Select Page

Indian Penal Code 1860 General Exceptions LLB 1st Year Notes

  Indian Penal Code 1860 General Exceptions LLB 1st Year Notes:- Indian Penal Code 1860 (IPC) LLB 1st Year / LLB 1st Semester Notes Study Material With Questions Answer in Hindi Hindi and English Language | In this new post of IPC today we are going to teach you about chapter 4 General Exceptions Chapter which is given great importance in the LLB Book Indian Penal Code. Read our old post to read well in LLB 1st, 2nd and 3rd year Notes Study Material in Hindi English.

अध्याय 4

साधारण अपवाद (GENERAL EXCEPTIONS)

दण्ड संहिता का अध्याय IV अनेक प्रतिरक्षाओं से सम्बन्धित है जिन्हें कोई अभियुक्त इस संहिता या विशिष्ट या स्थानीय विधि के अन्तर्गत अभिवाचित कर सकता है। यह अध्याय आपराधिक उत्तरदायित्व की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सम्मिलित धारायें, अन्य सभी धाराओं, जो अपराधों को परिभाषित करती हैं, को नियन्त्रित करती हैं। इन सभी धाराओं को एक अध्याय में इसलिये रखा गया है ताकि उन्हें बार-बार दुहराना न पड़े। अपराध की हर परिभाषा, प्रत्येक दाण्डिक उपबन्ध तथा किसी परिभाषा या दाण्डिक उपबन्ध के दृष्टान्त का इस अध्याय में उपबन्धित धाराओं के अध्यधीन अर्थ (construed) लगाया। जायेगा। सिद्धि का दायित्व (Burden of proof)–सामान्य नियम यह है कि अभियोजन कैदी के दोष को सिद्ध करे। और यदि सम्पूर्ण मामले की समाप्ति पर या तो अभियोजन द्वारा या कैदी द्वारा दिये गये साक्ष्य से उपयुक्त सन्देह उत्पन्न होता है कि अभियुक्त ने अपराध किया है या नहीं तो अभियुक्त सन्देह के लाभ (benefit of doubt) के आधार पर उन्मुक्ति का हकदार है। परन्तु मामले को, दण्ड संहिता के किसी भी सामान्य अपवाद या संहिता के किसी अन्य भाग में सम्मिलित किसी विशिष्ट अपवाद या परन्तुक या अपराध को परिभाषित करने वाली किसी उपविधि के अन्तर्गत ले आने वाली परिस्थितियों के अस्तित्ववान होने को सिद्ध करने का दायित्व अभियुक्त पर होता है और न्यायालय ऐसी परिस्थितियों को अनुपस्थित मानेगा। तात्पर्य यह है कि यदि अभियुक्त इस अध्याय में उपबन्धित किसी अपवाद को अभिवाचित करता है तो उसके विरुद्ध एक उपधारणा मानी जायेगी जिसको खण्डित करने का दायित्व उस पर होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अभियुक्त ही साक्ष्य प्रस्तुत करे। वे परिस्थितियाँ जो अभियुक्त के मामले को किसी भी अपवाद के अन्तर्गत लाती हैं या तो अभियोजन द्वारा प्रस्तुत किये गये साक्ष्य या अन्यथा रेकार्ड पर पाये गये साक्ष्य द्वारा सिद्ध की जा सकती हैं। जहाँ अभियुक्त अपने बचाव में किसी अपवाद को अभिवाचित करता है परन्तु अभिवचन के समर्थन में प्रस्तुत किया गया साक्ष्य न्यायालय को पूर्ण रूप से सन्तुष्ट करने में विफल रहता है। और यह नहीं सिद्ध हो पाता कि मामले को अभिवाचित सामान्य अपवाद के अन्तर्गत लाने वाली परिस्थितियाँ अस्तित्ववान थीं, वह तब भी उन्मुक्ति पाने का हकदार है यदि सम्पूर्ण साक्ष्य को विचारित करने के पश्चात् न्यायालय के मस्तिष्क में एक उचित सन्देह हो जाता है कि अभियुक्त को कथित अपवाद का लाभ मिलना चाहिये या नहीं। यदि यह रिकार्ड पर मौजूद साक्ष्य से स्पष्ट है कि कोई सामान्य अपवाद लागू होगा तो यह न्यायालय का दायित्व होता है कि वह देखे कि पर्याप्त मात्रा में प्रमाण उपलब्ध है जो अभियुक्त को सामान्य अपवाद का लाभ दिलाने में सक्षम है। अध्याय 4 में उल्लिखित सिद्धान्त वास्तव में साक्ष्य के सिद्धान्त हैं जो निश्चयात्मक या खण्डनीय (rebuttable) उपधारणा से सम्बन्धित हैं। वे उन परिस्थितियों से सम्बन्धित हैं जो मन:स्थिति के अस्तित्व को
  1. । दहयाभाई छगनभाई ठाकर बनाम गुजरात राज्य, ए० आई० आर० 1964 एस० सी० 1563.
  2. उलमिंगटन बनाम डी० पी० पी० 1935 ए० सी० 462; के० एम० नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए० आई० आर० 1962 सु० को० 605; भिखारी बनाम उ० प्र०, 1966 क्रि० लाँ ज० 63; योगेन्द्र मोरारजी बनाम गुजरात राज्य, 1980 क्रि० ला ज० 459.
  3. धारा 105 भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872.
  4. के० एम० नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए० आई० आर० 1962 एस० सी० 605.
  5. प्रभू बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1941 इलाहाबाद 402 (एफ० बी०).
  6. ‘मुसम्मात आनन्दी, (1923) 45 इला० 329.
प्रतिषिद्ध (Preclude) करती है। अतः वे उन परिस्थितियों के वर्णन (परिगणना) हैं जो मन:स्थित अस्तित्व के असंगत हैं। हदा उन सिद्धान्तों को ‘अआरोप्यता की शर्ते’ (non-imputability) कहते हैं त केनी इन्हें ‘आपराधिक दायित्व से मुक्ति की शर्ते” कहते हैं। यदि मामले को किसी भी अपवाद के अन्तर्गत लाने वाली परिस्थितियों या तथ्यों के अस्तित्व को सिद्ध कर दिया जाता है तो यह अपराध के लिये आवश्यक मन:स्थिति के अस्तित्व को समाप्त कर देता है और आपराधिक दायित्व से मुक्ति के लिये आधार प्रदान करता अध्याय 4 में वर्णित धाराओं का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि वे दो विस्तृत प्रकार के अपवादों से सम्बन्धिते हैं। ये हैं-(1) क्षम्य (Excusable), (2) युक्तिसंगत (Justifiable)। क्षम्य प्रतिरक्षायें वे हैं जिनमें कारित कार्य मन:स्थिति के आवश्यक तत्वों के अभाव के कारण माफ कर दिया जाता है। ऐसे मामलों में कार्य अपराध नहीं होता क्योंकि अभियुक्त का आशय आपराधिक नहीं था। दण्ड संहिता की धारा 76 से 95 क्षमा योग्य बचावों से सम्बन्धित है। न्यायोचित या तर्कसंगत प्रतिरक्षाओं में कारित कार्य को माफ नहीं किया जाता अपितु कुछ आधारों पर तर्कसंगत ठहराया जाता है क्योंकि अन्यथा उपागत (incurred) दायित्व को ये शुन्य कर देते हैं। कार्य यद्यपि आपराधिक होता है परन्तु दण्डनीय नहीं, क्योंकि यह अन्य रूप में सराहनीय होता है। दण्ड संहिता की धारायें 96 से 106 तक तर्कसंगत (justifiable) प्रतिरक्षाओं से सम्बन्धित हैं।
  1. विधि द्वारा आबद्ध या तथ्य की भूल के कारण अपने आप को विधि द्वारा आबद्ध होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य-कोई बात अपराध नहीं है, जो किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाए जो उसे करने के लिए विधि द्वारा आबद्ध हो या जो तथ्य की भूल के कारण, न कि विधि की भूल के कारण सद्भावपूर्वक विश्वास करता हो कि वह उसे करने के लिए विधि द्वारा आबद्ध है।
दृष्टान्त (क) विधि के समादेशों के अनुवर्तन में अपने वरिष्ठ आफिसर के आदेश से एक सैनिक क भीड़ पर गोली चलाता है। क ने कोई अपराध नहीं किया। (ख) न्यायालय का आफिसर, क, म को गिरफ्तार करने के लिए उस न्यायालय द्वारा आदिष्ट किए जाने । पर और सम्यक् जांच के पश्चात् यह विश्वास करके कि य, म है, य को गिरफ्तार कर लेता है। क ने कोई अपराध नहीं किया। टिप्पणी । भारतीय दण्ड संहिता का अध्याय 4, जिसका शीर्षक साधारण अपवाद” है, आरोप्यता की सामान्य शर्तों या आपराधिक दायित्व से उन्मुक्ति के सामान्य आधारों में सम्बन्धित है। इन उन्मुक्तियों के आधारों की प्रकृति व्यक्तिनिष्ठ (subjective) प्रतीत होती है। भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 76 से 106 तक का विश्लेषण करने पर प्रतीत होता है कि ये उन परिस्थितियों से सम्बन्धित हैं जो मन:स्थिति के अस्तित्व को नकार देती हैं। ये मात्र उन परिस्थितियों के परिगणन हैं जो मन:स्थिति के अस्तित्व से असंगत हैं। किसी अपराध को गठित करने हेतु दो मूलभूत चीजें आवश्यक हैं, (1) दुराशय तथा (2) उस दुराशय के परिणामस्वरूप एक स्वैच्छिक कार्य । आपराधिक उत्तरदायित्व की निम्नलिखित आवश्यक शर्ते हैं8 (1) अबाध या स्वतन्त्र इच्छा (free will); (2) कल्याण (good) तथा अनिष्ट (evil) में भेद करने की शक्ति; (3) उन तथ्यों का ज्ञान जिन पर किसी कार्य की अच्छाई या बुराई निर्भर करती है; (4) कार्य का विधि द्वारा प्रतिषिद्ध होने का ज्ञान । इसे सुविधाजनक औचित्य (expediency) के आधार पर अपवर्जित कर दिया गया है।
  1. हुदा, एस० : प्रिंसिपल्स आफ लॉ आफ क्राइम्स, पृ० 216.
  2. उपरोक्त सन्दर्भ. ।
यदि उपरोक्त वर्णित शर्तो में से कोई भी एक अनुपस्थित है तो उत्तरदायित्व शून्य हो जायेगा। हर व्यक्ति |ग होता है तथा वह अपनी इछा के अनुसार कार्य करने को स्वतन्त्र है। जब कोई व्यक्ति । अबाध इा से कार्य करता है तो कार्य को रवैक्षिक कार्य कहा जाता है। परन्तु यदि इच्छा जो एक को कार्य करने के लिये प्रेरित करती है , भय या दवाव (Compulsion) द्वारा उत्पन्न की गई है तो भी स्थिति में न तो इच्छा को अबाध और न कार्य को स्वैच्छिक कहा जा सकता हैं। ‘गह एक निश्चायक ((Conclusiv) उपधारणा है कि प्रत्येक मनुष्य उचित एवं अनुचित (right and wron७) तथा कल्याण एवं अUि में विद करने के लिये पर्या बुद्धि रखता है। यद्यपि यह एक मान्यता प्राप्त सिद्धान्त है परन्तु इसके कुछ अपवाद भी हैं, जैसे- शैशव, उन्मत्तता, तथा अनैच्छिक मत्तता।। कल्याण तथा अनिष्ट के बीच भेद निश्चयत: तथ्यों के ज्ञान पर निर्भर करता है। यही कारण है कि ऐसे तथ्यों, जो कल्याण एवं अनिष्ट । तर ‘पष्ट करने के लिये आवश्यक है, के अज्ञान या भूल के कारण ही आपराधिक दायित्व से उन्मुक्ति मिलती है। परन्तु किसी तथ्य की अज्ञानता या भूल जो उन्मुक्ति का आधार बनते हैं, असतर्कता या उपेक्षा के कारण नहीं होने चाहिये। भूल का अर्थ (Meaning of Mistake)-‘तथ्य की भूल क्षम्य है, विधि की भूल क्षम्य नहीं है”, (Ignorantia facti excusat, Ignorantia legis neminem excusat) 26 39 fafe at सुविदित सिद्धान्त है। यह सिद्धान्त कि तथ्य की भूल क्षम्य है (ignorantia fucti ccusat) मन:स्थिति के सिद्धान्त का अनुकरण करता है। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ है-तथ्य सम्बन्धी त्रुटि (factual error) | ‘‘जो मात्र छाया (appearance) है उसको यथार्थ के रूप में स्वीकार कर लेना भूल है।”) उदाहरण के लिये रात्रि । में एक व्यक्ति एक दूर स्थित वस्तु को देखता है और उसे यह एक व्यक्ति मान लेता है। परन्तु जब वह उसके सगीप पचता है तो पाता है कि वह लकड़ी का एक कुन्दा है। उसका पहले वाला विचार गलत साबित हो । जाता है। कोई विचार निर्णय या विश्वास उस अन्य विचार, जो तथ्य के अनुरूप है, के संदर्भ में त्रुटिपूर्ण है।10। हाल के अनुसार त्रुटि में निम्न अन्तर्निहित है।। (1) तथ्य अस्तित्ववान है। (2) यह कि तथ्यों की धारणा प्रज्ञा (जिरो हाल सेन्सा कहते हैं) तथ्यों से भिन्न होती है। (3) यह कि प्रज्ञा (Sensa) तथ्यों के सुसंगत है या नहीं।। (4) यह कि त्रुटिपूर्ण प्रज्ञा एक समय के लिये सत्य स्वीकार की जाती है अर्थात् वे तथ्य के सर्वांगसम माने जाते हैं। | (5) यह कि प्रज्ञा बाद में त्रुटिपूर्ण मानी जाती है अर्थात् कुछ विचार गलत हो जाते हैं जब वे विस्तृत | अनुभव के अधीन परखे जाते हैं, खासकर तब जब सम्यक अनुभूति की अपेक्षाकृत पर्याप्त शर्ते उपलब्ध हों। भूल (Ignorantia) इस शब्द का प्रयोग अनभिज्ञता (ignorance) तथा भूल (mistake) के अर्थ में हुआ है और ये दोनों शब्द अदल-बदल कर एक ही अर्थ में प्रयोग किये जाते हैं। अनभिज्ञता का अर्थ है ज्ञान का अभाव अथवा अपर्याप्त ज्ञान के कारण कारित गलत राय का निर्णय। अनभिज्ञता तथा भूल के बीच अन्तर। को स्पष्ट करते हुये स्टोरी कहते हैं-”तथ्य की भूल यथार्थ तथ्य के बारे में त्रुटिपूर्ण विचार सदैव कल्पित करता है, किन्तु तथ्य की अज्ञानता बिना किसी त्रुटि के भी हो सकती है। परन्तु इसका परिणाम ज्ञान या विचार का मात्र अभाव होता है।”12 अत: अज्ञानता में विषय वस्तु के सन्दर्भ में ज्ञान का पूर्ण अभाव अन्तर्निहित है। भूल में ज्ञान तो विद्यमान होता है परन्तु गलत निष्कर्ष अन्तर्निहित है ।13 परन्तु यह विभेद विधि पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं डालता ।14
  1. स्टाउट, एरर इन स्टडीज इन फिलासफी एड साइकोलाजी, पृ० 271 (1930).
  2. हाल, जेरोम, जनरल प्रिंसिपल्स आफ क्रिमिनल ला, (2रा संस्करण) पृ० 362
  3. उपरोक्त सन्दर्भ ।।
  4. स्टोरी, इक्विटी जुरिस्पूडेस (13वां संस्करण, 1886) पृ० 158.
  5. हरन बनाम इगर्टन, 6 एस० सी० 485, पृ० 489 (1975),
  6. हाल, जेरोम, जनरल प्रिंसिपल्स आफ क्रिमिनल लॉ, पृ० 36.
तथ्य की भूल को क्षम्य होने के लिये यह आवश्यक है कि वह भूल वास्तविक तथ्य के सम्बन्ध में होनी चाहिये, और तथ्य भी ऐसा जो अपराध विशेष को गठित करने हेतु आवश्यक हो। केवल ऐसी ही अनभिज्ञता अपराध को निर्मित करने वाली आवश्यक मन:स्थिति को शून्य करती है और जैसा कि बैरन पार्क ने इंगित किया है और हुदा ने स्वीकार किया है, कि अभियुक्त का दोष परिस्थितियों, जैसा कि वे उसे प्रतीत हई हो । पर निर्भर करता है।15 रसेल के अनुसार भूल को प्रतिरक्षा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है यदि16-। (1) यह कि यदि वस्तु की यह अवस्था जिसके अस्तित्व में होने का विश्वास किया है, यदि सत्य है, तो किये हुये कार्य को न्यायोचित ठहरायी होती; (2) यह कि भूल युक्तियुक्त होनी चाहिये; (3) यह कि भूल तथ्य से सम्बन्धित हो न कि विधि से। जो कोई अपनी प्रतिरक्षा के लिये भूल की सहायता लेता है उसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने मस्तिष्क की उस स्थिति को जिसे वह अपराध कारित करते समय उपस्थित बताता है, के अस्तित्व को या उसके अस्तित्व की सम्भाव्यता को सिद्ध करें। यदि यह सिद्ध हो जाता है तब यह देखा जायेगा कि क्या तथ्यों की छाया (appearance), जिसके द्वारा भ्रमित होने को वह अभिवाचित करता है, ने एक युक्तियुक्त व्यक्ति” को भी भ्रमित किया होता। दूसरे शब्दों में जो कुछ अभियुक्त ने विश्वास किया वह सदाशयी (bonafide) और सद्भाविक होना चाहिये। भारतीय विधि- भूल से सम्बन्धित भारतीय विधि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 76 और 79 में वर्णित है। धारा 76 को विश्लेषित करने पर निम्नलिखित तत्व प्राप्त होते हैं (1) एक व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कार्य जिसे करने के लिये वह विधि द्वारा बाध्य है, या (2) एक व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कार्य जिसे करने के लिये वह विधि द्वारा अपने को बाध्य समझता है, (3) यह विश्वास तथ्य की भूल के कारण होना चाहिये न कि विधि की भूल के कारण अर्थात् भूल तथ्य से सम्बन्धित होनी चाहिये न कि विधि से, (4) उसने सद्भावपूर्वक विश्वास किया हो अर्थात् विश्वास यथार्थ तथा सद्भावपूर्वक होना चाहिये। यदि उपरोक्त शर्ते पूरी हो जाती हैं तो किसी भी अपराध के अभियोजन से प्रतिरक्षा हेतु इसे सफलतापूर्वक अभिवाचित किया जा सकता है। तथ्य की भूल (Mistake of fact)–भूल मात्र विस्मृति नहीं है।17 यह विस्मृति, अज्ञान या अपूर्ण सूचना से हो भी सकती है और नहीं भी। यह दुर्भाग्य द्वारा हुई चूक है।18 भूल को प्रतिरक्षा (defence) होने के लिये आवश्यक है कि वह तथ्य से सम्बन्धित हो न कि विधि से। कामन लॉ के अन्तर्गत उन परिस्थितियों के अस्तित्व के बारे में सत्य एवं युक्तियुक्त विश्वास जो यदि सत्य हैं, उस कार्य जिसके लिये कैदी पर दोषारोपण हुआ है को निर्दोष कार्य बना देगी, सदैव एक उत्तम प्रतिरक्षा माना गया है। आर० बनाम टाल्सन19 के वाद में न्यायमूर्ति केब ने प्रेक्षित किया कि ईमानदारी से हुई एवं युक्तियुक्त भूल उसी धरातल पर खड़ी है जिस पर तार्किक शक्ति का अभाव जैसे शैशव में या तार्किक शक्ति का विकृत रूप (Perversion) जैसे पागलपन में। इसी मामले में न्यायमूर्ति स्टीफेन ने यह सामान्य नियम प्रतिपादित किया कि कथित अपराधी को तथ्य की उस स्थिति के अन्तर्गत कार्य किया हुआ मानना चाहिये जिसे उसने सद्भावपूर्वक तथा युक्तियुक्त आधारों पर उस समय अस्तित्ववान समझा जिस समय उसने यह आरोपित कार्य किया जो अपराध
  1. हुदा, प्रिन्सिपल्स आफ ला आफ क्राइम्स, पृ० 226.
  2. रसेल आन क्राइम्स, भाग 1, (11वीं संस्करण) प० 79-80
  3. बारो बनाम इसाक्स, (1891) 1 क्यू० बी० 417,
  4. स्टैण्डफोर्ड बनाम बील, (1899) 56 एल० जे० क्यू० बी० 73.
  5. (1899) 23 क्यू० बी० डी० 188.
गठित करता है | यह इसलिये न्यायसंगत है, क्योंकि ऐसे अज्ञान अनेक बार कार्य स्वयं को नैतिक रूप से क बना देते हैं।20 उदाहरण के लिये जहाँ ‘क’ ने सद्भावपूर्वक ‘ख’ एक मनुष्य को एक प्रेत समझा ये घातक चोटें कारित किया, ‘क’ किसी अपराध का दोषी नहीं होगा।21 यहाँ क को उसी स्थिति में आया जायेगा जैसा कि उसने यथार्थतः उसे समझा था ‘क’ ने ‘ख’ को एक प्रेत समझा था तथा प्रेत की हत्या ना कोई अपराध नहीं है अत: ‘क’ ने कोई अपराध नहीं कारित किया। | पदावली ‘तथ्य की भूल क्षम्य है” (Ignorantia facti doth excuse) के दो अपवाद हैं। पहला यह है। कि किसी व्यक्ति को तथ्य के अज्ञान को अभिवाचित करने नहीं दिया जायेगा। यदि विश्वसनीय छान-बीन ने वास्तविक तथ्य को प्रकट कर दिया होता। उदाहरण के लिये यदि कोई व्यक्ति इस सत्य विश्वास के आधार पर कि उसका पहला विवाह तलाक की डिक्री द्वारा विच्छेद हो चुका है, दूसरा विवाह कर लेता है जबकि यथार्थतः तलाक की डिक्री नहीं पारित हुई है वह द्विविवाह का दोषी होगा।22 यहाँ भूल उसे बचा नहीं। सकेगी, क्योंकि दूसरा विवाह, पहले विवाह के विच्छेद के बारे में उचित छान-बीन किये बगैर सम्पन्न किया। गया था। दूसरा, यह कि तथ्य की भूल को एक अभिवचन के बारे में कतई स्वीकार नहीं किया जाता जब कार्य को संविधि द्वारा अपराधकर्ता के मस्तिष्क को सन्दर्भित किये बिना दण्डित किया जाता है। उदाहरण के लिये अपमिश्रित भोज्य पदार्थों का बेचना खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 (Prevention of Food Adulteration Act, 1954) के अन्तर्गत अपराध घोषित किया गया है। यदि ऐसे मामले में विक्रेता के विरुद्ध अभियोजन दायर किया जाता है तो वह यह नहीं कह सकता कि उसे उस पदार्थ की प्रकृति, सार तथा विशेषता के बारे में कोई ज्ञान नहीं था। आर० बनाम प्रिंस-3 के बाद में अभियुक्त पर आरोप था कि उसने एक अविवाहित लड़की, जो सोलह वर्ष से कम आयु की थी, को उसके पिता के कब्जे से उसकी इच्छा के विरुद्ध हटाया। यह पाया गया कि अभियुक्त ने यथार्थतः तथा समुचित आधार पर विश्वास किया कि लड़की सोलह वर्ष से अधिक आयु की है। अपहरण के लिये सजा से प्रतिरक्षा हेतु लड़की की उम्र के बारे में अभियुक्त के भ्रामक विश्वास को स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि उसने एक दोषपूर्ण तथा अनैतिक कार्य करने की इच्छा की तथा उसे किया। उसने कोई निर्दोष कार्य नहीं किया था। व्यक्ति के विरुद्ध अपराध अधिनियम (The Offences Against Persons Act), 1857 की धारा 55, जिसके अन्तर्गत अपहरण का अपराध निर्मित हुआ है, का आशय अपराधी को उसके दुराशय के अभाव में भी दण्डित करना था। आर० बनाम टाल्सन24 के वाद में अभियुक्त को द्विविवाह के लिये सजा दी गई थी। उसने अपने पति द्वारा त्याग दिये जाने के पश्चात् सात साल के भीतर ही दूसरा विवाह कर लिया। उसने सद्भावपूर्वक तथा समुचित आधारों पर विश्वास किया कि उसके पति की मृत्यु हो गयी थी। यह निर्णीत हुआ कि समुचित आधारों पर सद्भावपूर्ण विश्वास उसे द्विविवाह के अपराध से उन्मुक्ति प्रदान करता है। इसी प्रकार शेराज बनाम डी० रूजेन25 के वाद में एक संविधि ने एक लाइसेन्सधारी शराब विक्रेता को किसी पुलिस कान्सटेबल को जब कि वह ड्यूटी पर हो शराब देने से प्रतिषिद्ध किया था। किन्तु विक्रेता ने उसे सद्भावपूर्ण विश्वास से उसे शराब दिया कि वह अपनी ड्यूटी समाप्त कर चुका है। यह निर्णीत हुआ कि उसने कोई अपराध नहीं किया है। कण्डी बनाम लीकाक26 के वाद में एक मद्यविक्रेता (Publican) पर आरोप था कि उसने एक उन्मत्त व्यक्ति को शराब बेचा जिसने उन्मत्तता का कोई संकेत नहीं दिया था। संविधि द्वारा किसी भी उन्मत्त व्यक्ति। को एक लाइसेन्सधारी विक्रेता द्वारा शराब बेचना अपराध घोषित कर दिया था। मद्यविक्रेता को यह ज्ञात नह।
  1. 1 हेल पी० सी० 42,
  2. वरयाम सिंह, (1926) 2 क्रि० लाँ ज० 39.
  3. आर० बनाम हवीट एण्ड स्टाक्स, (1921) 2 के० बी० 129.
  4. (1875) एल० आर० 2 सी० सी० आर० 154.
  5. (1889) 23 क्यू० बी० डी० 168.
  6. (1895) 1 क्यू० बी० 918. ।
  7. (1884) 13 क्यू० बी० डी० 207.
था की जिस कि जिस व्यक्ति को शराब दी जा रही है वह उन्मत्त है। यह निणीत हुआ कि संविधि के अन्तर्गत प्रतिषिद्ध (Prohibition) पूर्ण है तथा शराबी व्यक्ति को दशा का ज्ञान अपराध निर्मित करने के लिये आवश्यक नहीं है। भूल इसलिये एक प्रतिरक्षा है क्योंकि जब कोई कार्य तथ्य की भूल के कारण किया जाता है अपराध को निर्मित करने वाली आवश्यक मन:स्थिति या तो अनुपस्थित होती है या शून्य घोषित कर दी जाती है। रेप बनाम लीवेटस-7 के बाद में अभियुक्त एक रात्रि अपने घर में विचित्र आवाज सुनकर जग गया यह कि वह एक चोर पर प्रहार कर रहा है, उसने अन्त:काल में अपनी तलवार घुमाया जहाँ अतिक्रमी (in दिग्पा हुआ था और उसने अपने नौकर के मित्र को जो वहाँ नौकर के नियन्त्रण पर आया था, मार डाला। उसे मानव वध नहीं माना गया, क्योंकि इसे उसने अज्ञानतावश मृतक को चोट न पहुँचाने की इच्छा से किया था। ” कुछ मामलों में जिनमें भूल को प्रतिरक्षा हेतु अभिवाचित किया जा सकता है, इस प्रकार हैं (1) जहाँ एक रेल परिचालन एक यात्री को, जो बार-बार मांगने पर भी किराया देने से इन्कार करता है, इस विश्वास पर उसने किराया नहीं दिया है, बलपूर्वक बाहर ढकेल देता है।28 (2) जहाँ एक व्यक्ति मताधिकार के प्रयोग के लिये निर्धारित आयु को प्राप्त किये बिना इस विश्वास से कि उसने आयु प्राप्त कर लिया है, वोट दे।29 गोपालिया कलैया30 के बाद में एक पुलिस अधिकारी ने शिकायतकर्ता को एक वारण्ट के अन्तर्गत इस विश्वास से कि उसी व्यक्ति को कैद करना है, कैद किया। शिकायतकर्ता ने उसके विरुद्ध सदोष परिरोध के लिये प्रक्रिया आरम्भ किया। यह निर्णीत हुआ कि पुलिस अधिकारी दोषी नहीं है, क्योंकि वह इस धारा द्वारा रक्षित है। भाऊ जिवाजी बनाम मुली दयाल31 के वाद में अभियुक्त जो एक पुलिस कान्सटेबल था उसने शिकायतकर्ता को एक दिन सुबह अपने काँख में कपड़े के तीन टुकड़ों को ले जाते हुये देखा। उसने कपड़ों को चोरी का माल होने का सन्देह कर शिकायतकर्ता से उसके बारे में पूछा। शिकायतकर्ता ने उसके प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। उसके काँख के कपड़ों को दिखाने से भी इन्कार कर दिया। इस पर कान्सटेबल ने उसे कैदी बना लिया। बाद में यह पाया गया कि कपड़ा चोरी का माल नहीं था। अतः शिकायतकर्ता ने कान्सटेबल के विरुद्ध सदोष अवरोध एवं सदोष परिरोध के लिये अभियोजन दायर किया। उच्च न्यायालय ने निर्णीत किया कि कान्सटेबल के विरुद्ध दण्डादेश दोषपूर्ण है क्योंकि उसने इस सद्भावपूर्ण विश्वास के अन्तर्गत कार्य किया था कि जिसे वह चोरी की हुई सम्पत्ति समझता है उसे निरोधित (detaining) करने में वह विधि द्वारा न्यायानुमत (legally justified) है। वह इस धारा के अन्तर्गत सुरक्षित है क्योंकि उसकी भूल तथ्य से सम्बन्धित है तथा सद्भावपूर्ण है। शिकायतकर्ता से पूछे गये प्रश्न स्पष्टत: आशय को दर्शित करते हैं। अत: वह दायी नहीं है। प्रवर आदेशों का अभिवचन (Plea of Superior’s orders)–सिपाहियों के मामलों में, भारतीय दण्ड संहिता वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को अन्धाधुन्ध पालन के दायित्व को उसके कार्य के आपराधिक परिणामों से प्रतिरक्षा हेतु पर्याप्त नहीं मानती है। अवैध कार्य के लिये न तो माता-पिता का, न तो मालिक का और न ही वरिष्ठ अधिकारी का आदेश प्रतिरक्षा प्रदान कर सकता है। वरिष्ठ प्रतिवादी” (Respondent Superior) का नियम ऐसे मामलों को लागू नहीं होता। अवैध आदेश के पालन का अभिवचन मात्र दण्ड की। कम करने हेतु ध्यान में रखा जा सकता है। परन्तु इसे पूर्ण प्रतिरक्षा हेतु स्वीकार नहीं किया जा सकता। जहा। एक कान्स्टेबुल अपने वरिष्ठ पदाधिकारी के आदेश पर विधि विरुद्ध जमाव पर गोली चलाता है वह दायित्वाधान है और इस धारा का लाभ नहीं प्राप्त कर सकता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने वरिष्ठ पदाधिकारी के अवैध आदेशों के पालन करने हेतु बाध्य नहीं है।
  1. 79 इंगलिश रिपोर्ट (1064) के० बी० 1638.
  2. स्टेट बनाम मैक्डोनाल्ड 7 मूर्स अपील, 510 (1879).
  3. गोर्डन बनाम राज्य, 52, अला० (308) 1875.
  4. (1923) 26 बाम्बे लॉ रि० 138.
  5. (1888) 12 बाम्बे 377.
पश्चिम बंगाल राज्य बनाम शिव मंगल सिंह32 के बाद में पुलिस बल के एक सदस्य को भीड़ द्वारा हिंसा के फलस्वरूप उस समय उपहति कारित की गई जब वह गस्त लगा रहा था। डिप्टी पुलिस कमिश्नर ने पलिस को गोली चलाने का आदेश दिया जिसके फलस्वरूप भीड़ के कुछ सदस्य मारे गये। उन पर हत्या के लिये अभियोजन चलाया गया। उच्चतम न्यायालय ने अभिनित किया कि सिपाहियों ने वरिष्ठ अधिकारी के आदेश पर गोली चलाया था। इसलिये हत्या के लिये दोषसिद्धि नहीं प्रदान की जा सकती। इस वाद में वरिष्ठ अधिकारी के आदेश की वैधता को चुनौती नहीं दी गई थी। यह धारा वरिष्ठ अधिकारी के आदेशों के अनुपालन को सीमित रूप में सुरक्षा प्रदान करती है जैसा कि इस धारा में दिये गये दृष्टान्त से सुस्पष्ट है। वरिष्ठ अधिकारी के सभी आदेशों के अनुपालन के सन्दर्भ में यह धारा सुरक्षा नहीं प्रदान करती है। सद्भावनापूर्वक विश्वास या त्रुटि की युक्तियुक्तता (Belief in good faith or reasonableness of error)–तथ्य की एक वास्तविक भूल पर्याप्त नहीं है। भय या खतरा यथार्थ और युक्तियुक्त होना चाहिये।33 अभियुक्त की तथ्यों के विषय में भ्रामक बोधगम्यता नहीं अपितु ‘‘तथ्य जैसे उसे प्रतीत हुये हों” निर्धारित करते हैं कि वह आपराधिक रूप से दायित्वाधीन है या नहीं 34 अतः प्रत्येक भूल प्रतिरक्षा नहीं प्रदान करती है। उसे युक्तियुक्त होना चाहिये तथा सद्भाव में की गई हो। अतः तथ्यों की उस स्थिति का साक्ष्य होना चाहिये जो सद्भाव में विश्वास को न्यायोचित ठहरायेगा। पदावली ‘‘सद्भावपूर्वक को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 52 के सन्दर्भ में निर्वाचित करना चाहिये। । कोई व्यक्ति जिसने ‘‘अयुक्तियुक्तता” से कार्य किया है कदाचित् उसी प्रकार दण्डनीय होता है जैसे वह दण्डनीय हुआ होता यदि उसने यथार्थतः नुकसान कारित करने का आशय किया होता। ऐसा बहुधा द्विविवाह तथा अन्य आपराधिक मामलों में होता है। उपेक्षापूर्ण व्यवहार में कारित क्षति के लिये लापरवाही अन्तर्निहित है, जबकि तथ्यों की अज्ञानता की कार्यवाहियों में कर्ता को क्षति पहुँचाने का आशय होता है परन्तु जिसे वह, यदि भ्रमित नहीं रहा होता है तो कारित नहीं किया होता। अतः यह प्रतिवादी की क्षमता है। (जानने की तथा उचित सतर्कता से कार्य करने की) जिस पर सामान्य तत्व के रूप में बहुधा बल दिया जाता है।36 आवश्यक ज्ञान प्राप्त करने की अभियुक्त की क्षमता को इन शर्तों के अधीन परखा जाता है कि क्या उसकी अनभिज्ञता जेय थी या अजेय (vincible or invincible) । अरस्तु के अनुसार जब क्षति ”अज्ञानता। में कारित की जाती है, अपराधकर्ता दण्डनीय होगा, परन्तु जहाँ यह मात्र ‘अनभिज्ञता” में ही नहीं बल्कि अनभिज्ञता द्वारा भी की जाती है, वह दण्डनीय नहीं है। जहाँ कर्ता आवश्यक ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम था, अनभिज्ञता जेय (vincible) है, परन्तु यदि उसमें इस योग्यता की कमी थी तो यह ‘अजेय’ (invincible) थी। प्रोफेसर हाल इस विभेद को स्वीकार नहीं करते हैं। योग्यता की कमी को प्रेक्षित करते हुये कहते हैं कि अरस्तू की स्थिति, कामन लॉ की अपेक्षा, अधिक विभेदकारी (discriminating) है, जो यह विनिश्चित करता है कि यदि व्यक्ति स्वस्थचित्त का है तो यह निश्चायक रूप से (conclusively) अवधारित किया जायेगा कि उसके पास आवश्यक क्षमता है। यदि इस अवधारणा को अस्वीकृत कर दिया जाता है, जैसे ऐसे व्यक्ति हों जो यद्यपि स्वस्थ चित्त के हों, कुछ मामलों में इस प्रकार अक्षम हो गये हों कि उनमें सामान्य निपुणता का अभाव हो37, या ज्ञान, जिसका अर्थ है ऐसे व्यक्तियों की योग्यता के अभाव के फलस्वरूप हुई। हानि के लिये वे नैतिक रूप से दण्डनीय नहीं हैं, और उन्हें आपराधिकत: दायी नहीं माना जाना चाहिये।28। जहाँ कोई कार्य सारवान तत्व की अनभिज्ञता के कारण किया जाता है और उपेक्षा से अधिक कुछ नहीं प्रतीत होता है, कर्ता दायी होना चाहिये। किन्तु यदि निर्णय अनुपयुक्तता या किसी एक दाण्डिक दायित्व की
  1. 1981 क्रि० लाँ ज० 1683 (सु० को०). ।
  2. हिल बनाम राज्य, 2 ए० एल० आर० 509 (1915).
  3. नैली बनाम राज्य, 28 टेक्स कोर्ट अपील (387) (1890).
  4. रेगिना बनाम रोज, (1884) 15 काक्स० सी० सी० 540.
  5. हाल जेरोम, जनरल प्रिंसिपल्स आफ क्रिमिनल लॉ, (2रा संस्करण) 368
  6. एटस बनाम पीपल, 32 एन० वाई० 509 (1865).
  7. हाल, जेरोम जनरल प्रिंसिपल्स आफ क्रिमिनल लॉ, (2रा संस्करण) 369.
अजेयता की परख से उत्पन्न होता है, तो प्रोफेसर हाल की राय में यह अपेक्षा (negligence) तथा लापरवाही (recklessness) के बीच के महत्वपूर्ण अन्तर को ध्यान में नहीं रखता। यद्यपि अयोग्यता या अनभिज्ञता जेय (vincible) या अनुपयुक्त (unreasonable) रही हो इसका अर्थ यह नहीं है कि कारित क्षति ऐच्छिक लापरवाही (inadvertence) या अज्ञानता (ignorance) के परिणामस्वरूप हुई हानि अयोग्यता तथा अक्षमता को जाहिर करती है न कि ऐच्छिक दुराचरण को जो कि दाण्डिक विधि का विषय है 39 इसका अर्थ – नहीं है कि समाज को खतरनाक योग्यता या अनभिज्ञता से बचाया ही न जाय। प्रोफेसर हाल सुझाव देते हैं सिद्धान्त तथ्य की भूल” के सारवान निर्बन्धन (Restriction) के रूप में उपयुक्तता का निरसन। आपराधिक आचरण की प्रकृति के सम्बन्ध में लोकमत को स्पष्ट कर देगा। यह आपराधिक विधि के विश्लेषण में सहायता प्रदान करेगा और इसके स्वस्थ प्रशासन को प्रेरित करेगा 40 शिव सरन सहाय बनाम मुहम्मद फजील खान-1 के वाद में एक पुलिस अधिकारी ने द के परिसर (premises) में एक घोड़ा बंधा देखा। कुछ समय पूर्व उसके पिता का घोड़ा खो गया था और यह घोड़ा बिल्कुल उसी जैसा था, अत: उसने सोचा कि या तो द ने ही उसे चुराया था या उसने इसे चोर से खरीदा है। अधिकारी ने द को बाध्य किया कि वह घोड़े के कब्जे के विषय में बयान दे। तब उसे पता लगा कि द ने घोड़े को प से खरीदा है। इस पर उसने प पर चोरी का आरोप लगाया और उसे बाध्य किया कि वह जब तक छानबीन लम्बित है जमानत दे। उस पुलिस अधिकारी ने न तो उस कथित मालिक के बारे में ही छानबीन किया और न ही इस बात का पता लगाने की कोशिश किया कि घोड़ा उसके पिता का है या नहीं। न्यायालय ने पाया कि पुलिस अधिकारी ने सद्भाव में कार्य नहीं किया था। अत: यह इस धारा के अन्तर्गत अपने को प्रतिरक्षित नहीं कर सकता। विभ्रम (Delusion) के क्षणों में किये गये ऐसे कार्य भी इस धारा के अन्तर्गत रक्षित हैं। चिरंगी बनाम राज्य-2 के वाद में अभियुक्त ने विभ्रम के क्षण में निश्चित किया कि उसका एकमात्र पुत्र बाघ (Tiger) था, उसने उस पर यह सोच कर कुल्हाड़ी से प्रहार किया, तथ्य की भूल के कारण, कि मृतक को नष्ट करने में वह कोई अनुचित कार्य नहीं कर रहा है। मृतक को उसने एक ननुष्य नहीं समझा था अपितु उसे एक खतरनाक जानवर समझ रखा था, अत: वह अपराध के लिये दोषी नहीं पाया गया। विधि की भूल (Mistake of law)-विधि की भूल का अर्थ है किसी विशिष्ट विषय पर किसी विधि के अस्तित्ववान होने या अन्यथा के विषय में भूल तथा इसके विषय में भी भूल कि विधि क्या है। पदावली ‘तथ्य की भूल के कारण न कि विधि की भूल कारण” जिसका प्रयोग धारा 76 में हुआ है, उस लैटिन सूत्र को व्यक्त करती है जिसका अर्थ है ‘‘तथ्य की भूल क्षमा करती है, विधि की भूल क्षमा नहीं करती’ (Ignorantia facti excliSat ignountia juris non-exclusar) लैटिन सूत्र का व्यापक प्रसार हुआ है। इसे केवल इंगलिश और अमेरिकी न्याय प्रणालियों में नहीं अपितु अन्य अनेक देशों में स्वीकार किया गया। है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 76 उसी लैटिन सूत्र को भारत में लागू करती है। यह नियम साक्ष्य के एक अन्य नियम पर आधारित प्रतीत होता है और वह है ‘प्रत्येक व्यक्ति के विषय में यह अवधारणा है कि वह विधि को जानता है।” हेल के अनुसार उन वस्तुओं को न जानना जिसे जानने के लिये हर कोई बाध्य है, ER FET È I” (Ignorantia corumquoe scire tenetur non-excusat)44 आस्टिन के अनुसार विधि को भूल को क्षम्य न होने के दो कारण हैं 45 पहला यह कि यदि विधि का भूल को उन्मुक्तता के लिये स्वीकार कर लिया जाये तो न्यायालय ऐसे प्रश्नों में अन्तग्रस्त हो जायेंगे जिन्ह सुलझाना शायद ही सम्भव हो और जो न्याय प्रशासन को लगभग असम्भव बना देंगे। दूसरा यह कि पक्षका द्वारा सदैव विधि को भूल को ही अभिवाचित किया जायेगा और न्यायालय प्रत्येक मामले में यह प्रर
  1. हाल, जेरोम जनरल प्रिंसिपल्स आफ क्रिमिनल लॉ, (2रा संस्करण) 369.
  2. उपरोक्त सन्दर्भ पृ 372.
  3. (1868) 10 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 20.
  4. ए० आई० आर० 1952 नागपुर 282.
  5. दि किंग बनाम तुस्तीपद मण्डल, १० आई० आर० 1951 उड़ीसा 284
  6. 1 हेल पी० सी० 42. ।
  7. आस्टिन, जुरिसबूडेन्स, भाग 1, पृ० 478.
उत्तरित करने को बाध्य हो जायेंगे कि क्या पक्षकार यथार्थतः विधि से अनभिज्ञ थे। विलिस जज के अनुसार की प्रतिरक्षा न्याय प्रशासन में अनिश्चितता के तत्वों को पुनस्र्थापित करेगी 46 अन्य लोगों का ना है कि प्रत्येक व्यक्ति विधि को जानता हुआ माना जाता है। अत: राज्य का दायित्व उस समय समाप्त हो है जब वह नव अधिनियमित विधि को जारी कर देता है तथा लोक नीति व्यक्तिगत लाभ को सामाजिक राध हे बलिदान कर देती है। होम्स के अनुसार यह नि:सन्देह सत्य है कि बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें । अपराधी को यह मालूम ही नहीं होता कि वह विधि का उल्लंघन कर रहा है, किन्तु इसे क्षमा के रूप में। स्वीकार करना, अनभिज्ञता को बढ़ावा देना होगा जब कि विधि निर्माताओं का आशय था कि लोग उन्हें जानें। तथा उनका पालन करें और इसीलिये व्यक्तिगत न्याय को सार्वजनिक न्याय के पक्ष में बलिदान कर दिया 48 । किन्तु इसके विरुद्ध उतने ही जोरदार वक्तव्य दिये गये हैं। यदि तथ्य की भूल क्षमा प्रदान कर सकता है। तो विधि की भूल को भी क्षमा प्रदान करना चाहिये, क्योंकि दोनों ही अपराधी मानसिक उपस्थिति को शून्य करते हैं 9 आधुनिक समय में राज्य की कार्यवाहियाँ बहुत बढ़ गई हैं-अंशत: कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के अभ्युदय के कारण और अंशतः वैज्ञानिक एवं औद्योगिक विकास के कारण जिसने सामाजिक अन्योन्यक्रिया (interaction) में नये आयाम खोले हैं। अतः प्रतिदिन बनाई जाने वाली विधियों का अम्बार (bulk) इतना बढ़ गया है कि कोई व्यक्ति चाहे वह कितना ही सावधान एवं चतुर क्यों न हो सभी विधियों का नहीं जान सकता है। देश के दूर-दराज हिस्सों में रहने वाले लोगों से यह आशा नहीं की जा सकती कि वे विधि निर्माण में प्रतिदिन होने वाले विकास से अवगत होंगे। उदाहरण के लिये, ‘संसद के किसी अधिनियम द्वारा किसी कार्य को आज दण्डनीय घोषित किया जाता है और एक व्यक्ति एक दिन बाद उसी कार्य को यह जाने बिना कि जिस कार्य को वह करने जा रहा है दण्डनीय घोषित कर दिया गया है या वह अपने परिश्रम द्वारा भी यह नहीं जान पाता है कि ऐसी कोई विधि निर्मित की गई है जो उसके कार्य को दण्डनीय घोषित करती है, वह कर डालता है, तो उसे दण्डित किया जायेगा। क्योंकि सिद्धान्त यह है कि ‘‘विधि की भूल क्षम्य नहीं है।” इस मामले में कर्ता को दण्डित किया जायेगा यद्यपि उससे यह आशा नहीं की जा सकती कि उसने उस कार्य को इस ज्ञान से किया कि वह प्रतिषिद्ध है। बहुत से विधिवेत्ताओं को यह नियम अत्यधिक कठोर प्रतीत होता है किन्तु यह भी कहा जाता है कि यह नियम लोगों को व्यवहार के मामलों को सिखाने में मदद करता है और अन्य रूप में तर्क करने का अर्थ है, अनभिज्ञता को बढ़ावा देना जो विधि निर्माताओं का कभी आशय नहीं था। इंग्लैण्ड में ऐसे मामलों को कार्यपालिका द्वारा राज्य क्षमा के लिये सुपुर्द कर दिया जाता है। अमेरिका में ऐसे कार्य जो अपने आप में दोषपूर्ण हैं तथा उनमें जो विधि द्वारा प्रतिषिद्ध है (nnaturn in se and malium prohibittumn) में विभेद किया गया है जिसका उद्देश्य विधि की भूल के लिये सीमित प्रतिरक्षा प्रदान करना है। अपने देश में ऐसा कोई अन्तर नहीं निर्धारित किया गया है। इस प्रकार के विभेद की अपने देश में बहुत आवश्यकता है। खास कर आपराधिक मामलों को समाप्त करने हेतु जहाँ आपराधिक विधि में कुछ परिवर्तन किया गया है कि जब देश में बदलती आवश्यकताओं के लिये उपयुक्त नये विधान अधिनियमित किये गये हों। किसी ऐसी प्रतिषिद्धि के अस्तित्ववान होने के विषय में पूर्णत: अनभिज्ञता किसी व्यक्ति को दण्डित करना। आपराधिक विधिशास्त्र के मूलभूत सिद्धान्तों के विरुद्ध होगा। इसके विपरीत किसी विचार के लिये राज्य को अधिक मात्रा में सतर्कता की आवश्यकता होगी और इसके लिये आवश्यक होगा कि राज्य व्यापक प्रचार द्वारा आपराधिक विधि का ज्ञान लोगों को कराये। उदाहरण के लिये, भारत में एक निश्चित आयु के पूर्व विवाह करने पर प्रतिबन्ध लगाने हेतु कानून बनाये गये हैं तथा गरीब और अनपढ़ लोग जो दूर दराज गाँवों में निवास करते हैं, उनके बारे में नहीं जानते होंगे, इसके बावजूद वे यदि इन कानूनों के विरुद्ध कार्य करते हैं, तो उन्हें दण्डित किया जायेगा। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अन्तर्गत सहमति से सम्बन्धित कानून इसका एक दुसरा उदाहरण है। आरम्भ में धारा 375, खंड 5 के अन्तर्गत सहमति की आयु 10 वर्ष पर निश्चित की।
  1. आर० बनाम टाल्सन, 23 क्यू० बी० डी० 168, पृ० 172 विलिस जज का मत.
  2. होम्स, दि कॉमन लॉ, पृ० 47.
  3. उपरोक्त सन्दर्भ, पृ० 47-48.
  4. हुदा, एस० : दि प्रिन्सिपल्स आफ दि लॉ आफ क्राइम्स, 233-34.
गई थी, सन् 1891 में इसे बढ़ा कर 12 वर्ष कर दिया गया। बाद में इसे वैवाहिक सम्बन्धों के अन्तर्गत 13 वर्ष तथा इसके बाहर 14 वर्ष कर दिया गया। सन् 1949 में पुन: संशोधन किया गया और सहमति की आयु को वैवाहिक सम्बन्धों के अन्दर और बाहर क्रमशः 15 और 16 वर्ष निश्चित किया गया। जनता ने आयु से सम्बन्धित इन सारे परिवर्तनों को जानने में वर्षों लगाया, फिर भी यदि उन लोगों ने कोई कार्य कारित किया होता तो वे इसके लिये उत्तरदायी हुये होते । अतः इन परिस्थितियों को सुलझाने हेतु कोई हल (solution) अपेक्षित है। अतः यह सुझाव दिया जाता है कि ऐसे मामलों में उत्तम हल यह होगा कि अभियुक्त को क्षमा योग्य विधि की अनभिज्ञता को स्थापित करने दिया जाय। वास्तव में अनभिज्ञता सिद्ध करने का दायित्व उसी पर होता है। इस सुझाव के समर्थन में यह कहा जा सकता है कि चूंकि भूल से सम्बन्धित विधि और तथ्य के मिश्रित प्रश्न को तथ्य की स्वच्छ और साधारण भूल मानना चाहिये, अतः विधि की भूल के लिये सीमित प्रतिरक्षा प्रदान करने में कोई हानि नहीं प्रतीत होती । इंग्लैण्ड में भी यही नियम है कि यदि अभियुक्त विधि में त्रुटि होने के कारण, एक तथ्य की भूल कर सकता है, तो उसकी भूल को तथ्य की भूल माना जायेगा न कि विधि की। विदेशियों द्वारा विधि की अनभिज्ञता (Ignorance of law by foreigners)-सूत्र ‘विधि की भूल क्षम्य नहीं है” (ignorantia juris non cusat) सभी अपराधों पर एक जैसे लागू होती है। इसका कोई अपवाद नहीं है। यहाँ तक कि एक विदेशी, जिसके बारे में यह कहा जा सकता है कि वह इस देश की विधियों से अवगत नहीं होगा, वह भी इस सिद्धान्त के दायरे के बाहर नहीं है 50 एक प्रकरण में दो फ्रांसीसी व्यक्ति एक मल्लयुद्ध में सहायक के रूप में कार्य किये। उनके ऊपर जानबूझ कर हत्या करने का आरोप था। उन लोगों ने अभिवाचित किया कि उन्हें इस इंगलिश विधि का ज्ञान नहीं था कि किसी उचित मल्लयुद्ध में दुश्मन को मारना हत्या के तुल्य है। उनके इस अभिवचन को स्वीकार नहीं किया गया और उन लोगों को हत्या का दोषी ठहराया गया।51 इस नियम की कठोरता को एक दूसरे मामले द्वारा दर्शाया जा सकता है। आर० बनाम वेली2 के वाद में यह तथ्य जिसके लिये सजा थोपी गई थी, 27 जून, सन् 1799 को घटित हुआ। उस कार्य को संसद के एक अधिनियम द्वारा 10 मई, सन् 1799 को एक अपराध घोषित कर दिया गया था। अभियुक्त लैंग्ले नामक जहाज का कप्तान था जो उस समय अफ्रीका के तट पर था और वह सम्भवत: यह नहीं जान सका कि संसद ने ऐसा कोई नियम बनाया है। सम्यक् विधि के अन्तर्गत कैदी दोषी था यद्यपि उसे उस समय यह नहीं मालूम हो सकता था कि संसद द्वारा अधिनियम पारित कर दिया गया है। परन्तु मामले को कार्यपालिकीय क्षमा के लिये उपयुक्त समझा गया जो उसे प्रदान कर दिया गया। किसी नवनिर्मित अधिनियम की अनभिज्ञता को अपने देश में प्रतिरक्षा हेतु अभिवाचित नहीं किया जा सकता क्योंकि किसी भारतीय विधि को भारत की सीमा के अन्तर्गत कार्यान्वित होने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि या तो इसका प्रकाशन हो या देश के बाहर इसका प्रचार हो 53 राज्य का कार्य (Act of State)-राज्य के कार्य का अभिवचन राज्य के कार्य को सम्पादित करने वाले व्यक्तियों को निम्नलिखित मामलों में प्राप्त होगा– (1) यदि अभियुक्त उस विषय में राज्य के बदले में कार्य करने के लिये प्राधिकृत हो; और | (2) यदि इस प्रकार कार्य करते हुये वह विधि से परे नीति के रूप में कार्य करता हुआ मान रहा था न कि विधि के अन्तर्गत अधिकारतः कार्य कर रहा था। पथ-प्रदर्शक सिद्धान्त (Guiding rules)—जब कभी किसी तथ्य की भूल या विधि की भूल के कारण हुये किसी अपराध के सम्बन्ध में कोई प्रश्न उठता है तो दायित्व को निम्नलिखित पथ-प्रदर्शक सिद्धान्त के आधार पर निर्धारित किया जाता है34
  1. इसोप (1836) 7 सी० एण्ड पी० 456.
  2. री वैरोनेट, 118 ई० आर० 337.
  3. (1800) पी० आर० 1; 86 जे० पी० 77.
  4. एम० एच० जार्ज बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए० आई० आर० 1965 सु० को० 722.
54, दि किंग बनाम तुस्तीपद मण्डल, ए० आई० आर० 1951 उड़ीसा 284. (1) यह कि जब कोई कार्य अपने आप में आपराधिक है और यदि विशिष्ट परिस्थितियाँ सहतित्ववान होने पर यह अधिक कठोरता से दण्डनीय है, तो ऐसी परिस्थितियों के विषय में अनभिज्ञता. गरुतर अपराध (aggravated offence) के आरोप का उत्तर नहीं होगा। (2) यह कि जब कोई कार्य प्रथमत: निर्दोष एवं उचित है जब तक कि विशिष्ट परिस्थितियाँ सह अस्तित्ववान नहीं हैं, ऐसी परिस्थितियों से अनभिज्ञता इस आरोप का उत्तर होगा। (3) यह कि उन परिस्थितियों में जो कार्य की प्रकृति को बदल देती हैं, के अस्तित्व के बारे में। अभियुक्त की मानसिक स्थिति पूर्ण अनभिज्ञता के तुल्य होती है या उसके अस्तित्वहीनता के बारे में विश्वास के तुल्य। (4) जहाँ कोई कार्य अपने आप में दोषपूर्ण है तथा विशिष्ट परिस्थितियों के अन्तर्गत आपराधिक है, कोई व्यक्ति जो उसे करता है, यह प्रतिरक्षा नहीं कायम नहीं कर सकता कि उन तथ्यों से अनभिज्ञ था जिन्होंने दोष को अपराध में परिवर्तित कर दिया। (5) जहाँ कोई संविधि विशिष्ट परिस्थितियों के अन्तर्गत किये गये कार्य को दण्डनीय घोषित करती है, वहाँ संविधि में प्रयुक्त शब्दों तथा उसके उद्देश्य के आधार पर यह प्रश्न उठता है कि परिस्थितियाँ अस्तित्ववान हैं, इसको निर्धारित करने का उत्तरदायित्व क्या कर्ता के ऊपर डाला जाना चाहिये या नहीं? प्रथम प्रकरण में उसका ज्ञान अनावश्यक है।
  1. न्यायिकतः कार्य करते हुए न्यायाधीश का कार्य- कोई बात अपराध नहीं है, जो न्यायिकत: कार्य करते हुए न्यायाधीश द्वारा ऐसी किसी शक्ति के प्रयोग में की जाती है, जो या जिसके बारे में उसे सद्भावपूर्वक विश्वास है कि वह उसे विधि द्वारा दी गयी है।
टिप्पणी यह धारा एक जज को उस समय सुरक्षा प्रदान करती है जब कि वह न्यायिकतः कार्य कर रहा हो। यह धारा एक जज को उन मामलों में सुरक्षा प्रदान करती है जिनमें वह विधि द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग अनियमितता से करता है तथा उन मामलों में भी जिनमें यह सद्भावपूर्वक अपने क्षेत्राधिकार को पार कर जाता । है, जहाँ उसे वैध अधिकार नहीं है। इस धारा के अन्तर्गत उन्मुक्ति केवल आपराधिक प्रक्रियाओं से ही प्राप्त होती है। मेघराज बनाम जाकिर55 के बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निर्णीत किया है कि कोई । व्यक्ति न्यायिकतः कार्य करते हुये, किसी कार्य को करने या करने के लिये आदेशित किये जाने पर अपने पदीय दायित्व का पालन करते हुये अपने क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत करता है तो वह दायित्वाधीन नहीं होगा। और ऐसे किसी मामले में सद्भावपूर्वक कार्य करने का प्रश्न ही नहीं उठता। सद्भावपूर्वक का प्रश्न अनुचित है, मात्र जबकि जज क्षेत्राधिकार के बाहर कार्य कर रहा है। परन्तु यदि क्षेत्राधिकार है तब उन्मुक्ति उन कार्यों तक भी विस्तृत रहती है जो क्षेत्राधिकार का दुरुपयोग गठित करते हैं।
  1. न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य- कोई बात, जो न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में की जाए या उसके द्वारा अधिदिष्ट हो. यदि वह उस निर्णय या । आदेश के प्रवृत्त रहते की जाए, अपराध नहीं है, चाहे उस न्यायालय को ऐसा निर्णय या आदेश देने की अधिकारिता न रही हो, परन्तु यह तब जब कि वह कार्य करने वाला व्यक्ति सद्भावपूर्वक विश्वास करता ही कि उस न्यायालय को वैसी अधिकारिता थी।
टिप्पणी धारा 78 में धारा 77 का एक उप सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है। यह धारा । गय या आदेश के अन्तर्गत कार्य करते हुये अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करती है। एक अन्तर्गत उस समय प्रतिरक्षित है जब वह अपने क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत काय दत किया गया है। यह धारा किसी न्यायालय के कारियों को सुरक्षा प्रदान करती है। एक न्यायाधीश धारा 77 अपने क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत कार्य करता है या जब वह 55, 1 इला० 280. सद्भावपूर्वक यह विश्वास करता है कि उसके पास क्षेत्राधिकार था। इस धारा के अन्तर्गत एक ऐसा अधिकारी भी उन्मुक्त है जो ऐसे न्यायालय के आदेश को जिसे क्षेत्राधिकार नहीं था, निष्पादित करता है परन्तु उसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास होना चाहिये कि न्यायालय क्षेत्राधिकार से युक्त था। इस धारा के अन्तर्गत विधि की भूल को प्रतिरक्षा हेतु अभिवाचित किया जा सकता है।
  1. विधि द्वारा न्यायानुमत या तथ्य की भूल से अपने को विधि द्वारा न्यायानुमत होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य- कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाए, जो उसे करने के लिए विधि द्वारा न्यायानुमत हो, या तथ्य की भूल के कारण, न कि विधि की भूल के कारण, सद्भावपूर्वक विश्वास करता हो कि वह उसे करने के लिए विधि द्वारा न्यायानुमत है।
दृष्टान्त क, य को ऐसा कार्य करते देखता है, जो क को हत्या प्रतीत होता है। क सद्भावपूर्वक काम में लाए गए अपने श्रेष्ठ निर्णय के अनुसार उस शक्ति को प्रयोग में लाते हुए, जो विधि ने हत्याकारियों को उस कार्य में पकड़ने के लिए समस्त व्यक्तियों को दे रखी है, य को उचित प्राधिकारियों के समक्ष ले जाने के लिए य को अभिगृहीत करता है। क ने कोई अपराध नहीं किया है चाहे तत्पश्चात् असल बात यह निकले कि य आत्मप्रतिरक्षा में कार्य कर रहा था। टिप्पणी अवयव– (1) तथ्य की भूल के अन्तर्गत एक व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कार्य। (2) भूल, तथ्य से सम्बन्धित होनी चाहिये, विधि से नहीं। (3) भूल सद्भावना में कारित होनी चाहिये। (4) कर्ता या तो विधि द्वारा न्यायानुमत होना चाहिये या उसे करने में अपने आप को विधि द्वारा न्यायानुमत होना विश्वास करता है। तथ्य की भूल से सम्बन्धित विधि को धारा 76 में विस्तार से वर्णित किया गया है। यहाँ केवल कुछ महत्वपूर्ण मामलों का अध्ययन उदाहरणस्वरूप किया जायेगा। इस धारा के अन्तर्गत किसी पति के लिये अपनी पत्नी को अपने साथ रखने के लिये बल या प्रतिबन्ध का प्रयोग न्यायोचित नहीं है। यह नियम हिन्दू-मुसलमान दोनों पर समान रूप से लागू होता है, रामलो56 के वाद में यह निर्णीत किया गया कि बलपूर्वक पत्नी को हटाया जाना एक अपराध है और जो व्यक्ति ऐसा करने में पति का साथ देते हैं इस धारा के अन्तर्गत प्रतिरक्षा के अधिकारी नहीं हैं। मजिस्ट्रेट द्वारा अवैध परितुष्टि के। रूप में प्राप्त की गई धनराशि को वापस करने के लिये किसी मजिस्ट्रेट से किसी अधिवक्ता का कहना न्यायोचित नहीं है।57 जोसेफ थोम्मेन बनाम जोसेफ एन्टोनी58 के वाद में यह विनिश्चित हुआ कि पड़ोसी की जमीन में बढ़ते हुये पेड़ के उस भाग को जो उसकी अपनी जमीन के ऊपर लटक रहा है, काटन का हकदार जमीन का मालिक है। अतः ऐसी शाखाओं का काटा जाना धारा 427 के अन्तर्गत रािष्ट। (mischief) का अपराध नहीं निर्मित करता। धारा 76 और 79 में अन्तर-धारा 76 उन मामलों से सम्बन्धित है जिनमें तथ्य की भूल के कारण भ्रमित व्यक्ति एक विशिष्ट ढंग से कार्य करने के लिये अपने को विधि द्वारा बाध्य पाता है यद्यपि यथार्थ यह कि उसका कार्य एक अपराध है। किन्तु धारा 79 ऐसे मामलों से सम्बन्धित है जहाँ तथ्य की भूल के का भ्रमित व्यक्ति एक विशिष्ट ढंग से कार्य करने में अपने को विधि द्वारा न्यायानुमत पाता है। इन दो धारा बीच के अंतर को ‘विधि द्वारा बाध्य’ (bound by law) तथा विधि द्वारा न्यायानुमत’ (justified by!
  1. 19 क्रि० लों ज० 955 : ए० आई० आर० 1918 (एस०) 69.
  2. यू० सान बनाम यू० लॉ, ए० आई० आर० 1931 आर० 83.
  3. 1957 क्रि० लाँ ज० 166.
शब्दों के प्रयोग द्वारा स्पष्ट किया गया है। धारा 76 के अन्तर्गत वैधिक बाध्यता होती है, जबकि धारा 79 के अन्तर्गत वैधिक न्यायानुमतता मात्र होती है। ये दोनों धारायें ऐसे मामलों के लिये उपबन्ध बनाती हैं जिनका भूल सम्बन्धी ऐसे मामलों से कोई सम्बन्ध नहीं है जो किसी न किसी अपराध की परिभाषा के अन्तर्गत आते हैं किन्तु उन्हें वैधिक बाध्यता या वैधिक न्यायानुमतता के आधार पर दण्ड से उन्मुक्त कर दिया गया है। धारा 76 का दृष्टान्त (क) इसके अन्तर्गत आता है। यह अधिक उपयुक्त हुआ होता यदि इनमें से एक धारा भूल के सम्बन्ध में रही होती और दूसरी धारा बिना भूल के प्रश्न को उठाये वैधिक बाध्यता या वैधिक न्यायानुमतता से सम्बन्धित रही होती।। निर्णीत वाद-चरन दास9 के वाद में नेशनल वालन्टीयर कोर के एक सिपाही ने अपने वरिष्ठ पदाधिकारी की आज्ञाओं का पालन करने हेतु गोली चलायी जिससे तम्बू (Tent), जिसके अन्दर जुआ खेला जा रहा था और जहाँ कोई हिंसात्मक भीड़ इकट्ठी नहीं थी, अन्दर एक औरत घायल हो गयी। सिपाही को हत्या का दोषी करार दिया गया। वरिष्ठ पदाधिकारी का आदेश अवैध था और अवैध आदेश का पालन ऐसे आदेश का पालन करने में अपराध कारित करने वाले व्यक्ति को क्षमा नहीं करता। यदि आदेश प्रत्यक्षत: अवैध है तो ऐसे आदेश को निष्पादित करने से इन्कार करने में कनिष्ठ (निम्नवर्ती) अधिकारी न्यायोचित होगा परन्तु यदि वरिष्ठ पदाधिकारी का आदेश प्रत्यक्षत: इस देश की विधि के विरुद्ध नहीं है तो उस आदेश का पालन अवश्य होना चाहिये। | एक मामले में अभियुक्त और दो अन्य व्यक्तियों ने एक सवारी को, जिसमें शिकायतकर्ता कपड़ों के एक गट्ठर को साथ लिये घर जा रहा था रोक दिया तथा उसे मात्र इस सन्देह पर पुलिस स्टेशन ले गये कि शिकायतकर्ता कन्ट्रोल आदेश का उल्लंघन कर कपड़ों को ले जा रहा है। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त इस संहिता की धारा 79 के अन्तर्गत उन्मुक्त होने का अधिकारी नहीं है, क्योंकि उसने सद्भावपूर्वक भूल कारित नहीं किया था, अपितु वह सत्य के अभिनिश्चयन हेतु उचित प्रयास किये बिना ही मात्र सन्देह के आधार पर शिकायतकर्ता को पुलिस स्टेशन ले गया। भूल को प्रतिरक्षा होने के लिये केवल तथ्य से सम्बन्धित होना आवश्यक नहीं है इसका युक्तियुक्त होना भी आवश्यक है। | अ एक पुलिस अफसर युक्तियुक्त पूछताछ के पश्चात् ‘ब’ को जिसने कोई अपराध नहीं किया था, गिरफ्तार कर लिया। इस मामले में पुलिस अधिकारी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 79 के अधीन न्यायानुमत भूल का बचाव पाने का अधिकारी है, क्योंकि उसने ब को युक्तियुक्त जाँच अथवा पूछताछ के पश्चात् गिरफ्तार किया है। अ ने उपेक्षापूर्ण तरीके से कार्य नहीं किया है वरन् सद्भावपूर्वक अपने को विधि द्वारा ऐसा कार्य करने हेतु न्यायानुमत समझकर कार्य किया है। राजकपूर बनाम लक्ष्मन60 के मामले में यह निर्णय दिया गया कि यदि अपनी अधिकारिता में कार्य करते हुये बोर्ड आफ सेन्सर्स किसी ऐसी फिल्म को प्रदर्शित किये जाने की अनुमति प्रदान कर देता है जिसके अश्लील होने का आरोप लगाया जाता है तो फिल्म निर्माता एवं अन्य सम्बन्धित एजेन्सियाँ संहिता की धारा 292 के अन्तर्गत अभियोजित नहीं किये जा सकते हैं क्योंकि धारा 79 उन्हें यह बचाव प्रदान करती है कि उन्होंने बोर्ड आफ सेन्सर्स से प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के पश्चात् इस विश्वास से कार्य किया है कि उनका कार्य न्यायानुमत (justifiable) है। | उड़ीसा राज्य बनाम भगवान बारिक61 के मामले में अभियुक्त अ और मृतक द के बीच जानवरों को चराने के मामले को लेकर आपस में कट सम्बन्ध थे। घटना की रात को मृतक भागवत सुनने गया था। गाँव के कुछ अन्य लोग जिनमें अभियंक्त सम्मिलित था, भी वहाँ उपस्थित थे। भागवत समाप्त होने के बाद मतक तालाब से अपने बर्तन लेने गया था जहाँ अभियुक्त ने उसके सर पर लाठी से मारा। अभियुक्त की प्रतिरक्षा में यह कहा गया कि दिन में उसके बर्तन चोरी गये थे और वह चोर पर निगाह रखे हुये था और उसने अपने घर
  1. (1950) 52 पी० एल० आर० 331.
  2. 1980 क्रि० लॉ ज० 436.
  3. 1987 क्रि० लॉ ज० 1115 (सु० को०).
की परिसीमा के अन्दर एक व्यक्ति को आते देख उसे चोर समझ कर लाठी से मारा परन्तु बाद में यह पता चला कि वह मृतक है। मृतक के मृत्यु बयान एवं अभियुक्त को न्यायेतर संस्वीकृति के आधार पर यह पाया गया कि मृतक भागवत सुनने के बाद तालाब पर अपने बर्तन लेने गया था। यह अभिनिश्चय किया गया कि अभियुक्त ने सद्भावपूर्वक कार्य नहीं किया था अतएव वह धारा 79 के अन्तर्गत प्रतिरक्षा पाने का अधिकारी नहीं था। मृतक और अभियुक्त के आपसी सम्बन्ध खराब थे और अभियुक्त को यह मालूम था कि मृतक भागवत सुनने गया है। इससे यह स्पष्ट है कि अभियुक्त इस अवसर की तलाश में था कि मृतक से दाँव ले ले और जब उसने मृतक पर लाठी से प्रहार किया तो इस बात पर विश्वास करने का कोई आधार नहीं था कि वह चोर पर प्रहार कर रहा था। यदि यह मान भी लिया जाय कि वह चोर था तो भी मात्र यह तथ्य अभियुक्त द्वारा मृतक पर किये गये प्रहार को उचित नहीं ठहराता है। मृतक अभियुक्त के घर के अन्दर नहीं घुसा था और न उसके आसपास ही था बल्कि वह तालाब से अपने बर्तन लेने गया था। ।
  1. विधिपूर्ण कार्य करने में दुर्घटना- कोई बात अपराध नहीं है, जो दुर्घटना या दुर्भाग्य से और किसी आपराधिक आशय या ज्ञान के बिना विधिपूर्ण प्रकार से विधिपूर्ण साधनों द्वारा उचित सतर्कता और सावधानी के साथ विधिपूर्ण कार्य करने में हो जाती है।
दृष्टान्त क कुल्हाड़ी से काम कर रहा है, कुल्हाड़ी का फल उसमें से निकल कर उछल जाता है और निकट खड़ा हुआ व्यक्ति उससे मारा जाता है। यहाँ यदि क की ओर से उचित सावधानी का कोई अभाव नहीं था तो उसका कार्य माफी योग्य है और अपराध नहीं है। टिप्पणी अवयव-दुर्घटना सम्बन्धित भारतीय विधि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 80 में उपबन्धित है। इसके अवयव इस प्रकार हैं (1) कार्य एक दुर्घटना या दुर्भाग्य हो। (2) कार्य किसी आपराधिक आशय या ज्ञान के बिना किया गया हो। (3) दुर्घटना वैधिक साधनों द्वारा, वैधिक रीति से किये गये किसी विधिक कार्य का परिणाम हो। (4) कार्य उचित सतर्कता एवं सावधानी से किया गया हो। दुर्घटना या दुर्भाग्य का अर्थ- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 80 इस सिद्धान्त पर आधारित है कि कोई कार्य अपने आप आपराधिक नहीं होता जब तक कि कर्ता ने उसे आपराधिक आशय से न किया हो। अपराध को निर्मित करने के लिये अपराधी के आशय तथा उसके कार्य दोनों का संगामी होना आवश्यक है। चूंकि आपराधिक विधि का उद्देश्य सामाजिक नियमों के केवल व्यतिक्रमणों को दंडित करना है, इसका अर्थ यह हुआ कि आपराधिक विधि किसी व्यक्ति को उसकी भूल या दुर्भाग्य के लिये दण्डित नहीं कर सकती 62 दुर्घटना का अर्थ संयोग द्वारा एक घटना नहीं है अपितु घटना अनाशयित (unintentional) और अप्रत्याशित (unexpected) होनी चाहिये। इसका अर्थ है, सामान्य विवेक से परे कोई अप्रत्याशित घटना जिसकी हम परिकल्पना न कर सकें या जिसके विरुद्ध हम अपनी सुरक्षा न कर सकें। स्टीफेन प्रेक्षित करत कोई प्रभाव दुर्घटना कहा जाता है जबकि कार्य जिसके द्वारा यह कारित होता है इसे कारित न करने आशय से किया जाता है और जब उस कार्य के निष्कर्ष स्वरूप इसका घटित होना इतना सम्भाव्य नहीं है। एक सामान्य विवेक के व्यक्ति को उन परिस्थितियों, जिसके अन्तर्गत इसे किया गया, के विरुद्ध उप सतर्कता बरतनी चाहिये।”63
  1. गौड, एच० एस०, पेनल लॉ आफ इण्डिया, भाग 1 (4था संस्करण) पृ० 496.
63, स्टीफेन, डाइजेस्ट आफ क्रिमिनल लॉ (8वाँ संस्करण) पृ० 270. दुर्घटना और दुर्भाग्य दोनों ही शब्दों का अभिप्राय किसी अन्य व्यक्ति को पहुँची क्षति से है। दुर्घटना में दूसरे को क्षति अन्तर्ग्रस्त होती है, दुर्भाग्य में जितनी क्षति क्षतिकर्ता को होती है उतनी ही क्षति कार्य से अलग किसी अन्य व्यक्ति को होती है। उदाहरण के लिये, क और ख दो व्यक्ति जंगल में जंगली चूहे मारने हेतु गये। उन लोगों ने अपना स्थान ले लिया और खेल के लिये जाल बिछा दिया। कुछ समय के पश्चात् सरसराहट की आवाज हुई और क ने उसे जंगली चूहा समझकर उस दिशा में गोली चलायी। उस गोली से ख की मृत्यु हो। गयी। क इस धारा के अन्तर्गत प्रतिरक्षित होगा, क्योंकि मृत्यु दुर्घटना के कारण हुई 64 इस प्रकरण में जिस बन्दूक से अभियुक्त ने गोली चलायी थी वह बिना लाइसेंस की थी। न्यायालय ने यह कहा कि बिना लाइसेंस के बन्दूक का प्रयोग उस व्यक्ति को आयुध अधिनियम की धारा 19 के अन्तर्गत किसी अपराध के लिये दोषी बना सकता है किन्तु उसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 80 के अन्तर्गत प्राप्त प्रतिरक्षा से वंचित नहीं कर सकता। किन्तु यदि दो कारें विपरीत दिशा में दौड़ती हुई आपस में टकरा जाती हैं जिससे दोनों ही वाहनों के चालकों को चोटें आती हैं तो यह एक दुर्भाग्यपूर्ण मामला होगा। परन्तु व्यवहार में दुर्घटना और दुर्भाग्य में कोई अन्तर नहीं निर्धारित किया गया है। एक क्षति को अकस्मात् कारित हुआ कहा जाता है जब यह न तो स्वेच्छापूर्वक और न ही उपेक्षापूर्वक कारित होती है। स्टीफेन के क्रिमिनल लॉ डाइजेस्ट में दुर्घटना कहे जा सकने वाले कार्यों की प्रकृति को स्पष्ट करने हेतु निम्नलिखित दृष्टान्त दिये गये हैं (1) अ, एक स्कूल मास्टर, एक विद्यार्थी को पूर्ण सतर्कता के साथ इस प्रकार सुधारता है ताकि विद्यार्थी को कोई क्षति न पहुँचे। विद्यार्थी की मृत्यु हो जाती है। यहाँ मृत्यु आकस्मिक है। (2) अ, अतिचारी (Trespasser) ब को इस उद्देश्य हेतु आवश्यक बल का प्रयोग कर अपने से बाहर कर देता है। ब, अ पर प्रहार किये बिना उसका प्रतिरोध करता है। वे आपस में लड़ाई करने लगते हैं जिसमें ब की मृत्यु हो जाती है। यहाँ मृत्यु आकस्मिक है। (3) अ, एक कर्मचारी छत पर से उचित चेतावनी देते हुये बर्फ फेंकता है। एक राहगीर की मृत्यु हो जाती है। यह मृत्यु आकस्मिक है। (4) अ, एक बन्दुक उठाता है और यह जाने बिना कि वह भरी है या नहीं, खेल में ब की ओर करके उसका घोड़ा दबाता है। ब की गोली लगने से मृत्यु हो जाती है। ऐसी मृत्यु आकस्मिक नहीं है। यदि ‘अ’ को यह विश्वास करने के लिये कि बन्दूक भरी नहीं है कोई आधार रहा होता तो मृत्यु आकस्मिक होती, यद्यपि उसने यह जानने हेतु कि बन्दूक भरी है या नहीं सभी सम्भव सावधानियों का प्रयोग नहीं किया था। वैध साधनों द्वारा वैध रीति से किया गया वैध कार्य-जगेश्वर बनाम इम्परर65 के बाद में अभियुक्त घूसे से एक व्यक्ति को मार रहा था। उसी समय बाद वाले व्यक्ति की पत्नी ने दो महीने के बच्चे को अपने कन्धे पर लिये हुये हस्तक्षेप किया। अभियुक्त ने उस औरत पर भी प्रहार किया किन्तु उसका प्रहार बच्चे के सिर पर लगा। उस चोट के फलस्वरूप बच्चे की मृत्यु हो गई। यह निर्णीत हुआ कि बच्चे को अकस्मात् ही चोट आयी। चूँकि अभियुक्त एक वैधिक कार्य वैधिक रीति से नहीं कर रहा था। अतः वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 80 के अन्तर्गत दिये गये उपबन्धों का लाभ नहीं उठा सकता है। अ ने ब के घर में उसकी अनुपस्थिति में अतिचार किया और वापस लौटने पर ब ने अ से घर छोड़ने को कहा किन्तु अ ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। इस कारण दोनों में में वाद-विवाद शुरू हो गया जिसमें ब ने उत्तेजित हो अ को ऐसी लात मारी कि उसकी मृत्यु हो गयी। यह निर्णीत हुआ कि “किसी व्यक्ति को अपने घर से लात मार कर बाहर निकालने का ढंग न्यायोचित नहीं है, चाहे। वह एक अतिचारी ही क्यों न हो। यदि मृतक की मृत्यु, उसे चोट न कारित की गई होती तो न होती, ऐसी दशा में कैदी ने अवैध रूप में उसे यह क्षति कारित किया है और वह मानव वध का दोषी है।66
  1. राज्य बनाम रंगास्वामी, ए० आई० आर० 1952 नागपुर 268.
  2. ए० आई० आर० 1924 अवध 228.
  3. विलेस 2 ला० सी० सी० 214.
शाकिर खान बनाम क्राउन67 के वाद में लगभग सौ व्यक्तियों की एक पार्टी सूकरों का शिकार करने गई। एक नर शंकर अभियुक्त की तरफ दौड़ा जिसने उस पर गोली चला दी। किन्तु निशाना चूक गया और गोली शूकर को लगने के बजाय पार्टी के एक सदस्य के पैर को बंध गई। यह निर्णीत हुआ कि मृत्यु दुर्घटना के कारण हुई, यह लापरवाही या उपेक्षापूर्ण ढंग से गोली चलाने का परिणाम नहीं था। एक चिड़िया को मार डालने और उसे चुरा लेने के आशय से क उस पर गोली चलाकर ख को जो एक झाड़ी के पीछे है, मार डालता है किन्तु क यह नहीं जानता था कि ख वहाँ है। इस मामले में क ने कोई अपराध नहीं किया है और उसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 80 के अधीन दुर्घटना का बचाव उपलब्ध होगा। चिड़िया को मारना अपराध नहीं है। अतएव यह दुर्घटना एक वैध कार्य को वैध रीति से और वैध साधनों द्वारा कारित होने के फलस्वरूप हुई है। अतएव धारा 80 का लाभ क को मिलेगा। सुखदेव सिंह बनाम दिल्ली राज्य (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र )68 वाले मामले में अपीलार्थी सुरक्षा अधिकारी के रूप में मंगत राम निगम पार्षद एवं अध्यक्ष नगरपालिका कार्य समिति से सहबद्ध था। दिनांक 14-6-99 को अभियुक्त/अपीलार्थी और मृतक देवेन्द्र के बीच झगड़ा हुआ, जिसमें हाथापाई हो गई थी। मृतक ने अपना तिपहिया मंगतराम के कार्यालय के सामने खड़ा किया था, जिस पर अपीलार्थी ने आपत्ति किया, उसने तिपहिया को हटाने के लिये कहा। मृतक ने गाड़ी हटाने से इन्कार कर दिया, जिस पर अपीलार्थी ने गाड़ी थाने ले जाने की धमकी दिया। मृतक ने भी जवाब दिया कि वह देख लेगा, अभियुक्त क्या कर सकता है। इस पर अपीलार्थी तिपहिया पर बैठ गया और मृतक से बोला कि यान को आदर्श नगर पुलिस थाने ले चले। मृतक पुलिस थाने ले जाने की बजाय गलत दिशा में जाने का प्रयास किया। पीलार्थी ने उसे रुकने के लिये कहा और पुन: उनमें हाथापाई होने लगी, इसी दौरान अभियुक्त ने अपनी पिस्तौल निकाली और मृतक पर गोली चला दिया। निशाना चूक गया और गोली नहीं लगी और विजय कुमार अभि० सा० 7 के जांघ में लगी, जो पास में खड़ा था। अपीलार्थी ने पुनः गोली चलाई और गोली मृतक को लगी, जो गिर पड़ा और मर गया। मृतक और विजय कुमार दोनों को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ मृतक को मृत घोषित कर दिया गया। विचारण के दौरान अपीलार्थी की ओर से धारा 80 के अधीन प्रतिरक्षा माँगी गई। यह अभिनिर्धारित किया गया कि भा० द० संहिता की धारा 80 किसी निर्दोष, विधिक कार्य को विधिक तरीके से करने वाले को किसी अप्रत्यासित परिणाम से जो किसी दुर्भाग्य या दुर्घटना से कारित होता है, से बचाव करती है। यदि इनमें से कोई भी तत्व नहीं है तो कार्य को दुर्घटना के आधार पर क्षमा नहीं किया जा सकता है। दुर्घटना और कोई वाकया दोनों एक नहीं हैं वरन् कोई ऐसी बात है जो सामान्य अथवा साधारण रूप से घटित नहीं होती है। कोई प्रभाव दुर्घटना से कारित तभी कहा जाता है जबकि कार्य उसे कारित करने के आशय से नहीं किया जाता और उस कार्य के परिणामस्वरूप उस घटना का घटित होना इतना सम्भावित है कि एक सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को जिन परिस्थितियों में वह कार्य किया जाता है इसके विरुद्ध युक्तियुक्त सावधानी से उपाय करना चाहिए। दुर्घटना में कोई आकस्मिक, अप्रत्यासित बात अन्तर्निहित होती है। वर्तमान मामले में तथ्यात्मक स्थिति यह दर्शाती है कि अपराधी जो कि एक व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी के रूप में कार्यरत था, ने जानबूझकर बन्दूक का प्रयोग किया, निश्चय ही हाथापाई के समय उसने ऐसा किया। और अभियुक्त/अभीलांट ने यह अभिकथन नहीं किया था कि हाथापाई और छीना झपटी में गोली चलाई। बल्कि अभियुक्त ने स्पष्ट यह कहा कि चूंकि मृतक ने हाथापाई के दौरान पिस्तौल छीनने का प्रयास किया। अतएव उसने उस पर गोली चला दी। अतएव यह मामला दुर्घटना का नहीं है और वह भा० दे० संहिता का धारा 80 के अधीन बचाव पाने का अधिकारी नहीं होगा 69 | एक मामले में अ बिना लाइसेंस की बन्दूक लेकर शिकार के लिये एक घने वन क्षेत्र में जिसमें शिकार वर्जित था, प्रविष्ट हुआ तथा बहुत भीतर पहुँचने पर झाड़ी के पीछे से पशु जैसी हलचल और आहट सुनने पर
  1. ए० आई० आर० 1931 लाहौर 54.
  2. 2003 क्रि० लॉ ज० 4315 (सु० को०).
  3. 2003 क्रि० लाँ ज० 4315 (सु० को०).
गोली चलायी। एक व्यक्ति जो वहाँ जलाने की लकड़ी बिन रहा था, गोली से आहत होकर मर गया। अ के विरुद्ध हत्या का आरोप लगाया गया और उसने अपनी प्रतिरक्षा में दुर्घटना का तर्क प्रस्तुत किया। इस मामले में दो प्रश्न विचारणीय हैं। प्रथम, बिना लाइसेंस की बन्दूक से शिकार करना और द्वितीय वर्जित क्षेत्र में शिकार करना। इनमें से बन्दूक का लाइसेंस न होने मात्र से अ को दुर्घटना के बचाव से वंचित नहीं किया जा सकता है, परन्तु जहाँ तक वर्जित क्षेत्र में शिकार का प्रश्न है यह तथ्य बचाव के रूप में विवादित है। यह कहा जा सकता है कि शिकार अवैध रूप से किया जा रहा था अतएव दुर्घटना का बचाव नहीं मिलेगा। परन्तु उपयुक्त मत यह है कि अवैध शिकार और मृत्यु में कारणात्मक सम्बन्ध नहीं है। अतएव बचाव मिलना चाहिये। हाँ, यह अवश्य कहा जा सकता है कि अ ने कार्य सद्भावपूर्वक नहीं किया उसने युक्तियुक्त सावधानी नहीं बरती। है अतएव बचाव नहीं मिलेगा। अवैध कार्यों में दुर्घटनायें-जहाँ कोई दुर्घटना किसी अवैध कार्य को करते हुये होती है वहाँ कारित क्षति के लिये उत्तरदायित्व नहीं हो सकता यदि प्रश्नगत कार्य और परिणामतः क्षति के बीच कोई कारणात्मक सम्बन्ध (causal connection) नहीं है। मैकाले ने भारतीय दण्ड संहिता के अपने प्रारुप (draft) में दो दृष्टान्तों का जिक्र किया था। एक नौचालक (Pilot) एक नदी में अत्यधिक सतर्कता से नौचालन कर रहा था। उसने अपने पोत बालू वाले किनारे की ओर मोड़ा, किनारे के अस्तित्व के बारे में उसे विनाश के पूर्व कोई ज्ञान नहीं था। कई व्यक्ति नदी में डूब गये। इस प्रकरण में नौचालक को हत्या कारित करने के लिये फाँसी पर लटेका देना एक नृशंसतापूर्ण कार्य होगा। यदि पाइलट की यात्रा अवैध है, फलतः एक अपराध है तो क्या यह उसकी । सजा पर कोई प्रभाव डालेगा? इसका उत्तर तब भी नकारात्मक ही होगा। चालक को एक अपराध के लिये। इसलिये दोषी ठहराना कि वह एक दूसरे अपराध को कारित करते समय दुर्घटना का शिकार हुआ, उसे उन लोगों का हत्यारा घोषित करना जिनकी जिन्दगी को वह कभी खतरे में नहीं डालना चाहता था, जिनको वह अपनी उत्तम सेवा प्रदान कर सुरक्षित ढंग से उनके लक्ष्य तक ले जाना चाहता था, और जिनकी मृत्यु वस्तुतः आकस्मिक थी-निश्चयत: अपराध की सभी सीमाओं को अस्त-व्यस्त करना है। मैकाले का दूसरा दृष्टान्त है-बड़े शहरों में सैकड़ों व्यक्ति पाकेटमारी का कार्य करते हैं। वे जानते हैं कि वे एक अपराध कर रहे हैं। किन्तु यह उनमें से किसी को कभी महसूस नहीं हुआ और न तो किसी सामान्य विवेक वाले व्यक्ति को कभी महसूस होगा कि वे एक ऐसे अपराध के दोषी हैं जो लोगों के जीवन को खतरे में डाल देता है। दुर्भाग्यवश उनमें से एक, एक महोदय का पर्स लेने का प्रयास करता है जिसकी जेब में एक भरी हुई पिस्तौल रखी है। चोर पिस्तौल को पकड़ता है और उसका घोड़ा (trigger) दब जाता है तथा उन महोदय की मृत्यु हो जाती है। मैकाले की दृष्टि में इस पाकेटमार को अन्य पाकेटमारों से अलग नहीं माना जायेगा तथा इसके साथ भी वैसा ही बर्ताव होगा जैसा कि दूसरों के साथ, क्योंकि वे सभी एक ही आशय से कार्य कर रहे थे, जिसमें मृत्यु कारित करने का भय न कम था और न मृत्यु कारित होने से बचाने हेतु सावधानी अधिक थी। अत: यह सुझाव देते हैं कि उसे अन्य पाकेटमारों की तुलना में अधिक सजा नहीं मिलनी चाहिये। तात्पर्य यह है कि उसे मात्र पाकेटमारी के लिये सजा मिलनी चाहिये, हत्या के लिये नहीं। मैकाले की राय में जब कोई व्यक्ति अपराध कारित करने में लगा है और नितान्त दुर्घटना द्वारा मृत्यु कारित कर देता है, तब वह मात्र अपने अपराध के लिये दण्डित होगा, इस आकस्मिक मृत्यु के कारण उसके दण्ड की मात्रा में कोई वृद्धि नहीं होगी। संहिता के निर्माताओं की यह विचारधारा धारा 299 के दृष्टान्त (ग) में स्पष्ट हुई है। अतः भारतीय विधि। में पाकेटमार केवल पाकेटमारी के लिये दायी होगा और सदोष मानव वध के लिये नहीं। यह निवेदित किया जाता है कि हम पहले दृष्टान्त में मैकाले के विचारों से सहमत हो सकते हैं परन्तु दूसरे दृष्टान्त में उनके विचार से सहमत होना कठिन प्रतीत होता है। दुर्घटना के मामलों में नियम यह है कि कर्ता तब तक दायी। नहीं होगा जब तक कि प्रश्नगत कार्य तथा परिणामतः क्षति के बीच कारणात्मक (causal) सम्बन्ध न स्थापित हो जाय। पहले वाले दृष्टान्त में कोई भी ऐसा कारणात्मक सम्बन्ध नहीं है और यदि हम इसे मान भी ले तो यह अत्यन्त दूरवर्ती है। यात्रा अवैध है किन्तु बालू वाले किनारे की तरफ ही पोत का रुख करने से मृत्यु कारित हुई। पोत का रुख बदलने का कार्य बिल्कुल निर्दोष था और दुर्घटना उसी कार्य के कारण घटित हुई। मृत्यु इसलिये कारित नहीं हुई कि यात्रा अवैध थी अपितु पोत के किनारे से टकराने के फलस्वरूप हुई। बाद वाले प्रकरण में जेब में रखी पिस्तौल का घोड़ा इसलिये दबा क्योंकि पाकेटमार ने पाकिट में अपना हाथ चोरी करने के आशय से डाला था, अतः मृत्यु ऐसे एक कार्य की परिणति थी जो मात्र अपराध नहीं था अपितु । कारित हानि के साथ सीधा कारणात्मक सम्बन्ध था। अतः सर मैकाले के तर्को से सहमत होना युक्तिसंगत प्रतीत होता है कि दोनों ही प्रकरणों में हानि एक दुसरे अपराध को कारित करते समय दुर्घटना के कारण हुई। यह सत्य हो सकता है, परन्तु इस विषय पर उपस्थित विधि का पुन: अध्ययन आवश्यक प्रतीत होता है। एक 13 साल के लड़के ने जो कक्षा 9 में पढ़ रहा था, कक्षा में अनुशासन भंग किया। अध्यापक के द्वारा चेतावनी देने पर भी वह नहीं माना। अध्यापक ने उसे बेतों की सजा दी। बेंत से मारते समय उस लड़के ने अपना हाथ हटा लिया और अध्यापक का बेत बगल के दूसरे लड़के पर पड़ गया। बेंत से लगी चोट के परिणामस्वरूप वह लड़का स्थायी रूप से एक आँख का अंधा हो गया। इस प्रकरण में अध्यापक को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 80 के अन्तर्गत बचाव उपलब्ध होगा, क्योंकि अध्यापक अनुशासन भंग करने वाले लड़के के सुधार को ध्यान में रखकर सजा दे रहा था। दुर्भाग्यवश बेंत दूसरे लड़के को लग गई जिसे क्षति पहुँचाने का उसका कदापि आशय नहीं था। अध्यापक को विद्यार्थी के सुधार को ध्यान में रखकर सजा देने का। अधिकार है। यहाँ पर अध्यापक द्वारा किया गया कार्य किसी आपराधिक आशय या ज्ञान के बिना किया गया है तथा वैधिक साधनों द्वारा वैधिक रीति से विधिक कार्य है साथ ही कार्य सतर्कता एवं सावधानी से भी किया। गया है। परन्तु दण्डित किये जा रहे लड़के द्वारा हाथ हटा लेने के फलस्वरूप बेंत दूसरे लड़के को दुर्घटनावश लग गई। अत: अध्यापक को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 80 का लाभ देते हुये दोषमुक्त किया जाना चाहिये। सतर्कता एवं सावधानीपूर्वक किया गया कार्य- भूपेन्द्र सिंह ए० चौदासामा बनाम स्टेट आफ गुजरात70 के बाद में अपीलार्थी भूपेन्द्र सिंह स्पेशल रिजर्व पुलिस के एक सशस्त्र कांस्टेबुल ने अपने ठीक उच्च अधिकारी हेड कांस्टेबुल को गोली मार दी जो तत्काल मर गया। मृतक और अपीलांट दोनों खाम्पला बांध जिसको कि खतरा उत्पन्न था, पर एक ही प्लाटून में कार्यरत थे। दोनों में आपस में कुछ कहासुनी हो गई। थी और मृतक ने अपीलांट के विरुद्ध कर्तव्य में लापरवाही बरतने हेतु कार्यवाही की थी जिसे अपीलांट ने हल्के में नहीं लिया और वह बदला लेने के लिये अवसर की तलाश में था। 20-7-83 की शाम को अपीलांट ने मृतक को बांध के मीनार (टावर) पर टहलते हुये देखा। उसने अपनी राइफल को मृतक की ओर निशाना बनाकर चार गोलियाँ उसके शरीर के मर्म स्थान पर मार दी। अपीलांट ने गोली चलाने की बात को स्वीकार भी किया परन्तु यह तर्क दिया कि वह अपनी सर्विस राइफल के साथ गस्ती (patrolling) ड्यूटी पर था और तभी लगभग 7.45 बजे सायं जबकि बिल्कुल अंधेरा हो गया था वह वाल्व टावर (valve tower) की ओर जाने के लिये पुल के पास आया। उसने टावर के नजदीक एक आग की लपक (flame) देखा और किसी आदमी को चलते फिरते देखा। उसे यह सन्देह हुआ कि कोई बदमाश आग से रिष्टि कारित करने । वाला है। वह रोशनी की कमी के कारण घूमते हुये व्यक्ति को पहचान नहीं पाया और उसे रुक जाने के लिये आवाज दिया। चूंकि उधर से कोई उत्तर नहीं मिला वह आगे बढ़ा और पुनः आवाज दिया परन्तु पुनः कोई उत्तर न मिलने पर उसने अपने कर्तव्य पालन में गोली चला दी। उसका कथन है कि उसने पहले हवा में गोली चलाई और उसके पश्चात् दो राउण्ड और गोलीचलाई और किसी चीज के गिरने की आवाज सुना। उसके पश्चात् उसने घटना की रिपोर्ट कार्यालय में दी। अपीलांट के विरुद्ध हत्या का अभियोग लगाकर विचारण किया गया। विचारण न्यायालय ने उसे दोषमुक्त कर दिया, क्योंकि उसकी अपराधिता में संदेह था। परन्तु गुजरात न्यायालय की खण्डपीठ ने साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन करते हुये यह पाया कि यह एक हत्या मामला था। अतएव उसकी दोषमुक्ति के आदेश को उलट दिया और अपीलांट को दोषी करार देत हुने आजीवन कारावास की सजा सुनाया। उच्चतम न्यायालय ने भी अपीलांट को भारतीय दण्ड संहिता का था। 80 का लाभ देने से इंकार कर दिया क्योंकि उसके द्वारा उचित सतर्कता एवं सावधानीपर्वक कार्य नहीं किया गया था। न्यायालय ने यह अभिमत भी व्यक्त किया कि मात्र इस तथ्य से ही कि अभियुक्त ने अपने स हो कि अभियुक्त ने अपने ही एक
  1. 1998 क्रि० लॉ ज० 57 (एस० सी०).
सहकर्मी पर निकट से बिना अपने लक्ष्य की असलियत जाने ही गोली मार दिया, इस बात की गन्ध आती है। कि उसने पूर्णरूपेण बिना सतर्कता और सावधानी के कार्य किया है। उसने बचाव में अभियुक्त की ओर से दसरा तर्क दिया गया कि उसका कार्य भारतीय दण्ड संहिता की धारा 103 के अधीन न्यायोचित था। उच्चतम न्यायालय ने यह तर्क भी अस्वीकार कर दिया और यह मत व्यक्त किया कि इस प्रकार से सम्पत्ति की प्रतिरक्षा । के बचाव का दावा करने के लिये एक विशेष शर्त है जबकि ऐसी सम्पत्ति कोई भवन या इमारत हो। ऐसे भवन | का उपयोग मनुष्यों के निवास अथवा सम्पत्ति की अभिरक्षा के लिये होना आवश्यक है। बांध उस प्रकार की इमारत नहीं है अतएव उसकी प्रतिरक्षा के आधार पर बचाव की माँग करने वाला व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति । की मृत्यु कारित करने तक का अधिकार नहीं रखता है जब तक कि आशंकित रिष्टि से मृत्यु या घोर उपहति। का खतरा न उत्पन्न हो जाय। वह टावर जिसके लिये अभियुक्त की दृष्टि में खतरा उत्पन्न था न तो मनुष्यों के निवास हेतु और न सम्पत्ति की अभिरक्षा के लिये ही उपयोग किया जाता था। साथ ही अभियुक्त को भी मृत्यु अथवा घोर उपहति जैसे किसी खतरे की आशंका नहीं थी। अतएव भारतीय दण्ड संहिता की धारा 103 के अधीन बचाव नहीं प्रदान किया गया। इस मामले में न्यायालय ने यह अभिमत भी व्यक्त किया कि अभियुक्त ने अभियोजन पक्ष के किसी गवाह से यह भी नहीं कहा था कि वह अपने उच्च अधिकारी को पहचानने में असमर्थ था और उसे बदमाश समझकर और टावर के वाल्व की रक्षा हेतु गोली चलाया। प्राइवेट प्रतिरक्षा का बचाव दण्ड प्रक्रिया संहिता की। धारा 313 के अधीन अभिकथन के दौरान लिया गया। जब अभियुक्त ने मृतक पर गोली चलायी उस समय। प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार की बात उसके दिमाग में कहीं दूर-दूर तक नहीं थी अतएव वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 104 के अधीन सीमित प्रतिरक्षा के अधिकार का भी अधिकारी नहीं है। | सिद्धि का दायित्व (Burden of proof)—इस धारा के अन्तर्गत प्रतिरक्षा को सफलतापूर्वक अभिवाचित करने हेतु किसी भी आपराधिक आशय के अभाव या कार्य से पीछे कारित कारण को सिद्ध करना आवश्यक है। जहाँ अभियुक्त यह अभिवाचित करता है कि मृत्यु अकस्मात हुई है, ऐसी स्थिति में न्यायालय को यह मानना चाहिये कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 105 के अनुसार मामले को इस अपवाद के अन्तर्गत लाने वाली परिस्थितियाँ विद्यमान नहीं हैं और यह सिद्ध करने का दायित्व अभियुक्त पर होगा कि यह मामला इस अपवाद के अंतर्गत आता है। नकारात्मक मन:स्थिति को सिद्ध करने का जो दायित्व अभियुक्त पर होता है वह उस समय समाप्त हो जाता है यदि वह न्यायालय को उस सीमा तक संतुष्ट कर देता है जिस सीमा तक अपने पक्ष में निर्णय पाने हुये व्यवहार प्रक्रिया में करना पड़ता है। उसके लिये यह आवश्यक नहीं है कि वह सभी सन्देहों को दूर करे जैसा कि सजा को दृढ़ कराने हेतु अभियोजन को करना पड़ता है। सम्भाव्यता की प्रबलता मात्र की सिद्धि ही उसके लिये पर्याप्त है।72 । कश्ती (Wrestling)-टुन्डा बनाम राज्य73 के वाद में अभियुक्त और मृतक दो दोस्त थे और वे दोनों कुश्ती के बहुत शौकीन थे। अभियुक्त ने मृतक को कुश्ती के लिये आमंत्रित किया। कुश्ती के दौरान वह बाहर गिर पड़ा और उसका सिर चबूतरे की नोक से टकरा गया जिससे उसकी खोपड़ी टूट गयी और उसकी मृत्यु हो गयी। यह निर्णीत हुआ कि जब दोनों ने कुश्ती लड़ना स्वीकार किया तो दोनों के बीच यह सहमति अन्तर्निहित मानी जाएगी कि वे आकस्मिक चोटों को बर्दाश्त करेंगे। इस मामले में चूँकि क्षति साशय नहीं कारित की थी अपितु आकस्मिक थी और इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि अभियुक्त ने दुर्भावना ने उसे क्षति कारित किया, उसका आपराधिक महत्व नहीं है। वह इस धारा के अन्तर्गत प्रतिरक्षित है। आग्नेयास्त्र (Fire-arms)—आग्नेयास्त्र सम्बन्धी मामलों को सुलझाते समय साधारण मामलों की अपेक्षा अधिक सतर्कता की आवश्यकता होती है। कभी-कभी यह कहा जाता है कि एक व्यक्ति को यह जानना चाहिये कि बन्दूक भरी हुई है। एक इंगलिश प्रकरण74 में एक व्यक्ति और उसकी पत्नी अपने एक मित्र के
  1. के० एम० नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य ए० आई० आर० 1962 सु० को 605.
  2. आई० एल० आर० (1967) 1 केरल 460.
  3. ए० आई० आर० 1950 इला० 95.
  4. फोस्टर, क्रिमिनल लॉ, पृ० 265.
यहाँ निमंत्रण पर गये। वह अपने साथ अपनी बन्दूक भी ले गया ताकि यदि कोई समस्या उठे तो उससे निपट सके। परन्तु भोजन पर जाने के पूर्व उसने बन्दूक उतार कर अपने मित्र के घर में एक प्राइवेट स्थान में रख दिया। भोजन के पश्चात् वह चर्च गया और शाम को बन्दूक सहित वापस लौट आया। रास्ते में कुछ दूर तक अपनी पत्नी बन्दूक लेकर चलती रही और बन्दूक को एक कमरे तक ले गया जहाँ उसकी पत्नी थी। उसने बन्दूक उठाते समय अचानक बन्दूक के घोड़े को छू दिया जिससे गोली बन्दूक से निकल कर उसकी पत्नी को लगी और उसकी मृत्यु हो गयी। साक्ष्य में यह बताया गया कि जब वह चर्च में था, परिवार का एक सदस्य चुपचाप बन्दूक से गोली चलाने हेतु उसे ले गया था और वापस लाकर उसके मित्र के घर में उसी स्थान पर रख गया जहां उसने रखा था। अभियुक्त को इस कारण उन्मुक्त कर दिया गया कि उसने उपयुक्त आधारों पर यह विश्वास किया कि बन्दूक भरी नहीं थी। अतः मृत्यु को आकस्मिक माना गया। न्तु यदि ‘‘अ’ बन्दूक पाने का हकदार है जो ‘ब’ के पास है वह यह जानते हुये कि बन्दूक भरी है। उससे बलपूर्वक छीनने का प्रयास करता है, और इस प्रक्रिया में बन्दूक चल गयी और ‘ब’ की मृत्यु हो गयी। यह निर्णीत हुआ कि ‘क’ हत्या का दोषी है क्योंकि हत्या एक अवैध कार्य को कारित करते हुये हुई थी। यह सत्य है कि ‘अ’ बन्दूक का हकदार है परन्तु बन्दूक का स्वामित्व प्राप्त करने के लिये बल का प्रयोग बिल्कुल ही अनावश्यक था। कार्य इस कारण अवैध था क्योंकि इसे अवैध ढंग से किया गया था, यह जानते हुये कि बन्दूक भरी है। यदि यह कल्पना की जाये कि ‘अ’ को यह ज्ञात नहीं था कि बन्दूक भरी हुई है तो क्या अपराध के लिये दायित्व के सम्बन्ध में कोई अन्तर आयेगा। मेरी राय में कोई अन्तर नहीं आयेगा, क्योंकि बल द्वारा कब्जा लेना तब भी एक अवैध कार्य होगा। अत: अ अपराध के लिये दोषी माना जायेगा। उसी प्रकार यदि एक व्यक्ति भरी बन्दूक को अपनी पत्नी की ओर उठाता है और खेल ही खेल में घोड़ा दबने से गोली चल जाती है और पत्नी की मृत्यु हो जाती है तो वह हत्या का दोषी होगा।76 योगदायी उपेक्षा (Contributory negligence)-आपराधिक विधि में किसी आशय के लिये योगदायी उपेक्षा कोई बचाव नहीं है। आर० बनाम स्विंडल और ओसवार्न77 के प्रकरण में स्विंडल और ओसबार्न अपनी-अपनी कारें एक सार्वजनिक सड़क पर चला रहे थे। रास्ते में उन लोगों ने एक स्थान पर मदिरा पान किया तथा एक दूसरे से होड़ लेने लगे। रात्रि का समय था, एक बुजुर्ग आदमी कार के नीचे आ गया और उसकी मृत्यु हो गयी। दोनों को मानव वध के लिये विचारित किया गया। यह प्रमाण प्रस्तुत किया गया कि केवल एक कार द्वारा उसकी मृत्यु हुई। न्यायालय ने कहा कि दूसरा अभियुक्त उन्मुक्ति का हकदार है। यद्यपि दोनों ने निश्चय किया था कि संयुक्त होकर वे तीव्रगति से सड़क पर कार चलायेंगे जो अपने आप में एक अवैध कार्य था। परन्तु कोई भी यह आरोप नहीं लगा सकता कि दूसरे की लापरवाही या उपेक्षा से मृतक मारा गया जबकि उसका स्वयं का व्यवहार निन्दनीय था। आर० बनाम बाकर78 के वाद में ‘अ’ एक जोड़ी घोड़ों को बिना लगाम के हाँक रहा था। ब सड़क पर टहल रहा। था और वह नशे में था। ‘अ’ ने दो बार पुकार कर उसे सावधान किया कि वह सड़क छोड़ दे। परन्तु घोड़े तेजी से दौड़ रहे थे अत: ‘ब’ उनके नीचे आ गया और मारा गया। यह पाया गया कि वह नशे में था और उसने अ की बात पर ध्यान नहीं दिया। इसमें यह निर्णीत हुआ कि अ मानव वध का दोषी है क्योंकि उसका यह दायित्व था कि वह अपनी बग्घी को इस प्रकार चलाये ताकि दूसरों को कोई क्षति न पहुँचे यद्यपि यह सम्भव है कि वह दूसरा व्यक्ति भी किसी रूप में असावधान हो। यहाँ ब का उन्मत्त होना किसी प्रकार अ के दायित्व को कम नहीं करता। मुहम्मद बनाम राज्य79 के वाद में यह भी मत व्यक्त किया गया कि यदि कोई मोटर चालक अपने लोप या उपेक्षा के कारण किसी की मृत्यु कारित करता है तो यह तथ्य कि मृतक न असावधान था और उसने किसी दुर्घटना में सहयोग दिया, चालक को किसी भी प्रकार की प्रतिरक्षा नहीं प्रदान करेगा।
  1. आर्चर, 1 एफ० एण्ड एफ० 351.
  2. फास्टर, क्रिमिनल लॉ, पृ० 263.
  3. (1846) 2 सी० एण्ड के० 230.
  4. 1 सी० एण्ड पी० 320.
  5. ए० आई० आर० 1935 नागपुर 200,
महत्वपूर्ण वाद-राजाराम बनाम राज्य80 के मामले में क ने ख के हमले से अपने को बचाने के लिये बन्दूक से उस पर फायर किया जिससे ख बच गया परन्तु चार अन्य लोग घायल हो गये और उनमें से एक की मृत्यु हो गयी। इस साक्ष्य के अभाव में कि क का आशय घायलों एवं मृत व्यक्ति को चोट पहुँचाना था, यह निर्णय दिया गया कि वह संहिता की धारा 80, 96 एवं 100 के अन्तर्गत अपना बचाव प्रस्तुत कर सकता है। उड़ीसा राज्य बनाम खोरा घासी81 के मामले में क ने ख की मृत्यु एक तीर से मारकर इस सद्भावपूर्वक विश्वास कर कारित किया कि वह अपने खेत के अन्दर घुसे एक भालू पर तीर चला रहा है जो उसके मक्का के खेतों को नष्ट कर रहा है। इस मृत्यु को दुर्घटना का परिणाम निर्णीत किया गया। अमरेन्द्र बनाम स्टेट आफ कर्नाटक82 के वाद में अभियुक्त ने मृतक पर गोली चलायी। बचाव में यह तर्क दिया गया कि अभियुक्त का कार्य मात्र एक दुर्घटना थी, क्योंकि मृतक द्वारा अभियुक्त के ऊपर उछाला गया फसल काटने वाला रीपर (Reaper) बन्दूक में लग जाने से गोली दग गयी। परन्तु घटनास्थल पर कोई रीपर बरामद नहीं किया गया था। प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के साक्ष्य, जिसकी मेडिकल साक्ष्य तथा प्रक्षेपास्त्र विशेषज्ञ (ballistic expert) के साक्ष्य द्वारा संपुष्टि होती थी, के आधार पर यह पाया गया कि अभियुक्त ने अपने पिता द्वारा उकसाये जाने के पश्चात् मृतक पर गोली चलायी और अभियुक्त का यह कार्य दुर्घटनावश नहीं वरन् साशय किया गया कार्य था।

Follow me at social plate Form