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Indian Penal Code 1860 General Explanations Part 3 LLB 1st Year Notes

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सामान्य आशय अनुमान का प्रश्न है-जय भगवान बनाम स्टेट आफ हरियाणा42 के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि दण्ड संहिता की धारा 34 के लागू किये जाने हेतु इसके साथ कि दो या दो से अधिक अभियुक्तों का होना आवश्यक है। दो अन्य तथ्यों का सिद्ध किया जाना भी आवश्यक है-(i) प्रथम सामान्य आशय और (ii) दूसरा अभियुक्त द्वारा अपराध के कारित किये जाने में भागीदारी। यदि सामान्य आशय सिद्ध कर दिया जाता है परन्तु कोई प्रत्यक्ष कार्य किसी अभियुक्त द्वारा किया गया सिद्ध नहीं किया जाता है तो भी धारा 34 लागू होगी, क्योंकि यह आवश्यक रूप से प्रतिनिधायी दायित्व से सम्बन्धित है, और यदि अभियुक्त का अपराध में भागीदार होना भी सिद्ध हो जाता है परन्तु सामान्य आशय का होना नहीं पाया जाता है तो ऐसी दशा में धारा 34 को लागू नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक मामले में सामान्य आशय का प्रत्यक्ष (direct) साक्ष्य होना सम्भव नहीं है। सामान्य आशय का प्रत्येक मामले के तथ्यों तथा परिस्थितियों से अनुमान (inference) लगाया जाता है। गयासी राम बनाम म० प्र० राज्यभ3 वाले मामले में दो भिन्न समुदायों के बीच गाँव में पार्टी बंदी थी। घटना के दिन अभियुक्त के समुदाय के लोग रास्ते में मृतक का इंतजार कर रहे थे। दोनों अभियुक्त आग्नेयास्त्रों से लैस थे, जब मृतक और उसके साथी उनकी बगल से निकले तो उन्होंने उनका पीछा किया। इसके बाद उन्होंने गोली चलाई। अभियुक्तों ने अंधाधुंध गोली चलाई, अभियुक्त ने मृतक के गिरने के बाद उसके पुट्टे पर गोली मारी जो जानलेवा साबित हुई। सह-अभियुक्त अंगद ने भी मृतक पर निशाना साध कर गोली चलाई। यहाँ तक कि कुछ प्रत्यक्षदर्शी साक्षी भी घायल हो गये। यह अभिनिर्धारित किया गया कि इन परिस्थितियों में घटना में अंगद का शामिल होना और अपीलार्थी गयासी राम के साथ मृतक की हत्या करने का सामान्य आशय सन्देह से परे साबित हो गया है। सामान्य आशय घटनास्थल पर उत्पन्न हो सकता है (Common intention may develop on the spot)-कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में सामान्य आशय घटनास्थल पर भी उत्पन्न हो सकता है जिसे मामले के तथ्यों तथा परिस्थितियों और अभियुक्तों के आचरण से निश्चित किया जाता है। ऋषिदेव पाण्डेय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य44 के बाद में ‘‘क” तथा ‘ख” दोनों भाइयों को आहत व्यक्ति जो सो रहा था, की खाट के नजदीक देखा गया। उनमें से एक के हाथ में गंडासा तथा दूसरे के हाथ में लाठी थी। दोनों को आहत व्यक्ति के सोने के कमरे में भागते हुये देखा गया। आहत व्यक्ति की मृत्यु गले में लगी चोट के कारण हुई जो चिकित्सीय साक्ष्य (medical evidence) के अनुसार निश्चयत: घातक थी। न्यायालय ने पाया कि दोनों भाइयों का आशय उसकी मृत्यु करना था। यह भी विचार न्यायालय ने व्यक्त किया कि सामान्य आशय घटना-स्थल
  1. 2002 क्रि० लॉ ज० 4102. (सु० को०).
  2. 1999 क्रि० लॉ ज० 1634 (एस० सी०).
  3. 2003 क्रि० लॉ ज० 878 (सु० को०).
  4. ए० आई० आर० 1955 सु० को० 331.
पर भी उत्पन्न हो सकता है। परन्तु जहाँ यह कहा जाता है कि सामान्य आशय घटनास्थल पर उत्पन्न हुआ उसे प्रमाण द्वारा सिद्ध होना चाहिये 45 राम प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य46 के वाद में चार अभियुक्त प, म, ह, तथा क ने बलपूर्वक अपने अनाज के बंडलों को ‘र’ के बाड़े के सामने रखने की कोशिश किया। ‘र’ ने इसका विरोध किया। क्योंकि भूमि उसकी थी। प तथा म के हाथ में लाठियाँ थीं जिनसे उन लोगों ने र पर प्रहार किया। ह तथा क ने उस पर ठोकरों तथा मुक्कों से प्रहार किया। र की मत्य सिर से लगी लाठी की चोट के कारण हो गयी। न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्ताओं का यह ज्ञान कि बलपर्वक जमीन पर कब्जा करते समय लाठियों का भरपूर उपयोग किया जायगा, धारा 302 के अन्तर्गत अपराध करने के लिये सामान्य आशय को सिद्ध करने हेतु पर्याप्त नहीं है। किन्तु जब प तथा म ने र के सिर पर प्रहार करना आरम्भ किया, उसके बीच र को ऐसी शारीरिक चोट पहुचाने का सामान्य आशय उत्पन्न हो गया जो सामान्य रूप में उसकी मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त थी। अत: केवल प तथा म को हत्या करने के आरोप में धारा 302 सपठित धारा 34 के अन्तर्गत सजा दी जायेगी। तथा बाकी दो को इस धारा के अन्तर्गत सजा नहीं दी जा सकती। बंगाली मंडल उर्फ बेगई मण्डल बनाम बिहार राज्य47 के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि सामान्य आशय का अस्तित्व में होना एक तथ्य विषयक प्रश्न है। अधिकतम मामलों में न्यायालय सामान्य आशय का अभियुक्त के कार्य और आचरण (conduct) या अन्य सुसंगत परिस्थितियों से अनुमान लगाती (infer) है तथापि आपराधिक दायित्व उस समय उत्पन्न हो सकता है जबकि सामान्य आशय का अनुमान एक निश्चित मात्रा (degree) तक विश्वसनीय रूप (assurance) में लगाया जा सके। हम यह जानते हैं कि किसी व्यक्ति के आशय को प्रमाणित करना कठिन है तथा यह भी प्रमाणित करना कठिन है कि आशय अनेक लोगों के बीच सामान्य था। सामान्य आशय को अभियुक्तों के कार्य, उनके आचरण तथा मामले की अन्य परिस्थितियों, जो उसकी मानसिक स्थिति पर प्रकाश डालते हैं, से सिद्ध किया जा सकता है। शरीर में लगी चोटों की संख्या तथा शरीर के वे विशिष्ट भाग जिन पर चोटें लगी हैं, सामान्य आशय के लिये एक मजबूत आधार हैं। इस परिणाम पर पहुँचने के लिये, कि क्या अभियुक्तों का सामान्य आशय अपराध करने का था, जिसके लिये उन्हें सजा मिलनी चाहिये या नहीं, सम्पूर्ण परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिये।48 राम टहल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य19 के वाद में छ: अभियुक्तों के ऊपर यह आरोप था कि उन लोगों ने राम बदल नामक एक व्यक्ति के छप्पर को नष्ट कर दिया तथा राम हरख तथा जग्गा जो । राम बदल के क्रमशः भाई तथा सास की हत्या कर दिया। राम बदल तथा अभियुक्त के बीच छप्पर के निर्माण के सम्बन्ध में कुछ झगड़ा था। राम बदल ने छप्पर बना लिया। इस पर अभियुक्त ने कहा या तो अपना छप्पर हटा लो या इसके परिणाम को भुगतने के लिये तैयार रहो। परन्तु रामबदल ने अपना छप्पर नहीं। हटाया। अत: 30 नवम्बर सन् 1965 को लगभग साढ़े नौ बजे सबेरे, राम टहल अपने चारों पुत्रों तथा एक पुत्री के साथ वहाँ पहुँचा तथा छप्पर को गिराने लगा। ये सभी लोग, खुर्पा, बल्लम तथा लाठियों से लैस होकर आये थे। राम हरख ने जब उनकी कार्यवाही का विरोध किया तो उसे उन लोगों ने पीटा। राम हरख के शोर मचाने पर राम बदल तथा उसके परिवार के अन्य सदस्य दौड़ते हुये वहाँ पहुँचे। अभियुक्तों ने इन लोगों की भी पिटाई की। यह बताया गया कि जग्गा के जमीन पर गिर जाने के पश्चात् अभियुक्त प्रेम ने अपने बल्लम से उस पर प्रहार किया। घायल लोगों के चिल्लाने पर अन्य गाँव वाले भी घटनास्थल पर पहुँच गये। उन लोगों के हस्तक्षेप करने पर सभी अभियुक्त अपने हथियारों सहित वहाँ से भाग गये। जग्गा की मृत्यु पुलिस चौकी जाते हुये रास्ते में हो गयी तथा राम हरख 3 दिसम्बर सन् 1996 को अस्पताल में मर गया। राम टहल उसी दिन खून में रंगे खुर्प तथा खून से सने कुर्ते के साथ पकड़ लिया गया। उसका लडका मातादीन भी उसी दिन खून।
  1. अमीर सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1972 क्रि० लॉ ज० 465.
  2. ए० आई० आर० 1976 सु० को 199.
  3. (2010) 2 क्रि० ला ज० 1420 (एस० सी०).
  4. राम टहल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1972 सु० को 254.
  5. उपरोक्त सन्दर्भ ।
से रंगी लाठी ले जाते हुये पकड़ लिया गया। अभियुक्तों का भी चिकित्सीय परीक्षण किया गया और उनके शरीर पर भी कुछ चोटों के निशान पाये गये। यह निश्चित हुआ कि “सम्पूर्ण परिस्थितियाँ बिना किसी सन्देह के इस बात को साबित करती हैं कि उनके बीच छप्पर को हटाने तथा किसी व्यक्ति द्वारा विरोध किये जाने पर उस पर हथियारों से प्रहार करने की पूर्व निर्धारित योजना थी और यह उनका सामान्य आशय था।” इस वाद में उच्चतम न्यायालय इस बात से सहमत था कि सामान्य आशय समय की दृष्टि से अपराध घटित होने के पहले का होना चाहिये जो पूर्व निर्धारित योजना तथा पूर्व विचार विमर्श को दर्शाता है। पूर्व निर्धारित योजना अपराध कारित करने के दौरान घटनास्थल पर भी उत्पन्न हो सकती है परन्तु महत्वपूर्ण बात। यह है कि यह योजना अपराध घटित होने के पूर्व की होनी चाहिये। जहाँ अनेक व्यक्तियों ने मिलकर मृतक के ऊपर घातक हथियारों से आक्रमण किया जिसके फलस्वरूप उसके शरीर में 24 कटे हुये घाव हो गये। ये घाव शरीर के विभिन्न हिस्सों जैसे सिर, कन्धे, अग्रबाहु आदि पर हुये थे तथा मिलाकर घातक थे। इन तथ्यों के आधार पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 तथा धारा 34 के अन्तर्गत सजा को न्यायोचित ठहराने हेतु सामान्य आशय प्रमाणित हो चुका है 50 दुखमोचन पाण्डेय बनाम-स्टेट आफ बिहार51 के वाद में लगभग 200 लोगों की भीड़ विभिन्न अस्त्रशस्त्रों से लैश होकर खेत के पास मात्र इस उद्देश्य से आये कि अभियोजन पक्ष के लोगों को खेत में धान की पौध लगाने से रोका जाय परन्तु तात्कालिक तौर पर अभियुक्तों में से ही कुछ लोगों द्वारा ललकारने के परिणामस्वरूप शस्त्रों से लैश कुछ लोगों ने मृतक पर प्रहार करना शुरू कर दिया। अभियुक्त दुखमोचन पाण्डेय तथा सर्वनारायण मिश्र ने अपनी बन्दूक से फायर किया परिणामस्वरूप रजाउल्ला और अहमशाह गिर पड़े। सूचना देने वाला कपिलेश्वर पाण्डेय (गवाह-18) बुरी तरह भयभीत हो जाने के कारण नजदीक के ही जनेरा के खेत में भाग कर इस प्रकार छिप गया ताकि आक्रमणकारी उसे देख न सकें परन्तु वह अभियुक्तों द्वारा खेत में काम कर रहे मजदूरों पर किये जा रहे विभिन्न आक्रमणों को देख सकता था। जब मजदूरों के ऊपर आक्रमण जारी था उसी बीच किसी ने चिल्लाकर कह दिया कि पुलिस के साथ मजिस्ट्रेट आ गया है। यह आवाज सुनकर अभियुक्तगण घटनास्थल से भाग खड़े हुये। मजिस्ट्रेट और पुलिस जो कि उस गाँव में कैम्प लगाये थे, परन्तु उस दिन घटना के समय मौजूद नहीं थे, घटना की जानकारी मिलने पर शीघ्र ही घटनास्थल पहुँच गये। सूचना देने वाले गवाह नं० 18 कपिलेश्वर पाण्डेय ने घटना का विस्तृत विवरण लिख कर मजिस्ट्रेट को दिया। यह अभिनिर्धारित किया गया कि सभी अभियुक्तों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/34 के अन्तर्गत हत्या के लिये सिद्ध दोष नहीं किया जा सकता है। मात्र यह तथ्य कि अभियुक्तगण किन्हीं शस्त्रों से लैश थे अपने आप में उन सब का हत्या करने का सामान्य आशय मानने के लिये पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि उन लोगों ने मात्र हमला किया था जो कि शरीर के महत्वपूर्ण (vital) अंग में नहीं था, परन्तु जिससे कुछ मामूली चोटें आई थीं, इससे यह सन्देह के परे सिद्ध नहीं माना जा सकता कि उसका सामान्य आशय मृतक की हत्या करना था। परन्तु जिन लोगों ने ललकार सुनकर बन्दूक से गोली चलायी वे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/34 के अधीन दोषसिद्ध माने जायेंगे। आगे यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि किसी मामले में सामान्य आशय घटना स्थल पर ही अपराध कारित किये जाने के दौरान उत्पन्न हो सकता है। परन्तु यह सामान्य आशय जो घटना स्थल पर ही उत्पन्न होता है, कई व्यक्तियों में एक ही समय उत्पन्न होने वाले समरूप आशय (similar intention) से भिन्न होता है। और इस अन्तर को सदैव ध्यान में रखना चाहिये, क्योंकि जहाँ पर वे सब लोग जिन्होंने घटनास्थल पर तत्काल प्रत्यक्ष हमला किया, उन पर ऐसी दशा में धारा 34 को लागू किया जा सकता है या नहीं यह निर्णय करने में सुसंगत होगा। जब तक कि मामले की सिद्ध परिस्थितियों से सामान्य आशय का एक आवश्यक
  1. वी० एन० श्रीकान्तिया बनाम मैसूर राज्य, ए० आई० आर० 1958 सु० को 672.
  2. 1999 क्रि० लॉ ज० 66 (एस० सी०).
अनुमान नहीं लगाया जा सकता है तब तक अभियगुणों को किसी अन्य के द्वारा कारित कार्य हेतु नहीं व उनके स्वयं द्वारा किये गये व्यक्तिगत कार्यों हेतु ही दायित्वाधीन ठहराया जा सकता है। शारीरिक उपस्थिति तथा सक्रिय सहभागीदारी कब आवश्यक है (Physical presence and clve participation when necessary)– धारा 34 के प्रवर्तन के लिये घटनास्थल पर अभियुक्त की रारिक उपस्थिति आवश्यक है। श्री कान्तिया बनाम बम्बई राज्य3 के वाद में अभियुक्त जो एक लोक था , के ऊपर धारा 409 तथा धारा 34 के अन्तर्गत अभियोग लगाया गया था। वह एक सरकारी डिपो का इंचार्ज था। उसके सहयोगियों ने डिपो से सरकारी सामान को बाहर जाने दिया। उसने अपने सहयोगियों को सामान हटाने के लिये दुष्प्रेरित किया था। यद्यपि सामान डिपो से हटाये जाने के समय शारीरिक रूप से उसकी उपस्थिति के बारे में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं था। न्यायालय ने यह माना कि अभियुक्त को केवल दुष्प्रेरण के लिय सजा दी जा सकती है, धारा 409 में लगाये गये आरोप के लिये नहीं क्योंकि योजना बनाने के सम्बन्ध में। साक्ष्य दुष्प्रेरण (abetment) के आरोप को ही प्रमाणित कर सकता है, वास्तविक सहभागीदारी को नहीं। यह प्रेक्षित किया गया कि धारा 34 के प्रवर्तन के लिये आवश्यक है कि अभियुक्त घटनास्थल पर सशरीर मौजूद रहा हो तथा अपराध कारित करने में उसने हिस्सा लिया हो। यद्यपि यह आवश्यक नहीं है कि वह उसी कमरे में उपस्थित रहे जिसमें अपराध घटित हुआ परन्तु यह आवश्यक है कि वह इतना नजदीक हो जैसे घर के दरवाजे पर खड़ा होकर रखवाली करना, या सड़क पर खड़ा होकर चौकसी करना, ताकि आने वाले खतरे की सूचना अपने साथियों को दे सके। वह शारीरिक रूप में उपस्थित रहा हो तथा वास्तविक अपराध घटित । होते समय उसमें हिस्सा लिया हो।54 यह सिद्धान्त उच्चतम न्यायालय द्वारा जे० एम० देसाई बनाम बम्बई राज्य55 के वाद में थोडा संशोधित कर दिया गया। इस मामले में जे० एम० देसाई, रंगाई करने वाली एक संस्था का मैनेजिंग डायरेक्टर था। संस्था का नाम पारेख डाइंग एण्ड प्रिटिंग मिल्स लिमिटेड, बाम्बे था। इस कम्पनी ने वस्त्र आयुक्त (Textile Commissioner) के साथ एक संविदा किया जिसके अधीन कम्पनी को बहुत अधिक मात्रा में कपड़े रंगने के लिये दिये गये। कुछ कपड़ों की रंगाई के पश्चात् वस्त्र आयुक्त को सुपुर्द कर दिया गया, परन्तु जो बाकी बचे कपड़े थे उन्हें अनेक अनुस्मारक (reminders) के पश्चात् भी आयुक्त को नहीं लौटाया गया। अतः मैनेजिंग डायरेक्टर तथा द्वितीय डायरेक्टर को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 के अन्तर्गत अपराधिक न्यास भंग तथा धारा 34 के अन्तर्गत अभियोजित किया गया। न्यायालय ने निर्णय किया कि ‘‘ धारा 34 को लागू करने के लिये अनेक व्यक्तियों की कृत्य के सम्पादन में साझेदारी आवश्यक है, मात्र इसकी योजना करना ही आवश्यक नहीं है। परन्तु यह सहभागीदारी हमेशा शारीरिक उपस्थिति द्वारा आवश्यक नहीं है। शारीरिक हिंसा के मामलों में शारीरिक उपस्थिति संयुक्त दायित्व के सिद्धान्त को लागू करने के लिये आवश्यक होती है। परन्तु अन्य मामलों में शारीरिक उपस्थिति आवश्यक नहीं है, क्योंकि उन्हें अलग-अलग स्थान तथा अलग-अलग समय में किया जा सकता है।” । कृष्णा बनाम राज्य6 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि भा० द० सं० की धारा 34 के अधीन आरोप के लिये किसी आपराधिक कृत्य को करने के लिये एक से अधिक व्यक्तियों के बीच सामान्य आशय होने की पूर्वापेक्षा की गई है। धारा 34 की मुख्य विशेषता है, कृत्य में भागीदारी का तत्व। यह आवश्यक नहीं है कि सभी मामलों में यह भागीदारी शारीरिक उपस्थिति के माध्यम से हो। सामान्य आशय से सहमति से कृत्य करना विवक्षित है। एक पूर्व निर्धारित योजना होती है जो आचरण से या परिस्थितियों से अथवा फंसाने वाले तथ्यों के जरिये साबित होती है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 में किसी आपराधिक कृत्य को करने का संयुक्त दायित्व निहित होता है। समान आशय का विद्यमान होना आधारभूत दायित्व है। इसीलिये दायित्व और दोष निर्धारण के लिये पूर्व सहमति और पूर्व नियोजित योजना ही मुख्य आधार है।
  1. दुखमोचन पाण्डेय बनाम स्टेट आफ बिहार, 1990 क्रि० लॉ ज० 66 (एस० सी०).
  2. ए० आई० आर० 1955 सु० को० 287.
  3. शिवप्रसाद बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए० आई० आर० 1960 एस० सी० 889
  4. ए० आई० आर० 1965 सु० को० 264..
  5. 2003 क्रि० लाँ ज० 3705 (मु० को०).
आगे यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 34 के अधीन आन्वयिक दायित्व तो सुस्पष्ट मामलों में उत्पन्न हो सकता है। कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिये जिसे उसने कारित किया ही नहीं आन्वयिक रूप से निम्न कारणों से दायी हो सकता है, (1) ऐसा अपराध कारित करने के लिये सभी का समान आशय हो (देखें, धारा 34 ); (2) ऐसा अपराध कारित करने के लिये किये गये षडयंत्र का सदस्य हो (देखें, धारा 120); और (3) वह विधिविरुद्ध जमाव का सदस्य हो, जिसके सदस्यों को यह जानकारी हो कि कोई अपराध कारित किया जाना है (देखिये धारा 149), धारा 34 ऐसे मामले की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये बनाई गई। है, जिसमें किसी समूह के सदस्यों के वैयक्तिक कत्यों के बीच यह साबित करना कि उनमें से किसने क्या भूमिका निभाया, प्रभेद करना कठिन हो। ऐसे मामले में सभी को दोषी क्यों माना जाता है, इसका कारण यह है कि सह-अपराधियों की उपस्थिति से वस्तुत: अपराध कारित करने वाले व्यक्तियों को प्रोत्साहन, समर्थन और सुरक्षा प्राप्त होती है। इस उपबंध में सामान्य रूप से ज्ञात यह सिद्धान्त सन्निहित है कि यदि दो या अधिक व्यक्ति किसी काम को आशय सहित संयुक्त रूप से करते हैं तो वह ठीक उसी प्रकार है मानों उनमें से प्रत्येक ने उसे वैयक्तिक रूप से किया है। * यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि धारा 34 का लागू होना प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर लागू होगा। इसलिये, धारा 34 को कहाँ लागू होना है या कहाँ लागू नहीं होना है, इस संबंध में कोई कठोर नियम अधिकथित नहीं किया जा सकता। धारा को लागू करने के लिये यह आवश्यक नहीं है। कि कोई अपराध कारित करने के लिये आरोपित कतिपय व्यक्तियों के कृत्य समान हों या स्पष्ट रूप से एक जैसे हों। कृत्य प्रकृति में भिन्न हो सकते हैं, किन्तु इस धारा को लागू करने के लिये कृत्य सामान्य आशय से प्रेरित होकर किया गया हो। वर्तमान हत्या के मामले में सामान्य आशय साबित किया गया है। अभियुक्तों में से एक द्वारा मृतक के सिर पर पहुँचाई गई चोट प्राणान्त साबित हुई। दूसरे अभियुक्त द्वारा पीठ पर पहुंचाई गई चोट प्राणान्तक नहीं थी। किन्तु इससे यह अभिनिर्धारित नहीं किया जा सकता कि जिस अभियुक्त ने प्राणान्तक चोट नहीं पहुँचाई, वह धारा 34 के साथ पठित धारा 302 के अधीन दोषसिद्ध किये जाने का दायी नहीं है। निर्णीत वाद-केरल राज्य बनाम राजप्पन नय्यर-7 के मामले में दिनांक 1-8-1987 को रात्रि लगभग 8 बजे जब द लगभग 500/- रुपये लिये घर वापस आ रहा था तो अ एवं ब ने उसका पीछा किया और चोरी करने के उद्देश्य से अ ने द के सर पर एक छड़ से मारा और जब वह बेहोश होकर गिर गया तो उसके रुपयों की चोरी कर ली। ब को भी अ के साथ चोरी के अपराध में अभियोजित किया गया। ब के विरुद्ध मात्र यह साक्ष्य था कि उसे द और य ने घटना के पूर्व अ के साथ देखा था और वह उनके आगे-आगे चल रहा था। जब द ने टार्च जलाई और उसके उजाले में दोनों को पहचान लिया तो दोनों ही सड़क के किनारे हट गये। कुछ दूर आगे बढ़ने पर जब द ने पीछे मुड़कर देखा तो उसे अ ने मारा और वह गिर गया। ब की उस समय अ के साथ उपस्थिति के बारे में उसने कोई जिक्र नहीं किया। यह निर्णय दिया गया कि ब की उस अपराध में भागीदारी के विषय में मात्र इतना ही साक्ष्य था कि वह घटना के पूर्व उसके साथ देखा गया था। केवल इतना ही साक्ष्य बिना इस बात के प्रमाण के कि ब अपराध कारित किये जाने में सहभागी था अथवा उस समय मौजूद था उसका सामान्य आशय सिद्ध करने हेतु यथेष्ट नहीं है। अतएव ब इस अपराध का दोषी नहीं है। इन्दर सिंह बनाम क्राउन58 के वाद में चार व्यक्ति बन्दूकों से लैस होकर प के घर को लूटने गये। प अनुपस्थित था। अ और ब दो लुटेरों ने प के नाबालिग पुत्र को पकड़ लिया तथा उससे कहा कि वह उन लोगों को वहाँ ले चले जहाँ प कार्य कर रहा था। उनके जाने के बाद स और द दो अन्य लुटेरे घर में रह गये। स घर के मुख्य दरवाजे के समीप खड़ा हो गया जिसे उसने बन्द कर दिया। प के दो अन्य पुत्र जो दुकान में थे, सन्देह होने पर घर को आये और धक्का देकर मुख्य दरवाजे को खोले जिस पर स ने उन पर गोली चला दी, जिससे एक की मृत्यु हो गयी। ऐसा माना गया कि अ यद्यपि कुछ समय के लिये अनुपस्थित था फिर भी हत्या का दोषी है क्योंकि वह संयुक्त आपराधिक कार्यवाही में शरीक था जिसके अधीन हत्या की गयी।
  1. 1987 क्रि० लॉ ज० 1257 (केरल).
  2. (1933) 14 लाहौर 814.
शंकर लाल बनाम गुजरात राज्य के वाद में चार अभियुक्त म को मारने के सामान्य आशय से र के ऊपर इस विश्वास एवं सदभाव में गोली चला रहे थे कि र ही म है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वे लोग निश्चयत: आपराधिक कृत्य धारा 34 के अन्तर्गत म को मारने के, सामान्य आशय को अग्रसरित करने के १ कर रहे थे। न्यायालय ने कहा कि वे लोग धारा 302 तथा धारा 34 के अन्तर्गत हत्या के दोषी क्योकि ऐसे मामले में प्रश्न यह नहीं होता कि क्या कोई भूल सामान्य आशय का एक भाग है अपितु प्रश्न यह होता है कि क्या यह सामान्य आशय को अग्रसर करने हेतु किया गया था। पूसा राम बनाम राजस्थान राज्य60 के वाद में ‘क’ तथा ‘द’ दो सगे भाई थे तथा प, क का पुत्र था। इन ताना व्यक्तियों ने मिलकर भाखरा राम पर लाठियों से प्रहार किया जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। जिस समय जगल में ये तीनों अभियुक्त मतक पर प्रहार कर रहे थे उसकी चीख सुनकर राम सिंह नामक एक व्यक्ति वहाँ पहुचा और उसने इन लोगों को मृतक पर प्रहार करते हुये देखा। उसने अभियुक्तों से प्रहार न करने को कहा। किन्तु वे मृतक पर प्रहार करते रहे और उसे भी मार डालने की धमकी दिया, जब अभियुक्त मृतक को बुरी । तरह घायल कर वहाँ से चले गये तो राम सिंह मृतक के पास गया और पाया कि भाखरा राम के दोनों हाथ । पगड़ी से बंधे हुये थे और वही पगड़ी उसके गले में भी लिपटी हुई थी। राम सिंह ने मृतक की माँ को इस घटना की सूचना दिया। जब मृतक की माँ उसके पास पहुँची तो उसने बताया कि ‘क’ ‘द’ और ‘प’ ने उसे बुरी तरह पीटा है और उसके कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गयी। चिकित्सीय परीक्षण से स्पष्ट हुआ था कि उसके शरीर पर 19 बाह्य तथा 5 आन्तरिक चोटें आयी थीं। इनमें से कुछ चोटें गम्भीर किस्म की थीं तथा शरीर के महत्वपूर्ण भागों पर थीं। डाक्टर के अनुसार ये चोटें संयुक्त रूप से सामान्य प्रक्रम में मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त थीं यद्यपि अलग-अलग इस प्रयोजन हेतु पर्याप्त नहीं थीं। राजस्थान उच्च न्यायालय ने अभिनित किया कि जब शरीर पर चोटें व्यापक रूप में थीं और कुछ चोटें शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों पर थीं, ऐसी दशा में अपराध आपराधिक मानव वध के अन्तर्गत आयेगा न कि हत्या के अन्तर्गत और यह धारा 299 के तृतीय भाग द्वारा नियन्त्रित होगा तथा धारा 304 के भाग दो के अन्तर्गत दण्ड का निर्धारण किया जायेगा। न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि अभियुक्तों ने संयुक्त तथा एक होकर मृतक पर प्रहार किया था जिससे तीनों के सामान्य आशय का पता चलता है। सिद्धि का दायित्व (Burden of Proof)–धारा 34 को आकर्षित करने के लिये इस तथ्य को नि:सन्देह सिद्ध करना चाहिये कि आपराधिक कृत्य सभी अभियुक्तों के सामान्य आशय को अग्रसर करने के उद्देश्य से किया गया था। दूसरे शब्दों में अभियोजन द्वारा यह सिद्ध किया जाना चाहिये कि सभी सहयोगियों ने सामान्य आशय में हिस्सा लिया तथा अपराध उसी सामान्य आशय के अधीन एक या अनेक सहभागियों द्वारा किया गया।61 यदि किसी अपराध को कारित करने के लिये अभियुक्त एकमत थे तो यह कहा जायेगा कि उनका सामान्य आशय उस अपराध को कारित करने का था। सामान्य आशय के लिये पूर्व-सुनियोजित योजना होनी चाहिये, भले ही वह योजना अचानक तैयार हुई हो या तत्काल तैयार हुई हो। जहाँ सूचना देने वाले ने अपने वक्तव्य में केवल इतना ही कहा कि अभियुक्तों में से ‘ग’ ने उस अभियुक्त जिसने घातक प्रहार किया था, के साथ षड्यंत्र किया था किन्तु उसके सामान्य आशय को दर्शित करने वाले किसी विवर्त (overt) कार्य को नहीं दर्शाया गया, ऐसी दशा में उनके पूर्व सुनियोजित योजना के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जा सकता और यह भी नहीं कहा जा सकता है कि क्षतिग्रस्त व्यक्ति को उपहति अभियुक्त के सामान्य आशय के अग्रसरण में कारित की गयी थी। अत: ग को सन्देह का लाभ मिलेगा।62 । गुप्तेश्वर नाथ ओझा तथा अन्य बनाम बिहार राज्य63 के वाद में अपीलार्थी घटनास्थल पर विद्यमान थे और शोर मचा रहे थे। वे अन्य लोगों को निर्देश दे रहे थे कि वे लोग मृतक पर प्रहार करें परन्तु स्वयं मृतक को मारने में भाग नहीं ले रहे थे। प्रश्न यह था कि क्या अपीलार्थियों के विरुद्ध सामान्य आशय का परिकल्पना की जा सकती है? उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि यह आवश्यक नहीं है
  1. ए० आई० आर० 1965 सु० को० 1260.
  2. 1984 क्रि० लाँ ज० 1848 (सु० को०).
  3. भावानन्द शर्मा बनाम असम राज्य ए० आई० आर० 1977 स० को 2252.
  4. दीवान चन्द्र तथा अन्य बनाम राज्य, 1984 क्रि० लॉ ज० 1045.
  5. 1986 क्रि० लाँ ज० 1242 (सु० को०),
सामान्य आशय का साक्ष्य प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध हो। सामान्य आशय का निष्कर्ष परिस्थितियों से निकाला जा सकता है। परन्तु यह सिद्ध करना आवश्यक नहीं है कि अपीलार्थी किसी अवैध सभा के सदस्य थे तथा वे। सामान्य उद्देश्य के अग्रसरण में कार्य कर रहे थे। एक व्यक्ति की सजा तथा अन्य को विमुक्ति (Conviction of one and acquittal of the other)-जब दो व्यक्तियों को धारा 302 तथा धारा 34 के अन्तर्गत अभियोजित किया जाता है तथा एक को सन्देह के आधार पर विमुक्त कर दिया जाता है, तो दूसरे अभियुक्त को धारा 302 के अन्तर्गत सजा नहीं दी जा सकती, जब तक कि प्रत्येक अभियुक्त द्वारा कारित चोट का स्पष्ट प्रमाण न मिल जाए। जहाँ सामान्य आशय नहीं साबित हो पाता है वहाँ अभियोजन का यह दायित्व है कि वह प्रत्येक अभियुक्त द्वारा कारित की गई चोट को स्पष्टत: स्थापित करे, खास कर वहाँ जहाँ एक अभियुक्त को सन्देह का लाभ मिल चुका है। ऐसी परिस्थितियों में यह नहीं प्रतिपादित किया जा सकता कि दूसरे अभियुक्त ने अकेले ही सभी चोटें पहुँचाई । थीं 64 अत: इस प्रकार के मामलों में अभियुक्त को धारा 302 के बजाय केवल धारा 325 के अन्तर्गत सजा दी जा सकती है। फिर भी अभियुक्त को धारा 34 को लागू कर सजा दी जा सकती है यद्यपि उसके सहयोगी अन्य अभियुक्तों को न्यायालय ने मुक्त कर दिया हो। परन्तु इसके लिये यह प्रमाणित होना चाहिये कि अभियुक्त तथा उसके सहयोगियों ने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने हेतु अपराध किया था।65 वी० एम० दउना बनाम बम्बई राज्य66 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने घोषित किया कि यह निर्धारित करने हेतु, कि क्या शेष एक या अन्य अभियुक्तों ने अपराध कारित करने के सामान्य आशय में हिस्सा लिया था तथा अपराध के सम्पादन में हिस्सा लिया था। यदि उनके ऐसे आशय तथा हिस्सेदारी का साक्ष्य प्राप्त हो जाता है तो धारा 34 के प्रवर्तन द्वारा उन्हें दण्डित किया जा सकता है। यदि एक अभियुक्त को मुक्त करने के पश्चात् केवल एक ही अभियुक्त शेष बचता है तो उसे सजा तभी दी जायेगी जब बिना किसी सन्देह के यह सिद्ध हो जाये कि वह विमुक्त व्यक्ति के अतिरिक्त किन्हीं अन्य व्यक्तियों के साथ अपराध कारित करने के सामान्य आशय में भागीदार था। वे अन्य व्यक्ति अभियोजन द्वारा नामजद हो भी सकते हैं और नहीं भी। मैना सिंह बनाम राजस्थान राज्य67 के वाद में अभियुक्त चार अन्य व्यक्तियों के साथ धारा 302 तथा धारा 149 या धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत अपराध कारित करने के कारण अभियोजित किया गया। चार अन्य अभियुक्तों को सन्देह का लाभ दिया गया। यह निर्णीत किया गया कि इस प्रमाण के अभाव में। कि अभियुक्तों ने कुछ अन्य कथित या अकथित व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होकर कार्य किया, धारा 302 के अन्तर्गत सजा नहीं हो सकती। इस प्रकरण में सभी सह-अभियुक्तों को विमुक्त कर दिया गया, क्योंकि ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि अभियुक्तों ने कुछ अन्य कथित या अकथित लोगों के साथ मिलकर कार्य किया था। कृष्णा बनाम महाराष्ट्र68 के वाद में चार व्यक्तियों के ऊपर धारा 302 तथा धारा 34 के अन्तर्गत हत्या का आरोप था। उच्च न्यायालय द्वारा उनमें से तीन को विमुक्त कर दिया गया तथा चौथे को सजा हो गयी। उच्चतम न्यायालय ने उसकी सजा को दूषित बताया और निम्न मत व्यक्त किया ‘तीन व्यक्तियों को विमुक्त करने का प्रभाव यह है कि वे अपराध कारित करने में चौथे व्यक्ति के साथ मिलकर कार्य नहीं कर रहे थे। यदि ऐसी बात थी तो चौथे अभियुक्त को भी विमुक्त व्यक्तियों के साथ मिलकर किये हुये अपराध के लिये सजा नहीं दी जा सकती।” उपरोक्त वर्णित मामलों का अध्ययन करने के पश्चात् इस विषय में निम्नलिखित सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया जा सकता है| (1) जहाँ कई व्यक्तियों पर मिलकर सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने के उद्देश्य से अपराध करने के कारण कोई आरोप लगाया जाता है तथा उनमें से कुछ को विमुक्त कर दिया जाता है किन्तु एक या अधिक
  1. बाउल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1968 सु० को० 728.
  2. वासिम खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1956 सु० को० 400.
  3. ए० आई० आर० 1960 सु० को० 289.
  4. ए० आई० आर० 1976 सु० को० 1084.
  5. ए० आई० आर० 1963 सु० को० 1413.
व्यक्तियों को सजा दी जाती है, तो सजा को न्यायोचित ठहराया जा सकता है यदि सिद्धदोष व्यक्ति ने सामान्य आशय में भाग लिया था। | (2) परन्तु यदि केवल एक व्यक्ति को सजा होती है और अन्य सभी को विमुक्त कर दिया जाता है, तो सजा को न्यायोचित नहीं माना जायेगा जब तक कि यह सिद्ध न हो जाये कि उसने कुछ अन्य कथित या अकथित व्यक्तियों के साथ मिलकर अपराध किया था। सह-अपराधियों में से किसी एक की दोषमुक्ति का प्रभाव- उच्चतम न्यायालय द्वारा वाई अकया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य69 के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि यदि सहअपराधियों में से एक पापमुक्त कर भी दिया जाता है तो वह अन्य सहअभियुक्तों को अपराध के संयुक्त दायित्व से अपने आप मुक्त नहीं करता है। विधि यह है कि किसी एक सह अपराधी के दोषमुक्त किये जाने के बावजूद यह न्यायालय के ऊपर है कि वह अन्य अभियुक्त या अभियुक्तों को संयुक्त दायित्व के आधार पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 के अधीन दोषसिद्ध कर सकती है यदि उनके विरुद्ध अपराध सामान्य आशय के अग्रसरण में कारित करने का साक्ष्य उपलब्ध है। इसी प्रकार कुछ अभियुक्तों की दोषमुक्ति अभियुक्त को दोषमुक्ति प्रदान करने का आधार नहीं हो सकता है।70 | आपराधिकता का वैयक्तीकरण (Individualisation of Criminality)–जब कोई आपराधिक कृत्य अनेक व्यक्तियों की सामूहिक कार्यवाही द्वारा किया जाता है तो प्रलक्षित दायित्व का सिद्धान्त सभी भागीदारों को इसमें अन्तर्निहित करता है। परन्तु आपराधिकता की मात्रा परिवर्तित हो सकती है जो मात्र हानिकारक परिणामों पर ही निर्भर नहीं होती अपितु उपस्थित परिस्थितियों तथा किये गये कार्य पर भी निर्भर होती है और जो प्रत्येक के सन्दर्भ में वैयक्तिक निवेदन करती हैं। न्यायालय के लिये आवश्यक है कि वह अभियुक्त की अन्तग्रस्तता की परिस्थतियों, उसकी अनावस्था (non-age) तथा परिणामों की सम्भावनाओं पर व्यक्तिगत ढंग से विचार करें ।।। सामान्य आशय तथा सामान्य उद्देश्य के बीच अन्तर (Distinction between Common intention and Common object) :। छत्तर मल बनाम राजस्थान राज्य72 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 34 और धारा 149 आन्वयिक आपराधिकता अर्थात् अन्य व्यक्तियों के कृत्यों के लिये प्रतिनिधायी दायित्व के बारे में हैं। दोनों ही धारायें व्यक्तियों के समूहीकरण के बारे में हैं, जो अपराध में भागीदारी के कारण दण्डनीय पाए जाते हैं। इस प्रकार उनमें कतिपय समरूपता और कुछ सीमा तक कृत्याधिक्य (overlap) भी होता है। धारा 34 और 149 दोनों ही धारायें आन्वयिक आपराधिक दायित्व के विषय में उपबन्ध करती हैं, अर्थात् कोई व्यक्ति ऐसे कार्य हेतु आपराधिक दायित्वाधीन होता है जो उसने स्वयं नहीं किया है। परन्तु दोनों ही धाराओं में स्पष्ट अन्तर है और दोनों के विस्तार क्षेत्र और सीमा के मध्य भ्रम नहीं होना चाहिये। दोनों ही धाराओं के मध्य अन्तर उस मामले में और महत्वपूर्ण हो जाता है जहाँ कि धारा 149 के अधीन आरोप कुछ अभियुक्तों के सम्बन्ध में विफल हो जाने के फलस्वरूप शेष आरोपियों को दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता है। क्योंकि उनकी संख्या पाँच से कम हो जाती है। ऐसे मामलों में प्रश्न यह उठता है कि क्या शेष अभियुक्तों को धारा 34 लागू कर दोषसिद्ध किया जा सकता है। ऐसे मामलों में न्यायालय को इस तथ्य और परिस्थिति का परीक्षण करना। होता है कि क्या धारा 34 के तत्व अस्तित्ववान हैं या नहीं। किन्तु सामान्य आशय और सामान्य उद्देश्य में । स्पष्ट अंतर किया गया है जो यह है कि सामान्य आशय में कृत्य सहमति से किया जाता है और इसके अन्तर्गत । पूर्व नियोजित योजना बनाना आवश्यक है जिसमें विवक्षित रूप से पहले से मानसिक तालमेल शामिल हैं, जबकि सामान्य उद्देश्य में पहले से किया गया मानसिक तालमेल या पूर्व योजना आवश्यक नहीं है। यद्यपि दोनों धाराओं में सारभूत अंतर है। कुछ सीमा तक एक परस्पर व्यापी (overlapping) भी होते हैं और १९
  1. (2009) 3 क्रि० ला ज० 2834 पृ० 2839 (एस० सी०).
  2. गुरुनाथ दौनकप्पाकैरी और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य, (2009) 3 क्रि० ला ज० 2995 पृ० 3002 पर (एस० सा०)।
  3. हीरालाल मलिक बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1977 सु० को० 2236.
  4. 2003 क्रि० लॉ ज० 889 (सु० को०).
निर्धारित करना प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है कि धारा 149 के अधीन आरोप धारा 34 के अधीन 99 आने वाले आधारों पर परिव्यापी हैं या नहीं। इस प्रकार यदि पाँच या अधिक व्यक्ति कोई कृत्य करते हैं और उस कृत्य को करने का आशय रखते हैं तो दोनों ही धारायें 34 और 149 अभियुक्त के विरुद्ध परिणाम देंगी। और इसलिये इसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिये। किन्तु यदि इसमें सामान्य आशय निहित है तो धारा 149 के स्थान पर धारा 34 का प्रतिस्थापन सामान्य बात होगी : ऐसा किया जाए या नहीं, यह प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। इसलिये धारा 149 का लागू न होना भा० द० सं० की धारा 302 के साथ पठित धारा 34 के अधीन अभियुक्त की दोषसिद्धि पर रोक का काम नहीं करेगी। नानक चन्द्र बनाम पंजाब राज्य73 के वाद में यह अभिधारित किया गया कि धारा 34 में आशय की सहभागिता का स्थान धारा 149 में उद्देश्य की सहभागिता (Community) जो एकदम भिन्न तत्व है, ले लेती है। सामान्य आशय में व्यक्तियों के बीच विचारों का पूर्व मिलन और पूर्व विचार-विमर्श की पूर्व कल्पना की जाती है जबकि सामान्य उद्देश्य बिना पूर्व योजना के गठित हो सकता है। ऐसे मामले हो सकते हैं जिनमें किसी समूह का उद्देश्य एक हो सकता है परन्तु भागीदारों के आशय भिन्न-भिन्न होते हैं। । (1) धारा 34 के अन्तर्गत दायित्व का आधार सामान्य आशय है जो अभियुक्त व्यक्तियों को प्रेरित करता । धारा 149 के अन्तर्गत दायित्व का आधार सामान्य उद्देश्य या किसी अपराध के घटित होने की सम्भाव्यता है। दूसरे शब्दों में अभियुक्त कार्य के स्वाभाविक परिणाम से अवगत रहते हैं। (2) धारा 34 के अर्थ के अन्तर्गत सामान्य आशय अपरिभाषित तथा असीमित है। सामान्य उद्देश्य परिभाषित है तथा संहिता की धारा 141 के अनुसार पाँच अवैध उद्देश्यों तक सीमित है। (3) धारा 34 के अन्तर्गत आपराधिक कृत्य सामान्य आशय को अग्रसर करने के लिये किया जाता है। धारा 149 के अन्तर्गत आपराधिक कृत्य सामान्य उद्देश्य के निष्पादन में किया जाता है या यह भी पर्याप्त होगा यदि अवैध सभा के सदस्य यह जानते थे कि अपराध घटित होने वाला है। (4) अपराध कारित करने में प्रत्येक अभियुक्त द्वारा कोई न कोई चाहे वह कितना ही तुच्छ या महत्वहीन क्यों न हो किया जाना चाहिये। अर्थात् धारा 34 के प्रवर्तन के लिये अपराध कारित करने में सक्रिय सहयोग आवश्यक है। धारा 149 के प्रवर्तन के लिये अपराध घटित होते समय अवैध सभा का सदस्य होना पर्याप्त है। अपराध कारित करने में सक्रिय सहयोग आवश्यक नहीं है। (5) धारा 34 के प्रवर्तन द्वारा किसी अपराध के लिये उत्तरदायी बनाने हेतु यह आवश्यक है कि अपराध दो या अधिक व्यक्तियों द्वारा किया गया हो। धारा 149 के प्रवर्तन के लिये आवश्यक है कि अपराध 5 या अधिक व्यक्तियों द्वारा किया गया हो, क्योंकि पाँच या उससे अधिक व्यक्ति ही अवैध सभा का निर्माण कर सकते हैं। (6) धारा 34 संयुक्त दायित्व के सिद्धान्त को प्रतिपादित करती है परन्तु कोई विशिष्ट अपराध नहीं सृजित करती। यह निर्वचनात्मक (interpretative) प्रकृति की है। धारा 149 विशिष्ट अपराध सृजित करती है। यह संयुक्त दायित्व के सिद्धान्त की घोषणा करती है। (7) धारा 34 के अन्तर्गत शारीरिक कृत्य तथा मानसिक स्थिति दोनों (अर्थात अपराध कारित करते समय मस्तिष्क की अवस्था) को वर्गीकृत कर उस समुदाय को जो अपराध कारित करता है तथा उन व्यक्तियों को जो उस समुदाय को निर्मित करते हैं, पर बल दिया जाता है। धारा 141 के अन्तर्गत शारीरिक कृत्य तथा मानसिक स्थिति दोनों के सम्बन्ध में पूर्ण जोर अवैध सभा पर दिया जाता है। (8) धारा 34 के अन्तर्गत अपराधी शारीरिक तथा मानसिक, दोनों दृष्टिकोणों से आपराधिक कृत्य से सम्बन्धित रहता है। वह आपराधिक कृत्य तथा सामान्य आशय जिसको अग्रसर करने हेतु आपराधिक कृत्य
  1. ए० आई० आर० 1953 एस० सी० 274.
किया गया, दोनों में, भागीदार होता है। धारा 149 के अन्तर्गत मात्र इसलिये, एक व्यक्ति दण्डनीय है, क्योंकि अवध सभा के किसी सदस्य द्वारा अपराध कारित किये जाते समय वह अवैध सभा का सदस्य था, यद्यपि कि उसने स्वयं अपराध कारित नहीं किया था। धारा 34 के अन्तर्गत प्रतिनिहित दायित्व-विरेन्द्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य74 के वाद में यह ऑभनिर्धारित किया गया कि भा० द० संहिता की धारा 34 के अधीन प्रतिनिहित दायित्व तभी माना जायेगा जब दो शर्ते पूरी हों अर्थात् मानसिक तत्व या अन्य अभियुक्तों के साथ मिलकर (conjointly) अपराधिक कृत्य कारित करने का आशय तथा दूसरा अपराध कारित करने में किसी न किसी रूप में वास्तविक भागीदारी। सामान्य आशय के लिये पूर्व नियोजित योजना जिससे मस्तिष्क का पूर्व मिलन हो, आवश्यक है। यह अपराध कारित करने का आशय है जो आवश्यक है और किसी अभियुक्त को तभी दोषसिद्ध किया जा सकता है जब ऐसे आशय में सभी अभियुक्त भागीदार हों। इस प्रकार धारा 34 का महत्वपूर्ण तत्व है आशय और कृत्य में भागीदारी है। यह भागीदारी सभी मामलों में शारीरिक उपस्थिति द्वारा ही आवश्यक नहीं है। सामान्य आशय में सहमति से आपराधिक कृत्य करना अन्तर्निहित (implied) है। धारा 34 किसी विशिष्ट अपराध का सृजन नहीं करती है। वरन् प्रतिनिहित दायित्व का सिद्धान्त निर्धारित करती हैं। धारा 34 यह अभिधारित करती है कि कार्य सामान्य आशय के अग्रसरण में किया जाना होना चाहिये।
  1. जब कि ऐसा कार्य इस कारण आपराधिक है कि वह आपराधिक ज्ञान या आशय से किया गया है-जब कभी कोई कार्य, जो आपराधिक ज्ञान या आशय से किए जाने के कारण ही आपराधिक है, कई व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति, जो ऐसे ज्ञान या आशय से उस कार्य में सम्मिलित होता है, उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है, मानो वह कार्य उस ज्ञान या आशय से अकेले उसी द्वारा किया गया हो।
टिप्पणी यदि अनेक व्यक्ति एक ही जैसा आपराधिक आशय या ज्ञान रखते हैं और संयुक्त होकर हत्या करते हैं, तो प्रत्येक व्यक्ति अपराध के लिये दायित्वाधीन होगा, जैसे कार्य को उसने स्वयं किया हो। किन्तु यदि अनेक व्यक्ति एक कार्य में सम्मिलित होते हैं, प्रत्येक का आशय या ज्ञान एक दूसरे से भिन्न है, तब प्रत्येक व्यक्ति | अपने आपराधिक आशय या ज्ञान के अनुसार दायित्वाधीन होगा। यदि कोई कार्य अपने आप में एक अपराध है तथा कर्ता के आपराधिक ज्ञान या आशय के बिना अनेक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तो उनमें से प्रत्येक अपराध के लिये उत्तरदायी है। जहाँ अनेक व्यक्ति एक कृत्य में सम्मिलित होते हैं जो किसी विशिष्ट ज्ञान या आशय द्वारा किये जाने के कारण मात्र से ही अपराध हो जाता है, प्रत्येक व्यक्ति अपने ज्ञान या आशय की सीमा तक उस कार्य के लिये उत्तरदायी होगा।75 आदम अली तालुकदार76 के वाद में अ तथा ब ने स को इतना पीटा कि वह मर गया। अ उसकी हत्या करना चाहता था तथा यह भी जानता था कि उसके इस कार्य से उसकी मृत्यु हो जायेगी। ब की इच्छा मात्र घोर उपहति (grievous hurt) कारित करने की थी तथा उसे इस बात का ज्ञान नहीं था कि उसके कार्य से स की मृत्यु हो जायेगी या उसे शारीरिक चोट आयेगी जिससे उसकी मृत्यु हो सकती है। अ हत्या तथा ब घोर उपहति का दोषी पाया गया। घूरे77 के वाद में यह निर्णीत किया गया कि यदि किसी तेज धार वाले हथियार से या अग्नि शस्त्र से प्रहार किया जाता है तो यह माना जाना चाहिये कि हत्यारों को इस बात का ज्ञान था कि इस प्रकार के हथियार के प्रयोग से मृत्यु होने की सम्भावना था। और यदि सचमुच मृत्यु हो जाती है तो उनमें से प्रत्येक व्यक्ति हत्या का दोषी होगा।
  1. (2011) I क्रि० लॉ ज० 952 (एस० सी०).
  2. आदम अली बनाम तालुकदार, ए० आई० आर० 1927 कल० 324.
  3. उपरोक्त सन्दर्भ. 77. (1949) इलाहाबाद 770.
  4. अंशतः कार्य द्वारा और अंशतः लोप द्वारा कारित परिणाम-जहाँ कहीं किसी कार्य द्वारा या किसी लोप द्वारा किसी परिणाम का कारित किया जाना या उस परिणाम को कारित करने का प्रयत्न करना अपराध है वहाँ यह समझा जाता है कि उस परिणाम का अंशत: कार्य द्वारा और अंशत: लोप द्वारा कारित किया जाना वही अपराध है।
दृष्टान्त क अंशत: य को अवैध रूप से भोजन देने का लोप करके, और अंशत: य को पीटकर साशय य की मृत्यु कारित करता है। क ने हत्या की है। टिप्पणी धारा 32 प्रतिपादित करती है कि कार्य में अवैध लोप भी सम्मिलित है। तात्पर्य यह है कि अवैध लोप के भी वही विधिक परिणाम होंगे जो एक कार्य के होते हैं। अत: यदि कोई अपराध अंशत: कार्य द्वारा और अंशत: अवैध लोप द्वारा कारित किया जाता है तो परिणाम वही होगा मानो अपराध या तो मात्र कार्य द्वारा या मात्र लोप द्वारा किया गया है।
  1. किसी अपराध को गठित करने वाले कई कार्यों में से किसी एक को करके सहयोग करना– जबकि कोई अपराध कई कार्यों द्वारा किया जाता है, तब जो कोई या तो अकेले या किसी अन्य व्यक्ति के साथ सम्मिलित होकर उन कार्यों में से कोई एक कार्य करके उस अपराध के किए जाने में साशय सहयोग करता है, वह उस अपराध को करता है।
दृष्टान्त (क) क और ख पृथक-पृथक रूप से और विभिन्न समयों पर य को विष की छोटी-छोटी मात्राएं देकर उसकी हत्या करने को सहमत होते हैं। क और ख, य की हत्या करने के आशय से सहमति के अनुसार य को विष देते हैं। य इस प्रकार दी गई विष की कई मात्राओं के प्रभाव से मर जाता है। यहाँ क और ख हत्या करने में साशय सहयोग करते हैं, और क्योंकि उनमें से हर एक ऐसा कार्य करता है, जिससे मृत्यु कारित होती है, वे दोनों इस अपराध के दोषी हैं, यद्यपि उनके कार्य पृथक हैं। । (ख) क और ख संयुक्त जेलर हैं, और अपनी उस हैसियत में वे एक कैदी य का बारी-बारी से एक समय में 6 घण्टे के लिए संरक्षण- भार रखते हैं। य को दिए जाने के प्रयोजन से जो भोजन क और ख को दिया जाता है, वह भोजन इस आशय से कि य की मृत्यु कारित कर दी जाए, हर एक अपनी हाजिरी के काल में ये को देने का लोप करके वह परिणाम अवैध रूप से कारित करने में जानते हुए सहयोग करते हैं। ये भूख से मर जाता है। क और ख दोनों य की हत्या के दोषी हैं। । (ग) एक जेलर क, एक कैदी य का संरक्षण- भार रखता है। क, य की मृत्यु कारित करने के आशय से, य को भोजन देने का अवैध रूप से लोप करता है, जिसके परिणामस्वरूप य की शक्ति बहुत क्षीण हो जाती है, किन्तु यह क्षुधापीड़न उसकी मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। क अपने पद से च्युत कर दिया जाता है और ख उसका उत्तरवर्ती होता है। क से दुस्संधि या सहयोग किए बिना ख यह जानते हुए कि ऐसा करने से सम्भाव्य है कि वह य की मृत्यु कारित कर दे, य को भोजन देने का अवैध रूप से लोप करता है। य भूख से मर जाता है । ख हत्या का दोषी है किन्तु क ने ख से सहयोग नहीं किया, इसलिए क हत्या करने के प्रयत्न का ही दोषी है। टिप्पणी जहाँ कई कार्यों की परिणति एक साथ एक अपराध कारित करने में होती है, उनमें से किसी एक का अपराध में सहयोग करने के उद्देश्य से कारित करना जो सभी के सामान्य आशय जैसा नहीं हो सकता, कर्ता को अपराध कारित करने के लिये दण्ड हेतु दायी बना देता है।78 विंगले79 के वाद में कई व्यक्तियों ने संयुक्त होकर एक दस्तावेज को कूटकृत करने की योजना बनायी। प्रत्येक ने कूटकरण के एक भाग को स्वयं निष्पादित किया तथा उनमें से सभी उस समय उपस्थित नहीं थे जबकि दस्तावेज पूरा हुआ। यह निर्णीत हुआ कि सभी कूटकरण के लिये प्रमुख (Principal) की तरह दोषी हैं।
  1. वारेन्द्र कुमार घोष, (1924) 52 आई० ए० 40.
  2. (1827) रस एण्ड आर० वाई० 446.
धारा 34 तथा 37 के बीच अन्तर– धारा 34 तब तक लागू होती है जब आपराधिक कृत्य कई व्यक्तियों के सामान्य आशय को अग्रसर करने हेतु कारित किया जाता है। धारा 37 साशय सहयोग से सम्बन्धित है जिसमें अपराध कई कार्यों के परिणामस्वरूप होता है तथा उनमें से प्रत्येक अपने आप में अपराध नहीं होता जिसका आरोप अभियुक्त पर लगाया जाता है। अत: धारा 37 उस प्रकरण में लागू नहीं होगी जिसमें आभयुक्त के ऊपर यह आरोप लगाया गया था कि उसने लाठी द्वारा प्रहार कर साधारण या घोर उपहति कारित किया था, क्योंकि यह नहीं कहा जा सकता कि कई कार्य मिलकर अपराध सृजित किये हैं।
  1. आपराधिक कार्य में संयुक्त व्यक्ति विभिन्न अपराधों के दोषी हो सकेंगे-जहाँ कि कई व्यक्ति किसी आपराधिक कार्य को करने में लगे हुए या सम्पृक्त हैं, वहाँ वे उस कार्य के आधार पर विभिन्न अपराधों के दोषी हो सकेंगे।
दृष्टान्त क गम्भीर प्रकोपन की ऐसी परिस्थितियों के अधीन य पर आक्रमण करता है कि य का उसके द्वारा वध किया जाना केवल ऐसा आपराधिक मानव वध है, जो हत्या की कोटि में नहीं आता है। ख जो य से वैमनस्य रखता है, उसका वध करने के आशय से और प्रकोपन के वशीभूत न होते हुए य का वध करने में क की सहायता करता है। यहाँ, यद्यपि क और ख दोनों य की मृत्यु कारित करने में लगे हुए हैं, ख हत्या का दोषी है और क केवल आपराधिक मानव वध का दोषी है। टिप्पणी धारा 34, 35 तथा 38 एक ही उद्देश्य से सम्बन्धित हैं। अत: उन्हें एक साथ पढ़ा जाना चाहिये । धारा 34 सामान्य आशय से किये हुये कार्यों से सम्बन्धित है तथा धारा 38 भिन्न आशयों से किये हुये कार्यों से सम्बन्धित है। धारा 32 से 38 में अन्तर्निहित आधारभूत सिद्धान्त यह है कि कुछ परिस्थितियों में सम्पूर्ण कार्य को किसी एक व्यक्ति द्वारा किया हुआ माना जाता है, यद्यपि वह उसके एक भाग को ही करता है। धारा 34 इस सिद्धान्त पर आधारित है जिसमें बल कार्य पर दिया जाता है। वारेन्द्र कुमार घोष बनाम इम्परर81 के वाद में स्पष्ट किया गया है कि धारा 38 एक अपराध के लिये एक दण्ड के विकल्प के रूप में विभिन्न अपराधों के लिये विभिन्न दण्ड का उपबन्ध करती हैं चाहे आपराधिक कृत्य कारित करने में लगे व्यक्ति एक ही आशय से गतिशील हुये हों या भिन्न आशय से। यह धारा उपबन्धित करती है कि किसी आपराधिक कार्य को करने में लगे हुये व्यक्ति उनके आशय में भिन्नता होने के कारण विभिन्न अपराधों के दोषी हो सकेंगे। इन्दर82 के प्रकरण में क तथा ख एक तरफ तथा ग दूसरी तरफ, ने आपस में झगड़ा किया। ग ने क को गाली दी जिस पर उसने ग के ऊपर लाठी से प्रहार किया तथा ख ने ग के सर पर कुल्हाड़ी से प्रहार किया। ग को शरीर के अन्य अंगों में भी दो जगह कुल्हाड़ी से चोट आयी। कुल्हाड़ी द्वारा लगी तीन चोटों में से कोई एक, मुख्य रूप से सिर पर लगी चोट मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त थी। यह निर्णय किया गया कि ख सदोष मानव वध का दोषी है जब कि ग स्वैच्छिक चोट कारित करने का दोषी है। | भावानन्द बनाम असम राज्य83 के वाद में तीन अभियुक्तों ने आहत व्यक्ति के ऊपर प्रहार किया, उनमें से दो ने जिस प्रकार अपने हथियारों का प्रयोग किया था उससे स्पष्ट होता था कि उनका आशय उस व्यक्ति की हत्या करना था। तीसरे अभियुक्त ने उसे चोट पहुँचाने के लिये अपनी लाठी का प्रयोग नहीं किया। यह निर्णीत हुआ कि दो अभियुक्त हत्या के दोषी हैं तथा तीसरा धारा 304 भाग 2 के अन्तर्गत दोषी है क्योंकि वह आशय अपराध के सम्पादन में सम्मिलित हुआ था और उसे इस बात का ज्ञान था कि आहत व्यक्ति पर किया। जाने वाला प्रहार उसकी मृत्यु कारित कर सकता है यद्यपि उसका आशय हत्या कारित करना नहीं था।
  1. स्वेच्छया”-कोई व्यक्ति किसी परिणाम को ‘‘स्वेच्छया” कारित करता है, यह तब कहा जाता है, जब वह उसे उन साधनों द्वारा कारित करता है, जिनके द्वारा उसे कारित करना उसका आशय था, या उन । 80. मक्का (1952) क्रि० लॉ ज० 797.
  2. (1924) 52 आई० ए० 40. ।
  3. (1882) 2 ए० डब्ल्यू ० एन० 23.
  4. ए० आई० आर० 1977 सु० को 2252.
साधनों द्वारा कारित करता है जिन साधनों को काम में लाते समय वह यह जानता था, या यह विश्वास करने । का कारण रखता था कि उनसे उसका कारित होना सम्भाव्य है। दृष्टान्त | क लूट को सुकर बनाने के प्रयोजन से एक बडे नगर के एक बसे हुए गृह में रात को आग लगाता है और इस प्रकार एक व्यक्ति की मृत्यु कारित कर देता है। यहाँ क का आशय भले ही मृत्यु कारित करने का न रहा हो और वह दुखित भी हो कि उसके कार्य से मृत्यु कारित हुई है तो भी यदि वह यह जानता था कि सम्भाव्य है कि वह मृत्यु कारित कर दे, तो उसने स्वेच्छया मृत्यु कारित की है। टिप्पणी अवयव– एक व्यक्ति किसी परिणाम को ‘‘स्वेच्छया” कारित करता है, यदि (1) वह उसे उन साधनों से कारित करता है जिनके द्वारा उसे कारित करना उसका आशय था; या (2) वह उन साधनों द्वारा कारित करता है जिन साधनों को काम में लाते समय वह यह जानता था कि उसका कारित होना सम्भाव्य था; या | (3) वह उन साधनों द्वारा कारित करता है जिन साधनों को काम में लाते समय वह यह विश्वास करने का कारण रखता था कि उसका कारित होना सम्भाव्य है। यह धारा ‘‘स्वेच्छया” शब्द को ‘‘परिणाम कारित करने के संदर्भ में परिभाषित करती है और किसी कार्य को करने से सन्दर्भित नहीं है जिसकी परिणति किसी अपराध में होती है। संहिता उन मामलों, जिनमें कोई व्यक्ति किसी परिणाम को जानबूझ कारित करता है तथा उनमें जिन्हें वह संज्ञान कारित करता है या जिसके कारित होने की सम्भाव्यता का उसके ऊपर आधार था, में भेद नहीं करती है। यदि परिणाम साधनों का सम्भावित प्रतिफल है तो इसे स्वेच्छया कारित हुआ कहा जाता है चाहे वास्तव में उसे कारित करने की उसकी इच्छा थी या नहीं। रामरूप84 के वाद में यह निर्णीत हुआ कि कोई कार्य या लोप स्वेच्छया हुआ माना जायेगा यदि इसे उचित सावधानी के प्रयोग द्वारा बचाया जा सकता। अत: एक उपेक्षापूर्ण कार्य या लोप इच्छित होगा क्योंकि दोषी व्यक्ति सम्पादन या लोप को बचाने का इच्छुक नहीं था।
  1. अपराध‘-इस धारा के खण्ड 2 और 3 में वर्णित अध्यायों और धाराओं में के सिवाय ** अपराध” शब्द इस संहिता द्वारा दण्डनीय की गई किसी बात का द्योतक है।
अध्याय 4, अध्याय 5-क और निम्नलिखित धाराएं, अर्थात् धारा 64, 65, 66, 67, 71, 109, 110, 112, 114, 115, 116, 117, 85[118, 119, 120], 187, 194, 195, 203, 211, 213, 214, 221, 222, 223, 224, 225, 327, 328, 329, 330, 331, 347, 348, 388, 389 और 445 में ”अपराध’ शब्द इस संहिता के अधीन या एतस्मिन्पश्चात् यथापरिभाषित विशेष या स्थानीय विधि के अधीन दण्डनीय बात का द्योतक है। | और धारा 147, 176, 177, 201, 202, 212, 216 और 441 में, ‘अपराध” शब्द का अर्थ उस दशा में वही है जिसमें कि विशेष या स्थानीय विधि के अधीन दण्डनीय बात ऐसी विधि के अधीन छह मास या उससे अधिक अवधि के कारावास से, चाहे वह जुर्माने सहित हो या रहित, दण्डनीय हो। टिप्पणी इस धारा में तीन भाग हैं। हर भाग में ‘‘अपराध” शब्द का अर्थ अलग-अलग है। भाग एक के अनुसार संहिता द्वारा दण्डनीय बनायी गयी वस्तु अपराध है। दण्डनीय का अर्थ है जिस कार्य का कारित करना या लोप निषिद्ध है, को कारित करना या उसका लोप कारित करने वाले या लोप करने वाले व्यक्ति को दण्ड के योग्य घोषित करता है।86 यह भाग मात्र संहिता के अन्तर्गत, किसी अन्य विशिष्ट या स्थानीय विधि के अन्तर्गत नहीं, कारित करने या लोप तक ही सीमित है।
  1. (1950) 3 पंजाब 192.
  2. सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 (2009 का अधिनियम सं० 10) की धारा 51 (ख) द्वारा अन्त: स्थापित।।
  3. कन्हैया (1384) 7 इला० 67 पृ० 71 (दुथोइट का मत)
भाग दो विशिष्ट या स्थानीय विधि के अन्तर्गत दण्डनीय किसी कार्य को संहिता के अन्तर्गत एक अपराध | है। भाग तीन भी कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में ही कुछ विशिष्ट प्रयोजनों हेतु विशिष्ट तथा स्थानीय सम्बन्ध में अपराध को परिभाषित करता है। भाग दो तथा तीन भाग एक के अपवाद हैं। भाग दो तथा न में वर्णित धाराओं एवं भाग दो या तीन में उल्लिखित शर्तों एवं सीमाओं के अधीन विशिष्ट या स्थानीय विधि के अन्तर्गत दण्डनीय कोई कार्य या लोप इस धारा के अन्तर्गत भी एक अपराध होग | गणश बनाम राज्य87 के मामले में अपीलान्ट ने 300 रुपये इस बहाने से ऐंठ लिये कि वह अपने 7 क की पत्नी बनने हेतु एक कन्या का प्रबन्ध करेगा, और उसके बाद रुपये लेकर गायब हो गया। यह निर्णय किया गया कि मात्र इस कारण कि उपरोक्त मामले में संविदा के विशिष्ट अनुपालन हेतु अथवा रुपयों की वापसी हेतु सिविल वाद नहीं चलाया जा सकता है, धारा 420 सपठित धारा 34 के अन्तर्गत अभियोजन स नही बचा जा सकता है। जहाँ तथ्यों के आधार पर कोई अपराध गठित होता है वहाँ चूंकि मामला ऐसी सावदा से उत्पन्न है जो सिविल न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं है, मात्र इस कारण अपराध हेतु अभियोजन को रोका नहीं जा सकता। | एस० खुशबू बनाम कन्नी अम्मल और अन्य88 के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि भारतीय । दण्ड संहिता की धारा 40 के अधीन ”अपराध” का अर्थ है कोई आघात करने का कृत्य या दृष्टान्त, अवैध कार्य करना या अवैध साधनों द्वारा जो विधि के विरुद्ध या निषिद्ध हो। अपराध को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 40, 41 और 42 अथवा किसी विशेष स्थानीय विधि के प्रावधानों के अन्तर्गत विहित अथवा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (ढ) या सामान्य खण्ड अधिनियम, 1897 की धारा 3 (38) के अन्तर्गत यथा परिभाषित सन्दर्भ में पढ़ना और समझना चाहिए। । आगे यह भी कहा गया कि यद्यपि यह सत्य है कि हमारे समाज की मुख्य धारा का दृष्टिकोण यह है। कि यौनिक सम्बन्ध केवल विवाहित पक्षकारों के मध्य ही होना चाहिए, परन्तु ऐसा कोई भी संविधिक अपराध नहीं बनता है जब कि दो वयस्क आपसी सहमति से वैवाहिक सम्बन्धों के इतर यौनिक सम्बन्ध में लिप्त होते हैं। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497 में यथा परिभाषित जारकर्म का अपराध इसका अपवाद है। क्योंकि वह संहिता में अपराध घोषित है।
  1. ‘‘विशेष विधि‘_’विशेष विधि” वह विधि है जो किसी विशिष्ट विषय को लागू हो।
टिप्पणी । विशेष विधि वह विधि है जो किसी विशिष्ट विषय से सम्बन्धित है। विशेष विधियाँ, कुछ विशिष्ट कार्यों को ही, जो भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत दण्डनीय नहीं है, दण्डनीय बनाती हैं। उदाहरणार्थ, रेलवे अधिनियम, अफीम अधिनियम, इत्यादि।
  1. स्थानीय विधि”- ‘स्थानीय विधि” वह विधि है जो भारत के किसी विशिष्ट भाग को ही
लागू हो। स्थानीय विधियाँ वह विधियाँ हैं जो किसी विशिष्ट भाग या विशेष क्षेत्र में लागू होती हैं जैसे, पोर्ट ट्रस्ट ऐक्ट।। टिप्पणी
  1. अवैध_करने के लिए वैध रूप से आबद्ध”-‘‘अवैध” शब्द उस हर बात को लागू है, जो अपराध हो, या जो विधि द्वारा प्रतिषिद्ध हो, या जो सिविल कार्यवाही के लिए आधार उत्पन्न करती हो; और कोई व्यक्ति उस बात को ‘‘करने के लिए वैध रूप से आबद्ध” कहा जाता है जिसका लोप करना उसके लिए अवैध है।
टिप्पणी यह धारा शब्द ”अवैध” तथा ‘‘करने के लिये वैध रूप से आबद्ध” को परिभाषित करती है। अवैध का। अर्थ है
  1. 1976 क्रि० लॉ ज० 1403 (इलाहाबाद).
  2. (2010) 3 क्रि० ला ज० 2828 (एस० सी० ).
(1) एक चीज जो अपराध हो, या | (2) एक चीज जो विधि द्वारा प्रतिषिद्ध हो, या (3) एक चीज जो सिविल कार्यवाही के आधार उत्पन्न करती हो।। अवैधशब्द का बहुत विस्तृत अर्थ है। इसमें अपकृत्य (Tort) तथा संविदा भंग जो सिविल कार्यवाही के लिये आधार उत्पन्न करती हो, भी सम्मिलित है, अर्थात् ऐसी चीजें जिनके लिये संविदा अधिनियम की धारा 73 में क्षतिपूर्ति प्राप्त किया जा सकता हो या जो विशिष्ट ढंग से प्रवर्तित की जा सकती हो।89 अवैध (illegal) तथा विधिविरुद्ध (unlawful) शब्दों के एक ही अर्थ हैं ।90 विधि द्वारा अपेक्षित कर्तव्य को पूरा करने में लोप, जैसे यदि किसी व्यक्ति को खाना, कपडा, शरण तथा चिकित्सकीय सहायता प्रदान करने का दायित्व है, पर इनका उसे न दिया जाना अवैध है परन्तु पुण्य कार्यों को पूरा करने से इन्कार करना अवैध नहीं है, जब तक कि वह विधिक दायित्व न हो।91 अप्पैय्या92 के वाद में अभियुक्त ने अपने प्रवर (Superior) । अधिकारियों के सम्मुख अपनी जमीन के सम्बन्ध में झूठा ‘शून्य विवरण’ (nil retun) प्रस्तुत किया। रेवेन्यू सम्बन्धित छानबीन में भी उसने झूठा बयान दिया। यह निर्णय दिया गया कि कोई अपराध घटित नहीं हुआ क्योंकि अभियुक्त का कार्य अवैध नहीं था।
  1. क्षति-** क्षति” शब्द किसी प्रकार की अपहानि का द्योतक है, जो किसी व्यक्ति के शरीर, मन, ख्याति या सम्पत्ति को अवैध रूप से कारित हुई हो।
टिप्पणी क्षति के निम्नलिखित तत्व हैं (1) किसी व्यक्ति को कोई क्षति कारित करना, (2) ऐसी क्षति अवैध रूप से कारित हुई हो, । (3) क्षति शरीर, मन, ख्याति या सम्पत्ति से सम्बन्धित हो। इस प्रकार क्षति को विस्तृत अर्थ प्रदान किया गया है तथा यह केवल शारीरिक क्षति या आर्थिक हानि तक ही सीमित नहीं है अपितु यह मन या ख्याति को होने वाली क्षति तक विस्तृत है। एक प्रकरण में पति की मृत्यु ही पत्नी के लिये क्षति माना गया।93 परन्तु एक दूसरे प्रकरण में इस प्रकरण को स्वीकार नहीं किया गया।94 पति की हानि पत्नी पर नुकसानदायक प्रभाव डालती है, शारीरिक रूप से न सही, मानसिक रूप से। अत: पत्नी के लिये हानि माना जाना चाहिये। पुलिस के समक्ष एक झूठा आरोप, जिसको न्यायालय में अभियोजन करने का कभी कोई आशय नहीं था, क्षति कारित करता है।95 हबिले उल-रज्जा96 के बाद में अभियुक्त शिकायतकर्ता के पशुओं को अपने साथ ले गया तथा तब तक छोड़ने से इन्कार कर दिया जब तक कि उसे कुछ रुपया न दिया जाये और रुपया दिये जाने पर उसने पशुओं को छोड़ दिया। यह निर्णीत हुआ कि अभियुक्त ने शिकायतकर्ता को क्षति कारित किया है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति को यह धमकी देना कि यदि वह देय धन से अधिक नहीं देगा तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जायेगी, अवैध है और इस धारा के अन्तर्गत क्षति है।97 । एक वर्ग द्वारा उन लोगों का सामाजिक बहिष्कार जो उनके साथ सहयोग करने से इन्कार करते हैं, इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत क्षति नहीं है। जहाँ नाइयों तथा धोबियों ने निश्चित किया कि जो लोग अच्छी खेती की सुविधाएं नहीं प्रदान करते हैं उनका कार्य नहीं किया जायेगा और उनके समुदाय के जो लोग उनका समर्थन नहीं करते हैं उनका बहिष्कार किया जायेगा, बहिष्कार क्षति नहीं माना जायेगा। इसी प्रकार उनके
  1. गनपत, (1934) 36 बम्बई एल० आर० 373.
  2. फजलुर्रहमान, (1929) 9 पटना 725.
  3. ओम प्रकाश तिलक चन्द्र, (1959) क्रि० लॉ ज० 368.
  4. अप्पैया, (1891) 14 मद्रास 484.
  5. सैफ अली, (1898) पी० आर० नं० 17 (1808).
  6. यल्ला गंगुल बनाम मामीद्री दाली, (1897 ) 27 मद्रास 74 (एफ० बी० ).
  7. अशरफ अली, (1879) 5 कल० 281.
  8. (1923) 46 इला० 81.
  9. वी० अप्पलासामी, (1892) 1 वेयर 441.
द्वारा दी गयी धमकी कि कुछ लोग नाइयों तथा धोबियों की सेवाओं से वंचित हो जायेंगे, संहिता की धारा 506 के अन्तर्गत दण्डनीय क्षति नहीं होगी।98
  1. जीवन‘ जब तक कि घट ये तयतिकल प्रतीत न हो. ‘जीवन” शब्द मानव के जीवन का द्योतक है।
टिप्पणी रामराज बनाम छत्तीसगढ99 के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि आजीवन कारावास की अर्थ 14 वर्ष का कारावास है। इसका अर्थ दोषसिद्ध व्यक्ति की प्राकृतिक मृत्यु तक नहीं माना जाता है। दण्ड के क्षमा किये जाने के पश्चात् भी आजीवन कारावास 14 वर्ष से कम नहीं किया जा सकता है।
  1. ‘‘मृत्यु”- जब तक कि सन्दर्भ से तत्प्रतिकूल प्रतीत न हो, ‘‘मृत्यु” शब्द मानव की मृत्यु का द्योतक है।
47.”जीव-जन्तु-‘जीवजन्तु” शब्द मानव से भिन्न किसी जीवधारी का द्योतक है। टिप्पणी इस धारा में दी गयी ‘‘जीव जन्तु” की परिभाषा उपयुक्त नहीं प्रतीत होती है, क्योंकि यदि जीव-जन्तु। का तात्पर्य मनुष्य के अतिरिक्त किसी भी जीवधारी से है तो इसमें पत्तियाँ, पेड़ इत्यादि भी सम्मिलित होंगे।
  1. जलयान”-‘जलयान” शब्द किसी चीज का द्योतक है, जो मानवों के या सम्पत्ति के जल द्वारा प्रवहण के लिए बनाई गई हो।
  2. वर्ष”, ”मास”- जहाँ कहीं ‘‘वर्ष” शब्द या ‘‘मास” शब्द का प्रयोग किया गया है वहाँ यह समझा जाता है कि वर्ष या मास की गणना ब्रिटिश कलैण्डर के अनुकूल की जानी है।
  3. धारा”-“धाराशब्द इस संहिता के किसी अध्याय के उन भागों में से किसी एक का द्योतक है, जो सिरे पर लगे संख्यांकों द्वारा सुभिन्न किए गए हैं।
  4. ‘‘शपथ”-“शपथ” के लिए विधि द्वारा प्रतिस्थापित सत्यनिष्ठ प्रतिज्ञान और ऐसी कोई घोषणा, जिसका किसी लोकवक के समक्ष किया जाना या न्यायालय में या अन्यत्र सबूत के प्रयोजन के लिए उपयोग किया जाना विधि द्वारा अपेक्षित या प्राधिकृत हो, ‘‘शपथ” शब्द के अन्तर्गत आती है।
टिप्पणी शपथ एक धार्मिक दृढ़कथन है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति दया का परित्याग करता है तथा स्वर्ग के प्रतिशोध का अभिशाप लेता है, यदि वह सत्य नहीं बोलता है। शपथ की प्रकृति शपथ लेने वाले के धर्म के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। एक हिन्दू या मुसलमान के पास शपथ लेने के बदले अभिपुष्टि का वैधानिक अधिकार है।
  1. सद्भावपूर्वक– कोई बात ‘‘सद्भावपूर्वक” की गई या विश्वास की गई नहीं कही जाती जो सम्यक् सतर्कता और ध्यान के बिना की गई या विश्वास की गई हो। | इस धारा के ‘सद्भावपूर्वक’ शब्द की परिभाषा नकारात्मक है। यह धारा प्रतिपादित करती है कि किसी।
टिप्पणी कार्य को सद्भावपूर्वक किया हुआ कहा जायेगा यदि इसे सम्यक् सतर्कता और ध्यान से किया जाये। वक्स सू मीह चौधरी बनाम किंग के बाद में यह निर्णीत किया गया कि सद्भावपूर्वक की अनुपस्थिति का अर्थ है, असावधानी या उपेक्षा। यदि कोई विचार सम्यक् सतर्कता तथा ध्यान से इसकी सत्यता में विश्वास करते हुये बिना दोषपूर्ण प्रयोजन से प्रकट किया जाता है तो उसे सद्भावपूर्वक कहा हुआ माना जाता है। सामान्य उपबन्ध अधिनियम (The General Clauses Act, 1897) ”सद्भावपूर्वक” शब्द को इस प्रकार परिभाषित
  1. सेलाथू (1948) 2 एम० एल० जे० 522.
  2. (2010) 2 क्रि० ला ज० 2062 (एस० सी०),
  3. ह्वाइट (1786) 1 लीच 430,
  4. ए० आई० आर० 1938 गून 350.
  5. देव ज्योति बर्मन, (1957) 2 कल० 181.
करता है-सचमुच ‘‘एक वस्तु को सद्भावपूर्वक किया हुआ समझा जायेगा जब वह ईमानदारी से किया गया हो, चाहे उसे उपेक्षापूर्ण किया गया हो या नहीं।” । एच० सिंह बनाम राज्य के वाद में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णीत किया कि सामान्य उपबन्ध अधिनियम में वर्णित ”सद्भावपूर्वक” शब्द की परिभाषा में ईमानदारी के जो तत्व हैं उन्हें संहिता में दी गई। ‘सद्भावपूर्वक” शब्द की परिभाषा में सम्मिलित नहीं किया गया है। साधारण और वास्तविक विश्वास के अर्थ में सद्भावपूर्वक शब्द पर्याप्त नहीं है, विश्वास युक्तियुक्त होना चाहिये, अयुक्त नहीं। अर्थात् किसी वस्तु में विश्वास करने के लिये कोई युक्तियुक्त या सम्यक् आधार होना चाहिये और तभी विश्वास को सद्भावपूर्वक कहा जायेगा। किसी विश्वास को सद्भावपूर्वक होने के लिये प्रश्नगत वस्तु के सम्बन्ध में सतर्कता तथा ध्यान आवश्यक है। जहाँ किसी व्यक्ति को ऐसे आफिस का कार्य या दायित्व दिया जाता है जिसमें कौशल एवं सतर्कता की आवश्यकता है, प्रश्न उठता है कि अपने कार्य के सम्पादन में क्या उसने सद्भाव से कार्य किया था या नहीं? इसे सिद्ध करने हेतु वह मात्र उपयुक्त आशय का । ही प्रदर्शन न करे अपितु यह भी सिद्ध करे कि कर्तव्य के सम्पादन में जिस कौशल एवं सतर्कता की आवश्यकता थी, उसका प्रयोग उसने किया था। आवश्यक सतर्कता की मात्रा सतर्कता के अभाव में उत्पन्न होने वाले खतरे की मात्रा के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। सद्भाव का अर्थ तार्किक निभ्रान्ति (Logical infallibility) नहीं है अपितु सम्यक् सतर्कता एवं ध्यान है। सद्भावपूर्वक सम्बन्धी प्रश्न को, जिस व्यक्ति का सद्भाव प्रश्न का विषय है, उसकी स्थिति तथा जिन परिस्थितियों में उसने कार्य किया है के सन्दर्भ में निश्चित करना चाहिये। विधि हर व्यक्ति से जिस स्थिति में वे होते हैं उसको ध्यान में रखे बिना सतर्कता तथा ध्यान के एक ही मात्रा की उपेक्षा नहीं करता। यह विभिन्न मामलों में भिन्न-भिन्न होता है और इसका निर्धारण अभियुक्त की सामान्य दशाओं, क्षमता तथा विलक्षणता (Intelligence) के सन्दर्भ में होता है। सम्यक् सतर्कता तथा ध्यान में सत्य को प्राप्त करने के लिये यथार्थ विश्वास अन्तर्निहित है, न कि द्वेषयुक्त विश्वास का नि:संकोच प्रतिग्रहण। सम्यक् सतर्कता तथा ध्यान का मानक उस व्यक्ति का मानक है जिसका आचरण विचारणीय है न कि एक विवेकयुक्त व्यक्ति का। किसी कार्य का सद्भावपूर्वक किया जाना निम्नलिखित तीन तत्वों पर निर्भर करता (1) अभियुक्त द्वारा किये गये कार्य की प्रकृति; | (2) किये गये कार्य का परिणाम एवं महत्व; तथा। (3) सतर्कता तथा ध्यान का प्रयोग करने के लिये उपयुक्त अवसर।। सुन्दर लाल बनाम इम्परर के वाद में कुर्की वारण्ट कलेक्टर द्वारा हस्ताक्षरित होने के बजाय डिप्टी कलेक्टर तथा ट्रेजरी अफसर द्वारा हस्ताक्षरित हुआ था। अमीन ने वारण्ट पर कार्यवाह किया। यह निर्णीत हुआ कि जहाँ तक अमीन का प्रश्न है, वारण्ट उसे वैध प्रतीत हुआ तथा अमीन ने सद्भावपूर्वक कार्य किया। था। परन्तु रघुवीर के वाद!0 में अमीन ने उस समय एक व्यक्ति की सम्पत्ति को कुर्क करना चाहा जबकि कुर्की वारण्ट में निर्धारित समय समाप्त हो चुका था। यह निर्णय दिया गया कि अमीन ने सदभावपूर्वक कार्य नहीं किया था। प्राग11 के वाद में असिस्टेण्ट कलेक्टर ने अमीन ‘स’ को अधिकृत किया कि वह भू-राजस्व की अवशिष्ट राशि को प्राप्त करने हेतु कुर्की वारण्ट को निष्पादित करे। स ने वारण्ट पर उसे निष्पादित करने में अपनी असमर्थता पृष्ठांकित कर दिया और उसे तहसील को लौटा दिया। नायब तहसीलदार ने उसे असिस्टेण्ट
  1. ए० आई० आर० 1966 सु० को० 97.
  2. गयादीन (1934) 9 लखनऊ 517.
  3. भाऊ जिवाजी बनाम मूलजी दयाल, (1888) 12 बम्बई 377 पृ० 393.
  4. पो माई, (1940) रंगून 109. 8.
  5. अब्दुल वादूद, (1907) 9 बाम्बे एल० आर० 230.
  6. 1933 क्रि० लॉ० ज० 218.
  7. (1933) ओ० डब्ल्यू ० एन० 67.
  8. ए० आई० आर० 1942 अवध 256.
कलेक्टर को लौटाने के बजाय दूसरे अमीन को निष्पादन हेतु नाटाने के बजाय दूसरे अमीन को निष्पादन हेतु सौंप दिया तथा अपने ही पहल पर पुलिस द्वारा सहायता के लिये आदेश दे दिया। कार्यवाही में कुछ पशुओं को कुर्क कर रन आधकारियों के बीच मारपीट हो गई। यह निर्णीत हुआ कि यह हो सकता है कि निष्पादक पार्टी ने 17म आशय से कार्य किया था तथा सचमच में विश्वास किया कि वे कार्य करने के लिये प्राधिकृत हैं। *”] वाद नायब तहसीलदार ने वारण्ट का परीक्षण किया था तो उसे देखना चाहिये था कि वारण्ट में नामांकित केवल ‘स’ ही उसे निष्पादित करने के लिये प्राधिकृत था और याद या हाता तो उसे ज्ञात हो गया होता कि किसी अन्य अमीन को निष्पादन हेतु प्राधिकृत करने का उसे अकार नहीं है। अत: यह माना गया कि नायब तहसीलदार ने सद्भावपूर्वक अर्थात् सम्यक् सतर्कता तथा ध्यान से कार्य नहीं किया था। शिम्भू नरायन के वाद में अभियुक्त जो एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति था तथा एक कस्बे में रह रहा था। अरु समाचाकत्सीय सुविधायें उपलब्ध थीं. ने अपने भाई को जो तीव्र प्रकृति वी मिगी से परेशान था तीन महाने से भी अधिक समय तक अनावश्यक कठोरता से बाँध रखा था। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त ने सद्भावपूर्वक कार्य नहीं किया, क्योंकि उसने सम्यक् सतर्कता तथा ध्यान से कार्य नहीं किया, क्योंकि उसने चिकित्सीय सुविधा का लाभ नहीं उठाया अपितु उसे अनुपयुक्त कठोरता से दण्डित किया। सुकरू कविराज बनाम इम्परर13 के बाद में एक कविराज जो शल्य चिकित्सा में भिन्न नहीं था, जिसका ज्ञान मात्र अनुभव पर आधारित था, ने आंतरिक बवासीर के लिये एक व्यक्ति का आपरेशन किया जिसमें उसने साधारण चाकू का प्रयोग किया। उस व्यक्ति की मृत्यु अत्यधिक रक्तस्राव के कारण हो गई। यह निर्णीत हुआ कि उसने सद्भाव में कार्य नहीं किया था। यद्यपि उसने इस तरह के अनेक आपरेशन अनेक अवसरों पर किये थे। 52-क. संश्रय”- धारा 157 में के सिवाय और धारा 130 में वहाँ के सिवाय जहाँ कि संश्रय संश्रित व्यक्ति की पत्नी या पति द्वारा दिया गया हो ‘‘संश्रय” शब्द के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को आश्रय, भोजन, पेय, धन, वस्त्र, आयुध, गोला-बारूद या प्रवहण के साधन देना, या किन्हीं साधनों से चाहे वे उसी प्रकार के हों या नहीं, जिस प्रकार के इस धारा में परिगणित हैं, किसी व्यक्ति की सहायता पकड़े जाने से बचने के लिए करना, आता है। टिप्पणी ‘संश्रय” शब्द को संहिता की धारा 52-क में सन् 1942 के संशोधन द्वारा सम्मिलित किया गया है। इसके पूर्व यह संहिता की धारा 216-ख द्वारा परिभाषित था। ‘‘संश्रय” शब्द के अर्थ को उसी रूप में स्वीकार किया गया। इसे संशोधित रूप में पुन: स्थापित किया गया है, उसकी परिभाषा अन्तर्भूतकारी (inclusive) है। साधारणत: संश्रय का अर्थ है, गिरफ्तारी को टालने हेतु किसी प्रकार की सहायता प्रदान करना। संशोधन के पूर्व इस शब्द का अर्थ स्पष्ट नहीं था, क्योंकि इसके सम्बन्ध में उच्च न्यायालयों द्वारा अलग-अलग विचार व्यक्त किये गये थे। इसके अर्थ को स्पष्ट करने हेतु संशोधन आवश्यक हो गया था। संश्रय का अर्थ है (1) किसी व्यक्ति को आश्रय, भोजन, पेय, धन, वस्त्र, हथियार, गोला-बारूद तथा प्रवहण के साधन । की आपूर्ति करना, या (2) किसी व्यक्ति की उपरोक्त वर्णित साधनों या अन्यथा द्वारा सहायता करना; (3) इस तरह की आपूर्ति या सहायता गिरफ्तारी को टालने के उद्देश्य से दी गई हो। इस धारा के अन्तर्गत संश्रय, धारा 157 तथा धारा 130 में वर्णित संश्रय को सम्मिलित नहीं करता जिसमें संश्रय, संश्रित व्यक्ति की पत्नी या पति द्वारा दिया जाता है। तमिलनाडु राज्य बनाम नलिनी14 के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि पत्नी को अपने पति के संश्रय के लिये मात्र इस कारण अभियोजित नहीं की जा सकती क्योंकि वह अपने पति के साथ उसी घर में निवास कर रही थी।
  1. (1923) 45 इला० 495.
  2. (1887) 14 कल० 566.
  3. ए० आई० आर० 1998 एस० सी० 1406.

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