Select Page

Indian Penal Code 1860 False Evidence and Offences Against Public Justice Part 3 LLB Notes

  Indian Penal Code 1860 False Evidence and Offences Against Public Justice Part 3 LLB Notes:- Indian Penal Code IPC LLB Law 1st Year / 1st Semester Notes Study Material in Hindi English Question With Answer Previous year Sample Model Paper in PDF Download This Post Available Link.

 
  1. ऐसी राशि के लिए जो शोध्य नहीं है कपटपूर्वक डिक्री अभिप्राप्त करना- जो कोई किसी व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी राशि के लिए, जो शोध्य न हो. या जो शोध्य राशि से अधिक हो, या किसी सम्पत्ति या सम्पत्ति में के हित के लिए, जिसका वह हकदार न हो, डिक्री या आदेश को कपटपूर्वक अभिप्राप्त कर लेगा या किसी डिक्री या आदेश को, जिसके तुष्ट कर दिए जाने के पश्चात् या ऐसी बात के लिए, जिसके विषय में उस डिक्री या आदेश की तुष्टि कर दी गई हो, किसी व्यक्ति के विरुद्ध या तो कपटपूर्वक निष्पादित करवाएगा, या अपने नाम में कपटपूर्वक ऐसा कोई कार्य किया जाना सहन करेगा या किए जाने की अनुज्ञा देगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
टिप्पणी कपटपूर्वक डिक्री के सम्बन्ध में यह धारा 208 के विपरीत है। इस धारा के पीछे संहिता का उद्देश्य दोनों ही पक्षकारों को एक ही प्रकार, एक ही दण्ड से दण्डित करना है। यह धारा, धारा 208 के साथ दोनों ही पक्षकारों को एक जैसे दण्डित करने में न्यायालय को सक्षम बनाती है। (1) आज्ञप्ति कपटपूर्वक प्राप्त करना-मुल्ला फजला करीम75 के वाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अभिनित किया है कि इस धारा के अन्तर्गत अपराध उस समय बनता है जबकि आज्ञप्ति । कपटपूर्वक प्राप्त कर ली जाती है, और यह तथ्य कि आज्ञप्ति को रद्द नहीं कर दिया गया है, इस धारा के अन्तर्गत अभियोजन के लिये किसी प्रकार की रुकावट नहीं उत्पन्न करेगा। (2) डिक्री या आदेश निष्पादन को कारित करना…………उसकी तुष्टि के पश्चात्-इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि के लिये पूर्व निष्पादित आज्ञप्ति निष्पादन के लिये केवल आवेदन का प्रस्तुतीकरण मात्र पर्याप्त नहीं होगा। बल्कि यह आवश्यक है कि अभियुक्त ने अपने शत्रु के विरुद्ध आज्ञप्ति के निष्पादन को पूर्ण करा लिया हो।76 अथवा पूर्ण अदा की गई राशि की कुर्की के लिये आदेश प्राप्त कर लिया हो।77 कोई भी आज्ञप्तिधारी इस धारा के अन्तर्गत दण्डित नहीं किया जा सकता यदि वह आज्ञप्ति को निष्पादित नहीं करवाना चाहता है और वह अपने निष्पादन आवेदन को वापस लेता है।78 यह तथ्य कि आज्ञप्ति की तुष्टि इस प्रकृति की है कि निष्पादित करने वाला न्यायालय उसे स्वीकार नहीं कर सकता, आज्ञप्तिधारी को इस धारा के अन्तर्गत दण्डित किये जाने से मुक्ति नहीं प्रदान कर सकता 79
  1. क्षति कारित करने के आशय से अपराध का मिथ्या आरोप- जो कोई किसी व्यक्ति को यह जानते हुए कि उस व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी कार्यवाही या आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है क्षति कारित करने के आशय से उस व्यक्ति के विरुद्ध कोई दाण्डिक कार्यवाही संस्थित करेगा या करवाएगा या उस व्यक्ति पर मिथ्या आरोप लगाएगा कि उसने अपराध किया है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा;
  2. (1905) 33 कल० 193.
  3. श्यामा चरन दास बनाम कासी नायक, (1896) 23 कल० 971.
  4. हिकमत उल्ला खान बनाम सकीना बेगम, (1930) 53 इला० 416.
  5. बिस्मिल्ला खान बनाम राम भाऊ, (1946) नागपुर 686.
  6. माधव चन्दर मजुमदार बनाम नवदीप चन्दर पण्डित, (1888) 16 कल० 126.
तथा यदि ऐसी दाण्डिक कार्यवाही मृत्यु, आजीवन कारावास या सात वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दण्डनीय अपराध के मिथ्या आरोप पर संस्थित की जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। टिप्पणी यह धारा दो भिन्न अपराधों से सम्बन्धित है (1) किसी व्यक्ति के विरुद्ध मिथ्या आपराधिक प्रक्रिया संस्थापित करना या करवाना। (2) किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई अपराध कारित किये जाने के लिये मिथ्या आरोप लगाना। प्रथम अपराध द्वितीय अपराध को भी अपने में सम्मिलित करता है किन्तु दूसरा वहीं कारित हो सकता है। जहां आपराधिक प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया जाता। अवयव-इस धारा के निम्नलिखित अवयव हैं (1) क्षति पहुंचाने के आशय से आपराधिक कार्यवाही संस्थापित की गई हो या मिथ्या आरोप लगाया गया हो। (2) आपराधिक प्रक्रिया का ऐसा संस्थापन या मिथ्या अभियोग का लगाया जाना बिना किसी उचित या विधिपूर्ण आधार के होना चाहिये अर्थात् यह दुर्भावना से प्रेरित होना चाहिये। अत: इस धारा में वर्णित अपराध के तीन तत्व हैं-(1) एक मिथ्या अभियोग का लगाया जाना, (2) अभियोग लगाने वाला व्यक्ति जानता हो कि ऐसे अभियोग या कार्यवाही के लिये कोई उचित या विधिपूर्ण आधार नहीं था तथा (3) अभियोग उस व्यक्ति को क्षति कारित करने के उद्देश्य से लगाया गया हो जिसके विरुद्ध अभियोग लगाया गया है।80 | इस धारा के पैराग्राफ 1 तथा 2 में अन्तर यह है कि पैराग्राफ 1 के अन्तर्गत केवल मिथ्या अभियोग का लगाना तथा कुछ मामलों में आपराधिक कार्यवाही का संस्थापन भी आता है, किन्तु पैराग्राफ 2 के अन्तर्गत किसी मिथ्या उभियोग पर आधारित प्रक्रियाओं का वास्तविक संस्थापन सदैव आवश्यक है, यद्यपि इसमें अधिक कठोर दण्ड से दण्डनीय अपराध सम्मिलित हैं। पैराग्राफ लागू होने के लिये निम्नलिखित दो आवश्यक शर्ते हैं (1) मिथ्या आरोप पर मिथ्या प्रक्रिया का संस्थापन, तथा (2) मिथ्या आरोप, मृत्यु दण्ड से दण्डनीय अपराध, आजीवन कारावास या सात साल या इससे अधिक की अवधि से दण्डनीय अपराध के सम्बन्ध में होना चाहिये। क्षति कारित करने के आशय से- इस धारा का एक आवश्यक तत्व यह है कि क्षति कारित करने का आशय होना चाहिये ।81 कोई आपराधिक प्रक्रिया संस्थापित करना या करवाना-इस धारा के अन्तर्गत सर्वप्रथम यह सिद्ध किया जाना चाहिये कि अभियुक्त ने आपराधिक प्रक्रिया संस्थित किया या करवाया या मिथ्या आरोप लगाया। आपराधिक प्रक्रिया को संस्थित करने से तात्पर्य है अपराधिक विधि को गतिशील बनाना। उन मामलों में पुलिस को परिवाद प्रस्तुत करना जिनमें वह कार्यवाही करने के लिये सक्षम है इस धारा के अन्तर्गत आपराधिक प्रक्रिया संस्थित करने के तुल्य है।82 प्रक्रिया का किसी न्यायालय में संस्थित किया जाना आवश्यक नहीं है।83 ।
  1. शिवरतन लाल विनानी बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1930 कल० 288.
  2. गोपाल धनुक, (1881) 7 कल० 96.
  3. अप्पाजी, आई० एल० आर० 22 बाम्बे 517.
  4. अल्पीयट, ए० आई० आर० 1966 केरल 11.
आपराधिक विधि को दो प्रकार से गतिशील बनाया जा सकता है-(1) पुलिस को सूचना देकर, (2) मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करके। किसी संज्ञेय अपराध के विषय में पुलिस को मिथ्या सूचना देना एक आपराधिक प्रक्रिया संस्थित करने के तुल्य है क्योंकि संज्ञेय अपराधों के विषय में पुलिस को कार्यवाही करने का अधिकार है।84 किन्तु असंज्ञेय अपराधों के विषय में पुलिस को दी गई मिथ्या सूचना आपराधिक प्रक्रिया संस्थित करने के तुल्य नहीं है क्योंकि ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट की पूर्वानुमति लिये बिना कोई भी कार्यवाही करने का पुलिस को अधिकार नहीं है।85 असंज्ञेय अपराधों के विषय में दी गई सूचना केवल मिथ्या आरोप लगाने के तुल्य है, आपराधिक प्रक्रिया संस्थित करने जैसी नहीं है। संज्ञेय या असंज्ञेय किसी भी अपराध के सम्बन्ध में मजिस्ट्रेट के सम्मुख लगाया गया आरोप आपराधिक प्रक्रिया संस्थित करने के तुल्य है। मिथ्या आरोप-मिथ्या आरोप लगाने से तात्पर्य है एक प्राधिकारवान व्यक्ति के सम्मुख किसी व्यक्ति पर मिथ्या रूप से अभियोग लगाना।” आरोप लगाना” मात्र सूचना देने से कुछ अधिक और भिन्न है। यदि वादी उन तथ्यों, जिनको वह जानता है, को सूचना देने या अपने सन्देह का वर्णन करने तक अपने आप को सीमित रखता है और पुलिस द्वारा अतिरिक्त छानबीन के लिये उस वस्तु को छोड़ देता है तो यह माना जायेगा कि उसने सूचना दिया है किन्तु यह नहीं माना जायेगा कि उसने आरोप लगाया है। यदि शासकीय छानबीन की प्रतिज्ञा किये बिना वह कोई अन्य कार्यवाही करता है, जैसे वह निश्चित रूप से यह आरोप लगाता है कि अमुक व्यक्ति अपराधी है और वह चाहता है कि ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में कार्यवाही आरम्भ कर दी जाय, तो उसकी यह कार्यवाही चाहे लिखित हो या मौखिक, यदि किसी विधिक प्राधिकारी के सम्मुख की गई है, और वह प्राधिकारी कार्यवाही प्रारम्भ करने के लिए प्राधिकृत है, आरोप लगाने के तुल्य समझी जायेगी।”86 पुलिस अधीक्षक के सम्मुख प्रस्तुत की गयी मिथ्या याचिका, जिसमें पुलिस सब-इन्सपेक्टर के अन्यायपूर्ण आचरण से याची को सुरक्षा प्रदान करने की प्रार्थना की गयी हो तथा जिसे विभागीय कार्यवाही द्वारा प्रभावपूर्ण बनाया जा सकता हो, मिथ्या आरोप के तुल्य नहीं है।87 मिथ्या आरोप का लगाया जाना ही पर्याप्त है, अभियोजन का संस्थापन आवश्यक नहीं है।88 दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अन्तर्गत की जा रही छानबीन के दौरान किसी पुलिस अधिकारी द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर स्वरूप दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 162 के अन्तर्गत दिया गया कोई वक्तव्य, इस धारा के अन्तर्गत अभियोजन का आधार नहीं बन सकता है।89 इसी प्रकार किसी संदेह, कि एक विशिष्ट व्यक्ति ने कोई अपराध कारित किया है, के विषय में पुलिस को दिया गया वक्तव्य, इस धारा के अन्तर्गत आपराधिक प्रक्रिया संस्थित करने के तुल्य नहीं है। अतः केवल इस साक्ष्य पर कि सन्देह सिद्ध न हो सका, दण्डित करना संभव नहीं है।90 यह जानते हुये कि कोई उचित या विधिपूर्ण आधार नहीं है- इस धारा के अन्तर्गत प्रयुक्त पदावली ‘यह जानते हुये कि कोई उचित या विधिपूर्ण आधार नहीं है,” इंग्लिश विधि में प्रयुक्त पदावली ‘युक्तियुक्त और अभिसम्भाव्य कारण के बिना” के तुल्य है।‘‘युक्तियुक्त तथा अभिसम्भाव्य कारण” से तात्पर्य है पूर्ण अवधारणा पर आधारित अभियुक्त के अपराध के विषय में सद्भावपूर्ण विश्वास। इसके निम्नलिखित तत्व हैं (1) अभियुक्त के अपराध के विषय में अभ्यारोपण करने वाले व्यक्ति का सद्भावपूर्ण विश्वास; (2) ऐसा विश्वास उन परिस्थितियों के, जिसने अभ्यारोपण करने वाले व्यक्ति को इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिये प्रेरित किया, सद्भावपूर्ण अवधारणा पर आधारित हो;
  1. जीजी भाई गोविन्द, (1896) 22 बाम्बे 596.
  2. करीम बक्स (1888) 17 कल० 574.
  3. काशीराम बनाम किंग इम्परर, ए० आई० आर० 1924 इला० 778.
  4. अब्दुल हाकिम खान चौधरी, (1931) 59 कल० 334.
  5. अब्दुल हसन (1877) 1 इला० 497.
  6. रमना गौड़, (1908) 31 मद्रास 506.
  7. आनन्द भट्टाचारजी, (1881) 7 सी० एल० आर० 223.
(3) ऐसा विश्वास युक्तियुक्त आधार पर आधारित हो; अर्थात् आधार ऐसा होना चाहिये जिससे प्रतिवादी की जगह कोई सावधान व्यक्ति भी विश्वास कर ले; (4) परिस्थितियाँ जिन पर अभ्यारोपण करने वाले व्यक्ति ने विश्वास एवं भरोसा किया, निश्चयत: ऐसी होनी चाहिये जो अभियुक्त के अपराध के विषय में विश्वास के लिये युक्तियुक्त आधार बन सकें। उदाहरण- शिव प्रकाशन पिल्लई91 के वाद में एक व्यक्ति पर अपराध कारित करने के सन्दर्भ में मिथ्या आरोप लगाते हुये एक पत्र कुम्बाकोनम में लिखा गया तथा डाक में डाला गया। पत्र पुलिस महानिरीक्षक, मद्रास को सम्बोधित किया गया था। यह अभिनित किया गया कि इस धारा के अन्तर्गत तभी हुआ समझा जायेगा, जब पत्र पुलिस महानिरीक्षक के कार्यालय में पहुँचा। मिथ्या अभियोग की संसूचना वस्तुत: मिथ्या आरोप लगाने जैसा है और जब तक वस्तु यथार्थत: वरिष्ठ अधिकारियों को संसूचित नहीं होती। तब तक यह नहीं कहा जा सकता है कि मिथ्या आरोप लगाया गया है। इन रे सुब्बन सम्बन92 के वाद में एक रेलवे स्टेशन मास्टर को एक गैंगमैन ने संसूचित किया कि उसने एक व्यक्ति को रेलवे लाइन से दो तालियाँ हटाते हुये देखा था। उसने यह भी बताया कि मैंने चोर को पकड़ा था किन्तु वह छुड़ा कर भाग गया। यह रिपोर्ट मिथ्या पायी गयी और गैंगमैन को इस धारा के अन्तर्गत विचारण के लिये लाया गया। यह अभिनिर्धारण किया गया कि स्टेशन मास्टर अपराध के विषय में छानबीन करने को प्राधिकृत व्यक्ति नहीं था, गैंगमैन ने स्टेशन मास्टर को अधिसूचना अपने कर्तव्य पालन के दौरान दिया था, आपराधिक विधि को गतिशील बनाने के उद्देश्य से नहीं। गैंगमैन को इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता भले ही अधिसूचना मिथ्या थी। | एक अन्य प्रकरण में एक व्यक्ति ने स्वयं अपने घर में आग लगा कर एक दूसरे व्यक्ति पर यह आरोप लगाया कि उसने आरोपकर्ता के घर में आग लगाया था। यह अभिनिर्णीत हुआ कि वह इस धारा के अन्तर्गत दोषी है।93 एक दूसरे प्रकरण में एक स्त्री स्टेशन स्टाफ आफिसर के समक्ष उपस्थित हुई और एक नानकमिशन्ड आफिसर पर बलात्कार का आरोप लगाया। छानबीन किये जाने पर पता चला कि आरोप झूठा था। इस पर इस धारा के अन्तर्गत शिकायतकर्ता पर आरोप लगाया गया। यह अभिनिर्णीत हुआ कि कोई अपराध कारित नहीं हुआ है क्योंकि मिथ्या आरोप क्षेत्राधिकार रखने वाले न्यायालय के सम्मुख नहीं लगाया गया। था।94 धारा 211 तथा 182 में अन्तर-(1) धारा 182 एक व्यक्ति द्वारा किसी लोक सेवक को मिथ्या समाचार दिये जाने से सम्बन्धित है। इनके अन्तर्गत यह आवश्यक है कि समाचार के मिथ्या होने का ज्ञान या विश्वास समाचार देने वाले को होना चाहिये। धारा 211 किसी व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में आपराधिक प्रक्रिया संस्थित करने या करवाने या यह जानते हुये कि ऐसी कार्यवाहियों के लिये कोई उचित या विधिपूर्ण आधार नहीं है, किसी व्यक्ति पर एक अपराध कारित करने के सन्दर्भ में मिथ्या आरोप लगाने से सम्बन्धित है। (2) धारा 182 के अन्तर्गत किसी अपराध के विषय में दी गयी सूचना के मिथ्या होने का ज्ञान या विश्वास आवश्यक है। धारा 211 के अन्तर्गत सूचना के मिथ्या होने का ज्ञान आवश्यक है। (3) धारा 182 के अन्तर्गत यह आवश्यक नहीं है कि अपराधी किसी दुर्भावना से प्रेरित हो अथवा मिथ्या सूचना के लिये कोई युक्तियुक्त और सम्भाव्य कारण नहीं था। धारा 211 के अन्तर्गत दुर्भावना एक प्रमुख तत्व है।95
  1. 1948 मद्रास 893.
  2. ए० आई० आर० 1944 मद्रास 391.।
  3. भगवान अहीर, (1867) 8 डब्ल्यू आर० (क्रि०) 65.
  4. जमुना, (1881) 6 कल० 620.
  5. राघवेन्द्र, 19 बाम्बे 717.
(4) धारा 182 पुलिस को दी गयी मिथ्या सूचना तक ही सीमित है,96 धारा 211 न्यायालय में मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना से सम्बन्धित हैं। 712 अपराधी को संश्रय देना–जबकि कोई अपराध किया जा चुका हो, तब जो कोई किसी ऐसे व्यक्ति को जिसके बारे में यह जानता हो या विश्वास करने का कारण रखता हो कि वह अपराधी है । दण्ड से प्रतिच्छादित करने के आशय से संश्रय देगा या छिपाएगा; । यदि अपराध मृत्यु से दण्डनीय होयदि वह अपराध मृत्यु से दण्डनीय हो तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा, और। यदि अपराध आजीवन कारावास से या कारावास से दण्डनीय हो- यदि वह अपराध आजीवन कारावास से, या दस वर्ष तक के कारावास से, दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; और यदि वह अपराध एक वर्ष तक, न कि दस वर्ष तक के कारावास से दण्डनीय हो, तो उस अपराध के लिए उपबन्धित भांति के कारावास से, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि की एक चौथाई तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा। इस धारा में ‘अपराध” के अन्तर्गत भारत से बाहर किसी स्थान पर किया गया ऐसा कार्य आता है, जो, यदि भारत में किया जाता तो निम्नलिखित धारा, अर्थात् 302, 304, 382, 392, 393, 394, 395, 396, 397, 398, 399, 402, 435, 436, 450, 457, 458, 459 और 460 में से किसी धारा के अधीन दण्डनीय होता और हर एक ऐसा कार्य इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऐसे दण्डनीय समझा जाएगा, मानो अभियुक्त व्यक्ति उसे भारत में करने का दोषी था। अपवाद– इस उपबन्ध का विस्तार किसी ऐसे मामले पर नहीं है, जिसमें अपराधी को संश्रय देना या छिपाना उसके पति या पत्नी द्वारा हो। दृष्टान्त क यह जानते हुए कि ख ने डकैती की है, ख को वैध दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिए जानते हुए। छिपा लेता है। यहाँ ख आजीवन कारावास से दण्डनीय है, क तीन वर्ष से अनधिक अवधि के लिए दोनों में से किसी भांति के कारावास से दण्डनीय है और जुर्माने से भी दण्डनीय है। टिप्पणी इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि के लिये एक आवश्यक है कि वस्तुत: कोई अपराध किसी व्यक्ति द्वारा। किया गया हो और संश्रयदाता ऐसे व्यक्ति को, यह जानते हुये कि वह अपराधी है या उसके अपराधी होने का विश्वास है, इसलिये संश्रय देता है ताकि उसे विधिक दण्ड से प्रतिच्छादित किया जा सके। यह धारा उन प्रकरणों में लागू नहीं होती जिनमें संश्रित व्यक्ति अपराधी तो नहीं होते किन्तु न्यायिक छानबीन को केवल निष्फल या देर करने मात्र के उद्देश्य से फरार हो जाते हैं।97 संजीव कुमार बनाम स्टेट आफ हिमाचल प्रदेश8 के वाद में यह आरोप था कि अभियुक्त लेखराज ने मुख्य अभियुक्त संजीव कुमार, जिसने हत्या कारित किया, को अपने स्कूटर पर ले गया था। परन्तु इस बात का कोई प्रमाण नहीं था कि जब लेखराज संजीव कुमार को अपने साथ स्कूटर पर ले गया उस समय वह जानता था कि उसने हत्या कारित किया है। यह अभिनित किया गया कि अपराधी को सश्रय
  1. समोखन, ए० आई० आर० 1925 इला० 906.
  2. 1999 क्रि० लाँ ज० 1138 (एस० सी०).
  3. रामराज चौधरी, (1945) 24 पटना 604.
(horbouring) देने के अपराध के आवश्यक तत्व सिद्ध नहीं हो पाये और इसलिये लेखराज की भारतीय दण्ड संहिता की धारा 212 के अधीन दोषसिद्धि निरस्त कर दी गई। तमिलनाडु राज्य बनाम नलिनी और अन्य)9 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि पत्नी को अपने पति को संश्रय प्रदान करने के लिए मात्र इस कारण अभियोजित नहीं किया जा सकता क्योंकि वह उसी मकान में पति के साथ निवास कर रही थी। परन्तु वे अभियुक्तगण जो आपराधिक षड्यंत्र के उद्देश्य की प्राप्ति अर्थात् पूर्व प्रधान मंत्री की हत्या के पश्चात् साथ में आये और उन्होंने मुख्य अभियुक्त को संश्रय और शरण इस पूर्ण ज्ञान के साथ प्रदान किया कि वे हत्या में शामिल थे और साक्ष्य को नष्ट करने का प्रयास किया उन्हें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 212 के अधीन दोषसिद्ध करना उचित था। अपवाद- इस धारा के अन्तर्गत केवल एक अपवाद स्वीकार किया गया है। यदि संश्रय पति या पत्नी द्वारा दिया जा रहा है तो यह धारा लागू नहीं होगी। किन्तु अन्य सम्बन्धी इस अपवाद की परिधि से परे हैं। अत: अपराधियों का स्वेच्छा से स्वागत करना या उनकी सहायता करना क्षम्य नहीं है। यहाँ तक कि पिता अपने पुत्र को, पुत्र अपने माता-पिता को, भाई– भाई को, मालिक नौकर को या नौकर मालिक को भी संश्रय इस धारा के अन्तर्गत नहीं दे सकता।।
  1. अपराधी को दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिए उपहार आदि लेना– जो कोई अपने या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई परितोषण या अपने या किसी अन्य व्यक्ति के लिए किसी सम्पत्ति का प्रत्यास्थापन, किसी अपराध को छिपाने के लिए या किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए वैध दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिए, या किसी व्यक्ति के विरुद्ध वैध दण्ड दिलाने के प्रयोजन से उसके विरुद्ध की जाने वाली कार्यवाही न करने के लिए, प्रतिफलस्वरूप प्रतिगृहीत करेगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा या प्रतिगृहीत करने के लिए करार करेगा,
यदि अपराध मृत्यु से दण्डनीय होयदि वह अपराध मृत्यु से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; यदि अपराध आजीवन कारावास या कारावास से दण्डनीय हो- तथा यदि वह अपराध आजीवन कारावास या दस वर्ष तक के कारावास से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; तथा यदि वह अपराध दस वर्ष से कम तक के कारावास से दण्डनीय हो, तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित भांति के कारावास से इतनी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि की एक-चौथाई तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। टिप्पणी अवयव– इस धारा के दो प्रमुख अवयव हैं (1) कोई व्यक्ति या तो स्वयं अपने लिये या किसी अन्य व्यक्ति के लिये कोई परितोषण या सम्पत्ति का पुन:स्थापन स्वीकार करे या स्वीकार करने का प्रयत्न करे। (2) ऐसा परितोष निम्नलिखित कार्यों के प्रतिफलस्वरूप प्राप्त करे (क) किसी अपराध को छिपाने के निमित्त, या (ख) किसी व्यक्ति के किसी अपराध के लिये विधिपूर्ण दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिये, या (ग) किसी व्यक्ति को विधिपूर्ण दण्ड से बचाने हेतु कार्यवाही प्रारम्भ न करने के लिये। विस्तार यह धारा उन मामलों में लागू नहीं होती है जिनमें अपराध का शमन विधिमान्य है। इस धारा के विस्तार के सम्बन्ध में उच्च न्यायालयों के अलग-अलग विचार हैं। हेमचन्द्र मुकर्जी991 के वाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने विचार व्यक्त किया था कि यह धारा केवल उन जगहों पर लागू होती है जिनमें अपराध को वस्तत: छिपाया गया हो या जिनमें विधिक दण्ड से बचाने के लिये किसी व्यक्ति को प्रतिच्छादित
  1. 1999 क्रि० ला ज० 3124 (एस० सी० ),
99a. (1924) 52 कलकत्ता 151. किया गया हो या किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक प्रक्रिया को रोकना और इन क्रियाओं के लिये कोई प्रतिफल दिया गया हो। किन्तु बम्बई उच्च न्यायालय का विचार इससे भिन्न है। इसके अनुसार इस धारा के अन्तर्गत यह आवश्यक नहीं है कि अपराध को वस्तुतः छिपाया गया हो या किसी व्यक्ति को विधिपूर्ण दृष्ट से प्रतिच्छादित किया गया हो या प्रक्रिया को रोक दिया गया हो, बल्कि इतना ही पर्याप्त होगा, यदि अवैध परितोषण छिपाने हेतु या प्रतिच्छादित करने हेतु या प्रक्रिया प्रारम्भ न करने हेतु प्राप्त किया गया हो।
  1. अपराधी के प्रतिच्छादन के प्रतिफलस्वरूप उपहार की प्रस्थापना या सम्पत्ति का प्रत्यावर्त्तन- जो कोई किसी व्यक्ति को कोई अपराध उस व्यक्ति द्वारा छिपाए जाने के लिए या उस व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए वैध दण्ड से प्रतिच्छादित किए जाने के लिए या उस व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति को वैध दण्ड दिलाने के प्रयोजन से उसके विरुद्ध की जाने वाली कार्यवाही न की जाने के लिए प्रतिफलस्वरूप कोई परितोषण देगा या दिलाएगा या देने या दिलाने की प्रस्थापना या करार करेगा, या कोई सम्पत्ति प्रत्यावर्तित करेगा या कराएगा; ।
यदि अपराध मृत्यु से दण्डनीय होयदि वह अपराध मृत्यु से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। यदि आजीवन कारावास या कारावास से दण्डनीय हो- तथा यदि वह अपराध आजीवन । कारावास से या दस वर्ष तक के कारावास से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; तथा यदि वह अपराध दस वर्ष से कम के कारावास से दण्डनीय हो, तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित भांति के कारावास से इतनी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि की एक-चौथाई तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा। अपवाद– धारा 213 और 214 के उपबन्धों का विस्तार किसी ऐसे मामले पर नहीं है, जिसमें कि अपराध का शमन विधिपूर्वक किया जा सकता है। दृष्टान्त [1882 के अधिनियम 10 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित] टिप्पणी अवयव-इस धारा का उद्देश्य परितोषण देने वाले व्यक्ति को दण्डित करना है। अवयव-इस धारा के निम्नलिखित तत्व हैं (1) किसी व्यक्ति को कोई परितोषण या सम्पत्ति का प्रतिस्थापन प्रस्तावित किया जाना। (2) इस तरह का प्रस्ताव निम्नलिखित कार्यों के निमित्त किया जाय (क) किसी अपराध को छिपाने के लिये, या (ख) किसी व्यक्ति को किसी अपराध के विधिपूर्ण दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिये, या (ग) विधि पूर्ण दण्ड दिलाने हेतु ऐसे व्यक्ति के विपरीत कोई भी कार्यवाही प्रारम्भ करने से विरत रहने के लिये।
  1. चोरी की सम्पत्ति इत्यादि के वापस लेने में सहायता करने के लिए उपहार लेना- जो कोई किसी व्यक्ति की किसी ऐसी जंगम सम्पत्ति के वापस करा लेने में, जिससे इस संहिता के अधीन दण्डनीय किसी अपराध द्वारा वह व्यक्ति वंचित कर दिया गया हो, सहायता करने के बहाने या सहायता करने की बाबत कोई परितोषण लेगा या लेने का करार करेगा या लेने को सहमत होगा, वह, जब तक कि अपनी शक्ति में के सब साधनों को अपराधी को पकड़वाने के लिए और अपराध के लिए दोषसिद्धि करान के लिए उपयोग में न लाए, दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की ही सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  2. बिहारी लाल काली चरन, (1949) 51 बाम्बे लॉ रिपोर्ट 564.
टिप्पणी इस धारा का मुख्य उद्देश्य उन सभी दुव्यपारों को दण्डित करना है जिनके द्वारा कोई व्यक्ति अपराधी को न्याय से प्रतिच्छादित करते हुये इस सम्पत्ति से लाभ प्राप्त करता है जिसे वह जानता है कि चोरी द्वारा प्राप्त की गई है और किसी व्यक्ति ने चोरी द्वारा उसे प्राप्त किया है। अवयव– इस धारा के निम्नलिखित अवयव हैं (1) किसी व्यक्ति को कोई चल सम्पत्ति पुनः प्राप्त करने के बहाने किसी प्रकार का परितोषण ग्रहण करना, ग्रहण करने के लिये सहमत करना या अनुमति देना; (2) ऐसी सम्पत्ति का स्वामी इस संहिता के अन्तर्गत दण्डनीय किसी अपराध द्वारा सम्पत्ति से वंचित किया गया हो; (3) परितोषण लेने वाले व्यक्ति ने अपराधी को पकड़वाने तथा दोषसिद्धि दिलाने के लिये अपनी समस्त शक्ति एवं साधनों का उपयोग न किया हो।
  1. शक्ति एवं साधनों का उपयोग न किया हो- इन शब्दों में परितोषण देने वाला तथा ग्रहण करने वाला दोनों ही केवल इस बात से ही सहमत नहीं होते कि परितोषण का उद्देश्य क्या है अपितु परितोषण का स्वरूप क्या होगा, इस बात से भी सहमत रहते हैं। उन प्रकरणों में जिनमें परितोषण वस्तुत: नहीं दिया जा चुका है और परितोषण के स्वरूप के बारे में असहमति है ऐसी स्थिति में सहमति का विचार शून्य हो जाता है।
  2. इस संहिता के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध द्वारा वंचित- वह कार्य जिसके द्वारा सम्पत्ति वंचित होती है, इस संहिता के अन्तर्गत निश्चयत: दण्डनीय होनी चाहिये। शफी के वाद में अभियुक्त ने एक गाय के स्वामी से एक गाय और 12 रुपये लिया इस वादा के साथ कि 10 दिन में गाय लौटा देगा। किन्तु बाद में उसने गाय तथा पैसा दोनों ही लौटाने से इन्कार कर दिया। यह अभिनित किया गया कि इस धारा के अन्तर्गत कोई अपराध नहीं कारित हुआ है।
  3. जब तक कि वह अभियुक्त को पकड़ने के लिये अपनी शक्तियों एवं साधनों का उपयोग नहीं करता है- इस तथ्य को कि अभियुक्त ने अपराधी को पकड़ने के लिये अपनी शक्ति एवं साधनों का उपयोग नहीं किया, सिद्ध करने का दायित्व अभियोजन पर नहीं होता है। अपितु यह बचाव पक्ष का दायित्व होता है कि वह सिद्ध करे कि अभियुक्त ने अपराधी को पकड़ने के लिये अपने समस्त साधनों एवं शक्तियों का उपयोग किया।
  4. ऐसे अपराधी को संश्रय देना, जो अभिरक्षा से निकल भागा है या जिसको पकड़ने का आदेश दिया जा चुका है- जब किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध या आरोपित व्यक्ति उस अपराध के लिए वैध अभिरक्षा में होते हुए ऐसी अभिरक्षा से निकल भागे;
अथवा जब कभी कोई लोक सेवक ऐसे लोक सेवक की विधिपूर्ण शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति को पकड़ने का आदेश दे, तब जो कोई ऐसे निकल भागने को या पकड़े जाने के आदेश को जानते हुए, उस व्यक्ति को पकड़ा जाना निवारित करने के आशय से उसे संश्रय देगा या छिपाएगा, वह निम्नलिखित प्रकार से दंडित किया जाएगा, अर्थात् : यदि अपराध मृत्यु से दण्डनीय हो-यदि वह अपराध, जिसके लिए वह व्यक्ति अभिरक्षा में था या पकड़े जाने के लिए आदेशित है, मृत्यु से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा,
  1. (1914) पी० आर० नं० १ सन् 1915.
  2. देव सुचित राय, (1947) ए० एल० जे० 48 (एफ० बी०); डी० के० वलई, (1959) क्रि० लॉ ज० 1438.
यदि आजीवन कारावास या कारावास से दण्डनीय हो-यदि वह अपराध आजीवन कारावास से या दस वर्ष के कारावास से दण्डनीय हो, तो वह जुर्माने सहित या रहित दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा। तथा यदि वह अपराध ऐसे कारावास से दंडनीय हो, जो एक वर्ष तक का, न कि दस वर्ष तक का हो सकता है तो वह उस अपराध के लिए उपबंधित भांति के कारावास से, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबंधित कारावास की दीर्घतम अवधि की एक-चौथाई तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। इस धारा में ‘अपराध” के अन्तर्गत कोई भी ऐसा कार्य या लोप भी आता है, जिसका कोई व्यक्ति भारत से बाहर दोषी होना अधिकथित हो, जो यदि वह भारत में उसका दोषी होता, तो अपराध के रूप में दण्डनीय होता और जिसके लिए वह प्रत्यर्पण से सम्बन्धित किसी विधि के अधीन या अन्यथा भारत में पकड़े जाने या अभिरक्षा में निरुद्ध किए जाने के दायित्व के अधीन हो, और हर ऐसा कार्य या लोप इस धारा के प्रयोजन के लिए ऐसे दण्डनीय समझा जाएगा, मानो अभियुक्त व्यक्ति भारत में उसका दोषी हुआ था। अपवाद– इस उपबन्ध का विस्तार ऐसे मामले पर नहीं है, जिसमें संश्रय देना या छिपाना पकड़े जाने वाले व्यक्ति के पति या पत्नी द्वारा हो। टिप्पणी ऐश्वरामुर्थी के वाद में प्रिवी कौंसिल ने यह अभिनित किया कि इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि के लिये निम्नलिखित तत्वों को सिद्ध करना आवश्यक है (1) यह कि किसी अपराधी को पकड़ने के लिये आदेश दिया जा चुका था और वह व्यक्ति किसी अपराध का दोषी था, (2) यह कि अभियुक्त को उक्त आदेश का ज्ञान था, तथा (3) यह कि अभियुक्त ने उस व्यक्ति को पकड़े जाने से निवारित करने के लिये संश्रय दिया था या छिपाया था। इस धारा की धारा 212 से तुलना किये जाने पर यह प्रतीत होता है कि यह धारा एक ऐसे अपराधी को संश्रय देने से सम्बन्धित है जो वस्तुतः दोषसिद्धि प्रदान किये जाने के बाद या जिस पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया है या जिसे जेल में बन्द रखने का आदेश हुआ है, जेल में निकल भागा हो। धारा 212 एक ऐसे व्यक्ति को संश्रय देने से सम्बन्धित है जो कोई अपराध कारित करने के बाद लापता हो जाता है। अतः इस धारा में उल्लिखित अपराध धारा 212 के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध का गुरुतर रूप है। इस धारा के अन्तर्गत केवल वे मामले ही आते हैं जिनमें संश्रित व्यक्ति ऐसे अपराध का दोषी होता है। जिसके लिये दीर्घतम सजा कम से कम एक वर्ष का कारावास होता है। उन मामलों के लिये कोई प्रावधान नहीं बनाया गया है जिनके लिये एक वर्ष से कम से कारावास की सजा है। 216-क. लुटेरों या डाकुओं को संश्रय देने के लिए शास्ति- जो कोई यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए कि कोई व्यक्ति लूट या डकैती हाल ही में करने वाले हैं या हाल ही में । लट या डकैती कर चुके हैं, उनको या उनमें से किसी को, ऐसी लूट या डकैती का किया जाना सुकर बनाने के, या उनको या उनमें से किसी को दण्ड से प्रतिच्छादित करने के आशय से संश्रय देगा, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह तत्वहीन है कि लूट या डकैती भारत में करनी आशयित है या की जा चुकी है, या भारत से बाहर।
  1. (1944) 71 आई० ए० 80.
  2. देव बक्श सिंह, (1942) 18 लखनऊ 617.
अपवाद- इस उपबन्ध का विस्तार ऐसे मामले पर नहीं है, जिसमें संश्रय देना या छिपाना अपराधी के पति या पत्नी द्वारा हो। 216-ख. धारा 212, धारा 216 और धारा 216-क में ”संश्रय’ की परिभाषा – भारतीय दण्ड संहिता (संशोधन) अधिनियम, 1942 (1942 का 8) की धारा 3 द्वारा निरसित ।।
  1. लोक सेवक द्वारा किसी व्यक्ति को दण्ड से या किसी सम्पत्ति को समपहरण से बचाने के आशय से विधि के निदेश की अवज्ञा-जो कोई लोक सेवक होते हुए विधि के ऐसे किसी निदेश की, जो उस सम्बन्ध में हो कि उससे ऐसे लोक सेवक के नाते किस ढंग का आचरण करना चाहिए, जानते हुए अवज्ञा, किसी व्यक्ति को वैध दण्ड से बचाने के आशय से या सम्भाव्यत: तद्वारा बचाएगा, यह जानते हुए अथवा उतने दण्ड की अपेक्षा, जिससे वह दण्डनीय है, तद्द्वारा कम दण्ड दिलवाएगा यह सम्भाव्य जानते हुए अथवा किसी सम्पत्ति को ऐसे समपहरण या किसी भार से, जिसके लिए वह सम्पत्ति विधि के द्वारा दायित्व के अधीन है, बचाने के आशय से या सम्भाव्यत: तद्द्वारा बचाएगा, यह जानते हुए करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
टिप्पणी यदि कोई लोक सेवक अपने पदीय दायित्वों का निर्वहन समुचित रूप से नहीं करता है तो वह इस धारा के अन्तर्गत दण्डित होगा। इस धारा का उद्देश्य ऐसे लोक सेवक को दण्डित करना है जो साशय किसी व्यक्ति को दण्ड से बचाने के लिये विधि के किसी निर्देश का उल्लंघन करता है। इसके अन्तर्गत यह दर्शित किया जाना आवश्यक नहीं है कि दण्ड से बचाये जाने वाले व्यक्ति ने कोई अपराध कारित किया था या विधिक दण्ड से दण्डित किया जाने वाला था। अमीर उद्दीन के वाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि इस धारा के अन्तर्गत लोक सेवक उसी तरह दण्डनीय है जिस तरह अपराधी यद्यपि किसी व्यक्ति को विधिक दण्ड से बचाने का उसका आशय उस व्यक्ति के दण्ड सम्बन्धी दायित्व के बारे में भ्रमित विश्वास पर आधारित था।। इस धारा के अन्तर्गत ‘‘विधिक दण्ड” का तात्पर्य विभागीय दण्ड से नहीं है।
  1. किसी व्यक्ति को दण्ड से या किसी सम्पत्ति को समपहरण से बचाने के आशय से लोक सेवक द्वारा अशुद्ध अभिलेख या लेख की रचना-– जो कोई लोक सेवक होते हुए और ऐसे लोक सेवक के नाते कोई अभिलेख या अन्य लेख तैयार करने का भार रखते हुए, उस अभिलेख या लेख की इस प्रकार से रचना, जिसे वह जानता है कि अशुद्ध है लोक को या किसी व्यक्ति को हानि या क्षति कारित करने के आशय से या सम्भाव्यत: तद्द्वारा कारित करेगा यह जानते हुए अथवा किसी व्यक्ति को वैध दण्ड से बचाने के आशय से या सम्भाव्यत: तद्द्वारा बचाएगा यह जानते हुए अथवा किसी सम्पत्ति को ऐसे समपहरण या अन्य भार से, जिसके दायित्व के अधीन वह सम्पत्ति विधि के अनुसार है, बचाने के आशय से या सम्भाव्यत: तदद्वारा बचाएगा यह जानते हुए करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
टिप्पणी यह धारा ऐसे लोक सेवक के लिये दण्ड का विनिर्धारण करती है जो किसी व्यक्ति या सम्पत्ति को बचाने या क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से साशय मिथ्या अभिलेख तैयार करता है । इस धारा के अन्तर्गत अपराध के लिये लोक-सेवक का आशय अत्यन्त आवश्यक है। इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि के लिये किसी लेख में अशद्ध प्रविषि करना ही पर्याप्त नहीं है अपितु यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि मिथ्या प्रविष्टियाँ क्षति कारित करने के आशय से की गयी थीं।8।
  1. (1878) 3 कल० 412.
  2. जंगली लाल (1873) 19 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 40.
  3. रघुवंश लाल, (1957) 1 इला० 368.
एक लोक सेवक इस धारा के अन्तर्गत दण्डित होगा भले ही अपने आप को ही दण्ड से बचाने का उसका आशय रहा हो। अपराध का वस्तुतः कारित किया जाना आवश्यक नहीं है-इस धारा के अन्तर्गत अभिकथित अपराधी का वास्तविक दोष या अनभिज्ञता महत्वपूर्ण नहीं है यदि अभियुक्त उसे दोषी मानता है तथा उसे प्रतिच्छादित करना चाहता है ।10 मौलुद अहमद11 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनित किया है। कि यदि कोई पुलिस आफिसर अपनी डायरी में मिथ्या प्रविष्टि करता है तथा अभियुक्त को दण्ड से बचाने के आशय से दूसरे अभिलेखों में भी अभिचालन करता है तो केवल यह तथ्य कि तत्पश्चात् अभियुक्त विमुक्त कर दिया जाता है, पुलिस अधिकारी के लिये किसी भी प्रकार सहायक नहीं होगा। किसी व्यक्ति को विधिक दण्ड से बचाने के लिये लोक सेवक द्वारा अशुद्ध अभिलेख तैयार करना-देवधर सिंह12 के मामले में एक सब-इन्सपेक्टर को इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान की गई है। इस मामले के तथ्य इस प्रकार थे कि सब-इन्सपेक्टर को पुलिस निरीक्षक ने गैम्बलिग अधिनियम के अन्तर्गत कुछ व्यक्तियों को, जो किसी घर में जुआ खेल रहे थे, गिरफ्तार करने का वारण्ट दिया। सबइन्सपेक्टर ने उन व्यक्तियों को विधिक दण्ड से बचाने के लिये प्रपत्र, सूचना तथा विशेष डायरी को अशुद्ध तैयार किया। यदि कोई व्यक्ति एक पृष्ठ हटाकर उसकी जगह दूसरा पृष्ठ प्रतिस्थापित कर देता है जिससे कि उल्लिखित प्रविष्टि का लोप हो जाए तो वह व्यक्ति इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय होगा।13।
  1. न्यायिक कार्यवाही में विधि के प्रतिकूल रिपोर्ट आदि का लोक सेवक द्वारा भ्रष्टतापूर्वक दिया जानाजो कोई लोक सेवक होते हुए, न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में कोई रिपोर्ट, आदेश, अधिमत या विनिश्चय जिसका विधि के प्रतिकूल होना वह जानता हो, भ्रष्टतापूर्वक या विद्वेषपूर्वक देगा, या सुनाएगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  2. प्राधिकार वाले व्यक्ति द्वारा जो यह जानता है कि वह विधि के प्रतिकूल कार्य कर रहा है, विचारण के लिए या परिरोध करने के लिए सुपुर्दगी- जो कोई किसी ऐसे पद पर होते हुए, जिससे व्यक्तियों को विचारण या परिरोध के लिए सुपुर्द करने का, या व्यक्तियों को परिरोध में रखने का उसे वैध प्राधिकार हो, किसी व्यक्ति को उस प्राधिकार के प्रयोग में यह जानते हुए भ्रष्टतापूर्वक या विद्वेषपूर्वक विचारण या परिरोध के लिए सुपुर्द करेगा या परिरोध में रखेगा कि ऐसा करने में वह विधि के प्रतिकूल कार्य कर रहा है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  3. पकड़ने के लिए आबद्ध लोक सेवक द्वारा पकड़ने का साशय लोप- जो कोई ऐसा लोक सेवक होते हुए, जो किसी अपराध के लिए आरोपित या पकड़े जाने के दायित्व के अधीन किसी व्यक्ति को पकड़ने या परिरोध में रखने के लिए लोक सेवक के नाते वैध रूप से आबद्ध है, ऐसे व्यक्ति को पकड़ने का साशय लोप करेगा या ऐसे परिरोध में से ऐसे व्यक्ति का निकल भागना साशय सहन करेगा या ऐसे व्यक्ति के निकल भागने में या निकल भागने के लिए प्रयत्न करने में साशय मदद करेगा, वह निम्नलिखित रूप से दंडित किया जाएगा, अर्थात्:
यदि परिरुद्ध व्यक्ति या जो व्यक्ति पकड़ा जाना चाहिए था, वह मृत्यु से दण्डनीय अपराध के लिए आरोपित या पकड़े जाने के दायित्व के अधीन हो, तो वह जुर्माने सहित या रहित दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, अथवा
  1. नन्द किशोर, (1897) 19 इला० 305.
  2. हरदत्त शर्मा, (1897) 8 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 68.
  3. (1964) 2 क्रि० लॉ ज० 71 एस० सी०.
  4. (1899) 27 कल० 114.
  5. मदन लाल बनाम इन्दरजीत, ए० आई० आर० 1970 पंजाब एवं हरियाणा 200.
यदि परिरुद्ध व्यक्ति या जो व्यक्ति पकड़ा जाना चाहिए था, वह आजीवन कारावास या दस वर्ष तक की अवधि के कारावास से दण्डनीय अपराध के लिए आरोपित या पकड़े जाने के दायित्व के अधीन हो, तो वह जुर्माने सहित या रहित दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, अथवा यदि परिरुद्ध व्यक्ति या जो पकड़ा जाना चाहिए था वह दस वर्ष से कम की अवधि के लिए कारावास से दण्डनीय अपराध के लिए आरोपित या पकड़े जाने के दायित्व के अधीन हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, ।

Follow me at social plate Form