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Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 2 LLB 1st Year Notes

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  1. कार्य, जिससे अपहानि कारित होना सम्भाव्य है, किन्तु जो आपराधिक आशय के बिना और अन्य अपहानि के निवारण के लिए किया गया है- कोई बात केवल इस कारण अपराध नहीं है कि वह यह जानते हुए की गई है कि उससे अपहानि कारित होना सम्भाव्य है, यदि वह अपहानि कारित करने के लिए किसी आपराधिक आशय के बिना और व्यक्ति या सम्पत्ति को अन्य अपहानि का निवारण या परिवर्जन करने के प्रयोजन से सद्भावपूर्वक की गई हो।
स्पष्टीकरण- ऐसे मामले में यह तथ्य का प्रश्न है कि जिस अपहानि का निवारण या परिवर्जन किया जाना है क्या वह ऐसी प्रकृति की और इतनी आसन्न थी कि वह कार्य, जिससे यह जानते हुए कि उससे अपहानि कारित होना सम्भाव्य है, करने की जोखिम उठाना न्यायानुमत या माफी योग्य था। दृष्टान्त (क) क, जो एक वाष्प जलयान का कप्तान है, अचानक और अपने किसी कसूर या उपेक्षा के बिना अपने आपको ऐसी स्थिति में पाता है कि यदि उसने जलयान का मार्ग नहीं बदला तो इससे पूर्व कि वह अपने जलयान को रोक सके, वह बीस या तीस यात्रियों से भरी नाव ख को अनिवार्यतः टकराकर डुबो देगा, और कि अपना मार्ग बदलने से उसे केवल दो यात्रियों वाली नाव ग को डुबोने की जोखिम उठानी पड़ती है, जिसको वह सम्भवत: बचाकर निकल जाए। यहाँ यदि क नाव ग को डुबोने के आशय के बिना और ख के यात्रियों के संकट का परिवर्जन करने के प्रयोजन से सद्भावपूर्वक अपना मार्ग बदल देता है तो यद्यपि वह नाव ग को ऐसे कार्य द्वारा टकराकर डुबो देता है, जिससे ऐसे परिणाम का उत्पन्न होना वह सम्भाव्य जानता था, तथापि तथ्यतः यदि यह पाया जाता है कि वह संकट ज़िसे परिवर्जित करने का उसका आशय था, ऐसा था जिससे नाव ग को डुबोने की जोखिम उठाना माफी योग्य है, तो वह किसी अपराध का दोषी नहीं है। (ख) क, एक बडे अग्निकाण्ड के समय आग को फैलने से रोकने के लिए गहों को गिरा देता है। वह इस कार्य को मानव जीवन या सम्पत्ति को बचाने के आशय से सद्भावपूर्वक करता है। यहाँ, यदि यह पाया जाता है कि निवारण की जाने वाली अपहानि इस प्रकृति की और इतनी आसन्न थी कि क का कार्य माफी योग्य है तो क उस अपराध का दोषी नहीं है। टिप्पणी अवयव (Ingredients)-भारतीय दण्ड संहिता की धारा 81 को जो आवश्यकता के सिद्धान्त से सम्बन्धित है, निम्नलिखित ढंग से विश्लेषित किया जा सकता है
  1. 1977 क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 85.
  2. 1978 क्रि० लाँ ज० 1305.
  3. ए० आई० आर० 1998 एस० सी० 1985.
(1) दोषकर्ता यद्यपि यह जानता है कि अपराध कारित करने वाले कार्य द्वारा अपहानि (harm) कारित होना सम्भाव्य है फिर भी उसे अपहानि कारित करने के किसी आपराधिक आशय के बिना किया जाता है, (2) कार्य सद्भावपूर्वक किया गया हो; तथा (3) कार्य किसी अन्य अपहानि के निवारण या परिवर्जन हेतु किया गया हो; (4) अपहानि जिसे निवारित या परिवर्जित करने का उद्देश्य है, किसी व्यक्ति या सम्पत्ति से सम्बन्धित होनी चाहिये। आवश्यकता क्यों एक प्रतिरक्षा है?- कोई कार्य जो अन्यथा एक अपराध हो सकता है कुछ। मामलों में माफी योग्य होता है यदि अभियुक्त यह दिखा सके कि इसे केवल उन परिणामों को परिवर्तित करने हेतु किया गया है जिन्हें अन्य रूप में परिवर्तित करना कठिन था और उसे यदि रोका न गया होता तो उसे या अन्य लोगों को जिन्हें वह सुरक्षित रखने के लिये बाध्य था अत्यन्त हानि पहुँची होती और जितना युक्तित: उस व्यक्ति के लिये आवश्यक था उससे कुछ भी अधिक नहीं किया गया तथा इसके द्वारा पहुँची अपहानि परिवर्तित अपहानि की तुलना में अनुपातहीन नहीं थी।83 इस सिद्धान्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 81 में सम्मिलित किया गया है। धारा 81 किसी ऐसे क्षति को माफ करती है ताकि अच्छे परिणाम उत्पन्न हो सकें। यह धारा किसी गुरुतर हानि के निवारण हेतु लघुतर अपहानि को कारित करने की अनुमति देती है। इस धारा में सिद्धान्त “जहाँ किसी अचानक और चरम सीमा के संकट में दो में से एक अपहानि अवश्यम्भावी है वहाँ घटनाओं को इस प्रकार निदेशित करना वैधिक है ताकि लघुतर हानि कारित हो” को सांविधिक स्वीकृति प्रदान की गई है।84 कुछ अन्य प्रणालियों में आवश्यकता की प्रतिरक्षा एक विवादग्रस्त विषय है। कुछ इसके स्वीकार किये जाने के पक्ष में हैं जबकि अन्य इसके विरोध में हैं क्योंकि उन्हें इस प्रतिरक्षा की सीमा निर्धारित करने में कठिनाई महसूस होती है। स्टीफेन ने आवश्यकता से सम्बन्धित विधि को इतना अस्पष्ट माना है कि उन्होंने सन् 1879 के अपने ड्राफ्ट से भी इसे निकाल दिया। केनी ने भी इस प्रश्न को भ्रामक स्थिति में छोड़ दिया है। तथा स्टीफेन के विचारों से सहमत होते हुये वे कहते हैं कि ऐसे मामलों की कल्पना करना सम्भव है जिसमें विधि को भंग करने की आवश्यकता इतनी तीव्र होती है कि इसका उल्लंघन करते समय लोगों को न्यायोचित ठहराया जा सकता है परन्तु ऐसे मामलों को पहले से ही परिभाषित नहीं किया जा सकता है।”85 इस प्रतिरक्षा के विषय में बहुत से सिद्धान्तों को उद्धृत किया गया है।86 रेनीजर बनाम फोगोस्सा87 के वाद में सर्जेन्ट पोलार्ड ने निम्न मत व्यक्त किया ‘प्रत्येक विधि में कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो जब घटित होती हैं तो कोई व्यक्ति विधि के शब्दों को भंग कर सकता है फिर भी विधि स्वयं को भंग नहीं कर सकता और ऐसी चीजें विधि के दण्ड से उन्मुक्त कर दी। गई हैं तथा विधि उन्हें विशेषाधिकार प्रदान करती है। यद्यपि ये चीजें विधि के विरुद्ध की गई होती हैं क्योंकि विधि के शब्दों का उल्लंघन विधि स्वयं का उल्लंघन नहीं है जैसे विधि के आशय का उल्लंघन नहीं होता। यह एक सामान्य उक्ति है, कि आवश्यकता विधि को नहीं मानती (Quod necessitas non habet legem) जहाँ विधि के शब्दों का गुरुतर असुविधाओं के कारण या आवश्यकतावश या बाध्यता द्वारा उल्लंघन किया जा सकता जब कभी आवश्यकता किसी व्यक्ति को अवैध कार्य करने के लिये बाध्य करती है, वह उसे करने में । न्यायोचित होगा, क्योंकि कोई भी व्यक्ति आपराधिक आशय या इच्छा के बिना किसी अपराध का दोषी नहीं
  1. स्टीफेन, डाइजेस्ट आफ क्रिमिनल लॉ, (8वाँ संस्करण) आर्टिकिल II प० 10.
  2. मेन, क्रिमिनल लॉ आफ इण्डिया (4था संस्करण) 1 पृ० 157
  3. उदाहरण के लिये, (Necessitas Vincit Legenm).
  4. (1950) प्लोड 18, 75 ई० आर० 29-30.
  5. पर लार्ड मेन्सफील्ड इन आर० बनाम स्ट्रांटन, के वाद में (1779) 21 हावर्ड सेंट ट्रा० के० 1223.
होगा |88 अतः आवश्यकता से सम्बन्धित विधि उन चीजों से मुक्ति दिलाती है जिसका अन्य रूप में किया ३ नहीं है। यदि अपहानि को अन्य रूप से परिवर्जित नहीं किया जा सकता था तो यह प्रतिरक्षा 00 उसका विशिष्ट उदाहरण है, आग को फैलाने से बचाने के लिये मकानों को गिराना 91 कोप बनाम 02 के बाद में आग को फैलने से बचाने हेतु जहाज को जलाना न्यायोचित माना गया। स्टीफेन ने दो डूबते हुये व्यक्तियों के उदाहरण को उद्धृत किया है जो लकड़ी के एक तख्ते को पकड़ने लिये संघर्ष कर रहे थे परन्तु वह तख्ता केवल एक व्यक्ति का बोझ ढो सकता था। यदि उनमें से एक दूसरे । का देता है और उसकी डूबने से मृत्यु हो जाती है तो वह दोषी नहीं होगा, क्योंकि उसने उसे ऐसे अवसर पर छोड़ दिया ताकि वह दूसरा तख्ता ढूंढ सके। उसने ऐसा मात्र आवश्यकतावश किया। इस प्रकरण ने अनेक विद्वानों ने समझाने का प्रयास किया है, इसके अलग-अलग उत्तर पाये गये हैं। ऐसा प्रतीत होता है। कि विद्वान लोग तीनों स्थितियों में विभेद करने में असमर्थ हैं।93 (1) कर्ता एक ऐसे व्यक्ति को धक्का देता है। जो पहले से ही तख्ते पर था, या (2) कर्ता तख्ते पर है और वह उस व्यक्ति को धक्का देता है जो उसे धक्का देकर तख्ते से हटाना चाहता है, या (3) दोनों एक ही समय तख्ते पर पहुँचते हैं और एक दूसरे को एक तरफ ढकेल देता है ताकि वह अपने लिये तख्ते को प्राप्त कर ले। मेरी राय में स्टीफेन जो सुझाना चाहते हैं उसमें मात्र बाद वाली दोनों परिस्थितियाँ सम्मिलित हैं, पहले वाली नहीं। स्टीफेन ने एक दूसरा उदाहरण भी टूटे हुये जहाज में सवार व्यक्तियों का दिया है जिन्हें वह जहाज ढो नहीं सकता था। माउस4 के बाद में एक नाविक ने अपीलकर्ता के सामान को उठाकर नाव को हल्की करने के उद्देश्य से नाव से बाहर फेंक दिया ताकि तूफान से यात्रियों की रक्षा की जा सके। अपीलकर्ता ने अतिचार के लिये दावा किया और यह निर्णीत हुआ कि न केवल नाविक अपितु कोई भी यात्री, यात्रियों की सुरक्षा हेतु ऐसा कदम उठाने हेतु न्यायोचित ठहराया जायेगा और यह तथ्य महत्वहीन होगा कि नाविक ने नाव में अधिक बोझ लाद दिया था। ब्राउनिंग बनाम राज्य-5 के बाद में ब्राउनिंग पर लापरवाही द्वारा गाड़ी चलाने का आरोप था। उसका तर्क था कि उसने घोर अपहानि तथा पुलिस द्वारा अवैध कैद से बचने के लिये ऐसा किया क्योंकि पुलिस धोखे से उसे पकड़ना चाहती थी। उसके तर्क को स्वीकार कर लिया गया क्योंकि कार्य उसकी स्वतन्त्र सहमति से नहीं हुआ था। गाड़ी चलाने को न्यायोचित ठहराया गया यद्यपि उसने कैद किये जाने से बचने हेतु ऐसा किया था। बिना किसी आपराधिक आशय के- इस धारा के अन्तर्गत प्रतिरक्षा का हकदार होने के लिये यह आवश्यक है कि कार्य किसी आपराधिक आशय के बिना किया गया हो। साशय किया गया आपराधिक कृत्य कभी भी न्यायोचित नही घोषित किया जा सकता है। यदि एक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को एक कार्य द्वारा हानि पहुँचाता है और कार्य को करते समय उसका कोई आपराधिक आशय नहीं था, परन्तु उसे इस बात का ज्ञान था कि किसी न किसी प्रकार की अपहानि कारित होना सम्भाव्य है, वह अपने कार्य द्वारा हुई अपहानियों के लिये जवाबदेह नहीं होगा यदि कार्य सद्भावपूर्वक किसी अन्य व्यक्ति या सम्पत्ति को अपहानि से बचाने हेतु किया गया हो। अ देखता है कि एक बाघ ब के ऊपर आक्रमण कर रहा है और वह यह महसूस कर रहा है कि एक मिनट में बाघ उस पर झपटेगा। वह बाघ पर यह जानते हुये कि बाघ और ब इतने एक दूसरे के नजदीक हैं कि गोली से ब की हत्या हो सकती है, बाघ पर गोली चलाता है। यहाँ, अ ब की मृत्यु कारित कर देता है तो वह किसी अपराध का दोषी नहीं होगा क्योंकि उसका आशय ब की हत्या कारित करने का नहीं था। उसका आशय बाघ को मार करके ब की रक्षा करना था।
  1. पर लार्ड मैन्सफील्ड इन आर० बनाम स्ट्राटन, (1779) 21 होव० सेंट ट्रा० सी० 1223.
  2. पर कुरियन इन मानवी बनाम इस्काट, (1672) 1 लेविंज 4, 83 ई० आर० 268.
  3. बैक्टर 2 डी लेजीवस, एफ० 121 पृ० 277 (ट्वीस संस्करण) 1879.
  4. मेलवर्जर बनाम स्पिंक, (15370) डायर पृ० 36 (ब) 73 ई० आर० पृ० 81.
  5. (1912) 1 के० पी० 496.
  6. हाल, जेरोम, जनरल प्रिंसिपल्स आफ क्रिमिनल लॉ (दूसरा संस्करण) पृ० 418 पर फुटनोट नं० 16.
  7. (1608) 77 ई० आर० 1341.
  8. (1943) 244 एला० 251 : 13 एस० 2 डी० पृ० 56.
किसी व्यक्ति या सम्पत्ति को अपहानि से निवारण हेतु किया गया कार्य-मुख्य सिद्धान्त जिस पर यह धारा आधारित है वह यह है कि किसी व्यक्ति या सम्पत्ति को गुरुतर अपहानि से निवारण हेत् । लघुतर अपहानि का कारित किया जाना उपयुक्त है। सभी सावधानियाँ जो छुआछूत के रोगों, घेरों, सखा. आंधी, तुफान या जहाज नष्ट होने से बचाने के रूप में ली जाती हैं, उनके लिये कोई व्यक्ति जवाबदेह नहीं होगा। निम्नलिखित परिस्थितियों में आवश्यकता को अभिवाचित किया जा सकता है (1) आत्मरक्षा और हिंसा के निवारण हेतु, (2) निर्दोष व्यक्तियों द्वारा अभियुक्त को कारित होने वाली हानि में निवारण हेतु; (3) ऐसी बुराइयों का चयन जो अभियुक्त के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करती है। आत्मरक्षायहाँ अभियुक्त यह अभिवाचित करता है कि उसने आत्मरक्षा हेतु और अपनी सम्पत्ति की रक्षा हेतु प्रतिषिद्ध कार्य को किया या इसी प्रकार किसी अन्य व्यक्ति को उसके शरीर या सम्पत्ति के विरुद्ध कारित होने वाले अपराध से निवारण हेतु किया।96 आत्मरक्षा सम्बन्धी आवश्यकता का सिद्धान्त संहिता की धारा 96 से 106 तक में वर्णित है। एक निर्दोष व्यक्ति की कीमत पर अभियुक्त को हानि से बचाना- लार्ड हेल के अनुसार यदि जहाज की कम्पनी की सामान्य भोजन सामग्री समाप्त हो जाती है तो कुछ परिस्थितियों में जहाज का मास्टर। नाविकों एवं यात्रियों के वैयक्तिक बक्सों को तोड़कर जहाज की कम्पनी की प्रतिरक्षा हेतु सामग्री को वितरित कर सकता है। परन्तु आवश्यकता की कोई भी मात्रा, चाहे वह कितनी ही आवश्यक क्यों न हों, किसी व्यक्ति। द्वारा कपड़ा तथा खाद्य सामग्री चुराने को न्यायोचित नहीं ठहरा सकती है, यद्यपि इन परिस्थितियों को दण्ड आरोपित करते समय ध्यान में रखा जा सकता है। आत्मरक्षा का सिद्धान्त (Doctrine of self-preservation)—प्रश्न यह है कि अपने जीवन की रक्षा करते समय एक निर्दोष व्यक्ति को कारित नुकसान किस सीमा तक आवश्यकता के सिद्धान्त को न्यायोचित ठहराया है। आर० बनाम डड्ले एवं स्टीफेन97 के वाद में डड्ले, स्टीफेन एवं ब्रुक्स नामक तीन वयस्क व्यक्ति और पार्कर नामक एक लड़का एक तूफान में समुद्र में बह गये थे, जब वे एक खुली नाव में यात्रा कर रहे थे। कुछ दिनों की यात्रा करने के पश्चात् उनके पास रखी हुई भोजन सामग्री और पानी समाप्त हो गया। अट्ठारह दिनों के बीतने के पश्चात् डड्ले ने ब्रुक्स को सलाह दिया कि लड़के की बलि दे दी जाय। किन्तु ब्रुक्स इस बात के लिये राजी नहीं हुआ। बीसवें दिन डड्ले ने स्टीफेन की सलाह लेकर, किन्तु ब्रुक्स की सलाह के बिना ही लड़के को मार डाला और तीनों ने चार दिनों तक उसी के मांस को खाया। जब तीनों वयस्क सुरक्षित वापस लाये गये तो यह पाया गया कि लड़के की हालत बहुत नाजुक हो गयी थी और इस बात की सम्भावना थी कि वह तीनों से पहले मरता। यदि नाविकों ने लड़के के मांस को अपने भोजन के लिये इस्तेमाल न किया होता तो वे जीवित न बचे होते और लड़के को मार कर खाने के सिवा जीवित बचने का कोई साधन नहीं था। यह निर्णीत हुआ कि ऐसी कोई आवश्यकता नहीं थी जो अभियुक्तों के इस कार्य को न्यायोचित ठहरा सके। फलतः वे हत्या के दोषी हैं। आवश्यकता के सिद्धान्त पर अनेक दृष्टान्तों का अध्ययन करने के पश्चात् लार्ड कोलरिज ने अभिनित किया कि अपने जीवन को सुरक्षित रखना सामान्यत: एक दायित्व है किन्तु इसको बलिवेदी पर चढ़ाना स्पष्टतः सबसे बड़ा दायित्व है। युद्ध ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जिसमें व्यक्ति का दायित्व जीवित रहना नही, बल्कि मरना है। एक पोत ध्वंस के मामले में पोत के कप्तान का अपने सहकर्मियों के प्रति, पोत के कर्मचारियों का यात्रियों के प्रति, सैनिकों का औरतों और बच्चों के प्रति एक दायित्व होता है। ये दायित्व लोगों पर आत्मसंरक्षण का नैतिक प्रभार नहीं बल्कि अपनी जिन्दगी को दूसरों के लिये न्यौछावर कर देने का नैतिक प्रभार
  1. दी इण्डियन पेनल कोड, 1860 धारा
  2. 9 (1884) 14 क्यू० बी० डी० 273.
आरोपित करते हैं। यह कहना उपयुक्त नहीं है कि अपने जीवन को संरक्षित करने का दायित्व है। किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह प्रलोभन को बचाव घोषित कर सके। अत: कैदी का कार्य जानबूझकर किया गया एक हत्या है।” ग्रोव जज ने तो यहाँ तक कहा कि ”यदि दो अभियुक्तों द्वारा लड़के को मारना न्यायोचित ठहराया जाता है तो चौथे व्यक्ति को जीवित रहने का अवसर प्रदान करने हेतु उनमें से प्रत्येक की हत्या न्यायोचित रीति से की जा सकती है। इस प्रकार एक बलशाली व्यक्ति द्वारा एक निर्बल व्यक्ति की हत्या न्यायसंगत होगी।” स्टीफेन ने उपरोक्त निर्णय की आलोचना की है। डाक्टर हरी सिंह गौड़ ने उपरोक्त निर्णय में निम्नलिखित नियमों को निकाला है| (1) आत्म संरक्षण एक परम आवश्यकता नहीं है; (2) किसी व्यक्ति को दूसरे का जीवन लेकर अपना संरक्षण करने का अधिकार नहीं है, (3) कोई भी आवश्यकता मानव वध को न्यायोचित नहीं ठहराती। तीसरे नियम का अर्थ है कि कोई भी वैयक्तिक आवश्यकता मानव वध को न्यायोचित नहीं ठहराती। किन्तु इसका एक अपवाद है और वह है आत्मरक्षा या लोक न्याय अथवा सुरक्षा हेतु किया गया मानव-वध98 अभियुक्त के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करने वाली बुराइयों का विकल्प- इस शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले मामलों में से एक उदाहरण इस प्रकार है। एक डाक्टर को यह निश्चित करना है। कि वह शिशु की या उसको जन्म देने वाली स्त्री की मृत्यु कारित करे। डाक्टर सद्भावपूर्वक कार्य करता हुआ माँ को बचाने हेतु शिशु की मृत्यु कर देता है तो उसका कार्य इस धारा के अन्तर्गत न्यायसंगत होगा। इन प्रकरणों में यह पर्याप्त होगा यदि सद्भाव में कार्य करते हुये डाक्टर ने आपरेशन को आवश्यक समझा चाहे आपरेशन तथ्यत: आवश्यक रहा हो अथवा नहीं। इंग्लैण्ड में अभियोजन को यह सिद्ध करना होगा कि अभियुक्त सद्भावपूर्वक कार्य नहीं कर रहा था। उदाहरणधनिया दाजी99 के प्रकरण में अभियुक्त ने चोर का पता लगाने हेतु ताड़ी के बर्तन में जहर रख दिया क्योंकि चोर बार-बार उसके बर्तन से ताड़ी निकाल लेता था। कुछ सैनिकों ने इसे खरीदा और खरीदने के पश्चात् पी लिया। जिस व्यक्ति से सैनिकों ने इसे खरीदा था उसे यह ज्ञात नहीं था कि बर्तन में ताड़ी रखी है या जहर। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त संहिता की धारा 328 के अन्तर्गत दोषी है क्योंकि चोर को पकड़ने की ऐसी कोई आवश्यकता नहीं थी जिससे कि दूसरे किसी व्यक्ति को क्षति पहुँचाने का जोखिम उठाया जाय। । विशम्भर बनाम रूमल के वाद में परिवादी को उसका चेहरा काला कर पूरे गाँव में घुमाया गया तथा अभियुक्तों, जो कि पंचायत के सदस्य थे, के आदेश पर उसे जूतों से पीटा गया क्योंकि परिवादी ने एक चमार की लड़की के साथ छेड़छाड़ किया था और इसके फलस्वरूप उस समुदाय के लगभग 200 आदमी हथियारों तथा लाठियों से लैस होकर उसे दण्डित करना चाहते थे। अभियुक्तों को भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 323 तथा 506 के अन्तर्गत अभियोजित किया गया। यह निर्णय दिया गया कि चूंकि अभियुक्तों ने सद्भाव में बिना किसी आपराधिक आशय के परिवादी को उसके अभद्र कार्य के घातक परिणामों से उसे बचाने हेतु हस्तक्षेप किया, इतना ही नहीं अभियुक्तों ने परिवादी की सहमति लिखित रूप में उसके लाभ के लिये प्राप्त कर लिया था, अत: वे संहिता की धाराओं 81 और 87 का लाभ प्राप्त करने के हकदार हैं और वे आरोपित अपराध हेतु दण्डनीय नहीं हैं। गोपाल नायडू के वाद में एक ग्राम मैजिस्ट्रेट ने एक मदमत्त व्यक्ति को कैद किया क्योंकि उसका आचरण लोकहित के लिये खतरनाक था। यह निर्णय दिया गया कि मैजिस्ट्रेट किसी अपराध का दोषी नहीं है।
  1. हेल पी० सी० 478.
  2. (1868) 5 बी० एच० सी० (क्रि० के०) 59.
  3. ए० आई० आर० 1951 इला० 500.
  4. (1992) 46 मद्रास 605.
और वह धारा 81 का लाभ प्राप्त करने का हकदार है। इसे वैयक्तिक बचाव में किया गया एक कार्य भी कहा जा सकता है।

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