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How to download LLB Notes Indian Penal Code Attempted Commit Offences

 

 

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अध्याय 23 (Chapter 23)

अपराधों को करने के प्रयत्नों के विषय में

(OF ATTEMPTS TO COMMIT OFFENCES)

LLB Notes Study Material

511. आजीवन कारावास या अन्य कारावास से दण्डनीय अपराधों को करने के प्रयत्न करने के लिए दण्ड-जो कोई इस संहिता द्वारा आजीवन कारावास से या कारावास से दण्डनीय अपराध करने का, या ऐसा अपराध कारित किए जाने का प्रयत्न करेगा, और ऐसे प्रयत्न में अपराध करने की दिशा में कोई कार्य करेगा, जहां कि ऐसे प्रयत्न के दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता द्वारा नहीं किया। गया है, वहाँ वह उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भांति के कारावास से उस अवधि के लिए, जो यथास्थिति, आजीवन कारावास से आधे क की या उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि के आधे तक की हो सकेगी या ऐसे जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, या दोनों से, दण्डित किया। जाएगा।

दृष्टान्त

(क) क, एक सन्दूक तोड़कर खोलता है और उसमें से कुछ आभूषण चुराने का प्रयत्न करता है। सन्दूक इस प्रकार खोलने के पश्चात् उसे ज्ञात होता है कि उसमें कोई आभूषण नहीं है। उसने चोरी करने की दिशा में कार्य किया है, और इसलिए, वह इस धारा के अधीन दोषी है।

 (ख) क, य की जेब में हाथ डालकर य की जेब में से कुछ चुराने का प्रयत्न करता है। य की जेब में कुछ न होने के परिणामस्वरूप क अपने प्रयत्न में असफल रहता है। क इस धारा के अधीन दोषी है।

टिप्पणी

आपराधिक आचरण का विश्लेषण करने पर हमें निम्नलिखित अवस्थायें देखने को मिलती हैं-(1) विधित: निषिद्ध क्षति को कारित करने के विचार का सृजन, (2) विचार विमर्श (deliberation); (3) मन:स्थिति (mens rea); (4) तैयारी (preparation); (5) प्रयत्न (attempt) तथा (6) कार्य का पूर्णयन (अपेक्षित उद्देश्य की प्राप्ति हो सकती है और नहीं भी)। प्रथम दो अवस्थायें नैतिक मूल्यांकन हेतु सुसंगत हैं। विधिक रूप से वे महत्वपूर्ण नहीं हैं। मन:स्थिति (mens rea) यद्यपि महत्वपूर्ण है किन्तु दाण्डिक दायित्व

आरोपित करने के लिये पर्याप्त नहीं है। अपराध करने का केवल आशय दण्डनीय नहीं है क्योंकि मनुष्य के विचार को स्वयं दानव भी नहीं जानता। यह सदैव सम्भव है कि कोई मनुष्य अपना आशय बदल सकता है, अतएव केवल ऐसा दुराशय जिसके साथ कोई प्रकट (overt) कार्य भी किया जाता है, विधि द्वारा दण्डनीय होता है। किन्तु जब यह आशय शब्दों में व्यक्त हो जाता है या अभियुक्त के कार्य से इसका निष्कर्ष निकाला जाता है तो उसे इस संहिता के अन्तर्गत दोषी ठहराया जा सकता है।

चिन्तन (Contemplation) के पश्चात् दूसरी अवस्था तैयारी की होती है। तैयारी केवल कतिपय अपवादस्वरूप परिस्थितियों में ही दण्डनीय है क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में निर्दोष आशय का लगभग पूर्ण अभाव रहता है। तैयारी के वाद की अवस्था प्रयत्न होता है। प्रयत्न अपराध कारित किये जाने की प्रत्यक्ष (direct) क्रिया है।

तैयारी- तैयारी का अर्थ है ऐसी युक्ति निकालना अथवा ऐसे साधनों या उपायों की व्यवस्था करना जो अपराध के कारित किये जाने हेतु आवश्यक हैं। साधारणतया तैयारी दण्डनीय नहीं है। तैयारी के दण्डनीय नहीं होने के चार प्रमुख कारण हैं-2

1. हाल, जेरोम, जनरल प्रिंसिपल्स ऑव क्रिमिनल लॉ (द्वितीय संस्करण) पृ० 557.

2. हुदा, एस०: दि प्रिंसिपल्स ऑफ दि लॉ ऑफ क्राइम्स इन ब्रिटिश इण्डिया पृ० 47.

1. हेतु (motive) से परे तैयारी साधारणतया एक हानिरहित कार्य है।

2. द्वितीय, अधिकतर मामलों में यह साबित करना कि तैयारी दोषपूर्ण अन्त की ओर निर्दिष्ट थी या

दोषपूर्ण हेतु या आशय से की गयी थी असम्भव होगा। यह कहना निश्चयात्मक रूप से सम्भव नहीं है कि किसी व्यक्ति द्वारा की गयी तैयारी किसी अपराध को कारित करने के उद्देश्य से ही थी।

3. अपराधों का सृजन करना एवं उनकी वृद्धि करना विधि की नीति नहीं है और यदि तैयारी को

दण्डनीय बनाया जाता है तो अनेक नये अपराधों का सृजन करना पड़ेगा।

4. केवल तैयारी से ही उस व्यक्ति की सुरक्षा भावना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है जिसके विरुद्ध

अपराध कारित किया जाता है और न तो समाज में अशान्ति या संत्रास उत्पन्न होता है जिससे उसकी प्रतिशोध की भावना जाग्रत हो।

शमशुल हुदा द्वारा कथित उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त, यदि तैयारी को दण्डनीय बनाया जाता है तो निर्दोष व्यक्तियों के उत्पीड़न का खतरा है जबकि ऐसी तैयारी निर्दोष उद्देश्य हेतु भी की गयी हो। साथ ही इस बात को सदैव सम्भावना रहती है कि लोग अपने आपराधिक इरादों के लिये पाश्चात्ताप कर सकते हैं एवं पीछे हट सकते हैं भले ही उसके लिये उन्होंने तैयारी पूरी कर ली हो।

भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत इस नियम के कि तैयारी दण्डनीय नहीं है कतिपय अपवाद हैं। ये निम्न हैं

(1) भारतीय सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के आशय से आयुध आदि संग्रह करना (धारा 122)

(2) भारत सरकार के साथ शान्ति का सम्बन्ध रखने वाली शक्ति के राज्य क्षेत्र में लूट-पाट करना

अथवा लूट-पाट की तैयारी करना (धारा 126)

(3) सिक्के के कूटकरण के लिये उपकरण बनाना या बेचना (धारा 233), भारतीय सिक्के के

कूटकरण के लिये उपकरण बनाना या बेचना (धारा 234) और सिक्के के कूटकरण के लिये

उपकरण या सामग्री उपयोग में लाने के प्रयोजन से उसे कब्जे में रखना (धारा 235)

(4) डकैती करने के लिये तैयारी करना।

रमन चेद्रियार3 के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि छल के उद्देश्य से भेजने हेतु असत्य तार लिखना मात्र तैयारी है।

प्रयत्न- अपराध की संरचना उस स्थिति में होती है जहाँ कि आशयित आपराधिक कार्य पूर्णतया, क्रियान्वित नहीं होता। दायित्व उस समय प्रारम्भ हो जाता है जिस समय अपराधी कोई ऐसा कार्य करता है। जिससे केवल दुराशय का ही आभास नहीं होता अपितु उसका कार्य अपराध करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होता है। कोई अपराध करने का प्रयत्न एक ऐसा कृत्य है जो उस अपराध को कारित करने के आशय से किया जाता है, जो श्रेणीबद्ध कार्यों का एक अंश होता है एवं यदि कार्य में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हुयी तो अपराध वस्तुतः कारित हुआ होता। जिस बिन्दु पर ऐसा श्रेणीबद्ध कार्य प्रारम्भ होता है उसे परिभाषित नहीं किया जा सकता; यह प्रत्येक मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कोई अपराध कारित करने के आशय से किया गया कोई कार्य जिसका क्रियान्वयन अपेक्षित रीति से वस्तुत: असम्भव था उस अपराध को करने का एक प्रयत्न है। प्रयत्न की प्रकल्पना उस दशा में भी की जाती है जबकि अपराधी स्वेच्छया अपराध के वास्तविक क्रियान्वयन से अपने को विरत रखता है।

राम कृपाल पुत्र श्यामलाल चर्मकार बनाम मध्य प्रदेश राज्य5 के वाद में यह संप्रेक्षित किया गया कि किसी अपराध को करने के प्रयत्न की सारी तैयारियां समाप्त हो जाती हैं और अपराधी अपराध का

3. (1926) 51 एम० एल० जे० 635. ।

2. स्टीफेन, डाइजेस्ट ऑफ क्रिमिनल लॉ (8वां संस्करण) अनुच्छेद 29 पृ॰ 26.

3. (2007) 2 क्रि० लॉ ज० 2302 (सु० को०).

के आशय से कुछ कार्य करना प्रारम्भ करता है जिसे अपराध की दिशा में एक कदम माना जा सके तो उस समय प्रयत्न का प्रारम्भ होना कहा जा सकता है। जिस क्षण वह आवश्यक आशय के साथ कोई कार्य करना प्रारम्भ करता है उसी समय वह अपराध कारित करने के प्रयत्न को प्रारम्भ करता है। ”प्रयत्न” शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। अतएव उसे उसके सामान्य अर्थ में समझा जाना चाहिये।

अमन कुमार बनाम हरियाणा राज्य6 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि “प्रयत्न” शब्द को सामान्य अर्थों में समझा जाना चाहिये। इसे अपराध कारित करने के आशय या तैयारी के अर्थ से भिन्न समझा जाना चाहिये। प्रयत्न से ऐसा कृत्य अभिप्रेत है, जिसे यदि रोका न गया तो प्रयासरत कार्य पूर्ण रूप ग्रहण कर लेगा। प्रयास के मामले में अपराधी का नैतिक दोष वैसा ही होता है जैसा कि सफल होने पर होता। दण्ड को न्यायोचित जताने के लिये नैतिक दोष को क्षति से जोड़ना आवश्यक है। चूंकि क्षति उतनी नहीं हुई जितनी कृत्य के कारित होने पर होती, अत: बलात्कार के प्रयास के मामले में केवल आधा दण्ड ही अधिनिर्णीत किया गया।  

कोई प्रकट कार्य जो अपराध कारित किये जाने से सीधे सम्बन्धित होता है और जो कार्यों की श्रृंखला का अंग होता है, जिसे यदि बाधित या विफल (frustrate) नहीं किया जाता तो वास्तविक अपराध कारित हो जाता, ऐसा कार्य यदि दोषपूर्ण आशय से किया गया है तो अपराध का प्रयत्न गठित करता है। मेन के अनुसार। तैयारी किये जाने के पश्चात् अपराध कारित करने की दिशा में सीधी क्रिया (movement) को प्रयत्न कहते हैं। रेगिना बनाम चीसमैन के वाद में लार्ड ब्लैक बर्न ने यह कहा था कि इसमें किंचित मात्र सन्देह नहीं है। कि प्रयत्न के पूर्व की तैयारी तथा वास्तविक प्रयत्न में अन्तर है परन्तु यदि वास्तविक संव्यवहार (transaction) प्रारम्भ हो गया है जिसे यदि बाधित (interupted) न किया जाता तो अपराध कारित हो जाता, तो इसे अपराध का प्रयत्न न माना जायेगा। मुख्य न्यायाधीश काकबर्न के अनुसार प्रयत्न से यह अर्थ आशयित है कि यदि वह सफल हो गया होता तो आरोपित अपराध कारित हो गया होता।9

प्रयत्न की परिभाषा भारतीय दण्ड संहिता में नहीं दी गयी है परन्तु सामान्यतया प्रयत्न की संरचना हेतु निम्न अवयव (elements) आवश्यक हैं

(1) अपराध कारित करने की आपराधिक मन:स्थिति,

(2) एक कार्य जो आपराधिक प्रयत्न का दोषपूर्ण कार्य (actus reus) गठित करता हो,

(3) आशयित कार्य की पूर्ति में असफलता अर्थात् आशयित अपराध के पूर्ण होने तक कार्य का न हो पाना।

केनी के अनुसार प्रयत्न गठित करने वाला आपराधिक कार्य ऐसे कार्य के सम्पादन द्वारा पूर्ण होता है। जिससे सर्वप्रथम आशय का प्रथम दृष्ट्या स्पष्ट साक्ष्य मिलता है। रसेल के अनुसार प्रयत्न में आपराधिक कार्य का व्यावहारिक परीक्षण यह है कि अभियोजन यह सिद्ध करे कि अभियुक्त द्वारा उठाये गये कदम ऐसे बिन्दु तक पहुंच गये थे जहां उन्हीं से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वे किस लक्ष्य की ओर इंगित थे। दूसरे शब्दों में अभियुक्त द्वारा उठाये गये कदम ऐसे हों जो प्रथम दृष्ट्या अपराधी का उस अपराध को कारित करने का आशय जिसका उन पर आरोप लगाया गया है, दर्शाने में स्वयमेव यथेष्ट हों।10।

प्रयत्न की प्रस्तावित परिभाषायहाँ प्रस्तावित भारतीय दण्ड संहिता संशोधन विधेयक में दी गयी प्रयत्न की परिभाषा का भी उल्लेख करना उपयोगी होगा। प्रयत्न की परिभाषा हेतु प्रस्तावित विधेयक में संहिता में धारा 120-ग जोड़ने का प्रस्ताव है। इस धारा के अनुसार एक व्यक्ति किसी अपराध को कारित करने का प्रयत्न करता है जब

6. 2004 क्रि० लॉ ज० 1399 (सु० को०).

7. हेल्सबरीज लॉज ऑफ इंग्लैण्ड (तृतीय संस्करण, 1955) जिल्द 10 पृ० 307

8. (1852) 1 एल० एण्ड सी० 140.

9. क्वीन बनाम मैकफर्सन डी० एण्ड वी० 202.

10. रसेल आन क्राइम (ग्यारहवाँ संस्करण) पृ० 195.

(क) वह उसे कारित करने के लिये आवश्यक आशय अथवा ज्ञान से उसके कारित करने कि दिशा मे कोई कार्य करता है।

(ख) इस प्रकार किया गया कार्य अपराध के कारित किये जाने से निकटता से सम्बन्धित और उसकेसमीपस्थ (Proximate) है।

(ग) कार्य अपने उद्देश्य की पूर्ति में, तथ्यों का उसे ज्ञान न होने के कारण अथवा परिस्थितियों के उसके

नियंत्रण के बाहर होने के कारण, असफल हो जाता है।

इस धारा के प्रस्तावित दृष्टान्त निम्न हैं

(अ) क य की हत्या करने के आशय से, एक बन्दूक खरीदता है और उसमें गोली भरता है। क हत्या के प्रयत्न का दोषी नहीं है। क, ये पर उस बन्दूक से गोली चला देता है, वह हत्या के प्रयत्न का दोषी है।

(ब) क, य की विष द्वारा हत्या करने के आशय से, विष खरीदता है और उसे भोजन में मिला देता है। जो क के ही पास है। क हत्या के प्रयत्न का दोषी नहीं है। क भोजन को य की मेज पर रखता है अथवा उसे य के नौकर को य के खाने की मेज पर रखने के लिये देता है। क हत्या के प्रयत्न का दोषी है।

(स) के आभूषणों की चोरी करने के आशय से य के संदूक का ताला तोड़ता है और यह पाता है कि उसके अन्दर आभूषण नहीं है। चूंकि यहाँ तथ्यों की उसे जानकारी न होने के कारण उसके उद्देश्य की पूर्ति । नहीं होती है, वह चोरी के प्रयत्न का दोषी है।

लोकस पेनिन्सिया (Loctus Penitentiae)-लोकस पेनिन्सिया एक लैटिन सूत्र है जिसका अर्थ है। अपराध कारित करने से अपने को वापस लेने का अवसर। इस सूत्र में अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त है जिसका अर्थ है कि अभियुक्त को अपराध कारित करने से अपने को वापस लेने का अवसर प्रदान करना चाहिए। अतएव जब तक इस बात की सम्भावना रहती है कि अभियुक्त अपना मन बदल सकता है और यह सम्भव है। कि वह अपराध कारित न करे तो उसे इसका अवसर दिया जाना चाहिए। जहां तक भारतीय संहिता का सम्बन्ध है इस सिद्धान्त को तैयारी और प्रयत्न में अन्तर कर इसे मान्यता दी गई है। यही कारण है कि तैयारी को दण्डनीय नहीं बनाया गया है परन्तु प्रयत्न दण्डनीय है। तैयारी को केवल अपवाद स्वरूप कुछ अपराधों की तैयारी को ही अपराध घोषित किया गया है और जहां कहीं किसी अपराध को करने की मात्र तैयारी अपराध गठित करता है वहाँ स्पष्ट रूप से भारतीय दण्ड संहिता में यह प्रावधानित है जैसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 399 के अधीन डकैती का अपराध करने की तैयारी करना।

तैयारी और प्रयत्न में अन्तर काफी हद तक कार्य के किए जाने और उसके हानिकर परिणामों की पारस्परिक निकटता पर निर्भर करता है। तैयारी सामान्यतया अपराध गठित नहीं करती अतएव दण्डनीय नहीं। है जब कि प्रयत्न दण्डनीय है। तैयारी दण्डनीय क्यों नहीं है इसके निम्न चार कारण हैं

(i) तैयारी अपने हेतु के अतिरिक्त सामान्यतया अहितकर कृत्य है; (ii) ज्यादातर मामलों में यह दर्शाना असम्भव होगा कि तैयारी किसी दोषपूर्ण कार्य को करने की अथवा किसी हानिकर हेतु या आशय से की गयी। थी। अतएव यदि मात्र तैयारी को अपराध घोषित कर दण्डनीय बनाते हैं तो यह बहुत से निर्दोष व्यक्तियों का अनावश्यक उत्पीड़न (harassment) होगा क्योंकि लोकस पेनिन्सिया के सिद्धान्त के कारण इस बात की सम्भावना रहती है कि अभियुक्त अभी भी इरादा बदल दे और अपराध न कारित करे; (iii) साथ ही विधि की यह नीति नहीं है कि अपराध रचित किए जायें और उनकी संख्या बढ़ायी जाय। यदि हम मात्र तैयारी को दण्डनीय बनायेंगे तो उससे असंख्य नये अपराधों को सृजित करना होगा और (iv) यह भी कि मात्र तैयारी किसी अपकारित किये जाने वाले व्यक्ति की सुरक्षा के भाव को न तो प्रभावित करती है और न कर सकती है। और न तो समाज ही किसी प्रकार से क्षुब्ध या संत्रास होता है जिससे कि उसमें प्रतिशोध की भावना ही उत्पन्न हो।।

 तैयारी और प्रयत्न में अन्तर-तैयारी एक मानसिक कार्य है जिसमें किसी काम को करने के लिये कतिपय अनुवर्ती कृत्य किये जाते हैं। अपराध कारित करने के आवश्यक उपाय या साधन की व्यवस्था या आविष्कार (devise) करना तैयारी है। इसके विपरीत तैयारी करने के पश्चात् अपराध कारित करने की दिशा में प्रत्यक्ष क्रिया (movement) प्रयत्न कहा जाता है। फगना भाई बनाम उड़ीसा राज्य11 के मामले में यह प्रेक्षित किया गया कि किसी भी व्यक्ति को किसी अपराध को कारित करने का प्रयत्न करने के लिये दोषसिद्धि हेतु यह सिद्ध किया जाना आवश्यक है कि उसका अपराध कारित करने का आशय था और दूसरे यह कि उसने ऐसा कार्य किया जिससे आपराधिक प्रयत्न का दोषपूर्ण कार्य (Actus Reus) गठित होता है। आपराधिक कार्य की पर्याप्तता विधि विषयक प्रश्न है जिसके निर्धारण में कठिनाई का अनुभव किया जाता है। क्योंकि ऐसे कार्य जो किसी अपराध को कारित करने की तैयारी मात्र हैं और वे जो उसके पर्याप्त सन्निकट हैं। ताकि उन्हें अपराध को करने का प्रयत्न कहा जा सके, इनमें विभेद करने की आवश्यकता है। यह भी मत व्यक्त किया गया कि ‘‘प्रयत्न आपराधिक योजना (Design) के आंशिक क्रियान्वयन में किया गया कार्य है जो तैयारी से कुछ अधिक होता है परन्तु वास्तविक अपराध कारित नहीं होता है और इसमें केवल कार्य संरचित करने की असफलता के अतिरिक्त अपराध के सभी अवयव पाये जाते हैं।”

कृत कार्य और अपेक्षित दोषपूर्ण परिणा के मध्य सापेक्ष सन्निकटता तैयारी और प्रयत्न में अन्तर को अधिकतर निर्धारित करती है। सामान्यतया विधि तैयारी के कार्यों पर ध्यान नहीं देती है। जब तैयारी से यह स्पष्ट हो जाता है कि आशय के निर्दोष होने की कोई सम्भावना नहीं है अर्थात् जब साधनों की व्यवस्था करने से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि इसका आशय दोषपूर्ण उद्देश्यों हेतु प्रयोग में लाना है तभी विधि हस्तक्षेप करती है।

कोई कृत्य आपराधिक प्रयत्न की कोटि में तब आता है जब वह अपराध कारित करने की दिशा में सीधी चेष्टा (movement) है12 या पूर्णयन का प्रारम्भ है13 या तात्कालिक अथवा निकटता उस ओर प्रत्यक्ष चेष्टा है।14 होम्स के अनुसार किया गया कार्य आशयित परिणाम के प्राप्ति के सन्निकट होना चाहिये15 या कार्य के पूर्णयन के अत्यन्त समीप होना चाहिये ।16 किसी विशिष्ट आपराधिक कृत्य को करने का ऐसा आशय प्रयत्न है जिसमें ऐसा कार्य किया जाता है जो आशयित कार्य के पूर्ण होने में असफल रहता है।17 प्रयत्न एक आशयित प्रत्यक्ष अपूर्ण अपराध है।18 |

ओम प्रकाश बनाम पंजाब राज्य19 के मामले में अ ने अपनी पत्नी को कई दिनों तक एक कमरे में बन्द रखा और खाना इस आशय से नहीं दिया ताकि उसकी शीघ्र मृत्यु हो जाय। ब अन्तत: किसी तरह कमरे से निकल भागी। इस मामले में अ, अपनी पत्नी ब की हत्या कारित करने के प्रयत्न का दायी होगा।

साधारणतया तैयारी दण्डनीय नहीं है जबकि प्रयत्न दण्डनीय है। तैयारी के दण्डनीय न होने के कारणों का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। रेग बनाम चीसमैन20 के मामले में ब्लैकबर्न ने तैयारी और प्रयत्न में अन्तर को निम्न प्रकार स्पष्ट किया है-

11. (1992) क्रि० लाँ ज० 1808 (उड़ीसा).

12. मिलर बनाम स्टेट अला० अपी० 157.

13. ली बनाम कामनवेल्थ 141 वा 594.

14. स्किल्टन, दि रिक्विजिट एक्ट इन अ क्रिमिनल अटेम्ट, 34 पिट्सबर्ग लॉ रिव्यू 308 (1937). |

15. कामनवेल्थ बनाम केनेडी, 170 मास० 18.

16. कामनवेल्थ बनाम बीसली, 177 मास० 267.

17 विशप :न्य क्रिमिनल लॉ, जिल्द 1 धारा 728; ओम प्रकाश बनाम स्टेट आफ पंजाब, ए० आई० आर० 1961 एस० सी०

18. 1782 भी देखें। 18. ह्वार्टन, क्रिमिनल लॉ, जिल्द 1 पृ० 173.

19. ए० आई० आर० 1961 एस० सी० 1782.

20. (1862) आई० एल० एण्ड सी० 140.

“इसमें कोई सन्देह नहीं है कि वास्तविक प्रयत्न और प्रयत्न पूर्व तैयारी में अन्तर है परन्तु यदि वास्तविक संव्यवहार जिसका अन्त अपराध कारित करने में होता यदि उसमें विघ्न न पड़ा होता, प्रारम्भ हो गया है तो इसे स्पष्टतया अपराध का प्रयत्न कहेंगे।”

इस प्रकार तैयारी केवल अपवाद स्वरूप मामलों में ही दण्डनीय है। ये अपवाद ऐसे मामले हैं जहाँ या तो आशयित अपराध इतना गम्भीर होता है कि उसे प्रारम्भिक अवस्था में ही रोक देना आवश्यक होता हैं। अथवा जहाँ तैयारी ऐसी विशेष प्रकृति की होती है कि उसके निर्दोष उद्देश्यों हेतु होने की सम्भावना समाप्त हो जाती है।21 भारतीय दण्ड संहिता की धारायें 122 और 126 पूर्ववर्ती प्रकार की तथा धारायें 233, 234 एवं 235 पश्चात्वर्ती प्रकार की हैं। ऐसे कार्य जो दूरस्थ रूप से अपराध कारित किये जाने की दिशा में होते हैं ये प्रयत्न नहीं कहे जाते हैं। परन्तु जिनका सीधा सम्बन्ध ऐसे अपराधों की ओर रहता है वे प्रयत्न कहे जाते हैं 22 प्रयत्न का तात्पर्य यह है कि यदि यह सफल हो जाता तो आरोपित अपराध कारित हो जाता 23 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत कोई कार्य प्रयत्न होगा अथवा तैयारी इसका परीक्षण यह है कि क्या किये गये प्रकट कार्य ऐसे हैं कि यदि अपराधी अपना इरादा बदल देता और और उसके आगे नहीं बढ़ता तो क्या किये गये कार्य बिल्कुल नुकसान रहित होते । परन्तु यदि किया गया कार्य ऐसा है कि यदि वह किसी वाह्य कारण से निवारित न किया जाता तो अपराध कारित हो जाता, ऐसी दशा में उसे अपराध का प्रयत्न माना जायेगा 24 किसी अपराध को कारित करने का प्रयत्न मात्र इस कारण से प्रयत्न की कोटि में न आने वाला नहीं कहा जायेगा कि प्रयत्न के बाद परन्तु अपराध के पूर्ण होने के पहले अपराधी अपना आशय बदलते हुये किसी अन्य कार्य द्वारा उस अपराध को पूरा होने से रोक सकता है।25।

प्रयत्न के सिद्धान्त- तैयारी तथा प्रयत्न के बीच के अन्तर को स्पष्ट करने के लिये अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं

(क) सन्निकटता का सिद्धान्त (Proximity Rule)-कोई कार्य या श्रेणीबद्ध अनेक कार्य प्रयत्न की संरचना करते हैं यदि अपराधी लगभग सभी अथवा सभी महत्वपूर्ण कार्यवाहियाँ जो अपराध की संरचना हेतु आवश्यक हैं, पूरी कर चुका है किन्तु आकांक्षित परिणाम, जो अपराध का आवश्यक तत्व है, प्राप्त नहीं होता। इसके अन्तर्गत वे मामले आते हैं जिनमें परिणाम पूर्णतया अभियुक्त के कौशल की कमी या अभियुक्त पर प्रभावी दूसरे कारणों या ऐसे कारणों जो अभियुक्त से किसी भी तरह सम्बन्धित नहीं है, के कारण पूर्ण नहीं हो पाता है। उदाहरण के लिये, अ, ब पर गोली, उसे मार डालने के आशय से चलाता है किन्तु कौशल की कमी के कारण गोली ब को नहीं लगती है। यहाँ अ हत्या के प्रयत्न का दोषी होगा। यदि अ एक बन्दूक को ब की ओर निशाना लगाकर उसे मार डालने के उद्देश्य से घोड़ा दबा देता है परन्तु ऐसा पाया जाता है कि बन्दूक खाली थी, यहाँ अ प्रयत्न के लिये दायी होगा क्योंकि उसे उद्देश्य की प्राप्ति में सफलता इसलिये नहीं मिली कि बन्दूक भरी नहीं थी यद्यपि कि अपराध को कारित करने में उसने सब कुछ किया जो उसके अपने हाथ में था।

आर० बनाम टेलर26 का मामला सन्निकटता के सिद्धान्त का उदाहरण है। इस मामले में ‘क’ एक घास के ढेर के पीछे माचिस जलाते हुये पकड़ा गया और उसे आगजनी के प्रयत्न का दोषी घोषित किया गया। परन्तु माचिस जलाने के बजाय यदि ‘क’ केवल माचिस खरीद लिये होता अथवा माचिस उसके पास पायी जाती तब वह प्रयत्न का दोषी न होगा, क्योंकि ऐसी दशा में यह सिद्ध करना कठिन होगा कि माचिस घास के

21. हुदा, एस०, दि प्रिंसिपुल्स ऑफ दि लॉ आफ क्राइम्स इन ब्रिटिश इंडिया पृ० 47-48.

22. ईगलेटन (1855) डियर्सली 515 के वादे में बैरक पार्क का मत।।

23. मैक्सफर्सन डी० एण्ड बी० 202 के वाद में मुख्य न्यायाधीश काकबर्न का मत ।

24. तुस्तीपद मण्डल (1950) कटक 75.

25. हरिचरन, ए० आई० आर० 1950 उड़ीसा 114.

26.  (1895) 1 एफ० एण्ड एफ० 511.

ढेर में आग लगने हेतु लिये था। यहाँ तक कि पहले मामले में भी क यदि यह तर्क देता है कि उसने माचिस सिगरेट जलाने के लिये जलायी थी तो उसे दण्डित करना कठिन होगा।

आर० बनाम राबिन्सन27 इस बिन्दु पर दूसरा महत्वपूर्ण वाद है। इस मामले में एक जौहरी ने बीमें की राशि कपटपूर्वक प्राप्त करने के उद्देश्य से अपने आभूषणों के स्टाक को छिपा दिया तथा अपने को एक कुर्सी के नीचे बांध कर सहायता के लिये शोर मचाया। सड़क से होकर गुजरने वाली पुलिस ने शोर सुनकर मकान के अन्दर प्रवेश किया और जौहरी को असहाय स्थिति में पाया। जौहरी ने पुलिस को यह बताया कि उसे इस प्रकार असहाय स्थिति में बांधकर आभूषणों को लूट लिया गया है। तिजोरी खुली पाई गई थी और उसमें से आभूषण गायब थे। परवर्ती अन्वेषण के पश्चात् यह पाया गया कि जौहरी ने यह असत्य बहाना बीमा कम्पनी से धन प्राप्त करने के उद्देश्य से किया था। जौहरी ने स्वयं इसे स्वीकार किया था। यह निर्णय दिया गया कि असत्य बहाने बनाकर धन प्राप्त करने के प्रयत्न के लिये जौहरी दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसके कार्य केवल अपराध की तैयारी मात्र थे और अपराध की दिशा में किये गये कार्य नहीं थे। अतएव यदि किसी व्यक्ति ने किसी अपराध को करने की केवल तैयारी किया है और अपराध कारित करने की दिशा में अन्य कदम उठाये जाने शेष हैं तो उसे प्रयत्न के दि दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

ह्वाटन बनाम स्मिथ28 के मामले में एक फर्म से चुराये गये माल से लदा हुआ एक ट्रक पुलिस के द्वारा रोका गया। हर्टफोर्डशायर में अभियुक्त के साथ ट्रक एक पूर्व निश्चित मिलन स्थान की ओर जा रहा था जहाँ अभियुक्त के लन्दन क्षेत्र में माल को बेचने की योजना थी। अभियुक्त को फंसाने के उद्देश्य से ट्रक को अपनी यात्रा पर जाने दिया गया। ट्रक पर पुलिस के दो लोग अन्दर छिपे बैठे थे और एक वेष बदलकर ड्राइवर के बगल में बैठा था। अभियुक्त गन्तव्य स्थान पर मिला और वह अन्य व्यक्ति के साथ ट्रक पर लदे माल के विक्रय की सहायता करने में लग गया इसके बाद अभियुक्त और अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। अभियुक्त के विरुद्ध चोरी अधिनियम, 1968 की धारा 22 के अन्तर्गत चोरी का सामान बेचने के प्रयत्न का आरोप लगाया गया। न्यायालय ने अभियुक्त को दोषमुक्त करते हुये यह अभिकथित किया कि किसी व्यक्ति को किसी अपराध को कारित करने के प्रयत्न का दोषी केवल उन्हीं परिस्थितियों में ठहराया जा सकता है जहाँ अपराध कारित करने की दिशा में उसके उठाये गये कदम यदि सफल हो जाये तो उससे अपराध कारित हो जायेगा। ऐसा व्यक्ति जो किन्हीं कार्यों को ऐसे त्रुटिपूर्ण विश्वास के साथ करता है कि वे कार्य अपराध संरचित करते हैं, वह उस अपराध के प्रयत्न हेतु दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसने अपराध कारित करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। प्रस्तुत मामले में संव्यवहार के समय माल चोरी का नहीं था और यह तथ्य असंगत है कि अभियुक्त ने उसे चोरी का माल समझा। चोरी अधिनियम, 1968 की धारा 22 के अन्तर्गत अपराध संरचित करने हेतु यह आवश्यक है कि व्यवहार के समय माल चोरी का हो।

इस बात का विवाद है कि ह्वाटन बनाम स्मिथ29 के मामले में प्रतिपादित नियम हमारे देश में भी लागू होगा अथवा नहीं। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 410 चोरी की सम्पत्ति” को परिभाषित करती है और संहिता की धारा 411 चोरी की सम्पत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना अपराध घोषित करती है। कुछ लोगों का मत है कि उपरोक्त नियम धारा 411 के अन्तर्गत अपराध के प्रयत्न की दशा में लागू होगा परन्तु लेखक की राय इससे भिन्न है। मेरी राय में संहिता की धारा 511 का दृष्टान्त 2 यह स्पष्ट संकेत करता है कि पाकेटमारा। के मामले में जेब में पैसा न होने के कारण प्रयत्न असफल हो जाता है तथापि प्रयत्न करने वाला व्यक्ति दोषी माना जाता है और उसका त्रुटिपूर्ण विश्वास क्षमा का आधार नहीं माना जाता।

27. (1915) 2 के० बी० 342. ।

28. (1973) 3 आल ई० आर० 1109.

29. (1973) 3 आल ई० आर० 1109.

आर० बनाम शिवपुरी30 के प्रकरण में साथ गिरफ्तार किया गया, जिसमें प्रतिब पश्चात् सूटकेस में पाई गई औषधियां । अधिकारियों से अभियुक्त ने गिरफ्तारी के पड़े

शिवपरी30 के प्रकरण में अपीलांट को सीमा शुल्क अधिकारियों द्वारा एक सूटकेस के 1 किया गया, जिसमें प्रतिबन्धित औषधियां (drug) होने का विश्वास था जबकि विश्लेषण के

उ में पाई गई औषधियां मात्र सुंघनी अथवा गैर नुकसानी सब्जी पदार्थ पाये गये। सीमा शुल्क यों से अभियुक्त ने गिरफ्तारी के पश्चात् यह स्वीकार किया था कि वह प्रतिबन्धित औषधियों का

है। वह आपराधिक प्रयत्न अधिनियम, 1981 की धारा 1 के अधीन जानबूझ कर प्रतिबन्धित * धन्धे से सम्बन्धित होने और कस्टम एक्साइज मैनेजमेन्ट एक्ट, 1979 की धारा 170 (1) (ख) न में प्रतिबन्धित औषधियों को आश्रय देने का अपराध कारित करने का प्रयत्न करने हेतु आरोपित किया गया।

हाउस ऑफ लार्डस ने यह अभिनिर्धारित किया कि किसी व्यक्ति को प्रयत्न के लिये तभी दोषी कहा जा का है जब कि उसने कोई ऐसा कार्य किया हो जो मात्र वह अपराध जिसे करने का उसका आशय था उसे करने की तैयारी से अधिक था भले ही तथ्य ऐसे थे कि आशयित अपराध असम्भव था। वर्तमान मामले में अंकि अपीलांट का प्रतिबन्धित औषधियों का धन्धा करने और उन्हें आश्रय देने का आशय था जो आपराधिक प्रयत्न अधिनियम, 1981 की धारा 1 के अधीन अपराध था और चूंकि उसने ऐसे कार्य किये थे जो आशयित अपराध कारित करने की मात्र तैयारी से बढ़कर थे अतएव वह आरोपित अपराध को कारित करने के प्रयत्न हेतु दायित्वाधीन था।

जहाँ तक भारतीय मामलों का प्रश्न है सन्निकटता के सिद्धान्त को आर० बनाम रियासत अली के मामले में लागू किया गया। इस मामले के अभियुक्त ने एक प्रेस को सौ ऐसे फार्म मुद्रित करने का आदेश दिया जो पूर्व में बंगाल कोल कम्पनी द्वारा प्रयुक्त फार्म के समान थे। उसने मुद्रण हेतु पहले पूफ को शुद्ध कर दिया था और दूसरे प्रूफ में भी कतिपय सुधार करने का सुझाव इस उद्देश्य से दिया था, ताकि फार्म कम्पनी द्वारा प्रयुक्त फार्म के ठीक समान हो जाय। इसी अवस्था में अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया और उस पर संहिता की धारा 464 के अन्तर्गत असत्य अभिलेख बनाने के प्रयत्न का आरोप लगाया गया। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त प्रयत्न का दोषी नहीं था क्योंकि प्रयत्न के अपराध को तब तक पूर्ण नहीं कहा जायेगा जब तक कि बंगाल कोल कम्पनी की सील नहीं लगा दी जाती अथवा हस्ताक्षर उस अभिलेख पर नहीं कर दिया जाता है। इस मामले में जो कुछ किया गया उसे गलत अभिलेख बनाने की दिशा में कार्य नहीं। कहा जा सकता परन्तु यदि मुद्रित फार्मों पर उसे कम्पनी का नाम लिखते हुये पकड़ा जाता है चाहे उसने नाम। का एक ही अक्षर लिख लिया था तब यह माना जायेगा कि वास्तविक संव्यवहार जिसका अन्त जालसाजी के अपराध में होता प्रारम्भ हो गया था और उस दशा में अभियुक्त जालसाजी कारित करने के प्रयत्न का दोषी होगा।

(ख) असंभाव्यता का सिद्धान्त– एक समय नियम यह था कि यदि कोई व्यक्ति वह कार्य करने को प्रयत्न करता है जिसे करना असम्भव था तो यह अपराध नहीं होगा। यह नियम क्वीन बनाम कालिन्स2 के मामले में प्रतिपादित किया गया था। इस मामले में यह निर्णय दिया गया कि यदि क चोरी करने के आशय से दूसरे व्यक्ति की जेब में हाथ डालता है, परन्तु उसके हाथ कुछ नहीं लगता तो वह चोरी के प्रयत्न का दोषी नहीं होगा। अमेरिका के न्यायमूर्ति बटलर द्वारा इस नियम की विसंगति दर्शाते हुये निम्न टिप्पणी की। गई

“यह एक अनोखी संकल्पना होगी कि एक जाना माना पाकेटमार पुलिस की निगाहों के सामने एक भीड़ में गुजरता है और यहां तक कि पुलिस स्टेशन के कमरों में जाता है और उपस्थित व्यक्तियों

30. (1986) 2 आल इंग्लैण्ड रिपोर्ट 334 (एच० एल०).

31. (1881) 7 कल० 352.

32. 9 काक्स सी० सी० 407.

के जेबों में चोरी के आशय से हाथ डालता है तथापि उसे तब तक गिरफ्तार अथवा दण्डित नहीं किया जाता जब तक कि पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित नहीं कर लेते कि ऐसे व्यक्तियों में से किसी की जेब में वास्तव में रुपया था।”

इसी प्रकार आर० बनाम मैकफर्सन33 के मामले में क को एक बिल्डिंग में सेंध लगाकर घुसने और चोरी का प्रयत्न करने का दोषी नहीं माना गया क्योंकि उस बिल्डिंग में कोई सामान नहीं था। न्यायमूर्ति ब्रेमवेल ने इसी मामले में एक दृष्टान्त यह दिया कि यदि क किसी लकड़ी के ढूंठ को ख समझ लेता है और ख की हत्या के आशय से लकड़ी के ढूंठ पर कुल्हाड़ी से वार करता है तो क, ख की हत्या के प्रयत्न का दोषी नहीं होगा। आर० बनाम डाड34 का मामला भी इसी प्रकार निर्णीत किया गया जिसमें यह अधिकथित किया गया कि किसी व्यक्ति को ऐसे अपराध को कारित करने के प्रयत्न का दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो अपराध वह वास्तव में कारित नहीं कर सकता था। आर० बनाम ब्राउन35 के मामले में यह मत व्यक्त किया गया कि उपरोक्त मामलों को विधि के त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण के आधार पर निर्णीत किया गया था।

क्वीन बनाम कालिन्स36 और अन्य मामलों को आर० बनाम रिंग37 के मामले में उलट दिया गया था। आर० बनाम रिंग38 के मामले में अभियुक्त को एक महिला के झोले से सामान चोरी करने के प्रयत्न हेतु दोषसिद्ध किया गया था यद्यपि उस झोले में कुछ नहीं था। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 511 का दृष्टान्त ख उसी निर्णय पर आधारित है। अतएव आर० बनाम रिंग39 के पहले के मामले इस धारणा पर निर्णीत किये गये थे कि किसी भी व्यक्ति को किसी असम्भव प्रयत्न हेतु दण्डित नहीं किया जा सकता है। इसे असंभाव्यता का सिद्धान्त कहते हैं।

असम्भव प्रयत्नों को भी दण्डित नहीं किया जाता परन्तु असम्भाव्यता पूर्ण (absolute) होनी चाहिये। न कि सापेक्ष । पूर्ण असम्भाव्यता की दशा में प्रयत्न नहीं किया जाता है। किन्तु सापेक्ष असम्भाव्ग्ता की दशा में कार्य ही प्रयत्न के तुल्य होता है। पूर्णतया असम्भव कृत्य ऐसे कृत्य हैं जिनमें आपराधिक मन:स्थिति तथा आपराधिक कार्य दोनों ही विद्यमान रहते हैं। कारित कार्यों से न तो समाज में संत्रास उत्पन्न होता है और न ही असुरक्षा की भावना । शमशुल हुदा के अनुसार पूर्ण असम्भाव्यता के निम्न उदाहरण हैं40

(1) अ, एक प्रतिबिम्ब पर जो किसी व्यक्ति के पर्याप्त समीप हैं, गोली चलाता है जिससे उस व्यक्ति को खतरा उत्पन्न हो जाये । यह प्रयत्न नहीं है। परन्तु ह्वार्टन ने इसे प्रयत्न कहा है।4।।

(2) अ, ब को मार डालने के आशय से उसे आर्सेनिक समझ कर चीनी खिलाता है। चूंकि इस कार्य से आकांक्षित परिणाम उत्पन्न नहीं होता है इसलिये यह प्रयत्न की कोटि में नहीं आयेगा।

आर० बनाम आसवार्न42 के अनुसार अ दोषी नहीं है क्योंकि वह अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर नहीं था। इस मामले में उसने एक गर्भवती स्त्री को गर्भपात कराने के उद्देश्य से खाने की कुछ गोलियाँ

33. (1857) 7 काक्स 281.

34. (1868) 18 एल० टी० (एन० एस०) 89.

35. 24 क्यू० बी० डी० 537.

36. 9 काक्स सी० सी० 407.

37. (1892) 17 काक्स 491.

38: उपरोक्त सन्दर्भ.

39. उपरोक्त सन्दर्भ,

40. हुदा, एस०; दि प्रिंसिपुल्स आफ दि लॉ आफ क्राइम्स इन ब्रिटिश इण्डिया, पृ० 56.

41. ह्वार्टन पृ० 213.

42. (1920) 84 जे० पी० 63.

भेजा था। उसने उसे खा लिया परन्तु वे अहानिकर सिद्ध हुई और अ को प्रयत्न का दोषी नहीं माना गया। यहाँ यह मामला असम्भव प्रयत्न का नहीं है बल्कि व्यक्ति अपने वांछित उद्देश्य (job) की ओर अग्रसर नहीं था। इस मामले में न्यायमूर्ति रौलट ने यह मत व्यक्त किया कि यदि कोई व्यक्ति अपनी बन्दूक से किसी पेड़ के ढूंठ पर उसे अपना शत्रु समझकर गोली दागता है और उसका शत्रु मीलों दूर है तथा मैदान में कोई व्यक्ति नहीं है तो वह अपने उद्देश्य के निकट नहीं कहा जायेगा, उसने प्रयत्न का प्रारम्भ नहीं किया है बल्कि उसने ऐसा मिथ्या बोध के कारण किया है। यदि उसका कार्य हानिकर नहीं था यद्यपि उसने ऐसा सोचा था तो अहानिकर चीज खिलाने के कारण वह हानिकर चीज के खिलाने के प्रयत्न का दोषी नहीं होगा। मूल प्रश्न यह है कि क्या खिलाई गई वस्तु हानिकर थी।43 ।

परन्तु आर० बनाम स्पाइसर44 के मामले में इसके विपरीत मत व्यक्त किया गया है। पश्चात्वर्ती मत अधिक तर्कसंगत है और उच्चतम न्यायालय के निर्णयों द्वारा भी समर्थित है। अब अपराधी का आशय जैसा कि वह उसके कृत्यों के परिलक्षित होता है अधिक महत्वपूर्ण तत्व है अपेक्षाकृत इसके कि वह उपान्तिम (Penultimate) कृत्य है।45 अब किसी कार्य को प्रयत्न होने के लिये उसे अपराध कारित किये जाने की दिशा में उपान्तिम कार्य होना आवश्यक नहीं है बल्कि उस कार्य को अपराध कारित किये जाने के दौरान किया गया कार्य होना चाहिये।

(3) अ जादू टोने की सहायता से ब को मार डालने का प्रयत्न करता है। यह भी प्रयत्न नहीं है।

आर० बनाम ह्वाइट47 का वाद सापेक्ष असम्भाव्यता का उदाहरण है। यदि एक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को आर्सेनिक अपर्याप्त मात्रा में खिलाता है तो उसका कार्य सापेक्ष असम्भाव्यता की कोटि में आयेगा। चूंकि आर्सेनिक एक जहरीला पदार्थ है जिससे किसी भी व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है किन्तु यदि इसकी अपर्याप्त मात्रा खिलाई गयी है तो मृत्यु होना आवश्यक नहीं है किन्तु फिर भी अभियुक्त का कार्य प्रयत्न की कोटि में आयेगा।

(ग) वस्तु का सिद्धान्त (Object Theory)–तीसरा सिद्धान्त उन मामलों में अन्तर करने का प्रयत्न करता है जिनमें वस्तु (object) के विषय में भ्रम होता है तथा वे जिनमें वस्तु का अभाव रहता है। प्रथम स्थिति में यह प्रयत्न की कोटि में आयेगा किन्तु बाद वाली स्थिति में नहीं। यदि कोई पाकेटमार या जेबकतरा किसी खाली पाकेट में हाथ डालता है तो उसे मात्र भ्रमित कहा जायेगा किन्तु यदि कोई व्यक्ति किसी प्रतिबिम्ब पर गोली चलाता है तो उद्देश्य का अभाव माना जायेगा। एस० हुदा के अनुसार सम्पत्ति से सम्बन्धित अपराध के प्रयत्नों तथा मानव शरीर से सम्बन्धित अपराधों के प्रयत्नों में अन्तर है। सम्पत्ति के विरुद्ध अपराधों में आपराधिक मन:स्थिति (Mens rea) का महत्वपूर्ण योगदान रहता है जबकि मानव शरीर के विरुद्ध अपराधों में कारित उपहति की मात्रा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। किन्तु धारा 511 माननीय एस० हुदा द्वारा सुझाये गये अन्तर को मान्यता नहीं प्रदान करती। हुदा इस नियम के निम्न तीन अपवाद इस आधार पर मानते हैं कि ये मामले समाज में संत्रास उत्पन्न करते हैं

(1) अ, ब को मार डालने के आशय से एक खाली गाड़ी पर, ब को उसमें बैठा हुआ समझकर,

गोली चलाता है। अ का कार्य प्रयत्न की कोटि में आयेगा।

(2) अ, ब को मार डालने के आशय से ब की कोट पर जो कमरे में टॅगी हुई है, ब समझकर, गोली चलाता है। अ का कार्य प्रयत्न है।48

43. आर० बनाम आसवार्न, (1920) 84 जे० पी० 63.

44. (1955) 39 क्रि० अपील 189.

45. महाराष्ट्र राज्य बनाम मोहम्मद याकूब, ए० आई० आर० 1980 एस० सी० 111.

46. अभयानन्द मिश्र बनाम बिहार राज्य, ए० आई० आर० 1961 एस० सी० 1969.

47. (1910) 2 के० बी० 124.

48. ह्वार्टन पृ० 213.

(3) अ. गर्भपात कराने के आशय से ब को कोई दवा खिलाता है किन्तु ब गर्भवती नहीं है। अ

का कार्य प्रयत्न की कोटि में आयेगा।49 |

(घ) कार्य की ओर अग्रसर होने का सिद्धान्त (On the Job Theory)-आर० बनाम आसवार्न50 के मामले में अभियुक्त ने कुछ गोलियाँ यह विश्वास दिलाते हुये भेजा था कि उन्हें खाने से गर्भपात हो जायेगा। एक ने गोलियाँ खाया परन्तु वे अहानिकर सिद्ध हुयीं। यह मत व्यक्त किया गया कि अभियुक्त अपने कार्य (Job) की ओर अग्रसर नहीं था इसलिये वह प्रयत्न का दोषी नहीं है 51 इस मामले को । आर० बनाम स्पाइसर52 के मामले में उलट दिया गया अतएव अब यह प्रयत्न कहा जायेगा। कार्य की ओर अग्रसर होने के सिद्धान्त के कतिपय अन्य दृष्टान्त भी हैं। ब की हत्या करने के आशय से अ एक खाली गाड़ी पर यह विश्वास करते हुये गोली चलाता है कि उसमें ब बैठा हुआ है। इस मामले में अ, ब की हत्या के प्रयत्न का दोषी होगा क्योंकि अ के कार्य से समाज में संत्रास उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त अ ने अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु कार्य किया परन्तु इच्छित परिणाम इस कारण नहीं निकला क्योंकि वस्तु (object) वहाँ उपस्थित नहीं थी अर्थात् आशयित व्यक्ति अनुपस्थित था। इसी प्रकार अ, ब की मृत्यु कारित करने के आशय से उसके शयन कक्ष में टंगे हुये कोट पर यह समझ कर गोली चलाता है कि वह कोट नहीं बल्कि ब स्वयं है। अ प्रयत्न का दोषी होगा।54 एक अन्य मामले में अ रात्रि में ब के घर में प्रवेश किया और ब को मार डालने के आशय से अंधेरे में उस बिस्तर पर गोली चलाया जिस पर ब सदैव करता था। निशाना बिल्कुल ठीक था परन्तु चूंकि बिस्तर खाली था अतएव कोई क्षति नहीं हुयी। ‘अ’ प्रयत्न का दोषी है। 

अ, ब पर जिसकी पीठ उसकी तरफ है गोली चलाता है। प्रयत्न इस कारण विफल हो जाता है क्योंकि ब, अ के अस्त्र की मारक क्षमता से अधिक दूरी पर था। अ प्रयत्न का दोषी है। अ ब की ओर जिसकी पीठ उसकी तरफ है अपनी बन्दूक तान देता है और बन्दूक का घोड़ा दबा देता है। चूंकि बन्दूक खाली थी इसलिये ब कोई क्षति नहीं होती है। इस मामले में यदि अ ने यह समझ कर गोली चलाया था कि बन्दूक भरी है तो वह प्रयत्न का दोषी होगी परन्तु यदि बन्दूक के भरी न होने का तथ्य अ की जानकारी में था, तो वह प्रयत्न का दोषी नहीं होगा। आर० बनाम दयाल बौरी55 के बाद में अभियुक्त एक मकान के निकट जलता हुआ काठ का कोयला एक कपड़े में लपेट कर लिये हुये पकड़ा गया। उस गांव में कपड़े में लपटे काठ कोयले के टुकड़े से आगजनी के मामले कई वार घटित हुये थे। अभियुक्त को आग द्वारा रिष्टि कारित करने के प्रयत्न का दोषी पाया गया क्योंकि इस प्रकार रात को आग लगाने के सामान को लेकर घूमने से यह स्पष्ट है कि उसका आशय रिष्टि कारित करने का है और इसी इरादे से उसने मकान के बगल घूमना शुरू किया था। इस मामले में न्यायमूर्ति मित्तर ने अपनी असहमति जताते हुये यह मत व्यक्त किया कि केवल जलते हुये काठ के कोयले को कपड़े में लपेटा हुआ किसी के कब्जे में पाया जाना आग लगाकर रिष्टि करने के प्रयत्न के अपराध हेतु पर्याप्त नहीं था।

भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत प्रयत्न- भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत प्रयत्न का अपराध तीन प्रकार से कारित होता है

49. आर० बनाम गुडाल 2 काक्स सी० सी० 41.

50. (1920) 84 जे० पी० 63.

51. ह्वार्टन पृ० 210.

52. (1955) 39 क्रि० अपील 189.

53. ह्वार्टन पृ० 213.

54. उपरोक्त सन्दर्भ.

55. (1869) 4 बी० एल० आर० ए० (क्रि०) 55.

(1) कछ मामलों में किसी अपराध को कारित करना तथा इसे कारित करने का प्रयत्न करना दोनों ही धारा में वर्णित हैं तथा दोनों अपराधों के लिये एक ही प्रकार के दण्ड का विधान प्रस्तुत किया गया है 56

(2) कुछ मामलों में किसी विशिष्ट अपराध को कारित करने का प्रयत्न उस विशिष्ट अपराध के बगल में, किन्तु उससे अलग वर्णित है। ऐसे मामलों में अपराध तथा अपराध के प्रयत्न के लिये अलग-अलग दण्ड का प्रावधान प्रस्तुत किया गया है।7। ।

(3) धारा 511 में उन सभी अपराधों के सम्बन्ध में विधान बनाया गया है जो उपरोक्त वर्णित प्रथम या द्वितीय श्रेणी के अन्तर्गत नहीं आते। दूसरे शब्दों में इस धारा के अन्तर्गत ऐसे मामले आते हैं जिनके विषय में भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत अन्यत्र कोई प्रावधान नहीं बनाया गया है।

धारा 511 के अवयव-इस धारा में वर्णित प्रयत्न के लिये निम्नलिखित अवयव आवश्यक हैं

(1) भारतीय दण्ड संहिता द्वारा आजीवन कारावास से या कारावास से दण्डनीय अपराध करने का प्रयत्न या ऐसा अपराध कारित किये जाने का प्रयत्न करना;

(2) प्रयत्न करने वाला व्यक्ति अपराध करने की दिशा में कोई कार्य करे;

(3) धारा 511 के अन्तर्गत प्रयत्न तब दण्डनीय है जब इसके लिये कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता द्वारा अन्यत्र नहीं किया गया है। 

धारा 511 के दृष्टान्त (क) तथा (ख) आर बनाम रिग8 के वाद पर आधारित है जो पहले के प्रमुख वादों आर० बनाम कालिंस59, आर० बनाम मैकफर्सन60 तथा आर० बनाम ड्राइड61 के विपरीत नियम प्रतिपादित करता है जिनमें भ्रमित विचार व्यक्त किया गया था।

इस संहिता द्वारा दण्डनीय अपराध- इस संहिता के अन्तर्गत कोई व्यक्ति किसी कार्य को करने के प्रयत्न के कारण दण्डनीय नहीं होगा जो कार्य यदि किया जाता तो इस संहिता के विरुद्ध वह अपराध नहीं होता है।62 | आजीवन कारावास या कारावास से दण्डनीय- यह पदावली इस तथ्य को सुस्पष्ट करती है कि मात्र मृत्यु दण्ड या अर्थदण्ड से दण्डनीय अपराध इसके अन्तर्गत नहीं है।

किसी अपराध को कारित करने का प्रयत्न करना-प्रयत्न किया गया अपराध इस संहिता के अन्तर्गत किसी अपराध के दुष्प्रेरण सहित कोई भी अपराध हो सकता है क्योंकि दुष्प्रेरण अपने आप में अपराध

अपराध करने की दिशा में कोई कार्य करना– कार्य ऐसा होना चाहिये जो प्रमुख अपराध के निष्पादन के सन्निकट हो तथा अभियुक्त द्वारा ऐसी परिस्थितियों में कारित किया गया हो कि वह अपनी इच्छा। को कार्यान्वित करने की सामर्थ्य रखता हो। अत: यदि कोई व्यक्ति किसी टाल के समीप उसमें आग लगाने के आशय से जाता है तथा इस उद्देश्य से वह दियासलाई जलाता है किन्तु अपने प्रयत्न को छोड़ देता है क्योंकि उसे ऐसा लगता है कि उनकी गतिविधि को कोई देख रहा है तो वह इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी माना जायेगा।63

56. देखिये भारतीय दण्ड संहिता की धारायें 196, 198, 213, 239, 240, 241, 250, 251, 254, 385, 387, 389 तथा 391.  

57. देखिये, भारतीय दण्ड संहिता की धारायें 307, 308 तथा 393.

58. 17 काक्स सी० सी० 491.

59. 9 काक्स सी० सी० 497. ।

60. (1827) डी० एण्ड सी० 179 पृ० 202; 7 काक्स सी० सी० 281.

62. (1868) 18 एल० टी० (एन० एस०) 89.

62. मंगेश जिवाजी, (1887) 11 बाम्बे 376.

63. विलियम टेलर, (1857) 1 एफ० एण्ड एफ० 511.

जहां इस संहिता द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं बनाया गया है-यह धारा प्रयत्न के उन मामलों पर लागू नहीं होगी जो इस संहिता की किसी विशिष्ट धारा द्वारा दण्डनीय बनाये गये हैं। इसका प्रवर्तन अवशेषीय प्रकृति का है तथा इसके अन्तर्गत ऐसे मामले आते हैं जो प्रयत्न के रूप में संहिता के अन्तर्गत अन्यत्र दण्डनीय नहीं बनाये गये हैं।

धारा 307 और धारा 511 में अन्तर- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 511 और धारा 307 के विस्तार क्षेत्र (Scope) के विषय विभिन्न उच्च न्यायालयों के मत में काफी परस्पर विरोध है। आर० बनाम फ्रांसिस कैसिडी64 के बाद में बम्बई उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 511 काफी विस्तृत है और इसमें संहिता के अधीन दण्डनीय सभी प्रकार के प्रयत्न, यहाँ तक कि हत्या करने का प्रयत्न जिसके लिये अलग से धारा 307 में प्रावधान किया गया है, भी शामिल है। इस वाद में आगे यह भी अभिनित किया गया है कि धारा 307 के अधीन अपराध गठित करने हेतु यह आवश्यक नहीं है कि (i) ऐसी परिस्थितियों में किया गया कोई कार्य हो जिससे यदि कार्य किया जाये तो मृत्यु कारित हो सके और (ii) जिस कार्य को कारित करने की शिकायत की गई है वह प्राकृतिक और सामान्य दशाओं में मृत्यु कारित करने में सक्षम होना चाहिये। यदि कार्य इस प्रवृत्ति का नहीं था तो किसी व्यक्ति को धारा 307 के अधीन हत्या के प्रयत्न हेतु दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता है भले ही कार्य मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया हो और कैदी के विश्वास के अनुसार मृत्यु कारित कर सकने योग्य हो।65 जीवन दास बनाम किंग एम्परर06 के मामले में पंजाब की चीफ कोर्ट ने भी यह मत व्यक्त किया था कि संहिता की धारा 307 की अपेक्षा धारा 511 अधिक विस्तृत है। परन्तु क्वीन बनाम निधा67 के वाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसके विपरीत मत व्यक्त किया है और यह अभिनित किया कि धारा 511 हत्या के प्रयत्न के मामलों में लागू नहीं होती है क्योंकि इसके लिये संहिता की धारा 307 में अलग एकमात्र प्रावधान किया गया है। यह भी अभिनित किया गया कि संहिता की धारा 307 सुविस्तृत और सम्पूर्ण है तथा धारा 511 की तुलना में जहाँ तक हत्या के प्रयत्न का सम्बन्ध है संकीर्ण नहीं है। मेन ने बम्बई उच्च न्यायालय के मत का समर्थन किया है और डा० हरिसिंह गौड़ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मत का समर्थन किया है।  

कोनी68 के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 307 के लागू होने के लिये किया गया। कार्य मृत्यु कारित करने हेतु सक्षम होना चाहिये और इसे पूर्व अपराध को गठित करते हुये आवश्यक अन्तिम निकटस्थ कार्य भी होना चाहिये परन्तु धारा 511 के अधीन कार्य अपराध को कारित किये जाने की दिशा में प्रयत्न के दौरान कोई भी कार्य हो सकता है। परन्तु यह धारणा कि धारा 307 के अधीन कार्य अन्तिम निकटस्थ अथवा उपान्तिम कार्य होना चाहिये अब सही नहीं है। ओम प्रकाश के वाद में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में उपान्तिम कार्य के सम्बन्ध में दोनों ही धाराओं के अधीन समान स्थिति है। इस वाद में यह अभिनित किया गया कि धारा 511 की भाँति धारा 307 में भी कार्य का उपान्तिम होना आवश्यक नहीं है। ओम प्रकाश70 के वाद में अभियुक्त ने अपनी पत्नी की मृत्यु को शीघ्र कारित करने के उद्देश्य से उसे कई दिनों तक एक कमरे में परिरुद्ध कर भोजन से वंचित रखा यद्यपि वह किसी तरह बच निकलने में सफल रही। यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त का कार्य धारा 307 के अधीन दण्डनीय हत्या के प्रयत्न का अपराध गठित करता है यद्यपि कि उसका कार्य अन्तिम निकटस्थ कार्य नहीं था जिसके कारण उसकी मृत्य हो जाती। यहाँ कार्य का अर्थ किसी व्यक्ति के ऐसे विशिष्ट तात्कालिक कार्य से नहीं होता है। बल्कि कार्य से ऐसा कार्य अभिप्रेत है जैसा कि संहिता की धारा 33 में परिभाषित है अर्थात् कार्य में एक श्रृंखला में किये गये कार्य एक कार्य के रूप में माने जायेंगे।

64. (1867) 4 बी० एच० सी (क्रि० के०) 17.

65. उपरोक्त मुख्य न्यायाधीश कफ के अनुसार।

66. (1904) पी० आर० 30 सन् 1904.

67. (1891) आई० एल० आर० 14 इला० 38.

68. (1867) 7 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 48.  

69. (1961) 2 क्रि० लाँ ज० 848 (एस० सी०).

70. उपरोक्त सन्दर्भ.

अभयानन्द मिश्र बनाम बिहार राज्य7 के मामले में अ ने व्यक्तिगत परीक्षार्थी की हैसियत से अंग्रेजी विषय से एम० ए० की परीक्षा में सम्मिलित होने की अनुमति हेतु पटना विश्वविद्यालय में प्रार्थनापत्र दिया था। उसने अपने प्रार्थना-पत्र में अपने को स्नातक तथा एक विद्यालय में अध्यापक के रूप में कार्यरत बताया था और अपने प्रार्थना-पत्र के समर्थन में विद्यालय के प्रधानाचार्य तथा जिला विद्यालय द्वारा निर्गत अनुभव प्रमाण-पत्र भी लगाया था। परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी गयी परन्तु बाद में यह पाया गया कि वह न तो स्नातक था और न अध्यापक ही था, अतएव अनुमति वापस ले ली गयी। अ को छल के प्रयत्न का दोषी पाया गया।

उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि तैयारी की अवस्था उस समय पूर्ण हो गयी थी जब अभियुक्त ने विश्वविद्यालय में जमा करने हेतु आवेदन पत्र तैयार कर लिया और जिस क्षण उसने इसे प्रेषित कर दिया प्रयत्न का अपराध पूर्ण हो गया । कोई व्यक्ति किसी अपराध के प्रयत्न का दोषी तब होता है जब, (1) वह अपराध को कारित करने का आशय रखता है, और (2) वह तैयारी कर लेने के बाद अपराध कारित करने के आशय से उसे करने के लिये कोई कार्य करता है, इस प्रकार के कार्य का उस अपराध को। कारित करने की दिशा में उपान्तिम कार्य (Penultimate act) होना आवश्यक नहीं है वरन् उसे अपराध करने के दौरान किया गया होना आवश्यक है।

उपरोक्त सिद्धान्त की पुष्टि उच्चतम न्यायालय द्वारा सुधीर कुमार मुखर्जी बनाम पश्चिम बंगाल। राज्य72 के वाद में की गयी। इस मामले में प्रश्न यह था कि क्या अभियुक्त द्वारा बिना माल प्राप्त किये ही उसकी प्राप्ति के साक्ष्य के रूप में चालान पर हस्ताक्षर करना भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120-ख सपठित धारा 420 और 511 के अन्तर्गत अपराध का प्रयत्न होगा अथवा नहीं। बचाव पक्ष की ओर से यह तर्क दिया। गया कि यह केवल तैयारी थी क्योंकि छल के अपराध के लिये चालान के ऊपर स्टैम्प लगाना और पुनः अभियुक्त द्वारा उस पर हस्ताक्षर करना आवश्यक होगा। यह प्रेक्षित किया गया कि इस मामले में कम्पनी द्वारा प्रदायक (Supplier) को लम्बी धनराशि दी गयी थी। चालान तैयार कर लिया गया था और अभियुक्त द्वारा सम्बन्धित लिपिक का हस्ताक्षर भी करा लिया गया था। यह समस्त कार्य निश्चित रूप से छल का अपराध कारित किये जाने की दिशा में निश्चित कंदम था यद्यपि कि अभियुक्त द्वारा प्रदायक को भुगतान प्राप्त करने हेतु हस्ताक्षर करने का स्टैम्प लगाने का उपान्तिम कार्य अभी पूरा नहीं था। अभियुक्त का कार्य केवल तैयारी ही नहीं वरन् प्रयत्न था।

महाराष्ट्र राज्य बनाम मोहम्मद याकूब73 के मामले में तीन व्यक्ति (ट्रक एवं जीप के ड्राइवर एवं ट्रक का खलासी) भारत से बाहर चांदी की तस्करी का प्रयत्न करने हेतु दोषसिद्ध किये गये। एक निश्चित सचना प्राप्त होने पर वे तीनों पकड़े गये थे और ऐसे समुद्री तट के निकट पाये गये थे जो सामुद्रिक यानों की पहुँच में था। तलासी के बाद चाँदी के बोरे ट्रक में छिपाये पाये गये थे। साथ ही समुद्र की एक संकरी खाडी से यान्त्रिक यान के इन्जन की आवाज भी सुनायी पड़ी थी। अभियुक्तों को भारत से बाहर चाँदी की तस्करी के प्रयत्न का दोषी पाया गया। न्यायमूर्ति सरकारिया ने यह मत व्यक्त किया कि

‘प्रयत्न क्या है यह एक विधि एवं तथ्य का मिश्रित प्रश्न है जो अधिकतर मामले विशेष की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। प्रयत्न की एक परिभाषा करना कठिन है। मोटे तौर पर प्रत्येक अपराध जो सकारात्मक कार्यों से कारित होने से संरचित होते हैं उनके पहले ऐसे गुप्त या प्रकट कार्य किये जाते हैं जिनकी तीन अवस्थायें (stages) होती हैं। पहली अवस्था वह है जब अभियुक्त के मन में अपराध कारित करने के आशय की भावना बनती है। दूसरी अवस्था में वह उसे करने की तैयारी करता है। तीसरी अवस्था तब आती है जब अभियुक्त जानबूझ कर अपराध कारित करने हेतु प्रकट रूप से कदम उठाता है। ऐसे प्रकट कार्य अथवा कदम को अपराध होने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि वह अपराध की दिशा में किया गया उपान्तिम कार्य हो। इतना ही काफी होगा कि ऐसा कार्य या कई कार्य जानबूझ कर (deliberately) किये गये हैं और

71.  ए० आई० आर० 1961 एस० सी० 1698.

72. ए० आई० आर० 1973 एस० सी० 2655.

73. 1980 क्रि० लॉ ज० 793 (एस० सी०).

उद्देशित अपराध को कारित करने का ऐसा स्पष्ट आशय दर्शाते हैं जो अपराध के पूर्ण होने के युक्तियुक्त रूप से सन्निकट होता है।”

महाराष्ट्र राज्य बनाम मोहम्मद याकूब74 के मामले में न्यायमूर्ति चिन्नप्पा रेड्डी ने निम्न सम्प्रेक्षण किया

“प्रयत्न गठित करने हेतु सर्वप्रथम किसी अपराध को कारित करने का आशय होना चाहिये, द्वितीय कुछ कार्य अवश्य किया गया हो जो अपराध कारित करने हेतु किया जाना आवश्यक हो, और तृतीय ऐसा कार्य आशयित परिणाम के ”सन्निकट” होना चाहिये। सन्निकटता की माप समय और कार्य के सम्बन्ध में नहीं वरन् आशय के सम्बन्ध में होना चाहिये। दूसरे शब्दों में कार्य एक युक्तियुक्त निश्चितता के साथ आवश्यक रूप से पृथक नहीं वरन् अन्य तथ्यों और परिस्थितियों के संयोजन में प्रकट होना चाहिये, एक विशिष्ट अपराध कारित करने की मात्र कामना या लक्ष्य से भिन्न एक आशय होना चाहिये यद्यपि कार्य स्वयं में मात्र ऐसे आशय को सुझाता या इंगित करता हो परन्तु इसे ऐसा होना चाहिये कि इससे आशय का स्पष्ट संकेत मिलता हो।”

 इस मामले में ट्रक एक सुनसान संकरी खाडी तक ले जायी गयी थी जहाँ से चांदी सामुद्रिक यानों में अन्तरित की जा सकती थी। यद्यपि कि यह तथ्य इस बात हेतु निर्णायक नहीं था कि अभियुक्त चांदी का निर्यात करना चाहता था परन्तु उस दिशा में इंगित अवश्य करता है। चूंकि यह सारा कार्य गुप्त रूप (clandestine) से घोर रात्रि में किया गया था अतएव न्यायालय का यह निष्कर्ष निकालना उचित था कि चांदी का निर्यात करने सम्बन्धी अभियुक्त का आशय युक्तियुक्त रूप से निश्चित था।  

अ एक स्त्री ब को एक विषैला पदार्थ गर्भपात कराने के आशय से खिलाता है, परन्तु यह पाया जाता है। कि वह महिला गर्भवती नहीं थी। अ गर्भपात कारित करने के प्रयत्न का दोषी होगा।75 अ एक पत्र ब के नाम उसे गम्भीर अपराध के लिये उकसाते हुये लिखता है और उसे भेज देता है। ब उस पत्र को पढ़ता नहीं है। परन्तु अ अपराध कारित करने के लिये ब को उकसाने के प्रयत्न का दोषी होगा।76

अ नकली सिक्के बनाने के उद्देश्य से रंग उपाप्त करता है। अ को प्रयत्न के अपराध के लिये दोषसिद्धि प्रदान की जाएगी।77 अ, नकली सिक्के बनाने के आशय से रंग क्रय करने के लिये बर्मिंघम जाता है। अ ने प्रयत्न नहीं किया है।78 अ, अश्लील चित्र प्रकाशित करने के आशय से उपाप्त करता है। अ का कार्य प्रयत्न के तुल्य है।79 अ, के आधिपत्य में कुछ अश्लील चित्र हैं। वह उन्हें प्रकाशित करने को सोचता है। अ का कार्य प्रयत्न की कोटि में नहीं आएगा 180 ।

अ, एक साक्षी ब को झूठी शपथ दिलाने का प्रयत्न करता है यद्यपि ब का चरित्र इतना उच्च है कि वह इस प्रयत्न को असफल बना देता है या वह अक्षम है। अ का कार्य प्रयत्न के तुल्य है 81 अ, एक अक्षम पदाधिकारी ब के समक्ष झूठी शपथ ग्रहण करता है। अ का कार्य प्रयत्न की कोटि में आयेगा।82 ।

अमर ने अपने पाकेट से भरी हुई रिवाल्वर पूरी तरह निकाल लिया परन्तु इसके पहले कि अमर बलवन्त पर लक्ष्य साध पाता बलवन्त ने उसका हाथ पकड़ लिया। बलवन्त के साथ संघर्ष करते समय अमर ने बलवन्त से कई बार कहा कि “मैं तुम्हें मार डालूंगा” परन्तु वह रिवाल्वर का घोड़ा दबा नहीं सका। इस

74. (1980) क्रि० ला ज० 793.

75. आर० बनाम गुडाल, 2 काक्स सी० सी० 41.

76. आर० बनाम रैन्सफर्ड, (1874) 31 एल० टी० (एन० एस०) 488.

77. राबर्ट्स केस डीयर्सले सी० सी० 539.

78. राबर्ट्स केस डीयर्सले सी० सी० 557 में जर्विस, सी० जे० का मत।

79. आर० बनाम डुग्डले, डीयर सी० सी० 64.

80. आर० बनाम मैकफर्सन, डी० एण्ड वी० 201 में ब्रेमवेल वी० का मत।

81. ह्वार्टन 210.

82. ह्वार्टन 210.

मामले में अमर हत्या के प्रयत्न का दोषी होगा क्योंकि

दत्या के प्रयत्न का दोषी होगा क्योंकि उसने अपने पाकेट से रिवाल्वर पूरी तरह निकाल त लक्ष्य साधने के पहले ही बलवन्त द्वारा पकड़ लिया गया और रिवाल्वर चला नहीं पाया जिससे घटना बच गई।

एक महिला कयें की ओर यह कहते हुये दौड़ी कि वह कुएँ में कूद जायेगी किन्तु कुएँ तक पहुंचने से ही उसे पकड़ लिया गया। वह आत्महत्या करने के प्रयत्न की अपराधिनी नहीं होगी क्योंकि इस बात की सम्भावना थी कि वह कुएँ में कूदने से पहले अपना विचार बदल दे।83 ।

अ और ब पति पत्नी के बीच परिवार नियोजन को लेकर आपस में कटू झगडा हो जाता है यहाँ तक कि त आत्महत्या कर लेने की धमकी देती है और सीढ़ियों से ऊपर दूसरी मंजिल से कूद कर जान देने के लिये दौडती हयी जाती है। अ उसे ऐसा कठोर कदम उठाने से रोकने के लिये कुछ भी नहीं करता है परन्तु उसकी महिला नौकरानी उसका पीछा करती है और उसे सर के बल नीचे कूदने के पहले पीछे खींच लेती है। इस मामले में ब आत्महत्या के प्रयत्न की दोषी होगी श्योंकि वह महिला नौकर द्वारा कूद कर आत्महत्या कर लेने से बचा ली गयी थी। यदि वह महिला नौकर द्वारा पीछे न खींच ली गयी होती तो उसका प्रयत्न सफल हो जाता और इस बीच में विचारों के परिवर्तन का भी समय नहीं था।

अ जेब काटने के आशय से अपना हाथ ब के जेब में डालता है। ‘ब’ अपने जेब में एक भरी हुई पिस्तौल लिये हुये है। चोर उस पिस्तौल को छूता है और उसका घोड़ा दब जाता है जिसके दगने से ब की मृत्यु हो जाती है। इस मामले में लार्ड मैकाले की राय में अ मात्र जेब काटने के प्रयत्न का दोषी होगा न कि उसकी मृत्यु कारित करने का क्योंकि अ को अन्य जेब कतरों से भिन्न नहीं माना जा सकता है जो ठीक उन्हीं परिस्थितियों में और उसी आशय से चोरी करते हैं जिसमें मृत्यु कारित करने का उससे कम खतरा नहीं होता। है और न मृत्यु से बचाने की उससे ज्यादा सावधानी ही बरती जाती है।  

अ ने एक देशी डाक्टर से निवेदन किया कि उसे अपने दामाद को जहर देने के उद्देश्य से कोई दवा प्रदान कर दे। यह कार्य केवल तैयारी के तुल्य है, प्रयत्न नहीं है। देशी डाक्टर को उकसाने के अपराध के लिये अ को दोषसिद्धि प्रदान की जा सकती है।84 

अ अपना छाता ले जाता है पर वह समझता है कि छाता किसी अन्य व्यक्ति का है। अ ने चोरी का प्रयत्न नहीं किया था क्योकि भले ही कोई बाधा उपस्थित नहीं की गई थी, चोरी का अपराध कारित नहीं किया जा सकता था।85

अ रात्रि में ब के घर में चोरी करने के आशय से प्रवेश करता है परन्तु उसकी दरिद्रता से द्रवित होकर 100 रुपये का नोट छोड़कर वापस चला आता है। इस मामले में अ आपराधिक अतिचार तथा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 379 सपठित धारा 511 के अन्तर्गत चोरी के प्रयत्न का दोषी होगा।

अ, एक दस्तावेज की कूटरचना करने के उद्देश्य से जिससे यह आभास हो कि दस्तावेज का निष्पादन स ने किया था, एक विलेख लेखक को ज नामक स्थान पर ले जाता है जहाँ विलेख लेखक को यह बताया जाता है कि दस्तावेज का निष्पादन स करेगा। वहाँ से विलेख-लेखक अपने नौकर को एक स्टाम्प विक्रेता के पास मजता है जिसे मिथ्या व्यपदेशन द्वारा अभिप्रेरित किया जाता है कि वह स्टाम्प पत्र पर इस तथ्य की संस्तुति दे। कि स्टाम्प का क्रेता स था। इसी अवस्था में नौकर को गिरफ्तार कर लिया गया जिससे कार्यवाही वहीं समाप्त हा गया। सादे फार्म पर कुछ भी अंकित नहीं था। यह कार्य कूटरचना का प्रयत्न नहीं है अपितु मिथ्या साक्ष्य गढ़ने का प्रयत्न है।86

अ न इस आशय की सर्टीफिकेट प्राप्त करने के उद्देश्य से कि उसके द्वारा दिया गया चुगा कर उर

वक्तव्य दिया। किन्तु उसे सर्टिफिकेट प्रदान नहीं की गयी जिससे उसकी सारी कार्यवाही

83. रमझा, (1884) 8 मद्रास 5.

84. मुसम्मात बख्तावर, (1882) पी० आर० नं० 24 सन् 1882.

85. आर० बनाम आस्बर्न, (1919) 84 जे० पी० 63.

86. आर० बनाम राम सरन, (1872) 4 एन० डब्ल्यू० पी० 46.

विफल हो गयी। अ को छल करने के प्रयत्न के लिये दोषसिद्धि प्रदान नहीं की जायेगी, क्योंकि वह अपना विचार बदल कर इस अपराध को बचा सकता था।87

वशीरभाई मोहम्मदभाई बनाम बम्बई राज्य88 के वाद में अभियुक्त ने शिकायतकर्ता चम्पक लाल से यह कहा कि वह मुद्रा के नोटों की अनुलिपि बना सकता है। शिकायतकर्ता ने अभियुक्त को उसके कथन पर विश्वास करने का अनुभव कराया और पुलिस अधिकारियों के ज्ञान में डालते हुये उसे मुद्रा के नोट दिया। अभियुक्त को शिकायतकर्ता से करेन्सी नोट प्राप्त करते समय ही अनुलिपि तैयार करने की सामग्री के साथ पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया। अभियुक्त छल के प्रयत्न हेतु दोषी अभिनिर्धारित किया गया। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि एक झूठ कथन किया गया था और चम्पक लाल के पास से 200 रुपये प्राप्त हुये थे। यह स्पष्टतया ऐसे कार्य हैं जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 511 के अन्तर्गत अपराध कारित किये जाने की दिशा में किये गये कार्य हैं। वास्तव में झूठा प्रतिनिधित्व करना और सम्पत्ति का परिदान प्राप्त करना भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420 के अन्तर्गत छल के अपराध के दो आवश्यक तत्व हैं। ये दोनों ही तत्व इस मामले में मौजूद हैं और उन्हें अभियुक्त ने कारित किया है। अतएव यह नहीं कहा जा सकता है। कि अभियुक्त ने अपराध कारित करने का प्रयत्न नहीं वरन् मात्र तैयारी किया है।

क्वीन बनाम कल्यान सिंह89 के प्रकरण में एक चतुरी नामक व्यक्ति जो अपने को खेरी कहता है। कल्यान सिंह नामक व्यक्ति के साथ एक स्टाम्प विक्रेता के पास गया और खेरी के नाम में उससे स्टाम्प पेपर खरीदा। उसके पश्चात् दोनों लोग एक याचिका लेखक के पास गये और चतूरी ने वहां फिर अपना नाम खेरी। बतलाया उन्होंने याचिका लेखक से खेरी द्वारा कल्यान सिंह को देय 5 रुपये का एक बाण्ड उनके लिये। लिखने को कहा। याचिका लेखक ने बाण्ड लिखना प्रारम्भ किया परन्तु सन्देह हो जाने के कारण उसने उसे समाप्त नहीं किया परन्तु चतुरी और कल्यान सिंह दोनों को पुलिस स्टेशन ले गया। यह अभिनिर्धारित किया। गया कि यह कार्य तैयारी से कहीं अधिक था और वे अपराध कारित किये जाने की दिशा में किये गये कार्य थे, अतएव चतुरी कूट रचना कारित करने के प्रयत्न हेतु दायित्वाधीन था।

क्वीन बनाम पेटरसन90 के प्रकरण में अभियुक्त पर द्विविवाह कारित करने के प्रयत्न स्वरूप शादी के बैन (ban) प्रकाशित करने का आरोप था। यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त का कार्य केवल तैयारी कारित करना है न कि प्रयत्न क्योंकि वह इसके पहले कि विवाह की कोई रश्म प्रारम्भ होती अपने विवाह करने के आशय को बदल सकता था।

पडाला वेंकटसामी91 के प्रकरण में अभियुक्त ने अन्य लोगों के साथ मिलकर एक झूठा अभिलेख बनाने हेतु साजिश रचा और उसके निष्पादन में एक ड्राफ्ट तैयार किया जिसकी वह इस उद्देश्य से प्रेषित एक पुराने स्टाम्प पेपर पर नकल उतारने वाला था और एक साक्षी से जिस तारीख में अभिलेख लिखा जाना था। उसकी अंग्रेजी तिथि के तदनुरूप तेलगू तिथि बतलाने को कहा। अभियुक्त का कार्य कूट रचना का प्रयत्न नहीं वरन् तैयारी मात्र था परन्तु वह दुष्प्रेरण का दोषी था।

मला92 के प्रकरण में द ने प को ब का छद्म रूप धारण करने और ब के नाम में स्टैम्प पेपर खरीदने के लिये उकसाया। फलत: विक्रेता ने स्टैम्प पेपर पर क्रेता के रूप में ब का नाम अंकित किया। द ने इस आशय से कार्य किया कि यह पष्ठांकन एक न्यायिक कार्यवाही में ब के विरुद्ध प्रयोग किया जा सकता था। यह अभिनिर्धारित किया गया कि मिथ्या साक्ष्य गढ़ने का अपराध वास्तव में कारित किया जा चुका था और द इस अपराध के कारित करने के दुष्प्रेरण के लिये दोषसिद्ध किया गया। आगे यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि

87. क्वीन बनाम घुण्दी, (1886) 8 इला० 304.

88. ए० आई० आर० 1960 एस० सी० 979.

89. (1894) 16 इला० 409.

90, (1876) 1 इला० 316.

91, (1881) 3 मद्रास 4.

92. (1879) 2 इला० 105.

अभियुक्त ने मिथ्या पृष्ठांकन इस उद्देश्य से प्राप्त किया था कि वह बाद में करेगा और इसलिये वह मिथ्या साक्ष्य गढ़ने के प्रयत्न का दायित्वाधीन होगा।

एक अन्य प्रकरण में जहां एक कर्जदार ने अपने ऋणदाता को बीमाकृत डाक (In टटी कागजों से भरा पार्सल भेजा माना कि उस पासल में करन्सी नोट हो और इस प्रकार ऋण दाता को पावना। पत्र में हस्ताक्षर करने को उत्प्रेरित किया। इस मामले में कर्जदार प्रयत्न का दोषी नहीं होगा क्योंकि कार्य केवल तैयारी गठित कर रहा है। परन्तु यदि वह अपने इस तर्क के समर्थन में उस पावना पत्र । Acknowledgement) को न्यायालय में इस आशय से प्रस्तुत (file) करता है कि उसने कर्ज अदा कर दिया। है तब वह उस गढे साक्ष्य को दण्ड संहिता की धारा 196 सपठित धारा 511 के अधीन सही साक्ष्य के रूप में प्रयोग का प्रयत्न करने का दोषी होगा ।93

निष्कर्ष

प्रयत्न से सम्बन्धित अनेक सिद्धान्त तथा विषय से सम्बन्धित न्यायिक निर्णयों जिनका विवेचन इस अध्याय में किया गया है, के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि ऐसे नियमों अथवा मार्गदर्शक बिन्दुओं, जो इस बात का निर्णय करने में सहायक हो सके कि कोई कार्य प्रयत्न है अथवा नहीं, का सुझाव देना केवल | कठिन ही नहीं वरन् असम्भव है। तथापि निम्न मार्गदर्शक नियमों का सुझाव इस उद्देश्य से दिया जा रहा है कि शायद इनसे समस्याओं का उत्तर देने में सहायता मिल सके।

(1) विचार बदल देने की सम्भावना- ऐसे मामलों में कठिनाई का अनुभव होता है जिनमें अभियुक्त उत्पन्न परिणाम से भिन्न अपराध को पूर्ण करने के लिये आवश्यक सभी कार्यों को पूरा नहीं करता है। ऐसे मामलों में हुदा का कहना है कि जहाँ तक अभियुक्त का कार्य युक्तियुक्त उम्मीद के लिये यह अवसर देता है कि अभियुक्त स्वेच्छया आकांछित प्रयत्न से अपने आप को विरत रखेगा, उसे तैयारी की ही अवस्था में माना जायेगा। ऐसी उम्मीद अन्तिम सन्निकट कार्य, जिससे अपराध पूर्ण होता, से दूरस्थ कारित किसी कार्य पर निर्भर हो सकती है।94 उदाहरण के लिये यदि कोई व्यक्ति बन्दूक खरीदकर उसमें गोलियाँ भरता है तथा गोली भरी बन्दूक लेकर बाहर जाता है। बाहर उसके शत्रु से उसकी मुलाकात होती है और वह उसका पीछा करता है। किन्तु वह अपने शत्रु को पकड़ नहीं पाता। बन्दूकधारी व्यक्ति इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी होगा, क्योकि हर सम्भाव्यता में उसने अपने शत्रु पर गोली चलाया होता यदि वह उसे पकड़ने में सफल रहा। होता। केवल यही नहीं उसके कार्य से उसी प्रकार संत्रास उत्पन्न होगा, जैसे उसने अपने शत्रु पर गोली चलायी। हो और गोली अपेक्षित व्यक्ति को न लगी हो। किन्तु जहाँ अ को यह सूचना दी जाती है कि उसका शत्रु शहर में है, वह अपनी बन्दूक में गोली भरकर मोटरसाइकिल में शत्रु की खोज में निकलता है तो अ को प्रयत्न के लिये दोषसिद्धि प्रदान नहीं की जायेगी, क्योंकि वह अपनी स्वतन्त्र इच्छा से अपने आपको आकांक्षित कार्य से विरत रख सकता है।

इसी प्रकार ‘अ’ जहां यह जानते हुये कि ‘ब’ कुछ जेवरात लिये हुये है उसे लूटने की योजना बनाता है। और रिवाल्वर से सज्जित होकर एक स्कूटर पर सवार हो ब’ की खोज में उसके पीछे-पीछे निकल पड़ता है, वह प्रयत्न के अपराध हेतु दायित्वाधीन नहीं होगा क्योंकि यहां भी इस बात की सम्भावना थी कि वह अपना इरादा बदल सकता है।

यदि कोई व्यक्ति किसी दस्तावेज की जालसाजी करने के आशय से स्टाम्प पेपर केवल खरीदता है तो भले ही यह सिद्ध हो जाये कि उसका आशय जालसाजी करने का था, उसे दण्डित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका कार्य केवल तैयारी की कोटि में आयेगा। ऐसा इसलिये है क्योंकि निर्देषिता की उपधारण का अमान्य नहीं किया जा सकता तथा यह सम्भव रहता है कि दूरस्थता होने के कारण वह अपना आशय बदल दे। किन्तु जैसे ही वह कागज पर लिखना प्रारम्भ करता है जालसाजी करने के प्रयत्न का सृजन हो जाता है। परन्तु जहाँ यह पाया जाता है कि किसी व्यक्ति ने जालसाजी करने के आशय से वर्ष भर पहले से ही लिखना

93. विथिनाथा स्वामी अय्यर, (1926) 24 एल० डब्ल्यू० 725.

94. – एस० हुदा, दि प्रिंसिपुल्स आफ दि लॉ आफ क्राइम्स इन ब्रिटिश इण्डिया, पृ० 62-63.

 प्रारम्भ कर दिया था फिर भी उसका कार्य अधूरा है तो यह कार्य जालसाजी करने के प्रयत्न की कोटि में नहीं आयेगा क्योंकि उसके आचरण से स्पष्ट है कि उसने अपना आशय बदल दिया था।

जहाँ किसी अपराध को करने के साधनों को केवल उपाप्त किया गया है तथा साधनों के उपाप्तिकरण एवं किसी ऐसे कार्य को प्रारम्भ करने के बीच अन्तर था, जिससे हर हालत में अपराध का क्रियान्वयन सम्भव था तो साधनों को उपाप्त करना प्रयत्न के तुल्य नहीं होगा। यदि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को मार डालने के आशय से जहर उपाप्त करता है तो वह केवल तैयारी की अवस्था में माना जायेगा। किन्तु कोई व्यक्ति यदि किंग के सिक्कों की जालसाजी करने के उद्देश्य से रंग खरीदता है तो वह ऐसे सिक्कों की जालसाजी करने के प्रयत्न का दोषी होगा।

(2) उपान्तिम कार्य (Penultimate act)-अभयानन्द मिश्र बनाम बिहार राज्य95 के बाद में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में प्रयत्न के लिये कार्य को अपराध के आशय से किया जाना आवश्यक है, उसे अपराध करने की दिशा में किया गया उपान्तिम कार्य होना आवश्यक नहीं है परन्तु उस अपराध को कारित किये जाने के दौरान होना आवश्यक है। इस सिद्धान्त की पुष्टि सुधीर कुमार मुखर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य96 के बाद में की गयी जिसमें यह प्रेक्षित किया गया कि कार्य को अपराध की दिशा में उठाया गया कदम होना चाहिये यद्यपि कि उपान्तिम कार्य पूर्ण नहीं हुआ हो। इसी प्रकार महाराष्ट्र राज्य बनाम मोहम्मद याकूब97 के मामले में यह प्रेक्षित किया गया कि प्रकट कार्य अथवा उठाये गये कदम को ‘अपराध” कहे जाने के लिये अपराध की दिशा में किया गया उपान्तिम (penultimate) कार्य होना आवश्यक नहीं है। इतना ही यथेष्ट होगा कि ऐसा कार्य जानबूझ कर किया गया था और इससे उद्देशित अपराध कारित करने का आशय स्पष्ट परिलक्षित होता है और किये गये कार्य युक्तियुक्त रूप से अपराध की पूर्णता के सन्निकट थे। कार्य से आशय का स्पष्ट सुझाव या संकेत मिलना आवश्यक है।

इसी नियम को दृष्टि में रखते हुये मृत्यु कारित करने के आशय से संखिया समझकर चीनी खिलाना प्रयत्न होगा। इसी प्रकार जहाँ अ एक गर्भवती महिला का गर्भपात कराने के आशय से कुछ गोलियाँ खिलाता है परन्तु गोलियाँ अहानिकर पाई जाती हैं, अ प्रयत्न का दोषी होगा चाहे महिला गर्भवती हो या नहीं अथवा चाहे खिलायी गयी वस्तु अहानिकर हो अथवा खुराक अपर्याप्त रही हो।

अतएव अपराध कारित करने का आशय और उसके अग्रसर करने में अपराध कारित किये जाने की दिशा में किये गये प्रकट कार्य (Overt act) प्रयत्न संरचित करने हेतु पर्याप्त होंगे। आशय का अत्यधिक महत्व है। तथापि ऐसा कोई एक सुविचारित नियम प्रतिपादित नहीं किया जा सकता है जिसके द्वारा यह निश्चय किया जा सके कि कार्य प्रयत्न है अथवा नहीं। इस बात का निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा जिसका निर्णय उपरोक्त टिप्पणी के आलोक में किया जाना चाहिये।

95. ए. आई. आर. 1961 एस. सी. 1698.

96. ए. आई. आर. 1973 एस. सी. 2655.

97. (1890) क्री. लॉ ज. 793 (एस.सी.)

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