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Indian Penal Code 1860 General Explanations Part 2 LLB 1st Year Notes

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  1. विल-“विल” शब्द किसी भी वसीयती दस्तावेज का द्योतक है।
टिप्पणी विल एक वसीयती दस्तावेज है। यह एक घोषणा है जिसके द्वारा घोषणा करने वाला व्यक्ति अपनी मृत्यु के पश्चात् अपनी सम्पत्ति के बंटवारे या उसके प्रबन्ध के लिये व्यवस्था करता है। यह वसीयतकर्ता की मृत्यु के पश्चात् प्रभावी होती है। यह वसीयतकर्ता द्वारा प्रतिसंहरणीय (revocable) है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 2(ख) “विल” को परिभाषित करती है जो इस प्रकार है, “विल वसीयतकर्ता के आशय का, उसकी सम्पत्ति के सम्बन्ध में वैधिक घोषणा है जिसे वह अपनी मृत्यु के पश्चात् कार्य रूप देना चाहता है।”93 भारतीय दण्ड संहिता की धारा 467 तथा 477 में इसका प्रयोग हुआ है।
  1. कार्यों का निर्देश करने वाले शब्दों के अन्तर्गत अवैध लोप आता है-जब तक कि संदर्भ से तत्प्रतिकूल आशय प्रस्तुत न हो, इस संहिता के हर भाग में किए गए कार्यों का निर्देश करने वाले शब्दों का विस्तार अवैध लोपों पर भी है।
टिप्पणी कार्य (Act)–कार्य में अवैध लोप (illegal omission) भी सम्मिलित है। कार्य से तात्पर्य है एक व्यक्ति द्वारा स्वेच्छा से की गयी कोई चीज। कार्य, इच्छा की अवधारणा है जो एक प्रभाव उत्पन्न करता है। कोई भी वाह्य अभिव्यक्ति एक कार्य है। इसमें लिखना और बोलना दोनों ही सम्मिलित हैं। संहिता के अन्तर्गत कार्य किसी धनात्मक आचरण तक ही सीमित नहीं है। इसमें लोप (omissions) भी शामिल हैं जो अवैध हैं। लोप” (Omission)-‘लोप” शब्द का सामान्यतया प्रयोग आशयपूर्वक किसी कार्य को न करने के लिये होता है। संहिता द्वारा केवल ऐसे लोप दण्डनीय बनाये गये हैं जो कोई बुरा प्रभाव या तो उत्पन्न करते हैं।
  1. गोविन्द प्रसाद, ए० आई० आर० 1962 कल० 174.
  2. हरी प्रसाद, (1955) 1 इला० 749.
  3. रामासामी, (1888) 12 मद्रास 148.
  4. कपालप्पा सराया, (1864) 2 एम० एच० सी० 247.
  5. अजीमुद्दीन, (1869) 11 डब्ल्यू आर० (क्रि०) 15.
  6. रामनारायण साहू, ए० आई० आर० 1933 पटना 601.
  7. कृष्ण राव बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (1953) क्रि० लॉ ज० 979.
  8. नर्वदा प्रसाद, (1956) क्रि० लॉ ज० 1246.
  9. साधोलाल, ए० आई० आर० 1917 पटना 699.
  10. चारु चन्द्र घोष, ए० आई० आर० 1924 कल० 503.
  11. एच० के० शा, ए० आई० आर० 1936 कल० 324.
  12. खुसाल हिरामन, (1867) 4 बी० एच० सी० (क्रि० सी०) 28.
  13. लतीफ खान, (1895) 20 बम्बई 394.
या बुरा प्रभाव उत्पन्न करने को आशयित हैं या बरा प्रभाव उत्पन्न करने योग्य हैं। एक व्यक्ति द्वारा कोई उपेक्षा या लोप जिसे वह विधि द्वारा करने के लिये बाध्य है, दण्डनीय लोप निर्मित करता है। | 33..’कार्य, ‘‘लोप”_’कार्य” शब्द कार्यावली का द्योतक उसी प्रकार है जिस प्रकार एक का का; ‘लोप” शब्द लोपावली का द्योतक उसी प्रकार है जिस प्रकार एक लोप का। टिप्पणी ‘कार्य’ शब्द में केवल एक ही कार्य सम्मिलित नहीं है बल्कि इसमें अनेक कार्य सम्मिलित हैं जो एक व्यवहार (Transaction) को गठित करते हैं। इसी प्रकार ‘‘लोप” शब्द भी अनेक लोपों को सम्मिलित करता है। संहिता की धारा 32 और 33 को एक साथ पढने पर यह स्पष्ट होता है कि ”कार्य” एक या अनेक कार्यों तथा एक या अनेक लोपों को सम्मिलित करता है। ओम प्रकाश95 के वाद में यह मत व्यक्त किया गया कि कार्य शब्द का अर्थ किसी व्यक्ति को मात्र कोई विशिष्ट, विनिर्दिष्ट या तात्क्षणिक कार्य से ही नहीं है, यह एक क्रमबद्ध कार्य को भी इंगित करता है।
  1. सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य-जब कि कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सब के सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है, तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है, मानो वह कार्य अकेले उसी ने किया हो।
टिप्पणी संयुक्त दायित्व का सिद्धान्त (Principle of Joint Liability)-भारतीय दण्ड संहिता में कुछ ऐसे उपबन्ध हैं जो एक ऐसे व्यक्ति के दायित्व को निर्धारित करते हैं जो दूसरे अन्य लोगों के साथ मिलकर कोई अपराध करता है।96 ऐसे सभी उपबन्धों में संयुक्त दायित्व सृजित किया जाता है, क्योंकि इसमें या तो आशय या तो उस वर्ग में सम्मिलित सभी व्यक्तियों का उद्देश्य सामान्य होता है। भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत आपराधिक दायित्व का विनिश्चय इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति अपराध से किस प्रकार जुड़ा हुआ था। सामान्य रूप में एक व्यक्ति किसी अपराध से निम्नलिखित रूप से सम्बन्धित हो सकता है (1) जब वह स्वयं अपराध करता है। (2) जब वह अपराध घटित होने में भाग लेता है। (3) जब वह अपराध कारित करने के उद्देश्य से किसी तीसरे पक्ष को प्रेरित करता है अर्थात् वह अपराध स्वयं न करके किसी तीसरे पक्ष द्वारा करवाता है। | (4) जब वह अपराध घटित होने के पश्चात् अभियुक्त को न्याय से छुपाने का प्रयास करता है। इनमें से तीसरी और चौथी श्रेणी दुष्प्रेरण विधि से सम्बन्धित है। यहाँ पर हम केवल श्रेणी नम्बर दो के बारे में अध्ययन करेंगे क्योंकि वह संयुक्त दायित्व के सिद्धान्त से सम्बन्धित है। स्वयं अपराधी के द्वारा किये गये कार्य प्रथम श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं। ऐसे मामले में दायित्व निर्धारित करने में कोई परेशानी नहीं होती। परन्तु जहाँ अपराध छोटे तथा बड़े अनेक कृत्यों द्वारा पूरा होता है तथा अपराध किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं अपितु एक वर्ग द्वारा किया जाता है वहाँ उस वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व निर्धारित करने में कठिनाई। होती है। दण्ड संहिता की धारा 34 से 38 तथा धारा 149 ऐसी परिस्थितियों में संयुक्त आपराधिक दायित्व को निर्धारित करती है। बिशप (Bishop) के अनुसार अपराध में संयुक्त दायित्व का सिद्धान्त यह है कि, “जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी आपराधिक उद्देश्य को एक या सभी को शारीरिक चेष्टा द्वारा निष्पादित करने । हेत एक होते हैं तथा अलग-अलग या एक साथ कार्य करते हैं, तो प्रत्येक व्यक्ति जिसने अपराध करने में। सहयोग किया था विधि के अन्तर्गत सम्पूर्ण कार्य के लिये उसी प्रकार उत्तरदायी है जैसे उसने स्वयं ही उस कार्य को किया हो।”97
  1. लतीफ खान, (1895) 20 बम्बई 394.
  2. (1961) 2 क्रि० लाँ ज० 848.
  3. देखिये, धारा 34 से 38, धारा 114, 149, 396 तथा 460.
  4. विशप, जे० पी०; क्रिमिनल लॉ, वाल्यूम 1, (तीसरा संस्करण) धारा 439.
अत: प्रत्येक व्यक्ति जिसके दुराशय ने आपराधिक कृत्य के लिये अंशदान किया तथा जो अपराध कारित करने में एक पक्ष बन जाता है विधि के अन्तर्गत पूरे अपराध के लिये दोषी है। उसका रोल अपराध में चाहे कितना ही तुच्छ क्यों न रहा हो यदि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को कोई कार्य करने के लिये गतिशील करता है, तो वह उसके परिणाम के लिये दायी (liable) है। यदि उसने किसी परिणाम की अपेक्षा किया था, वह तब भी उत्तरदायी होगा यदि परिणाम उसके द्वारा कल्पित ढंग से न प्राप्त दूसरे ढंग से प्राप्त होता है। धारा 34 संयुक्त दायित्व के सिद्धान्त को प्रतिपादित करती है। यदि दो या अधिक व्यक्ति किसी कार्य को संयुक्त रूप से करते हैं तो ऐसा माना जायेगा कि उसमें से प्रत्येक ने उस कार्य को वैयक्तिक रूप में किया है। संहिता के निर्माताओं ने इस धारा को उन मामलों के निपटारे हेतु बनाया है, जिनमें प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किये गये कार्य को निश्चित रूप से अलग करना दुष्कर प्रतीत होता है, अतः आपराधिक कृत्य के लिये प्रत्येक व्यक्ति को दोषी ठहराना आवश्यक समझा गया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि पदावली ‘‘अपने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में’ (in furtherance of common intention of all) मूल संहिता में। नहीं थी। इसे सन् 1870 के संशोधन अधिनियम द्वारा इस धारा में शामिल किया गया। सन् 1870 के पूर्व इस विषय को लेकर अंग्रेजी तथा भारतीय विधियों में अन्तर था। इंगलिश विधि में एक व्यक्ति जो अपने साथियों की हत्या करने के आशय से भागीदार नहीं था, हत्या के लिये जिम्मेदार नहीं हो सकता था, किन्तु भारतीय विधि में यद्यपि वह अपने साथियों के दुराशय में भागीदार नहीं था फिर भी हत्या के लिये उत्तरदायी था। सः बानस पीकाक ने कहा था कि ‘अब अनेक व्यक्तियों का एक गुट जो समान उद्देश्य के लिये संघटित हों, वैधानिक या अवैधानिक तथा उसमें के एक दूसरों के ज्ञान और सहमति के बिना एक अपराध करता है, दूसरे अपराध में शामिल (अन्तर्ग्रस्त) नहीं होंगे जब तक कि कार्य किसी प्रकार सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने हेतु न किया गया हो।”98 | एक दूसरे प्रकरण में प्रिवी कौंसिल ने निम्नलिखित मत व्यक्त किया था “जब पक्षकार सामान्य प्रयोजन से सामान्य उद्देश्य को निष्पादित करने जाते हैं तो प्रत्येक व्यक्ति सामान्य उद्देश्य को अग्रसरित करने तथा उसके निष्पादन हेतु हर दूसरे व्यक्ति द्वारा किये गये कार्य के लिये उत्तरदायी है; चूंकि प्रयोजन सामान्य है अतः उत्तरदायित्व भी सामान्य होना चाहिये।”99 सम्भवतः इसी मामले के बाद धारा 34 में 1870 में पदावली ‘‘सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में” को जोड़ा गया। यद्यपि संशोधन धारा को और स्पष्ट बनाने हेतु किया गया था, परन्तु ये उपबन्ध स्वयं विवादग्रस्त विरचना के स्रोत बन गये। इसके बाद के सारे निर्णय इसी पदावली “सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में” पर केन्द्रित होकर रह गये। यद्यपि इस धारा का निर्वचन सन् 1870 के पूर्व भी इसी प्रकार (जैसा कि संशोधन के पश्चात्) किया गया था। अवयव– धारा 34 के अन्तर्गत संयुक्त दायित्व के सिद्धान्त को आकर्षित करने के लिये निम्नलिखित अवयव आवश्यक हैं (1) एक आपराधिक कृत्य; (2) आपराधिक कृत्य एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा किया गया हो; (3) आपराधिक कृत्य ऐसे व्यक्तियों द्वारा सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने हेतु किया गया हो ; (4) | ऐसे व्यक्तियों के बीच सामान्य आशय पूर्व निर्धारित योजना के अन्तर्गत होना चाहिये; (5) अपराध के सभी कथित अभियुक्तों का किसी न किसी प्रकार सम्मिलित होना आवश्यक है; (6) अपराध घटित होते समय सभी व्यक्तियों की शारीरिक उपस्थिति, (परन्तु सभी व्यक्तियों की सभी मामलों में शारीरिक उपस्थिति सदैव आवश्यक नहीं है)।
  1. गोरा चन्द गोपी, 1860 बी० एन० आर० 443.
  2. गणेश सिंह बनाम रामपूजा, (1869) 3 वी० एल० आर० 44 (पी० सी०).
  3. ऐक्ट नं० XXVI, 1870 धारा 1.
म० प्र० राज्य बनाम देशराज2 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि दण्ड संहिता की धारा 34 को किसी आपराधिक कृत्य के किये जाने के संयक्त-दायित्व के सिद्धान्त पर अधिनियमित किया गया है। यह धारा साक्ष्य का एक नियम मानी गई है और इससे किसी सारभूत अपराध का सृजन नहीं होता। धारा की प्रभेदकारी विशेषता कृत्य में भागीदारी का तत्व है। दसरे द्वारा कारित आपराधिक कृत्य के अनुक्रम में किसी व्यक्ति का दायित्व जिसे कतिपय लोगों ने मिल कर करने की तैयारी की हो, धारा 34 के अधीन उत्पन्न होता है याद ऐसा आपराधिक कृत्य अपराध कारित करने वाले व्यक्तियों द्वारा सामान्य आशय से किया जाता है। सामान्य आशय का प्रत्यक्ष साक्ष्य बहुत कम मिलता है और इसलिये ऐसे आशय के बारे में मामले के साबित किये गये तथ्यों से प्रकट होने वाली साबित परिस्थितियों से ही अनुमान लगाया जा सकता है। सामान्य आशय का आरोप साबित करने के लिये अभियोजन को साक्ष्य से चाहे प्रत्यक्ष हो या पारिस्थितिक यह सिद्ध करना होता है कि अभियुक्तों के बीच उस अपराध को कारित करने के लिये सामान्य आशय या मानसिक मिलन था, चाहे वह पूर्व विचारित हो या मौके पर तत्काल उत्पन्न हुआ हो, जिसके लिये उन्हें धारा 34 के अधीन आरोपित किया गया था, किन्तु यह आवश्यक रूप से अपराध कारित किये जाने से पूर्व होना चाहिये। धारा 34 के वास्तविक तत्व यह हैं कि यदि दो या अधिक व्यक्ति साशय कोई कृत्य संयुक्त रूप से करते हैं तो विधि में उसकी स्थिति ठीक वैसी ही होती है मानों उनमें से प्रत्येक ने उस कृत्य को व्यक्तिगत (वैयष्टिक) रूप से स्वयं किया है। धारा 34 को लागू करने के लिये किसी अपराध में सहभागियों में सामान्य आशय विद्यमान होना आवश्यक तत्व है। यह आवश्यक नहीं है कि संयुक्त रूप से अपराध कारित करने के आरोपी कतिपय व्यक्तियों ने एक ही या समान अथवा समरूप कृत्य किया हो। प्रकृति के अनुसार कृत्य भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, किन्तु उन्हें एक और सामान्य आशय से संप्रेरित होना चाहिये, जिससे कि उपबंधों को आकृष्ट किया जा सके। धारा 34 यह नहीं कहती कि सब का सामान्य आशय हो” और यह भी नहीं कहती कि ‘‘सामान्य आशय जो सब में सामान्य हो”। धारा 34 के उपबंधों के अधीन दायित्व सामान्य आशय के विद्यमान होने में ही पाया जा सकता है, जिससे संप्रेरित होकर अभियुक्त ऐसे सामान्य आशय को पूर्ण करने के लिये आपराधिक कृत्य करता है जिसके परिणास्वरूप धारा 34 में अन्तर्निहित सिद्धान्त लागू होते हैं। जब किसी अभियुक्त को धारा 34 के साथ पठित धारा 300 के अधीन दोषसिद्ध किया जाता है तो विधि में उसका अभिप्राय है कि अभियुक्त उस कृत्य के लिये दायी है, जिससे मृत व्यक्ति की मृत्यु कारित हुई, मानों वह कृत्य एकमात्र उसी के द्वारा किया गया है। यह उपबंध ऐसे मामले की जरूरत पूरी करने के लिये अधिनियमित किया गया है, जिसमें सब के सामान्य आशय को अग्रसर करते हुये कृत्य करने वाले सदस्यों के दल में प्रत्येक सदस्य द्वारा कारित कृत्य को सुभिन्न करना कठिन हो या यह साबित करना कठिन हो कि उनमें से प्रत्येक द्वारा क्या भूमिका निभाई गई। धारा 34 वहाँ भी लागू होती है, जहाँ किसी विशिष्ट अभियुक्त द्वारा स्वयं कोई क्षति कारित नहीं की गई है। धारा 34 को लागू करने के लिये अभियुक्त की ओर से कोई सक्रिय कृत्य किया गया दर्शित करना आवश्यक नहीं है। यह अभिनिर्धारित किया गया कि वर्तमान मामले में विभिन्न हथियारों से सुसज्जित अभियुक्तों ने संयुक्त रूप से हमला किया, जिससे घायल व्यक्ति की मृत्यु हो गई और। अन्य साक्षियों को चोटें आईं। विशिष्ट अभियुक्त को विशिष्ट चोट (क्षति) से जोड़ने के बारे में साक्ष्य उपलब्ध न होने की दशा में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 300 सपठित धारा 34 के अधीन दोषसिद्धि न करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। आपराधिक कृत्य (Criminal act)–जहाँ एक गुट या वर्ग द्वारा कोई अपराध किया जाता है वहा। धारा 34 में प्रयुक्त ” आपराधिक कृत्य” शब्द किसी व्यक्ति के वैयक्तिक कार्य को इंगित नहीं करता है। जहां कोई अपराध कई व्यक्तियों द्वारा सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने हेतु किया जाता है तो उनमें से प्रत्यक व्यक्ति उस पूरे कार्य के लिये दायी होगा चाहे उसने एक जैसे या अलग-अलग किस्म के या छोटा या बड़े कार्य किया हो।”वह कार्य” (that act) का धारा 34 में प्रयोग आपराधिक कृत्य को इंगित करता है जिसका अर्थ है, आपराधिक व्यवहार की एकता और जिसकी परिणति किसी ऐसे कार्य में होती है जिसके लिये एक व्यक्ति दण्डनीय होगा यदि यह स्वयं उसके द्वारा किया गया होता तो एक अपराध होता है
  1. 2004 क्रि० लो ज० 1415 (सु० को०),
  2. बरेन्द्र कुमार घोष बनाम इम्परर, 52 आई० ए० 40 (पी० सी०).
लल्लन बनाम बिहार राज्य वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 34 में प्रयुक्त ‘कृत्य” शब्द कृत्यों की श्रृंखला को एकल कृत्य के रूप में उपदर्शित करता है। विधि के अधीन अपेक्षा यह की जाती है कि समान आशय का साझीदार व्यक्ति घटनास्थल पर उपस्थित रहे और वे अपने आप को आशयित दाण्डिक कृत्य से जिसके लिये वे समान आशय रखते हैं अलग न करें। धारा 34 के अधीन आपराधिकता को घटनास्थल से दूरी के आधार पर ही अपवर्जित नहीं किया जा सकता। इसलिये, परिनियम की अपेक्षा यह है कि घटनास्थल पर उपस्थित होने के साथ ही समान आशय रखना भी जरूरी है। घटनास्थल से दूरी बनाये रखने मात्र से अभियुक्त छुटकारा नहीं पा सकता–तथापि यह विचाराधीन मामले की तथ्यात्मक स्थिति पर निर्भर करता है और इसके लिये कोई कठोर नियम नहीं बनाया जा सकता। नन्दकिशोर बनाम मध्य प्रदेश राज्य के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि भा० द० सं० की धारा 34 प्रलक्षित (constructive) आपराधिक दायित्व से सम्बन्धित है। धारा 34 यह उपबन्धित करती है। कि जहां कोई आपराधिक कृत्य कई व्यक्तियों द्वारा सभी के सामान्य आशय के अग्रसरण में किया जाता है इनमें से प्रत्येक व्यक्ति उस कार्य हेतु उसी प्रकार दायित्वाधीन होता है मानो वह केवल उसी द्वारा किया गया हो। यदि सामान्य आशय आरोपित अपराध के किये जाने की ओर प्रेरित करता है तो सामान्य आशय में भागीदारी करने वाला प्रत्येक व्यक्ति उनमें से किसी एक के द्वारा किये गये कार्य हेतु प्रलक्षित रूप से (Constructively) दायित्वाधीन होता है। सामान्य आशय (Common Intention)—पदावली ‘‘सामान्य आशय” को बहुत से अर्थ प्रदान किये गये हैं- (1) इसमें पूर्व-निर्धारित योजना अन्तर्निहित है, विचारों का पूर्व मिलन, सभी व्यक्तियों, जो एक गुट को निर्मित करते हैं, के बीच पूर्व विचार-विमर्श । (2) सामान्य आशय का अर्थ है, परिणाम की कल्पना किये बिना एक आपराधिक कृत्य कारित करने की इच्छा। (3) सामान्य आशय का अर्थ है, घटित अपराध को निर्मित करने हेतु आवश्यक दुराशय।8। (4) इसका तात्पर्य कोई आपराधिक कृत्य कारित करने के आशय से भी है परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वही अपराध जो घटित हुआ है। (5) कुछ लोगों के अनुसार सामान्य आशय को ऐसा अर्थ नहीं प्रदान किया जा सकता जिसे हम हर जगह लागू कर सकें। अत: इसका वास्तविक अर्थ हर मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है ।10। उपरोक्त वर्णित अर्थों में किसी भी एक अर्थ को स्वीकार करने में निम्नलिखित दो कठिनाइयाँ हैं (1) यह कि आपराधिक कृत्य के सभी साझेदारों को एक ही अपराध का दोषी माना जाना चाहिये, या उन्हें अलग-अलग अपराधों के लिये दोषी मानना सम्भव है। दृष्टिकोण 1, 3 तथा 4 के अनुसार सभी को एक ही अपराध का दोषी माना जाना चाहिये। विधि उनके बीच या अपराध करते समय उनके द्वारा किये गये कार्य में कोई भेद नहीं करता। प्रत्येक व्यक्ति उसी अपराध का दोषी है। परन्तु उन लोगों के अनुसार जो दृष्टिकोण (2) का समर्थन करते हैं, अलग-अलग व्यक्तियों को अलग-अलग अपराधों में उनमें से प्रत्येक को मन:स्थिति के अनुसार जोड़ना सम्भव है।12
  1. 2003 क्रि० लाँ ज० 465 (सु० को०).
  2. (2011) 4 क्रि० लॉ ज० 4243 (एस० सी०).
  3. महबूब शाह बनाम इम्परर, 72 आई० ए० 148 (पी० सी०).
  4. इब्रा अंकदा बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1944 कल० 339 में न्यायाधीश लार्ड का मत।
  5. पूर्वोक्त सन्दर्भ में न्यायाधीश दास का मत।।
  6. सैदूखान बनाम राज्य, ए० आई० आर० 1951 इला० 21 (एफ० बी०) में न्यायाधीश का मत.
  7. इब्रा अर्कदा बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1944 कल० 339, में न्यायाधीश खुन्दकार का मत.
  8. बशीर बनाम राज्य, 1953 क्रि० लाँ ज० 1505, पृ० 1511. ।
  9. राजू बी० बी०, कमेन्ट्रीज आन दी इण्डियन पेनल कोड (दूसरा संस्करण) वा० 1; पृ० 1056.
(2) यह कि क्या धारा 34 उन अपराधों के लिये लाग होगी जिनको निर्मित करने हेतु मन:स्थिति आशय आवश्यक नहीं है या उन अपराधों के लिये जो मन:स्थिति के बिना भी दण्डनीय है। उदाहरण के लिये, धारा 304, भाग 2 हत्या की कोटि में न आने वाले सदोष मानव वध को दण्डनीय घोषित करती है। यदि कार्य इस ज्ञान के साथ किया जाता है कि उससे मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है, परन्तु मृत्यु कारित करने का कोई आशय नहीं होता, ऐसी शारीरिक क्षति कारित करना जिससे मृत्यु होना सम्भाव्य है, धारा 34 के अन्तगत यह साबित किया जाना चाहिये कि आपराधिक कृत्य सभी सहयोगियों के सामान्य आशय को अग्रसर करने के लिये किया गया है। धारा 34 में प्रयुक्त ‘‘आपराधिक कृत्य” का अर्थ एक विचार धारा के अनुसार मात्र एक साधारण कार्य से है, दूसरों के अनुसार इसका अर्थ एक अपराध का दोष से है जिसमें इसको निर्मित करने हेतु आवश्यक मन:स्थिति भी सम्मिलित है। अत: प्रश्न यह उठता है कि क्या एक भागीदार सामान्य आशय से युक्त समझा जाएगा जबकि अपराध करने का उसका आशय नहीं था, उसे केवल कार्य के परिणाम का ज्ञान था या उसने परिणाम की भी कल्पना नहीं किया था। एक विचार यह है कि धारा 34 धारा 304 भाग । 2 के अन्तर्गत आने वाले मामलों को लागू होती है।13 न्यायाधीश दास ने इसके विपरीत विचार व्यक्त किया है। तीसरा विचार यह है कि भाग 2 के मामले में संयुक्त दायित्व का सिद्धान्त तभी होगा जब धारा 34 और 35 दोनों ही लागू हो रहे हों, परन्तु यदि अकेले धारा 34 लागू हो रही हो तब संयुक्त दायित्व का सिद्धान्त नहीं लागू होगा। पूर्व-निर्धारित योजना सामान्य आशय में अन्तर्निहित है। पूर्व निर्धारित योजना का तात्पर्य है पूर्व-सम्मति (Prior Concert) या विचारों का आदान-प्रदान। आपराधिक कृत्य पूर्व सुनियोजित योजना के अनुसार किया जाना चाहिये। समय के दृष्टिकोण से सामान्य आशय कृत्य सम्पन्न होने के पूर्व अस्तित्व में आ जाती है। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि सामान्य आशय के विनिश्चित होने तथा कृत्य को सम्पन्न होने के बीच पर्याप्त समय गुजरे।15 किन्तु यदि पूर्व मनन (meditation) या पूर्व निर्धारित योजना का कोई संकेत नहीं मिलता है तो मात्र यह तथ्य, कि घटना स्थल पर दो अभियुक्तों को देखा गया या तो अभियुक्तों ने गोली चलायी जिसके फलस्वरूप एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी तथा दो अन्य व्यक्तियों को साधारण चोटें आईं, सामान्य आशय को अनुमानित करने हेतु पर्याप्त नहीं है।16 यद्यपि बहुत से व्यक्तियों के बीच घटनास्थल पर ही सामान्य आशय उत्पन्न हो सकता है और इसका निर्धारण अभियुक्त के कार्य तथा उसे आचरण एवं हर मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों से किया जा सकता है।17 नन्दू रस्तोगी बनाम बिहार राज्य18 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया था कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 का अवलम्ब लेने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि मृतक पर अभियुक्तों में से हर एक प्रहार करे। इतना ही पर्याप्त है कि यह दर्शित कर दिया जाए। कि वे अपराध कारित करने के लिये सामान्य आशय रखते थे, उसको पूरा करने के लिये प्रत्येक ने सौंपे गये। अपने-अपने कृत्य किये चाहे वे एक जैसे हों या भिन्न-भिन्न हों। इस मामले के तथ्य बहुत स्पष्ट हैं और अपीलार्थी अभियुक्त द्वारा निभाई गई भूमिका जिसके जरिये उसने अभियोजन साक्षियों को मृतक को बचाने के लिये जाने से रोका, मृतक की हत्या करने के अंतिम उद्देश्य को पूरा करने के लिये थी। धारा 34 को आकर्षित करने के लिये केवल इतना ही सिद्ध करना पर्याप्त नहीं है कि प्रत्येक अपराधी का आशय एक ही था। और वह था एक विशिष्ट अपराध को करना। इस धारा का महत्वपूर्ण अवयव यह है कि हर एक ने दूसरे के आशय में भागीदारी किया हो।19 मकसूदन तथा अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य20 के मामले में अपीलार्थी आपस में सम्बन्धी थे एवं सभी घातक अस्त्रों से लैस थे। वे सभी साथ थे। उनमें से किसी ने आदेश दिया-‘मार डालो, मार डालो” तभी अभियुक्त सहित सभी अन्य व्यक्तियों ने मृतक पर प्रहार किया जिसके
  1. राज्य बनाम सैदूखान, ए० आई० आर० 1951 इलाहाबाद 21 (एफ० बी०).
  2. इब्रा अकन्दा बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1944 कल० 339, पृ० 355.
  3. रामचन्दर बनाम राजस्थान राज्य, 1970 क्रि० लॉ ज० 653.
  4. उपरोक्त सन्दर्भ.
  5. कृपाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1954 सु० को० 706.
  6. 2002 क्रि० लॉ ज० 4698 (सु० को०).
  7. दज्या मोश्या भील तथा अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य, (1984) क्रि० लॉ ज० 1728 (सु० को०).
  8. 1983 क्रि० लॉ ज० 218 (सु० को०).
फलस्वरूप उसकी मृत्यु हो गयी। यह अभिनिर्धारित किया गया कि सामान्य आशय एक तथ्य विषयक प्रश्न है। यह व्यक्तिपरक (subjective) है किन्तु इसका निर्धारण तथ्य तथा परिस्थितियों से किया जा सकता है। अनिल शर्मा बनाम झारखण्ड राज्य21 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 34 के उपबंधों के अधीन दायित्व का सार सामान्य आशय विद्यमान होने के तत्व पर निर्भर करता है और अभियुक्त को उस सामान्य आशय को अग्रसर करने के लिये कोई आपराधिक कृत्य करने को प्रेरित करना है। धारा 34 में निहित सिद्धान्त को लागू करने के परिणामस्वरूप जब किसी अभियुक्त को धारा 34 के साथ पठित धारा 302 के अधीन सिद्ध दोष किया जाता है तो विधि में इसका यह अभिप्राय है कि अभियुक्त की मृत्यु कारित करने के लिये वह उसी रीति से दायी है मानों वह एकमात्र उसी के द्वारा कारित की गई है। यह उपबंध उन मामलों की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिये अधिनियमित किये गये हैं, जिनमें सामान्य आशय वाली पार्टी के सदस्यों द्वारा किये गये कृत्य में व्यक्तिगत दायित्व को अलग करना कठिन हो या जहाँ प्रत्येक सदस्य द्वारा क्या भूमिका अदा की गई थी, यह पता करना कठिन हो। धारा 34 वहाँ भी लागू होती है जहाँ किसी विशिष्ट अभियुक्त द्वारा कोई क्षति न कारित की गई हो। धारा 34 लागू करने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि अभियुक्त द्वारा कोई वाह्य कृत्य किया गया दर्शित किया जाय।। चमन एवं अन्य बनाम उत्तरांचल राज्य22 के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 के उपबन्धों के अधीन दायित्व का तत्व अभियुक्तों के बीच विद्यमान सामान्य आशय में पाया जाता है जो ऐसे आशय के अग्रसरण में किसी आपराधिक कार्य के कारित किये जाने की ओर अग्रसर करता है। इस उपबन्ध का उद्देश्य ऐसे मामले में अपराध निर्धारण से है, जहाँ किसी पार्टी के सदस्यों द्वारा किये गये उनके व्यक्तिगत कार्यों में भेद करने में कठिनाई होती है जहां वे सभी सदस्यों के सामान्य आशय के अग्रसरण में कार्य करते हैं अथवा जहां ठीक-ठीक यह सिद्ध करना कठिन होता है कि पार्टी के सदस्यों में प्रत्येक द्वारा अलग-अलग क्या कार्य किया गया है। धारा 34 तब भी लागू होती है जहां किसी विशेष अभियुक्त द्वारा स्वयं कोई क्षति कारित नहीं की गयी हो। धारा 34 को लागू किये जाने हेतु किसी विशिष्ट अभियुक्त द्वारा कोई कृत्य किया जाना सिद्ध करना आवश्यक नहीं है। पारस राजा माणिक्य राव बनाम आ० प्र० राज्य23 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया था कि धारा 34 का वस्तुत: यह अर्थ है कि दो या अधिक व्यक्ति साशय संयुक्त रूप से कोई समान कृत्य करते हैं। तो यह वही बात है मानों उनमें से प्रत्येक ने वैयष्टिक रूप से अलग-अलग वही कृत्य किया है। दाण्डिक विधिशास्त्र का यह सुस्थिर सिद्धान्त है कि न्यायालय सह-षड्यंत्रकारियों के बीच प्रभेद नहीं कर सकते और वे इस बात की जाँच भी नहीं कर सकते कि अपराध में प्रत्येक द्वारा किये गये अपराध में किसने क्या कृत्य किया। किसके कृत्य का अंश सामान्य आशय में शामिल होकर सामान्य उद्देश्य के निष्पादन का रूप लेता है। और हर एक व्यक्ति इस दूसरे और प्रत्येक व्यक्ति के कृत्य निष्पादन और सामान्य आशय को अग्रसर करने के लिये उत्तरदायी होता है। चूंकि आशय सामान्य है अत:, उत्तरदायित्व भी सामान्य होगा। सभी मुख्य अपराध के दोषी हैं. मात्र दुष्प्रेरण के दोषी नहीं हैं। इस प्रकार के गठबंधन में एक ही प्राणान्तक प्रहार भले ही दल के किसी एक सदस्य द्वारा किया गया है विधि की दृष्टि से वहाँ मौजूद और दुष्प्रेरित कर रहे प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किया गया प्रहार माना जाएगा। यह भी स्पष्ट किया गया कि इस धारा को लागू करने के लिये यह सिद्ध किया। जाना चाहिये कि (1) दोनों के बीच सामान्य आशय था अर्थात् पूर्व निर्धारित योजना बनाई गई थी और इस प्रकार दायी ठहराये जाने वाले व्यक्ति ने अपराध का गठन करने वाले कृत्य में समान रीति से भाग लिया। जब तक सामान्य आशय और कृत्य दोनों में भागीदारी विद्यमान न हों, यह धारा लागू नहीं हो सकती। सामान्य आशय में पूर्व व्यवस्थित योजना विवक्षित है और पूर्व में बनाई गई योजना के अनुसरण में कृत्य पूर्ण करना। इस धारा के अधीन पूर्व सहमति से सुभिन्न रूप से कारित अपराध के पहले पूर्व निर्धारित योजना होना साबित करना आवश्यक नहीं है। किसी विशिष्ट परिणाम के लिये सामान्य आशय अनेक व्यक्तियों के
  1. 2005 क्रि० लॉ ज० 2527 (सु० को०).
  2. (2009) 1 क्रि० लॉ ज० 978 (सु० को०).
23, 2004 क्रि० लॉ ज० 390 (सु० को०). बीच ठीक मौके पर भी बन सकता है जो मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। यद्यपि सामान्य आशय मौके पर भी बन सकता है फिर भी जहाँ तक किसी अपराध के कारित किये जाने के समय की बात है। पूर्व निर्धारित योजना अपराध कारित होने के पहले होना चाहिए। महाराष्ट्र राज्य बनाम जगमोहन सिंह कलदीप सिंह आनन्द24 वाले मामले में यह अभिनिर्धाhि किया गया कि सामान्य आशय सिद्ध करने के लिये अभियोजन से प्रत्येक मामले में पूर्व निर्धारित योजना या ११ सहमति साबित करने के लिये नहीं कहा जा सकता। प्रस्तुत मामले में नाली की सफाई करने के मुद्दे पर पटना की तारीख को सुबह तड़के ही विवाद हो गया था। अभियुक्त पक्ष जो एक ही परिवार के थे। शिकायतकर्ता के घर में घुस गये, उससे हाथापाई की और बाहर घसीट कर लाए, उसकी कई बार पिटाई की गई। अभियुक्तों के विरुद्ध आरोपित कृत्य से स्पष्ट रूप से सामान्य आशय का मामला बनता था जिससे गृहअतिचार कारित किया गया था, और शिकायतकर्ता को उपहति (Hurt) कारित की गई थी। । एजाज एवं अन्य बनाम उ० प्र० राज्य25 के वाद में मृतक और अभियुक्तगणों में से एक के बीच वैमनस्य था। अभियुक्तगणों ने देशी निर्मित पिस्तौल से लैस होकर मृतक को पकड़ लिया और उसे धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया। अभियुक्तों में से एक ने मृतक के गर्दन पर बन्दूक से घातक प्रहार किया। साक्षियों का साक्ष्य स्पष्ट और तर्कसंगत था। सभी अभियुक्तगण भारतीय दण्ड संहिता की धारा 300 सपठित धारा 34 के अधीन दोषी पाये गये। उनका यह तर्क कि केवल एक अभियुक्त की मृतक से दुश्मनी थी और उसी ने चोट पहुंचायी थी, और अन्य अभियुक्तों ने अस्त्र का प्रयोग नहीं किया तत्वहीन पाया गया तथा दोषसिद्धि को उचित ठहराया गया। आगे यह भी सम्प्रेक्षित किया गया कि आपराधिक प्रवृत्ति का कोई परिसाक्ष्य प्राप्त करने के लिये व्यक्तियों के मध्य मानसिक मतैक्य का भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 के अधीन सामान्य आशय का आवश्यक तत्व है। आपराधिक कृत्य में किसी प्रकार से भागीदारी करना भी आवश्यक है परन्तु घटनास्थल पर शारीरिक उपस्थिति सदैव आवश्यक नहीं है। महत्वपूर्ण वाद- सामान्य आशय के सिद्धान्त को समझने के लिये कुछ महत्वपूर्ण मामलों का अध्ययन आवश्यक है। बारेन्द्र कुमार घोष बनाम इम्परर26 के बाद में अपीलकर्ता भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 तथा धारा 34 के अन्तर्गत अभियुक्त घोषित किया गया क्योंकि उसने एक सब-पोस्टमास्टर की हत्या किया था। 3 अगस्त सन् 1923 को शंकरी टोला पोस्ट आफिस का सब पोस्टमास्टर पीछे के कमरे में रुपया गिन रहा था। बहुत से व्यक्ति उस दरवाजे पर प्रकट हुये जो आफिस के आंगन की ओर से कमरे में खुलता था। उन लोगों ने सब पोस्टमास्टर से रुपये की माँग की, और इसके तुरन्त पश्चात् उस पर गोली चला दिये।। सब पोस्टमास्टर की तत्काल मृत्यु हो गयी। अभियुक्त अलग-अलग दिशाओं में बिना रुपये लिये भागे, परन्तु उनमें से एक वारेन्द्र कुमार घोष का पीछा पोस्ट आफिस के कर्मचारियों ने किया। यद्यपि उसने अपनी पिस्तौल से अनेक गोलियाँ चलायी परन्तु वह हाथ में पिस्तौल लिये पकड़ लिया गया। पिस्तौल को विचारण (trial) के दौरान प्रस्तुत किया गया। वारेन्द्र कुमार घोष को हत्या करने के आरोप में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 तथा धारा 34 के अन्तर्गत अभियोजित एवं विचारित किया गया। अपीलकर्ता ने निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किया- (1) यह कि वह पोस्ट-आफिस के बाहर खड़ा था तथा उसने सब-पोस्टमास्टर पर गोली नहीं। चलायी। (2) यह कि लूटने के लिये वह दूसरों का साथ देने पर मजबूर किया गया था तथा मृतक को मारने का उसका कोई आशय नहीं था। (3) यह कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 में, जहाँ बहुत से व्यक्तियों में प्रत्येक ने कोई-न-का आपराधिक कृत्य किया, तथा सभी सामान्य आशय को अग्रसारित करने हेतु कार्य कर रहे थे ।
  1. 2004 क्रि० लॉ ज० 4254 (सु० को०).
  2. (2008) 4 क्रि० लाँ ज० 4374 (सु० को०),
  3. 52 आई० ए० 40.
कुछ भी किसी ने किया है, उसके लिये प्रत्येक उसी प्रकार दण्डनीय है जैसे उसने उसे स्वयं किया हो। यदि धारा 34 संयुक्त दायित्व के सभी मामलों को सम्मिलित करती है तो धारा 114 तथा 149 अर्थविहीन एवं अनावश्यक हो जाएंगी। प्रिवी कौंसिल कलकत्ता उच्च न्यायालय के विचारों से सहमत थी और उसने अपील खारिज कर दिया। अपीलकर्ता को हत्या के लिये दोषी मानते हुये प्रिवी कौंसिल ने निम्नलिखित सिद्धान्त प्रस्तुत किया (1) यद्यपि अपीलकर्ता ने कुछ भी नहीं किया क्योंकि वह बाहर दरवाजे पर खड़ा था, यह ध्यान में रखना चाहिये कि अन्य वस्तुओं की तरह अपराध में भी ‘‘वे भी कार्य करते हैं जो मात्र खड़े रहते हैं तथा प्रतीक्षा करते हैं।” (2) धारा 34 अनेक व्यक्तियों द्वारा अलग-अलग किये गये कार्यो, एक जैसे या भिन्न, से सम्बन्धित है। यदि सभी कार्य सामान्य आशय को अग्रसारित करने हेतु किया गया तो प्रत्येक व्यक्ति सभी कार्यों के परिणाम के लिये उत्तरदायी है जैसे स्वयं उसने ही सम्पूर्ण कार्य को किया हो, क्योंकि धारा के बाद वाले भाग में प्रयुक्त ‘‘वह कार्य” शब्द आपराधिक कृत्य द्वारा किये गये सम्पूर्ण कार्यवाही को सम्मिलित करता है। (3) “आपराधिक कृत्य” का अर्थ है, आपराधिक आचरण की एकता जिसकी परिणति किसी चीज में होती है जिसके लिये एक व्यक्ति दण्डनीय होगा जैसे उसने ही उस कार्य को किया हो। (4) अपीलकर्ता के तीसरे तर्क के जवाब में यह कहा गया कि यह अपराधी के व्यक्तिगत कार्य पर ध्यान केन्द्रित रखता है। अत: हत्या करने का आशय और फलस्वरूप मृत्यु, इसके लिये पर्याप्त नहीं है, अनेक व्यक्तियों द्वारा किया गया एक सिद्ध कार्य होना चाहिये, जिससे मृत्यु होती है और इससे मिलता-जुलता परन्तु इसके जैसा घातक कार्य नहीं, जो एक व्यक्ति द्वारा किया गया हो। इसका उत्तर यह है कि यदि इस विरचना को स्वीकार किया जाता है तो यह अपने को विफल कर देता है, क्योंकि अनेक व्यक्ति एक ही कार्य को नहीं करते हैं जैसा एक व्यक्ति करता है। वे लगभग एक जैसा कार्य कर सकते हैं परन्तु हरेक का कार्य अपना है और चूंकि यह उसका कार्य है तथा उससे सम्बन्धित है, यह दूसरे का कार्य नहीं है या वैसा नहीं है जैसे दूसरे कार्य । अत: इस रूप में विरचित धारा 34 में कोई तत्व नहीं है और यह अनुपयोगी है। (5) इसके अतिरिक्त यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि क और ख, ग के गले में फंदा डालकर उसके विपरीत सिरों को तब तक खींचते हैं जब तक कि उसकी मृत्यु नहीं हो जाती। ऐसी ही अवस्था को स्पष्ट करने के लिये धारा 34 में संयुक्त दायित्व के सिद्धान्त को सम्मिलित किया गया है। यदि प्रत्येक को मात्र उसके कार्य के लिये दोषी ठहराया जाये, जैसे उसने उसे स्पष्ट किया हो तो क तथा ख दोनों ही कह सकते हैं। कि वे मृत्यु के लिये दोषी नहीं हैं। उस स्थिति में उन्हें अधिक से अधिक हत्या के प्रयास के लिये दोषी माना जा सकता है परन्तु हत्या के लिये नहीं, क्योंकि एक की गैर मौजूदगी में दूसरा सफल नहीं हुआ होता। इस विषय पर दूसरा महत्वपूर्ण वाद, महबूब शाह बनाम इम्परर है।27 25 अगस्त सन् 1943 को सूर्योदय के समय, मृतक अल्लाहदाद कुछ अन्य लोगों के साथ अपने गाँव को छोड़कर एक नाव द्वारा नरकुल (reed) काटने और इकट्ठा करने सिन्धु नदी के किनारे पर चल पड़ा। जब वे लोग लगभग 1 मील निम्रगामी धारा में चल चुके थे तो उन लोगों ने वली शाह के पिता मुहम्मद हुसैन शाह को किनारे पर नहाते हुये देखा। मुहम्मद हुसैन शाह ने उन लोगों को सावधान किया तथा कहा कि वे लोग उसकी जमीन से नरकुल न काटें। इस चेतावनी तथा विरोध के बावजूद भी अल्लाहदाद ने उस जमीन से नरकुल काटा तथा वापस लौटने लगा। नरकुल के गट्ठरों के साथ जब वे लोग वापस लौट रहे थे, उसी समय मुहम्मद हुसैन शाह के भतीजे गुलाम कासिम शाह ने उन लोगों से नरकुल लौटाने को कहा। लेकिन उन लोगों ने लौटाने से इन्कार कर दिया। इस पर उसने नाव के रस्से को पकड़ लिया और अल्लाहदाद को धक्का देकर एक लाठी से उस पर प्रहार किया जिससे वह बच गया। तब अल्लाहदाद ने नाव पर से बांस का एक लट्ठा उठाया और गुलाम कासिम शाह पर प्रहार किया। इस पर गुलाम कासिम शाह सहायता के लिये चिल्लाया। उसी समय वली शाह और महबूब शाह भरी बन्दूक लेकर वहाँ पहुँचे। उन दोनों को देखकर अल्लाहदाद तथा उसका मित्र हमीदुल्ला वहाँ से भागने की
  1. 72 आई० ए० 148.
कोशिश करने लगे परन्तु उनके इस प्रयास को वलीशाह तथा महबूब शाह ने विफल कर दिया। वली शाह ने तादाद पर गोली चलायी जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। महबूब शाह ने हमीदुल्ला पर गोली चला ||जससे उसे चोटें आयीं । वली शाह फरार रहा और उसे पकड़ा न जा सका। महबूब शाह तथा गुलाम कासि शाह की धारा 302 सपठित धारा 34 के अन्तर्गत अल्लाहदाद की हत्या के लिये विचारित किया गया। महबूब शाह को हत्या के प्रयास के लिये विचारण न्यायालय द्वारा सात साल की कठोर कारावास की सजा हुई। परन्तु अपील में लाहौर उच्च न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 सपठित धारा 34 के अन्तगत अल्लाहदाद की हत्या के लिये उसे मृत्यु दण्ड की सजा दिया। इस सजा के विरोध में महबूब शाह ने प्रिवो कौंसिल में अपील किया। प्रिवी कौंसिल ने अपील स्वीकार कर लिया और सजा को रद्द कर दिया। इस मामले में न्यायालय ने निम्नलिखित मत (Observations) व्यक्त किये। (1) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 34 के अन्तर्गत दायित्व के लिये सामान्य आशय (Common intention) आवश्यक है और अभियुक्त द्वारा आपराधिक कृत्य सामान्य आशय को अग्रसरित करने हेतु किया गया हो। (2) धारा 34 को सफलतापूर्वक लागू करने के लिये यह साबित किया जाना चाहिये कि आपराधिक कृत्य, जिसके विरुद्ध अभियोग लगाया गया है, किसी एक अभियुक्त द्वारा सामान्य आशय को अग्रसर करने के लिये किया गया है। यदि ऐसा है तो अपराध के लिये किसी भी एक व्यक्ति पर दोषारोपण किया जा सकता है। जैसे सारे कार्य केवल उसी ने किये हों। (3) इस धारा के अन्तर्गत सामान्य आशय का अर्थ है, पूर्ण सुनियोजित योजना तथा अभियुक्त को एक अपराध के लिये इस धारा को लागू कर दोषी ठहराने हेतु यह सिद्ध होना चाहिये कि आपराधिक कृत्य पूर्व सुनियोजित योजना के अधीन किया गया है। (4) किसी अभियुक्त के आशय को साबित करने के लिये प्रत्यक्ष प्रमाण को उपलब्ध करना, यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। अधिकतर मामलों में प्रमाण को उसके कार्य या आचरण, या मामले की अन्य सुसंगत परिस्थितियों से निश्चित किया जाता है। | (5) सामान्य आशय तथा वही और समरूप (Same and Similar) आशय के अन्तर में किसी प्रकार का घपला नहीं होना चाहिये। उनके बीच बहुत ही सूक्ष्म अन्तर है फिर भी अन्तर वास्तविक तथा सारवान है। और इस अन्तर की अपेक्षा करना न्याय का गला घोटना होगा। | (6) धारा 34 की शब्दावली के अन्तर्गत सामान्य आशय को तब तक निश्चित नहीं माना जाना चाहिये, जब तक कि मामले की परिस्थितियों में इसे निश्चयत: निर्धारित न किया जा सके। । इस मामले में न्यायाधीशों की राय थी कि न तो कोई ऐसा प्रमाण है और न ही इसकी परिस्थितियाँ ऐसी हैं जिनसे यह सिद्ध हो सके कि महबूब शाह ने वलीशाह से मिलकर कार्य किया और कार्य पूर्व योजना को अग्रसर करते हुये किया गया जिस समय वह वलीशाह के साथ गुलाम कासिम को बचाने दौड़ा था। दोनों की। एक ही इच्छा थी, गुलाम कासिम को बचाने की और यदि आवश्यकता हो तो बन्दूक का प्रयोग कर बचाया जाय। इसी इच्छा को पूरा करने में महबूब शाह ने हमीदुल्ला पर तथा वलीशाह ने अल्लाहदाद पर गोली चलायी। परन्तु इसमें सामान्य आशय को अग्रसर करने हेतु सम्बन्धी कोई भी प्रमाण नहीं उपलब्ध हैं। अत: अपीलकतो को हत्या के लिये सजा देने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इस प्रकार का कोई प्रमाण हमें नहीं मिलता कि अपीलकर्ता और वली शाह के बीच ऐसा कोई समझौता या पूर्व योजना थी कि गुलाम कासिम को बचाते समय अल्लाहदाद की हत्या कर दी जाये। प्रिवी कौंसिल द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धान्त अनेक भारतीय निर्णयों में लागू किया गया। रामनाथ बना मध्य प्रदेश राज्य-8 में सुन्दर के दुश्मनों ने रात्रि के अंधेरे में एक सड़क पर उस पर आक्रमण किया। इस का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं था कि किसने वह घातक गोली चलायी थी। एक मात्र उपलब्ध प्रमाण उसका ना घोषणा पत्र (Dying declaration) था तथा पड़ोसियों के वक्तव्य कि चारों हत्यारे सुन्दर के नजदीक सड़क
  1. ए० आई० आर० 1953 सु० को 420.
देखे गये थे। रामनाथ को धारा 302 सपठित धारा 34 के अन्तर्गत हत्या के लिये सजा दी गयी। अपील में उच्चतम न्यायालय ने मामले को सुना परन्तु सजा को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति महाजन ने कहा “यदि यह सत्य भी हो कि सभी अपीलकर्ता गोली चलाने के समय घटनास्थल पर मौजूद थे तो भी यह तथ्य अपने आप में, यह सिद्ध करने के लिये कि सुन्दर की हत्या के लिये अपीलकर्ताओं का सामान्य आशय था, पर्याप्त नहीं है। यह भी हो सकता है कि चारों एक साथ खड़े रहे हों और उनमें से एक ने सुन्दर को देखकर उस पर एकाएक गोली चला दिया हो। इस सम्भावना को रेकार्ड पर मौजूद किसी भी प्रमाण द्वारा समाप्त नहीं किया गया है। ऐसी परिस्थिति में जब तक यह नहीं माना जा सकता कि किसने गोली चलायी थी तब तक इसमें से किसी भी व्यक्ति को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के अन्तर्गत हत्या के लिये सजा नहीं दी जा सकती। ऐसा प्रतीत होता है कि इस मामले में उच्च न्यायालय महबूब शाह बनाम इम्परर के बाद में प्रिवी कौंसिल द्वारा दिये गये निर्णय के वास्तविक प्रभाव को समझ नहीं सका। अत: इसका धारा 34 के सम्बन्ध में दिया गया निर्णय उलट दिया जाना चाहिये। इसी प्रकार उच्चतम न्यायालय ने कृपाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य29 के वाद में सामान्य आशय की कल्पना को मानने से इन्कार किया। इस प्रकरण में एक दिन सुबह उन लोगों ने देखा कि दो अन्य श्रमिक मानसिंह तथा शेर सिंह उसी रास्ते से जा रहे हैं। उन्होंने मजदूरों से पूछा कि वे कहाँ जा रहे हैं। मानसिंह आदि ने उन्हें बताया कि वे जैराज के खेत में गन्ने की कटाई के लिये जा रहे हैं। अपीलकर्ताओं ने उनको गाली दी और वहाँ जाकर काम करने से मना किया। किन्तु मानसिंह और शेर सिंह ने उनकी बात नहीं सुनी और वे आगे बढ़ गये। अभी वे कुछ ही दूर गये थे कि अपीलकर्ता उनकी ओर दौड़े और उन्हें मारने लगे। भूपाल और कृपाल ने उनको भाले के हत्थे से मारा तथा शिवराज ने लाठी से। उसी समय जैराज भी वहाँ पर आ गया। और उनसे अपने मजदूरों को मारने का कारण पूछने लगा। उसने उनको मारने से मना किया। तब शिवराज ने अपनी लाठी से जैराज के पैरों पर प्रहार किया और वह नीचे गिर गया। कृपाल ने अपना भाला उसकी कान के पास भोंक दिया, भूपाल ने अपना भाला उसके बायें जबड़े में भोंक दिया और फिर उसके सीने पर पैर रखकर जबड़े में से भाला बाहर निकाल लिया। जबड़े से भाले को बाहर निकालते ही जैराज मर गया। हाईकोर्ट ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 सपठित धारा 34 के अन्तर्गत हत्या के लिये दी गई सजा को स्वीकार किया। सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमे की अपील को गई। सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित विचार व्यक्त किया-क्रमबद्ध प्रहार तथा शरीर के उन भागों को, जिनको शिवराज तथा कृपाल के प्रहार का निशाना बनाया गया था तथा प्रहार के वास्तविक परिणामों, जैसा कि ऊपर कहा गया है, को ध्यान में रखते हुये यह कहना कठिन है कि उनमें से किसी भी व्यक्ति का आशय मृतक को मारने का था। यह सोचना भी उचित नहीं है कि उस क्षण तीन अपीलकर्ताओं का सामान्य आशय जो मात्र मजदूरों को मारने का था, एकाएक जैराज को मारने के सामान्य आशय में परिवर्तित हो गया तब उसने उनके बीच वाद विवाद में हस्तक्षेप किया। अत: हम उच्च न्यायालय के इस विचार को स्वीकार करने में असमर्थ हैं कि तीनों अपीलकर्ताओं का सामान्य आशय मृतक की हत्या करना था। अतः जहाँ तक जैराज के ऊपर प्रहार का प्रश्न है तीन अपीलकर्ताओं के विरुद्ध जो एकमात्र सामान्य आशय आरोपित किया जा सकता है वह जैराज को पीटने का था तथा उस हथियार को भी प्रयोग करने का था जो उनके हाथ में था और जो घातक चोट पहुंचा सकता था।” । उपरोक्त कथन के आधार पर तीनों अभियुक्तों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326 के अन्तर्गत जैराज पर प्रहार करने का दोषी पाया गया। परन्तु भूपाल अकेले धारा 302 के अन्तर्गत हत्या के लिये दोषी पाया गया। एक मामले में अ ब तथा स का सामान्य आशय म को लूटने का था। अ और ब दोनों म के घर में घुस गये और उसे मारा पीटा तथा लूटा भी परन्तु स घर के बाहर इसलिये खड़ा रहा ताकि वह अ और ब को किसी सम्भावित खतरे से चेतावनी दे सके। अ और ब के साथ ही अभियोजित किये जाने पर स ने यह तर्क दिया कि उसने न तो लूट में भाग लिया है और न म को मारा पीटा ही है, अतएव वह किसी अपराध का
  1. ए० आई० आर० 1954 सु० को० 706.
दोषी नहीं है। इस मामले में अ, ब और स तीनों लोग लूट का अपराध कारित करने के लिये दोषी होंगे। स का तक मान्य नहीं है क्योंकि बारेन्द्र कमार घोष बनाम इम्परर30 के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया था कि वे लोग भी अपराध में सहयोग करते हैं जो केवल बाहर खड़े होकर इन्तजार करते हैं। चूंकि स भी अ आर बे के साथ लूट कारित करने के सामान्य आशय में भागीदार था और वह बाहर इसलिये खड़ा रहा ताकि अ और ब को किसी खतरे से आगाह कर सके वह भी अ ब के साथ लूट का अपराध कारित किये जाने में बराबर का सहभागी है। महबूब शाह1 के वाद में प्रिवी कौंसिल ने वही या समरूप (Same or smilar) आशय तथा सामान्य आशय के अन्तर को स्पष्ट किया। आशय को सामान्य होने के लिये यह सिद्ध किया जाना चाहिये कि उसमें सभी सदस्य साझीदार थे। समय की दृष्टि से सामान्य आशय हमेशा अपराध घटित होने के पूर्व अस्तित्ववान होता है। वही या समरूप आशय तथा सामान्य आशय के बीच के अन्तर को उच्चतम न्यायालय ने पांडुरंगा बनाम हैदराबाद राज्य32 के वाद में स्पष्ट किया है। इस वाद में रामचन्द्र साल्के नामक एक व्यक्ति अपनी पत्नी की बहन रसीकाबाई तथा अपने नौकर सुभानराव के साथ अपने खेत में मिर्च तोड़ने गया था। रसीकाबाई तथा सुभानराव एक खेत में मिर्चे इकट्ठा कर रहे थे तथा रामचन्द्र एक फर्लाग दूरी पर एक दूसरे खेत में। कुछ ही देर पश्चात् रसीकाबाई उस तरफ से चिल्लाने की आवाज सुनकर सुभानराव के साथ उधर को दौड़ पड़ी। उन्होंने देखा कि पाँचों अभियुक्त रामचन्द्र को लाठियों और कुल्हाड़ियों से प्रहार कर रहे थे। रसीकाबाई ने प्रहार का विरोध किया परन्तु उन लोगों ने उसे गम्भीर परिणामों की धमकियाँ दिया। रामचन्द्र की घटनास्थल पर मृत्यु हो गयी। सभी पाँचों व्यक्तियों को धारा 302 सपठित धारा 34 के अन्तर्गत हत्या करने के आरोप में। अभियोजित किया गया। अपीलकर्ता (अर्थात् पांडुरंगा) की सजा को उच्चतम न्यायालय ने निम्न आधारों पर रद्द कर दिया ‘‘कई व्यक्ति एक ही साथ किसी एक व्यक्ति पर आक्रमण कर सकते हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति का हत्या करने का आशय हो सकता है और उनमें से प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग घातक प्रहार कर सकता। है तब भी कोई भी व्यक्ति इस धारा में इच्छित सामान्य अशय से युक्त नहीं हो सकता, क्योंकि मस्तिष्कों का पूर्व मिलन पूर्व निर्धारित योजना को निर्मित करने हेतु नहीं हुआ था। इस तरह के मामलों में प्रत्येक व्यक्ति जो चोट उसने पहुँचायी है उसके लिये वह स्वयं दायित्वाधीन होगा, परन्तु कोई अन्य व्यक्ति किसी अन्य कार्य के लिये प्रतिनिधायी रूप से दायित्वाधीन नहीं होगा और यदि अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर पाता है कि उसका ही प्रहार वह घातक प्रहार था जिससे मृत्यु हुई तो उसे हत्या के लिये सजा नहीं दी जा सकती, चाहे कितना ही स्पष्ट रूप से हत्या करने के आशय को क्यों न सिद्ध कर दिया जाये।” उपरोक्त सिद्धान्त का प्रयोग कर उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त को धारा 326 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत, घोर उपहति (grievous hurt) का दोषी पाया। हत्या के लिये अभियुक्त की सजा को इसलिये रद्द कर दिया गया, क्योंकि अभियोजन (Prosecution) यह सिद्ध नहीं कर सका कि हत्या सभी अभियुक्तों के सामान्य आशय को अग्रसर करने के उद्देश्य से की गयी थी। नीना जी राव जी बनाम महाराष्ट्र राज्य33 के वाद में नीनाजी राव जी तथा सात अन्य व्यक्तियों ने भाना जी तथा उनके पुत्रों के साथ, अभियुक्तों में से एक के जानवरों को अवरुद्ध करने पर, झगड़ा किया। अभियुक्त आनन्द तथा समाधान के बीच पहले कुछ वाद-विवाद हुआ तथा बाद में मारपीट। समाधान को चोटें लगी। तथा वह अपने घर मरहम पट्टी कराने चला गया। उसके पिता भाना जी अपने घर के सामने बैठे हुये थे। यह अभिकथित (Alleged) किया गया कि नीना जी राव जी और परशुराम ने भाना जी को इस कदर मारा कि बाद । में उसकी मृत्यु हो गयी। अन्य अभियुक्त समाधान को त्रिम्बक के घर ले गये जहाँ उसे पीटा। यह निणात हुआ कि
  1. 52 आई० ए० 40.
  2. 72 आई० ए० 148.
  3. ए० आई० आर० 1955 सु० को 216.
  4. ए० आई० आर० 1976 सु० को 1537.
‘‘यह सिद्ध करने को रेकार्ड पर कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं उपलब्ध है कि ‘क’ और ‘ख’ में से किसके घातक प्रहार द्वारा मृतक की मृत्यु हुई। उनका आशय मृतक स्वयं को ही नहीं उसके पुत्र को भी चोट पहुँचाने का था। अन्य प्रहार शरीर के किसी महत्वपूर्ण हिस्से पर नहीं पड़े तथा उसकी मृत्यु कारित करने के उनके सामान्य आशय के प्रमाण के अभाव में यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त का सामान्य आशय मात्र घोर उपहति (grievous injury) करने का था।” अत: उन्हें हत्या करने का दोषी नहीं पाया गया अपितु उन्हें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 325 सपठित धारा 34 के अन्तर्गत उपहति (hurt) के लिये दोषी पाया गया। नित्यसेन बनाम पं० बंगाल राज्य34 के बाद में मृतक चिन्तामनी घोष हुगली में किसी प्लान्ट (Plant) में कार्य कर रहा था। वह हर शनिवार को अपने गाँव आया करता था। 13 नवम्बर, सन् 1971 को लगभग 8.30 बजे रात्रि को अपने घर जब वह आया तो अपने घर की खिड़की को उसने खटखटाया। जब उसके दोनों भाई नवजीवन घोष तथा रतन घोष ने दरवाजा खोला तो देखा कि उनके भाई चिन्तामनी घोष को नित्यसेन और दो अन्य-वैद्यनाथ घोष तथा धरम घोष पीट रहे हैं तथा उसे घसीट कर पूर्व की ओर बाँस खण्ड (Bamboo grove) में ले जा रहे हैं, जहाँ उन लोगों ने देखा कि उस पर छुरे से प्रहार किया जा रहा है। जब दोनों ने अपने भाई की मदद करना चाहा तो नित्यसेन, जो अपने हाथ में पिस्तौल लिये हुये था, ने उन्हें धमकाया। उन लोगों ने ग्यारह चोटें की जिनमें तीन अत्यधिक गम्भीर थीं। हत्यारे चिल्लाये कि उन्होंने पुलिस एजेन्ट” को मार डाला है और अपीलकर्ता नित्यसेन ने घटना स्थल छोड़ने से पहले एक बार पिस्तौल चलाया। यह अभिनिर्धारित किया गया कि ‘‘इस वाद में पूर्व विचार विमर्श के लिये न केवल पर्याप्त समय था, अपितु अपीलकर्ता सहित अन्य हत्यारों ने जानबूझ कर पूर्व निर्धारित योजना को अग्रसर करने हेतु मृतक की हत्या किया है। अभियोजन यह सिद्ध करने में सफल हो गया है कि हत्या, तीनों अभियुक्तों के सामान्य आशय को अग्रसर करने हेतु की गयी थी।” । नन्द रस्तोगी बनाम बिहार राज्य35 वाले मामले में मुख्य अभियुक्त अ-1, 5 बजे अपराह्न सूचनादाता की दूकान पर आया, जहाँ दुकानदार अपने किरायेदार के साथ बैठा था। अ-1 ने सूचनादाता को सावधान किया कि वह अपने पुत्र को रोके कि वह उसके मामलों में दखलंदाजी न करे। उसने धमकी दिया कि यदि वह ऐसा नहीं करता तो उसके पुत्र की हत्या की जा सकती है। ऐसा कहते हुये सूचनादाता को गंभीर परिणामों की धमकी देते हुये वह चला गया। लगभग 6.45 बजे अपराह्न जब सूचनादाता अपनी दूकान में अपने पुत्र एवं अन्य प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के साथ बैठा था, तभी बिजली कट गई। चूंकि यह दीपावली का दिन था, इसलिये मोमबत्ती और मिट्टी के दिये उसकी दूकान में और अन्यत्र जल रहे थे। पन्द्रह मिनट बाद अभियुक्त अ-1 और उसका भाई ख और कुछ अन्य जिनमें ज और म सहित कुल पाँच अभियुक्त थे, उसकी दूकान में आए, इनके पास देशी पिस्तौलें थीं। अ-1 और ज ने सूचनादाता के पुत्र को पकड़ लिया और उसे बंदूक की नोक पर रिहायशी अपार्टमेन्ट में भीतर ले गये जो दूकान के ठीक पीछे है। जब सूचनादाता और अन्य लोगों ने बीच बचाव करना चाहा तो अभियुक्तों में से एक और उसके साथी ने जिनके हाथ में देशी पिस्तौल थी उन्हें रोक दिया। उन्होंने उन्हें चुप रहने के लिये धमकाया। अभियुक्तों द्वारा मृतक को भीतर ले जाने के बाद गोली चलाई। गई। अभियुक्तगण भाग गये। जब सूचनादाता भीतर गया तो उसके पुत्र के शरीर से रक्त बह रहा था और वह अचेत था जो बाद में अस्पताल में मर गया। यह अभिनिर्धारित किया गया कि सभी पांचों अभियुक्त जो सूचनादाता की दुकान में आए थे, उनका हत्या। करने का सामान्य आशय था और उन्होंने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार कृत्य किया, अत: उनमें से तीन भा० द० सं० की धारा 34 की सहायता से दोषसिद्ध किये जाने के दायी थे। । उपरोक्त वर्णित मामलों का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि धारा 34 को लागू होने के लिये पूर्व विचार-विमर्श या पूर्व निर्धारित योजना का सिद्ध होना आवश्यक है। यद्यपि सामान्य आशय को अभियुक्तों के
  1. ए० आई० आर० 1978 सु० को० 383 : 1978 क्रि० लाँ ज० 481 (सु० को०).
  2. 2002 क्रि० लॉ ज० 4698 (सु० को०).
कार्य, उनके आचरण तथा अन्य ससंगत परिस्थितियों से निश्चित किया जाता है, यह आवश्यक नहीं है कि किसी अभियुक्त द्वारा कोई स्पष्ट कार्य किया गया हो। यह पर्याप्त है, यदि आपराधिक कृत्य किसी भी एक ऑभयुक्त द्वारा उनके सामान्य आशय को अग्रसर करने के उद्देश्य से किया गया था।36 सामान्य आशय किसी एक अपराध को करने का होना चाहिये यद्यपि अपराध सामान्य आशय के भागीदारों में से किसी भी एक दारा किया जा सकता है और तब सभी को अपराध के लिये दोषी ठहराया जा सकता है। । हरियाणा राज्य बनाम तेजराम38 के वाद में ट तथा र दो भाईयों के विरुद्ध मध्य रात्रि में फरसा तथा लाठी से हमला कर द की हत्या करने का आरोप था। दोनों की मृतक से दुश्मनी चल रही थी। दोनों द के घर हथियारों से लैस होकर आये और मिलकर हमला किया। चोट की प्रकृति से यह स्पष्ट था कि वह धारदार तथा कुंद औजार से कारित की गयी थी। यह निर्णय दिया गया कि इन परिस्थितियों में अभियुक्त जिसके हाथ में लाठी थी इस आधार पर दोषमुक्त नहीं किया जा सकता कि उसने मृतक पर आक्रमण नहीं किया था अथवा हत्या करने का उसका सामान्य आशय नहीं था, क्योंकि प्रत्यक्षदर्शियों का यह साक्ष्य कि द पर दोनों ने हमला किया था, डाक्टरी साक्ष्य जिसमें दो प्रकार की चोटें दर्शायी गयी थीं, से मेल खा रहा था। अतएव दोनों को धारा 302 सपठित धारा 34 के अन्तर्गत सिद्ध दोष ठहराया गया। | अहेर पीथा वाशी तथा अन्य बनाम गुजरात राज्य39 के मामले में अहेर पीथा नामक एक व्यक्ति तथा उसके पाँच पुत्रों पर आरोप लगाया गया था कि उन लोगों ने नाभाराम नामक एक व्यक्ति की हत्या किया है। अभियुक्तों ने पहले मृतक को खींच कर अपने घर की ड्योढ़ी के अन्दर किया तथा उस पर प्रहार करने के बाद उसके शरीर की ड्योढ़ी के सामने से गुजरती सड़क पर फेंक दिया। इन तथ्यों के आधार पर उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनित किया कि सभी अभियुक्त एक मत से कार्य कर रहे थे। वे एक दूसरे से सम्बन्धित थे। जिस समय उन्होंने नाभाराम को ड्योढ़ी के अन्दर खींचा था तथा उसके शरीर को सड़क पर फेंका था, वे एक मत से कार्य कर रहे थे। नाभाराम के शरीर पर घाव के बीस निशान थे जो इस बात के प्रतीक थे कि सभी अभियुक्त सामान्य आशय में सह-भागीदार थे और उनका आशय नाभाराम की मृत्यु कारित करना। था। मेजर सिंह बनाम पंजाब राज्य-0 वाले मामले में मृतका गुरतार कौर का अपीलार्थी के भाई बलदेव सिंह के साथ विवाह हुआ था, जबकि अन्य मृतका सुखो का विवाह अपीलार्थी के साथ हुआ था। वह दोनों प्रीतम सिंह की पुत्रियाँ थीं। बलदेव सिंह की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी गुरतार कौर अपीलार्थी के साथ उसकी पत्नी के रूप में रह रही थी। इन दोनों पत्नियों से कोई संतान नहीं हुई। जीत सिंह अ-1 और बलवंत सिंह अ-2 अपीलार्थी मेजर सिंह के साथ मिलकर मृतका को पर्याप्त दहेज न लाने के लिये निरंतर प्रताडित करते थे। घटना से एक दिन पहले अभि० सा० 2 प्रीतम सिंह अपने बेटे कुलेल सिंह के साथ अ-1 के घर गया, जिससे दहेज का भुगतान न करने के मामले को सुलझाया जा सके। दोनों रात में जीत सिंह के घर पर रुके। अगले दिन सुबह लगभग 9 या 10 बजे अ-1 और अ-2 दोनों का मृतका महिलाओं से अपने पिता से दहेज की मांग की बाबत की गई शिकायत को लेकर झगड़ा होने लगा। झगड़े के दौरान अ-1 ने करसी उठा लिया और थान सिंह अ-4 ने कुल्हाड़ी उठा लिया और मृतका पर प्रहार किया। उस समय अपीलार्थी ने गुरतार कौर का हाथ पकड़ रखा था, जबकि अ-2 बलवन्त सिंह ने सुखो का हाथ पकड़ा हुआ था, जिससे कि अन्य दो अपीलार्थी अर्थात् अ-1 और अ-4 मृतकाओं पर प्रहार कर सकें। मृतकाओं को पहँचाई गई चोटें इतनी गंभीर थीं कि दोनों की मौके पर ही मृत्यु हो गई। | यह अभिनिर्धारित किया गया कि जब हमलावरों ने हथियार उठा लिया और घटना की शिकार महिलाओं पर प्रहार करने आए तब अपीलार्थी ने एक महिला का हाथ पकड़ लिया। यह दर्शित करने के लिये कुछ भी नहीं है कि उसने मृतका का हाथ छोड़ दिया था अथवा हमलावरों को हमला करने मना
  1. उत्तर प्रदेश राज्य बनाम इफ्तिखार खान, ए० आई० आर० 1973 सु० को० 863.
  2. हरदेव सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1975 क्रि० लॉ ज० 243.
  3. 1980 क्रि० लॉ ज० 1057 (सु० को०).
  4. 1983 क्रि० लाँ ज० 1049 (सु० को०).
  5. 2003 क्रि० लाँ ज० 473 (सु० को०).
किया। ऐसी स्थिति में यह निष्कर्ष निकालना युक्तियुक्त होगा कि अपीलार्थी भी हमलावरों के आशय के भागीदार बने जो मृतकाओं की हत्या करने का था। सुबहमणि बनाम तमिलनाडु राज्य41 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया था कि यदि अपीलार्थीगण अपनी व्यक्तिगत संपत्ति की रक्षा के लिये प्रतिरक्षा के व्यक्तिगत अधिकार का प्रयोग किया था, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने सामान्य आशय को अग्रसर करने के लिये अपराध कारित किया है, क्योंकि धारा 96 में यह पूर्णरूप से स्पष्ट किया गया है कि व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुये की गई कोई बात अपराध नहीं है। उनका आशय कोई आपराधिक कृत्य करने का या कोई ऐसा कृत्य करने का नहीं था, जिसे विधि विरुद्ध कहा जा सके। उनका उद्देश्य मृतक की हत्या करने का नहीं था, जबकि अपनी संपत्ति की रक्षा करना था। हो सकता है उनमें से कुछ ने अपनी व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का अतिक्रमण किया हो और उसके लिये वे व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी माने जाएंगे। किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि सामान्य आशय के अग्रसरण में अपराध करके हत्या कारित की गई थी, क्योंकि उनके द्वारा व्यक्तिगत संपत्ति की, जो उनके कब्जे में बहुत समय से थी, रक्षा के लिये हत्या किया गया था।

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