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Indian Penal Code 1860 False Evidence and Offences Against Public Justice Part 2 LLB Notes

  Indian Penal Code 1860 False Evidence and Offences Against Public Justice Part 2 LLB Notes:- Indian Penal Code IPC Important Book LLB Law Notes Study Material Questions With Answers Mock Test Solved Paper in Hindi English PDF Download.

  197, मिथ्या प्रमाण-पत्र जारी करना या हस्ताक्षरित करना-जो कोई ऐसा प्रमाण-पत्र, जिसका दिया जाना या हस्ताक्षरित किया जाना विधि द्वारा अपेक्षित हो, या जो किसी ऐसे तथ्य से सम्बन्धित हो जिसका वैसा प्रमाणपत्र विधि द्वारा साक्ष्य में ग्राह्य हो, यह जानते हुए या विश्वास करते हुए कि वह किसी तात्विक बात के बारे में मिथ्या है, वैसा प्रमाणपत्र जारी करेगा या हस्ताक्षरित करेगा, वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा, मानो उसने मिथ्या साक्ष्य दिया हो। टिप्पणी यदि कोई व्यक्ति मिथ्या प्रमाण-पत्र जारी करता है या उस पर हस्ताक्षर करता है तो इस धारा के अन्तर्गत उसके साथ वैसा ही बर्ताव होगा जैसा कि मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध में होता है। किन्तु प्रमाण-पत्र का किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर मिथ्या होना आवश्यक है अवयव-इस अपराध के दो आवश्यक तत्व हैं (1) किसी ऐसे प्रमाण-पत्र का जारी करना अथवा हस्ताक्षरित करना। (क) जिसका दिया जाना या हस्ताक्षरित होना विधि द्वारा अपेक्षित है। (ख) जो ऐसे तथ्य से सम्बन्धित है, जिसके लिये यह प्रमाण-पत्र साक्ष्य के रूप में विधि के अन्तर्गत ग्राह्य है; (2) ऐसे प्रमाण-पत्र को, यह जानते हुये या विश्वास करते हुये कि वह किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर मिथ्या है, जारी किया जाना हो, या हस्ताक्षरित किया गया हो। साक्ष्य के रूप में विधि के अन्तर्गत ग्राह्य” का अर्थ है कि प्रमाण-पत्र विधि के कतिपय उपबन्धों द्वारा बिना किसी अन्य प्रमाण के ऐसे प्रमाण-पत्र के रूप में साक्ष्य स्वरूप ग्राह्य हो ? एक चिकित्सा प्रमाणपत्र इस धारा के अन्तर्गत प्रमाण-पत्र नहीं है। अतएव किसी मिथ्या चिकित्सा प्रमाण-पत्र का जारी किया जाना अथवा प्रयोग किया जाना किसी व्यक्ति को धारा 197 अथवा 198 के अन्तर्गत दायित्वाधीन नहीं बनाता है 38 हलधर कर्जी बनाम दिलेश्वर सुबुधी39 के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि किसी विधायक द्वारा किसी विद्यार्थी को अपनी मैट्रिक के पहले छात्रवृत्ति प्राप्त करने हेतु जारी किया गया जाति प्रमाण-पत्र जिसमें उसकी जाति अथवा जनजाति का विशिष्ट उल्लेख नहीं किया गया था, इस धारा के अन्तर्गत
  1. दण्ड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2005(2006 का 2) की धारा 2 द्वारा अन्त:स्थापित।
  2. प्रफुल्ल कुमार खारा, (1942) 1 कल० 573.
  3. उपरोक्त सन्दर्भ.
  4. 1989 क्रि० लॉ ज० 629 (उड़ीसा).
प्रमाण-पत्र नहीं कहा जा सकता है। जहाँ इस निर्णय पर पहुँचने के लिये समुचित अभिलेखीय अथवा अन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे कि जारी किये गये प्रमाण-पत्र मिथ्या हैं. अथवा अभियुक्त ने उन्हें यह जानते हुये अथवा विश्वास करते हुये कि प्रमाण-पत्र मिथ्या है जारी किया है, ऐसी दशा में इस धारा के अन्तर्गत अपराध गठित नहीं होता है।
  1. प्रमाण-पत्र को जिसका मिथ्या होना ज्ञात है, सच्चे के रूप में काम में लाना- जो कोई किसी ऐसे प्रमाणपत्र को यह जानते हुए कि वह किसी तात्विक बात के सम्बन्ध में मिथ्या है, सच्चे प्रमाणपत्र के रूप में भ्रष्टतापूर्वक उपयोग में लाएगा या उपयोग में लाने का प्रयत्न करेगा, वह ऐसे दण्डित किया जाएगा, मानो उसने मिथ्या साक्ष्य दिया हो।
  2. ऐसी घोषणा में, जो साक्ष्य के रूप में विधि द्वारा ली जा सके, किया गया मिथ्या कथन-जो कोई अपने द्वारा की गई या हस्ताक्षरित किसी घोषणा में, जिसको किसी तथ्य के साक्ष्य के रूप में लेने के लिए कोई न्यायालय, या कोई लोक सेवक या अन्य व्यक्ति विधि द्वारा आबद्ध या प्राधिकृत हो, कोई ऐसा कथन करेगा जो, किसी ऐसी बात के सम्बन्ध में, जो उस उद्देश्य के लिए तात्विक हो जिसके लिए वह घोषणा की जाए या उपयोग में लाई जाए, मिथ्या है और जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास है, या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, वह उसी प्रकार दंडित किया जाएगा, मानो उसने मिथ्या साक्ष्य दिया हो।
टिप्पणी इस धारा के अन्तर्गत किसी उद्घोषणा के अन्तर्गत किये गये मिथ्या कथन, जो कि विधि द्वारा साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य हैं, के लिये दण्ड का प्रावधान किया गया है। इस धारा के निम्नलिखित तत्व हैं (1) किसी ऐसी उद्घोषणा का किया जाना जिसे साक्ष्य के अन्तर्गत ग्रहण करने के लिये कोई न्यायालय या लोक सेवक विधि द्वारा आबद्ध या प्राधिकृत है। (2) ऐसी उद्घोषणा में मिथ्या कथन किया जाना जिसे उद्घोषक जानता था या जिसके लिये उसे विश्वास था, कि वह मिथ्या है। (3) ऐसा मिथ्या कथन उस उद्देश्य के किसी महत्वपूर्ण स्थल को छू रहा हो जिनके लिये उद्घोषणा की गयी या उपयोग किया गया हो। डिप्टी जनरल मैनेजर इन्टर स्टेट बस टर्मिनल बनाम सुदर्शन कुमारी10 के वाद में रेस्पान्डेन्ट द्वारा दाखिल एक शपथपत्र जो नोटरी द्वारा सत्यापित था असत्य पाया गया। नोटरी को असत्य शपथ पत्र को सत्यापित करने हेतु नोटिस जारी की गई परन्तु तीस हजारी न्यायालय के रजिस्ट्रार कार्यालय द्वारा यह आख्या भेजी गई कि उस नाम का कोई नोटरी नहीं था। अतएव रेस्पांडेन्ट के वकील को यह निर्देश दिया गया कि वह अपने मुवक्किल को नोटरी का नाम बताने को कहे अन्यथा उसके विरुद्ध असत्य शपथपत्र दाखिल करने की कार्यवाही प्रारम्भ की जायेगी। चूंकि रेस्पान्डेन्ट की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला अतएव सुदर्शन कुमारी को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 199 के अधीन असत्य प्रमाण-पत्र और असत्य शपथ पत्र दाखिल करने हेतु दोषसिद्ध किया गया। ।
  1. ऐसी घोषणा का मिथ्या, होना जानते हुए सच्ची के रूप में काम में लाना-जो कोई किसी ऐसी घोषणा को, यह जानते हुए कि वह किसी तात्विक बात के सम्बन्ध में मिथ्या है, भ्रष्टतापूर्वक सच्ची के रूप में उपयोग में लाएगा, या उपयोग में लाने का प्रयत्न करेगा, वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा, मानो उसने मिथ्या साक्ष्य दिया हो।
स्पष्टीकरण-कोई घोषणा, जो केवल किसी अप्ररूपिता के आधार पर अग्राह्य है, धारा 199 और धारा 200 के अर्थ के अन्तर्गत घोषणा है।
  1. 1997 क्रि० लॉ ज० 1931 (एस० सी०).
  2. अपराध के साक्ष्य का विलोपन, या अपराधी को प्रतिच्छादित करने के लिए मिथ्या इत्तिला देना- जो कोई यह जानते हुए, या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि कोई अपराध किया गया है, उस अपराध के किए जाने के किसी साक्ष्य का विलोप इस आशय से कारित करेगा कि अपराधी को वैध दण्ड से प्रतिच्छादित करे या उस आशय से उस अपराध से सम्बन्धित कोई ऐसी इत्तिला देगा जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास है।
यदि अपराध मृत्यु से दण्डनीय होयदि वह अपराध जिसके किए जाने का उसे ज्ञान या विश्वास है, मृत्यु से दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; यदि आजीवन कारावास से दण्डनीय हो- और यदि वह अपराध आजीवन कारावास से, या ऐसे कारावास से, जो दस वर्ष तक का हो सकेगा, दण्डनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; यदि दस वर्ष से कम के कारावास से दण्डनीय हो-और यदि वह अपराध ऐसे कारावास से उतनी अवधि के लिए दण्डनीय हो, जो दस वर्ष तक की न हो, तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित भांति के कारावास से उतनी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि की एक-चौथाई तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। दृष्टान्त क यह जानते हुए कि ख ने य की हत्या की है, ख को दण्ड से प्रतिच्छादित करने के आशय से मृत शरीर को छिपाने में ख की सहायता करता है। क सात वर्ष के लिए दोनों में से किसी भांति के कारावास से, और जुर्माने से भी दण्डनीय है। टिप्पणी यह धारा कारित किसी अपराध के साक्ष्य के विलोपन से सम्बन्धित है तथा इसमें अपराधी को विधिक दण्ड से प्रतिच्छादित करने के लिये मिथ्या इत्तिला देना भी सम्मिलित है। धारायें 202 तथा 203 ऐसी इत्तिला दिये जाने के लोप अथवा इत्तिला दिये जाने से सम्बन्धित हैं, जबकि धारा 204 दस्तावेजी साक्ष्य को नष्ट किये। जाने से सम्बन्धित है। इस धारा का उद्देश्य उन अपराधों को समावेशित करना है जो धारा 193 तथा 195 के दायरे से बाहर हैं 41 । क्षेत्र विस्तार-कलावती42 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने इस धारा के क्षेत्र विस्तार (scope) की चर्चा करते हुये कहा था कि इस धारा का विस्तार केवल उन्हीं मामलों तक नहीं है जिसमें किसी व्यक्ति ने वास्तविक अपराधी को प्रतिच्छादित किया हो, अपितु यह उन पर भी लागू होती है जो मुख्य अपराध के दोषी हैं, यद्यपि व्यवहार्यतः न्यायालय किसी व्यक्ति को मुख्य अपराध तथा इस धारा में वर्णित अपराध दोनों के लिये एक साथ दण्डित नहीं करती। फिर भी यदि मुख्य अपराध से अभियुक्त को सम्बद्ध नहीं किया गया है तो उसे इस धारा के अन्तर्गत दण्डित किया जा सकता है।43 उन मामलों में जिनमें यह सत्यापित करना। दुष्कर है कि अमुक व्यक्ति ने मुख्य अपराध को कारित किया है तो वह केवल इस आधार पर इस धारा से मुक्ति नहीं पा सकेगा कि उसके मुख्य अपराधी होने में पर्याप्त सन्देह है।14। वेगू बनाम किंग इम्परर45 के बाद में प्रिवी कौंसिल ने अभिनिर्धारित किया कि हत्या के दोषी किसी व्यक्ति को अन्य किसी अभियोग के बिना भी दण्डित किया जा सकता है। इस मामले में पाँच व्यक्तियों को ।
  1. मुसम्मात सरीना, (1884) पी० आर० नं० 42 सन् 1884.
  2. (1953) सु० को० रि० 546 पृ० 557.
  3. नेवती मण्डल, (1939) 19 पटना 361.
  4. पब्लिक प्राजीक्यूटर बनाम वेंकटम्मा, (1932) 56 मद्रास 63.
  5. (1925) 52 आई० ए० 191.
धारा 302 के अन्तर्गत अभियुक्त बनाया गया था जिनमें से केवल दो के ही विरुद्ध दोषसिद्ध हो सका। साक्ष्यों द्वारा यह प्रतिस्थापित किया गया था कि तीन अन्य व्यक्तियों ने यह जानते हुये कि हत्या की गयी है, मृतक के शव को छिपाने में सहायता पहुँचायी थी। अत: इन तीनों व्यक्तियों को बिना किसी अन्य अभियोग के भी इस धारा के अन्तर्गत साक्ष्य के विलोपन के लिये दण्डित किया गया। पुलिस को दिये गये एक वक्तव्य, जो अन्ततः मिथ्या प्रमाणित होता है.’ के लिये एक व्यक्ति को इस धारा के अन्तर्गत उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है 46 पलविन्दर कौर47 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि जहाँ साक्ष्य द्वारा यह प्रमाणित हो जाता है कि एक व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है और उसका शव बक्स में बन्द किसी कुएँ में पाया जाता है। तथा अभियुक्तों ने उसके शव को छिपाने में भाग लिया था, किन्तु कोई ऐसा साक्ष्य नहीं था जिससे मृत्यु के कारणों का पता चलता या यह पता चलता कि किस भाँति या किन परिस्थितियों में हत्या हुई, तो ऐसी दशा में इस धारा में वर्णित अपराध के लिये अभियुक्तों को दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता। अवयव-इस धारा के अवयव इस प्रकार हैं (1) यह जानना या विश्वास करने का कारण रखना कि कोई अपराध किया गया है; (2) उस अपराध के किये जाने के किसी साक्ष्य का विलोप इस आशय से कारित करना कि अपराधी को वैध दण्ड से प्रतिच्छादित किया जा सके, या (3) अपराधी को वैध दण्ड से प्रतिच्छादित करने के आशय से उस अपराध से सम्बन्धित कोई ऐसी इत्तिला देना जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास है। (1) जानना या विश्वास करने का कारण रखना कि कोई अपराध किया गया है- इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि के लिये यह सिद्ध किया जाना चाहिये कि कोई अपराध वस्तुतः कारित किया गया है,48 जिसके साक्ष्य का विलोप करने का आरोप अभियुक्त पर है तथा अभियुक्त या तो यह जानता है अथवा विश्वास करने का पर्याप्त आधार रखता था कि अपराध कारित हुआ है।49 (2) अपराधों को प्रतिच्छादित करने का आशय अभियुक्त का मुख्य तथा एकमात्र उद्देश्य अपराधी को दण्ड से प्रतिच्छादित करना होना चाहिये। यह तथ्य कि विलोपन प्रतिच्छादित करने की सम्भावना से युक्त था, पर्याप्त नहीं है।50 । रवीन्द्र कुमार बनाम बिहार राज्य51 के मामले में नवीन कुमार जिसे कि कुछ चोटें लगी थीं पुलिस के द्वारा पेटीशनर डॉ० रवीन्द्र कुमार के पास चिकित्सा परीक्षण हेतु भेजा गया। उन्होंने चोटों की जाँच कर अपनी रिपोर्ट में यह उल्लेख किया कि चोटें साधारण प्रकार की हैं और किसी सख्त तथा तेज पदार्थ से कारित की गई | हैं। बाद में उन्होंने घायल व्यक्ति को सदर अस्पताल में एक्सरे के लिये भेजा। एक्सरे रिपोर्ट में यह कहा गया कि चोटें बन्दूक से लगी हैं और उपचार के दौरान घावों से धातु के कठोर तत्व भी पेटीशनर के द्वारा निकाले गये जिन्हें सुरक्षित रखा गया और अन्वेषणकर्ता अधिकारी के पास भेज दिया गया। पेटीशनर को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अन्तर्गत अभियुक्त के पक्ष में चिकित्सा परीक्षण की गलत रिपोर्ट प्रेषित कर अपराधी को प्रतिच्छादित करने के लिये अभियोजित किया गया। पटना उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि यदि पेटीशनर के विरुद्ध अभियोजन को चालू रखने की अनुमति दी जाती है तो यह न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। उच्च न्यायालय की राय में पेटीशनर को चोटों की प्रकृति को छिपाकर अभियुक्त की सहायता करने का आपराधिक आशय नहीं था। पेटीशनर के कार्य उसके सद्भाव और निर्दोषता को सिद्ध करने के
  1. (1925) 52 आई० ए० 191.
  2. (1953) एस० सी० आर० 94.
  3. अब्दुल कादिर, (1880) 3 इला० 279 एफ० बी०.
  4. मटुकी मिसर, (1885) 11 कल० 619.
  5. जमनादास, (1963) 1 क्रि० लॉ ज० 433.
  6. 1991 क्रि० लाँ ज० 3052 (पटना).
लिये काफी हैं जैसा कि उसने स्वयं घायल व्यक्ति को एक्सरे के लिये सन्दर्भित किया और धातु के सख्त पदार्थ जो घावों में पाये गये थे उन्हें अन्वेषणकर्ता अधिकारी के पास भेज दिया। अतएव डॉ० रवीन्द्र कुमार भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अन्तर्गत दोषी नहीं हैं। (3) अपराध का विलोप करने में सहायता प्रदान करना- यदि किसी व्यक्ति ने भयवश हत्या कारित करने के निवारण में हस्तक्षेप नहीं किया किन्तु बाद में शव के विलोपन में हत्यारों की मदद किया तो उसे इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी माना जायेगा।52 यदि कोई व्यक्ति मृत शरीर को घटनास्थल से कुछ दूर ले जाने में वास्तविक हत्यारों की सहायता करता है तो वह प्रथम दृष्टया (prima facie) इस धारा के अन्तर्गत दोषी माना जायेगा, जब तक कि वह यह न सिद्ध कर दे कि बाध्य होकर उसे ऐसा करना पड़ा था P3 विजय बनाम महाराष्ट्र राज्य4 वाले मामले में ऊषा का विवाह अपीलार्थी (अ-2) के भाई अभियुक्त 1 (अ-1) के साथ 16-5-1989 को हुआ था। विवाह के बाद वह 18-5-1989 को अपने माता पिता के घर आ गई और 4-6-1989 के बाद पुन: अ-1 के घर लाई गई। अपलिथी (अ-2) का 15-5-1989 को विवाह कर दिया गया और वह अपने भाई (अ-1) के घर आ गई। घटना के दिन 24-6-1989 को अ-1 और उसकी पत्नी ऊषा एक कमरे में सोए हुये थे और अ-2 घर के दूसरे कमरे में सोया था। दिनांक 24-6-1989 को मृतका ऊषा के पिता को पता चला कि उसकी बेटी को जला कर मार दिया गया। यद्यपि अ-1 ने बताया कि उसने आत्म हत्या किया है, जिस पर मृतका के पिता ने विश्वास नहीं किया। अभियोजन का पक्षकथन यह है कि मृतका का शव रसोई में पाया गया। यह अभिकथन किया गया कि अ-1 और अ-2 दोनों ने पुलिस को घटना के बारे में गलत सूचना दिया है। अ-1 और अ-2 दोनों का भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302, 304-ख, 498-क और 201 के अधीन विचारण किया गया। विचारण न्यायालय ने अपीलार्थियों को धारा 302, 304-ख और 498-क के अधीन अपराधों से दोषमुक्त कर दिया, किन्तु भा० द० सं० की धारा 201 के अधीन दोषसिद्ध किया, किन्तु अ-1 को भा० द० सं० की धारा 302 और 201 दोनों के अधीन दोषी ठहराया। दोनों ने उच्च न्यायालय में अपील किया, किन्तु अपीलें खारिज हो गईं। अ-1 ने विशेष इजाजत लेकर उच्चतम न्यायालय में अपील किया जो खारिज कर दी गई। वर्तमान अपील अ-2 द्वारा की गई है। उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि प्रस्तुत मामले में इस तथ्य के अतिरिक्त कि अपीलार्थी अ-2 को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 से संबंधित अपराध से मुक्त कर दिया गया था, ऐसी कोई सामग्री नहीं है, जिसके आधार पर अपराध कारित किये जाने की जानकारी होने का अपराध धारा 201 के अधीन उस पर मढ़ा जाए। इसके अतिरिक्त उसके विरुद्ध आरोप साक्ष्य को समाप्त करने के लिये लगाये गये थे। न्यायालय के मत में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 दो भागों में है अर्थात् (i) साक्ष्य को गायब करना और (2) अपराधी को बचाने के लिये गलत सूचना देना। आगे यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 201 यह अपेक्षा करती है कि अभियुक्त का आशय अपराधी की स्क्रीनिंग करने का रहा हो। दूसरे शब्दों में अपराधी को प्रतिच्छादित करने का आशय ही अभियुक्त का आरंभिक और एकमात्र उद्देश्य होना चाहिये। यह तथ्य कि छुपाए जाने का भी वही प्रभाव होगा, ऐसी संभावना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि धारा 201 में आशय की बात की गई है जो मात्र संभावना से भिन्न है। धारा 201 के घटक निम्नलिखित रूप में हैं । (i) यह कि अपराध कारित किया गया है; (ii) यह कि ऐसा अपराध किये जाने की जानकारी अभियुक्त को थी या विश्वास करने का कारण था; (iii) यह कि ऐसी जानकारी या विश्वास के साथ वह
  1. गोबरधन वेरा, (1866) 6 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 80.
  2. अवतार, (1924) 47 इला० 306.
  3. 2003 क्रि० लॉ ज० 4318 सु० को०.
(क) उस अपराध के कारित किये जाने के किसी साक्ष्य का विलोप (disappearance) करता है। या। (ख) अपराध की बाबत कोई सूचना देता है, जिसे वह उस समय जानता था या उसे विश्वास था। कि वह मिथ्या है। (iv) यह कि उसने यथोक्त कृत्य अपराधी को विधिक दण्ड से बचाने के लिये किया; वर्तमान मामले में स्वीकृत रूप से अपीलार्थी भिन्न कमरे में सो रही थी, चूंकि मृत्यु जलने से हुई थी, अतः साक्ष्य का लोप करने का प्रश्न ही नहीं उठता। यह भी उल्लेख किया गया कि धारा 201 के अधीन दोषसिद्ध अभियुक्त के धारा 302 के अधीन दोषमुक्त किये जाने के बावजूद अनुज्ञेय है। किन्तु इस मामले में अभिलेख पर कोई साक्ष्य नहीं है जो धारा 201 के अधीन अभियुक्त पर अपराध की जानकारी का दायित्व डालता हो। अत: भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन दोषसिद्धि कायम नहीं हो सकती 55 अब्दुल रजाक बनाम नन्हे तथा अन्य6 के वाद में नन्हें तथा बन्दू के ऊपर हत्या का आरोप लगाया गया था। दोनों अभियुक्तों ने मृतक को उस समय मारा जब वह प्रातः 10 बजे अपने घर से बाजार कपड़ा बेचने के लिये जा रहा था। उसकी हत्या करने के बाद उन लोगों ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया तथा सिर को अपने साथ ले गये। कुछ लोगों ने इस घटना को अपनी आँखों से देखा तथा शोर मचाया। अभियुक्तों का कथन था कि उन्होंने हत्या नहीं किया था। किन्तु लोग जो उन्हें सजा दिलवाना चाहते हैं उन लोगों का नाम मिथ्यापूर्वक हत्या में शामिल कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जहाँ गवाह मामले में किसी प्रकार का हित नहीं रखते हैं और जहाँ पर मिथ्या आलिप्त करने का कोई प्रयोजन नहीं है, वहाँ पर गवाहों के बयान को अस्वीकार करने के लिये ठोस आधार होना चाहिये। उनके बयानों को सामान्य रूप से मिथ्या कहकर अस्वीकार नहीं किया जा सकता। कोरा घाजी बनाम उड़ीसा राज्य7 के वाद में यह अभिमत व्यक्त किया गया कि यदि किसी व्यक्ति पर धारा 201 के अन्तर्गत आरोप लगाया जाता है किन्तु दोषसिद्धि प्रदान करने के लिये पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं है तो उस व्यक्ति को उन्मुक्त कर दिया जायेगा। । महेश महतो बनाम स्टेट आफ बिहार58 के वाद में मीरादेवी का विवाह उमेश महतो के साथ हुआ। उमेश महतो ने एक स्कूटर की माँग की थी जिसे मीरा देवी के भाई द्वारा आर्थिक कठिनाईयों के कारण पूरा नहीं किया जा सका। अभियुक्तगणों ने कुछ अन्य सामानों की भी माँग किया जिनमें से कुर को पूरा किया गया। परन्तु मीरा देवी को तंग करना बन्द नहीं हुआ। दि० 12-9-84 को राम विनोद प्रसाद फर्नीचर की कीमत अदा करने के लिये रामदेव महतो के यहाँ गया और उसके बाद दोनों उमेश महतो के घर गये। जब उन लोगों ने मीरा देवी के बारे में पूछताछ किया तो विशेश्वर महतो नाम के व्यक्ति ने बताया कि वह पिछले तीन दिनों से घर में नहीं है। घर के निवासियों में से कोई भी मीरा देवी के बारे में सूचना नहीं दे सका। पूछताछ करने पर गाँव की एक वृद्ध महिला ने राम देव महतो से बताया कि पिछले रविवार को तीनों अभियुक्तगणों ने मीरा | देवी की हत्या कर दी और उसकी लाश को गंडक नदी में फेंक दिया। राम विनोद प्रसाद ने पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराया परन्तु पुलिस लाश का पता नहीं लगा सकी। परन्तु राम विनोद प्रसाद और उसके भाई ने लाश की खोज जारी रखी और अन्ततः मीरादेवी की लाश दिनांक 15-9-84 को गन्डक नदी के किनारे पाई गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह स्पष्ट था कि उसके सीने में ऐसी चोटें कारित की गई थीं जो प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त थीं। अपीलांट महेश महतो उमेश महतो का छोटा भाई था। इस बात का कोई साक्ष्य नहीं था कि अपीलांट मीरा देवी को तंग कर रहा था अथवा उस पर कभी हमला किया हो। उच्चतम न्यायालय के मतानुसार अभियोजन पक्ष सन्देह से परे यह सिद्ध नहीं कर सका कि अपीलांट की मीरादेवी की हत्या करने में सह अपराधिता थी। परन्तु जहाँ तक मीरा देवी की लाश बड़े भाई महतो के साथ ले जाने और उसे नदी में फेंकने का प्रश्न है इस बात की पुष्टि यथेष्ट साक्ष्य था। सिंचाई विभाग के चिन्तामणि महतो नाम के एक आपरेटर ने एक चारपाई
  1. 2003 क्रि० लॉ ज० 4318 सु० को०.
  2. 1984 क्रि० लॉ ज० 187 (सु० को०).
  3. 1983 क्रि० लॉ ज० 692 (सु० को०).
  4. 1997 क्रि० लॉ ज० 4402 (एस० सी०).
पर चार लोगों को मीरा देवी की लाश ले जाते हुये देखा था। उसने उनसे पूछा था कि यह किसकी लाश है। तब उन लोगों ने कहा कि एक औरत की है। अतएव यह अभिनिर्धारित किया गया कि अपीलांट की धारा 201 सपठित धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता दोषसिद्धि उचित थी, क्योंकि इस आशय का विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध था। चूंकि अभियुक्त/अपीलांट केवल 18 वर्ष की उम्र का था और घटना के समय अपने भाई के साथ निवास कर रहा था, अतएव भाई द्वारा उस पर दबाव डाले जाने की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। अतएव उसकी 7 वर्ष के कारागार की सजा को उस अवधि तक के लिये कम कर दिया जो वह अब तक कारागार में व्यतीत कर चुका था।59 संजीव कुमार बनाम स्टेट आफ हिमाचल प्रदेश60 के बाद में अभियुक्त संजीव कुमार कमलेश का भतीजा था। संजीव कुमार के विरुद्ध राजेश शर्मा की हत्या कारित करने का आरोप था। मृतक राजेश का पिता विलासपुर में पब्लिक प्राजीक्यूटर के पद पर कार्यरत था। अभियुक्त कमलेश के चार पुत्रियाँ थीं जिनमें से सबसे बड़ी चंचल मृतक राजेश की कक्षा की सहपाठिनी थी और उसके साथ उसकी घनिष्ठता बढ़ गई थी। मृतक का पिता पी० डब्ल्यू० 19 इस सम्बन्ध को उचित नहीं मानता था और उसने एक बार कमलेश से यह अनुरोध किया कि वह अपनी पुत्री को राजेश से मिलने से मना कर दे। परन्तु कमलेश ने उससे उत्तर में कहा। कि वह अपने पुत्र को चंचल से मिलने से रोक दे। यह आरोपित था कि कमलेश और संजीव ने मृतक को कई बार धमकियां दिया था। हत्या कारित करने के पश्चात् संजीव कुमार पी० डब्ल्यू०-2 सपना के घर गया जहां उसके कपड़े पर खून के धब्बे थे और उसने सपना से अनुरोध किया कि वह कमलेश के घर से उसके बदलने के लिये कपड़े ले आवे। खून के दाग लगे कपड़े कमलेश के घर से बरामद भी किये गये थे। यह अभिनिर्णीत किया गया कि कमलेश ने मुख्य अभियुक्त संजीव कुमार के लिये सपना को कपड़े दिये तथा कमलेश ने पुलिस एवं अन्य गवाहों द्वारा उसके घर में तलाशी लेने से प्रतिरोध उत्पन्न किया और उसने अभियुक्त के विषय में गलत बयान दिया कि कुछ लड़कों द्वारा उसे मारा पीटा गया था और उसका पता नहीं है, तथा खून से भीगे कपड़ों की उसके घर से बरामदगी ये सभी ऐसे तथ्य हैं जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन उसकी दोषसिद्धि के लिये यथेष्ट हैं। वी० एल० ट्रेसा बनाम केरल राज्य61 के वाद में अभियुक्त मृतक की पत्नी थी। मृतक, उसकी पत्नी और उनका अवयस्क बच्चा ही उस मकान के वासी थे जहाँ यह घटना घटित हुई थी। अभियुक्त पत्नी के कथनानुसार मृतक ने अपने गले में रस्सी बांध कर आत्महत्या करने का प्रयास किया और ऐसा करने का प्रयास करते समय उसे ऐसा करने से रोकने के प्रयास के कारण मृतक एक धारदार वस्तु पर गिर पड़ा जिससे उसे खुद ही चोट लग गई और उसकी मृत्यु हो गई। परन्तु बाद में खोजबीन करने और तलाशी लेने पर उस मकान में एक रम्भा (सब्बल) पाया गया जिसमें खून लगा था जो खून कि मृतक का होना सिद्ध किया गया। यह अभिनित किया गया कि वे परिस्थितियाँ जिनमें मृतक की मृत्यु हुई उनकी अभियुक्त को विशेष जानकारी थी। यह उसके द्वारा जानबूझकर अपराध के विषय में गलत सूचना देकर अपराधी को विधि के अधीन दण्ड से बचाने के लिये तथा छिपाने का प्रयास था। यदि मृतक को घातक चोट किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा भी पहँचाई। गई थी तो भी अभियुक्त भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन अपराध हेतु दोषसिद्धि के दायित्वाधीन होगी। अतएव उच्चतम न्यायालय द्वारा अभियुक्त की धारा 201 के अन्तर्गत दोषसिद्धि को मान्य किया गया। प्रकाश धवल खैरनार बनाम महाराष्ट्र राज्य62 के मामले में दो भाईयों के बीच खेतिहर जमीन के बंटवारे के सम्बन्ध में विवाद था और मृतक जमीन में अभियुक्त का हिस्सा देने में आनाकानी कर रहा था। अभियुक्त पर मृतक के घर में बन्दूक से गोली चलाने तथा मृतक के पविार के सभी सदस्यों की मृत्यु कारित करने का आरोप था, जिसमें उसका भाई और माता शामिल थे। यह आरोपित था कि सहअपराधी पुत्र ने मुख्य अभियुक्त अपने पिता को अनेक लोगों की हत्यायें करते देखा था और उसने उन हत्याओं से सम्बन्धित साक्ष्य
  1. 1997 क्रि० लॉ ज० 4402 (एस० सी०).
  2. 1999 क्रि० लॉ ज० 1138 (एस० सी०).
  3. । ‘2001 क्रि० लॉ ज० 1171 (एस० सी०).
  4. 2002 क्रि० लॉ ज० 928 (एस० सी०).
को दो अलग-अलग अवसरों पर पुल के ऊपर से सामानों को फेंक कर नष्ट कर दिया था। यह अभिनिन किया गया कि पारिस्थितिक साक्ष्य से यह सिद्ध नहीं होता था कि पिता और पुत्र के बीच अपराध का करने हेतु कोई सामान्य उद्देश्य अथवा षड्यंत्र था। अतएव सिद्ध परिस्थितियों से सह-अपराधी का भारती दण्ड संहिता की धारा 302 के अधीन अपराध में भागीदार होना सिद्ध नहीं था। परन्तु इस बात को सिद्ध करने | का यथेष्ट साक्ष्य था कि पुत्र ने अपने पिता को बचाने के मूल उद्देश्य से हत्याओं से सम्बन्धित साक्ष्य को न किया था। अतएव वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन अपराध हेतु दोषसिद्धि योग्य था। बुधन सिंह बनाम बिहार राज्य63 के वाद में दिनांक 14-1-1979 को सायं लगभग 7 बजे जब मोहम्मद सौदागर अपने गांव के साथियों सैफुद्दीन अभि० सा० 2, अलाउद्दीन अभि० सा० 3, देवनाथ पासवान अभि० सा०-9 और लखन पासवान (अब मृतक) राजघाट मेला से लौट रहे थे, अभियुक्त देवी दयाल सिंह, मथुरा सिंह, सर जुग सिंह और छुटा सिंह उन्हें रास्ते में मिले। उसके बाद सैफुद्दीन ने अभियुक्त देवी सिंह से उनका परिचय पूछा जिसका उन लोगों में से एक ने उत्तर दिया कि वह उनका बाप है। उसके पश्चात् दोनों पक्षों में वाकयुद्ध और गाली गलौज प्रारम्भ हो गया। देवी दयाल और सरजुग सिंह अपने साथ देशी पिस्तौल और छुटा सिंह राइफल तथा मथुरा सिंह दो नली बन्दूक लिये हुये थे। उन लोगों ने मो० सौदागर और उसके साथियों को गोली मार देने की धमकी दिया जिसके बाद वे अपने गांव की ओर चोर-चोर कहकर चिल्लाते हुये भाग गये। उन लोगों की आवाज सुनकर मो० सौदागर के भाई मिस्तरमियां (मृतक) और गांव के कई अन्य लोग उधर दौड़ पड़े जिसके बाद जैसा कि आरोपित है देवी दयाल ने गोली चलाने का आदेश दिया जिसके पालन में चार लोगों द्वारा गोली चलाये जाने का आरोप है। गोली मिस्तर मियाँ (मृतक) को लगी। वह कृषि के खेत में गिर पड़े। उसके पश्चात् अभियुक्तगण भाग गये। मृतक को देवनाथ पासवान अभि० सा० १, मो० अमान उल्ला अभि० सा० 8, जलालुद्दीन अभि० सा० 7, अलाउद्दीन अभि० सा० 3, अमीरुददीन अभि० सा० 10 और अन्य द्वारा चारपाई पर उठाकर लगभग 8 बजे रात्रि में लाया गया। अभियुक्तगणों ने मृतक मिस्तर मियाँ को चारपाई सहित हथियार दिखाकर छीन लिया जिसके बाद शाहपुर गांव के मिथिला सरन सिंह अभि० साक्षी-1 सहित कई अन्य लोग आ गये। पुलिस को सूचना दी गयी और मृतक की लाश को जिस स्थान से छीना गया था उससे लगभग 750 गज की दूरी पर स्थित एक खेत से बरामद किया गया। उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिधारित किया गया कि उपरोक्त परिस्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि अभियुक्त गणों को हमला कारित किये जाने का ज्ञान था, और उन्होंने जानबूझकर साक्ष्य को छिपाने का अपराध किया और इस कारण भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन अपराध के दोषी हैं। । उच्चतम न्यायालय द्वारा यह भी अभिधारित किया गया कि चूंकि अपीलार्थी/अभियुक्तगण बुधन सिंह, राजेन्द्र सिंह, सुरेन्द्र सिंह, जगदीश सिंह और अर्जुन सिंह सभी 70 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और वे घटना के पहले वाले भाग से सम्बन्धित भी नहीं थे, अतएव न्यायहित में यह उचित होगा कि उन्हें उतनी ही सजा दी जाय जितनी वे अभिरक्षा में जेल में बिता चुके हैं। एक व्यक्ति की अविवाहिता लड़की ब से दोस्ती थी। वह गर्भवती हो गई। वेलेन्टाइन डे की रात को वह उसके घर गई और विवाह करने के लिये उस पर दबाव डाला। अभियुक्त ने इन्कार कर दिया। उसने । अभियुक्त के दरवाजे पर ही जहर खा कर आत्महत्या कर लिया। बाद में रात को अभियुक्त ने देखा कि उसके दरवाजे पर लाश पड़ी है। पुलिस के भय से और इस तथ्य को छुपाने के लिये कि उसने लड़की को प्रपीड़ित किया, जिससे उसने आत्महत्या की उसने शव को नाले में फेंक दिया। दो दिन बाद शव बरामद किया गया। अन्वेषण के बाद अभियुक्त का चालान भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन किया गया। समस्या का प्रथम भाग रवि चन्द्रन बनाम मैरियम्मा64 वाले मामले के तथ्यों से पर्याप्त समानता रखता है। और अ छल करने के लिये दायी होगा, क्योंकि अ के इस वादे पर विश्वास करके कि वह ब से शादी कर
  1. 2006 क्रि० लॉ ज० 2451 (एस० सी०).
  2. 1992 क्रि० लाँ ज० 1675 (मद्रास).
लेगा, वह अ के साथ सहवास के लिये सहमत हुई और परिणामस्वरूप गर्भवती हो गई। इसके बाद अ ने उससे विवाह करने से इन्कार कर दिया। यदि अ ने वादा (अभ्यावेदन) न किया होता तो वह अ के साथ हमबिस्तर (सहवासी) न बनती, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई। अ द्वारा ब से विवाह करने से इन्कार किये जाने के बाद वह अ के दरवाजे पर ही आत्महत्या कर लेती है। अ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन भी दायी होगा, क्योंकि उसने शव को नाले में फेंककर यह जानते हुये साक्ष्य को गायब किया कि अ द्वारा किये गये छल के अपराध के कारण ही ब ने आत्महत्या किया। उसका स्पष्ट आशय छल के अपराध के विधिक दण्डादेश से अपने को बचाना था। |
  1. इत्तिला देने के लिए आबद्ध व्यक्ति द्वारा अपराध की इत्तिला देने का साशय लोप- जो कोई यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि कोई अपराध किया गया है, उस अपराध के बारे में कोई इत्तिला जिसे देने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध हो, देने का साशय लोप करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  2. किये गये अपराध के विषय में मिथ्या इत्तिला देना- जो कोई यह जानते हुए, या विश्वास करने का कारण रखते हुए, कि कोई अपराध किया गया है, उस अपराध के बारे में कोई ऐसी इत्तिला देगा, जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। ।
स्पष्टीकरण-धारा 201 और 202 में और इस धारा में ‘‘अपराध” शब्द के अन्तर्गत भारत से बाहर किसी स्थान पर किया गया कोई भी ऐसा कार्य आता है, जो यदि भारत में किया जाता तो निम्नलिखित धारा अर्थात् 302, 304, 382, 392, 393, 394, 395, 396, 397, 398, 399, 402, 435, 436, 449, 450, 457, 458, 459 तथा 460 में से किसी भी धारा के अधीन दण्डनीय होता। टिप्पणी यह धारा किसी अपराध के घटित होने के सम्बन्ध में मिथ्या सूचना देने पर सूचना देने वाले व्यक्ति को दण्डित करती है तथा इस धारा के अन्तर्गत यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वह सूचना देने के लिये विधि द्वारा आबद्ध था या नहीं। इस धारा का मुख्य उद्देश्य मिथ्या सूचना दिये जाने को निरुत्साहित करना है किन्तु यह आवश्यक है कि मिथ्या होने का ज्ञान हो या विश्वास हो।
  1. साक्ष्य के रूप में किसी दस्तावेज या 65[ इलेक्ट्रानिक अभिलेख ] का पेश किया जाना निवारित करने के लिए उसको नष्ट करना- जो कोई किसी ऐसे दस्तावेज 65 [या इलेक्ट्रानिक अभिलेख] को छिपाएगा या नष्ट करेगा जिसे किसी न्यायालय में या ऐसी कार्यवाही में, जो किसी लोक सेवक के समक्ष उसकी वैसी हैसियत में विधिपूर्वक की गई है, साक्ष्य के रूप में पेश करने के लिए उसे विधिपूर्वक विवश किया जा सके, या पूर्वोक्त न्यायालय या लोक सेवक के समक्ष साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने का उपयोग में लाए जाने से निवारित करने के आशय से, या उस प्रयोजन के लिए उस दस्तावेज 65 [या इलेक्ट्रानिक अभिलेख] को पेश करने को उसके विधिपूर्वक समनित या अपेक्षित किए जाने के पश्चात् ऐसी सम्पूर्ण दस्तावेज 65 [या इलेक्ट्रानिक अभिलेख] को या उसके किसी भाग को, मिटाएगा या ऐसा बनाएगा, जो पढा न जा सके, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
टिप्पणी यह धारा किसी दस्तावेज के छिपाने या नष्ट करने से सम्बन्धित है जिसे न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिये किसी व्यक्ति को विधिपूर्वक विवश किया जा सके। इस धारा में वर्णित अपराध धारा 175 में वर्णित
  1. . सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का अधिनियम सं० 21) की धारा 91 तथा प्रथम अनुसूची द्वारा अंत:स्थापित.
अपराध का गुरुतर रूप है। धारा 175, दस्तावेज पेश करने के लिये वैध रूप से आबद्ध व्यक्ति द्वारा लोकसेवक को दस्तावेज पेश करने के लोप से सम्बन्धित है। यह धारा दीवानी तथा आपराधिक दोनों ही तरह की कार्यवाहियों पर लागू होती है। इस धारा के अन्तर्गत कोई व्यक्ति दस्तावेज को केवल उसी समय ही नहीं छिपा सकता है जब कि दस्तावेज के अस्तित्व का ज्ञान अन्य लोगों को नहीं है अपितु उस समय भी जबकि दस्तावेज के अस्तित्व का ज्ञान अन्य लोगों को है।66 दस्तावेज छुपानासुब्रानिया गनपती67 के वाद में वादी को इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान की गयी, क्योंकि एक विवाचन प्रक्रिया के दौरान विवाचक के बगल में रखे हुये एक बाण्ड को लेकर यह भागा था और देने से इन्कार कर दिया था। इस कार्यवाही के पीछे उसका उद्देश्य यह था कि एक गवाह बाण्ड पर हुई संस्तुति का उल्लेख न कर सके। दस्तावेज नष्ट करना-जहां कोई पुलिस अधिकारी डकैती पड़ने की सूचना पहले लिख तो लेता है। पर बाद में उसे नष्ट कर देता है और उसकी जगह पर एक मिथ्या सूचना एक पूर्णतया भिन्न अपराध कारित होने की दर्ज कर लेता है, वह इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय होगा।68 ।
  1. वाद या अभियोजन में किसी कार्य या कार्यवाही के प्रयोजन से मिथ्या प्रतिरूपण-जो कोई किसी दूसरे का मिथ्या प्रतिरूपण करेगा और ऐसे धरे हुए रूप में किसी वाद या आपराधिक अभियोजन में कोई स्वीकृति या कथन करेगा, या दावे की संस्वीकृति करेगा, या कोई आदेशिका निकलवाएगा या जमानतदार या प्रतिभू बनेगा, या कोई भी अन्य कार्य करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
टिप्पणी इस धारा के अन्तर्गत केवल ऐसे ही अपराध की कल्पना नहीं की गई है जिसमें कोई व्यक्ति किसी काल्पनिक नाम का प्रयोग कर दूसरों को छलता है बल्कि ऐसे अपराधों की भी जिनमें एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का मिथ्या प्रतिरूपण करता है और उस हैसियत से कोई स्वीकृति करता है, या दावे की संस्वीकृति करता है या कोई आदेशिका निकलवाता है। सुप्पाकन69 के वाद में यह अभिनित किया गया कि धारा 205 के अन्तर्गत यह आवश्यक नहीं है। कि अभियुक्त को किसी प्रकार का कपटपूर्ण लाभ प्राप्त हो। इस वाद में अ ने ब की सहमति से एक विचारण के दौरान इसलिये ब का प्रतिरूपण किया जिससे उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित न होना पड़े। यह निर्णय दिया गया कि अ इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी है तथा ब इस अपराध के दुष्प्रेरण का दोषी काल्पनिक व्यक्ति का प्रतिरूपण- इस प्रश्न को लेकर न्यायालयों में मतभेद है कि क्या कोई व्यक्ति पूर्णतया एक काल्पनिक व्यक्ति का प्रतिरूपण कर इस धारा के अन्तर्गत कोई अपराध कारित करता है। भिट्टो । कहार70 के वाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अभिनित किया है कि इस प्रकार प्रतिरूपण द्वारा इस धारा के अन्तर्गत अपराध कारित होता है। उसके विपरीत मद्रास उच्च न्यायालय की राय में यह दर्शाना आवश्यक नहीं है कि उसने किसी मिथ्या व्यक्ति का नाम ग्रहण किया था अपितु यह भी प्रतीत होना चाहिये कि ग्रहण किये गये नाम का प्रयोग किसी अन्य व्यक्ति के रूप में अपने को मिथ्यापूर्वक प्रदर्शित करने के लिये किया। गया था।71
  1. सम्पत्ति को समपहरण किए जाने में या निष्पादन में अभिगृहीत किए जाने से निवारित करने के लिए उसे कपटपूर्वक हटाना या छिपाना-जो कोई किसी सम्पत्ति को, या उसमें
  2. सुसेन बिहारी रे, (1930) 58 कल० 1051 फु० बे०.
  3. (1881) 3 मद्रास 261.
  4. मुहम्मद शाह खान, (1898) 20 इला० 367.
  5. । (1863) 3 एम० एच० सी० 450.
  6. (1862) 1 इण्ड, जूर० ओ० एस० 128.
  7. कादर रउत्तन, (1868) 4 एम० एच० सी० 18.
के किसी हित को इस आशय से कपटपूर्वक हटाएगा, छिपाएगा या किसी व्यक्ति को अन्तरित या परिदत्त करेगा, कि तद्द्वारा वह उस सम्पत्ति या उसमें के किसी हित का ऐसे दण्डादेश के अधीन जो न्यायालय या | किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा सुनाया जा चुका है या जिसके बारे में वह जानता है कि न्यायालय या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसका सुनाया जाना सम्भाव्य है, समपहरण के रूप में या जुर्माने के चुकाने के लिए लिया जाना या ऐसी डिक्री या आदेश के निष्पादन में, जो सिविल वाद में न्यायालय द्वारा दिया गया हो या जिसके बारे में वह जानता है कि सिविल वाद में न्यायालय द्वारा उसका सुनाया जाना सम्भाव्य है, लिया जाना निवारित करे, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। टिप्पणी यह धारा सम्पत्ति को समपहरण किये जाने में या निष्पादन में अभिगृहीत किये जाने से निवारित करने के लिये उसे कपटपूर्वक हटाने या छिपाने से सम्बन्धित है। इसके अन्तर्गत प्रकल्पित सम्पत्ति को कपटपूर्वक हटाने या उसे छिपाने का कार्य उस आशय से किया जाना चाहिये जिससे उसे लिया न जा सके। यदि सम्पत्ति का समपहरण पहले ही किया जा चुका है और बाद में उसे हटाया जा रहा है तो ऐसा कृत्य इस धारा के अन्तर्गत अपराध नहीं है।/2 यह धारा ऐसे मामलों में लागू नहीं होगी जिसमें समपहरण बिना किसी | गोपनीयता एवं प्रवंचना के प्रत्यक्ष था।73 एक ऋणदाता जो अन्य ऋणदाताओं का पूर्वानुमान कर किसी सम्पत्ति द्वारा जो किसी दूसरे ऋणदाता द्वारा कुर्क नहीं की जा चुकी है, अपने ऋण को उन्मोचित कर लेता है, इस धारा के अन्तर्गत अपराधी नहीं होगा।
  1. सम्पत्ति पर उसके समपहरण किए जाने में या निष्पादन में अभिगृहीत किए जाने से | निवारित करने के लिए कपटपूर्वक दावा-जो कोई किसी सम्पत्ति को, या उसमें के किसी हित को, यह जानते हुए कि ऐसी सम्पत्ति या हित पर उसका कोई अधिकार या अधिकारपूर्ण दावा नहीं है, कपटपूर्वक प्रतिगृहीत करेगा, प्राप्त करेगा, या उस पर दावा करेगा अथवा किसी सम्पत्ति या उसमें के किसी हित पर किसी | अधिकार के बारे में इस आशय से प्रवंचना करेगा कि तद्द्वारा वह उस सम्पत्ति या उसमें के हित का ऐसे दण्डादेश के अधीन, जो न्यायालय या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा सुनाया जा चुका है या जिसके बारे में। वह जानता है कि न्यायालय या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसका सुनाया जाना सम्भाव्य है, समपहरण | के रूप में या जुर्माने के चुकाने के लिए लिया जाना, या ऐसी डिक्री या आदेश के निष्पादन में, जो सिविल वाद में न्यायालय द्वारा दिरा गया हो, या जिसके बारे में वह जानता है कि सिविल वाद में न्यायालय द्वारा उसका दिया जाना सम्भाव्य है, लिया जाना निवारित करे, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी | अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  2. ऐसी राशि के लिए जो शोध्य न हो, कपटपूर्वक डिक्री होने देना सहन करना-जो। कोई किसी व्यक्ति के बाद में ऐसी राशि के लिए, जो ऐसे व्यक्ति को शोध्य न हो या शोध्य राशि से अधिक हो, या किसी ऐसी सम्पत्ति या सम्पत्ति में के हित के लिए, जिसका ऐसा व्यक्ति हकदार न हो, अपने विरुद्ध कोई। डिक्री या आदेश कपटपूर्वक पारित करवाएगा, या पारित किया जाना सहन करेगा अथवा किसी डिक्री या आदेश को उसके तुष्ट कर दिए जाने के पश्चात् या किसी ऐसी बात के लिए, जिसके विषय में उस डिक्री या आदेश की तुष्टि कर दी गई हो, अपने विरुद्ध कपटपूर्वक निष्पादित करवाएगा या किया जाना सहन करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
दृष्टान्त य के विरुद्ध एक वाद क संस्थित करता है। य यह सम्भाव्य जानते हुए कि क उसके विरुद्ध डिक्री अभिप्राप्त कर लेगा, ख के वाद में, जिसका उसके विरुद्ध कोई न्यायसंगत दावा नहीं है, अधिक रकम के लिए
  1. मुरली, (1888) 8 ए० डब्ल्यू ० एन० 237.
  2. कुटुम्ब बनाम दिनकरण, (1962) क्रि० लाँ ज० 555.
  3. अप्पा मल्या, (1876) अनरिपोर्टेड क्रि० के० 110.
अपने विरुद्ध निर्णय किया जाना इसलिए कपटपूर्वक सहन करता है कि ख स्वयं अपने लिए या य के फायदे के लिए य की सम्पत्ति के किसी ऐसे विक्रय के आगमों का अंश ग्रहण करे, जो क की डिकी के अधीन जाए। य ने इस धारा के अधीन अपराध किया है।
  1. बेईमानी से न्यायालय में मिथ्या दावा करना- जो कोई कपटपूर्वक डिक्री अभिप्राप्त करना- जो कोई किसी व्यक्ति को क्षति या क्षोभ कारित करने के आशय से न्यायालय में कोई ऐसा दावा करेगा, जिसका मिथ्या से वह जानता हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी। दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

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