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Indian Penal Code 1860 Criminal Conspiracy LLB 1st Year Notes

  Indian Penal Code 1860 Criminal Conspiracy LLB 1st Year Notes:- Indian Penal Code (IPC) Important LLB Law Study Material Notes in Hindi English Previous Year Mock Test Solved Questions With Answer Solved Sample Papers in PDF Download Online.

अध्याय 5-क

आपराधिक षड्यंत्र (CRIMINAL CONSPIRACY)

120-क. आपराधिक षड्यंत्र की परिभाषा- जबकि दो या अधिक व्यक्ति (1) कोई अवैध कार्य, अथवा (2) कोई ऐसा कार्य, जो अवैध नहीं है, अवैध साधनों द्वारा, करने या करवाने को सहमत होते हैं, तब ऐसी सहमति आपराधिक षड्यंत्र कहलाती है, परन्तु किसी अपराध को करने की सहमति के सिवाय कोई सहमति आपराधिक षड्यंत्र तब तक न होगी, जब तक कि सहमति के अलावा कोई कार्य उसके अनुसरण में उस सहमति के एक या अधिक पक्षकारों द्वारा नहीं कर दिया जाता। स्पष्टीकरण– यह तत्वहीन है कि अवैध कार्य ऐसी सहमति का चरम उद्देश्य है या उस उद्देश्य का आनुषंगिक मात्र है। टिप्पणी मात्र दो या दो से अधिक व्यक्तियों के आशय द्वारा षड्यंत्र गठित नहीं होता, अपितु इसके लिये दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच कोई अवैध कार्य या अवैध साधनों द्वारा वैध कार्य को करने के लिये सहमति होना आवश्यक है। जबकि ऐसी परिकल्पना (design) केवल आशय के रूप में रहती है, दण्डनीय नहीं होती किन्तु जैसे ही दो व्यक्ति उस परिकल्पना को कार्यान्वित करने को सहमत हो जाते हैं तो योजना स्वयं अपने आप एक कार्य का रूप धारण कर लेती है, और प्रत्येक पक्षकार का कार्य प्रतिज्ञा के बदले प्रतिज्ञा, कृत्य के बदले कृत्य (actus contra actus) यदि वैध होता तो प्रवर्तन के योग्य होता तथा यदि आपराधिक साधनों द्वारा किया जाता है तो दण्डनीय होता है। व्यक्तियों की संख्या तथा उनका सम्बन्ध बल प्रदान कर खतरा उत्पन्न करते हैं। सहमति उस आशय के अग्रसरण हेतु एक कार्य था जिसकी प्रकल्पना प्रत्येक व्यक्ति ने अपने मस्तिष्क में की थी। षड्यंत्र के आरोप में सत्यापित करने के लिये सहमति का होना आवश्यक है। इसके लिये न तो प्रत्यक्ष विचार-विमर्श अथवा समुच्चय के साक्ष्य की आवश्यकता होती है और न ही यह आवश्यक है। इसके लिये न तो प्रत्यक्ष विचार-विमर्श अथवा समुच्चय के साक्ष्य की आवश्यकता होती है और न ही यह आवश्यक है कि पक्षकार एक दूसरे के पास लाये गये हों। सहमति का निष्कर्ष उन परिस्थितियों से निकाला जा सकता है जो अवैध परिकल्पना को कार्यान्वित करने की सामान्य योजना की अवधारणा को सृजित करती हैं। समुच्चय (combination) ही इस अपराध का सार है। शब्द ‘षड्यंत्र’ में समुच्चय के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है और इसका यही सार है। षड्यंत्र की निष्क्रिय संज्ञेयता (Cognizance) मात्र पर्याप्त नहीं है वरन् सक्रिय सहयोग आवश्यक है। दसरे शब्दों में अपराध गठित करने के लिये संयुक्त दुराशय आवश्यक है। पुलिन बिहारी दास बनाम इम्परर। के वाद में एक संस्था के कुछ सदस्यों को क्रांतिकारी पाया गया किन्तु वे संस्था के वास्तविक उद्देश्यों से
  1. मुलचे बनाम रेग, (1868) 3 एल० आर० एच० एल० आर० 306 में विलिस जज का मत।
  2. मुलचे बनाम रेग, (1868) 3 एल० आर० एच० एल० आर० 306 में लार्ड जेम्सफोर्ड का मत।
  3. बारेन्द्र कुमार घोष बनाम इम्परर, (1924) 52 आई० ए० 40.
  4. पुलिन बिहारी दास बनाम इम्परर,
  5. 16 सी० डब्ल्यू० एन० 1105. 16 सी० डब्ल्यू० एन० 1105.
अवगत नहीं थे, संस्था के गुप्त तथ्यों का उन्हें पता नहीं था। इस प्रकरण में चूँकि दो मस्तिष्कों का सम्मिलन नहीं हुआ था तथा प्रत्येक की परिकल्पना को कोई अन्य नहीं जानता था, अत: उन्हें षड्यंत्र के आरोप के लिये दण्डित नहीं किया गया। षड्यंत्र गठित करने के लिये दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच सहमति होनी चाहिये । सहमति का अर्थ है एक विशिष्ट वस्तु के सन्दर्भ में दो मस्तिष्कों का सम्मिलन और जब तक वस्तु के विषय में चर्चा होती है तथा विचारों का आदान-प्रदान होता है परन्तु जब तक दो या अधिक षड्यंत्रकारियों की सम्मति द्वारा कार्यवाही की योजना निश्चित नहीं हो जाती तब तक आपराधिक षड्यंत्र की स्थिति या अवस्था को पहुंचा हुआ नहीं माना जायेगा। योगेश उर्फ सचिन जगदीश जोशी बनाम महाराष्ट्र राज्य के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया। कि षड्यन्त्र के अपराध के गठन हेतु दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मस्तिष्क का मिलन अनिवार्य है। परन्तु प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा ऐसे व्यक्तियों के मध्य करार को सिद्ध करना सम्भव नहीं है। षड्यन्त्र के उद्देश्य को आसपास की परिस्थितियों और अभियुक्त के आचरण (conduct) से अनुमान लगाया (inferred) जा सकता है। यह एक मौलिक (substantive) अपराध है। किसी अपराध के करने का मात्र करार ही इसे दण्डनीय बनाता है। भले ही वह अपराध उस अवैध करार के परिणामस्वरूप घटित न हो क्योंकि षड्यंत्र स्वत: एक मौलिक अपराध है। अजय अग्रवाल बनाम भारत संघ के वाद में एक अप्रवासी भारतीय अपीलांट दुबई में मेसर्स सेल्स इण्टरनेशनल के नाम से एक प्रतिष्ठान संचालित कर रहा था और भारत में रह रहे चार अन्य लोग अपना प्रतिष्ठान चंडीगढ़ में संचालित कर रहे थे। इन सभी पांच लोगों ने मिलकर चंडीगढ़ में पंजाब नेशनल बैंक को छलने के लिए एक षड्यंत्र रचा और इस षड्यंत्र के निष्पादन (अनुसरण) में वे बैंक को 40,30,329 रुपये का धोखा देने में सफल रहे। यह पाया गया कि अपीलांट द्वारा दुबई के एक बैंक को झूठे और जाली शिपिंग अभिलेख के प्रेषण के आधार पर विदेशी क्रेडिट के जालीपत्र बनाये गये। एतद्नुसार उनमें से सभी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120ख, 420, 468 और 471 के अधीन आरोपित किये गये। इस मामले में अपीलांट का यह तर्क था कि अपराध का संज्ञान लेने हेतु भारत की केन्द्रीय सरकार से पूर्व स्वीकृति लेना आवश्यक था। क्योंकि वह एक अप्रवासी भारतीय था। यह अभिनिर्धारित किया गया कि षड्यंत्र का आवश्यक तत्व दो या अधिक लोगों के मध्य आपसी सहमति होना आवश्यक है न कि ऐसे लोगों का भारत में निवास। भले ही षड्यंत्र के अनुसरण में आंशिक रूप से ही कार्य भारत में किया गया हो, भारत में उसका संज्ञान लिया जा सकता है। षड्यंत्र स्वयमेव वह अपराध जिसे कारित करने का षड्यंत्र रचा गया है उससे भिन्न एक तात्विक अपराध है। जब तक यह षड्यंत्र कार्यान्वित नहीं हो जाता अथवा स्वेच्छा या आवश्यकतावश त्याग नहीं दिया जाता या असफल नहीं हो जाता यह एक निरन्तरित अपराध है। आगे यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक षड्यंत्रकारी को योजना के सभी बातों की पूर्ण जानकारी हो। तमिलनाडु राज्य बनाम नलिनी8 के वाद में भारत के पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी की हत्या करने का षड्यंत्र रचा गया था। अभियुक्तों में से एक मुख्य अभियुक्त ने ऐच्छिक रूप से षड्यंत्र में उसकी प्रधान भूमिका का होना संस्वीकार किया था। संस्वीकृति की साक्षियों के साक्ष्य और महत्वपूर्ण अभिलेखों द्वारा चारपुष्ट होती थी। उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 और 120ख के अधीन उसका बापासाद्ध सही अभिनिर्धारित किया। दूसरा अभियुक्त जो मानव बम के प्रस्फोटन हेतु पावर बैटरी ले आया र यह जानता था कि उसका प्रयोग विस्फोट हेतु किया जायेगा. भी आपराधिक षड्यंत्र हेतु दोषी है। तु उन अभियुक्तों का जिनका उन कट्टर उग्रवादियों से जो हत्या के लिये जिम्मेदार थे मात्र से उन्हें दोषी नहीं बनाता है।
  1. (2008) 4 क्रि० लॉ ज० 3872 (सु० को०).
  2. 1993 क्रि० लों ज० 2516 (एस० सी०).
  3. 1999 क्रि० लाँ ज० 3124 (एस० सी०).
यायोचितता-षड्यंत्र सम्बन्धी विधि के समर्थन में अनेक तर्क प्रस्तुत किये गये हैं। इसके संबंध में सामान्य न्यायोचितता कि यह एक अपरिपक्व (inchoate) अपराध है, उसी प्रकार है जैसे कि अन्य अपरिपक्व अपराधों में। यह उन परिस्थितियों में जिनमें यह स्पष्ट है कि अपराध कारित करने का एक निश्चित आशय निरूपित हो चुका है, आशयित अपराधियों के विरुद्ध निवारक कार्यवाही को सुगम बनाती है। बहधा वे कार्य जिनसे षड्यंत्र का निष्कर्ष निकाला जाता है अपराध कारित करने के प्रयास को दर्शाते हैं, किन्त षड्यंत्र दर्शाने का लाभ यह है कि यह प्रयास के लिये आवश्यक समीपता (proximity) के दुष्कर तत्व को समाप्त कर देता है। द्वितीयत: षड्यंत्र का समर्थन इस आधार पर भी किया गया है कि एक अवैध कार्य करने के लिये दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच सन्धि कार्य को गति प्रदान करती है जो संभावित प्रारम्भिक अवस्था में ही इसे दण्डित किये जाने को न्यायोचिंत ठहराती है। यह समझना कठिन प्रतीत होता है, कि क्यों सिविल दोष कारित करने के षड्यंत्र को दण्डनीय बनाया जाना चाहिये, क्योंकि सिविल दोष, यदि यथार्थतः कारित किया गया है तो दण्डनीय नहीं होगा। इसके जवाब में दो तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं (1) एक समुच्चय उसे उत्पीड़क या घातक बना सकता है जो कि यदि एक अकेले व्यक्ति द्वारा किया जाता तो अन्यथा होगा, और (2) समुच्चय से यह भी स्पष्ट हो सकता है कि इसका उद्देश्य मात्र एक व्यक्ति के वैध अधिकार के प्रयोग को अपहानि कारित करना है। प्रथम तर्क यदा-कदा सत्य होता है, सदैव नहीं। बहुधा एक व्यक्ति उतनी ही अपहानि पहुँचा सकता है। जितना कि दो या तीन व्यक्ति तथा ऐसे अनेक घातक उद्देश्य हैं जो कई व्यक्तियों के संयोजित होने के बावजूद भी उद्देश्य पूर्ति के लिये एक व्यक्ति से अधिक सक्षम नहीं हो सकते। फलत: संख्याओं के तथ्य में निश्चयत: कोई असामाजिक महत्व नहीं है। कार्य या तो पर्याप्त हानिकारक माना जाता है जिससे वह एक अपराध बन जाता है या अपराध नहीं होता, और यदि अपराध नहीं है, तो इसे करने के लिये कोई संधि या सहमति क्यों आपराधिक मानी जाये। दूसरे तर्क के बारे में यह कहना पर्याप्त होगा कि षड्यंत्र विद्वेष (Malice) का प्रमाण हो सकता है परन्तु इसका एकमात्र तथा पर्याप्त साक्ष्य नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त यह भी कि सभी विद्वेषपूर्ण आचरण आपराधिक नहीं है। यह भी सुझाव दिया गया है कि गोपनीयता जिसके तहत सामान्यतया षड्यंत्रकारी कार्य करते हैं उन सामान्य सिद्धान्तों, जो कुछ पकड़े गये लोगों को लागू होते हैं, से विचलित होने के लिये एक दूसरा आधार है। इस स्पष्टीकरण अथवा स्पष्टीकरण के प्रयास का चाहे जो भी मूल्य हो किन्तु इस तर्क से सन्तुष्ट होना कठिन है। कि कोई कार्य जो मात्र अवैध है यदि एक व्यक्ति द्वारा किया जाता है तो अपराध नहीं है परन्तु यदि उसी अवैध कार्य को करने की सहमति एक से अधिक व्यक्ति द्वारा दी जाती है तो वह अपराध है। । ततीयत: वर्तमान विधि को कभी-कभी इस आधार पर समर्थन दिया जाता है कि परिस्थितियाँ अनगिनत हैं और पूर्वनिर्धारित विधियों में उन सभी बातों को सम्मिलित करना सम्भव नहीं है सामाजिक रूप से हानिकारक है। कुछ विद्वानों का विचार है कि आपराधिक षड्यंत्र सम्बन्धी विधि विस्तृत आपराधिक विधि की अतिवद्धि हैं। दोनों में पर्याप्त साम्यता है तथा एक ही सामान्य सिद्धान्त पर आधारित हैं। फिर भी दोनों एक नहीं है। एक व्यक्ति इसके बहुत पूर्व ही षड्यंत्र का दोषी बन सकता है जबकि उसका कार्य पूर्ण होने के करीब इतना घातक रूप में आ चुका है कि वह कारित करने का प्रयत्न किये गये अपराध के लिये आपराधिक रूप से दण्डनीय बन जाये। यह विचार कि समुच्चय (combination) आपराधिक हो सकता है, यद्यपि समुच्चय से अलग इसका उद्देश्य सही अर्थ में आपराधिक न होगा, सर्वप्रथम 17वीं शताब्दी के अन्त में तर्क में स्पष्ट रूप धारण करने
  1. हुदा, एस०, दि प्रिन्सिपल्स ऑफ दी लॉ ऑफ क्राइम्स, पृ० 111.
लगा। इस विचार को डेनियल10 के वाद द्वारा पूर्णत: खंडित कर दिया गया। किन्तु हाकिन्स के वाद के पश्चात् इस विचार को समर्थन मिला तथा यह पूर्णत: स्थापित हुआ। इस सिद्धान्त का विश्लेषणात्मक परीक्षण कुछ समस्यायें उत्पन्न करता है। यदि समुच्चय का अपेक्षित उद्देश्य किसी भी रूप में आपराधिक नहीं है तथा प्रयुक्त साधन भी किसी प्रकार आपराधिक नहीं है, तो आपराधिकता नहीं हो सकती। संयोजित होने का कृत्य मात्र निश्चयत: आपराधिक नहीं हो सकता जबकि आपराधिक अन्त अपेक्षित नहीं है और न ही आपराधिक साधनों का प्रयोग होता है। आपराधिक विधि में  पृथक्-पृथक् कार्य, प्रत्येक अकेले वैध हो सकते हैं, जब संयुक्त हो जाते हैं तो इस प्रकार का असामाजिक प्रभाव सृजित कर सकते हैं कि कर्ता का सम्पूर्ण आचरण ही आपराधिक बन जाता है। | यह तर्क इस कठिनाई को स्पष्ट करने में विफल रहता है कि आपराधिकता असामाजिक प्रभाव द्वारा सृजित होती है न कि उन व्यक्तियों की संख्या पर जो कार्य सम्पादित करते हैं। आपराधिकता का लेबल वहाँ नहीं लगाया जा सकता जहाँ कि समरूप (identical) परिणाम या प्रभाव सौ या दो सौ व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न किया जा सकता है। क्या ऐसी वस्तु तर्क द्वारा प्रतिरक्षणीय है? तब क्या इसे कार्यात्मक और प्रतिरक्षा की मात्रा, जो यह सामाजिक एवं वैयक्तिक हितों अथवा अधिकारों को प्रदान करता है, द्वारा न्यायोचित ठहराया जाता है? यदि ऐसा है, तो यह सभी विधियों के लिये न्यायसंगत है जो मुख्यत: न्यायप्राप्ति के लिये अस्तित्ववान है और इसलिये शान्ति तथा समय समता की प्रोन्नति को तार्किक अथवा विशुद्ध विश्लेषणात्मक विचारों द्वारा स्वेच्छाचारितापूर्वक इतना परिसीमित न किया जाय कि वह ऐतिहासिक न्यायनिर्णयों एवं सत्यतापूर्वक निष्कर्षित वैधिक अवधारणाओं की दृढ़ पकड़ से अधिक प्रतीत हो। यह तर्क सामान्यतया समुच्चय द्वारा समुदाय के लिये कल्पित हानि पर आधारित है परन्तु इसके विरुद्ध भी तर्क दिया जा सकता है। यह सोचना भ्रमात्मक है कि बड़ी तथा शक्तिशाली निकाय (Corporation) जो विधि की दृष्टि में एक व्यक्ति का निर्माण करती है, खतरनाक हो भी सकती है और नहीं भी। पार्कर सी० जे० के अनुसार मात्र संख्या’ कार्य की प्रकृति को प्रभावित नहीं करती। प्रोफेसर सायर ने सत्य ही कहा है कि प्रचलित तथा बहुधा दुहराये हुये इस विचार को त्याग देने के लिये यह उपयुक्त समय है कि केवल समुच्चय ही अपराधिता अथवा अवैधता से रहित कृत्यों को आपराधिक तथा अवैध बना सकता है। यह सिद्धान्त भूल से उत्पन्न हुआ है तथा विधि में इसका कोई वास्तविक आधार नहीं है। यह तार्किक स्तर पर अनुपयुक्त तथा प्रतिरक्षणीय है। इससे भी अधिक, यह खतरनाक है। रोमन विधि में यह बिल्कुल ही अज्ञात है। यह आधुनिक कान्टिनेन्टल संहिता (Continental Code) में भी नहीं। पाया जाता। कुछ कान्टिनेन्टल अधिवक्ताओं ने शायद ही इसके विषय में सुना हो। साक्ष्य के नियम (Rules of Evidence)-आपराधिक षड्यंत्रों के व्यवहार की विलक्षणता तथा आपराधिक विधि के कुछ सामान्य सिद्धान्तों से अलगाव ने हुदा के अनुसार साक्ष्य के नियमों से सम्बन्धित अन्य अनेक विलक्षणताओं को उत्पन्न किया है। इनमें से एक विलक्षणता यह है कि किसी भी एक षड्यंत्रकारी द्वारा कही अथवा की गई कोई बात जिसका सन्दर्भ उनके सामान्य आशय से है, कुछ परिस्थितियों के अन्तर्गत दूसरों के विरुद्ध साक्ष्य है। इस विधि का कारण यह है कि षड्यंत्र की परिसीमा के अन्तर्गत षड्यंत्रकारियों का स्थान भागीदारों के समतुल्य है, जिसमें एक व्यक्ति दूसरे का अभिकर्ता माना जाता है।।। इस विषय पर विधि का वर्णन रसेल निम्नलिखित ढंग से करते हैं जब यह सिद्ध हो जाता है कि अनेक व्यक्ति एक साथ एक ही अवैध प्रयोजन के लिये संयुक्त हुये हैं तो पक्षकारों में से एक पक्षकार द्वारा मूल विनिश्चित योजना तथा उनके सामान्य उद्देश्य के अनुसरण में किया गया कोई कार्य विधि के अवेक्षण (Contemplation) में पूरी पार्टी का कार्य है। फलतः ऐसे कार्य का प्रमाण उनमें से किसी भी अन्य एक के खिलाफ जो कि उसी षड्यंत्र में संलग्न थे, साक्ष्य होगा तथा पक्षकारों में से किसी भी एक द्वारा ऐसे अवैध कार्य को करते समय की गयी घोषणाएँ कार्य की प्रकृति को निर्धारित करते
  1. (1704) 6 मोड 99; 87 ई० आर० 856.
  2. हुदा, एस०; दि प्रिन्सिपल्स ऑफ दी लॉ ऑफ क्राइम्स, पृ० 113.
हुए, केवल उसी के विरुद्ध साक्ष्य नहीं प्रतीत होती अपितु शेष पूरी पार्टी के विरुद्ध भी जो उसी प्रकार दायित्वाधीन है जैसे उन्होंने स्वयं ही उस कार्य को किया हो।’ किन्तु इसके पूर्व कि एक षड्यंत्रकारी के कार्य को दूसरे के विरुद्ध साक्ष्य के रूप में दिया जा सके, षडयंत्र के अस्तित्व का सिद्ध होना आवश्यक है। अभियोजन या तो षड्यंत्र को सिद्ध करे जो षड्यंत्रकारियों के कार्यों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य बनाता है अथवा विभिन्न पक्षकारों के कार्यों को सिद्ध कर षड्यंत्र को सिद्ध करे।12 यद्यपि षड्यंत्र के आरोप में, षड्यंत्र को कार्यान्वित करने के प्रयोजन से किसी भी षड्यंत्रकारी द्वारा दिया गया वक्तव्य अन्य षड्यंत्रकारियों के विरुद्ध साक्ष्य के रूप में ग्राह्य है, परन्तु षड्यंत्र के अनुसरण में दिये गये वक्तव्य इस प्रकार ग्राह्य नहीं हैं और न ही षड्यंत्र के परित्याग या उसके उद्देश्य की प्राप्ति के बाद दिये गये। वक्तव्य। आपराधिक षड्यंत्र के अवयव-आपराधिक षड्यंत्र के निम्नलिखित अवयव हैं (1) दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच एक समझौता जिन पर षड्यंत्र करने का आरोप हो, (2) समझौता; (क) कोई अवैध कार्य; या (ख) कोई कार्य जो यद्यपि अवैध नहीं है, अवैध साधनों द्वारा, करने या करवाने के लिये किया जाये। इस धारा के परन्तुक के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि कोई अपराध कारित करने हेतु समझौता तथा एक ऐसा समझौता जिसका या तो उद्देश्य अथवा प्रयोग में लाया गया साधन अवैध है परन्तु जो कोई अपराध नहीं गठित करता, के बीच विभेद किया गया है। अपराध कारित करने हेतु किये गये समझौते के प्रकरण में समझौते के अतिरिक्त किसी अन्य विवर्त कार्य (overt act) का किया जाना आवश्यक नहीं है। किन्तु एक ऐसे कार्य के करने हेतु किये गये समझौते में जो अपराध नहीं होगा, समझौते के अतिरिक्त कुछ विवर्त कार्य भी समझौते के एक या अनेक पक्षकारों द्वारा किया जाना चाहिये। यह भी आवश्यक है कि इस प्रकार किया गया कार्य निश्चयत: कथित समझौते के अनुसरण में किया गया हो। अत: दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच कोई अवैध कार्य करने या एक ऐसा कार्य जो अवैध नहीं है, अवैध साधनों द्वारा करने के लिये कोई समझौता स्वयं आपराधिक षड्यंत्र का अपराध है। यदि आपराधिक षड्यंत्र के फलस्वरूप षड्यंत्रकारी अनेक अपराध कारित करते हैं तो उनमें से प्रत्येक उनके हेतु दायित्वाधीन होगा, भले ही उनमें से कुछ ने अपराध कारित करने में सक्रिय भाग नहीं लिया हो।13 के हासिम बनाम तमिलनाडु राज्य14 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि आपराधिक षडयंत्र का सार है, अवैध गठबंधन और सामान्य रूप से षड्यंत्र उस समय पूर्ण होता है जबकि यह गठबंधन हो जाता है। इससे आवश्यक रूप से यह अर्थ निकलता है कि जब तक कानून ऐसी अपेक्षा न करे तब तक षडयंत्र को पूरा करने के लिये कोई बाह्य कृत्य करने की आवश्यकता नहीं है और गठबंधन का उद्देश्य पूर्ण होना आवश्यक नहीं है जिससे कि किसी स्पष्ट अपराध का गठन होता हो। सह-षड्यंत्रकारी एक दूसरे की जो प्रोत्साहन और सहयोग देते हैं जिससे उनका प्रयास सफल होता है, यदि इसे व्यक्तिगत प्रयास पर छोड़ दिया जाय तो प्रयास को पूर्ण करना असम्भव होगा, इस दृष्टि से षड्यंत्रकारी और दुष्प्रेरक को दण्ड देने के लिये देखना होगा। षड्यंत्र का अपराध दो या अधिक के आशय तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि दो या अधिक व्यक्तियों के बीच अवैध साधनों से अवैध कृत्य करने के करार पर निर्भर होता है। जब तक ऐसी योजना केवल आशय में रहती है तब तक वह अभ्यारोप्य नहीं होता, जब दोनों उसे कार्य रूप देने का मन बना लेते हैं तो
  1. आर्चवाल्ड, पृ० 307.
  2. हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम कृष्ण लाल, 1987 क्रि० लाँ ज० 709 (सु० को०).
  3. 2005 क्रि० लॉ ज० 143 (सु० को०).
वह योजना ही अपने आप में कृत्य बन जाता है और प्रत्येक भागीदार का कृत्य यदि आपराधिक उद्देश्य से है। या आपराधिक साधनों से किया गया है तो दण्डनीय बन जाता है। दो या अधिक व्यक्तियों के बीच समझौता- षड्यंत्र के अपराध का आवश्यक तत्व विधि का उल्लंघन करने हेतु समझौता है। यदि वे लोग कोई अवैध कार्य करने को सहमत होते हैं तो वे आपराधिक षड्यंत्र के दोषी होंगे भले ही किये जाने के लिये विनिश्चित अवैध कार्य कारित न हुआ हो।15 जब तक कि परिकल्पना अप्रकट रहती है या केवल आशय गठित करती है वह दण्डनीय नहीं है। किन्तु जब दो या दो से अधिक व्यक्ति उनकी परिकल्पना को कार्यान्वित करने के लिये सहमत हो जाते हैं तो षड्यंत्र (Plot) स्वयं । एक कार्य होता है तथा पक्षकारों में से प्रत्येक का कार्य, प्रतिज्ञा के बदले प्रतिज्ञा, कृत्य के बदले कृत्य (actus Contra actras) दण्डनीय बन जाता है यदि वह आपराधिक उद्देश्य अथवा आपराधिक साधनों के प्रयोग के लिये है।16 षड्यंत्र के अपराध का सार न तो उस कार्य को करने अथवा प्रयोजन जिसके लिये षड्यंत्र गठित हुआ है को कार्यान्वित करने में निहित है, न ही कृत्यों में से किसी एक को करने के प्रयास में और न ही उन्हें करने हेतु दूसरों को उकसाने में अपितु पक्षकारों के बीच समझौता करने अथवा योजना बनाने में ।17। प, क तथा र आपस में ब को म के घर से जेवरात चोरी करने को राजी करने के लिये निश्चय करते हैं। वे तद्नुसार ऐसा करते भी हैं। ब इस कार्य के लिये आसानी से तैयार हो जाता है और म के घर से जेवरात चोरी करने के उद्देश्य से चल पड़ता है। इस मामले में प, क और र चोरी के दुष्प्रेरण अपराध हेतु दायित्वाधीन होंगे। चूंकि ब जेवरात चुराने के लिये प, क तथा र के अनुनय पर तैयार हो गया अतएव ब चोरी के षड्यंत्र के अपराध हेतु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120-क के अधीन दायित्वाधीन होगा। केवल एक व्यक्ति को दण्ड (Conviction of one only)—इस धारा का दूसरा अवयव यह है। कि सहमति या समझौते में दो या दो से अधिक व्यक्ति पक्षकार हों और उनमें से केवल एक व्यक्ति को आपराधिक षड्यंत्र के लिये दोषी नहीं साबित किया जा सकता, क्योंकि कोई व्यक्ति अपने आपसे षड्यंत्र नहीं। रच सकता।18 जब धारा 120-ख के अन्तर्गत केवल दो व्यक्तियों पर आरोप लगाया जाता है तथा उनमें से एक को उन्मुक्त कर दिया जाता है तो दूसरे को अकेले दण्डित नहीं किया जा सकता।19 जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों पर आरोप लगाया जाता है परन्तु एक के अतिरिक्त अन्य सभी को उन्मुक्त कर दिया जाता है। तो उस एक को भी षड्यंत्र के अपराध के लिये दण्डित नहीं किया जा सकता।20 किन्तु विम्बधर प्रधान बनाम उड़ीसा राज्य-1 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने तपन दास-2 के वाद को विभेदित किया और कहा कि, यह आवश्यक नहीं है कि षड्यंत्र के अपराध के लिये एक से अधिक व्यक्तियों को दण्डित किया जाये। यह पर्याप्त है कि यदि न्यायालय का यह विचार है कि दो या अधिक व्यक्ति ही आपराधिक षड्यंत्र से यथार्थत: सम्बन्धित थे। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि दो या अधिक व्यक्ति षड्यंत्र में सक्रिय थे, यद्यपि वे पकड़े नहीं जा सके, तो एक व्यक्ति को भी सजा दी जा सकती है।23। | यह आवश्यक नहीं है कि सभी पक्षकार एक ही अवैध कार्य को करने के लिये सहमत हों। इसमें अनेक कार्यों का किया जाना सम्मिलित हो सकता है। मेजर ई० जी० बरसे24 के बाद में यह कहा गया कि यदि अभियुक्तों पर यह आरोप है कि उन्होंने तीन अलग-अलग अवैध कार्य करने का निश्चय किया था तो मात्र यह तथ्य कि सभी को प्रत्येक अपराध के सिलसिले में अलग-अलग दण्डित नहीं किया जा सकता, इस प्रश्न
  1. मेजर ई० जी० बरसे, ए० आई० आर० 1961 सु० को० 1762.
  2. गुलाब सिंह, ए० आई० आर० 1916 इला० 141.
  3. श्रीरामुल नायडू, (1963) II क्रि० लॉ ज० 546.
  4. तपनदास, (1955) 2 एस० सी० आर० 881 : ए० आई० आर० 1956 सु० को० 33.
  5. कासिम अली, ए० आई० आर० 1927 कल० 949.
  6. तपन दास बनाम बम्बई राज्य, ए० आई० आर० 1956 सु० को० 33.
  7. ए० आई० आर० 1956 सु० को० 469.
  8. । ए० आई० आर० 1956 सु० को० 33.
  9. आर० बनाम थाम्पसन, (1851) 16 क्यू० बी० 832.
  10. ए० आई० आर० 1961 सु० को० 1762.
के निर्धारण में महत्वपूर्ण नहीं है कि क्या षड्यंत्र का अपराध कारित हुआ है। अवैध कार्यों को करने के षडयंत्र के सिलसिले में उन सभी को दोषी ठहराया जा सकता है यद्यपि वैयक्तिक अपराधों के लिये उनमें से सभी उत्तरदायी नहीं हो सकते। यह भी आवश्यक नहीं है कि षड्यंत्र का प्रत्येक सदस्य षड्यंत्र के सभी तथ्यों को जानता हो।25। | सेन्ट्रल ब्यूरो आफ इन्वेस्टीगेशन बनाम वी० सी० शुक्ला,26 के बाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि जहां अभियोजन यह सिद्ध करने में असमर्थ रहा कि दो अभियुक्तों में से एक आपराधिक षड्यंत्र में भागीदार था। वहां आपराधिक षड्यंत्र का आरोप दूसरे के विरुद्ध नहीं बनता है क्योंकि षड्यंत्र में कम से कम दो व्यक्तियों का होना आवश्यक है। | अवैध कार्य (Illegal act)-आपराधिक षड्यंत्र के अपराध को गठित करने के लिये समझौता निश्चयतः विधि विरुद्ध अथवा विधि द्वारा निषिद्ध कोई कार्य करने के लिये होना चाहिये। कोई समझौता या सहमति जो अनैतिक है या लोकनीति के विरुद्ध है, या व्यापार पर प्रतिबन्ध लगाता है या अन्यथा इस प्रकृति का है कि न्यायालय इसे प्रवर्तित नहीं करेगा, तो वह आवश्यक रूप से अवैध नहीं होगा।27 किन्तु चूँकि एक कार्य आपराधिक हुये बिना भी अवैध हो सकता है अतः यह कहा जा सकता है कि अवैध कार्य करने के लिये सहमति आपराधिक षड्यंत्र के तुल्य हो सकती है यद्यपि वह उसी रूप में दण्डनीय नहीं हो सकता।28 एक दूसरे व्यक्ति के साथ मिलकर कोई कार्य करने के लिये षड्यंत्र रचना एक अपराध हो सकता है किन्तु अकेले किया जाये तो अपराध नहीं होगा। उदाहरण के लिये वेश्या बनाने के लिये एक औरत को उपाप्त करना29 या एक व्यक्ति के साथ अवैध सम्बन्ध रखने हेतु एक औरत को उपाप्त करना 30 यदि रेलवे का कोई कर्मचारी किसी वर्तमान आदेश के विरुद्ध किन्तु वाणिज्यिक निरीक्षक जो एक सक्षम प्राधिकारी है, के निर्देश के अनुसरण में कोयले का प्रेषण करता है, और इस तथ्य का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं। है कि व्यापारी ने प्रेषण के समय कर्मचारी के साथ कोई षड्यंत्र किया था या उसे अवैध धनराशि प्रदान किया। था तो न ही यार्ड मास्टर जिसने प्रेषण किया था और न ही व्यापारी जिसके नाम में प्रेषण किया गया था, धारा। 120-ख या 420 के अन्तर्गत दण्डित किया जा सकता है।31 अवैध साधनों द्वारा (By illegal means)—किसी कार्य को, भले ही वह वैध हो, अवैध साधनों द्वारा करने की सहमति षड्यंत्र गठित करती है। कार्य का अन्त साधनों को न्यायोचित नहीं ठहराता, उदाहरण के लिये प्रतिद्वन्द्वी व्यापारी को मात देना अवैध कार्य नहीं है परन्तु सस्ती वस्तुओं के विक्रेता को नष्ट करने के लिये एकीकृत होकर एक दिवालिया क्रेता को ऋण देने के लिये प्रोत्साहन देकर विक्रेता को हानि पहुँचाना अवैध होगा।32 व्यक्त कार्य (Overt act)–जहाँ किसी ऐसे कार्य को करने के लिये समझौता हुआ जो अपराध नहीं । होगा, सहमति या समझौते के अनुसरण में, आपराधिक षड्यंत्र गठित करने के लिये किसी व्यक्त कार्य का किया जाना जरूरी है। व्यक्त कार्य उस कार्य से भिन्न होना चाहिये जो मात्र सहमति के अस्तित्व को सिद्ध करता है।33 यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक षड्यंत्रकारी षड्यंत्र की प्रत्येक अवस्था में विद्यमान रहे। अथवा यह कि उसने कोई व्यक्त कार्य किया हो। यह इस प्रकार घटित हो सकता है कि एक व्यक्ति ने कोई प्रकट कार्य न किया हो किन्तु यदि यह प्रमाणित हो जाता है कि वह षड्यंत्र में एक पक्षकार था अर्थात उसने सामान्य परिकल्पना के लिये अपनी सहमति दे दिया था तथा उस समझौते से अपने को अलग नहीं किया था।
  1. आर० के० डालमिया, (1962) II क्रि० लॉ ज० 805.
  2. ए० आई० आर० 1998 एस० सी० 1406.
  3. ओ कोनेल 11 सी-एल० एण्ड फिन 155.
  4. ह्वीट चर्च, 24, क्यू० बी० डी० 420.
  5. होवेल 4 एफ० एण्ड एफ० 160.
  6. डेलावाल 3 वर 1424.
  7. ओम प्रकाश तोड़ी बनाम बिहार राज्य, 1984 क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 197 (पटना).
  8. । एस्डेल, I एफ० एण्ड एफ० 213. ।
  9. गुलाब सिंह, 35, आई० सी० (इला०) 991.
तो यह माना जा सकता है कि वह षड्यंत्र का एक पक्षकार रहा और वह अन्य षड्यंत्रकारियों के कार्यों के लिये भी दायी है।34 भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120-क के अन्तर्गत वर्णित षड्यंत्र के अपराध के सार को स्पष्ट करते हुये मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने राजाराम गुप्ता बनाम धरमचन्द35 के मामले में प्रेक्षित किया कि वह अपराध एक अवैध व्यक्त कृत्य करने के लिये एक समझौते में सम्मिलित होने के कृत्य द्वारा गठित होता है जिसमें अवैध लोग भी सम्मिलित हैं। व्यक्त कार्य जो षड्यंत्र गठित करते हैं वे या तो (1) कोई समझौता दर्शाते हैं, या (2) अपराध की पूर्व प्रक्रिया स्वरूप होते हैं तथा (3) ऐसे कार्य होते हैं जो स्वयमेव अपराध गठित करते हैं। पक्षकारों के बीच किसी योजना या समझौते का सृजन ही इस अपराध का सार है जिसमें आपसी सम्मति का विनिमय सामान्य प्रयोजन के लिये किया जाता है और यह किसी वाह्य या व्यक्त कार्य द्वारा परिलक्षित होता है। जिस कार्य का विधि के अन्तर्गत अभियुक्त द्वारा किया जाना अपेक्षित है उस कार्य का न किया जाना अवैध लोप है। सुशील सुरी बनाम सी० बी० आई०36 के बाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि आपराधिक षड्यन्त्र का आवश्यक तत्व अपराध कारित करने का करार (agreement) है। अभियुक्तों के मध्य अपराध को करने का मात्र षड्यन्त्र का प्रमाण ही भा० द० संहिता की धारा 120-ख के अन्तर्गत दोषसिद्धि हेतु काफी है। अभियुक्त या उनमें से किसी के द्वारा किसी बाह्य कृत्य के किये जाने के प्रकरण की आवश्यकता नहीं है। षड्यंत्र का प्रमाण (Proof of Conspiracy)-अभिकथित सहमति को आपराधिक षड्यंत्र साबित करने के लिये प्रत्यक्ष साक्ष्य के द्वारा सिद्ध किया जाना न तो आवश्यक है और न तो बहुधा सम्भव ही है। बहुधा अभिकथित सहमति के अनुसरण में विवर्त कार्यों में सहयोग, सहमति स्वयं में ही हिस्सेदारी के निष्कर्ष के लिये अच्छा आधार प्रदान करता है। परमहंस यादव बनाम बिहार राज्य37 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिमत व्यक्त किया कि षड्यंत्र के प्रत्येक आरोप के समर्थन में प्रत्यक्ष साक्ष्य का उपलब्ध होना कठिन है परन्तु यदि अभियोजन पारिस्थितिक साक्ष्य पर विश्वास करता है तो उन घटनाओं की कड़ी में जो षड्यंत्र गठित करती है अबाधित संयोजन (link) का प्रमाण देना आवश्यक होगा। हीरालाल हरिलाल भगवती बनाम सी० बी० आई० नई दिल्ली38 वाले मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि षड्यंत्र के अपराध को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120ख के दायरे में लाने के लिये यह सिद्ध करना आवश्यक है कि पक्षकारों के बीच विधिविरुद्ध कार्य करने का करार हुआ था। तथापि प्रत्यक्ष साक्ष्य से षड्यंत्र को सिद्ध करना कठिन है। अशोक दत्त नायक और अन्य बनाम राज्य39 के वाद में कहा गया कि आपराधिक षड्यंत्र का आरोप एक स्वतन्त्र अपराध है, अत: इसे भी अन्य अपराधों की तरह प्रमाणित किया जाना चाहिये। आपराधिक षड्यंत्र के अपराध को सत्यापित करने के लिये अभियोजन सहमति या समझौते को सिद्ध करे, सहमति सदैव प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा प्रमाणित किये जाने योग्य नहीं है, क्योंकि यह गुप्त रूप में अस्तित्व में आती है। वास्तव में षड्यंत्र के प्रकरणों में शायद ही कभी प्रत्यक्ष प्रमाण नजर आता है। सामान्यतया यह अनुमान (inference) का विषय है जिसे अन्तर्विष्ट पक्षकारों के विशिष्ट आपराधिक कृत्यों से निर्धारित किया जाता है। इन परिस्थितियों में यह देखा जाना चाहिये कि क्या उपरोक्त वर्णित तत्वों के आधार पर अभियुक्त के विरुद्ध विशिष्ट साक्ष्य अस्तित्ववान है कि उन लोगों ने वैयक्तिक रूप से उस परिकल्पना (design) में भाग लिया था जिसका उन पर। आरोप है। अत: आपराधिक षड्यंत्र या तो प्रत्यक्ष साक्ष्य अथवा पारिस्थितिक साक्ष्य (Circumstantial evidence) द्वारा किया जा सकता है।
  1. अशोक दत्त नाइक एवम् अन्य बनाम राज्य, 1979 क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 95.
  2. राजाराम गुप्त बनाम धरमचन्द, 1983 क्रि० ला ज० 612 (म० प्र०).
  3. (2011) 3 क्रि० लॉ ज० 2939 (एस० सी०).
  4. 1987 क्रि० लॉ ज० 789 (सु० को०).
  5. 2003 क्रि० लॉ ज० 3041 (सु० को०).
  6. 1979 क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 95.
षड्यंत्र का साक्ष्य (Evidence of Conspiracy) सेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन, हैदराबाद बनाम नारायन राव0 के बाद में यह अभिधारित किया गया कि किसी कार्य को करने का करार आपराधिक षड्यंत्र का मूल तत्व (essence) है। आपराधिक षड़यंत्र का प्रत्यक्ष साक्ष्य मिलना यदाकदा उपलब्ध होता है। यह घटना के पूर्व और बाद की परिस्थितियों के आधार पर सिद्ध किया जाता है। सिद्ध परिस्थितियों को यह स्पष्ट दर्शाना चाहिए कि वे एक करार के अग्रसरण में कारित की गयी है। इस मामले में बैंक को संदिग्ध (dubious) गृह कर्ज मंजूर (sanction) कर धोखा देने का षड्यंत्र था। पैनल एडवोकेट और बैंक के अधिकारियों को अपराध हेत आरोपित किया गया था। पैनल एडवोकेट के विरुद्ध यह आरोप था कि उसने गृह कर्ज के बारे में गलत विधिक राय दिया। प्रथम सूचना रिपोर्ट में पैनल एडवोकेट का नाम नहीं था। गवाहों। में किसी ने पैनल एडवोकेट का नाम मुख्य षड्यंत्रकारियों के साथ अपराध के सन्दर्भ में नहीं लिया। यह अभिधारित किया गया कि विधिक राय देने वाले एडवोकेट के दायित्व का प्रश्न तभी जब वह बैंक को धोखा देने की योजना में सक्रिय रूप से शामिल हो। किसी भी व्यावसायिक (Professional) द्वारा दिया गया मात्र आश्वासन का अर्थ है कि वह अपने व्यवसाय में समुचित (requisite) पटुता/निपुणता रखता है और वह अपनी निपुणता का प्रयोग युक्तियुक्त क्षमता (competence) से करेगा। मात्र इस कारण कि उसकी राय स्वीकार्य नहीं है उसके विरुद्ध आपराधिक अभियोजन नहीं चल सकता जब तक कि इस बात का साक्ष्य न हो कि यह षड्यंत्रकारियों के साथ था। अधिक से अधिक राय देने वाले एडवोकेट को व्यावसायिक दुराचरण (misconduct) हेतु अपराधी कहा जा सकता है। अतएव पैनल एडवोकेट के विरुद्ध आरोप को निरस्त करने को उचित धारित किया गया। जेठसुर सुरंग भाई बनाम गुजरात राज्य,41 के वाद में को-आपरेटिव सोसाइटी के चेयरमैन पर यह आरोप लगाया गया था कि उसने सोसायटी के आय-व्यय में धोखाधड़ी करने के उद्देश्य से षड्यंत्र किया था, किन्तु षड्यंत्र का आरोप प्रमाणित न होने के कारण उच्चतम न्यायालय ने उसे उन्मुक्ति प्रदान कर दिया और यह भी कहा कि प्रतिनिहित दायित्व के आधार पर उसे दण्ड संहिता की धाराओं 408, 409, 467 तथा 471 के अन्तर्गत भी दण्डित नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने आगे कहा कि षड्यंत्र जैसे गम्भीर अपराधों के मामले में मन:स्थिति (mens rea) को त्यागा नहीं जा सकता। यदि अपराध प्रमाणित नहीं हो पाता तो यह अभियोजन को सिद्ध करना होगा कि अभियुक्त उन कार्यों या लोपों से व्यक्तिगत तौर पर सम्बन्धित था जिसका आरोप उस पर लगाया गया है। इन तथ्यों के अभाव में अभियुक्त को केवल इसलिये दोषसिद्धि नहीं प्रदान की जा सकती कि वह संस्था का प्रधान था, इसलिये उसके कार्यकलापों के लिये वह प्रतिनिहित रूप में दायित्वाधीन है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 10 एजेन्सी के सिद्धान्त को प्रतिपादित करती है। यदि इस धारा में दी गई शर्ते, पूरी हो जाती हैं तो एक व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य सह-षड्यंत्रकारी के विरुद्ध स्वीकार्य होगा। अम्मीनी बनाम स्टेट ऑफ केरल12 के वाद में टामी और उसका भाई फ्रांसिस अलग-अलग फर्म नामों से कोई व्यापार कर रहे थे। फ्रांसिल की मृत्यु के पश्चात् उसकी पत्नी अम्मीनी दो फर्मों में एक भागीदार के रूप में शामिल कर ली गयी परन्तु तीसरी फर्म में भागीदार नहीं बनाई गई। साथ ही अम्मीनी अन्य कारणों से भी टामी के व्यवहार से अप्रसन्न थी, अम्मीनी को समय-समय पर अन्य लोगों से रुपये उधार लेना पड़ता था और इसी सम्बन्ध में वह अभियुक्त सं० 2 कार्तिकेयन के सम्पर्क में आई जिसके साथ धीरे-धीरे उसका अवैध सम्बन्ध विकसित कर गया। एक बार वह बीमार पड़ गई और अभियुक्त नं० 2 अस्पताल में अक्सर उसके पास देखा जाता था। एक दिन जब टामी ने अभियुक्त नं० 2 कार्तिकेयन को देखा तो उसने अभियक्त नं० 1 अम्मीनी से कहा कि वह जो कुछ भी कर रही है वह उचित नहीं है। उसके पश्चात् अम्मीनी ने सोचा कि उसके और कार्तिकेयन के सम्बन्धों के बीच टामी और उसकी पत्नी बाधक है। अतएव उन दोनों ने शमी और उसके परिवार को बरबाद कर देने का निश्चय किया। उन लोगों ने टामी के परिवार को समाप्त करने का तरह-तरह के उपायों से प्रयास किया परन्तु उन्हें इस कार्य में सफलता तभी मिली जब उसकी महिला नौकरानी अभियक सं० 3 और थामस अभियुक्त सं० 4 जिसका भी सम्बन्ध अम्मीनी से हो गया था, षड्यंत्र में।
  1. (2012) IV क्रि० ला ज० 4610 (एस० सी०).
  2. 1984 क्रि० ला ज० 162 (सु० को०).
  3. 1998 क्रि० लाँ ज० 481 (एस० सी०).
शामिल हो गये। अभियुक्त नं० 4 थामस ने चिनधन नामक एक व्यक्ति, जो गवाह नं० 27 था, से कुछ साइनाइड प्राप्त कर लिया। पूर्व योजनानुसार अम्मीनी पहले लगभग 7 बजे सायं टामी के घर गई और बातचीत करना प्रारम्भ किया। उसके बाद अभियुक्त नं० 3 और 4 भी अम्मीनी से मिलने के बहाने वहाँ गये। उन लोगों ने टामी की पत्नी मेरली से पीने के लिये पानी लाने को कहा। जब वह उनके पीने के लिये पानी ला रही थी। उसी बीच अभियुक्त 3 एवं 4 अर्थात् महिला नौकरानी और थामस ने उसे पीछे से पकड़ लिया और उसके मुंह में जबरदस्ती साइनाइड बँस दिया। उसने महिला नौकरानी के हाथ में दाँत काटकर प्रतिरोध करने का प्रयास किया परन्तु वह सफल नहीं हुई। मेरली की तत्काल मृत्यु हो गई। तत्पश्चात् अम्मीनी ने महिला नौकरानी की सहायता से मेरली के दो बच्चों को भी साइनाइड खिला दिया और उनकी भी मृत्यु हो गई। उसके बाद अम्मीनी एक कपबोर्ड से मेरली की सोने की जंजीर लेकर घर से चली गई। यह अभिनिर्णीत किया गया, कि मृतक के घर के निकट घटना के समय अभियुक्तगण की गतिविधि के बारे में साक्ष्य था, अभियुक्तगणों में से एक की अंगुलियों के निशान मृतक के घर से बरामद शीशों में से एक पर पाये गये और एक अभियुक्त ने अपराध की संस्वीकृति भी की थी, ये परिस्थितियाँ और अन्य साक्ष्य अभियुक्त के दोष को सिद्ध करते हैं। इस बात को दर्शाने हेतु भी यथेष्ट साक्ष्य था कि चारों अभियुक्तगण मृतकगणों की हत्या का आपराधिक षड्यंत्र रचे थे। इन तथ्यों के आलोक में न्यायालय ने अभियुक्तगणों की धारा 300 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं पाया +3 पति तथा पत्नी (Husband and Wife)-अंग्रेजी विधि में यदि केवल पति तथा उसकी पत्नी दोनों ही किसी षड्यंत्र के पक्षकार हैं तो उन्हें षड्यंत्र के लिये दण्डित नहीं किया जा सकता, क्योंकि विधित: वे एक व्यक्ति माने जाते हैं किन्तु भारत में ऐसा नियम नहीं है, उन्हें षड्यंत्र के लिये दण्डित किया जा सकता है । धारा 120-ख तथा धारा 107 में अन्तर- षड्यंत्र धारा 120-ख के अन्तर्गत सारभूत (Substantive) अपराध है। दुष्प्रेरण से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। धारा 120-ख आपराधिक षड्यंत्र की एक विस्तृत परिभाषा प्रदान करती है जिसके अन्तर्गत वे कार्य सम्मिलित हैं जो धारा 107 के अन्तर्गत षड्यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण के समतुल्य है। जहाँ आपराधिक षड्यंत्र धारा 107 के अन्तर्गत दुष्प्रेरण के समतुल्य है, वहाँ धारा 120-क अथवा 120-ख के उपबंधों की सहायता लेना आवश्यक है क्योंकि संहिता में ऐसे षड्यंत्रों को दण्डित करने के लिये विशिष्ट उपबन्ध बनाये गये हैं 45 धारा 107 के अन्तर्गत किसी षड्यंत्र के लिये मात्र समुच्चय अथवा सहमति पर्याप्त नहीं है। कोई कार्य अथवा अवैध लोप षड्यंत्र के अनुसरण में होना चाहिये तथा षड्यन्त्रित वस्तु को सम्पादित करने के उद्देश्य से होना चाहिये। धारा 120-क के अन्तर्गत सहमति पर्याप्त है यदि यह अपराध करने के उद्देश्य से हैं ।6 जहाँ तक षड्यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण का सम्बन्ध है दुष्प्रेरक धारा 108 से 117 तक वर्णित विभिन्न परिस्थितियों के अन्तर्गत दण्डनीय होगा। धारा 120-क में वर्णित आपराधिक षड्यंत्र का अपराध धारा 120-ख के अन्तर्गत दण्डनीय है 47 ।

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