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Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 3 LLB 1st Year Notes

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  1. सात वर्ष से कम आयु के शिशु का कार्य कोई बात अपराध नहीं है, जो सात वर्ष से कम ‘आय के शिशु द्वारा की जाती है।
टिप्पणी शैशव में समझ की कमी होती है। अत: चाहे कुछ भी हो शैशव की उम्र में आपराधिक अभियोजन द्वारा शिशुओं को दण्डित नहीं किया जाना चाहिये । विधिक सन्दर्भ में सात साल से कम उम्र के बच्चे एवं बच्चियों को शिशुओं की श्रेणी में रखा गया था और वे रोमन तथा इंगलिश विधियों के अन्तर्गत दण्ड से उन्मुक्त थे। वे अच्छाई और बुराई के बीच विभेद करने में स्वभावत: असमर्थ होते हैं। रोमन तथा इंगलिश दोनों विधियों के अन्तर्गत जब लड़का 14 वर्ष और लड़की 12 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेते हैं तो कहा जाता है कि उन्होंने स्वविवेक की आयु प्राप्त कर ली है। अत: इससे अधिक आयु के बच्चों को उनके द्वारा किये गये अपराधों के लिये दण्डित किया गया। इस आयु को प्राप्त करने के पूर्व बच्चों को अपराध करने में अक्षम” (doli incapaa) की संज्ञा दी जाती थी किन्तु न्यायालय इस निर्णय पर पहुँचता था कि वह अपराध करने में सक्षम” (doli capx) था तथा अच्छाई और बराई में विभेद कर सकता था तो उसे सजा में दण्डित किया जा सकता था। । भारत में 7 वर्ष से कम आयु के शिशुओं को अपराध करने में अक्षम’ (doli incapa) कहा जाता है, अत: उन्हें किसी अपराध के लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस आयु का साक्ष्य मात्र ही इस बात का अन्तिम प्रमाण होगा कि शिशु निर्दोष है तथा उसके खिलाफ लगाये गये किसी आरोप का वह स्वत: एक प्रमाण होगा। मार्श बनाम लोडर के वाद में प्रतिवादी ने एक बच्चे को अपने परिसर में लकड़ी का एक टुकड़ा चुराते हुये पकड़ा और उसे जेल में डाल दिया। चूंकि लड़का सात वर्ष से कम आयु का था अत: उसे मुक्त कर दिया गया। जहाँ एक साझेदारी के सदस्यों को या संयुक्त परिवार के सहभागियों को उनके नौकर द्वारा किये गये किसी आपराधिक कृत्य के लिये किसी विशिष्ट विधि के अन्तर्गत दायित्वाधीन ठहराया जाता है तो नाबालिग सहभागियों का मामला संहिता की धारा 82 और 83 द्वारा नियन्त्रित होगा 6 सात साल से कम आयु का शिशु आपराधिक दायित्व से पूर्णतया उन्मुक्त है।
  1. सात वर्ष से ऊपर किन्तु बारह वर्ष से कम आयु के अपरिपक्व समझ के शिशु का कार्य- कोई बात अपराध नहीं है, जो सात वर्ष से ऊपर और बारह वर्ष से कम आयु के ऐसे शिशु द्वारा की जाती है जिसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है, कि वह उस अवसर पर अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों का निर्णय कर सके।
टिप्पणी यह प्रश्न कि क्या किसी मामले में कर्ता के आपराधिक आशय को उसकी अपरिपक्व आयु अथवा पश्चातूवर्ती विवेकहीनता के कारण नकारा जा सकता है, अनेक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। वह आयु । जिस पर किसी व्यक्ति के लिये कहा जा सके कि उसने अपने कार्य की प्रकृति तथा उसके परिणाम को समझने हेतु पर्याप्त विवेक अर्जित कर लिया है, उसकी शिक्षा, प्रौढ़ता तथा वातावरण पर निर्भर करता है और तदनुसार परिवर्तित होता है। एक विशिष्ट आयु तक निर्दोषता की अवधारणा पूर्ण और अन्तिम होती है। भारत में यह आयु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 82 द्वारा सात वर्ष तक निश्चित की गयी है। इंग्लैण्ड में यह आयु 10 वर्ष से कम एर निश्चित की गयी है।
  1. ब्लैकस्टन, कमेन्ट्रीज भाग 4 पृष्ठ 20 एवं 22.
  2. क्वीन बनाम लाखिनी अग्रदानिनी, (1474) 22 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 27.
  3. (1863) 14 सी० वी० एन० एस० 535.
  4. उत्तम चन्द, (1946) लाहौर 239. उत्तम चन्द, (1946) लाहौर 239.
  5. चिल्ड्रन एण्ड यंग परसंस ऐक्ट, 1963 की धारा 16.
अवयव- धारा 83 के निम्नलिखित अवयव हैं (1) सात वर्ष से अधिक और 12 वर्ष से कम आयु के एक बच्चे द्वारा किया गया एक कार्य। (2) शिशु ने अपने आचरण की प्रकृति तथा परिणाम को समझने के लिये पर्याप्त क्षमता न अर्जित कर ली हो।। (3) अक्षमता कार्य सम्पादित होते समय अस्तित्व में हो। धारा 83 सीमित उन्मुक्ति के मामलों से सम्बन्धित है क्योंकि 7 वर्ष से अधिक और 12 वर्ष से कम आयु के शिशु से अपेक्षा की जाती है कि वह समझने की क्षमता रखता होगा तथा अपराध कारित करने की सामर्थ्य प्राप्त कर चुका होगा। किन्तु यह अवधारणा खण्डनीय है और इसको खण्डित करने का दायित्व प्रतिवादी पर। होता है। हीरालाल बनाम बिहार राज्य के मामले में एक लड़के ने एक आयोजित कार्य में भाग लिया और मृतक पर प्राणघातक हमला करने में एक धारदार अस्त्र का प्रयोग किया। उस लड़के के मन्दबुद्धि होने के कारण अपने कार्यों की समुचित समझ न होने के साक्ष्य के अभाव में धारा 83 के अन्तर्गत प्रतिरक्षा प्रदान की। गई। भारतीय और इंग्लिश विधियों में अन्तर- भारत में 7 वर्ष से कम आयु का शिशु आपराधिक दायित्व से पूर्णतया उपयुक्त है, इंग्लैण्ड में यह आयु 10 वर्ष की है। भारत में 7 वर्ष से अधिक और 12 वर्ष से कम आयु का शिशु सीमित उन्मुक्ति का लाभ प्राप्त करता है और उसे अपराध करने में सक्षम (doli capax) समझा जाता है। अतः इस अवधारणा को खण्डित करने का दायित्व शिशु पर होता है और इसे सिद्ध करना होगा कि वह इस आयु वर्ग में आता है तथा अपराध करने में अक्षम (doli incapax) माना जाता है किन्तु इस अवधारणा को अपकारी स्वविवेक (Mischievous discretion) के साक्ष्य द्वारा खण्डित किया जा सकता है। इंग्लैण्ड में 14 वर्ष से कम आयु का शिशु बलात्कार या लैंगिक सम्भोग सम्बन्धी किसी अपराध के लिये दण्डित नहीं किया जा सकता किन्तु भारत में इस आयु वर्ग के शिशुओं को इस प्रकार की उन्मुक्ति नहीं प्रदान की गई है। अत: भारतीय तथा आंग्ल विधियों में महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि भारतीय विधि धारा 83 के अन्तर्गत आने वाले मामलों में समझने की क्षमता तथा अपराध कारित करने की सामर्थ्य की अवधारणा करती है जबकि आंग्ल विधि सीमित उन्मुक्ति के मामलों में अपराध कारित करने में अक्षमता की अवधारणा करती है | सीमित उन्मुक्ति का परीक्षण (Test of qualified immunity)—सीमित उन्मुक्ति निम्नलिखित तथ्यों पर निर्भर करती है (1) किये गये कार्य की प्रकृति, (2) अभियुक्त का पश्चात्वर्ती आचरण, (3) अभियुक्त की न्यायालय में उपस्थिति और आचरण। अभियुक्त में समझ की प्रौढ़ता इस तथ्य से निर्धारित की जाएगी कि उसने कार्य सम्पादित करने के पश्चात् अपने हथियारों को तथा स्वयं को छिपाने का प्रयास किया या नहीं। इसका निष्कर्ष पूर्व निश्चय से भी निकाला जा सकता है। मुसम्मात एमोना10 के बाद में अभियुक्त जो लगभग 10 वर्ष की आयु की थी, हत्या की पूर्व रात्रि में अपनी सास के साथ सोयी थी। उसका पति जो लगभग 19 वर्ष की आयु का था, अपने भाई के साथ उसी इमारत के दूसरे कमरे में सोया था। दुर्भाग्यपूर्ण दिन की प्रभात बेला में सास ने अभियुक्त को जगाया कि वह जाकर घर के काम-काज को निपटा दे। इसके कुछ ही समय पश्चात् अभियुक्त को घर से भागते हुये देखा गया और उसके पति को गले में लगी चोट द्वारा बुरी तरह घायल पाया गया। अभियुक्त ने अपने को एक ख में छिपा रखा था और दोपहर के बाद उसे खोज निकाला गया। न्यायालय ने उसे अपराध करने के लिये (doli capax) पाया क्योंकि उसके व्यवहार तथा मामले की परिस्थितियों से यह निष्कर्ष निकाला जा था कि वह पर्याप्त आपराधिक आशय से युक्त थी। अत: उसको दी गयी सजा न्यायसंगत है।
  1. 1977 क्रि० लॉ ज० 1921 (सु० को०)
  2. (1864) 1 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 43.
क्वीन बनाम लरिखनी अरदनिन।। के बाद में 7 वर्ष से अधिक तथा 12 वर्ष से लड़कों को आग लगाने (Ars) के आरोप के लिये विधारित किया गया। जूरी ने पाया कि अभि सचिव कार्य की पति को समझने में सक्षम थी अर्थात् वह जानती थी कि उसके कार्य से क्षति पहुंचेगी । यधपि वह इस बात से भिन नहीं थी इस कार्य के फलस्वरूप उसे जेल जाना पड़ेगा। सशस जज ने यह विचार हये अमले को उच्च न्यायालय के सुपुर्द कर दिया कि यदि एक व्यक्ति अपने कार्य की प्र गापि वर नहीं जानती थी कि इस कार्य के लिये उसे दण्डित होना पड़ेगा, तो उसे अपराध कारित क के लिये सक्षम माना जाएगा। उच्च न्यायालय ने कहा कि पदावली”उसक व्यवहार के फलस्वरूप पयोग धारा 83 में हुआ. का तात्पर्य स्वैच्छिक कृत्य से व्युत्पन्न दाण्डिक परिणामों से नहीं है, उदाहरण के लिये यदि किसी प्रज्वलनशील पदार्थ को आग लगायी जाती है तो वह जल जायेगा। मामले की परिस्थितियाँ ही विद्वेष की उस मात्रा को स्पष्ट करती हैं जिसमें पदावली ‘‘विद्वेष उम्र की परिपूर्ति करती है” (quia maliia appler actalena) को सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है। यहाँ विद्वेष का अर्थ नैतिक तथा वैधिक दोनों ही रूपों में दोषपूर्ण कार्य का ज्ञान है। भारतीय विधि की समालोचना-बाल्यावस्था से सम्बन्धित भारतीय विाध में एक कमी देखी जा सकती है। धारा 82, सात वर्ष से कम आयु के शशु द्वारा किये गये कार्य से सम्बन्धित है। धारा 83 सात वर्ष से अधिक तथा बारह वर्ष से कम आयु के शिशु द्वारा किये गये कार्य से सम्बन्धित है। ये दोनों धारायें एक ऐसे शिशु के लिये कोई उपबन्ध नहीं करती हैं जो पूरे-पूरे सात वर्ष का है। अत: यह अनुरोध किया जाता है कि ऐसे शिशु का मामला धारा 82 के अन्तर्गत आता है क्योंकि दाण्डिक संविधियों का नियमनिष्ठ निरूपण किया जाना चाहिये। किसी अपराध के लिये दण्ड आरोपित किये जाने के लिये यह आवश्यक है कि मामला आरोपित अपराध की परिभाषा के अन्तर्गत आता हो और नियम यह है कि सभी सम्भावित सन्देहों का लाभ अभियुक्त को मिलना चाहिये। यह तर्क भी प्रस्तुत किया जा सकता है कि भारतीय विधि में सात वर्ष से अधिक आयु के शिशु के विरुद्ध सामर्थ्य और दायित्व की अवधारणा अनुचित प्रतीत होती है और कोई भी न्यायाधीश उस आयुवर्ग के शिशु को तब तक दण्डित नहीं करेगा जब तक कि वह अपने आप को सन्तुष्ट न कर ले कि शिशु ने अपने कार्य की प्रकृति या उसके परिणाम को समझने की पर्याप्त क्षमता हासिल कर ली थी। यह सिद्धान्त इस नियम पर आधारित है कि विद्वेष उम्र की परिपूर्ति करता है।” (qtionalitia Stupplet actatera) ।। उदाहरण-उल्ला महापात्र12 के वाद में अभियुक्त जो 11 वर्ष से अधिक तथा 12 से कम आयु का था, ने एक चाकू उठाकर मृतक को टुकड़े-टुकड़े में काट देने की धमकी देने लगा तथा यथार्थतः उसने उसकी हत्या भी कर दी। यह निर्णय हुआ कि अभियुक्त के कार्य से केवल एक निर्णय निकाला जा सकता है और वह यह कि उसने वही किया जो वह करना चाहता था तथा पूरी घटना के दौरान उसे यह ज्ञात था कि चाकू का मात्र एक ही प्रहार उसके आशय की पूर्ति कर देगा। अत: उसे सुधार गृह में 5 वर्ष के लिये भेज दिया गया। कृष्णा13 के वाद में 9 वर्ष के एक बच्चे ने 2 रुपये आठ आने कीमत वाले एक हार को चुराकर अभियुक्त के हाथ पांच आने में बेच दिया। परीक्षण के दौरान प्रस्तुत किये गये साक्ष्य से पता चला कि बच्चे ने अपने कार्य की प्रकृति तथा परिणामों को समझने की पर्याप्त प्रौढ़ता अर्जित कर ली थी। अत: यह चोरी के आरोप का दोषी ठहराया गया। एक दूसरे प्रकरण14 में एक 10 वर्ष की लड़की ने अपने पति के जीवनकाल में। दुबारा विवाह किया। विवाह की सारी कार्यवाहियाँ उनकी माँ ने सम्पन्न किया। यह निर्णय दिया गया कि दूसरे विवाह के समय लड़की कार्य की प्रकृति तथा उसके परिणामों को समझने में पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं।
  1. 22 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 27,
  2. 1950 कटक 293.
  3. (1883) 6 मद्रास 373.
  4. गोदी (1896) क्रि० रि० नं० 55 : 1896 अनरिपोर्टेड क्रिमिनल केसेज, 876.
थी | मारियामुथू15 के वाद में एक 10 वर्ष की लड़की ने चाँदी की एक बटन उठा कर अपनी माँ को दे या। लड़की को चोरी के लिये दोषी नहीं ठहराया गया, क्योंकि परिस्थितियों से यह स्पष्ट नहीं था कि उसने अपने कार्य की प्रकृति तथा उसके परिणामों को समझने की योग्यता हासिल कर ली थी।
  1. विकृतचित्त व्यक्ति का कार्य- कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है जो उसे करते समय चित्तविकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति, या यह कि जो कुछ वह कर रहा है, वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ है।
टिप्प्णी साधारण सिद्धान्त- एक व्यक्ति को किसी अपराध के लिये दोषी ठहराने हेतु सामान्यतया एक आपराधिक आशय आवश्यक है। अत: व्यक्ति के आपराधिक दायित्व के विनिश्चय हेतु यह देखना आवश्यक है कि क्या अपराधकर्ता आपराधिक आशय को सृजित करने के लिये सामर्थ्यवान था। आपराधिक आशय को निर्मित करने हेतु एक व्यक्ति में पर्याप्त मानसिक क्षमता का अभाव अपरिपक्व आयु या मस्तिष्कीय दोष के कारण हो सकता है। जब ऐसा दोष किसी मस्तिष्कीय रोग के कारण व्युत्पन्न होता है तो एक व्यक्ति विकृत चित्त का कहा जाता है। अत: वे व्यक्ति जो स्वाभाविक अयोग्यता के अन्तर्गत अच्छाई और बुराई में विभेद नहीं कर सकते जैसे शिशु, विक्षिप्त या उन्मत्त, वे किसी भी प्रकार के आपराधिक अभियोजन द्वारा दण्डनीय नहीं हैं।16 स्टीफेन अपनी आपराधिक विाध डाइजेस्ट में लिखते हैं कि-“कोई कृत्य अपराध नहीं है यदि इसका कर्ता इसे करते समय दोषपूर्ण मस्तिष्कीय क्षमता या मस्तिष्क को प्रभावित करने वाले किसी रोग के कारण (क) कृत्य की प्रकृति तथा उसके लक्षणों या (ख) यह कि कृत्य दोषपूर्ण है, को जानने से वंचित कर दिया गया है।”17 आर० बनाम आर्नल्ड18 के वाद में अभियुक्त को लार्ड आन्स्लो को घायल करने तथा उनकी हत्या के प्रयास के लिये विचारित किया गया। अभियुक्त की मस्तिष्कीय विक्षिप्तता का पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध था। इस प्रकरण में ट्रेसी जज ने निम्नलिखित परीक्षण प्रतिपादित किया- “यदि वह ईश्वरीय प्रभाव के अन्तर्गत था तथा उचित और अनुचित में विभेद करने में असमर्थ था और वह यह नहीं जानता था कि उसने क्या किया है, यद्यपि उसने एक असामान्य अपराध कारित किया, फिर भी वह किसी विधि के अन्तर्गत किसी अपराध के लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता।” । इस मामले के अनुसार एक व्यक्ति दायित्व से उन्मुक्ति की माँग कर सकता है यदि चित्त की विकृतता के कारण वह उचित और अनुचित में विभेद करने में असमर्थ था और यह भी नहीं जानता था कि उसने क्या किया। इस परीक्षण को बाइल्ड बीस्ट टेस्ट (Wild Beast Test) के नाम से भी जाना जाता है। बाद में लार्ड फेरर19 के वाद में उपरोक्त परीक्षण को स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इस वाद में लार्ड फेरर को अपने परिचालक (Steward) की हत्या के लिये हाउस आफ लार्ड्स में विचारित किया गया। लार्ड फेरर ने परिचालक की हत्या जानबूझकर एक काल्पनिक दोष के लिये की थी। अपने बचाव में उन्होंने पागलपन का अभिवचन प्रस्तुत किया। हैडफील्ड20 के प्रकरण में विक्षिप्त भ्रान्ति परीक्षण (Insane delusion test) नामक एक अन्य परीक्षण को प्रतिपादित किया गया। हैडफील्ड के विरुद्ध किंग जार्ज तृतीय की हत्या के प्रयास का अभियोग था। इस वाद में अभियुक्त के वकील एर्सकिन ने विक्षिप्त भ्रान्ति जिससे अभियुक्त पीड़ित था, के आधार पर,
  1. 9 क्रि० एल० जे० 392 (मद्रास).
  2. हॉकिन्स 1 हाव० पी० सी० 1.
  3. अनुच्छेद यू० 6, पृ० 5.
  4. (1724) 16 सेंट ट्री० 695.
  5. (1760) 19 सेंट ट्री० 885.
  6. (1800) 27 सेंट ट्री० 128.
अभियुक्त के दोषरहित होने के निर्णय सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया। अभियुक्त के वकील ने तर्क प्रस्तुत किया कि पागलपन का विनिश्चयन स्थिर विक्षिप्त भ्रान्ति जिससे कि अभियुक्त प्रभावित था तथा जो उसके अपराध के तात्कालिक कारण थे, के तथ्यों द्वारा किया जाना चाहिये। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे व्यक्तियों के अतिरिक्त जो स्थायी अथवा अस्थायी रूप से पर्णतया विवेकरहित हैं और उनके अतिरिक्त जो ऐसी वीभत्स प्रकार की भ्रान्तियों से पीड़ित हैं जो उन पीड़ितों की मानसिक शक्ति को अभिभूत (Overpower) कर लेती हैं, भ्रान्ति से ऐसे भी अन्य लोग हैं जहाँ पर भ्रान्ति सीमित होती है और पीड़ित व्यक्ति की सभी बौद्धिक क्षमताओं को। अभिभूत नहीं करती और जिनका निष्कर्ष अपने आप में स्वस्थ तथा विवेकयुक्त हो सकता है। और अन्त में बाउलर21 के बाद में उचित और अनुचित” में विभेद की क्षमता की प्रकल्पना की गयी। इस वाद में ली ब्लांक जज ने जुरी पर यह दायित्व सौंपा कि वह निश्चित करे कि क्या अपराध कारित करते। समय अभियुक्त उचित और अनुचित में विभेद करने में असमर्थ था या किसी भ्रान्ति से पीड़ित था जिसने उसके विवेक को इस सीमा तक प्रभावित किया कि वह अपने द्वारा किये जाने वाले कार्य की प्रकृति को नहीं समझ सका। बाउलर के वाद में दिये गये निर्णय के समय से ही न्यायालय अभियुक्त की उचित और अनुचित में विभेद करने की शक्ति पर अधिक बल देते थे यद्यपि वे सन् 1843 तक मैक्नाटेन के वाद में दिये गये निर्णय के पूर्व इस सिद्धान्त को निश्चित रूप से प्रतिपादित नहीं कर पाये थे। मैक्नाटेन के सिद्धान्त- स्काटलैंड निवासी डैनियल मैक्नाटेन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री सर राबर्ट पील के वैयक्तिक सचिव, एडमन्ड इमण्ड की हत्या के सिलसिले में विचारित किया गया। मैक्नाटेन इस तथ्य से भ्रमित था कि सर राबर्ट पील ने उसे क्षति पहुँचायी है और ड्रमन्ड को ही सर राबर्ट पील समझ कर उसने उसके ऊपर गोली चला दी जिससे ड्रमन्ड की मृत्यु हो गयी। अभियुक्त ने अपने बचाव में पागलपन का अभिवचन प्रस्तुत किया तथा चिकित्सीय प्रमाणों ने यह दर्शाया कि मैक्नाटेन विकृत भ्रम से पीड़ित था जिसके कारण वह नियन्त्रण की शक्ति खो बैठा था। अभियुक्त को पागलपन के आधार पर आरोप से मुक्त कर दिया गया। उसको उन्मुक्त किये जाने के कारण चारों तरफ सनसनी फैल गयी तथा हाउस आफ लास में यह विवाद का विषय बन गया। अतः हाउस आफ लास ने इस मामले को 15 न्यायाधीशों की एक बेंच (पीठ) को सौंप दिया और उनसे कहा गया कि विक्षिप्तता (Lunacy) के प्रकरणों में आपराधिक दायित्व सम्बन्धी सिद्धान्त को प्रतिपादित करें। उन न्यायाधीशों के समक्ष कुछ प्रश्न भी रखे गये जिनका उत्तर देने को उनसे कहा गया। इन्हीं प्रश्नों तथा उनके जवाबों को मैक्नाटेन के नियमों से जाना जाता है जो विक्षिप्तता या पागलपन से सम्बन्धित आधुनिक विधि का आधार है। न्यायाधीशों द्वारा किये गये जवाबों से निम्नलिखित सिद्धान्त निकाले जा सकते हैं (1) यद्यपि अभियुक्त ने चित्त-विकृतता के प्रभाव के अन्तर्गत किसी कल्पित क्षोभ या चोट की प्रतिपूर्ति या बदला लेने या किसी लोकहित की व्युत्पत्ति हेतु कथित कार्य को किया, फिर भी, यदि वह ऐसे अपराध को कारित करते समय यह जानता था कि उसका कार्य विधिविरुद्ध है तो वह कारित अपराध की प्रकृति के अनुसार दण्डनीय है। | (2) जूरी को बताया जाना चाहिये कि वह सदैव प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ चित्त का माने और यह भी माने कि अपने अपराध के प्रति उत्तरदायी होने के लिये वह पर्याप्त क्षमता रखता है जब तक उसके सन्तुष्टि। तक इसके विपरीत न सिद्ध हो जाये तथा चित्त विकृतता के आधार पर बचाव सिद्ध करने के लिये यह स्पष्टतः स्थापित होना चाहिये कि कृत्य कारित करते समय अभियुक्त मस्तिष्कीय रोग के कारण ऐसे दोष से पीड़ित था कि वह अपने द्वारा किये हुये कार्य की प्रकृति तथा उसके गुणों को समझने में असमर्थ था या यदि वह इसे नहीं जानता था, तो वह यह भी नहीं जानता था कि जो कुछ वह कर रहा है, विधिविरुद्ध है। (3) यदि अभियुक्त इस तथ्य से भिज्ञ था कि कार्य ऐसा है जिसे उसे नहीं करना चाहिये और यदि उसी समय कार्य देश की विधि के विरुद्ध है तो वह दण्डनीय है और सामान्य ढंग यह है कि प्रश्न को जूरी के लिये छोड़ दिया जाये कि क्या वह यह जानने की पर्याप्त क्षमता रखता था कि जो कुछ वह कर रहा है दोषपूर्ण था?
  1. (1872) 1 कोलिसन ल्युनेसी 673.
(4) यदि अभियुक्त मात्र आंशिक भ्रांति से प्रभावित है और अन्य संदर्भो में वह विकृतचित्त का नहीं है। तो उत्तरदायित्व हेतु उसे उसी स्थिति में माना जाना चाहिये कि वे तथ्य जिनके सम्बन्धों में भ्रांति अस्तित्ववान है, सचमुच यथार्थ है। उदाहरण के लिये, यदि इस भाँति के प्रभाव के अन्तर्गत यह सोचता है कि एक दूसरा व्यक्ति उसका जीवन समाप्त करने का प्रयास कर रहा है और वह उस व्यक्ति को मार डालता है और वह ऐसा आत्म सुरक्षा हेतु करता है तो वह दण्ड से उन्मुक्त होगा। यदि उसका भ्रम यह था कि मृतक ने उसके चरित्र तथा उसकी सम्पदा पर घातक प्रहार किया और उसने मृतक को इसके प्रतिशोध में मार डाला तो वह दण्डित किया जायेगा। (5) एक चिकित्सक, जो कि चित्तविकृतता के रोग का ज्ञाता है और जिसने अभियुक्त को विचारण के पूर्व कभी नहीं देखा था किन्तु जो अभियुक्त के सम्पूर्ण विचारण तथा परीक्षण के दौरान विद्यमान था, से उसकी राय अभियुक्त की मस्तिष्कीय परिस्थिति के बारे में जो अपराध कारित करते समय विद्यमान थी, नहीं मांगी जा सकती या उसकी राय कि क्या अभियुक्त उस तथ्य से भिज्ञ था कि जो वह कर रहा है विधि के विरुद्ध है या यह कि वह उस समय किसी विभ्रांति से पीड़ित था क्योंकि इन प्रश्नों में आरोपित तथ्यों के सत्य का विनिश्चयन सम्मिलित है और जिसका विनिश्चयन केवल जूरी द्वारा सिद्ध किया जा सकता है तथा ये प्रश्न मात्र विज्ञान के प्रश्न नहीं हैं, किन्तु जहाँ तथ्यों को स्वकार कर लिया जाता है या उनका खण्डन नहीं किया। जाता और प्रश्न सारवान रूप से केवल विज्ञान का प्रश्न बन जाता है वहाँ लाभप्रद होगा कि प्रश्न को उसी सामान्य रूप से रखा जाये यद्यपि उस पर साधिकार बल नहीं दिया जा सकता। हुदा के अनुसार ये उत्तर यद्यपि न्यायिक निर्णय के समतुल्य नहीं हैं फिर भी चित्तविकृतता से सम्बन्धित विधि की महत्वपूर्ण व्याख्या है।22 न्यायाधीशों द्वारा दिये गये उत्तरों से निम्नलिखित प्रतिपादनायें निकाली जा सकती हैं (1) प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थचित्त का तथा कारित अपराध के लिये उत्तरदायी होने हेतु पर्याप्त क्षमता के युक्त समझा जाये जब तक कि इसके विपरीत जूरी या न्यायालय की संतुष्टि तक न सिद्ध हो जाये। (2) चित्तविकृतता के आधार पर बचाव सिद्ध करने के लिये यह स्पष्टत: दर्शाया जाना चाहिये कि अपराध कारित करते समय अभियुक्त मस्तिष्कीय रोग के कारण विवेक शक्ति के ऐसे दोष से पीड़ित था कि वह कार्य की प्रकृति तथा उसके गुणों को नहीं जानता था या वह यह नहीं जानता था कि जो कुछ वह कर रहा है, दोषपूर्ण है। (3) यदि अभियुक्त इस तथ्य से भिज्ञ था कि कार्य ऐसा है जिसे उसे नहीं करना चाहिये और यदि कार्य उसी समय विधिविरुद्ध भी था तो वह दण्डनीय होगा। (4) एक चिकित्सक जिसने कि अभियुक्त को विचारण के पूर्व कभी नहीं देखा था उससे उसकी राय नहीं पूछी जानी चाहिये कि क्या साक्ष्यों के आधार पर वह ऐसा सोचता है कि अभियुक्त विकृतचित्त का था। (5) जहाँ एक व्यक्ति किसी आपराधिक कार्य को उपस्थित तथ्यों की भ्रांति के अन्तर्गत कारित करता है, जो उसके द्वारा किये जा रहे कार्य की वास्तविक प्रकृति को उससे छुपा लेते हैं तो उसके दायित्व की मात्रा वही होगी जैसाकि तथ्यों के आधार पर हुई होती जैसा कि उसकी कल्पना के अनुसार उन्हें होना चाहिये। भारतीय विधि— चित्तविकृतता या पागलपन से सम्बन्धित भारतीय विधि भारतीय दण्ड संहिता की। धारा 8 में दी गई है जो उपरोक्त प्रथम दो अवधारणाओं पर आधारित है जिन्हें प्रश्न नं० 2 तथा 3 के उत्तरों से लिया गया है। यह धारा आरोपित मस्तिष्कीय अस्वस्थता के मामलों में उत्तरदायित्व का परीक्षण प्रतिपादित करती है। अवयव- धारा 84 के निम्नलिखित अवयव हैं(1) कार्य एक अस्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिये।
  1. एस० हुदा, दी० प्रिन्सिपल्स आफ दी लॉ आफ क्राइम्स इन ब्रिटिश इण्डिया, पृ० 286.
(2) ऐसा व्यक्ति (क) कार्य की प्रकृति, या (ख) यह कि कार्य विधिविरुद्ध था, या (ग) यह कि कार्य-दोष पूर्ण था, समझने में निश्चयत: असमर्थ हो। (3) ऐसी अक्षमता अपराधी के अस्वस्थ मस्तिष्क के कारण होनी चाहिये। | (4) अवयव नं० 2 में वर्णित प्रकृति की अक्षमता उस कार्य को करते समय अस्तित्ववान हो जो अपराध गठित करता है। एक व्यक्ति जो मस्तिष्कीय रोग के कारण अपने कार्य को नियन्त्रित करने से वंचित हो चुका है और मस्तिष्कीय रोग द्वारा एक व्यक्ति जो आशयित कार्य के नैतिक चरित्र पर उपयुक्त निर्णय लेने की शक्ति से रहित हो चुका है, धारा 84 का लाभ प्राप्त करने का हकदार है।23। यदि अभियुक्त यह मानता था कि उसके द्वारा किया जाने वाला कार्य अनुचित था, तब उसको अभिरक्षित नहीं किया जा सकता, भले ही वह न जानता रहा हो कि यह कार्य विधि-विरुद्ध है अथवा नहीं। अपराध करते समय उसकी चित्त विकृत्ति का अस्तित्ववान् होना आवश्यक है, और मस्तिष्क की विकृति को सिद्ध करने का दायित्व अभियुक्त के ऊपर है।24 सुरजू मारन्डे बनाम बिहार राज्य25 के मामले में यह मत व्यक्त किया गया कि सभी सन्देहों से परे यह सिद्ध करने का आभार अभियुक्त पर नहीं होता है कि वह विकृतचित्त व्यक्ति था और इस विकृतचित्तता के कारण वह कार्य की प्रकृति समझने में अक्षम था। विधि की यह उपधारणा है कि विवेक वय प्राप्त सभी व्यक्ति स्वस्थचित्त के हैं जब तक कि इसके विपरीत सिद्ध नहीं कर दिया जाता है। जहाँ किसी अस्वस्थचित्त व्यक्ति के स्वस्थ अन्तराल रहते हैं वहाँ विधि की यह उपधारणा है कि अपराध इसी अन्तराल में कारित किया गया है जब तक कि यह सिद्ध नहीं कर दिया जाता है कि अपराध चित्तविकृतता के समय किया गया है। छगन बनाम राज्य26 के मामले में यह मत व्यक्त किया गया कि केवल अपराध की प्रकृति से व्युत्पन्न तर्क के आधार पर विकृतचित्त के बचाव को मान्यता देना अत्यन्त खतरनाक होगा। अपराध करने के पूर्व अभियुक्त का विलक्षण या अस्वस्थ व्यवहार यह सिद्ध नहीं करता है कि अभियुक्त विकृत मस्तिष्क (NonCompos mentis) है। श्रीकान्त आनन्द राव भोसले बनाम महाराष्ट्र राज्य27 वाले मामले में अपीलार्थी पुलिस का सिपाही था। उसका सुरेखा के साथ 1987 में विवाह हुआ। घटना की तारीख को वे अपनी पुत्री के साथ पुलिस के आवास में रह रहे थे। दिनांक 24 अप्रैल, 1994 को पति-पत्नी के बीच झगड़ा हुआ। सुरेखा जब स्नानघर में कपड़े धो रही थी, उस समय पति ने बट्टे से उसके सिर पर प्रहार किया। अपीलार्थी को तत्काल क्वार्टर गार्ड में ले जाया गया, सुरेखा को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसे मृत पाया गया। सामान्य अन्वेषण के पश्चात् । अपीलार्थी पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप लगाया गया। अपीलार्थी की प्रतिरक्षा में अपराध कारित करते। समय विक्षिप्तता (Unsoundness) का अभिवचन किया गया। अपीलार्थी की यह खानदानी बीमारी थी, क्योंकि उसका पिता भी मनोरोग से ग्रस्त था। बीमारी के कारण का पता नहीं चल सका। आनुवंशिक की। अहम भूमिका होती है। अभियुक्त का विक्षिप्तता के लिये 1992 से उपचार चल रहा था और उसकी बीमारी पैरानाइड साइजोफ्रेनिया के रूप में निरूपित (Diagnose) की गई। दिनांक 27 जून, 1994 से 5 दिसम्बर,
  1. हकीक शाहद्द, (1887) पी० आर० नं० 42 (1887).
  2. गेरों अली, (1940) 2 कल० 329.
  3. 1977 क्रि० लॉ ज० 1765.
  4. 1976 क्रि० लॉ ज० 671.
  5. 2002 ड्रिा० लॉ ज० 4356 (सु० को०).
1994 के छोटे से अंतराल में उसे इलाज के लिये 25 बार अस्पताल ले जाया गया। अभियुक्त का मानसिक रोग “) निरन्तर उपचार चल रहा था। पत्नी की हत्या का हेतु (मोटिव) बहुत कमजोर था कि उसने पुलिस की नौकरी त्याग पत्र देने का विरोध किया था। दिन दहाड़े पत्नी की हत्या करने के बाद उसने छुपने या भागने का प्रयास नहीं किया। अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य के प्रकाश में तथ्यों और परिस्थितियों पर समग्र रूप से विचार करने के त यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त पैरानाइड साइजोफ्रेनिया रोग से ग्रस्त था। घटना से पूर्व और पश्चात् चित्तविकृति सुसंगत तथ्य है। मामले की परिस्थितियों से युक्तियुक्त रूप से यह आशय निकाला जा सकता है कि सुसंगत समय पर अभियुक्त विभ्रम की स्थिति में था। उस समय उस पर रोग हावी हो गया। था। अभियोजन द्वारा नाराजगी की बात का जो आधार लिया गया है, साइजोफ्रेनिया के आक्रमण के समय उससे इन्कार नहीं किया जा सकता। अभियुक्त पर जिस प्रकार का भार था, उस संबंध में यह कहा जा सकता है कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 105 द्वारा यथा ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिसमें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 84 का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इन परिस्थितियों में यह नहीं कहा जा सकता कि अपराध अत्यधिक क्रोध के दौरे के परिणामस्वरूप किया गया था। एक युक्तियुक्त सन्देह यह किया जा सकता है कि अपराध कारित करते समय अभियुक्त विक्षिप्तता के कारण किये जा रहे कृत्य की प्रकृति को समझने में विफल था. अतः वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 84 का लाभ पाने का हकदार है, अत: अभियुक्त अपराध के लिये दायी नहीं है। विधिक पागलपन (Legal Insanity)–एस तुबा चेतिया बनाम असम राज्य28 के मामले में यह मत व्यक्त किया गया कि विधिक पागलपन स्थापित करने हेतु यह सिद्ध करना आवश्यक है कि सम्बन्धित व्यक्ति की ज्ञानात्मक क्षमतायें ऐसी हैं कि वह नहीं जानता है कि उसने क्या किया है अथवा उसके कार्य का परिणाम क्या होगा। इन रे वाला गोपाल29 के मामले में अभियुक्त अपनी पत्नी के साथ बड़े मेजजोल से रह रहा था और उसके साथ मित्रवत् व्यवहार करता था। उसने एक चाकू से घोप कर अपनी पत्नी और पुत्र की हत्या कर दी। हत्या के पीछे किसी हेतु का पता नहीं चला। डाक्टरी सलाह भी इस निश्चित आशय की थी कि अभियुक्त कार्य की प्रकृति को समझने की स्थिति में नहीं था। इस कारण विकृत चित्त का तर्क उसके बचाव हेतु मान लिया गया। फूला बाई बनाम महाराष्ट्र राज्य30 के मामले में भी अपराधी को विकृतचित्त का बचाव मान्य किया गया क्योंकि वह पुरानी और असाध्य बीमारी से पीड़ित था। इस मामले में अभियुक्त आत्महत्या के प्रयास में अपने बच्चे के साथ एक कुयें में कूद गयी, जिसमें बच्चे की मृत्यु हो गयी। अपराधी के बचाव में विकृतचित्त होने का तर्क प्रस्तुत किया गया। परन्तु डाक्टरी साक्ष्य इस आशय का नहीं था। विकृतचित्त का तर्क इस कारण स्वीकार किया गया कि डाक्टरी साक्ष्य का अभाव सामान्य ज्ञान के अपवर्जन को उचित नहीं ठहराता है। सुधीर चन्द विश्वास बनाम राज्य31 के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त की उत्केन्द्रता (eccentricity) या सनक अथवा व्यवहार की विचित्रता से उन्मुक्ति केवल विधिक पागलपन ही प्रदान करता है। विधिक पागलपन गठित करने हेतु यह आवश्यक है कि मस्तिष्क की विकृति ऐसी हो जिससे अपराधी कार्य की प्रकृति जानने में अथवा यह जानने में कि वह विधि विरुद्ध कार्य कर रहा है, असमर्थ हो। ठीक ऐसी मन:स्थिति अपराध कारित करते समय होनी चाहिये, न तो उसके पहले और न उसके बाद । यही स्थिति यह निर्धारण करने में तात्विक है कि अभियुक्त विकृत मस्तिष्क का था अथवा नहीं। पागलपन अपराध कारित करते समय अस्तित्व में होना चाहिये। सोमेश्वर बोरा बनाम असम राज्य32 के वाद में अभियुक्त ने हत्या करने के बाद तुरन्त हत्या करने का स्थान छोड़ दिया और घटना के दूसरे दिन दी गयी अपनी संस्वीकृति में उसने जो कुछ किया था वह उसे
  1. 1976 क्रि० लॉ ज० 1416.
  2. 1976 क्रि० लाँ ज० 1978.
  3. 1976 क्रि० लॉ ज० 1519.
  4. 1987 क्रि० लॉ ज० 863 (कलकत्ता).
  5. 1981 क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 51 (गौहाटी).
भलीभांति याद था | यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त भारतीय दण्ड संहिता की धारा 84 के अधीन बचाव पाने का अधिकारी नहीं था क्योंकि यह नहीं कहा जा सकता कि वह कार्य की था अथवा यह नहीं जानता था कि वह जो कुछ भी करने जा रहा है वह दोषपूर्ण कार्य है। यह तय की उसकी कुछ असामान्य स्थिति थी अथवा मानसिक अंसतुलन था अर्थहीन है। यह भी धारा 84 के अधीन बचाव पाने के लिये अभियुक्त की ओर से विधिक पागलपन का अस्तित्व में होना सिट किया जाना आवश्यक है। नियम यह है कि पागलपन या चित्तविकृति के आधार पर बचाव पाने के लिये यह सिद्ध किया जाना आवश्यक है कि कार्य कारित करते समय अभियुक्त मानसिक बीमारी के कारण ऐसी तर्क शक्ति के अभाव से ग्रसित था कि वह किये गये कार्य की प्रकृति और गुण को नहीं जानता था अथवा यदि वह यह जानता था तो यह नहीं जानता था कि वह जो भी कर रहा है वह दोषपूर्ण (Wrong) है।23। चिकित्सीय चित्त विकृति और विधिक चित्त विकृति में अन्तर-चिकित्सीय चित्त विकृति और विधिक चित्त विकृति में अन्तर है। चिकित्सीय पागलपन (Insanity) पूर्णरूपेण डाक्टरी आधार पर निर्भर करता है जबकि विधिक पागलपन ऐसे तथ्यों पर आधारित होता है जिनका न्यायालय के समक्ष सिद्ध किया । जाना आवश्यक है ताकि अभियुक्त को आरोप से दोषमुक्त किया जा सके। दूसरे शब्दों में विधिक पागलपन आपराधिक दायित्व से बचाव का अच्छा आधार प्रदान करती है जबकि चिकित्सीय पागलपन स्वयमेव ऐसा आधार नहीं होता है। विधिक पागलपन सिद्ध करने हेतु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 84 के अधीन आवश्यक तत्वों का सिद्ध किया जाना आवश्यक होता है। यदि यह सिद्ध करने हेतु कि कोई व्यक्ति पागलपन से ग्रसित है, यथेष्ट चिकित्सीय आधार हैं तो इसे चिकित्सीय पागलपन कहते हैं। दूसरे शब्दों में चिकित्सीय चित्त विकृति (पागलपन) का अस्तित्व चिकित्सीय साक्ष्य के आधार पर सिद्ध किया जाता है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 84 के प्रयोजनों हेतु विधिक चित्तविकृति (पागलपन) से तात्पर्य यह है कि बचाव पक्ष यह सिद्ध करे कि वह अपराध जिसे कारित करने का अभियुक्त पर आरोप है, उसे कारित करते समय चित्तविकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति को नहीं जानता था अथवा यह नहीं जानता था कि जो कुछ कर रहा है। वह या तो गलत अथवा विधिविरुद्ध था। अभियुक्त की अक्षमता मस्तिष्क की किसी बीमारी के कारण होना चाहिये और उसे अपराध कारित किये जाते समय अस्तित्व में होना चाहिये। डाक्टरी रूप से कोई व्यक्ति स्वस्थ चित्त अथवा विकृत्त चित्त जैसा भी हो, प्रमाणित किया जा सकता है परन्तु विधिक दृष्टि से वह चित्तविकृत तभी कहा जायेगा जब वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 84 के अधीन आवश्यक तत्वों के अस्तित्व को सफलतापूर्वक सिद्ध कर देता है जिसके फलस्वरूप वह आरोप से मुक्ति पाने का अधिकारी होगा। यदि इसे सिद्ध करने में वह असफल रहता है तो विधि उसे अपराध कारित करते समय स्वस्थचित्त होने की उपधारणा करती है भले ही वह उस समय चिकित्सीय आधार पर विकृतचित्त (पागल) रहा हो। विकृत मस्तिष्क वाले व्यक्ति- विकृत मस्तिष्क वाले व्यक्ति (non-compos mentis) 4 प्रकार के बताये गये हैं-(1) जड़ (idiot), (2) विक्षिप्त अथवा पागल (lunatic or mad man); (3) बीमारी द्वारा विकृत मस्तिष्क वाला व्यक्ति (one made non-compos by illness), (4) मदिरापान किये हुये व्यक्ति (one who is drunk)।। जड (Idiot)–एक व्यक्ति जो जन्म से ही चिरस्थायी जीर्णता के कारण बिना किसी स्पष्ट अन्तराल के विक्षिप्त स्मृति वाला हो, वह जड़ कहा जाता है। ऐसा व्यक्ति भी जो 20 तक की गिनती गिनना अथवा सप्ताह के दिनों को बताना, अथवा अपने माता-पिता आदि के विषय में न जानता हो, जड कहा जाता है।4। विक्षिप्त (Lunatic)—वह व्यक्ति जो समय-समय पर मानसिक असन्तुलन से आक्रान्त रहता है और फिर स्वस्थ्य हो जाता है, विक्षिप्त कहलाता है।35 किन्तु पागलपन चिरस्थायी होता है। विक्षिप्त अथवा पागलपन उपार्जित पागलपन है तथा मूढ़ता (idiocy) स्वाभाविक या प्राकृतिक पागलपन है।
  1. उपरोक्त।
  2. आर्चबाल्ड, 35वाँ संस्करण, पृ० 31-32.
  3. रसेल, 12वाँ संस्करण, वाल्यूम 1, पृ॰ 103-1 हेल पी० सी० 31.
बीमारी द्वारा विकृत-मस्तिष्क वाला व्यक्ति (non-Compos mentis)-बीमारी द्वारा विकृतमस्तिष्क वाला व्यक्ति उन कृत्यों के प्रकरणों से आपराधिक दायित्व से उन्मुक्त होता है जो उसने अपने मानसिक असन्तुलन से प्रभावित होकर किये हैं।36 | | मस्तिष्क रोग (Disease of mind)-अभियुक्त को सर्वप्रथम यह दिखाना चाहिये कि जब उसने निषिद्ध कृत्य को किया तब वह मस्तिष्क रोग से पीड़ित था। मदिरापन से उत्तेजित मनोरोग के कारण आत्मसंयम न रख सकने की कठिनता का कारण देना ही केवल पर्याप्त नहीं है।37 किसी भी प्रकार का मानसिक असंतुलन जो स्वयं को हिंसा में प्रकट करता है और इस तरह प्रकट होने की जिसकी प्रवृत्ति है, मस्तिष्क रोग कहलाता है।38 परन्तु यह प्रश्न कि रोग मैक्नाटेन (Mc Naghten) के नियमों के अन्तर्गत ‘मस्तिष्क रोग” है अथवा नहीं न्यायाधीश और जूरी द्वारा निर्णीत होगा।39 द्वितीयत: अभियुक्त यह भी सिद्ध करे कि वह मस्तिष्क रोग के कारण तर्क शक्ति के विकार से पीड़ित था। यह विकार क्षणिक मानसिक हलचल ही न हो, अपितु इसमें विवेक शक्ति का पूर्ण लोप होना चाहिये।40 मस्तिष्क रोग द्वारा अभियुक्त की तर्कनाशक्ति इस हद तक प्रभावित हो कि उसे चिकित्सीय उद्देश्यों के लिये विक्षिप्त प्रमाणित किया जाय। तृतीयत: इस प्रकार व्युत्पन्न तर्क विकृति विधिक उत्तरदायित्वों को प्रभावित करें41 अर्थात् यह उस। व्यक्ति के कार्य तथा उसकी वैधता को समझने की क्षमता को प्रभावित करे। दूसरे शब्दों में, यह उसकी कार्य की प्रकृति को समझने तथा उचित एवं अनुचित के मध्य भेद करने की क्षमता को प्रभावित करे। चतुर्थत: मस्तिष्क रोग से उत्पन्न तर्क विचार अपराध करते समय अस्तित्ववान् हो। । अभियुक्त का डाक्टरी ( मेडिकल ) परीक्षण-महाराष्ट्र राज्य बनाम महतरबा शिन्दे41के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि यदि अभियुक्त द्वारा उन्मत्तता का तर्क दिया जाता है तो अभियोजन का यह कर्तव्य है कि अभियुक्त का डाक्टरी परीक्षण तत्काल कराये। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि अन्वेषण के दौरान यह पाया जाता है कि अभियुक्त किसी मानसिक रोग से पीड़ित था तो अभियोजन का यह और कर्तव बनता है कि वह न्यायालय के समक्ष वह साक्ष्य प्रस्तुत करे जिसके आधार पर यह स्पष्ट हो सके कि जब उसने आरोपित अपराध कारित किया उस समय उसकी मस्तिष्कीय दशा ठीक थी। यह मानसिक बीमारी या उन्मत्तता के तर्क को काटने के लिए जो विचारण के दौरान उठाया जा सकता है, आवश्यक है। ऐसा करने में अभियोजन की असफलता हत्या के मामले में अभियोजन के मामले में गम्भीर त्रुटि पैदा करती है। अभियोजन द्वारा ऐसा करने में असफलता के कारण अभियुक्त संदेह का लाभ पाने का अधिकारी होता है। । मस्तिष्क की अस्वस्थता-मस्तिष्क की अस्वस्थता’ शब्द को संहिता में परिभाषित नहीं किया गया है। स्टीफेन के अनुसार यह पागलपन के समतुल्य है। पागलपन मस्तिष्क की वह अवस्था है जिसमें अनुभूति, ज्ञान, सम्वेदना तथा इच्छा आदि की एक या अनेक क्रियायें असामान्य ढंग से सम्पादित होती हैं अथवा स्नायु तंत्र (Nervous System) या किसी मस्तिष्क रोग के कारण बिल्कुल ही नहीं सम्पादित होती है।42 पागलपन के अन्तर्गत विक्षिप्तता, मानसिक असंतुलन, मानसिक विप्लव तथा उन्माद आदि विकार आते हैं। धारा 84 के अन्तर्गत चिकित्सीय विज्ञान को ज्ञात सभी प्रकार के पागलपन नहीं आते हैं, अपितु वे ही पागलपन आते हैं जिनके द्वारा व्यक्ति अपने द्वारा किये जाने वाले कृत्यों की प्रकृति को समझने की क्षमता नहीं रखता है, और यदि वह इसे समझता भी है, तो वह नहीं जानता कि उसका कृत्य अनुचित अथवा विधिविरुद्ध है या नहीं। इस धारा में पदावली, मस्तिष्कीय अस्वस्थता इतनी विस्तृत है कि इसके अन्तर्गत सभी प्रकार की क्षमताओं का प्रभाव सम्मिलित है चाहे वे क्षणिक हों या चिरस्थायी, प्राकृतिक हों अथवा उपार्जित, चाहे वे
  1. 1 हेल पी० सी० 30.
  2. ए० जी० फार नार्दर्न आयरलैण्ड बनाम गल्लाधर, (1963) ए० सी० 349.
  3. ब्रेट्टी बनाम ए० जी० फार नार्दर्न आयरलैण्ड, (1963) ए० सी० 386.
  4. कैम्प (1957) 1 399.
  5. क्लार्क (1972) 1 आल० ई० रि० 219.
  6. रिबेट (1950) 34 क्रि० अपील रि० 87. 41क. (2010) II क्रि० ला ज० 3586 (बम्बई).
  7. स्टीफेन, हिस्ट्री आफ क्रिमिनल लॉ, भाग, II, पृ० 130.
किसी रोग से उत्पन्न हों या जन्मजात हों। पागलपन की अनेक अवस्थायें हैं। क्षम्य होने के लिये पागलपन का उस अवस्था तक पहुँचना आवश्यक है जिसका वर्णन धारा 84 के अन्तिम भाग में किया गया है। यदि कोई व्यक्ति अस्वस्थ मस्तिष्क का पाया जाता है तो एक अपराध के लिये उसका दायित्व पागलपन के साधारण नियमों के परिप्रेक्ष्य में निर्धारित किया जायेगा। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि पागलपन किसी मस्तिष्कीय रोग से व्युत्पन्न है अथवा दवा एवं शराब के निरन्तर प्रयोग से 43 | दण्ड संहिता में ‘‘मस्तिष्कीय अस्वस्थता’ पदावली का प्रयोग हुआ है न कि पागलपन “मस्तिष्कीय अस्वस्थता’ जैसी विस्तृत पदावली के प्रयोग से यह लाभ हुआ कि पागलपन को परिभाषित करने की आवश्यकता समाप्त हो गई। मात्र मस्तिष्कीय अस्वस्थता ही बचाव नहीं है, अपितु इसे ऐसा होना चाहिये जिसके द्वारा व्यक्ति का निर्णय या विवेक प्रभावित हो या दूसरे शब्दों में इसके द्वारा व्यक्ति अपने कृत्यों की प्रकृति को या उसका कृत्य अनुचित एवं विधिविरुद्ध है अथवा नहीं, इसे समझने में असमर्थ हो। । सिद्धपाल कमला यादव बनाम महाराष्ट्र राज्य44 के बाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि यदि हत्या के मामले में अभियुक्त के द्वारा अपने बचाव में उन्मत्तता या पागलपन का दावा किया जाता है तो ऐसे पागलपन या उन्मत्तता को सिद्ध करने का भार अभियुक्त पर होता है। परन्तु जहां अन्वेषण के दौरान पूर्व में उन्मत्तता के इतिहास का पता लगता है तो एक ईमानदार अन्वेषक का यह कर्तव्य बनता है कि वह अभियुक्त का चिकित्सीय परीक्षण कराये और उस साक्ष्य को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे और यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो इससे अभियोजन के मामले में एक गम्भीर त्रुटि पैदा हो जाती है और ऐसे सन्देह का लाभ अभियुक्त को दिया जाना चाहिये। इस उत्तरदायित्व का निर्वाह अपराध कारित होने के थोड़ा पहले अभियुक्त के इस आशय के आचरण का और अपराध के समय या उससे ठीक बाद में उसका आचरण और उसकी मानसिक स्थिति के बारे में साक्ष्य और अन्य महत्वपूर्ण कारकों का साक्ष्य प्रस्तुत कर किया जाना चाहिये। यह सिद्ध करने का भार उतना दुर्भर नहीं है जितना कि अभियोजन का यह सिद्ध करने का है कि अभियुक्त ने उस कार्य को किया है जिसे करने का उस पर आरोप है। अभियुक्त पर आभार उससे अधिक नहीं है जितना कि वादी या प्रतिवादी का एक सिविल प्रक्रिया संहिता में होता है। मदिरापान द्वारा व्युत्पन्न पागलपन-मदिरापान क्षम्य नहीं है, किन्तु मदिरापान से व्युत्पन्न मदहोशी जो इस अवस्था तक उन्माद उत्पन्न करे कि व्यक्ति उचित एवं अनुचित के मध्य भेद करने में असमर्थ हो जाय, आपराधिक दायित्व का एक आधार है।45 अभ्यासजनित मदिरापान से उत्पन्न पागलपन, चाहे वह स्थायी हो अथवा विच्छिन्न वह किसी भी अन्य कारण से उत्पन्न पागलपन के समतुल्य है तथा कृत्य दायित्व से मुक्त है।46 कार्य करने के समयअपराध को निर्मित करने वाले कार्य को करते समय पागलपन के अस्तित्व को सिद्ध करना आवश्यक है।+7 विचारण के समय पागलपन का अभिवचन अभियुक्त की किसी भी प्रकार सहायता नहीं करेगा।+8 यदि अपराध कारित करते समय कोई व्यक्ति इस प्रकार के तर्क विकार से पीडित पाया जाता है कि वह अपने द्वारा किये गये कार्य की प्रकृति को नहीं समझता था और यदि वह जानता था, तो । यह नहीं जानता था कि उसका कृत्य अनुचित या विधि विरुद्ध था तो ऐसे व्यक्ति पर यह धारा प्रवर्तित होगी। इस निष्कर्ष पर पहुँचते समय उपयुक्त परिस्थितियों जैसे अपराध कारित करने के पूर्व तथा कारित करने के पश्चात् अभियुक्त के व्यवहार आदि को भी ध्यान में रखना चाहिये 49 । एस० के० नायर बनाम पंजाब राज्य-0 के वाद में अपीलांट एम० के नायर के ऊपर नायक बी० चौधरी की हत्या करने तथा खुकरी (नेपाली कटार) से हवलदार काश्यप तथा ड्राइवर जोगा सिंह को चोट
  1. हरका, (1906) 26 ए० डब्ल्यू ० एन० 193.
  2. (2009) 1 क्रि० लॉ ज० 373 (सु० को०).
  3. डेविस (1881) 14 काक्स 563.
  4. भेलेका अहम (1902) 29 कल० 493.
  5. गुणाधर मण्डल बनाम राज्य 1979 क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 178.
  6. नोटा राम (1866) पी० आर० नं० 56 (1866).
  7. जी० एस० पदयाची (1952) मद्रास 479; अहमदुल्ला, (1961) 3 एस० सी० आर० 583; दहयाभाई, ए० आई० आर० । 1964 सु० को० 1563; एस० डब्ल्यू० महिम्मद बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1972 क्रि० लाँ ज० 1523.
  8. 1997 क्रि० लॉ ज० 772 (एस० सी०).
कारित करने का आरोप था। अभियुक्त एस० के० नायर, मृतक बी० चौधरी और चोटहिल हवलदार कास्यप एक ही बैरक में निवास कर रहे थे। मृतक छुट्टी पर जाने वाला था और ड्राइवर जोगा सिंह को उसे अम्बाला रेलवे स्टेशन पर छोड़ने के लिये ड्यूटी पर लगाया गया था। मृतक ने हवलदार काश्यप से रात्रि में उसे सोते से जगा देने को कहा था। जब काश्यप मृतक को जानने के लिये आया तो उसने देखा कि अभियुक्त खुकरी लेकर मृतक की चारपाई पर बैठा है। अभियुक्त ने काश्यप के सर पर दो बार प्रहार किया और तब उसने शोर मचाया और मृतक बी० चौधरी तथा सुरेश कुमार सोते से जग गये और देखा कि अभियुक्त काश्यप पर प्रहार कर रहा हैं। काश्यप किसी तरह खिड़की के रास्ते बैरक के बाहर जाने में सफल हो गये। चौधरी ने अभियुक्त को पकड़ लिया और कहा कि उसे अधिकारियों के समक्ष पेश किया जायेगा। इसके उत्तर में अभियुक्त ने कहा कि वह तभी अफसरों के सामने पेश किया जायेगा जब चौधरी तब तक जीवित बचेंगे और तत्पश्चात् मृतक पर एक कटार (dagger) से हमला कर 19 चोटें पहुंचाई जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई। इसी बीच ड्राइवर जोगा सिंह भी आया गया था और जब उसने अभियुक्त को रोकना चाहा तो उस पर भी हमला किया गया और खुकरी से एक आघात उसे भी लगा। घटना की सूचना पाने पर जब सुरक्षा अधिकारी घटनास्थल पर डाक्टर के साथ पहुँचा तो उन्होंने भी देखा कि अभियुक्त हाथ में खुकरी लिये खड़ा है। अभियुक्त ने सुरक्षा अधिकारी को आत्मसमर्पण कर दिया और खुकरी भी दे दिया। अभियुक्त की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि वह संविभ्रम (Paranoid) नामक रोग से ग्रस्त था अतएव यह उपधारणा की जानी चाहिये कि उसने मनोविकार के भावनात्मक दौरे (fits) से एकाएक प्रभावित होने के कारण अपराध कारित किया है और इस मनोभाव (passion) के कारण वह अपने कार्य का परिणाम समझ सकने में असमर्थ था। यह अभिनिर्धारित किया गया कि यदि यह मान भी लिया जाय तो भी संविभ्रम (Paranoid) के रोगियों के मामले में स्वस्थ अन्तराल का परीक्षण जो विकृतचित्त वाले अन्य रोगियों पर लागू होता है, उसे लागू नहीं किया जाना चाहिये और यदि संविभ्रम (Paranoid) के कारण कोई व्यक्ति एकाएक भावनात्मक दौरों (fits) के बाउट पारी (bouts) से ऐसा प्रभावित हो जाता है जिससे कि वह अस्थायी तौर पर अपने कार्यों के परिणामों को समझने में पूर्णतया असमर्थ हो जाता है और दौरे (fits) के ऐसे बाउट बहुत थोड़े समय में समाप्त हो जाते हैं तब भी वर्तमान मामले में उपलब्ध साक्ष्य से यह प्रकट हो रहा है कि उक्त अपराधों को कारित करते समय अपीलांट ने अपनी समझबूझ का होश (sense) एक पूर्णतया नहीं खो दिया था। अभियुक्त द्वारा बोले गये शब्द और उसके कार्य यह पूर्णतया दर्शाते हैं कि हत्या कारित करते समय वह अपने आशयित कार्यों की व्याख्या तर्कपूर्ण ढंग से कर सकता था। अतएव अभियुक्त अपने कार्यों के निहितार्थ (implications) को समझने में असमर्थ नहीं था। इसलिये उसे मृतक की हत्या तथा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 के अधीन अन्य लोगों को उपहति कारित करने के लिये दोषी पाया गया।51 कृत्य की प्रकृति को समझने में असमर्थ- मैक्नाटेन का सिद्धान्त प्रतिपादित करता है कि यदि अभियुक्त इस तथ्य के प्रति सचेत था कि उसने वह कार्य किया है जो उसे नहीं करना चाहिये था और साथ ही यदि कृत्य विधिविरुद्ध था तब वह व्यक्ति दण्डनीय है। एक व्यक्ति तब कृत्य की प्रकृति से अनभिज्ञ कहा जायेगा जब वह प्रयोग में लाये जानेवाले बाह्य माध्यमों के गुणों तथा क्रियाकलापों से अनभिज्ञ है।52 जहाँ एक व्यक्ति का मस्तिष्क अथवा तर्क शक्ति इतनी सुस्पष्ट है कि वह अपने कृत्य को समझ सके तब यह मानना चाहिये कि वह अपने कृत्य के परिणामों से अवगत था।23 इस धारा के अन्तर्गत बचाव के लिये यह आवश्यक है कि अभियुक्त अपने कार्य की प्रकृति को समझने में असमर्थ हो। भारतीय दण्ड संहिता में मैक्नाटेन सिद्धान्त में प्रयुक्त कृत्य की प्रकृति एवं गुण पदावली के बजाय ‘‘कृत्य की प्रकृति” पदावली का प्रयोग हुआ है। यदि एक व्यक्ति अपने कृत्य के परिणामों को जानता है तब वह कृत्य के गुण से अनभिज्ञ नहीं। है किन्तु वह उन सामान्य सिद्धान्तों को समझने में असमर्थ है जो कार्य की प्रकृति को आश्चर्यजनक तथा घृणित बनाते हैं।54 ‘‘कार्य का स्वरूप” पदावली इसके नैतिक पक्ष को इंगित नहीं करती अपितु कार्य के
  1. 1997 क्रि० लाँ ज० 772 (एस० सी०).
  2. मैन, क्रिमिनल लॉ, चौथा संस्करण, भाग 2, पृ० 173, जसवन्त राय बाजी राव, ए० आई० आर० 1949 नागपुर 66 में उल्लिखित ।
  3. मनीराम, (1929) 8 लाहौर 114.
  4. मेन, क्रिमिनल लॉ, चौथा संस्करण, भाग 2 पृ० 173.
व्यावहारिक चरित्र से सम्बद्ध है। भारतीय दण्ड संहिता में कार्य का स्वरूप पदावली नहीं प्रयुक्त है। दण्ड संहिता के अन्तर्गत यह आवश्यक है कि अभियुक्त यह समझने में असमर्थ हो कि जो वह कर रहा है वह अनुचित एवं विधिविरुद्ध है। यहाँ पर ”अनुचित शब्द” का तात्पर्य व्यावहारिक अनौचित्य से है न कि नैतिक अनौचित्य से। इसी प्रकार मैक्नाटेन सिद्धान्त में ”अनुचित” शब्द का तात्पर्य ‘विधि विरुद्ध” कार्य से है न कि लोकमत के अनुसार ”अनुचित कार्य’ से है।55 । विकृतचित्त सिद्ध करना-मीत खादिया बनाम उड़ीसा राज्य के मामले में यह निर्णय दिया। गया कि यदि किसी हत्या के मामले में यह अभिकथित किया जाता है कि अभियुक्त विकृतचित्त का रोगी था तो विकृतचित्त अथवा पागलपन को पूर्ण रूप से सिद्ध किया जाना चाहिये। इसे उस महत्वपूर्ण क्षण में सिद्ध किया जाना चाहिये जिस समय यथार्थतः अपराध कारित किया गया था। विकृतचित्त अथवा पागलपन को सिद्ध करने का दायित्व अभियुक्त पर होता है। यद्यपि अभियुक्त से यह अपेक्षा नहीं रहती कि वह अपने मामले को युक्तियुक्त सन्देह से परे सिद्ध करे। इतना ही पर्याप्त होगा कि सिविल मामलों की तरह उसका मामला भी संभाव्यताओं के आधार पर प्रमाणित हो जाता है। इस तथ्य को अपराध की पूर्ववर्ती तत्कालीन तथा पश्चात्वर्ती परिस्थितियों से सिद्ध किया जा सकता है। विकृतचित्त के बचाव को केवल अपराध की प्रकृति से निष्कासित तर्कों के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रयोजन के प्रमाण के अभाव मात्र से यह नहीं। दर्शाया जा सकता है कि अभियुक्त विकृचित्त का था, यद्यपि इस तथ्य को अन्य के साथ न्यायनिर्णयन हेतु ध्यान में रखा जा सकता है। जहाँ विकृतचित्त को बचाव का आधार बनाया जाता है वहाँ अभिकथित कृत्य के पूर्व, दौरान एवं पश्चात् अभियुक्त के आचरण का पूर्ण परीक्षण होना चाहिये57। अभियुक्त का पागलपन विधिक पागलपन होना चाहिये। चिकित्सा विज्ञान द्वारा मान्य सभी पागलपन विधिक नहीं होते हैं जब तक कि यह सिद्ध न कर दिया जाय कि अभियुक्त कार्य कारित करते समय मानसिक रूप से विक्षिप्त था।58 श्रीराम बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में अभियुक्त ने अपनी तीन शिशु नातिनों को पत्थर तोड़ने वाले एक हैंडिल से मार डाला और उसने न तो उनकी लाशों को छिपाने का प्रयत्न किया और न अपराध से सम्बन्धित साक्ष्य को नष्ट कर कानून के उल्लंघन का ही प्रयास किया। उसने तीनों शिशुओं को मारने की कोई । तैयारी भी नहीं की थी। अपराधी श्रीराम के विरुद्ध हत्या का आरोप लगाये जाने पर उसके पक्ष में यह बचाव प्रस्तुत किया गया कि अपराध कारित करते समय यह विकृतचित्त था। यह निर्णय दिया गया कि इस मामले के तथ्यों से स्पष्ट है कि तीनों शिशुओं की हत्या करते समय अभियुक्त की मन:स्थिति आपराधिक नहीं थी। और उसने पागलपन के दौरे के कारण ही हत्या की है। यदि यह मान भी लिया जाय कि अभियुक्त निश्चयात्मक रूप से यह सिद्ध नहीं कर सका है कि अपराध कारित करते समय वह विकृतचित्त का था तथापि अभियुक्त अथवा अभियोजन पक्ष के द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्य से न्यायालय के मस्तिष्क में आरोपित अपराध के तत्वों के विषय में जिसमें अपराधी की आपराधिक मन:स्थिति भी सम्मिलित है, एक युक्तियुक्त सन्देह उत्पन्न हो सकता है और ऐसी दशा में न्यायालय अभियुक्त के इस अपराध पर दोषमुक्त कर सकता है कि अभियुक्त के अपराध को सभी युक्तियुक्त सन्देहों से परे सिद्ध करने का सामान्य आधार जो अभियोजन पक्ष पर रहता है उसका निर्वहन नहीं किया गया है। अतएव अपीलकर्ता श्रीराम भारतीय दण्ड संहिता की धारा 84 के अन्तर्गत बचाव पाने का अधिकारी है। । दुर्निवार भावना (Irresistible Impulse)-एक कार्य तब तक अपराध नहीं हो सकता है जब तक कि वह स्वैच्छिक न हो। अत: एक स्वस्थचित्त या अस्वस्थचित्त वाला अभिकर्ता अपने द्वारा अपनी इच्छा के विरुद्ध किये गये कार्य के लिये उत्तरदायी नहीं होगा। आपराधिक विधि केवल शारीरिक बाध्यता को स्वीकार करती है न कि नैतिक बाध्यता को। एक स्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति के प्रकरण में यह एक निर्णायक
  1. आर० बनाम विंडल, (1952) 2 क्यू० बी० 826.
  2. (1983) क्रि० लॉ ज० 1385 (उड़ीसा).
  3. प्रकाश बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1985 क्रि० लॉ ज० 196 (बम्बई).
  4. रामचन्द्रन बनाम केरल राज्य, 1986 क्रि० लॉ ज० 1222 (केरल).
  5. 1991 क्रि० लाँ ज० 1631 (बम्बई).
प्रकल्पना है कि वास्तविक शारीरिक बाध्यता की अनुपस्थिति में वह अपनी इच्छानुसार कार्य करने को स्वतन्त्र है। किन्तु यह अवधारणा विक्षिप्त मस्तिष्क वाले व्यक्ति के सन्दर्भ में नहीं लागू होती है। एक विशिष्ट कार्य को करने के मनोवेग को भले ही कर्ता जानता हो कि दोषपूर्ण है, जो मानसिक व्यतिक्रम या ऐसे व्यतिक्रम के कारण हो सकता है जिसने उसकी प्रतिरोध शक्ति को कमजोर बना दिया है जिसकी अपेक्षा एक स्वस्थचित्त वाले व्यक्ति से की जाती है। आपराधिक विधि एक व्यक्ति को केवल उसके दोषों के लिये दण्डित करती है न कि उसके दुर्भाग्य के लिये। अत: यदि मस्तिष्क की ऐसी अवस्था विद्यमान है जिसमें कि कर्ता यह जानता है कि वह क्या कर रहा है और यह भी जानता है कि उसका कार्य दोषपूर्ण है किन्तु वह इस प्रकार रोगग्रस्त है कि अपराध कारित करने से अपने को विरत नहीं रख सकता60 तो यह एक दुर्निवार भावना का मामला होगा। यह सिद्धान्त इसलिये आकर्षित करता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी एक समय ऐसा आता है जब कि वह अपने अच्छे विवेक के विरुद्ध कार्य करने को तत्पर हो जाता है। दुर्निवार भावना को कुछ इंगलिश प्रकरणों में वैध बचाव के लिये स्वीकार किया गया है। अत: दुर्निवार भावना का परीक्षण यह नहीं है कि क्या वह उचित और अनुचित का ज्ञान रखता था या उसे अपने कार्य के परिणामों का ज्ञान था, अपितु यह है कि क्या वह अपने संव्यवहार को समुचित रूप में नियन्त्रित कर सकता था।61 मात्र यह तथ्य कि मनोवेग को नियन्त्रित नहीं किया गया इस बात का प्रतीक नहीं है कि वह दुर्निवार (Irresistible) है। चिकित्सीय विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ मामलों में दुर्निवार मनोवेग स्वयं एक रोग होता है। यह सत्य नहीं है। एक अर्थ में प्रत्येक असामान्य वस्तु एक रोग है परन्तु इस सिद्धान्त को स्वीकार करने में न्यायालय, न्यायोचित ढंग से कार्य करते हुये नहीं कहे जायेंगे, क्योंकि अपराध को माफ करने में इसका प्रभाव उस सीमा तक पड़ेगा जो समाज के लिये हानिकारक है।62 इस सिद्धान्त का विरोध इस आधार पर भी किया जाता है, क्योंकि यदि दुर्निवार मनोवेग के बचाव को स्वीकृति प्रदान की जाती है तो ऐसे मनोवेग को जो दण्ड विधि के कारण प्रतिरोध्य है और जिसका प्रतिरोध किया जाता है, उसे आप अप्रतिरोध्य बना देते हैं। सौडमैन बनाम आर०63 के वाद में प्रिवी कौंसिल ने मैक्नाटेन के सिद्धान्तों में एक और सिद्धान्त जोड़ दिया। प्रिवी कौंसिल ने कहा कि जब कर्ता यह जानता है कि उसका कार्य दोषपूर्ण है तब भी उसे पागलपन से प्रभावित मानना चाहिये यदि वह उस कार्य को करने के लिये किसी रोग द्वारा व्युत्पन्न दुर्निवार मनोवेग से प्रेरित हुआ था। अतः उचित स्थिति इस प्रकार होती है कि यदि एक व्यक्ति अन्यथा विक्षिप्त सिद्ध हो जाता है किन्तु यह दुर्निवार मनोवेग का अभिवचन प्रस्तुत करता है तो उसे क्षमा कर दिया जायेगा इसलिये नहीं कि मनोवेग दुर्निवार था, अपितु इसलिये कि रोग ने उसकी प्रतिरोध शक्ति को इस सीमा तक क्षीण कर दिया था कि वह परिस्थितियों में मनोवेग के समक्ष झुक गया जिनमें एक सामान्य व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह नहीं झुकेगा। दुर्निवार मनोवेग का तर्क अपने आप में एक बचाव नहीं है किन्तु उस स्थान पर अच्छा-बचाव साबित हो सकेगा जहाँ कि एक मस्तिष्कीय पूर्व अस्वस्थता का साक्ष्य उपलब्ध है।64 आर० बनाम हेन्स65 के वाद में कैदी पर एक औरत की हत्या का दोष लगाया गया था परन्तु अभियोजन दारा किसी प्रयोजन का आरोप नहीं लगाया गया था। कैदी के पक्ष में यह तर्क प्रस्तत किया गया कि अपराध कारित करने के लिये किसी प्रयोजन को सिद्ध करना दुष्कर होगा, जिसने निश्चयतः एक शक्तिशाली दुर्निवार मनोवेग के प्रभाव या मानववध प्रवृत्ति के अन्तर्गत कार्य किया होगा। कैदी को हत्या का दोषी घोषित किया गया। ब्रामवेल जज ने निम्न मत व्यक्त किया है-“किसी कार्य की प्रत्यक्षत: प्रयोजनरहित परिस्थिति वह आधार नहीं है जिससे हम सहजतापूर्वक इस प्रकार के प्रभाव के अस्तित्व का निष्कर्ष निकाल सकें। गुप्त तथा असंख्य प्रकार के प्रयोजन हैं जो कार्य को अभिप्रेरित करते हैं। एक विकृत तथा विक्षुब्ध किन्तु
  1. इस परिकल्पना के विरुद्ध मन:चिकित्सकों ने राय व्यक्त किया है.
  2. नैग्स; रिस्पान्सिबिलिटी इन क्रिमिनल ल्यूनैसी, 69 (1854).
  3. हुदा, एस० : दि प्रिन्सिपल्स आफ दि लॉ आफ क्राइम्स इन ब्रिटिश इण्डिया, पृ० 287-88.
  4. । (1936) 2 आल० ई० रि० 1138.
  5. हुदा, एस० : दि प्रिंसिपल्स आफ दि लॉ आफ क्राइम्स इन ब्रिटिश इण्डिया, पृ० 288.
  6. (1859) 175 ई० आर० 898.
प्रतिरोध्य खून की प्यास स्वयं ही एक प्रयोजन है जो स्वयं को सन्तुष्ट करने हेतु ऐसे कृत्य के लिये अभिप्रेत करती है।” | आगे यह भी इंगित किया गया है कि कल ऐसे प्रतिबन्ध हैं जो इस प्रकार के प्रभाव को निष्फल बनाते है। सवाधिक शक्तिशाली प्रतिवन्ध कानन का है और अन्य प्रतिबन्ध धर्म तथा अन्त:करण के हैं। किन्तु यदि प्रभाव को स्वयं ही एक वैधिक बचाव माना जाय जो अपराध को अदण्डनीय बनाये तो वह वास्तव में एक सवाधिक शक्तिशाली प्रतिबन्ध को समाप्त करने के समतुल्य है। यह निश्चित करना अत्यधिक कठिन है कि कौन से मनोवेग नियन्त्रणीय हैं और कौन से नहीं। द्वितीयत: अभिवचन समस्त प्रोत्साहनों को आत्मसंयम की ओर ले जायेगा। इसी प्रकार कालीचरन66 के बाद में यह स्पष्ट किया गया है कि विधिक पागलपन के’अभिवचन एवं प्रमाण के अभाव में एक अपराध के लिये चाहे वह कितना ही नृशंस क्यों न हो, मात्र प्रकोपन की अनुपस्थिति प्रकरण को इस धारा के अन्तर्गत नहीं ला सकती। केवल यह तथ्य कि अभियुक्त ने आकस्मिक उत्तेजना के वशीभूत होकर हत्या की थी और वहाँ किसी भी प्रकार का स्पष्ट प्रयोजन नहीं है, पागलपन के अभिवचन को स्वीकार करने के लिये आधार नहीं बना सकता ।°/ साधारणत: जहाँ उचित और अनुचित के मध्य भेद करने योग्य विवेक है, वहाँ मात्र एक दुर्निवार मनोवेग। का अस्तित्व दायित्व को क्षमा नहीं कर सकता। जहाँ मस्तिष्कीय अस्वस्थता किसी विशिष्ट ढंग से कार्य करने के लिये एक अदम्य उत्तेजना व्युत्पन्न करती है और उत्तेजना इतनी शक्तिशाली हो कि वह विवेक और निर्णय पर हावी हो जाय तथा अभियुक्त को अनुचित कार्य छोड़ कर सही कार्य करने की क्षमता से वंचित कर दे, वहाँ मात्र उचित तथा अनुचित की बौद्धिक अनुभूति इस प्रश्न को प्रभावित नहीं करेग। ह्वार्टन के अनुसार दुर्निवार मनोवेग आपराधिक अभियोजन में बचाव नहीं है, जब तक वह इस सीमा तक न उपस्थित हो कि विवेक को अपने अधीन कर ले, इच्छा को नियन्त्रित कर ले तथा व्यक्ति के लिये यह असम्भाव्य बना दे कि वह समर्पण से अन्यथा करने को विवश हो जाय। यह दायित्वविहीनता उस व्यक्ति के लिये विस्तारित नहीं। की जायेगी जो बिना किसी मानसिक असन्तुलन के केवल अतिशय क्रोध, ईष्र्या तथा बदले की भावना से कार्य करता है। पहले पागलपन का होना अत्यावश्यक है। दुर्निवार मनोवेग सम्बन्धी कानून को इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है (अ) एक आपराधिक कार्य के प्रयोजन मात्र की अनुपस्थिति से यह नहीं समझ लेना चाहिये कि दुर्निवार मनोवेग अस्तित्ववान है। (ब) किन्तु जहाँ रोगग्रस्त मस्तिष्क का अस्तित्व अन्य साक्ष्यों द्वारा सिद्ध हो जाता है तो ऐसा साक्ष्य स्वयं कार्य द्वारा साक्ष्य के साथ मिलकर दुर्निवार मनोवेग के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है और जब वह सिद्ध हो जाता है कि उन्मुक्ति के लिये उचित आधार बन जाता है भले ही यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट हो कि कार्य दोषपूर्ण या अवैध है। (स) किन्तु जहाँ इस तरह की अवधारणा के अस्तित्व को नकारा नहीं जाता मात्र दुर्निवार मनोवेग भारत में उन्मुक्ति के लिये पर्याप्त आधार नहीं प्रतीत होता। ‘आत्मयुग्मनका सिद्धान्त-दुर्निवार मनोवेग की मनोवैज्ञानिक प्रकल्पना के विपरीत तथा उसका प्रचलित समतुल्य है “आत्मयुग्मन’ (Integration of the self) का सिद्धान्त68 घातक मस्तिष्कीय रोग व्यक्तित्व के सभी प्रमुख अवयवों को अत्यधिक क्षीण बना देता है। एक मनोविकार से पीड़ित या पागल व्यक्ति अपने कार्य के नैतिक महत्व को यथार्थतः समझ नहीं पाता। आत्म नियंत्रण की शक्ति के अभाव से तात्पर्य है। उचित और अनुचित में विभेद करने की अक्षमता। यह वैसे ही सत्य है कि एक व्यक्ति जो अपने आप को। नियन्त्रित नहीं कर सकता अपने कार्य की प्रकृति को नहीं जानता जैसे कि एक व्यक्ति जो अपने कृत्य की प्रकृति को नहीं समझता आत्म नियन्त्रण के लिये अक्षम है।69
  1. (1947) नागपुर 226.
  2. गणेश श्रवन, (1969) 71 बाम्बे लॉ रि० 643
  3. हाल, जेरोम, जनरल प्रिंसिपल्स आफ क्रिमिनल लॉ (2रा संस्करण) पृ० 494.
  4. । स्टीफेन, 2 क्रि० लॉ 171 (1883).
डर्हम का नियम (Durhum’s Rule)-डर्हम बनाम संयुक्त राज्य70 के वाद में डर्हम पर घर में सेंध (House Breaking) लगाने का आरोप था तथा उसने अपने बचाव में चित्त विकृतता का अभिवचन प्रस्तुत किया था। सर्किट कोर्ट आफ अपील (Circuit Court of Appeal) ने घोषणा किया कि आपराधिक दायित्व के वर्तमान टेस्ट अब अप्रचलित (Obsolete) हो गये हैं और उन्हें विस्थापित कर देना चाहिये। वर्तमान । परीक्षणों (Tests) के अन्तर्गत “मैक्नाटेन नियम’ तथा दुर्निवार मनोवेग दोनों ही परीक्षण आते हैं। इस वाद में न्यायालय ने एक नया परीक्षण प्रतिपादित किया जो इस प्रकार है-‘सामान्यतया एक अभियुक्त आपराधिक रूप में दायित्वाधीन नहीं है यदि उसका अवैधानिक कार्य मस्तिष्कीय रोग या मस्तिष्कीय दोष की उपज था।’ मस्तिष्कीय रोग तथा मस्तिष्कीय दोष परिभाषित थे। मात्र यह कि अभियुक्त प्रश्नगत कार्य को करते समय मस्तिष्कीय रोग या मस्तिष्कीय दोष से पीड़ित था, पर्याप्त नहीं होगा। वह अपने अवैधानिक कार्य के लिये फिर भी दायित्वाधीन होगा, यद्यपि कार्य तथा मस्तिष्कीय असामान्यता के बीच कोई हेतुक सम्बन्ध (Causal Connection) नहीं था। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि अभियुक्त इस प्रकार की मस्तिष्कीय असामान्यता से पीड़ित था तो सभी सन्देहों से परे यह सिद्ध करने का भार कि कृत्य ऐसी असामान्यता की उपज नहीं है, अभियोजन पर होगा। मैक्नाटेन नियम तथा दुर्निवार मनोवेग, ये दोनों परीक्षण अब भी लागू किये जा सकते हैं। तथा डरहम नियम इन दोनों के अतिरिक्त है। अतः डरहम के वाद में लागू किये गये नियम से तात्पर्य है-साधारण तथ्य कि एक व्यक्ति किसी मस्तिष्कीय रोग या मस्तिष्कीय दोष से प्रभावित है उसे किसी आपराधिक दायित्व से मुक्त करने के लिये पर्याप्त नहीं है। आपराधिक कृत्य तथा रोग के बीच एक सम्बन्ध होना आवश्यक है तथा सम्बन्ध इस प्रकार का होना चाहिये जिससे यह स्पष्ट हो कि आपराधिक कार्य नहीं हुआ होता यदि अभियुक्त रोग से पीड़ित न रहा होता।71 अन्य अवसरों पर अभियुक्त की मस्तिष्कीय स्थिति की प्रासंगिकता- किसी व्यक्ति की स्वस्थचित्तता सम्बन्धी प्रश्न अपराध कारित करते समय महत्वपूर्ण होता है। इसके अतिरिक्त तीन अन्य अवसर होते हैं जबकि किसी व्यक्ति की स्वस्थचित्तता महत्वपूर्ण होती है। ये अवसर हैं-जब वह परीक्षण के लिये लाया जाता है, जब उसे दोषसिद्ध किया जाता है तथा जब सजा की घोषणा की जाती है। अभियुक्त आरोपित कार्य करते समय पूर्णतया स्वस्थचित्त का हो सकता है किन्तु विचारण के समय वह विकृतचित्त का हो सकता है। अर्थात् वह विचारण के समय विकृतचित्त का होने के कारण यह कह सकता है कि वह ”अभिवचन। करने में असमर्थ है”। इंग्लैण्ड में ऐसे अभियुक्त को जेल में रखा जाता है तथा स्वस्थ होने के पश्चात् उसका विचारण होता है। आर० बनाम पोदोला72 के वाद में प के ऊपर द की हत्या का आरोप था । द एक जासूस पुलिस अधिकारी था जो अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था। यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि प चित्तविकृतता। से पीड़ित है, अतः वह विचारण के दौरान उत्तर देने में असमर्थ है। न्यायालय ने कहा कि यदि मूर्छा या मिरगी (Hysterical amnesia) के कारण अभियुक्त यह वाद करने में समर्थ नहीं है कि जिस घटना के सन्दर्भ में उस पर आरोप लगाया गया है, उसे घटित होते समय क्या हुआ था, उसे अभिवचन के लिये अयोग्य नहीं ठहराती। अयोग्यता को सिद्ध करने का दायित्व अभियुक्त पर होता है यद्यपि उसे यह सिद्ध करने के लिये मात्र सम्भावनाओं के आधार पर जूरी को संतुष्ट करना होता है। इंग्लैण्ड में प्रक्रिया सम्बन्धी इन प्रश्नों से सम्बन्धित अनेक विधान (Legislation) हैं किन्तु भारत में इस विषय पर न तो कोई विधायी और न ही न्यायिक नियम है। | बेनार सिंह तांती बनाम असम राज्य73 के मामले में अभियुक्त ने एक 13 वर्ष की लड़की की कुल्हाड़ी से मारकर हत्या कर दी और तीन अन्य लोगों को चोटें पहुँचायीं। जब अभियुक्त के हाथ से एक व्यक्ति द्वारा। जिस पर वह हमला करना चाहता था, कुल्हाड़ी छीन ली गयी तो वह भाग गया। अभियुक्त की प्रतिरक्षा में पागलपन का तर्क दिया गया। यह अभिनित किया गया कि अभियुक्त का पागलपन इस प्रकार का नहीं था। कि उसे धारा 84 का लाभ मिल सके, क्योंकि कुल्हाड़ी छीनी जाने पर भागना यह सिद्ध करता है कि उसकी ज्ञानात्मक क्षमतायें (cognitive faculties) एकदम समाप्त नहीं हुई थीं कि वह कृतकार्य की प्रकृति नहीं समझ सकता था।
  1. 214 एफ०, (2रा संस्करण) 862.
  2. उपरोक्त सन्दर्भ पृ० 864. ।
  3. (1960) 1 क्यू० बी० 325.
  4. 1977 क्रि० लॉ० ज० 296 (गौहाटी).
हरि सिह गोड बनाम प० प्र० राज्य/4 के बाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि भारतीय दह संहिता की धारा १ को लाश किये जाने के विनिश्श्य करने का मानक यह है कि क्या एक किया कि दारा अपनाये जाने वाले सामान्य मानक के अनुसार कार्य सही था या गलत। मात्र यह तथा कि एक अभियुक्त भी गवं विभिन्न कधी * और उसको मस्तिष्क एकदम सही नहीं है अथवा यह कि शारीरिक व मानसिक मारियाँ जिससे वह पीडित है ने उसकी बुद्धि को कमजोर कर दिया है और उसके संवा और इ को शाबित कर दिया है अथवा यह तर्क कि उसने भूतकाल में एसे असाधारण कार्य किया। शेरै अन्तराल पर उसे विक्षिमता का दौरा अथवा मिगी का दौरा आता है परन्तु उसके व्यवहार में है। असामान्य (abnormal) नही था अथवा उसका व्यवहार विचित्र (queer) था, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 84 के लागू किये जाने हेतु यथेष्ट नहीं कहा जा सकता है। तथ्यों के आधार पर यह अभिनिर्धारित किया गया है कि इस मामले में धारा 84 लागू नहीं होगी। सुरेन्द्र मिश्र बनाम झारखण्ड राज्य/4क के बाद में मृतक चन्द्रशेखर चौबे एक कार में 11 अगस्त, 2000 को जा रही थी और कार विद्युत कुमार ड्राइवर द्वारा चलायी जा रही थी। जब मृतक एक नाला की क्रासिंग के पास पहुंचा तब उसने ड्राइवर को गाड़ी रोकने के लिये कहा और सुलेखा ऑटो पार्ट के मालिक मुखर्जी को बुलाने को कहा। जब मुखर्जी आ गये तो वह गाड़ी के अन्दर बैठे बैठे ही उनसे बात करने लगे। जब वे इस प्रकार बात कर रहे थे उसी समय एकाएक अपीलार्थी जो मेडिकल हॉल के मालिक थे, एक देशी पिस्तौल के साथ वहां आये और मुखजी को बगल करते हुये मृतक पर एकदम नजदीक से गोली दाग दिया। ड्राइवर को भी उसने धमकी दिया कि कुछ कहा तो उसके गम्भीर परिणाम होंगे। ड्राइवर मृतक को वहीं छोड़कर भाग गया और मृतक के घरवालों को घटना की सूचना दिया। विनोद कुमार चौबे ड्राइवर के साथ ही घटनास्थल पर आये और मृतक को अस्पताल ले गये जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के अधीन मामला दर्ज कर जांच प्रारम्भ की गयी। अभियुक्त/अपीलाण्ट मृतक पर गोली चलाने और ड्राइवर को धमकी देने के बाद वहां से भाग गया और पिस्तौल को एक कुयें में फेंक दिया। जब मामले का विचारण प्रारम्भ हुआ तो अभियुक्त ने अपने बचाव में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 84 का तर्क प्रस्तुत किया। यह अवधारित किया गया कि यदि कोई व्यक्ति धारा 84 के अधीन चित्तविकृतता या पागलपन का तर्क देता है तो सिद्धि का आभार उस व्यक्ति पर होता है तथा उसे मेडिकल पागलपन नहीं वरन् विधिक पागलपन सिद्ध करना होता है। यह आवश्यक है कि यह सिद्ध करने का भार सभी युक्तियुक्त सन्देहों से परे सिद्ध करने का नहीं होता है परन्तु उसे यह सिद्ध करने का दायित्व अवश्य होता है कि विभिन्न सम्भावनाओं पर विचार करने पर पागलपन की गुरुता या प्राबल्य पर विचार करने पर उसी की अधिक सम्भावना थी। पागलपन अपराध कारित करते समय होना चाहिये उसके पहले या बाद का पागलपन प्रासंगिक नहीं है। प्रस्तुत मामले में अभियुक्त का घटनास्थल से भाग जाना और पिस्तौल कुयें में फेंक देना उसका ऐसा आचरण है जो यह दर्शाता है कि उसे अपने कार्य की प्रकृति का ज्ञान था। उसकी मानसिक अस्वस्थता के बारे में डॉक्टर के द्वारा सुझायो। गयी दवाओं के पर्चे की दवाओं से यह सिद्ध होता है कि उसे भ्रम का अनुभव (feeling) हुआ था और वह भी घटना के काफी पहले। इसके अतिरिक्त अभियुक्त एक दवाओं का स्टोर की दुकान चलाता था जिससे उसे इन चीजों का ज्ञान रहा होगा। अतएव स्थितियों में यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त भा० दे० संहिता की धारा 84 का लाभ पाने का अधिकारी नहीं था और वह पागलपन के आधार पर आपराधिक दायित्व से मुक्ति पाने का अधिकारी नहीं है। सधाकरन बनाम केरल राज्य/4ख के बाद में अभियुक्त पर अपनी पत्नी की हत्या करने का आरोप था। जबकि उसने अपनी पत्नी की नृशंस हत्या की थी वहीं उसने अपने पुत्र को किसी तरह की चोट या कष्ट नहीं । पहुंचाया बल्कि बच्चों को उचित देखरेख में रखे जाना और अभिरक्षा में रखे जाना भी सुनिश्चित करने का ध्यान रखा। उसने मस्तिष्क की चित्तविकृति का तर्क देकर अपना बचाव किया। वह संविधम मनोविदलता या खण्डित मनस्कता से पीड़ित था। 74, (2009) 1 क्रि० लॉ ज० 346 (सु० को०), 74क. (2011) 1 क्रि० ला ज० 1161 (एस० सी०), 74ख. (2011) 1 क्रि० लॉ ज० 292 (एस० सी०), यह अभिनिर्धारित किया गया कि यह सिद्ध करने का भार अभियुक्त पर है कि वह मस्तिष्क की विक्षिप्तता के कारण अपने द्वारा कारित कार्य की प्रकृति समझने में असमर्थ था। जिस समय यह पागलपन था, वह अपराध कारित किये जाते समय होना चाहिये । प्रस्तुत मामले में अभियुक्त का आचरण आपराधिक कार्य करते समय उसके पहले एवं बाद में यह नकारने हेतु यथेष्ट था कि वह मानसिक रूप से ऐसा अस्वस्थ था कि अपनी पत्नी की हत्या करते समय उसका दुराशय नहीं था। अभिलेख पर मौजूद साक्ष्य मात्र यह दर्शाता है कि घटना के लगभग 15 वर्ष पूर्व मनश्चिकित्सीय अस्पताल में उसका 13 दिनों तक इलाज किया गया था और चिकित्सक ने उसकी बीमारी को मनोविक्षिप्त विकार बताया था। अतएव हत्या हेतु उसकी दोषसिद्धि उचित पायी गयी ।। राजस्थान राज्य बनाम विद्या देवी74ग के वाद में अभियुक्त चालान फाइल किये जाने के पहले से ही अस्पताल में भर्ती था। वह नौ महीनों तक उपचार (treatment) में रहा। यह अभिधारित किया गया कि अभियुक्त भा० द० संहिता की धारा 84 का लाभ लेने का दावा करने का अधिकारी था क्योंकि परिस्थितियां स्पष्ट रूप से अभियुक्त की मत्तत्ता (Insanity) दर्शा रही हैं।

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