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Indian Penal Code 1860 Of Abetment LLB 1st Year Notes

  Indian Penal Code 1860 Of Abetment LLB 1st Year Notes:- IPC 1860 LLB Law Important Study Material Notes Questions With Answer Paper in PDF Download in Hindi English Language.

अध्याय 5

दुष्प्रेरण के विषय में

(OF ABETMENT)

  1. किसी बात का दुष्प्रेरण- वह व्यक्ति किसी बात के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है,
पहला-उस बात को करने के लिए किसी व्यक्ति को उकसाता है; अथवा दूसरा-उस बात को करने के लिए किसी षड्यंत्र में एक या अधिक अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के साथ सम्मिलित होता है, यदि उस षड्यंत्र के अनुसरण में, और उस बात को करने के उद्देश्य से, कोई कार्य या अवैध लोप घटित हो जाए, अथवा तीसरा-उस बात के लिए किए जाने में किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा साशय सहायता करता है। स्पष्टीकरण 1-जो कोई व्यक्ति जानबूझकर दुर्व्यपदेशन द्वारा, या तात्विक तथ्य, जिसे प्रकट करने के लिए वह आबद्ध है, जानबूझकर छिपाने द्वारा, स्वेच्छया किसी बात का किया जाना कारित या उपाप्त करता है, अथवा कारित या उपाप्त करने का प्रयत्न करता है, वह उस बात का किया जाना उकसाता है, यह कहा जाता है। दृष्टान्त क, एक लोक आफिसर, न्यायालय के वारण्ट द्वारा य को पकड़ने के लिए प्राधिकृत है। ख उस तथ्य को जानते हुए और यह भी जानते हुए कि ग, य नहीं है, क को जानबूझ कर यह व्यपदिष्ट करता है कि ग, य है, और तद्वारा साशय क से ग को पकड़वाता है। यहाँ ख, ग के पकड़े जाने का उकसाने द्वारा दुष्प्रेरण करता है। स्पष्टीकरण 2- जो कोई या तो किसी कार्य के किए जाने से पूर्व या किए जाने के समय, उस कार्य के किए जाने को सुकर बनाने के लिए कोई बात करता है और तद्वारा उसके किए जाने को सुकर बनाता है, वह उस कार्य के करने में सहायता करता है, यह कहा जाता है। टिप्पणी जब कोई अपराध कारित करने में अनेक व्यक्ति हिस्सा लेते हैं तो उसे कारित करने में उनमें से प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग ढंग से और अलग-अलग मात्रा में मदद करता है। एक व्यक्ति के प्रोत्साहन पर अपराध दसरा व्यक्ति कारित कर सकता है जबकि कुछ अन्य, अपराध कारित होते समय केवल सहायता देने के लिये उपस्थित रहते हैं तथा कुछ और व्यक्ति मुख्य अपराधी को हथियार जुटाने में सहायता कर सकते हैं। अतः उनकी अपराधिता की मात्रा के विनिश्चयन हेतु यह आवश्यक है कि उनमें से प्रत्येक व्यक्ति के सहयोग की मात्रा एवं प्रकति का निर्धारण किया जाये। परन्तु कृत्य के विभिन्न वर्गीकरण दण्ड में विभेद करने के प्रयोजन से निश्चयत: दोष के विभिन्न मापों को इंगित नहीं करते। इंगलिश विधि-इंगलिश विधि में प्रथम कोटि तथा द्वितीय कोटि के अपराधी (Principals of first and Second degree) और तथ्यपूर्व के अनुचारी एवं तथ्य पश्चात् के अनुचारी (Accessories before and after the fact) में विभेद किया गया है। प्रथम कोटि का पिन काटि का अपराधी (Principal of First degree) वह व्यक्ति होता है जिसने या तो स्वयं अपने हाथ से अपराध कार्य किया है कार्य किया है या किसी अन्य के माध्यम से सम्पन्न कराया।कि है। द्वितीय कोटि का अपराध (Principal of second degree) वह व्यक्ति है जो अपराध कार्य के क्रियान्वयन हेतु सहायता और दुष्प्रेरण देता है। तथ्य पूर्व का अनुचारी (accessory before the fact) वह व्यक्ति है जो प्रत्यक्षत: या विवक्षित रूप से प्रमुख अपराधी को प्रोत्साहित करता है, सलाह देता है, हथियार जुटाता है तथा आदेश देता है, यदि अपराध इसके परिणामस्वरूप कारित होता है। ऐसा व्यक्ति यदि अपराध कारित होते समय घटनास्थल पर विद्यमान रहता है तो उसे द्वितीय कोटि का अपराधी मानते हैं। तथ्य पश्चात् के अनुचारी (accessory after the fact) वे अपराधी हैं जो अपराध घटित हो जाने के बाद और इस ज्ञान से कि अपराध घटित हो गया है प्रमुख अपराधी को अपने यहाँ शरण देते हैं, सुविधा (Comfort) प्रदान करते हैं तथा दण्ड से बचने में उसकी सहायता करते हैं। किन्तु इंग्लिश विधि का यह अन्तर केवल महापराधी (felony) के लिये ही उपयुक्त है, देश-द्रोह (Treason) तथा साधारण अपराध (misdemeanour) के लिये नहीं। दृष्टान्त-अ, ब को प्रोत्साहित करता है कि वह म की हत्या कर दे। स, मारो मारो कह कर ब को प्रोत्साहित करता है तथा द उसे लाठी पकड़ाता है। ब इस प्रोत्साहन के प्रभाव में आकर म को मार डालता है। प यह जानते हुये कि ब ने म की हत्या किया है उसे शरण देता है ताकि वह पकड़ा न जा सके। | इस उदाहरण में ब वह व्यक्ति है जो अपराध कारित करता है इसलिये यह प्रथम कोटि का अपराधी है। द उसे लाठी पकडाता है अत: वह द्वितीय कोटि का अपराधी है। अ और स तथ्यपूर्व के अनुचारी हैं क्योंकि वे ब को म की हत्या के लिये प्रोत्साहित करते हैं। प तथ्य पश्चात् का अनुचारी है क्योंकि वह दण्ड से बचने में ब की सहायता करता है। भारतीय विधि- भारतीय दण्ड संहिता दुष्प्रेरकों एवं मुख्य अपराधियों के बीच एक विस्तृत अन्तर कायम करती है किन्तु तथ्य पश्चात् के अनुचारी को नहीं स्वीकारती सिवा इसके कि कुछ मामलों में अपराधियों को छिपाना मौलिक अपराध माना गया है। भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत निम्नलिखित रीति से दुष्प्रेरण गठित होता है (1) एक व्यक्ति को अपराध कारित करने के लिये उकसाने (instigation) द्वारा; (2) एक अपराध कारित करने के लिये किसी षड्यंत्र में सम्मिलित होने (conspiracy) द्वारा, या (3) एक अपराध कारित करने के लिये जानबूझ कर एक व्यक्ति की सहायता (aiding) द्वारा ।। दुष्प्रेरण तभी एक अपराध होता है जबकि दुष्प्रेरित कार्य स्वत: एक अपराध हो तथा भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अन्तर्गत दण्डनीय हो। गन्गुला मोहन रेड्डी बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य के के बाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि दुष्प्रेरण उकसाने की मानसिक अथवा कोई निश्चित कार्य करने में साशय सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया आवेष्टित करता है। दुष्प्रेरण हेतु अभियुक्त द्वारा कुछ सकारात्मक कार्य किया जाना आवश्यक है।
  1. उकसाना (Instigation)–उकसाना या भड़काने का अर्थ है किसी अन्य व्यक्ति को एक दोषपूर्ण कार्य करने के लिये उत्तेजित करना । एक व्यक्ति एक कार्य करने के लिये एक दूसरे व्यक्ति को सलाह, सुझाव, उकसाने या निर्देश द्वारा दुष्प्रेरित कर सकता है। उकसाने द्वारा दुष्प्रेरण गठित करने के लिये अपराध सृजन को दिशा में कुछ सक्रिय प्रक्रियायें आवश्यक हैं। उकसाने का अर्थ है सक्रिय रूप से सझाव देना अथवा प्रत्यक्ष या विवक्षित भाषा द्वारा प्रेरित करना चाहे यह स्पष्ट प्रार्थना के रूप में हो या संकेत से फुसलाना या प्रेरित करना हो। इसका अर्थ फुसलाना (goad), प्रार्थना करना, उत्तेजित करना (to provoke), उकसाना, विन या किसी कार्य के लिये उत्साहित करना है। किसी भी प्रकार की भाषा का प्रयोग दुष्प्रेरण के लि सकता है किन्तु दुष्प्रेरक द्वारा प्रयुक्त शब्दों के अर्थ के बारे में युक्तियुक्त निश्चितता होना चा प्रयुक्त यथार्थ शब्दों का सिद्ध होना आवश्यक नहीं है।
  2. धारा 130, 136, 201, 212, 216 तथा 216-अ भारतीय दण्ड संहिता को देखिये।।
1क. (2010) 2 क्रि० ला ज० 2110 (एस० सी०).
  1. आर० बनाम डेलर, 44 एल० जे० एम० सी० 67.
  2. अमीनुद्दीन, (1922) 24 बाम्बे लॉ रि० 327.।
  3. परिमल चटर्जी, (1932) 60 कल० 327.
  4. प्रेम नारायन, ए० आई० आर० 1957 इला० 177.
मात्र स्वीकृति, मूक सहमति या मौखिक आज्ञा से उकसाना गठित नहीं होगा। उदाहरण के लिये अ, ब से कहता है कि उसका आशय स की हत्या करने का है। ब, उससे कहता है कि जैसी तुम्हारी इच्छा हो करो। अ, स को मार डालता है। इस उदाहरण में यह नहीं कहा जा सकता है कि ब ने स की हत्या के लिये अ को प्रोत्साहित किया, क्योंकि प्रोत्साहन का अर्थ है किसी कार्य को कारित करने के लिये किसी सक्रिय सुझाव का समर्थन या उत्तेजना। सलाह स्वतः उकसाने के समतुल्य नहीं होती। यह उकसाना हो सकता है यदि इसका अर्थ कोई अपराध कारित करने के लिये सक्रिय रूप से सुझाव देना या उत्तेजित करना था। जहाँ प्रभावशाली व्यक्ति जो किसी अवैध सभा के उद्देश्य को जानते थे जानबूझ कर उस क्षेत्र से गायब रहते हैं ताकि सभा के उद्देश्य के प्रति सहानुभूति व्यक्त कर सकें, दुष्प्रेरक नहीं है। जानबूझकर दुर्व्यपदेशन या तात्विक तथ्य को छिपाना– भारतीय दण्ड संहिता की धारा 107 स्पष्टीकरण 1 यह उद्घोषित करती है कि उकसाना उस व्यक्ति के, जो उसे प्रकट करने के लिये बाध्य है, जानबूझ कर दुर्व्यपदेशन अथवा आवश्यक तत्व को जानबूझ कर छिपाने द्वारा गठित हो सकता है। इस स्पष्टीकरण से संलग्न दृष्टान्त जानबूझकर दुर्व्यपदेशन द्वारा उकसाने को पूर्णतया स्पष्ट करता है। जानबूझकर छिपाने द्वारा तब उकसाना गठित है जबकि छिपाना तात्विक तथ्य से सम्बन्धित होता है जिसे प्रकट करने के लिये वह बाध्य होता है। पत्र द्वारा उकसाना- उकसाना या तो स्पष्ट हो सकता है या पत्र द्वारा। जहाँ, अ, एक पत्र लिखकर स की हत्या के लिये ब को उकसाता है, उकसाने द्वारा दुष्प्रेरण का अपराध तभी पूर्ण हो जाता है जैसे ही उस पत्र में लिखी बातों का पता ब को लगता है। यदि पत्र कभी भी ब के पास नहीं पहुँचाता है तो यह दुष्प्रेरित करने का एक प्रयत्न मात्र होगा, दुष्प्रेरक नहीं होगा। किसी कार्य को करने के लिये प्रयत्न मात्र भी उकसाना हो सकता है। उदाहरण के लिये अ, एक लोक-सेवक ब को घूस देने का प्रयत्न करता है परन्तु ब उसे लेने से इन्कार कर देता है किन्तु अ दुष्प्रेरण कारित करता है। इसी प्रकार जहाँ अ, ब को घूस देता है ताकि वह अपने मालिक की सामग्री निश्चित मूल्य से कम पर उसे बेच दे, अ उकसाने का दोषी है।10। प्रत्यक्ष रूप से उकसाना-उकसाना वहाँ प्रत्यक्ष होता है जहाँ कोई प्रत्यक्षतः एक कार्य करने का आदेश देता है, सुझाव देता है या उत्साहित करता है। उदाहरणस्वरूप अ, अपने नौकर ब को आदेश देता है। कि वह स को पीटे। यहाँ अ उकसाने का अपराधी है।11 । उसका कार्य अपराध कारित कराने के दुष्प्रेरण के लिये एक व्यक्ति को दण्डित करने हेतु प्रेरणा का स्पष्ट प्रमाण होना आवश्यक है। मात्र यह पर्याप्त नहीं है कि एक व्यक्ति ने उन कार्यवाहियों में भाग लिया था जो निर्दोष है अपितु उसे आपराधिक कार्यवाहियों से किसी न किसी रूप में जुड़ा होना आवश्यक है।12 कभीकभी प्रत्यक्षत: संकेत भी उकसाने के तुल्य होता है यदि वह स्वीकारसूचक तथा स्पष्ट परिणाम व्युत्पन्न करने के योग्य है। उदाहरणस्वरूप, अ जानता था कि ब, म की पत्नी से एक निर्दोष प्रयोजन हेतु मिलना चाहता था। अ, म को उत्तेजित करने के उद्देश्य से उसे बताता है कि दोनों किसी अवैध प्रयोजन हेतु मिलने वाले हैं। चूंकि सुझाव अ ने म को इस विचार से दिया कि वह ब पर हमला करे अतः वह उकसाने द्वारा दुष्प्रेरण का दोषी है। । किन्तु किसी भी रूप में प्रदर्शित मूक सहमति जो अपराध को प्रेरित करने एवं उत्साहित करने के प्रभाव से युक्त है, दुष्प्रेरण है। क्वीन बनाम मोहित13 के वाद में अभियुक्तों की उपस्थिति में एक स्त्री ने सती होने के लिये अपने को तैयार किया। वे लोग उसके साथ चिता तर्क गये तथा उसके सौतेले पुत्रों के साथ खड़े हो
  1. रघुनाथ दास, (1920) 5 पी० एल० जे० 129.
  2. यतीम अली मजुमदार बनाम इम्परर, 4 सी० डब्ल्यू० एन० 500.
  3. शिव दयाल मल, (1894) 16 इला० 389.
9 रैन्सफोर्ड, (1874) 13 काक्स 492.
  1. रेगिना बनाम डी क्रोम, 17 काक्स 492.
  2. रसूकुल्लाह, (1869) 12 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 51.
  3. क्वीन बनाम नीमचन्द, 20 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 41.
  4. (1871) 3 एन० डब्ल्यू ० पी० 316.
कर ‘राम-राम” चिल्लाते रहे। यह निर्णय दिया गया कि वे सभी व्यक्ति जो चिता तक उसके साथ आये थे तथा ‘राम-राम” चिल्ला रहे थे, दुष्प्रेरण के दोषी होंगे क्योंकि उन लोगों ने सती होने के लिये सक्रिय रूप से उसे समर्थन दिया।
  1. षड्यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण (Abetment by Conspiracy)—षड़यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण तब होता है जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी अवैध कार्य को करने अथवा किसी अवैध कार्य को अवैध साधनों से करने के लिये सहमत हो जाते हैं। अत: षड्यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण गठित होने के लिये निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं
(1) दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच षड्यंत्र, (2) एक कार्य या अवैध लोप उस षड्यंत्र के फलस्वरूप कारित हो, तथा (3) ऐसा कार्य या अवैध लोप जो षड्यन्त्रित वस्तु को पूर्ण करने में कारित हुआ हो, षड्यंत्र का अर्थ है, दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच एक ऐसा समझौता जो, (क) कोई अवैध कार्य करने हेतु, अथवा (ख) कोई ऐसा कार्य जो अवैध नहीं है, अवैध साधनों द्वारा करने हेतु किया गया हो। अत: यह स्पष्ट है। कि धारा 107 खण्ड 2 के अन्तर्गत किसी अपराध के लिये कई लोगों के बीच मात्र एक सन्धि या समझौता पर्याप्त नहीं है। षड्यंत्र के तहत एक कार्य या एक अवैध लोप का भी कारित होना आवश्यक है और यह कार्य या लोप उस निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु होना चाहिये। किन्तु धारा 120-क के अन्तर्गत किसी अपराध के लिये मात्र सम्मति पर्याप्त है यदि सम्मति एक अपराध कारित करने के उद्देश्य से दी गयी है।14 षड्यंत्र के अनुसरण में कोई प्रत्यक्ष या अवैध लोप अवश्य किया जाना चाहिये, भले ही सम्मति एक अपराध कारित करने के लिये हो। खण्ड 2 की धारा 108 को स्पष्टीकरण के साथ पढ़ा जाना चाहिये जो यह उद्घोषित करती है कि षड्यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण का अपराध कारित करने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरक अपराधकर्ता के साथ सम्बन्ध बनाये रखे। यह पर्याप्त होगा यदि वह उस षड्यंत्र में भाग लेता है जिसके अनुसरण में अपराध कारित होता है। स्पष्टीकरण 5 के साथ दिया गया दृष्टान्त इस स्थिति को पूर्णतया स्पष्ट करता है। एक षड्यंत्र मात्र दुष्प्रेरक के समतुल्य नहीं होता। यदि षड्यंत्रकारियों की पहचान योजना पर विचारविमर्श के दौरान ही हो जाती है तो वे दुष्प्रेरकों के रूप में दण्डित नहीं होंगे भले ही उनका साधारण आशय अपराध कारित करने का रहा हो। परन्तु यदि उनकी योजना ही एक अपराध कारित करने की थी तो वे संहिता की धारा 120-ख के अन्तर्गत षड्यंत्र के लिये दायित्वाधीन होंगे। पंडाला वेंकटास्वामी15 के वाद में यह निर्णय दिया गया कि यदि एक व्यक्ति अन्य कई लोगों के साथ मिलकर किसी आशयित झूठे दस्तावेज की एक प्रतिलिपि तैयार करता है तथा इस झूठे दस्तावेज को लिखने के प्रयोजन से रसीदी कागज खरीदता है और उस झूठे दस्तावेज में लिखने के उद्देश्य से एक तथ्य के विषय में सूचना इकट्ठी करता है, तो वह जालसाजी (Forgery) के दुष्प्रेरण का अपराधी है क्योंकि ये ऐसे कृत्य हैं जो अपराध कारित करने में सहायता पहुँचाते हैं। जहाँ एक औरत अपने को गर्भवती समझ कर, जबकि वह यथार्थतः गर्भवती नहीं थी, किसी अन्य व्यक्ति से मिलकर षड्यंत्र रचती है, ताकि वह उसे दवा दे दे, किसी हथियार का प्रयोग करें जिससे उसका गर्भपात हो जाये, वह गर्भपात कराने के षड्यंत्र के लिये दण्डित होगी।16 हेरधन चक्रवती बनाम भारत संघ17 के मामले में याचिकादाता को षडयंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण कारित करने के लिये अभियोजित किया गया। मेजर त्रिलोक चन्द के ऊपर 250 पहिया के
  1. प्रमथ नाथ बनाम सरोज रंजन, ए० आई० आर० 1962 सु० को० 876.
  2. (1881) 3 मद्रास 4.
  3. ह्विटचर्च (1890) 24 क्यू० बी० डी० 420.
  4. 1 1990 क्रि० लॉ ज० 1246 (एस० सी०).
आरोप था और याचिकादाता समेत नौ लोगों को इस षड्यंत्र में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। कोर्ट मार्सल द्वारा मेजर त्रिलोक चन्द को दोषी पाया गया। परन्तु नौ दुष्प्रेरकों में से आठ को दोषमुक्त कर दिया गया। बाद में मेजर त्रिलोक चन्द भी अपील में उच्च न्यायालय द्वारा दोषमुक्त कर दिये गये तथा उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध भारत संघ को अपील करने की विशेष याचिका भी उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज कर दी गयी। तत्पश्चात् मेजर त्रिलोक चन्द्र को सेवा से बाहर कर दिया गया। उसके बाद याचिकादाता ने भी नौकरी में बहाल किये जाने का आवेदन प्रस्तुत किया क्योंकि सभी अभियुक्तों की दोषमुक्ति के बाद वह अपने को भी निदोष समझता था। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि चूंकि मुख्य अभियुक्त उनके विरुद्ध आरोप सिद्ध नहीं हो सकने के कारण दोषमुक्त कर दिये गये और नौ दुष्प्रेरक में से आठ दोषमुक्त कर दिये गये थे। अतएव मात्र एक याचिकादाता को ही षड्यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण के अपराध का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि षड्यंत्र केवल एक व्यक्ति द्वारा सम्भव नहीं है। | सेन्ट्रल व्यूरो आफ इन्वेस्टीगेसन बनाम वी० सी० शुक्ला17a के वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि जहां अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहता है कि दो में से एक अभियुक्त किसी आपराधिक षड्यंत्र में भागीदार था ऐसी दशा में दूसरे अभियुक्त के विरुद्ध षड्यंत्र का आरोप सिद्ध नहीं माना जायेगा क्योंकि षड़यंत्र में कम से कम दो व्यक्तियों का होना अनिवार्य है। । षड्यंत्र के लिये सजा (Conviction for Conspiracy)-कोई भी व्यक्ति षड्यंत्र के लिये दण्डित नहीं हो सकेगा यदि अन्य षड्यंत्रकारियों के विरुद्ध आरोप विफल हो चुका है18 या अन्य कथित षड्यंत्रकारी आरोप से उन्मुक्त कर दिये गये हैं।19 कई व्यक्तियों के विरुद्ध षड्यंत्र के लिये एक आरोप के प्रकरण में अभियोजन को सिद्ध करना आवश्यक है कि प्रत्येक षड्यंत्रकारी जानता था तथा इसका अन्य षड्यंत्रकारियों से व्यक्तिगत सम्बन्ध था, क्योंकि उनमें से कुछ मध्यस्थ भी हो सकते थे।20।
  1. सहायता के माध्यम से दुष्प्रेरण (Abetment by aiding)- धारा 107 का तीसरा उपबन्ध अपराध के लिये किये जाने में किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा साशय सहायता के कार्य को दुष्प्रेरण करना बतलाता है। धारा 107 का उपबन्ध तीन उसी धारा के स्पष्टीकरण दो के साथ पढ़ा जाना चाहिये और दोनों को साथ पढ़ा जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि एक व्यक्ति एक कार्य को करने में सहायता पहुँचाने के कारण दण्डित नहीं हो सकेगा यदि वह कार्य किया ही नहीं जाता। सहायता पहुँचाने का मात्र आशय, भले ही वह किसी ऐसे कार्य से संयुक्त क्यों न हो जो सहायता पहुँचा सकता है, दुष्प्रेरण गठित करने के लिये तब तक पर्याप्त नहीं जबकि आशयित कृत्य यथार्थत: घटित नहीं हो जाता तथा उसे सहायता प्राप्त नहीं हो जाती 21 उदाहरण के लिये, यदि नौकर अपने स्वामी के घर का दरवाजा खुला रखता है ताकि चोर घर में घुस जाएँ। परन्तु चोर नहीं आते हैं, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसने चोरी के कृत्य को दुष्प्रेरित किया। किन्तु यदि वह दरवाजा खोलने के पूर्व या उसके पश्चात् सम्भावित चोरी को सूचित करता है कि वह दरवाजा खुला रखेगा तो वह अपने आचरण द्वारा चोरी किये जाने को प्रोत्साहित करता है। वह उकसाने के माध्यम से दुष्प्रेरण।
का दोषी है या यदि वह दरवाजा खोलने के पूर्व चोरों के साथ समझौता कर लेता है कि वह दरवाजा खुला रखेगा तो वह षड्यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण का दोषी होगा। इसी प्रकार यदि अ‘मारो-मारो” कह कर ब को । उत्तेजित करता है कि वह स को मार डाले तथा द, ब के हाथों में लाठी पकड़ा देता है और इस प्रकार से या तो वह मार दिया जाता है या उसे गम्भीर क्षति पहुँचती है। यहाँ अ उकसाने के माध्यम से दुष्प्रेरण का दोषी हैं। तथा द सहायता पहुँचाने के माध्यम से दुष्प्रेरण का दोषी है, क्योंकि उसने ब के हाथों में लाठी पकड़ा कर कृत्य के संपादन में सहायता पहुँचायी तथा कार्य यथार्थत: सम्पादित हुआ। केवल सहायता पहुँचाना ही एक अपराध का दुष्प्रेरण नहीं होता जबकि सहायता पहुँचाने वाला व्यक्ति गट नहीं जानता कि कोई अपराध कारित किया जा रहा है या कारित किये जाने की संभावना है। अपराध। 17 ए० आई० आर० 1998 एस० सी० 1406.
  1. जगजीवन घोष, (1909) 10 क्रि० लाँ ज० 125.
  2. फागुनकान्त, (1959) क्रि० लॉ ज० 917.
  3. वन (1909) 11 बम्बई ला रि० 1153.
21, हुदा, एस : दि प्रिन्सिपल्स ऑफ दी लॉ ऑफ क्राइम्स, पृ० 95. कारित किये जाने में सहायता पहुँचाने का आशय होना आवश्यक है। किन्तु यदि सहायता प्रदान करने वाले व्यक्ति को यह नहीं ज्ञात था कि जिस कार्य को वह सहायता या समर्थन प्रदान कर रहा है वह स्वत: एक अपराध है तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह साशय उस कार्य को किये जाने में सहायता करता है 22 उदाहरणस्वरूप अ, ब तथा स मित्र हैं। अ तथा ब में इस तरह मतभेद हो जाता है कि अ, ब को मार डालने का निश्चय कर लेता है। अ एक बहाने से स के घर जाता है तथा स को प्रेरित करता है कि वह ब को अपन। घर बुलाये । स को इस बात का जरा सा भी ज्ञान नहीं था कि वह ब को उसके आने पर मार डालेगा। व आता है तथा अ उसकी हत्या कर देता है। क ने हत्या कारित किया है। इस प्रकरण में कोई सन्देह नहीं है कि स न ब को अपने घर बुलाने में मदद किया किन्तु उसे इस तथ्य का ज्ञान नहीं था कि अ क्यों ब को बुलवा रहा है। जो कुछ भी स ने किया साशय किया क्योंकि यह निश्चयत: स का आशय था कि ब उसके घर आये ।। किन्तु यह स का आशय नहीं था कि कोई अपराध कारित हो। अत: स हत्या के दुष्प्रेरण का दोषी नहीं है।\ उपस्थिति मात्र सहायता तुल्य नहीं है (Mere presence does not amount to aiding)-अपराध करते समय अपराध स्थल पर किसी व्यक्ति का उपस्थित हो जाना मात्र ही सहायता के माध्यम से दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता जब तक कि उस व्यक्ति का वैसा आशय न रहा हो। उपस्थित रहना और यह जानना कि कोई अपराध कारित किया जाने वाला है अपराध तब तक नहीं गठित करता जब तक कि इस प्रकार उपस्थित व्यक्ति के पास कोई अधिकार न हो, या उसका प्रभाव इस प्रकृति का हो कि उसका अपराध के विषय में कुछ कहना परिस्थितियों के अन्तर्गत स्पष्ट प्रोत्साहन के तुल्य हो या जब तक कि उस पर नियन्त्रण का कोई स्पष्ट दायित्व न हो जिसे वह इस प्रकार अपूर्ण छोड़ देता है जिससे यह बिना किसी कठिनाई के कहा जा सके कि उसने षड्यंत्र में अपराध कारित करने हेतु भाग लिया था।23। अवैध लोप द्वारा सहायता (Aid by illegal omission)—सहायता कृत्य तथा अवैध लोप दोनों द्वारा पहुँचायी जा सकती है। जब विधि किसी व्यक्ति पर किसी कार्य को करने का दायित्व आरोपित करती है। और यदि वह उसे संपादित नहीं कर पाता तो वह दण्डित किया जायेगा।24 क्वीन बनाम कालीचरन-5 के वाद में मुख्य सिपाही जो यह जानता था कि कुछ व्यक्तियों को अपराध स्वीकृति के प्रयोजन से यातना दी जाने की संभावना है जानबूझ कर रास्ते से अलग हट गया। वह स्पष्टीकरण 2 के अन्तर्गत दुष्प्रेरण का अपराधी है। ऐसे मामलों में यह दर्शाना आवश्यक है कि अभियुक्त ने साशय अपने अहस्तक्षेप द्वारा अपराध कारित करने में सहायता पहुँचायी ।26 किन्तु इस तथ्य, कि कोई अपराध कारित हुआ है, की सूचना देने से लोप करना सहायता देने के तुल्य नहीं है। जब तक कि इस प्रकार के लोप में वैधिक बाध्यता का उल्लंघन सम्मिलित न। हो ।27 कार्य द्वारा सहायता (Aiding by act) इम्परर बनाम फैयाज हुसैन-8 के वाद में एक जमींदार ने अपना मकान एक पुलिस अधिकारी को किराये पर दिया जो एक मामले का अन्वेषण कर रहा था। जमींदार ने यह जानते हुये मकान पुलिस अधिकारी को दिया था कि मकान का उपयोग शंकायुक्त चोर को यात देने हेतु किया जायेगा। वह दुष्प्रेरण का दोषी है।। दम्परर बनाम रामलाल29 के वाद में कुछ व्यक्तियों ने एक स्त्री को सती होने से रोकने में अथक प्रयास किया। उन लोगों ने समीपवर्ती पुलिस चौकी को इस तथ्य की सूचना भी दे दिया था। किन्तु उसे रोकने में अपने को असमर्थ पाते हुये उन लोगों ने स्त्री की इच्छा का अनुसरण किया तथा सती होने में उसकी सहायता भी किया। वे लोग दुष्प्रेरण के दोषी घोषित किये गये। इसी प्रकार आर० बनाम फ्रेटवेल के वाद में। अभियुक्त ने एक गर्भवती स्त्री द्वारा अपने को नष्ट कर देने की धमकी दिये जाने तथा उसकी इच्छा के आधार पर जहर प्राप्त किया। अभियुक्त यह जानता था कि जहर का प्रयोग गर्भपात कराने के लिये होगा किन्तु उसने न तो स्वयं उसे दिया और न ही लेने के लिये स्त्री को प्रेरित किया। उसे वह उम्मीद थी कि वह अपना
  1. रामनाथ (1924) 47 इला० 268 पृ० 275 के बाद में मुकर्जी जे० का मत
  2. लक्ष्मी (1886) क्रि० रि० नं० 51 सन् 1886\अनरिपोर्टड क्रि० के० 303.
  3. इम्परर बनाम लतीफ खान, 20 बाम्बे 394,
  4. 21 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 11. ।
  5. ख्वाजा नूरुल हुसेन बनाम फबेर टोनेर, 24 डब्ल्यू० आर० ( क्रि०) 26.
  6. क्वीन बनाम खादिम, 4 बी० एल० आर० ए० क्रि० 7.
  7. 16 डब्ल्यू ० एन० 194.
  8. 36 इला० 26.
विचार बदल देगी तथा गर्भपात नहीं करायेगी। परन्तु उसने जहर का सेवन किया और वह उसकी मृत्यु हो गयी। अभियुक्त को दोषी नहीं माना गया। सुविधा प्रदान कर सहायता पहुँचाना (By affording facility)-प्रदान की गयी सुविधा ऐसी होनी चाहिये जो अपराध कारित करने के लिये आवश्यक हो। अपने मकान में अवैध विवाह सम्पन्न कराये। जाने के लिये आज्ञा देने मात्र का कार्य दुष्प्रेरण के तुल्य नहीं है 30 इसी प्रकार इम्परर बनाम उमी31 के वाद में यह निर्धारित किया गया कि अवैध विवाह के अवसर पर उपस्थित रहने की सम्मति मात्र या वास्तविक उपस्थिति या विवाह सम्पन्न कराने हेतु मकान में आवास उपलब्ध कराना अवैध विवाह का दुष्प्रेरण गठित नहीं करता, किन्तु जो पुरोहित अवैध विवाहकरण समारोह की अध्यक्षता करता है, भारतीय दण्ट संहिता की धारा 494 के अन्तर्गत द्विविवाह के दुष्प्रेरण का दोषी है। इसी प्रकार मालन32 के वाद में अभियन्त जिसने विवाह संपन्न होते समय अन्तरपट (Screen) पकड़ रखा था तथा जिसे यह भी मालूम था कि विवाह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 494 के अन्तर्गत शून्य था, सहायता पहुंचाने द्वारा दुष्प्रेरण का दोषी माना गया। मोंग बा योग बनाम मा ला किन33 के वाद में अपहरण के लिये एक कार का प्रयोग किया गया था। यह निर्णय दिया गया कि इस साक्ष्य के अभाव में कि कार का एक प्रकार प्रयोग उसके स्वामी की सम्मति से अथवा उसके आदेश के अन्तर्गत हुआ था स्वामी अपहरण के दुष्प्रेरण का दोषी नहीं माना जा सकता। जहाँ, अ, ब पर प्रहार करता है और ब इस प्रकोपन के फलस्वरूप हिंसा करने की सीमा तक उत्तेजित हो जाता है। ज, एक दर्शक ब के हाथों में छूरा पकड़ा देता है इस आशय से ताकि ब, अ को मार डाले। ब, छूरा भोंक कर अ को मार डालता है। ब आपराधिक मानव वध के लिये दण्डनीय होगा तथा ज, हत्या के दुष्प्रेरण का दोषी होगा, क्योंकि उसने अ को मार डालने के आशय से ब की सहायता किया था। प्रयास (Attempt)—किसी अपराध का दुष्प्रेरण स्वत: एक अपराध है। दुष्प्रेरण भारतीय दण्ड संहिता की धारा 40 के अन्तर्गत भी एक अपराध है। अतः दुष्प्रेरण को भी कारित करने का प्रयास इस संहिता की धारा 511 के उपबन्धों के अधीन एक अपराध है।34 अ दस हजार रुपये प्रतिफल प्राप्त करने के एवज में ब को ऐसे उपकरण प्रदान करने पर सहमत हो जाता। है जिससे कि वह कलकत्ता जाने वाली एक रेलगाड़ी को पटरियों से उतार सके। अ ने उन उपकरणों की ब को आपूर्ति कर दी। इस मामले में साशय सहायता प्रदान करने द्वारा दुष्प्रेरण का अपराध कारित नहीं किया गया। परन्तु अ ने रेलगाड़ी को रेलपटरी से उतारने के अपराध की सुविधायें प्रदान की हैं यद्यपि कि रेल पटरी से उतरी नहीं । अतएव अ रेलगाड़ी को पटरी से उतारने को साशय सहायता प्रदान कर दुष्प्रेरण के अपराध के। प्रयत्न का दोषी होगा।
  1. दुष्प्रेरक-वह व्यक्ति अपराध का दुष्प्रेरण करता है, जो अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करता। है या ऐसे कार्य के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है, जो अपराध होता, यदि वह कार्य अपराध करने के लिए विधि-अनुसार समर्थ व्यक्ति द्वारा उसी आशय या ज्ञान से, जो दुष्प्रेरक का है, किया जाता।
स्पष्टीकरण 1-किसी कार्य के अवैध लोप का दुष्प्रेरण अपराध की कोटि में आ सकेगा, चाहे दुष्प्रेरक उस कार्य को करने के लिए स्वयं आबद्ध न हो। स्पष्टीकरण 2-दुष्प्रेरण का अपराध गठित होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरित कार्य किया जाए या अपराध गठित करने के लिए अपेक्षित प्रभाव कारित हो।
  1. क्वीन बनाम कदम, (1864) डब्ल्यू० आर० 13.
  2. (1882) 6 बम्बई 156.
  3. (1957) 60 बाम्बे लॉ रि० 420.
  4. 1933 रंगून 297. ‘
  5. आर० स्पायर (1887) पी० आर० नं० 49 (1887).
दृष्टान्त (क) ग की हत्या करने के लिए ख को क उकसाता है। ख वैसा करने से इन्कार कर देता है। क हत्या। करने के लिए ख के दुष्प्रेरण का दोषी है। (ख) घ की हत्या करने के लिए ख को क उकसाता है। ख ऐसी उकसाहट के अनुसरण में घ को विद्ध करता है। घ का घाव अच्छा हो जाता है। क हत्या करने के लिए ख को उकसाने का दोषी है। स्पष्टीकरण 3- यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरित व्यक्ति अपराध करने के लिए विधि-अनुसार समर्थ हो, या उसका वही दूषित आशय या ज्ञान हो, जो दुष्प्रेरक का है, या कोई भी दूषित आशय या ज्ञान हो। दृष्टान्त (क) क दूषित आशय से एक शिशु या पागल को वह कार्य करने के लिए दुष्प्रेरित करता है, जो अपराध होगा, यदि वह ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाए जो कोई अपराध करने के लिए विधि-अनुसार समर्थ है और वही आशय रखता है जो कि क का है। यहाँ, चाहे वह कार्य किया जाए या न किया जाए क अपराध के दुष्प्रेरण का दोषी है। (ख) य की हत्या करने के आशय से ख को, जो सात वर्ष से कम आयु का शिशु है, वह कार्य करने के लिए क उकसाता है जिससे य की मृत्यु कारित हो जाती है। ख दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप वह कार्य क की अनुपस्थिति में करता है और उससे य की मृत्यु कारित करता है। यहाँ यद्यपि ख वह अपराध करने के लिए। विधि अनुसार समर्थ नहीं था, तथापि क उसी प्रकार से दण्डनीय है, मानो ख वह अपराध करने के लिए विधि-अनुसार समर्थ हो और उसने हत्या की हो, और इसलिए क मृत्युदण्ड से दण्डनीय है। (ग) ख को एक निवासगृह में आग लगाने के लिए क उकसाता है। ख चित्तविकृति के परिणामस्वरूप उस कार्य की प्रकृति रा यह कि वह जो कुछ कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है जानने में असमर्थ होने के कारण क के उकसाने के परिणामस्वरूप उस गृह में, आग लगा देता है। ख ने कोई अपराध नहीं किया है, किन्तु क एक निवासगृह में आग लगाने के अपराध के दुष्प्रेरण का दोषी है, और उस अपराध के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है। (घ) क चोरी कराने के आशय से य के कब्जे में से य की सम्पत्ति लेने के लिए ख को उकसाता है। ख को यह विश्वास करने के लिए क उत्प्रेरित करता है कि वह सम्पत्ति क की है। ख उस सम्पत्ति को इस विश्वास से कि वह क की सम्पत्ति है, य के कब्जे में से सद्भावपूर्वक ले लेता है। ख इस भ्रम के अधीन कार्य करते हुए उसे बेईमानी से नहीं लेता, और इसलिए चोरी नहीं करता, किन्तु क चोरी के दुष्प्रेरण का दोषी है, और उसी दण्ड से दण्डनीय है, मानो ख ने चोरी की हो। स्पष्टीकरण 4-अपराध का दुष्प्रेरण अपराध होने के कारण, ऐसे दुष्प्रेरण का दुष्प्रेरण भी अपराध है। दृष्टान्त ग को य की हत्या करने को उकसाने के लिए ख को क उकसाता है। ख तदनुकूल य की हत्या करने के लिए ग को उकसाता है और ख के उकसाने के परिणामस्वरूप ग उस अपराध को करता है। ख अपने अपराध के लिए हत्या के दण्ड से दण्डनीय है, और क ने उस अपराध को करने के लिए ख को उकसाया, इसलिए क भी उसी दण्ड से दण्डनीय है। स्पष्टीकरण 5-षड़यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण का अपराध करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरक उस अपराध को करने वाले व्यक्ति के साथ मिलकर उस अपराध की योजना बनाए। यह पर्याप्त है कि वह उस षड़यंत्र में सम्मिलित हो जिसके अनुसरण में वह अपराध किया जाता है। दृष्टान्त य को विष देने के लिए क एक योजना ख से मिलकर बनाता है। यह सहमति हो जाती है कि क विष देगी। ख तब यह वर्णित करते हुए ग को वह योजना समझा देता है कि कोई तीसरा व्यक्ति विष देगा, किन्तु क का नाम नहीं लेता। ग विष उपास करने के लिए सहमत हो जाता है, और उसे उपाप्त करके समझाए गए प्रकार से प्रयोग में लाने के लिए ख को परिदत्त करता है। क विष देता है, परिणामस्वरूप य की मृत्यु हो जाती है। यहाँ यद्यपि क और ग ने मिलकर षड़यंत्र नहीं रचा है, तो भी ग उस षड़यंत्र में सम्मिलित रहा है, जिसके अनुसरण में य की हत्या की गई है। इसलिए ग ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है और हत्या के लिए दण्ड से दण्डनीय है। टिप्पणी दुष्प्रेरण के अपराध के मामलों में वास्तविक अपराध कारित होने के पूर्व दुष्प्रेरक द्वारा सक्रिय साजिश आवश्यक है। दुष्प्रेरक अपराध कारित करने में प्रमुख अपराधी को यथार्थतः सहायता करे। धारा 108, खण्ड 1 “दुष्प्रेरक” शब्द को परिभाषित करता है। दुष्प्रेरक का अर्थ है (क) एक व्यक्ति जो किसी अपराध के लिये किये जाने का दुष्प्रेरण करता है, या (ख) एक व्यक्ति जो ऐसे कार्य के किये जाने का दुष्प्रेरण करता है जो अपराध होता, यदि वह कार्य किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाता जो शारीरिक अथवा मानसिक असमर्थता से युक्त न हो। दुष्प्रेरण क्या है, इसे धारा 107 में ही स्पष्ट कर दिया गया है। अत: दुष्प्रेरक वह व्यक्ति जो धारा 107 के अर्थ के अन्तर्गत एक षड्यंत्र करता है, उकसाता है या उसमें सहायता पहुँचाता है अथवा उसमें हिस्सा लेता है। उपरोक्त वर्णित श्रेणी ख के अन्तर्गत आने वाले दुष्प्रेरक को एक दृष्टान्त के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है। यदि अ, एक विक्षिप्त व्यक्ति ब को उकसाता है कि वह स को मार डाले। स को ब मार डालता है। यहाँ ब विक्षिप्त होने के कारण इस संहिता की धारा 84 के अन्तर्गत क्षम्य होगा और हत्या का दोषी नहीं माना जायेगा किन्तु अ तब भी दुष्प्रेरण के अपराध का दोषी होगा, क्योंकि उसने अपराध किये जाने के लिए दुष्प्रेरित किया था जो यदि विक्षिप्त व्यक्ति द्वारा न किया गया होता तो एक अपराध हुआ होता। अपराध का मात्र पश्चात्वर्ती ज्ञान दुष्प्रेरण नहीं गठित करता ।36 दुष्प्रेरण एक स्वतन्त्र अपराध है। अत: दुष्प्रेरक की सजा कर्ता अथवा दुष्प्रेरित व्यक्ति की सजा पर निर्भर नहीं करती 37 एक व्यक्ति जो प्रमुख अपराधी के रूप में दण्डित हुआ है। दुष्प्रेरक के रूप में भी दण्डित नहीं हो सकता।28। स्पष्टीकरण 1- यह स्पष्टीकरण यह स्पष्ट करता है कि यदि एक लोक-सेवक किसी दायित्व के अवैध लोप का दोषी है जो इस संहिता द्वारा दण्डनीय घोषित किया गया है और एक गैर सरकारी आदमी उसे वैध दायित्व का निर्वहन न करने के लिये उकसाता है या सहायता पहुँचाता है तो यह कहा जायेगा कि उसने उस अपराध का दुष्प्रेरण किया है जिसका कि वह लोक-सेवक दोषी है यद्यपि दुष्प्रेरक गैर सरकारी आदमी होने के कारण उस दायित्व के अवैध लोप का दोषी स्वयं नहीं हो सकता था। स्पष्टीकरण 2-इस स्पष्टीकरण के दो भाग हैं। प्रथम भाग के अनुसार अपराध पूर्ण है भले ही दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरित कार्य को करने से इन्कार कर देता है या उसे पूर्ण करने से अनैच्छित रूप से विफल रहता है या कार्य करता तो है परन्तु अपेक्षित परिणाम नहीं उत्पन्न होता। उकसाने के माध्यम से दुष्प्रेरण का अपराध टपेरक के आशय पर निर्भर करता है न कि दुष्प्रेरित व्यक्ति द्वारा यथार्थत: किये गये कार्य पर 39 द्वितीय भाग के अनसार दुष्प्रेरण का अपराध गठित करने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि अपराध गठित करने हेत। आवश्यक प्रभाव कारित होना चाहिये। । दन्त (ख) इस स्थिति को अच्छी प्रकार स्पष्ट करता है। इस दृष्टान्त में ख उकसाहट के अनुसरण में घ को विद्ध करता है तथा घ का घाव अच्छा हो जाता है। क ने ख को घ की हत्या के लिये उकसाया था।
  1. मुलाजिम तिवारी, (1961) 2 क्रि० लॉ ज० 266.
  2. शमीरउद्दीन (1865) 2 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 40.
  3. । मारुती दादा, (1875) 1 बम्बई 15.
  4. जीत चौधरी, (1865) 4 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 23. |
  5. इमामदी भूया (1973) 21 डब्ल्यू आर० (क्रि०) 8.
चूँकि घ का घाव अच्छा होता है, अत: यह स्पष्ट है कि हत्या का अपराध गठित करने हेतु आवश्यक प्रभाव कारित नहीं हुआ था किन्तु तब भी हत्या कारित करने के लिये ख को उकसाने का दोषी है। अत: किसी। अपराध को दुष्प्रेरित किया जा सकता है, यद्यपि प्रयोग के लिये आशयित तरीके ऐसे हो सकते हैं जिनके द्वारा। अपराध गठित करने हेतु आवश्यक परिणाम का उत्पन्न होना सम्भव न हो।40 एक प्रकरण में अभियुक्त ने स। को इस प्रयोजन से रुपया दिया कि वह ब को मन्त्र द्वारा य को मार डाले या उसे अपंगु बना दे। यह स के निर्णय पर छोड़ दिया गया कि वह ब को मार डालेगा या उसे अपंग बनायेगा। ब को मार डाला गया ।। अभियुक्त हत्या के दुष्प्रेरण का दोषी होगा 41 । । अ झूठी साक्ष्य देने हेतु ब को उकसाता है। ब झूठी साक्ष्य नहीं देता है। इस मामले में अ, ब को झूठी साक्ष्य देने के लिये उकसाने के कारण दुष्प्रेरण का दोषी होगा। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 108 की व्याख्या 2 के अनुसार दुष्प्रेरण का अपराध गठत करने हेतु दुष्प्रेरित कार्य का वास्तव में किया जाना आवश्यक नहीं है। अतएव चाहे ब ने झूठी साक्ष्य नहीं भी दिया तब भी अ दुष्प्रेरण का अपराधी होगा। स्पष्टीकरण 3-इस स्पष्टीकरण के अनुसार यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरित व्यक्ति का आपराधिक आशय रहा हो या उसे उसका ज्ञान रहा हो, वह विधि के अनुसार अपराध कारित करने के लिये समर्थ भी नहीं हो सकता है । इसके अतिरिक्त उसका भी वही दूषित आशय या ज्ञान नहीं हो सकता जो कि दुष्प्रेरक का है। अत: सम्पूर्ण बल दुष्प्रेरक की आपराधिकता तथा आपराधिक आशय पर दिया जाता है न कि दुष्प्रेरित व्यक्ति पर। दुष्प्रेरित व्यक्ति बिना किसी आपराधिक आशय अथवा ज्ञान के भी कार्य कर सकता है या अपराध गठित करने के लिये आवश्यक आशय को निर्मित करने में वह सक्षम नहीं हो सकता, फलतः वह दण्डनीय नहीं होगा। इसके बावजूद भी वह उकसाने के कारण दुष्प्रेरक की हैसियत से दण्डनीय होगा भले ही दुष्प्रेरित व्यक्ति दण्डित न हुआ हो।42 दृष्टान्त घ इसे पूर्णतः स्पष्ट करता है कि दुष्प्रेरण करने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरित व्यक्ति ने अपराध कारित किया हो तथा दण्डित हुआ हो। दृष्टान्त ‘ख’, ‘ग’ तथा ‘घ’ से यह भी स्पष्ट है कि यदि कोई व्यक्ति एक निर्दोष अभिकर्ता (innocent agent) द्वारा कोई कार्य करता है जो अपराध है तो नियोजक (Employer) दण्डित होगा भले ही अभिकर्ता दण्डित न हो। अभिकर्ता, इसलिये दण्डित नहीं होगा क्योंकि उसमें आपराधिक आशय निर्मित करने हेतु आवश्यक क्षमता का, अपरिपक्वता, चित्त-विकृतता अथवा तथ्य के भ्रम के कारण का अभाव था। | यह स्पष्टीकरण, उकसाना, सहायता या षड्यंत्र सभी प्रकार के दुष्प्रेरण को लागू होता है। स्पष्टीकरण 4- यह स्पष्टीकरण, यह स्पष्ट करता है कि किसी अपराध का दुष्प्रेरण स्वत: एक अपराध है। एक अपराध का दुष्प्रेरण भारतीय दण्ड संहिता की धारा 40 के अन्तर्गत भी एक अपराध है। अतः दुष्प्रेरण का दुष्प्रेरण भी एक अपराध है। इस स्पष्टीकरण से जुड़ा दृष्टान्त इस स्थिति को पूर्णतया प्रदर्शित करता है। फिर भी पदावली किसी अपराध का दुष्प्रेरण एक अपराध होता है, का यह अर्थ नहीं है कि जब किसी अपराध का दष्प्रेरण यथार्थत: कारित होता है, तभी जो दुष्प्रेरण के अपराध को दुष्प्रेरित करता है, दंडित होगा। उसका साधारण अर्थ यह है कि जब इस संहिता में दी गई परिभाषा के अनुसार दुष्प्रेरण का अपराध गठित होता है तभी ऐसे दुष्प्रेरण के दुष्प्रेरण का अपराध गठित होता है। इसे एक दृष्टान्त द्वारा अच्छी प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है। अ, ब को उकसाता है कि वह स को उकसाये ताकि वह द की हत्या कर दे। ब. स को नहीं उकसाता है या उसे उकसाने से इन्कार कर देता है फिर भी अ दुष्प्रेरण के लिये दंडनीय होगा। एक प्रकरण में अ ने ब को इसलिये 50 रुपये दिया कि वह उन रुपयों को स को घूस के रूप में दे दे। स एक मेडिकल आफिसर था। ब ने स को रुपया नहीं दिया। अ ने ब के विरुद्ध आपराधिक दुर्विनियोग (criminal misappropriation) का मुकदमा चलाया जिसमें ब को सजा हो गयी। तत्पश्चात् अ को ब द्वारा एक लोकसेवक को घूस देने के दुष्प्रेरण के लिये अभियोजित किया गया। अ इस संहिता की धारा 110 तथा धारा 116 के अन्तर्गत दुष्प्रेरण के अपराध के लिये दोषी पाया गया, यद्यपि ब ने स को दुष्प्रेरित नहीं किया।
  1. साहिब दित्ता, (1885) पी० आर० नं० 20 सन् 2025.
  2. साहिब दित्ता, (1885) पी० आर० नं० 20 सन् 1885.
  3. खुशी मुहम्मद, (1940) 42 पी० एल० आर० 447. ।
था।43 दुष्प्रेरण का दुष्प्रेरण भी एक अपराध है भले ही दूसरा दुष्प्रेरण निष्क्रिय रहा हो।44 अत: एक तीसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप द्वारा कोई व्यक्ति अपने आप को दुष्प्रेरक बना सकता है भले ही उसके तथा कार्य करने हेत नियोजित व्यक्ति के बीच कोई सीधा सम्पर्क न रहा हो। उपरोक्त वर्णित दृष्टान्त में अ तथा स के बीच कोई सीधा सम्पर्क नहीं था। स वह व्यक्ति था जिसके माध्यम से इच्छित कार्य पूरा किया जाना था। ब, दुष्प्रेरक अ तथा नियोजित व्यक्ति स के बीच एक तीसरा आदमी था। | मुसम्मात बख्तावर45 के वाद में अभियक्त ने एक मेडिकल प्रैक्टिशनर द तथा उसके पडोसी से एक ५वा मागा जिससे वह अपने दामाद (son-in-law) की मृत्यु कारित कर दे। द ने उसे दवा दे दिया। यह निर्णय दिया गया कि द दुष्प्रेरण के लिये दण्डित होगी, क्योंकि उसने अभियुक्त को अपने दामाद की हत्या करने के लिये प्रेरित किया था। । इसी प्रकार यदि अ टेलीफोन द्वारा ब को सचित करता है कि वह अनैतिक प्रयोजन हेतु दो लड़कियाँ उपलब्ध कराये। किसी लड़की का नाम नहीं लिया गया था। यहाँ अ, ब को उकसाता है कि वह अपराध कारित करने के प्रयोजन से लड़कियों को उकसाये। अत: एक दुष्प्रेरक के रूप में दण्डित होगा। | अ ब को उकसाता है कि वह स को द की हत्या करने के लिये उकसाये। इसके परिणामस्वरूप ब एक पत्र स को द की हत्या करने के लिये उकसाते हुये लिखता है। स पत्र को पढ़ता नहीं है। इस मामले में अ हत्या के दुष्प्रेरण हेतु दोषी है परन्तु ब केवल हत्या को दुष्प्रेरित करने के प्रयत्न का दोषी है क्योंकि उसने द की हत्या करने को उकसाये हुये स को पत्र लिखा है परन्तु स ने उस पत्र को पढ़ा नहीं है। जब तक कि उकसाने वाली बात स के ज्ञान में नहीं आ जाती तब तक ब हत्या के दुष्प्रेरण का दोषी नहीं कहा जा सकता है। अतएव ब केवल हत्या के दुष्प्रेरण के प्रयत्न के लिये दायित्वाधीन होगा। स्पष्टीकरण 5- यह स्पष्टीकरण षड्यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण को लागू होता है। इसके अनुसार यह आवश्यक नहीं है कि षड्यंत्र में सम्मिलित प्रत्येक व्यक्ति षड्यंत्र के प्रत्येक भेद से परिचित हो या उसके प्रत्येक विवरण को जानता हो। षड्यंत्र में अनेक व्यक्ति भागीदार हो सकते हैं और उनमें से प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग कार्य करता है। यह सम्भव है कि उनमें से कुछ को उसके विवरण का ज्ञान न हो किन्तु यदि वे षड्यंत्र में हिस्सा लेते हैं जिसके अनुसरण में अपराध होता है तो प्रत्येक व्यक्ति दण्डित होगा। यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरक अपराध करने वाले व्यक्ति के साथ विचार-विमर्श करे। यह तथ्य इस स्पष्टीकरण से जुड़े दृष्टान्त द्वारा स्पष्ट किया गया है। इसे एक अन्य दृष्टान्त द्वारा भी स्पष्ट किया जा सकता है। अ तथा ब आपस में यह तय करते हैं कि जालसाजी के प्रयोजन से वे एक फ्लैट तैयार करेंगे। अ ने स को प्लेट बनाने का मात्र आदेश दिया। स ने ब को उस समय तक कभी नहीं देखा जब तक कि प्लेट नहीं बन गई। यहाँ अ तथा ब दोनों ही दण्डित किये किये जायेंगे यद्यपि ब, निर्दोष अभिकर्ता स के बारे में कुछ भी नहीं जानता था।47 108-क. भारत से बाहर के अपराधों का भारत में दुष्प्रेरण- वह व्यक्ति इस संहिता के अर्थ के अन्तर्गत अपराध का दुष्प्रेरण करता है, जो भारत से बाहर और उससे परे किसी ऐसे कार्य के किए जाने का भारत में दुष्प्रेरण करता है, जो अपराध होगा, यदि भारत में किया जाए। दृष्टान्त क, भारत में ख को, जो गोआ में विदेशीय है, गोआ में हत्या करने के लिए उकसाता है। क हत्या के दुष्प्रेरण का दोषी है। टिप्पणी यह धारा भारत से बाहर रहते हुये किसी भारतीय नागरिक द्वारा किसी विदेशी क्षेत्र में अपराध का। दुष्प्रेरण करने पर उसे दण्डनीय बनाती है। इस धारा के प्रवर्तन के लिये यह भी आवश्यक है कि दुष्प्रेरित अपराध निश्चयतः भारत में अपराध गठित करे यदि वह भारत में कारित किया गया हो।
  1. प्राविंसियल गवर्नमेंट सी० पी० एंड वेरार बनाम मुरलीधर, (1942) एन० एल० जे० 104.
  2. राजा रत्नम, (1951) मद्रास 626.
  3. (1882) पी० आर० नं० 24 सन् 1882.
  4. बेन्टले (1923) 1 के० बी० 403.
  5. वुल (1845) 1 काक्स 281.
यह दृष्टान्त अब अप्रचलित (obsolete) हो गया है। अत: इसे एक दूसरे दृष्टान्त द्वारा स्थानापन्न कर दिया जाना चाहिये, क्योंकि गोवा अब भारतीय क्षेत्र का एक भाग है, अत: वह अब भारत के बाहर नहीं है।

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