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How to download LLB 2nd Semester Law Chapter 5 Notes

 

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अध्याय 5 (Chapter 5, LLB Notes)

विवाह (Marriage)

विवाह चाहे संस्कार माना जाये, चाहे अनुबन्ध, यह प्रास्थिति (Status) को जन्म देता है। विवाह के पक्षकार पति-पत्नी की प्रास्थिति प्राप्त करते हैं। विवाह की सन्तान धर्मज की प्रास्थिति प्राप्त करती है। लगभग सभी विधि-व्यवस्थाओं में वैध विवाह के लिये दो शर्तों का होना अनिवार्य है

(क) वैवाहिक सामर्थ्य का होना, और

(ख) वैवाहिक अनुष्ठानों का सम्पन्न करना।

वर्तमान संसार के अधिकांश देश दोनों ही शर्तों को विधि द्वारा निर्धारित करते हैं। दोनों शर्तों के पालन करने पर ही विवाह वैध होता है।

हिन्दुओं ने विवाह की संस्था का आदर्शीकरण (Idealization) किया और उसे शालीनता प्रदान की। इस प्रक्रिया में उन्होंने विवाह के प्रत्येक अंग के सम्बन्ध में विस्तृत नियम निर्धारित किये। वे बहुत विस्तार और सूक्ष्मता में गये।

अब हिन्दू वैवाहिक विधि संहिताबद्ध कर दी गयी है। विवाह-विच्छेद और अन्य वैवाहिक अनुतोषों को भी मान्यता दी गयी है।

हिन्दूकौन है [हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955-धारा 2 (2) की प्रयोज्यतायें]-हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की प्रयोज्यता के प्रयोजन के लिये कौन ‘हिन्दू’ है? यह विधि का प्रश्न है।

अधिनियम की धारा 2 उन व्यक्तियों को निर्दिष्ट करती है, जिनको अधिनियम लागू है। धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (क), (ख) और (ग) अधिनियम को उन व्यक्तियों के लिये प्रयोज्य बनाती है, जो अपने किसी रूप में धर्म द्वारा हिन्दू है या वैष्णव, लिंगायत, ब्रह्म, प्रार्थना या आर्य समाज के अनुयायी को शामिल करके विकास के किसी रूप में हिन्दू है और उस व्यक्ति को लागू है, जो धर्म द्वारा बौद्ध, जैन या सिक्ख है। यह भारत के राज्य क्षेत्र में निवास करने वाले किसी ऐसे व्यक्ति को लागू है, जो धर्म से मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है। इसलिये, अधिनियम की प्रयोज्यता व्यापक है और भारत के राज्य क्षेत्र में निवास करने वाले उन सभी व्यक्तियों को लागू है, जो धर्म से मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं।

‘हिन्दू’ शब्द को या तो अधिनियम या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम या विधान मण्डल की किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन परिभाषित नहीं किया गया है। पूर्व में 1903 में प्रीवी कौन्सिल ने भगवान कुंवर बनाम जे० सी० बोस एवं अन्य में सम्परीक्षण किया था-

“हम यहां सामान्य परिभाषा अधिकथित करने का प्रयास नहीं करेंगे कि हिन्द शब्द का क्या तात्पर्य है। और उसी समय पर्याप्त रूप से व्यापक और विभेद करना अत्यधिक कठिन है। हिन्द धर्म आश्चर्यजनक रूप से उदार और लचीला है। इसके ईश्वर मीमांसा को संकलवाद और सहनशीलता तथा व्यक्तिगत पूजा का असीमित स्वतन्त्रता द्वारा चिन्हित किया गया है। इसकी सामाजिक संहिता अत्यधिक कठोर है किन्तु इसका विभिन्न जातियों और उपजातियों के बीच प्रथा की व्यापक विभिन्नता परिलक्षित होती है। गाय के मांस का प्रयोग करने के भय से सामान्यतया हिन्दू समाज में कोई विशेषता चिन्हित नहीं की गयी है। फिर भी चमार, जा हिन्दुत्व को स्वीकार करते हैं, किन्तु जो गाय का मांस और मृत पशुओं का मांस खाते हैं, इसमें निम्न श्रेणी

1. आई० एल० आर० (31) कल० सीरीज 11.

में आते हैं। यह कहना आसान है कि कौन हिन्दू नहीं है, व्यावहारिक रूप से नहीं और गैर-हिन्दुओं से हिन्दुओं का पृथक्करण इतनी कठिनाई का मामला नहीं है। लोग अन्तर को भलीभांति समझते हैं और आसानी से बता सकते हैं कि कौन हिन्दू है और कौन नहीं।”

इसलिये अधिनियम लागू है”-

(1) सभी हिन्दुओं को, जिनमें वीर शैव, लिंगायत, ब्रह्म, प्रार्थना समाजी, और आर्यसमाजी शामिल हैं।

(2) बौद्ध,

(3) जैन,

(4) सिक्ख।”

इस मामले में पक्षकार स्वीकृततः जनजातीय हैं, अपीलार्थी उरांव है और प्रत्युत्तरदाता संथाल हैं। संविधान के अनुच्छेद 342 के अधीन अधिसूचना या आदेश के अभाव में, उन्हें हिन्दू होना माना जाता है। यदि संविधान के अधीन अधिसूचना जारी की जाती है, तो अधिनियम अनुसूचित जनजातियों को लागू किया जा सकता है और अधिनियम की धारा 2 की उपधारा (2) के निबन्धनों में पुनः अधिसूचना जारी की जाती है। यह विवादास्पद नहीं है कि संविधान (अनुसूचित जनजाति) अध्यादेश, 1995 में, जैसा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (संशोधन) अधिनियम (अधि० सं० 63 वर्ष 1956), (108 वर्ष 1976), (18 वर्ष 1987) और (15 वर्ष 1990) द्वारा संशोधित है. दोनों जनजातियां, जिनसे पक्षकार सम्बन्धित हैं, भाग 18 में विनिर्दिष्ट हैं। अपीलार्थी द्वारा भी यह स्वीकार किया गया है कि “याचिका के पक्षकार दोनों जनजातीय हैं, जो अन्यथा हिन्दुत्व को मानते हैं किन्तु इस प्रकार हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के परिक्षेत्र में उनका विवाह बाहर होने के कारण अधिनियम की धारा 2 (2) के परिप्रेक्ष्य में अपनी संथाल प्रथा और रूढ़ि द्वारा शासित होते हैं।”

लेकिन, अपीलार्थी ने जनजाति में अभिकथित प्रथा पर विश्वास किया है, जो नियम के रूप में एक विवाह का समादेश देता है। यह तर्क दिया गया है कि चूंकि प्रत्युत्तरदाता ने अपीलार्थी के साथ प्रथम विवाह के अस्तित्व के दौरान दूसरा विवाह किया है, इसलिये दूसरे विवाह के शून्य होने के कारण प्रत्युत्तरदाता भारतीय दण्ड संहिता की धारा 494 के अधीन दण्डनीय अपराध के लिये अभियोजित किये जाने हेतु दायी

कोई प्रथा अपराध सजित नहीं कर सकती, क्योंकि यह आवश्यक रूप से पक्षकारों के सिविल अधिकारों के सम्बन्ध में प्रावधान करती है और कोई व्यक्ति आरोपित कार्य के किये जाने के समय प्रवर्तित विधि के उल्लंघन के सिवाय किसी अपराध के लिये दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता। पक्षकारों की प्रास्थिति को शामिल करके उनके सिविल अधिकारों के निर्धारण के लिये प्रथा को साबित किया जा सकता है, जिनका साबित किया जाना अपराध के तत्वों के प्रयोजन के लिये प्रयुक्त किया जा सकता है, जिसका अधिनियम की धारा 3 (33) के अधीन जुर्माना या कारावास से किसी विधि द्वारा दण्डनीय कार्य या लोप होगा। संविधान का अनच्छेद 20, जो अपराध की दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण को प्रत्याभूत करता है, प्रावधान करता है कि कोई व्यक्ति अपराध के रूप में आरोपित कार्य को करने के समय प्रवर्तित विधि के उल्लंघन के सिवाय किसी अपराध के लिये दोषसिद्ध नहीं किया जायेगा। संविधान के अनुच्छेद 13 खण्ड (3) के अधीन विधि का तात्पर्य ऐसी विधि से है, जो विधान मण्डल द्वारा निर्मित की गयी है और जिसमें कानूनी नियमों द्वारा प्रदत्त। शक्तियों के प्रयोग में कि या गया आदेश या कानूनी आदेश है।।

(1)

विवाह के प्रकार

हिन्दू विवाह का आदर्श हमेशा उच्च रहा है। वैदिक युग से आज तक वैवाहिक सम्बन्ध को हमेशा पवित्र और पावन माना गया है। पत्नी की विधिक स्थिति कुछ भी रही हो, परिवार में उसका स्थान हमेशा

1. डॉ० सरजमणि स्टेला कुजूर बनाम दुर्गाचरण हंसदह एवं अन्य, ए० आई० आर. 2001 एस सी : 2001 विधि निर्णय एवं सामयिकी 604 (सु० को०).

आदर और सम्मान का था। बहुपत्नीत्व विवाह मान्य था, परन्तु हिन्दू विवाह के इतिहास में बहुपत्नीत्व विवाह को हेय माना गया है। व्यवहार में बहुत कम लोग एक से अधिक विवाह करते थे। भारत के कुछ भागों में बहुपतित्व विवाह का भी प्रचलन रहा है, परन्तु यह सीमित क्षेत्र में ही प्रचलित था।

प्राचीन हिन्दू विधि में विवाह के आठ रूप प्रचलित थे; जिनमें से सन् 1955 के पूर्व केवल तीन ही मान्य थे; ब्रह्म, असुर और गंधर्व।

ब्रह्म विवाह-मनु के अनुसार जब पिता वेदों में पारंगत और सच्चरित्र वर को निमन्त्रित करके हीरेजवाहरातों का दान देकर, कन्या को बहुमूल्य आभूषणों से सजा कर दान में वर को देता है तो उसे ब्रह्म विवाह कहते हैं

ब्रह्म विवाह सबसे उच्च विवाह माना गया है। यह विवाह पूर्ण रूप से पिता द्वारा अपनी पुत्री का दान है। दूसरे शब्दों में, पुत्री पर अपने आधिपत्य का हस्तान्तरण पिता वर को अपनी स्वेच्छा से और बिना किसी अनुदान के करता है। प्रारम्भ में द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) ही इस भांति का विवाह कर सकते थे। अंग्रेजी शासन-काल में वर का वेदों में पारंगत होना अनिवार्य नहीं रहा और ब्रह्म विवाह शूद्रों को भी उपलब्ध हो गया। इस विवाह की अन्य शर्ते जैसे बहुमूल्य आभूषणों से सजाना और हीरे-जवाहरात दान देना भी अनिवार्य नहीं रहा। सन् 1955 के पूर्व ब्रह्म-विवाह के लिये आवश्यक शर्त केवल यही रह गयी कि इसमें अवश्यम्भावी रूप से कन्या-दान होना चाहिये।

गान्धर्व विवाह-मनु के अनुसार एक कन्या का अपनी स्वेच्छा से अपने प्रेमी के साथ गठबन्धन, जिनका जन्म वासना से होता है और जिसका ध्येय सम्भोग है, गांधर्व विवाह कहलाता है। मित्रमिश्र के अनुसार जब वर-वधू आपस में स्वेच्छा से विवाह-बन्धन में यह कहकर-“तुम मेरे पति हो” “तुम मेरी पत्नी हो” बंध जाते हैं तो उसे गांधर्व के नाम से पुकारा जाता है। इस विवाह में भी अन्य विवाह की भांति वैवाहिक अनुष्ठानों का सम्पन्न करना आवश्यक है। यह एक अभूतपूर्व बात है कि उस समाज में जहां विवाह अवश्यम्भावी रूप से पिता द्वारा पुत्री पर अपने आधिपत्य का पति को हस्तान्तरण करता था, भी स्वेच्छा से किये गये विवाहों को मान्यता दी गयी। स्पष्ट ही है कि उस समाज और समाज की विधियों के अन्तर्गत ऐसे विवाहों को अनियमित ही माना जा सकता था। आधुनिक युग में स्वेच्छा से किया गया विवाह ही सबसे श्रेष्ठ विवाह माना जाता है और अनेक देशों की विधि में स्वेच्छारहित विवाह शून्य (Void) है।

असुर विवाह-मनु के अनुसार जब वर अपनी इच्छा से वधू और वधू के नातेदारों को इतनी सम्पत्ति देकर जितनी कि वह दे सकता है,वधू को प्राप्त करता है तो वह विवाह असुर विवाह कहलाता है। असुर विवाह पिता द्वारा कन्या का विक्रय ही लगता है, अनुदान में पिता चाहे चल सम्पत्ति ले या अचल सम्पत्ति या रोकड़ ले। अनेक प्राचीन समाजों में क्रय द्वारा विवाह प्रचलित थे। हिन्दू आचार्यों ने इस भांति के विवाह का कभी अनुमोदन नहीं किया है और हिन्दू समाज में इस विवाह को हेय ही माना जाता रहा है। इसका प्रचलन निम्न वर्गों के लोगों में ही था। सन् 1955 के पूर्व सभी जातियों के लिये यह विवाह मान्य और वैध था। यह ध्यान देने की बात है कि वर और वधू पिता या अन्य नातेदारों के बीच विवाह अनुदान के रूप में कछ देने का अनबन्ध लोकनीति के विरुद्ध होने के कारण प्रवर्तित नहीं किया जा सकता है, चाहे उस अनबन्ध के अन्तर्गत विवाह सम्पन्न भी हो गया हो। यदि अनुदान की रोकड़ या सम्पत्ति का भुगतान कर दिया गया हो तो उसे वापस वसूल नहीं किया जा सकता है।

वर्तमान हिन्दू विधि में विवाह का रूप-हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 किसी भी प्रकार के विवाह का विनिर्दिष्ट उपबन्ध नहीं बनाता है। अधिनियम के अन्तर्गत सम्पन्न प्रत्येक विवाह “हिन्दू

1. हिन्दू विवाहों को दो भागों में बांटा गया था-अनुमोदित विवाह इसके अन्तर्गत आते हैं. ब्रह्म आर्ष देव और प्रजापत्य और नियमित इसके अन्तर्गत आते हैं, गांधर्व, असुर, राक्षस और पैचाश विवाह

2. मनुस्मृति

3, 27. 3. मनुस्मृति 2, 32.

4. मनुस्मृति 177.

5. मनुस्मृति 3,31.

विवाह” कहलाता है। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि अब ब्रह्म, असुर, गान्धर्व विवाह नहीं हो सकते हैं। विवाह अब भी हो सकते हैं, इन सब विवाहों के लिये अधिनियम में निर्धारित अनुष्ठानों का सम्पन्न करना आवश्यक है। अब ये सब, विवाह अनुमोदित विवाह ही होंगे। अधिनियम के अन्तर्गत अनुमोदित और अनियमित विवाहों का प्रभेद मान्य नहीं है।

दूसरे दृष्टिकोण से हम पाते हैं कि हिन्दू विवाह दो भांति के हैं-एक वे जो वर-वधू की स्वेच्छा से सम्पन्न होते हैं और दूसरे वे जो माता-पिता या अन्य नातेदारों द्वारा व्यवस्थित किये जाते हैं। वर-वधू का स्वेच्छा द्वारा विवाह गांधर्व-विवाह ही कहलायेगा। व्यवस्थित विवाह ब्रह्म विवाह हो सकता है या असुर विवाह । उच्च वर्ग में दहेज-प्रथा प्रचलित है। वर्तमान युवा पीढ़ी में गांधर्व विवाह का प्रचलन बढ़ रहा है।

हिन्दू विवाह में अनुष्ठानों का सम्पन करना अब भी आवश्यक है। आडम्बर, ठाट-बाट, धूमधाम, सजावट और प्रदर्शन हिन्दू विवाह का अब भी अभिन्न अंग है, परन्तु अनिवार्य नहीं है। अनिवार्य अंग केवल कुछ अनुष्ठानों का सम्पन्न करना ही है, और इन्हें बिना किसी आडम्बर और ठाटबाट के भी किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण से हिन्दू विवाह बड़े ही साधारण रूप से सम्पन्न किया जा सकता है।

दहेज (Dowry)

हिन्दू समाज में दहेज प्रथा, विशेष कर द्विज-हिन्दुओं में एक बहुत बड़ी बुराई है, जिसे अनेक प्रयत्नों के बावजूद भी मिटाया नहीं जा सका है। आये दिन यह सुनने में आता है कि पर्याप्त दहेज न लाने के कारण वधू को मारा-पीटा गया और घर से निकाल दिया गया। कुछ समय पूर्व उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक मुकदमें में ये तथ्य सामने आये कि सास-श्वसुर ने वधू को बुरी तरह मारा-पीटा और फिर गला घोंट दिया, परन्तु प्रामाणिक साक्षी के अभाव में श्वुसर और पति दोनों ही दण्ड से बच गये।

कुछ ब्राह्मणों में वर-दक्षिणा की प्रथा है जिसके अन्तर्गत वर को भेंट-पूजा दी जाती है। वर दक्षिणा दहेज की परिभाषा में आती है।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की एक पूर्णपीठ ने मत व्यक्त किया है कि दहेज और वधू को विवाह के समय दी गयी पारम्परिक भेटें पत्नी का स्त्रीधन होगा।

दहेज का प्रतिषेध करने के लिये 1961 में दहेज प्रतिषेध अधिनियम संसद् द्वारा पारित किया गया था, परन्तु यह विधेयक अपने उद्देश्य की पूर्ति में असफल रहा और हिन्दू समाज में तथा अन्य धर्मावलम्बियों में भी दहेज एक कैन्सर की भांति बढ़ता ही गया। दहेज प्रतिषेध अधिनियम की परीक्षा के लिये संसद के दोनों सदनों ने एक समिति का गठन किया। समिति ने अपनी रिपोर्ट 1982 में प्रस्तुत की और दहेज का प्रतिषेध करने के लिये अनेक सुझाव दिये। समिति की कुछ सिफारिशों को मानते हुये, संसद ने दहेज प्रतिषेध। (संशोधन) अधिनियम, 1984 पास किया है।

नये संशोधनों द्वारा दहेज के प्रतिषेध की सम्भावनायें बढ़ी हैं, परन्तु यह कहना कठिन है कि यह अधिनियम दहेज-प्रथा का उन्मूलन कर सकेगा। प्रथमत: तो नये संशोधन कोई क्रान्तिकारी संशोधन नहीं हैं।। द्वितीय, हम यह जानते हैं कि अनेक सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन करने में विधि योगदान तो दे सकती है, परन्तु जब तक समाज ही उनके उन्मूलन का दृढ़ निश्चय न कर ले उन्हें मिटाना सम्भव नहीं है।

दहेज की परिभाषा

दहेज की नई परिभाषा अब इस भांति है-कोई भी सम्पत्ति या मूल्यवान् प्रतिभूति जो विवाह के पक्षकारों में से एक ने दूसरे को या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, या पक्षकारों के माता-पिता द्वारा, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, विवाह के पूर्व या विवाह के समय या विवाह के पश्चात् विवाह के सम्बन्ध में दी है या देने का वचन दिया

1. नारायणलाल बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान, (1969) 2 सुप्रीम कोर्ट वीकली रिपोर्ट्स, 282 और देखें,

श्याम सुन्दर बनाम शान्तामणी, 1962 अवध 50.

2 टी० आई० सुन्दरम् बनाम एस० आई० पंडावेश्वर, (1946) ट्रावनकोर लॉ रिपोर्ट 224.

3. विनोद कुमार बनाम पंजाब राज्य, 1982 पं० और० ह0372(पर्णपीठ)

है (धारा 2)। इस संशोधन के पूर्व सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति दहेज तब ही कहला सकती थी जबकि उसे “बतौर विवाह के अनुदान के दिया गया है। अनुभव से यह पाया गया कि यह सिद्ध करना कि सम्पत्ति “बतौर विवाह के अनुदान” के दी गयी है, अत्यधिक कठिन है। अब परिभाषा का रूप बहुत वृहत हो गया है, परन्तु यह कोई परिभाषा नहीं रह गयी है। फिर संशोधन के पश्चात् भी विवाह के पूर्व, विवाह के समय या पश्चात् दी गयी भेटें दहेज के अन्तर्गत नहीं आती हैं। नई परिभाषा के अनुसार अब कोई भी सम्पत्ति यदि “विवाह के सम्बन्ध” में दी गयी है तो दहेज होगी और यदि भेंट के रूप में दी गयी है तो दहेज नहीं होगी। यह कहना अत्यधिक कठिन होगा कि कौन-सी सम्पत्ति विवाह के सम्बन्ध में दी गयी है और कौन-सी बतौर भेंट के। देने और लेने वालों का प्रयत्न यही होगा कि विवाह के समय, विवाह से पूर्व या पश्चात् दी गयी सम्पत्ति भेंट कहलाये, क्योंकि दहेज लेना और देना दोनों ही जुर्म है। इस लेखक का निवेदन है कि इससे अच्छी और सरल परिभाषा तो यह होती है कि “वह अब सम्पत्ति जो बतौर भेंट के नहीं दी गयी है, दहेज कहलायेगी।”

भेंट में दी गयी सम्पत्ति का मूल्य कुछ भी हो सकता है। संसदीय समिति ने भेंटों की सीमा निर्धारित करने का सुझाव दिया था, परन्तु संसद् ने उसे स्वीकार नहीं किया। धारार 3 (2) के अन्तर्गत भेंट में दी गयी सम्पत्ति पर दो पाबन्दियां लगायी गयी हैं-

(क) विवाह के समय वर या वधू को दी गयी भेंटों की सूची तैयार करनी होगी; और

(ख) यदि भेंटे वधू पक्ष द्वारा वर को दी गयी हैं तो फिर वे दाता की आर्थिक स्थिति के अनुरूप हानी आवश्यक हैं।

यह सूची वर या वध को दी गयी भेंटों की ही बनानी होगी। वर पक्ष के या वधू पक्ष के किसी भी व्यक्ति को दी गयी भेंटों की सूची बनाना आवश्यक नहीं है। उपर्युक्त दोनों ही शर्ते विवाह के पूर्व या पश्चात् दी गयी भेंटों पर लागू नहीं होती हैं। इस लेखक का निवेदन है कि विधि की असफलता के बीज हमने इन उपबन्धों द्वारा बो दिये हैं असफलता के वृक्ष को बढ़ने-पनपने में क्या देर लगती है।

दहेज का लेना या देना या लेन-देन की दुष्प्रेरणा करना या दहेज मांगना

धारा 3 (1) के अन्तर्गत दहेज लेना या देना या दहेज के लेने या देने की दुष्प्रेरणा करना अपराध है। संदीय समिति ने सिफारिश की थी कि दहेज देना अपराध नहीं होना चाहिये, क्योंकि दहेज देने वाला तो दहेज की सामाजिक कुरीति का शिकार है। वह तो पिटा हुआ व्यक्ति है। इस स्थिति में क्या उसे अपराधी की संज्ञा देना औचित्यपूर्ण होगा? इसका दूसरा पहलू भी है; यदि दहेज देने वाला भी अपराधी है तो क्या वह यह आकर बयान देगा या यह रिपोर्ट करेगा कि उसने दहेज दिया है। यही कारण है कि दहेज लेने वाले का समुचित अभियोजन नहीं हो पाता है और अपराधी दण्ड नहीं पाता है। परन्तु संसद ने यह सुझाव अस्वीकार कर दिया और पूर्व की ही भांति दहेज देने वाला भी अपराधी है।

धारा 4 के अन्तर्गत, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वधू या वर से या उनमें से किसी के माता-पिता या संरक्षक से दहेज मांगना अपराध है।

वर्तमान संशोधन के पूर्व ही अन्य राज्यों ने दहेज सम्बन्धी अपराधों का दण्ड कठोर बनाया था। उडीसा और पंजाब राज्य के संशोधनों में एक वर्ष तक के कारावास की व्यवस्था थी परन्तु अन्य किसी भी राज्य ने छ: माह से अधिक कारावास का दण्ड नहीं निर्धारित किया था। वर्तमान संशोधन द्वारा दहेज लेने या देने या दहेज देने या लेने का दुष्प्रेरण करने, या दहेज की मांग करने पर अब न्यूनतम और अधिकतम कारावास की अवधि निर्धारित की गयी है। इन सभी अपराधों के लिये दण्ड एक-सा ही है। उपर्युक्त किसी भी अपराध के लिये न्यूनतम कारावास की अवधि छ: माह है और अधिकतम दो वर्ष, साथ ही दस हजार रुपये तक का जुर्माना, किया जा सकता है। दहेज देने या लेने या दुष्प्रेरण करने वाले अपराधी को दस हजार रुपये तक का जुर्माना या दा गयो सम्पत्ति के बराबर राशि तक का जुर्माना किया जा सकता है, उनमें से जो भी अधिक हो। यह है कि यदि दहेज की सम्पदा का मूल्य 15 हजार रुपये है तो उस पर 15,000 रुपये तक।

का जुर्माना हो सकता है, और यदि दहेज की सम्पदा का मूल्य 5,000 रुपये है तो उसे 10,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।

दुर्भाग्यवश न्यूनतम कारावास की सजा की कठोरता यह उपबन्ध बनाकर कम कर दी गयी है कि यदि न्यायालय चाहे तो किसी समुचित और विशेष कारण से छ: माह के कारावास की अवधि को कम कर सकता है। ऐसा करते समय न्यायालय को अपने निर्णय में लिखना होगा।

दहेज लेने और देने का अनुबन्ध शून्य है (धारा 5)। इसे किसी भी न्यायालय में निष्पादित नहीं कराया जा सकता है।

दहेज पाने वाले व्यक्ति को दहेज की सम्पदा को वधू के नाम करना

दहेज लेने की अधिकांश स्थितियों में दहेज वधू के कब्जे में नहीं होता है। वह पति, सास, श्वसुर या अन्य किसी व्यक्ति के कब्जा में होता है। ऐसी स्थिति में धारा 6 यह प्रावधान बनाती है कि दहेज पर काबिज व्यक्ति की दहेज की सब सम्पदा को वधू के नाम हस्तान्तरित करना चाहिये। विवाह के पूर्व दहेज में प्राप्त सब सम्पदा विवाह के तीन माह के अन्दर वधू के नाम करनी होगी। इसी भांति यदि दहेज विवाह के समय या विवाह के उपरान्त मिला है तो उसे मिलने के तीन माह की अवधि के भीतर उस सम्पदा को वधू के नाम कर देना चाहिये। यदि विवाह के समय वधू अवयस्क है तो वयस्कता प्राप्त होने के पश्चात् तीन माह की अवधि के भीतर दहेज की सम्पदा वधू के नाम हस्तान्तरित कर देनी चाहिये। वधू के वयस्क होने तक वह व्यक्ति सम्पदा का न्यासी होगा। ऐसा न करने पर वह व्यक्ति दहेज सम्बन्धी अपराध का दोषी होगा और उसे न्यूनतम छ: माह की अवधि का कारावास और अधिकतम दो वर्ष के कारावास की सजा दी जा सकती है, साथ ही 10,000 रुपये तक का जुर्माना भी किया जा सकता है। इस अपराध के लिये न्यायालय को कारावास की अवधि को छ: माह से कम करने का अधिकार नहीं है। यह सजा उस सजा के अतिरिक्त है जो उसे दहेज लेने या दहेज मांगने के अपराध में दी जा सकती है।

वधू के नाम सम्पत्ति के हस्तान्तरण के पूर्व यदि वधू की मृत्यु हो गयी है, तो दहेज सम्पदा को वधू के उत्तराधिकारियों के नाम करना होगा। प्रश्न यह है कि सम्पदा को वधू के नाम हस्तान्तरण करने के अपराध में दण्डित व्यक्ति क्या सम्पदा को अपने पास रख सकता है? धारा 6 (3-क) के अन्तर्गत अपराधी को दण्ड देते समय न्यायालय को यह आदेश देना होगा कि अपराधी निर्धारित अवधि के भीतर सम्पदा को वधू के नाम या (उसके मत होने पर) उसके उत्तराधिकारियों के नाम कर दे। अपराधी द्वारा ऐसा न करने पर न्यायालय को दहेज-सम्पदा के मूल्य के बराबर राशि का जुर्माना अपराधी पर करके यह आदेश देना होगा कि यह राशि वधू को या (उसके मृत होने पर) उसके उत्तराधिकारी को दे दी जाये।

दहेज सम्बन्धी अपराध उनकी संज्ञेयता

भारतीय जनमत के एक वर्ग की निश्चित राय थी कि दहेज सम्बन्धी सभी अपराध संज्ञेय हों। संसदीय समिति का यह कथन था कि वह दहेज सम्बन्धी अपराधों को संज्ञेय बनाने के पक्ष में तो है, परन्त अपराध की संज्ञेयता के दुरुपयोग से डरती है। संज्ञेय अपराध होने की स्थिति में पुलिस किसी भी व्यक्ति को अपराध के संशय होने पर ही गिरफ्तारी कर सकती है। अतः डर यह है कि विवाह के समय ही वर या वधू या उनके किसी नातेदार को पुलिस गिरफ्तार कर ले, और विवाह में भंग पड़ जाये। अत: समिति ने मत व्यक्त किया कि किसी भी व्यक्ति को परिपीड़न से बचाने के लिये अपराध को संज्ञेय बनाने के साथ यह प्रावधान होना चाहिये कि किसी भी व्यक्ति को दहेज के अपराध के सम्बन्ध में बिना वारण्ट या बिना मजिस्ट्रेट की आज्ञा के गिरफ्तार नहीं करना चाहिये। समिति की राय यह भी थी कि अपराध शमनीय हो।।

संसद ने इन सिफारिशों को संशोधित रूप में माना है। दहेज सम्बन्धी कोई भी अपराध संज्ञेय नहीं है, यद्यपि दहेज सम्बन्धी अपराध की खोजबीन संज्ञेय है। इसका तात्पर्य है कि दहेज सम्बन्धी कोई अपराध हुआ। है या नहीं इसकी जांच-पड़ताल पुलिस स्वयं कर सकती है, यह अनिवार्य नहीं है कि दहेज के अपराध को कोई व्यक्ति पुलिस में शिकायत पेश करे। इसकी जांच-पड़ताल के लिये न्यायालय की आज्ञा भी आवश्यक

नहीं है। परन्तु दहेज सम्बन्धी किसी भी अपराध के अभियुक्त को बिना वारण्ट या मजिस्ट्रेट की आज्ञा के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।

अपराध शमनीय (Compoundable) नहीं है। वह अशमनीय अपराध है। इसका तात्पर्य यह है कि एक बार किसी अपराध में न्यायालय के समक्ष कार्यवाही आरम्भ होने पर, पक्षकार आपस में कोई समझौता नहीं कर सकते हैं।

दहेज सम्बन्धी सभी अपराध जमानतीय (Bailable) हैं। दहेज के अभियोग में गिरफ्तार किसी भी व्यक्ति को जमानत पर रिहा किया जा सकता है।

दहेज की मांग के विरुद्ध अभियोजन कार्यवाही-जहां प्रथम सूचना रिपोर्ट में किया गया अभिकथन सही पाया जाता है और अन्वेषण के आधार पर तथा पुलिस द्वारा एकत्रित साक्ष्य के आधार पर आवेदकों के विरुद्ध अन्ततोगत्वा आरोप-पत्र पेश किया गया है तो यह कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण या न्यायालय की आदेशिका का दुरुपयोग नहीं है।

दहेज के अपराधों पर विचारण

संसदीय समिति ने यह सुझाव दिया था कि दहेज सम्बन्धी अपराध कुटुम्ब के नाजुक मामलों से सम्बन्धित है। अत: उन पर विचारण कौटुम्बिक न्यायालय द्वारा होना चाहिये। परन्तु इस सुझाव को संसद ने स्वीकार नहीं किया है।

मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी को ही दहेज सम्बन्धी मामलों पर विचारण की अधिकारिता दी गयी है। दहेज सम्बन्धी अपराधों का संज्ञान (Cognizance) न्यायालय अपनी स्वयं की सूचना पर, या व्यथित व्यक्ति की शिकायत पर या उसके माता-पिता या अन्य नातेदारों की शिकायत पर या किसी मान्यता प्राप्त सामाजिक संस्था या संगठन की शिकायत कर सकता है। मूल अधिनियम के अन्तर्गत किसी भी सामाजिक संस्था या संगठन को दहेज सम्बन्धी अपराध की शिकायत करने का अधिकार नहीं था। अनुभव यह रहा है कि दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के असफल होने का एक कारण यह भी था कि अपराध की शिकायत व्यथित व्यक्ति द्वारा ही की जा सकती थी और यह सोचना मिथ्या बात थी कि दहेज देने वाला पिता या उसकी पुत्री शिकायत करेगी। समाजसेवी संस्थाओं और संगठन को शिकायत करने का अधिकार देने का यही औचित्य है। यह आवश्यक है कि समाजसेवी संस्था या संगठन मान्यता प्राप्त हो।

संशोधन के पूर्व अधिनियम की धारा 7 के अनुसार दहेज सम्बन्धी किसी भी अपराध की शिकायत अपराध होने के एक वर्ष की अवधि के भीतर करनी होती थी। परन्तु देखा यह गया कि दहेज सम्बन्धी अपराध की शिकायतें बहुत समय तक नहीं की जा सकती थीं, क्योंकि कोई भी सम्बन्ध व्यक्ति का पक्ष विवाह को तोड़ना नहीं चाहता है। अपराध की शिकायत तभी की जा सकती है जब वधू का प्रपीड़न किया जाता है, उसे सताया जाता है और उसके साथ क्रूरता का व्यवहार किया जाता है। अत: संशोधन द्वारा इस अवधि को समाप्त कर दिया गया है और अब दहेज सम्बन्धी अपराध की शिकायत कभी भी की जा सकती है |

 

दाम्पत्य सम्बन्धों का त्यजन करने वाले पति को दण्ड

समिति ने यह सुझाव दिया था कि पत्नी द्वारा दहेज न लाने या अपर्याप्त दहेज लाने पर यदि पति दाम्पत्य सम्बन्धों का त्यजन कर देता है तो उसे एक वर्ष तक के कारावास की सजा और दस हजार रुपये तक के जुमान। स दाण्डत किया जा सकता है। इस लेखक का निवेदन है कि किसी भी समाज में दबाव या बल द्वारा दाम्पत्या सम्बन्धों को स्थापित रखने या प्रतिस्थापित करने की चेष्टा करता, असभ्यता और नृशंसता है। आज सला अनक दशा न दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के वैवाहिक अनतोष को समाप्त कर दिया है, और जिन दशा। म यह मान्य है वहां भी प्रतिपक्षी की गिरफ्तारी द्वारा इसकी डिक्री का निष्पादन ही किया जाता है। इस

१. मोहनलाल एव अन्य बनाम उ० प्र०. राज्य एवं अन्य, 2001 विधि निर्णय एवं सामयिकी 602 (इला०)।

अनुतोष को अमानवीय, घृणित और अनिष्टकारी की संज्ञा दी गयी है। यह मानव-मर्यादा और प्रतिष्ठा का हनन करता है। (देखें; इस ग्रन्थ का अध्याय 6.”दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन” शीर्षक के अन्तर्गत)। यही बात दहेज की अपर्याप्तता के कारण पति द्वारा दाम्पत्य सम्बन्धों के त्यजन पर लागू होगी है। यह वह स्थिति है जहां विवाह-भंग हो जाता है। इस लेखक का निवेदन है कि इस सिफारिश को न मानकर संसद ने उचित काम ही किया है।

दहेज प्रतिषेध अफसर

1986 के संशोधन द्वारा यह उपबन्ध बनाया गया है कि दहेज प्रतिषेध अधिनियम के उपबन्धों को लागू करने और उसके अन्तर्गत किये गये अपराधों की प्रतियोजना के लिये और उन अपराधों को रोकने के लिये ‘दहेज प्रतिषेध अफसरों की नियुक्ति प्रत्येक राज्य के पृथक-पृथक् इलाकों के लिये करनी होगी। दहेज प्रतिषेध अधिनियम के कारागार न होने का एक कारण यह भी रहा कि उसके उपबन्धों को लागू करने और प्रतिपादित करने के लिये कोई प्रभावी प्रतियोजन मशीनरी नहीं बनायी गयी। अब यह कार्य दहेज प्रतिषेध अफसरों को सौंपा गया है। ये अफसर न केवल अधिनियम के उपबन्धों को लागू करेंगे और उसके अन्तर्गत होने वाले अपराधों का प्रत्यायोजन करेंगे, बल्कि दहेज से सताये गये व्यक्तियों की सहायता करेंगे। इन अफसरों के साथ उस इलाके के विख्यात पांच समाज सेवियों की एक सलाहकार समिति का भी गठन किया जा सकता है |

सगाई

सगाई विवाह का अनुबन्ध है। अधिकांश हिन्दुओं में विवाह के पूर्व सगाई की प्रथा है। मनु ने कहा है कि यदि किसी कन्या को विवाह में देने का अनुबन्ध है तो अच्छे लोग उसे तोड़ते नहीं हैं। ऋषियों ने यह भी कहा है कि सगाई के पश्चात् यदि वर या वधू में किसी खोट का पता चले या अधिक सुयोग्य वर मिले, तो सगाई तोड़ी जा सकती है। नारद के अनुसार यदि कोई वर अकारण कन्या का हाथ लेने से इन्कार करे तो उसे विवाह के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। आधुनिक हिन्दू विधि में यह स्थापित नियम है कि सगाई (विवाह के अनुबन्ध) का विनिर्दिष्ट पालन नहीं कराया जा सकता है। हर्जाने का वाद चल सकता है। यही नहीं, सगाई के सम्बन्ध में प्रीतिभोज और अन्य अनुष्ठानों पर किये गये खर्चे की रकम भी वसूल की जा सकती है। सगाई के समय भेंट में दी गयी रोकड़, आभूषण और पोशाकें भी वापस ली जा सकती हैं। अजन्मे अपत्य की सगाई का अनुबन्ध शून्य हैं। सगाई के अनुबन्ध को तोड़कर किया गया विवाह शून्य है।

तिलक में दिये गये उपहार भी विवाह में या विवाह के आसपास दी गयी सम्पत्ति होती है-यह अधिनियम की धारा 27 द्वारा आच्छादित है और केवल संयुक्त सम्पत्ति से संव्यवहार करने तक सीमित नहीं। है बल्कि पक्षकारों की अपवर्जी सम्पत्ति के निस्तारण की भी अनुमति प्रदान करती है। अभिनिर्धारित किया। गया कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 27 के अधीन विवाह विषयक न्यायालयों को पति-पली की अपवर्जी सम्पत्ति का निस्तारण करने का अधिकार प्राप्त है बशत उसे विवाह के समय या विवाह के आसपास उपहार स्वरूप दिया गया हो। न्यायालयों को वस्तुओं की वापसी के बजाय धन के रूप में उनके मूल्य की वापसी के वाद को डिक्रीत करना चाहिये।

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 27 पारसी विवाह और तलाक अधिनियम की धारा 42 के सदश है। उन दोनों में यह उपबन्ध किया गया है कि विवाह विषयक न्यायालयों को विवाह के समय या उसके आसपास दी गयी सम्पत्ति से संव्यवहार करने की शक्ति प्राप्त है।

1. पुरुषोत्तम दास बनाम पुरुषोत्तम दास, (1896) 21 बम्बई 23.

2. राजेन्द्र बनाम रोशन, 1950 इलाहाबाद 592; गुलाब बनाम फूलबाई, (1909) 33 बम्बई 411

3. आत्मा बनाम वाकू, (1930) 11 लाहौर 598.

4 खीम जी बनाम नरमी, (1915) 39 बम्बई 682; शिवनन्दी बनाम भागीरथम्मा, 1962 मद्रास 400.

5. हेमन्त कुमार अग्रहरि एवं अन्य बनाम श्रीमती लक्ष्मा देवी, 2003 विधि निर्णय एवं सामयिकी 7261

बालकृष्ण आर० कदम बनाम संगीता बी० कदम, (बालकृष्ण का वाद) में उच्चतम न्यायालय ने निम्नवत् अभिनिर्धारित किया-

इसमें अधिनियम की धारा 27 में पक्षकारों को विवाह के पूर्व अथवा विवाह के पश्चात् भी, दी गयी त्ति जहां तक उसका सम्बन्ध विवाह से हो, सम्मिलित है अभिव्यक्ति “विवाह के समय या उसके आसपास” का उस सम्पत्ति को उस सम्पत्ति जिसे विवाह के समय दिया गया हो और साथी ही विवाह के पूर्व या उसके पश्चात् दी गयी सम्पत्ति भी, को सम्मिलित करने हेतु समुचित ढंग से अर्थान्वयन किया जाना आवश्यक है जिससे कि वह उसकी “संयुक्त सम्पत्ति” हो जाये और तदद्वारा यह विवक्षा करते हुये कि सम्पत्ति का सम्बन्ध विवाह से होना पता लगाया जा सकता हो। यह सब सम्पत्ति अधिनियम की धारा 27 से आच्छादित होती है।”

साररूप में, उच्चतम न्यायालय ने बालकृष्ण के मामले में यह अभिनिर्धारित किया था कि धारा 27 के अधीन आच्छादित सम्पत्ति का सम्बन्ध विवाह से होना नितान्त आवश्यक है और वह उसके सम्बन्ध में होना चाहिये। इस वाद में, तिलक अथवा विवाह के समय नगदी और वस्तुयें उपहार स्वरूप दी गयी थीं। तिलक की रस्म साधारणतया लड़के के घर में की जाती है, कभी-कभी वह विवाह के ठीक पहले और कभी-कभी काफी दिन पहले होती है, तथापि यह विवाह का ही एक अंग है। तिलक के समय दिये गये उपहार भी विवाह के समय या विवाह के आसपास दी गयी सम्पत्ति होते हैं, इसलिये वे उससे सम्बद्ध हैं।

विवाह विषयक वादों के विषय में जिला न्यायालय द्वारा विचारण किया जाता है और यदि कुटुम्ब न्यायालय की स्थापना की गयी हो तो कुटुम्ब न्यायालय द्वारा विचारण किया जायेगा। उन्हें जिला स्तर के वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा विनिश्चित किया जाता है और सिविल प्रक्रिया संहिता प्रयोज्य होती है। सम्पूर्ण कार्यवाही नियमित वाद की भांति है, यद्यपि न्यायालय से पक्षकारों के मध्य सुलह कराने की अपेक्षा की जाती है। विवाह विषयक न्यायालयों का संचालन करने वाले न्यायाधीश नियमित पक्ष पर अपवर्जी सम्पत्ति के बारे में विनिश्चय करने के लिये पर्याप्त वरिष्ठ होते हैं। यही प्रक्रिया विवाह विषयक वादों में प्रयोज्य है। यह सही है कि कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम की धारा 13 में यह घोषित किया गया है कि किसी पक्षकार को विधिक अभ्यावेदन का अधिकार प्राप्त नहीं होगा, लेकिन न्यायालय सदैव विधिक अभ्यावेदन की अनुमति दे सकता है। यदि जटिल प्रश्न अन्तर्ग्रस्त हों तो कुटुम्ब न्यायालय में विधिक अभ्यावेदन की अनुमति सामान्यतया प्रदान कर दी जाती है, इससे भी अधिक ऐसे वाद में जहां सम्पत्ति का निस्तारण करने सम्बन्धी जटिल प्रश्न अन्तर्ग्रस्त हों। यदि मामला विवाह विषयक न्यायालय के समक्ष हो तो यही समुचित होता है कि पक्षकारों से सम्बन्धित समस्त विवाद एक ही समय में एक ही न्यायालय द्वारा निपटाये जायें। विवाद के किसी भाग को भविष्य में किसी अन्य वाद में विनिश्चित किये जाने के लिये छोड़ना कड़वाहट और पीड़ा को बढाना होगा। जीवन को फलप्रद तरीके से व्यतीत किया जाना चाहिये अपेक्षाकृत इसके कि उसे निरन्तर झगडे। में नष्ट कर दिया जाये। इस बात का कोई कारण प्रतीत नहीं होता है कि क्यों विवाह के समय दी गयी संयक्त सम्पत्ति का निस्तारण किया जा सकता है, लेकिन विवाह के समय पेश की गयी अपवर्जी सम्पत्ति का निस्तारण पृथक रूप से किया जाना चाहिये। इससे न केवल कार्यवाहियों की बाहुल्यता परिणामित होगी बल्कि इससे अन्तिम निपटारे में और पक्षकारों द्वारा नया जीवन प्रारम्भ करने में भी विलम्ब कारित होगा।

लार्ड डेनिंग ने एलेन बनाम अल्फ्रेड मैक अल्पाइन, के बाद में निम्नवत् कहा था-

“विधि के विलम्ब असहनीय हो चुके हैं। वे इतना लम्बा खिच चुके हैं कि उससे न्याय कम संतोषजनक हो गया है।”

हमारे देश में यह बात सत्य है। हमें ऐसा निर्वचन अंगीकत करना होगा जिससे कार्यवाहियों के विलम्ब और बाहुल्यता से बचा जा सके।

1. ए० आई० आर० 1997 एस० सी० 3652-1997 (7) एस० सी० सी०500.

2. 1968 (1) ऑल ई० आर० 543.

धारा 27 में पदावली “विवाह के समय उपहार स्वरूप दी गयी सम्पत्ति, जो संयुक्त रूप से पति एवं पत्नी दोनों की हो सकेगी” का प्रयोग किया गया है। इस धारा की बालकृष्ण के वाद में यथानिर्दिष्ट एक पूर्व शर्त है-सम्पत्ति विवाह से सम्बद्ध होनी अनिवार्य है। जहां तक सम्पत्ति के पक्षकारों द्वारा संयुक्त स्वामित्व में होने का सम्बन्ध है, इतना कहना ही पर्याप्त है कि इस धारा में कहीं भी, आज्ञापक शब्द “Must” का प्रयोग कहीं भी नहीं किया गया है, उसमें शब्द “May” का प्रयोग किया गया है। पदावली “जो संयुक्त रूप से हो सकेगी” अपने में शब्द “May” के प्रयोग के कारण खण्ड छाया (penumbra) सम्पत्ति सम्मिलित करता है, जो संयुक्त रूप से पक्षकारों की नहीं हो सकेगी। अधिनियम की धारा 27 विवाह-विषयक न्यायालयों के क्षेत्राधिकार को पक्षकारों की उस संयुक्त सम्पत्ति से ही संव्यवहार करने मात्र तक सीमित करती है जिसे विवाह के समय या उसके आस-पास उपहार स्वरूप दिया गया हो, बल्कि उसमें पक्षकारों की अपवर्जी सम्पत्ति के निस्तारण की अनुमति दी गयी है बशर्ते उन्हें विवाह के समय अथवा उसके आस-पास उपहार स्वरूप दिया गया हो।

सामान्यतया, पत्नी गृहिणी होती है तथा घर में रहती है और पति धन कमाने वाला सदस्य होता है। वह उपार्जन करता है तथा सम्पत्ति अपने ही नाम से अर्जित करता है। उसे उसकी पथक सम्पत्ति के रूप में अर्जित किया जाता है। हमारे देश में ऐसा कोई विनिश्चय नहीं किया गया है कि पति-पत्नी की पृथक् सम्पत्तियों को एक साथ मिलाया जाये एवं उनके मध्य विभाजित करा दिया जाये। तथापि, विश्व के कुछ भागों में, पक्षकारों की अपवर्जी सम्पत्ति को समुदाय की सम्पत्ति अथवा परिवार की आस्ति माना जाता है और उसे तलाक के समय दोनों के मध्य विभक्त कर दिया जाता है। इसका कारण यह है कि गृहणियां भी कार्य करती हैं लेकिन वे सम्पत्ति अर्जित नहीं कर पाती हैं क्योंकि उन्हें धन के रूप में संदाय नहीं किया जाता है। यही कारण है कि इन विधियों को अधिनियमित किया गया था और विश्व के अन्य भागों में उनका समर्थन हुआ।

विवाहार्थ संरक्षण

बाल विवाह अवरोध (संशोधन) अधिनियम, 1978 ने बाल-विवाहों को समाप्त कर दिया है। अब 18 वर्ष से कम आयु की कन्या और 21 वर्ष से कम आयु का युवक विवाह नहीं कर सकता है। अतः अब विवाहार्थ संरक्षक को कोई स्थान नहीं है। धारा 6 (जो अवयस्क कन्या के विवाहार्थ संरक्षक सम्बन्धी थी) का उन्मूलन कर दिया गया है।

(2)

विवाह के अनुष्ठान (Ceremonies of Marriage) (LLB Notes in Hindi English)

अधिकांश हिन्दू विवाहों को सम्पन्न करने के लिये धार्मिक अनुष्ठान अब भी अनिवार्य है। हिन्द आचार्यों। ने विवाह के अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन किया है। वैवाहिक अनुष्ठानों का संक्षिप्त विवरण इस भांति है-विवाह सम्पन्न होने वाले दिन में पूर्वान्ह में वधू का पिता (उसके न होने पर विवाहार्थ संरक्षक) वद्धि श्राद्ध करता है और वधू को स्नान कराने का अनुष्ठान किया जाता है। संध्या को बारात चढ़ती है। वध के घर पहंचने पर बारात का भव्य स्वागत-सत्कार होता है। प्राचीन काल में एक गाय बारातियों के भोज के लिये पथक रख दी जाती थी। बाद में इस प्रथा को छोड़ दिया गया. यद्यपि कहीं-कहीं अब भी बारात आने तक एक गाय बांध कर रखने और बारात के आने पर उसको छोड़ देने की प्रथा है।

– वधू के घर पहुंचने पर सबसे पहले सम्प्रदाय का अनुष्ठान होता है और मंत्रों के उच्चारण के बीच वर को दक्षिणा दी जाती है। तत्पश्चात् प्रथम मुख्य अनुष्ठान, कन्यादान आता है। इस अनुष्ठान में वधू का पिता या संरक्षक कन्यादान करता है और वह कामसूत्र का उच्चारण करते हुये वधू को स्वीकार करता है। इस समय भी। वर को भेंट में एक सोने का टुकड़ा या आभूषण दिया जाता है। तत्पश्चात् वधू का पिता वर से कहता है-“धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के अर्जन में वह वधू का साथ कभी नहीं छोड़ेगा” उत्तर में वह तीन बार कहता है कि वह वधू का साथ कभी नहीं छोड़ेगा।

1. हेमन्त कुमार अग्रहरि एवं अन्य बनाम श्रीमती लक्ष्मी देवी, 2003 विधि निर्णय एवं सामयिकी 726.

अगला प्रमुख अनुष्ठान विवाह-होम है। पवित्र अग्नि प्रज्वलित की जाती है-अग्नि, विवाह संस्कार की देवी साक्षी है और उसकी पवित्रता की संरक्षक है। अग्नि के पश्चिम में एक चक्की का पाट और उत्तरपा पानी का भरा घडा रखा जाता है। वर अग्नि को आहुति देता है जिसमें वधू भी वर का हाथ पकड़ कर सम्मिलित होती है-प्रकाश, पृथ्वी आर स्वर्ग का आहुति दी जाती है। वर कुछ मंत्रों का उच्चारण करता है। इसके पश्चात आता है तीसरा प्रमुख अनुष्ठान, पाणिग्रहण जिसमें वर वधू का कर अंगीकार करता है। गह्य-सत्रों के अनसार यह अनुष्ठान पर खड़े होकर और पश्चिम की ओर मुंह करके करता है जबकि वधू उसके समक्ष पर्व की ओर मंह करके बैठी होती है। वधू का हाथ पकड़ कर वर कुछ मंत्रों का उच्चारण करता है। फिर लाजहोम किया जाता है जिसमें वधू अर्यमा, वरुण, पूषाण और अग्नि को उनके बन्धनों से मुक्त होने के लिये आहति देती है। तत्पश्चात् अग्नि-परिणय का (जिसको ‘फेरे’ कहा जाता है) अनुष्ठान आता है। गृह्य-सूत्रों के अनुसार तीन फेरे पर्याप्त हैं, परन्तु प्रथा पांच या सात फेरों की है। इस अनुष्ठान में वर वधू के आगे चलकर तीन बार अग्नि की परिक्रमा करता है। हर परिक्रमा में वधू वर की सहायता से चक्की के पाट पर चढ़ती है। इस बीच कुछ मंत्रों का उच्चारण करता है। अन्तिम परिक्रमा के अन्त में इस मन्त्र का उच्चारण करते हुये वर वधू की दो लटें खोल देता है, “मैं तुम्हें वरुण के बन्धन से मुक्त करता हूं।”

अन्त में सप्तपदी का अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है। विवाह-मंडप में उत्तरी-पूर्वी दिशा में मंत्रों का उच्चारण करते हुये वर वधू के साथ सात पग चलता है। तत्पश्चात वर-वधु के हाथों पर जल की आहति दी जाती है और कुछ प्रार्थनायें की जाती हैं। प्रार्थनाओं की समाप्ति पर वधू का हाथ अपने हाथ में लेकर कहता है।” मेरे धार्मिक कर्तव्यों की पूर्ति में मेरा साथ दो, मेरे विचारों में साम्य रखो, मेरी और तुम्हारी वाणी एक हो, वृहस्पति तुम्हें और मुझे एकता के सूत्र में बांध दें।” सप्तम पग के पूर्ण होते ही विवाह सम्पन्न हो जाता है। और वर-वधू अटूट बन्धन में बंध जाते हैं।

गृह्य-सत्र अन्य अनुष्ठानों का भी वृत्तान्त देते हैं। उनमें से कुछ वधू की विदाई के समय सम्पन्न होते हैं और कुछ वर के घर वधू के पहुंचने पर और उसके पश्चात् होते हैं। इन अनुष्ठानों का विवाह सम्पन्न होने से कोई सम्बन्ध नहीं है, अत: हम उनका विवरण यहां नहीं दे रहे हैं।

आजकल के हिन्दू विवाहों में उपर्युक्त सभी अनुष्ठान सम्पन्न किये जाते हैं। बहुत कम विवाह ऐसे हैं। जहां वर-वधू मंत्रों का उच्चारण करते हैं या वर-वधू एक दूसरे को सीधे सम्बोधित करते हैं। मंत्रों का उच्चारण विवाह के अनुष्ठान सम्पन्न कराने वाले पुरोहित द्वारा किया जाता है और जहां आवश्यक होता है वर-वधू सिर हिलाकर स्वीकृति देते रहते हैं और आहुति देते रहते हैं। उपर्युक्त कथित सभी अनुष्ठानों का सम्पन्न करना विधि के अन्तर्गत अनिवार्य नहीं है। प्रश्न यह है कि अनिवार्य अनुष्ठान क्या है?

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 7 (1) के अनुसार कोई भी विवाह दोनों पक्षकारों में से किसी भी एक के यहां प्रचलित अनुष्ठानों को सम्पन्न करके किया जा सकता है। धारा 7(4) के अनुसार प्रचलित अनुष्ठानों में सप्तपदी भी सम्मिलित है।

प्रचलित अनुष्ठान दो प्रवर्गों में आते हैं-

(1) शास्त्रिक अनुष्ठान अर्थात् वे अनुष्ठान जिनकी स्थापना विधि के अन्तर्गत की गयी है, और

(2) रूढ़िगत अनुष्ठान अर्थात् वे अनुष्ठान जो रूढ़िगत प्रचलित हैं और किसी जाति, उपजाति या क्षेत्र में। मान्य हैं।

उपर्युक्त कथित अनष्ठानों में से किसी भी एक को सम्पन्न करके हिन्द विवाह किया जा सकता पाद पक्षकार रूढिगत अनुष्ठानों द्वारा विवाह सम्पन्न करना चाहते हैं तो उन्हें यह सिद्ध करना होगा पगत अनुष्ठानों जो वे सम्पन्न कर रहे हैं. रूढिगत हैं और वे (या उनमें से एक पक्ष) उस रूढ़ि द्वारा शासन राहा शास्त्रिक अनुष्ठान सम्पन्न करने के लिये यह सिद्ध करना आवश्यक नहीं है। कागत वन हान पर शास्त्रिक अनुष्ठानों द्वारा ही विवाह सम्पन्न हो सकता है।

1. विबी बनाम रामकली. 1982 इला०248.

आवश्यक शास्त्रिक अनुष्ठान-हिन्दू विवाह अधिनियम इस विषय में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहता है कि विवाह सम्पन्न करने के लिये किन शास्त्रिक अनुष्ठानों का सम्पन्न करना अनिवार्य है। हम ऊपर देख चुके हैं कि कन्यादान, पाणिग्रहण, विवाह-होम और सप्तपदी चार प्रमुख अनुष्ठान हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम केवल सप्तपदी के अनुष्ठान का उल्लेख करता है। सप्तपदी के बिना कोई भी हिन्दू-विवाह शास्त्रिक अनुष्ठानों द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकता है। क्या अन्य तीनों अनुष्ठानों का भी सम्पन्न करना अनिवार्य है। या उनमें से किसी का भी सम्पन्न करना अनिवार्य नहीं है या उनमें से कछ का सम्पन्न करना अनिवार्य है? एक मत यह है कि विवाह-होम भी आवश्यक अनुष्ठान है। इस मत के समर्थन में मद्रास उच्च न्यायालय का एक निर्णय है। यह स्थापित मत है कि अनुष्ठानों को सम्पन्न करने के लिये पुरोहित का होना अनिवार्य नहीं है। परन्तु क्या सतपदी पवित्र अग्नि के समक्ष ही सम्पन्न की जा सकती है? देवानी बनाम चिदम्बरमा में मद्रास उच्च न्यायालय के अनुसार विवाह के लिये दो अनुष्ठान आवश्यक हैं-एक लौकिक, अर्थात कन्यादान का अनुष्ठान और दूसरा धार्मिक अर्थात् पाणिग्रहण और सप्तपदी यह एक स्थापित नियम है कि शूद्रों में विवाह-होम अनिवार्य नहीं है। हिन्दू विवाह के लिये सप्तपदी अनिवार्य अनुष्ठान है, जिसके बिना विवाह सम्पन्न हो ही नहीं सकता है। चाहे सब अन्य अनुष्ठान सम्पन्न कर दिये गये हों, परन्तु यदि सप्तपदी का अनुष्ठान नहीं किया गया है तो विवाह अमान्य और अवैध होगा। ऐसा विदित होता है कि हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत पवित्र अग्नि के समक्ष सप्तपदी करना ही हिन्दू विवाह की अनुष्ठान-मान्यता के लिये पर्याप्त है । धारा 7 (2) से यही आशय निकलता है।

परन्तु क्योंकि हमारा कानून रूढ़िगत अनुष्ठानों को भी मान्यता प्रदान करता है इसलिये सप्तपदी शास्त्रिक विधि द्वारा सम्पन्न विवाह के लिये तो अनिवार्य है परन्तु रूढ़िगत अनुष्ठान द्वारा सम्पन्न विवाह के लिये अनिवार्य नहीं है। रूढ़िगत अनुष्ठान के लिये रूढ़ि द्वारा निर्धारित अनुष्ठान अनिवार्य है।

रूढ़िगत अनुष्ठान के लिये यह सिद्ध करना अनिवार्य है कि वर्ग, जाति या उपजाति में प्राचीन काल से वैसी रूढि चली आ रही है और वर्ग, जाति या उपजाति में वैसे अनुष्ठान को मान्यता है।। रूढ़िगत अनुष्ठान पूर्णतया लौकिक अनुष्ठान हो सकते हैं, वे नाममात्र के ही अनुष्ठान हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि रूढि के अन्तर्गत किसी भी अनुष्ठान का सम्पन्न करना आवश्यक न हो। उदाहरणार्थ संथालों मे वर द्वारा वधू के मस्तक पर सिन्दूर लगाना अनुष्ठान है। दक्षिण भारत के नायाहनो में वर द्वारा वधू के गले में वायद बीता थाली बांधना ही पर्याप्त है। बौद्धों में आपसी सहमति विवाह सम्पन्न करने के लिये पर्याप्त है,किसी अनुष्ठान का करना अनिवार्य नहीं है।10 करेवा’ विवाह के लिये भी किसी अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है: पक्षकारों का दूसरे के साथ पति-पत्नी की भांति रहना ही पर्याप्त है।11 यही बात पंजाब में प्रचलित चादर-अंदोजी विवाह पर लागू होती है।12।

वैवाहिक अनष्ठानों का सम्पन्न करना विवाह की वैधता के लिये अनिवार्य है। यदि आवश्यक बैवाहिक अनष्ठानों को सम्पन्न नहीं किया गया है तो विवाह अमान्य होगा। यदि कोई युगल आवश्यक अनुष्ठानों को

1. देखें, मुल्ला, हिन्दू लॉ (13वां संस्करण) पैरा 537.

2. अप्पी बाई बनाम खीमजी, 1936 बम्बई 138.

3. 1954 मद्रास 657.

4. कान्ता देवी बनाम श्रीराम, 1963 पंजाब 235 में पंजाब उच्च न्यायालय ने भी यही मत व्यक्त किया है.

5. चक्की बनाम अयप्पन, 1989 केरल 89.

6. नीलव्वा सोमनाथ तारापुर बनाम डिवीजनल कंट्रोलर के० एस० आर० टी० सी०, बीजापुर, 2002| कर्नाटक 347.

7. रवीन्द्र नाथ बनाम स्टेट, 1969 कलकत्ता 55.

8. धामा बनाम इम्परर, 1943 पट ।। 109.

9. तिरुमलाई बनाम ऐथिराजामाह, (1947) 1 एम० एल० जे० 538; सुरजीत बनाम गजरा सिंह, 1994 सु० को० 135.

10. भीमें बनाम मिश वे, (1935) 38 कलकत्ता 492.

11. चरण सिंह बनाम गुरदयाल सिह, 1961 पंजाब 301.

12. सोहन सिंह बनाम काबला सिंह, 1928 लाहौर 706.

13. लक्ष्मण सिंह बनाम केशर सिंह, 1966 मध्य प्रदेश 166.

छोड़कर 101 अन्य अनुष्ठान करता है तो भी विवाह अमान्य होगा। जो भी अनुष्ठान विधि के अन्तर्गत या मटि के अन्तर्गत पक्षकारों (या उनमें से एक के यहां) के यहां आवश्यक हैं उन्हीं के द्वारा वैध विवाह सम्पन्न हो ना है। उदाहरणार्थ : यदि एक धर्मतः हिन्दू एक सिक्ख से विवाह करता है तो सप्तपदी (हिन्द अनटान) या आनन्द कारज (सिक्ख अनुष्ठान)का सम्पन्न करना विवाह की वैधता के लिये अनिवार्य है। एक धर्मतः डिन्ट और एक धर्मत: बुद्ध आनन्द-कारज के अनुष्ठान द्वारा वैध विवाह सम्पन्न नहीं कर सकते हैं। यदि हिट विवाह के आवश्यक अनुष्ठान सम्पन्न नहीं हुये हैं तो विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह का रजिस्ट्रीकरण विवाह को वैध नहीं कर सकता है।

द्विविवाह का अभियोजन और दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की याचिका तभी सफल हो सकती है। जबकि आवश्यक वैवाहिक अनुष्ठानों का सम्पन्न होना सिद्ध हो जाये। इस सम्बन्ध में विचित्र तथ्यों का एक वाद है, ‘डॉ० एम० ए० मुखर्जी बनाम स्टेट में एक डॉक्टर मुखर्जी को द्विविवाह के अभियोग में अभियोजित किया गया। डॉक्टर साहब ने अपना दूसरा विवाह तीन अनुष्ठान सम्पन्न करके किया। प्रथमत:, चन्द्रमा-अनुष्ठान, दूसरा; काली के मन्दिर में युगल ने एक दूसरे के गले में मालायें डाली और सात पग चले, और तीसरा अनुष्ठान; गुरुग्रंथ साहिब के समक्ष किया, अर्थात् उन्होंने अपनी ओर से मुस्लिम, हिन्दू और सिक्ख के अनुष्ठान सम्पन्न किये। इनमें से कोई भी अनुष्ठान ऐसा नहीं था जो विधि द्वारा वर या वधू के यहां मान्य हो। इसका तात्पर्य यह हुआ कि उन्होंने कोई भी वैध अनुष्ठान सम्पन्न नहीं किया। वध और मान्य अनुष्ठान सम्पन्न न होने के कारण यह माना जायेगा किसी भी विवाह का अनुष्ठान सम्पन्न नहीं हुआ, अतः द्विविवाह का अभियोजन असफल रहा। यही मत उच्च न्यायालय ने व्यक्त किया है। दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की याचिका भी तभी सफल हो सकती है जबकि मान्य वैवाहिक अनुष्ठानों का सम्पन्न होना सिद्ध हो जाये।

नये अनुष्ठानों का आविष्कार-क्या कोई वर्ग, जाति, उपजाति,संस्था या आन्दोलन विवाह के नये अनुष्ठानों का आविष्कार कर सकता है? जब आर्य समाजियों ने विवाह के अनुष्ठान में परिवर्तन किया (यद्यपि उसके अनुसार ये अनुष्ठान वैदिक अनुष्ठान ही हैं) तो एक विधेयक पास करना आवश्यक हुआ कुछ समय पूर्व तमिलनाडु के ब्राह्मण-विरोधी एक संगठन ने भी धार्मिक अनुष्ठानों को त्याग कर नये अनुष्ठानों को निर्धारित किया जिसके अन्तर्गत निमन्त्रित अतिथियों के समक्ष वर-वधू अपनी अंगूठियां बदलते हैं और एक दूसरे को जयमाला पहनाते हैं। मद्रास उच्च न्यायालय ने इन विवाहों के, अमान्य घोषित करते हुये कहा है कि विवाह के अनुष्ठानों को सुधारना एक सराहनीय कार्य हो सकता है, परन्तु यह काम कोई आंदोलन, संस्था या व्यक्ति नहीं कर सकता है। यह कार्य विधान-मण्डल ही कर सकते हैं। इन निर्णयों के फलस्वरूप तमिलनाडु राज्य से एक विधेयक पास करके इन अनुष्ठानों द्वारा सम्पन्न किये गये विवाहों को मान्यता दी गयी। है।

हिन्द विधि के अन्तर्गत वैवाहिक अनुष्ठानों को सम्पन्न करके ही वैध विवाह किया जा सकता है। वे अनष्ठान चाहे जो भी हों। कोई भी दो व्यक्ति स्वेच्छा से या लिखित अनुबन्ध के अन्तर्गत वर्षों से पति-पत्नी की।

1. शकुन्तला बनाम नीलकण्ठ, (1973) महाराष्ट्र लॉ जर्नल 310, हिन्दुओं द्वारा बौद्ध अनुष्ठान द्वारा सम्पन्न किया गया विवाह शून्य है.

2. संजय बनाम एवरलीन 1993 मध्य प्रदेश 54.

3.1969 इलाहाबाद 489.

4. भाऊराम बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1964 सुप्रीम कोर्ट 1504%; केवलराम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, 1966 सुप्रीम कोर्ट 641; कटारा बनाम कटारी, 1994 आ० प्र० 364.

5. देवयानी बनाम चिदम्बरा, 1954 मद्रास 567; पुरविया बनाम थोपली.1966 हिमाचल प्रदेश 20,

6. आर्य मैरिज वेलीडेशन ऐक्ट, 1937 सिक्ख विवाहों के लिये आनन्द कारज ऐक्ट, 1909 पास किया। गया था.

7. देवयानी बनाम चिदाम्बरा, 1954 मद्रास 651; राजोठी बनाम सेलियह, (196672 एमएल

8. इसके फलस्वरूप हिन्द विवाह अधिनियम में एक नई धारा 7-क जोड़ी गयी है।

भांति रह रहे हों तब भी विधि के समक्ष वे पति-पत्नी की संस्थित को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। उनकी संतान अवैध संतान होगी।

विवाह के पक्ष में उपधारणा-साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के अन्तर्गत यह उपबन्ध है कि यदि विवाह सम्पन्न होने का कोई स्वतन्त्र साक्ष्य उपलब्ध नहीं है तो पक्षकारों के बीच लगातार सहवास के आधार पर विवाह को वैध माना जायेगा। विधि की नीति विवाह की वैधता के पक्ष में है और यह सिद्ध होने पर कि पक्षकार पति-पत्नी की भांति वर्षों से रहते आ रहे हैं, तो उन्हें विवाहित माना जायेगा। लगातार और लम्बा सहवास (Cohabitation) विवाह के पक्ष में उपधारणा स्थापित करता है और जो उस युगल को पति-पत्नी नहीं मानते हैं, उन्हें ही यह सिद्ध करना होगा कि पक्षकारों के बीच अनुष्ठान नहीं हये हैं। यह उपधारणा द्विविवाह के अभियोजन और दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना पर लागू नहीं होती है।

विवाहों का रजिस्ट्रीकरण-परम्परागत हमारे यहां रजिस्ट्री की कोई विधि नहीं रही है। 1955 तक न ही हिन्दू विवाहों का रजिस्ट्रीकरण आवश्यक था और न ही रजिस्ट्री की कोई विधि थी। हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत भी विवाहों का रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य नहीं है। पर जहां विवाह रजिस्टर करना हो वहां याचिका सम्पन्न होने के 15 दिन के भीतर दी जानी अनिवार्य है। सम्भवतः यह इसलिये है कि हिन्दू विवाह इतने धूमधाम से मनाये जाते हैं और वंशावलियों में अंकित होते हैं कि उनसे प्रमाण की कभी कोई कठिनाई नहीं होती। विवाहों का रजिस्ट्रीकरण विवाह के प्रमाण के अतिरिक्त और कुछ हैं भी नहीं। हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत यह उपबन्ध है कि राज्य सरकारें चाहे तो विवाहों के रजिस्ट्रीकरण के नियम, विवाह का रजिस्टर और हिन्दू विवाहों का या कुछ विशेष भांति के विवाहों को अनिवार्य रूप से वैवाहिक रजिस्टर में दर्ज कराने का उपबन्ध बना सकती है। मद्रास उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया है कि रजिस्ट्रीकरण को अनिवार्य बनाया जाना चाहिये। परन्तु यदि आवश्यक अनुष्ठान सम्पन्न नहीं हुये हैं तो, रजिस्ट्री मात्र विवाह में अनुष्ठानों का सबूत नहीं है। रजिस्ट्रीकरण एक अवैध विवाह को वैध नहीं बना सकता।

विवाह का रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य-हिन्दू विवाह अधिनियम में विवाह के पंजीयन के सम्बन्ध में नियम बनाने के लिये राज्य सरकार को समर्थ बनाया गया है, धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन यदि राज्य सरकार की यह राय हो कि वह पंजीयन अनिवार्य होना चाहिये तो वह इस प्रकार उपबन्ध कर सकती है। उस दशा में इस सम्बन्ध में बनाये गये किसी भी नियम का उल्लघन करने वाला व्यक्ति अर्थदण्ड से दण्डनीय होगा। यद्यपि अधिकांश राज्यों ने विवाह के पंजीयन के सम्बन्ध में नियमों की विरचना की है लेकिन फिर भी विवाह का पंजीयन अनेक राज्यों में अनिवार्य नहीं है। यदि विवाह के अभिलेख को रखा जाता है तो भारी। सीमा तक दो व्यक्तियों के मध्य विवाह के अनुष्ठान के सम्बन्ध में विवाह टाला जाता है। राष्ट्रीय आयोग द्वारा प्रतिवाद किया गया है, कि अधिकांश वादों में विवाहों के पंजीयन न किये जाने से स्त्रियां भारी सीमा तक प्रभावित होती हैं। यदि विवाह का पंजीयन किया जाता है तो उसमें विवाह के होने के साक्ष्य का भी उप किया जाता है एवं विवाह के होने की विखण्डनीय उपधारणा का उपबन्ध होगा। यद्यपि स्वयं पंजीयन ही .

1 डेरेज ने इसके विपरीत मत प्रतिपादित किया है, देखें, डेरेट क्रीटिक ऑफ माडर्न हिन्द लॉ पट 500 और देखें, रेडोलगोट (1968) आन्ध्र प्रदेश 117, इस लेखक के मत के समर्थन में।

वान सब्रमन्यम बनाम श्रुतयम, 1992 सु० को० 756; चन्दू बनाम खालीलर, (1949)2 कलकत्ता 2293 नन्द बनाम ओंकार, 1960 राजस्थान 252; गोकुल बनाम प्रवीण, 1962 सुप्रीम कोर्ट 231; पोनम्म बनाम कामरा, (1972) 1 एम० एल० जे० 364; शंकरप्पा बनाम सुशीलाबाई, 1984 कर्नाटक 1121 कित्वेश्वर बनाम सोनला, 1991 गौहाटी 61; निर्मला बनाम रूक्मणी, 1994 का 247

3. फनकारी बनाम स्टेट, 1965 जम्मू और कश्मीर 105.

४. पं० रमेश कुमार बनाम सचिव, कन्नापुरम ग्राम पंचायत, 1998 केरल 95

5. हिन्दू विवाह अधिनियम, धारा 8.

6. कनगावल्ली बनाम सरोजा, 2002 मद्रास 73.

7. संजय बनाम चौबे, ए० आई० आर० 1993 मध्य प्रदेश S4

8. कनगावल्ली बनाम सरोजा, 2002 मद्रास 73.

वैध विवाह का प्रत्यक्ष सबूत नहीं हो सकता है और वह विवाह की वैधता के सम्बन्ध में अवधारक घटक नहीं होगा लेकिन फिर भी उसका बच्चों की अभिरक्षा, उन दो व्यक्तियों, जिनका विवाह पंजीकृत है, के विवाह बन्धन से उत्पन्न बच्चों के अधिकार, विवाह के पक्षकारों की आयु से सम्बन्धित मामलों से अत्यधिक सायिक मल्य होता है। ऐसा होने पर यह समाज के हित में ही होगा बशर्ते विवाह को अनिवार्य रूप से पंजीकत किये जाने योग्य बनाया गया हो। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 8 को अधिनियमित करने से विधायी आशय अभिव्यक्ति “हिन्दू विवाहों के सबूत को सरल बनाने के प्रयोजनार्थ” के प्रयोग से प्रकट होता है। स्वाभाविक परिणाम के रूप में पंजीयन न किये जाने का परिणाम यह होगा कि उपधारणा जो विवाह के पंजीयन से उपलब्ध है, ऐसे व्यक्ति के लिये इन्कार की जायेगी जिसके विवाह का पंजीयन नहीं हुआ है। उच्चतम न्यायालय का मत है कि उन सभी व्यक्तियों का विवाह, जो विभिन्न धर्मों के होते हुये भारत के नागरिक हैं, क्रमश: अपने-अपने राज्यों में जहां विवाह का अनुष्ठान हुआ है अनिवार्य रूप से पंजीयन योग्य बनाये जाने चाहिये।

विवाह की सम्पूर्णता-भाऊराव शंकर लोखाण्डे बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा विवाह संस्कार के सम्बन्ध में विचार किया गया था एवं अभिनिर्धारित किया गया था कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 7 के अन्तर्गत विवाह संस्कार का विधिवत् सम्पन्न किया जाना एवं उचित अनुष्ठानों से युक्त होना चाहिये। धार्मिक अनुष्ठानों या प्रथागत रीतिरिवाजों के माध्यम से पूरा किया गया विवाह, विवाह को सिद्ध करने की आवश्यक शर्त है। विवाह के समय ज्वलित अग्नि के समक्ष सात फेरे लिये जाने के पश्चात् सप्तपदी द्वारा विवाह सम्पूर्णता को प्राप्त कर लेता है।

रूढ़ि एवं प्रथा की प्राथमिकता-उच्चतम न्यायालय ने डॉ० सूरजमणि बनाम दुर्गाचरन हन्सदह के वाद में निर्णय प्रदान किया कि यदि कोई व्यक्ति अनुसूचित जनजाति का है और उसने दूसरा विवाह अपनी जाति के अन्तर्गत भान्य रूढि एवं प्रथा के अधीन कर लिया है तो ऐसे व्यक्ति को हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2 (2) के अर्थान्तर्गत दोषी नहीं ठहराया जा सकता एवं उसे भारतीय दण्ड संहिता, 1860 को धारा 494 के अधीन बहुविवाह हेतु अभियोजित नहीं किया जा सकता।

उपरोक्त मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि, यदि अनुसूचित जनजाति में रूढ़ि एवं प्रथा के अन्तर्गत मान्यता प्रदान की गयी है तो ऐसी परिस्थिति में रूढ़ि एवं प्रथा अभिभावी होगी।

रूढिगत अनुष्ठान-वर या वधू के यहां जो भी रूढिगत अनुष्ठान मान्य हैं उनके सम्पन्न करने से मान्य विवाह किया जा सकता है। विवाह के या अनुष्ठान कुछ भी क्यों न हों, सप्तपदी का होना भी अनिवार्य है।

शून्य या शून्यकरणीय विवाह से उत्पन्न सन्तान का अधिकार-शून्य या शन्यकरणीय विवाह से। पैदा हुयी सन्तान अपने पिता द्वारा अर्जित व्यक्तिगत सम्पत्ति एवं आय में अंश को प्राप्त करने का अधिकारी है, वह पिता का पैतृक या संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में कोई भी अंश नहीं प्राप्त कर सकता

सहमति आवश्यक-बल द्वारा प्राप्त सहमति विवाह को विधिमान्य नहीं बनायेगी, बशर्ते यह सिद्ध किया जा सकता रहा हो कि सहमति को बल प्रयोगद्वारा प्राप्त किया गया था अथवा वह अनैच्छिकपूर्ण ढंग से । दी गयी थी।

1. श्रीमती सीमा बनाम अश्विनी कुमार, 2006 विधि निर्णय एवं सामयिकी 512 (एस० सी०), श्रीमती सीमा बनाम अश्विनी कुमार, 2008 विधि निर्णय एवं सामयिकी 250 (एस० सी०) में उच्चतम न्यायालय ने अग्रेतर निर्देश जारी किये हैं.

2. ए० आई० आर०2001 एस० सी० 1108.

3. ए० आई० आर० 2001 एस० सी० 938.

4. राजदेवी बनाम लोटन, 1980 इला०109.

५. जीनीया कियोटीन बनाम कुमार सीताराम मांझीए आई0आर02003 एस० सा०750

७. श्रीमती अंजू शर्मा बनाम सरेश कुमार, ए० आई० आर० 1998 दिल्ली 47कुमार सिविल न्यायाधीश, (ज्येष्ठ खण्ड) 2005 वी० एन० एस० 474 (ला) आई० आर० 1998 दिल्ली 47, कुमारी कीति शर्मा बनाम।

विवाह की सामर्थ्य (LLB Study Material in English)

अंग्रेजी शासन काल में यह स्थापित मत था कि हिन्दू विवाह दस संस्कारों में से एक है, प्रत्येक हिन्द विवाह कर सकता है, विवाह के लिये किसी भी सामर्थ्य का होना आवश्यक नहीं है, और हिन्द के लिये कोई वैवाहिक असमर्थता नहीं है। पुरानी विधि के अन्तर्गत विवाह के लिये वर्जनायें अवश्य थीं जिनके आधार जाति, गोत्र, धर्म और रक्त या विवाह द्वारा सम्बन्ध था।

अन्तर्जातीय एवं अन्तर-उपजातीय विवाह (LLB Study Material)

सम्भवत: वैदिक युग में अर्जातीय विवाह वर्जित नहीं थे। यह प्रतीत होता है कि उत्तर वैदिक युग में वर्ण-व्यवस्था परिदृढ़ हो गयी थी और अन्तर्वर्णीय विवाह वर्जित कर दिये गये थे। स्मृतिकारों ने दो भांति के अन्तर्जातीय विवाहों का विवरण दिया है-(क) अनुलोम विवाह-जब ऊंचे वर्ण का पुरुष नीचे वर्ण की कन्या से विवाह करता है तो उसे अनुलोम विवाह की संज्ञा दी जाती है; उदाहरणार्थ ब्राह्मण पुरुष का क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र कन्या से विवाह या क्षत्रिय पुरुष का वैश्य या शूद्र से विवाह, (ख) प्रतिलोम वह विवाह है जिसमें निम्न वर्ण के पुरुष का उच्च वर्ण की कन्या से विवाह होता है। उत्तरवैदिक युग में सवर्ण विवाह ही मान्ये थे। प्रतीत यह होता है कि आगे चलकर यह वर्जना अन्तर-उपजातीय विवाहों पर भी लगा दी गयी। अंग्रेजी शासन-काल से लेकर 1949 तक सिथति यह थी कि समस्त भारत में प्रतिलोम विवाह वर्जित और अमान्य थे। बम्बई, आसाम और बंगाल को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में अनुलोम विवाह, वर्जित अमान्य और अवैध थे। अंग्रेजी शासन-काल में अन्तर्जातीय विवाह विशेष विवाह अधिनियम, 1923-1972 के अन्तर्गत सिविल मैरेज के रूप में किया जा सकता था। 1937 से आर्य मैरेज वैलिडेशन ऐक्ट, 1937 के अन्तर्गत आर्यसमाजी अन्तर्जातीय विवाह कर सकते थे। 1949 हिन्दू मैरेज वैलिडिटी ऐक्ट, 1949 के अन्तर्गत सब हिन्दू अन्तर्जातीय विवाह कर सकते थे। इस अधिनियम के अन्तर्गत सिक्ख और जैन हिन्दू की पारंभाषा में आते हैं। अन्तर-उपजातीय विवाह भी हिन्दू मैरेज (रिभूवल ऑफ डिसेबिलिटीज) ऐक्ट, 1949 के अर्न्तगत वैध माना गया है।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत अन्तर्जातीय और अन्तर-उपजातीय विवाह मान्य हैं। विधेयक के अन्तर्गत विवाह किन्हीं दो हिन्दुओं के बीच सम्पन्न किया जा सकता है।

गांत्र, प्रवर एवं पिण्ड की वर्जनायें-हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, सगोत्र, सप्रवर और सपिण्ड विवाह वर्जित थे। इस भांति के विवाह अमान्य और अवैध थे।

सगोत्र और सप्रवर विवाह-हिन्दुओं में यह विश्वास है कि उनमें से प्रत्येक किसी-न-किसी ऋषि की सन्तान हैं। एक ऋषि की सन्तान का गोत्र एक ही होता है। दूसरे शब्दों में एक ऋषि की पुरुष परम्परा में समस्त वंशजों का एक ही गोत्र होता है। यह गोत्र है, उस पूर्वज ऋषि का नाम । गोत्र की अन्य व्याख्यायें भी दी। गयी हैं। सम्भवतः प्रारम्भ में गोत्र का अर्थ था ‘बन्ध’ जो भी अन्य व्याख्यायें गोत्र की रही हों; यह स्पष्ट है कि स्मृतियों और गृहसूत्रों के काल में सगोत्रीय विवाह वर्जित थे।

गोत्र के संस्थापक के तीन पारम्परिक पूर्व-पुरुष को सप्रवर को कहा जाता है। प्रवर का शाब्दिक अर्थ है। आहत करना। सम्भवतः यह भारतीय आर्यों में अग्नि-पूजा से सम्बन्धित है, अग्नि के समक्ष आहुति देते हुये। परोहित, ऋषि-पूर्वजों को आहूत करना था जिसे वे अर्पित आहूति को ईश्वर तक पहुंचा दें। अत: प्रवर उन पर्वजों को कहने लगे जिन्होंने अग्नि को आहत किया था। इस आधार पर यह नियम बना कि कोई भी व्यक्ति उस कन्या से विवाह नहीं करेगा जिसका सम्बन्ध उसके प्रवरों से हो।

1. बाई गलाब बना जीवन लाल, (1922) 46 बम्बई 47; नाथ बनाम मेहता (1931) 55 बम्बई 15 कस्तरों बनाम चिरंगी, 1962 इलाहाबाद 446.

विस्तृत विवरण के लिये देखें, पारस दीवान-हिन्दू लॉ ऑफ मिक्स्ड मैरिजेज, 1953 सुप्रीम कोर्ट जर्नल 232.

गोत्र और प्रवर की वर्जनायें (Prohibitions) शूद्रों पर लागू नहीं होती है। अंग्रेजी शासन-काल में सप्रवर विवाह मान्य माने जाने लगे, परन्तु सगोत्र विवाह अमान्य ही रहे। हिन्दू मैरेज (डिसेबिलिटीज रिमूवल) ऐक्ट, 1946 के अन्तर्गत सगोत्रीय विवाहों को भी मान्य घोषित किया गया। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत सगोत्रीय और सप्रवर विवाह मान्य हैं।

अन्तर्धार्मिक (Inter-religious) विवाह-हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के लागू होने के पूर्वन्यायालयों ने धर्मतः हिन्दू, सिक्ख, और बौद्ध के बीच विवाह को मान्य ठहराया था। इस भांति के विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत भी मान्य हैं। न्यायाधीश ने यह मत भी व्यक्त किया था कि हिन्दू और धर्मतः अहिन्दू के बीच भी विवाह मान्य हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री किदवई ने कहा कि धर्मशास्त्रों में ऐसा कोई नियम नहीं है जिसके अन्तर्गत हिन्दू का अहिन्दू से विवाह वर्जित हो।

मैसूर उच्च न्यायालय ने भी यही मत व्यक्त किया है। परन्तु अब हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत हिन्दू और अहिन्दू के बीच विवाह मान्य नहीं होगा, क्योंकि यह अधिनियम हिन्दुओं के बीच विवाह के नियम बनता है, और अहिन्दू के बीच नहीं विदेश में हिन्दू और अहिन्दू के बीच सम्पन्न हुआ विवाह मान्य होगा यदि वहां की विधि के अन्तर्गत वह मान्य हो या वह विदेशी विवाह अधिनियम, 1969 के अन्तर्गत सम्पन्न हुआ हो।

सपिण्ड और प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी-धर्मशास्त्रों के अनुसार समीप के नातेदारों के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध निषिद्ध ही नहीं अपितु पाप भी माना जाता था। अपनी माता, बहिन, पुत्री और पुत्रवधू के साथ लैंगिक सम्बन्ध महापातक था। हिन्दू विधि में प्रतिषिद्ध कोटियों के नातेदारों से विवाह कब निषिद्ध माना गया है, इस बारे में हमारा ज्ञान अभी अधूरा है। प्रतीत ऐसा होता है कि शतपथ ब्राह्मण के युग में प्रतिषिद्ध कोटियां तीसरी या चौथी कोटि के पूर्वजों तक ही सीमित थीं। गृहसूत्रों के युग में यह पूर्णतया स्थापित हो गया कि सपिण्ड और गोत्रज से विवाह निषिद्ध है। तत्पश्चात् यह नियम स्थापित हुआ कि कोई भी व्यक्ति माता की ओर से पूर्वजों की पांच कोटियों तक और पिता की ओर से पूर्वजों की सात कोटियों तक किसी से विवाह नहीं कर सकता है। हिन्दू विवाह अधिनियम के लागू होने के पूर्व तक यही नियम मान्य था |

सपिण्ड नातेदारी के सिद्धान्त-हिन्दू विधि में सपिण्ड नातेदारी के दो सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं-आहुति सिद्धान्त’ और एक ही शरीर के कण सिद्धान्त । विज्ञानेश्वर के पूर्व सपिण्ड नातेदारी का सिद्धान्त आहति या पिण्डदान के धार्मिक सिद्धान्त से जुड़ा हुआ था। हिन्दू लोग पूर्वज-उपासना में विश्वास करते हैं। अपने पूर्वजों का श्राद्ध करना इस उपासना का ही एक रूप है। श्राद्ध में वे अपने पूर्वजों को पिण्ड अर्पित करते। हैं। पिण्ड चावल से बनाये जाते है। नियम यह है कि प्रत्येक हिन्दू अपने पिता की ओर से तीन पितरों को एक-एक पूर्ण पिण्ड अर्पित करता है और अपनी माता की ओर से दो पितरों को पूर्ण पिण्ड अर्पित करता है। वह पिता की ओर से अन्य तीन पितरों को और ऐसे दो अन्य पितरों को लेप (या अर्द्धपिण्ड) अर्पित करता है। इस भांति वह पिण्ड द्वारा पिता की ओर से और माता की ओर से चार पितरों से नातेदारी का सम्बन्ध रखता है। पितरों की डिग्रियां (कोटियां) गिनने में हम पिण्डदान करने वाले से गिनना आरम्भ करते हैं और इसलिये हम कहते हैं कि पिता की ओर से वह सात डिग्रियों के पितरों से और माता की ओर से पांच डिग्रियों के पितरों से सपिण्ड नातेदारी का सम्बन्ध रखता है। इसे हम निम्न आरेख द्वारा समझ सकते हैं।

1. बहादुर सिंह बनाम करतार सिंह, 1950 मध्य भारत 1 (सिक्ख और हिन्दू के बीच विवाह).

2. दुबे बनाम दुबे, 1951 इलाहाबाद 629.

3. राजमल बनाम मोरियामल, 1954 मैसूर 38.

4. चेरीस चरा बनाम चेटी (190) प्रोबेट 67 (अंग्रेजी रिपोर्ट) सेनापति बनाम सेनापत्ति, 1932 लाहार 116

5. विष्णु के अनसार ऐसे व्यक्ति के लिये कोई प्रायश्चित पर्याप्त नहीं है, इसके अतिरिक्त का प्रज्वलित अग्नि 12313 वह अपनी आहति दे दे, विष्णुस्मृति 34, 1.10 और देखें, मनुस्मृति 11,59 यावर बौधायन धर्मसूत्र 29, 2, 13.

6. याज्ञवल्क्य 1,52,53, मनु. 3,5.

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द्विविवाह के अन्तर्गत बहुपत्नीत्व (Polygamy) एवं बहुपतित्व (Polyandry) विवाह दोनों ही सम्मिलित हैं। बहुपत्नीत्व-विवाह पुरुष को एक साथ एक से अधिक पत्नी रखने की स्वतन्त्रता देता है। बहुपतित्व-विवाह स्त्री को एक साथ एक से अधिक पत्नी रखने की स्वतन्त्रता देता है। वैदिक युग से लेकर हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के लागू होने तक हिन्दू विधि बहुपत्नीत्व विवाह को मान्यता देती थी। बम्बई प्रांत में बहुपत्नीत्व विवाह 1948 में और मद्रास प्रान्त में 1949 में समाप्त कर दिया गया था। हिन्दू विधि के अन्तर्गत बहपत्नीत्व-विवाह कभी भी मान्य नहीं रहे। परन्तु भारत के कुछ भागों में रूढ़ि के अन्तर्गत बहुपतित्व विवाह प्रचलित रहे हैं। हिन्द विवाह अधिनियम, 1955 ने अब द्विविवाहों को समाप्त कर दिया है। धारा 5 (i) के अनुसार भी यह आवश्यक शर्त है कि विवाह के समय किसी भी पक्षकार का पति या पत्नी जीवित नहीं हों। द्विविवाह शून्य है, शून्यकरणीय नहीं बल्कि शून्य है। धारा 11 द्वारा यह स्पष्ट है।’

धारा 17 द्विविवाह को दाण्डिक अपराध (Criminal offence) मानती है। और द्विविवाह करने वाली स्त्री या पुरुष का अभियोजन (Prosecution) दाण्डिक विधि संहिता की धाराओं 494 और 495 के अन्तर्गत हो सकता है।

द्विविवाह का अपराध उस समय घटित होता है, जब कोई स्त्री या पुरुष अपने युगल के होते हुये भी विवाह कर लेता है। द्विविवाह का अपराध तब ही बनता है जबकि पहला विवाह वैध हो। पहले विवाह के शून्य होने पर वह द्विविवाह का अपराधी नहीं होता है। परन्तु पहले विवाह के शून्यकरणीय होने पर द्विविवाह अपराध बनता है। हम पहले भी कह चुके हैं कि द्विविवाह अपराध तब ही बनेगा जब कि दूसरे विवाह के समस्त मान्य अनुष्ठान पूर्ण रूप से सम्पन्न हये हों। उनके प्रमाण के अभाव में द्विविवाह का अभियोजन विफल हो जायेगा। द्विविवाह के अभियोजन के आरम्भ होने के पूर्व ही यदि द्विविवाह न्यायालय की डिक्री द्वारा शून्य घोषित हो गया है तो द्विविवाह का अभियोजन नहीं चल सकता है। पक्षकारों को पति-पत्नी की भांति रहने की स्वेच्छा और उसके साथ-साथ वस्तुत: पति-पत्नी के रूप में रहने मात्र से ही वे विवाहित नहीं हो सकते हैं, न ही वे पति-पत्नी की प्रास्थिति (Status) को प्राप्त कर सकते हैं। यदि वे पति-पत्नी नहीं हैं तो द्विविवाह के अपराधी भी नहीं हैं।

यह ध्यान रखने योग्य बात है कि द्विविवाह की पत्नी व द्विविवाह का पति, पति-पत्नी की प्रास्थिति प्राप्त नहीं करते हैं, परन्तु यदि द्विविवाह का पति या पत्नी शून्यकरणीय की याचिका प्रेषित करें तो दोनों में से कोई भी पक्ष अन्तरिम और स्थायी भरण-पोषण प्राप्त कर सकता है।

प्रतीत यह होता है कि यदि पति या पत्नी दूसरा विवाह करने जा रहा है तो दूसरा पक्षकार न्यायालय द्वारा प्रतिषेधात्मक व्यादेश (Prohibitory injunction) प्राप्त कर सकता है।

विवाह का कोई पक्षकार यदि द्विविवाह कर लेता है तो वह विवाह शन्य है और शन्यकरणीय की याचिका न्यायालय में प्रेषित करके शून्यकाल की डिक्री प्राप्त की जा सकती है। द्विविवाह करने वाले व्यक्ति की दसरी पत्नी शन्यकरण की याचिका प्रेषित कर सकती है। पहली पत्नी को ऐसी याचिका प्रेषित करने का। अधिकार नहीं है। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 12 स्पष्ट रूप से यह कहती है कि दूसरे विवाह का

१. हिमांचल प्रदेश की लाहोल वादी में और दक्षिण मालाबार के थियाओं में बहुपतित्व विवाह मान्य रहे हैं। देखें, थियाओ के बारे में, कृष्णन नाम अलल, 1972 केरल 19.

2. यमना बाई बनाम अनन्तराव, 1988 सु० को० 344; सन्तोष बनाम सुरजीत, 1990 हि० प्र०77.

3. कंबलराम बनाम हिमाचल प्रदेश, 1966 सु० को० 641; वर्धाराजन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास, 1956 एस० सी० 1942; भावराव बनाम महाराष्ट्र स्टेट, 1965 सु० को 19643; पुहुल्लापविती बनाम पुदुन्लापथि, MO2 आन्ध्र प्रदेश 311: कुन्तीदेवी बनाम श्रीराम, 1963 पंजाब 233.

4. प्रिया बनाम सरेश, 1971 सुप्रीम कोर्ट 1153; शान्ति बनाम कथन, 1991 सु० को 816,

देखे, शंकरप्पा बनाम वसम्मा, 1964 मैसूर 247, सीताबाई बनाम रामचन्द्र, 1958 बम्बई 116 (पूर्णपीठ), ति मत के लिये देखें, सम्पत, (1972) एल० एल० ज० (जनल) पृष्ठ 2-6.

पक्षकार ही विवाह के शून्यकरण की याचिका प्रेषित कर सकता है। प्रतीत यह होता है कि पहली पत्नी सिविल न्यायालय में विवाह के शून्यकाल को घोषणा दावा विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act), 1963 के अन्तर्गत ला सकती है। इसके अतिरिक्त वह विवाह-विच्छेद की याचिका भी धारा 13 (1) के अन्तर्गत यह कहकर ला सकती है कि उसके पति ने जारकर्म किया है।

मानसिक सामर्थ्य-अनुमति देने में असमर्थ और चित्त-विकृति (Mental capacity; incapacity to consent and mental disorder) (LLB Notes in Hindi)

एक युग में मान्यता यह थी कि प्रत्येक हिन्दू के लिये ब्रह्मचर्य आश्रम के पश्चात् गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना अनिवार्य । हमारे आचार्यों ने विवाह की सामर्थ्य और योग्यता की विस्तृत विवेचना की है। उन्होंने यह भी निर्धारित किया है कि वर-वध में क्या-क्या गण होने चाहिये और कौन-से अवगण व खोट नहीं होनी चाहिये। उन्होंने विषय की सूक्ष्म विवेचना की है। परन्तु अंग्रेजी शासन काल में यह मानकर कि विह एक आवश्यक संस्कार है, न्यायालयों ने यह मत दिया कि हिन्दू विवाह के लिये सामर्थ्य का होना महत्वहीन है। हिन्दू विवाह अधिनियम के लागू होने के पूर्व स्थिति यह थी कि प्रत्येक हिन्दू विवाह की सामर्थ्य रखता था, चाहे वह जड़ हो, नपुंसक हो, या किसी भी आयु का हो। इस लेखक का निवेदन है कि हिन्दू विधि के पाठ इस मत का समर्थन नहीं करते हैं बल्कि वे इसके विपरीत हैं।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन यह नियम था कि विवाह के समय वर या वधू को जड़ (Idiot) या पागल (Lunatic) नहीं होनी चाहिये। परन्तु ऐसा विवाह शून्य नहीं था। यह केवल शून्यकरणीय था। जिसका अर्थ है कि जब तक न्यायालय द्वारा शून्यकरणीय की डिक्री पारित न हो जाये, विवाह वैध रहता था।

सन् 1976 के संशोधन द्वारा इस खण्ड का गठन इस भांति किया गया है-विवाह के समय वर और वधू दोनों में से कोई भी : (क) चित्तविकति के परिणामस्वरूप विधिमान्य सम्मति देने में असमर्थ न हों, या, (ख) विधिमान्य सम्मति देने में समर्थ होने पर भी इस प्रकार के या इस हद तक मानसिक विकार से ग्रस्त न हो कि वह विवाह और सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य हो, या (ग) उसे उन्मत्तता (या मिरगी)7 का दौरा बार-बार न पड़ता हो।

सन् 1976 के संशोधन का तात्पर्य यह है कि अब वर या वधू जड़बुद्धि या पूर्ण पागल होने पर ही विवाह के अयोग्य नहीं हैं, बल्कि पागलपन की कुछ स्थितियों में वे विवाह करने के अयोग्य हैं। पागलपन में मस्तिष्क की दर्बलता, सनकी होना या झक्की होना सम्मिलित नहीं है। इसी तरह मूढ़ता, बेवकुफी अक्खड़पन, अत्यधिक भावुकता पागलपन की परिभाषा में नहीं आते हैं।

अलका शर्मा बनाम अविनाश चन्द्र में यह प्रश्न सामने आया है कि वे क्या स्थितियां हैं जब चित्तविकति के कारण कोई व्यक्ति इस प्रकार से मानसिक विकार से ग्रस्त हों कि विवाह और सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य हों। माननीय न्यायाधीश ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति विवाह क्या है, यह समझने में असमर्थ हैया।

1. केदारनाथ बनाम सुप्रभा, 1963 पटना 311.

2. (1964) 2 इलाहाबाद वीकली रिपोर्ट्स 142.

3. अमृताम्मल बनाम वाल्लियम्मल, 1942 मद्रास 693; उसी वर्ष इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी यही मत। व्यक्त किया है, भगवती शरण बनाम परमेश्वरी, (1942) इलाहाबाद 518.1

4. देखें, इस लेखक का निबन्ध मैरेज ऑफ न्यूमेटिक्स अण्डर हिन्दू ला, 1953 इलाहाबाद ला जर्नल 24, और देखें, मैरेज ऑफ इम्पोटेंट परसन्स अण्डर हिन्दू लॉ, (1966)2 दी लॉ रिव्यू 401-2111

5. धारा 5 (ii).

6. देखें, धारा 12 हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955, 7. विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1999 की धारा 2 द्वारा अब साधना आधानयम, 1999 की धारा 2 द्वारा अब मिमी’ शब्द को हटा (omiseay दिया गया है.

8. 1991 मध्य प्रदेश 205.

वह सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य है तो उसे चित्तविकृत माना जायेगा। इस वाद में यह पाया गया कि पत्नी बहत ही ठण्डी और नर्वस प्रकृति की थी, वह यह नहीं समझती थी कि यौन संभोग क्या है और नहीं वह उसमें सहयोग देने के योग्य थी। वह रसोई के बर्तन आदि का रखरखाव करने में अयोग्य थी। वह यह भी नहीं जानती थी कि परिवार के सदस्यों की क्या आवश्यकता है। न्यायालय ने कहा कि वह स्त्री चित्तविकृत है।

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 5 (1) के अन्तर्गत विवाह के समय की चित्त-विकृतता ही विवाह के शून्यकरणीय होने का आधार है। विवाह के पश्चात् चित्तविकृति का होना शून्यकरणीय होने का आधार नहीं है। बल्कि न्यायिक पृथक्करण और विवाह-विच्छेद का आधार है।

चित्त-विकृति तथ्य का विषय है और सबूत का भार (Burden of Proof) उस पक्षकार पर है, जो दूसरे को चित्तविकृत बताता है। चित्तविकृत के आधार पर शून्यकरणीय डिक्री उस पक्षकार की याचिका पर पास हो सकती है जो स्वयं स्वस्थचित्त हो। कभी-कभी एक विचित्र स्थिति सामने आ सकती है। जब दोनों ही पक्षकार चित्त-विकृत हों तो फिर प्रश्न उठता है कि शून्यकरणीय की याचिका कौन प्रेषित कर सकता है? यह -प्रत्यारोपण (Recrimination) का मामला नहीं है। धारा 12 (1) के खण्ड (ख) के अनुसार कोई भी विवाह शून्यकरणीय होगा यदि वह धारा 5 (1) के उपबन्ध चित्तविकृति के उल्लंघन द्वारा सम्पन्न किया गया है। स्पष्ट है कि यदि दोनों पक्षकार चित्त-विकृत हैं तो धारा 5(i) का उल्लंघन होता है। अत: यह लेखक निवेदन करता है कि जब दोनों ही पक्षकार चित्तविकृत हैं तो किसी भी पक्षकार की याचिका पर शून्यकरणीय की डिक्री पास हो सकती है। इस लेखक का निवेदन है कि जिस भांति धारा 12 (1) (ख) गठित की गयी है, उससे यह आशय निकाला जा सकता है कि एक पक्षकार के चित्तविकृत होने पर कोई भी पक्ष शून्यकरणीय की याचिका प्रेषित कर सकता है। यह व्याख्या सामाजिक रूप से भी औचित्यपूर्ण होगी।

मानसिक सामर्थ्य-आयु

धर्मशास्त्रों ने एक ओर से कहा है कि कन्याओं के विवाह उनके रजस्वला होने के पूर्व कर देना चाहिये। दूसरी ओर पुरुष के लिये यह विधान बनाया गया है कि वह बिना ब्रह्मचर्य आश्रम पूर्ण किये विवाह नहीं कर सकता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार किसी भी बालक के लिये 25 वर्ष की आयु से पहले ब्रह्मचर्य आश्रम पूर्ण करना सम्भव नहीं था। प्रतीत यह होता है कि आरम्भिक हिन्दू काल में अल्पायु कन्याओं के विवाह यदा-कदा होते थे। परन्तु आगे चलकर सामाजिक और आर्थिक कारणों से बाल विवाह का प्रचलन बढ़ गया। हिन्दू धर्म और हिन्दू विधि की अधोगति के युग में संस्कार अनुष्ठान मात्र रह गये और सारहीन हो गये।

सन 1929 में विवाह के लिये लघुतम आयु निर्धारित करने का प्रयत्न किया गया, जिसके फलस्वरूप वर के लिय कम से कम 18 वर्ष और वधू के लिये कम से कम 15 वर्ष की आयु निर्धारित की गयी थी। बाल विवाह अवरोध (संशोधन) अधिनियम, 1978 द्वारा अब 18 वर्ष से कम आयु की कन्या और 211 वर्ष से कम आयु का युवक विवाह नहीं कर सकते हैं। परन्तु शारदा अधिनियम, 1929-1978 के। अन्तर्गत बाल-विवाह न शून्य है न शून्यकरणीय है। इस अधिनियम के लागू होने के पश्चात् भी बाल विवाह मान्य और वैध होता है यद्यपि बाल विवाह के लिये उत्तरदायी व्यक्तियों को दण्डित करने का उपबन्ध अवश्य बनाया गया है। यह आश्चर्य की बात प्रतीत होती है कि हिन्द विवाह अधिनियम 1055 के अन्तर्गत भी स्थिति यही है। शारदा अधिनियम, 1978 के संशोधन द्वारा अब 18 वर्ष से कम आय की वध और 21 वर्ष से कम आयु का वर नहीं होना चाहिये परन्तु यदि कम उम्र के वर या वध के बीच विवाह हो। जाता है तो विवाह वैध है यद्यपि उन्हें थोड़े से दण्ड का भागी होना पड़ सकता है। प्रतीत यह होता है कि

1. मनुस्मृति 3, 1, 9, 94.

2 मनस्मति 89,90-93, याज्ञवल्क्य स्मृति, 164, विष्णु स्मृति 24, 4 वशिष्ठ धर्मसूत्र 177 नारद-स्मति। 25,26 गौतम धर्मसूत्र 18, 23.

३ मनिन्द्र बनाम मेजर सिंह, 1972 हरियाणा और पंजाब, 184, गिन्डल बनाम बोरलाल, 1976 मध्य प्रदेश 83, पिन्टी बनाम स्टेट, 1977 आन्ध्र प्रदेश 43,

बाल हिन्दू समाज में विवाह इतना गहरा बैठ गया है कि संसद को भी उसे पूर्णतया समाप्त करने का साहस नहीं है।

शारदा एक्ट, 1929 के अन्तर्गत यदि 18 वर्ष से अधिक और 21 वर्ष से कम आयु का कोई पुरुष 15 वर्ष कन्या से विवाह करता है तो उसे 15 दिन के सादा कारावास या 1000 रुपये तक के जुर्माने किया जा सकता है। यदि 15 वर्ष से कम आयु की कन्या से विवाह करने वाले पुरुष की आय वर्ष से अधिक है तो उसे तीन महीने तक के सादा कारावास और जुर्माने से दण्डित किया जा सकता है। बाल विवाह सम्पन्न कराने, संचालन (Direct) करने, निर्दिष्ट (Promote) कराने, सम्प्रवर्तित कराने वालों को भी तीन महीने तक के सादे कारावास और जुर्माने से दण्डित किया जा सकता है। इस भांति माता-पिता, संरक्षक, परक्रामण (Negotiators) कराने वाले, बिचौलिये (Go-between) और विवाहों का अनुष्ठान सम्पन्न कराने वाला पुरोहित भी दण्डित किये जा सकते हैं। शारदा ऐक्ट के अन्तर्गत कोई भी अभियुक्त यह सिद्ध करके दण्ड से छूट सकता है कि उसके विश्वासानुसार वह विवाह बाल विवाह नहीं था। बाराती और स्वागत-समारोह में उपस्थित अतिथियों को दण्डित नहीं किया जा सकता है।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत भी दण्ड की व्यवस्था है। धारा 18 के अन्तर्गत यह उपबन्ध है कि यदि कोई व्यक्ति आयु के उपबन्ध के प्रतिकूल विवाह करता है तो उसे 15 दिनों तक के सादा कारावास या 1,000 रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दण्डित किया जा सकता है।

यह विचित्र बात प्रतीत होती है कि एक ओर तो विधि विवाह की न्यूनतम आयु निर्धारित करती है, किन्तु दूसरी ओर उसे लागू नहीं करती है। लगता यह है कि इस विधि द्वारा संसद ने बाल विवाहों को रोकने मात्र का प्रयास किया है, उन्हें वर्जित नहीं किया है। विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अन्तर्गत विवाह की न्यूनतम आयु का उल्लंघन करके किया गया विवाह शून्य है। दोनों विधेयकों के इस अन्तर का कारण यह प्रतीत होता है कि विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत अधिकतर पढ़े-लिखे, और आधुनिक लोग ही विवाह करते हैं, और इस खण्ड में उल्लंघन का क्या फल होगा वे समझते हैं। दूसरी ओर हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह करने वाले व्यक्ति पढ़े-लिखे और अनपढ़ दोनों ही हैं।

हिन्दू समाज में बाल-विवाह की परम्परा घर कर चुकी है। उसे सम्भवतः एकदम समाप्त नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि बाल विवाह हिन्दू विधि के अन्तर्गत शून्य नहीं है। फिर भी प्रश्न उठता है कि यदि हिन्दू विवाह अधिनियम बाल विवाहों को वर्जित नहीं करना चाहता था तो फिर विवाह के लिये वरवधू की न्यूनतम आयु निर्धारित करने का क्या तात्पर्य है? एक तात्पर्य प्रतीत होता है कि शिक्षा का दूसरा महत्वपूर्ण तात्पर्य यह है कि इस उपबन्ध द्वारा बाल विवाहों को सम्पन्न होने से रोका जा सकता है। यदि कोई बाल विवाह होने जा रहा है तो न्यायालय से प्रतिषेधात्मक व्यादेश लेकर उस विवाह को रोका जा सकता है। 6 यह ठीक है कि व्यादेश के उल्लंघन में सम्पन्न किया गया विवाह भी वैध और मान्य होगा, यद्यपि उल्लंघन बाल विवाह व्यक्तियों को दंडित किया जा सकता है। संक्षेप में हम यह कह सकते है कि हिन्द। विधि के अर्न्तगत बाल विवाह अब भी वैध है यद्यपि उन्हें सम्पन्न करने वाले और कराने वालों को दण्डित किया जा सकता है। बाल विवाह को सम्पन्न होने से रोका जा सकता है। हिन्दू विवाह अधिनियम की नीति ।

1. शारदा ऐक्ट, धारा 3.

2. शारदा-ऐक्ट, धारा 4.

3. शारदा ऐक्ट, धारा 5

4 शारदा ऐक्ट, धारायें 5 और 61.

5. शारदा ऐक्ट, धारा 19, 29 और 12.

6. मु० प्रेमी बनाम दयाराम, 1965 हिमाचल प्रदेश 15; कलावती बनाम देवीराम, 1961 हिमाचल प्रदेश : नैनी बनाम नरोत्तम, 1968 हिमाचल प्रदेश 15; विपरीत मत के लिये देखें: कुन्ता देवी बनाम श्रीराम 1963 पंजाब 235, परन्तु इस मुकदमें में विवाह वैवाहिक अनुष्ठानों के सम्पन्न न करने के कारण शून्य था.

7. देखें, नई धारा 7, बाल विवाह अवरोध अधिनियम, 1978, जिसके द्वारा कुछ अपराध अब संज्ञेय बनाये गये हैं.

विवाह की वैधता के पक्ष में है, और इस भांति प्रतीत यह होता है कि हम जीमूतवाहन द्वारा निर्धारित नियम को कि “सौ पाठ भी एक तथ्य को नहीं मिटा सकते हैं।” अब भी मान्यता देते हैं।

बाल विवाह और प्रतिषेधात्मक व्यादेश (Child Marriage and Prohibitory Injunction) (LLB Notes)

सिविल न्यायालय अपनी मामूली अधिकारिता के अन्तर्गत एवं शारदा ऐक्ट की धारा 12 के अन्तर्गत, बालक के कल्याण में उसके विवाह को रोकने के लिये प्रतिषेधात्मक व्यादेश जारी करने की शक्ति रखते हैं। वैवाहिक संरक्षक की विवाह में अनुमति होने पर भी वैसा व्यादेश जारी किया जा सकता है। न्यायालय के समाधान होने पर (समाधान चाहे न्यायालय के समक्ष किसी के द्वारा शिकायत करने पर हो या अन्य किसी भांति हो) कि बाल विवाह सम्पन्न किया जाने वाला है, न्यायालय प्रतिषेधात्मक व्यादेश जारी कर देगा। ऐसे व्यादेश को उल्लंधित करके विवाह सम्पन्न करने पर न्यायालय व्यादेश का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों को तीन मास तक का सादा कारावास और/या 1,000 रुपये तक के जुर्माने से दण्डित कर सकता है। इसके अतिरिक्त अपने अपमान के लिये भी न्यायालय दोषी व्यक्तियों की सम्पत्ति को कुर्क कर सकता है आर अन्य दण्ड भी दे सकता है। अवमान के लिये न्यायालयों की शक्ति अधिक है परन्तु फिर भी विवाह मान्य रहेगा।

शारीरिक सामर्थ्य-नपुंसकता

धारा 12 (i) (क), हिन्दू विवाह अधिनियम-हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के लागू होने के पूर्व यह प्रतिपादित किया गया था कि हिन्दू विधि में, नपुंसक का विवाह विधिमान्य है। इस मत का आधार था मनु का एक पाठ जिसके अन्तर्गत यह कहा गया है कि यदि किसी भांति क्लीव या ऐसा ही अन्य व्यक्ति विवाह कर ले तो उसकी सन्तान को उनकी सम्पत्ति में भाग मिलेगा। यह पाठ उत्तराधिकार के अध्याय में है। कई देशों की वर्तमान विधियों में शून्य विवाह की सन्तान को वैध सन्तान माना गया है।

इस लेखक की राय में मनु का मत भी यही रहा होगा कि सन्तान वैध है, यद्यपि विवाह शून्य है। परन्तु न्यायालयों ने मनु के इस पाठ को ठीक नहीं समझा और इस पाठ के आधार पर कहा कि क्लीव (Eunuch) और नपुंसक का विवाह विधिमान्य है। कुछ निर्णयों में इसके विपरीत मत भी व्यक्त किया गया है |

हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत भी नपुंसक का विवाह शून्य नहीं है यह केवल शून्यकरणीय है। एक पक्षकार के नपुंसक होने पर दूसरा पक्षकार उस विवाह के शून्यकरणीय की डिक्री प्राप्त कर सकता है। परन्तु जब तक ऐसी डिक्री पारित न हो, विवाह विधिमान्य रहता है। अंग्रेजी विधि के अन्तर्गत भी यही स्थिति है, यद्यपि उसके अन्तर्गत नपुंसक पक्षकार भी विवाह के शून्यकरणीय की याचिका प्रेषित कर सकता है। विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत ऐसे विवाह शून्य हैं।

हम पहले ही कह चुके हैं कि हिन्दू विवाह अधिनियम की नीति यह है कि कम से कम विवाहों को शून्य माना जाये। नपुंसक के विवाह को शून्य न मानने के अन्य कारण भी हो सकते हैं। एक तर्क यह है कि कि यदि कोई व्यक्ति अपने नपुंसक पक्षकार के साथ सुखपूर्वक और प्रसन्नता से रहना चाहता है तो समाज और

1. शारदा ऐक्ट, धारा 12 (5).

2. मनुस्मृति 9, 203.

3. उदाहरणार्थ देखें, अंग्रेजी अधिनियम लेजीटीमेसी ऐक्ट, 1926.1

4. देखें, इस लेखक का निबन्ध, मैरेज ऑफ इम्पोटेंट परसन्स अण्डर हिन्दू लॉ, (1966)2 दी लॉ रिव्यू 401-21.

5 कन्जपति बनाम सुभामा, 1965 आन्ध्र प्रदेश 237; कान्ती लाल बनाम विमला. 1977 सौरा रामादेवी बनाम राजाराम, 1953 इलाहाबाद 456.

6. रतन बनाम नगेन्द्र 1946 कलकत्ता 414; रखिया बनाम अनिल कुमार, (1949) कलकत्ता एक वी० बी० (1953) बम्बई 487.

विधि को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये? हो सकता है कि दोनों ही पक्षकार नपुंसक या क्लीव हों, और वे साथ-साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हों किसी को इसमें आपत्ति क्यों होनी चाहिये? हिन्दुओं ने विवाह के लैंगिक पक्ष को कभी भी महत्व नहीं दिया है और कोई कारण नहीं है कि वर्तमान विधि विपरीत मत ले। लैंगिक सम्बन्धों के अतिरिक्त विवाह के अन्य पक्ष भी हैं। एक-दूसरे का साहचर्य भी विवाह का एक महत्वपूर्ण पक्ष है कि यदि सन्तान की इच्छा हो तो उसे दत्तक द्वारा तृप्त किया जा सकता है। फिर भी, यदि पक्षकार यह समझे कि वे साथ-साथ नहीं रह सकते हैं, तो शून्यकरणीयता की डिक्री प्राप्त की जा सकती

सन् 1976 के संशोधन के पश्चात् हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत शून्यकरणीयता की डिक्री प्राप्त करने का आधार है कि प्रत्यर्थी की नपुंसकता के कारण विवाहोत्तर संभोग नहीं हुआ है। संशोधन बाबी बनाम नाथ के निर्णय को मान्यता प्रदान करता है।

नपुंसकता की परिभाषा-अंग्रेजी विधि के आधार पर नपुंसकता की परिभाषा करते हुये गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा कि नपुंसकता का आवश्यक अंग है, पक्षकार द्वारा मैथुन कर सकने की असमर्थता और मैथुन का यहां अर्थ है, पूर्ण मैथुन, न कि अधूरा या ऊपरी मैथन। यह असमर्थता जननेन्द्रियों के अपूर्ण विकसित होने या उनमें अन्य खोट के कारण हो सकती है, यह असमर्थता मानसिक या नैतिक कारणों से भी हो सकती है, जैसे मैथुन से विरक्ति के कारण या एक व्यक्ति विशेष के साथ मैथुन की अरुचि के कारण। संक्षेप में मैथुन की शारीरिक या मानसिक असमर्थता को नपुंसकता कहते हैं उच्चतम न्यायालय के शब्दों में यदि पक्षकार की शारीरिक या मानसिक स्थिति उसे विवाह को संसिद्ध करने में असमर्थ बनाती है तो उसे नपुंसक कहा जायेगा। पक्षकार की मैथुन की इच्छा मन्द होने पर हम उसे नपुंसक नहीं कहेंगे। अतः नपुंसकता निम्न दो भांति की हो सकती है

(क) शारीरिक (Physical) नपुंसकता; और

(ख) मानसिक (Mentai) नपुंसकता।

शारीरिक नपुंसकता का अर्थ है जननेन्द्रियों में ऐसा खोट जिसके कारण मैथुन सम्भव नहीं है। उदाहरणार्थ जननेन्द्रियों का परिपक्व न होना, या उनकी बनावट में खोट होना, अत्यधिक लम्बे पुरुष की जननेन्द्रिय अत्यधिक लम्बी, छोटी स्त्री की जननेन्द्रिय अधिक छोटी जननेन्द्री का बाहर लटका होना नपुंसकता की परिभाषा में आता है। एम० बनाम एस07 और गनेशजी बनाम हस्तुवेन इसके अच्छे उदाहरण हैं। इन दोनो ही वादों में जननेन्द्रिय में खोट होने के कारण पत्नी सम्भोग के अयोग्य थी। परन्तु पत्नी शल्य-क्रिया द्वारा सम्भोग के योग्य हो गयी। न्यायालयों ने निर्णय दिया कि वह नपुंसक नहीं है। लक्ष्मी बनाम बाबूलाल में

1. 1970 ज० और क० 130; राजेन्द्र बनाम शान्ति, 1975 पं० और० ह० 181.

2. सुवर्णा बहन बनाम चिन्नभाई, 1970 गुजरात 43; चमन बनाम रूपा, 1966 जम्मू और कश्मीर 68 में न्यायाधीश श्री अली ने नपुंसकता की विपरीत व्याख्या की है। शारदाबाई बनाम ताराचन्द, 1966 मध्य प्रदेश 3 में न्यायाधीश श्री शिवदयाल ने संक्षेप में बहुत ही अच्छी परिभाषा दी है। लक्ष्मी बनाम बाबू 1973 राजस्थान 89 में न्यायाधीश श्री सिंह ने अंग्रेजी और भारतीय निर्णयों की समीक्षा की है.

3. दिग्विजय बनाम प्रताप कुमारी, 1970 सुप्रीम कोर्ट 137; उस्मान बनाम चन्द्रजीत, 1977 पं० और० ह० 97; समर बनाम स्निग्धा, 1977 कल0 213.

4. कान्थी बनाम हैरी, 1954 मद्रास 316.

5. ए० बनाम बी०, (1953) बम्बई 947; जी० बनाम जी०, 1962 आन्ध्र प्रदेश 151; रंगास्वामा बना रंगास्वामी, 1957 मद्रास 243.

6. पी० बनाम के०, 1982 बम्बई 400.

7. (1963) केरल लॉ टाइम्स, 315.

8. (1967) गुजरात लॉ टाइम्स 215.

9. 1975 राज० 89.

पत्नी के जननेन्द्रिय थी ही नहीं, परन्तु शल्य-क्रिया द्वारा लगभग 2 इंच गहरी नकली जननेन्द्रिय बना दी गयी। न्यायालय ने निर्णय दिया इसके द्वारा उसकी नपुंसकता दूर नहीं हुयी है। गनेशजी के निर्णय के बारे में न्यायालय ने कहा कि वह छोटी जननेन्द्रिय का मामला था, यहां पर तो पत्नी के जननेन्द्रिय है ही नहीं। दूसरी ओर राजेन्द्र बनाम शान्ती में शल्य-क्रिया द्वारा लगभग डेढ़ इंच गहरी जननेन्द्रिय पत्नी के बनायी गयी। न्यायालय ने कहा कि स्त्री नपुंसक नहीं है। यह अन्य निर्णयों से भिन्न है, क्योंकि न्यायालयों ने अब तक नपुंसक होने के लिये यह आधार नहीं बनाया है कि प्रतिपक्षी याचिकाकार के साथ सन्तोषप्रद सम्भोग करने योग्य होना चाहिये। परन्तु यह कहना भी औचित्यपूर्ण नहीं होगा कि पति या पत्नी को नकली जननेन्द्रिय से ही सन्तोष कर लेना चाहिये। जहां पति की दाढ़ी मूंछ इत्यादि न के बराबर थी, पत्नी कुंवारी (virgin) पायी गयी, पति के पिटुईटरी ग्रन्थि (petuitary) पर शल्य क्रिया हुयी थी तथा उसने कोई सबूत नपुंसकता नकारने के लिये नहीं दिया, इस स्थिति में उसे नपुंसक करार दिया गया।

मानसिक नपुंसकता का अर्थ है कि नैतिक या मानसिक कारणों से मैथुन के लिये इतनी विरक्ति की शारीरिक समर्थता के होते हुये भी मैथुन करने की असमर्थता हो। जगदीश बनाम सीता देवी में विवाह के पश्चात् पति-पत्नी तीन दिन तक साथ-साथ रहे, परन्तु पति विवाह की संसिद्धि करने में असमर्थ रहा। पंजाब उच्च न्यायालय ने कहा कि विवाह की संसिद्धि पति नहीं कर पाया है, यह चाहे उसकी अधीरता के कारण हो या अन्य किसी मानसिक कारण से हो, जहां तक उसकी पत्नी का सम्बन्ध है वह नपुंसक है। दूसरी ओर यदि विवाह की प्रथम रात्रि का विवाह की संसिद्धि पत्नी द्वारा यह कह कर सम्भोग से इन्कार करने के कारण नहीं हो सका कि उसका विवाह इसकी इच्छा के विरुद्ध किया गया है, तो यह नपुंसकता नहीं होगी। मानसिक नपुंसकता के लिये आवश्यक नहीं है कि नपुंसकता पूर्ण हो। पति या पत्नी के प्रति संभोग की अनिच्छा नपुंसकता है। शामला देवी बनाम सुरजीत सिंह में पत्नी ने पति की नपुंसकता के आधार पर याचिका डाली पर स्वयं की चिकित्सक जांच करवाने से इन्कार कर दिया उधर पति चिकित्सक जांच के पश्चात् ठीक व स्वस्थ माना गया। याचिका खारिज कर दी गयी।

यदि नपुंसकता चिकित्सा या शल्य क्रिया द्वारा ठीक हो सकती है तो उसे नपुंसकता तब तक नहीं कहेंगे जब तक कि यह सिद्ध न हो जाये कि पति-पत्नी चिकित्सा या शल्य-क्रिया से जानबूझ कर इन्कार करता है। 9 पी० बनाम के०10 के न्यायालय में अब मत व्यक्त किया है कि 1976 के संशोधन के पश्चात् नपुंसकता का चिकित्सा या शल्य-क्रिया के द्वारा ठीक हो सकना इस आधार पर शून्यकरण की डिक्री पारित करने में बाधक नहीं है। यदि नपुंसकता के कारण संभोग नहीं हो सकता है तो यह आधार पर्याप्त है। एक या दो बार के प्रयल से सम्भोग का असफल होना पर्याप्त आधार हैं।

बांझपन (Barrenness) और बन्ध्यत्व (Sterility)-ऐसा प्रतीत होता है कि अंग्रेजी विधि के अन्तर्गत बांझपन और बन्ध्यत्व नपुंसकता की परिभाषा में नहीं आते हैं। एस० बनाम एसा में पत्नी को मासिक धर्म कभी नहीं हुआ, न ही उसके गर्भाशय था, उसकी जननेन्द्रिय परिपक्व नहीं थी, केवल एक छोटी-सी।

1 जगदीश बनाम श्यामा, 1966 इलाहाबाद 155; बाबी बनाम नाथ, 1970 जम्मू और कश्मीर 130.

2. सुरेन्द्र सिंह बनाम निर्मलजीत कौर, 2000 पंजाब और हरियाणा 1307

3. 1963 पंजाब 193.

4 और देखें, किशोर बनाम स्नेहप्रभा, 1943 नागपुर 183; विल्सन बनाम विल्सन 1931 लाहौर 241: अरुण बनाम सुधांशु, 1961 उड़ीसा 224; वेंकटेश्वर राव बनाम नागमणि, 1962 आन्ध्र प्रदेश 151.

5. 1998 पं० और० ह० 181.

6 एम० बनाम एस०, (1963) केरल लॉ टाइम्स 315; ब्रिज बनाम सुमित्रा, 1957 राज0125.

7. स्वर्ण बनाम आचार्य, 1975 आन्ध्र प्रदेश 169.

8. 1998 हि०प्र० 32.

9. एम० बनाम एस०, (1962) केरल लॉ टाइम्स 315.

10.पी० बनाम के0400.

11. (1962) 11 आल इंग्लैण्ड रिपोर्ट्स 33.

थैली थी, परन्तु शल्य-क्रिया द्वारा उसको पूर्ण मैथुन के योग्य बनाया जा सकता था। न्यायालय ने निर्णय दिया कि पत्नी नपुंसक नहीं है। हिन्दू विधि के अन्तर्गत भी यही मत लिया गया है। शैवन्ती बनाम भाऊराव में डाक्टरी साक्ष्य द्वारा यह स्थापित हो गया कि पत्नी बांझ है, उसे मासिक धर्म नहीं होता है; और शल्य-क्रिया द्वारा भी इन खोटों को दूर नहीं किया जा सकता है। दूसरी ओर साक्ष्य द्वारा यह भी स्थापित हो गया कि वह मैथुन के लिये समर्थ है। न्यायाधीश श्री सिंह ने कहा कि ‘नपुंसकता’ शब्द का प्रयोग करके संसद ने उसके अन्तर्गत बांझपन या बन्ध्यत्व को सम्मिलित नहीं किया है। नपुंसकता का अर्थ है-मैथुन की असमर्थता। एक व्यक्ति जो बांझ है परन्तु वह मैथुन में समर्थ है तो वह नपुंसक नहीं कहलायेगा।

क्लीव (Eunuch) के साथ विवाह-वर्तमान हिन्दू विधि के अन्तर्गत क्लीव (हिजड़ा) के साथ किया गया विवाह शून्यकरणीय है। परन्तु क्या ऐसा विवाह शून्य भी है, को दो पुरुषों का दो स्त्रियों के बीच विवाह शून्य है। परन्तु क्या यह आवश्यक है कि विवाह के पक्षकारों में से एक पुरुष और एक स्त्री हो, या क्या यह पर्याप्त नहीं होगा कि एक स्त्री है और दूसरा अस्त्री है या एक पुरुष है दूसरा अपुरुष है? एक अंग्रेजी मुकदमे में कोरबेट बनाम कोरबेट3 में एक विवाह सम्पन्न हुआ, एक पुरुष और अन्य व्यक्ति के बीच जो जन्म के समय पुरुष था परन्तु विवाह से पूर्व लिंग-परिवर्तन की शल्य-क्रिया द्वारा वह स्त्री बन गया था और बतौर स्त्री के रह रहा था। शल्य-क्रिया द्वारा उसके एक नकली जननेन्द्रिय बना दी गयी थी। पति के द्वारा विवाह को शून्य घोषित कराने की याचिका पारित करने पर अंग्रेजी न्यायालय ने कहा कि विवाह आवश्यक रूप से एक स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध है, अत: विवाह की विधिमान्यता इसी पर निर्भर करती है कि विपक्षी विवाह के समय स्त्री थी या नहीं। विपक्षी जन्मतः पुरुष होने के कारण उसका विवाह दूसरे पुरुष के साथ शून्य होगा। इसका तात्पर्य यह भी निकल सकता है कि यदि एक पक्षकार या दोनों क्लीव हों तो विवाह शून्य होगा। हमारे यहां क्लीव अधिकतर. स्त्री भेष में अपना एक पृथक् वर्ग बनाकर रहते हैं और जन्म या विवाह या ऐसे ही अवसरों पर नाच-गाकर अपना जीवन-निर्वाह करते हैं। परन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि इन क्लीव का पालन-पोषण परिवारों में होता है, तब उनका लालन-पालन या तो बतौर पुरुष या बतौर स्त्री के, फिर ऐसा भी हो सकता है कि उनका विवाह कर दिया जाता। यदि क्लीवों का लालन-पालन पुरुष की भांति हुआ है तो उसका विवाह बतौर पुरुष होता है, यदि उसका लालन-पालन बतौर स्त्री के होता है तो बतौर स्त्री। ऐसे ही एक विवाह के सम्बन्ध में एक मुकदमा उच्च न्यायालय के समक्ष आया है। विवाह की विधिमान्यता का प्रश्न पति की मृत्यु के पश्चात् उत्तराधिकार के सम्बन्ध में उत्पन्न हुआ। न्यायाधीश अलगिरि स्वामी ने क्लीव-पत्नी के नपुंसक तुल्य ठहराते हुये कहा कि ऐसा विवाह शून्यकरणीय है जिसके शून्यकरणीयता का वाद पति ही चला सकता है। पति के मृत होने के कारण विवाह विधिमान्य है। इस लेखक की राय में यह निर्णय ठीक है। दो पुरुष या दो स्त्रियों के बीच विवाह शून्य है, परन्तु एक पुरुष या स्त्री या क्लीव या नपुंसक के बीच विवाह शून्य नहीं है, दो क्लीवों या दो नपुंसकों के बीच भी विवाह शून्य नहीं है। वह केवल शून्यकरणीय है। विवाह का ध्येय मैथुन ही नहीं है। एक दूसरे का साहचर्य भी एक मानवीय आवश्यकता है। इसी सन्दर्भ में मेधातिथि ने कहा था कि क्लीव को प्रथम-दर्शने (Prima facie) विवाह का अधिकार है।

समनुदेशन और प्रत्यानुमति (Approbation and Reprobation) का सिद्धान्त-समनुदेशन और प्रत्यानुमति अंग्रेजी विधि का अंग है। दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न एस० बनाम एम०० में आया कि क्या हिन्दू विधि का भी अंग है? पक्षकारों के बीच विवाह 1948 में हुआ था। पति की नपुंसकता

1. 1971 मध्य प्रदेश 168.

2. और देखें, प्रजापति बनाम हस्तुबाई (1967) 8 गुजरात लॉ रिव्य 166 विपरीत परिभाषा के लिये देखें, 21 गुडिबाडा बनाम नागमणी, 1962 आन्ध्र प्रदेश 151, यह निर्णय रंगास्वामी बनाम रंगास्वामी, 1957 मद्रास। 243 पर आधारित है। इस लेखक की राय में ये परिभाषायें गलत हैं.

3. (1970) 2 आल इंग्लैण्ड रिपोर्ट्स 33.

4. धर्मस्वामी बनाम सोमाध्यामल, 1961 मद्रास 124.

5. दख, कान हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, खण्ड 2. पाठ 431, मनुस्मृति

6. 1968 दिल्ली 713 परन्त देखें, शण बनाम प्रेम, 1967, दिल्ला 321.

के आधार पर याचिका सन् 1952 में प्रेषित की गयी। पति की ओर से यह कहा गया कि पत्नी ने इस विवाह से लाभ उठाया है क्योंकि पति ने उसके नाम कुछ सम्पत्ति कर दी थी और उसे कुछ अन्य धनराशि भी दी थी। न्यायालय ने कहा कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 11 से 28 शून्यकरणीय और विवाह-विच्छेद के सम्बन्ध में पूर्ण संहिता है, अत: अंग्रेजी विधि के किसी सिद्धान्त को वहां न तो ढूंढ़ा जा सकता है, न लागू किया जा सकता है, जब तक कि उस बारे में स्पष्ट उपबन्ध न हो। अत: अंग्रेजी विधि का सिद्धान्त हिन्दू विधि में मान्य नहीं है। लेखक इस मत से सहमत है।

सबूत का भार-सामान्य नियम यह है कि यह सिद्ध करने का भार कि प्रतिपक्षी नपुंसक है, याचिका कार पर है। यह सिद्ध करना पर्याप्त नहीं होगा कि प्रतिपक्षी धार्मिक प्रवृत्ति का है या वह विवाह के प्रति उदासीन है। परन्तु बहुत लम्बी अवधि तक मैथुन न होने के आधार पर न्यायालय यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि प्रतिपक्षी नपुंसक है। गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकार की ही साक्षी पर्याप्त हो सकती है। नपुंसकता की डाक्टरी साक्ष्य दी जा सकती है और वह साक्ष्य सबसे अधिक प्रमाणित है। परन्तु न्यायालय प्रतिपक्षी को डाक्टरी जांच के लिये बाध्य नहीं कर सकते हैं। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने प्रतिकूल मत व्यक्त किया है। डाक्टरी जांच कराने से इन्कार करने पर न्यायालय नपुंसकता की अवधारणा कर सकती है।

1. देखें; ए० बनाम बी०, 1967 पंजाब 152.

2. जयराम बनाम मेरी, 1957; 242.

3. टी० बनाम टी०, 1917 मद्रास

4. विपिनचन्द्र बनाम माधुरी बहन, 1963 गुजरात, 250; श्रीमथि बनाम लक्ष्मीकान्तम 1955 आन्ध्र प्रदेश  207: रंगनाथन बनाम चिन्ना, 1955 मद्रास 546: रावम्मा बनाम सनथप्पा, 1972 मैसूर 157: वैकटा बनाम सरोजा, 1980 मद्रास 439.

5. वीरेन्द्र बनाम हेमलता, 24 सी० डब्ल्यू० एन० 994.

6. जार्ज बनाम सेला. 1995 केरल 289 (यह निर्णय विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 के अन्तर्गतका है)

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