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How to download LLB 2nd Semester Law Chapter 4 Notes

 

How to download LLB 2nd Semester Law Chapter 4 Notes:- Principles of Marriage Most Important LLB 2nd Semester Notes Study Material for Modern Hindu Law for All University and All Students PDF Download With LLB Question Paper With Answer in Hindi English and All Language Available This Website.

 

 

अध्याय4 (Chapter 4 LLB Notes)

विवाह के संप्रत्यय और विवाह-विच्छेद के सिद्धान्त (Principles of Marriage and Marriage – Principles of Marriage)

अब यह मत स्थापित ही प्रतीत होता है कि आदि मानव विवाह से अनभिज्ञ था। उस युग में मनुष्य अन्य प्राणियों (जीव-जन्तुओं) की ही भांति रहता था। वह अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं, भूख और निवास, की परितुष्टि (Satisfaction) में इतना रत था कि उसके पास अन्य किसी विषय पर सोचने का समय ही नहीं था। उस युग में लैंगिक सम्बन्धों (Sex relations) की पूर्ण स्वतन्त्रता थी। ___ प्रगति के पथ पर अग्रसर होते हुये मानव ने दो वस्तुओं की खोज की-दूध देने वाले पशुओं की और अग्नि की। पालतू पशुओं की खोज मानव को अन्य प्राणियों से अपना पृथक् अस्तित्व स्थापित करने में बहुत सहायक सिद्ध हुयी। उसके लिये अब यह अनिवार्य नहीं रहा कि भोजन की खोज में वह दर-दर भटकता फिरे। वह पशु-पालन बन गया था और अपने पशुओं के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमता-फिरता था। सम्भवतः पशु-पालन के साथ ही स्वाधीनम् और स्वामित्व के संप्रत्ययों (Concepts) का जन्म हुआ। मनुष्य ने सभ्यता के युग में प्रवेश किया।

उस युग में पुरुष के लिये अपनी पैतृकता को जानना असम्भव था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वाधीनम् और स्वामित्व के संप्रत्ययों की स्थापना के साथ ही पुरुष के मस्तिष्क में यह विचार आया कि वह यह जाने कि उसकी संतान कौन है। सम्भवतः मनुष्य की इस इच्छा ने ही विवाह की संस्था को जन्म दिया। जब तक लैंगिक स्वतन्त्रता रहेगी पुरुष के लिये अपनी पैतृकता को जानना असम्भव है। अतः लैंगिक सम्बन्धों का विनियमन (Regulation) आवश्यक हुआ। यदि पुरुष और स्त्री के बीच लैंगिक सम्बन्ध अनन्यतः (Exclusive) हो जाये तो पितृत्व को जाना जा सकता है। अतः विवाह की संस्था के विकास का इतिहास पुरुष की इसी इच्छा की पूर्ति के प्रयत्नों का परिणाम है। यह प्रक्रिया निःसन्देह ही धीमी और लम्बी रही है।

पशु-पालन, कृषि और उद्योग के ज्ञान के साथ-साथ सभ्यता का विकास होता है। जब मानव ने प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग करना अपने हित में जान लिया, और धातु गलाने की विद्या जान गया, और जब उसे कला और उद्योग का ज्ञान हो गया, तब सभ्यता निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर होती गयी। पारिवारिक जीवन में लैंगिक सम्बन्धों का विनियमन होने लगा। संभवतः यह सामूहिक विवाहों से आरम्भ हुआ। अलग-अलग स्थानों पर, सभ्यता के विकास की पृथक्-पृथक् मंजिल पर, इसका रूप भी पृथक्-पृथक् रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि लैंगिक विनियमन के प्रारम्भिक काल में जन-जाति के भीतर लैंगिक सम्बन्धों की स्वतन्त्रता थी, अर्थात् जनजाति की प्रयेक स्त्री प्रत्येक पुरुष से सम्भोग कर सकती थी, परन्तु जनहित के बाहर किसी भी पुरुष से सम्भोग करना वर्जित था। इसके पश्चात् ऐसा प्रतीत होता है कि लैंगिक सम्बन्धों का यह दायरा घटता गया। सर्वप्रथम निकटतम नातों में लैंगिक सम्बन्धों की वर्जना (Prohibition) की गयी जैसे माँ-बेटे के बीच या भाई-बहन के बीच। वर्जनाओं का यह क्रम चलता रहा और अन्त में हम उस मंजिल पर पहुंच गये जब विवाह एक स्त्री और एक पुरुष का सम्बन्ध बन गया। सम्भवतः आरम्भ में यह बंधन ढीला था, पक्षकारों को विवाह करने और विवाह-विच्छेद करने की एक-सी स्वतन्त्रता थी। रामेन विधि के प्रारम्भिक काल में हम विवाह का यही रूप देखते हैं। पर धीरे-धीरे यह बन्धन कड़ा होता गया और हिन्दुओं और ईसाईयों में यह संस्कार बन गया-विवाह एक न टूटने वाला अटूट बन्धन हो गया।

पितसत्ता के युग में पिता के माध्यम से अवजनन (Descent) गिना जाने लगा। पुरुष सत्तारूढ़ हो गया और वस्तओं की भांति स्त्री को भी अपने अधीन कर लिया। इस युग में विवाह एक अनन्यतः सम्बन्ध

के रूप में स्थापित हो गया, यद्यपि पुरुष के लिये यह संबंध इतनी कठोरता के साथ अनन्य नहीं था जितना कि स्त्री के लिये। पितृसत्ता-युग में पश्चिम में विवाह एकपत्नीत्व विवाह के रूप में और पूर्व में बहुपत्नीत्व विवाह के रूप में स्थापित हो गया। पश्चिम में केवल एक ही विवाह के नियम का पालन स्त्री के लिये अनिवार्य था और उसका पालन कठोरता से किया जाता था। परन्तु पुरुष के लिये यह बन्धना इतना कड़ा नहीं था। इसका कारण यह है कि यदि अवजनन पुरुष के माध्यम से गिना जाता है तो स्त्री के लिये पातिव्रत्य अनिवार्य है; पितृसत्ता-युग में पति अपतिव्रता पत्नी की हत्या भी करने की शक्ति रखता था?

अपने इस ध्येय की पूर्ति के लिये कि अवजनन पुरुष के माध्यम से हो, पुरुष ने एक ओर स्त्री को पातिव्रत्य धर्म पालने के लिये बाध्य किया तो दूसरी ओर उसने विवाह की संख्या का आदर्शीकरण किया जिसके द्वारा उसने स्त्री का हृदय और मस्तिष्क जीतने का प्रयास किया। इन प्रयत्नों का फल यह निकला कि हिन्दुओं और ईसाईयों में विवाह एक संस्कार बन गया।

विवाह के संप्रत्यय

विवाह एक संस्कार के रूप में

सम्भवतः संसार में विवाह का इतना आदर्शीकरण हिन्दुओं के अतिरिक्त अन्य किसी ने नहीं किया है। ऋग्वेद के पितृसत्ता-युग में भी विवाह को संस्कार ही माना जाता था और हिन्दुओं के इतिहास में विवाह को सदैव ही संस्कार माना गया है। आज भी बहुत से हिन्दू अपने विवाह को संस्कार ही मानते हैं। विवाह के समय हिन्दू वर-वधू से कहता है-“मैं तुम्हारा हाथ सौभाग्य के लिये ग्रहण करता हूं, तुम अपने पति के साथ ही वृद्धावस्था की ओर अग्रसर हो, सृष्टिकर्ता ने, न्याय ने, बुद्धिमानों ने तुमको मुझे दिया है।” मनु का कहना है कि स्त्री को पातिव्रत्य धर्म का पालन करना चाहिये। पत्नी पति के गृह की सम्राज्ञी है। ऋग्वेद के एक मन्त्र के अनुसार वर वधू से कहता है-“तुम मेरे वीर पुत्रों की माँ बनो, ईश्वर में श्रद्धा रखो, तुम अपने पति के गृह में रानी बनकर रहो। समस्त देवी-देवता हमारे हृदयों को मिलाकर एक कर दें।”3

यही नहीं, हिन्दुओं के अनुसार पत्नी अर्धांगिनी है,4 पुरुष अपूर्ण है, विवाह द्वारा वह पूर्णता प्राप्त करता है। पति-पत्नी ऐक्यता के सिद्धान्त द्वारा ही आपसी विश्वस्तता (पातिव्रत्य धर्म) का ढांचा रखा गया है। मनु कहते हैं कि पति-पत्नी की आपसी विश्वस्तता परम धर्म है। एक बार विवाह-बन्धन में बंधने के पश्चात् वे एक दूसरे के हो जाते हैं और एकनिष्ठ होना ही उनका धर्म है।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में पति-पत्नी के अनेक पर्यायवाची शब्द हैं, पति को भर्तार कहा गया है क्योंकि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करता है, उसे पति कहा गया है क्योंकि वह पत्नी का रक्षक है; उसे स्वामी कहा गया है क्योंकि पत्नी उसके अधीन है। पति को परमेश्वर कहा गया है क्योंकि पत्नी का सबसे बड़ा धर्म है-पति-सेवा, पति-सेवा द्वारा ही परमेश्वर को प्राप्त कर सकती है। इसी भांति पत्नी को ‘जाया’ कहा गया है क्योंकि पति अपनी सन्तान की उत्पत्ति उसके द्वारा करता है। पत्नी को लक्ष्मी कहा गया है। महाभारत के अनुसार जो व्यक्ति अपनी पत्नी का आदर करता है, वह समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। पत्नी अर्धांगिनी है, पति का आधा भाग है। पत्नी पति की सर्वोत्तम मित्र है, वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मार्ग है। पत्नी पति की आत्मा है। पतिगृह में पत्नी गृहिणी है, सखी है, अनुचरी, वह गृहलक्ष्मी है, अद्धांगिनी है-सब कुछ है।

1. मनुस्मृति 8, 277.

2. मनुस्मृति 8, 278.

3. ऋग्वेद 9,85.

4. सत्पथ ब्राह्मण 5, 1, 6,10.

5. तैत्तिरीय संहिता 3, 1, 2, 57.

6. मनुस्मृति 9, 101, 102.

7. महाभारत, आदि पर्व 46, 1-13.

8. तत्रैव.

9. रामायण 11, 33, 22-24.

पत्नी के आदर्शवादी चरित्र-चित्रण के साथ-साथ हिन्दू आचार्यों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पति पत्नी का स्वामी है, सर्वेश्वर है। पत्नी को उसकी आज्ञा माननी चाहिये, पति चाहे कितना ही हीन, पतित और चरित्रहीन या अधर्मी हो। जब तक पति जीवित है पत्नी को उसकी सेवा करनी चाहिये पत्नी को पति की पूजा करनी चाहिये-पति चाहे भ्रष्ट हो, चरित्रहीन हो, अधर्मी हो, पतित हो, गुण्डा हो।

विवाह अपने में एक संस्कार है और प्रत्येक हिन्दू के लिये विवाह एक अनिवार्य संस्कार है। हर हिन्दू को विवाह करना चाहिये। स्त्री की रचना माँ बनने के लिये की गयी और पुरुष की रचना पिता बनने के लिये। वही व्यक्ति स्वयं में पूर्ण है जिसके पत्नी है, सन्तान है। जिसके पत्नी है, वे इस संसार में अपने

कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं, जिसके पत्नी है वही पारिवारिक जीवन व्यतीत कर सकते हैं, जिनके पत्नी । है, वे सुखी है, जिसके पत्नी है वे पूर्ण जीवन जी सकते हैं।

हिन्दू विवाह एक संस्कार है, एक पवित्र बन्धन है, एक दैवी कथन है। स्त्री-पुरुष के बीच विवाह एक धार्मिक कृत्य है, एक पवित्र बन्धन है, अनुबन्धन नहीं है। एक हिन्दू के लिये विवाह आवश्यक है। न केवल पुत्रोत्पत्ति के लिये, पितृ-ऋण से उऋण होने के लिये भी, अपितु धार्मिक और आध्यात्मिक कर्तव्यों के पालन के लिये भी। पत्नी गृहपत्नी ही नहीं है, वह धर्मपत्नी भी है और सहधर्मिणी भी। स्वाभाविक ही है, ऐसा विवाह बिना धार्मिक अनुष्ठानों के सम्पन्न नहीं किया जा सकता है। द्वितीय सांस्कारिक विवाह का यह अर्थ भी है कि यह एक स्थायी बन्धन है। विवाह वह ग्रन्थि है जो एक बार बंध जाने पर खुल नहीं सकता, टूट भले ही जाये (पत्नी या पति की मृत्यु पर) अत: विवाह-विच्छेद का प्रश्न ही नहीं उठता। तृतीय सांस्कारिक विवाह में यह भी तात्पर्य है कि विवाह अनादि-काल का सम्बन्ध है, यह जन्मजन्मान्तर का सम्बन्ध है। इसका लौकिक रूप यह है कि हिन्दुओं ने विधवा-विवाह को मान्यता नहीं दी। नियम यह था-‘कन्या को केवल एक बार कन्यादान में दिया जाता है। ऋषियों ने यहां तक कहा है-“पुत्रहीन स्त्री” भी स्वर्ग प्राप्त कर सकती है यदि वह पातिव्रत्यधर्म का पालन जीवन भर करे।10 नारद और पाराशर ने कहा है, “यदि विधवा पातिव्रत्य धर्म का पालन न करके भ्रष्ट हो जाती है तो उस स्त्री को पति की सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं है, वह भरण-पोषण पाने योग्य भी नहीं है, उसका बहिष्कार कर देना चाहिये और उसको जातिच्युत कर देना चाहिये।”11

सांस्कारिक विवाह में विवाह-विच्छेद का कोई स्थान नहीं है। हिन्दू आचार्यों के अनुसार कुछ असाधारण स्थितियों में पति या पत्नी एक दूसरे को त्याग सकते थे। वशिष्ठ के अनुसार यदि किसी कन्या की सगाई किसी चरित्रहीन व्यक्ति, या नपुंसक के साथ, या अन्धे के साथ, या पागल के साथ, या धर्म-भ्रष्ट व्यक्ति, या ऐसे ही अन्य किसी के साथ हो जाये तो सगाई को तोड़ा जा सकता है और कन्या किसी सुयोग्य वर को दी जा सकती है। परन्तु यह पाठ सगाई सम्बन्धी है, विवाह सम्बन्धी नहीं। नारद और पाराशर ने कहा है कि पांच स्थितियों में से किसी एक के होने पर पत्नी पति को त्याग कर दूसरा विवाह कर सकती है-ये स्थितियां

1. मनुस्मृति 5, 147,54.

2. मनुस्मृति 5, 151; याज्ञवल्क्य स्मृति 1, 57; विष्णुस्मृति 25, 13-14.

3. मनस्मति 1, 154-6; याज्ञवल्क्य स्मृति 1, 77; विष्णुस्मृति 25, 13; कात्यायन स्मृति 36.

4. मनुस्मृति 9, 96.

5. मनुस्मृति 9, 45.

6. महाभारत, आदि पर्व 74, 40-41.

7. कुछ पाठ यह भी कहते हैं कि विवाह एक अनुबन्ध भी है, देखें; व्यवस्थाचन्द्रिका.

8  मनु ने कहा है कि पति-पत्नी का मिलन इसी जीवन का ही नहीं है, परन्तु मृत्यु के पश्चात अन्य जन्मों में। भी यह सम्बन्ध बना रहता है, मनुस्मृति 5, 160-161.

9. पत्नी के लिये आदेश यह था-सहधामणी पत्नी को चाहिये कि वह पातिव्रत्य धर्म का पालन न केवल काल में करे, बल्कि पति की मृत्यु के पश्चात् भी करे, मनुस्मृति 5-151, यही बात अन्य ऋषियों ने भी कही है-देखें, याज्ञवल्क्य स्मृति 1, विष्णु स्मृति 25, 13-14.

10.. याज्ञवल्क्य स्मृति 1, पराशरस्मृति 4, 26; विष्णुस्मृति 25, 17.

11. देखें-नारद स्मृति 12, 81; पराशर स्मृति 11, 26-35.

हैं-(क) जब पति लापता है, (ख) जब पति मर गया है, (ग) जब वह संन्यासी हो गया है, (घ) जब वह नपुंसक है, (ङ) जब वह जातिच्युत है। कौटिल्य के अनुसार भी पत्नी कुछ स्थितियों में पति को त्याग कर दूसरा विवाह कर सकती है। ये स्थितियां हैं-यदि पति चरित्रहीन, नपुंसक, देशद्रोही, या जाति से बहिष्कृत है, या परदेश भ्रमण कर रहा है, या उसके (पत्नी के) जीवन के लिये घातक है। इस बारे में मतभेद है कि क्या सब भांति के विवाहों में पत्नी पति का त्याग कर सकती थी? कुछ भी क्यों न हो, हमें यह ध्यान में रखना चाहिये कि उस युग में विवाह का संप्रत्यय एक अट बन्धन के रूप में था, जिसमें विवाह-विच्छेद का कोई स्थान नहीं था। अत: इधर-उधर कुछ पाठों या श्लोकों में से विवाह-विच्छेद के कुछ नियम खोज निकालना एक निठल्ले शोधकार्य से अधिक कुछ नहीं है।

विवाह की संस्था की प्रगति के इतिहास का एक विचित्र अंग यह है कि स्त्री पुरुषों के एक अनन्य सम्बन्ध के रूप में विवाह के स्थापित होते ही उसकी ग्रंथि ढीली हो गयी और उस ढील में से पुरुष निकल भागा। पुरुष ने दासियां रखना आरम्भ किया, रखैलें रखना आरम्भ किया, वेश्यावृत्ति प्रारम्भ हुयी। पूर्व में पुरुष ने रखैल, दासियों और वेश्याओं के साथ-साथ बहुपत्नीत्व विवाह की प्रथा को भी स्थापित किया। पुरुष सत्तारूढ़ था, उसकी वासना बन्धनहीन थी। अपनी वासना की तप्ति के लिये उसने सब द्वार खोले हुये थे। विवाह केवल स्त्री के लिये अनन्य बनकर रह गया। उसी के लिये यह संस्कार रहा। हिन्दू पत्नी पति को छोड़ नहीं सकती थी, चाहे कुछ भी क्यों न हो। हिन्दू पति भी पत्नी को छोड़ नहीं सकता था, परन्तु वह दूसरी अनेक पत्नियां रख सकता था, कितने ही वैवाहिक संस्कारों में बंध सकता था। यह दूसरी बात है कि एक से अधिक पत्नी रखने वाले हिन्दुओं की संख्या सदैव ही कम रही है।

यह सब करके क्या यथार्थ में पुरुष विवाह को अनन्य सम्बन्ध रख सका? क्या स्त्री ने भी ग्रन्थि को ढीला करके बाहर निकलने का मार्ग नहीं ढूंढ लिया? पत्नी ने प्रेमी रखना आरम्भ किया जिसे ‘जार’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है, और तब से ही पुरुष इस मार्ग को अवरुद्ध करने में लगा हुआ है। उसने विधान बनाया जिसके अन्तर्गत जारकर्म एक दण्डनीय अपराध ही नहीं, अपितु पाप भी है। हिन्दू आचार्यों के अनुसार यह उपपातकों में से एक है। परन्तु क्या जारकर्म कम हुआ है? यह कहना कठिन है। संसार के लगभग सभी देशों में यह विवाह-विच्छेद का एक आधार है। कुछ देशों में यह दाण्डिक अपराध (Crime) है, पूंजीपति देशों में यह एक अपकृत्य (Tort) है !

विवाह एक अनुबन्ध के रूप में (LLB 2nd Semester PDF Download)

यह संप्रत्यय कि विवाह एक अनुबन्ध है, आधुनिक युग की देन है। औद्योगिक क्रान्ति ने स्वतन्त्रता और समानता के विचारों को जन्म दिया। औद्योगिक क्रान्ति का मानव-विचारधारा में सबसे बड़ा योगदान है इस विचार का प्रवर्तन कि मानव-मानव और समाज के बीच सब सम्बन्धों का आधार है, व्यक्ति की स्वेच्छा और व्यक्ति की स्वेच्छा के बिना कोई भी सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकता है। इस पृष्ठभूमि में यह स्वाभाविक विचार था कि मानव-मानव के बीच उच्चतम सम्बन्ध, विवाह का आधार भी व्यक्ति की स्वेच्छा है।

औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् समस्त पश्चिमी देशों में विवाह को अनुबन्ध माना जाने लगा। आज पश्चिम के लगभग सभी देशों के विवाह पक्षकारों की स्वेच्छा के बिना नहीं हो सकते हैं, यद्यपि जिन विधि-व्यवस्थाओं में अवयस्क का विवाह मान्य है, वहां अवयस्क को स्वेच्छा के स्थान पर उसके संरक्षण की अनुमति पर्याप्त है|

हिन्दू विधि में विवाह संस्कार ही माना जाता रहा है।। अंग्रेजी शासनकाल में, न्यायालयों के निर्णयों द्वारा यह मत स्थापित हो गया है कि हिन्दू विवाह में पक्षकारों की स्वेच्छा का कोई महत्व नहीं है। पक्षकारों की स्वेच्छा न होने पर भी विवाह मान्य ही रहेगा। यही नहीं, न्यायालयों ने यह मत भी स्थापित किया कि वाघ म पागल (Lunatic) और जडबद्धि (Idiot) का विवाह भी विधिमान्य है क्योंकि हिन्दू विवाह पक्षकारों की अनुमति अनिवार्य नहीं है । हिन्दू विधि में हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 लागू

1. व्यवस्था चन्द्रिका, खण्ड 2, 432 में कहा गया है कि हिन्दू विवाह एक अनुबन्ध भा है.

2. कटाचार्यालू बनाम रंगाचार्यालू, (1890) 14 मद्रास 816.

होने के पूर्व यही मत विधिमान्य था। अब प्रश्न यह है कि क्या हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 ने विवाह के संप्रत्यय में कुछ परिवर्तन किया है।

हिन्दू विवाह अधिनियम,1955 के अन्तर्गत विवाह का संप्रत्यय-हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत विवाह एक अनुबन्ध है या अब भी संस्कार ही है? इस सम्बन्ध में अधिनियम की धारा 5, 11 और 12 का अवलोकन करना आवश्यक है। धारा 5 विवाह की शर्तों का वर्णन करती है। धारा 5 का खण्ड (ii) विवाह के लिये सम्मति देने की असमर्थता से सम्बन्धित है। धारा 5 के खण्ड (iii) में यह शर्त है कि विवाह के समय वधू ने 18 वर्ष की और वर ने 21 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है (शारदा अधिनियम के 1978 के संशोधन द्वारा यह आयु निर्धारित की गयी है)। अब संरक्षक की अनुमति का प्रश्न नहीं उठता है। वयस्कता और विवाह के समय स्वस्थचित्त होना वैवाहिक स्वेच्छा के द्योतक हैं। यदि विवाह अनुबन्ध माना जाता है तो यह आवश्यक है कि विवाह स्वेच्छा से होना चाहिये और स्वेच्छा पक्षकार तभी प्रकट कर सकते हैं जबकि वे वयस्क हों और स्वस्थचित्त हों। भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 11 के अन्तर्गत अवयस्क और विकृतचित्त और विकृतचित्त व्यक्ति द्वारा किया गया अनुबन्ध शून्य है। यदि विवाह को अनुबन्ध माना जाता है तो फिर यही कसौटी विवाह पर लाग होनी चाहिये। परन्तु हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत अवयस्क व्यक्ति शारदा अधिनियम (सन् 1978 के संशोधन के पश्चात् भी स्थिति यही है) का विवाह मान्य विवाह है। यह दूसरी बात है कि धारा 17 के अन्तर्गत कम आयु होने पर पक्षकार कुछ दण्ड के भागीदार होते हैं। तथ्य की बात यह है कि ऐसा विवाह पूर्णतया मान्य विवाह है। विकृतचित्त व्यक्ति का विवाह भी शून्य विवाह नहीं है, बल्कि ऐसा विवाह शून्यकरणीय है। शून्यकरणीय विवाह तब तक मान्य विवाह है जब तक कि उसका शून्यकरण न हो जाये। अनुबन्ध विधि का यह मान्य नियम है कि सामर्थ्यहीन व्यक्ति (अर्थात् वह व्यक्ति जो आवश्यक और विकृतचित्त है) का अनुबन्ध प्रारम्भ से ही शून्य होता है। इन उपबन्धों के अवलोकन पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत स्वेच्छा या पक्षकारों की अनुमति को कोई विशेष महत्व नहीं दिया गया है। स्वेच्छा सम्बन्धी शर्तों को रखा तो गया है, परन्तु स्वेच्छा न होने पर विवाह को शून्य नहीं माना गया है, अर्थात् स्वेच्छारहित विवाह भी उसी तरह मान्य है, जिस तरह स्वेच्छा से किया गया विवाह एक हल्का-सा प्रयत्न ऐसे विवाहों को रोकने को, हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 17 के अन्तर्गत और शारदा अधिनियम के अन्तर्गत बनाये गये दाण्डिक उपबन्धों द्वारा किया गया है। ऐसे विवाह के पक्षकारों को या ऐसा विवाह कराने वाले को दण्ड तो दिया जाता है, परन्तु विवाह को शून्य या अमान्य नहीं माना जाता है। विवाह पूर्णतया विधिमान्य होता है। हिन्दू विवाह अधिनियम में स्वेच्छा सम्बन्धी दूसरा उपबन्ध है, धारा 12 (1) (ग) जिसके अन्तर्गत विवाह के लिये किसी भी पक्षकार की अनुमति यदि बल या कपट से ली गयी है तो वह पक्षकार जिसकी अनुमति कपट या बल से ली गयी है ऐसे विवाह को शून्यकरणीय करा सकता है। ऐसा विवाह शून्य नहीं है। अनुमति लेने में कपट या बल का प्रयोग होना चाहिये। यदि अनुमति ली ही नहीं गयी है तो विवाह न तो शून्य होगा, और न ही शून्यकरणीय।

हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हिन्दू विवाह के लिये स्वेच्छा या अनुमति का कोई महत्व नहीं है। अत: हिन्द विवाह अनुबन्ध नहीं है। यह तर्क भी दिया जा सकता है कि जब दो व्यक्ति विवाह के अनष्ठान को सम्पन्न करते हैं तो उनकी स्वेच्छा विवक्षित है। सम्भवतः यह ठीक हो। परन्तु मान लीजिये, कोई व्यक्ति यह सिद्ध करने में सफल हो जाता है कि विवाह में न तो उसकी स्वेच्छा थी न ही अनुमति, तो फिर क्या विवाह शन्य होगा? क्या विवाह के शून्यकरण की घोषणा की डिक्री किसी न्यायालय से प्राप्त की जा सकती है? इस सम्बन्ध में हिन्दू विवाह अधिनियम में कोई उपबन्ध नहीं है। इस लेखक की राय में वैसे उपबन्ध के अभाव में किसी न्यायालय को वैसी डिक्री पास करने की अधिकारिता नहीं है। इससे तात्पर्य यह है कि ऐसा विवाह विधिमान्य विवाह है तो फिर स्पष्ट ही है कि हिन्दू विवाह अनुबन्ध नहीं है।

प्रश्न यह है कि क्या हिन्दू विवाह अब भी संस्कार है? हम ऊपर देख चुके हैं कि सांस्कारिक विवाह से तात्पर्य है-अट विवाह, जो विघटित नहीं हो सकता, जो जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध है जो एक पवित्र बन्धन है। सांस्कारिक विवाह के प्रथम तत्व को हिन्दू विवाह अधिनियम ने विच्छेद का उपबन्ध बनाकर नष्ट

कर दिया है। इसका दूसरा तत्व सन् 1856 में हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम ने नष्ट कर दिया था। सम्भवतः कुछ अंश तक तीसरा तत्व अब भी विद्यमान है, क्योंकि अधिकांश हिन्दू विवाहों के लिये धार्मिक अनुष्ठान अब भी अनिवार्य है परन्तु अनुष्ठानिक भाग हिन्दू विवाह का सबसे कम महत्वपूर्ण अंग है।

उपर्युक्त व्याख्या से यह तात्पर्य निकलता है कि हिन्दू विवाह न ही संस्कार रहा है और न ही अनुबन्ध बना है यद्यपि इसमें आभास दोनों का है। इसमें अनुबन्ध का आभास इसलिये है क्योंकि हिन्दू विवाह अधिनियम स्वेच्छा को थोड़ा-सा महत्व देता है। इसमें संस्कार का आभास इसलिये है अधिकांश हिन्दू विवाह के लिये अब भी धार्मिक अनुष्ठान अनिवार्य है।।

विवाह-विच्छेद (LLB 2nd Semester Notes)

मानव-समाज द्वारा यह मानने पर कि विवाह एक अनुबन्ध है, यह तर्कसंगत ही था कि विवाहविच्छेद को भी मान्यता दी जाये। विवाह के अनुबन्ध होने के साथ-साथ यह स्वीकार किया जाने लगा कि विवाह का विघटन भी हो सकता है। यह उल्लेखनीय है कि यद्यपि विवाह एक अनुबन्ध माना जाने लगा, फिर भी यह साधारण अनुबन्ध नहीं है; यह एक विशेष अनुबन्ध है। विवाह एक सामाजिक संस्था भी है। इस संस्था को बनाये रखने में ही समाज का हित है। यही कारण है कि संसार की सभी विधि-व्यवस्थाओं में विवाह को अनेक भांति के परित्राण (Safeguards) दिये गये हैं, परिवार की सुरक्षा के प्रतिबन्ध किये गये हैं, और विवाहितों को सुविधायें दी गयी हैं। यदि विवाह विशेष अनुबन्ध है तो उसका विघटन साधारण अनुबन्ध की भांति नहीं हो सकता है। अतः प्रारम्भिक धारणा यह स्थापित हुयी कि विवाह-विच्छेद किन्हीं विशेष कारणों से ही हो सकता था। विवाह-विच्छेद की प्रारम्भिक विधि में बहुत कम कारणों को विवाहविच्छेद का हेतु माना गया। उदाहरणार्थ, प्रारम्भिक अंग्रेजी विधि में जारकर्म, अभित्यजन और क्रूरता ही विवाह-विच्छेद के आधार माने गये थे।

विवाह-विच्छेद के आधारों पर हम दो दृष्टिकोणों से विचार कर सकते हैं-(क) विवाह एक अनन्य सम्बन्ध है और यदि यह अनन्य सम्बन्ध न रहे तो विवाह नहीं रहता है। जारकर्म विवाह की इस आधारभूत मान्यता को नष्ट कर देता है। विवाह का तात्पर्य है कि पक्षकार साथ-साथ मिलकर साहचर्य करेंगे, क्रूरता इस आधार को नष्ट कर देती है। विवाह का तात्पर्य है, पक्षकारों का साथ-साथ रहना, और सहवास करना। अभित्यजन (Desertion) विवाह के इस आधार को नष्ट कर देता है। अत: जारकर्म, क्रूरता और अभित्यजन विवाह की नींव को ही नष्ट कर देते हैं, और यथार्थ में विवाह, विवाह ही नहीं रह जाता है। (ख) दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो विवाह-विच्छेद के इन आधारों को हम वैवाहिक अपराधों की संज्ञा दे सकते हैं। वैवाहिक अपराध के अपराधी पक्षकार को दण्ड मिलना ही चाहिये। इस दृष्टिकोण से देखने पर विवाहविच्छेद अपराधी पक्षकार को, जिसने स्वयं को विवाह-बन्धन के अयोग्य सिद्ध कर दिया है, दण्डित करने का माध्यम है। विवाह-विच्छेद के प्रारम्भिक काल में इसी भावना ने जन्म दिया-विवाह-विच्छेद के आपराधिक सिद्धान्त को।

विवाह-विच्छेद का आपराधिक सिद्धान्त (Guilt theory) (LLB Notes in PDF)

प्रारम्भिक अंग्रेजी वैवाहिक विधि में विवाह-विच्छेद का आपराधिक सिद्धान्त ही सबसे औचित्यपूर्ण माना गया (जहां से यह समस्त राष्ट्र-मण्डल के देशों और अमरीकी संयुक्त राज्य में पहुंच गया)। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी भी विवाह का विच्छेद हो सकता है यदि एक पक्षकार यह सिद्ध कर दे कि दूसरे पक्षकार ने कोई वैवाहिक अपराध किया है। उस युग में यद्यपि विवाह-बंधन के बंधने की पूर्ण स्वतन्त्रता थी, तथापि विवाह-विच्छेद की इतनी स्वतन्त्रता नहीं थी। विवाह वैवाहिक विधि द्वारा निर्धारित आधारों पर ही समाप्त हो सकता था।

1. हिन्दू विवाह अधिनियम, धारा 7.

2. मैट्रिमोनियल कॉजेज ऐक्ट, 1857, आरम्भ में जारकर्म ही विवाह-विच्छेद का केवल एकमात्र हेतु माना गया था.

आपराधिक सिद्धान्त के अन्तर्गत यह आवश्यक है कि एक पक्षकार अपराधी हो और दूसरा पक्षकार निर्दोष हो। यदि एक पक्ष दूसरे पक्ष के अपराध में भागीदार है या परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उत्तरदायी है तो फिर वह विवाह-विच्छेद की मांग नहीं कर सकता है। इस नियम की चरम सीमा यह रही कि यदि दोनों पक्षकार पृथक्-पृथक् रूप से, (भागीदार के रूप में नहीं) अपराधी हैं तो उनमें से किसी को भी विवाहविच्छेद की डिक्री नहीं मिल सकती है। उदाहरणार्थ, मान लीजिये, पति ने पत्नी के जारकर्म के आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित की। याचिका की सुनवाई के दौरान यह सिद्ध हो गया कि पत्नी ही नहीं पति भी जारकर्म का अपराधी है तो फिर दोनों में से किसी को भी विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त नहीं हो सकती।

आपराधिक सिद्धान्त का दूसरा पक्ष यह है कि दूसरे पक्षकार को निर्दोष होना चाहिये। सिद्धान्त के इस पक्ष ने अंग्रेजी विधि में वैवाहिक वर्जनाओं (Bars) के नियम को जन्म दिया। इन वर्जनाओं को दो भागों में बांटा गया है-पूर्ण वर्जनायें और विवेकीय वर्जनायें (Discretionary bars)। वर्जनाओं से तात्पर्य यह है कि यदि याचिकाकार यह सिद्ध कर भी दे कि विपक्षी ने वैवाहिक अपराध किया है, तथापि उसे विवाह-विच्छेद की डिक्री तभी मिलेगी जब वह यह सिद्ध कर दे कि उस पर कोई वर्जना लागू नहीं होती है। पूर्ण वर्जना के होने पर डिक्री मिल ही नहीं सकती। वैवाहिक वर्जना होने पर डिक्री देना या न देना न्यायालय के विवेक पर है। वर्तमान अंग्रेजी विधि में वर्जनाओं को समाप्त कर दिया गया है। वर्तमान अंग्रेजी वैवाहिक विधि में आपराधिक सिद्धान्त को ही त्याग दिया गया है।।

कुछ समय उपरान्त अंग्रेजी वैवाहिक विधि में विवाह-विच्छेद का एक और आधार जोड़ा गया-उन्मत्ता, परन्तु उन्मत्तता आपराधिक सिद्धान्त पर खरी नहीं उतरती। उन्मत्तता को वैवाहिक अपराध नहीं कहा जा सकता है। यह तो दुर्भाग्य है। अत: यह आवश्यक हुआ कि विवाह-विच्छेद के सिद्धान्त में परिवर्तन किया जाये। अब आपराधिक सिद्धान्त का पुन: नामकरण किया गया-दोषिता सिद्धान्त के नाम से। यदि विवाह के किसी पक्षकार में कोई दोष है तो दोषहीन पक्षकार विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकता है। इस नये नामकरण ने एक बहुत बड़ा सैद्धान्तिक परिवर्तन भी किया। अब यह माना जाने लगा कि विवाह-विच्छेद की विधि का ध्येय दोषहीन पक्षकार को परित्राण देना है। अब तक आपराधिक सिद्धान्त के प्रवर्तक यह मानते थे कि विवाह-विच्छेद विधि का ध्येय अपराधी पक्षकार को दण्डित करना है। विवाहविच्छेद के इस नये सिद्धान्त का फल यह निकला कि अनेक देशों में विवाह-विच्छेद के कई आधारों का जन्म हुआ। इस भांति कुछ अवधि तक का कारावास, प्रतिपक्षी का लापता होना, विवाह की संसिद्धि (Consumation) न करना, कुष्ठ रोगों से पीड़ित होना, रतिज रोगों से पीड़ित होना, बलात्कार (Rape), गुदामैथुन (Sodomy), इत्यादि विवाह-विच्छेद के अन्य आधार माने गये।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में प्रारम्भ में केवल दोषिता-सिद्धान्त (Guilt theory) को मान्यता दी गयी थी। धारा 13 (1) में विवाह-विच्छेद के दोषिता के आधार दिये गये हैं। विवाह-विच्छेद के आधारों में घोर कट्टरपंथीपन था-जारकर्म, क्रूरता और अभित्यजन विवाह-विच्छेद के आधार नहीं थे, बल्कि न्यायिक पथक्करण के आधार थे। विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 ने अब इन्हें विवाह-विच्छेद का आधार बनाया है और अन्य आधारों को भी उदार बनाया है।

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 23 (1) में वैवाहिक अनुतोष की वर्जनाओं को स्थान दिया गया है। सभी वर्जनायें पूर्ण वर्जनायें हैं। 1976 के संशोधन द्वारा कुछ वर्जनाओं को विवाह की अकृतता पर से हटा लिया गया है।

सन 1964 में संशोधन द्वारा विवाह भंग सिद्धान्त को मान्यता दी गयी। सन् 1976 के संशोधन द्वारा पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद को भी मान्यता दी गयी है।

1. देखें, अध्याय 5; अंग्रेजी विधि में अब वर्जनाओं को समाप्त कर दिया गया है। मैट्रिमोनियल कॉजेज ऐक्ट, 1973.

2. धारा 10.

3. धारा 13 (1-क).

विवाह-विच्छेद का स्वेच्छा का सिद्धान्त (Consent theory of divorce) (LLB Study Material in Hindi English)

आपराधिक या दोषिता सिद्धान्त के स्थान पर स्वेच्छा सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है। इस सिद्धान्त के प्रवर्तकों का कहना है कि विवाह के पक्षकारों को विवाह-विच्छेद की भी उतनी ही स्वतन्त्रता है जितनी कि विवाह सम्पन्न करने की। यदि विवाह एक पारस्परिक अनुमति द्वारा स्थापित सम्बन्ध है तो यह तर्क संगत ही होगा कि उनका विघटन भी (किसी कारण या आधार बनाये बिना) पारस्परिक अनुमति द्वारा हो जाये। मनुष्य जिस भांति किसी अन्य अनुबन्ध या कृत्य के करने में त्रुटि कर सकता है, उसी भांति वह विवाह-सम्बन्ध स्थापित करने में भी त्रुटि कर सकता है, उसे अपनी त्रुटि सुधारने की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिये। तर्क यह है-दो व्यक्ति जिन्होंने अपनी स्वेच्छा से विवाह किया है, विवाह के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उनका विवाह सफल नहीं है, टूट गया है, वे साथ-साथ नहीं रह सकते। एक दूसरे के साथ साहचर्य असम्भव है, अतः यह उनके और समाज के हित में होगा कि विवाह-बन्धन को तोड़कर वे पृथक् हो जागें। उनका विवाह इसलिये सफल नहीं रहा है कि उनमें से कोई पक्ष दुष्ट है; बुरा है; विद्वेषपूर्ण है या पतित है। वे साधारण मनुष्य हैं, उनमें से कोई अव्यसन नहीं है, बस उनका यह दुर्भाग्य है कि उनका विवाह असफल हो गया है और उनके लिये साथ-साथ रह पाना असम्भव हो गया है। क्या उन्हें अपनी भूल सुधारने का अवसर नहीं मिलना चाहिये? वह भूल जिसके कारण उनका जीवन दूभर हो गया है। यदि इस परिस्थिति से उबरने का कोई मार्ग नहीं होगा तो वे भटक जायेंगे। हो सकता है कि आपराधिक भावना से प्रेरित होकर वे कोई अपराध ही कर बैठे। इस भांति का दुखी और असफल कुटुम्ब अपराधी वृत्ति के अपत्यों के पालन-पोषण का अखाड़ा बन जाता है। ऐसे कुटुम्ब को स्थापित रखे रहना न तो व्यक्ति के हित में है और न ही समाज के हित में है। अतः इस सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह तर्क प्रस्तुत किया है कि विवाह की स्वतन्त्रता में विवाह-विच्छेद की पूर्ण स्वतन्त्रता निहित है। विवाह स्त्री-पुरुष का अनन्य सम्बन्ध तभी स्थापित हो सकता है जबकि विवाह-विच्छेद की पूर्ण स्वतन्त्रता हो। एंगिल्स के शब्दों में यदि वे ही विवाह नैतिक हैं जिनका आधार प्रेम है तो फिर वे ही विवाह नैतिक रहेंगे। जिनमें प्रेम का साम्राज्य है। प्रेम के समाप्त होने पर या अन्यत्र प्रेम स्थापित होने पर पक्षकारों का पृथक् हो जाना ही उनके और समाज के हित में है। यदि वे पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद कर सकते हैं तो वे व्यर्थ की, अनावश्यक और लम्बी विवाह-विच्छेद की कार्यवाही से बच सकते हैं।

विवाह की नींव आपसी विश्वास है, यदि नींव ही टूट जाये तो विवाह एक जर्जर ढांचा मात्र रह जायेगा। अतः विश्वास टूटने पर यही औचित्यपूर्ण है कि वे उसी स्वतन्त्रता से विवाह-विच्छेद कर लें जिस स्वतन्त्रता से उन्होंने विवाह किया था। आपसी विश्वास को स्थापित रखने का अन्य कोई साधन नहीं है। पारम्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद एक असहनीय परिस्थिति का प्रतिग्रहण है। विधि अभागे युगल से कहती है-“यदि तुम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हो कि तुम्हारा विवाह असफल हो गया है और विवाह-विच्छेद ही इस स्थिति से उबरने का एकमात्र मार्ग है, तो तुम विवाह-विच्छेद कर सकते हो।”

पारम्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद के सिद्धान्त की आलोचना में यह कहा गया है कि यह विवाह-विच्छेद को प्रोत्साहन देता है पर इस सिद्धान्त के प्रवर्तक इस आलोचना का खण्डन करते हैं। लेनिन के अनुसार पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद कुटुम्बों को तोड़ेगा नहीं बल्कि उन्हें प्रजातन्त्रवाद के सिद्धान्त पर आधारित करके सुदृढ़ करेगा-प्रजातन्त्रवाद ही सभ्य समाज की सही नींव हो सकता है। अतः विवाह-विच्छेद की स्वतन्त्रता अराजकता को जन्म नहीं देगी और न ही यह अनैतिकता को प्रोत्साहन देगी। अंग्रेजी लेखक टिलट के शब्दों में किसी देश की नैतिकता का मानदण्ड उस देश में प्रचलित पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद की प्रथा नहीं हो सकती। यह कहना भ्रांतिपर्ण होगा कि पारस्परिक अनुमात। द्वारा विवाह-विच्छेद अनैतिकता को खली छूट देने के सदश है । इस सिद्धान्त के प्रवर्तकों का कहना है पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद सुखी विवाहों को जन्म देगा और दुखी विवाहों का संख्या न्यूनतम करेगा। यह पति-पत्नी को शान्तिपूर्वक और एक दूसरे के साथ सहयोगपूर्ण जीवन व्यतीत करने के

1. ओरिजिन ऑफ फेमिली, प्राइवेट प्रॉपर्टी, पृष्ठ 117-118 (मास्को प्रकाशन).

2. लॉ एण्ड दी प्यूपिल 157.

लिये प्रोत्साहित करेगा। पारिवारिक एकता बढ़ेगी और पति-पत्नी अपने-अपने कार्य को सुचारु रूप से करने के । लिये प्रेरित होंगे। विवाह-विच्छेद की स्वतन्त्रता पति-पत्नी को विवाह के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने के लिये बाध्य करेगी।

अक्टूबर-क्रान्ति के पश्चात सोवियत संघ ने अपनी वैवाहिक विधि में इस सिद्धान्त को मान्यता दी। जनवादी चीन, गणराज्य बेल्जियम, बल्गेरिया, नार्वे, स्वीडन, जापान, पुर्तगाल और दक्षिणी अमेरिका के कुछ राज्यों ने किसी-न-किसी रूप में इस सिद्धान्त को मान्यता दी है। संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ राज्य मा इस मान्यता देते हैं। भारत में विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और 1976 के संशोधन के पश्चात् हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत इस सिद्धान्त को अपनाया गया है।

पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद के सिद्धान्त की आलोचना में एक दूसरे की विरोधी दो बातें कही गयी हैं-

(क) यह सिद्धान्त विवेकहीन और जल्दबाजी में किये गये विवाह-विच्छेद को प्रोत्साहित करता है। बहुधा ऐसा होता है कि विवाह-विच्छेद की सहूलियत की पृष्ठभूमि में पक्षकार अपने भेदभावों और आकुलता को बढ़ा-चढ़ा कर सोचने लगते हैं, तनिक सन्तुलन बिगड़ने पर, तनिक मनमुटाव होने पर, वे सोचने लगते हैं कि उनका विवाह असफल हो गया है, उन्हें विवाह-विच्छेद कर लेना चाहिये। बिना सोचे-समझे वे विवाह-विच्छेद कर लेते हैं, फिर पछताते हैं। जिसे उन्होंने विवाह की असफलता समझा था वह समायोजन (Adjustment) की समस्या के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। इस आलोचना का उत्तर अनेक विधि-व्यवस्थाओं ने पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद को अभिरक्षित करके दिया है। पक्षकारों को सोचने का पर्याप्त समय दिया जाता है उसके पश्चात् ही वे पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद करा सकते हैं।

वर्तमान अंग्रेजी विधि में भी पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद को मान्यता दी गयी है। मैट्रीमोनियल कॉजेज ऐक्ट, 1973 के अन्तर्गत उपबन्ध यह है कि यदि दो वर्ष की अवधि तक पति-पत्नी एक दूसरे से पृथक् रह रहे हैं तो कोई भी पक्षकार दूसरे पक्षकार की अनुमति से विवाहविच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकता है। विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955-56 के अन्तर्गत पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद का उपबन्ध इस भांति है-

(i) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुये, दोनों पक्षकार मिलकर विवाह-विच्छेद के लिये अर्जी जिला न्यायालय में इस आधार पर प्रस्तुत कर सकते हैं कि वे एक वर्ष या उससे अधिक से अलग-अलग रह रहे हैं और वे एक साथ नहीं रह सकते हैं तथा वे इस बात के लिये परस्पर सहमत हो गये हैं कि विवाह विघटित कर देना चाहिये।

(ii) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अर्जी के पेश किये जाने की तारीख से छ: माह के पश्चात और अठारह माह के भीतर दोनों पक्षकारों द्वारा किये गये प्रस्तावों पर, यदि इस बीच में अर्जी वापस न ले ली गयी हो, तो जिला न्यायालय पक्षकारों को सुनने के पश्चात् और ऐसी जांच जैसी कि वह ठीक समझे, करने के पश्चात् अपना यह समाधान कर लेने पर कि विवाह इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित हुआ है और अर्जी में किये गये प्रकथन सही हैं, यह घोषणा करने वाली डिक्री पारित करेगा कि विवाह डिक्री की तारीख से विघटित हो जायेगा।

इस सिद्धान्त की पहली आलोचना का यह समुचित उत्तर है।

(ख) इस सिद्धान्त की दूसरी आलोचना यह है कि विवाह-विच्छेद को अत्यधिक कठिन और असम्भव बना देता है। पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद के सिद्धान्त के अन्तर्गत किसी भी विवाह का विघटन तब तक नहीं हो सकता है जब तक कि दोनों पक्षकार सहमत न हों। यदि एक पक्षकार अपनी अनमति देने से इन्कार करता रहे तो विवाह-विच्छेद हो ही नहीं सकता। हो सकता है कि विवाह के असफल होने पर भी दूसरा पक्ष अपनी अनुमति न दे, या उस पक्षकार का विवाह की

अखण्डता में इतना विश्वास हो कि वह उसका विघटन सोच ही नहीं सकता हो, या वह विद्वेषी हो, घमण्डी हो और विवाह-विच्छेद के लिये किसी भांति तैयार न हो। इस आलोचना का कोई उत्तर नहीं है।

असमाधेय भंग-विवाह का सिद्धान्त (Irretrievable breakdown of marriage theory of divorce) (LLB Study Material)

अपराध या दोषिता-सिद्धान्त इसलिये अपर्याप्त माना गया है कि बिना दोषिता आधार के विवाह का विघटन हो ही नहीं सकता है। स्वेच्छा-सिद्धान्त इसलिये अपर्याप्त है कि उसके अन्तर्गत या तो विवाहविच्छेद बहुत आसानी से हो सकता है, या हो ही नहीं सकता है। आधुनिक वैवाहिक विधि-व्यवस्था के समक्ष समस्या यह है कि कोई असमाधेय विवाह-भंग हो गया है, चाहे पक्षकारों में से एक के दोषी होने के कारण या दोनों के दोषी होने के कारण या अकारण ही और उसके जुड़ने की कोई सम्भावना नहीं है, तो फिर क्या उस तथाकथित विवाह को स्थापित रखना व्यक्ति या समाज के हित में होगा? अब यह माना जाने लगा है। कि ऐसी स्थिति में विवाह का विघटन समाज और व्यक्ति के हित में होगा। ऐसा विवाह, का ढांचा मात्र है, तथ्यहीन है, उसका विघटन ही सही उपचार है। असमाधेय भंग-विवाह सिद्धान्त प्रवर्तक अपने सिद्धान्त का यही औचित्य बताते हैं। उनके अनुसार असमाधेय भंग विवाह सिद्धान्त एक असहनीय स्थिति को स्वीकार करता है और संतप्त (Unhappy) युगल से (या उनमें से एक के, जो भी इस स्थिति से उबरना चाहे) कहता है-“यदि तुम न्यायालय के समक्ष यह फिर सिद्ध कर दो कि तुम्हारा विवाह असफल होकर भंग हो गया है, उसके जुड़ने की कोई सम्भावना नहीं है, तुम उस स्थिति से उबरना चाहते हो, तो फिर तुम्हारा विवाह विघटित कर दिया जायेगा, कुछ भी कारण क्यों न हो, या कोई भी कारण न हो।” इंग्लैण्ड के लॉ कमीशन ने कहा है, किसी भी आदर्श वैवाहिक विधि के दो ध्येय होते हैं-प्रथम, विवाह के स्थायित्व को सुस्थिर और मजबूत करना; द्वितीय, जब दुर्भाग्यवश एक विवाह भंग हो गया है, टूट गया है और उसके साथ जुड़ सकने की कोई सम्भावना नहीं है तो फिर उसे शीघ्रता से, कम से कम कष्ट के साथ, औचित्यपूर्वक, बिना कटुता के विघटित कर देना चाहिये। संक्षिप्त रूप में इस सिद्धान्त का तात्पर्य यही है कि यदि विवाह जुड़ने की सम्भावना के बिना टूट चुका है, तो उसका विघटन करना ही श्रेयस्कर है, यह जाने बिना ही कि टूटने का क्या कारण है या उस टूटने के लिये कौन-सा पक्षकार उत्तरदायी है।

असमाधेय भंग-विवाह सिद्धान्त विवाह-विच्छेद का आधुनिकतम सिद्धान्त है और कई देशों की विधियों में उसे स्थापित किया गया है। सोवियत संघ, पूर्वी यूरोप के अधिकांश देशों में और पश्चिमी जर्मनी की वैवाहिक विधियों में उसे स्थान दिया गया है। पश्चिम के कुछ अन्य देश भी इस सिद्धान्त को मान्यता दे चुके हैं। इंग्लैण्ड में इस रुझान का श्रीगणेश हआ था। कुछ दोषिता आधारों जैसे क्रूरता की इतनी व्यापक व्याख्या कि जिस स्थिति में भी विवाह टूट गया हो उसे ‘क्रूरता’ की संज्ञा दी गयी और विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित कर दी गयी। न्यायालयों की इस प्रवृत्ति का फल यह निकला कि आज इंग्लैण्ड ने इस सिद्धान्त को मान्यता दे दी है।

आधुनिक विधि में असमाधेय भंग विवाह सिद्धान्त के दो रूप हैं-

प्रथम, वैवाहिक विधि यह नियम निर्धारित करती है कि असमाधेय विवाह भंग हो गया है और उसके जुड़ने की कोई सम्भावना नहीं है, तो उसे विघटित कर देना चाहिये। इस प्रश्न का निर्धारण कि वास्तव में विवाह असमाधेय रूप से भंग हुआ या नहीं, न्यायालयों पर छोड़ दिया गया है। दूसरे शब्दों में, अधिनियम विवाह टूटने का कोई मानदण्ड निर्धारित नहीं करता है, इस तथ्य की जांच कि यथार्थ में विवाह टूटा है या। नहीं न्यायालय पर छोड़ देता है। सोवियत संघ ने सन् 1944 से अब तक की वैवाहिक विधियों में असमाधय।

1. देखें, रिपोर्ट 15.

2. देखें, गोलिन्स बनाम गोलिन्स, (1963) ऑल ई० आर० 1966: विलियम्स बनाम विलियम्स, (1963) 2 ऑल ई० आर० 964; मसरती बनाम मसरती, (1969) डब्ल्यू ० एल० आर० 392.

3. देखें, मैट्रिमोनियल कॉजेज ऐक्ट, 1973 धारा 1.

भंग विवाह के इस रूप को ही अपनाया है। पश्चिमी जर्मनी की सन 1949 की विधि में और पूर्वी यूरोप के ‘अधिकांश देशों की विधियों में भी इसी रूप को मान्यता दी गयी है। इन देशों की विधियों में विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित करने के पूर्व न्यायालय का यह कर्तव्य माना गया है कि वे पक्षकारों के पुनः मिलन का प्रयत्न करें।

द्वितीय, अधिनियम असमाधेय भंग-विवाह का मानदण्ड निर्धारित करता है, उसके सिद्ध होने पर ही न्यायालय पक्षकारों के पृथक्-पृथक रहने की एक न्यूनतम अवधि निर्धारित करता है और उस अवधि तक या उससे अधिक की अवधि तक पथक-पथक रहने के तथ्य के सिद्ध होने पर न्यायालय विवाह-विच्छेद की डिक्रा पारित कर सकते हैं। इस सिद्धान्त के इस रूप को इंग्लैण्ड ने सन् 1969 में स्वीकार किया है, यदि याचिका प्रेषित करने के पूर्व पांच वर्ष या उससे अधिक की कालावधि से पक्षकार एक दूसरे से पृथक्-पृथक् रहे हैं तो कोई भी पक्षकार इस आधार पर विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकता है।

कुछ देशों (जैसे स्वीडन, न्यूजीलैण्ड, और आस्ट्रेलिया के कुछ राज्यों में) की विधि में असमाधेय भंग विवाह के दो अन्य आधार मान्य रहे हैं-

(क) विवाह के दोनों पक्षकार इस आधार पर कि उनका विवाह पूर्णतया टूट चुका है, विवाह-विच्छेद के लिये संयुक्त याचिका प्रेषित कर सकते हैं। ऐसी याचिका एक पक्षकार द्वारा प्रेषित हो सकती है। पहली स्थिति में न्यायालय बिना किसी प्रमाण के याचिका स्वीकार करके विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित कर देगा, दूसरी स्थिति में न्यायालय के समक्ष यह प्रमाणित होने पर कि विवाह पूर्णतया टूट गया है, विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित होगी।

(ख) विवाह-विच्छेद की डिक्री उस आधार पर मिल सकती है कि न्यायिक पृथक्करण या दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री पारित होने के पश्चात् पक्षकार एक वर्ष की अवधि तक एक दूसरे से वास्तव में पृथक्-पृथक् रहे है।

असमाधेय भंग विवाह सिद्धान्त हिन्दू विधि में सन् 1964 में स्थापित किया गया। अधिनियम के अन्तर्गत कोई भी पक्षकार निम्न दोनों में से किसी एक आधार के होने पर विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकता है-(च) न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पास होने के पश्चात् एक वर्ष या उससे अधिक की कालावधि तक विवाह के पक्षकारों के बीच सहवास का पुनरारम्भ नहीं हुआ है; (छ) दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन (Restitution) की डिक्री पारित किये जाने के पश्चात् एक वर्ष या उससे अधिक की कालावधि तक विवाह के पक्षकारों के बीच दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन नहीं हुआ। विशेष विवाह अधिनियम में भी सन 1970 में ऐसा ही उपबन्ध बनाया गया है। हिन्दू विवाह अधिनियम का यह उपबन्ध न्यायालय के समक्ष व्याख्या के लिये आया है और कुछ न्यायालयों ने हिन्दू अधिनियम की धारा 23 को लाग करते हये यह कहा है कि यदि याचिकाकार निर्दोष व्यक्ति नहीं है तो उन्हें विवाह-विच्छेद की डिक्री नहीं मिल सकती है। इन निर्णयों से स्पष्ट तात्पर्य यह है कि हमारे न्यायालयों ने असमाधेय विवाह भंग सिद्धान्त के मूलभूत नियम को समझने का प्रयास किया है। परन्तु अब न्यायालयों के मत में परिवर्तन हो रहा है। (देखें; अध्याय 6 “असमाधेय भंग विवाह” शीर्षक के अन्तर्गत)।

1. हिन्दू विवाह (संशोधन) अधिनियम, 1964 द्वारा.

2. धारा 13 (1) (i-क) हिन्दू विवाह अधिनियम विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के द्वारा अवधि एक वर्ष की दी गयी है। पहले यह दो वर्ष थी.

3 विशेष विवाह (संशोधन) अधिनियम, 1970.

4. देखें, अध्याय 6, “विवाह-भंग-सिद्धान्त’ शीर्षक के अन्तर्गत.

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