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How to Download LLB 2nd Semester Law Chapter 6 Notes

 

How to Download LLB 2nd Semester Law Chapter 6 Notes:- In this post of LLB Bachelor of Law 2nd Semester Year Wise, all of you are going to read LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Conjugal Relief which we are dividing into 6 Post. Join our website to read the LLB Notes Study Material in Hindi English PDF Download Question Paper With Practice Set.

अध्याय 6 (Chapter 6, LLB Notes in Hindi English.

वैवाहिक अनुतोष

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रतिपादित होने के पूर्व हिन्दू विधि में, रूढ़ि के अतिरिक्त, विवाहविच्छेद मान्य नहीं था। विवाह-विच्छेद को मान्यता देने का प्रथम प्रयत्न बड़ौदा रियासत में 1930 में हुआ जब बड़ौदा रियासत में हिन्दू वैवाहिक विधि में सुधार किये गये और विवाह-विच्छेद को मान्यता दी गयी। 1946 में बम्बई प्रान्त ने हिन्दुओं में द्विविवाह की प्रथा को समाप्त कर दिया और उसके फलस्वरूप 1946 में विवाह-विच्छेद का विधान बनाया गया। मद्रास प्रान्त ने 1949 में, सौराष्ट्र ने 1952 में इसी भांति के सुधार हिन्दू विधि में प्रान्तीय स्तर पर किये। ट्रावनकोर और कोचीन रियासतों में भी इसी भांति के सुधार पहले किये जा चुके थे, कुछ रियासती अधिनियम के अन्तर्गत परस्पर अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद भी मान्य था।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के पूर्व हिन्दू विधि में सही अर्थों में वैवाहिक अनुतोषों का कोई स्थान नहीं था, यद्यपि विवाह के सम्बन्ध में कुछ कार्यवाहियां हो सकती थीं। उदाहरण के लिये सामान्य विधि के अन्तर्गत किसी भी विवाह के सम्बन्ध में शून्यकरणीयता की घोषणा की डिक्री वाद दायर करके प्राप्त की जा सकती थी। इसी भांति दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन का वाद भी दायर किया जा सकता था। हिन्दू विवाहित स्त्री के पृथक् निवास और भरण-पोषण अधिकार अधिनियम, 1946 के अन्तर्गत हिन्दू विवाहित स्त्री, निर्धारित आधारों पर पति से पृथक् रहकर भरण-पोषण के लिये पति के विरुद्ध वाद दायर कर सकती थी। परन्तु इसे न्यायिक पृथक्करण की संज्ञा नहीं दी जा सकती है।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत वैवाहिक अनुतोषों को मान्यता दी गयी है। वैवाहिक अनुतोष से हमारा तात्पर्य है, विवाह के सम्बन्ध में न्यायालय द्वारा प्राप्त किया गया कोई भी निवारण। अंग्रेजी विधि में इन्हें मैट्रीमोनियल काजेज (या वैवाहिक कार्यवाही) भी कहते हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत सब हिन्दुओं के लिये निम्न चार वैवाहिक अनुतोषों की स्थापना की गयी है

(क) विवाह की अकृतता (Nullity of marriage),

(ख) न्यायिक पृथक्करण (Judicial separation),

(ग) विवाह-विच्छेद (Dissolution of marriage),

(घ) दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन (Restitution of marriage)।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के लागू होने के पूर्व रूढ़ि और विशेष अधिनियमों के अन्तर्गत मान्य विवाह-विच्छेद के आधार पर कार्यवाहियाँ अब भी मान्य हैं।

क्या यह आवश्यक है कि याचिकाकार या प्रत्यर्थी वैवाहिक अनुतोष की याचिका के समय हिन्दू हो- विलायत राज बनाम सुनीला में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया है कि यदि विवाह

1. उदाहरणार्थ देखें, ट्रावनकोर नामक ऐक्ट, और देखें, नन्गू बनाम अप्पी, 1966 एस० सी० 68.

2. यह अधिनियम अब निरसित कर दिया गया है, परन्तु इसके मूल उपबन्धों का हिन्दू दत्तक पोषण अधिनियम की धारा 18 (2) में अधिनियमित किया गया है.

3. हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955.

4. हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955, धारा 29 (2).

5. 1983 दिल्ली 351.

हिन्दू विधि के अन्तर्गत हुआ है तो विवाह के पश्चात् याचिकाकार या प्रत्यर्थी के हिन्दू न रहने पर भी वैवाहिक अनुतोष के लिये याचिका प्रेषित की जा सकती है।

(1)

विवाह की अकृतता (LLB Notes in English PDF)

विवाह की अकृतता की विधि सम्बन्ध विवाह की अवबाधाओं (अड़चनों) से है। यदि किसी पक्षकार में कोई अवबाधा है तो वह विवाह के अयोग्य हैं। अवबाधा के होते हुये विवाह करने पर विवाह विधिमान्य नहीं होगा। अधिकांश विधियों में अवबाधाओं को दो भागों में बांटा जाता है।

(क) पूर्ण अवबाधायें (Absolute bars), और

(ख) वैवेकिक अवबाधायें (Discretionary bars)।

पूर्ण अवबाधा के होने पर विवाह पूर्णतया अमान्य और शून्य होता है। यह प्रारम्भ से ही शून्य माना जाता है वैवेकिक अवबाधा के होने पर विवाह अमान्य नहीं होता है, वह शून्यकरणीय होता है, अर्थात् कोई पक्षकार चाहे तो उसका विघटन कर सकता है। कभी-कभी कुछ अवबाधाओं के होते हुये भी विवाह सम्पन्न होने पर विधि विवाह को न ही शून्य और न ही शून्यकरणीय मानती है, बल्कि उन्हें मान्यता देती है, यद्यपि पक्षकार और वैसा विवाह सम्पन्न कराने के लिये उत्तरदायी व्यक्तियों को दण्डित करती है। हिन्दू विवाह अधिनियम में यही बात है। यहां पर हम उन सापेक्षिक अवबाधाओं पर ही विचार करेंगे जिनके कारण विवाह शून्यकरणीय होता है। इन अवबाधाओं ने विवाह की अकृतता के सम्प्रत्यय को जन्म दिया। विवाह की अकृतता के सन्दर्भ में विवाहों को निम्न दो प्रवर्गों में विभाजित किया जाता है

(च) शून्य विवाह, और

(छ) शून्यकरणीय विवाह।

हमारे यहां यह प्रवर्गीकरण (classification) अंग्रेजी विधि से आया है। अंग्रेजी विधि में यह प्रवर्गीकरण कुछ ऐतिहासिक कारणों से हुआ है। इसका जन्म उस युग में हुआ जब वैवाहिक अधिकारिता धार्मिक न्यायालयों को थी। यह दुर्भाग्य है कि हमने इस प्रवर्गीकरण को उसके दोषों सहित अपना लिया है।

शून्य विवाह का अर्थ-शून्य विवाह कोई विवाह नहीं है। यह ऐसा सम्बन्ध है जो विधि के समक्ष विद्यमान है ही नहीं। इसे विवाह केवल इस कारण कहते हैं कि दो व्यक्तियों ने विवाह के अनुष्ठान सम्पन्न कर लिये हैं। परन्तु पूर्ण अवबाधाओं के होने या पूर्णतया सामर्थ्यहीन होने के कारण कोई भी व्यक्ति पति-पत्नी की प्रास्थिति विवाह के अनुष्ठान करके ही प्राप्त कर सकता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई भाई-बहिन विवाह के अनुष्ठान सम्पन्न कर लें तो वे पति-पत्नी नहीं हो सकते हैं। शून्य विवाह, विवाह न होने के कारण किसी भी विधिक सम्बन्ध या प्रास्थिति को जन्म नहीं देता है। वैध विवाह के अन्तर्गत विधिक संस्थितियां और सम्बन्ध जन्म लेते हैं। पक्षकार पति-पत्नी की प्रास्थिति प्राप्त करते हैं, सन्तान वैध सन्तान की संस्थिति प्राप्त करती है और पक्षकारों के पारस्परिक अधिकारों, कर्तव्यों और दायित्वों का जन्म होता है। परन्तु शून्य विवाह के अन्तर्गत ऐसा कुछ नहीं होता है। यदि पक्षकारों में से कोई (या दोनों ही) दूसरा विवाह कर लें तो वह विवाह का दोषी नहीं होगा। यदि पत्नी को कोई रखैल कहकर पुकारे तो वह मानहानि का अपराध या दोषी नहीं होगा। कोई भी व्यक्ति उस विवाह को शून्य मानकर चल सकता है, वह उसे शून्य घोषित कराने का वाद भी प्रेषित कर सकता है या अन्य कानूनी कार्यवाही में उस विवाह को शन्य मानकर चल सकता है 3 हिन्द विवाह अधिनियम का कोई भी उपबन्ध इस कार्यवाही में बाधक नहीं है। शून्य विवाह की सन्तान अधर्मज होती है (धारा 16 के कारण अब हिन्दू विधि में ऐसी सन्तान वैध है)। शन्य विवाह के अन्तर्गत पक्षकारों के

1. देखें, अध्याय 5, ‘मानसिक सामर्थ्य’ शीर्षक के अन्तर्गत.

2. कृष्णा बनाम तुलसान, 1972 पंजाब और हरियाणा 305.

3 राजेश बाई बनाम शान्ताबाई, 1972 बम्बई 231; रामप्रिया बनाम धर्मदास, 1984, ई. 147.

बीच किसी भी कर्तव्य, अधिकार या दायित्व का जन्म नहीं होता है। विवाह शून्य घोषित कराने की याचिका प्रेषित होने पर और डिक्री पास होने के पश्चात् कोई भी पक्षकार भरण-पोषण की मांग कर सकता है, परन्तु यह इसलिये नहीं कि शून्य विवाह के अन्तर्गत वैसा उत्तरदायित्व उत्पन्न होता है, बल्कि इसलिये कि उस सम्बन्ध में हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में विशिष्ट उपबन्ध (Specific provision) है।

शून्य विवाह को शून्य करार देने के लिये शून्य घोषित करने की डिक्री की आवश्यकता नहीं है । जब न्यायालय वैसी डिक्री पारित करता भी है तो वह केवल इस तथ्य की घोषणा करता है कि विवाह शुन्य है। विवाह न्यायालय की डिक्री द्वारा शून्य नहीं होता है, वह तो वैसे ही शून्य है।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 11 के अन्तर्गत विवाह शून्य घोषित कराने की याचिका विवाह के दोनों पक्षकारों में से कोई भी एक प्रेषित कर सकता है, अन्य व्यक्ति नहीं । यदि विवाह इस कारण शून्य है पुरुष की पूर्व पत्नी के जीवन काल में विवाह हुआ है तो धारा 11 के अन्तर्गत पूर्व-पली याचिका प्रेषित नहीं कर सकती बल्कि शून्य विवाह की ही पत्नी याचिका प्रेषित कर सकती है। पहली पत्नी वैसी घोषणा का वाद विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act, 1963) के अन्तर्गत ला सकती है। वैसी याचिका पक्षकारों में से एक के मरने के उपरान्त दूसरा पक्षकार प्रेषित नहीं कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी विवाह की शून्यता का वाद किसी सिविल न्यायालय में दायर करता है तो हिन्दू विवाह अधिनियम का कोई भी उपबन्ध उसके रास्ते में नहीं आता है।

अकृत एवं शून्य विवाह-यदि पत्नी द्वारा अपने पूर्व पति के साथ प्रथम विवाह को न्यायालय की किसी डिक्री द्वारा विघटित नहीं किया गया है तो इस कारण उसका दूसरा विवाह अधिनियम की धारा (1) के उल्लंघन में है और उसे अधिनियम की धारा 11 के अधीन अकृत किया जाना चाहिये।

शून्य विवाह के आधार-हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 11 शून्य विवाह का आधार निर्धारित करती है। ये आधार अधिनियम के पारित होने के पश्चात् हुये विवाहों पर लागू होते हैं। अधिनियम के पूर्व सम्पन्न शून्य विवाहों पर असंहिताबद्ध हिन्दू विधि के नियम लागू होते हैं। धारा 11 के अन्तर्गत शून्य विवाह के निम्न तीन आधार हैं-

(क) विवाह के समय किसी पक्षकार का पति या पत्नी जीवित था। (देखें; अध्याय 5 ‘द्विविवाह’ शीर्षक के अन्तर्गत),

(ख) पक्षकार एक दूसरे के सपिण्ड हैं (देखें; अध्याय 5, सपिण्ड नातेदारी’ शीर्षक के अन्तर्गत), और

(ग) पक्षकारों के प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी (देखें, अध्याय 5, ‘प्रतिषिद्धि कोटि की नातेदारी’ शीर्षक के अन्तर्गत)।

उपर्युक्त किसी भी आधार पर पति या पत्नी विवाह के शून्य घोषित कराने की याचिका प्रेषित कर सकते हैं। धारा 11 के अतिरिक्त, दो और आधार हैं जिन पर विवाह शून्य होता है। प्रथम जब पक्षकारों ने विवाह के

1. देखें, हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955, धारायें 24 और 25.

2. लीला बनाम लक्ष्मी, 1968 इलाहाबाद लॉ जर्नल 689..

3. परमास्वामी बनाम सोरनाथाम्मल, 1968 मद्रास 124; शीला बनाम रामनन्दनी, 1981 इला0 42,

4. केदार बनाम सुप्रभा, 1965 पटना 311.

5. (1964) 2 इलाहाबाद वीकली नोट्स 142.

6. यह 1976 के संशोधन द्वारा स्पष्ट किया गया है। इन निर्णयों में कमा बनाम तुलसान, 1977 हरियाणा 683; न्यायाधीश श्री गुजराल, लेटर पेटेन्ट अपील में तलमान बनाम कृष्णा हरियाणा 442; लक्ष्मी बनाम थरम्मा, 1974 आन्ध्र प्रदेश 255 विपरीत मत लिया गया 1976 के संशोधन ने नकार दिया है.

7. राजेशबाई बनाम शान्ताबाई, 1982 बम्बई 231.

8. रमेशचन्द्र रामप्रतापजी डागा बनाम रामश्वरा रामेश्वरी रमेशचन्द डागा. 2005 वी० एन० एस० 37 (एस० सी)

आवश्यक अनुष्ठानों को सम्पन्न नहीं किया है, और द्वितीय, जब विवाह धारा 15 का उल्लंघन करके सम्पन्न किया गया है। (देखें; इसी अध्याय में आगे “विवाह-विच्छेद के पश्चात् पुनः विवाह की वर्जना” के नीचे)।

धारा 11 में यह घोषित किया गया है कि प्रथम पत्नी के जीवित रहते द्वितीय विवाह शून्य होगा।

क्या पति को दूसरा विवाह सम्पन्न करने से रोकने के लिये प्रथम पत्नी व्यादेश की आज्ञा प्राप्त कर सकती है?-यह प्रश्न पटना उच्च न्यायालय के समक्ष उमाशंकर बनाम राधा देवी में आया था। न्यायालय ने विचार व्यक्त किया कि हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में ऐसा कोई उपबन्ध नहीं है जिसके अन्तर्गत प्रथम पत्नी ऐसा वाद ला सके। इस लेखक की राय में यद्यपि व्यादेश के लिये हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत कार्यवाही नहीं की जा सकती है, तथापि प्रथम पत्नी विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 के अन्तर्गत पति को दूसरा विवाह करने से रोकने के लिये शाश्वत व्यादेश (Permanent injunction) के लिये वाद दायर कर सकती है। मैसूर न्यायालय ने भी यही मत व्यक्त किया है।

पति द्वारा दूसरी पत्नी ले आने पर विवाह अधिनियम के अन्तर्गत प्रथम पत्नी के लिये कोई अनुतोष नहीं है। परन्तु वह विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम के अन्तर्गत दूसरे विवाह के शून्य होने घोषित कराने का वाद ला सकती है।

शून्यकरणीय विवाह-शून्यकरणीय विवाह एक विधिमान्य विवाह है और जब तक कि उसके शून्यकरणीय विवाह होने की डिक्री पारित न हो जाये वह वैध और मान्य विवाह रहता है। शून्यकरणीय विवाह, विवाह के पक्षकारों में से किसी एक की याचिका द्वारा ही विघटित हो सकता है। यदि उनमें से एक पक्षकार की मृत्यु हो जाये तो उस विवाह को शून्यकरणीय की डिक्री पारित नहीं की जा सकती। दोनों पक्षकारों के जीवित होने पर यदि विवाह के शून्यकरणीय होने की कार्यवाही कोई पक्षकार न करे तो विवाह विधिमान्य ही रहेगा। जब तक कि शून्यकरणीय विवाह विघटित (annulled) न हो जाये, उसके अन्तर्गत विधिमान्य विवाह की सब प्रास्थितियां और सब अधिकार, कर्तव्य और दायित्व जन्म लेते हैं। यह पक्षकारों पर पति-पत्नी की प्रास्थिति और सन्तान पर धर्मज सन्तान की प्रास्थिति प्रदत्त करता है। वैध विवाह के सभी कर्तव्य, दायित्व और अधिकार भी उत्पन्न होते हैं। परन्तु अंग्रेजी विधि में ऐतिहासिक कारणों से शून्यकरणीय विवाह के निवारण का यह विचित्र ढंग रहा है कि शून्यकरणीय की डिक्री पारित होते ही इसे भूतलक्षी (Retrospective) प्रभाव दिया जाता है। यह माना जाता है कि सभी भांति से विवाह प्रारम्भ (विवाह होने की तिथि) से ही पूर्णरूप से शून्य था, पक्षकारों को आरम्भ से ही पति-पत्नी की प्रास्थिति और सन्तान को धर्मज सन्तान की प्रास्थिति प्राप्त नहीं थी। इस नियम का आधार है एक धार्मिक सिद्धान्त जिसके अन्तर्गत या तो विवाह सदैव-सदैव के लिये विधिमान्य है या सदैव-सदैव के लिये ही शून्य है। यह इस सिद्धान्त का तर्कसंगत प्रतिफल था कि विवाह विघटित न होने वाला एक स्थायी संस्कार है। धार्मिक न्यायायलों के लिये यह कहना असम्भव था कि कुछ समय तक तो विवाह मान्य है उसके पश्चात् यह अमान्य हो जाता है। यह मानने का अर्थ होता है कि वे विवाह-विच्छेद को मान्यता दे रहे हैं। शून्यकरणीय विवाह का यह रूप अंग्रेजी विधि में अभी भी विद्यमान है, यद्यपि उसकी कुछ कटुता इस वैधानिक उपबन्ध द्वारा कम कर दी गयी है। शान्यकरणीय विवाह की सन्तान शून्यकरणीय की डिक्री पारित होने के पश्चात भी धर्मज संतान रहेगी। न्यकरणीय विवाह के आधारों को विवाह-विच्छेद का आधार बनाया जा सकता था।

वाह की अकतता-हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12 के अधीन विवाह को अकृत घोषित करने के लिये यह आवश्यक है कि अधिनियम के अधीन उपबन्धित आवश्यक तत्व पूरे

1. शंकरप्पा बनाम वसमरा, 1968 मसूर 247; और देखें, सीताबाई बनाम रामचन्द्र, 1958 बम्बई 116: भोरी लाल बनाम कौशल्या, 1970 राजस्थान 83; विस्तृत ब्यौरे और विपरीत मत के लिये देखें, श्री सम्पत का लेख (1972) एम० एल० जे० 206.

2. वीरेन्द्र बनाम कमला, 1995 इला० 243.

पारसी बनाम वासुदेव , 1968 कल० 293 (प्रपाड़न) और विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1937 के अन्तर्गत ऐसा ही किया गया है.

हों। पति या पत्नी में से किसी एक की मृत्यु के पश्चात् पक्षकार विवाह की अकृतता हेतु वाद संस्थित कर सकता है।

शुन्यकरणीय विवाह के आधार-धारा 12 शून्यकरणीय विवाह के चार आधार निर्धारित करती है। ये आधार हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रतिपादित होने से पहले और बाद में सम्पन्न किये गये सभी विवाहों पर लागू होते हैं। ये आधार निम्न हैं-

(च) प्रत्यर्थी की नपुंसकता के कारण विवाहोत्तर संभोग का न होना, (इसका विवरण अध्याय पांच में दिया जा चुका है),

(छ) प्रत्यर्थी का विवाह के समय-

(i) चित्तविकृति के परिणामस्वरूप विधिमान्य सम्पत्ति देने में असमर्थ होना, या

(ii) विधिमान्य सम्मति देने में समर्थ होने पर भी वह इस प्रकार के या इस सीमा तक मानसिक विकार से ग्रस्त है कि वह विवाह और सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य है, या

(iii) उसे उन्मत्तता (या मिरगी)2 का दौरा बार-बार पड़ता है, (इसका विवरण अध्याय पांच में दिया जा चुका है),

(ज) प्रत्यर्थी का विवाह के समय गर्भवती होना, और

(झ) अर्जीदाता की सम्पत्ति बल-प्रयोग या कर्मकाण्ड (Ceremonial) की प्रकृति या प्रत्यर्थी से सम्बन्धित किसी तात्विक तथ्य या परिस्थिति के बारे में कपट द्वारा प्राप्त की गयी थी।

विवाह का बातिलीकरण-यदि विवाह पंजीकृत है तो शून्य नहीं है। दो हिन्दू व्यक्ति सिविल विवाह अथवा हिन्दू धार्मिक संस्कारों के अनुसार विवाह कर सकते हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 प्रभावी होगा एवं वाद की सुनवाई उस राज्य क्षेत्र के अन्तर्गत होगी जिसको वह प्रभावी है। अधिकारिता धारण करने वाले किसी न्यायालय द्वारा सुनवाई नहीं की जा सकती। हिन्दू विवाह अधिनियम उस क्षेत्र पर प्रभावी है जहां विवाह सम्पन्न किया गया था तथा उस क्षेत्र का समुचित न्यायालय वाद का विचारण कर सकता है। पत्नी द्वारा गोवा राज्य के न्यायालय से दिल्ली के न्यायालय में वाद को अन्तरित करने के अनुरोध पर महिला की सविधा के विचारगत मामला गोवा के न्यायालय से दिल्ली के कुटुम्ब न्यायालय को अन्तरित करने का आदेश पारित किया गया।

विवाह को अकृत एवं शून्य घोषित करने के लिये हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 12 के अधीन विवाह के बातिलीकरण के लिये वाद संस्थित किया जा सकेगा।

प्रत्यर्थी का विवाह के समय गर्भवती होना-विवाह के समय यदि प्रत्यर्थी गर्भवती थी तो विवाह शून्यकरणीय है। यह ध्यान में रखने योग्य बात है कि शून्यकरणीय का आधार प्रतिपक्षी का विवाह के समय गर्भवती होना है न कि शीलभ्रष्टा (Unchaste) होना। इस आधार की आवश्यक शर्ते यह हैं-(1) प्रतिपक्षी विवाह के समय गर्भवती थी, (2) वह याचिकाकार के अतिरिक्त अन्य किसी द्वारा गर्भवती थी, (3) याचिकाकार को विवाह के समय इसका ज्ञान नहीं था, (4) याचिका को अधिनियम के पूर्व के विवाहों के सम्बन्ध में, अधिनियम प्रतिपादित होने से एक वर्ष की अवधि के भीतर, और अधिनियम के पश्चात् सम्पन्न होने वाले विवाहों के सम्बन्ध में विवाह के पश्चात् एक वर्ष की कालावधि के भीतर, प्रेषित करना चाहिये, और (5) यह ज्ञात होने के पश्चात् कि प्रतिपक्षी गर्भवती है, याचिकाकार ने स्वेच्छा से मैथुन नहीं किया है। प्रतिपक्षी के साथ मैथुन होने का अर्थ है कि याचिकाकार ने प्रतिपक्षी के अपराध का उपमषण (Condonation) कर दिया है।

1. श्रीमती त्रिवेणी सिंह बनाम उ० प्र० राज्य एवं अन्य, 2008 विधि निर्णय एवं सामयिकी 463 (इला) ए० आई० आर०2008 इला०81.

2. विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1999 की धारा 2 द्वारा यह शब्द “मिरगी को हटा  दिया गया है.

3. विनिशा जीतेश तोलानी उर्फ मनमीत लघमानी बनाम जीतेश किशोर तोलाना, 20 सामयिकी 746 (एस० सी०).

4. राजिन्दर शर्मा बनाम अपर्णा शर्मा, 2011 (5) ए० डब्ल्यू० सा० 57

5. सुरजीत बनाम राजकुमारी, 1967 पंजाब 572.

6. रंगा बनाम चूडामणि, 1992 आन्ध्र प्र० 103.

इस आधार को हमने अंग्रेजी विधि से लिया है। यह कपट का एक विशेष रूप है। इसे कपट की संज्ञा इसलिये नहीं दे सकते हैं कि हो सकता है कि विवाह के समय वधू की ओर से यह न कहा गया हो कि वध गर्भवती नहीं है। धर्मशास्त्रों में भी ऐसे विवाहों की चर्चा है-यदि पुरुष जानबूझकर गर्भवती स्त्री से विवाह करता था तो वह स्त्री उसकी पत्नी होती थी और गर्भ से उत्पन्न सन्तान उसकी धर्मज सन्तान होती थी, जिसे ‘सहोधा’ की संज्ञा दी गयी है। परन्तु यदि विवाह के समय पुरुष को वधू के गर्भ का ज्ञान नहीं था तो वह गर्भवती पत्नी को उसके पिता को वापस कर सकता था और विवाह को निराकृत (Repudiate) कर सकता था।

यदि याचिका विवाह के पश्चात् एक वर्ष की कालावधि के भीतर प्रेषित नहीं की गयी है तो फिर विवाह के शून्यकरणीय की याचिका प्रेषित नहीं हो सकती है। यह सिद्ध करने का भार याचिकाकार पर है कि प्रतिपक्षी विवाह के समय गर्भवती थी। महेन्द्र बनाम सशीला में उच्चतम न्यायालय ने कहा, जब यह सिद्ध हो जाये कि याचिकाकार और प्रतिपक्षी के बीच विवाह के पूर्व लैंगिक सम्बन्ध नहीं थे और प्रतिपक्षी विवाह के समय अपना गर्भवती होना स्वीकार कर ले तो फिर याचिकाकार अपने भार को वहन करने में समर्थ हुआ है और उसके पक्ष में शून्यकरणीय की डिक्री पास कर देनी चाहिये।

पवन कुमार बनाम मुकेश कुमारी में पत्नी किसी अन्य व्यक्ति से गर्भवती थी तथा विवाह एकदम ही टूट गया था परन्तु याचिका में विलम्ब था। क्योंकि यह तथ्य कि पत्नी किसी अन्य से गर्भवती है मानसिक प्रताड़ना तथा क्रूरता है इसलिये यह याचिका विवाह-विच्छेद (धारा 13) में परिवर्तित कर दी गयी

(झ)कपट और बल-यदि याचिकाकार की अनुमति कपट या बल द्वारा ली गयी है तो वह विवाह के शून्यकरणीय की याचिका दे सकता है। इस आधार की शर्ते हैं-(1) याचिकाकार की अनुमति कपट या बल द्वारा ली गयी है, (2) याचिका कपट का पता लगने या बल प्रयोग के समाप्त होने के एक वर्ष की कालावधि के अन्दर प्रेषित की गयी, और (3) याचिकाकार कपट का पता लगने या बल प्रयोग के समाप्त होने के पश्चात् अपनी स्वीकृति से प्रत्यर्थी के साथ पति या पत्नी की तरह नहीं रहा था या रही है, यह अनिवार्य शर्त है।

बल (Force)-वैवाहिक विधि में बल का वृहत् अर्थ लिया गया है। बल से तात्पर्य भौतिक शक्ति का प्रयोग ही नहीं बल्कि शक्ति के प्रयोग की धमकी देना भी है। अंग्रेजी निर्णयों में यह कहा गया है कि मस्तिष्क की दुर्बलता, यह किसी भय के कारण (जो कारणवश हो या अकारण हो परन्तु सचमुच में पक्षकार को भयभीत करे) ली गयी स्वीकृति या स्वीकृति उस समय ली गयी है जब पक्षकार ऐसी मानसिक स्थिति में हो कि वह किसी भी दबाव का सामना नहीं कर सकता है तो वह बल-प्रयोग कहलायेगा। ऐसी स्थिति में सच्ची अनुमति नहीं दी गयी है। बल-प्रयोग प्रत्यर्थी द्वारा हो सकता है या प्रत्यर्थी की ओर से अन्य व्यक्ति द्वारा। उदाहरण लें, चाहे प्रत्यर्थी स्वयं बन्दूक तानकर खड़ा हो जाये या उसकी ओर से अन्य कोई बन्दूक तानकर खड़ा हो जाये और याचिकाकार से कहे कि उसे प्रत्यर्थी से विवाह करना होगा; तो यह बल-प्रयोग होगा। यह बात कोई अर्थ नहीं रखती है कि याचिकाकार वयस्क है या अवयस्क। परन्तु केवल दबाव, या दृढ़ सलाह, या भावुक मनुहार (Persuation) बल-प्रयोग नहीं कहलायेगा। लगभग व्यवस्थित विवाहों में कुछ-न-कुछ मनुहार तो होती है। कभी-कभी थोड़ा दबाव भी होता है, परन्तु यह बल प्रयोग की परिभाषा में नहीं आता है। प्रपीड़न (Coercion) या अनुचित प्रभाव बल प्रयोग की परिभाषा में नहीं आते हैं। स्काट

1. मैट्रीमोनियल काजेज ऐक्ट, 1950 धारा 8 (1) (ख).

2. मनुस्मृति 9,73.

3. बेलीन्यागी बनाम मनियन (1969) 1 एम० एल० जे० 334; सांवलराम बनाम यशोधरा बाई, 1962 बम्बई 190; रंगास्वामी बनाम नागम्मा, (1972) 2 मैसूर लॉ जर्नल 256.

4. निशीत बनाम अंजली, 1968 कलकत्ता 105; न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के विपरीत मत से असहमति प्रकट की-शिवगुरू बनाम सरोजा, 1960 मद्रास 216 इस लेखक को राय में कलकत्ता उच्च न्यायालय का मत ठीक है.

5.2001 राजस्थान 1.

6. 1965 सुप्रीम कोर्ट 364.

7. पूर्वी बनाम बासुदेव, 1968 कलकत्ता 293 (प्रपीड़न का मामला).

बनाम स्काइट और राईस बनाम राईस बल प्रयोग के अच्छे उदाहरण हैं। पहले वाद में प्रत्यर्थी ने याचिकाकार से कहा कि यदि वह सीधी तरह से विवाह का अनुष्ठान करने पर सहमत नहीं होगी तो वह उसे गोली मार देगा। दसरे वाद में प्रत्यर्थी ने याचिकाकार को पिस्तौल दिखाकर कहा कि यदि विवाह सम्पन्न करने के लिये सहमत नहीं होगी तो वह उसे गोली से उड़ा देगा।

कपट (Fraud)-कपट का मुख्य अंग है-धोखा। परन्तु वैवाहिक विधि में हर भांति का धोखा कपट की परिभाषा में नहीं आता है। उदाहरण के लिये देखें, प्रत्येक व्यवस्थित विवाह में वर और वधु को हर प्रकार की योग्यताओं और गुणों से सम्पन्न बताया जाता है। वैवाहिक विज्ञापनों से यह बात स्पष्ट है। कभी यह भी कहा जाता है कि वह जागीरदार है, जमींदार है, उद्योगपति है, बड़ा सरकारी अफसर है। यही बातें वधू के लिये भी कही जाती हैं। मान लीजिये, ये सब बातें मिथ्या सिद्ध हों तो क्या यह कपट कहलायेगा? उत्तर इसका नकारात्मक है। पूर्वी बनाम वासुदेव में याचिकाकार ने कहा कि उसके पति ने विवाह के पूर्व यह शेखी बघारी थी कि वह उसे बहत ही उच्च स्तर का जीवन व्यतीत करायेगा। न्यायालय ने कहा कि यह कपट नहीं है। अन्यथा मत लेने पर हमारे अधिकांश विवाह कपट के आधार पर शून्यकरणीय होंगे। थोड़ा बहुत ही कपट हो सकता है जब कि यह मौलिक रूप से विवाह पर प्रभाव डाले।

सन् 1976 के संशोधन द्वारा यह उपबन्ध बनाया गया है कि निम्न दो स्थितियों में सम्मति कपट द्वारा मानी जायेगी-

(क) विवाह के अनुष्ठानों (कर्मकाण्ड) के सम्बन्ध में, या

(ख) प्रत्यर्थी से सम्बन्धित किसी तात्विक तथ्य या परिस्थिति के बारे में इस संशोधित आधार के पश्चात् प्रश्न यह उठा है कि क्या अब इस आधार को कुछ वृहत् कर दिया गया? इसकी विवेचना हम आगे करेंगे।

यह मान्य नियम रहा है कि विवाह के अनुष्ठानों पर किया गया कपट शून्यकरणीय की डिक्री का पर्याप्त आधार है। परन्तु यह ठीक से नहीं कहा जा सकता है कि सन् 1976 के संशोधन द्वारा प्रत्यर्थी सम्बन्धित किन तात्विक तथ्यों और कौन-सी परिस्थितियों पर किया गया कपट शून्यकरणीयता की डिक्री के लिये पर्याप्त आधार होगा। सन् 1976 के संशोधन के पूर्व आने वाले वादों में निम्न तथ्य और परिस्थितियों को कपट का आधार मानकर विवाह के शून्यकरणीय की याचिका प्रषित की गयी थी

(क) रोग को छिपाना,

(ख) धर्म या जाति को छिपाना, (ग) शीलभ्रष्टता को छिपाना, और (घ) अधर्मजता को छिपाना।

प्रतिपक्षी की अनन्यता (Identity) सम्बन्धी कपट सदैव से ही शून्यकरणीयता का आधार माना गया है। इस लेखक का निवेदन है कि प्रत्यर्थी सम्बन्धी उन्हीं तथ्यों और परिस्थितियों पर कपट शन्यकरणीयता के आधार हो सकते हैं, जिनका विवाह पर असर मूल रूप से पड़ता है।

विवाह के अनुष्ठान के सम्बन्ध में-यदि विवाह के अनुष्ठान के सम्बन्ध में धोखा दिया गया है, या किसी पक्षकार के मन में विवाह के अनुष्ठान के सम्बन्ध में कोई विभ्रम (Mistake) है तो निर्दोष पक्षकार की याचिका पर विवाह के शून्यकरणीय की डिक्री पारित हो सकती है। उदाहरण लें, प्रत्यर्थी याचिकाकार को आर्यसमाज मन्दिर में शुद्धि के अनुष्ठान को सम्पन्न कर लेता है। इस स्थिति में विवाह शन्यकरणीय है। अंग्रेजी मामले फोर्ड बनाम स्टायरों में एक 17 वर्षीय कन्या का अपने भाई के मित्र के साथ वैवाहिक अनुष्ठान यह कहकर सम्पन्न कराया गया कि यह सगाई का अनुष्ठान है। न्यायालय ने विवाह के शून्यकरणीय की डिक्री पारित कर दी। शिरन बनाम हेलर में पति ने विवाह का अनुष्ठान पत्नी के साथ सम्पन्न किया, परन्तु सचमुच में विवाह सम्पन्न करने की उसकी इच्छा नहीं थी। न्यायालय ने पत्नी की याचिका पर विवाह का शून्यकरणीय घोषित कर दिया। यह मुकदमा विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत था।

1.12 प्रोवेट डिवीजन 21 (अंग्रेजी निर्णय),

2.72 लॉ टाइम्स 122 (अंग्रेजी निर्णय).

3. भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 17 कपट की परिभाषा देती है.

4. 1969 कलकत्ता293.

5. 1896 प्रोबेट 1.

6. 1952 पंजाब 277.

पक्षकार की अनन्यता के सम्बन्ध में-पक्षकार की अनन्यता पर कपट उस समय होता है जब कोई व्यक्ति यह कहे कि वह ‘श्याम’ है, जबकि वह ‘राम’ है और याचिकाकार ने उसके साथ विवाह उसे ‘श्याम’ समझ कर किया हो, यदि वह यह जानती कि वह श्याम नहीं बल्कि राम है तो वह उससे विवाह नहीं करती। इस स्थिति में याचिकाकार विवाह के शून्यकरणीय की डिक्री प्राप्त कर सकता है।

प्रास्थिति का छिपाना-विवाह के पूर्व की प्रास्थिति का छिपाना कपट है। राजेन्द्र बनाम प्रमिला में पति ने यह छिपाया था कि उसका तलाक हो चुका है। न्यायालय ने कहा कि यह कपट की संज्ञा में आता है। विवाहित स्त्री द्वारा विवाह से पूर्व यह कहना. झठा बयान देना कि हमारा तलाक हो चुका है और यह भी असत्य कथन माना जायेगा कि वह बी० ए० पास है कपट की संज्ञा में आता है।

रोग को छिपाने पर-यह पहले उल्लेख किया गया है कि जड़ता और पागलपन के आधार पर विवाह शून्यकरणीय होता है। प्रश्न उठता है कि क्या किसी रोग के छिपाने के कारण भी विवाह शून्यकरणीय होगा? अमरनाथ बनाम लज्जावती में विवाह पूर्व पत्नी यक्ष्मा से पीड़ित थी पर यह बात छिपा ली गयी थी। पति की याचिका खारिज करते हुये न्यायालय ने कहा कि विवाह के शून्यकरणीय का यह उचित आधार नहीं है। सम्भवतः किसी असाध्य रोग (जैसे असाध्य मिरगी) का छिपाना शून्यकरणीय का आधार हो सकता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया है कि यह छिपाना कि पत्नी विवाह के पूर्व मिरगी के रोग में पीड़ित थी कपट की परिभाषा में आयेगा उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि पति द्वारा यह छिपाना कि वह “पैरानाइड सीजोफ्रेनिया” बीमारी से ग्रस्त था, कपट के अन्तर्गत आता है और विवाहविच्छेद का उचित आधार गठित करता है।

धर्म या जाति का छिपाना-क्या धर्म या जाति का छिपाना विवाह की शून्यकरणीयता का आधार हो सकता है? हम पहले ही कह चुके हैं कि वर्तमान हिन्दू विधि में हिन्दू का अहिन्दू से विवाह मान्य नहीं है, वह शून्य है। परन्तु यदि कोई जैन धर्मावलम्बी अपने को हिन्दू धर्मावलम्बी कहकर अन्य पक्ष से विवाह कर लेता है, तो इस लेखक की राय में वैसा विवाह न तो शून्य होगा न ही शून्यकरणीय। परन्तु यदि धर्म या जाति छिपाने के कारण खानपान का अंतर पड़े जैसा याचिकाकार शाकाहारी से ही विवाह करना चाहती है अतः प्रतिपक्षी का जैन या बौद्ध होना वह अनिवार्य मानती हो तो विवाह शून्यकरणीय होना चाहिये। विमला बनाम शंकरलाल में जाति के बारे में दुव्यपदेशन के कारण न्यायालय ने विवाह के शून्यकरणीयता की डिक्री पारित की। विवाह-विच्छेद अधिनियम के अन्तर्गत आयकट बनाम आयकट में पति ने यह दुर्व्यपदेशन किया कि वह ईसाई है जब कि वह मुसलमान था। न्यायालय ने विवाह को शून्यकरणीय की डिक्री प्रदान कर दी।

यह छिपाना कि प्रतिपक्षी का पहले भी विवाह हो चुका था और वह विधुर था कपट की परिभाषा में नहीं आता है।

 

हिन्दू द्वारा ईसाई से किया गया विवाह अविधिमान्य है-अधिनियम की धारा 5 से यह स्पष्ट हो जाता है कि किन्हीं दो हिन्दुओं के मध्य विवाह अनुष्ठापित किया जा सकेगा। इसमें बतायी गयी शर्तों की पर्ति किया जाना आवश्यक ही नहीं बल्कि आज्ञापक है तथा उसके पूरा न किये जाने से दो हिन्दुओं के मध्य विवाह की अनुमति नहीं दी जा सकती है। एक रोमन कैथोलिक समुदाय का ईसाई द्वारा हिन्दू से किया गया विवाह अविधिमान्य है और इसका पंजीकरण नहीं किया जा सकता।

1. 1987 दिल्ली 285.

2. ब्रजेन्द्र बनाम परमिन्दर, 1995 पं० और० ह0 42..

3. 1959 कलकत्ता 771.

4. प्रवीन बनाम मनमोहन, 1984 दिल्ली 139.

5. विनीता सक्सेना बनाम पंकज पंडित, 2006 निधि निर्णय एवं सामयिकी 565 (एस० सी०).

6. 1969 मध्य प्रदेश 8.

7. 1940 कलकत्ता 75.

8. राजाराम बनाम दीपाबाई, 1974 मध्य प्रदेश 52.

9. गल्लीपल्ली सौरिया राज बनाम बण्डारू पावनी उर्फ गुल्लीपल्ली पावनी, 2009 विधि निर्णय एवं सामयिकी 387 (एस० सी०).

शीलभ्रष्टता को छिपाना-हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रतिपादित होने के पूर्व न्यायालयों ने यह मत व्यक्त किया था कि विवाह की मान्यता के लिये वधू का शीलवती होना अनिवार्य नहीं है। अंग्रेजी विधि में भी यही स्थिति है। हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत यह प्रश्न उच्च न्यायालय के समक्ष दो मुकदमों में आया है। हरभजन बनाम ब्रिज बल्लभर में प्रत्यर्थी के पिता ने याचिकाकार को यह विश्वास दिलाया था कि प्रत्यर्थी शीलवती है, परन्तु विवाह के पश्चात् पता चला कि विवाह के पूर्व उसने अधर्मज अपत्य को जन्म दिया है। न्यायालय ने निर्णय दिया कि इन तथ्यों पर विवाह के शून्यकरणीय की डिक्री पारित नहीं की जा सकती है। दूसरे मुकदमे सुरजीत बनाम हरीचन्द में न्यायाधीश श्री कपूर ने कहा कि विवाह पूर्व-पत्नी की शीलभ्रष्टता जिसका ज्ञान पति को विवाह के समय नहीं था विवाह की शून्यकरणीयता का आधार नहीं हो सकता है। इस कारण भी विवाह शून्यकरणीय नहीं हो सकता है कि वधू ने अपने शीलभ्रष्ट न होने का दुर्व्यपदेशन (Misrepresentation) किया था। परन्तु माननीय न्यायाधीश ने कहा कि यदि पति अपनी पत्नी के शीलभ्रष्ट न होने को विवाह के मूल बात समझता है तो उसका कर्तव्य है कि वह उस सम्बन्ध में वधू के नातेदारों से विवाह के पूर्व पूछताछ करे और फिर भी यदि वधू या उसके नातेदार वधू के शीलवती होने का दुर्व्यपदेशन करें तो वह यह कह सकता है कि उन्होंने उसे धोखा दिया। सामान्य रूप से यह कहना कि वधू शीलवती है, कपट की परिभाषा में नहीं आता है। यह लेखक इस मत से सहमत है।

जननेन्द्रियहीनता को छिपाना-यह स्पष्ट है कि यह छिपाना कि पत्नी की जननेन्द्रियां हैं ही नहीं, कपट होगा। परन्तु मूबी बनाम मुर्दशन में पिता ने कन्या को पसन्द किया था और पिता को कन्या की जननेन्द्रियहीनता बता दी गयी थी, अत: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि पिता के साथ कोई कपट नहीं किया गया था और पिता का ज्ञान पुत्र का ज्ञान माना जायेगा।

तात्विक तथ्य या परिस्थिति-क्या तथ्य और परिस्थितियां तात्विक होंगी जिनको कपट कहा जा सकता है,  कहना कठिन है। ये तथ्य और परिस्थितियां भिन्न-भिन्न और अनेक हो सकती हैं। ये तथ्य या परिस्थितियां विपक्षी के सम्बन्ध में या उसके चरित्र के सम्बन्ध में होनी चाहिये, यह अनिवार्य है। पी० बनाम के05 में न्यायालय ने कहा कि यदि विवाह के पूर्व प्रतिपक्षी का किसी भयंकर रोग से, जैसे कुष्ठरोग या रतिज रोग से पीड़ित होना शीलभ्रष्टा होना आवश्यक तथ्यों के छिपाने की संज्ञा में आयेगा। इस वाद में पत्नी का गुप्तांग ऐसा था कि उसके साथ सामान्य रूप से सम्भोग नहीं किया जा सकता था। इस तथ्य को छिपाया गया था। न्यायालय ने कहा कि यह कपट है।

अधर्मजता को छिपाना-हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रवर्तित होने के पूर्व के मुकदमे में रुक्मणी बनाम चारी7 में न्यायालय ने दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री पति को इसलिये नहीं दी कि विवाह के पूर्व उसने यह व्यपदेशन (Representation) किया था कि वह अविवाहित है, जबकि यथार्थ में वह विवाहित था। विमला बनाम शंकरलाल में न्यायालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति दूसरे को अपना पुत्र कहता है तो इसका तात्पर्य यह है कि उसका धर्मज पुत्र है। परन्तु यदि पुत्र अधर्मज है तो यह कपट की संज्ञा में आयेगा।

न्यायालय की पूर्व पारित डिक्री को छिपाना-यदि किसी पक्षकार के विवाह का विघटन हो गया हो या उसकी अकृतता घोषित कर दी गयी हो और विवाह के समय यदि प्रतिपक्षी ने इस तथ्य को छिपाया है, तो यह तात्विक तथ्य के छिपाने की परिभाषा में आयेगा।

1. विस्तृत विवरण के लिये देखें, मेन “हिन्दू लॉ एण्ड यूसेज”, पृष्ठ 144.

2, 1964 पंजाब 359.

3. 1967 पंजाब 172.

4. 1988 कल0 210.

5. 1982 बम्बई 400.

6. और देखें, सरला बनाम कोमल, 1991 मध्य प्रदेश 385.

7. 1938 मद्रास 616.

8. 1959 मध्य प्रदेश 8; और देखें; नन्दकीनी बनाम पंडालिक, 1986 बम्बई 172.

9. किरण बनाम भैरो प्रसाद, 1982 इला० 242,

क्या व्यपदेशन का समय महत्त्वपूर्ण है?-कोई व्यपदेशन कपटपूर्ण है या नहीं, क्या इसके निर्धारण के लिये यह महत्वपूर्ण है कि व्यपदेशन कब किया गया था? अमरनाथ बनाम लाजवन्ती में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा कि पक्षकारों की स्वीकृति का प्रश्न दो अवस्थाओं में उत्पन्न होता है, पहले उस समय जब पक्षकार विवाह सम्पन्न करना स्वीकार करते हैं और दूसरे उस समय जब पक्षकार विवाह सम्पन्न करते हैं। न्यायालय ने कहा कि हिन्दू विवाह के संस्कार (अनुबन्ध नहीं) होने के कारण यदि पृथक् अवस्था में स्वीकृति कपट द्वारा भी ली गयी है तो भी विवाह अमान्य नहीं हो सकता है, परन्तु यदि स्वीकृति विवाह के समय कपट द्वारा ली गयी है तो यह विवाद की विधिमान्यता पर असर डालेगा। इस निर्णय को पंजाब उच्च न्यायालय ने हरभजन बनाम बृजपाला में अनुमोदित किया। परन्तु सुरजीत बनाम राजकुमारी में न्यायाधीश श्री कपूर ने (इस लेखक की राय में ठीक ही) इस मत से असहमति व्यक्त की। माननीय न्यायाधीश ने कहा कि यदि स्वीकृति लेने में पहली अवस्था में भी कपट का प्रयोग किया गया है तो भी विवाह शून्यकरणीय होगा। इस लेखक का निवेदन है कि हिन्दू विवाह को चाहे संस्कार मानें चाहे अनुबन्ध, जहां तक सम्मति का प्रश्न है, सम्मति कपटपूर्ण है तो विवाह शून्यकरणीय ही होगा-कपट चाहे विवाह के पूर्व किया गया हो या विवाह के समय, इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता है। आवश्यक यह है कि विवाह के लिये सम्मति कपट द्वारा ली गयी थी लेकिन यदि कपट विवाह की तिथि पर समाप्त हो जाये तो वह कपट नहीं कहलायेगा |

आयु का छिपाना-सोमदत्त बनाम राजकुमार में विवाह के समय यह कहा गया था कि वधू वर से छोटी है परन्तु वास्तव में वह वर से आयु में अधिक थी। यह कपट की संज्ञा में आयेगा। यदि शून्यकरणीय इस आधार पर धारा 12 के अन्तर्गत मांगा जाये कि पति की आयु 21 वर्ष से कम थी तो वह याचिका नामंजूर होगी क्योंकि यह आधार धारा 11, 12, 13 तथा 5(iii) में नहीं है,

वित्तीय स्थिति एवं व्यवसाय-छिपाना-पति द्वारा वित्तीय स्थिति अथवा व्यवसाय छिपाना कपट माना गया है।

याचिकाकार के पिता का कपट-वैवाहिक विधि के अन्तर्गत विवाह की सम्मति के सम्बन्ध में वह कपट का महत्व है जिसके लिये प्रतिपक्षी उत्तरदायी है, अर्थात्, यह कपट जो प्रतिपक्षी द्वारा या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया है। परन्तु क्या याचिकाकार अपने स्वयं के माता या पिता या अन्य नातेदार द्वारा किये गये कपट के आधार पर भी विवाह की शून्यकरणीयता की डिक्री प्राप्त कर सकता है? प्रतीत यह होता है कि व्यवस्थित विवाह के सम्बन्ध में इसका उत्तर सकारात्मक देना होगा। बुबई बनाम रामी में पत्नी ने विवाह की शून्यकरणीयता की याचिका इन तथ्यों के आधार पर प्रेषित की कि विवाह के समय उसने अपने पिता को अपनी माता से यह कहते हुये सुना कि उसने याचिकाकार के लिये वर निश्चित कर लिया है, वर की आयु 20-30 वर्ष के लगभग होगी। विवाह के पश्चात् ससुराल पहुंचने पर उसने पाया कि उसके पति की आयु 60 वर्ष से भी अधिक थी। न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या पत्नी के पिता का व्यपदेशन कपट कहलायेगा, जब कि पिता ने याचिकाकार से सीधे कुछ नहीं कहा, बल्कि याचिकाकार ने यह बात सुन ली थी। न्यायाधीश श्री सिंह ने शून्यकरणीयता की डिक्री पारित करते हुये कहा कि पिता ने उस तथ्य को छिपा कर जिसका ज्ञान उसे था, याचिकाकार को परोक्ष रूप से धोखा दिया है।10

1.1964 पंजाब 356,

2. 1967 पंजाब 172.

3. और देखें, बबुई बनाम राम, 1968 पटना 190; जहां इस मामले का समर्थन किया गया है.

4. ऐ० प्रेमचन्द बनाम वी० पद्मप्रिया, 1997 मद्रास 135.

5. 1986 पंजाब और हरियाणा 191.

6. मल्लिकार्जुनैय्या बनाम गौरम्मा, 1997 कर्नाटक 77, गजरा भूरा बनाम कानबी कुंवरबाई, 1997 गुजरात 185.

7. अनुराग आनन्द बनाम सुनीता आनन्द 1997 दिल्ली 94.

8. बिन्द शर्मा बनाम ओम प्रकाश, 1988 इलाहाबाद 429.

9. 1968 पटना 190.

10 और देखें, किशन बनाम तुलसान्, 1972 पं० और० ४0 305: अलका बनाम अविनाश, 1991 मध्य प्रदा 205.

शुन्य विवाह और शून्यकरणीय बिवाहों का प्रभेद-शून्य विवाह, और शून्यकरणीय विवाहों के बीच मलभत प्रभेद है। शून्य विवाह, विवाह हा नहीं है, वह प्रारम्भ से ही शून्य विवाह है। उस विवाह के अन्तर्गत पक्षकार पति-पत्नी की संस्थित प्राप्त नहीं करते हैं। सन्तान भी धर्मज सन्तान की प्रास्थिति प्राप्त नहीं करती है, न ही पक्षकारों के आपसी अधिकार, कर्तव्य और उत्तरदायित्वों का जन्म होता है। दूसरी ओर शन्यकरणीय विवाह जब तक शून्यकरणीय की डिक्री द्वारा विघटित न हो जाये पूर्णतया मान्य विवाह है। उसके अन्तर्गत पति-पत्नी की प्रास्थिति प्राप्त करते हैं, सन्तान धर्मज सन्तान की प्रास्थिति प्राप्त करती है और समस्त पारम्परिक अधिकार, कर्तव्य और दायित्वों का जन्म होता है।

जब न्यायालय डिक्री द्वारा शून्य विवाह को शून्य घोषित करता है, तो वह इस तथ्य की घोषणा-मात्र है कि विवाह शून्य है, क्योंकि विवाह तो पहले ही से शून्य है। परन्तु शून्यकरणीय विवाह तभी शून्यकरणीय होता है तब न्यायालय वैसी डिक्री पारित करता है। शून्यकरणीय विवाह के लिये न्यायालय की डिक्री उसे शून्यकरणीय करने के लिये आवश्यक है, जबकि शून्य विवाह के लिये किसी डिक्री की आवश्यकता नहीं

शून्य विवाह के दोनों पक्षकार बिना डिक्री के पारित हुये भी दूसरा विवाह कर सकते हैं, वे द्विविवाह के अपराधी नहीं होंगे। परन्तु शून्यकरणीय विवाह के पक्षकार ऐसा नहीं कर सकते हैं, यदि वे या उसमें से कोई ऐसा करेगा तो वह द्विविवाह का दोषी होगा। शून्य विवाह की पत्नी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अन्तर्गत भरण-पोषण का प्रार्थना-पत्र प्रेषित नहीं कर सकती है, जब कि शून्यकरणीय विवाह की पत्नी वैसा कर सकती है।

शून्य और शून्यकरणीय विवाहों की सन्तान-वर्तमान हिन्दू विधि के अन्तर्गत शून्य विवाह की सन्तान, चाहे शून्य घोषित करने की डिक्री पारित की गयी हो या न की गयी हो, धर्मज होगी। परन्तु इस धारा के लागू होने के लिये ऐसी संतान के माता-पिता के बीच विवाह होना अनिवार्य है। यदि माता-पिता ने विवाह ही नहीं किया तब यह धारा लागू नहीं होगी।। सन् 1976 के संशोधन के पश्चात् भी शून्य विवाह की सन्तान और उस शून्यकरणीय विवाह की सन्तान जिसके शून्यकरण की डिक्री पास हो गयी है, केवल अपने माता-पिता की सम्पत्ति में उत्तराधिकार पाने का अधिकार रखते हैं, अन्य नातेदारों की सम्पत्ति में नहींउसका यह भी तात्पर्य कि शून्य विवाह का पुत्र उस सहदायिकी का सदस्य नहीं हो सकता है जिसमें उसका पिता सहदायक है।

कंवलजीत बनाम एन० के० सिंह में न्यायालय ने कहा कि यदि विवाह दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की कार्यवाही में शून्य ठहराया जाये तो फिर सन्तान धारा 16 के अन्तर्गत धर्मज नहीं हो सकती है। विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम के अन्तर्गत विवाह के शून्य घोषित होने की डिक्री पर या विवाह के शून्य इसलिये घोषित होने पर कि विवाह के अनुष्ठान सम्पन्न नहीं किये गये हैं, यह धारा 15 को उल्लंधित करके किये जाने के कारण विवाह के शून्य घोषित होने पर, सन्तान धारा 16 के अन्तर्गत धर्मज नहीं हो सकती है। धारा 16 केवल उन शून्य विवाहों पर लागू होती है जो धारा 11 के अन्तर्गत शून्य हैं।

शून्य या शून्यकरणीय विवाह से उत्पन्न सन्तान का सम्पत्ति में अधिकार अधिनियम की धारा 16 (3) प्रावधान करती है कि ऐसी सन्तान किसी व्यक्ति की, जो उसका माता-पिता नहीं है, सम्पत्तिया म किसी अधिकार का हकदार नहीं होगा, यदि वह संशोधन को पारित करने के पूर्व उसकी अधमजता के पारणामस्वरूप उनके लिये हकदार नहीं था। लेकिन, उक्त प्रतिषेध उसकी माता-पिता का सम्मान

गा। धारा 16 का खण्ड (1) और (2) अभिव्यक्त रूप से घोषणा करता है कि ऐसा सन्तान

बाद उन्ह धर्मज घोषित किया गया है, तो उनके विरुद्ध विभेद नहीं किया जा सकता आर व धमज सन्तान के समान होंगे और अपने माता-पिता की सम्पत्ति स्वअर्जित और पैतृक दा * लिय हकदार हैं। धारा 16(3) में अन्तर्विष्ट प्रतिषेध ऐसी सन्तानों का उनक माता

का सम्पत्ति स्वअर्जित और पैतृक दोनों में सभी अधिकारों

एसा सन्तानों का उनके माता-पिता के अतिरिक्त

1. धारा 165.

2. रामकली बनाम श्यामवती. 2000 मध्य प्रदेश 288.

3. धारा 16 (5); गोंडर बनाम याचियाप्पन, 1990 मद्रास 110.

4. 1961 पजाब 331, सुदर्शन बनाम राज्य, 1988 दिल्ली 366.

किसी अन्य व्यक्ति की सम्पत्ति के सम्बन्ध में लाग होंगे। हमारे समाज को शामिल करके प्रत्येक समाज में धर्मजता के सामाजिक मापदण्ड के परिवर्तन के साथ, जो पहले अधर्मज था वह आज धर्मज हो सकता है। धर्मजता की अवधारणा सामाजिक सहमति से उदभत होती है जिसके रूप में विभिन्न सामाजिक समूह व्यापक भूमिका अदा करते हैं। बहुधा प्रमुख समूह परिवर्तित होने वाले सामाजिक आर्थिक परिदृश्य की दृष्टि में और मानव सम्बन्ध में पारिणामिक उतार-चढ़ाव की दृष्टि में अपनी प्राथमिकता खो देता है। विधि संशोधन की प्रक्रिया के माध्यम से ऐसे सामाजिक परिवर्तन को नियमित करने के लिये अपना समय लेती है। इसी कारण परिवर्तित समाज में विधि स्थिर नहीं बनी रह सकती। यदि कोई व्यक्ति हिन्दू विधि के विकास के इतिहास का अवलोकन करता है, तो यह स्पष्ट होगा कि यह कभी भी स्थिर नहीं है और विभिन्न समय में परिवर्तित होने वाले सामाजिक प्रतिमान के चुनौती को पूरा करने के लिये समय-समय से परिवर्तित हुई है। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 16 में संशोधन अधिनियम 1976 के अधिनियम संख्या 60 द्वारा पुर:स्थापित किया गया था। इस संशोधन ने वास्तव में वर्तमान धारा के साथ अधिनियम की पूर्व धारा 16 को प्रतिस्थापित किया था। इस संशोधन से सम्बन्धित खण्ड में संलग्न सुसंगत टिप्पण से, यह प्रतीत होता है कि उसे धारा 16 के निर्वचन में कठिनाइयों का निवारण करने के लिये किया गया था। धारा 16 में अन्तर्विष्ट विधिक परिकल्पना की दृष्टि में अधर्मज सन्तानों को उनके माता-पिता की सम्पत्ति में उत्तराधिकार को शामिल करके सभी व्यावहारिक प्रयोजनों के लिये धर्मज माना जाना चाहिये। लेकिन, वे इस नियम के आधार पर किसी अन्य सम्बन्धी की सम्पत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं कर सकते, जो अपने प्रवर्तन में माता-पिता की सम्पत्ति तक सीमित हैं। धारा 16 (3) के संशोधन के साथ सामान्य विधिक दृष्टिकोण, कि विवाह की, जो शून्य और शून्यकरणीय हैं, सन्ताने स्वतः अधर्मज हैं, को पूर्ण रूप से परिवर्तित किया गया है और साथ ही विधि ऐसी सन्तानों के उनके माता-पिता की सम्पत्ति में अधिकार को मान्यता देती है। यह ऐसी सन्तानों को, जो किसी अन्य सन्तानों की तरह निर्दोष हैं, अधर्मजता के कलंक को हटाने के सामाजिक रूप से लाभदायक प्रयोजन को अग्रसारित करने के लिये है।

लेकिन, एक चीज को स्पष्ट बनाया जाना चाहिये कि संशोधित धारा 16 के अधीन दिया गया लाभ केवल उन मामलों में उपलब्ध है, जहां विवाह विद्यमान है किन्तु ऐसा विवाह अधिनियम के प्रावधानों की दृष्टि में शून्य या शून्यकरणीय है। संयुक्त पारिवारिक सम्पत्ति के मामले में ऐसी सन्तानें केवल उनके माता-पिता की सम्पत्ति में अंश का हकदार होंगी किन्तु वे अपने अधिकार पर दावा नहीं कर सकते। तार्किक रूप से पैतृक सम्पत्ति के विभाजन पर, ऐसी सन्तानों के माता-पिता के अंश में आने वाली सम्पत्ति को उनकी स्वअर्जित और आत्यन्तिक सम्पत्ति माना जाता है। संशोधन की दृष्टि में, कोई कारण नहीं पाया जाता कि क्यों ऐसी सन्तानों को ऐसी सम्पत्ति में कोई अंश नहीं होगा क्योंकि ऐसी सन्तानों को संशोधित विधि के अधीन विधिमान्य विवाह की धर्मज सन्तान से समीकृत किया जाता है। संशोधन के पश्चात् एकमात्र परिसीमा यह होना प्रतीत होती है कि ऐसी सन्तानें अपने माता-पिता के जीवनकाल में विभाजन की मांग नहीं कर सकते किन्तु वे अपने मातापिता की मृत्यु के पश्चात् इस अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं।

धारा 16 (3), जैसा कि संशोधित है, ऐसी सन्तानों की सम्पत्ति के अधिकार पर कोई निर्बन्धन अधिरोपित नहीं करती, सिवाय उनके माता-पिता की सम्पत्ति तक उसे सीमित करने के। इसलिये, ऐसी सन्तानों को उसके लिये अधिकार होगा, जो उनके माता-पिता की सम्पत्ति होती है, चाहे स्व-अर्जित हो या पैतृक।।

क्या ऐसा पुत्र सहदायिक हो सकता है-शान्ताराम बनाम दुर्गाबाई2 में बम्बई उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी सन्तान पिता की पृथक् सम्पत्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त कर सकती है परन्तु संयुक्त परिवार में पिता के हित में उसे कोई अंश नहीं प्राप्त होगा।

1. रेवा सिहप्पा बनाम मल्लिकार्जुन, 2011 (11) एस० सी० सी०१

2. 1987 बम्बई 182; (1980) 2 आन्ध्र प्र० 210.

3. हनमंथा बनाम धोण्डामाबाई, 1977 बम्बई 19; लक्ष्मीबाई बनाम लिम्बाबाई, 1983 बम्बई 222 में भी यही मत व्यक्त किया गया है,

वर्तमान हिन्दू विधि में शून्य या शून्यकरणीय विवाहों की सन्तान के बारे में स्थितियां निम्न हैं-

1. शून्य विवाह की सन्तान धर्मज मानी जाती है, चाहे शून्यकरण की डिक्री पारित की गयी हो अथवा नहीं।

2. शन्यकरणीय विवाह के शून्य होने की डिक्री पारित होने पर भी सन्तान धर्मज रहती है।

3. शून्य विवाह का शून्यकरणीय विवाह के शून्य होने की डिक्री पास होने पर विवाहों की सन्ताने केवल अपने माँ बाप की सम्पत्ति में ही हिस्सा पा सकती हैं । संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में उनका कोई अधिकार नहीं है। ऐसे विवाहों के पुत्र संयुक्त सम्पत्ति में सहदायिक नहीं हो सकते हैं। विपरीत मत त्रुटिपूर्ण है।

4. शून्य विवाह या शून्यकरणीय विवाहों की वे ही सन्ताने धर्मज होती हैं जो विवाह धारा 11 या धारा 12 के अन्तर्गत आते हैं। उदाहरण के लिये यदि विवाह वैवाहिक अनुष्ठानों में त्रुटि के कारण शून्य है, तो उन विवाहों की सन्तानें अधर्मज रहेंगी।

(2)

पृथक्करण (LLB Question Paper)

सामान्य रूप में विवाह का अर्थ होता है कि पक्षकार साथ-साथ रहकर दाम्पत्य जीवन व्यतीत करें। परन्तु यदि साथ-साथ रहना सम्भव न हो तो पक्षकार पृथक् हो सकते हैं। यह पृथक्करण कहलाता है। पृथक्करण दो भांति से हो सकता है-

(क) पक्षकारों की पारस्परिक सम्मति द्वारा, उसे स्वेच्छापूर्वक पृथक्करण भी कहते हैं, और

(ख) न्यायिक पृथक्करण, यह न्यायालय की डिक्री के द्वारा होता है।

पृथक्करण किसी भी भांति का हो उसका अर्थ खानपान और रहन-सहन का पृथक्करण होता है। पृथक्करण के पश्चात् पक्षकार दाम्पत्य जीवन व्यतीत करने के लिये बाध्य नहीं है, न मैथुन उनके लिये अनिवार्य है, न साहचर्य। पृथक्करण के पश्चात् सब मूल वैवाहिक दायित्व, कर्तव्य और अधिकार निलम्बित हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, उन वैवाहिक दायित्वों, अधिकारों या कर्तव्य को छोड़कर जिन्हें पृथक्करण के करार ने संजोए रखा है, अन्य सब निलम्बित हो जाते हैं। परन्तु पृथक्करण के पश्चात् पक्षकार पति-पत्नी ही रहते हैं, विवाह विघटित नहीं होता है। एक पक्षकार की मृत्यु के पश्चात् दूसरा उसकी सम्पत्ति में उत्तराधिकारी है। पृथक्करण के पश्चात् किसी पक्षकार द्वारा दूसरा विवाह करने पर वह द्विविवाह का अपराधी होता है।

न्यायालय द्वारा पृथक्करण की याचिका तभी स्वीकार होगी जब कि विवाह मान्य है।

स्वेच्छा से पृथक्करण में पृथक्करण की स्थिति का अन्त उसी समय हो जायेगा जब वे पृथक्करण के करार को विघटित कर दें और दाम्पत्य जीवन फिर से आरम्भ कर दें। न्यायिक पृथक्करण में यदि पक्षकार दाम्पत्य जीवन फिर आरम्भ करना चाहते हैं तो न्यायालय द्वारा पृथक्करण की डिक्री को रद्द करने की आज्ञा आवश्यक होगी। सामान्यत: न्यायालय पक्षकारों की प्रार्थना पर पृथक्करण की डिक्री को तुरन्त रद्द कर देते हैं। पक्षकार चाहे न्यायिक पृथक्करण के पश्चात् एक वर्ष या उससे अधिक की कालावधि समाप्त होने पर धारा “13 (1) (i-क) के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद की याचिका भी प्रेषित कर सकते हैं।

करार द्वारा पृथक्करण (Separation by Agreement) (LLB Study Material in PDF)

करार द्वारा पृथक्करण के सम्बन्ध में हिन्दू विवाह अधिनियम में कोई उपबन्ध नहीं है। करार द्वारा पृथक्करण वैवाहिक विधि का एक महत्वपूर्ण अंग है। हिन्दू विधि में विवाह अधिनियम के पूर्व और अब

1. संतराम बनाम दागूबाई, 1992 बम्बई 182; सुजाता बनाम जागर, 1992 आन्ध्र प्र० 291″

2. नरसिंह बनाम वसम्मा, 1976 आन्ध्र प्रदेश 77.

3. विश्वनाथ बनाम अंजली, 1975 कल० 45.

4. धारा 10 (2) हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955.

भी करार द्वारा पथक्करण मान्य रहा है। करार की सामान्य विधि करार द्वारा पृथक्करण पर लागू होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि पति-पली साथ-साथ रहना नहीं चाहते, किसी कारणवश, या हो सकता है अकारणही। परन्तु न तो वे विवाह-विच्छेद चाहते हैं और न ही न्यायिक पृथक्करण। यह भी हो सकता है। कि उन्हें विवाह-विच्छेद या न्यायिक पृथक्करण के कोई आधार उपलब्ध ही न हों।

करार द्वारा पृथक्करण में पृथक्-पृथक् रहना अनिवार्य है। करार वर्तमान पृथक्करण से सम्बन्धित होना चाहिये, भविष्य में नहीं। भविष्य में पृथक्करण के करार शून्य हैं, क्योंकि वे लोकनीति के विरुद्ध हैं। करार द्वारा पृथक्करण पक्षकारों के बीच अनुबन्ध है।

करार द्वारा पृथक्करण में भरण-पोषण का अधिकार समाप्त नहीं होता है। पृथक्करण करार के अन्तर्गत कभी यह शर्त भी होती है कि पक्षकार दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की मांग नहीं करेंगे। इस भांति की शर्त प्रवर्तित की जा सकती है, परन्तु न्यायालय उसे प्रवर्तित करने के लिये बाध्य नहीं है। वे चाहें तो वैसी शों के होते हुये भी दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री पारित कर सकते हैं यही बात अपत्यों के भरण-पोषण और अभिरक्षा सम्बन्धी शर्तों के बारे में है। पृथक्करण के करार में न्यायिक पृथक्करण के विरुद्ध शों के होते हुये भी न्यायालय न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित कर सकते हैं। इस बारे में मतभेद है कि पृथक्करण करार के अन्तर्गत भरण-पोषण की शतों को शीलभ्रष्टा पत्नी प्रतिपादित कर सकती है या नहीं प्रतीत यह होता है कि यदि भरण-पोषण की शर्त है तो पत्नी शीलभ्रष्टा होने पर भी भरण-पोषण प्राप्त कर सकती है। परन्तु यदि परोक्ष या अपरोक्ष रूप से शर्त यह है कि वह भरण-पोषण की तभी अधिकारिणी है जब वह शीलवती रहती है तो शीलभ्रष्टा होने पर वह भरण-पोषण की शर्त को प्रवर्तित नहीं करा सकती है।

क्या पृथक्करण के करार के अन्तर्गत निर्धारित भरण-पोषण की रकम को न्यायालय घटा-बचा सकता है? आन्ध्र प्रदेश और मद्रास न्यायालयों ने इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक दिया है और कहा है कि हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण की धारा 25 के अन्तर्गत उन्हें ऐसा अधिकार है। पृथक्करण के करार को कपट, भूल या बल-प्रयोग के आधार पर विघटित कराया जा सकता है। उदाहरणार्थ : यदि पथक्करण के करार के समय पक्षकारों का विश्वास था कि उनका विवाह विधिमान्य है, परन्तु करार के पश्चात् उन्हें पता चला कि उनका विवाह शून्य है। ऐसी स्थिति में करार को विघटित कराया जा सकता है। परन्तु यदि यह पता चलता है कि विवाह शून्यकरणीय है तो करार को विघटित नहीं कराया जा सकता है।

न्यायिक पृथक्करण-सामान्यतया न्यायिक पृथक्करण किसी आधार पर ही प्राप्त किया जा सकता है कभी-कभी ऐसा होता है कि न्यायिक पृथक्करण और विवाह-विच्छेद एक आधार पर ही होते हैं। कभी ये आधार पृथक-पृथक होते हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत सन् 1976 के संशोधन के पश्चात विवाह-विच्छेद और न्यायिक पृथक्करण के आधार एक हैं।

न्यायिक पृथक्करण का अन्त या तो पक्षकारों के पुनः मिलन में होता है या विवाह-विच्छेद में। कभीकभी ऐसा भी होता है कि पक्षकार जीवन भर पृथक्करण में रहते हैं।

पृथक्करण और पृथक् निवास एवं भरण-पोषण-हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 18(2) के अन्तर्गत कुछ आधार के होने पर पत्नी, पति से पक रह सकती है और भरण-पोषण की मांग कर सकती है। यह उपबन्ध हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत न्यायिक पथक्करण के उपबन्ध से भिन हो सकता है कि किसी परिस्थिति में पत्नी, पति से न्यायिक पृथक्करण न ले परन्तु वह उसके

1. देखें, भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, धारा 23.

2. धीरूमल बनाय राजाम्मल, (1967)2 मद्रास लॉ जर्नल 484..

3. किशनजी बनाम लक्ष्मण, 151 बम्बई 286; सत्यभामा बनाम केशवाचार्य, (1915) 39 मद्रास 354.

4.बरा बनाम बरा, 1966 मद्रास 428: शशी बनाम क्षेत्र, 1964 आन्ध्र प्रदेश617.

5. एम्स बनाम एडम्स, (1941) किग्स बेच 536 (अंग्रेजी निर्णय

6 धारा 18, विशेष विवाह अधिनियम, 1954,

7. रोहिणी बनाम नरेन्द्र, 1972 सु० का० 459,

8. धारा 10.

साथ भी रहना चाहे: यह भी हो सकता है कि न्यायिक पृथक्करण का आधार ही उपलब्ध न हो। इन समितियों में यदि उसे हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम की धारा 18 (2) के अन्तर्गत कोई आधार उपलब्ध है तो वह पृथक रहकर भरण-पोषण की मांग कर सकती है। जब न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित हो जाती है तो पक्षकार एक दूसरे के साथ दाम्पत्य जीवन व्यतीत करने के लिये, जब तक डिक्री निरस्त नहीं कर दी जाती है, बाध्य नहीं है। धारा 18 (2) के अन्तर्गत यह बात नहीं है। पृथक् रहने के आधार के समाप्त होने के साथ ही पत्नी दाम्पत्य जीवन का पुनःस्थापन करने के लिये बाध्य है। उदाहरणार्थ : एक पत्नी पति से इस आधार पर पृथक् निवास कर रही थी कि उसकी दूसरी पत्नी है। दूसरी पत्नी के मरते ही या दूसरी पत्नी के साथ विवाह-विच्छेद होते ही आधार समाप्त हो जाता है और वह पति के साथ रहने को बाध्य है। न्यायिक पृथक्करण की डिक्री सर्वबन्धक (In rem) निर्णय है और वह तब तक पारित रहती है जब तक कि उसे निरस्त न कर दिया जाये। जबकि धारा 18 (2) के अन्तर्गत निर्णय या आज्ञा वैयक्तिक है। धारा 18 (2) के अन्तर्गत पृथक् रहने वाली पत्नी जब चाहे तब पति के साथ पुनः दाम्पत्य सम्बन्ध स्थापित कर सकती है। न्यायिक पृथक्करण की कार्यवाही में और डिक्री पारित होने के पश्चात् भी न्यायालय को पक्षकारों के भरण-पोषण और अपत्यों के सम्बन्ध में अभिरक्षा और भरण-पोषण की डिक्री पारित करने की अधिकारिता है जबकि धारा 18 (2) के अन्तर्गत न्यायालय को वैसी कोई अधिकारिता नहीं है। न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित होने के पश्चात् एक वर्ष या उससे अधिक की कालावधि तक यदि दाम्पत्य अधिकारों की पुनः स्थापना नहीं हुयी है तो कोई भी पक्षकार विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकता है। धारा 18 (2) के अन्तर्गत पृथक् रहने पर यह उपबन्ध उपलब्ध नहीं है।

न्यायिक पृथक्करण और विवाह-विच्छेद-न्यायिक पथक्करण और विवाह-विच्छेद में मूलभूत अन्तर है। विवाह-विच्छेद को ही समाप्त कर देता है। पक्षकारों के बीच विवाह के अन्तर्गत उपबन्ध में सब कर्तव्य, अधिकार और दायित्व समाप्त हो जाते हैं। पक्षकार पति-पत्नी नहीं रहते हैं और वे अपना पृथक्पृथक् जीवन व्यतीत करने के लिये स्वतन्त्र हो जाते हैं। उनके बीच कोई सम्बन्ध नहीं रहता है। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 25 के अन्तर्गत पक्षकारों के भरण-पोषण की कार्यवाही और धारा 26 के अन्तर्गत अपत्यों की अभिरक्षा और भरण-पोषण की कार्यवाही पक्षकारों के बीच विवाह-विच्छेद और न्यायिक पृथक्करण के पश्चात् भी हो सकती है। दूसरी ओर न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के पश्चात् भी पक्षकार पति-पत्नी रहते हैं, विवाह विद्यमान रहता है केवल दाम्पत्य सम्बन्ध निलम्बित रहते हैं।

न्यायिक पृथक्करण और विवाह-विच्छेद की याचिकायें-विवाह-विच्छेद और न्यायिक पृथक्करण की अपेक्षा बड़ा अनुतोष है। अत: यदि विवाह-विच्छेद की याचिका में विवाह का आधार स्थापित न हो सके और न्यायिक पृथक्करण का आधार स्थापित हो जाये तो न्यायालय को यह विवेक है कि वह न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित कर दे। चन्दर बनाम सुदेश में कुछ विचित्र परिस्थितियां सामने आयी हैं। विवाह-विच्छेद के लिये याचिका जनवरी सन् 1966 में प्रेषित की गयी। जिला न्यायालय ने सितम्बर 25 सन् 1967 को विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित कर दी। अपील होने पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने उस डिक्री को न्यायिक पृथक्करण की डिक्री में बदल दिया क्योंकि उनके अनुसार विवाहविच्छेद का आधार पूर्णतया सिद्ध नहीं हुआ है। लेटर्स पेटेण्ट अपील होने पर न्यायालय ने कहा कि अपीलीय न्यायाधीश की डिक्री उस दिन से मान्य होगी जिस दिन से जिला न्यायाधीश ने डिक्री पारित की। लेटर्स पेटेन्ट की सुनवाई की तिथि तक दो वर्ष की कालावधि पूरी हो गयी थी। अतः उच्च न्यायालय ने कहा कि वह हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 18 (1-क) के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित कर सकते हैं और वैसी डिक्री पारित कर दी गयी इसका तात्पर्य यह हुआ कि न्यायालय ने विवाह-विच्छेद का डिक्रा उस आधार पर पारित की जो याचिका प्रेषित करते समय विद्यमान नहीं था।

1. अन्नामलाई बनाम पेरुमयी, 1965 मद्रास 139; रोहणी बनाम नरेन्द्र, 1972 सु० को० 459.

2. हिन्दू विवाह अधिनियम, 13 (2); देखें, गोधाबाई बनाम नारायण, 1972 मध्य प्रदश

3. भगवान बनाम अमर कौर, 1962 पंजाब 144; वीरारेड्डी बनाम किस्तम्मा, 1969 म

4. 1971 दिल्ली 208..

5. आर भी देखें, वीरारेडी बनाम किस्तम्मा, 1969 मद्रास 235.

विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा इस नियम को वैधानिक रूप दे दिया गया है, एक नई अन्त:स्थापित धारा 13-क द्वारा, इस नियम के कुछ अपवाद भी दिये गये हैं। इस धारा के अन्तर्गत विवाहविच्छेद की डिक्री द्वारा विवाह के विघटन के लिये अर्जी इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में (निम्न आधारों को छोड़कर, धर्म-सम्परिवर्तन, संसार-त्याग और मृत्यु की उपधारणा) यदि न्यायालय मामलों की परिस्थिति को ध्यान में रखते हुये डिक्री पारित कर सकता है।

न्यायिक पृथक्करण के आधार (LLB Notes PDF Download)

विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के संशोधन द्वारा न्यायिक पृथक्करण और विवाह-विच्छेद के आधार एक बना दिये गये हैं। अत: इन आधारों की विवेचना हम भाग (3) विवाह-विच्छेद में करेंगे।

(3)

विवाह-विच्छेद

विवाह-विच्छेद विवाह को विघटित कर देता है। पक्षकारों के बीच सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं और वे पुनः अविवाहित की प्रास्थिति प्राप्त करते हैं। विवाह की अकृतता का सम्बन्ध विवाह के पूर्व की अवबाधाओं से है, विवाह-विच्छेद का सम्बन्ध विवाह के पश्चात् उत्पन्न होने वाली अवबाधाओं से है। धारणा यह रही है कि इन अवबाधाओं के कारण निर्दोष पक्ष के लिये दोषी पक्षकार के साथ वैवाहिक जीवन व्यतीत करना असम्भव होगा, अत: यह विवाह के विघटन की याचिका प्रेषित कर सकता है। इन अवबाधाओं को ही विवाह-विच्छेद के आधार या हेतु कहते हैं। कुछ विधि व्यवस्थाओं में विवाह-विच्छेद के आधार न्यूनतम हैं, कुछ में अनेक हैं।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 प्रारम्भ में विवाह प्रारम्भ में विवाह-विच्छेद दोषिता सिद्धान्त पर आधारित था। सन् 1964 के संशोधन द्वारा विवाह-भंग सिद्धान्त को मान्यता दी गयी है। सन् 1978 के संशोधन द्वारा पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद के सिद्धान्त को मान्यता दी गयी है। आज स्थिति यह है कि हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद के तीनों सिद्धान्तों को स्वीकारा गया है। साथ ही साथ रूढ़िगत विवाह-विच्छेद और विशेष अधिनियमों द्वारा मान्य विवाह-विच्छेद को भी संजोये रखा गया

इस भाग में हम विवाह-विच्छेद की हिन्दू विधि की विवेचना निम्न रूप में करेंगे

(क) दोषिता के अधार (Guilty Grounds)-

(i) वे आधार जिन पर पति-पत्नी दोनों ही विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित कर सकते हैं; और

(ii) वे आधार जिन पर केवल पत्नी ही विवाह-विच्छेद की याचिका पेश कर सकती है।

(ख) विवाह-भंग का आधार;

(ग) पारस्परिक सम्मति का आधार;

(घ) रूढ़िगत और विशेष अधिनियमों के अन्तर्गत मान्य विवाह-विच्छेद।

दोषिता का आधार (LLB Study Material)

सन 1976 के संशोधन के पश्चात् धारा 13 (1) के अन्तर्गत अब विवाह-विच्छेद के दो अन्य दोषिता आधारों को मान्यता दी गई है, जिन पर पति-पत्नी दोनों ही विवाह-विच्छेद या न्यायिक पृथक्करण की मांग कर सकते हैं। 1976 के संशोधन के पश्चात् 13 (2) चार दोषिता आधारों को निर्धारित करती है जिन पर ली ही विवाह-विच्छेद या न्यायिक पृथक्करण की मांग कर सकती है। यह ध्यान देने की बात है। कि विवाह-विच्छेद अन्य आधारा (विवाह-भग के आधार पर या पारस्परिक सम्मति द्वारा) पर न्यायिक पृथक्करण की मांग नहीं की जा सकती है।

धारा 13 (1) में दिये गये विवाह-विच्छेद के कुछ वे आधार हैं जो प्रायः सभी देशों की विधियों में पाये जाते हैं, जैसे : जारकर्म, अभित्यजन, क्रूरता, विकृतचित्तता, रतिज रोग, कुष्ठ रोग, बलात्कार, गुदा-मैथुन, पशुअपना कछ आधार पूर्णतया भारतीय आधार जैसे संसार त्यागना, धर्म परिवर्तन इत्यादि। यदि कोई आधार दोषिता आधारों की परिसीमा में नहीं आता है तो उस आधार पर विवाह-विच्छेद नहीं हो सकता है।

जवाबदावे में लगाये गये दोषों को याचिकाकार विवाह-विच्छेद के आधार नहीं बना सकता है।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि जो आधार अधिनियम में विवाह-विच्छेद का आधार नहीं है वह विवाह-विच्छेद का आधार नहीं हो सकता है।

हम अब प्रत्येक आधार की विवेचना करेंगे।

अभित्यजन (Desertion) (LLB Notes)

अभित्यजन की सबसे संक्षिप्त परिभाषा (चाहे उतनी सुतथ्य न हो)-एक पक्षकार द्वारा दूसरे का अकारण ही और बिना दूसरे की सम्मति के स्थायी रूप से निराकरण करना। अभित्यजन एक स्थान-मात्र का परित्याग नहीं है, बल्कि एक स्थिति का परित्याग है। परित्याग कृत्य-मात्र नहीं है, बल्कि एक आचरण है। अभित्यजन एक कठिन विधिक संप्रत्यय (Concept) है। हम इस संप्रत्यय को उसके समस्त तत्वों के विवरण द्वारा समझने का प्रयत्न करेंगे।

“भगोड़ा” शब्द से सभी लोग परिचित हैं। सेना में से भागने वाले को भगोड़ा कहा जाता है। यह वह सैनिक है जो अपने कर्तव्यों से या नियुक्त स्थान से भाग खड़ा होता है। अगर हम भगोड़े की समता उस पति या पत्नी से करें जो वैवाहिक घर से या वैवाहिक दायित्वों से भाग खड़ा होता है तो हम बहुत सीमा तक अभित्यजन शब्द को समझने में समर्थ हो सकते हैं। भाग खड़े होने का एक रूप है, जब पत्नी या पति वैवाहिक घर को स्थायी रूप से छोड़कर चले जाते हैं; दूसरा रूप वह है जब पत्नी या पति रहते तो उसी घर में है, परन्तु स्थायी रूप से अपने वैवाहिक दायित्वों और कर्तव्यों का पालन करना छोड़ देते हैं। एक पक्षकार द्वारा दूसरे की जानबूझकर उपेक्षा करना भी अभित्यजन की परिभाषा में आता है। इस भांति अभित्यजन निम्न प्रकार का हो सकता है

(1) वास्तविक अभित्यजन,

(2) आन्वयिक अभित्यजन, और

(3) जानबूझकर उपेक्षा करना।

वास्तविक अभित्यजन (LLB Notes in Hindi)

वैवाहिक विधि के अन्तर्गत अभित्यजन के निम्न तत्व हैं-

(क) अभित्यजन का तथ्य,

(ख) अभित्यजन की इच्छा,

(ग) अभित्यजन किसी औचित्यपूर्ण कारण के बिना होना चाहिये,

(घ) अभित्यजन याचिकाकार की सम्पत्ति से नहीं होना चाहिये, और

(ङ) अभित्यजन की दो वर्षों की कालावधि पूर्ण होनी चाहिये।

प्रथम दो तत्व प्रतिपक्षी से सम्बन्ध रखते हैं। अर्थात् अभित्यजन करने वाले पक्षकार ने दूसरे पक्षकार का स्वच्छा से परित्याग कर दिया है। तीसरे और चौथे तत्व दूसरे पक्षकार से सम्बन्ध रखते हैं, अर्थात् उसन आभत्यजन के लिये अपनी सम्पत्ति नहीं दी है और अभित्यजन के लिये कोई औचित्यपूर्ण हेतु भी नही दिया

1. शकुन्तला बनाम अमरनाथ, 1982 पं० और० ह० 221.

2. सदन सिंह बनाम रेशम, 1982 इला 52.

3., वी० बनाम एच० 1993 बम्बई 70.

है। अन्तिम तत्व अभित्यजन की वैधानिक आवश्यकता है कि अभित्यजन की कालावधि याचिका पेखित करने के पूर्व पूर्ण हो जानी चाहिये। इन पांचों तत्वों को प्रमाणित करने का भार याचिकाकार पर है। अभित्यजन के लिये पति पत्नी का साथ रहना, चाहे कितने भी समय के लिये, अनिवार्य है। यदि वे कभी साथ नहीं रहे तो अभित्यजन न होगा।

अभित्यजन का तथ्य और इच्छा-वास्तविक अभित्यजन में यह आवश्यक है कि प्रतिपक्षी ने वैवाहिक घर का परित्याग किया है। उदाहरणार्थ : मान लीजिये कि एक पति प्रत्येक रात्रि को सोने से पूर्व यह पूर्णरूपेण निश्चय करता है कि दूसरे दिन प्रात: वह घर को सदैव के लिये छोड़ कर चला जायेगा, परन्तु वह घर छोड़ कर जाता नहीं है, दिन प्रतिदिन घर पर ही बना रहता है। यहां पर पति को घर छोड़ने की इच्छा तो है पर उसने घर छोडा नहीं है, अत: अभित्यजन का दोषी नहीं हो सकता है। पत्नी इस संभ्रम (Delusion) से पीडित है कि यदि वह पति के साथ रहेगी तो उसकी मत्य हो जायेगी, अत: वह पति को छोड़कर मायके चली गयी। न्यायालय ने कहा कि वह अभित्यजन की दोषी है। उसने घर अपनी इच्छा से छोड़ा है परन्तु संभ्रम से ग्रसित होकर छोड़ा है। एक दूसरा उदाहरण लें, किसी कार्यवश पति पत्नी से कहकर चला जाता है कि वह तीन चार माह में वापस आयेगा। परन्तु वह वहां बीमार पड़ जाता है या कार्यवश उसे वहां रुकना पड़ता है और इस बीच दो वर्ष की अवधि पूर्ण हो जाती है और पति बम्बई में ही रहता है। यहां पर हम पाते हैं कि अभित्यजन का तथ्य तो विद्यमान है, परन्तु इच्छा विद्यमान नहीं है। अभित्यजन की इच्छा का होना अनिवार्य है। अत: पति अभित्यजन का दोषी नहीं है। इस भांति क्षणिक क्रोध या भावावेश या आवेश में पति या पत्नी द्वारा घर छोड़कर चले जाना अभित्यजन की परिभाषा में नहीं आयेगा। अभित्यजन तब ही गठित होगा जबकि पति या पत्नी एक दूसरे को अभित्याग का स्थायी इच्छा से छोड़ दे।

अभित्यजन के गठन के लिये प्रथम दो तत्वों, अभित्याग की इच्छा और तथ्य का साथ-साथ विद्यमान होना अनिवार्य है। जिस भी क्षण वे विद्यमान हो जाते हैं अभित्यजन गठित हो जाता है। यह ध्यान देने की बात है कि यह आवश्यक नहीं है कि इच्छा तथ्य से पहले हो, तथ्य पहले से ही विद्यमान हो; इच्छा बाद में हो जाये। ऐसी स्थिति में इच्छा और तथ्य के साथ-साथ विद्यमान होने के क्षण से ही अभित्यजन का दोष हो जाता है। उदाहरण के लिये, मान लीजिये कि एक व्यक्ति किसी व्यवसाय के प्रशिक्षण के लिये एक वर्ष के लिये बाहर चला जाता है, उस समय उसकी इच्छा यही है कि वह प्रशिक्षण के पश्चात् वापस आ जायेगा। परन्तु छ: मास की अवधि के पश्चात् वह यह निश्चय कर लेता है कि वह लौटेगा नहीं। उसी क्षण से वह अभित्यजन का दोषी हो जाता है।

तीर्थराम बनाम पार्वती के मामले में पत्नी पति से तंग आकर पृथक् घर में रह रही थी। वह यह चाहती थी कि उसका पति पृथक् गृह बसाये, तब वह उसके साथ रहेगी। राजस्थान उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि पत्नी अभित्यजन की दोषी नहीं है।

विनय बनाम निर्मला में पत्नी ने बिना पति की अनुमति के पति-गृह छोड़ दिया। वह पति और अपने सास-ससुर, नन्द-देवरों के साथ दुर्व्यवहार करती थी, और गाली-गलौज भी किया करती थी और उसने घर में स्वयं को आग लगाने का प्रयत्न भी किया। न्यायालय ने कहा कि इस आचरण से घर छोड़ने की इच्छा स्पष्ट हो जाती है। पत्नी द्वारा अकारण पतिगृह का त्याग कर देना अभित्यजन है।10।

1. देखें विपिनचन्द्र बनाम प्रभावती, 1957 सुप्रीम कोर्ट 176; रोहिणी बनाम नरेन्द्र, 1972 सु० को० 459.

2. सावित्री पांडे बनाम प्रेमचन्द्र पांडे, 2002 सु० को० 591.

3. मेरी बनाम मेरी, (1963) 3 आल इंग्लैण्ड रिपोर्ट्स 766.

4. शान्ति बनाम गोविन्द, 1983 राज० 211; गोपाल बनाम पुष्पवेणी, 1982 कर्नाटक 329.

5. रुक्मणी बनाम श्रीनिवास, 1984 कर्नाटक 131.

6. अध्यात्म भट्टर अस्वा बनाम अध्यात्म भट्टार श्रीदेवी, 2002 सु० को०88.

7. 1987 देलही 79.

8. 1995 राज० 86.

9. रवीन्द्र बनाम कुसुम, 1991 गौहाटी 54.

10. 1957 सुप्रीम कोर्ट 176.

अभित्यजन के सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का विपिन चन्द्र बनाम प्रभावती एक महत्वपूर्ण निर्णय है। जिसमें अभित्यजन के लगभग सभी तत्वों पर प्रकाश डाला गया है। यह मुकदमा बम्बई हिन्दू विवाहविच्छेद, 1947 के अन्तर्गत था, जहां पर चार वर्ष का अभित्यजन विवाह-विच्छेद का आधार था। सन् 1942 में विवाह करने के पश्चात् चार वर्ष तक पक्षकार सुखपूर्वक बम्बई में वैवाहिक घर बसा कर रह रहे थे। पति का परिवार संयुक्त परिवार था, और वैवाहिक घर में माता-पिता और दो अविवाहिता बहनें भी रहती थीं। इस बीच उनके एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ। सन् 1946 में परिवार का एक मित्र महेन्द्र भी वहां आकर रहने लगा। जनवरी 23, 1947 में पति व्यापार के सिलसिले में लन्दन गया। मई, 1947 में वापस लौटने पर उसके पिता ने बताया कि उसकी पत्नी के महेन्द्र के साथ अनुचित सम्बन्ध हो गये हैं और उन्होंने महेन्द्र के नाम पत्नी द्वारा लिखे गये कुछ पत्र भी पति को दिये। पति ने पत्नी से स्पष्टीकरण मांगा। पत्नी ने कहा कि वे पत्र उसके लिखे हुये नहीं हैं और उस पर झूठा लांछन लगाया जा रहा है। दूसरे दिन 24 मई, 1947 को वह अपनी चचेरी बहन के विवाह में सम्मिलित होने का बहाना (विवाह लगभग डेढ़ माह पश्चात् होना था) बनाकर अपने पिता के घर चली गयी। पति के कथनानुसार वह उसके पश्चात् लौटकर नहीं आयी। 25 जुलाई, 1947 को पति ने अपने वकील द्वारा पत्नी को एक पत्र भेजा जिसके अन्तर्गत उसे महेन्द्र के साथ अनुचित सम्बन्ध रखने का दोषी ठहराया गया और कहा कि वह पुत्र को तुरन्त उसके पास भेज दे। नवम्बर, 1947 में पति की माता ने उससे कहा कि उसकी पत्नी प्रभा 4 या 5 दिनों में बम्बई आ रही है। इस पर पति ने पत्नी के पिता को एक तार दिया। ‘प्रभा को मत भेजो….।” 1951 में पति ने विवाह-विच्छेद की याचिका पत्नी के अभित्यजन के आधार पर प्रेषित की। पत्नी ने अपने लिखित कथन में महेन्द्र के साथ अनुचित सम्बन्धों से इन्कार करते हये कहा कि लन्दन से लौटने के पश्चात् पति के अभद्र और अशिष्ट व्यवहार के कारण उसे अपनी इच्छा के विरुद्ध वैवाहिक घर छोड़ना पड़ा था।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह तथ्य है कि पत्नी ने वैवाहिक घर 24 मई, 1947 को छोड़ा था। परन्तु प्रश्न यह है कि क्या 24 मई, 1947 को घर छोड़ना अभित्यजन की संज्ञा में आता है? दूसरे शब्दों में कि क्या पत्नी ने घर का अभित्याग इस स्थायी इच्छा के साथ किया था कि वह घर वापस कभी नहीं आयेगी? क्या अभित्यजन पति की इच्छा के विरुद्ध और बिना किसी औचित्यपूर्ण कारण के किया गया है? न्यायाधीश श्री सिन्हा ने कहा कि इस सम्बन्ध में दो महत्वपूर्ण बातें हैं, प्रथम; घर का अभित्यजन, अभित्यजन के सम्बन्ध में तभी महत्व रखता है जबकि वह कभी न वापस आने की इच्छा से किया गया हो। यह इच्छा आचरण या अन्य भांति के अभित्याग द्वारा जानी जा सकती है। द्वितीय; वह पक्षकार जो अपनी स्वेच्छा से दाम्पत्य जीवन का अन्त करने के लिये उत्तरदायी है, वही अभित्यजन का दोषी है।

माननीय न्यायाधीश ने कहा कि इस सबूत का भार याचिकाकार पर है कि अभित्यजन की समस्त वैधानिक कालावधि में प्रत्यर्थी अकारण ही अभित्यजन में रही है। परन्तु यदि यह सिद्ध हो जाये कि इस कालावधि में याचिकाकार ने यह इंगित किया कि वह लौटना भी चाहेगी तो भी उसके लिये घर में कोई स्थान नहीं है या प्रत्यर्थी द्वारा घर लौटने के प्रत्येक प्रयत्न को उसने निष्फल किया है, तो फिर वह यह नहीं कह सकता है कि प्रत्यर्थी समस्त कालावधि में अभित्यजन में रही है। वर्तमान मामले में जून, 1947 के अन्त में पत्नी की चचेरी बहन का विवाह हो चुका था और वह जुलाई में पति के घर वापस आ सकती थी. परन्त जुलाई, 15 को पति ने वकील द्वारा नोटिस भेजी। उसके पश्चात् भी पत्नी के घर वापस लौटने के प्रयत्नों को उसने पत्नी के पिता को यह तार देकर कि प्रभा को वापस मत भेजो, विफल कर दिया। इन तथ्यों पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मई 24, 1947 को पत्नी ने पति का घर छोड़ दिया, उसके लिये पति किसी भी भांति उत्तरदायी नहीं है न ही उसने (पति ने) घर छोड़ने का कोई औचित्यपूर्ण कारण ही पत्नी को उपलब्ध कराया और न ही पत्नी उसकी सम्मति से गयी। परन्तु अपने पिता के घर कुछ माह रहकर वह अपने पति के घर लाटने की इच्छुक थी, उसकी इस इच्छा और घर लौटने के उसके प्रयत्नों को पति ने विफल कर दिया, इसलिये वह अभित्यजन का दोषी नहीं है।

अत: अभित्यजन सिद्ध करने के लिये याचिकाकार को यह सिद्ध करना होगा कि समस्त वैधानिक आध में प्रत्यर्थी में अभित्यजन की इच्छा विद्यमान थी। यदि उस कालावधि के पूर्ण होने के पूर्व प्रत्यर्थी

1. नीतू बनाम कृष्णलाल, 1990 दिल्ली 1 में भी लगभग यही स्थिति थी.

घर आने की इच्छा करता है; और प्रयत्न करता है, परन्तु याचिकाकार उसे आने नहीं देता है तो फिर वह अभित्यजन का दोषी नहीं है।

उच्चतम न्यायालय को अभित्यजन के तत्वों पर अपने विचार करने का अवसर लक्ष्मण बनाम राधा में फिर आया। यह मुकदमा हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत था। यहां पर भी पत्नी पति के संयुक्त परिवार में रहती थी। नवम्बर 14, 1946 को विवाह करके पक्षकार फरवरी, 1954 तक बम्बई में अपने वैवाहिक घर में रहे थे। इस बीच उनके एक पुत्र ने भी जन्म लिया। पत्नी के माता-पिता धनाढ्य थे। पत्नी फरवरी, 1954 में घर छोड़कर पूना चली गयी और उसके पश्चात् दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक स्थानों पर रही। इसी समय पति-पत्नी को बराबर पत्र द्वारा कहता रहा कि वह घर वापस आ जाये। हर पत्र के उत्तर में वह यह कहती रही है कि उसका स्वास्थ्य ठीक होते ही वह वापस आ जायेगी। परन्तु वह वापस नहीं आयी। कुछ पत्रों में पति ने पत्नी पर शीलभ्रष्टा होने का लांछन भी लगाया। अन्त में पति ने पत्नी के अभित्यजन के आधार पर न्यायिक पृथक्करण की याचिका प्रेषित कर दी।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सभी तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि अभित्यजन गठित होता है या नहीं। वर्तमान मामले में यह स्पष्ट है कि पत्नी ने पति की सम्मति से घर नहीं छोड़ा है बल्कि अपनी स्वेच्छा से छोड़ा है। इस पूरी कालावधि में अभित्यजन का तथ्य और इच्छा दोनों ही पत्नी की ओर से विद्यमान रहे हैं। पत्नी द्वारा घर वापस लौटने की बात लिखना एक झूठा आश्वासन-मात्र था। वह वापस लौटकर आना कभी भी नहीं चाहती थी। पति द्वारा शीलभ्रष्टा होने के लांछन का उस पर कुछ प्रभाव नहीं हुआ और न ही उसने लौटने में कोई बाधा डाली। अत: उच्चतम न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पत्नी अभित्यजन की दोषी है।

भारतीय न्यायालयों के समक्ष अभित्यजन के आधार पर न्यायिक पृथक्करण के अधिकांश मुकदमें इसी आधार पर हैं कि पत्नी ने घर का परित्याग कर दिया और पत्नी ने घर इसलिये छोड़ा है कि वह पति के संयुक्त परिवार में रह पाने में असफल हुयी। रोशन लाल बनाम बसन्त कुमारी2 में पत्नी ने घर इसलिये छोड़ दिया कि वह घर में पति के माता-पिता के साथ रहने को तैयार नहीं थी। पति ने इस स्थिति से उबरने के लिये पत्नी के लिये एक पृथक् घर बसाया था परन्तु स्थिति सुधरी नहीं, पत्नी पति के साथ पृथक् घर में रहना चाहती थी कि उसका पति अपने माता-पिता के साथ सभी सम्बन्ध तोड़ ले। अपने माता-पिता का इकलौता बेटा होने के कारण पति इसके लिये तैयार नहीं था। पत्नी पति का घर छोड़कर मायके चली गयी। यह अभित्यजन का स्पष्ट मामला था। लगभग यही बात कृष्णा बाई बनाम पूनम चन्द्र में थी। पति के यह कहने पर वह अपने माता-पिता को छोड़कर उसके पृथक् घर बसाने को तैयार नहीं है, पत्नी अपने मायके चली गयी।

रोहणी कमारी बनाम नरेन्द्र सिंह भी अभित्यजन का एक अच्छा मुकदमा है। पक्षकार 1954 में विवाह संस्कार में बंधे और 1957 तक साथ-साथ सुखपूर्वक रहे। परन्तु 1957 में पत्नी अपने वस्त्राभूषणों माहित अपने मायके चली गई। पति के अनेक बुलावों पर भी वह वापस नहीं आई। पत्नी के कथनानुसार उस अवधि में जब पति के घर रही, पति ने उसके साथ अभद्र और अशिष्ट व्यवहार किया, जिसके फलस्वरूप सेयरोग ने ग्रस लिया। उस रोग की चिकित्सा हेतु ही उसे श्वसुर ने उसे मायके भेजा था। साथ ही उसने यह भी कहा कि पति ने दूसरा विवाह भी कर लिया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अभित्यजन का अर्थ पथक निवास या पृथक रहना नहीं बल्कि अभित्यजन के लिये यह अनिवार्य है कि दाम्पत्य जीवन और दाम्पत्य संबंधों को स्वेच्छा द्वारा स्थाई समाप्त कर दिया है। पति के दूसरे विवाह करने मात्र से अभित्यजन

1. 1954 सुप्रीम कोर्ट 40.

2. (1967) 68 पंजाब लॉ रिपोर्ट्स 566.

3.(1967) मध्य प्रदेश 200.

4 और देखें मंगलाबाई बनाम देवराव, 1962 मध्य प्रदेश 198; और, काको बनाम अजीत. 1960 पंजाब 328; इन्दू बनाम राजेश्वर, 1982 दिल्ली 344.

5. 1972 सु० को० 459.

समाप्त नहीं होता है। पति के दूसरे विवाह का यदि पत्नी पर कोई प्रभाव ही न पड़े, तो वह तथ्य किसी महत्व का नहीं है, यह वास्तविक अभित्यजन का अच्छा उदाहरण है।

मातो बनाम सन्तराम में पत्नी ने कहा कि पति ने उसे मारपीट कर घर से निकाल दिया है। पत्नी ने यह भी कहा कि पति जारकर्म में रह रहा है। पति ने उत्तर में कहा कि पत्नी स्वयं ही घर छोड़कर चली गई थी और उसके प्रयत्नों के बावजूद वापस नहीं आयी। उसने यह भी कहा कि उसने जारकर्म किया है। प्रतिउत्तर में पत्नी ने कहा कि पति ने उसके साथ सदैव ही क्रूरता का व्यवहार किया है, यहाँ तक कि उसके साथ मैथुन करने से भी इन्कार किया है और इसी कारण वह जारकर्म करने के लिये बाध्य हुई। न्यायालय ने कहा कि पति द्वारा मैथुन से इन्कार पत्नी के जारकर्म का औचित्यपूर्ण कारण नहीं हो सकता है। उसका जारकर्म उसके इस कथन के भी प्रतिकूल है कि पति ने क्रूरता का व्यवहार किया है और उसको घर से निकाल दिया है। पत्नी यह सिद्ध करने में सफल नहीं हो सकी कि पति ने उसे घर से निकाल दिया। तुषार बनाम चौधरी में विवाह सन् 1951 में हुआ था और वह सितम्बर 1952 तक वैवाहिक घर में रही उसके पश्चात् वह घर छोड़कर चली गई। सन् 1955 में पत्नी ने न्यायिक पृथक्करण की यचिका यह कहकर प्रेषित की पति की क्रूरता के कारण 1952 में उसे घर छोड़ देना पड़ा। उसके पश्चात् पति ने उसे कभी भी वापस बुलाने का प्रयत्न नहीं किया, पति करता और अभित्यजन का दोषी है। पर यह सिद्ध होने पर कि पति ने कोई भी क्रूरता का व्यवहार नहीं किया और स्वेच्छा से ही घर छोड़कर चली गई पत्नी की याचिका खारिज कर दी गई।

अशोक कुमार बनाम प्रेमी3 में विवाह के एक वर्ष के पश्चात् पति-पत्नी को एक पुत्र उत्पन्न हुआ और उसके पश्चात् आपस में झगड़े होने आरम्भ हो गये। वे एक दूसरे पर जारता का दोष मढ़ते थे। पाँच महीने के पुत्र को छोड़कर पत्नी पति-गृह से चली गई। उसने पति पर लांछन लगाते हुये कई पत्र लिखे। न्यायालय ने कहा कि नि:सन्देह ही उसने पति-गृह को त्यागा है। पति-गृह त्यागने की उसकी इच्छा इन तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है कि वह पाँच महीने के अपत्य को छोड़कर चली गई, उसके बीमार होने पर भी उसकी परवाह नहीं की और पति को लिखे पत्रों में भी घर वापस न लौटने की इच्छा व्यक्त की। अभित्यजन की पर्याप्त पुष्टि होना अनिवार्य है।

अनागला पदमालता बनाम एक सुदर्शन राव में पत्नी बच्चे के जन्म के लिये अपने मायके गई और संतानोत्पत्ति का समाचार भी पति को न दिया। उसने पति के साथ वापिस आने से भी इन्कार कर दिया। इस स्थिति में अभित्यजन की पर्याप्त पुष्टि होती है।

‘दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन’ शीर्षक के अन्तर्गत उन निर्णयों की विवेचना की गयी है जिनमें पति-पत्नी दोनों ही नौकरी करते थे और पत्नी के पति के कहने से त्याग-पत्र नहीं दिया। उमेश कुमार बनाम शशी कुमारी में विवाह से पूर्व पत्नी नौकरी करती थी और विवाह के समय ऐसी कोई शर्त नहीं थी कि वह नौकरी से त्याग-पत्र दे देगी। पति के पास कोई स्थाई काम नहीं था। विवाह के पश्चात् कुछ दिन वह पति के पास दिल्ली में रही और उसके पश्चात् अपनी नौकरी पर चली गई। पति ने पत्नी के अभित्यजन के आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका दायर कर दी। याचिका खारिज हो गई। इसके लगभग तीन वर्ष पश्चात् उसने पत्नी द्वारा कारित क्रूरता और अभित्यजन के आधार पर फिर विवाह-विच्छेद की याचिका पेश कर दी। यह सिद्ध हो गया कि पति-पत्नी के पास आता-जाता था। पत्नी ने कहा कि पति के पास कोई स्थाई काम नहीं है और वह मदिरापान करता है और हमेशा ही उससे पैसे मांगता रहता है। याचिका खारिज करते हुये न्यायालय ने कहा कि पत्नी द्वारा अभित्यजन की इच्छा सिद्ध नहीं होती है।

1. 1961 पंजाब 152.

2. 1978 (73) सी० डब्ल्यू ० एन० 143.

3. 1987 दिल्ली 79.

4. 2000 आंध्र प्र०353.

5. नारायण बनाम श्रीदेवी, 1990 सु० को० 594.

6. 1987 दिल्ली 235.

7. रामचन्द्र बनाम आदर्श, 1987 दिल्ली 99 में भी अभित्यजन की इच्छा सिद्ध नहीं हुइ.

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