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Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 6 LLB 1st Year Notes

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  1. शरीर तथा सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार-धारा 99 में अन्तर्विष्ट निबन्धनों के अध्यधीन, हर व्यक्ति को अधिकार है, कि वह
पहलामानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले किसी अपराध के विरुद्ध अपने शरीर और किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की प्रतिरक्षा करे, दूसरा-किसी ऐसे कार्य के विरुद्ध, जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार की परिभाषा में आने वाला अपराध है, या जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार करने का प्रयत्न है, अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की, चाहे जंगम, चाहे स्थावर सम्पत्ति की प्रतिरक्षा करे। टिप्पणी यह धारा प्रावईट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग की सीमा से सम्बन्धित है। धारा 99 इस अधिकार की परिसीमा निर्धारित करती है। ये दोनों धारायें एक साथ मिलकर प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के सिद्धान्त को निर्मित करती हैं। यह अधिकार शरीर और सम्पत्ति दोनों से सम्बन्धित है। यह अधिकार अपने ही शरीर एवं सम्पत्ति तक सीमित नहीं है अपितु इसका प्रयोग दूसरे के शरीर एवं सम्पत्ति की प्रतिरक्षा हेतु भी किया जा सकता है। एक समय, एक सन्दर्भ में इंगलिश विधि भारतीय विधि से संकुचित थी। इंग्लैण्ड में एक व्यक्ति मात्र अपने एवं नजदीकी सम्बन्धियों को प्रतिरक्षा हेतु ही अपराधी के विरुद्ध बल का प्रयोग कर सकता था। किन्तु बाद में यह सीमा शनैः शनै बढ़ती गई और यह अधिकार अब उन व्यक्तियों तक सीमित है जिनके हित एक दूसरे से संलग्न हैं, अर्थात् व्यावहारिक एवं प्राकृतिक दोनों ही प्रकार के सम्बन्ध इसमें अन्तर्विष्ट हैं, जैसे,
  1. 2007 क्रि० लॉ ज० 874 (एस० सी०).
पति-पत्नी मालिक एवं सेवक, पिता-पुत्र तथा भूस्वामी एवं काश्तकार। अमरीका की विधि इससे विस्तृत है। भारतीय विधि तथा अमरीका की विधि के अनुसार एक व्यक्ति जो कुछ अपने लिये कर सकता है वह दूसरे के लिये भी कर सकता है। भारत में प्रत्येक व्यक्ति को (1) अपने शरीर तथा किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की, मानव-शरीर को प्रभावित करने वाले किसी अपराध से (2) अचल तथा चल सम्पत्ति चाहे अपनी हो या किसी अन्य व्यक्ति की चोरी, लूट (Robbery), रिष्टि (Mischief) या आपराधिक अतिचार (Criminal trespass) या इनमें से किसी एक को कारित करने के प्रयास से प्रतिरक्षित करने का अधिकार है। डकैती, लूट का तीव्र रूप है, अत: स्पष्ट रूप से इसका वर्णन नहीं किया गया है। लूट का वर्णन इसलिये किया गया है क्योंकि इसमें चोरी के अतिरिक्त उद्दापन भी सम्मिलित है। धारा 97 के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को बचाव का अधिकार है।” अपने शरीर तथा सम्पत्ति को अवांछित प्रहार के विरुद्ध प्रतिरक्षा करने का प्रत्येक व्यक्ति का अन्तर्निहित अधिकार (Inherent right) है। एक व्यक्ति का समाज के प्रति यह दायित्व है कि वह दूसरे के शरीर एवं सम्पत्ति की सुरक्षा करे। लोक सुरक्षा का यह नियम है कि प्रत्येक ईमानदार व्यक्ति अपने आपको दूसरे का प्राकृतिक या स्वाभाविक रक्षक समझे।90 | प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार अभिदाचित किया जाना चाहिये-सामान्यतया प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार को अभियुक्त द्वारा अभिवाचित होना चाहिये। किन्तु यदि अभियुक्त आत्म-बचाव को अभिवाचित नहीं करता है तब भी न्यायालय इस तर्क को ध्यान में रख सकती है यदि यह उपलब्ध प्रमाणों से स्पष्ट है।91 आत्म-बचाव के तर्क को सिद्ध करने का अभियुक्त का दायित्व उतना क्लिष्ट नहीं है जितना कि अभियोजक का जबकि अभियोजन का दायित्व अपने मामले को उचित सन्देह से परे सिद्ध करने का होता है, अभियुक्त इस तर्क को उस सीमा तक सिद्ध करने के लिये बाध्य नहीं है। उसका दायित्व उस समय समाप्त हो जाता है। यदि वह मात्र इसकी सम्भाव्यता प्रतिपरीक्षण के दौरान सिद्ध कर दे या बचाव-प्रमाण प्रस्तुत करे।92 सेकर बनाम राज्य93 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में किसी व्यक्ति ने व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग किया है तथ्य सम्बन्धी प्रश्न है जिसका अवधारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है। व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का अभिवचन करने वाले अभियुक्त से साक्ष्य प्रस्तुत करने की अपेक्षा नहीं की जाती, वह अपना अभिवचन अभियोजन साक्ष्य से प्रकट होने वाली परिस्थितियों के माध्यम से ही सिद्ध कर सकता है। ऐसे मामले में अभियोजन साक्ष्य के सही प्रभाव के मूल्यांकन का प्रश्न उठता है, और अभियुक्त द्वारा किसी भार (दायित्व) को निभाना नहीं है। वी० सुब्रमणि बनाम तमिलनाडु राज्य94 वाले मामले में 21-12-1993 को रवि कुमार का भान्जा सिबा अभि० सा० 1 के परिवार की भूमि में अ-1 की भैंसें चरा रहा था। इसे देख कर अभि० सा० 5 ने उसे मारा-पीटा, जिसे उसने अ-1 को बताया, जिसने अभि० सा० 5 से उसके आचरण के बारे में पूछताछ किया। इस समाचार को सुन कर मृतक और उसका भाई अभि० सा० 6 मध्यस्थता करने पहुँचे और उन पर भी हमला किया गया, जिससे उनके सम्बन्धों में तनाव आ गया। दिनांक 22-12-1993 को लगभग 8.00 पूर्वान्ह अभि० सा० 1 एवं अभि० सा० 2 शामिल हाल कुयें के निकट ब्रश (दातून) कर रहे थे, उन्होंने अ-1 को पास से जाते हुए देखा। अभि० सा० 1 ने उससे पूंछा कि क्या अभि3 सा० 5 के साथ मारपीट करना उसके लिये उचित था, जो कि उनकी भूमि में ही भैंस चरा रहा था। अ-1 और अभि० सा० 1 के बीच अभि० सा० 2 की उपस्थिति में कहासुनी हुई। अ-1 क्रोधित हो गया और वह अ-6 के घर में गया और एक लाठी लेकर आया और अभि० सा० 1 की पीठ में मारा। अ-1 के आचरण से व्यथित होकर दोनों भाई अभि० सा० 1 और अभि० सा० 2 ने अ-1 को खदेड़ा और अ-1 ने अ-6
  1. बेन्थम, प्रिन्सिपल्स ऑफ दि पेनल कोड, पृ० 269.
  2. मुन्शीराम बनाम दिल्ली प्रशासन, ए० आई० आर० 1968 सु० को० 702.
  3. सलीम मियाँ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1979) 1 क्रि० लॉ ज० 323; मोहिन्द्र पाल बनाम पंजाब राज्य, 1979 क्रि० लाँ। ज० 584 भी देखें।
  4. 2003 क्रि० लॉ ज० 53 (सु० को०). .
  5. 2004 क्रि० लाँ ज० 1727 (सु० को०).
के घर में शरण ले लिया। तब अभि० सा० 1 और अभि० सा० 2 दोनों अ-6 के घर के बाहर चिल्लाने लगे। 207 धमकी भरी बातें सुन कर अ-3 ने ललकारा कि अभि० सा० 1 और अभि० सा० 2 पर प्रहार किया जाय, भले। दी हत्या क्यों न हो जाए, क्योंकि वे उसके घर में घुस आये हैं। इस ललकार के समर्थन में अ-2 ने अभि० सा० 2 के सिर पर प्रहार किया और अ-4 ने रीपर से मारा और अ-1 ने लोहे की छड़ से सर पर प्रहार किया। यह देखकर अभि० सा० 3 जो अभि० सा० 1, अभि० सा० 2 और 5 का पिता है। उन्हें बचाने गया, उसे देख कर अ-3 और अ-5 ने उसके सिर पर हल के जुओं से प्रहार किया जबकि अ-6 ने उसे पकड़ लिया, जिससे उसे गंभीर चोटें आयीं। अभि० सा० 1 को मौके पर पड़ा एक डंडा मिल गया, जिसे लेकर उसने अभियुक्तों को खदेड़ा। यह सुनकर कि भाइयों पर हमला किया गया, अभि० सा० 6 मौके पर आया, उसने घायल को देखा। और अभियुक्तों का पीछा किया और इस प्रक्रम में अ-1 को भी चोटें आई। यह घटना मुथूकृष्णन और नागप्पन ने देखा। मृतक को घायल अवस्था में 11.30 बजे पूर्वान्ह अस्पताल ले जाया गया, जहाँ 22-12-99 को लगभग 12.10 बजे अपरान्ह उसकी मृत्यु हो गयी। ऊपर उल्लिखित पृष्ठभूमि के तथ्यों पर विचार करते हुये यह अभिनिर्धारित किया गया था कि अभियुक्त व्यक्तियों ने व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुये कृत्य नहीं किया था। शेष अभिवचन के बारे में कि हलके वजन के लकड़ी के बने हल के जुओं से मात्र एक ही प्रहार किया गया था यह अभिनिर्धारित किया गया कि इसे सार्वभौम रूप से लागू होने वाले सामान्य नियम के रूप में अधिकथित नहीं किया जा सकता कि जब कभी एकमात्र प्रहार से मृत्यु कारित हो जाए, तब भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 को लागू न किया जाय, प्रत्येक मामले में परिस्थिति के तथ्यों पर विचार किया जाना चाहिए। उपरोक्त परिस्थितियों में दोषसिद्धि को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 से परिवर्तित कर धारा 304 भाग I के अधीन कर दिया। गया ।। | यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि क्षतियों की संख्या यह अवधारित करने के लिये सुरक्षित नहीं है। कि आक्रमणकर्ता कौन था। सार्वभौम नियम के रूप में यह उल्लेख नहीं किया जा सकता कि जब कभी अभियुक्त के शरीर पर चोटें पाई जाएं, तब आवश्यक रूप से यह उपधारणा कर ली जाए कि अभियुक्त व्यक्तियों ने व्यक्तिगत प्रतिरक्षा में क्षति कारित किया है। प्रतिरक्षा के लिए यह सिद्ध करना होता है कि अभियुक्त को आई क्षति से यह संभावना बनती है कि व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग किया गया होगा। घटना के समय या कहा सुनी के समय अभियुक्त को आई क्षतियों के बारे में स्पष्टीकरण न देना बहुत महत्वपूर्ण परिस्थिति है। किन्तु अभियोजन द्वारा क्षतियों के बारे में मात्र स्पष्टीकरण न देने से अभियोजन के पक्ष कथन पर सभी मामलों में प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह पता लगाने के लिये कि व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध है। या नहीं, अभियुक्त को आई क्षतियाँ, उसकी सुरक्षा के आसन्न संकट, अभियुक्त द्वारा कारित क्षति और यह परिस्थिति कि अभियुक्त के पास लोक प्राधिकारियों से संपर्क करने का अवसर था या नहीं, ऐसे सुसंगत तथ्य हैं, जिन पर विचार किया जाना चाहिये। | यह निष्कर्ष भी दिया गया कि उत्तेजना और अशान्त मानसिक स्थिति के क्षणों में प्राय: यह अपेक्षा करना कठिन होता है कि पक्षकार अपने संयम को बनाये रखेंगे और बदले में मात्र, उतना ही बल प्रयोग करेंगे जितनी उसे खतरे की आशंका है। जब बल प्रयोग के कारण हमला सन्निकट हो, आत्मरक्षा में हमले के बल प्रयोग का प्रतिविरोध करना विधिपूर्ण है और व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार उसी समय आरंभ हो जाता है। जैसे कि जोखिम (संकट) आरंभ हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में स्थिति के संदर्भ में विचार करना चाहिये। और बहुत बारीकी से अथवा दूरबीन से छान कर देखने की आवश्यकता नहीं है जिससे कि जरा सा अथवा नाम मात्र का भी इधर-उधर (ओवरलैपिंग) न हो, किन्तु यदि तथ्यगत परिस्थितियों से यह दर्शित होता हो कि अपने बचाव के बहाने जब युक्तियुक्त आशंका समाप्त हो गई हो तब भी वस्तुतः हमला किया गया है तो, व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार को वैध नहीं कहा जा सकता है। व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार आवश्यक रूप से प्रतिरक्षात्मक अधिकार है जो नियंत्रणकारी परिनियम (कानून) अर्थात् भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार वहाँ उपलब्ध होता है, जहाँ परिस्थितियाँ स्पष्टरूप से उसे न्यायोचित ठहराती हों, इसे बदले की भावना से, आक्रमण या प्रतिशोधात्मक तरीके से प्रयोग करने अभिवचन करने की अनुमति नहीं दी जानी । चाहिये। उपरोक्त सिद्धान्त को लागू करते हुये इस वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार अभियुक्त व्यक्तियों को उपलब्ध नहीं था। जयपाल बनाम स्टेट आफ हरियाणा के वाद में अभियुक्तगण खतरनाक अस्त्रों से सुसज्जित थे और परिवादी पक्ष का कोई भी व्यक्ति खतरनाक अस्त्र से लैश नहीं था। यह अभिनित किया गया से यह स्पष्ट है कि आक्रमण करने का आशय अभियुक्तगण का था न कि परिवादी का। मतक की शरीर के मर्मस्थल वाले (vital) अंगों पर अभियुक्त द्वारा प्रहार किया गया था। यह अभिनित किया गया । अभियुक्तगण आक्रमण कर्ता थे, परिवादी पक्ष आक्रमणकर्ता नहीं थे। इस मामले में अभियुक्त द्वारा जो लाठी और गंड़ासी से लैश था मृतक पर हमला किया गया था। टा का यह मत था कि मृतक को कारित की गई शारीरिक क्षति प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त थीं। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित थी क्योंकि उसने क्रूर और असाधारण तरीके से कार्य किया था, इसलिये भारतीय दण्ड संहिता की धारा 300 का अपवाद 4 लागू नहीं होगा। रणबीर सिंह एवं अन्य बनाम हरयाणा राज्य95 में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्त की तरफ कई चोटें आना अपने आप में आत्मरक्षा के अधिकार को स्थापित करने के लिए यथेष्ट नहीं हो सकती हैं। | शरीर के बचाव में-नूर मियाँ6 के बाद में अभियुक्त ने जिस पर अनेक व्यक्तियों ने अनेक हथियारों से प्रहार किया उनमें से एक हथियार छीन लिया तथा उस पर उसी हथियार से प्रहार किया जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त को अपने शरीर की प्रतिरक्षा का अधिकार था यद्यपि मृतक तत्समय बिना हथियार के था। एक प्रकरण में जहाँ कि एक स्त्री को बलपूर्वक उसकी इच्छा के विरुद्ध उठा ले जाया गया उससे सम्बन्धित लोगों से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वे लोग उस समय तक प्रतीक्षा करेंगे। जब तक कि इस तथ्य की सूचना पुलिस को नहीं दी जाती और पुलिस कार्यवाही आरम्भ नहीं कर देती। प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उस समय भी प्रभावित नहीं होता भले ही बलपूर्वक हटाने की प्रक्रिया उसके पति द्वारा ही की जा रही हो ।9/ डम्बरुधर महन्त बनाम उड़ीसा राज्य98 के वाद में मृतक ने कुल्हाड़ी लेकर अभियुक्त पर प्रहार किया और उसके सिर पर दो वार किया। तत्पश्चात् अभियुक्त ने मृतक पर प्रहार किया जिससे उसकी मृत्यु हो । गयी। यह अभिनिर्णीत हुआ कि अभियुक्त प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार द्वारा प्रतिरक्षित है और यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपने इस अधिकार की सीमा को पार कर गया था जब उसने अपने बचाव में कई बार मृतक पर प्रहार किया। न्यायालय ने यह भी कहा कि अभियुक्त पर इस अपवाद को सिद्ध करने का दायित्व इतना कठोर नहीं होगा जितना कि अभियोजन पर आरोप को सिद्ध करने का दायित्व होता है। सम्पत्ति के बचाव में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तथा दूसरे की सम्पत्ति की प्रतिरक्षा करने का अधिकार है। क्या इसका तात्पर्य यह है कि सम्पत्ति पर उसका वास्तविक अधिकार हो या उसका कब्जा ही पर्याप्त है? इसका तात्पर्य मात्र कब्जे से है क्योंकि बिना कब्जे के किसी चल सम्पत्ति पर अतिचार (Trespass), चोरी, लूट (Robbery) या रिष्टि (Mischief) के समतुल्य नहीं हो सकता तथा चल सम्पत्ति पर अतिचार आपराधिक अतिचार समतुल्य ही हो सकता है। यदि एक व्यक्ति एक गाय को मवेशीखाने में बन्द करने के उद्देश्य से छीन लेता है परन्तु उस पर गाय के मालिक द्वारा प्रहार किया जाता है तो गाय छीनने वाले व्यक्ति को अपने को कब्जे में बनाये रखने का अधिकार होगा। यहाँ मात्र कब्जा है सम्पत्ति पर किसी प्रकार का अधिकार नहीं। गाय यथार्थतः हमलावरों की है तथा जिसने गाय को छीना है उसके पास मात्र कब्जा है। जिसकी रक्षा कर सकता है।99 किन्तु मवेशीखाने में बन्द करने के उद्देश्य से गाय की अवैध जब्ती चोरी है। और जब्ती को रोकने के लिये बलपवूक किया गया प्रयास प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग स्वरूप होगा। और इस प्रकार वे इस धारा के अन्तर्गत बचाव के हकदार हैं।
  1. 2000 क्रि० लाँ ज० 1778 (एस० सी०).
95क. (2009) 3 क्रि० ला ज० 3051 (एस० सी०).
  1. (1945) 50 सी० डब्ल्यू० एन० 168.
  2. दयाराम (1952) 1 एम० बी० एल० आर० 13.
  3. 1984 क्रि० लाँ ज० (एन० ओ० सी०) 67 उड़ीसा.
  4. हुदा, एस०; दि प्रिंसिपल्स ऑफ दि ला ऑफ क्राइम्स, पृ० 391.
  5. मद्रा (1946) नाग० 326; लोकनाथ बनाम रहस बेउरा (1963) 1 क्रि० लॉ ज० 308: मैदे खाँ (1965) 1 क्रि० लाँ ज० 476,
एक वैध स्वामी अतिचारी को या उसके अधिकारों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को शारीरिक रूप से 209 अपनी सम्पत्ति से निष्कासित कर देने का हकदार है। किन्तु इस अधिकार का प्रयोग करने वाले व्यक्ति के लिये यह आवश्यक है कि वह अतिचार से अपने कब्जे को बचाये रखने के लिये आवश्यक बल से अधिक बल का इस्तेमाल न करे। जहाँ अतिचारी दूसरे की भूमि में प्रवेश करता है वहां कब्जाधारी उस समय जब कि अतिचारी कब्जा प्राप्त करने का प्रयास ही कर रहा है, बलपूर्वक उसे भूमि से निष्कासित कर सकता है और यदि ऐसा करते समय वह अतिचारी को ऐसी क्षति पहुंचाता है, जो परिस्थिति के अनुकूल है तो वह कोई अपराध नहीं कारित करता। हरियाणा राज्य बनाम शेर सिंह वाले मामले में भीम सिंह का चचेरा भाई फूल सिंह (अभि० सा० 5) के पास किशनचन्द के पिता रामेश्वर की विवादित भूमि खेती के लिये किरायेदारी पर थी, जिसने शुफाधिकार के लिये वाद फाइल किया और उसके पक्ष में डिक्री हो गई । रामेश्वर ने शेर सिंह के पक्ष में विक्रय करार भी निष्पादित किया था और विक्रय धन का एक भाग उसने प्राप्त कर लिया था। अभियुक्त को मृतक के विरुद्ध व्यादेश भी मिला था। शिकायत में यह कहा गया था कि मृतक और फूल सिंह ने उप जिला मजिस्ट्रेट के आदेश का उल्लंघन करते हुये गेहूं की फसल काट लिया। अभियुक्तगण भाला, गड़ासा और लाठियों से हथियार बंद होकर भूमि पर जबरन कब्जा करने आए और जानवरों को खूटे से छोड़ दिया, जिससे खड़ी फसल को नुकसान हुआ। इसके बाद मृतक और चार अन्य अभियुक्त अर्थात् फूल सिंह अभि० सा० 5, जिले सिंह अभि० सा० 6, दीवान सिंह अभि० सा० 11 और धुमन सिंह मौके पर पहुँचे। जब भीम सिंह मृतक ने उनसे जोर जबरदस्ती पर सवाल उठाया, तब चारों अभियुक्तों ने उसे घेर लिया और अपने हथियारों से उसे चोट पहुँचाने लगे। अभि० सा० 6 ने मृतक को बचाने का प्रयास किया, किन्तु चारों अभियुक्तों ने उस पर भी हमला किया और गंभीर क्षतियाँ कारित की और इसी प्रकार अभि० सा० 11 दीवान सिंह और धुमन सिंह पर भी, जब उन्होंने हस्तक्षेप करने का प्रयास किया तो हमला किया गया और उन्हें घायल कर दिया। भीम सिंह की चोटों के कारण मौके पर ही मृत्यु हो गई। दलाल सिंह द्वारा भीम सिंह के सीने पर भाले का प्रहार प्राणान्तक साबित हुआ। विचारण न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के कथन को स्वीकार कर लिया कि मृतक पक्ष का विवादित भूमि पर कब्जा था, किन्तु उच्च न्यायालय ने अभियुक्त के पिता को प्राप्त शुफाधिकार की डिक्री खसरे में की गई प्रविष्टि के आधार पर विचार करते हुये मृतक पक्ष के विरुद्ध अभियुक्त को दिये गये व्यादेश पर विचार करते हुये और अभियोजन द्वारा यह साक्ष्य देने में विफल रहने पर कि अभियुक्तों ने खेत में जानवर छोड़ दिये थे, यह अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्तगण का विवादग्रस्त भूमि पर कब्जा था और अभियोजन पक्ष का कथन संदिग्ध था। उच्च न्यायालय ने दलाल सिंह को धारा 304 भाग I के अधीन दोषसिद्ध किया, क्योंकि उसने व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का अतिक्रमण किया था, किन्तु अन्य अभियुक्त दोषमुक्त कर दिये गये।। विशेष इजाजत आवेदन करने पर उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 136 के अधीन दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील में उच्च न्यायालय के निष्कर्ष में इसलिये हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता कि भिन्न मत जैसा विचारण न्यायालय ने व्यक्त किया, अपनाया जाना संभव है। इसलिये यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्तों ने व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का अतिक्रमण किया है। आगे यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि चूंकि अभियुक्त का भूमि पर कब्जा था मृतक पक्ष ने बलपूर्वक कब्जा लेने का प्रयास किया, मृतक पक्ष का एक व्यक्ति मारा गया और दूसरा गंभीर रूप से घायल हो गया। यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त ने अपनी व्यक्तिगत अभिरक्षा के अधिकार का अतिक्रमण किया, इसलिये उच्च न्यायालय द्वारा ठीक ही दोषसिद्धि में परिवर्तन करते हुये धारा 300 से धारा 304-भाग I के अधीन दोषसिद्ध किया गया। किन्तु फरसे के प्रहार से मृतक पक्ष के एक सदस्य पर गंभीर क्षति कारित करने । वाले अभियुक्त को दोषमुक्त करना उचित नहीं था, और वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326 के अधीन दोषसिद्ध किये जाने का दायी था।
  1. रामकृष्ण सिंह, ए० आई० आर० 1922 पटना 197.
  2. होरम (1949) 50 क्रि० लाँ ज० 868.
  3. (2002) क्रि० लॉ ज० 4120 (सु० को०).
कट्टा सुरेन्द्र बनाम उ० प्र० राज्य के वाद में ग्रामवासियों द्वारा सड़क पर रोक लगाने के प्रयास के कारण घटना घटी थी। अभियुक्त अन्य लोगों के साथ शस्त्र सज्जित होकर आया और सड़क पर रोक लगाने पर आपत्ति किया। भीड़ ने अभियुक्त और उसके आदमियों पर पत्थर फेंका। अभियुक्त ने पत्थर फेंका जाना बन्द होने के काफी देर बाद मृतक पर प्राणघातक चोट पहुंचायी। यह अभिनिर्धारित किया गया कि इस मामले में अभियुक्त भारतीय दण्ड संहिता की धारा 97 के अधीन प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के बचाव का दावा करने का अधिकारी नहीं था। यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का दावा अनुमानों (surmises) और अटकलों (speculation) पर आधारित नहीं हो सकता है। प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार की उपलब्धता का विनिश्चय करने हेतु पूरी घटना का सही परिप्रेक्ष्य (proper setting) में परीक्षण करना चाहिये। तथापि यह स्पष्ट किया गया कि हत्या का अपराध कारित किये जाने को खारिज करने के लिये एकमात्र एक चोट का तर्क सदैव यथेष्ट नहीं होता है। ताना जी गोविन्द किसाल बनाम स्टेट आफ महाराष्ट6 के वाद में अभियुक्तगण जिनकी संख्या 29 थी परिवाद कर्ता के खेत पर इकट्ठा की गई और उसी की बबूल की लकडियाँ हटाने गये थे। चूंकि उन्हें लकड़ियों के ढेर को हटाने से मना किया गया, उन्होंने परिवादकर्ता की पार्टी पर कुल्हाड़ी एवं अन्य हथियारों, जिससे वे लैश थे, से हमला कर दिया। साक्ष्य से यह स्पष्ट था कि जिस सम्पत्ति के ऊपर दोनों पक्षों में यह घटना घटी वह खेत परिवादकर्ता का था। अवर न्यायालयों का यह निष्कर्ष था कि अभियुक्तगण को सम्पत्ति अथवा व्यक्तिगत प्राइवेट प्रतिरक्षा सम्बन्धी कोई अधिकार नहीं था। परिवादकर्ता की पार्टी को कुल 51 चोटें आई थीं जबकि अभियुक्त की पार्टी को 15 चोटें आई थीं जिनमें मात्र एक अभियुक्त की बाई अन्तः प्रकोष्ठिका के भंग सम्बन्धी चोट महत्वपूर्ण थी। चूंकि प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं था अतएव भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 से धारा 304 के अधीन दोषसिद्धि को परिवर्तित नहीं किया गया।
  1. ऐसे व्यक्ति के कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार जो विकृतचित्त आदि हो-जबकि कोई कार्य, जो अन्यथा कोई अपराध होता, उस कार्य को करने वाले व्यक्ति के बालकपन, समझ की परिपक्वता के अभाव, चित्तविकृति या मत्तता के कारण, या उस व्यक्ति के किसी भ्रम के कारण, वह अपराध नहीं है, तब हर व्यक्ति उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह उस कार्य के वैसा अपराध होने की दशा में रखता।
दृष्टान्त (क) य, पागलपन के असर में, क को जान से मारने का प्रयत्न करता है। य किसी अपराध का दोषी नहीं है। किन्तु क को प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार है, जो वह य के स्वस्थचित्त होने की दशा में रखता। (ख) क रात्रि में एक ऐसे गृह में प्रवेश करता है जिसमें प्रवेश करने के लिए वह वैध रूप से हकदार है। य, सद्भावपूर्वक क को गृहभेदक समझकर, क पर आक्रमण करता है। यहाँ य इस भ्रम के अधीन क पर आक्रमण करके कोई अपराध नहीं करता है। किन्तु क, य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह तब रखता, जब य उस भ्रम के अधीन कार्य न करता। टिप्पणी धारा 98 का वर्णित सिद्धान्त यह है कि प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार आक्रमणकर्ता की वास्तविक अपराधिता पर नहीं अपितु प्रयासित कार्य की दोषपूर्ण प्रकृति पर निर्भर करता है। यदि एक कार्य अन्यथा एक अपराध है तो उस कार्य के कर्ता के विरुद्ध प्रतिरक्षा का अधिकार उत्पन्न होता है भले ही अपराध कारित करने की वैयक्तिक अक्षमता के कारण वह दण्डनीय नहीं है या वह आवश्यक मन:स्थिति के अभाव में कार्य करता। है। उदाहरण के लिये यदि एक विक्षिप्त व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति पर प्रहार करता है या दूसरे व्यक्ति का।
  1. (2008) 1 क्रि० लॉ ज० 340 (सु० को०).
  2. 1998 क्रि० लॉ ज० 340 (एस० सी०).
  3. हुदा, एस०; दि प्रिन्सिपल्स ऑफ दि लॉ ऑफ क्राइम्स, पृ० 387.
पर्स लेकर भाग जाता है तो उस व्यक्ति का आत्मरक्षा का अधिकार या अपना पर्स वापस लेने का अधिकार इस तथ्य से प्रभावित नहीं होगा कि विक्षिप्त व्यक्ति में आपराधिक आशय निर्मित करने की सामर्थ्य नहीं होती है। और इसलिये उसका कार्य अपराध नहीं गठित करेगा। आक्रमणकारी अपने किये हुये कार्य के लिये दण्डित । होगा या नहीं यह अलग प्रश्न है किन्तु प्रत्येक व्यक्ति को उसके अवैध कार्य के विरुद्ध प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त है।

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