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Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 8 LLB 1st Year Notes

  Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 8 LLB 1st Year Notes:- In General Exceptions Part of Indian Penal Code 1860 (IPC) Part 8 Post, you welcome all the candidates again, today you will get further information about General Exceptions. LLB Notes Study Material PDF Download in Hindi English Urdu, Please comment to download in Language.

 
  1. कब ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का होता है- यदि अपराध पूर्वगामी अन्तिम धारा में प्रगणित भांतियों में से किसी भांति का नहीं है, तो शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार हमलावर की मृत्यु स्वेच्छया कारित करने तक का नहीं होता, किन्तु इस अधिकार का विस्तार धारा 99 में वर्णित निर्बन्धनों के अध्यधीन हमलावर की मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का होता है।
टिप्पणी शरीर सम्बन्धी वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का अध्ययन करते समय धारा 100 तथा 101 को एक साथ पढ़ा जाना चाहिये। इस धारा के अन्तर्गत वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का उपयोग करते हुये हमलावर की मृत्यु कारित करने के अतिरिक्त कोई अन्य अपहानि कारित की जा सकती है, यदि मामला धारा 100 के अन्तर्गत नहीं आता है। वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुये यदि अभियुक्त मृत्यु के अतिरिक्त कोई अन्य अपहानि कारित करता है तो उसे केवल यह सिद्ध करना होगा कि उसने संहिता की धारा 99 में, प्रतिपादित सीमा का उल्लंघन नहीं किया है। जहाँ सादी वर्दी में कोई सिपाही विधिपूर्वक अ को कैद करने का प्रयत्न करता है और अ उसे लुटेरा समझकर अत्यधिक तथा अनावश्यक बल से उस पर प्रहार कर देता है। अ. सिपाही को उपहति कारित करने के लिये दण्डनीय होगा। जिस अपराध का उसे भय था वह लट नहीं वरन केवल कैद था। अत: सिपाही को लुटेरा समझने का अ के पास कोई युक्तियुक्त कारण नहीं था भले ही वह अपने प्राधिकार के अन्तर्गत कार्य नहीं कर रहा था। उसका कार्य धारा 100, खण्ड 6 के अन्तर्गत नहीं आता है बल्कि धारा 101 के अन्तर्गत आता है। चूंकि धारा 101 की धारा 99 में उल्लिखित परिसीमाओं के अध्यधीन क्रियान्वित होती है, अत: अ दण्डनीय होगा। योगेन्द्र मोरारजी बनाम गुजरात राज्य73 के वाद में अभियुक्त तथा मृतक के बीच किसी ऋण की। अदायगी तथा एक कुयें की खुदायी को लेकर विवाद था। एक बार जब अभियुक्त जीप से घर को वापस लौट
  1. ए० आई० आर० 1930 पटना 347.
  2. 1977 क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 116 (इला० ).
  3. रारू ए० आई० आर० 1946 सिन्ध 17.
  4. 2002 क्रि० लॉ ज० 4102 (सु० को०).
  5. ए० आई० आर० 1980 सु० को० 660.
रहा था, दो व्यक्तियों ने हाथ उठाकर जीप रोकने का इशारा किया। इसी समय उनके अन्य सहयोगी भी जीप धारा 102 के समीप आ गये, इस पर अभियुक्त ने अपनी पिस्तौल निकाल कर दनादन तीन बार गोलियाँ चलायीं जिससे एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी । ऐसा करते समय उन्होंने रुक कर यह सुनिश्चित करने का प्रयत्न नहीं किया। कि जल्दी-जल्दी तीन बार गोली चलाने की आवश्यकता थी या नहीं और न ही, उसने इसके प्रभाव को देखना उचित समझा। यह अभिनिर्णीत हुआ कि वह इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार की सीमा को पार कर गया। था। धन्नू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य74 के बाद में अधिकार विधिक परिसीमा को पार कर गया था यद्यपि अभियुक्त ने उस समय प्रहार किया था जबकि अभियोजन पक्ष से सम्बन्धित लोगों ने गोलियाँ चलायी थीं। आभयुक्त द्वारा पिस्तौल छीन कर प्रयोग में लाया गया बल इस अवधारणा को जन्म देता था कि मृत्यु अथवा घोर उपहति के भय का कारण समाप्त हो चुका था। इन परिस्थितियों में अभियुक्त द्वारा पिस्तौल से गोला। चलाना प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार की सीमा से अधिक था।
  1. शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारम्भ और बना रहना- शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उसी क्षण प्रारम्भ हो जाता है, जब अपराध करने के प्रयत्न या धमकी से शरीर के संकट की युक्तियुक्त आशंका पैदा होती है, चाहे वह अपराध किया न गया हो, और वह तब तक बना रहता है। जब तक शरीर के संकट की ऐसी आशंका बनी रहती है।
टिप्पणी यह धारा यह प्रतिपादित करती है कि शरीर की वैयक्तिक प्रतिरक्षा का अधिकार कब प्रारम्भ होता है। और कब तक बना रहता है। यह अधिकार उसी समय प्रारम्भ होता है जैसे ही शरीर को खतरे की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती है और तब तक बना रहता है जब तक खतरे की आशंका बनी रहती है। यह अधिकार केवल तभी प्रारम्भ होता है जब अपराध करने के प्रयत्न या धमकी से शरीर के संकट की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती है।75 यह आवश्यक नहीं है कि वास्तविक अपराध कारित ही हुआ हो। दूसरे शब्दों में इस अधिकार का प्रयोग करने के पूर्व वास्तविक उपहति होनी आवश्यक नहीं है।76 अपराध का सचमुच कारित किया जाना आवश्यक नहीं है। अधिकार के प्रारम्भ के लिये प्रयत्न धमकी तथा उसके परिणामस्वरूप संकट की आशंका पर्याप्त है। उदाहरण के लिये यदि एक व्यक्ति एक खतरनाक हथियार छीन कर अपने आप को इस प्रकार तैयार कर रहा हो जिससे तुरन्त हिंसा का उसका आशय स्पष्ट हो तो वैयक्तिक प्रतिरक्षा के प्रयोग के लिये पर्याप्त न्यायोचित आधार होगा, क्योंकि उसका आचरण धमकी के सदृश्य है और अन्य दूसरे व्यक्ति यह सोचने का पर्याप्त आधार रखते हैं कि खतरा बिल्कुल समीप है।77 अरुण बनाम महाराष्ट्र राज्य78 के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार वैसे ही प्रारम्भ हो जाता है जैसे शरीर को खतरा की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती है और यह अधिकार तब तक रहता है जब तक कि शरीर को खतरे की युक्तियुक्त आशंका वर्तमान रहती है। | नवीन चन्द्र बनाम उत्तरांचल राज्य79 के वाद में दो भाइयों में पारिवारिक विवाद था और दुर्घटना के दिन प्रात: काल दोनों परिवारों के बीच कुछ कहा सुनी भी हुई थी। मृतक को सर पर चोटें पहुँची थीं। पंचायत के माध्यम से कुछ सुलह समझौते की बात भी हुई थी। समझौता पंचायत के समय मृतक जिसे प्रात:काल सर में चोटें आईं थीं उत्तेजित हो गया और अभियुक्त को गालियाँ देने लगा और फलतः उसके बाद वाकयुद्ध के दौरान अभियुक्त ने दो लोगों को जो निहत्थे थे चोटें पहुँचायी और परिवार के अन्य लोगों को भी खदेड़ दिया। यह अभिधारित किया गया कि इन परिस्थितियों में अभियुक्त को प्राइवेट प्रतिरक्षा का तर्क देने का अधिकार नहीं प्राप्त था। यह भी अभिधारित किया गया कि प्रावईट प्रतिरक्षा का अधिकार अपने बचाव का अधिकार है। और इसका तर्क दण्डात्मक (Vindictive), आक्रामक और प्रतिशोधात्मक अपराधों के प्रयोजन हेतु नहीं दिया जा सकता है।
  1. ए० आई० आर० 1980 सु० को० 864.
  2. गोवर्धन भूयन (1870) 4 बंगाल लॉ रि० (अपेन्डिक्स) 101.
  3. एम० सी० दत्त बनाम राज्य, 1977 क्रि० लॉ ज० 506 गौहाटी.
  4. विक्टर सोलेमन, (1966) क्रि० लाँ ज० 841:
  5. (2009) 2 क्रि० लॉ ज० 2065 (सु० को०).
  6. 2007 क्रि० लॉ ज० 874 (एस० सी०).
यह भी अभिधारित किया गया कि शरीर की प्रावईट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारम्भ, जैसे ही शरीर के खतरे की युक्तियुक्त आशंका होती है वैसे हो जाता है और तब तक जारी रहता है जब तक कि वह खतरा बना रहता है। खतरे की आशंका को टालने के लिये प्रयोग की जाने वाली शक्ति का व्यावहारिक दृष्टिकोण से न कि सूक्ष्मदर्शी या उच्च शक्ति वाली दृष्टि के चश्मे से मामूली या सीमान्त अतिलंघन का पता लगाने के लिये परीक्षण किया जाना चाहिये।
  1. कब सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने तक का होता है- सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार, धारा 99 में वर्णित निर्बन्धनों के अध्यधीन दोषकर्ता की मृत्यु या अन्य अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का है, यदि वह अपराध जिसके किए जाने के, या किए जाने के प्रयत्न के कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, एतस्मिन्पश्चात् प्रगणित भांतियों में से किसी भी भांति का है, अर्थात्:
पहला-लूट, दूसरा-रात्रौ गृह-भेदन तीसरा– अग्नि द्वारा रिष्टि, जो किसी ऐसे निर्माण, तम्बू या जलयान को की गई है, जो मानव आवास के रूप में या सम्पत्ति की अभिरक्षा के स्थान के रूप में उपयोग में लाया जाता है। चौथा-चोरी, रिष्टि या गृह अतिचार, जो ऐसी परिस्थितियों में किया गया है, जिनसे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो कि यदि प्राइवेट प्रतिरक्षा के ऐसे अधिकार का प्रयोग न किया गया तो परिणाम मृत्यु या घोर उपहति होगा। टिप्पणी यह धारा उन परिस्थितियों को इंगित करती है जिनमें सम्पत्ति से प्रतिकूल वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुये हमलावर की मृत्यु तक कारित की जा सकती है। एक व्यक्ति अपनी सम्पत्ति तथा किसी अन्य व्यक्ति की सम्पत्ति की रक्षा करते हुये हमलावर की मृत्यु कारित कर सकता है। यदि यह विश्वास करने का आधार था कि हमलावर जिसकी मृत्यु कारित की गयी है, इस धारा में वर्णित अपराधों में से कोई अपराध कारित करने वाला था या उसका प्रयत्न कर रहा था।80 सम्पत्ति के सम्बन्ध में प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग कर मृत्यु कारित करने की पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं है। यह परिसीमित है। यह मृत्यु या घोर उपहति का युक्तियुक्त भय तथा लोक प्राधिकारियों द्वारा प्रदत्त सहायता द्वारा परिसीमित है। इस विचार की पुष्टि कन्चन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य81 के वाद में भी की गयी थी। किन्तु उत्तर प्रदेश राज्य बनाम शिवमूरत82 में प्राइवेट प्रतिरक्षा सम्बन्धी अधिकार को एक प्रगतिशील दृष्टिकोण प्रदान किया गया। इस वाद में कहा गया कि प्रतिरक्षा सम्बन्धी अधिकार की परिसीमा का निर्धारण करते समय हमें उपहति कारित करने में अभियुक्त की वास्तविकता को मुख्यतया ध्यान में रखना चाहिये। प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार विभिन्न परिस्थितियों में परिसीमा से अधिक भी हो सकता है। किसी व्यक्ति द्वारा कठिन परिस्थितियों में अपने को बचाने हेतु किये गये कार्यों तथा घटनाओं का परिमापन उस विवेक तथा सावधानी के सन्दर्भ में किया जाना चाहिये, जिसने उसे कार्य करने तथा अपने अधिकार का प्रयोग करने के लिये बाध्य किया। लूट, या रात्रि गृहभेदन या अग्नि द्वारा रिष्टि- सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार मृत्यु कारित करने तक विस्तारित होता है यदि लूट, रात्रि गृहभेदन या अग्नि द्वारा रिष्टि या इनमें से कोई एक अपराध कारित किया जा रहा है या किये जाने का प्रयत्न किया जा रहा है। चोरी– धारा 103 खण्ड 4 उन मामलों से सम्बन्धित है जहाँ वह कृत्य जिससे प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग उत्पन्न होता है उन परिस्थितियों में चोरी, रिष्टि या गृह अतिचार, (Theft, Mischief or House Trespass) के समतुल्य है जिसमें युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न हो सकती है कि यदि वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग न किया गया तो परिणाम मृत्यु या घोर उपहति होगी।83 यह नियम उस समय नहीं
  1. अली मियाँ, ए० आई० आर० 1926 कल० 1012.
  2. 1982 क्रि० लॉ ज० 1633 (इला०).
  3. 1982 क्रि० लॉ ज० 2003 (इला०).
  4. स्टेट ऑफ उड़ीसा बनाम रघुराम साहू और अन्य, 1979 क्रि० लॉ ज० 502.
लागू होता जबकि मृत्यु की आशंका उस व्यक्ति के हस्तक्षेप के फलस्वरूप उत्पन्न होती है जो वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करता है।84 अतिचार– ऐसे अपराध जिनके कारित किये जाने की आशंका होने पर सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार मृत्यु कारित करने तक विस्तारित होता है भारतीय दण्ड संहिता की धारा 103 में वर्णित है। जस्सा सिंह बनाम हरियाणा राज्य85 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि चोरी, रिष्टि अथवा गृह अतिचार के सभी अपराध ऐसी परिस्थितियों में कारित किये जाने चाहिये, जिससे कि युक्तियुक्त ढंग से यह प्रतीत हो कि उसका परिणाम मृत्यु अथवा घोर उपहति होगा। यद्यपि कि आपराधिक अतिचार अथवा रिष्टि की दशा में भी अपनी अथवा अन्य की सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध है। परन्तु आपराधिक अतिचार भारतीय दण्ड संहिता की धारा 103 में वर्णित नहीं है। अतएव सम्पत्ति का प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करने तक विस्तारित नहीं होता है जो ऐसे कार्य करता है। यदि अतिचार का कार्य किसी खुली हुई भूमि के सम्बन्ध में है। मात्र ऐसा गृह अतिचार जिससे युक्तियुक्त ढंग से यह आशंका हो कि मृत्यु अथवा घोर उपहति उस कार्य का परिणाम होगा वही ऐसा अपराध है जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 103 में वर्णित है।। उदाहरण- पाटिल हरी मेघजी तथा अन्य बनाम गुजरात राज्य86 के मामले में यह निर्णय दिया गया कि किसी व्यक्ति को उस समय प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं प्राप्त होता जबकि वह किसी ऐसे व्यक्ति पर प्रहार करता है जो कि भूमि पर गिर चुका है, अस्त्र विहीन है तथा प्रतिरोध उत्पन्न करने की स्थिति में नहीं है। गुरुदत्त मल87 के वाद में मृतक, जिनमें से किसी के भी पास खतरनाक हथियार नहीं थे एक खेत में पुलिस के संरक्षण में शान्तिपूर्ण आशय से फसल काट रहे थे। अभियुक्त जो फसल को अपना बता रहे। थे उपयुक्त अधिकारियों से सहायता की प्रार्थना नहीं किये यद्यपि ऐसा करने के लिये उनके पास पर्याप्त समय था, एक बहाने से सिपाहियों को दूर भेज दिये और इसके बाद बन्दूकों व अन्य घातक हथियारों से हमला कर नजदीक से उन्हें गोली मार दिये। यह निर्णय दिया गया कि मृतकों का कार्य लूट नहीं था, अत: अभियुक्तों को वैयक्तिक प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं था। | इस्माइल88 के वाद में मध्य रात्रि में जगाये जाने पर अभियुक्त ने मृतक को अपने आंगन में पाया। मृतक घर के चारों तरफ बनी दीवार को लांघ कर घर में घुसा था। आंगन के दरवाजे में ताला लगा था। आंगन से लगे एक कमरे में अभियुक्त ने मृतक के सिर पर गंडासे से प्रहार कर उसे मार डाला। यह निर्णय दिया गया कि आंगन भी एक भवन था भले ही उस पर छत न रही हो तथा अंधेरे में अभियुक्त को यह नहीं ज्ञात था कि चोर के पास हथियार थे या नहीं। फलत: गड़ासे द्वारा मृतक की मृत्यु कारित करते समय अभियुक्त धारा 103 खण्ड 4 के अन्तर्गत वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार की सीमा को पार नहीं किया। क्याब जान लॉ89 के वाद में एक चोर ने अभियुक्त के गन्ने के खेत में प्रवेश किया तथा दाह की सहायता से गन्ने काटने लगा। गन्ने काटने की आवाज सुनकर अभियुक्त ने आवाज की दिशा में निशाना साध कर तीर छोड़ा। तीर चोर के बगल में लगा जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। यह निर्णय दिया गया कि चूंकि चोर के पास दाह था जो एक खतरनाक हथियार था अतः अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा हेतु उसका तीर चलाना न्यायसंगत था। अभियुक्त ने सद्भाव में अपने शरीर एवं सम्पत्ति की प्रतिरक्षा हेतु तीर चलाया था। । सुब्रामणि बनाम तमिलनाडु राज्य90 वाले मामले में मृतक जयवेलु ने मुदलियार और सावित्री से भूमि खरीदा था। अपीलार्थी सं० 1 जो उक्त भूमि का शिकमी काश्तकार था, मृतक को जिसने भूमि खरीदा था। भूमि का कब्जा देने में बाधा डाल रहा था। विवाद को पंचायत के जरिये भी सुलझाया नहीं जा सका। मृतक ने 19 अप्रैल, 1971 को खेत जोतने का प्रयास किया, किन्तु अपीलार्थी सं० 1 ने विरोध किया, जिससे, मृतक ने भूमि की जोताई बंद कर दिया। इसके बाद मृतक पक्ष चला गया, अगले दिन सुबह लगभग 6 बजे से पूर्व
  1. रामराम महतो, (1947) 26 पटना 550.
  2. 2002 क्रि० ताँ ज० 563 (एस० सी०).
  3. 1983 क्रि० लॉ ज० 826 (सु० को०).
  4. ए० आई० आर० 1965 सु० को० 257.
  5. (1926) 6 लाहौर 463.
  6. (1904) क्रि० लाँ ज० 997.
  7. 2002 क्रि० लॉ ज० 3915 (सु० को०).
मृतक अपने पुत्र और दो पुत्रियों अभि० सा० 2 और 3 तथा अभि० सा० 1 अभि० सा० 2 का पति तथा 231 सिकामणि पुनः भूमि जोतने पहुँचे और कृषि कार्य आरंभ कर दिया। इसकी जानकारी मिलने पर  अपीलार्थीगण तथा अभियुक्त 5 और 6 (जो दोषमुक्त हो गये हैं) आए और भूमि जो अपीलार्थियों के कब्जे में थी, जोतने का विरोध करने लगे। यह अभिकथन किया गया कि अपीलार्थी सं० 1 से 4 के पास फावडे, क्रो-वार और चाकू आदि थे, जबकि अभियुक्त 5 और 6 खाली हाथ आए थे। अपीलार्थी सं० 1 ने मृतक को जोताई करने से रोका, यद्यपि मृतक ने भूमि की कीमत चुकाने का वादा किया। अपीलार्थी सं० 1 से 4 ने मृतक पर अपने-अपने हथियारों से प्रहार किया, जबकि अभि० 5 और 6 ने मुक्के से प्रहार किया। जब अभि०-सा०-सं० 1, 2, 3 और सिकामणि ने मृतक को बचाने के लिये बीचबचाव करने का प्रयास किया तो उन पर भी प्रहार किया। गया। सिकामणि पर अपीलार्थी सं० 1 अ० 5 और 6 ने प्रहार किया, अभि० सा० 2 पर अपीलार्थी 1, 3 और 4 ने प्रहार किया, जबकि अ० 5 और 6 ने मुक्के से प्रहार किया। अभि० सा० ३ को अपीलार्थी सं० 1, 2 और 3 ने मारा, जबकि अभि० सा० 1 को सभी अपीलार्थियों ने और दोषमुक्त अभियुक्त 5 और 6 ने भी मारा।। मारपीट के कारण जयवेलु और अभि० सा० 1, 2 और 3 को रक्तस्राव वाली चोटें आई, वे गिर पड़े। अभि० सा० 6 मृतक की पुत्री जो घटनास्थल से कुछ दूरी पर थी, ने देखा कि अभियुक्त अपने हथियारों सहित भाग रहे थे और यह भी देखा कि घायल खेत में पड़े थे और उनके घावों से रक्त बह रहा था। इस मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि अपीलार्थीगण का खेत पर 50 वर्षों से कब्जा था। मृतक ने खेत की जोताई करके अपीलार्थी को बेदखल करने का प्रयास किया। इसके कारण हुये झगड़े में मृतक मारा गया। और उसके कुछ आदमी घायल हुये। अपीलार्थियों का आशय मृतक की हत्या करने का नहीं था, बल्कि उन्होंने आत्मरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुये कार्रवाई किया था। व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते समय अपीलार्थियों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि अपराध कारित करने के लिये समान आशय से प्रेरित थे। समान आशय केवल अपराध के लिये ही सुसंगत है और व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार के सम्बन्ध में नहीं है। इसलिये अपीलार्थीगण किसी अपराध के दोषी नहीं हैं। आगे यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते समय मात्र उतना ही बल प्रयोग करना चाहिये जो आवश्यक हो, किन्तु समान रूप से यह सुस्थिर है कि ऐसी स्थिति में जब व्यक्ति को अपने या अन्य के जीवन या अंगों पर आसन्न संकट दिखाई दे रहा हो, तो उसके लिये आवश्यक नहीं है कि समय को सोने के तराजू पर मापे । उसे खतरे से बचने के लिये कम से कम बल प्रयोग करना आवश्यक है। यहाँ तक कि यदि उस क्षण के आवेग में वह प्रतिरक्षा कुछ अधिक समय तक जारी रखता है, जो शांत एवं अनुत्तेजित दिमाग से विचार करने पर आवश्यकता से अधिक प्रतीत होगी, वहाँ भी विधि सम्यक छूट देती है।91 |
  1. ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का कब होता है- यदि वह अपराध, जिसके किए जाने या जिसके किए जाने के प्रयत्न से प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, ऐसी चोरी, रिष्टि या आपराधिक अतिचार है, जो पूर्वगामी अन्तिम धारा में प्रगणित भांतियों में से किसी भांति का न हो, तो उस अधिकार का विस्तार स्वेच्छया मृत्यु कारित करने तक का नहीं होता, किन्तु उसका विस्तार धारा 99 में वर्णित निर्बन्धनों के अध्यधीन दोषकर्ता की मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का होता है।
टिप्पणी यह धारा सम्पत्ति के प्रतिकूल वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में मृत्यु से भिन्न कोई अन्य अपहानि कारित करने को न्यायसंगत ठहराती है। यदि अपराध जिसे कारित किया गया या कारित करने का प्रयत्न किया गया हो वह अपराध साधारण चोरी (theft), रिष्टि (Mischief) या आपराधिक अतिचार। (Criminal trespass) है। यह अधिकार संहिता की धारा 99 में वर्णित निर्बन्धनों के अध्यधान है। | धारा 104 के परिणामस्वरूप किसी भूमि पर कब्जा रखने वाला व्यक्ति अपने कब्जे का बना र m का निष्काषित करने के उद्देश्य से प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग द्वारा मृत्यु से भिन्न कोई भी ]91. 2002 क्रि० लॉ ज० 4102 सु० को०. आवश्यक क्षति कारित करने का हकदार है। कल्पित वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में कारित मत्स्य को यह धारा न्यायसंगत नहीं ठहराती है।92 कंवर सेन बनाम बीर सेन93 के वाद में ब अभियुक्त के खेत से होकर जाने वाले एक रास्ते से जा रहा था। ब, जब खेत के मध्य में ही था कि अभियुक्त स, द तथा य अचानक लाठियों एवं कुल्हाड़ी के साथ प्रकट हो गये तथा ब को रोक लिये। ब ने उन लोगों से प्रार्थना किया कि उसे माफ कर दिया जाये तथा उसने प्रतिज्ञा किया कि वह उस रास्ते से भविष्य में कभी नहीं गुजरेगा। किन्तु उसकी बात पर ध्यान दिये बिना ही अभियुक्तों ने उस पर अपने-अपने हथियारों द्वारा आक्रमण कर दिया। ब के शरीर पर नौ चोटें आयीं तथा उसका दायाँ हाथ टूट गया। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त घोर उपहति कारित करने के लिये उत्तरदायी हैं और इस धारा के अन्तर्गत बचाव के हकदार नहीं हैं क्योंकि वे धारा 99 में उपबन्धित सीमा को पार कर गये थे। एक दूसरे प्रकरण में ब ने अपने दोस्त स की सहायता से द को पूरी तरह से पीटा क्योंकि द ने ब की पत्नी के साथ सम्भोग करने के उद्देश्य से उसके घर में प्रवेश किया था। यह निर्णय दिया कि ब तथा स किसी अपराध के लिये उत्तरदायी नहीं है अपितु इस धारा के अन्तर्गत बचाव के अधिकारी है।24। अ पाता है कि उसके द्वारा बोई गई फसल को बं जड़ से उखाड़ रहा है। पुलिस सहायता की प्रतीक्षा किये बगैर अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा करने की योजना बनाता है जिससे फसल को और अधिक नुकसान न पहुँचे, इस उद्देश्य से वह ब पर आक्रमण करता है और उसे उपहति कारित करता है। दोनों के बीच मारपीट के दौरान ब, अ पर छूरे से वार करता है और चोट के कारण अ की मृत्यु हो जाती है। यहाँ अपनी फसल को नुकसान से बचाने के लिये अ द्वारा किये गये प्रयत्न युक्तिसंगत थे और यह तथ्य कि उसने पुलिस की सहायता नहीं लिया, उसे प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं करता। चूंकि अ ने केवल उपहति कारित किया। था, जो मृत्यु से न्यून थी और उपहति करते समय इसका कार्य न्यायोचित था अतः ब इस संहिता की धारा 304 के अन्तर्गत अ की मृत्यु कारित करने के लिये दण्डनीय होगा। किसी सम्पत्ति के वास्तविक स्वामी को यह अधिकार होता है कि एक अतिचारी को जबकि वह अतिचार के कृत्य या प्रक्रिया से संलग्न हो, सम्पत्ति से बेदखल कर दे किन्तु यदि एक बार अतिचार सफलतापूर्वक पूर्ण हो जाता है तो वास्तविक स्वामी का अधिकार समाप्त हो जाता है और ऐसे मामलों में उसके पास केवल एक ही उपाय बचता है कि वह विधि के अन्तर्गत उपलब्ध उपचारों की शरण लें 95 एक प्रकरण में ब तथा उसके तीन पुत्र स की सम्पत्ति पर अनधिकृत रूप से कब्जा किये हुये थे। वे लोग घटना के लगभग दो वर्ष पहले से सम्पत्ति पर कब्जा किये हुये थे और खुले आम कृषि के लिये उसका उपयोग कर रहे थे। घटना के समय ब ने उसमें गेहूं की फसल बोया था। घटना के दिन ‘स’ कुछ अन्य लोगों के साथ अपनी जमीन पर गया तथा ब द्वारा अनधिकृत रूप से बोये गये खेत में हल चलाने लगा। ब तथा उसके पत्रों ने स को रोकने का प्रयत्न किया जिससे कि फसल बर्बाद न होने पाये। अन्त में ब अपनी लाठी का प्रयोग किया और स को घटनास्थल पर ही मार डाला। ब पर स की हत्या के लिये अभियोजन चलाया गया तो उसने म की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का सहारा लिया। इस प्रकरण में चूंकि ब द्वारा स की सम्पत्ति पर अतिचार का कृत्य पूर्ण हो चुका था अतः विधि के अन्तर्गत प्रदत्त उपचारों की सहायता लेने के दायित्वाधीन था। किन्त उसने विधि प्रदत्त उपचारों की सहायता लेने के बजाय विधि को ही अपने हाथ में ले लिया तथा ब द्वारा बोर्ड गयी, यद्यपि अवैध रूप से ही, भूमि को जोतने का प्रयत्न किया। अत: ब को अपनी भूमि की सुरक्षा करने का अधिकार था और वह विधित: मृत्यु से न्यून कोई भी उपहति कारित कर सकता था। चूंकि ब को मृत्यु अथवा घोर उपहति जैसा कोई भय प्रतीत नहीं होता अतः वह अपने अधिकार की सीमा पार कर गया था। ब हत्या के लिये दण्डनीय नहीं होगा अपितु वह आपराधिक मानव वध का दोषी होगा। उसे धारा 300 अपवाद 2 का लाभ मिलेगा।
  1. रामराम महतो (1947) 26 पटना 550.
  2. (1969) क्रि० लॉ ज० 76.
  3. ढन्मन तेली, (1873) 20 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 36.
  4. रामरतन बनाम राज्य, 1977 क्रि० लॉ ज० 433 (सु० को०).
अ, ब को अपनी भूमि पर अतिचार करते हुये देखता है। वह ब पर गोली चलाता है और उसे घायल कर देता है। ऐसा प्रतीत होता था कि ब को अ की भूमि पर होकर आने-जाने का अधिकार था। यह अने। भूलवश ब को अतिचारी समझ लिया था। इसलिये अ को अधिकार था कि अपनी सम्पत्ति की प्रतिरक्षा में मृत्यु से न्युन वह कोई उपहति कारित कर दे। परन्तु यह अतिचार का साधारण मामला था तथा अ ने गोली चलाया था, इससे यह प्रतीत होता है कि उसने आवश्यकता से अधिक उपहति कारित किया था। अ उपहति। कारित करने के अपराध का दोषी होगा। एक प्रकरण में स ने द के घर में मध्य रात्रि में चोरी करने के आशय से प्रवेश किया। अंधेरे में द ने उस पर लाठी से प्रहार किया और वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। द ने एक बार और उस पर प्रहार किया। जिससे चोट स के सिर पर लगी। अत्यधिक रक्तस्राव के फलस्वरूप स की मृत्यु हो गयी। इस प्रकरण में सम्पत्ति की सुरक्षा के सन्दर्भ में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं होगा क्योंकि जहाँ मात्र चोरी का भय है। वहाँ चोरी नहीं कारित की जा सकती। अतः द आपराधिक मानव वध का दोषी होगा तथा उसे धारा 300, अपवाद 2 का लाभ मिलेगा। प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार अतिचारी के विरुद्ध सम्पत्ति की सुरक्षा के लिये प्राप्त है किन्तु इस अधिकार का तभी प्रयोग किया जा सकता है जबकि लोक प्राधिकारियों से सहायता प्राप्त करने के लिये समय नहीं उपलब्ध है।96 ईश्वर बहेड़ा बनाम राज्य97 ग्रामवासियों ने अभियुक्त की भूमि में अतिचार कर मकान बनाने का प्रयत्न किया और अभियुक्त आक्रमणकारियों के प्रवेश को वर्जित करने के उद्देश्य से आवश्यक शक्ति के साथ तैयार होकर वहाँ पहुँचा किन्तु उसने पब्लिक प्राधिकारियों की सहायता नहीं लिया। अभिनिर्णीत हुआ कि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के अन्तर्गत उसका कार्य वैध था। शरीर के प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के सम्बन्ध में न्यायालय ने कहा कि यह अधिकार किसी अपराध के विरुद्ध उपलब्ध है और वह कृत्य जिसके फलस्वरूप किसी अपराध का गठन होता है, आक्रमणकारी को प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग के लिये कोई आधार नहीं प्रदान कर सकता। अ चोरी करने के आशय से ब के घर के अन्दर प्रवेश किया। ब और उसके परिवार के सदस्यों ने अ को घेर लिया और लाठियों से हमला कर दिया। अपने जीवन को खतरे में पाकर अ ने रिवाल्वर निकाल लिया । और फायर कर दिया जिससे ब की मृत्यु हो गयी। इस मामले में चूंकि अ स्वयं अतिचारी था और चोरी करने के आशय से ब के घर में प्रवेश किया था अतएव वह प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का दावा नहीं कर सकता है। अतएव अ हत्या कारित करने के अपराध का दोषी होगा। अ स्वयं में अपराधी था और उसने स्वयं को ऐसी परिस्थिति में डाल दिया था कि जिस कारण उसने आत्मरक्षा में गोली चलाने का अवसर प्राप्त हुआ। कोई भी ऐसा कार्य जिससे कोई अपराध गठित होता है उसे अपराधी द्वारा अपनी आत्मप्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करने का आधार नहीं माना जा सकता। बलजीत सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य8 में यह अभिनिर्णीत हुआ कि यदि विवादग्रस्त भूमि का वास्तविक कब्जा अभियुक्त के पास है तो उस भूमि को बचाये रखने का उसे अधिकार है। किन्तु यदि इस अधिकार का प्रयोग करते समय आक्रमणकारी पर प्रहार भी किया जाता है जिससे उसे घातक चोट पहुँचती है। तो यह माना जायेगा कि उसने अपने इस अधिकार की सीमा का उल्लंघन कर दिया है। | भाजा प्रधान बनाम उड़ीसा राज्य99 के वाद में मृतक ने अभियुक्त के घर से बकरी चुरा लिया था। अभियुक्त ने उसे अपनी बकरी वापस करने के उद्देश्य से दौड़ाया तथा उसे वापस पाने की प्रक्रिया में मृतक पर प्रहार किया, बिना यह जाने कि मृतक के शरीर के नाजुक हिस्सों पर चोटें आयी हैं। यह अभिनिर्णीत हुआ
  1. एम० रहमान बनाम राज्य, 1977 क्रि० लाँ ज० 1293 (गौहाटी).
  2. 1976 क्रि० लॉ ज० 611.
  3. 1976 क्रि० लॉ ज० 1745 सु० को०,
  4. 1976 क्रि० लॉ ज० 1347 (उड़ीसा).
कि अभियुक्त ने सम्पत्ति सम्बन्धी अपने प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार की सीमा को पार कर लिया था। अत: वह आपराधिक मानव वध के अपराध का दोषी है और उसे धारा 304 के भाग 2 के अन्तर्गत दण्डित किया जायेगा। जय भगवान बनाम स्टेट आफ हरियाणा के वाद में अभियुक्त नं० 2 उस खेत का सह-स्वामी और कब्जाधारी था जहाँ पर घटना घटी थी। उसने खतरनाक अस्त्र से घोर उपहति कारित किया था। यह अभिनित किया गया कि विवादित खेत का एक सह-स्वामी और कब्जाधारी होने के नाते अभियुक्त भारतीय दण्ड संहिता की धारा 104 के अधीन सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का दावा करने का हकदार था और इस कारण उसकी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326 के अधीन दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया गया।
  1. सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारम्भ और बना रहना- सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार तब प्रारम्भ होता है, जब सम्पत्ति के संकट की युक्तियुक्त आशंका प्रारम्भ होती सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार चोरी के विरुद्ध अपराधी के सम्पत्ति सहित पहुँच से बाहर हो जाने तक अथवा या तो लोक प्राधिकारियों की सहायता अभिप्राप्त कर लेने या सम्पत्ति प्रत्युद्धत हो जाने तक बना रहता है।
सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार लूट के विरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक अपराधी किसी व्यक्ति की मृत्यु या उपहति, या सदोष अवरोध कारित करता रहता या कारित करने का प्रयत्न करता रहता है, अथवा जब तक तत्काल मृत्यु का, या तत्काल उपहति का, या तत्काल वैयक्तिक अवरोध का, भय बना रहता है। सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार आपराधिक अतिचार या रिष्टि के विरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक अपराधी आपराधिक अतिचार या रिष्टि करता रहता है। सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार रात्रौ-गृह भेदन के विरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक ऐसे गृह भेदन से आरम्भ हुआ गृह-अतिचार होता रहता है। टिप्पणी यह धारा यह उद्घोषित करती है कि सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार कब प्रारम्भ होता है और वह कब तक बना रहता है। प्रथम खण्ड-सम्पत्ति के विरुद्ध सभी अपराधों में जिनमें कि वैयक्तिक प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त रहता है, अधिकार तब प्रारम्भ होता है जब सम्पत्ति के संकट की युक्तियुक्त आशंका प्रारम्भ होती है। प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रारम्भ के लिये यह आवश्यक नहीं है कि सम्पत्ति के लिये यथार्थ संकट प्रारम्भ हो।। संकट की मात्र युक्तियुक्त आशंका पर्याप्त होगी। इसका अर्थ यह है कि वास्तविक अपहानि कारित होने के पर्व ही विपक्षी अपना कार्य कर सकता है। यह प्रतिशोध अधिकार नहीं है अतः इसके प्रयोग के लिये उस समय तक प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है जब तक कि हमलावर अपराध कारित करना प्रारम्भ न कर दे। किसी नगर में आपराधिक दंगा शुरू हो गया। एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के ‘अ” की दूकान को घेर लिया। भीड़ ने ‘अ’ की दूकान को लाठियों से पीटना आरंभ किया। इसके बाद ‘अ’ ने एक गोली चलाया, जिससे भीड़ के एक व्यक्ति ‘ख’’ की मृत्यु हो गई। यह मामला अमजद खान बनाम राज्य वाले
  1. 1999 क्रि० लॉ ज० 1634 (एस० सी०).
  2. चक्रधर (1964) 2 क्रि० लॉ ज० 696.
  3. वरीसा मुदी (1959) क्रि० लॉ ज० 71.
  4. अमजद खान बनाम राज्य ए० आई० आर० 1952 सु० को० 165.
मामले पर आधारित है, जिसके तथ्य इस प्रकार थे कि मध्य प्रदेश के कटनी नगर में सिंधी शरणार्थियों और 235 लमानों के बीच सांप्रदायिक दंगा भड़क उठा था और स्थानीय मुसलमानों की दुकानें लूट ली गयी थी और न पसलमानों को जान गंवानी पड़ी थी। इसके बाद भीड़ अभियुक्त और उसके भाइयों की दुकान पर पहुँची शे पास में थी और भाई की दुकान लूट ली गई। इसके बाद भी अभियुक्त की बंद दुकान के दरवाजे लाठियों से पीटने लगी। अभियुक्त परिवार के रिहायशी कमरे उसके भाई की दुकान के पीछे स्थित थे, भीड दूकान तोडकर भीतर प्रवेश करती, इससे पूर्व अभियुक्त ने अपनी बंदूक से दो बार फायर किया, जिससे दंगाई भीड़ का एक व्यक्ति मारा गया। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि मामले के तथ्य अभियुक्त को व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध करने के लिये पर्याप्त है, भले ही इससे मृत्यु कारित हो गई, क्योंकि अभियुक्त की यह आशंका उचित थी कि यदि उसने तत्परतापूर्वक कार्य नहीं किया होता, तो उसे या उसके परिवार के सदस्यों की मृत्यु या उन्हें गंभीर क्षति कारित हो जाती। उसे दरवाजा तोड़े जाने और भीड़ को दुकान में प्रवेश करने तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं थी। भीड़ के आचरण से दुकान को तोड़ने का खतरा सन्निकट था और एक बार दरवाजा टूटने पर परिवार के सदस्यों की हत्या होना निश्चित थी, यह इस तथ्य से। स्पष्ट था कि अन्य मुस्लिम दूकाने लूट ली गयी थीं और मुसलमान मारे गये थे। इन परिस्थितियों में यह अभिनिर्धारित किया जाना आवश्यक है कि जिस समय अभियुक्त ने गोली चलाई, उस समय मृत्यु अथवा कम से कम गंभीर उपहति का खतरा सन्निकट था और बेकाबू भीड़ को रोकने के लिये फायर करना आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग का मामला नहीं है। यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 102 और 105 के अधीन व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार उसी समय आरंभ हो जाता है, जैसे ही स्वयं अपने या किसी अन्य के शरीर या संपत्ति के प्रति खतरे की युक्तियुक्त संभावना प्रतीत होती है, जिससे कि उसे अपराध करने से रोका जा सके, भले ही अपराध कारित न किया गया हो। संपत्ति की व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करने के लिये यह बिल्कुल आवश्यक नहीं है कि अधिकार का प्रयोग करने वाला व्यक्ति अपनी या किसी अन्य की संपत्ति को लूटे जाने तक अथवा गृह का वस्तुत: अतिचार (अतिक्रमण) किये जाने तक प्रतीक्षा करें। यह अवधारित करने के लिये कि अधिकार का प्रयोग करने में किया गया बल प्रयोग वस्तुत: जितना आवश्यक था, उतना ही किया गया या उससे अधिक किया गया था और जिन परिस्थितियों में व्यक्ति घिर गया था, ऐसी थी या नहीं थी, जिनमें मृत्यु कारित करने की आवश्यकता थी, इसके लिये तथ्यों को मापने के लिये बहुत बारीक मापदण्ड अर्थात् सोने के तराजू की आवश्यकता नहीं है। द्वितीय खण्ड-चोरी के विरुद्ध सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार तब तक बना रहता है जब तक कि-(1) अपराधी सम्पत्ति सहित पहुँच से बाहर नहीं हो जाता, अथवा (2) लोक प्राधिकारियों की सहायता अभिप्राप्त नहीं कर ली जाती, अथवा (3) सम्पत्ति प्रत्युद्धृत (Recovered) नहीं हो जाती।6।। एच० एस० गौड़ के मतानुसार यह धारा यह नहीं उद्घोषित करती कि उस अधिकार का क्या हो जाता है। यदि उपरोक्त में से कोई भी शर्त पूरी हो जाती है किन्तु सम्पत्ति फिर से प्राप्त नहीं कर ली जाती। उनका कथन है कि इस अधिकार का मुख्य उद्देश्य स्वामी को सम्पत्ति की पुन: प्राप्ति में सहायता प्रदान करना है। अतः अधिकार तब तक अस्तित्ववान रहता है जब तक कि उद्देश्य पूर्ण नहीं हो जाता।। “अपराधी के सम्पत्ति सहित पहुंच से बाहर हो जाने तक’ पदावली के अनेक अर्थ व्यक्त किये गये हैं। एक मत के अनुसार प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उस समय समाप्त हो जायेगा जब अभियुक्त सफलतापूर्वक पहुँच से बाहर हो जाता है। यदि हम मान लें कि ‘अ’ ‘ब’ की घड़ी लेकर भाग जाता है तो ‘ब’ उस समय तक उसका पीछा कर सकता है जब तक कि वह उसकी पहुँच से बाहर नहीं हो जाता। किन्तु ‘ब’ का
  1. अमजद खान बनाम राज्य, ए० आई० आर० 1952 सु० को० 165.
  2. पंजाब राव, (1945) नागपुर 881.
  3. गौंड, एच० एस० पेनल लॉ ऑफ इण्डिया (7वाँ संस्करण) भाग 1, पृ० 490-91.
अधिकार ‘अ’ के मात्र भाग निकलने से समाप्त नहीं हो जाता। यदि ‘ब’ किसी दिन ‘अ’ को घड़ी पहने हुये देखता है तो उसे अधिकार होगा कि आवश्यक बल का प्रयोग कर वह घड़ी ‘अ’ से छीन ले। किन्तु यदि उस समय एक सिपाही की सहायता प्राप्त हो सकती है तो ‘ब’ उस सहायता को निश्चयत: प्राप्त करे फिर भी वह ‘अ’ को पकड़ने के अपने प्रयत्न को उस समय तक स्थगित करने के लिये बाध्य नहीं है जब तक कि उसे लोक प्राधिकारियों की सहायता नहीं प्राप्त हो जाती। दूसरा मत यह है कि यदि एक बार चोर पहुंच की सीमा से बाहर हो जाता है तो प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार समाप्त हो जाता है और तत्पश्चात् सम्पत्ति का स्वामी बलपूर्वक चोर से उस वस्तु को नहीं छीन सकता है। यदि चोरी गयी सम्पत्ति किसी दूसरे व्यक्ति के घर में देखी जाती है तो सम्पत्ति का स्वामी उस सम्पत्ति को प्राप्त करने हेतु घर में प्रवेश कर सकता है और वह आपराधिक अतिचार के लिये उत्तरदायी नहीं होगा।10 किन्तु नागपुर उच्च न्यायालय ने इसके विरुद्ध विचार व्यक्त किया है। नागपुर उच्च न्यायालय के अनुसार सम्पत्ति का स्वामी अपनी सम्पत्ति को वापस प्राप्त करने के लिये दूसरे व्यक्ति की एकान्तता (Privacy) को भंग करने का अधिकारी नहीं है। इस प्रकार का प्रवेश अतिचार होगा।11 किन्तु यदि घर चोर का ही है तब स्वामी अपनी सम्पत्ति को प्राप्त करने के लिये वैधतः घर। में प्रवेश कर सकता है।12 ‘ अन्ततः पहुँच से बाहर” का अर्थ होगा कि चोर अपने अन्तिम लक्ष्य पर पहुँच चुका है।13। मेन ने इससे भिन्न विचार व्यक्त किया है। उनका कथन है कि सम्पत्ति को कारित क्षति के विरुद्ध प्रतिरक्षा का अधिकार उसी सिद्धान्त से नियन्त्रित होता है अर्थात् किसी क्षति की अनवरतता जिसे निवारित किया जा सके। अतः न्यायोचित सीमा के अन्तर्गत तब तक प्रतिरोध कायम रह सकता है जब तक कि दोषपूर्ण कार्य जारी रहता है। किन्तु यदि उदाहरणस्वरूप लुटेरा गायब हो जाता है तो आत्मरक्षा का अधिकार उसकी मृत्यु कारित करने तक विस्तारित नहीं होगा यदि उससे बाद में किसी दिन भेंट हो जाती है। फिर भी यदि सम्पत्ति उसके कब्जे में पायी जाती है तो उसे प्राप्त करने के प्रयोजन से अधिकार पुनः जागृत हो जायेगा।14 राज्य बनाम सिद्ध नाथ राय15 के वाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह विचार व्यक्त किया है कि एक लम्बी अवधि के पश्चात् चोरी की गयी सम्पत्ति को पुनः कब्जे में लेना कितना ही न्यायसंगत क्यों न हो सम्पत्ति से सम्बन्धित वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग नहीं माना जा सकता। धारा 105 द्वारा जो अपेक्षित है वह यह है कि सम्पत्ति या तो तुरन्त प्राप्त हो जाय या अभियुक्त के अन्ततः पहुँच के बाहर होने के पूर्व प्राप्त हो जाये। यह निवेदित किया जाता है कि ”अपराधी के पहुँच के बाहर होने तक” के अर्थों के बारे में विचार विनिमय शैक्षणिक प्रकृति का अधिक है व्यावहारिक प्रकृति का नहीं। मेरे विचार से चोर के विरुद्ध अधिकार के जागृत होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता जैसा कि मेन ने सुझाया है क्योंकि चोरी एक अनवरत अपराध और यदि चोर के विरुद्ध कोई अधिकार है तो वह तब तक निरन्तरित रहता है जब तक कि अपराध जारी रहता है। इसके अतिरिक्त स्वामी को यह अधिकार है कि वह वाद में सम्पत्ति को जहाँ कहीं भी देखता है उसे प्राप्त कर ले और वह यदि ऐसा करता है तो क्या यह सम्पत्ति के सम्बन्ध में अनवरत प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग नहीं होगा। चतर्थ खण्ड- आपराधिक अतिचार के विरुद्ध सम्पत्ति का कब्जा रखने वाले व्यक्ति को तब तक प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार रहता है जब तक अतिचार जारी रहता है। हुकुम सिंह16 के वाद में अभियुक्त
  1. जरहा बनाम सुरति राम, 3 एन० एल० आर० 177.
  2. मीर दाद बनाम क्राउन, ए० आई० आर० 1926 लाहौर 74.
  3. जरहा बनाम सुरति राम, 3 एन० एल० आर० 177.
  4. पंजाब राव बनाम इम्परर, (1945) नागपुर 881.
  5. गौड, एच० एस० पेनल लॉ आफ इण्डिया (7वाँ संस्करण) भाग 1, पृ० 492.
  6. मीर दार बनाम क्राउन, ए० आई० आर० 1926 लाहौर 74.
  7. मेन, क्रिमिनल लॉ पृ० 231.
  8. ए० आई० आर० 1959 इला० 233.
  9. ए० आई० आर० 1961 सु० को० 1541.
बलपूर्वक गन्ने से लदी दो बैलगाड़ियाँ ‘म’ के खेत में से होकर आम रास्ते पर जो ‘म’ के खेत के किनारे से 237 था ले गया। ‘म’ के खेत में फसल खड़ी थी। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त ब एक खेत में था। अतिचार समाप्त नहीं हुआ था और ‘म’ को यह अधिकार था कि वह अभियुक्त को अपराध करते रहने से ओके। न्यायालय ने यह भी कहा कि यह तथ्य कि अभियुक्त खेत से अतिरिक्त आपराधिक अतिचार कारित । किये बिना नहीं जा सकते थे उन्हें यह आग्रह करने का अधिकार नहीं देता कि वे आपराधिक अतिचार को जारी रखें। उन्हें ‘म” के आदेश का पालन करना चाहिये था। । राजेश कुमार बनाम धर्मवीर17 के वाद में यह तर्क दिया गया था कि अभियुक्त की पार्टी ने परिवादी की पार्टी पर तब हमला किया जब परिवादी पार्टी ने उनके मकान के बाहरी दरवाजे को क्षतिग्रस्त कर दिया था। यह अभिनिर्धारित किया गया कि यदि उपरोक्त तर्क को सत्य मान लिया जाय तब भी इस प्रकार की क्षति पहुँचाना भारतीय दण्ड संहिता की धारा 426 के अधीन केवल रिष्टि का अपराध बनता है और ऐसी दशा में धारा 105 के उपबन्धों के अनुसार अभियुक्तगण को अपनी सम्पत्ति की प्रतिरक्षा में कार्य करने का अधिकार केवल तब तक था जब तक रिष्टि कारित की जा रही थी। दूसरे शब्दों में दरवाजा क्षतिग्रस्त हो जाने के पश्चात् अभियुक्तों की सम्पत्ति को प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं था। अतएव इस मामले में अभियुक्तगण । (प्रत्यर्थी) को सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं था। पंचम खण्ड- इस खण्ड के अनुसार गृह भेदन के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार केवल जब तक विस्तृत रहता है जब तक कि अपराध जारी रहता है। एक प्रकरण में जहाँ ‘ब’ गृहभेदन समाप्त होने के पश्चात् चोर का पीछा कर उसे एक खुले स्थान में मार डालता है। वह सफलतापूर्वक यह नहीं कह सकता कि सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के तहत उसने ऐसा किया।18
  1. घातक हमले के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार जबकि निर्दोष व्यक्ति को अपहानि होने की जोखिम है-जिस हमले से मृत्यु की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित होती है, उसके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करने में यदि प्रतिरक्षक ऐसी स्थिति में हो कि निर्दोष व्यक्ति की अपहानि की जोखिम के बिना वह उस अधिकार का प्रयोग कार्यसाधक रूप से न कर सकता हो, तो उसके प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार वह जोखिम उठाने तक का है।
दृष्टान्त क पर एक भीड़ द्वारा आक्रमण किया जाता है, जो उसकी हत्या करने का प्रयत्न करती है। वह उस भीड़ पर गोली चलाए बिना प्राइवेट प्रतिरक्षा के अपने अधिकार का प्रयोग कार्यसाधक रूप से नहीं कर सकता, और वह भीड़ में मिले हुए छोटे-छोटे शिशुओं को अपहानि करने की जोखिम उठाए बिना गोली नहीं चला सकता यदि वह इस प्रकार गोली चलाने से उन शिशुओं में से किसी शिशु की अपहानि करे तो क कोई अपराध नहीं करता। टिप्पणी यह धारा यह उदघोषित करती है कि वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का उपयोग करते हुये कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में निर्दोष व्यक्तियों को अपहानि कारित की जा सकती है। इस धारा की व्याख्या करते समय यह सदैव ध्यान में रखना चाहिये कि धारा 106 का प्रवर्तन केवल उन्हीं मामलों में होता है जिसमें मृत्यु की युक्तियुक्त आशंका न हो, न कि घोर उपहति की। यह भी आवश्यक है कि इस धारा के अन्तर्गत किसी निर्दोष व्यक्ति को कारित की गई अपहानि हर स्थिति में आवश्यक रही हो तथा कारित अपहानि किसी भी दशा में संहिता की धारा 99 में वर्णित परिसीमाओं से अधिक न रही हो, क्योंकि धारा 97 के उपबन्धों के कारण धारा 99 में स्थापित की गई परिसीमायें धारा 106 पर लागू होती हैं। यह धारा उस व्यक्ति द्वारा जो मृत्यु की युक्तियुक्त आशंका करता है, निर्दोष व्यक्ति को कारित अपहानि को भी न्यायसंगत ठहराती है।
  1. 1997 क्रि० लॉ ज० 2242 (एस० सी०). ।
  2. बलाकी जलहेद, (1868) 10 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 9.

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