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Indian Penal Code 1860 Introduction LLB 1st Year Notes

Indian Penal Code 1860 Introduction LLB 1st Year Notes:- Indian Penal Code 1860 As you all know that for any kind of crime committed by an Indian citizen, the Indian Penal Code 1860 was the Chief Ordinance. Indian Penal Code LLB 1st year 1st semester is asked as a paper. Today we are going to tell you in this post LLB Notes Study Material PDF Download in Hindi English, which can fulfill the dream of becoming a lawyer by reading to you. For the LLB Notes Site you have been sharing our post every day. Our website is a very useful website for getting Law Notes for Students PDF. You have been updating our website for KUK Law Notes and Best Law Notes. LLB Notes in Hindi Medium Our website is very important for candidates.  

दण्ड संहिता, 1860 (INDIAN PENAL CODE, 1860) ( अधिनियम संख्या 45 सन् 1860)

(Act No. XLV of 1860)

(6 अक्टूबर सन् 1860 को गवर्नर-जनरल ने अनुमति प्रदान किया)।

अध्याय 1

प्रस्तावना

(INTRODUCTION)

उद्देशिका- भारत के लिए एक साधारण दण्ड संहिता का उपबन्ध करना समीचीन है, अत: यह निम्नलिखित रूप में अधिनियमित किया जाता है
  1. संहिता का नाम और उसके प्रवर्तन का विस्तार- यह अधिनियम भारतीय दण्ड संहिता कहलाएगा और इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर होगा।
टिप्पणी आपराधिक विधि का इतिहास-भारत में आपराधिक विधि के इतिहास का अध्ययन तीन भागों में सरलता से किया जा सकता है। ये हैं-(1) प्राचीन हिन्दू आपराधिक विधि; (2) मुस्लिम आपराधिक विधि; (3) इंग्लिश आपराधिक विधि। (1) प्राचीन हिन्दू आपराधिक विधि- प्राचीन समुदायों की आपराधिक विधि वास्तव में आपराधिक विधि नहीं थी। यह सदोष विधि1 थी क्योंकि उन दिनों दोष को अपकृत्य (Torts) तथा अपराध (Crimes) में वर्गीकृत नहीं किया गया था। तब अपराध के तत्व के रूप में सदोष आशय की आवश्यकता नहीं थी। आधुनिक समय में प्रचलित दो प्रकार के दोषों में दिये जाने वाले दण्डों में भी उन दिनों कोई महत्वपूर्ण अन्तर नहीं था। आपराधिक विधि का यह स्वरूप लगभग विश्व ही हर प्रणाली (System) में मिलती है। परन्तु प्राचीन हिन्दू आपराधिक विधि इससे भिन्न थी। हिन्दू विधि में अपराध के लिये दिया जाने वाला दण्ड दोष के लिये दिये जाने वाले प्रतिकर Compensation) से अधिक महत्वपूर्ण था। यद्यपि कुछ परिस्थितियों में दोषकर्ता प्रतिकर देने के लिये बाध्य होता था किन्तु यह प्रतिकर या तो दण्ड के अतिरिक्त होता था या उसके बदले में 2 पाश्चात्य आपराधिक विधिशास्त्र के अन्तर्गत अभियुक्त को दण्डित करने का अधिकार वैयक्तिक होता था और यह अधिकार मध्यकालीन युग में आकर ही समाज को सौंपा गया तथा बाद में राज्य को। किन्तु प्राचीन हिन्दू विधि के अनुसार यह राजा का कर्तव्य था कि वह अपराधी को दण्डित करे। यद्यपि हिन्दू विधिवेत्ताओं ने सिविल दोष तथा अपराध में स्पष्ट विभेद नहीं किया था फिर भी विभिन्न प्रकार के दण्ड तथा प्रक्रियायें जो उन लोगों ने निर्धारित की थीं उनसे यह स्पष्ट होता है कि उन्हें यह ज्ञात था कि किसी कृत्य का आपराधिक स्वरूप उसके सिविल स्वरूप से किस प्रकार भिन्न था। मुस्लिम आपराधिक विधिइस देश पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् मुस्लिम विजेताओं ने मुस्लिम आपराधिक विधि को यहाँ पर लागू किया तथा भारतीय न्यायालयों ने न्याय प्रशासन के लिये इसे अपनाया।

  1. सेन, एन्सियन्ट लॉ।
  2. सेन, पी० एन० : हिन्दू जुरिस्पूडेन्स, अध्याय 12.
  3. सेन० पी० एन० : हिन्दू जुरिस्मुडेन्स, अध्याय 12
मुस्लिम विधि कुरान या हदीस पर आधारित थी इज्मा 79 या हदीस पर आधारित थी, इज्मा तथा कियास द्वारा इसका विकास हुआ। विधि को स्पष्ट करने तथा व्यक्त करने का दायित्व काजियों पर था। | अपराध को दो भागों में बांटा गया था—(1) ईश्वर के विरुद्ध अपराध जैसे जाता 1) ईश्वर के विरुद्ध अपराध जैसे जारता (adultery), तथा शराबखोरी (Drunkenness) और, (2) व्यक्ति के विरुद्ध अपराध जैसे हत्या (murdu) व्यक्ति के विरुद्ध अपराध जैसे हत्या (murder), लूट (robbery) – ईश्वर के विरुद्ध किये गये अपराध को सार्वजनिक अपराध माना गया। अत: दोषी, समाज द्वारा टडित किया जाता था। व्यक्तियों के विरुद्ध अपराधों को वैयक्तिक दोष कहा जाता था तथा दोषकर्ता, क्षतिग्रस्त व्यक्ति द्वारा दण्डित किया जाता था। अधिकतर मामलों में अपराध क्षतिग्रस्त व्यक्ति के विरुद्ध दोष है, राज्य के विरुद्ध नहीं। अतः अभियोजन का कार्य व्यक्ति विशेष द्वारा सम्पादित होता था। मुस्लिम विधि में चार प्रकार के दण्डों को स्वीकार किया गया था-(1) किसास (retaliation), (2) faya (blood money), (3) FE (defined punishment which could neither be increased nor reduced) तथा (4) ताजेर तथा सियासा (discretionary and exemplary punishment) । साक्ष्य के नियम भी दोषयुक्त थे। उनमें से कुछ प्राकृतिक न्याय (natural justice) के विरुद्ध था। आपराधिक प्रकरणों के विचारण में न्यायालयों द्वारा अनुपालनीय प्रक्रिया भी असंतोषजनक थी। कुछ प्रकरणों में विधि इतना अधिक दोषमुक्त थी कि किसी भी सभ्य सरकार के लिये उसे लागू करना असम्भव था। उदाहरण के लिये, यदि किसी मामले में कोई मुसलमान प्रभावित हो रहा है तो किसी गैर मुस्लिम द्वारा किया गया साक्ष्य स्वीकार नहीं किया जाता था। इसी प्रकार यौन अपराधों (Sexual offences) के लिये पत्थरों से पिटाई या चोरी के मामले में अंग-भंग ऐसे दण्ड थे जिन्हें कार्यान्वित करना लगभग असम्भव था। इंगलिश आपराधिक विधि (English Criminal Law)-जिस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय उपनिवेश का प्रशासन अपने हाथ में लिया, जहाँ मुस्लिम आपराधिक विधि लागू थी। सन् 1765 में कम्पनी ने, तीन प्रान्तों बंगाल, बिहार, उड़ीसा की निजामत अपने हाथ में ले लिया। शुरू-शुरू में उन लोगों ने यथास्थिति बनाये रखने की नीति को अपनाया। शनैः शनै मुस्लिम आपराधिक विधि के दोष स्पष्ट होते गयेऔर उनको दूर करने के उपाय किये जाने लगे। इस दिशा में पहला प्रयास वारेन हेस्टिंग्स द्वारा किया गया जिन्होंने डकैती के लिये दिये जाने वाले अंग-भंग की सजा को समाप्त करने का प्रयास किया। लार्ड कार्नवालिस ने भी कुछ महत्वपूर्ण आपराधिक सुधार किये। मानव वध (Homicide) के अपराध को बदल दिया गया तथा हत्या अब वैयक्तिक अपराध नहीं रह गया। लूट झूठी गवाही (Perjury) तथा हत्या से सम्बन्धित विधियों को भी बदल दिया गया। दण्ड को यथोचित बनाने का प्रयास किया। इसके लिये अपराध एवं दण्ड में साम्य स्थापित किया गया। सन् 1832 का एक विनियम यह निर्धारित किया कि विनियम के अधीन किसी मामले के विचारण (Trial) में एक गैर मुस्लिम आपराधिक विधि के अन्तर्गत विचारण से मुक्ति की मांग कर सकता है। परन्तु मुस्लिम आपराधिक विधि में किये गये परिवर्तन सभी प्रेसीडेंसियों (Presidencies) में एक जैसे नहीं लागू होते थे। अधिकतर परिवर्तन मात्र बंगाल में लागू होते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि अलग-अलग सूबों में अलग-अलग नियम लागू होने लगे। ये बुराइयाँ या कमियाँ स्पष्ट रूप से उभर कर उस समय सामने आयीं जब सारे प्रान्तों को केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण में लाया गया। अतः एक आयोग की नियुक्ति की गयी जिसका उद्देश्य था परस्पर विरोधी नियमों की जाँच कर उनमें आवश्यक परिवर्तन सुझाना। । बाद में यह महसूस किया गया कि सन्तोषजनक सुधार अलग-अलग अधिनियमों द्वारा नहीं किया जा सकता। सधार के लिये एक दण्ड संहिता को आवश्यक समझा गया। बम्बई प्रान्त में गवर्नर एल्फिन्सटन के नेतत्व में एक दण्ड संहिता बनायी गयी जिसे एल्फिन्सटन संहिता (Elphinstone Code) के नाम से जाना। जाता था। यह संहिता संक्षिप्त, और खाके के रूप में थी तथा इसमें कुल 41 धारायें थीं। सन् 1844 में पंजाब चात (Phiab Province) में उसके विलीनीकरण के बाद एक अलग संहिता तैयार की गयी। ये सभी । सहितायें अलग-अलग प्रान्तों के लिये थीं।। सन 1833 के चार्टर अधिनियम (Charter Act of 1833) द्वारा सम्पूर्ण भारत के लिये एक विधानांग (Legislature) का सृजन किया गया। गवर्नर जनरल की कौंसिल में विधिसट गया विधि आयोग (Law Commission) की नियुक्ति के लिये भी नियम बनाये गये। प्रथम विधि आयोग सन् 1834 में तत्कालीन विधि सदस्य लार्ड मैकाले के नेतृत्व में नियुक्त हुआ। सर्वश्री मैक्लीयोड, एन्डरसन तथा मिलेट आयोग के अन्य सदस्य थे। आयोग ने भारत के लिये एक ड्राफ्ट दण्ड संहिता तैयार किया जिसे गवर्नर जनरल की कौंसिल में 14 अक्टूबर, सन् 1837 को पेश किया गया। इसमें सर बार्नेस पीकाक, सर जे० डब्ल्यू० कोलविले तथा बहुत से अन्य सदस्यों द्वारा संशोधन किया गया। इसका पूरा ड्राफ्ट सन् 1850 में बनकर तैयार हुआ और इसे लेजिस्लेटिव कौंसिल में सन् 1856 में पेश किया गया। यह बिल 6 अक्टूबर, सन् 1860 को पारित हो गया। उसी दिन इसे गवर्नर जनरल की अनुमति प्राप्त हो गयी। इस प्रकार यह सन् 1860 की भारतीय दण्ड संहिता बना। एक जनवरी, सन् 1862 में इसका प्रवर्तन (operation) आरम्भ हो गया। समीक्षा (Critique)-मुगल शासन के दौरान न्यायालय मुस्लिम आपराधिक विधि को लागू करते थे। हिन्दू विधि लगभग पूर्णरूप से अपवर्जित थी। परन्तु मुस्लिम आपराधिक विधि का स्थान धीरे-धीरे इंगलिश आपराधिक विधि ने ले लिया। ऐसा भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश प्रभाव फैलने के कारण हुआ। सन् 1860 के पूर्व अनेक अधिनियमों द्वारा संशोधित इंग्लिश आपराधिक विधि तीन प्रेसीडेन्सी नगरों, बम्बई, कलकत्ता तथा मद्रास में लागू होती थी। परन्तु मोफस्सिल में आपराधिक न्याय प्रशासन मुख्यतः मुस्लिम आपराधिक विधि द्वारा प्रभावित था। मुस्लिम विधि के महत्वपूर्ण दोषों को स्थानीय सरकार के विनियमों द्वारा दूर कर दिया गया। सन् 1827 में बम्बई की न्याय व्यवस्था को संशोधित किया गया तथा आपराधिक विधि को विनियम द्वारा लागू किया गया। परन्तु अन्य दो प्रेसीडेन्सी टाउन्स, कलकत्ता तथा मद्रास में मुस्लिम विधि सन् 1860 तक लागू होती रही जब उसे अन्तिम रूप से भारतीय दण्ड संहिता द्वारा प्रतिस्थापित किया गया। शीर्षक (Title)—किसी अधिनियम का शीर्षक उसका एक महत्वपूर्ण भाग होता है तथा इसके सामान्य विस्तार को विनिश्चित करने हेतु तथा इसकी विरचना पर प्रकाश डालने हेतु इसका हवाला दिया जा सकता है। यद्यपि यह अधिनियम के स्पष्ट अर्थ को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।। उद्देशिका (Preamble)-किसी अधिनियम की उद्देशिका उसके उद्देश्य का वर्णन करती है। इस अधिनियम का उद्देश्य सम्पूर्ण भारत के लिये सामान्य दण्ड संहिता प्रदान करना। यद्यपि इस अधिनियम का उद्देश्य सम्पूर्ण भारत के लिये सामान्य दण्ड संहिता प्रदान करता है, किन्तु यह अधिनियम सन् 1862 में प्रचलित आपराधिक विधियों को निरस्त (repeal) नहीं करती। ऐसा इसलिये है क्योंकि संहिता में सभी अपराधों को शामिल नहीं किया गया है और यह सम्भव है कि अभी भी कुछ अपराध दायरे के बाहर रह गये हों और उनको दाण्डिक परिणामों से मुक्त करने का कोई आशय न रहा हो। यह संहिता इस विषय पर सम्पूर्ण विधि को समेकित (consolidate) करती है पर जिन विषयों पर यह विधि निर्धारित करती हैं पूर्णरूप में विस्तृत हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि दण्ड संहिता अपराधों का एक विस्तृत तथा वे पूर्ण कोश हैं और इसमें वर्जित अपराधों के अलावा अन्य अपराधों के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। इस संहिता के अतिरिक्त बहुत से आपराधिक अधिनियम हैं जिनमें अनेक अपराधों का वर्णन है। साधारण तौर पर अधिनियम को पारित करते समय विधानांग (legislature) के उद्देश्य और उसके आशय का वर्णन करती हैं, और यदि अस्पष्टता को सुलझाने या जहाँ शब्दों के कई अर्थ हैं वहाँ उनके अर्थ को विनिश्चित करने या जहाँ अधिनियमित हिस्सों में किसी प्रकार का सन्देह है वहाँ इसके प्रभाव को वास्तविक विचार के अन्दर सीमित रखने हेतु इसकी सहायता ली जा सकती है। किन्तु उद्देशिका अधिनियमित हिस्सों को सीमित या विस्तृत या संशोधित नहीं कर सकती है जब अधिनियम की भाषा या उसका उद्देश्य या उसका क्षेत्र विस्तार निश्चित हो और उसमें किसी प्रकार का सन्देह न हो6 अधिनियम के अर्थ को समझने या अधिनियम को पारित करते समय उसके सामान्य उद्देश्य और विधानांग के आशय जो जानने हेतु संविधि (statute) की उद्देशिका पर निर्भर हुआ जा सकता है। किसी भी अस्पष्टता को सुलझाने हेतु इसकी सहायता
  1. आश्विन कुमार, ए० आई० रा० 1952 सु० को० 369; पोपट लाल शाह, ए० आई० आर० 1953, सु० को० 274.
  2. मैक्सवेल, इन्टर प्रिटेशन आफ स्टेट्यूट्स (7वाँ संस्करण), पृ० 37.
  3. उपरोक्त सन्दर्भ पृ० 39.
ली जा सकती है। अधिनियम को बनाने वालों के मस्तिष्क को समझने के लिये यह कुन्जी का कार्य करती है। अधिनियमित हिस्सों में उत्पन्न किसी अस्पष्टता को सुलझाना ही उद्देशिका का कार्य है न कि उसे उत्पन्न करना। | संहिता का प्रवर्तन (Operation of the Code)-भारतीय दण्ड संहिता का जम्मू और कश्मीर राज्य को छोड़कर सम्पूर्ण भारत पर विस्तार होगा। दण्ड संहिता की धारा 18 ‘भारत’ शब्द को परिभाषित करती है। जिसका अर्थ है जम्मू और कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत। भारत की सीमा संविधान की धारा 1(3) द्वारा परिभाषित है। इसमें (क) राज्यों की क्षेत्र सीमाएँ, (ख) संविधान की प्रथम अनुसूची में वर्णित केन्द्र शासित प्रदेशों की परिसीमायें, और (ग) अन्य कोई परिसीमाएं जिन्हें अर्जित किया जाए शामिल हैं। भारतीय जल भी भारतीय परिसीमा का अंश है। अत: यदि कोई अपराध भारत की जल सीमा के अन्दर घटित होता है। तो माना जायेगा कि अपराध भारत में ही घटित हुआ है। ।
  1. भारत के भीतर किए गए अपराधों का दण्ड- हर व्यक्ति इस संहिता के उपबन्धों के प्रतिकूल हर कार्य या लोप के लिए, जिसका वह भारत के भीतर दोषी होगा, इसी संहिता के अधीन दण्डनीय होगा, अन्यथा नहीं।
टिप्पणी भारत के आपराधिक न्यायालय अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग इसलिये करते हैं कि या तो कोई अपराध किसी व्यक्ति, देशी या विदेशी द्वारा भारत की सीमा के अन्दर किया गया है या तो 3 पराध भारत की सीमा के बाहर किसी भारतीय द्वारा कारित किया गया है। पहले वाले को अन्त:प्रादेशिक क्षेत्राधिकार (Intraterritorial jurisdiction) तथा बाद वाले को बहिर्जादेशिक क्षेत्राधिकार (Extra-territorial Jurisdiction) कहते हैं। क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं (1) प्रादेशिक क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) .(2) वैयक्तिक क्षेत्राधिकार (Personal Jurisdiction)
  1. प्रादेशिक क्षेत्राधिकार-जहाँ कोई अपराध भारत की परिसीमा के अन्दर घटित होता है, संहिता लागू होगी और न्यायालय इस तथ्य पर ध्यान दिये बिना कि अपराधी भारतीय नागरिक है या विदेशी, विचारण कर दण्ड दे सकती है। इसे प्रादेशिक क्षेत्राधिकार कहते हैं क्योंकि इसमें अपराध न्यायालय के सम्मुख इसलिये लाया जाता है क्योंकि वह भारत की परिसीमा के अन्दर घटित होता है, जहाँ क्षेत्राधिकार परिसीमा से जुड़ा रहता है। संहिता किसी भी ऐसे अपराध में लागू होगी जो
(1) भारतीय परिसीमा के भीतर जैसा कि संविधान की धारा 1(3) में परिभाषित है। (2) भारतीय जलसीमा के भीतर, और (3) किसी भी जहाज पोत या विमान एयर क्राफ्ट जो या तो भारत का हो या भारत में पंजीकृत (Registered) हो, घटित हुआ हो। प्रादेशिक क्षेत्राधिकार भी दो प्रकार के होते हैं (क) अन्तः प्रादेशिक क्षेत्राधिकार (Intra territorial Jurisdiction), (ख) बहिर्जादेशिक क्षेत्राधिकार (Extra territorial Jurisdiction), अन्तः प्रादेशिक क्षेत्राधिकार वह है जिसमें किसी व्यक्ति द्वारा भारत की सीमा के भीतर अपराध किया जाता है। धारा 2 अन्तः प्रादेशिक क्षेत्राधिकार से पल बहिर्जादेशिक क्षेत्राधिकार – जहाँ किसी भारतीय नागरिक द्वारा भारत की सीमा के बाहर अपराध किया जाता है ऐसा व्यक्ति भारतीय न्यायालय द्वारा विचारित एवं दण्डित होला । धिकार कहते हैं। संहिता की धारा 3 और 4 बहिर्जादेशिक क्षेत्राधिकार से सम्बन्धित है। 7 सेक्रेटरी आफ स्टेट बनाम वासुदेव, (1928) बाम्बे एल० आर० 1494 प० 1498.  
  1. वैयक्तिक क्षेत्राधिकार (Personal Jurisdiction)–जहाँ किसी व्यक्ति द्वारा भारतीय सीमा के अन्दर कोई अपराध किया जाता है, चाहे वह भारतीय नागरिक हो या विदेशी, संहिता वहाँ पर लागू होगी, क्योंकि जो व्यक्ति अपराध कारित करता है वह अपराध के प्रभाव को भारत की धरती पर उत्पन्न करता है। संहिता की धारा 2 ऐसे मामलों से ही सम्बन्धित है।
एडमिरैल्टी क्षेत्राधिकार (Admiralty Jurisdiction)—समुद्र में घटित हुये अपराध को विचारित करने तथा दण्डित करने हेतु एडमिरैल्टी क्षेत्राधिकार का प्रयोग होता है। समुद्रों के बारे में ऐसा माना जाता है। कि वे किसी की परिसीमा नहीं है। समुद्रों में उपस्थित जहाजों पर क्षेत्राधिकार इस आधार पर होता है कि जहाज एक तैरता हुआ द्वीप (Island) है तथा यह उस देश का होगा जिसका झंडा इस पर लगा हुआ है। दण्ड संहिता की धारा 4 ऐडमिरैल्टी क्षेत्राधिकार से सम्बन्धित है। अन्तः प्रादेशिक क्षेत्राधिकार-दण्ड संहिता की धारा 2 अन्त: प्रादेशिक क्षेत्राधिकार से सम्बन्धित है। इस धारा के अनुसार संहिता प्रत्येक व्यक्ति, भारत के किसी भी भू-भाग या क्षेत्र में प्रत्येक कार्यों का लोप जो इसके उपबन्धू के प्रतिकूल है, पर लागू होगी। धारा 2 कोई समय सीमा नहीं निर्धारित करती है जिसके। अन्दर अभियोजन आरम्भ कर देना चाहिये। यह (Nultum tempus occurrit regi) के सिद्धान्त पर आधारित है, जिसका अर्थ है समय का बीत जाना सम्राट के अधिकार को नष्ट नहीं करता है। प्रत्येक व्यक्ति (Every person)–शब्द “प्रत्येक व्यक्ति” का अर्थ है भारतीय नागरिक तथा विदेशी। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 2 उपबन्धित करती है कि संहिता के अन्तर्गत कोई व्यक्ति राष्ट्रीयता, पद, जाति अथवा वंश के भेदभाव के बिना न्यायालय द्वारा विचारित एवं दण्ड का भागी होगा बशर्ते यह अपराध जिसका वह अभियुक्त है भारतीय परिसीमा के अन्दर घटित हुआ हो। वह विदेशी जो भारत की सीमा के अन्दर प्रवेश करता है, भारतीय कानून को स्वीकार करता है तथा न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के अधीन अपने को मानता है, यह अपनी सफाई में यह नहीं कर सकता कि उसने इस अनुचित कार्य को बिना अपराध जाने ही कर दिया, क्योंकि उसके अपने देश में इस कार्य को अपराध के रूप में नहीं समझा जाता।8। इसोप के वाद में एक व्यक्ति जो बगदाद का निवासी था, सेंट कैथरीन बन्दरगाह में खड़े ईस्ट इंडिया पोत पर एक अप्राकृतिक अपराध को करने का दोषी ठहराया गया। यह कार्य उसके अपने देश में अपराध नहीं। हुआ होता। न्यायालय ने कहा कि वह अपराध करने का दोषी है और यह तथ्य कि ऐसा कार्य उसके अपने देश में अपराध नहीं हुआ होता उसे बचाव नहीं प्रदान कर सकता यदि उसका कृत्य भारत में अपराध है। एक विदेशी जो भारत में अपराध करता है वह दोषी होगा और दण्डित किया जायेगा इस तथ्य पर ध्यान दिए बिना कि वह शारीरिक रूप से कितने दिनों से भारत में है।10 यद्यपि दण्ड संहिता में क्षेत्राधिकार को लेकर किसी व्यक्ति के पक्ष में कोई अपवाद नहीं है परन्तु कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं जो संविधान के उपबन्धों के कारण या विश्व के सभ्य राष्ट्रों की विधियों के अधीन, उन्मुक्त हैं। क्षेत्राधिकार से उन्मुक्तियाँ
  1. विदेशी राष्ट्राध्यक्ष (Foreign Sovereigns)–विभिन्न राष्ट्रों के बीच यह आपसी समझौता रहता है। कि एक देश का राष्ट्राध्यक्ष दूसरे देश की विधि का विषयवस्तु नहीं हो सकता। एक राष्ट्राध्यक्ष किसी भी रूप में दूसरे के अधीन नहीं हो सकता। सम्प्रभुता (Sovereignty) किसी को अपने से बड़ा नहीं मानते। अत: एक राष्ट्राध्यक्ष का दूसरे राष्ट्राध्यक्ष के अधीन होना सम्प्रभुता (Sovereignty) के सिद्धान्त के विरुद्ध है। शूनर एक्सचेंज बनाम एमफेड्न11 के वाद में मुख्य न्यायाधीश मार्शल ने कहा कि एक सम्प्रभु सर्वोत्तम चरित्र की बाध्यता से बाध्य है कि वह अपने राष्ट्र की गरिमा को, अपने या अपने सम्प्रभु अधिकारों को दूसरे राष्ट्र के
  2. इसोप (1836) 7 सी० एण्ड पी० 456.
  3. उपरोक्त सन्दर्भ.।
  4. मोबारक अली अहमद बनाम बम्बई राज्य, (1958) एस० सी० आर० 328.
  5. (1812) 7 कैंच 116.
क्षेत्राधिकार में डालकर धूमिल न करें। जब कोई राष्ट्राध्यक्ष दूसरे देश की यात्रा कर रहा होता है तो ऐसा मात्र भारतीय दण्ड संहिता जाता है कि उसे स्पष्ट अनुज्ञप्ति या इस विश्वास में कि उसके स्वतन्त्र प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र को प्राप्त सुविधायें यद्यपि स्पष्टतः वर्णित नहीं हैं और सांकेतिक रूप में आरक्षित हैं, का लाभ उसे भी मिलेगा।
  1. राज्य के उच्चाधिकारी (High Dignitaries of the State)–भारत के राष्ट्रपति तथा राज्यों के राज्यपाल संहिता के क्षेत्राधिकार से उन्मुक्त हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 361 निर्धारित करता है कि किसी भी न्यायालय में कोई भी आपराधिक प्रक्रिया न तो राष्ट्रपति के विरुद्ध और न ही किसी राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान न तो दाखिल की जा सकती है न उसे कायम रखा जा सकता है।
  2. राजदूत और राजनयिक अभिकर्ता (Ambassadors and Diplomatic agents)–राजदूत तथा अन्य कुछ विदेशी राजनयिक न्यायालयों के क्षेत्राधिकार से उन्मुक्त हैं। वे भी उसी तरह की सुविधाओं एवं उन्मुक्तियों का लाभ उठाते हैं जैसे कोई सम्प्रभु या राज्य। उनकी उन्मुक्तियाँ इस सिद्धान्त पर आधारित हैं। कि वे, उस राष्ट्र या सम्प्रभु जिसने उन्हें भेजा है, के प्रतिनिधि हैं। अत: किसी भी प्रतिकूल क्षेत्राधिकार से उसी प्रकार उन्मुक्त हैं जिस प्रकार उनका सम्प्रभु या राष्ट्र ।12 वह जिस सम्प्रभु के पास भेजा जाता है उसके साथ इसका जरा भी यहाँ तक कि क्षणिक सम्बन्ध भी नहीं होता। वह अपने देश में ही निवास करता हुआ माना जाता है।13 कुछ मामलों के लिये दूतावास का क्षेत्र इस देश का हिस्सा नहीं माना जाता है बल्कि उस देश का हिस्सा माना जाता है जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। वे इन उन्मुक्तियों को परस्पर आपसी सम्बन्धों के आधार पर प्राप्त करते हैं। अत: विदेशी दूतावास में घटित हुये अपराध को भारतीय न्यायालय विचारित नहीं कर सकते। यदि कोई व्यक्ति राजनयिक उन्मुक्तियों का लाभ उठाते हुये अपने पद का दुरुपयोग करता है, देश के हित के विरुद्ध कोई कार्य करता है तो उसका उपचार यह है कि उसके वापस बुलाये जाने की माँग की जानी चाहिये जहाँ उसके विरुद्ध उचित कार्यवाही उसके शासक द्वारा की जा सकती है। इस तरह की उन्मुक्तियाँ और सुविधायें संयुक्त राष्ट्र संघ, उसके प्रतिनिधि तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं तथा उनके प्रतिनिधियों को भी प्राप्त हैं।
  3. विदेशी शत्रु (Alien Enemies)–युद्ध या युद्ध जैसी कार्यवाहियों के लिये विदेशी शत्रुओं को भारतीय आपराधिक न्यायालयों द्वारा विचारित नहीं किया जा सकता। परन्तु यदि वह युद्ध जैसी कार्यवाही न कर चोरी (Theft), छल (Cheating) इत्यादि कृत्य करता है तो उसे आपराधिक न्यायालयों के सम्मुख पेश किया जाएगा। युद्ध की कार्यवाही के लिये वह केवल मार्शल लॉ (Martial Law) द्वारा ही दण्डित किया जा सकता है।
  4. विदेशी सेना (Foreign Army)–यदि किसी विदेशी राज्य की सेनाएँ भारत की धरती पर भारत सरकार की सहमति से विद्यमान हैं तो वे स्थानीय आपराधिक न्यायालयों के क्षेत्राधिकार से उन्मुक्त हैं। यह एक दृढ़ अन्तर्राष्ट्रीय प्रथा है।
  5. युद्धपोत (Warships)—किसी राज्य के सैनिक जब विदेशी जल में होते हैं तो वे उस देश, जिसके जल में होते हैं, के क्षेत्राधिकार से उन्मुक्त होते हैं। प्रादेशिक जल में उपस्थित पोतों के सम्बन्ध में दो सिद्धान्त हैं। एक तो यह है कि किसी देश का सार्वजनिक पोत सभी उद्देश्यों हेतु उस देश, जिसका वह पोत है, का क्षेत्र है या माना जाना चाहिये। दूसरा यह है कि सार्वजनिक पोत विदेशी जल में न तो जहाज के देश का क्षेत्र है,
और न ही ऐसा माना जाना चाहिये। अन्तर्राष्ट्रीय विधि के सिद्धान्तों के अनुरूप जहाजों, उसके सदस्यों तथा उस पर लदे सामानों को स्थानीय न्यायालयों से उन्मुक्तियाँ प्रदान की जाती हैं। यद्यपि उन्मुक्तियों का परित्याग उस देश द्वारा किया जा सकता है, जिस देश का वह पोत (Ship) है। ऐसे युद्धपोत का राष्ट्र इन उन्मुक्तियों का अभित्याग करके उन्हें देश के सामान्य न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के अधीन समर्पित कर सकता है।14 किसी भी विदेशी राज्य का युद्धपोत भारतीय जल में केवल भारत सरकार की आज्ञा से ही प्रवेश कर सकता है।
  1. इन दि पार्लयामेंट वेल्ज, (1880) 5 पी० डी० 197 पृ० 207 पर ब्रेट्टे एल० जे० का मत ।
  2. मैग्डेलेना स्टीम नैवीगेशन कम्पनी बनाम मार्टिन, (1859) 2 ई० एण्ड ई० 94 पृ० 111.
14चुंग ची चियंग, (1939) ए० सी० 160.
  1. निगम (Corporation)-शब्द ‘‘निगम” को संहिता की धारा 11 में परिभाषित किया गया है। इसमें सम्मिलित हैं-एक कम्पनी या संस्था, व्यक्तियों का निकाय चाहे निगमित (incorporated) हो या नहीं। परन्तु धारा 2 में प्रत्येक व्यक्ति’ का अर्थ है-एक प्राकृतिक व्यक्ति और इसमें न्यायिक व्यक्ति (juridicial persons) जैसे निगम को सम्मिलित नहीं किया जाता। यदि किसी निगम द्वारा कोई अपराध होता है तो माना जायेगा कि निगम के उन सदस्यों ने ही उसे किया है जिन्होंने कार्य में भाग लिया। था।
  2. स्वामी का अपने सेवक के कार्यों के लिये प्रतिनिधायी दायित्व (Vicarious liability of master for acts of his servants)–एक स्वामी अपने सेवक द्वारा किये गये आपराधिक कृत्य के लिये सामान्य रूप से दायित्वाधीन है यदि सेवक ने वह कृत्य स्वामी की सहमति, मौनानुकूलता (Connivance) या ज्ञान (Knowledge) में किया था या स्वामी ने कृत्य के लिये प्रेरित किया था। परन्तु प्रश्न उठता है कि क्या सेवक के उन कार्यों जो उसने अपने मालिक की सहमति के बिना अपनी नौकरी के दौरान किया था, के लिये भी मालिक जिम्मेदार है? स्वामी अपने सेवक द्वारा किये गये अनधिकृत आपराधिक कृत्य के लिये दायित्वाधीन नहीं है। आपराधिक रूप में केवल वह व्यक्ति दण्डनीय है जिसने स्वयं अपराध किया है या जिसकी सहमति से दूसरे ने अपराध किया है।15 परन्तु इस सिद्धान्त के निम्नलिखित अपवाद
(i) विधिक दायित्व (Statutory liability)–यद्यपि प्रथम दृष्टि में स्वामी अपने सेवक द्वारा किये गये आपराधिक कृत्य के लिये दायित्वाधीन नहीं होता फिर भी विधानांग (Legislature) किसी कृत्य को निषिद्ध कर सकती है या किसी दायित्व को इस प्रकार प्रवर्तित (enforce) कर सकती है जिससे प्रतिषेध । (Prohibition) या दायित्वपूर्ण (Absolute) हो जाए। ऐसी परिस्थिति में यदि कार्य उसके सेवक द्वारा सचमुच किया गया है तो वह अवश्य दायित्वाधीन होगा। पूर्ण दायित्व के निर्धारण हेतु हमें संविधि (Statute) के उद्देश्य, उसमें प्रयुक्त शब्दों तथा आरोपित दायित्व की प्रकृति पर ध्यान देना चाहिये। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 154 द्वारा स्वामी, या भूमि पर दखल रखने वाले व्यक्ति पर सांविधिक दायित्व आरोपित किया गया है यदि उसका अभिकर्ता या मैनेजर पुलिस अधिकारी को विधिविरुद्ध सभा या बलवा जो उसके ज्ञान में उस जमीन पर धारित हो रहा है, की सूचना देने में असमर्थ रहता है। सांविधिक दायित्व अन्य बहुत से अधिनियमों के अन्तर्गत भी उत्पन्न किया गया है जैसे अफीम अधिनियम (Opium Act), भोजन अपमिश्रण निवारण अधिनियम, (Prevention of Food Adulteration Act) तथा जुआ अधिनियम (Gambling Act) इत्यादि। (i) सार्वजनिक न्यूसेंस (Public nuisance)–किसी कार्य का स्वामी अपने अभिकर्ता द्वारा अपने लाभ के लिये किये गये कार्य से उत्पन्न सार्वजनिक न्यूसेंस के लिये दायित्वाधीन है यदि न्युसेंस अभिकर्ता। द्वारा कार्य को करते समय उत्पन्न होती है यद्यपि वह कार्य स्वामी के ज्ञान के बिना एवं उसके सामान्य आदेशों के विरुद्ध किया गया हो।16। (iii) कर्तव्य की उपेक्षा (Neglect of duty)–यदि कोई व्यक्ति दूसरों के लिये खतरा उत्पन्न कर सकने वाले किसी कार्य के संपादन में उपेक्षा करता है तथा उसे अनिपुण व्यक्तियों के हाथों में सौंप देता है। तो कुछ मामलों में वह दण्डित किया जा सकता है। किन्तु यदि निपुण व्यक्ति को नियुक्त किया जाता है तो स्पष्ट विद्वेष के अभाव में नियोजक (employer) दायित्वाधीन नहीं होगा।17 डिक्सन18 के वाद में नियोजक ने एक नौकर को पत्तियों में फिटकिरी लगाने के लिये नियुक्त किया। दवा का अत्यधिक प्रयोग नुकसान दायक था किन्तु नियोजक ने इसके प्रयोग पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया। नौकर ने अधिक मात्रा में
  1. 2 हेल, पी० सी० 114; टी० डी० बोर्ड बनाम एस० एन० मूथाथू, (1955) क्रि० लाँ ज० 845.
  2. स्टीफेन्स (1866) एल० आर० 1 क्यू० बी० 702.
  3. श्रीशचन्द्र सरकार, ए० आई० आर० 1919 इला० 385.
  4. (1814) 3 एम० एण्ड एस० 11.
इसका प्रयोग कर दिया, क्योंकि उसने उसके प्रयोग में उचित सावधानी नहीं बरती। अत: मालिक दायित्वाधीन था। | भारत में (Within India) कोई व्यक्ति भारतीय म्युनिसिपल न्यायालयों द्वारा केवल तभी विचारणीय होता है जब अपराध भारत के अन्दर घटित होता है। यदि अपराध भारत के बाहर घटित होता है तो वह तभी भारत में दण्डनीय होगा जब संहिता की विशिष्ट धाराओं 3, 4 तथा 108-क आदि के उपबन्धों से प्रभावित हो । शब्दों ”भारत में ” दण्ड संहिता के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार को परिभाषित करते हैं। ये उन प्रदेशों का वर्णन करते हैं जिनमें संहिता लागू होगी। भारत की परिसीमा में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1(3) में परिभाषित सभी प्रदेश तथा सीमावर्ती जल सम्मिलित हैं। 30 सितम्बर, सन् 1967 की राष्ट्रपति की घोषणा के अनुसार भारत की जल सीमा समुद्र में उचित आधार रेखा (Proper base line) से 12 नाटिकल मील (nautical miles) तक फैली हुई है। अत: राज्य की विधियाँ समुद्र के उस भाग पर भी लागू होंगी। यदि कोई अपराध सीमावती जल में घटित होता है तो वह अपराध दण्ड संहिता के उपबन्धों के अधीन विचारणीय होगा। कस्त्या राम!9 के प्रकरण में एक गाँव के निवासियों ने समुद्र के किनारे से 3 मील की दूरी के भीतर वैधानिक रूप में लगायी गयी बहुत सी मछियारी दावों (Fishing stakes) को खींच कर बाहर निकाल दिया। ये मछियारी दाँव दूसरे गाँव के लोगों द्वारा लगाये गये थे। यह माना गया कि स्थानीय आपराधिक न्यायालयों को अपराधियों को विचारित करने का अधिकार है। इस प्रकरण में रिष्टि (Mischief) का अपराध घटित हुआ था। यह भी स्वीकार किया गया कि दण्ड संहिता इस प्रकरण पर लागू होगी। म्युनिसिपल आपराधिक न्यायालयों का क्षेत्राधिकार पत्तन (Port), बन्दरगाह (Harbours), नदी के मुहानों, जमीन से घिरी खाड़ियों, कुँओं, खानों तथा एक विशिष्ट ऊँचाई तक हवा में भी होता है। प्रलक्षित उपस्थिति (Constructive Presence)एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को भारतीय क्षेत्र में क्षति पहुँचा सकता है। यद्यपि वह शारीरिक रूप में किसी अन्य देश में मौजूद हो। उदाहरण के लिये, बंगाल देश का एक नागरिक सीमा के उस पार से बन्दूक चलाता है जिससे भारत की सीमा में उपस्थित कोई व्यक्ति मर जाता है। अभियुक्त को भारत में अभियोजित किया जा सकता है यदि विचारण हेतु उसकी भारत में उपस्थिति निश्चित की जा सके।20 लोटस21 (Lotus) के वाद में यह सर्वप्रथम निश्चित हुआ कि जहाँ एक देश के सीमावर्ती जल में, दूसरे देश में शारीरिक रूप में विद्यमान किसी व्यक्ति के कार्य के स्पष्ट परिणामस्वरूप कोई अपराध घटित होता है तो अन्तर्राष्ट्रीय विधि, अभियुक्त की उसी स्थान, जहाँ उसका कार्य प्रभावी हुआ, पर प्रलक्षित उपस्थिति के सिद्धान्त के आधार पर प्रथम राज्य द्वारा, अभियुक्त के अभियोजन को निषिद्ध नहीं करती यदि वह प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आता हो।
  1. भारत से परे किए गए, किन्तु उसके भीतर विधि के अनुसार विचारणीय अपराधों का दण्ड- भारत से परे किये गये अपराध के लिए जो कोई व्यक्ति किसी भारतीय विधि के अनुसार विचारण का पात्र हो, भारत से परे किये गये किसी कार्य के लिये उससे इस संहिता के उपबन्धों के अनुसार ऐसे बरता जाएगा, मानो वह कार्य भारत के भीतर किया गया था।
टिप्पणी संहिता की धारा 3 तथा 4 बहिर्जादेशिक क्षेत्राधिकार से सम्बन्धित है। भारतीय आपराधिक न्यायालयों का क्षेत्राधिकार इसके नागरिकों पर भारत के भीतर तथा इसके बाहर भी है। साधारण रूप में किसी देश के न्यायालय को केवल अन्त:प्रादेशिक क्षेत्राधिकार होता है तथा उसकी विधियाँ उसकी सीमा के भीतर ही प्रवर्तित हो सकती हैं, क्योंकि कोई अपनी सीमा से दूसरे राज्य को अपना अधिकार लागू करने की सहमति नहीं दे सकता। परन्तु आपवादिक परिस्थितियों में बहिप्रदेशिक प्रभाव रखने वाली विधियों को अधिनियमित किया जा सकता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 245(2) निर्धारित करती है कि ”संसद द्वारा निर्मित कोई भी कानन बहिप्रदेशिक क्षेत्राधिकार होने के कारण अवैधानिक नहीं समझा जायेगा।”
  1. (1871) 8 बी० एच० सी० (क्रि० सी०) 63.
  2. मोबारक अली अहमद बनाम बम्बई राज्य, 1958 एस० सी० आर० 328.
  3. 1927) एस० जे० 770-एल० क्यू० आर० वाल्यूम XLIV, पृ० 154.
यह अनुच्छेद निर्धारित करता है कि यदि कोई कृत्य भारत में अपराध है और वही कृत्य भारत की सीमा के परे यदि घटित होता है तो भी वह अपराध होगा। धारा 3 में प्रयुक्त ” भारतीय विधि द्वारा” शब्द का प्रयाग इस धारा के प्रवर्तन को प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 (Extradition Act, 1962) तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 187 और 188 में वर्णित मामलों तक ही सीमित रखता है। अपराध किसी भी व्यक्ति जो आरोपित अपराध को करते समय भारतीय न्यायालयों के क्षेत्राधिकार में था, द्वारा किया जा सकता है। ऐसा व्यक्ति भारतीय नागरिक हो भी सकता है और नहीं भी। यदि कोई भारतीय किसी दूसरे देश में एक कार्य करता है। और वह कार्य उस देश की विधि के अनुसार अपराध नहीं है, किन्तु भारतीय विधि के अनुसार अपराध है तो उसे भारत में अभियोजित किया जा सकता है। ‘क’ एक अंग्रेज ‘ग’ की पत्नी ‘ख’ से इंग्लैण्ड में लैंगिक समागम बिना ‘ग’ की सहमति या मौनानुकूलता से करता है (जारता इंग्लैण्ड में अपराध नहीं है)। ‘क’ भारत में जारता के अपराध के लिये अभियोजित किया जा सकता है, यदि भारत में उसकी मौजूदगी को निश्चित किया जा सके। उपरोक्त मामले में यदि ‘ग’ भारत में रह रहा हो तब भी कोई अन्तर नहीं पड़ेगा यदि ‘ख’ इंग्लैण्ड में हो जहाँ अपराध घटित हुआ। ‘क’ एक अंग्रेज ‘ज’ एक भारतीय द्वारा लिखित पत्र एक दूसरे भारतीय ‘ख’ के 10,000 रुपये पाने के लिये दिये हुये है। ‘क’ अपने देश को वापस चला जाता है तथा ‘ख’ को धोखा देने के उद्देश्य से वह पत्र में एक शून्य और बढ़ा देता है। वह इस आशय से शून्य बढ़ाता है कि ‘ख’ विश्वास कर लेगा कि ‘ज’ ने ऐसा लिखा होगा। ‘क’ ने जालसाजी (Forgery) का अपराध इस उदाहरण में किया है। जिसके लिये उसे भारत में अभियोजित किया जा सकता है यद्यपि वह शारीरिक रूप में भारत में मौजूद नहीं है ।22 इन सभी प्रकरणों में अपराध भारत की सीमा के परे गठित होते हैं। किन्तु भारत में उसी प्रकार विचारणीय होंगे जैसे वे अपराध भारत में ही घटित हुये हैं। अत: शब्द ‘जैसे वह कार्य भारत में ही घटित हुआ था’ का धारा 3 का प्रयोग भारत के बाहर घटित हुये अपराधों के बारे में एक कल्पना उत्पन्न करते
  1. राज्य-क्षेत्रातीत अपराधों पर संहिता का विस्तार- इस संहिता के उपबन्ध
(1) भारत से बाहर और परे किसी स्थान में भारत के किसी नागरिक द्वारा। (2) भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी पोत या विमान पर, चाहे वह कहीं भी हो किसी व्यक्ति द्वारा, किए गए। किसी अपराध को भी लागू है। 23[(3) कोई व्यक्ति किसी स्थान में भारत से बाहर और परे कोई अपराध भारत में स्थित कम्प्यूटर साधन को लक्ष्य बनाते हुये कारित करता है। 24[ स्पष्टीकरण-इस धारा में (1) शब्द ‘अपराध” में ऐसा प्रत्येक अपराध सम्मिलित है जो भारत से बाहर किया गया है जो यदि भारत में किया जाता है तो इस संहिता के अन्तर्गत दण्डनीय होता; (2) अभिव्यक्ति ‘कम्प्यूटर साधन” का वही अर्थ होगा जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (ट) में दिया गया है। दृष्टान्त क जो भारत का नागरिक है उगाण्डा में हत्या करता है। वह भारत के किसी स्थान में, जहाँ वह पाया जाय, हत्या के लिए विचारित और दोषसिद्ध किया जा सकता है।
  1. मुबारक अली बनाम बम्बई राज्य, 1958 एस० सी० आर० 328.
  2. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2008 (2009 का अधिनियम सं० 10) की धारा 51 (क) (i) द्वारा अन्त:स्थापित।
  3. उपरोक्त की धारा 51 (1) (ii) द्वारा प्रतिस्थापित । प्रतिस्थापन के पहले प्रतिस्थापित स्पष्टीकरण निम्न प्रकार था-“इस धारा में ‘अपराध’ शब्द के अन्तर्गत भारत से बाहर किया गया ऐसा हर कार्य आता है, जो यदि भारत में किया जाता तो, इस संहिता के अधीन दण्डनीय होता।”
टिप्पणी यह धारा भारतीय आपराधिक न्यायालयों को निम्नलिखित मामलों में क्षेत्राधिकार प्रदान करती है (1) भारत से बाहर और परे किसी स्थान में भारत के किसी नागरिक द्वारा, और (2) भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी पोत या विमान पर, चाहे वह कहीं भी हो किसी व्यक्ति द्वारा किये गये अपराधों में। जब कोई अपराध भारत की सीमा के परे घटित होता है तथा अपराधी भारत की सीमा के अन्दर पाया जाता है तो ऐसी स्थिति में निम्न दो रास्तों में से कोई एक अपनाया जा सकता है (1) उसे उस देश को विचारण हेतु सौंपा जा सकता है जिस देश में अपराध किया गया है, अर्थात् वह दूसरे देश को प्रत्यर्पित (extradited) किया जा सकता है, या (2) उसका विचारण भारत में हो सकता है। प्रत्यर्पण (Extradition)—प्रथम प्रकार के मामले प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 के द्वारा निर्णीत होते हैं। प्रत्यर्पण का अर्थ हैं एक राज्य की सीमा में पाये जाने वाले व्यक्ति को दूसरे राज्य को सौंपना। एक राज्य द्वारा दूसरे राज्य को सौंपने की प्रक्रिया एक राजनीतिक कृत्य है तथा यह कृत्य किसी सन्धि के अन्तर्गत या उस उद्देश्य हेतु किसी समझौते के अन्तर्गत सम्पादित होता है। किसी अभियुक्त को सौंपने सम्बन्धी प्रश्न उस देश जिससे सौंपने को कहा गया है, की घरेलू विधियों द्वारा निर्धारित होते हैं।25 किन्तु यदि आरोपित अपराध राजनीतिक प्रकृति का है तो सौंपने के बजाय उसे राजनीतिक संरक्षण प्रदान किया जा सकता है। अपराधियों का प्रत्यर्पण अन्तर्राष्ट्रीय विधि का एक मान्य सिद्धान्त है जो प्रत्यार्पण संधियों द्वारा नियंत्रित होता है। वैधानिक अधिकार के रूप में प्रत्यर्पण केवल उन देशों के सम्बन्ध में किया जा सकता है जिनके साथ इस उद्देश्य हेतु कोई समझौता हो, यद्यपि अन्तर्राष्ट्रीय प्रथा के अनुसार प्रत्यर्पण सन्धि के अभाव में भी सामान्य रूप में प्रत्यर्पण से इन्कार नहीं किया जाता। भारत में प्रत्यर्पण सम्बन्धी प्रश्न प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 द्वारा निर्धारित होते बहिर्जादेशिक क्षेत्राधिकार- भारतीय न्यायालय भारत के बाहर (1) थल, (2) समुद्र या (3) वायुयानों पर घटित हुये अपराधों को विचारित करने के अधिकारी हैं। थल (Land) दण्ड संहिता की धारा 3 तथा 4 और दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 188 के अन्तर्गत भारतीय न्यायालय, भारतीय क्षेत्र के बाहर घटित हुये अपराधों को भी विचारित कर सकते हैं। यदि भारत के किसी नागरिक द्वारा कोई कार्य किया जाता है जो यदि भारत में किया गया होता तो दण्ड संहिता के अन्तर्गत एक दण्डनीय अपराध होता, ऐसा कार्य संहिता की धारा 4 के अन्तर्गत एक अपराध होगा और जिसका विचार दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 188 के अन्तर्गत होगा 26 धारा 4 के उपबन्ध ऐसे अभियुक्त के लिये लागू नहीं होंगे जो अपराध करते समय भारतीय नागरिक नहीं था।27 यदि अभियुक्त अपराध करते समय भारतीय नागरिक नहीं था परन्तु अपराध करने के बाद भारत की नागरिकता स्वीकार कर लेता है तब भी वह भारतीय न्यायालयों द्वारा विचारणीय नहीं होगा क्योंकि पश्चात्वर्ती घटनाएँ भूतलक्षी क्षेत्राधिकार प्रदान नहीं कर सकतीं। भारत के बाहर कोई अपराध किया हुआ व्यक्ति भारत में जहाँ कहीं भी पाया जायेगा वहीं उसका विचारण किया जा सकता है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 188 में प्रयुक्त पाया गया” शब्द का तात्पर्य उस स्थान से नहीं है जहाँ उसे खोज कर निकाला जाता है बल्कि उस स्थान से है जहाँ वह वास्तविक रूप में विद्यमान रहता है 28 एक व्यक्ति अपनी इच्छा के विरुद्ध जिस स्थान पर लाया जाता है उसे वहीं पाया हुआ माना जायेगा।29 उसे यह साबित करने का अवसर नहीं दिया जायेगा कि वह बलपूर्वक या अवैधानिक रीति
  1. जुगल किशोर मोरे, (1969) 3 एस० सी० आर० 320.
  2. नारायण मोहले, (1935) 37 बम्बई एल० आर० 885.
  3. सेण्ट्रल बैंक आफ इण्डिया बनाम राम नारायण, (1955) 1 एस० सी० आर० 697.
  4. मगनलाल, (1882) 6 आई० एल० आर० (बम्बई) 622.
  5. लोपेज एण्ड सैटलर, (1858) 27 एल० जे० (एम० सी०) 48.
से निदेश से वहाँ लाया गया।30 धारा 4 तभी लागू होती है जब किया गया कार्य दण्ड संहिता के अन्तर्गत एक अपराध बनता है।31 यदि कोई कार्य, जो एक अपराध गठित करता है, आंशिक रूप में भारत के बाहर तथा आंशिक रूप में भारत के अन्दर किया जाता है तथा यह कार्य भारत के किसी नागरिक द्वारा किया जाता है। वह भारतीय न्यायालयों द्वारा विचारित किया जा सकता है यदि दोनों कृत्य मिलकर दण्ड संहिता के अन्तर्गत एक अपराध गठित कर रहे हों 32 समुद्र– समुद्र में घटित हुये अपराधों को विचारित करने का क्षेत्राधिकार, नौ-अधिकरण क्षेत्राधिकार (admiralty jurisdiction) के नाम से जाना जाता है। वह इस सिद्धान्त पर आधारित है कि समुद्र में विद्यमान पोत एक तैरता हुआ द्वीप माना जाता है, तथा वह उस देश का होता है जिस देश का झंडा पोत पर लगा होता है। नौ-अधिकरण क्षेत्राधिकार निम्नलिखित पर लागू होते हैं (1) समुद्र में विद्यमान भारतीय पोत पर घटित अपराध, (2) भारत में सीमावर्ती जल में विद्यमान किसी विदेशी पोत पर घटित अपराध; (3) जल दस्यु (Pirates)।
  1. भारतीय पोत पर अपराध- नौ-अधिकरण क्षेत्राधिकार केवल समुद्र में विद्यमान भारतीय पोत तक ही नहीं व्याप्त रहता बल्कि वह पुलों के नीचे नदियों में जहाँ ज्वार तथा भाटे का उत्थान और पतन होता है और जहाँ तक बड़े पोत जा सकते हैं, तक भी व्याप्त रहता है।33 यह क्षेत्राधिकार भारतीय पोतों पर भी लागू होता है यद्यपि वे पोत ऐसे स्थान पर हो सकते हैं जहाँ विदेशी म्युनिसिपल अधिकारी भी अपने समवर्ती क्षेत्राधिकार (Concurrent jurisdiction) का प्रयोग यदि चाहें तो कर सकते हैं। पोत पर विद्यमान सभी व्यक्ति भारतीय नागरिक या विदेशी, भारतीय विधियों की शरण लेने के अधिकारी हैं 34 जहाँ तक समुद्र के किनारे का प्रश्न है, उस पर साधारण आपराधिक न्यायालय तथा नौ-अधिकरण न्यायालयों दोनों को क्रमशः ऊँचे और नीचे जल चिन्हों के बीच अधिकार है।35
  2. विदेशी पोत पर अपराध (Offence on foreign ships)–नौ-अधिकरण क्षेत्राधिकार का विस्तार वहाँ भी होता है जहाँ भारतीय जल में किसी विदेशी पोत पर अपराध घटित होता है। इस प्रकरण में भी भारतीय न्यायालयों तथा उस देश के न्यायालयों जिसका झंडा पोत पर लगा है, दोनों को समवर्ती क्षेत्राधिकार प्राप्त है। । प्रारम्भ में समुद्रों पर घटित अपराध आपराधिक न्यायालयों द्वारा विचारणीय नहीं थे, परन्तु वाद में नौ अधिकरण अपराध अधिनियम (Admiralty Offences Act, 1849) तथा व्यापारिक नौ वाहन अधिनियम (Shipping Act), 1894 द्वारा ऐसे अपराधों के सम्बन्ध में भी आपराधिक न्यायालयों को अधिकार प्रदान कर दिये गये। भारतीय व्यापारिक नौवाहन अधिनियम, 1958 के पारित होने के पश्चात् साधारण न्यायालयों का नौ अधिकरण क्षेत्राधिकार समाप्त हो गया।
  3. जल-दस्युता (Piracy)- जल दस्युता का तात्पर्य है, अपने व्यक्तिगत लाभ हेतु राज्य सरकार की आज्ञा बिना, लूटने या सम्पत्ति का अपहरण करने या व्यक्तियों के विरुद्ध हिंसा करने के उद्देश्य से समुद्र में घूमते रहना। अतः जल-दस्यु वे व्यक्ति हैं जो किसी भी राज्य की आज्ञा प्राप्त किये बिना समुद्र द्वारा आक्रमण करते हैं।
जल दस्युता दो प्रकार की होती है—(1) अन्तर्राष्ट्रीय विधि द्वारा (Piracy jure gentium), (2) देशों के अधिनियमों द्वारा (piracy by the Statutes of the Country)।
  1. विनायक डी० सावरकर, (1910) 1 बम्बई एल० आर० 296.
  2. रामभरथी, (1923) बम्बई एल० आर० 772.
  3. मोलवी अहमदुल्ला, (1865) 2 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 60.
  4. एन्डर्सन (1868) एल० आर० 1 सी० सी० आर० 161.
  5. एन्डर्सन उपरोक्त, कार (1882) 10 क्यू० बी० डी० 76 पृ० 86.
  6. 3 कोक 113.
(1) अन्तर्राष्ट्रीय विधि द्वारा जल दस्युतासमस्त देशों के विरुद्ध यह एक अपराध है। अत. प्रत्येक देश इसे दण्ड देने का अधिकारी है। स्टीफेन के अनुसार ऐसे व्यक्ति जल दस्युता के दोषी हैं जो ऐसे पोत पर शान्तिपूर्वक रहते हुये, हिंसा द्वारा या पोत के स्वामियों को भय दिखाकर पोत को छीन लेते हैं या छीनने का प्रयास करते हैं, या पोत के स्वामियों के प्रति हिंसा का प्रयोग कर या उन्हें भय दिखा कर पोत पर रखे सामानों को ले जाते हैं या ले जाने का प्रयास करते हैं।36 वास्तविक लूट तथा लूटने का प्रयास दोनों ही अन्तर्राष्ट्रीय विधि द्वारा जल दस्युता हैं।37 जल दस्युता में लगे रहने के कारण एक व्यक्ति मनुष्य समुदाय का दुश्मन बन जाता है और वह अपने देश तथा अन्य देशों से भी शरण पाने के सभी अधिकार खो देता है। एक जलदस्यु अपने कैद करने वाले के न्यायाधिकरण से किसी भी प्रकार की उन्मुक्ति की माँग नहीं कर सकता। जल दस्युता का अपराध वहाँ भी होता है जहाँ एक ही देश के लोग एक दूसरे को लूटते हैं। यदि अलग-अलग देशों की प्रजा एक दूसरे को लूटती है तथा दोनों देशों के आपसी सम्बन्ध मित्रवत् हैं तो जल-दस्युता का अपराध होगा, किन्तु यदि दोनों देशों के आपसी सम्बन्ध अच्छे नहीं हैं तो एक दूसरे को लूटना जल दस्युता नहीं होगा, क्योंकि दुश्मन एक दूसरे पर जल दस्युता का अपराध नहीं कर सकते हैं। एक दूसरे को बर्बाद करना मात्र शत्रुतापूर्ण कार्य है।38 (2) अधिनियम द्वारा जल-दस्युता (Piracy by the Statutes of the Country)—कुछ ऐसे कार्य हैं जिन्हें अन्तर्राष्ट्रीय विधि में जल दस्युता का कार्य नहीं माना जाता है परन्तु किसी देश की विधि के अधीन उसे जल दस्युता माना जा सकता है। ऐसे कार्य जो किसी विधि के अनुसार जल दस्युता के कार्य माने जाते हैं, उस देश के न्यायालय द्वारा दण्डनीय हैं। वायुयान (Air Craft)–भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी भी वायुयान में यदि कोई अपराध घटित होता है। तो वायुयान चाहे जहाँ भी हों, भारत में उसका विचारण हो सकता है। विदेशियों का दायित्व (Liability of Foreigners)–विदेशियों द्वारा भारतीय सीमा के बाहर किया गया अपराध भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत अपराध नहीं माना जाता, अत: कोई भी विदेशी भारत के बाहर किये गये अपराध के लिये भारतीय न्यायालयों द्वारा विचारित नहीं किया जा सकता। यदि अपराधी अपराध घटित होते समय ऐसे क्षेत्र में विद्यमान था जिस पर भारतीय विधि प्रवर्तित होती है, तब उसे भारतीय न्यायालयों के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा तथा उसे दण्डित किया जायेगा। प्रश्न यह नहीं है कि ”अपराध कहाँ घटित होता है।” अपितु प्रश्न यह है कि ‘‘अपराध घटित होते समय अपराधी कहाँ विद्यमान था। “यदि अपराध घटित होते समय अपराधी भारतीय सीमा के अन्दर नहीं था, तब उसके द्वारा किया गया कार्य अपराध नहीं होगा तथा उस कार्य का कर्ता अपराधी की तरह दण्डित नहीं किया जायेगा, और वह आपराधिक न्यायालयों के अध्यधीन नहीं होगा।39 परन्तु यदि कोई विदेशी एक अपराध की शुरुआत तो विदेशी राज्य में करता है परन्तु जो पूर्ण भारतीय सीमा के अन्दर होता है, वह उस भारतीय न्यायालय द्वारा विचारित किया जा सकता है जिसके क्षेत्राधिकार में अपराध पूर्ण हुआ यदि वह भारतीय सीमा के अन्दर पाया जाता है तो 40 ‘क’ एक विदेशी, जो एक दूसरे देश का निवासी है ‘ख’ को एक अपराध करने के लिये उकसाता है जिसके परिणामस्वरूप अपराध भारत की सीमा में घटित होता है। ‘क’ भारतीय न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के अध्यधीन नहीं होगा यदि प्रोत्साहन भारत में नहीं दिया गया था।41 भारत के बाहर निवास स्थान (Residence outside India) और अपराध का भारत में कारित किया जाना (offence Committed in India)—ली किम ही और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य42 के
  1. स्टीफेन, डाइजेस्ट आफ क्रिमिनल लॉ (9वाँ संस्करण) पृ० 101.
  2. 1934 ए० सी० 586.
38.4 कोक 154.
  1. मुसम्मात किशन कौर, (1878) पी० आर० नं० 20, सन् 1878.
  2. छोटा लाल, (1912) 14 बम्बई एल० आर० 147.
  3. पिरताई, (1873) 10 बी० एच० सी० (क्रि० सी० 356); राजबहादुर, ए० आई० आर० 1918 (एल०) 49. 42. (2012) II क्रि० ला० ज० 1551 (एस० सी०).
वाद में एक विदेशी कम्पनी के विरुद्ध और बाहर रह रहे इसके अधिकारियों के विरुद्ध धोखाधड़ी और आपराधिक न्यासभंग का आरोप लगाया गया। आपूर्तिकर्ता द्वारा अभियुक्त पर यह आरोप था कि उसने सप्लाई किये गये माल का प्रतिफल (consideration) अदा नहीं किया है। यह तर्क दिया गया कि आक्षेपित कार्य भारत के अन्दर कारित नहीं किये गये थे। यह अभिनिर्धारित किया गया कि यह तर्क मान्य नहीं था जबकि माल भारत से आपूर्ति किये गये थे तो प्रतिफल भी भारत में मिलना चाहिये और सम्प्रेषण (Communication) भारत के माध्यम से किया गया था। यह भी अभिधारित किया गया कि अभियुक्त का भारत में अनुपस्थित रहना जबकि अपराध कारित किया गया था, उनकी विदेशी राष्ट्रीयता (nationality) और भारत के बाहर निवास स्थान के आधार पर भारतीय दण्ड संहिता के अधीन विचारण किये जाने से मुक्त (Exempt) या छूट नहीं प्रदान किया जा सकता है।
  1. कुछ विधियों पर इस अधिनियम द्वारा प्रभाव न डाला जाना इस अधिनियम में की कोई बात भारत सरकार की सेवा के अफसरों, सैनिकों, नौसैनिकों या वायुसैनिकों द्वारा विद्रोह और अभित्यजन को दण्डित करने वाले किसी अधिनियम के उपबन्धों, या किसी विशेष या स्थानीय विधि के उपबन्धों, पर प्रभाव नहीं डालेगी।
टिप्पणी यह धारा संहिता के क्षेत्राधिकार को गदर (mutiny) और अधिकारियों, सिपाहियों, नाविकों तथा वायु सैनिकों, जो भारत सरकार की सेवा में है, के अभित्याग को विनिश्चित करने से अपवर्जित करती है। इन विषयों के लिये विशिष्ट या स्थानीय विधि द्वारा नियम बनाये गये हैं। विशिष्ट या स्थानीय विधि- यद्यपि दण्ड संहिता के उपबन्ध सामान्य रूप से लागू होने के लिये बनाये गये थे, पर वे विस्तृत नहीं है, और विशिष्ट या स्थानीय विधि द्वारा परिभाषित अपराध इस संहिता के क्षेत्र से परे हैं तथा उन्हीं अधिनियमों द्वारा दण्डनीय घोषित किये गये हैं। एक अपराध विशिष्ट या स्थानीय विधि तथा दण्ड संहिता दोनों द्वारा दण्डनीय हो सकता है। यदि विशिष्ट या स्थानीय विधि अपने आप में पूर्ण । है तब दण्ड संहिता के उपबन्ध लागू नहीं होंगे परन्तु यदि विशिष्ट या स्थानीय विधि का आशय दण्ड संहिता को अपवर्जित करना नहीं था, तो यह लागू होगी। कोई भी व्यक्ति उसी अपराध के लिये दोनों विधियों, अर्थात् संहिता तथा विशिष्ट या स्थानीय, द्वारा दण्डित नहीं किया जा सकता 43 साधारण रूप में किसी व्यक्ति को विशिष्ट विधि के अन्तर्गत ही दण्डित करना चाहिये 4 | दण्ड संहिता का प्रवर्तन निम्नलिखित मामलों में अपवर्जित है (1) मार्शल लॉ (Martial Law)-जब मार्शल लॉ लागू होता है, म्युनिसिपल विधियाँ निलम्बित (suspended) रहती हैं। अत: दण्ड संहिता का प्रवर्तन भी निलम्बित रहता है। मार्शल लॉ को हटाये जाने के बाद कार्य या लोप के लिये पुनः अभियोजन किया जा सकता है। मार्शल लॉ के दौरान किये गये कार्यों से सुरक्षा प्रदान करने हेतु साधारणत: क्षतिपूर्ति अधिनियम (Indemnity Act) पारित किया जाता है। | (2) राज्यकत (Act of State)-राज्यकृत एक ऐसा कार्य है जो किसी व्यक्ति के शरीर अथवा उसकी सम्पत्ति के लिये हानिकारक है तथा वह व्यक्ति कार्य होते समय भारत की प्रजा नहीं था। यह कार्य भारत सरकार के प्रतिनिधि द्वारा किया जाता है और इसकी स्वीकृति या तो कार्य होने के पूर्व मिल जाती है। या बाद में भारत सरकार उस कार्य को अपनी सहमति दे देती है। राज्यकृत केवल एक विदेशी के ही विरुद्ध हो सकता है, भारतीय नागरिक के विरुद्ध नहीं क्योंकि सरकार तथा उसके प्रजाजनों के बीच राज्यकृत नहीं हो सकता। राज्यकृत म्युनिसिपल न्यायालय के क्षेत्राधिकार के परे हैं। राज्यकृत के लिये उपचार केवल । राजनयिक सारणी (diplomatic channel) द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
  1. हसन अली, (1873) 5 एन० डब्ल्यू० पी० 49.
  2. के० पी० मजुमदार, (1906) 11 सी० डब्ल्यू० एन० 100.

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