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Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 4 LLB 1st Year Notes

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  1. ऐसे व्यक्ति का कार्य जो अपनी इच्छा के विरुद्ध मत्तता में होने के कारण निर्णय पर पहुँचने में असमर्थ है- कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, जो उसे करते समय मत्तता के कारण उस कार्य की प्रकृति, या यह कि जो कुछ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ है, परन्तु यह तब जबकि वह चीज, जिससे उसको मत्तता हुई थी, उसके अपने ज्ञान के बिना या इच्छा के विरुद्ध दी गयी थी।
टिप्पणी प्रारम्भिक कामन लॉ में मत्तता के आधार पर कोई भी छूट नहीं प्रदान की जाती थी वरन् मत्तता को एक ऐसी परिस्थिति माना जाता था जो अपराध को गुरुतर बना देती थी। सर्वप्रथम इंग्लिश मामला जिसमें न्यायालय ने अत्यधिक मत्तता के प्रभाव के अन्तर्गत कारित किये गये मानववध (Homicide) के लिये मृत्युदण्ड की सजा को स्वीकार किया, रेनिन्जर बनाम फोगोस्सा75 का है। यह कठोर नियम उन्नीसवीं । शताब्दी के प्रारम्भ तक लागू होता रहा यद्यपि ब्लैकस्टन तथा कोक के प्रयत्न की मत्तता को उत्तेजक के रूप में स्वीकार किया जाय सफल न हो सका। ह्वार्टन का विचार है कि, “यदि मत्तता दायित्व का परिहार करती थी। तो मानव-वध के लिये कदाचित ही दण्ड आरोपित किया जा सकता था।”76 स्टोरी का कहना था कि, ‘‘विधि किसी व्यक्ति को यह स्वीकृति नहीं प्रदान करती कि वह अपने आपत्तिजनक दोष तथा दुराचरण का लाभ स्वयं उठा सके जिससे वह ऐसे अपराध के विधिक परिणामों से अपने को सुरक्षित रख सके।”77 । किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इस नियम में न्यायिक निर्णयों द्वारा शनैः शनैः ढील दी गई और अब मत्तता के कारण व्युत्पन्न यथार्थ चित्तविकृतता आपराधिक उत्तरदायित्व के विरुद्ध उस सीमा तक एक बचाव है जैसे कि वह अन्य कारणों से उत्पन्न हुआ था।78 किन्तु केवल अनैच्छिक मत्तता ही बचाव के लिये प्रेषित की जा सकती है, स्वैच्छिक मत्तता नहीं। इंग्लैण्ड में सामान्य नियम इस प्रकार है-“मात्र यह दर्शाना कि अभियुक्त का मस्तिष्क नशे के कारण इस सीमा तक प्रभावित हो चुका था कि वह आसानी से तीव्र उत्तेजना के सम्मुख नतमस्तक हो गया, बचाव नहीं।”79 इस सामान्य नियम के दो अपवाद हैं। (क) लगातार मदिरापान से कभी-कभी मस्तिष्क की कोशिकाओं में ऐसे स्थायी परिवर्तन हो जाते हैं। जिसे पागलपन या चित्तविकृतता80 की संज्ञा दी जा सकती है जैसे, डिलीरियम ट्रीमेंस (Delirium tremens) तथा मादक पागलपन (Alcoholic Dementia) । जहाँ एक व्यक्ति का विवेक स्थायी तौर पर घृणित आदत के द्वारा क्षतिग्रस्त हो चुका है तो असमर्थता के तर्क को त्यागने का आधार प्रभावकारी नहीं होगा।81 74ग, (2012) III क्रि० ला ज० 3398 (एस० सी०).
  1. (1851) के० बी० 75 ई रिपोर्ट 1.
  2. ह्वार्टन, क्रिमिनल लॉ 95 (1932).
  3. यूनाइटेड स्टेट्स बनाम ड्यू, 25 फेडरल केसेज नं० 15, पृ० 993.
  4. डेवीस (1881) 14 काक्स 563.
  5. डी० पी० पी० बनाम बीयर्ड, (1920) ए० सी० 479.
  6. डेवीस (1881) 14 काक्स 563.
  7. क्रिमिनल लॉ कमीशन 7वीं रिपोर्ट, (1843) पार्लियामेण्टरी पेपर्स XIX, 24,
(ख) अनैच्छिक मत्तता एक बचाव है। यह अपवाद इसलिये न्यायोचित है क्योंकि अनैच्छिक मत्तता का दुरुपयोग उसी प्रकार नहीं किया जा सकता जिस प्रकार स्वैच्छिक मत्तता का तथा अपराध की पुनरावृत्ति किये जाने की सम्भावना नहीं रहती है।82 जहाँ तक स्वैच्छिक मत्तता का प्रश्न है, रेक्स बनाम ग्रिंडले83 के वाद में यह सुझाव दिया गया कि यद्यपि स्वैच्छिक मत्तता एक बचाव नहीं हो सकता फिर भी पूर्व संकल्प (premeditation) का निर्धारण करते। समय इसे ध्यान में रखना चाहिये। तत्पश्चात् रेगिना बनाम दोहटी84 के वाद में स्टीफेन जज ने कहा किमत्तता या मदिरापान अपराध के लिये कोई बचाव साबित नहीं हो सकता फिर भी यदि अपराध ऐसा है कि इसे कारित करने वाले पक्षकार का आशय इसका एक अवयव है तो इस तथ्य के निर्धारण हेतु कि क्या अपराध गठित करने के लिये आवश्यक आशय उस व्यक्ति का था, हम इस विषय पर ध्यान दे सकते हैं कि वह व्यक्ति नशे में था। दोषमोचक (Exculpatory) नियम का पालन उन प्रकरणों में नहीं किया जाता है जो लोक भावनाओं को आघात पहुँचाते हैं।85 मदिरापान का प्रतिरक्षा के रूप में उपलब्ध होने के लिये उस मात्रा एवं सीमा तक का होना चाहिये जो प्रतिवादी को लगभग स्वचालित बना देता है ।86 तथा आवश्यक आपराधिक आशय को विनिर्मित करने हेतु क्षमता की कमी को सिद्ध करने का दायित्व प्रतिवादी पर होता है।87 उपयुक्त मनःस्थिति का खण्डन करने की आज्ञा प्रदान करने वाले नियम को व्यापक स्वीकृति दी गई 188 विशप प्रचलित . विधि पर अपने विचार व्यक्त करते हुये कहते हैं “अत: मत्तता का साक्ष्य यह विनिश्चय करने के उद्देश्य हेतु ग्राह्य है कि क्या वह आरोपित विशिष्ट आशय को सृजित करने में सक्षम था? क्या ऐसा आशय विधि के अन्तर्गत कारित किये गये विनिर्दिष्ट अपराध का आवश्यक अवयव है?”89 | भारतीय विधि-अनैच्छिक मत्तता से सम्बन्धित भारतीय विधि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 85 में वर्णित है-यह धारा एक अभियुक्त को वही बचाव प्रदान करती है जो धारा 84 एक अस्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति को प्रदान करती है। धारा 85 के अन्तर्गत आपराधिक दायित्व से उन्मुक्ति की मांग करने के लिये अभियुक्त को यह स्थापित करना होगा कि(1) कार्य करते समय मत्तता के कारण वह समझने में असमर्थ था कि (क) कार्य की प्रकृति; या (ख) यह कि वह जो कुछ कर रहा था वह दोषपूर्ण या विधिविरुद्ध था; और (2) यह कि जिस वस्तु ने उसे उन्मत्त किया था या तो उसके बिना ज्ञान के अथवा उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे दी गयी थी। उसके ज्ञान के बिना अथवा उसकी इच्छा के विरुद्ध- पदावली ‘‘बिना उसके ज्ञान के” का अर्थ है इस तथ्य की अज्ञानता कि क्या उसे दिया जा रहा है या मादक पदार्थ में क्या चीज मिला दी गई है 90 एक कार्य जो कि कर्ता अपनी, स्वयं की चेतना के अन्तर्गत सम्पादित नहीं करता अपितु किसी बाहरी दबाव के अन्तर्गत जिसने उसकी इच्छा को या तो नष्ट कर दिया है या उसे अपने प्रभाव में कर लिया है, करता है। उसकी इच्छा के विरुद्ध किया गया कार्य है।91
  1. विलियम्स जी, क्रिमिनल लॉ (2रा संस्करण) पृष्ठ 562-63.
  2. रेक्स बनाम कैरोल, 173 इंग्लिश रिपोर्ट 64 में वर्णित.
  3. 16 काक्स सी० सी० 306, पृ० 308. ।
  4. उदाहरण के लिये बलात्संग के आशय से किया गया हमला।
  5. टेट बनाम कामनवेल्थ 258 की० 685 पृ० 695 पर (1935).
  6. विल्सन बनाम स्टेट, 60 एन० जे० एल० 171. ।
  7. हाल, जेरोम, जनरल प्रिंसपल आफ क्रिमिनल लॉ (2रा संस्करण) पृ० 534.
  8. 1 विशप, क्रिमिनल लॉ 299 (9वाँ संस्करण) 1923.
  9. जेठू राम, (1960) क्रि० लॉ ज० 1093.
  10. उपरोक्त सन्दर्भ.
स्वैच्छिक मदिरापान अपराध कारित करने के लिये कोई बचाव नहीं है।92 मत्तता पागलपन की एक – 177 स्वैच्छिक प्रजाति है जिससे वह व्यक्ति अपने को विरत रख सकता है और वह इसके लिये जवाब देने को बाध्य है। किन्तु जहाँ मदिरापान अनैच्छिक है जैसे यदि एक व्यक्ति को शराब पीने के लिये बाध्य किया गया हो या छल-कपट द्वारा उसे मदिरापान हेतु प्रेरित किया गया हो या अज्ञान में या कोई मादक पदार्थ उसके ज्ञान के बिना अथवा इसकी इच्छा के विरुद्ध उसे दिया गया हो93 तो उसके आपराधिक कार्य का विनिर्णय अपराध कारित होते समय विद्यमान उसकी मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जायेगा। ऐसा मामला भी उसी । प्रकृति का है जैसे चित्तविकृतता का। धारा 84 तथा धारा 85 में प्रयुक्त शब्द लगभग एक जैसे हैं और वे सभी तथ्य जो चित्तविकृतता के प्रकरण में उत्पन्न होते हैं, अनैच्छिक मदिरापान या मत्तता के प्रकरण में भी उत्पन्न होते हैं। डायरेक्टर आफ पब्लिक प्राजीक्यूशन बनाम बियर्ड94 का वाद इस विषय पर महत्वपूर्ण निर्णय है। इस वाद में 13 वर्ष की एक लड़की बाजार जाते समय एक मिल के फाटक से निकल रही थी जहाँ अभियुक्त बीयर्ड पहरेदार के रूप में कार्यरत था। अभियुक्त ने बलात्कार करने का प्रयास किया। लड़की ने इसका प्रतिरोध किया। इस पर अभियुक्त ने अपना हाथ लड़की के मुंह पर रख दिया तथा दूसरे हाथ का अंगूठा उसके गले पर रखकर दबाया ताकि लड़की शोर न मचा सके। इस प्रयास में उसने अनजाने में ही उसकी हत्या कर दिया। कोर्ट आफ क्रिमिनल अपील ने उसे मानव-वध का दोषी पाया किन्तु हाउस आफ लार्ड्स ने उसे मृत्युदण्ड से दण्डित किया। इस प्रकरण में अग्रलिखित सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये (1) जहाँ अपराध में एक विशिष्ट आशय एक आवश्यक तत्व है, वहाँ मत्तता की स्थिति का लक्ष्य जो अभियुक्त को ऐसा आशय सृजित करने से वंचित कर दे, को इस बात को विनिश्चित करने हेतु ध्यान में रखना चाहिये कि क्या विशिष्ट अपराध को गठित करने के लिये आवश्यक आशय उसका था। यदि वह नशे में इस कदर चूर था कि आवश्यक आशय को सृजित करने में असमर्थ था तो उन अपराधों के लिये दण्डित नहीं किया जायेगा जिनके लिये आशय का सिद्ध होना आवश्यक है। किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मत्तता अपने आप में एक उन्मुक्ति है परन्तु मत्तता की स्थिति वास्तविक आरोपित अपराध की विसंगति में हो सकती है, अत: उस अपराध के दायित्व को शून्य कर सकती है। | (2) चित्तविकृतता चाहे मदिरापान से व्युत्पन्न हो या अन्यथा, आरोपित अपराध के लिये बचाव है। अत्यधिक मदिरापान से उत्पन्न यथार्थतः चित्तविकृतता के बचाव तथा मत्तता के बचाव जो ऐसी परिस्थिति व्युत्पन्न करते हैं कि विशिष्ट आशय को विनिर्मित करने में उन्मत्त व्यक्ति का मस्तिष्क असमर्थ बन जाता है, के अन्तर को सुरक्षित रखा गया है। विकृतचित्त वाला व्यक्ति किसी अपराध के लिये दण्डित नहीं किया जा सकता। विधि चित्त विकृतता के कारण पर ध्यान नहीं देती। यदि वास्तविक चित्त-विकृतता अलकोहल की अधिकता के फलस्वरूप सृजित होती है तो यह आपराधिक दायित्व के लिये उसी प्रकार पूर्ण उत्तर होता है। जैसे कि अन्य कारणों से उत्पन्न चित्त-विकृतता । पागलपन अस्थायी ही क्यों न हो वह एक उन्मुक्ति है। जहाँ यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि कार्य को करते समय अभियुक्त का मस्तिष्क अस्वस्थ था तथा साक्ष्य से यह सिद्ध हो गया कि वह डिलीरियम ट्रीमेंस से पीड़ित था और यह अत्यधिक मदिरापान से उत्पन्न हुआ, यह निर्णय दिया गया कि “मदिरापान एक चीज है तथा मदिरापान से उत्पन्न रोग एक अलग चीज है, और यदि एक व्यक्ति मदिरापान द्वारा रोग को इस स्थिति में ला देता है कि मात्र कुछ समय के लिये पागलपन की वह स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसने उसे दायित्व से मुक्त कर दिया होता, यदि वह अन्य किसी ढंग से कारित हुआ होता, तो वह अपराध हेतु दायित्वाधीन नहीं होता।” (3) यह मदिरापान के साक्ष्य, जो एक अपराध गठिन करने के लिये आवश्यक विशिष्ट आशय को सृजित करने से अभियुक्त को असमर्थ बना देता है, को अन्य स्थापित तथ्यों के साथ यह विनिश्चित करने हेतु कि क्या वह इस आशय से युक्त था अथवा नहीं, ध्यान में रखना चाहिये 95
  1. बोधी खान (1866) 5 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 79.
  2. 1 ह्वेल पी० सी० 32.
  3. 1920 ए० सी० 479.
  4. वासुदेव बनाम पेप्सू राज्य, ए० आई० आर० 1956 सु० को 488 भी देखें।
(4) यह कि अपराध गठित करने के लिये आवश्यक आशय को सृजित करने के लिये अभिय== सत्यापित असमर्थता से न्यून मदिरापान का साक्ष्य तथा मात्र यह सिद्ध करना कि उसका मस्तिष्क प्रभावित था जिससे वह सहज ही में तीव्र उत्तेजना के सम्मुख झुक गया, इस अवधारणा का खण्डन नहीं करने कि अभियुक्त अपने कृत्य के स्वाभाविक परिणामों से भिज्ञ था। उपरोक्त वर्णित दूसरा सिद्धान्त चित्त-विकृतता तथा मत्तता के आधार पर प्रतिरक्षा के अन्तर को स्पष्ट करता है। केवल पागलपन के प्रकरणों में ही अभियुक्त द्वारा अपने व्यवहार के विधिक प्रभावों का मूल्यांकन महत्वपूर्ण होता है ।26 गल्लाधर97 के वाद में दिये गये निर्णय को उचित स्थान दिया जाना चाहिये जो प्रतिपादित करता है कि मस्तिष्कीय रोग जिसका सम्बन्ध नशे से नहीं है, तो वह रोग मात्र इस कारण नशे से उत्पन्न नहीं माना जायेगा, क्योंकि नशा उसे उत्तेजित कर देता है।98।
  1. किसी व्यक्ति द्वारा, जो मत्तता में है, किया गया अपराध जिसमें विशेष आशय या ज्ञान का होना अपेक्षित है– उन दशाओं में, जहाँ कि कोई किया गया कार्य अपराध नहीं होता जब तक कि वह किसी विशिष्ट ज्ञान या आशय से न किया गया हो, कोई व्यक्ति, जो वह कार्य मत्तता की हालत में करता है, इस प्रकार बरते जाने के दायित्व के अधीन होगा मानो उसे वही ज्ञान था जो उसे होता यदि वह मत्तता में न होता जब तक कि वह चीज, जिससे उसे मत्तता हुई थी, उसे उसके ज्ञान के बिना या उसकी इच्छा के विरुद्ध न दी गयी हो।
टिप्पणी सर ई० कोक की राय में एक उन्मत्त व्यक्ति के लिये, जो स्वेच्छा से नशे से है, इस कारण कोई विशेषाधिकार नहीं प्राप्त है किन्तु यदि वह कभी नुकसान या क्षति पहुँचाने वाले कार्य को करता है तो उसकी मत्तता निश्चय ही उसे व्यापक बना देती है।” मत्तता अपराध को गुरुतर नहीं बनाती, अपितु वह अब एक बचाव है, और एक कार्य यदि एक उद्वेगरहित व्यक्ति द्वारा किया जाता है तो एक अपराध है, वह कार्य तब भी एक अपराध होगा यदि एक व्यक्ति द्वारा उस समय किया जाता है जब वह नशे में है यदि मत्तता स्वैच्छिक है 99 इस विषय से सम्बन्धित इंगलिश विधि में मीड, बीयर्ड2 , तथा गल्लाधर महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। बीयर्ड की व्याख्या धारा 85 में की जा चुकी है। आर० बनाम मीड के प्रकरण में अभियुक्त ने निर्दयता से अपनी पत्नी पर घूसे से प्रहार कर उसे मार डाला। उसने अपने बचाव में मत्तता का सहारा लिया किन्तु उसे हत्या के लिये दोषी ठहराया गया। अभियुक्त के पक्ष में यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि, यह अवधारणा कि वह अपनी पत्नी की हत्या करना चाहता था, खण्डित हो गई क्योंकि मत्तता के कारण उसका ऐसा कोई आशय नहीं था। यह निर्णय दिया गया कि एक व्यक्ति के विषय में ऐसा माना जाता है कि वह अपने कृत्य के यथार्थ परिणामों की इच्छा करता है। उन्मत्त व्यक्ति के प्रकरण में इसका खण्डन किया जा सकता है। इसके लिये यह दर्शाना होगा कि नशे के प्रयोग से उसका मस्तिष्क इस हद तक प्रभावित हो गया था कि वह यह नहीं जानता था कि जो कुछ वह कर रहा है घातक है अर्थात् घातक क्षति पहुँचने की सम्भावना है। यदि यह सिद्ध हो जाता है तो यह अवधारणा कि उसका आशय गम्भीर शारीरिक चोट पहुँचाने का था, खण्डित हो जायेगी। यह भी इंगित किया गया कि यदि एक व्यक्ति बुरी तरह नशे में चूर है जिससे वह कोई आशय सृजित करने में असमर्थ है। तब भी वह मानव वध का दोषी हुआ होता, क्योंकि वह या तो अपनी पत्नी पर संप्रहार करना चाहता था या घोर उपेक्षा का दोषी था।
  1. क्रास एण्ड जोन्स, इन्ट्रोडक्शन टु क्रिमिनल लॉ (7वाँ संस्करण) पृ० 92.
97 ए० जी० फार नार्दर्न आयरलैंड बनाम गल्लाधर, (1963) ए० सी० 349.
  1. उपरोक्त, क्रास एण्ड जोन्स पृ० 92.
  2. क्वीन बनाम जुल्फिकार 16, डब्ल्यू० आर० क्रि० 36.
  3. (1909) 1 के० बी० 865.
  4. (1920) ए० सी० 479.
  5. (1963) ए० सी० 349.
  6. (1909) 1 के० बी० 865.
ए० जी० फार नार्दर्न आयरलैण्ड बनाम गल्लाधर के बाद में यह प्रमाण था कि अभियुक्त मस्तिष्क रोग। 179 से पीड़ित था और उसका मनोरोग, मस्तिष्क की एक बीमारी थी जो नशे द्वारा इस कदर तीव्र हो जायेगी जिससे वह अत्यधिक सहजता से आत्मनियंत्रण को खो देगा। अभियुक्त गल्लाधर जब सामान्य प्रकृति का था। तभी अपनी पत्नी की हत्या करने के आशय को स्पष्ट कर दिया था। तत्पश्चात् उसने व्हिस्की की एक बोतल खरीदा जिसमें से कुछ अपनी पत्नी की हत्या के पूर्व पिया होगा। पागलपन तथा मत्तता के बचाव के तर्क को प्रस्तुत किया गया है। | जज ने जुरी को निर्देश दिया कि मैक्नाटेन नियमों में प्रतिपादित परीक्षण को मदिरापान के समय लागू किया जाना चाहिये न कि जब सचमुच हत्या की गयी। गल्लाधर को सजा दे दी गयी। हाउस आफ लास ने। यह मत व्यक्त किया कि ‘गल्लाधर का मनोरोग नशे के कारण उत्पन्न मस्तिष्कीय रोग नहीं था अपितु एक मस्तिष्कीय रोग था जो बिना नशे के, मैक्नाटेन के नियमों को कार्यान्वित न कर सका होता, क्योंकि इसने मात्र अभियुक्त की आत्मनियन्त्रण की शक्ति को क्षीण कर दिया था। पागलपन के बचाव को, मत्तता के बचाव के विपरीत व्हिस्की की सहायता से उचित नहीं बनाया जा सकता और मत्तता का बचाव प्राप्त नहीं होगा, क्योंकि अभियुक्त ने जिस समय व्हिस्की का सेवन किया उसके पूर्व ही हत्या करने का निश्चय कर चुका था।” लार्ड डेनिंग ने कहा कि मामले का निर्णय इस सामान्य नियम के आधार पर होना चाहिये कि एक आपराधिक आरोप के लिये मत्तता का बचाव नहीं है। इस नियम के दो अपवादों को उन्होंने स्वीकार किया—(1) जहाँ मत्तता विशिष्ट आशय के विनिर्माण को प्रतिरोधित करती है, (2) जहाँ मस्तिष्क रोग से तर्क शक्ति में मैक्नाटेन के नियमों के अन्तर्गत नशे के फलस्वरूप दोष उत्पन्न होता है। किन्तु इनमें से कोई भी अपवाद गल्लाधर के वाद में लागू नहीं हो सकता था, क्योंकि वह ऐसे किसी रोग से पीड़ित नहीं था तथा उसने व्हिस्की का सेवन करने के पूर्व ही पत्नी की हत्या करने का निर्णय ले लिया था। लार्ड डेनिंग ने सुझाव दिया कि मामला भिन्न किस्म का हुआ होता, यदि अभियुक्त का आशय नशे का सेवन करने के पूर्व अपनी पत्नी की हत्या करने का नहीं रहा होता। उस हालत में प्रश्न हुआ होता कि क्या मत्तता इस प्रकृति की थी जिससे कि मामला सामान्य नियम के प्रथम अपवाद के अन्तर्गत आ जाये। किन्तु ‘‘एक मनोरोग से पीड़ित व्यक्ति जो अपनी पत्नी की हत्या करने को निश्चित कर लेता है, दायित्व से मात्र इसलिये नहीं बच सकता कि हत्या के पूर्व उसने नशे का सेवन किया था।”6 आर० बनाम लिपमैन? इस विषय पर एक अन्य उदाहरण है। लिपमैन तथा मृतक लड़की दोनों को ही दवा लेने की लत थी। एक शाम लड़की के घर पर दवा एल० एस० डी० (LSD) की कुछ मात्रा लिपमैन द्वारा लेने के पश्चात् उसे लगा कि वह पृथ्वी के केन्द्र की ओर जा रहा है जहां सर्प उस पर प्रहार कर रहे हैं और वह उनसे लड़ रहा है। इस भ्रमित स्थिति ही में उसने लड़की के सिर पर दो बार प्रहार किया जिससे दम घुटने के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। उस पर हत्या का आरोप लगाया गया और उसने तर्क प्रस्तुत किया कि दवा के प्रभाव के अन्तर्गत होने के कारण उसे यह ज्ञान नहीं था कि वह क्या कर रहा था तथा मृतक को किसी भी तरह का नुकसान पहुँचाने का उसका कोई आशय नहीं था। लिपमैन को मानववध के लिये दोषी ठहराया गया। यह प्रेक्षित किया गया कि-‘आपराधिक दायित्व के उद्देश्य हेतु स्वेच्छापूर्वक दवा का सेवन करने तथा अनिच्छापूर्वक दवा का सेवन करने के बीच कोई अन्तर नहीं है। अवैध कार्य को करने के दौरान हुई मृत्यु पर आधारित मानववध की सजा को न्यायसंगत ठहराने के लिये विशिष्ट आशय की आवश्यकता नहीं होती और जब अवैध कार्य के फलस्वरूप मृत्यु होती है तो मानववध की सजा के लिये किसी विशिष्ट आशय का सिद्ध होना आवश्यक नहीं है, फलतः स्वयं प्रेरित मत्तता कोई बचाव नहीं है।” लार्ड डेनिंग ने गल्लाधर के मामले में दो महत्वपूर्ण मामलों का वर्णन किया है। पहला मामला एक मत्त नर्स की है जिसने नामकरण के अवसर पर एक बच्चे को आग के ढेर के पीछे रख दिया तथा बाद में यह समझी कि वह लकड़ी का एक लट्ठा है। दूसरे मामले में एक मत्त व्यक्ति ने बिस्तर में लेटे अपने मित्र को समझा कि वह एक नाट्य गृह का पुतला (Theatrical dummy) है और छुरा मारकर उसकी हत्या कर दिया। दोनों ही को मानव-वध का दोषी ठहराया गया। मानव-वध की सजा को नि:सन्देह आपराधिक उपेक्षा ।
  1. (1963) ए० सी० 349.
  2. उपरोक्त सन्दर्भ पृ० 382.
  3. (1970) 1 क्यू० बी० 152.
के आधार पर न्यायसंगत ठहराया जा सकता है। किन्तु प्रश्न उठता है कि तब क्या होता यदि शिशु तथा मित्र दोनों ही जीवित बच गये होते? अवैध चोट पहुंचाने के आरोप के सिलसिले में, जिसके लिये मत्तता एकमात्र बचाव है, लार्ड डेनिंग का विचार है कि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये बाध्य है कि अभियुक्त को इस तथ्य का ज्ञान था,चाहे। कितना ही मत्त वह क्यों न रहा हो कि उसके कार्य से उसके शिकार को शारीरिक क्षति पहुँचेगी। इस विचारधारा का समर्थन केवल इस आधार पर किया जा सकता है कि एक व्यक्ति के विरुद्ध किसी अपराध के आरोप से पूर्ण बचाव हेतु मत्तता के तर्क की स्वीकृति करना लोकनीति के विरुद्ध है जिस पर न्यून अपराध के लिये सजा की कोई सम्भावना नहीं है, इसकी अपेक्षा कि गम्भीर अपराध के लिये कोई चीज दायित्व को संक्षिप्त कर दे। यह विचारधारा पूर्णत: उपयुक्त है किन्तु इसके समर्थन में कोई नवीन प्रमाण नहीं है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि मत्तता एक ऐसा तत्व है जिसे सजा की मात्रा को निर्धारित करते समय कभी-कभी ध्यान में रखना पड़ेगा। | भारतीय विधि-स्वैच्छिक मत्तता सम्बन्धित विधि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 86 में वर्णित है।। यदि एक व्यक्ति स्वेच्छा से मत्त हुआ है तो यह माना जायेगा कि उसे वही ज्ञान था जो उसे रहा होता यदि वह मत्त नहीं हुआ होता। कुछ अपराधों में एक विशिष्ट ज्ञान एक अवयव हो सकता है जब कि अन्य आशय ही अवयव होता है। यह धारा यह नहीं कहती कि अभियुक्त के साथ उसी तरह का व्यवहार किया जाना चाहिये जैसा कि उसका आशय था और जैसा कि उसकी कल्पना की गयी होती यदि वह मत्त नहीं होता। जहाँ तक ज्ञान का प्रश्न है उसके सम्बन्ध में एक निश्चित अवधारणा है किन्तु अपराध को गठित करने के लिये विशिष्ट आशय के बारे में ऐसी कोई अवधारणा नहीं है। यह धारा मत्त व्यक्ति को एक साान्य प्रज्ञा वाले व्यक्ति के ज्ञान से युक्त मानती है किन्तु उसे सामान्य प्रज्ञा वाले व्यक्ति के आशय से युक्त नहीं मानती। दूसरे शब्दों में ऐच्छिक मत्तता की स्थिति में एक व्यक्ति को उस ज्ञान से युक्त माना जाता है जैसे कि एक अमत्त व्यक्ति के मामले में किन्तु उसी आशय से नहीं। यह कहा जाता है कि एक व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने कृत्य के स्वाभाविक परिणामों को जानता है और यदि यह जानता है कि सम्भावित परिणाम क्या है तो यह माना जायेगा कि उसका वही आशय था। किन्तु ज्ञान से आशय का यह निष्कर्ष उस समय नहीं उत्पन्न होगा कि वह मत्त था। ऐच्छिक मत्तता धारा 86 के अन्तर्गत उन मामलों में कोई बचाव नहीं प्रदान करती जिसमें अपराध गठित करने के लिये मात्र आवश्यक ज्ञान का अभाव है यद्यपि इसका प्रयोग यह दिखाने के लिये किया जा सकता है कि यदि किसी आशय की आवश्यकता थी तो वह अनुपस्थित था। अर्थात् उसे केवल ज्ञान के आधार पर दण्डित किया जा सकता है किसी विशिष्ट आशय के आधार पर नहीं वासुदेव बनाम पेप्सू राज्य का मामला इस विषय पर भारत में प्रमुख वाद है। वासुदेव एक अवकाश प्राप्त सेना का जमादार था। लगभग 15 या 16 वर्ष का एक लड़का उसके साथ एक बारात में गया। जब वे खाना खाने गये अपीलकर्ता ने लड़के से कहा कि वह थोड़ा खिसक जाये ताकि वह सुविधाजनक स्थान ग्रहण कर ले। किन्तु लड़का अपने स्थान में खिसका नहीं। इस पर अपीलकर्ता को क्रोध आ गया और उसने अपनी पिस्तौल निकाल कर लड़के के पेट में गोली चला दिया। लड़के की मृत्यु हो गयी। अपीलकर्ता उस समय नशे में था। प्रश्न यह था कि यह मामला संहिता की धारा 302 या 304 के अन्तर्गत आयेगा। उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त को हत्या के लिये दोषी ठहराते हुये कहा कि जहाँ तक ज्ञान का प्रश्न है उन्मत्त व्यक्ति को उसी ज्ञान से युक्त माना जाये जिससे कि एक सामान्य प्रज्ञा वाला व्यक्ति युक्त होता है। किन्तु जहाँ तक आशय का प्रश्न है इसका निर्धारण मामले की सामान्य परिस्थितियों से, मत्तता की मात्रा को उचित स्थान देते हुये, किया जाना चाहिये। क्या तत्समय वह व्यक्ति अपना होश हवाश खो चुका था? यदि ऐसा था, तो उसके विरुद्ध आवश्यक आशय की प्रकल्पना नहीं की। जायेगी। किन्तु यदि उसकी मत्तता गम्भीर प्रकृति की नहीं थी और यदि तथ्यों से यह स्पष्ट होता था कि वह जानता था कि वह क्या करना चाहता था तो हम इस सिद्धान्त को लागू कर सकते हैं कि एक व्यक्ति अपने कृत्य या कृत्यों के स्वाभाविक परिणामों की इच्छा करता है।” डाक्टर एच० एस० गौड़ के अनुसार मत्तता से सम्बन्धित विधि इस प्रकार है10
  1. दिल मोहम्मद (1941) 21 पटना 250.
  2. ए० आई० आर० 1956 सु० को० 488.
  3. एच० एस० गौड़, पेनल लॉ आफ इण्डिया, (7वाँ संस्करण) पृ० 382.
(1) अनैच्छिक मत्तता अर्थात् मत्तता यदि सम्बन्धित व्यक्ति के ज्ञान के बिना या इच्छा के विरुद्ध कारित । की गयी है तो यह एक बचाव होगी। | (2) ऐच्छिक मत्तता केवल ‘‘आशय” के सम्बन्ध में ही बचाव है। अत: उन प्रकरणों में जिनमें अपराध । को पूर्ण होने के लिये “आशय” का होना आवश्यक है, ऐच्छिक मत्तता पूर्ण बचाव है। (3) किन्तु ऐच्छिक मत्तता उन अपराधों के लिये बचाव सिद्ध नहीं होती जिनमें ‘आशय” से अलग मात्र ‘‘ज्ञान” की उपस्थिति आवश्यक है। (4) यद्यपि ऐच्छिक मत्तता किसी भी प्रकरण में मात्र ज्ञान के लिये बचाव नहीं है, परन्तु इसमें वह यथार्थ ज्ञान अन्तर्निहित नहीं है जिससे अवधारित आशय का निष्कर्ष निकल सके। । मत्तता की स्थिति-शब्द ‘‘मत्तता की स्थिति” का अर्थ है वह मत्तता जो एक व्यक्ति को अपने कार्य की प्रकृति को समझने में असमर्थ बना देती है या यह समझने में असमर्थ बना देती है कि जो कुछ वह कर रहा है या तो दोषपूर्ण या विधिविरुद्ध है। मत्तता द्वारा एक व्यक्ति से अपेक्षित ज्ञान में कोई परिवर्तन नहीं होता। है। परन्तु यदि वह जानता था कि उसके कार्य के स्वाभाविक परिणाम क्या हैं तो यह माना जायेगा कि उन्हें कारित करने का उसका आशय था।11 किन्तु इस अवधारणा का खण्डन इस तथ्य द्वारा किया जा सकता है कि जिस समय उसने कार्य किया उसका मस्तिष्क उसके द्वारा ग्रहीत मदिरा से इस कदर प्रभावित था कि वह अपने विरुद्ध आरोपित प्रभार को अपराध में परिवर्तित करने हेतु आवश्यक आशय को सृजित करने में असमर्थ था।12 सारथी बनाम मध्य प्रदेश राज्य13 के मामले में नशे में मत्त तीन अभियुक्तों ने मृतक को पकड़ कर इतनी बुरी तरह पीटा कि वह बेहोश हो गया और तत्पश्चात् उसे छत से लटका दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गई। यह निर्णीत किया गया कि पीटने की अवस्था तक तो उन अभियुक्तों का आशय घोर उपहति पहुँचाने का था परन्तु उसके बाद जब उन्हें बिना इस बात का पता किये कि वह जीवित है अथवा मर गया है, उसे छत से लटका दिया तो उनका आशय दुविधापूर्ण हो गया। अतएव अभियुक्तों द्वारा मत्तता की स्थिति में घोर उपेक्षा और असावधानी के कारण उन्हें हत्या के लिये नहीं वरन् सदोष मानव-वध के लिये दोषी पाया गया। गौतम भिला अहिरे बनाम महाराष्ट्र राज्य13 के वाद में अपीलांट/अभियुक्त गौतम भिला अहिरे पीडित रिना बाई का पति है जिनका विवाह घटना के 8-9 वर्ष पूर्व हुआ था और उनके एक पुत्र और एक पुत्री थे। अभियुक्त आदतन शराबी था और वह अपनी पत्नी रिना बाई के चरित्र पर संदेह करता था। वह बहुधा रिना बाई को मारता पीटता था और रिना बाई जब कभी भी अपने माता पिता के घर जाती थी तो उनसे यह बात बताया करती थी। नवम्बर 2006 में रिना बाई और उसका पति दोनों रिनाबाई की छोटी बहन की शादी में शामिल होने गये थे। उस समय रिना ने पुन: अपने पति के दुर्व्यवहार के विषय में बताया था। उस समय उसके पति ने यह आश्वासन दिया कि अब वह शराब नहीं पियेगा और पत्नी रिनाबाई के साथ दुर्व्यवहार भी नहीं करेगा। शादी के पश्चात् रिना और उसका पति दोनों ही पति गौतम भिला के घर वापस आये। दिनांक 06-2-2007 को अभियुक्त गौतम भिला ने शराब के नशे में अपनी पत्नी रिना बाई को मारा और उसके शरीर के ऊपर मिट्टी के तेल की जलती हुई चिमनी फेंक दिया जिसके कारण उसकी साड़ी में आग लग गयी। उसने खुद अपनी साड़ी में लगी आग को बुझाने का प्रयास किया परन्तु उस प्रयत्न में वह एक नाला में गिर गयी। उसके पश्चात् अभियुक्त ने उसे सिविल अस्पताल में भर्ती कर दिया। पुलिस को सूचना दी गयी और उसका मृत्यु कालिक बयान सहायक सब इन्स्पेक्टर तथा स्पेशल एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा रिकार्ड किया गया। इन दोनों ही बयानों में उसने यह कहा था कि उसके पति ने जलती हुई मिट्टी के तेल की चिमनी फेंक दिया जिससे उसे आग लग गयी। घटना की जानकारी पाकर रिनाबाई की माता भी अस्पताल में आयी और उससे मिली। रिनाबाई ने अपनी माता से बताया कि 6-2-2007 को सायं लगभग 6.30 बजे जब वह घर पर अकेली थी अभियुक्त ने उसे शराब के नसे में मारा पीटा और जलती हुई मिट्टी के तेल की चिमनी उसके ऊपर फेंक दिया जिससे उसे आग लग गयी। दिनांक 6-2-2007 को रात्रि लगभग 10.10 बजे उसके मृत्यु कालिक बयान के आधार पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 और 323 के अधीन दण्डनीय अपराध हेतु मामला पंजीकृत किया गया। परन्तु दिनांक 9-2-2007 को चोटों के कारण रिनाबाई की मृत्यु हो गई और
  1. जुदागी मल्लाह, (1929) 8 पटना 911.
  2. सम्मन सिंह, (1941) 24 लाहौर 39.
  3. 1976 क्रि० लॉ ज० 594.
13क. (2010) IV क्रि० ला ज० 4073 (बम्बई). उसके पश्चात् धारा 302 के अधीन अपराध का मामला जोड़ दिया गया। विचारण के दौरान अभियुक्त ने यह तर्क दिया कि घटना के समय वह उपस्थित नहीं था बल्कि कहीं और (alibi) था।। उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया जब कभी अभियुक्त द्वारा घटना के समय अन्यत्र होने (alibi) का तर्क दिया जाता है, यह सिद्ध करने का भार (burden) कि घटना के समय वह कहीं अन्यत्र था अभियुक्त पर होगा। आगे यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 86 का लाभ किसी व्यक्ति को तभी मिलेगा जब कि नशीला पदार्थ उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध अथवा उसके ज्ञान के बिना खिलाया या पिलाया गया हो। चूंकि इस मामले में मृतक के पति ने स्वयं शराब पिया था अतएव वह धारा 86 का बचाव पाने का अधिकारी नहीं है। इस मामले में मृतक ने अपने दोनों ही मृत्यु कालिक कथनों में स्पष्टतया यह कहा था कि उसका पति बहुधा शराब पिया करता था और शराब के नशे में ही उसको मारता था। मृतक की माता को भी मृत्यु के पहले दिया गया बयान पूर्व में दिये गये दोनों लिखित कथनों से पूर्णतया मेल खाता था। चूंकि उसकी माँ की मृतक से मुलाकात पुलिस और मजिस्ट्रेट को दिये गये बयान के पश्चात् हुयी थी तो उसे किसी प्रकार सिखाने-पढ़ाने (tutor) की भी सम्भावना नहीं थी। अपना मृत्यु कालिक बयान देते समय मृतक बिल्कुल सही हालत में थी। अतएव मृत्युकालिक कथन के आधार पर अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित अभिनिर्धारित की गयी। ‘क’ के पास दो बोतल हैं जिसमें एक में जहरीला लोसन और दूसरे में पीने की दवा थी। जबकि वह नशे के प्रभाव में था क ने भूल से अपने बच्चे को जहरीले लोसन की एक खुराक पिला दी जिससे बच्चे की मृत्यु हो गयी। इस मामले में क धारा 86 के अन्तर्गत मत्तता के आधार पर अपना बचाव नहीं प्रस्तुत कर सकता और वह हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव वध का दोषी होगा, क्योंकि वह घोर उपेक्षा का दोषी था। क और ख दो मित्र एक साथ नशीला पदार्थ खाते हैं। क को ऐसा विश्वास होने लगता है कि उस पर एक जंगली जानवर ने हमला कर दिया है और इस भ्रम में ख को मार डालता है। यहाँ क हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव-वध कारित करने के लिये दायित्वाधीन होगा, क्योंकि उसने स्वेच्छा से नशीला पदार्थ ग्रहण किया था और स्वैच्छिक मत्तता केवल ऐसे अपराधों में बचाव होता है जिन्हें गठित करने के लिये आशय आवश्यक तत्व है परन्तु उन अपराधों में बचाव नहीं करता है जिनमें केवल ज्ञान आवश्यक होता है।
  1. सम्मति से किया गया कार्य जिससे मृत्यु या घोर उपहति कारित करने का आशय न हो और न उसकी सम्भाव्यता का ज्ञान हो- कोई बात, जो मृत्यु या घोर उपहति कारित करने के आशय से न की गई हो और जिसके बारे में कर्ता को यह ज्ञात न हो कि उससे मृत्यु या उपहति कारित होना सम्भाव्य है, किसी ऐसी अपहानि के कारण अपराध नहीं है जो उस बात से अठारह वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति को, जिसने वह अपहानि सहन करने की चाहे अभिव्यक्त चाहे विवक्षित सम्मति दे दी हो, कारित हो या कारित होना कर्ता द्वारा आशयित हो अथवा जिसके बारे में कर्ता को ज्ञात हो कि वह उपर्युक्त जैसे किसी व्यक्ति को, जिसने उस अपहानि की जोखिम उठाने की सम्मति दे दी है, उस बात द्वारा कारित होनी सम्भाव्य
दृष्टान्त क और य आमोदार्थ आपस में पट्टेबाजी करने को सहमत होते हैं। इस सहमति में किसी अपहानि को. जो ऐसी पट्टेबाजी में खेल के नियम के विरुद्ध न होते हुए कारित हो, उठाने की हर एक की सम्मति विवक्षित है, और यदि क यथानियम पट्टेबाजी करते हुए य को उपहति कारित कर देता है, तो क कोई अपराध नहीं करता है। टिप्पणी जो सम्मति देता है उसे कोई क्षति नहीं पहुंचती है (He who consents suffers no injury) ।। ‘सहमति से कारित क्षति को क्षति नहीं कहते हैं” (volenti non fit injuria), यह रोमन विधिशास्त्र की। एक पुरानी उक्ति है। यद्यपि सैद्धान्तिक रूप में अपराध के लिये आवाश्यक है कि वह पूरे समाज के लिये। हानिकारक हो किन्तु अपराधों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो निश्चयत: वैयक्तिक दोष के रूप में होता है। ऐसे प्रकरणों में व्यक्ति विशेष को कारित क्षति से उत्पन्न समाज के लिये मात्र सामान्य आशंका ही समाज के लिए। क्षति है तथा एक व्यक्ति को उसकी सहमति से कारित क्षति के फलस्वरूप कोई भय उत्पन्न नहीं हो सकता। सहमति का तथ्य ही सम्पत्ति तथा शरीर के विरुद्ध कारित अपराध को क्षम्य करता है। व्यापक रूप से यों कहः जा सकता है कि किसी भी अधिकार को उस हालत में क्षति नहीं पहुँचती है जबकि क्षतिकारक कृत्य को अधिकार का स्वामी अपनी सहमति दे चुका है। सम्पत्ति के विरुद्ध सभी अपराध अन्य संक्राम्य (alienable) अधिकारों के विरुद्ध अपराध है और साथ स्वामी की सहमति से किये जाते हैं तो सिविल तथा आपराधिक दोनों ही प्रकार की कार्यवाहियों के लिय। बचाव है। मानव शरीर के विरुद्ध अपराध जिसमें अपने जीवन तथा अंगों की रक्षा का अधिकार सम्मिलित होता है, एक भिज्ञ धरातल पर होते हैं। यह अधिकार एक विशिष्ट अवस्था तक अन्तरणीय अधिकार होता है। किन्तु उसके पश्चात् अनन्तरणीय होता है तथा उस अधिकार के हनन को सहमति की कोई मात्रा माफ नहीं कर सकती। एक व्यक्ति को केवल रहने का अधिकार ही नहीं है अपितु यह उसका दायित्व भी है।14 जीवन यापन का अधिकार अनन्तरणीय अधिकार है और इसे अन्तरित करने हेतु कोई व्यक्ति अपनी सहमति नहीं दे सकता । गम्भीर चोट कारित करना भी उपरोक्त सन्दर्भ में अनन्तरणीय अधिकार है। अतः सहमति सम्पत्ति के विरुद्ध कारित सभी अपराधों के लिये एक अच्छा बचाव है परन्तु मानव शरीर के विरुद्ध कारित अपराधों में मृत्यु या गम्भीर चोट कारित करने के अलावा अन्य में बचाव है। सहमति का अर्थ– भारतीय दण्ड संहिता में सहमति को परिभाषित नहीं किया गया है यद्यपि धारा 90 यह परिभाषित करती है कि सहमति कब स्वतन्त्र नहीं होती। सहमति का तात्पर्य है, किये जा रहे कार्य को स्वीकार कर लेना। स्टोरी के अनुसार सहमति का अर्थ है–अच्छाई तथा बुराई के बीच सन्तुलन कायम रखते हुये मस्तिष्कीय विवेचना के साथ तर्क का एक कार्य। स्टीफेन के अनुसार सहमति का अर्थ है, एक ऐसी स्थिति में विद्यमान किसी विचारवान तथा उद्वेग रहित व्यक्ति द्वारा दी गई स्वतन्त्र सहमति जिसमें वह उस विषय पर जिस पर सहमति दे रहा है, विवेकयुक्त निर्णय लेने में समर्थ होगा। सहमति को उस समय स्वतन्त्र सहमति माना जाता है जब इसे, किसी भी प्रकार के धोखा, बल या धमकी के द्वारा नहीं प्राप्त किया जाता है।15 इसी प्रकार केन्नी प्रेक्षित करते हैं-सहमति अवश्य ही स्वतन्त्रतापूर्वक एक विवेकयुक्त तथा उद्वेग रहित व्यक्ति द्वारा दी जाये तथा वह व्यक्ति ऐसी स्थिति में हो ताकि जिस विषय पर सहमति दे रहा है उपयुक्त | निर्णय लेने में समर्थ हो ।16 यह बात पूर्णतः स्पष्ट होनी चाहिये कि सहमति मस्तिष्क का धनात्मक प्रवर्तन है। फलत: यह मात्र समर्पण, विरोध का अभाव या प्रसन्नतापूर्वक स्वीकृति आदि से अलग किये जाने योग्य है। यद्यपि ये उपयुक्त मामलों में सहमति के बड़े मजबूत प्रमाण हैं। सहमति तथा समर्पण के बीच अन्तर है। प्रत्येक सहमति में समर्पण निहित होता है किन्तु मात्र समर्पण में सहमति निहित नहीं होती। यह कहना हास्यास्पद होगा कि एक बालिग व्यक्ति जो अत्याचार के सम्मुख झुक जाता है चुपचाप अपनी सहमति नहीं देता किन्तु एक शिशु द्वारा समर्पण, जबकि यह एक बलशाली व्यक्ति के अधिकार में है और सम्भवत: भय के कारण ऐसा किया हो, को कतई सहमति नहीं माना जा सकता है जो कैदी को विधित: न्यायसंगत ठहराये।17 आर० बनाम निकोल18 के वाद में यह निर्णय दिया गया कि यदि एक अध्यापक किसी छात्रा के साथ बिना उसकी सहमति के अभद्र स्वतन्त्रता लेता है तो वह सामान्य प्रहार (Common Assault) के लिये दण्डित होगा भले ही छात्रा ने परिवाद न किया हो। धारा 87 के अवयव-धारा 87 में निहित मुख्य सिद्धान्त यह है कि सहमति कभी भी मृत्यु तथा गम्भीर चोट को न्यायोचित नहीं ठहराती। इस धारा के अन्तर्गत मृत्यु तथा गम्भीर चोट के अतिरिक्त अन्य कोई क्षति, भले ही आशयित रही हो या उसके कारित किये जाने की सम्भावना का ज्ञान कर्ता को रहा हो, निम्नलिखित परिस्थितियों में अपराध नहीं होगी (1) यदि कार्य न तो मृत्यु या गम्भीर चोट कारित करने के आशय से किया गया और न तो इस ज्ञान से कि कार्य द्वारा मृत्यु या गम्भीर चोट कारित होने की सम्भावना है। (2) क्षति किसी व्यक्ति को उसकी सहमति से कारित की गयी।
  1. हुदा, एस० : दि प्रिन्सिपल्स आफ दि लॉ आफ क्राइम्स इन ब्रिटिश इण्डिया, पृ० 326.
  2. स्टीफेन, डाइजेस्ट आफ क्रिमिनल लॉ (8वाँ संस्करण) आर्टिकिल 309 पृ० 266-67.
  3. केन्नी, आउटलाइन्स आफ क्रिमिनल लॉ, (17वाँ संस्करण) पृ० 189.
  4. आर० बनाम डे, 9 सी० एण्ड सी० 722, में जस्टिस कालरिज का मत।
  5. आर० एण्ड आर० 130.
(3) सहमति देने वाला व्यक्ति 18 वर्ष के अधिक आयु का है। (4) सहमति स्पष्ट या विवक्षित हो सकती है। सहमति द्वारा बचाव दो अवधारणाओं पर आधारित है-(1) यह कि प्रत्येक व्यक्ति अपने हित का सबसे उत्तम निर्णायक है, (2) यह कि कोई भी व्यक्ति जिस कार्य को अपने लिये हानिकारक समझता है। उसके लिये अपनी सहमति नहीं देगा। वह इस प्रत्येक बात के लिये स्वतन्त्र है कि वह अपने शरीर तथा सम्पत्ति को कारित क्षति को बर्दास्त करे। अतः यदि वह की जा रही क्षति के लिये अपनी सहमति दे देता है। तो कर्ता किसी भी अपराध का दोषी नहीं होगा। उदाहरण के लिये एक व्यक्ति अपनी सम्पत्ति दूसरे को दे देता है, अत: ग्रहीता उसे अपनी सहमति से ग्रहण करता है. इस तरह के ग्रहण द्वारा वह कोई अपराध नहीं कारित करता। किन्तु यह धारा एक व्यक्ति को यह आज्ञा नहीं देती कि वह किसी आशयित या ज्ञात वस्तु जिससे उसकी मृत्यु या गम्भीर चोट कारित होने की सम्भावना है, की सहमति दे। संहिता के रचयिताओं ने कहा कि यदि ज अपना दाँत एक डेन्टिस्ट को बेचने का निर्णय करता है तथा डेन्टिस्ट को यह अधिकार देता है कि वह दात निकाल ले तो ऐसी स्थिति में डेन्टिस्ट दाँत निकालने के फलस्वरूप हई हानि के लिये दण्डित नहीं हो सकेगा। | संहिता की धारायें 87, 88 तथा 89 सहमति सम्बन्धी नियम प्रतिपादित करती हैं। मृत्यु तथा गम्भीर चोट कारित करने की सहमति न्यायोचित नहीं ठहराती । जहाँ तक मृत्यु का प्रश्न है उस मामलों को छोड़कर जिनमें सांविधिक उपबन्ध अपराध की गम्भीरता को न्युन करते हैं, निषेधपूर्ण तथा बिना शर्त है। संहिता की धारा 300 अपवाद 5 तथा धारा 314 इसके उदाहरण हैं। यदि सहमति किसी खतरनाक कार्य को करने हेतु । प्राप्त की गयी है तथा कार्य के फलस्वरूप सहमति देने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो अभियुक्त को दी जाने वाली सजा कम कर दी जायेगी। उदाहरण के लिये एक प्रदर्शनकारी ‘ब’, ‘अ’ के सिर पर रखे नीबू पर निशाना लगाता है जिससे ‘अ’ की मृत्यु हो जाती है। ‘ब’ सदोष मानव वध का दोषी होगा न कि हत्या का। इसी प्रकार आत्म हत्या के गठबन्ध मे जो व्यक्ति जीवित बच जाता है, वह भारतीय विधि के अन्तर्गत सदोष मानववध का दोषी होगा न कि हत्या का। गम्भीर चोट के मामले में कुछ दशाओं में प्रतिबन्ध को हटा दिया जाता है। विधि इस बात को स्वीकार नहीं करती कि मृत्यु किसी भी हालत में एक व्यक्ति के लिये लाभप्रद सिद्ध हो सकती है यद्यपि यह कुछ मामलों में क्षणिक सन्तोष प्रदान कर सकती है। उदाहरण के लिये, असह्य पीड़ा से पीड़ित एक व्यक्ति मृत्यु को श्रेयस्कर समझेगा तथा वह दूसरे से अपने ऊपर गोली चलाने की प्रार्थना कर सकता है और यदि वह दूसरा व्यक्ति उसकी मृत्यु कारित कर देता है तो वह दोषी होगा परन्तु उसे हत्या के लिये दण्डित नहीं किया जायेगा। धारा 300 के अपवाद 5 के अन्तर्गत उसे सदोष मानव वध के लिये दण्डित किया जायेगा। धाराओं 87, 88 और 89 में वर्णित उपबन्ध सम्पत्ति के विरुद्ध अपराधों से सम्बन्धित नहीं है, क्योंकि इन धाराओं की परिभाषाओं से सहमति को अलग कर दिया गया है। दूसरे शब्दों में सम्पत्ति के विरुद्ध सभी अपराधों में सहमति की अनुपस्थिति विवक्षित होती है। | क्रीड़ा एवं अभ्यास- जहाँ कोई कार्य अपने आप में अवैध है वहीं सहमति को भी बचाव के रूप में नहीं स्वीकार किया जायेगा। परन्तु इस नियम के कुछ अपवाद हैं। यह धारा सामान्यतया कुछ खेलों जैसे, मुक्केबाजी, फुटबाल, वनेठी से लड़ना (Fencing) आदि को सुरक्षा प्रदान करती है। इसका कारण यह है कि खेलों का प्रमुख उद्देश्य शारीरिक क्षति पहुँचाना नहीं होता है। किन्तु इस धारा के अन्तर्गत बचाव हासिल करने के लिये आवश्यक है कि दोनों तरफ से स्वच्छ खेल का प्रदर्शन हो तथा खेल में पर्याप्त सावधानी बरतना आवश्यक है। परन्तु यदि कोई अनुचित लाभ उठाने का प्रयास किया जाता है तो कार्य मानव वध के समतुल्य होगा।19 एक निर्णायक हाथापाई अवैध है तथा उसमें सहायता प्रदान करने वाला एक उकसाने वाला प्रत्येक व्यक्ति प्रहार का दोषी है तथा लड़ाई में यथार्थ रूप से सम्मिलित व्यक्तियों की सहमति इस आरोप के लिये उपयुक्त उत्तर न होगी। किन्तु उक्त स्थल पर विद्यमान प्रत्येक व्यक्ति विधित: मात्र अपनी मौजूदगी की वजह से इस अपराध के लिये दोषी नहीं ठहराया जायेगा 20 परन्तु ऐसे प्रत्येक व्यक्ति जो मौजूदगी मात्र से लड़ाई को बढ़ावा देते हैं जिससे प्रहार किये जाते हैं मानव वध के दोषी होंगे भले ही उन लोगों ने न तो कुछ किया और न कुछ कहा हो।21
  1. अलीसन 114,
  2. कोनी (1882) 8 क्यू० बी० डी० 543.
  3. मर्फी (1883) 6 सी० एण्ड पी० 103.

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