्यपि वह लूट नहीं की जाती, क उस अपराध के लिए उपबंधित कारावास की दीर्घतम अवधि के आधे से, और जुर्माने से भी दण्डनीय है। (घ) क द्वारा जो एक पुलिस आफिसर है, और जिसका कर्तव्य लूट को निवारित करना है, उस अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण ख करता है। यहाँ यद्यपि वह लुट न की जाए, ख लट के अपराध के लिए। उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि के आधे से, और जुर्माने से भी, दण्डनीय है। टिप्पणी इस अध्याय की अनेक धारायें दुष्प्रेरण सम्बन्धी विभिन्न परिस्थितियों से सम्बन्धित हैं। ये निम्नलिखित है- 66, इम्परर बनाम द्वारिका नाथ गोस्वामी, (1932) आई० एल० आर० 60 कल० 427. (1) वे मामले जिनमें अपराध कारित नहीं होता। ऐसे मामलों में अपराधी धारा 115 तथा 116 के अधीन मात्र दुष्प्रेरण के लिये दण्डनीय है। (2) जहाँ दुष्प्रेरित कार्य सम्पादित हो जाता है वहाँ धारा 109 तथा 110 लागू होती है। (3) जहाँ दुष्प्रेरित कार्य से भिन्न कार्य सम्पादित होता है परन्तु वह कार्य दुष्प्रेरित कार्य से ही व्युत्पन्न होता है वहाँ धारा 111 या 113 लागू हो सकती है। यह धारा ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण हेतु दण्ड का प्राविधान प्रस्तुत करती है, जो कारावास से दण्डनीय है। इस धारा के पैराग्राफ 1 को लागू होने के लिये जो शर्ते आवश्यक हैं वे उपर्युक्त वर्णित धारा में लगी शर्तों जैसी ही हैं, यथा (1) दुष्प्रेरित अपराध कारित नहीं होता और (2) ऐसे दुष्प्रेरण को दण्डित करने के लिये संहिता द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है। इस धारा में दिये गये दृष्टान्त दोनों ही पैराग्राफों को स्पष्ट करते हैं। |
  1. लोक साधारण द्वारा या दस से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण- जो कोई लोक साधारण द्वारा, या दस से अधिक व्यक्तियों की किसी भी संख्या या वर्ग द्वारा किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
दृष्टान्त क, एक लोक स्थान में एक प्लेकार्ड चिपकाता है, जिसमें एक पंथ को जिसमें दस से अधिक सदस्य हैं, एक विरोधी पंथ के सदस्यों पर, जबकि वे जुलूस निकालने में लगे हुये हों, आक्रमण करने के प्रयोजन से, किसी निश्चित समय और स्थान पर मिलने के लिए उकसाया गया है। क ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है। टिप्पणी दुष्प्रेरण के लिये यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरित व्यक्ति एक विनिश्चित ही होना चाहिये और व्यक्तियों का अनिश्चित वर्ग या समुदाय नहीं होना चाहिये। यह धारा इसी सिद्धान्त पर आधारित है। अत: दुष्प्रेरण के लिये एक व्यक्ति दण्डित हो सकता है, भले ही अभियोजन दुष्प्रेरित व्यक्तियों का नाम बताने में असमर्थ हो। दुष्प्रेरित व्यक्ति ‘लोक साधारण” हो सकते हैं या ‘‘दस से अधिक व्यक्तियों की कोई भी संख्या या वर्ग।” एक पत्रक (leaflet) भेज कर जनता को अपराध करने के लिये उत्तेजित करना इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय नहीं है यदि पत्रक को किसी द्वारा पढ़े जाने के पूर्व ही हटा लिया जाता है। इस प्रकरण में इस धारा के अन्तर्गत अपराध गठित करने हेतु जनता द्वारा उस पत्रक का पढ़ा जाना आवश्यक है या इसे जनता के लिये प्रदर्शित कर दिया गया हो।67 परन्तु रेलवे कर्मचारियों को हड़ताल के दौरान उकसाना कि वे रेलवे पटरी पर लेट जाएँ इस धारा के अन्तर्गत एक अपराध होगा।68
  1. मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना- जो कोई मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का किया जाना सुकर बनाने के आशय से या सम्भाव्यत: तद्वारा सुकर बनाएगा, यह जानते हुए,
ऐसे अपराध के किये जाने की 69[स्वेच्छा से किसी कार्य का लोप द्वारा या कोड में परिवर्तित करने के प्रयोग द्वारा अथवा किसी अन्य सूचना छिपाने वाले उपकरण द्वारा एक डिजाइन का अस्तित्व छिपाता है] परिकल्पना के बारे में व्यपदेशन करेगा जिसका मिथ्या होना वह जानता है,
  1. इम्परर बनाम परिमल चटर्जी, ए० आई० आर० 1932 कल० 760.
  2. एस० सुब्रामनिया अय्यर बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1933 मद्रास 279.
  3. सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 (2009 का अधिनियम सं० 10) की धारा 51 (ग) द्वारा ‘‘परिकल्पना के अस्तित्व को किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा स्वेच्छया छिपाता है” के स्थान पर प्रतिस्थापित।।
यदि अपराध कर दिया जाए-यदि अपराध नहीं किया जाए- यदि ऐसा अपराध कर दिया जाए, तो वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी. अथवा यदि अपराध न किया जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और दोनों दशाओं में से हर एक में जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। दृष्टान्त क यह जानते हुए कि ख स्थान पर डकैती पड़ने वाली है, मजिस्ट्रेट को यह मिथ्या इत्तिला देता है कि डकैती ग स्थान पर, जो विपरीत दिशा में है, पड़ने वाली है और इस आशय से कि एतद्वारा उस अपराध का किया जाना सुकर बनाए, मजिस्ट्रेट को भुलावा देता है। डकैती परिकल्पना के अनुसरण में ख स्थान पर पड़ती है। क इस धारा के अधीन दण्डनीय है। टिप्पणी धारायें 118, 119 तथा 120 अपराध करने की परिकल्पना को छिपाने के लिये दण्ड का प्रावधान प्रस्तुत करती हैं। ये धारायें आपराधिक गोपनीयता की विधि से सम्बन्धित हैं। इस धारा का आवश्यक तत्व है। गोपनीयता द्वारा अपराधी को अपराध करने में सुविधा प्रदान करना। इस धारा में दो प्रकार की गोपनीयताओं का वर्णन किया गया। (1) मिथ्या व्यपदेशन द्वारा गोपनीयता (Concealment by misrepresentation), (2) अप्रकटीकरण (Non-disclosure) द्वारा गोपनीयता । प्रथम लोक साधारण को प्रवित करता है जब कि बाद वाला केवल उनको प्रभावित करता है जिनका यह दायित्व है कि वह प्रकट करें। किसी गोपनीयता को आपराधिक होने के लिये आशयित होना आवश्यक है या इसका ज्ञान होना चाहिये कि इसके द्वारा अपराध कारित करने में मदद मिलेगी। धारा 118 मृत्यु-दण्ड या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराधों से सम्बन्धित है। अपराध को गोपनीय रखने वाले व्यक्ति पर उसे प्रकट करने का दायित्व अवश्य होना चाहिये।70 यह भी दर्शाया जाना चाहिये कि कार्य का लोप अपराध किये जाने को सुकर बनाने (facilitate) के योग्य था।7।
  1. किसी ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना का लोक सेवक द्वारा छिपाया जाना, जिसका निवारण करना उसका कर्तव्य है- जो कोई लोक सेवक होते हुए उस अपराध का किया जाना, जिसका निवारण करना ऐसे लोक सेवक के नाते उसका कर्तव्य है, सुकर बनाने के आशय से या । सम्भाव्यत: तद्वारा सुकर बनाएगा यह जानते हुए,
ऐसे अपराध के किए जाने की 72[स्वेच्छा से किसी कार्य या लोप द्वारा या कोड में परिवर्तित करने के प्रयोग द्वारा अथवा किसी अन्य सूचना छिपाने वाले उपकरण द्वारा एक डिजाइन का अस्तित्व छिपाता है] परिकल्पना के बारे में ऐसा व्यपदेशन करेगा जिसका मिथ्या होना वह जानता है, यदि अपराध कर दिया जाए- यदि ऐसा अपराध कर दिया जाए, तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि ऐसे कारावास की दीर्घतम अवधि से आधी तक की। हो सकेगी, या जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, या दोनों से, अनि अपराध मत्य, आदि से दण्डनीय है- अथवा यदि वह अपराध मत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो। सकेगी,
  1. बहादुर (1882) पी० आर० नं० 34 सन् 1882.
  2. केसरी (1866) 1 आगरा 37.
  3. सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम 2008 (2009 का अधिनियम सं० 10) की धारा 51 (घ) द्वारा ‘परिकल्पना के अस्तित्व को किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा स्वेच्छया छिपाता है” के स्थान पर प्रतिस्थापित।
यदि अपराध नहीं किया जाए- अथवा यदि वह अपराध नहीं किया जाए, तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि ऐसे कारावास की दीर्घतम अवधि की एक चौथाई तक की हो सकेगी या ऐसे जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। दृष्टान्त क, एक पुलिस आफिसर, लूट किए जाने से सम्बन्धित सब परिकल्पनाओं की, जो उसको ज्ञात हो जाए, इत्तिला देने के लिए वैध रूप से आबद्ध होते हुए और यह जानते हुए कि ख लूट करने की परिकल्पना बना रहा है, उस अपराध के किए जाने को सुकर बनाने के आशय से ऐसी इत्तिला देने का लोप करता है। यहाँ क ने ख की परिकल्पना के अस्तित्व को एक अवैध लोप द्वारा छिपाया है, और वह इस धारा के उपबन्ध के अनुसार दण्डनीय है। टिप्पणी धारा 118 उन मामलों से सम्बन्धित है जिनमें पब्लिक द्वारा या ऐसे व्यक्ति द्वारा जो लोक-सेवक नहीं हैं, किये गये अपराधों को गोपनीय रखा जाता है। धारा 119 धारा 118 जैसे अपराधों से ही सम्बन्धित है किन्तु धारा 119 में अपराध लोक-सेवकों द्वारा किया जाता है। अत: इसमें कठोर दण्ड का उपबन्ध किया गया है।
  1. कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना- जो कोई उस अपराध का किया जाना, जो कारावास से दण्डनीय है, सुकर बनाने के आशय से या सम्भाव्यत: तद्द्वारा सुकर बनाएगा, यह जानते हुए,
ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना के अस्तित्व को किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा स्वेच्छया छिपाएगा या ऐसी परिकल्पना के बारे में ऐसा व्यपदेशन करेगा, जिसका मिथ्या होना वह जानता है। यदि अपराधं कर दिया जाए-यदि अपराध नहीं किया जाए- यदि ऐसा अपराध कर दिया जाए, तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित भांति के कारावास से, जिसकी अवधि ऐसे कारावास की दीर्घतम अवधि की एक चौथाई तक की हो सकेगी और । यदि वह अपराध नहीं किया जाए, तो वह ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि ऐसे कारावास की दीर्घतम अवधि के आठवें भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। टिप्पणी धारा 120 तथा 118 दोनों लगभग एक ही सिद्धान्त पर आधारित हैं। दोनों धाराओं में प्रमुख अन्तर यह है कि धारा 118 मृत्यु दण्ड अथवा आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डनीय अपराधों से सम्बन्धित है जबकि धारा 120 आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डनीय अपराधों से सम्बन्धित है। केवल अर्थदण्ड से दण्डनीय अपराधों को इन धाराओं में शामिल नहीं किया गया है।

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